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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

भगदत्तो महीपालः क्षत्रधर्मरतः सदा । धनंजयेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ १६ ॥ जो सागर-तटवर्ती किरातोंके स्वामी तथा देवराज इन्द्रके अत्यन्त आदरणीय प्रिय सखा थे, सदा क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहनेवाले वे धर्मात्मा राजा भगदत्त भी अर्जुनके साथ पराक्रम दिखाकर यमराजके लोकमें चले गये ॥ १६ ॥

तथा कौरवदायादो न्यस्तशस्त्रो महायशाः । हतो भूरिश्रवा राजन् शूरः सात्यकिना युधि ॥ १७ ॥ राजन्! कौरववंशी महायशस्वी शूरवीर भूरिश्रवा, जो अपने अस्त्र-शस्त्रोंका परित्याग कर चुके थे, युद्धस्थलमें सात्यकिके हाथसे मारे गये ॥ १७ ॥

श्रुतायुरपि चाम्बष्ठः क्षत्रियाणां धुरंधरः । चरन्नभीतवत् संख्ये निहतः सव्यसाचिना ॥ १८ ॥ अम्बष्ठदेशके राजा क्षत्रिय-धुरंधर श्रुतायु भी, जो समरांगणमें निर्भय-से विचरते थे, सव्यसाची अर्जुनके हाथसे मारे गये ॥ १८ ॥

तव पुत्रः सदामर्षी कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः । दुःशासनो महाराज भीमसेनेन पातितः ॥ १९ ॥ महाराज! जो अस्त्र-विद्याका विद्वान् तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाला था, सदा अमर्षमें भरे रहनेवाले आपके उस पुत्र दुःशासनको भीमसेनने मार गिराया ॥ १९ ॥

यस्य राजन् गजानीकं बहुसाहस्रमद्भुतम् । सुदक्षिणः स संग्रामे निहतः सव्यसाचिना ॥ २० ॥ राजन्! जिसके अधिकारमें कई हजार हाथियोंकी अद्भुत सेना थी, वह सुदक्षिण भी संग्राममें सव्यसाची अर्जुनके बाणोंका निशाना बन गया ॥ २० ॥

कोसलानामधिपतिर्हत्वा बहुमतान् परान् । सौभद्रेण हि विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ २१ ॥ कोशलनरेश शत्रुपक्षके अत्यन्त सम्मानित वीरोंका वध करके सुभद्राकुमार अभिमन्युके साथ पराक्रम दिखाते हुए यमलोकके पथिक बन गये ॥ २१ ॥

बहुशो योधयित्वा तु भीमसेनं महारथम् । मद्रराजात्मजः शूरः परेषां भयवर्धनः । असिचर्मधरः श्रीमान् सौभद्रेण निपातितः ॥ २२ ॥ जो महारथी भीमसेनके साथ भी कई बार युद्ध कर चुका था, ढाल और तलवार लेकर शत्रुओंका भय बढ़ानेवाला वह मद्रराजका शूरवीर तेजस्वी पुत्र सुभद्राकुमार अभिमन्युके द्वारा मार डाला गया ॥ २२ ॥

समः कर्णस्य समरे यः स कर्णस्य पश्यतः । वृषसेनो महातेजाः शीघ्रास्त्रो दृढविक्रमः ॥ २३ ॥

अभिमन्योर्वधं श्रुत्वा प्रतिज्ञामपि चात्मनः । धनंजयेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ २४ ॥ जो समरभूमिमें कर्णके समान ही पराक्रमी था, शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाला, सुदृढ़ बल-विक्रमसे सम्पन्न और महान् तेजस्वी था, वह कर्णपुत्र वृषसेन अभिमन्युका वध सुनकर की हुई अपनी प्रतिज्ञाको याद रखनेवाले अर्जुनके साथ भिड़कर कर्णके देखते-देखते उनके द्वारा यमलोक पहुँचा दिया गया ॥ २३-२४ ॥

नित्यं प्रसक्तवैरो यः पाण्डवैः पृथिवीपतिः । विश्राव्य वैरं पार्थेन श्रुतायुः स निपातितः ॥ २५ ॥ जो पाण्डवोंके साथ सदा वैर बाँधे रखता था, उस राजा श्रुतायुको कुन्तीकुमार अर्जुनने उसकी शत्रुताका स्मरण कराकर मार डाला ॥ २५ ॥

शल्यपुत्रस्तु विक्रान्तः सहदेवेन मारिष । हतो रुक्मरथो राजन् भ्राता मातुलजो युधि ॥ २६ ॥ माननीय नरेश! शल्यका पराक्रमी पुत्र रुक्मरथ, जो सहदेवका ममेरा भाई था, युद्धमें सहदेवके ही हाथसे मारा गया ॥ २६ ॥

राजा भगीरथो वृद्धो बृहत्क्षत्रश्च केकयः । पराक्रमन्तौ विक्रान्तौ निहतौ वीर्यवत्तरौ ॥ २७ ॥ बूढ़े राजा भगीरथ और केकयनरेश बृहत्क्षत्र—ये दोनों अत्यन्त बलवान् और पराक्रमी वीर थे, जो युद्धमें पराक्रम दिखाते हुए मारे गये ॥ २७ ॥

भगदत्तसुतो राजन् कृतप्रज्ञो महाबलः । श्येनवच्चरता संख्ये नकुलेन निपातितः ॥ २८ ॥ राजन्! भगदत्तके विद्वान् और महाबली पुत्रको युद्धमें बाजकी तरह झपटनेवाले नकुलने मार गिराया ॥

पितामहस्तव तथा बाह्लीकः सह बाह्लीकैः । निहतो भीमसेनेन महाबलपराक्रमः ॥ २९ ॥ आपके पितामह बाह्लीक भी महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। वे भीमसेनके हाथसे बाह्लीक योद्धाओंसहित मारे गये ॥ २९ ॥

जयत्सेनस्तथा राजञ्जारासंधिर्महाबलः । मागधो निहतः संख्ये सौभद्रेण महात्मना ॥ ३० ॥ राजन्! जरासंधके महाबलवान् पुत्र मगधवासी जयत्सेनको महामना सुभद्राकुमारने युद्धमें मार डाला ॥

पुत्रस्ते दुर्मुखो राजन् दुःसहश्च महारथः । गदया भीमसेनेन निहतौ शूरमानिनौ ॥ ३१ ॥

नरेश्वर! आपके पुत्र दुर्मुख और महारथी दुःसह—ये दोनों अपनेको शूरवीर माननेवाले योद्धा थे, जो भीमसेनकी गदासे मारे गये ॥ ३१ ॥ दुर्मर्षणो दुर्विषहो दुर्जयश्च महारथः । कृत्वा त्वसुकरं कर्म गता वैवस्वतक्षयम् ॥ ३२ ॥ इसी प्रकार दुर्मर्षण, दुर्विषह और महारथी दुर्जय दुष्कर कर्म करके यमराजके लोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ३२ ॥ उभौ कलिङ्गवृषकौ भ्रातरौ युद्धदुर्मदौ । कृत्वा चासुकरं कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥ ३३ ॥ युद्धदुर्मद कलिंग और वृषक ये दोनों भाई भी दुष्कर पराक्रम प्रकट करके यमलोकके अतिथि हो चुके हैं ॥ सचिवो वृषवर्मा ते शूरः परमवीर्यवान् । भीमसेनेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ ३४ ॥ आपके मन्त्री परम पराक्रमी शूरवीर वृषवर्मा भीमसेनके द्वारा बलपूर्वक यमलोक पहुँचा दिये गये ॥ ३४ ॥ तथैव पौरवो राजा नागायुतबलो महान् । समरे पाण्डुपुत्रेण निहतः सव्यसाचिना ॥ ३५ ॥ इसी प्रकार दस हजार हाथियोंके समान बलशाली महान् राजा पौरवको समरांगणमें पाण्डुकुमार सव्यसाची अर्जुनने मार डाला ॥ ३५ ॥ वसातयो महाराज द्विसाहस्राः प्रहारिणः । शूरसेनाश्च विक्रान्ताः सर्वे युधि निपातिताः ॥ ३६ ॥ महाराज! प्रहारकुशल दो हजार वसातिलोग और पराक्रमी शूरसेन—ये सब-के-सब युद्धमें मार डाले गये हैं ॥ अभीषाहाः कवचिनः प्रहरन्तो रणोत्कटाः । शिबयश्च रथोदाराः कालिङ्गसहिता हताः ॥ ३७ ॥ रणमें उन्मत्त होकर प्रहार करनेवाले कवचधारी अभीषाह और उदार रथी शिबि—ये सब कलिंगराजसहित मारे गये हैं ॥ ३७ ॥ गोकुले नित्यसंवृद्धा युद्धे परमकोपनाः । तेऽपावृत्तकवीराश्च निहताः सव्यसाचिना ॥ ३८ ॥ जो सदा गोकुलमें पले हैं, युद्धमें अत्यन्त कुपित होकर लड़ते हैं और जिन्होंने कभी युद्धमें पीठ दिखाना नहीं सीखा है, वे गोपाल भी अर्जुनके हाथसे मारे जा चुके हैं ॥ ३८ ॥ श्रेणयो बहुसाहस्राः संशप्तकगणाश्च ये । ते सर्वे पार्थमासाद्य गता वैवस्वतक्षयम् ॥ ३९ ॥

संशप्तकगणोंकी कई हजार श्रेणियाँ थीं। वे सभी अर्जुनका सामना करके यमराजके लोकमें चले गये ॥ ३९ ॥ स्यालौ तव महाराज राजानौ वृषकाचलौ । त्वदर्थमतिविक्रान्तौ निहतौ सव्यसाचिना ॥ ४० ॥ महाराज! आपके दोनों साले राजा वृषक और अचल, जो आपके लिये अत्यन्त पराक्रम प्रकट करते थे, अर्जुनके द्वारा मार डाले गये ॥ ४० ॥ उग्रकर्मा महेष्वासो नामतः कर्मतस्तथा । शाल्वराजो महाबाहुर्भीमसेनेन पातितः ॥ ४१ ॥ जो महान् धनुर्धर तथा नाम और कर्मसे भी उग्रकर्मा थे, उन महाबाहु शाल्वराजको भीमसेनेने मार गिराया ॥ ४१ ॥ ओघवांश्च महाराज बृहन्तः सहितौ रणे । पराक्रमन्तौ मित्रार्थे गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥ ४२ ॥ महाराज! मित्रके लिये रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करनेवाले ओघवान् और बृहन्त—ये दोनों एक साथ यमलोकको प्रस्थान कर चुके हैं ॥ ४२ ॥ तथैव रथिनां श्रेष्ठः क्षेमधूर्तिर्विशाम्पते । निहतो गदया राजन् भीमसेनेन संयुगे ॥ ४३ ॥ प्रजानाथ! नरेश्वर! इसी प्रकार रथियोंमें श्रेष्ठ क्षेमधूर्तिको भी युद्धस्थलमें भीमसेनेने अपनी गदासे मार डाला ॥ ४३ ॥ तथा राजन् महेष्वासो जलसंधो महाबलः । सुमहत् कदनं कृत्वा हतः सात्यकिना रणे ॥ ४४ ॥ राजन्! महाधनुर्धर महाबली जलसंध रणभूमिमें शत्रु-सेनाका महान् संहार करके अन्तमें सात्यकिके हाथसे मारे गये ॥ ४४ ॥ अलम्बुषो राक्षसेन्द्रः खरबन्धुरयानवान् । घटोत्कचेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ ४५ ॥ घटोत्कचने पराक्रम करके गर्दभयुक्त सुन्दर रथवाले राक्षसराज अलम्बुषको यमलोक पहुँचा दिया है ॥ ४५ ॥ राधेयः सूतपुत्रश्च भ्रातरश्च महारथाः । केकयाः सर्वशश्चापि निहताः सव्यसाचिना ॥ ४६ ॥ सूतपुत्र राधानन्दन कर्ण, उसके महारथी भाई तथा समस्त केकय भी सव्यसाची अर्जुनके हाथसे मारे गये ॥ ४६ ॥ मालवा मद्रकाश्चैव द्राविडाश्चोग्रकर्मिणः । यौधेयाश्च ललित्थाश्च क्षुद्रकाश्चाप्युशीनराः ॥ ४७ ॥ मावेल्लकास्तुण्डिकेराः सावित्रीपुत्रकाश्च ये ।

प्राच्योदीच्याः प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च मारिष ।। ४८ ।।
पत्तीनां निहताः संघा हयानां प्रयुतानि च ।
रथव्रजाश्च निहता हताश्च वरवारणाः ।। ४९ ।।
मालव, मद्रक, भयंकर कर्म करनेवाले द्राविड़, यौधेय, ललित्थ, क्षुद्रक, उशीनर, मावेल्लक, तुण्डिकेर, सावित्रीपुत्र, प्राच्य, उदीच्य, प्रतीच्य और दाक्षिणात्य, पैदलसमूह, दस लाख घोड़े, रथोंके समूह और बड़े-बड़े गजराज अर्जुनके हाथसे मारे गये हैं ।। ४७—४९ ।।
सध्वजाः सायुधाः शूराः सवर्म्माम्बरभूषणाः ।
कालेन महता यत्ताः कुशलैर्ये च वर्धिताः ।। ५० ।।
ते हताः समरे राजन् पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा ।
राजन्! पालननिपुण पुरुषोंने जिनका दीर्घकालसे पालन-पोषण किया था, जो युद्धमें सदा सावधान रहनेवाले शूरवीर थे, वे सभी अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अर्जुनके हाथसे ध्वज, आयुध, कवच, वस्त्र और आभूषणोंसहित समरांगणमें मारे गये ।। ५० १/२ ।।
अन्ये तथामितबलाः परस्परवधैषिणः ।। ५१ ।।
एते चान्ये च बहवो राजानः सगणा रणे ।
हताः सहस्रशो राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ५२ ।।
महाराज! एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले असीम बलशाली अन्यान्य योद्धा भी मौतके घाट उतर चुके हैं। राजन्! ये तथा और भी बहुत-से नरेश रणभूमिमें अपने दलबलके साथ सहस्रोंकी संख्यामें मारे गये हैं। आप मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, वह सब मैंने बता दिया ।। ५१-५२ ।।
एवमेष क्षयो वृत्तः कर्णार्जुनसमागमे ।
महेन्द्रेण यथा वृत्रो यथा रामेण रावणः ।। ५३ ।।
यथा कृष्णेन नरको मुरुश्च नरकारिणा ।
कार्तवीर्यश्च रामेण भार्गवेण यथा हतः ।। ५४ ।।
सज्ञातिबान्धवः शूरः समरे युद्धदुर्मदः ।
रणे कृत्वा महद् युद्धं घोरं त्रैलोक्यमोहनम् ।। ५५ ।।
यथा स्कन्देन महिषो यथा रुद्रेण चान्धकः ।
तथार्जुनेन स हतो द्वैरथे युद्धदुर्मदः ।। ५६ ।।
सामात्यबान्धवो राजन् कर्णः प्रहरतां वरः ।

राजन्! इस प्रकार कर्ण और अर्जुनके संग्राममें यह भारी संहार हुआ है। जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरको, श्रीरामचन्द्रजीने रावणको, नरकशत्रु श्रीकृष्णने नरक और मुरुको तथा भृगुवंशी परशुरामने तीनों लोकोंको मोहित करनेवाला अत्यन्त घोर युद्ध करके समरांगणमें रणदुर्मद शूरवीर कृतवीर्यकुमार अर्जुनको उसके भाई-बन्धुओंसहित मार डाला था, जैसे स्कन्दने महिषासुरका और रुद्रने अन्धकासुरका संहार किया था, उसी प्रकार अर्जुनने योद्धाओंमें श्रेष्ठ युद्धदुर्मद कर्णको द्वैरथयुद्धमें उसके मन्त्री और बन्धुओंसहित मार डाला ।। ५३—५६ १/२ ।।

जयाशा धार्तराष्ट्राणां वैरस्य च मुखं यतः ॥ ५७ ॥
तीर्णस्तत् पाण्डवो राजन् यत् पुरा नावबुध्यसे ।
उच्यमानो महाराज बन्धुभिर्हितकाङ्क्षिभिः ॥ ५८ ॥
तदिदं समनुप्राप्तं व्यसनं सुमहात्ययम् ।

जिससे आपके पुत्रोंने विजयकी आशा लगा रखी थी, जो वैरका मुख बना हुआ था, उससे पाण्डुपुत्र अर्जुन पार हो गये। महाराज! पहले आपने हितैषी बन्धुओंके कहनेपर भी जिसकी ओर ध्यान नहीं दिया, वही यह महान् विनाशकारी संकट प्राप्त हुआ है ।। ५७-५८ १/२ ।।

पुत्राणां राज्यकामानां त्वया राजन् हितैषिणा ॥ ५९ ॥
अहितान्येव चीर्णानि तेषां तत् फलमागतम् ॥ ६० ॥

राजन्! आपने राज्यकी कामना रखनेवाले अपने पुत्रोंके हितकी इच्छा रखते हुए सदा उन पाण्डवोंके अहित ही किये हैं; आपके उन्हीं कर्मोंका यह फल प्राप्त हुआ है ।। ५९-६० ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संजय-वाक्यविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1609)

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षष्ठोऽध्यायः

कौरवोंद्वारा मारे गये प्रधान-प्रधान पाण्डव-पक्षके वीरोंका परिचय

धृतराष्ट्र उवाच

आख्याता मामकास्तात निहता युधि पाण्डवैः ।
हतांश्च पाण्डवेयानां मामकैर्ब्रूहि संजय ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— तात संजय! तुमने युद्धमें पाण्डवोंद्वारा मारे गये मेरे पक्षके वीरोंके नाम बताये हैं। अब मेरे योद्धाओंद्वारा मारे गये पाण्डव-योद्धाओंका परिचय दो ॥ १ ॥

संजय उवाच

कुन्तयो युधि विक्रान्ता महासत्त्वा महाबलाः ।
सानुबन्धाः सहामात्या गाङ्गेयेन निपातिताः ॥ २ ॥
संजयने कहा— राजन्! अत्यन्त धीर, महान् बलवान् और पराक्रमी जो कुन्तिभोजदेशके योद्धा थे, उन्हें गंगानन्दन भीष्मने मन्त्रियों तथा सगे-सम्बन्धियोंसहित मार गिराया ॥ २ ॥

नारायणा बलभद्राः शूराश्च शतशोऽपरे ।
अनुरक्ताश्च वीरेण भीष्मेण युधि पातिताः ॥ ३ ॥
पाण्डवोंमें अनुराग रखनेवाले जो नारायण और बलभद्र नामवाले सैकड़ों शूरवीर थे, उन्हें भी वीरवर भीष्मने युद्धमें धराशायी कर दिया ॥ ३ ॥

समः किरीटिना संख्ये वीर्येण च बलेन च ।
सत्यजित् सत्यसंधेन द्रोणेन निहतो युधि ॥ ४ ॥
सत्यजित् संग्राममें किरीटधारी अर्जुनके समान बल और पराक्रमसे सम्पन्न था, जिसे युद्धस्थलमें सत्यप्रतिज्ञ द्रोणाचार्यने मार डाला ॥ ४ ॥

पञ्चालानां महेष्वासाः सर्वे युद्धविशारदाः ।
द्रोणेन सह संगम्य गता वैवस्वतक्षयम् ॥ ५ ॥
युद्धकी कलामें कुशल सम्पूर्ण पांचाल महाधनुर्धर द्रोणाचार्यसे टक्कर लेकर यमलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ५ ॥

तथा विराटद्रुपदौ वृद्धौ सहसुतौ नृपौ ।
पराक्रमन्तौ मित्रार्थे द्रोणेन निहतौ रणे ॥ ६ ॥
मित्रके लिये पराक्रम करनेवाले बूढ़े राजा विराट और द्रुपद अपने पुत्रोंसहित द्रोणाचार्यके द्वारा रणभूमिमें मारे गये हैं ॥ ६ ॥

यो बाल एव समरे सम्मितः सव्यसाचिना । केशवेन च दुर्धर्षो बलदेवेन वा विभो ॥ ७ ॥ परेषां कदनं कृत्वा महारथविशारदः । परिवार्य महामात्रैः षड्भिः परमकै रथैः ॥ ८ ॥ अशक्नुवद्भिर्बीभत्सुमभिमन्युर्निपातितः । जो बाल्यावस्थामें ही दुर्धर्ष वीर था और सव्यसाची अर्जुन, भगवान् श्रीकृष्ण अथवा बलदेवजीके समान समझा जाता था तथा जो महान् रथयुद्धमें विशेष कुशल था, वह अभिमन्यु शत्रुओंका संहार करके छः बड़े-बड़े महारथियोंद्वारा, जिनका अर्जुनपर वश नहीं चलता था, चारों ओरसे घेरकर मार डाला गया ॥ ७-८ १/२ ॥

कृतं तं विरथं वीरं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥ दौःशासनिर्महाराज सौभद्रं हतवान् रणे । महाराज! क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहनेवाला वीर सुभद्राकुमार अभिमन्यु रथहीन कर दिया गया था, उस अवस्थामें दुःशासनके पुत्रने उसे रणभूमिमें मारा था ॥ ९ १/२ ॥

सपत्नानां निहन्ता च महत्या सेनया वृतः ॥ १० ॥ अम्बष्ठस्य सुतः श्रीमान् मित्रहेतोः पराक्रमन् । आसाद्य लक्ष्मणं वीरं दुर्योधनसुतं रणे ॥ ११ ॥ सुमहत् कदनं कृत्वा गतो वैवस्वतक्षयम् । शत्रुहन्ता श्रीमान् अम्बष्ठपुत्र अपनी विशाल सेनासे घिरकर मित्रोंके लिये पराक्रम दिखा रहा था। वह शत्रु-सेनाका महान् संहार करके रणभूमिमें दुर्योधनके वीर पुत्र लक्ष्मणसे टक्कर ले यमलोकमें जा पहुँचा ॥

बृहन्तः सुमहेश्वासः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः ॥ १२ ॥ दुःशासनेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् । अस्त्र-विद्याके विशेषज्ञ रणदुर्मद महाधनुर्धर बृहन्तको दुःशासनने बलपूर्वक यमलोक पहुँचाया था ॥ १२ १/२ ॥

मणिमान् दण्डधारश्च राजानौ युद्धदुर्मदौ ॥ १३ ॥ पराक्रमन्तौ मित्रार्थे द्रोणेन युधि पातितौ । युद्धमें उन्मत्त होकर जूझनेवाले राजा मणिमान् और दण्डधार मित्रोंके लिये पराक्रम दिखाते थे। उन दोनोंको द्रोणाचार्यने युद्धमें मार गिराया है ॥ १३ १/२ ॥

अंशुमान् भोजराजस्तु सहसैन्यो महारथः ॥ १४ ॥ भारद्वाजेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् । सेनासहित भोजराज महारथी अंशुमान्‌को भरद्वाजनन्दन द्रोणने पराक्रम करके यमलोक पहुँचाया है ॥ १४ १/२ ॥

सामुद्रश्चित्रसेनश्च सह पुत्रेण भारत ॥ १५ ॥ समुद्रसेनेन बलाद् गमितो यमसादनम् । भारत! समुद्रतटवर्ती राज्यके अधिपति चित्रसेन अपने पुत्रके साथ युद्धमें आकर समुद्रसेनके द्वारा बलपूर्वक यमलोक भेज दिया गया ॥ १५ १/२ ॥ अनूपवासी नीलश्च व्याघ्रदत्तश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥ अश्वत्थाम्ना विकर्णेन गमितो यमसादनम् । समुद्रतटवासी नील और पराक्रमी व्याघ्रदत्त—इन दोनोंको क्रमशः अश्वत्थामा और विकर्णने यमलोक पहुँचा दिया ॥ १६ १/२ ॥ चित्रायुधश्चित्रयोधी कृत्वा च कदनं महत् ॥ १७ ॥ चित्रमार्गेण विक्रम्य विकर्णेन हतो मृधे । विचित्र युद्ध करनेवाले चित्रायुध समरमें विचित्र रीतिसे पराक्रम करते हुए कौरव-सेनाका महान् संहार करके अन्तमें विकर्णके हाथसे मारे गये ॥ १७ १/२ ॥ वृकोदरसमो युद्धे वृतः कैकेययोधिभिः ॥ १८ ॥ कैकेयेन च विक्रम्य भ्रात्रा भ्राता निपातितः । केकयदेशीय योद्धाओंसे घिरे हुए भीमके समान पराक्रमी केकयराजकुमारको उन्हींके भाई दूसरे केकयराजकुमारने बलपूर्वक मार गिराया ॥ १८ १/२ ॥ जनमेजयो गदायोधी पर्वतीयः प्रतापवान् ॥ १९ ॥ दुर्मुखेन महाराज तव पुत्रेण पातितः । महाराज! प्रतापी पर्वतीय राजा जनमेजय गदायुद्धमें कुशल थे। उन्हें आपके पुत्र दुर्मुखने धराशायी कर दिया ॥ रोचमानौ नरव्याघ्रौ रोचमानौ ग्रहाविव ॥ २० ॥ द्रोणेन युगपद् राजन् दिवं सम्प्रापितौ शरैः । राजन्! दो चमकते हुए ग्रहोंके समान नरश्रेष्ठ रोचमान, जो एक ही नामके दो भाई थे, द्रोणाचार्यके द्वारा बाणोंसे एक साथ ही स्वर्गलोक पहुँचा दिये गये ॥ नृपाश्च प्रतियुध्यन्तः पराक्रान्ता विशाम्पते ॥ २१ ॥ कृत्वा नसुकरं कर्म गता वैवस्वतक्षयम् । प्रजानाथ! और भी बहुत-से पराक्रमी नरेश आपकी सेनाका सामना करते हुए दुष्कर पराक्रम करके यमलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ २१ १/२ ॥ पुरुजित् कुन्तिभोजश्च मातुलौ सव्यसाचिनः ॥ २२ ॥ संग्रामनिर्जिताँल्लोकान् गमितौ द्रोणसायकैः ।

पुरुजित् और कुन्तिभोज दोनों सव्यसाची अर्जुनके मामा थे। द्रोणाचार्यके सायकोंने उन्हें भी उन लोकोंमें पहुँचा दिया, जो संग्राममें मारे जानेवाले वीरोंको प्राप्त होते हैं ॥ २२ १/२ ॥

अभिभूः काशिराजश्च काशिकैर्बहुभिर्वृतः ॥ २३ ॥
वसुदानस्य पुत्रेण न्यासितो देहमाहवे ।
काशिराज अभिभू बहुतेरे काशीनिवासी योद्धाओंसे घिरे हुए थे। वसुदानके पुत्रने युद्धस्थलमें उनसे उनके शरीरका परित्याग करवा दिया ॥ २३ १/२ ॥

अमितौजा युधामन्युरुत्तमौजाश्च वीर्यवान् ॥ २४ ॥
निहत्य शतशः शूरानस्मदीयैर्निपातिताः ।
अमितौजा, युधामन्यु तथा पराक्रमी उत्तमौजा ये सैकड़ों शूरवीरोंका संहार करके हमारे सैनिकोंद्वारा मारे गये ॥ २४ १/२ ॥

मित्रवर्मा च पाञ्चाल्यः क्षत्रधर्मा च भारत ॥ २५ ॥
द्रोणेन परमेष्वासौ गमितौ यमसादनम् ।
भारत! पांचालयोद्धा मित्रवर्मा और क्षत्रधर्मा महाधनुर्धर थे। उन्हें भी द्रोणाचार्यने यमलोक पहुँचा दिया ॥ २५ १/२ ॥

शिखण्डितनयो युद्धे क्षत्रदेवो युधां पतिः ॥ २६ ॥
लक्ष्मणेन हतो राजंस्तव पौत्रेण भारत ।
भरतवंशी नरेश! आपके पौत्र लक्ष्मणने युद्धमें योद्धाओंके स्वामी क्षत्रदेवको, जो शिखण्डीका पुत्र था, मार डाला ॥ २६ १/२ ॥

सुचित्रश्चित्रवर्मा च पितापुत्रौ महारथौ ॥ २७ ॥
प्रचरन्तौ महावीरौ द्रोणेन निहतौ रणे ।
सुचित्र और चित्रवर्मा ये दो महावीर महारथी परस्पर पिता-पुत्र थे। रणभूमिमें विचरते हुए इन दोनोंको द्रोणाचार्यने मार डाला ॥ २७ १/२ ॥

वार्द्धक्षेमिर्महाराज समुद्र इव पर्वणि ॥ २८ ॥
आयुधक्षयमासाद्य प्रशान्तिं परमां गतः ।
महाराज! जैसे पूर्णिमाके दिन समुद्र उमड़ पड़ता है, उसी प्रकार वृद्धक्षेमका पुत्र भी युद्धमें उद्धत हो उठा था, परंतु उसके सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो गये थे, इसलिये वह प्राणशून्य हो सदाके लिये परम शान्त हो गया ॥ २८ १/२ ॥

सेनाविन्दुसुतः श्रेष्ठः शात्रवान् प्रहरन् युधि ॥ २९ ॥
बाह्लिकेन महाराज कौरवेन्द्रेण पातितः ।
राजाधिराज! सेनाविन्दुका श्रेष्ठ पुत्र रणभूमिमें शत्रुओंपर प्रहार कर रहा था। उस समय कौरवेन्द्र बाह्लीकने उसे मार गिराया ॥ २९ १/२ ॥

धृष्टकेतुर्महाराज चेदीनां प्रवरो रथः ॥ ३० ॥ कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम् । महाराज! चेदिदेशका श्रेष्ठ रथी धृष्टकेतु भी युद्धमें दुष्कर कर्म करके यमलोकका पथिक हो गया ॥ ३० १/२ ॥

तथा सत्यधृतिर्वीरः कृत्वा कदनमाहवे ॥ ३१ ॥ पाण्डवार्थे पराक्रान्तो गमितो यमसादनम् । पाण्डवोंके लिये पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर सत्यधृतिने भी रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करके यमलोककी राह ली ॥ ३१ १/२ ॥

सेनाबिन्दुः कुरुश्रेष्ठ कृत्वा कदनमाहवे ॥ ३२ ॥ पुत्रस्तु शिशुपालस्य सुकेतुः पृथिवीपतिः । निहत्य शात्रवान् संख्ये द्रोणेन निहतो युधि ॥ ३३ ॥ कुरुश्रेष्ठ! सेनाविन्दु भी युद्धमें शत्रुओंका संहार करके कालके गालमें चला गया। शिशुपालका पुत्र राजा सुकेतु भी युद्धमें शत्रुसैनिकोंका वध करके स्वयं भी द्रोणाचार्यके हाथसे मारा गया ॥ ३२-३३ ॥

तथा सत्यधृतिर्वीरो मदिराश्वश्च वीर्यवान् । सूर्यदत्तश्च विक्रान्तो निहतो द्रोणसायकैः ॥ ३४ ॥ इसी प्रकार वीर सत्यधृति, पराक्रमी मदिराश्व और बल-विक्रमशाली सूर्यदत्त भी द्रोणाचार्यके बाणोंसे मारे गये हैं ॥ ३४ ॥

श्रेणिमांश्च महाराज युध्यमानः पराक्रमी । कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम् ॥ ३५ ॥ महाराज! पराक्रमपूर्वक युद्ध करनेवाले श्रेणिमान्ने युद्धमें दुष्कर कर्म करके यमलोकके मार्गका आश्रय लिया है ॥ ३५ ॥

तथैव युधि विक्रान्तो मागधः परमास्त्रवित् । भीष्मेण निहतो राजञ्शेतेऽद्य परवीरहा ॥ ३६ ॥ राजन्! इसी प्रकार शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला और उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता पराक्रमी मागध वीर भी भीष्मजीके हाथसे मारा जाकर आज रणभूमिमें सो रहा है ॥ ३६ ॥

विराटपुत्रः शङ्खस्तु उत्तरश्च महारथः । कुर्वन्तौ सुमहत् कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥ ३७ ॥ राजा विराटके पुत्र शंख और महारथी उत्तर ये दोनों युद्धमें महान् कर्म करके यमलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ३७ ॥

वसुदानश्च कदनं कुर्वाणोऽतीव संयुगे । भारद्वाजेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ ३८ ॥

वसुदान भी युद्धस्थलमें बड़ा भारी संहार मचा रहा था। परंतु भरद्वाजनन्दन द्रोणने पराक्रम करके उसे यमलोक पहुँचा दिया ।। ३८ ।।
(पाण्ड्यराजश्च विक्रान्तो बलवान् बाहुशालिना ।
अश्वत्थाम्ना हतस्तत्र गमितो वै यमक्षयम् ॥)
अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले अश्वत्थामाने बलवान् एवं पराक्रमी पाण्ड्यराजको मारकर यमलोक पहुँचा दिया ।
एते चान्ये च बहवः पाण्डवानां महारथाः ।
हता द्रोणेन विक्रम्य यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३९ ॥
ये तथा और भी बहुत-से पाण्डव महारथी, जिनके बारेमें आप मुझसे पूछ रहे थे, द्रोणाचार्यके द्वारा बलपूर्वक मार डाले गये ।। ३९ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्ये षष्ठोऽध्यायः ।। ६ ।।
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत कर्णपर्वमें संजय-वाक्यविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ।। ६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं।)

कौरवपक्षके जीवित योद्धाओंका वर्णन और धृतराष्ट्रकी मूर्च्छा

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सप्तमोऽध्यायः

कौरवपक्षके जीवित योद्धाओंका वर्णन और धृतराष्ट्रकी मूर्च्छा

धृतराष्ट्र उवाच

मामकस्यास्य सैन्यस्य हृतोत्सेकस्य संजय ।
अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—संजय! प्रधान पुरुष भीष्म, द्रोण और कर्ण आदिके मारे जानेसे मेरी सेनाका घमंड चूर-चूर हो गया है। मैं देखता हूँ, अब यह बच नहीं सकेगी ॥ १ ॥

तौ हि वीरौ महेष्वासौ मदर्थे कुरुसत्तमौ ।
भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नार्थो वै जीवितेऽसति ॥ २ ॥
वे दोनों कुरुश्रेष्ठ महाधनुर्धर वीर भीष्म और द्रोणाचार्य मेरे लिये मारे गये; यह सुन लेनेपर इस अधम जीवनको रखनेका अब कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २ ॥

न च मृष्यामि राधेयं हतमाहवशोभनम् ।
यस्य बाह्वोर्बलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतम् ॥ ३ ॥
जिसकी दोनों भुजाओंमें समानरूपसे दस-दस हजार हाथियोंका बल था, युद्धमें शोभा पानेवाले उस राधापुत्र कर्णके मारे जानेका समाचार सुनकर मैं इस शोकको सहन नहीं कर पाता हूँ ॥ ३ ॥

हतप्रवरसैन्यं मे यथा शंससि संजय ।
अहतानपि मे शंस येऽत्र जीवन्ति केचन ॥ ४ ॥
संजय! जैसा कि तुम कह रहे हो कि मेरी सेनाके प्रमुख वीर मारे जा चुके हैं, उसी प्रकार यह भी बताओ कि कौन-कौन वीर नहीं मारे गये हैं। इस सेनामें जो कोई भी श्रेष्ठ वीर जीवित हैं, उनका परिचय दो ॥ ४ ॥

एतेषु हि मृतेष्वद्य ये त्वया परिकीर्तिताः ।
येऽपि जीवन्ति ते सर्वे मृता इति मतिर्मम ॥ ५ ॥
आज तुमने जिन लोगोंके नाम लिये हैं, उनकी मृत्यु हो जानेपर तो जो भी अब जीवित हैं वे सभी मरे हुएके ही समान हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ५ ॥

संजय उवाच

यस्मिन् महास्त्राणि समर्पितानि
चित्राणि शुभ्राणि चतुर्विधानि ।
दिव्यानि राजन् विहितानि चैव

द्रोणेन वीरे द्विजसत्तमेन ॥ ६ ॥
महारथः कृतिमान् क्षिप्रहस्तो
दृढायुधो दृढमुष्टिर्दृढेषुः ।
स वीर्यवान् द्रोणपुत्रस्तरस्वी
व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ ७ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यने जिस वीरको चित्र (अद्भुत), शुभ्र (प्रकाशमान), दिव्य तथा धनुर्वेदोक्त चार प्रकारके महान् अस्त्र समर्पित किये थे, जो सफल प्रयत्न करनेवाला महारथी वीर है, जिसके हाथ बड़ी शीघ्रतासे चलते हैं, जिसका धनुष, जिसकी मुट्ठी और जिसके बाण सभी सुदृढ़ हैं, वह वेगशाली तथा पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा आपके लिये युद्धकी इच्छा रखकर समरभूमिमें डटा हुआ है ॥
आनर्तवासी हृदिकात्मजोऽसौ
महारथः सात्वतानां वरिष्ठः ।
स्वयं भोजः कृतवर्मा कृतास्त्रो
व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ ८ ॥
सात्वतकुलका श्रेष्ठ महारथी, आनर्तनिवासी, भोजवंशी अस्त्रवेत्ता, हृदिकपुत्र कृतवर्मा भी आपके लिये युद्ध करनेको दृढ़ निश्चयके साथ डटा हुआ है ॥ ८ ॥
आर्तायनिः समरे दुष्प्रकम्प्यः
सेनाग्रणीः प्रथमस्तावकानाम् ।
यः स्वस्रीयान् पाण्डवेयान् विसृज्य
सत्यां वाचं स्वां चिकीर्षुस्तरस्वी ॥ ९ ॥
तेजोवधं सूतपुत्रस्य संख्ये
प्रतिश्रुत्याजातशत्रोः पुरस्तात् ।
दुराधर्षः शक्रसमानवीर्यः
शल्यः स्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ १० ॥
जिन्हें युद्धमें विचलित करना अत्यन्त कठिन है, जो आपके सैनिकोंके प्रथम सेनापति एवं वेगशाली वीर हैं, जो अपनी बात सच्ची कर दिखानेके लिये अपने सगे भानजे पाण्डवोंको छोड़कर तथा अजातशत्रु युधिष्ठिरके सामने युद्धस्थलमें सूतपुत्र कर्णके तेज और उत्साहको नष्ट करनेकी प्रतिज्ञा करके आपके पक्षमें चले आये थे, वे बलवान् दुर्धर्ष तथा इन्द्रके समान पराक्रमी ऋतायनपुत्र शल्य आपके लिये युद्ध करनेको तैयार हैं ॥ ९-१० ॥
आजानेयैः सैन्धवैः पर्वतीयै-
र्नदीजकाम्बोजवनायुजैश्च ।
गान्धारराजः स्वबलेन युक्तो

व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ ११ ॥ अच्छी नस्लके सिंधी, पहाड़ी, दरियाई, काबुली और वनायुदेशके बहुसंख्यक घोड़ों तथा अपनी सेनाके साथ गान्धारराज शकुनि आपके लिये युद्ध करनेको डटा हुआ है ॥ ११ ॥

शारद्वतो गौतमश्चापि राजन् महाबाहुर्बहुचित्रास्त्रयोधी । धनुश्चित्रं सुमहद् भारसाहं व्यवस्थितो योद्धुकामः प्रगृह्य ॥ १२ ॥ राजन्! अनेक प्रकारके विचित्र अस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेवाले, गौतमवंशीय शरद्वान्के पुत्र महाबाहु कृपाचार्य भी महान् भार सहन करनेमें समर्थ विचित्र धनुष हाथमें लेकर आपके लिये युद्ध करनेको तैयार हैं ॥ १२ ॥

महारथः केकयराजपुत्रः सदश्वयुक्तं च पताकिनं च । रथं समारुह्य कुरुप्रवीर व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ १३ ॥ कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर! महारथी केकयराजकुमार भी सुन्दर घोड़ोंसे जुते हुए, ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित रथपर आरूढ़ हो आपके लिये युद्ध करनेकी इच्छासे डटा हुआ है ॥ १३ ॥

तथा सुतस्ते ज्वलनार्कवर्णं रथं समास्थाय कुरुप्रवीरः । व्यवस्थितः पुरुमित्रो नरेन्द्र व्यभ्रे सूर्यो भ्राजमानो यथा खे ॥ १४ ॥ नरेन्द्र! कुरुकुलका प्रमुख वीर आपका पुत्र पुरुमित्र अग्नि और सूर्यके समान कान्तिमान् रथपर आरूढ़ हो बिना बादलोंके आकाशमें सूर्यके समान प्रकाशित होता हुआ युद्धके लिये खड़ा है ॥ १४ ॥

दुर्योधनो नागकुलस्य मध्ये व्यवस्थितः सिंह इवाबभासे । रथेन जाम्बूनदभूषणेन व्यवस्थितः समरे योत्स्यमानः ॥ १५ ॥ हाथियोंकी सेनाके बीच जो अपने सुवर्णभूषित रथके द्वारा उपस्थित हो सिंहके समान सुशोभित होता है, वह राजा दुर्योधन भी समरांगणमें जूझनेके लिये खड़ा है ॥ १५ ॥

स राजमध्ये पुरुषप्रवीरो रराज जाम्बूनदचित्रवर्मा ।

पद्मप्रभो वह्निरिवाल्पधूमो मेघान्तरे सूर्य इव प्रकाशः ॥ १६ ॥ पुरुषोंमें प्रधान वीर और कमलके समान कान्तिमान् दुर्योधन सोनेका बना हुआ विचित्र कवच धारण करके राजाओंके समुदायमें अल्प धूमवाली अग्नि एवं बादलोंके बीचमें सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १६ ॥

तथा सुषेणोऽप्यसिचर्मपाणि- स्तवात्मजः सत्यसेनश्च वीरः । व्यवस्थितौ चित्रसेनेन सार्धं हृष्टात्मानौ समरे योद्धुकामौ ॥ १७ ॥ हाथमें ढाल-तलवार लिये हुए आपके वीर पुत्र सुषेण और सत्यसेन मनमें हर्ष और उत्साह लिये समरमें जूझनेकी इच्छा रखकर चित्रसेनके साथ खड़े हैं ॥

ह्रीनिषेवो भारत राजपुत्र उग्रायुधः क्षणभोजी सुदर्शः । जारासंधिः प्रथमश्चादृढश्च चित्रायुधः श्रुतवर्मा जयश्च ॥ १८ ॥ शलश्च सत्यव्रतदुःशलौ च व्यवस्थिताः सहसैन्या नराग्रयाः । भारत! लज्जाशील भयंकर आयुधोंवाला शीघ्रभोजी और देखनेमें सुन्दर जरासंधका प्रथम पुत्र राजकुमार अदृढ, चित्रायुध, श्रुतवर्मा, जय, शल, सत्यव्रत और दुःशल—ये सभी श्रेष्ठ पुरुष युद्धके लिये अपनी सेनाओंके साथ खड़े हैं ॥ १८ १/२ ॥

कैतव्यानामधिपः शूरमानी रणे रणे शत्रुहा राजपुत्रः ॥ १९ ॥ रथी हयी नागपत्तिप्रयायी व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे । प्रत्येक युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेवाला और अपनेको शूरवीर माननेवाला एक राजकुमार, जो जुआरियोंका सरदार है तथा रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंकी चतुरंगिणीसेना साथ लेकर चलता है, आपके लिये युद्ध करनेको तैयार खड़ा है ॥ १९ १/२ ॥

वीरः श्रुतायुश्च धृतायुधश्च चित्राङ्गदश्चित्रसेनश्च वीरः ॥ २० ॥ व्यवस्थिता योद्धुकामा नराग्रयाः प्रहारिणो मानिनः सत्यसंधाः । वीर श्रुतायु, धृतायुध, चित्रांगद और वीर चित्रसेन—ये सभी प्रहारकुशल स्वाभिमानी और सत्यप्रतिज्ञ नरश्रेष्ठ आपके लिये युद्ध करनेको तैयार खड़े हैं ॥ २० १/२ ॥

कर्णात्मजः सत्यसंधो महात्मा व्यवस्थितः समरे योद्धुकामः ॥ २१ ॥ अथापरौ कर्णसुतौ वरास्त्रौ व्यवस्थितौ लघुहस्तौ नरेन्द्र । बलं महद् दुर्भिदमल्पधैर्यैः समाश्रितौ योत्स्यमानौ त्वदर्थे ॥ २२ ॥ नरेन्द्र! कर्णका महामना एवं सत्यप्रतिज्ञ पुत्र समरांगणमें युद्धकी इच्छासे डटा हुआ है। इसके सिवा कर्णके दो पुत्र और हैं, जो उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता और शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले हैं, वे भी आपकी ओरसे युद्धके लिये तैयार खड़े हैं। इन दोनोंने ऐसी विशाल सेनाको अपने साथ ले रखा है, जिसका अल्प धैर्यवाले वीरोंके लिये भेदन करना कठिन है ॥ २१-२२ ॥

एतैश्च मुख्यैरपरैश्च राजन् योधप्रवीरैरमितप्रभावैः । व्यवस्थितो नागकुलस्य मध्ये यथा महेन्द्रः कुरुराजो जयाय ॥ २३ ॥ राजन्! इनसे तथा अन्य अनन्त प्रभावशाली श्रेष्ठ एवं प्रधान योद्धाओंसे घिरा हुआ कुरुराज दुर्योधन हाथियोंके समूहमें देवराज इन्द्रके समान विजयके लिये खड़ा है ॥ २३ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

आख्याता जीवमाना येऽपरे सैन्या यथायथम् । इतीदमवगच्छामि व्यक्तमर्थाभिपत्तितः ॥ २४ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! अपने पक्षके जो जीवित योद्धा हैं एवं उनसे भिन्न जो मारे जा चुके हैं, उनका तुमने यथार्थरूपसे वर्णन कर दिया। इससे जो परिणाम होनेवाला है, उसे अर्थापत्ति प्रमाणके द्वारा मैं स्पष्टरूपसे समझ रहा हूँ (मेरे पक्षकी हार सुनिश्चित है) ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं ब्रुवन्नेव तदा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । हतप्रवीरं विश्वस्तं किंचिच्छेषं स्वकं बलम् ॥ २५ ॥ श्रुत्वा व्यामोहमागच्छच्छोकव्याकुलेन्द्रियः । **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! यह कहते हुए ही अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र उस समय यह सुनकर कि अपनी सेनाके प्रमुख वीर मारे गये, अधिकांश सेना नष्ट हो गयी और बहुत थोड़ी शेष रह गयी है, मूर्च्छित हो गये। उनकी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठीं ॥ २५ १/२ ॥ मुह्यमानोऽब्रवीच्चापि मुहूर्तं तिष्ठ संजय ॥ २६ ॥

व्याकुलं मे मनस्तात श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ।
मनो मुह्यति चाङ्गानि न च शक्नोमि धारितुम् ॥ २७ ॥
वे अचेत होते-होते बोले—'संजय! दो घड़ी ठहर जाओ। तात! यह महान् अप्रिय संवाद सुनकर मेरा मन व्याकुल हो गया है, चेतना लुप्त-सी हो रही है और मैं अपने अंगोंको धारण करनेमें असमर्थ हो रहा हूँ' ॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
भ्रान्तचित्तस्ततः सोऽथ बभूव जगतीपतिः ॥ २८ ॥
ऐसा कहकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र भ्रान्तचित्त (मूर्च्छित) हो गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्यं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संजयवाक्यविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1621)

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अष्टमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका विलाप

जनमेजय उवाच

श्रुत्वा कर्णं हतं युद्धे पुत्रांश्चैव निपातितान् ।
नरेन्द्रः किंचिदाश्वस्तो द्विजश्रेष्ठ किमब्रवीत् ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**द्विजश्रेष्ठ! युद्धमें कर्ण मारा गया और पुत्र भी धराशायी हो गये, यह सुनकर अचेत हुए राजा धृतराष्ट्रको जब पुनः कुछ चेत हुआ, तब उन्होंने क्या कहा? ॥ १ ॥

प्राप्तवान् परमं दुःखं पुत्रव्यसनजं महत् ।
तस्मिन् यदुक्तवान् काले तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ २ ॥
धृतराष्ट्रको अपने पुत्रोंके मारे जानेके कारण बड़ा भारी दुःख प्राप्त हुआ था, उस समय उन्होंने जो कुछ कह, उसे मैं पूछ रहा हूँ; आप मुझे बताइये ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा कर्णस्य निधनमश्रद्धेयमिवाद्भुतम् ।
भूतसम्मोहनं भीमं मेरोः संसर्पणं यथा ॥ ३ ॥
चित्तमोहमिवायुक्तं भार्गवस्य महामतेः ।
पराजयमिवेन्द्रस्य द्विषद्भ्यो भीमकर्मणः ॥ ४ ॥
दिवः प्रपतनं भानोरुर्व्यामिव महाद्युतेः ।
संशोषणमिवाचिन्त्यं समुद्रस्याक्षयाम्भसः ॥ ५ ॥
महीवियद्दिगम्बूनां सर्वनाशमिवाद्भुतम् ।
कर्मणोरिव वैफल्यमुभयोः पुण्यपापयोः ॥ ६ ॥
संचिन्त्य निपुणं बुद्ध्या धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।
नेदमस्तीति संचिन्त्य कर्णस्य समरे वधम् ॥ ७ ॥
प्राणिनामेवमन्येषां स्यादपीति विनाशनम् ।
शोकाग्निना दह्यमानो धम्यमान इवाशये ॥ ८ ॥
विस्रस्ताङ्गः श्वसन् दीनो हाहेत्युक्त्वा सुदुःखितः ।
विललाप महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ ९ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! कर्णका मारा जाना अद्भुत और अविश्वसनीय-सा लग रहा था। वह भयंकर कर्म उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाला था, जैसे मेरु पर्वतका अपने स्थानसे हटकर अन्यत्र चला जाना। परम बुद्धिमान् भृगुनन्दन

परशुरामजीके चित्तमें मोह उत्पन्न होना जैसे सम्भव नहीं है, जैसे भयंकर कर्म करनेवाले देवराज इन्द्रका अपने शत्रुओंसे पराजित होना असम्भव है, जैसे महातेजस्वी सूर्यके आकाशसे पृथ्वीपर गिरने और अक्षय जलवाले समुद्रके सूख जानेकी बात मनमें सोचीतक नहीं जा सकती; पृथ्वी, आकाश, दिशा और जलका सर्वनाश होना एवं पाप तथा पुण्य—दोनों प्रकारके कर्मोंका निष्फल हो जाना जैसे आश्चर्यजनक घटना है; उसी प्रकार समरमें कर्ण-वधरूपी असम्भव कर्मको भी सम्भव हुआ सुनकर और उसपर बुद्धिद्वारा अच्छी तरह विचार करके राजा धृतराष्ट्र यह सोचने लगे कि 'अब यह कौरवदल बच नहीं सकता। कर्णकी ही भाँति अन्य प्राणियोंका भी विनाश हो सकता है।' यह सब सोचते ही उनके हृदयमें शोककी आग प्रज्वलित हो उठी और वे उससे तपने एवं दग्ध-से होने लगे। उनके सारे अंग शिथिल हो गये। महाराज! वे अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र दीनभावसे लंबी साँस खींचने और अत्यन्त दुःखी हो 'हाय! हाय!' कहकर विलाप करने लगे ॥ ३—९ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

संजयाधिरथिर्वीरः सिंहद्विरदविक्रमः ।
वृषभप्रतिमस्कन्धो वृषभाक्षगतिश्चरन् ॥ १० ॥
वृषभो वृषभस्येव यो युद्धे न निवर्तते ।
शत्रोरपि महेन्द्रस्य वज्रसंहननो युवा ॥ ११ ॥

**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! अधिरथका वीर पुत्र कर्ण सिंह और हाथीके समान पराक्रमी था। उसके कंधे साँड़के कंधोंके समान हृष्टपुष्ट थे। उसकी आँखें और चाल-ढाल भी साँड़के ही सदृश थीं। वह स्वयं भी दानकी वर्षा करनेके कारण वृषभस्वरूप था। रणभूमिमें विचरता हुआ कर्ण इन्द्र-जैसे शत्रुसे पाला पड़नेपर भी साँड़के समान कभी युद्धसे पीछे नहीं हटता था। उसकी युवा-अवस्था थी। उसका शरीर इतना सुदृढ़ था, मानो वज्रसे गढ़ा गया हो ॥ १०-११ ॥

यस्य ज्यातलशब्देन शरवृष्टिरवेण च ।
रथाश्वनरमातङ्गा नावतिष्ठन्ति संयुगे ॥ १२ ॥

जिसकी प्रत्यंचाकी टंकार तथा बाण-वर्षाके भयंकर शब्दसे भयभीत हो रथी, घुड़सवार, गजारोही और पैदल सैनिक युद्धमें सामने नहीं ठहर पाते थे ॥ १२ ॥

यमाश्रित्य महाबाहुं विद्विषां जयकाङ्क्षया ।
दुर्योधनोऽकरोद् वैरं पाण्डुपुत्रैर्महारथैः ॥ १३ ॥

जिस महाबाहुका भरोसा करके शत्रुओंपर विजय पानेकी इच्छा रखते हुए दुर्योधनने महारथी पाण्डवोंके साथ वैर बाँध रखा था ॥ १३ ॥

स कथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णः पार्थेन संयुगे ।
निहतः पुरुषव्याघ्रः प्रसह्यासह्यविक्रमः ॥ १४ ॥