महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इस प्रकार शक्तिसे आहत होकर भीमसेन काँप उठे और मूर्च्छित हो गये। फिर सचेत होनेपर बलवान् भीमने उनपर गदाका प्रहार किया ।। १४ १/२ ।। सा पाण्डवेन प्रहिता बाह्लीकस्य शिरोऽहरत् ।। १५ ।। स पपात हतः पृथ्व्यां वज्राहत इवाद्रिराट् । पाण्डुपुत्र भीमसेनद्वारा चलायी हुई उस गदाने बाह्लीकका सिर उड़ा दिया। वे वज्रके मारे हुए पर्वतराजकी भाँति मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। १५ १/२ ।। तस्मिन् विनिहते वीरे बाह्लीके पुरुषर्षभ ।। १६ ।। पुत्रास्तेऽभ्यर्दयन् भीमं दश दाशरथेः समाः । नरश्रेष्ठ! वीर बाह्लीकके मारे जानेपर श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी आपके दस पुत्र भीमसेनको पीड़ा देने लगे ।। १६ १/२ ।। नागदत्तो दृढरथो महाबाहुरयोभुजः ।। १७ ।। दृढः सुहस्तो विरजाः प्रमाथ्युग्रोऽनुयाय्यपि । उनके नाम इस प्रकार हैं—नागदत्त, दृढरथ (दृढरथाश्रय), महाबाहु, अयोभुज (अयोबाहु), दृढ (दृढक्षत्र), सुहस्त, विरजा, प्रमाथी, उग्र (उग्रश्रवा) और अनुयायी (अग्रयायी) ।। १७ १/२ ।। तान् दृष्ट्वा चुक्रुधे भीमो जगृहे भारसाधनान् ।। १८ ।। एकमेकं समुद्दिश्य पातयामास मर्मसु । उनको सामने देखकर भीमसेन कुपित हो उठे। उन्होंने प्रत्येकके लिये एक-एक करके भारसाधनमें समर्थ दस बाण हाथमें लिये और उन्हें उनके मर्मस्थानोंपर चलाया ।। १८ १/२ ।। ते विद्धा व्यसवः पेतुः स्यन्दनेभ्यो हतौजसः ।। १९ ।। चण्डवातप्रभग्नास्तु पर्वताग्रान्महीरुहाः । उन बाणोंसे घायल होकर आपके पुत्र अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे और पर्वतशिखरसे प्रचण्ड वायुद्वारा उखाड़े हुए वृक्षोंके समान तेजोहीन होकर रथोंसे नीचे गिर पड़े ।। १९ १/२ ।। नाराचैर्दशभिर्भीमस्तान् निहत्य तवात्मजान् ।। २० ।। कर्णस्य दयितं पुत्रं वृषसेनमावाकिरत् । आपके उन पुत्रोंको दस नाराचोंद्वारा मारकर भीमसेनने कर्णके प्यारे पुत्र वृषसेनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। २० १/२ ।। ततो वृकरथो नाम भ्राता कर्णस्य विश्रुतः ।। २१ ।। जघान भीमं नाराचैस्तमप्यभ्यद्रवद् बली । तदनन्तर कर्णके सुविख्यात बलवान् भ्राता वृकरथने आकर भीमसेनपर भी आक्रमण किया और उन्हें नाराचोंद्वारा घायल कर दिया ।। २१ १/२ ।।
ततः सप्त रथान् वीरः स्यालानां तव भारत ।। २२ ।। निहत्य भीमो नाराचैः शतचन्द्रमपोथयत् । भारत! तत्पश्चात् वीर भीमसेनने आपके सालोंमेंसे सात रथियोंको नाराचोंद्वारा मारकर शतचन्द्रको भी कालके गालमें भेज दिया ।। २२ १/२ ।। अमर्षयन्तो निहतं शतचन्द्रं महारथम् ।। २३ ।। शकुनेर्भ्रातरो वीरा गवाक्षः शरभो विभुः । सुभगो भानुदत्तश्च शूराः पञ्च महारथाः ।। २४ ।। अभिद्रुत्य शरैस्तीक्ष्णैर्भीमसेनमताडयन् । महारथी शतचन्द्रके मारे जानेपर अमर्षमें भरे हुए शकुनिके वीर भाई गवाक्ष, शरभ, विभु, सुभग और भानुदत्त—ये पाँच शूर महारथी भीमसेनपर टूट पड़े और उन्हें पैने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ।। २३-२४ १/२ ।। स ताड्यमानो नाराचैर्वृष्टिवेगैरिवाचलः ।। २५ ।। जघान पञ्चभिर्बाणैः पञ्चैवातिरथान् बली । जैसे वर्षाके वेगसे पर्वत आहत होता है, उसी प्रकार उनके नाराचोंसे घायल होकर बलवान् भीमसेनने अपने पाँच बाणोंद्वारा उन पाँचों अतिरथी वीरोंको मार डाला ।। २५ १/२ ।। तान् दृष्ट्वा निहतान् वीरान् विचेलुर्नृपसत्तमाः ।। २६ ।। ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धस्त्वानीकमशातयत् । मिषतः कुम्भयोनेस्तु पुत्राणां तव चानघ ।। २७ ।। उन पाँचों वीरोंको मारा गया देख सभी श्रेष्ठ नरेश विचलित हो उठे। निष्पाप नरेश्वर! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिर द्रोणाचार्य तथा आपके पुत्रोंके देखते-देखते आपकी सेनाका संहार करने लगे ।। अम्बष्ठान् मालवाञ्छूरांस्त्रिगर्तान् स शिबीनपि । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय क्रुद्धो युद्धे युधिष्ठिरः ।। २८ ।। उस युद्धमें क्रुद्ध होकर युधिष्ठिरने अम्बष्ठों, मालवों, शूरवीर त्रिगतों तथा शिबिदेशीय सैनिकोंको भी मृत्युके लोकमें भेज दिया ।। २८ ।। अभीषाहाञ्छूरसेनान् बाह्लीकान् सवसातिकान् । निकृत्य पृथिवीं राजा चक्रे शोणितकर्दमाम् ।। २९ ।। अभीषाह, शूरसेन, बाह्लीक और वसातिदेशीय योद्धाओंको नष्ट करके राजा युधिष्ठिरने इस भूतलपर रक्तकी कीच मचा दी ।। २९ ।। यौधेयान् मालवान् राजन् मद्रकाणां गणान् युधि । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय शूरान् बाणैर्युधिष्ठिरः ।। ३० ।।
राजन्! युधिष्ठिरने अपने बाणोंसे यौधेय, मालव तथा शूरवीर मद्रकगणोंको मृत्युके लोकमें भेज दिया ॥ ३० ॥
हताहरत गृह्णीत विध्यत व्यवकृन्तत ।
इत्यासीत् तुमुलः शब्दो युधिष्ठिररथं प्रति ॥ ३१ ॥
युधिष्ठिरके रथके आसपास 'मारो, ले आओ, पकड़ो, घायल करो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो' इत्यादि भयंकर शब्द गूँजने लगा ॥ ३१ ॥
सैन्यानि द्रावयन्तं तं द्रोणो दृष्ट्वा युधिष्ठिरम् ।
चोदितस्तव पुत्रेण सायकैरभ्यवाकिरत् ॥ ३२ ॥
द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरको अपनी सेनाओंको खदेड़ते देख आपके पुत्र दुर्योधनसे प्रेरित होकर उनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३२ ॥
द्रोणस्तु परमक्रुद्धो वायव्यास्त्रेण पार्थिवम् ।
विव्याध सोऽपि तद् दिव्यमस्त्रमस्त्रेण जघ्निवान् ॥ ३३ ॥
अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्यने वायव्यास्त्रसे राजा युधिष्ठिरको बींध डाला। युधिष्ठिरने भी उनके दिव्यास्त्रोंको अपने दिव्यास्त्रसे ही नष्ट कर दिया ॥ ३३ ॥
तस्मिन् विनिहते चास्त्रे भारद्वाजो युधिष्ठिरे ।
वारुणं याम्यमाग्नेयं त्वाष्ट्रं सावित्रमेव च ॥ ३४ ॥
चिक्षेप परमक्रुद्धो जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ।
उस अस्त्रके नष्ट हो जानेपर द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरपर क्रमशः वारुण, याम्य, आग्नेय, त्वाष्ट्र और सावित्र नामक दिव्यास्त्र चलाया; क्योंकि वे अत्यन्त कुपित होकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको मार डालना चाहते थे ॥ ३४ १/२ ॥
क्षिप्तानि क्षिप्यमाणानि तानि चास्त्राणि धर्मजः ॥ ३५ ॥
जघानास्त्रैर्महाबाहुः कुम्भयोनेरवित्रसन् ।
परंतु महाबाहु धर्मपुत्र युधिष्ठिरने द्रोणाचार्यसे तनिक भी भय न खाकर उनके द्वारा चलाये गये और चलाये जानेवाले सभी अस्त्रोंको अपने दिव्यास्त्रोंसे नष्ट कर दिया ॥ ३५ १/२ ॥
सत्यां चिकीर्षमाणस्तु प्रतिज्ञां कुम्भसम्भवः ॥ ३६ ॥
प्रादुश्चक्रेऽस्त्रमैन्द्रं वै प्राजापत्यं च भारत ।
जिघांसुर्धर्मतनयं तव पुत्रहिते रतः ॥ ३७ ॥
भारत! द्रोणाचार्यने अपनी प्रतिज्ञाको सच्ची करनेकी इच्छासे आपके पुत्रके हितमें तत्पर हो धर्मपुत्र युधिष्ठिरको मार डालनेकी अभिलाषा लेकर उनके ऊपर ऐन्द्र और प्राजापत्य नामक अस्त्रोंका प्रयोग किया ॥ ३६-३७ ॥
पतिः कुरूणां गजसिंहगामी
विशालवक्षाः पृथुलोहिताक्षः ।
प्रादुश्चकारास्त्रमहीनतेजा माहेन्द्रमन्यत् स जघान तेन ।। ३८ ।। तब गज और सिंहके समान गतिवाले, विशाल वक्षःस्थलसे सुशोभित, बड़े-बड़े लाल नेत्रोंवाले, उत्कृष्ट तेजस्वी कुरुपति युधिष्ठिरने माहेन्द्र अस्त्र प्रकट किया और उसीसे अन्य सभी दिव्यास्त्रोंको नष्ट कर दिया ।। ३८ ।।
विहन्यमानेष्वस्त्रेषु द्रोणः क्रोधसमन्वितः । युधिष्ठिरवधं प्रेप्सुर्ब्राह्ममस्त्रमुदैरयत् ।। ३९ ।। उन अस्त्रोंके नष्ट हो जानेपर क्रोधभरे द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरका वध करनेकी इच्छासे ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया ।। ३९ ।।
ततो नाज्ञासिषं किंचिद् घोरेण तमसाऽऽवृते । सर्वभूतानि च परं त्रासं जग्मुर्महीपते ।। ४० ।। महीपते! फिर तो मैं घोर अन्धकारसे आवृत उस युद्धस्थलमें कुछ भी जान न सका और समस्त प्राणी अत्यन्त भयभीत हो उठे ।। ४० ।।
ब्रह्मास्त्रमुद्यतं दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ।। ४१ ।। राजेन्द्र! ब्रह्मास्त्रको उद्यत देख कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने ब्रह्मास्त्रसे ही उस अस्त्रका निवारण कर दिया ।। ४१ ।।
ततः सैनिकमुख्यास्ते प्रशशंसुर्नरर्षभौ । द्रोणपार्थौ महेष्वासौ सर्वयुद्धविशारदौ ।। ४२ ।। तदनन्तर प्रधान-प्रधान सैनिक सम्पूर्ण युद्धकलामें प्रवीण, महाधनुर्धर, नरश्रेष्ठ द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरकी बड़ी प्रशंसा करने लगे ।। ४२ ।।
ततः प्रमुच्य कौन्तेयं द्रोणो द्रुपदवाहिनीम् । व्यधमत् क्रोधताम्राक्षो वायव्यास्त्रेण भारत ।। ४३ ।। भारत! उस समय द्रोणाचार्यने कुन्तीकुमारका सामना करना छोड़कर क्रोधसे लाल आँखें किये वायव्यास्त्रके द्वारा द्रुपदकी सेनाका संहार आरम्भ किया ।। ४३ ।।
ते हन्यमाना द्रोणेन पञ्चालाः प्राद्रवन् भयात् । पश्यतो भीमसेनस्य पार्थस्य च महात्मनः ।। ४४ ।। द्रोणाचार्यकी मार खाकर पांचाल-सैनिक भीमसेन और महात्मा अर्जुनके देखते-देखते भयके मारे भागने लगे ।।
ततः किरीटी भीमश्च सहसा संन्यवर्तताम् । महद्भ्यां रथवंशाभ्यां परिगृह्य बलं तदा ।। ४५ ।। यह देख किरीटधारी अर्जुन और भीमसेन विशाल रथसेनाओंके द्वारा अपनी सेनाकी रोकथाम करते हुए सहसा उस ओर लौट पड़े ।। ४५ ।।
बीभत्सुर्दक्षिणं पार्श्वमुत्तरं च वृकोदरः ।
भारद्वाजं शरौघाभ्यां महद्भ्यामभ्यवर्षताम् ॥ ४६ ॥
अर्जुनने द्रोणाचार्यके दाहिने पार्श्वमें और भीमसेनने बायें पार्श्वमें महान् बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥
केकयाः सृञ्जयाश्चैव पञ्चालाश्च महौजसः ।
अन्वगच्छन् महाराज मत्स्याश्च सह सात्वतैः ॥ ४७ ॥
महाराज! उस समय केकय, सृंजय, महातेजस्वी पांचाल, मत्स्य तथा यादव-सैनिकोंने भी उन दोनोंका अनुसरण किया ॥ ४७ ॥
ततः सा भारती सेना वध्यमाना किरीटिना ।
तमसा निद्रया चैव पुनरेव व्यदीर्यत ॥ ४८ ॥
उस समय किरीटधारी अर्जुनकी मार खाती हुई कौरवी-सेना अंधकार और निद्रासे पीड़ित हो पुनः तितर-बितर हो गयी ॥ ४८ ॥
द्रोणेन वार्यमाणास्ते स्वयं तव सुतेन च ।
नाशक्यन्त महाराज योधा वारयितुं तदा ॥ ४९ ॥
महाराज! द्रोणाचार्य और स्वयं आपके पुत्र दुर्योधनके मना करनेपर भी उस समय आपके योद्धा रोके न जा सके ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे द्रोणयुधिष्ठिरयुद्धे
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरका युद्धविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥
१५८-
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
दुर्योधन और कर्णकी बातचीत, कृपाचार्यद्वारा कर्णको फटकारना तथा कर्णद्वारा कृपाचार्यका अपमान
संजय उवाच
उदीर्यमाणं तद् दृष्ट्वा पाण्डवानां महद् बलम् ।
अविषह्यं च मन्वानः कर्णं दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! पाण्डवोंकी उस विशाल सेनाका जोर बढ़ते देख उसे असह्य मानकर दुर्योधनने कर्णसे कहा— ॥ १ ॥
अयं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल ।
त्रायस्व समरे कर्ण सर्वान् योधान् महारथान् ॥ २ ॥
पञ्चालैर्मत्स्यकैकेयैः पाण्डवैश्च महारथैः ।
वृतान् समन्तात् संक्रुद्धैर्निःश्वसद्भिरिवोरगैः ॥ ३ ॥
‘मित्रवत्सल कर्ण! यही मित्रोंके कर्तव्यपालनका उपयुक्त अवसर आया है। क्रोधमें भरे हुए पांचाल, मत्स्य, केकय तथा पाण्डव महारथी फुफकारते हुए सर्पोंके समान भयंकर हो उठे हैं। उनके द्वारा चारों ओरसे घिरे हुए मेरे समस्त महारथी योद्धाओंकी आज तुम समरांगणमें रक्षा करो ॥
एते नदन्ति संहृष्टाः पाण्डवा जितकाशिनः ।
शक्रोपमाश्च बहवः पञ्चालानां रथव्रजाः ॥ ४ ॥
‘देखो, ये विजयसे सुशोभित होनेवाले पाण्डव तथा इन्द्रके समान पराक्रमी बहुसंख्यक पांचाल महारथी कैसे हर्षोत्फुल्ल होकर सिंहनाद कर रहे हैं’ ॥ ४ ॥
कर्ण उवाच
परित्रातुमिह प्राप्तो यदि पार्थं पुरंदरः ।
तमप्याशु पराजित्य ततो हन्तास्मि पाण्डवम् ॥ ५ ॥
**कर्णने कहा—**राजन्! यदि साक्षात् इन्द्र यहाँ कुन्तीकुमार अर्जुनकी रक्षा करनेके लिये आ गये हों तो उन्हें भी शीघ्र ही पराजित करके मैं पाण्डुपुत्र अर्जुनको अवश्य मार डालूँगा ॥ ५ ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि समाश्वसिहि भारत ।
हन्तास्मि पाण्डुतनयान् पञ्चालांश्च समागतान् ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! तुम धैर्य धारण करो। मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि युद्धस्थलमें आये हुए पाण्डवों तथा पांचालोंको निश्चय ही मारूँगा ॥ ६ ॥
जयं ते प्रतिदास्यामि वासवस्येव पावकिः । प्रियं तव मया कार्यमिति जीवामि पार्थिव ॥ ७ ॥ जैसे अग्निकुमार कार्तिकेयने तारकासुरका विनाश करके इन्द्रको विजय दिलायी थी, उसी प्रकार मैं आज तुम्हें विजय प्रदान करूँगा। भूपाल! मुझे तुम्हारा प्रिय करना है, इसीलिये जीवन धारण करता हूँ ॥ ७ ॥
सर्वेषामेव पार्थानां फाल्गुनो बलवत्तरः । तस्यामोघां विमोक्ष्यामि शक्तिं शक्रविनिर्मिताम् ॥ ८ ॥ कुन्तीके सभी पुत्रोंमें अर्जुन ही अधिक शक्तिशाली हैं, अतः मैं इन्द्रकी दी हुई अमोघ शक्तिको अर्जुनपर ही छोड़ूँगा ॥ ८ ॥
तस्मिन् हते महेष्वासे भ्रातरस्तस्य मानद । तव वश्या भविष्यन्ति वनं यास्यन्ति वा पुनः ॥ ९ ॥ मानद! महाधनुर्धर अर्जुनके मारे जानेपर उनके सभी भाई तुम्हारे वशमें हो जायँगे अथवा पुनः वनमें चले जायँगे ॥ ९ ॥
मयि जीवति कौरव्य विषादं मा कृथाः क्वचित् । अहं जेष्यामि समरे सहितान् सर्वपाण्डवान् ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! तुम मेरे जीते-जी कभी विषाद न करो। मैं समरभूमिमें संगठित होकर आये हुए समस्त पाण्डवोंको जीत लूँगा ॥ १० ॥
पांचालान् केकयांश्चैव वृष्णींश्चापि समागतान् । बाणौघैः शकलीकृत्य तव दास्यामि मेदिनीम् ॥ ११ ॥ मैं अपने बाणसमूहोंद्वारा रणभूमिमें पधारे हुए पांचालों, केकयों और वृष्णिवंशियोंके भी टुकड़े-टुकड़े करके यह सारी पृथ्वी तुम्हें दे दूँगा ॥ ११ ॥
संजय उवाच
एवं ब्रुवाणं कर्णं तु कृपः शारद्वतोऽब्रवीत् । स्मयन्निव महाबाहुः सूतपुत्रमिदं वचः ॥ १२ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! इस तरहकी बातें करते हुए सूतपुत्र कर्णसे शरद्वान्के पुत्र महाबाहु कृपाचार्यने मुसकराते हुए-से यह बात कही— ॥ १२ ॥
शोभनं शोभनं कर्ण सनाथः कुरुपुङ्गवः । त्वया नाथेन राधेय वचसा यदि सिध्यति ॥ १३ ॥ ‘कर्ण! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा! राधापुत्र! यदि बात बनानेसे ही कार्य सिद्ध हो जाय, तब तो तुम-जैसे सहायकको पाकर कुरुराज दुर्योधन सनाथ हो गये ॥ १३ ॥
बहुशः कत्थसे कर्ण कौरवस्य समीपतः । न तु ते विक्रमः कश्चिद् दृश्यते फलमेव वा ॥ १४ ॥
‘कर्ण! तुम कुरुनन्दन सुयोधनके समीप तो बहुत बढ़कर बातें किया करते हो; किंतु न तो कभी कोई तुम्हारा पराक्रम देखा जाता है और न उसका कोई फल ही सामने आता है॥ १४॥
समागमः पाण्डुसुतैर्दृष्टस्ते बहुशो युधि।
सर्वत्र निर्जितश्चासि पाण्डवैः सूतनन्दन॥ १५॥
‘सूतनन्दन! पाण्डुके पुत्रोंसे युद्धस्थलमें तुम्हारी अनेकों बार मुठभेड़ हुई है; परंतु सर्वत्र पाण्डवोंसे तुम्हीं परास्त हुए हो॥ १५॥
ह्रियमाणे तदा कर्ण गन्धर्वैर्धृतराष्ट्रजे।
तदायुध्यन्त सैन्यानि त्वमेकोऽग्रेऽपलायिथाः॥ १६॥
‘कर्ण! याद है कि नहीं, जब गन्धर्व दुर्योधनको पकड़कर लिये जा रहे थे, उस समय सारी सेना तो युद्ध कर रही थी और अकेले तुम ही सबसे पहले पलायन कर गये थे॥ १६॥
विराटनगरे चापि समेताः सर्वकौरवाः।
पार्थेन निर्जिता युद्धे त्वं च कर्ण सहानुजः॥ १७॥
‘कर्ण! विराट नगरमें भी सम्पूर्ण कौरव एकत्र हुए थे; किंतु अर्जुनने अकेले ही वहाँ सबको हरा दिया था। कर्ण! तुम भी अपने भाइयोंके साथ परास्त हुए थे॥ १७॥
एकस्याप्यसमर्थस्त्वं फाल्गुनस्य रणाजिरे।
कथमुत्सहसे जेतुं सकृष्णान् सर्वपाण्डवान्॥ १८॥
‘समरांगणमें अकेले अर्जुनका सामना करनेकी भी तुममें शक्ति नहीं है; फिर श्रीकृष्णसहित सम्पूर्ण पाण्डवोंको जीत लेनेका उत्साह कैसे दिखाते हो?॥
अब्रुवन् कर्ण युध्यस्व कत्थसे बहु सूनज।
अनुक्त्वा विक्रमेद् यस्तु तद् वै सत्पुरुषव्रतम्॥ १९॥
‘सूतपुत्र कर्ण! चुपचाप युद्ध करो। तुम बातें बहुत बनाते हो। जो बिना कुछ कहे ही पराक्रम दिखाये, वही वीर है और वैसा करना ही सत्पुरुषोंका व्रत है॥ १९॥
गर्जित्व सूतपुत्र त्वं शारदाभ्रमिवाफलम्।
निष्फलो दृश्यसे कर्ण तच्च राजा न बुध्यते॥ २०॥
‘सूतपुत्र कर्ण! तुम शरद्-ऋतुके निष्फल बादलोंके समान गर्जना करके भी निष्फल ही दिखायी देते हो; किंतु राजा दुर्योधन इस बातको नहीं समझ रहे हैं॥
तावद् गर्जस्व राधेय यावत् पार्थं न पश्यसि।
आरात् पार्थं हि ते दृष्ट्वा दुर्लभं गर्जितं पुनः॥ २१॥
‘राधानन्दन! जबतक तुम अर्जुनको नहीं देखते हो, तभीतक गर्जना कर लो। कुन्तीकुमार अर्जुनको समीप देख लेनेपर फिर यह गर्जना तुम्हारे लिये दुर्लभ हो जायगी॥
त्वमनासाद्य तान् बाणान् फाल्गुनस्य विगर्जसि।
पार्थसायकविद्धस्य दुर्लभं गर्जितं तव ॥ २२ ॥
'जबतक अर्जुनके वे बाण तुम्हारे पड़ रहे हैं, तभीतक तुम जोर-जोरसे गरज रहे हो। अर्जुनके बाणोंसे घायल होनेपर तुम्हारे लिये यह गर्जन-तर्जन दुर्लभ हो जायगा ॥ २२ ॥
बाहुभिः क्षत्रियाः शूरा वाग्भिः शूरा द्विजातयः ।
धनुषा फाल्गुनः शूरः कर्णः शूरो मनोरथैः ॥ २३ ॥
तोषिता येन रुद्रोऽपि कः पार्थं प्रतिघातयेत् ।
'क्षत्रिय अपनी भुजाओंसे शौर्यका परिचय देते हैं। ब्राह्मण वाणीद्वारा प्रवचन करनेमें वीर होते हैं। अर्जुन धनुष चलानेमें शूर हैं; किंतु कर्ण केवल मनसूबे बाँधनेमें वीर है। जिन्होंने अपने पराक्रमसे भगवान् शंकरको भी संतुष्ट किया है, उन अर्जुनको कौन मार सकता है?' ॥
एवं संरुषितस्तेन तदा शारद्वतेन ह ॥ २४ ॥
कर्णः प्रहरतां श्रेष्ठः कृपं वाक्यमथाब्रवीत् ।
उन कृपाचार्यके ऐसा कहनेपर योद्धाओंमें श्रेष्ठ कर्णने उस समय रुष्ट होकर कृपाचार्यसे इस प्रकार कहा— ॥ २४ ½ ॥
शूरा गर्जन्ति सततं प्रावृषीव बलाहकाः ॥ २५ ॥
फलं चाशु प्रयच्छन्ति बीजमुप्तमृताविव ।
'शूरवीर वर्षाकालके मेघोंकी तरह सदा गरजते हैं और ठीक ऋतुमें बोये हुए बीजके समान शीघ्र ही फल भी देते हैं ॥ २५ ½ ॥
दोषमत्र न पश्यामि शूराणां रणमूर्धनि ॥ २६ ॥
तत्तद् विकत्थमानानां भारं चोद्वहतां मृधे ।
'युद्धस्थलमें महान् भार उठानेवाले शूरवीर यदि युद्धके मुहानेपर अपनी प्रशंसाकी ही बातें कहते हैं तो इसमें मुझे उनका कोई दोष नहीं दिखायी देता ॥ २६ ½ ॥
यं भारं पुरुषो वोढुं मनसा हि व्यवस्यति ॥ २७ ॥
दैवमस्य ध्रुवं तत्र साहाय्यायोपपद्यते ।
'पुरुष अपने मनसे जिस भारको ढोनेका निश्चय करता है, उसमें दैव अवश्य ही उसकी सहायता करता है ॥
व्यवसायद्वितीयोऽहं मनसा भारमुद्वहन् ॥ २८ ॥
हत्वा पाण्डुसुतानाजौ सकृष्णान् सहसात्वतान् ।
गर्जाामि यद्यहं विप्र तव किं तत्र नश्यति ॥ २९ ॥
'मैं मनसे जिस कार्यभारका वहन कर रहा हूँ, उसकी सिद्धिमें दृढ़ निश्चय ही मेरा सहायक है। विप्रवर! मैं कृष्ण और सात्यकिसहित समस्त पाण्डवोंको युद्धमें मारनेका निश्चय करके यदि गरज रहा हूँ तो उसमें आपका क्या नष्ट हुआ जा रहा है? ॥ २८-२९ ॥
वृथा शूरा न गर्जन्ति शारदा इव तोयदाः ।
सामर्थ्यमात्मनो ज्ञात्वा ततो गर्जन्ति पण्डिताः ॥ ३० ॥
'शरद्-ऋतुके बादलोंके समान शूरवीर व्यर्थ नहीं गरजते हैं। विद्वान् पुरुष पहले अपनी सामर्थ्यको समझ लेते हैं, उसके बाद गर्जना करते हैं ॥ ३० ॥
सोऽहमद्य रणे यत्तौ सहितौ कृष्णपाण्डवौ ।
उत्सहे मनसा जेतुं ततो गर्जामि गौतम ॥ ३१ ॥
'गौतम! आज मैं रणभूमिमें विजयके लिये साथ-साथ प्रयत्न करनेवाले श्रीकृष्ण और अर्जुनको जीत लेनेके लिये मन-ही-मन उत्साह रखता हूँ। इसीलिये गर्जना करता हूँ ॥ ३१ ॥
पश्य त्वं गर्जितस्यास्य फलं मे विप्र सानुगान् ।
हत्वा पाण्डुसुतानाजौ सहकृष्णान् ससात्वतान् ॥ ३२ ॥
दुर्योधनाय दास्यामि पृथिवीं हतकण्टकाम् ।
'ब्रह्मन्! मेरी इस गर्जनाका फल देख लेना। मैं युद्धमें श्रीकृष्ण, सात्यकि तथा अनुगामियोंसहित पाण्डवोंको मारकर इस भूमण्डलका निष्कण्टक राज्य दुर्योधनको दे दूँगा' ॥
कृप उवाच
मनोरथप्रलापा मे न ग्राह्यास्तव सूतज ॥ ३३ ॥
सदा क्षिपसि वै कृष्णौ धर्मराजं च पाण्डवम् ।
ध्रुवस्तत्र जयः कर्ण यत्र युद्धविशारदौ ॥ ३४ ॥
**कृपाचार्य बोले—**सूतपुत्र! तुम्हारे ये मनसूबे बाँधनेके निरर्थक प्रलाप मेरे लिये विश्वासके योग्य नहीं हैं। कर्ण! तुम सदा ही श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरपर आक्षेप किया करते हो; परंतु विजय उसी पक्षकी होगी, जहाँ युद्धविशारद श्रीकृष्ण और अर्जुन विद्यमान हैं ॥ ३३-३४ ॥
देवगन्धर्वयक्षाणां मनुष्योरगरक्षसाम् ।
दंशितानामपि रणे अजेयौ कृष्णपाण्डवौ ॥ ३५ ॥
यदि देवता, गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, सर्प और राक्षस भी कवच बाँधकर युद्धके लिये आ जायँ तो रणभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको वे भी जीत नहीं सकते ॥ ३५ ॥
ब्रह्मण्यः सत्यवाग् दान्तो गुरुदैवतपूजकः ।
नित्यं धर्मरतश्चैव कृतास्त्रश्च विशेषतः ॥ ३६ ॥
धृतिमांश्च कृतज्ञश्च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
धर्मपुत्र युधिष्ठिर ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, गुरु और देवताओंका सम्मान करनेवाले, सदा धर्मपरायण, अस्त्रविद्यामें विशेष कुशल, धैर्यवान् और कृतज्ञ हैं ॥ ३६ ½ ॥
भ्रातरश्चास्य बलिनः सर्वास्त्रेषु कृतश्रमाः ॥ ३७ ॥
गुरुवृत्तिरताः प्राज्ञा धर्मनित्या यशस्विनः ।
इनके बलवान् भाई भी सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी कलामें परिश्रम किये हुए हैं। वे गुरुसेवापरायण, विद्वान्, धर्मतत्पर और यशस्वी हैं ॥ ३७ ½ ॥
सम्बन्धिनश्चेन्द्रवीर्याः स्वनुरक्ताः प्रहारिणः ॥ ३८ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च दौर्मुखिर्जनमेजयः ।
चन्द्रसेनो रुद्रसेनः कीर्तिधर्मा ध्रुवो धरः ॥ ३९ ॥
वसुचन्द्रो दामचन्द्रः सिंहचन्द्रः सुतेजनः ।
द्रुपदस्य तथा पुत्रा द्रुपदश्च महास्त्रवित् ॥ ४० ॥
उनके सम्बन्धी भी इन्द्रके समान पराक्रमी, उनमें अनुराग रखनेवाले और प्रहार करनेमें कुशल हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, दुर्मुखपुत्र जनमेजय, चन्द्रसेन, रुद्रसेन, कीर्तिधर्मा, ध्रुव, धर, वसुचन्द्र, दामचन्द्र, सिंहचन्द्र, सुतेजन, द्रुपदके पुत्रगण तथा महान् अस्त्रवेत्ता द्रुपद ॥ ३८—४० ॥
येषामर्थाय संयत्तो मत्स्यराजः सहानुजः ।
शतानीकः सूर्यदत्तः श्रुतानीकः श्रुतध्वजः ॥ ४१ ॥
बलानीको जयानीको जयाश्वो रथवाहनः ।
चन्द्रोदयः समर्थो विराटभ्रातरः शुभाः ॥ ४२ ॥
यमौ च द्रौपदेयाश्च राक्षसच घटोत्कचः ।
येषामर्थाय युध्यन्ते न तेषां विद्यते क्षयः ॥ ४३ ॥ जिनके लिये शतानीक, सूर्यदत्त, श्रुतानीक, श्रुतध्वज, बलानीक, जयानीक, जयाश्व, रथवाहन, चन्द्रोदय तथा समर्थ—ये विराटके श्रेष्ठ भाई और इन भाइयोंसहित मत्स्यराज विराट युद्ध करनेको तैयार हैं, नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पुत्र तथा राक्षस घटोत्कच—ये वीर जिनके लिये युद्ध कर रहे हैं, उन पाण्डवोंकी कभी कोई क्षति नहीं हो सकती है ॥ ४१—४३ ॥
एते चान्ये च बहवो गुणाः पाण्डुसुतस्य वै । कामं खलु जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ४४ ॥ सयक्षराक्षसगणं सभूतभुजगद्विपम् । निःशेषमस्त्रवीर्येण कुर्वीते भीमफाल्गुनौ ॥ ४५ ॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके ये तथा और भी बहुत-से गुण हैं। भीमसेन और अर्जुन यदि चाहें तो अपने अस्त्रबलसे देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, राक्षस, भूत, नाग और हाथियोंसहित इस सम्पूर्ण जगत्का सर्वथा विनाश कर सकते हैं ॥
युधिष्ठिरश्च पृथिवीं निर्दहेद् घोरचक्षुषा । अप्रमेयबलः शौरिर्येषामर्थे च दंशितः ॥ ४६ ॥ कथं तान् संयुगे कर्ण जेतुमुत्सहसे परान् । युधिष्ठिर भी यदि रोषभरी दृष्टिसे देखें तो इस भूमण्डलको भस्म कर सकते हैं। कर्ण! जिनके लिये अनन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्ण भी कवच धारण करके लड़नेको तैयार हैं, उन शत्रुओंको युद्धमें जीतनेका साहस तुम कैसे कर रहे हो? ॥ ४६ १/२ ॥
महानपनयस्त्वेष नित्यं हि तव सूतज ॥ ४७ ॥ यस्त्वमुत्सहसे योद्धुं समरे शौरिणा सह । सूतपुत्र! तुम जो सदा समरभूमिमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेका उत्साह दिखाते हो, यह तुम्हारा महान् अन्याय (अक्षम्य अपराध) है ॥ ४७ १/२ ॥
संजय उवाच
एवमुक्तस्तु राधेयः प्रहसन् भरतर्षभ ॥ ४८ ॥ अब्रवीच्च तदा कर्णो गुरुं शारद्वतं कृपम् । **संजय कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर राधापुत्र कर्ण ठठाकर हँस पड़ा और शरद्वान्के पुत्र गुरु कृपाचार्यसे उस समय यों बोला— ॥ ४८ १/२ ॥
सत्यमुक्तं त्वया ब्रह्मन् पाण्डवान् प्रति यद् वचः ॥ ४९ ॥ एते चान्ये च बहवो गुणाः पाण्डुसुतेषु वै । ‘बाबाजी! पाण्डवोंके विषयमें तुमने जो बात कही है वह सब सत्य है। यही नहीं, पाण्डवोंमें और भी बहुत-से गुण हैं ॥ ४९ १/२ ॥
अजय्याश्च रणे पार्था देवैरपि सवासवैः ।। ५० ।।
सदैत्ययक्षगन्धर्वैः पिशाचोरगराक्षसैः ।
'यह भी ठीक है कि कुन्तीके पुत्रोंको रणभूमिमें इन्द्र आदि देवता, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षस भी जीत नहीं सकते ।। ५० १/२ ।।
तथापि पार्थाञ्जेष्यामि शक्त्या वासवदत्तया ।। ५१ ।।
मम ह्यमोघा दत्तेयं शक्तिः शक्रेण वै द्विज ।
एतया निहनिष्यामि सव्यसाचिनमाहवे ।। ५२ ।।
'तथापि मैं इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे कुन्तीके पुत्रोंको जीत लूँगा। ब्रह्मन्! मुझे इन्द्रने यह अमोघ शक्ति दे रखी है; इसके द्वारा मैं सव्यसाची अर्जुनको युद्धमें अवश्य मार डालूँगा ।। ५१-५२ ।।
हते तु पाण्डवे कृष्णे भ्रातरश्चास्य सोदराः ।
अनर्जुना न शक्ष्यन्ति महीं भोक्तुं कथञ्चन ।। ५३ ।।
'पाण्डुपुत्र अर्जुनके मारे जानेपर उनके बिना उनके सहोदर भाई किसी तरह इस पृथ्वीका राज्य नहीं भोग सकेंगे ।। ५३ ।।
तेषु नष्टेषु सर्वेषु पृथिवीयं ससागरा ।
अयत्नात् कौरवेन्द्रस्य वशे स्थास्यति गौतम ।। ५४ ।।
'गौतम! उन सबके नष्ट हो जानेपर बिना किसी प्रयत्नके ही यह समुद्रसहित सारी पृथ्वी कौरवराज दुर्योधनके वशमें हो जायगी ।। ५४ ।।
सुनीतैरिह सर्वार्थाः सिध्यन्ते नात्र संशयः ।
एतमर्थमहं ज्ञात्वा ततो गर्जामि गौतम ।। ५५ ।।
'गौतम! इस संसारमें सुनीतिपूर्ण प्रयत्नोंसे सारे कार्य सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं है। इस बातको समझकर ही मैं गर्जना करता हूँ ।। ५५ ।।
त्वं तु विप्रश्च वृद्धश्च अशक्तश्चापि संयुगे ।
कृतस्नेहश्च पार्थेषु मोहान्मामवमन्यसे ।। ५६ ।।
'तुम तो ब्राह्मण और उसमें भी बूढ़े हो। तुममें युद्ध करनेकी शक्ति है ही नहीं। इसके सिवा, तुम कुन्तीके पुत्रोंपर स्नेह रखते हो; इसलिये मोहवश मेरा अपमान कर रहे हो ।। ५६ ।।
यद्येवं वक्ष्यसे भूयो ममाप्रियमिह द्विज ।
ततस्ते खड्गमुद्यम्य जिह्वां छेत्स्यामि दुर्मते ।। ५७ ।।
'दुर्बुद्धि ब्राह्मण! यदि यहाँ पुनः इस प्रकार मुझे अप्रिय लगनेवाली बात बोलोगे तो मैं अपनी तलवार उठाकर तुम्हारी जीभ काट लूँगा ।। ५७ ।।
यच्चापि पाण्डवान् विप्र स्तोतुमिच्छसि संयुगे ।
भीषयन् सर्वसैन्यानि कौरवेयाणि दुर्मते ।। ५८ ।।
अत्रापि शृणु मे वाक्यं यथावद् ब्रुवतो द्विज । ‘ब्रह्मन्! दुर्मते! तुम तो युद्धस्थलमें समस्त कौरव-सेनाओंको भयभीत करनेके लिये पाण्डवोंके गुण गाना चाहते हो, उसके विषयमें भी मैं जो यथार्थ बात कह रहा हूँ, उसे सुन लो ॥ ५८ १/२ ॥
दुर्योधनश्च द्रोणश्च शकुनिर्दुर्मुखो जयः ॥ ५९ ॥ दुःशासनो वृषसेनो मद्रराजस्त्वमेव च । सोमदत्तश्च भूरिश्च तथा द्रौणिर्विविंशतिः ॥ ६० ॥ तिष्ठेयुर्दंशिता यत्र सर्वे युद्धविशारदाः । जयेदेतान् नरः को नु शक्रतुल्यबलोऽप्यरिः ॥ ६१ ॥ ‘दुर्योधन, द्रोण, शकुनि, दुर्मुख, जय, दुःशासन, वृषसेन, मद्रराज शल्य, तुम स्वयं, सोमदत्त, भूरि, अश्वत्थामा और विविंशति—ये युद्धकुशल सम्पूर्ण वीर जहाँ कवच बाँधकर खड़े हो जायँगे, वहाँ इन्हें कौन मनुष्य जीत सकता है? वह इन्द्रके तुल्य बलवान् शत्रु ही क्यों न हो (इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता) ॥
शूराश्च हि कृतास्त्राश्च बलिनः स्वर्गलिप्सवः । धर्मज्ञा युद्धकुशला हन्युर्युद्धे सुरानपि ॥ ६२ ॥ ‘जो शूरवीर, अस्त्रोंके ज्ञाता, बलवान्, स्वर्गप्राप्तिकी अभिलाषा रखनेवाले, धर्मज्ञ और युद्धकुशल हैं वे देवताओंको भी युद्धमें मार सकते हैं ॥ ६२ ॥
एते स्थास्यन्ति संग्रामे पाण्डवानां वधार्थिनः । जयमाकाङ्क्षमाणा हि कौरवेयस्य दंशिताः ॥ ६३ ॥ ‘ये वीरगण कुरुराज दुर्योधनकी जय चाहते हुए पाण्डवोंके वधकी इच्छासे संग्राममें कवच बाँधकर डट जायँगे ॥ ६३ ॥
दैवायत्तमहं मन्ये जयं सुबलिनामपि । यत्र भीष्मो महाबाहुः शेते शरशताचितः ॥ ६४ ॥ ‘मैं तो बड़े-से-बड़े बलवानोंकी भी विजय दैवके ही अधीन मानता हूँ। दैवाधीन होनेके कारण महाबाहु भीष्म आज सैकड़ों बाणोंसे विद्ध होकर रणभूमिमें शयन करते हैं ॥ ६४ ॥
विकर्णश्चित्रसेनश्च बाह्लीकोऽथ जयद्रथः । भूरिश्रवा जयश्चैव जलसंधः सुदक्षिणः ॥ ६५ ॥ शलश्च रथिनां श्रेष्ठो भगदत्तश्च वीर्यवान् । एते चान्ये च राजानो देवैरपि सुदुर्जयाः ॥ ६६ ॥ ‘विकर्ण, चित्रसेन, बाह्लीक, जयद्रथ, भूरिश्रवा, जय, जलसंध, सुदक्षिण, रथियोंमें श्रेष्ठ शल तथा पराक्रमी भगदत्त—ये और दूसरे भी बहुत-से राजा देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय थे ॥ ६५-६६ ॥
निहताः समरे शूराः पाण्डवैर्बलवत्तराः । किमन्यद् दैवसंयोगान्मन्यसे पुरुषाधम ॥ ६७ ॥ ‘परंतु उन अत्यन्त प्रबल तथा शूरवीर नरेशोंको भी पाण्डवोंने युद्धमें मार डाला। पुरुषाधम! तुम इसमें दैवसंयोगके सिवा दूसरा कौन-सा कारण मानते हो? ।।
यांश्च तान् स्तौषि सततं दुर्योधनरिपून् द्विज । तेषामपि हताः शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६८ ॥ ‘ब्रह्मन्! तुम दुर्योधनके जिन शत्रुओंकी सदा स्तुति करते रहते हो, उनके भी तो सैकड़ों और सहस्रों शूरवीर मारे गये हैं ।। ६८ ।।
क्षीयन्ते सर्वसैन्यानि कुरूणां पाण्डवैः सह । प्रभावं नात्र पश्यामि पाण्डवानां कथंचन ॥ ६९ ॥ ‘कौरव तथा पाण्डव दोनों दलोंकी सारी सेनाएँ प्रतिदिन नष्ट हो रही हैं। मुझे इसमें किसी प्रकार भी पाण्डवोंका कोई विशेष प्रभाव नहीं दिखायी देता है ।।
यस्तान् बलवतो नित्यं मन्यसे त्वं द्विजाधम । यतिष्येऽहं यथाशक्ति योद्धुं तैः सह संयुगे । दुर्योधनहितार्थाय 'जयो दैवे प्रतिष्ठितः' ॥ ७० ॥ ‘द्विजाधम! तुम जिन्हें सदा बलवान् मानते रहते हो, उन्हींके साथ मैं संग्रामभूमिमें दुर्योधनके हितके लिये यथाशक्ति युद्ध करनेका प्रयत्न करूँगा। विजय तो दैवके अधीन है’ ।। ७० ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे कृपकर्णवाक्येऽष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें कृपाचार्य और कर्णका विवादविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५८ ।।
१५९-
एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
अश्वत्थामाका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना, दुर्योधनका उसे मनाना, पाण्डवों और पाञ्चालोंका कर्णपर आक्रमण, कर्णका पराक्रम, अर्जुनके द्वारा कर्णकी पराजय तथा दुर्योधनका अश्वत्थामासे पांचालोंके वधके लिये अनुरोध
संजय उवाच
तथा परुषितं दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मातुलम् ।
खड्गमुद्यम्य वेगेन द्रौणिरभ्यपतद् द्रुतम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने मामाके प्रति सूतपुत्र कर्णको कटु वचन सुनाते देख अश्वत्थामा बड़े वेगसे तलवार उठाकर तुरंत कर्णपर टूट पड़ा ॥ १ ॥
ततः परमसंक्रुद्धः सिंहो मत्तमिव द्विपम् ।
प्रेक्षतः कुरुराजस्य द्रौणिः कर्णं समभ्ययात् ॥ २ ॥
जैसे सिंह मतवाले हाथीपर झपटता है, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणकुमार अश्वत्थामाने कुरुराज दुर्योधनके देखते-देखते कर्णपर आक्रमण किया ॥ २ ॥
अश्वत्थामोवाच
यदर्जुनगुणांस्तथ्यान् कीर्तयानं नराधम ।
शूरं द्वेषात् सुदुर्बुद्धे त्वं भर्त्सयसि मातुलम् ॥ ३ ॥
विकत्थमानः शौर्येण सर्वलोकधनुर्धरम् ।
दर्पोत्सेधगृहीतोऽद्य न कञ्चिद् गणयन् मृधे ॥ ४ ॥
**अश्वत्थामाने कहा—**दुर्बुद्धि! नराधम! मेरे मामा सम्पूर्ण जगत्के श्रेष्ठ धनुर्धर एवं शूरवीर हैं। ये अर्जुनके सच्चे गुणोंका बखान कर रहे थे, तो भी तू द्वेषवश अपनी शूरताकी डींग हाँकता हुआ और घमण्डमें आकर आज युद्धमें किसीको कुछ न समझता हुआ जो इन्हें फटकार रहा है, उसका क्या कारण है? ॥ ३-४ ॥
क्व ते वीर्यं क्व चास्त्राणि यत्त्वां निर्जित्य संयुगे ।
गाण्डीवधन्वा हतवान् प्रेक्षतस्ते जयद्रथम् ॥ ५ ॥
जब युद्धस्थलमें गाण्डीवधारी अर्जुनने तुझे परास्त करके तेरे देखते-देखते जयद्रथको मार डाला था, उस समय तेरा पराक्रम कहाँ था? तेरे वे अस्त्र-शस्त्र कहाँ चले गये
थे? ॥ ५ ॥
येन साक्षान्महादेवो योधितः समरे पुरा ।
तमिच्छसि वृथा जेतुं सूताधम मनोरथैः ॥ ६ ॥
सूताधम! जिन्होंने समरांगणमें पहले साक्षात् महादेवजीके साथ युद्ध किया है, उन्हें केवल मनोरथोंद्वारा जीतनेकी तू व्यर्थ इच्छा प्रकट कर रहा है ॥ ६ ॥
यं हि कृष्णेन सहितं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।
जेतुं न शक्ताः सहिताः सेन्द्रा अपि सुरसुराः ॥ ७ ॥
लोकैकवीरमजितमर्जुनं सूत संयुगे ।
किं पुनस्त्वं सुदुर्बुद्धे सहैभिर्वसुधाधिपैः ॥ ८ ॥
दुर्बुद्धि! सूत! जो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा श्रीकृष्णके साथ रहनेपर जिन्हें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी जीतनेमें समर्थ नहीं हैं, उन्हीं लोकके एकमात्र अपराजित वीर अर्जुनको जीतनेके लिये इन राजाओंसहित तेरी क्या शक्ति है? ॥ ७-८ ॥
कर्ण पश्य सुदुर्बुद्धे तिष्ठेदानीं नराधम ।
एष तेऽद्य शिरः कायादुद्धरामि सुदुर्मते ॥ ९ ॥
दुर्बुद्धि नराधम! कर्ण! तू देख और खड़ा रह। दुर्मते! मैं अभी तेरा सिर धड़से उतार लेता हूँ ॥ ९ ॥
संजय उवाच
समुद्यतं तु वेगेन राजा दुर्योधनः स्वयम् ।
न्यवारयन्महातेजाः कृपश्च द्विपदां वरः ॥ १० ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार वेगपूर्वक उठे हुए अश्वत्थामाको महातेजस्वी स्वयं राजा दुर्योधन तथा मनुष्योंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने रोका ॥ १० ॥
कर्ण उवाच
शूरोऽयं समरश्लाघी दुर्मतिश्च द्विजाधमः ।
आसादयतु मद्दर्यं मुञ्चेमं कुरुसत्तम ॥ ११ ॥
**कर्ण बोला—**कुरुश्रेष्ठ! यह दुर्बुद्धि एवं नीच ब्राह्मण बड़ा शूरवीर बनता है और युद्धकी श्लाघा रखता है। तुम इसे छोड़ दो। आज यह मेरे पराक्रमका सामना करे ॥ ११ ॥
अश्वत्थामोवाच
तवैतत् क्षम्यतेऽस्माभिः सूतात्मज सुदुर्मते ।
दर्पमुत्सिक्कमेतत् ते फाल्गुनो नाशयिष्यति ॥ १२ ॥
**अश्वत्थामाने कहा—**दुर्बुद्धि सूतपुत्र! हमलोग तेरे इस अपराधको क्षमा करते हैं। तेरे इस बढ़े हुए घमण्डका नाश अर्जुन करेंगे ॥ १२ ॥
दुर्योधन उवाच
अश्वत्थामन् प्रसीदस्व क्षन्तुमर्हसि मानद ।
कोपः खलु न कर्तव्यः सूतपुत्रे कथंचन ॥ १३ ॥
दुर्योधन बोला— दूसरोंको मान देनेवाले (भाई) अश्वत्थामा! प्रसन्न होओ। तुम्हें क्षमा करना चाहिये। सूतपुत्र कर्णपर तुम्हें किसी प्रकार भी क्रोध करना उचित नहीं है ॥ १३ ॥
त्वयि कर्णे कृपे द्रोणे मद्रराजेऽथ सौबले ।
महत् कार्यं समासक्तं प्रसीद द्विजसत्तम ॥ १४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! तुमपर, कर्णपर तथा कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, मद्रराज शल्य और शकुनिपर महान् कार्यभार रखा गया है; तुम प्रसन्न होओ ॥ १४ ॥
एते ह्यभिमुखाः सर्वे राधेयेन युयुत्सवः ।
आयान्ति पाण्डवा ब्रह्मन्नाह्वयन्तः समन्ततः ॥ १५ ॥
ब्रह्मन्! ये सामने राधापुत्र कर्णके साथ युद्धकी अभिलाषा रखकर समस्त पाण्डव-सैनिक सब ओरसे ललकारते आ रहे हैं ॥ १५ ॥
संजय उवाच
प्रसाद्यमानस्तु ततो राज्ञा द्रौणिर्महामनाः ।
प्रससाद महाराज क्रोधवेगसमन्वितः ॥ १६ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! राजा दुर्योधनके मनानेपर क्रोधके वेगसे युक्त महामना अश्वत्थामा शान्त एवं प्रसन्न हो गया ॥ १६ ॥
ततः कृपोऽप्युवाचेदमाचार्यः सुमहामनाः ।
सौम्यस्वभावाद् राजेन्द्र क्षिप्रमागतमार्दवः ॥ १७ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् सौम्य स्वभावके कारण शीघ्र ही मृदुता आ जानेसे महामना कृपाचार्य भी शान्त हो गये और इस प्रकार बोले ॥ १७ ॥
कृप उवाच
तवैतत् क्षम्यतेऽस्माभिः सूतात्मज सुदुर्मते ।
दर्पमुत्सिक्तमेतत् ते फाल्गुनो नाशयिष्यति ॥ १८ ॥
कृपाचार्यने कहा— दुर्बुद्धि सूतपुत्र! हमलोग तो तेरे इस अपराधको क्षमा कर देते हैं; परंतु अर्जुन तेरे इस बढ़े हुए घमंडका अवश्य नाश करेंगे ॥ १८ ॥
संजय उवाच
ततस्ते पाण्डवा राजन् पञ्चालाश्च यशस्विनः ।
आजग्मुः सहिताः कर्णं तर्जयन्तः समन्ततः ॥ १९ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वे यशस्वी पाण्डव और पांचाल एक साथ होकर गर्जन-तर्जन करते हुए चारों ओरसे कर्णपर चढ़ आये ॥ १९ ॥
कर्णोऽपि रथिनां श्रेष्ठश्चापमुद्यम्य वीर्यवान् ।
कौरवाग्र्यैः परिवृतः शक्रो देवगणैरिव ॥ २० ॥
पर्यतिष्ठत तेजस्वी स्वबाहुबलमाश्रितः ।
रथियोंमें श्रेष्ठ, पराक्रमी एवं तेजस्वी वीर कर्ण भी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रके समान प्रधान कौरववीरोंसे घिरकर अपने बाहुबलका भरोसा करके धनुष उठाकर युद्धके लिये खड़ा हो गया ॥ २० १/२ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं कर्णस्य सह पाण्डवैः ॥ २१ ॥
भीषणं सुमहाराज सिंहनादविराजितम् ।
महाराज! तदनन्तर कर्णका पाण्डवोंके साथ भीषण युद्ध आरम्भ हुआ, जो सिंहनादसे सुशोभित हो रहा था ॥
ततस्ते पाण्डवा राजन् पञ्चालाश्च यशस्विनः ॥ २२ ॥
दृष्ट्वा कर्णं महाबाहुमुच्चैः शब्दमथानदन् ।
राजन्! यशस्वी पाण्डव और पांचालोंने महाबाहु कर्णको देखकर उच्चस्वरसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ २२ १/२ ॥
अयं कर्णः कुतः कर्णस्तिष्ठ कर्ण महारणे ॥ २३ ॥
युध्यस्व सहितोऽस्माभिर्दुरात्मन् पुरुषाधम ।
'कहाँ कर्ण है? यह कर्ण है। दुरात्मन् नराधम कर्ण! इस महायुद्धमें खड़ा रह और हमारे साथ युद्ध कर' ॥ २३ १/२ ॥
अन्ये तु दृष्ट्वा राधेयं क्रोधरक्तेक्षणाऽब्रुवन् ॥ २४ ॥
हन्यतामयमुत्सिक्तः सूतपुत्रोऽल्पचेतनः ।
सर्वैः पार्थिवशार्दूलैर्नानेनार्थोऽस्ति जीवता ॥ २५ ॥
अत्यन्तवैरी पार्थानां सततं पापपूरुषः ।
एष मूलमनर्थानां दुर्योधनमते स्थितः ॥ २६ ॥
घ्नतैनमिति जल्पन्तः क्षत्रियाः समुपाद्रवन् ।
महता शरवर्षेण च्छादयन्तो महारथाः ॥ २७ ॥
वधार्थं सूतपुत्रस्य पाण्डवेयेन चोदिताः ।
दूसरे लोगोंने राधापुत्र कर्णको देखकर क्रोधसे लाल आँखें करके कहा—'समस्त श्रेष्ठ राजा मिलकर इस घमंडी और मूर्ख सूतपुत्रको मार डालें। इसके जीनेसे कोई लाभ नहीं है। यह पापात्मा पुरुष सदा कुन्तीकुमारोंके साथ अत्यन्त वैर रखता आया है। दुर्योधनकी रायमें रहकर यही सारे अनर्थोंकी जड़ बना हुआ है। अतः इसे मार डालो।' ऐसा कहते हुए समस्त क्षत्रिय महारथी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे सूतपुत्रके वधके लिये प्रेरित हो बाणोंकी बड़ी भारी वर्षाद्वारा उसे आच्छादित करते हुए उसपर टूट पड़े ॥ २४—२७ १/२ ॥
तांस्तु सर्वांस्तथा दृष्ट्वा धावमानान् महारथान् ॥ २८ ॥
न विव्यथे सूतपुत्रो न च त्रासमगच्छत ।
उन समस्त महारथियोंको इस प्रकार धावा करते देख सूतपुत्रके मनमें न तो व्यथा हुई और न त्रास ही हुआ ॥ २८ १/२ ॥
दृष्ट्वा संहारकल्पं तमुद्धूतं सैन्यसागरम् ॥ २९ ॥
पिप्रीषुस्तव पुत्राणां संग्रामेष्वपराजितः ।
सायकौघेन बलवान् क्षिप्रकारी महाबलः ॥ ३० ॥
वारयामास तत् सैन्यं समन्ताद् भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! प्रलयकालके समान उस सैन्यसागरको उमड़ा हुआ देख संग्राममें पराजित न होनेवाले बलवान्, शीघ्रकारी और महान् शक्तिशाली कर्णने आपके पुत्रोंको प्रसन्न करनेकी इच्छासे बाणसमूहकी वर्षा करके सब ओरसे शत्रुओंकी उस सेनाको रोक दिया ॥ २९-३० १/२ ॥
ततस्तु शरवर्षेण पार्थिवास्तमवारयन् ॥ ३१ ॥
धनूंषि ते विधुन्वानाः शतशोऽथ सहस्रशः ।
अयोधयन्त राधेयं शक्रं दैत्यगणा इव ॥ ३२ ॥
तदनन्तर सैकड़ों और सहस्रों नरेशोंने अपने धनुषोंको कम्पित करते हुए बाणोंकी वर्षासे कर्णकी भी प्रगति रोक दी। जैसे दैत्योंने इन्द्रके साथ संग्राम किया था, उसी प्रकार वे राजालोग राधापुत्र कर्णके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३१-३२ ॥
शरवर्षं तु तत् कर्णः पार्थिवैः समुदीरितम् ।
शरवर्षेण महता समन्ताद् व्यकिरत् प्रभो ॥ ३३ ॥
प्रभो! राजाओंन्द्वारा की हुई उस बाण-वर्षाको कर्णने बाणोंकी बड़ी भारी वृष्टि करके सब ओर बिखेर दिया ॥ ३३ ॥
तद् युद्धमभवत् तेषां कृतप्रतिकृतैषिणाम् ।
यथा देवासुरे युद्धे शक्रस्य सह दानवैः ॥ ३४ ॥
जैसे देवासुर-संग्राममें दानवोंके साथ इन्द्रका युद्ध हुआ था, उसी प्रकार घात-प्रतिघातकी इच्छावाले राजाओं तथा कर्णका वह युद्ध बड़ा भयंकर हो रहा था ॥
तत्राद्भुतमपश्याम सूतपुत्रस्य लाघवम् ।