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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अलायुधका युद्धस्थलमें प्रवेश तथा उसके स्वरूप और रथ आदिका वर्णन

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षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

अलायुधका युद्धस्थलमें प्रवेश तथा उसके स्वरूप और रथ आदिका वर्णन

संजय उवाच

तस्मिंस्तथा वर्तमाने कर्णराक्षसयोर्मृधे ।
अलायुधो राक्षसेन्द्रो वीर्यवानभ्यवर्तत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार कर्ण और घटोत्कचका वह युद्ध चल ही रहा था कि पराक्रमी राक्षसराज अलायुध वहाँ उपस्थित हुआ ॥ १ ॥

महत्या सेनया युक्तो दुर्योधनमुपागमत् ।
राक्षसानां विरूपाणां सहस्रैः परिवारितः ॥ २ ॥
वह सहस्रों विकराल रूपवाले राक्षसोंसे घिरकर अपनी विशाल सेनाके साथ दुर्योधनके पास आया ॥ २ ॥

नानारूपधरैर्वीरैः पूर्ववैरमनुस्मरन् ।
तस्य ज्ञातिर्हि विक्रान्तो ब्राह्मणदो बको हतः ॥ ३ ॥
उसके साथ अनेक रूप धारण करनेवाले वीर राक्षस मौजूद थे। वह पहलेके वैरका स्मरण करके वहाँ आया था। उसका कुटुम्बी बन्धु ब्राह्मणभक्षी पराक्रमी बकासुर भीमसेनके द्वारा मारा गया था ॥ ३ ॥

किर्मीरश्च महातेजा हैडिम्बश्च सखा तदा ।
स दीर्घकालाध्युषितं पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥ ४ ॥
उसके सखा हिडिम्ब और महातेजस्वी किर्मीर भी उन्हींके हाथसे मारे गये थे। इस प्रकार दीर्घकालसे मनमें रखे हुए पहलेके वैरको उस समय वह बारंबार स्मरण कर रहा था ॥ ४ ॥

विज्ञायैतन्निशायुद्धं जिघांसुर्भीममाहवे ।
स मत्त इव मातङ्गः संक्रुद्ध इव चोरगः ॥ ५ ॥
दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीद् युद्धलालसः ।
रात्रिमें होनेवाले इस संग्रामका समाचार पाकर रणभूमिमें भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे वह मतवाले हाथी और क्रोधमें भरे हुए सर्पकी भाँति युद्धकी लालसा मनमें रखकर दुर्योधनसे इस प्रकार बोला— ॥ ५ ½ ॥

विदितं ते महाराज यथा भीमेन राक्षसाः ॥ ६ ॥
हिडिम्बबककिर्मीरा निहता मम बान्धवाः ।

‘महाराज! आपको तो मालूम ही होगा कि भीमसेनने हमारे राक्षस भाई-बन्धु हिडिम्ब, बक और किर्मीरका किस प्रकार वध कर डाला है ॥ ६१/२ ॥

परामर्शश्च कन्याया हिडिम्बायाः कृतः पुरा ॥ ७ ॥ किमन्यद् राक्षसानन्यानस्मांश्च परिभूय ह ।

‘इतना ही नहीं, उन्होंने मेरा तथा दूसरे राक्षसोंका अपमान करके पूर्वकालमें राक्षसकन्या हिडिम्बाके साथ भी बलात्कार किया था। इससे बढ़कर दूसरा अपराध क्या हो सकता है? ॥ ७१/२ ॥

तमहं सगणं राजन् सवाजिरथकुञ्जरम् ॥ ८ ॥ हैडिम्बिं च सहामात्यं हन्तुमभ्यागतः स्वयम् ।

‘अतः राजन्! मैं सैन्यसमूह, घोड़े, हाथी और रथोंसहित भीमसेनको तथा मन्त्रियोंसहित हिडिम्बापुत्र घटोत्कचको मार डालनेके लिये स्वयं यहाँ आया हूँ ॥ ८१/२ ॥

अद्य कुन्तीसुतान् सर्वान् वासुदेवपुरोगमान् ॥ ९ ॥ हत्वा सम्भक्षयिष्यामि सर्वैरनुचरैः सह ।

‘श्रीकृष्ण जिनके अगुआ हैं, उन सभी कुन्तीपुत्रोंको मारकर आज मैं समस्त अनुचरोंके साथ उन्हें खा जाऊँगा ॥ ९१/२ ॥

निवारय बलं सर्वं वयं योत्स्याम पाण्डवान् ॥ १० ॥ तस्यैतद् वचनं श्रुत्वा हृष्टो दुर्योधनस्तदा । प्रतिगृह्याब्रवीद् वाक्यं भ्रातृभिः परिवारितः ॥ ११ ॥

‘अतः आप अपनी सारी सेनाको रोक दीजिये। पाण्डवोंके साथ हमलोग युद्ध करेंगे।’ उसकी यह बात सुनकर भाइयोंसे घिरे हुए राजा दुर्योधनको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने अलायुधका प्रस्ताव स्वीकार करते हुए कहा— ॥ १०-११ ॥

त्वां पुरस्कृत्य सगणं वयं योत्स्यामहे परान् । न हि वैरान्तमनसः स्थास्यन्ति मम सैनिकाः ॥ १२ ॥

‘राक्षसराज! सैनिकोंसहित तुम्हें आगे रखकर हमलोग भी शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे; क्योंकि जिनका मन वैरका अन्त करनेमें लगा हुआ है, वे मेरे सैनिक चुपचाप खड़े नहीं रहेंगे’ ॥ १२ ॥

एवमस्त्विति राजानमुक्त्वा राक्षसपुङ्गवः । अभ्ययात् त्वरितो भैमिं सहितः पुरुषादकैः ॥ १३ ॥

‘अच्छा, ऐसा ही हो।’ राजा दुर्योधनसे इस प्रकार कहकर राक्षसराज अलायुध तुरंत ही राक्षसोंके साथ भीमसेनपुत्र घटोत्कचके सामने गया ॥ १३ ॥

दीप्यमानेन वपुषा रथेनादित्यवर्चसा । तादृशेनैव राजेन्द्र यादृशेन घटोत्कचः ॥ १४ ॥

राजेन्द्र! उसका शरीर देदीप्यमान हो रहा था। वह भी सूर्यके समान तेजस्वी वैसे ही रथपर आरूढ़ होकर गया, जैसे रथसे घटोत्कच आया था ।। १४ ।।

तस्याप्यतुलनिर्घोषो बहुतोरणचित्रितः ।
ऋक्षचर्मावनद्धाङ्गो नल्वमात्रो महारथः ।। १५ ।।
उसका विशाल रथ भी अनेक तोरणोंसे विचित्र शोभा पा रहा था। उसकी घर्घरराहट भी अनुपम थी। उसके ऊपर भी रीछका चाम मढ़ा हुआ था और उसकी लंबाई-चौड़ाई भी चार सौ हाथ थी ।। १५ ।।

तस्यापि तुरगाः शीघ्रा हस्तिकायाः खरस्वनाः ।
शतं युक्ता महाकाया मांसशोणितभोजनाः ।। १६ ।।
उसके रथमें जुते हुए घोड़े भी हाथीके समान मोटे शरीरवाले, शीघ्रगामी और गदहोंके समान उच्चस्वरसे हिनहिनानेवाले थे। उनकी संख्या सौ थी। वे विशालकाय अश्व मांस और रक्त भोजन करते थे ।। १६ ।।

तस्यापि रथनिर्घोषो महामेघरवोपमः ।
तस्यापि सुमहच्चापं दृढज्यं कनकोज्ज्वलम् ।। १७ ।।
उसके रथका गम्भीर घोष भी महामेघकी गर्जनाके समान जान पड़ता था। उसका धनुष भी विशाल, सुदृढ़ प्रत्यंचासे युक्त तथा सुवर्णजटित होनेके कारण प्रकाशमान था ।। १७ ।।

तस्याप्यक्षसमा बाणा रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः ।
सोऽपि वीरो महाबाहुर्यथैव स घटोत्कचः ।। १८ ।।
उसके बाण भी शिलापर तेज किये हुए थे। वे भी धुरेके समान मोटे और सुवर्णमय पंखोंसे सुशोभित थे। अलायुध भी वैसा ही महाबाहु वीर था, जैसा कि घटोत्कच था ।। १८ ।।

तस्यापि गोमायुबलाभिगुप्तो
बभूव केतुर्ज्वलनार्कतुल्यः ।
स चापि रूपेण घटोत्कचस्य
श्रीमत्तमो व्याकुलदीपितास्यः ।। १९ ।।
अलायुधका ध्वज भी अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी था। वह गीदड़-समूहसे चिह्नित दिखायी देता था। उसका स्वरूप भी घटोत्कचके ही समान अत्यन्त कान्तिमान् था। उसका मुख भी विकराल एवं प्रज्वलित जान पड़ता था ।। १९ ।।

दीप्ताङ्गदो दीप्तकिरीटमाली
बद्धस्रगुष्णीषनिबद्धखड्गः ।
गदी भुशुण्डी मुसली हली च
शरासनी वारणतुल्यवर्मा ।। २० ।।

उसकी भुजाओंमें बाजूबंद चमक रहे थे। मस्तकपर दीप्तिमान् मुकुट प्रकाशित हो रहा था। उसने हार पहन रखे थे। उसकी पगड़ीमें तलवार बँधी हुई थी। उसका शरीर हाथीके समान था तथा वह गदा, भुशुण्डी, मुसल, हल और धनुष आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न था॥ २०॥

रथेन तेनानलवर्चसा तदा
विद्रावयन् पाण्डववाहिनीं ताम्।
रराज संख्ये परिवर्तमानो
विद्युन्माली मेघ इवान्तरिक्षे॥ २१॥

अग्निके समान तेजस्वी पूर्वोक्त रथके द्वारा उस समय पाण्डव-सेनाको खदेड़ता हुआ अलायुध युद्धस्थलमें सब ओर घूमकर आकाशमें विद्युन्मालासे प्रकाशित मेघके समान सुशोभित हो रहा था॥ २१॥

ते चापि सर्वप्रवरा नरेन्द्रा
महाबला वर्मिणश्चर्मिणश्च।
हर्षान्विता युयुधुस्तस्य राजन्
समन्ततः पाण्डवयोधवीराः॥ २२॥

राजन्! तब पाण्डवपक्षके सर्वश्रेष्ठ महाबली वीर योद्धा नरेश भी कवच और ढालसे सुसज्जित हो हर्ष और उत्साहमें भरकर सब ओरसे उस राक्षसके साथ युद्ध करने लगे॥ २२॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धेऽलायुधयुद्धे
षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें अलायुधयुद्धविषयक एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७६॥

१७७-

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सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेन और अलायुधका घोर युद्ध

संजय उवाच

तमागतमभिप्रेक्ष्य भीमकर्माणमाहवे ।
हर्षमाहारयांचक्रुः कुरवः सर्व एव ते ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! युद्धस्थलमें भयंकर कर्म करनेवाले अलायुधको आया हुआ देख सभी कौरव-योद्धा बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥

तथैव तव पुत्रास्ते दुर्योधनपुरोगमाः ।
अप्लवाः प्लवमासाद्य तर्तुकामा इवार्णवम् ॥ २ ॥
उसी प्रकार आपके दुर्योधन आदि पुत्रोंको भी बड़ा हर्ष हुआ, मानो समुद्रके पार जानेकी इच्छावाले नौकाहीन पुरुषोंको जहाज मिल गया हो ॥ २ ॥

पुनर्जातमिवात्मानं मन्वानाः पुरुषर्षभाः ।
अलायुधं राक्षसेन्द्रं स्वागतेनाभ्यपूजयन् ॥ ३ ॥
वे पुरुषप्रवर कौरव अपना नया जन्म हुआ मानने लगे। उन्होंने राक्षसराज अलायुधका स्वागतपूर्वक सत्कार किया ॥ ३ ॥

तस्मिंस्त्वमानुषे युद्धे वर्तमाने महाभये ।
कर्णराक्षसयोर्नक्तं दारुणप्रतिदर्शने ॥ ४ ॥
(न द्रौणिर्न कृपो द्रोणो न शल्यो न च माधवः ।
एक एव तु तेनासीद् योद्धा कर्णो रणे वृषा ॥)
उस रात्रिकालमें जब कर्ण और घटोत्कचका अत्यन्त भयंकर और दारुण अमानुषिक युद्ध चल रहा था। उस समय न तो अश्वत्थामा, न कृपाचार्य, न द्रोणाचार्य, न शल्य और न कृतवर्मा ही घटोत्कचका सामना कर सके। अकेला दानवीर कर्ण ही रणभूमिमें उसके साथ जूझ रहा था ॥ ४ ॥

उपप्रैक्षन्त पञ्चालाः स्मयमानाः सराजकाः ।
तथैव तावका राजन् वीक्षमाणास्ततस्ततः ॥ ५ ॥
राजन्! पांचाल योद्धा अन्यान्य राजाओंके साथ विस्मित होकर वह युद्ध देखने लगे। उसी प्रकार आपके सैनिक भी इधर-उधरसे उसी युद्धका दृश्य देख रहे थे ॥ ५ ॥

चुक्रुशुर्नेदमस्तीति द्रोणद्रौणिकृपादयः ।
तत् कर्म दृष्ट्वा सम्भ्रान्ता हैडिम्बस्य रणाजिरे ॥ ६ ॥
समरांगणमें हिडिम्बाकुमार घटोत्कचका वह अलौकिक कर्म देखकर घबराये हुए द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कृपाचार्य आदि चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे कि ‘अब हमारी

यह सेना नहीं बचेगी' ।। ६ ।। सर्वमाविग्नमभवद्धाहाभूतमचेतनम् । तव सैन्यं महाराज निराशं कर्णजीविते ।। ७ ।। महाराज! कर्णके जीवनसे निराश होकर आपकी सारी सेना उद्विग्न हो उठी थी। सर्वत्र हाहाकार मचा था। सबके होश उड़ गये थे ।। ७ ।। दुर्योधनस्तु सम्प्रेक्ष्य कर्णमार्तिं परां गतम् । अलायुधं राक्षसेन्द्रं समाहूयेदमब्रवीत् ।। ८ ।। उस समय कर्णको बड़े भारी संकटमें पड़ा देख दुर्योधनने राक्षसराज अलायुधको बुलाकर इस प्रकार कहा— ।। ८ ।। एष वैकर्तनः कर्णो हैडिम्बेन समागतः । कुरुते कर्म सुमहद् यदस्यौपयिकं मृधे ।। ९ ।। ‘वीरवर! देखो, यह सूर्यपुत्र कर्ण हिडिम्बाकुमार घटोत्कचके साथ जूझ रहा है। युद्धस्थलमें जहाँतक इसके प्रयत्नसे होना सम्भव है, वहाँतक यह महान् पराक्रम प्रकट कर रहा है ।। ९ ।। पश्यैतान् पार्थिवान् शूरान् निहतान् भैमसैनिना । नानाशस्त्रैरभिहतान् पादपानिव दन्तिना ।। १० ।। ‘भीमसेनके पुत्रने नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा जिन शूरवीर नरेशोंको घायल करके मार डाला है, वे हाथीके गिराये हुए वृक्षोंके समान यहाँ पड़े हैं, इन्हें देखो ।। १० ।। तवैष भागः समरे राजमध्ये मया कृतः । तवैवानुमते वीर तं विक्रम्य निबर्हय ।। ११ ।। ‘वीर! तुम्हारी अनुमतिसे ही समरांगणमें सम्पूर्ण राजाओंके बीच इस घटोत्कचको मैंने तुम्हारा भाग नियत किया है, अतः तुम पराक्रम करके इसे मार डालो ।। ११ ।। पुरा वैकर्तनं कर्णमेष पापो घटोत्कचः । मायाबलं समाश्रित्य कर्षयत्यरिकर्शन ।। १२ ।। ‘शत्रुसूदन! कहीं ऐसा न हो कि यह पापी घटोत्कच मायाबलका आश्रय ले वैकर्तन कर्णको पहले ही नष्ट कर दे' ।। १२ ।। एवमुक्तः स राज्ञा तु राक्षसो भीमविक्रमः । तथेत्युक्त्वा महाबाहुर्घटोत्कचमुपाद्रवत् ।। १३ ।। राजा दुर्योधनके ऐसा कहनेपर उस भयंकर पराक्रमी महाबाहु राक्षसने ‘बहुत अच्छा’ कहकर घटोत्कचपर धावा किया ।। १३ ।। ततः कर्णं समुत्सृज्य भैमसैनिरपि प्रभो । प्रत्यमित्रमुपायान्तमर्दयामास मार्गणैः ।। १४ ।।

प्रभो! तब घटोत्कचने भी कर्णको छोड़कर अपने समीप आते हुए शत्रुको बाणोंद्वारा पीड़ित करना आरम्भ किया ।। १४ ।।

तयोः समभवद् युद्धं क्रुद्धयो राक्षसेन्द्रयोः । मत्तयोर्वासिताहेतोर्द्विपयोरिव कानने ।। १५ ।। फिर तो क्रोधमें भरे हुए उन दोनों राक्षसराजोंमें वनके भीतर हथिनीके लिये लड़नेवाले दो मतवाले हाथियोंके समान घोर युद्ध होने लगा ।। १५ ।।

रक्षसा विप्रमुक्तस्तु कर्णोऽपि रथिनां वरः । अभ्यद्रवद् भीमसेनं रथेनादित्यवर्चसा ।। १६ ।। राक्षससे छूटनेपर रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने भी सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा भीमसेनपर धावा किया ।। १६ ।।

तमायान्तमनादृत्य दृष्ट्वा ग्रस्तं घटोत्कचम् । अलायुधेन समरे सिंहेनेव गवां पतिम् ।। १७ ।। रथेनादित्यवपुषा भीमः प्रहरतां वरः । किरन् शरौघान् प्रयायावलायुधरथं प्रति ।। १८ ।। आते हुए कर्णकी उपेक्षा करके समरांगणमें सिंहके चंगुलमें फँसे हुए साँड़की भाँति घटोत्कचको अलायुधका ग्रास बनते देख योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीमसेन सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए अलायुधके रथकी ओर बड़े वेगसे बढ़े ।। १७-१८ ।।

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य स तदालायुधः प्रभो । घटोत्कचं समुत्सृज्य भीमसेनं समाह्वयत् ।। १९ ।। प्रभो! उस समय उन्हें आते देख अलायुधने घटोत्कचको छोड़कर भीमसेनको ललकारा ।। १९ ।।

तं भीमः सहसाभ्येत्य राक्षसान्तकरः प्रभो । सगणं राक्षसेन्द्रं तं शरवर्षैरवाकिरत् ।। २० ।। राजन्! राक्षसोंका विनाश करनेवाले भीमने सहसा निकट जाकर सैनिकगणोंसहित राक्षसराज अलायुधको अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ।। २० ।।

तथैवालायुधो राजन् शिलाधौतैरजिह्मगैः । अभ्यवर्षत कौन्तेयं पुनः पुनररिंदम ।। २१ ।। शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! उसी प्रकार अलायुध भी कुन्तीकुमार भीमसेनपर शिलापर तेज किये हुए बाणोंकी बारंबार वर्षा करने लगा ।। २१ ।।

तथा ते राक्षसाः सर्वे भीमसेनमुपाद्रवन् । नानाप्रहरणा भीमास्त्वत्सुतानां जयैषिणः ।। २२ ।।

आपके पुत्रोंकी विजय चाहनेवाले वे समस्त भयंकर राक्षस हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर भीमसेनपर टूट पड़े ॥ २२ ॥
स ताड्यमानो बहुभिर्भीमसेनो महाबलः ।
पञ्चभिः पञ्चभिः सर्वांस्तानविध्यच्छितैः शरैः ॥ २३ ॥
बहुत-से योद्धाओंकी मार खाकर महाबली भीमसेनने उन सबको पाँच-पाँच तीखे बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २३ ॥
ते वध्यमाना भीमेन राक्षसाः क्रूरबुद्धयः ।
विनेदुस्तुमुलान्नादान् दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥ २४ ॥
भीमसेनके बाणोंकी चोट खाकर वे क्रूरबुद्धि राक्षस भयंकर चीत्कार करने और दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ २४ ॥
तांस्त्रास्यमानान् भीमेन दृष्ट्वा रक्षो महाबलम् ।
अभिदुद्राव वेगेन शरैश्चैनमवाकिरत् ॥ २५ ॥
भीमके द्वारा उन राक्षसोंको भयभीत होते देख महाबली राक्षस अलायुधने बड़े वेगसे भीमसेनपर धावा किया और उन्हें बाणोंसे ढक दिया ॥ २५ ॥
तं भीमसेनः समरे तीक्ष्णाग्रैरक्षिणोच्छरैः ।
अलायुधस्तु तानस्तान् भीमेन विशिखान् रणे ॥ २६ ॥
चिच्छेद कांश्चित् समरे त्वरया कांश्चिदग्रहीत् ।
तब भीमसेनने समरांगणमें तीखी धारवाले बाणोंसे अलायुधको क्षत-विक्षत कर दिया। अलायुधने भीमसेनके चलाये हुए कुछ बाणोंको रणभूमिमें काट दिया और कुछ बाणोंको बड़ी शीघ्रताके साथ हाथसे पकड़ लिया ॥ २६ १/२ ॥
स तं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रं भीमो भीमपराक्रमः ॥ २७ ॥
गदां चिक्षेप वेगेन वज्रपातोपमां तदा ।
भयंकर पराक्रमी भीमसेनने राक्षसराज अलायुधको ऐसा पराक्रम करते देख उस समय उसके ऊपर वज्रपातके समान अपनी भयंकर गदा बड़े वेगसे चलायी ॥ २७ १/२ ॥
तामापतन्तीं वेगेन गदां ज्वालाकुलां ततः ॥ २८ ॥
गदया ताडयामास सा गदा भीममाव्रजत् ।
ज्वालासे व्याप्त हुई उस गदाको वेगसे आती देख अलायुधने उसपर अपनी गदासे आघात किया। फिर वह गदा भीमके पास ही लौट आयी ॥ २८ १/२ ॥
स राक्षसेन्द्रं कौन्तेयः शरवर्षैरवाकिरत् ॥ २९ ॥
तानप्यस्याकरोन्मोघान् राक्षसो निशितैः शरैः ।
फिर कुन्तीकुमार भीमसेनने राक्षसराज अलायुधपर बाणोंकी झड़ी लगा दी; परंतु उस राक्षसने अपने तीखे बाणोंद्वारा उनके वे सभी बाण व्यर्थ कर दिये ॥ २९ १/२ ॥
ते चापि राक्षसाः सर्वे रजन्यां भीमरूपिणः ॥ ३० ॥

शासनाद् राक्षसेन्द्रस्य निजघ्नु रथकुञ्जरान् । उस रातमें भयंकर रूपधारी सम्पूर्ण राक्षसोंने भी राक्षसराज अलायुधकी आज्ञासे कितने ही रथों और हाथियोंको नष्ट कर दिया ।। ३० १/२ ।।
पञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव वाजिनः परमद्विपाः ।। ३१ ।।
न शान्तिं लेभिरे तत्र राक्षसैर्भृशपीडिताः ।
उन राक्षसोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर पांचाल और सृंजयवंशी क्षत्रिय तथा उनके घोड़े और बड़े-बड़े हाथी भी शान्ति न पा सके ।। ३१ १/२ ।।
तं तु दृष्ट्वा महाघोरं वर्तमानं महाहवम् ।। ३२ ।।
अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षो धनंजयमिदं वचः ।
पश्य भीमं महाबाहुं राक्षसेन्द्रवशं गतम् ।। ३३ ।।
पदमस्यानुगच्छ त्वं मा विचारय पाण्डव ।
उस महाभयंकर वर्तमान महायुद्धको देखकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे इस प्रकार कहा—'पाण्डुनन्दन! देखो, महाबाहु भीमसेन राक्षसराज अलायुधके वशमें पड़ गये हैं। तुम शीघ्र उन्हींके मार्गपर चलो। कोई दूसरा विचार मनमें न लाओ ।। ३२-३३ १/२ ।।
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च युधामन्यूत्तमौजसौ ।। ३४ ।।
सहितौ द्रौपदेयाश्च कर्णं यान्तु महारथाः ।
'धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, साथ रहनेवाले युधामन्यु और उत्तमौजा तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र—ये सभी महारथी एक साथ होकर कर्णपर धावा करें ।। ३४ १/२ ।।
नकुलः सहदेवश्च युयुधानश्च वीर्यवान् ।। ३५ ।।
इतरान् राक्षसान् घ्नन्तु शासनात् तव पाण्डव ।
'पाण्डुपुत्र! नकुल, सहदेव और पराक्रमी सात्यकि—ये तुम्हारे आदेशसे अन्य राक्षसोंका वध करें ।। ३५ १/२ ।।
त्वमपीमां महाबाहो चमूं द्रोणपुरस्कृताम् ।। ३६ ।।
वारयस्व नरव्याघ्र महद्धि भयमागतम् ।
'महाबाहु! तुम भी द्रोण जिसके अगुआ हैं, इस कौरव-सेनाको आगे बढ़नेसे रोको; क्योंकि नरव्याघ्र! पाण्डव-सेनापर महान् भय आ पहुँचा है' ।। ३६ १/२ ।।
एवमुक्ते तु कृष्णेन यथोद्दिष्टा महारथाः ।। ३७ ।।
जग्मुर्वैकर्तनं कर्णं राक्षसांश्चैव तान् रणे ।
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर वे सभी महारथी उनके आदेशके अनुसार रणभूमिमें वैकर्तन कर्ण तथा उन राक्षसोंका सामना करनेके लिये चले गये ।। ३७ १/२ ।।
अथ पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैराशीविषोपमैः ।। ३८ ।।
धनुश्चिच्छेद भीमस्य राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।

तदनन्तर प्रतापी राक्षसराज अलायुधने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंद्वारा भीमसेनके धनुषको काट डाला॥ ३८ १/२॥
हयांश्चास्य शितैर्बाणैः सारथिं च महाबलः॥ ३९॥
जघान मिषतः संख्ये भीमसेनस्य राक्षसः।
साथ ही, उस महाबली निशाचरने युद्धमें भीमसेनके देखते-देखते पैने बाणोंद्वारा उनके सारथि और घोड़ोंको भी मार डाला॥ ३९ १/२॥
सोऽवतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वो हतसारथिः॥ ४०॥
तस्मै गुर्वीं गदां घोरां विनदन्नुत्ससर्ज ह।
घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर रथकी बैठकसे नीचे उतरकर गर्जते हुए भीमसेनने उस राक्षसपर अपनी भारी एवं भयंकर गदा दे मारी॥ ४० १/२॥

ततस्तां भीमनिर्घोषामापतन्तीं महागदाम्॥ ४१॥
गदया राक्षसो घोरो निजघान ननाद च।

भयानक शब्द करनेवाली उस विशाल गदाको आती देख भयंकर राक्षस अलायुधने अपनी गदासे उसपर आघात किया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ४१ १/२ ॥
तद् दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य घोरं कर्म भयावहम् ॥ ४२ ॥
भीमसेनः प्रहृष्टात्मा गदामाशु परामृशत् ।
राक्षसराज अलायुधके उस भयदायक घोर कर्मको देखकर भीमसेनका हृदय हर्ष और उत्साहसे भर गया और उन्होंने शीघ्र ही गदा हाथमें ले ली ॥ ४२ १/२ ॥
तयोः समभवद् युद्धं तुमुलं नररक्षसोः ॥ ४३ ॥
गदानिपातसंह्रादैर्भुवं कम्पयतोर्भृशम् ।
फिर गदाओंके टकरानेकी आवाजसे भूतलको अत्यन्त कम्पित करते हुए उन दोनों मनुष्य और राक्षसोंमें वहाँ भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ४३ १/२ ॥
गदाविमुक्तौ तौ भूयः समासाद्येतरेतरम् ॥ ४४ ॥
मुष्टिभिर्वज्रसंह्रादैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
गदासे छूटते ही वे दोनों फिर एक-दूसरेसे गुथ गये और वज्रपातकी-सी आवाज करनेवाले मुक्कोंसे एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ४४ १/२ ॥
रथचक्रैर्युगैरक्षैरधिष्ठानैरुपस्करैः ॥ ४५ ॥
यथासन्नमुपादाय निजघ्नतुरमर्षणौ ।
तत्पश्चात् अमर्षमें भरकर वे दोनों रथके पहियों, जूओं, धुरों, बैठकों और अन्य उपकरणोंसे तथा जो भी वस्तु समीप मिल जाती, उसीको लेकर एक-दूसरेपर चोट करने लगे ॥ ४५ १/२ ॥
तौ विक्षरन्तौ रुधिरं समासाद्येतरेतरम् ॥ ४६ ॥
मत्ताविव महानागौ चकृषाते पुनः पुनः ।
वे मदस्रावी मतवाले गजराजोंके समान अपने अंगोंसे रुधिरकी धारा बहाते हुए एक-दूसरेसे भिड़कर बारंबार खींचातानी करने लगे ॥ ४६ १/२ ॥
तदपश्यद्धृषीकेशः पाण्डवानां हिते रतः ।
स भीमसेनरक्षार्थं हैडिम्बं पर्यचोदयत् ॥ ४७ ॥
पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने जब वह युद्ध देखा, तब भीमसेनकी रक्षाके लिये हिडिम्बाकुमार घटोत्कचको भेजा ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धेऽलायुधयुद्धे
सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें अलायुधयुद्धविषयक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४८ श्लोक हैं।)

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अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

दोनों सेनाओंमें परस्पर घोर युद्ध और घटोत्कचके द्वारा अलायुधका वध एवं दुर्योधनका पश्चात्ताप

संजय उवाच

संदृश्य समरे भीमं रक्षसा ग्रस्तमन्तिकात् ।
वासुदेवोऽब्रवीद् राजन् घटोत्कचमिदं वचः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! समरभूमिमें राक्षसके चंगुलमें फँसे हुए भीमसेनको निकटसे देखकर भगवान् श्रीकृष्णने घटोत्कचसे यह बात कही— ॥ १ ॥

पश्य भीमं महाबाहो रक्षसा ग्रस्तमाहवे ।
पश्यतां सर्वसैन्यानां तव चैव महाद्युते ॥ २ ॥
‘महातेजस्वी महाबाहु वीर! देखो, युद्धस्थलमें उस राक्षसने सम्पूर्ण सेनाके और तुम्हारे देखते-देखते भीमसेनको वशमें कर लिया है ॥ २ ॥

स कर्णं त्वं समुत्सृज्य राक्षसेन्द्रमलायुधम् ।
जहि क्षिप्रं महाबाहो पश्चात् कर्णं वधिष्यसि ॥ ३ ॥
‘महाबाहो! अतः तुम कर्णको छोड़कर पहले राक्षसराज अलायुधको शीघ्रतापूर्वक मार डालो। पीछे कर्णका वध करना’ ॥ ३ ॥

स वार्ष्णेयवचः श्रुत्वा कर्णमुत्सृज्य वीर्यवान् ।
युयुधे राक्षसेन्द्रेण वकभ्रात्रा घटोत्कचः ॥ ४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर पराक्रमी वीर घटोत्कचने कर्णको छोड़कर वकके भाई राक्षसराज अलायुधके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ४ ॥

तयोः सुतुमुलं युद्धं बभूव निशि रक्षसोः ।
अलायुधस्य चैवोग्रं हैडिम्बेश्चापि भारत ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! उस रात्रिके समय अलायुध और हिडिम्बाकुमार घटोत्कच दोनों राक्षसोंमें अत्यन्त भयंकर एवं घमासान युद्ध होने लगा ॥ ५ ॥

अलायुधस्य योधांश्च राक्षसान् भीमदर्शनान् ।
वेगेनापततः शूरान् प्रगृहीतशरासनान् ॥ ६ ॥
आत्तायुधः सुसंक्रुद्धो युयुधानो महारथः ।
नकुलः सहदेवश्च चिच्छिदुर्निशितैः शरैः ॥ ७ ॥
अलायुधके सैनिक राक्षस देखनेमें बड़े भयंकर और शूरवीर थे। वे हाथमें धनुष लेकर बड़े वेगसे आक्रमण करते थे। परंतु अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए

महारथी युयुधान, नकुल और सहदेवने उन सबको अपने पैने बाणोंसे काट डाला ।। ६-७ ।।
सर्वांश्च समरे राजन् किरीटी क्षत्रियर्षभान् ।
परिचिक्षेप बीभत्सुः सर्वतः प्रकिरन् शरान् ।। ८ ।।
राजन्! किरीटधारी अर्जुनने समरांगणमें सब ओर बाणोंकी वर्षा करके कौरवपक्षके समस्त क्षत्रिय-शिरोमणियोंको मार भगाया ।। ८ ।।
कर्णश्च समरे राजन् व्यद्रावयत पार्थिवान् ।
धृष्टद्युम्नशिखण्ड्यादीन् पञ्चालानां महारथान् ।। ९ ।।
नरेश्वर! कर्णने भी रणभूमिमें धृष्टद्युम्न और शिखण्डी आदि पांचाल महारथी नरेशोंको दूर भगा दिया ।। ९ ।।
तान् वध्यमानान् दृष्ट्वाथ भीमो भीमपराक्रमः ।
अभ्ययात् त्वरितः कर्णं विशिखान् प्रकिरन् रणे ।। १० ।।
उन सबको बाणोंकी मारसे पीड़ित होते देख भयंकर पराक्रमी भीमसेनने युद्धस्थलमें अपने बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ तुरंत ही कर्णपर आक्रमण किया ।।
ततस्तेऽप्याययुर्हत्वा राक्षसान् यत्र सूतजः ।
नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः ।। ११ ।।
तत्पश्चात् वे नकुल, सहदेव और महारथी सात्यकि भी राक्षसोंको मारकर वहीं आ पहुँचे, जहाँ सूतपुत्र कर्ण था ।। ११ ।।
ते कर्णं योधयामासुः पञ्चाला द्रोणमेव तु ।
अलायुधस्तु संक्रुद्धो घटोत्कचमरिंदमम् ।
परिघेणातिकायेन ताडयामास मूर्धनि ।। १२ ।।
वे तीनों योद्धा कर्णके साथ युद्ध करने लगे और पांचालदेशीय वीरोंने द्रोणाचार्यका सामना किया। उधर क्रोधमें भरे हुए अलायुधने एक विशाल परिघके द्वारा शत्रुदमन घटोत्कचके मस्तकपर आघात किया ।। १२ ।।
स तु तेन प्रहारेण भैमसेनिर्महाबलः ।
ईषन्मूर्च्छितमात्मानमस्तम्भयत वीर्यवान् ।। १३ ।।
उस प्रहारसे भीमसेनपुत्र घटोत्कचको कुछ मूर्छा आ गयी। परंतु उस महाबली और पराक्रमी वीरने पुनः अपने-आपको सँभाल लिया ।। १३ ।।
ततो दीप्ताग्निसंकाशां शतघण्टामलंकृताम् ।
चिक्षेप तस्मै समरे गदां काञ्चनभूषिताम् ।। १४ ।।
तदनन्तर घटोत्कचने समरांगणमें प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्विनी, एक सौ घंटियोंसे अलंकृत और सुवर्णभूषित अपनी गदा उसके ऊपर चलायी ।। १४ ।।
सा हयांश्च रथं चास्य सारथिं च महास्वना ।

चूर्णयामास वेगेन विसृष्टा भीमकर्मणा ॥ १५ ॥ भयंकर कर्म करनेवाले उस राक्षसद्वारा वेगपूर्वक फेंकी गयी उस भारी आवाज करनेवाली गदाने अलायुधके रथ, सारथि और घोड़ोंको चूर-चूर कर दिया ॥ १५ ॥ स भग्नहयचक्राक्षाद् विशीर्णध्वजकूबरात् । उत्पपात रथात् तूर्णं मायामास्थाय राक्षसीम् ॥ १६ ॥ जिसके घोड़े, पहिये और धुरे नष्ट हो गये थे, ध्वज और कूबर बिखर गये थे, उस रथसे अलायुध राक्षसी मायाका आश्रय लेकर तुरंत ही ऊपरको उड़ गया ॥ १६ ॥ स समास्थाय मायां तु ववर्ष रुधिरं बहु । विद्युद्विभ्राजितं चासीत् तुमलाभ्राकुलं नभः ॥ १७ ॥ उसने मायाका आश्रय लेकर बहुत रक्तकी वर्षा की। उस समय आकाशमें भयंकर मेघोंकी घटा घिर आयी थी और बिजली चमक रही थी ॥ १७ ॥ ततो वज्रनिपाताश्च साशनिस्तनयित्नवः । महांश्चटचटाशब्दस्तत्रासीच्च महाहवे ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् उस महासमरमें वज्रपात, मेघगर्जनाके साथ विद्युत्‌की गड़गड़ाहट तथा महान् चट-चट शब्द होने लगे ॥ १८ ॥ तां प्रेक्ष्य महतीं मायां राक्षसो राक्षसस्य च । ऊर्ध्वमुत्पत्य हैडिम्बिस्तां मायां माययावधीत् ॥ १९ ॥ राक्षसकी उस विशाल मायाको देखकर राक्षसजातीय हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने ऊपर उड़कर अपनी मायासे उस मायाको नष्ट कर दिया ॥ १९ ॥ सोऽभिवीक्ष्य हतां मायां मायावी माययैव हि । अश्मवर्षं सुतुमुलं विससर्ज घटोत्कचे ॥ २० ॥ अपनी मायाको मायासे ही नष्ट हुई देखकर मायावी अलायुध घटोत्कचपर पत्थरोंकी भयंकर वर्षा करने लगा ॥ २० ॥ अश्मवर्षं स तं घोरं शरवर्षेण वीर्यवान् । दिक्षु विध्वंसयामास तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २१ ॥ किंतु पराक्रमी घटोत्कचने बाणोंकी वृष्टि करके उस भयंकर प्रस्तरवर्षाका उन-उन दिशाओंमें ही विध्वंस कर दिया। वह अद्भुत-सा कार्य हुआ ॥ २१ ॥ ततो नानाप्रहरणैरन्योन्यमभिवर्षताम् । आयसैः परिघैः शूलैर्गदामुसलमुद्गरैः ॥ २२ ॥ पिनाकैः करवा लैश्च तोमरप्रासकम्पनैः । नाराचैर्निशितैर्भल्लैः शरैश्चक्रैः परश्वधैः । अयोगुडैर्भिन्दिपालैर्गोशीर्षोलूखलैरपि ॥ २३ ॥ उत्पाटितैर्महाशाखैर्विविधैर्जगतीरुहैः ।

शमीपीलुकदम्बैश्च चम्पकैश्चैव भारत ॥ २४ ॥ इङ्गुदैर्बदरीभिश्च कोविदारैश्च पुष्पितैः । पलाशैश्चारिमेदैश्च प्लक्षन्यग्रोधपिप्पलैः ॥ २५ ॥ महद्भिः समरे तस्मिन्नन्योन्यमभिजघ्नतुः । विपुलैः पर्वताग्रैश्च नानाधातुभिराचितैः ॥ २६ ॥ भारत! तत्पश्चात् वे एक-दूसरेपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। लोहेके परिघ, शूल, गदा, मुसल, मुद्गर, पिनाक, खड्ग, तोमर, प्रास, कम्पन, तीखे नाराच, भल्ल, बाण, चक्र, फरसे, लोहेकी गोली, भिन्दिपाल, गोशीर्ष, उलूखल, बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले उखाड़े हुए नाना प्रकारके वृक्ष—शमी, पीलु, कदम्ब, चम्पा, इंगुद, बेर, विकसित कोविदार, पलाश, अरिमेद, बड़े-बड़े पाकड़, बरगद और पीपल—इन सबके द्वारा उस महासमरमें वे एक-दूसरेपर चोट करने लगे। नाना प्रकारकी धातुओंसे व्याप्त विशाल पर्वतशिखरोंद्वारा भी वे परस्पर आघात करते थे ॥ २२—२६ ॥ तेषां शब्दो महानासीद् वज्राणां भिद्यतामिव । युद्धं समभवद् घोरं भैम्यालायुधयोर्नृप ॥ २७ ॥ हरीन्द्रयोर्यथा राजन् वालिसुग्रीवयोः पुरा । उन पर्वत-शिखरोंके टकरानेसे ऐसा महान् शब्द होता था, मानो वज्र फट पड़े हों। नरेश्वर! घटोत्कच और अलायुधका वह भयंकर युद्ध वैसा ही हो रहा था, जैसे पहले त्रेतायुगमें वानरराज बाली और सुग्रीवका युद्ध सुना गया है ॥ २७ १/२ ॥ तौ युद्धा विविधैर्घोरैरायुधैर्विशिखैस्तथा । प्रगृह्य च शितौ खड्गावन्योन्यमभिपेततुः ॥ २८ ॥ नाना प्रकारके भयंकर आयुधों और बाणोंसे युद्ध करके वे दोनों राक्षस तीखी तलवारें लेकर एक-दूसरेपर टूट पड़े ॥ २८ ॥ तावन्योन्यमभिद्रुत्य केशेषु सुमहाबलौ । भुजाभ्यां पर्यगृह्णीतां महाकायौ महाबलौ ॥ २९ ॥ उन दोनों महाबली और विशालकाय राक्षसोंने परस्पर आक्रमण करके दोनों हाथोंसे दोनोंके केश पकड़ लिये ॥ तौ स्विन्नगात्रौ प्रस्वेदं सुस्रुवाते जनाधिप । रुधिरं च महाकायावतिवृष्टाविवाम्बुदौ ॥ ३० ॥ नरेश्वर! अत्यन्त वर्षा करनेवाले दो मेघोंके समान उन विशालकाय राक्षसोंके शरीर पसीनेसे तर हो रहे थे। वे अपने अंगोंसे पसीनोंके साथ-साथ खून भी बहा रहे थे ॥ अथाभिपत्य वेगेन समुद्भ्राम्य च राक्षसम् । बलेनाक्षिप्य हैडिम्बिश्चकर्तास्य शिरो महत् ॥ ३१ ॥

तदनन्तर बड़े वेगसे झपटकर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने उस राक्षसको पकड़ लिया और उसे घुमाकर बलपूर्वक पटक दिया। फिर उसके विशाल मस्तकको उसने काट डाला ॥ ३१ ॥

सोऽपहृत्य शिरस्तस्य कुण्डलाभ्यां विभूषितम् ।
तदा सुतुमुलं नादं ननाद सुमहाबलः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार महाबली घटोत्कचने उसके कुण्डलमण्डित मस्तकको काटकर उस समय बड़ी भयानक गर्जना की ॥ ३२ ॥

हतं दृष्ट्वा महाकायं वकज्ञातिमरिंदमम् ।
पञ्चालाः पाण्डवाश्चैव सिंहनादान् विनेदिरे ॥ ३३ ॥
बकासुरके विशालकाय भ्राता शत्रुदमन अलायुधको मारा गया देख पांचाल और पाण्डव सिंहनाद करने लगे ॥

ततो भेरीसहस्राणि शङ्खानांमयुतानि च ।
अवादयन् पाण्डवेया राक्षसे निहते युधि ॥ ३४ ॥
युद्धस्थलमें उस राक्षसके मारे जानेपर पाण्डवदलके सैनिकोंने सहस्रों नगाड़े और हजारों शंख बजाये ॥ ३४ ॥

अतीव सा निशा तेषां बभूव विजयावहा ।
विद्योतमाना विबभौ समन्ताद् दीपमालिनी ॥ ३५ ॥
चारों ओरसे दीपावलियोंद्वारा प्रकाशित होनेवाली वह रात्रि उनके लिये विजयदायिनी होकर अत्यन्त शोभा पाने लगी ॥ ३५ ॥

अलायुधस्य तु शिरो भैमेसेनिर्महाबलः ।
दुर्योधनस्य प्रमुखे चिक्षेप गतचेतसः ॥ ३६ ॥
उस समय दुर्योधन अचेत-सा हो रहा था। महाबली घटोत्कचने अलायुधका वह मस्तक दुर्योधनके सामने फेंक दिया ॥ ३६ ॥

अथ दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा हतमलायुधम् ।
बभूव परमोद्विग्नः सह सैन्येन भारत ॥ ३७ ॥
भारत! अलायुधको मारा गया देख सेनासहित राजा दुर्योधन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा ॥ ३७ ॥

तेन ह्यस्य प्रतिज्ञातं भीमसेनमहं युधि ।
हन्तेति स्वयमागम्य स्मरता वैरमुत्तमम् ॥ ३८ ॥
अलायुधने अपने भारी वैरीको याद करते हुए स्वयं आकर दुर्योधनके सामने यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं युद्धमें भीमसेनको मार डालूँगा ॥ ३८ ॥

ध्रुवं स तेन हन्तव्य इत्यमन्यत पार्थिवः ।
जीवितं चिरकालं हि भ्रातॄणां चाप्यमन्यत ॥ ३९ ॥

इससे राजा दुर्योधन यह मान बैठा था कि अलायुध निश्चय ही भीमसेनको मार डालेगा और यही सोचकर उसने यह भी समझ लिया था कि अभी मेरे भाइयोंका जीवन चिरस्थायी है ॥ ३९ ॥

स तं दृष्ट्वा विनिहतं भीमसेनात्मजेन वै ।
प्रतिज्ञां भीमसेनस्य पूर्णामेवाभ्यमन्यत ॥ ४० ॥

परंतु भीमसेनपुत्र घटोत्कचके द्वारा अलायुधको मारा गया देख उसने यह निश्चित रूपसे मान लिया कि अब भीमसेनकी प्रतिज्ञा पूरी होकर ही रहेगी ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि
रात्रियुद्धेऽलायुधवधेऽष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय अलायुधका वधविषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥

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एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

घटोत्कचका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा चलायी हुई इन्द्रप्रदत्त शक्तिसे उसका वध

संजय उवाच

निहत्यालायुधं रक्षः प्रहृष्टात्मा घटोत्कचः ।
ननाद विविधान् नादान् वाहिन्याः प्रमुखे तव ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! राक्षस अलायुधका वध करके घटोत्कच मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ और वह आपकी सेनाके सामने खड़ा हो नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगा ॥ १ ॥

तस्य तं तुमुलं शब्दं श्रुत्वा कुञ्जरकम्पनम् ।
तावकानां महाराज भयमासीत् सुदारुणम् ॥ २ ॥
महाराज! उसकी वह भयंकर गर्जना हाथियोंको भी कँपा देनेवाली थी। उसे सुनकर आपके योद्धाओंके मनमें अत्यन्त दारुण भय समा गया ॥ २ ॥

अलायुधविषक्तं तु भैमसैनिं महाबलम् ।
दृष्ट्वा कर्णो महाबाहुः पञ्चालान् समुपाद्रवत् ॥ ३ ॥
जिस समय महाबली घटोत्कच अलायुधके साथ उलझा हुआ था, उस समय उसे उस अवस्थामें देखकर महाबाहु कर्णने पांचालोंपर धावा किया ॥ ३ ॥

दशभिर्दशभिर्बाणैर्धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।
दृढैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्बिभेद नतपर्वभिः ॥ ४ ॥
उसने पूर्णतः खींचकर छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले दस-दस सुदृढ़ बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्न और शिखण्डीको घायल कर दिया ॥ ४ ॥

ततः परमनाराचैर्युधामन्यूत्तमौजसौ ।
सात्यकिं च रथोदारं कम्पयामास मार्गणैः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् उसने अच्छे-अच्छे नाराचोंद्वारा युधामन्यु और उत्तमौजाको तथा अनेक बाणोंसे उदार महारथी सात्यकिको भी कम्पित कर दिया ॥ ५ ॥

तेषामप्यस्यतां संख्ये सर्वेषां सव्यदक्षिणम् ।
मण्डलान्येव चापानि व्यदृश्यन्त जनाधिप ॥ ६ ॥
नरेश्वर! वे सात्यकि आदि भी बायें-दायें बाण चला रहे थे। उस समय उन सबके धनुष भी मण्डलाकार ही दिखायी देते थे ॥ ६ ॥

तेषां ज्यातलनिर्घोषो रथनेमिस्वनश्च ह ।

मेघानामिव घर्मान्ते बभूव तुमलो निशि ॥ ७ ॥ उस रात्रिके समय उनकी प्रत्यंचाकी टंकार तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटका शब्द वर्षाकालके मेघोंकी गर्जनाके समान भयंकर जान पड़ता था ॥ ७ ॥ ज्यानेमिघोषस्तनयित्नुमान् वै धनुस्तडिन्मण्डलकेतुशृङ्गः । शरौघवषाकुलवृष्टिमांश्च संग्राममेघः स बभूव राजन् ॥ ८ ॥ राजन्! वह संग्राम वर्षाकालीन मेघके समान प्रतीत होता था। प्रत्यंचाकी टंकार और पहियोंकी घर्घराहटका शब्द ही उस मेघकी गर्जनाके समान था। धनुष ही विद्युन्मण्डलके समान प्रकाशित होता था और ध्वजाका अग्रभाग ही उस मेघका उच्चतम शिखर था तथा बाण-समूहोंकी वृष्टि ही उसके द्वारा की जानेवाली वर्षा थी ॥ ८ ॥ तदद्भुतं शैल इवाप्रकम्पो वर्षं महाशैलसमानसारः । विध्वंसयामास रणे नरेन्द्र वैकर्तनः शत्रुगणावमर्दी ॥ ९ ॥ नरेन्द्र! महान् पर्वतके समान शक्तिशाली एवं अविचल रहनेवाले शत्रुदलसंहारक सूर्यपुत्र कर्णने रणभूमिमें उस अद्भुत बाणवर्षाको नष्ट कर दिया ॥ ९ ॥ ततोऽतुलैर्वज्रनिपातकल्पैः शितैः शरैः काञ्चनचित्रपुङ्खैः । शत्रून् व्यपोहत् समरे महात्मा वैकर्तनः पुत्रहिते रतस्ते ॥ १० ॥ तत्पश्चात् आपके पुत्रके हितमें तत्पर रहनेवाले महामनस्वी वैकर्तन कर्णने समरांगणमें सोनेके विचित्र पंखोंसे युक्त एवं वज्रपातके तुल्य भयंकर, तुलनारहित तीखे बाणोंद्वारा शत्रुओंका संहार आरम्भ किया ॥ १० ॥ संछिन्नभिन्नध्वजिनश्च केचित् केचिच्छरैर्दितभिन्नदेहाः । केचिद् विसूता विहयाश्च केचिद् वैकर्तनेनाशु कृता बभूवुः ॥ ११ ॥ वैकर्तन कर्णने वहाँ शीघ्र ही किन्हींकी ध्वजाके टुकड़े-टुकड़े कर दिये, किन्हींके शरीरोंको बाणोंसे पीड़ित करके विदीर्ण कर डाला, किन्हींके सारथि नष्ट कर दिये और किन्हींके घोड़े मार डाले ॥ ११ ॥ अविन्दमानास्त्वथ शर्म संख्ये यौधिष्ठिरं ते बलमभ्यपद्यन् ।