महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१८३-
त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण
धृतराष्ट्र उवाच
कर्णदुर्योधनादीनां शकुनेः सौबलस्य च ।
अपनीतं महत् तात तव चैव विशेषतः ॥ १ ॥
यदि जानीथ तां शक्तिमेकघ्नीं सततं रणे ।
अनिवार्यामसह्यां च देवैरपि सवासवैः ॥ २ ॥
सा किमर्थं तु कर्णेन प्रवृत्ते समरे पुरा ।
न देवकीसुते मुक्ता फाल्गुने वापि संजय ॥ ३ ॥
धृतराष्ट्र बोले— तात संजय! कर्ण, दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनिका तथा विशेषतः तुम्हारा इस विषयमें महान् अन्याय है। यदि तुम लोग जानते थे कि यह शक्ति रणभूमिमें सदा किसी एक ही वीरको मार सकती है तथा इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी न तो इसे रोक सकते हैं और न इसका आघात ही सह सकते हैं, तब तुम्हारे सुझानेसे युद्ध आरम्भ होनेपर कर्णने पहले ही देवकीनन्दन श्रीकृष्ण अथवा अर्जुनपर वह शक्ति क्यों नहीं छोड़ी? ॥ १—३ ॥
संजय उवाच
संग्रामाद् विनिवृत्तानां सर्वेषां नो विशाम्पते ।
रात्रौ कुरुकुलश्रेष्ठ मन्त्रोऽयं समजायत ॥ ४ ॥
प्रभातमात्रे श्वोभूते केशवायार्जुनाय वा ।
शक्तिरेषा हि मोक्तव्या कर्ण कर्णेति नित्यशः ॥ ५ ॥
संजयने कहा— प्रजानाथ! कुरुकुलश्रेष्ठ! प्रतिदिन संग्रामसे लौटनेपर रात्रिमें हमलोगोंकी यही सलाह हुआ करती थी कि 'कर्ण! तुम कल सबेरा होते ही श्रीकृष्ण अथवा अर्जुनपर यह शक्ति चला देना' ॥ ४-५ ॥
ततः प्रभातसमये राजन् कर्णस्य दैवतैः ।
अन्येषां चैव योधानां सा बुद्धिर्नाश्यते पुनः ॥ ६ ॥
परंतु राजन्! प्रातःकाल आनेपर देवतालोग कर्ण तथा अन्य योद्धाओंके उस विचारको पुनः नष्ट कर देते थे ॥ ६ ॥
दैवमेव परं मन्ये यत् कर्णो हस्तसंस्थया ।
न जघान रणे पार्थं कृष्णं वा देवकीसुतम् ॥ ७ ॥
मैं तो दैव (प्रारब्ध)-को ही सबसे बड़ा मानता हूँ, जिससे कर्णने हाथमें आयी हुई शक्तिके द्वारा रणभूमिमें कुन्तीकुमार अर्जुन अथवा देवकीनन्दन श्रीकृष्णका वध नहीं किया ॥ ७ ॥
तस्य हस्तस्थिता शक्तिः कालरात्रिरिवोद्यता ।
दैवोपहतबुद्धित्वान्न तां कर्णो विमुक्तवान् ॥ ८ ॥
कृष्णे वा देवकीपुत्रे मोहितो देवमायया ।
पार्थे वा शक्रकल्पे वै वधार्थं वासवीं प्रभो ॥ ९ ॥
कर्णके हाथमें स्थित हुई वह शक्ति कालरात्रिके समान शत्रुवधके लिये उद्यत थी; परंतु दैवके द्वारा बुद्धि मारी जानेके कारण देवमायासे मोहित हुए कर्णने इन्द्रकी दी हुई उस शक्तिको देवकीनन्दन श्रीकृष्ण अथवा इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनपर उनके वधके लिये नहीं छोड़ा ॥ ८-९ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
दैवेनोपहता यूयं स्वबुद्ध्या केशवस्य च ।
गता हि वासवी हत्वा तृणभूतं घटोत्कचम् ॥ १० ॥
धृतराष्ट्र बोले— संजय! निश्चय ही तुमलोग दैवके द्वारा मारे गये थे। श्रीकृष्णकी अपनी बुद्धिसे वह इन्द्रकी शक्ति तिनकेके समान घटोत्कचका वध करके चली गयी ॥ १० ॥
कर्णश्च मम पुत्राश्च सर्वे चान्ये च पार्थिवाः ।
तेन वै दुष्प्रणीतेन गता वैवस्वतक्षयम् ॥ ११ ॥
अब तो मैं समझता हूँ कि उस दुर्नीतिके कारण कर्ण, मेरे सभी पुत्र तथा अन्य भूपाल यमलोकमें जा पहुँचे ॥ ११ ॥
भूय एव तु मे शंस यथा युद्धमवर्तत ।
कुरूणां पाण्डवानां च हैडिम्बे निहते तदा ॥ १२ ॥
अब घटोत्कचके मारे जानेपर कौरवों तथा पाण्डवोंमें पुनः जिस प्रकार युद्ध आरम्भ हुआ, उसीका मुझसे वर्णन करो ॥ १२ ॥
ये च तेऽभ्यद्रवन् द्रोणं व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
सृञ्जयाः सह पञ्चालैस्तेऽप्यकुर्वन् कथं रणम् ॥ १३ ॥
प्रहार करनेमें कुशल जिन सृञ्जयों और पांचालोंने अपनी सेनाका व्यूह बनाकर द्रोणाचार्यपर धावा किया था, उन्होंने किस प्रकार संग्राम किया? ॥ १३ ॥
सौमदत्तेर्वधाद् द्रोणमायान्तं सैन्धवस्य च ।
अमर्षाज्जीवितं त्यक्त्वा गाहमानं वरूथिनीम् ॥ १४ ॥
जृम्भमाणमिव व्याघ्रं व्यात्ताननमिवान्तकम् ।
कथं प्रत्युद्ययुर्द्रोणमस्यन्तं पाण्डुसृञ्जयाः ॥ १५ ॥
भूरिश्रवा तथा जयद्रथके वधसे कुपित हो जब द्रोणाचार्य आये और जीवनका मोह छोड़कर पाण्डव-सेनामें उसका मन्थन करते हुए प्रवेश करने लगे, उस समय जँभाई लेते हुए व्याघ्र तथा मुँह बाये हुए यमराजके समान बाण-वर्षा करते हुए द्रोणाचार्यके सम्मुख पाण्डव और सृंजय योद्धा कैसे आ सके? ॥ १४-१५ ॥
आचार्यं ये च तेऽरक्षन् दुर्योधनपुरोगमाः ।
द्रौणिकर्णकृपास्तात ते वाकुर्वन् किमाहवे ॥ १६ ॥
तात! अश्वत्थामा, कर्ण, कृपाचार्य तथा दुर्योधन आदि जो महारथी रणभूमिमें आचार्य द्रोणकी रक्षा करते थे, उन्होंने वहाँ क्या किया? ॥ १६ ॥
भारद्वाजं जिघांसन्तौ सव्यसाचिवृकोदरौ ।
समाच्छ॑न् मामका युद्धे कथं संजय शंस मे ॥ १७ ॥
संजय! द्रोणाचार्यको मार डालनेकी इच्छावाले अर्जुन और भीमसेनपर युद्धस्थलमें मेरे सैनिकोंने किस प्रकार आक्रमण किया? यह मुझे बताओ ॥ १७ ॥
सिन्धुराजवधेनेमे घटोत्कचवधेन ते ।
अमर्षिताः सुसंक्रुद्धा रणं चक्रुः कथं निशि ॥ १८ ॥
सिन्धुराज जयद्रथके वधसे अमर्षमें भरे हुए कौरवों तथा घटोत्कचके मारे जानेसे अत्यन्त कुपित हुए पाण्डवोंने रात्रिमें किस प्रकार युद्ध किया? ॥ १८ ॥
संजय उवाच
हते घटोत्कचे राजन् कर्णेन निशि राक्षसे ।
प्रणदत्सु च हृष्टेषु तावकेषु युयुत्सुषु ॥ १९ ॥
आपतत्सु च वेगेन वध्यमाने बलेऽपि च ।
विगाढायां रजन्यां च राजा दैन्यं परं गतः ॥ २० ॥
**संजयने कहा—**राजन्! जब रातमें कर्णके द्वारा राक्षस घटोत्कच मारा गया, आपके सैनिक हर्षमें भरकर युद्धकी इच्छासे गर्जना करते हुए वेगपूर्वक आक्रमण करने लगे तथा पाण्डव-सेना मारी जाने लगी, उस समय प्रगाढ़ रजनीमें राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दीन एवं दुःखी हो गये ॥ १९-२० ॥
अब्रवीच्च महाबाहुर्भीमसेनमिदं वचः ।
आवारय महाबाहो धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् ॥ २१ ॥
हैडिम्बैश्चैव घातेन मोहो मामाविशन्महान् ।
उन महाबाहु नरेशने भीमसेनसे इस प्रकार कहा—'महाबाहो! तुम्हीं दुर्योधनकी सेनाको रोको। घटोत्कचके मारे जानेसे मेरे मनमें महान् मोह छा गया है' ॥ २१ ½ ॥
एवं भीमं समादिश्य स्वरथे समुपाविशत् ॥ २२ ॥
अश्रूपूर्णमुखो राजा निःश्वसंश्च पुनः पुनः। कश्मलं प्राविशद् घोरं दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम्॥ २३॥ इस प्रकार भीमको आदेश देकर राजा युधिष्ठिर बारंबार सिसकते हुए अपने रथपर जा बैठे। उस समय उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी। वे कर्णका पराक्रम देखकर घोर चिन्तामें डूब गये थे॥ २२-२३॥
तं तथा व्यथितं दृष्ट्वा कृष्णो वचनमब्रवीत्। मा व्यथां कुरु कौन्तेय नैतत् त्वय्युपपद्यते॥ २४॥ वैकलव्यं भरतश्रेष्ठ यथा प्राकृतपूरुषे। उन्हें इस प्रकार व्यथित देखकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—‘कुन्तीनन्दन! भरतश्रेष्ठ! आप दुःख न मानिये। आपके लिये मूढ़ मनुष्योंकी-सी यह व्याकुलता शोभा नहीं देती॥ २४१/२॥
उत्तिष्ठ राजन् युध्यस्व वह गुर्वीं धुरं विभो॥ २५॥ त्वयि वैक्लव्यमापन्ने संशयो विजये भवेत्। ‘राजन्! उठिये और युद्ध कीजिये। इस महासंग्रामका गुरुतर भार सँभालिये। प्रभो! आपके घबरा जानेपर विजय मिलनेमें संदेह है’॥ २५१/२॥
श्रुत्वा कृष्णस्य वचनं धर्मराजो युधिष्ठिरः॥ २६॥ विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां कृष्णं वचनमब्रवीत्। श्रीकृष्णका कथन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने दोनों हाथोंसे अपनी आँखें पोंछकर उनसे इस प्रकार कहा—॥
विदिता मे महाबाहो धर्माणां परमा गतिः॥ २७॥ ब्रह्महत्या फलं तस्य यैः कृतं नावबुध्यते। ‘महाबाहो! मुझे धर्मकी श्रेष्ठ गति विदित है। जो मनुष्य किसीके किये हुए उपकारको याद नहीं रखता, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है॥ २७१/२॥
अस्माकं हि वनस्थानां हैडिम्बेन महात्मना॥ २८॥ बालेनापि सता तेन कृतं साह्यं जनार्दन। ‘जनार्दन! जब हमलोग वनमें थे, उन दिनों महामनस्वी हिडिम्बाकुमारने बालक होनेपर भी हमारी बड़ी भारी सहायता की थी॥ २८१/२॥
अस्त्रहेतोर्गतं ज्ञात्वा पाण्डवं श्वेतवाहनम्॥ २९॥ असौ कृष्ण महेष्वासः काम्यके मामुपस्थितः। उषितश्च सहास्माभिर्यावन्नासीद् धनंजयः॥ ३०॥ ‘श्रीकृष्ण! श्वेतवाहन अर्जुनको अस्त्र-प्राप्तिके लिये अन्यत्र गया हुआ जानकर महाधनुर्धर घटोत्कच काम्यकवनमें मेरे पास आया और जबतक अर्जुन लौट नहीं आये तबतक हमारे साथ ही रहा॥ २९-३०॥
गन्धमादनयात्रायां दुर्गेभ्यश्च स्म तारिताः । पाञ्चाली च परिश्रान्ता पृष्ठेनोढा महात्मना ॥ ३१ ॥ ‘गन्धमादनकी यात्रामें उसने बड़े-बड़े संकटोंसे हमें बचाया है, पांचालराजकुमारी द्रौपदी जब थक गयी तो उस महाकाय वीरने उन्हें अपनी पीठपर बिठाकर ढोया ॥ ३१ ॥ आरम्भाच्चैव युद्धानां यदेष कृतवान् प्रभो । मदर्थे दुष्करं कर्म कृतं तेन महाहवे ॥ ३२ ॥ ‘प्रभो! युद्धके आरम्भसे ही इसने मेरा बहुत सहयोग किया है, इसने महायुद्धमें मेरे लिये दुष्कर कर्म कर दिखाया है ॥ ३२ ॥ स्वभावाद् या च मे प्रीतिः सहदेवे जनार्दन । सैव मे परमा प्रीति राक्षसेन्द्रे घटोत्कचे ॥ ३३ ॥ ‘जनार्दन! सहदेवपर जो मेरा स्वाभाविक प्रेम है, वही उत्तम प्रेम राक्षसराज घटोत्कचपर भी रहा है ॥ ३३ ॥ भक्तश्च मे महाबाहुः प्रियोऽस्याहं प्रियश्च मे । तेन विन्दामि वार्ष्णेय कश्मलं शोकतापतः ॥ ३४ ॥ ‘वार्ष्णेय! वह महाबाहु मेरा भक्त था। मैं उसे प्रिय था और वह मुझे; इसीलिये उसके शोकसे संतप्त होकर मैं मोहको प्राप्त हो रहा हूँ ॥ ३४ ॥ पश्य सैन्यानि वार्ष्णेय द्राव्यमाणानि कौरवैः । द्रोणकर्णौ तु संयत्तौ पश्य युद्धे महारथौ ॥ ३५ ॥ ‘वृष्णिनन्दन! देखिये, कौरव किस प्रकार मेरी सेनाओंको खदेड़ रहे हैं तथा महारथी द्रोण और कर्ण किस प्रकार युद्धमें प्रयत्नपूर्वक लगे हुए हैं? ॥ ३५ ॥ निशीथे पाण्डवं सैन्यमेतत् सैन्यप्रमर्दितम् । गजाभ्यामिव मत्ताभ्यां यथा नलवनं महत् ॥ ३६ ॥ ‘जैसे दो मतवाले हाथी नरकुलके विशाल वनको रौंद रहे हों, उसी प्रकार इस आधी रातके समय उनकी सेनाद्वारा यह पाण्डव-सेना कुचल दी गयी है ॥ ३६ ॥ अनादृत्य बलं बाह्वोर्भीमसेनस्य माधव । चित्रास्त्रातां च पार्थस्य विक्रमन्ति स्म कौरवाः ॥ ३७ ॥ ‘माधव! भीमसेनके बाहुबल और अर्जुनके विचित्र अस्त्र-कौशलका अनादर करके कौरव योद्धा अपना पराक्रम प्रकट कर रहे हैं ॥ ३७ ॥ एष द्रोणश्च कर्णश्च राजा चैव सुयोधनः । निहत्य राक्षसं युद्धे हृष्टाः नर्दन्ति संयुगे ॥ ३८ ॥ ‘ये द्रोण, कर्ण तथा राजा दुर्योधन युद्धमें राक्षस घटोत्कचका वध करके बड़े हर्षके साथ सिंहनाद कर रहे हैं ॥ ३८ ॥ कथं वास्मासु जीवत्सु त्वयि चैव जनार्दन ।
हैडिम्बिः प्राप्तवान् मृत्युं सूतपुत्रेण सङ्गतः ॥ ३९ ॥ 'जनार्दन! हमारे और आपके जीते-जी हिडिम्बा-कुमार घटोत्कच सूतपुत्रके साथ संग्राम करके मृत्युको कैसे प्राप्त हुआ? ॥ ३९ ॥
कदर्थीकृत्य नः सर्वान् पश्यतः सव्यसाचिनः । निहतो राक्षसः कृष्ण भैमसेनिर्महाबलः ॥ ४० ॥ 'श्रीकृष्ण! हम सबकी अवहेलना करके सव्यसाची अर्जुनके देखते-देखते भीमसेनकुमार महाबली राक्षस घटोत्कच मारा गया है ॥ ४० ॥
यदाभिमन्युर्निहतो धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः । नासीत् तत्र रणे कृष्ण सव्यसाची महारथः ॥ ४१ ॥ 'श्रीकृष्ण! धृतराष्ट्रके दुरात्मा पुत्रोंने जब युद्धमें अभिमन्युको मारा था, उस समय महारथी अर्जुन वहाँ उपस्थित नहीं थे ॥ ४१ ॥
निरुद्धाश्च वयं सर्वे सैन्धवेन दुरात्मना । निमित्तमभवद् द्रोणः सपुत्रस्तत्र कर्मणि ॥ ४२ ॥ 'दुरात्मा जयद्रथने हम सब लोगोंको भी व्यूहके बाहर ही रोक लिया था। वहाँ अभिमन्युके वधमें पुत्रसहित द्रोणाचार्य ही कारण हुए थे ॥ ४२ ॥
उपदिष्टो वधोपायः कर्णस्य गुरुणा स्वयम् । व्यायच्छतश्च खड्गेन द्विधा खड्गं चकार ह ॥ ४३ ॥ 'गुरु द्रोणाचार्यने स्वयं ही कर्णको अभिमन्युके वधका उपाय बताया था और जब वह तलवार लेकर परिश्रमपूर्वक युद्ध कर रहा था, उस समय उन्होंने ही उसकी तलवारके दो टुकड़े कर दिये थे ॥ ४३ ॥
व्यसने वर्तमानस्य कृतवर्मा नृशंसवत् । अश्वान् जघान सहसा तथोभौ पार्ष्णिसारथी ॥ ४४ ॥ 'इस प्रकार जब वह संकटमें पड़ गया, तब कृतवर्माने क्रूर मनुष्यकी भाँति सहसा उसके घोड़ों तथा दोनों पार्श्वरक्षकोंको मार डाला ॥ ४४ ॥
तथेतरे महेष्वासाः सौभद्रं युध्यपातयन् । अल्पे च कारणे कृष्ण हतो गाण्डीवधन्वना ॥ ४५ ॥ सैन्धवो यादवश्रेष्ठ तच्च नातिप्रियं मम । 'इसी प्रकार दूसरे महाधनुर्धरोंने सुभद्राकुमारको युद्धमें मार गिराया था। यादवश्रेष्ठ श्रीकृष्ण! अभिमन्युके वधमें जयद्रथका बहुत कम अपराध था, तो भी उस छोटे-से कारणको लेकर ही गाण्डीवधारी अर्जुनने जयद्रथको मार डाला है। यह कार्य मुझे अधिक प्रिय नहीं लगा है ॥ ४५ ½ ॥
यदि शत्रुवधो न्याय्यो भवेत् कर्तुं हि पाण्डवैः ॥ ४६ ॥ कर्णद्रोणौ रणे पूर्वं हन्तव्याविति मे मतिः ।
‘यदि पाण्डवोंके लिये अपने शत्रु का वध करना न्याय-संगत है, तो युद्धभूमिमें सबसे पहले कर्ण और द्रोणाचार्यको ही मार डालना चाहिये; मेरा तो यही मत है॥ ४६ १/२॥
एतौ हि मूलं दुःखानामस्माकं पुरुषर्षभ॥ ४७॥
एतौ रणे समासाद्य समाश्वस्तः सुयोधनः।
‘पुरुषोत्तम! ये कर्ण और द्रोण ही हमारे दुःखोंके मूल कारण हैं। रणभूमिमें इन्हींका सहारा लेकर दुर्योधनका ढाढ़स बँधा हुआ है॥ ४७ १/२॥
यत्र वध्यो भवेद् द्रोणः सूतपुत्रश्च सानुगः॥ ४८॥
तत्रावधीन्महाबाहुः सैन्धवं दूरवासिनम्।
‘जहाँ द्रोणाचार्यका वध होना चाहिये था तथा जहाँ सेवकोंसहित सूतपुत्र कर्णको मार गिराना चाहिये था, वहाँ महाबाहु अर्जुनने दूर रहनेवाले सिंधुराज जयद्रथका वध किया है॥ ४८ १/२॥
अवश्यं तु मया कार्यः सूतपुत्रस्य निग्रहः॥ ४९॥
ततो यास्याम्यहं वीर स्वयं कर्णजिघांसया।
भीमसेनो महाबाहुर्द्रोणानीकेन सङ्गतः॥ ५०॥
‘मुझे तो अवश्य ही सूतपुत्र कर्णका दमन करना चाहिये। अतः वीर! मैं स्वयं ही कर्णका वध करनेकी इच्छासे युद्धभूमिमें जाऊँगा। महाबाहु भीमसेन द्रोणाचार्यकी सेनाके साथ युद्ध कर रहे हैं’॥ ४९-५०॥
एवमुक्त्वा ययौ तूर्णं त्वरमाणो युधिष्ठिरः।
स विस्फार्य महच्चापं शङ्खं प्रध्माप्य भैरवम्॥ ५१॥
ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर भयंकर शंख बजाकर अपने विशाल धनुषकी टंकार करते हुए बड़ी उतावलीके साथ तुरंत वहाँसे चल दिये॥ ५१॥
ततो रथसहस्रेण गजानां च शतैस्त्रिभिः।
वाजिभिः पञ्चसाहस्रैः पाञ्चालैः सप्रभद्रकैः॥ ५२॥
वृतः शिखण्डी त्वरितो राजानं पृष्ठतोऽन्वयात्।
तदनन्तर शिखण्डी, एक सहस्र रथ, तीन सौ हाथी, पाँच हजार घोड़े तथा पांचालों और प्रभद्रकोंकी सेना साथ ले उनसे घिरा हुआ शीघ्रतापूर्वक राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे गया॥ ५२ १/२॥
ततो भेरीःसमाजघ्नुः शङ्खान् दध्मूश्च दंशिताः॥ ५३॥
पञ्चालाः पाण्डवाश्चैव युधिष्ठिरपुरोगमाः।
तब पांचालों और पाण्डवोंने युधिष्ठिरको आगे करके कवच आदिसे सुसज्जित हो डंके पीटे और शंख बजाये॥ ५३ १/२॥
ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्वासुदेवो धनंजयम्॥ ५४॥
एष प्रयाति त्वरितः क्रोधाविष्टो युधिष्ठिरः । जिघांसुः सूतपुत्रस्य तस्योपेक्षा न युज्यते ।। ५५ ।। उस समय महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—‘ये राजा युधिष्ठिर क्रोधके आवेशसे युक्त हो सूतपुत्र कर्णका वध करनेकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े जा रहे हैं। इस समय इन्हें अकेले छोड़ देना उचित नहीं है’ ।। ५४-५५ ।।
एवमुक्त्वा हृषीकेशः शीघ्रमश्वानचोदयत् । दूरं प्रयान्तं राजानमन्वगच्छज्जनार्दनः ।। ५६ ।। ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने शीघ्र ही घोड़ोंको हाँका और दूर जाते हुए राजाका अनुसरण किया ।। ५६ ।।
तं दृष्ट्वा सहसा यान्तं सूतपुत्रजिघांसया । शोकोपहतसंकल्पं दह्यमानमिवाग्निना ।। ५७ ।। अभिगम्याब्रवीद् व्यासो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । धर्मराज युधिष्ठिरका संकल्प (विचार-शक्ति) शोकसे नष्ट-सा हो गया था। वे क्रोधकी आगमें जलते हुए-से जान पड़ते थे। उन्हें सूतपुत्रके वधकी इच्छासे सहसा जाते देख महर्षि व्यास उनके समीप प्रकट हो गये और इस प्रकार बोले ।। ५७ १/२ ।।
व्यास उवाच
कर्णमासाद्य संग्रामे दिष्ट्या जीवति फाल्गुनः ।। ५८ ।। सव्यसाचिवधाकाङ्क्षी शक्तिं रक्षितवान् हि सः । व्यासने कहा— राजन्! बड़े सौभाग्यकी बात है कि संग्राममें कर्णका सामना करके भी अर्जुन अभी जीवित हैं; क्योंकि उसने उन्हींके वधकी इच्छासे अपने पास इन्द्रकी दी हुई शक्ति रख छोड़ी थी ।। ५८ १/२ ।।
न चागाद् द्वैरथं जिष्णुर्दिष्ट्या तेन महारणे ।। ५९ ।। सृजेतां स्पर्धिनावेतौ दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः । वध्यमानेषु चास्त्रेषु पीडितः सूतनन्दनः ।। ६० ।। वासवीं समरे शक्तिं ध्रुवं मुञ्चेद् युधिष्ठिर । ततो भवेत् ते व्यसनं घोरं भरतसत्तम ।। ६१ ।। उस महासमरमें कर्णके साथ द्वैरथयुद्ध करनेके लिये अर्जुन नहीं गये, यह बहुत अच्छा हुआ। ये दोनों वीर एक-दूसरेसे स्पर्धा रखते हैं; अतः युधिष्ठिर! यदि ये सब प्रकारसे दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करते तो फिर अपने अस्त्रोंके नष्ट होनेपर सूतनन्दन कर्ण पीड़ित हो समरांगणमें इन्द्रकी दी हुई शक्तिको निश्चय ही अर्जुनपर चला देता। भरतश्रेष्ठ! उस दशामें तुमपर और भयंकर विपत्ति टूट पड़ती ।।
दिष्ट्या रक्षो हतं युद्धे सूतपुत्रेण मानद । वासवीं कारणं कृत्वा कालेनोपहतो ह्यसौ ।। ६२ ।। मानद! यह हर्षकी बात है कि युद्धमें सूतपुत्र कर्णने उस राक्षसको ही मारा है। वास्तवमें इन्द्रकी शक्तिको निमित्त बनाकर कालने ही उसका वध किया है ।। ६२ ।।
तवैव कारणाद् रक्षो निहतं तात संयुगे । मा क्रुधो भरतश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः ।। ६३ ।। प्राणिनामिह सर्वेषामेषा निष्ठा युधिष्ठिर । तात! भरतश्रेष्ठ तुम्हारे हितके लिये ही वह राक्षस युद्धमें मारा गया है; ऐसा समझकर न तो तुम किसीपर क्रोध करो और न मनमें शोकको ही स्थान दो। युधिष्ठिर! इस जगत्के समस्त प्राणियोंकी अन्तमें यही गति होती है ।।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पार्थिवैश्च महात्मभिः ।। ६४ ।। कौरवान् समरे राजन् प्रतियुध्यस्व भारत । पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति ।। ६५ ।। भरतवंशी नरेश! तुम अपने समस्त भाइयों तथा महामना भूपालोंके साथ जाकर समरभूमिमें कौरवोंका सामना करो। तात! आजके पाँचवें दिन यह सारी पृथ्वी तुम्हारी हो जायगी ।।
नित्यं च पुरुषव्याघ्र धर्ममेवानुचिन्तय । आनृशंस्यं तपो दानं क्षमां सत्यं च पाण्डव ॥ ६६ ॥ सेवेथाः परमप्रीतो यतो धर्मस्ततो जयः । पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन! तुम सदा धर्मका ही चिन्तन करो तथा कोमलता (दयाभाव), तपस्या, दान, क्षमा और सत्य आदि सद्गुणोंका ही अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक सेवन करो; क्योंकि जिस पक्षमें धर्म है, उसीकी विजय होती है ॥
इत्युक्त्वा पाण्डवं व्यासस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६७ ॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर महर्षि व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ६७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे व्यासवाक्ये त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें व्यासवाक्यविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८३ ॥
(द्रोणवधपर्व)
(द्रोणवधपर्व)
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
निद्रासे व्याकुल हुए उभयपक्षके सैनिकोंका अर्जुनके कहनेसे सो जाना और चन्द्रोदयके बाद पुनः उठकर युद्धमें लग जाना
संजय उवाच
व्यासेनैवमथोक्तस्तु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
स्वयं कर्णवधाद् वीरो निवृत्तो भरतर्षभ ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! व्यासजीके ऐसा कहनेपर वीर धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं कर्णका वध करनेके विचारसे हट गये ॥ १ ॥
घटोत्कचे तु निहते सूतपुत्रेण तां निशाम् ।
दुःखामर्षवशं प्राप्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
सूतपुत्रके द्वारा घटोत्कचके मारे जानेपर उस रातमें धर्मराज युधिष्ठिर दुःख और अमर्षके वशीभूत हो गये ॥ २ ॥
दृष्ट्वा भीमेन महतीं वार्यमाणां चमूं तव ।
धृष्टद्युम्नमुवाचेदं कुम्भयोनिं निवारय ॥ ३ ॥
भीमसेनके द्वारा आपकी विशाल सेनाका निवारण होता देख उन्होंने धृष्टद्युम्नसे इस प्रकार कहा—'वीर! तुम द्रोणाचार्यको आगे बढ़नेसे रोको ॥ ३ ॥
त्वं हि द्रोणविनाशाय समुत्पन्नो हुताशनात् ।
सशरः कवची खड्गी धन्वी च परतापनः ॥ ४ ॥
'तुम तो शत्रुओंको संताप देनेवाले हो और द्रोणका विनाश करनेके लिये ही बाण, कवच, खड्ग और धनुषसहित अग्निकुण्डसे उत्पन्न हुए हो ॥ ४ ॥
अभिद्रव रणे हृष्टो मा च ते भीः कथंचन ।
जनमेजयः शिखण्डी च दौर्मुखिश्च यशोधरः ॥ ५ ॥
अभिद्रवन्तु संहृष्टाः कुम्भयोनिं समन्ततः ।
'अतः हर्षमें भरकर रणभूमिमें द्रोणाचार्यपर धावा करो। तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं होना चाहिये। जनमेजय, शिखण्डी तथा दुर्मुखपुत्र यशोधर—ये हर्ष और उत्साहमें भरकर चारों ओरसे द्रोणाचार्यपर धावा करें ॥ ५ ½ ॥
नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ॥ ६ ॥ द्रुपदश्च विराटश्च पुत्रभ्रातृसमन्वितौ । सात्यकिः केकयाश्चैव पाण्डवश्च धनंजयः ॥ ७ ॥ अभिद्रवन्तु वेगेन कुम्भयोनिवधेप्सया । ‘नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, प्रभद्रकगण, पुत्रों और भाइयोंसहित द्रुपद और विराट, सात्यकि, केकय तथा पाण्डुपुत्र अर्जुन—ये द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे वेगपूर्वक उनपर धावा बोल दें’ ॥ ६-७ १/२ ॥
तथैव रथिनः सर्वे हस्त्यश्वं यच्च किञ्चन ॥ ८ ॥ पदाताश्च रणे द्रोणं पातयन्तु महारथम् । ‘इसी प्रकार हमारे समस्त रथी, हाथी-घोड़ोंकी जो कुछ भी सेना अवशिष्ट है वह और पैदल सैनिक—ये सभी रणभूमिमें महारथी द्रोणाचार्यको मार गिरावें’ ॥
तथाऽऽज्ञप्तास्तु ते सर्वे पाण्डवेन महात्मना ॥ ९ ॥ अभ्यद्रवन्त वेगेन कुम्भयोनिवधेप्सया । पाण्डुनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके इस प्रकार आदेश देनेपर वे सब वीर द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे वेगपूर्वक उनपर टूट पड़े ॥ ९ १/२ ॥
आगच्छतस्तान् सहसा सर्वोद्योगेन पाण्डवान् ॥ १० ॥ प्रतिजग्राह समरे द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । उन समस्त पाण्डव-सैनिकोंको पूरे उद्योगके साथ सहसा आक्रमण करते देख शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यने समरभूमिमें आगे बढ़कर उनका सामना किया ॥ १० १/२ ॥
ततो दुर्योधनो राजा सर्वोद्योगेन पाण्डवान् ॥ ११ ॥ अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्ध इच्छन् द्रोणस्य जीवितम् । उस समय द्रोणाचार्यके जीवनकी रक्षा चाहते हुए राजा दुर्योधनने अत्यन्त कुपित हो पूरे प्रयत्नके साथ पाण्डवोंपर धावा किया ॥ ११ १/२ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं श्रान्तवाहनसैनिकम् ॥ १२ ॥ पाण्डवानां कुरूणां च गर्जतामितरेतरम् । तदनन्तर एक-दूसरेको लक्ष्य करके गर्जते हुए पाण्डव तथा कौरव योद्धाओंमें पुनः युद्ध आरम्भ हो गया। वहाँ जितने वाहन और सैनिक थे, वे सभी थक गये थे ॥ १२ १/२ ॥
निद्रान्धास्ते महाराज परिश्रान्ताश्च संयुगे ॥ १३ ॥ नाभ्यपद्यन्त समरे काञ्चिच्चेष्टां महारथाः । महाराज! युद्धमें अत्यन्त थके हुए महारथी योद्धा निद्रासे अंधे हो रहे थे; अतः संग्राममें कोई चेष्टा नहीं कर पाते थे ॥ १३ १/२ ॥
त्रियामा रजनी चैषा घोररूपा भयानका ॥ १४ ॥
सहस्रयामप्रतिमा बभूव प्राणहारिणी ।
यह तीन पहरकी रात उनके लिये सहस्रों प्रहरोंकी रात्रिके समान घोर, भयानक एवं प्राणहारिणी प्रतीत होती थी ॥ १४ १/२ ॥
वध्यतां च तथा तेषां क्षतानां च विशेषतः ॥ १५ ॥
अर्धरात्रिः समाजज्ञे निद्रान्धानां विशेषतः ।
वहाँ बाणोंकी चोट सहते और विशेषतः क्षत-विक्षत होते हुए निद्रान्ध सैनिकोंकी आधी रात बीत गयी ॥ १५ १/२ ॥
सर्वे ह्यासन् निरुत्साहाः क्षत्रिया दीनचेतसः ॥ १६ ॥
तव चैव परेषां च गतास्त्रा विगतेषवः ।
उस समय आपकी और शत्रुओंकी सेनाके समस्त क्षत्रिय उत्साहहीन एवं दीनचित्त हो गये थे; उनके हाथोंसे अस्त्र और बाण गिर गये थे ॥ १६ १/२ ॥
ते तदापारयन्तश्च ह्रीमन्तश्च विशेषतः ॥ १७ ॥
स्वधर्ममनुपश्यन्तो न जहुः स्वामनीकिनीम् ।
वे उस समय अच्छी तरह युद्ध नहीं कर पा रहे थे, तो भी विशेषतः लज्जाशील होनेके कारण अपने धर्मपर दृष्टि रखते हुए अपनी सेना छोड़कर जा न सके ॥ १७ १/२ ॥
अस्त्राण्यन्ये समुत्सृज्य निद्रान्धाः शेरते जनाः ॥ १८ ॥
रथेष्वन्ये गजेष्वन्ये हयेष्वन्ये च भारत ।
भारत! दूसरे बहुत-से सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्र छोड़कर नींदसे अन्धे होकर सो रहे थे। कुछ लोग रथोंपर, कुछ हाथियोंपर और कुछ लोग घोड़ोंपर ही सो गये थे ॥ १८ १/२ ॥
निद्रान्धा नो बुबुधिरे काञ्चिच्चेष्टां नराधिप ॥ १९ ॥
तानन्ये समरे योधाः प्रेषयन्तो यमक्षयम् ।
नरेश्वर! नींदसे बेसुध होनेके कारण वे किसी भी चेष्टाको समझ नहीं पाते थे और उन्हें दूसरे योद्धा समरांगणमें यमलोक भेज देते थे ॥ १९ १/२ ॥
स्वप्नायमानांस्त्वपरे परानतिविचेतसः ॥ २० ॥
आत्मानं समरे जघ्नुः स्वानेव च परानपि ।
नानावाचो विमुञ्चन्तो निद्रान्धास्ते महारणे ॥ २१ ॥
दूसरे सैनिक शत्रुओंको स्वप्नमें पड़कर अत्यन्त वेसुध हुए देख उन्हें मार बैठते थे। कुछ लोग उस महासमरमें निद्रान्ध होकर नाना प्रकारकी बातें कहते हुए कभी अपने-आपपर ही प्रहार कर बैठते थे, कभी अपने पक्षके ही लोगोंको मार डालते थे और कभी शत्रुओंका भी वध करते थे ॥ २०-२१ ॥
अस्माकं च महाराज परेभ्यो बहवो जनाः ।
योद्धव्यमिति तिष्ठन्तो निद्रासंरक्तलोचनाः ॥ २२ ॥
महाराज! हमारे पक्षके भी बहुत-से सैनिक शत्रुओंके साथ युद्ध करना है, ऐसा समझकर खड़े थे, परंतु नींदसे उनकी आँखें लाल हो गयी थीं॥ २२॥ संसर्पन्तो रणे केचिन्निद्रान्धास्ते तथा परान्। जघ्नुः शूरा रणे शूरांस्तस्मिंस्तमसि दारुणे॥ २३॥ कुछ शूरवीर निद्रान्ध होकर भी रणभूमिमें विचरते थे और उस दारुण अन्धकारमें शत्रुपक्षके शूरवीरोंका वध कर डालते थे॥ २३॥ हन्यमानमथात्मानं परेभ्यो बहवो जनाः। नाभ्यजानन्त समरे निद्रया मोहिता भृशम्॥ २४॥ बहुत-से मनुष्य निद्रासे अत्यन्त मोहित हो जानेके कारण शत्रुओंकी ओरसे समरभूमिमें अपनेको जो मारनेकी चेष्टा होती थी, उसे समझ ही नहीं पाते थे॥ २४॥ तेषामेतादृशीं चेष्टां विज्ञाय पुरुषर्षभः। उवाच वाक्यं बीभत्सुरुच्चैः संनादयन् दिशः॥ २५॥ उनकी ऐसी अवस्था जानकर पुरुषप्रवर अर्जुनने सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए उच्चस्वरसे इस प्रकार कहा—॥ २५॥ श्रान्ता भवन्तो निद्रान्धाः सर्व एव सवाहनाः। तमसा च वृते सैन्ये रजसा बहुलेन च॥ २६॥ ते यूयं यदि मन्यध्वमुपारमत सैनिकाः। निमीलयत चात्रैव रणभूमौ मुहूर्तकम्॥ २७॥ ‘सैनिको! तुम सब लोग अपने वाहनोंसहित थक गये हो और नींदसे अन्धे हो रहे हो। इधर यह सारी सेना घोर अन्धकार और बहुत-सी धूलसे ढक गयी है। अतः यदि तुम ठीक समझो तो युद्ध बंद कर दो और दो घड़ीतक इस रणभूमिमें ही सो लो॥ २६-२७॥ ततो विनिद्रा विश्रान्ताश्चन्द्रमस्युदिते पुनः। संसाधयिष्यथान्योन्यं संग्रामं कुरुपाण्डवाः॥ २८॥ ‘तत्पश्चात् चन्द्रोदय होनेपर विश्राम करनेके अनन्तर निद्रारहित हो तुम समस्त कौरव-पाण्डव योद्धा परस्पर पूर्ववत् संग्राम आरम्भ कर देना’॥ २८॥ तद् वचः सर्वधर्मज्ञा धार्मिकस्य विशाम्पते। अरोचयन्त सैन्यानि तथा चान्योन्यमब्रुवन्॥ २९॥ प्रजानाथ! धर्मात्मा अर्जुनका यह वचन समस्त धर्मज्ञोंको ठीक लगा। सारी सेनाओंने उसे पसंद किया और सब लोग परस्पर यही बात कहने लगे॥ २९॥ चुक्रुशुः कर्ण कर्णेति तथा दुर्योधनेति च। उपारमत पाण्डूनां विरता हि वरूथिनी॥ ३०॥ कौरव सैनिक ‘हे कर्ण! हे कर्ण! हे राजा दुर्योधन!’ इस प्रकार पुकारते हुए उच्चस्वरसे बोले—‘आपलोग युद्ध बंद कर दें; क्योंकि पाण्डव-सेना युद्धसे विरत हो गयी है’॥ ३०॥
तथा विक्रोशमानस्य फाल्गुनस्य ततस्ततः । उपारमत पाण्डूनां सेना तव च भारत ॥ ३१ ॥ भारत! जब अर्जुनने सब ओर इधर-उधर उच्चस्वरसे पूर्वोक्त प्रस्ताव उपस्थित किया, तब पाण्डवोंकी तथा आपकी सेना भी युद्धसे निवृत्त हो गयी ॥ ३१ ॥
तामस्य वाचं देवाश्च ऋषयश्च महात्मनः । सर्वसैन्यानि चाक्षुद्रां प्रहृष्टाः प्रत्यपूजयन् ॥ ३२ ॥ महात्मा अर्जुनके इस श्रेष्ठ वचनका सम्पूर्ण देवताओं, ऋषियों और समस्त सैनिकोंने बड़े हर्षके साथ स्वागत किया ॥ ३२ ॥
तत् सम्पूज्य वचोऽक्रूरं सर्वसैन्यानि भारत । मुहूर्तमस्वपन् राजञ्छ्रान्तानि भरतर्षभ ॥ ३३ ॥ भारतवंशी नरेश! भरतकुलभूषण! अर्जुनके उस क्रूरताशून्य वचनका आदर करके थकी हुई सारी सेनाएँ दो घड़ीतक सोती रहीं ॥ ३३ ॥
सा तु सम्प्राप्य विश्रामं ध्वजिनी तव भारत । सुखमाप्तवती वीरमर्जुनं प्रत्यपूजयत् ॥ ३४ ॥ भारत! आपकी सेना विश्रामका अवसर पाकर सुखका अनुभव करने लगी। उसने वीर अर्जुनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा— ॥ ३४ ॥
त्वयि वेदास्तथास्त्राणि त्वयि बुद्धिपराक्रमौ । धर्मस्त्वयि महाबाहो दया भूतेषु चानघ ॥ ३५ ॥ 'महाबाहु निष्पाप अर्जुन! तुममें वेद तथा अस्त्रोंका ज्ञान है। तुममें बुद्धि और पराक्रम है तथा तुममें धर्म एवं सम्पूर्ण भूतोंके प्रति दया है ॥ ३५ ॥
यच्चाश्वस्तास्तवेच्छामः शर्म पार्थ तदस्तु ते । मनसश्च प्रियानर्थान् वीर क्षिप्रमवाप्नुहि ॥ ३६ ॥ 'कुन्तीनन्दन! हमलोग तुम्हारी प्रेरणासे सुस्ताकर सुखी हुए हैं; इसलिये तुम्हारा कल्याण चाहते हैं। तुम्हें सुख प्राप्त हो। वीर! तुम शीघ्र ही अपने मनको प्रिय लगनेवाले पदार्थ प्राप्त करो' ॥ ३६ ॥
इति ते तं नरव्याघ्रं प्रशंसन्तो महारथाः । निद्रया समवाक्षिप्तास्तूष्णीमासन् विशाम्पते ॥ ३७ ॥ प्रजानाथ! इस प्रकार आपके महारथी नरश्रेष्ठ अर्जुनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए निद्राके वशीभूत हो मौन हो गये ॥ ३७ ॥
अश्वपृष्ठेषु चाप्यन्ये रथनीडेषु चापरे । गजस्कन्धगताश्चान्ये शेरते चापरे क्षितौ ॥ ३८ ॥
सायुधाः सगदाश्चैव सखड्गाः सपरश्वधाः । सप्रासकवचाश्चान्ये नराः सुप्ताः पृथक् पृथक् ॥ ३९ ॥
कुछ लोग घोड़ोंकी पीठोंपर, दूसरे रथोंकी बैठकोंमें, कुछ अन्य योद्धा हाथियोंपर तथा दूसरे बहुत-से सैनिक पृथ्वीपर ही सो रहे। कुछ लोग सभी प्रकारके आयुध लिये हुए थे। किन्हींके हाथोंमें गदाएँ थीं। कुछ लोग तलवार और फरसे लिये हुए थे तथा दूसरे बहुत-से मनुष्य प्रास और कवचसे सुशोभित थे। वे सभी अलग-अलग सो रहे थे ।। ३८-३९ ।।
गजास्ते पन्नगाभोगैर्हस्तैर्भूरिणुगुण्ठितैः । निद्रान्धा वसुधां चक्रुर्घाणनिःश्वासशीतलाम् ॥ ४० ॥ नींदसे अंधे हुए हाथी सर्पोंके समान धूलमें सनी हुई सूँड़ोंसे लंबी-लंबी साँसें छोड़कर इस वसुधाको शीतल करने लगे ॥ ४० ॥
सुप्ताः शुशुभिरे तत्र निःश्वसन्तो महीतले । विकीर्णा गिरयो यद्वन्निःश्वसद्भिर्महोरगैः ॥ ४१ ॥ धरतीपर सोकर निःश्वास खींचते हुए गजराज ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो पर्वत विखरे पड़े हों और उनमें रहनेवाले बड़े-बड़े सर्प लंबी साँसें छोड़ रहे हों ॥ ४१ ॥
समां च विषमां चक्रुः खुराग्रैर्विकृतां महीम् । हयाः काञ्चनयोक्त्रास्ते केसरलम्बिभिर्युगैः ॥ ४२ ॥ सोनेकी बागडोरमें बँधे हुए घोड़े अपने गर्दनके बालोंपर रथके जूए लिये टापोंसे खोद-खोदकर समतल भूमिको भी विषम बना रहे थे ॥ ४२ ॥
सुषुपूस्तत्र राजेन्द्र युक्ता वाहेषु सर्वशः । एवं हयाश्च नागाश्च योधाश्च भरतर्षभ । युद्धाद् विरम्य सुषुपुः श्रमेण महतान्विता ॥ ४३ ॥ राजेन्द्र! वे रथोंमें जुते हुए ही चारों ओर सो गये। भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार घोड़े, हाथी और सैनिक भारी थकावटसे युक्त होनेके कारण युद्धसे विरत हो सो गये ॥
तत् तथा निद्रया भग्नमबोधं प्रास्वपद् भृशम् । कुशलैः शिल्पिभिर्न्यस्तं पटे चित्रमिवाद्भुतम् ॥ ४४ ॥ इस प्रकार निद्रासे वेसुध हुआ वह सैन्यसमूह गहरी नींदमें सो रहा था। वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था, मानो किन्हीं कुशल कलाकारोंने पटपर अद्भुत चित्र अंकित कर दिया हो ॥ ४४ ॥
ते क्षत्रियाः कुण्डलिनो युवानः परस्परं सायकविक्षताङ्गाः । कुम्भेषु लीनाः सुषुपुर्गजानां कुचेषु लग्ना इव कामिनीनाम् ॥ ४५ ॥ वे कुण्डलधारी तरुण क्षत्रिय परस्पर सायकोंकी मारसे सम्पूर्ण अंगोंमें क्षत-विक्षत हो हाथियोंके कुम्भस्थलोंसे सटकर ऐसे सो रहे थे, मानो कामिनियोंके कुचोंका आलिंगन करके सोये हों ॥ ४५ ॥
ततः कुमुदनाथेन कामिनीगण्डपाण्डुना । नेत्रानन्देन चन्द्रेण माहेन्द्री दिगलङ्कृता ॥ ४६ ॥ तत्पश्चात् कामिनियोंके कपोलोंके समान श्वेत-पीतवर्णवाले नयनानन्ददायी कुमुदनाथ चन्द्रमाने पूर्व दिशाको सुशोभित किया ॥ ४६ ॥
दशशताक्षककुब्दरिनिःसृतः किरणकेसरभासुरपिञ्जरः । तिमिरवारणयूथविदारणः समुदियादुदयाचलकेसरी ॥ ४७ ॥ उदयाचलके शिखरपर चन्द्रमारूपी सिंहका उदय हुआ, जो पूर्व दिशारूपी कन्दरासे निकला था। वह किरणरूपी केसरोंसे प्रकाशित एवं पिंगलवर्णका था और अन्धकाररूपी गजराजोंके यूथको विदीर्ण कर रहा था ॥ ४७ ॥
हरवृषोत्तमगात्रसमद्युतिः स्मरशरासनपूर्णसमप्रभः । नववधूस्मितचारुमनोहरः प्रविसृतः कुमुदाकरबान्धवः ॥ ४८ ॥ भगवान् शंकरके वृषभ नन्दिकेश्वरके उत्तम अंगोंके समान जिसकी श्वेत कान्ति है, जो कामदेवके श्वेत पुष्पमय धनुषके समान पूर्णतः उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित होता है और नववधूकी मन्द मुसकानके सदृश सुन्दर एवं मनोहर जान पड़ता है; वह कुमुदकुल-बान्धव चन्द्रमा क्रमशः ऊपर उठकर आकाशमें अपनी चाँदनी छिटकाने लगा ॥ ४८ ॥
ततो मुहूर्ताद् भगवान् पुरस्ताच्छशलक्षणः । अरुणं दर्शयामास ग्रसन् ज्योतिःप्रभाः प्रभुः ॥ ४९ ॥ उस समय दो घड़ीके बाद शशचिह्नसे सुशोभित प्रभावशाली भगवान् चन्द्रमाने अपनी ज्योत्स्नासे नक्षत्रोंकी प्रभाको क्षीण करते हुए पहले अरुण कान्तिका दर्शन कराया ॥ ४९ ॥
अरुणस्य तु तस्यानु जातरूपसमप्रभम् । रश्मिजालं महच्चन्द्रो मन्दं मन्दमवासृजत् ॥ ५० ॥ अरुण कान्तिके पश्चात् चन्द्रदेवने धीरे-धीरे सुवर्णके समान प्रभाववाले विशाल किरण-जालका प्रसार आरम्भ किया ॥ ५० ॥
उत्सारयन्तः प्रभया तमस्ते चन्द्ररश्मयः । पर्यगच्छन् शनैः सर्वा दिशः खं च क्षितिं तथा ॥ ५१ ॥ फिर वे चन्द्रमाकी किरणें अपनी प्रभासे अन्धकारका निवारण करती हुई शनैः-शनैः सम्पूर्ण दिशाओं, आकाश और भूमण्डलमें फैलने लगीं ॥ ५१ ॥
ततो मुहूर्ताद् भुवनं ज्योतिर्भूतमिवाभवत् ।
अप्रख्यमप्रकाशं च जगामाशु तमस्तथा ॥ ५२ ॥
तदनन्तर एक ही मुहूर्तमें समस्त संसार ज्योतिर्मय-सा हो गया। अन्धकारका कहीं नाम भी नहीं रह गया। वह अदृश्यभावसे तत्काल कहीं चला गया ॥ ५२ ॥
प्रतिप्रकाशिते लोके दिवाभूते निशाकरे ।
विचेरुर्न विचेरुश्च राजन् नक्तञ्चरास्ततः ॥ ५३ ॥
चन्द्रदेवके पूर्णतः प्रकाशित होनेपर जगत्में दिनका-सा उजाला हो गया। राजन्! उस समय रात्रिमें विचरनेवाले कुछ प्राणी विचरण करने लगे और कुछ जहाँ-के-तहाँ पड़े रहे ॥ ५३ ॥
बोध्यमानं तु तत् सैन्यं राजंश्चन्द्रस्य रश्मिभिः ।
बुबुधे शतपत्राणां वनं सूर्यांशुभिर्यथा ॥ ५४ ॥
नरेश्वर! चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे सारी सेना उसी प्रकार जाग उठी, जैसे सूर्यरश्मियोंका स्पर्श पाकर कमलोंका समूह खिल उठता है ॥ ५४ ॥
यथा चन्द्रोदयोद्भूतः क्षुभितः सागरोऽभवत् ।
तथा चन्द्रोदयोद्भूतः स बभूव बलार्णवः ॥ ५५ ॥
जैसे पूर्णिमाके चन्द्रमाका उदय होनेपर उससे प्रभावित होनेवाले महासागरमें ज्वार उठने लगता है, उसी प्रकार उस समय चन्द्रोदय होनेसे उस सारे सैन्य-समुद्रमें खलबली मच गयी ॥ ५५ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं पुनरेव विशाम्पते ।
लोके लोकविनाशाय परं लोकमभीप्सताम् ॥ ५६ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर इस जगत्में महान् जनसंहारके लिये परलोककी इच्छा रखनेवाले योद्धाओंका वह युद्ध पुनः आरम्भ हो गया ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि रात्रियुद्धे सैन्यनिद्रायां
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय सेनाका निद्राविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८४ ॥
१८५-
पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
दुर्योधनका उपालम्भ और द्रोणाचार्यका व्यंगपूर्ण उत्तर
संजय उवाच
ततो दुर्योधनो द्रोणमभिगम्याब्रवीदिदम् ।
अमर्षवशमापन्नो जनयन् हर्षतेजसी ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर अमर्षमें भरे हुए दुर्योधनने द्रोणाचार्यके पास जाकर उनमें हर्षोत्साह और उत्तेजना पैदा करते हुए इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
दुर्योधन उवाच
न मर्षणीयाः संग्रामे विश्रमन्तः श्रमान्विताः ।
सपत्ना ग्लानमनसो लब्धलक्ष्या विशेषतः ॥ २ ॥
**दुर्योधन बोला—**आचार्य! युद्धमें विशेषतः वे शत्रु, जो लक्ष्य बेधनेमें कभी चूकते न हों, यदि थककर विश्राम ले रहे हों और मनमें ग्लानि भरी होनेसे युद्धविषयक उत्साह खो बैठे हों, उनके प्रति कभी क्षमा नहीं दिखानी चाहिये ॥ २ ॥
यत् तु मर्षितमस्माभिर्भवतः प्रियकाम्यया ।
त एते परिश्रान्ताः पाण्डवा बलवत्तराः ॥ ३ ॥
इस समय जो हमने क्षमा की है—सोते समय शत्रुओंपर प्रहार नहीं किया है, वह केवल आपका प्रिय करनेकी इच्छासे ही हुआ है। इसका फल यह हुआ कि ये पाण्डव-सैनिक पूर्णतः विश्राम करके पुनः अत्यन्त प्रबल हो गये हैं ॥ ३ ॥
सर्वथा परिहीनाः स्म तेजसा च बलेन च ।
भवता पाल्यमानास्ते विवर्धन्ते पुनः पुनः ॥ ४ ॥
हमलोग तेज और बलसे सर्वथा हीन हो गये हैं और वे पाण्डव आपसे सुरक्षित होनेके कारण बारंबार बढ़ते जा रहे हैं ॥ ४ ॥
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि ब्राह्मादीनि च यानि ह ।
तानि सर्वाणि तिष्ठन्ति भवत्येव विशेषतः ॥ ५ ॥
ब्रह्मास्त्र आदि जितने भी दिव्यास्त्र हैं, वे सब-के-सब विशेषरूपसे आपहीमें प्रतिष्ठित हैं ॥ ५ ॥
न पाण्डवेया न वयं नान्ये लोके धनुर्धराः ।
युध्यमानस्य ते तुल्याः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ६ ॥
युद्ध करते समय आपकी समानता न तो पाण्डव, न हमलोग और न संसारके दूसरे धनुर्धर ही कर सकते हैं, यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ६ ॥
ससुरासुरगन्धर्वानिमाँल्लोकान् द्विजोत्तम ।
सर्वास्त्रविद् भवान् हन्याद् दिव्यैरस्त्रैर्न संशयः ॥ ७ ॥
द्विजश्रेष्ठ! आप सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता हैं। अतः चाहें तो अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा देवता, असुर और गन्धर्वोंसहित इन सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥
स भवान् मर्षयत्येतांस्त्वत्तो भीतान् विशेषतः ।
शिष्यत्वं वा पुरस्कृत्य मम वा मन्दभाग्यताम् ॥ ८ ॥
फिर भी आप इन पाण्डवोंको क्षमा करते जाते हैं। यद्यपि वे आपसे विशेष भयभीत रहते हैं, तो भी वे आपके शिष्य हैं, इस बातको सामने रखकर या मेरे दुर्भाग्यका विचार करके आप उनकी उपेक्षा करते हैं ॥ ८ ॥
संजय उवाच
एवमुद्धर्षितो द्रोणः कोपितश्च सुतेन ते ।
समन्युरब्रवीद् राजन् दुर्योधनमिदं वचः ॥ ९ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! जब इस प्रकार आपके पुत्रने द्रोणाचार्यको उत्साहित करते हुए उनका क्रोध बढ़ाया, तब वे कुपित होकर दुर्योधनसे इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥