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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

वासुदेव उवाच

राजा श्रान्तो विक्षतो दुःखितश्च कर्णेन संख्ये निशितैर्बाणसंघैः । यश्चानिशं सूतपुत्रेण वीर शरैर्भृशं ताडितोऽयुध्यमानः ॥ ७६ ॥ **श्रीकृष्णने कहा—**वीर! राजा युधिष्ठिर थक गये हैं। कर्णने युद्धस्थलमें अपने तीखे बाणसमूहोंद्वारा इन्हें क्षत-विक्षत कर दिया है, इसलिये ये बहुत दुःखी हैं। इतना ही नहीं, जब ये युद्ध नहीं कर रहे थे, उस समय भी सूतपुत्रने इनके ऊपर लगातार बाणोंकी वर्षा करके इन्हें अत्यन्त घायल कर दिया था ॥ ७६ ॥

अतस्त्वमेतेन सरोषमुक्तो दुःखान्वितेनेदमयुक्तरूपम् । अकोपितो ह्येष यदि स्म संख्ये कर्णं न हन्यादिति चाब्रवीत् सः ॥ ७७ ॥ इसीलिये दुःखी होनेके कारण इन्होंने तुम्हारे प्रति रोषपूर्वक ये अनुचित बातें कही हैं। इन्होंने यह भी सोचा है कि यदि अर्जुनको क्रोध न दिलाया गया तो ये युद्धमें कर्णको नहीं मार सकेंगे, इस कारणसे भी वैसी बातें कह दी हैं ॥ ७७ ॥

जानाति तं पाण्डव एष चापि पापं लोके कर्णमसह्यमन्यैः । ततस्त्वमुक्तो भृशरोषितेन राज्ञा समक्षं परुषाणि पार्थ ॥ ७८ ॥ ये पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिर जानते हैं कि संसारमें पापी कर्णका सामना करना तुम्हारे सिवा दूसरोंके लिये असम्भव है। पार्थ! इसीलिये अत्यन्त रोषमें भरे हुए राजाने मेरे सामने तुम्हें कटु वचन सुनाये हैं ॥ ७८ ॥

नित्योद्युक्ते सततं चाप्रसह्ये कर्णे द्यूतं ह्यद्य रणे निबद्धम् । तस्मिन् हते कुरवो निर्जिताः स्यु- रेवं बुद्धिः पार्थिवे धर्मपुत्रे ॥ ७९ ॥ कर्ण नित्य-निरन्तर युद्धके लिये उद्यत और शत्रुओंके लिये असह्य है। आज रणभूमिमें हार-जीतका जूआ कर्णपर ही अवलम्बित है। कर्णके मारे जानेपर अन्य कौरव शीघ्र ही परास्त हो सकते हैं। धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें ऐसा ही विचार काम कर रहा था ॥

ततो वधं नार्हति धर्मपुत्र- स्त्वया प्रतिज्ञार्जुन पालनीया । जीवन्नयं येन मृतो भवेद्धि

तन्मे निबोधेह तवानुरूपम् ॥ ८० ॥ अर्जुन! इसलिये धर्मपुत्र युधिष्ठिर वधके योग्य नहीं हैं। इधर तुम्हें अपनी प्रतिज्ञाका पालन भी करना है। अतः जिस उपायसे ये जीवित रहते हुए भी मरेके समान हो जायँ, वही तुम्हारे अनुरूप होगा। उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ८० ॥

यदा मानं लभते माननार्ह- स्तदा स वै जीवति जीवलोके । यदावमानं लभते महान्तं तदा जीवन्मृत इत्युच्यते सः ॥ ८१ ॥ इस जीवजगत्में माननीय पुरुष जबतक सम्मान पाता है, तभीतक वह वास्तवमें जीवित है। जब वह महान् अपमान पाने लगता है, तब वह जीते-जी मरा हुआ कहलाता है ॥ ८१ ॥

सम्मानितः पार्थिवोऽयं सदैव त्वया च भीमेन तथा यमाभ्याम् । वृद्धैश्च लोके पुरुषैश्च शूरै- स्तस्यापमानं कलया प्रयुङ्क्ष्व ॥ ८२ ॥ तुमने, भीमसेनने, नकुल-सहदेवने तथा अन्य वृद्ध पुरुषों एवं शूरवीरोंने जगत्में राजा युधिष्ठिरका सदा सम्मान किया है; किंतु इस समय तुम उनका थोड़ा-सा अपमान कर दो ॥ ८२ ॥

त्वमित्यत्रभवन्तं हि ब्रूहि पार्थ युधिष्ठिरम् । त्वमित्युक्तो हि निहतो गुरुर्भवति भारत ॥ ८३ ॥ पार्थ! तुम युधिष्ठिरको सदा आप कहते आये हो, आज उन्हें 'तू' कह दो। भारत! यदि किसी गुरुजनको 'तू' कह दिया जाय तो यह साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें उसका वध ही हो जाता है ॥ ८३ ॥

एवमाचर कौन्तेय धर्मराजे युधिष्ठिरे । अधर्मयुक्तं संयोगं कुरुष्वैनं कुरूद्वह ॥ ८४ ॥ कुन्तीनन्दन! तुम धर्मराज युधिष्ठिरके प्रति ऐसा ही बर्ताव करो। कुरुश्रेष्ठ! उनके लिये इस समय अधर्मयुक्त वाक्यका प्रयोग करो ॥ ८४ ॥

अथर्वाङ्गिरसी ह्येषा श्रुतीनामुत्तमा श्रुतिः । अविचार्यैव कार्यैषा श्रेयस्कामैर्नरैः सदा ॥ ८५ ॥ जिसके देवता अथर्वा और अंगिरा हैं, ऐसी एक श्रुति है, जो सब श्रुतियोंमें उत्तम है। अपनी भलाई चाहनेवाले मनुष्योंको सदा बिना विचारे ही इस श्रुतिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये ॥ ८५ ॥

अवधेन वधः प्रोक्तो यद् गुरुस्त्वमिति प्रभुः ।

तद् ब्रूहि त्वं यन्मयोक्तं धर्मराजस्य धर्मवित् ॥ ८६ ॥ उस श्रुतिका भाव यह है—'गुरुको तू कह देना उसे बिना मारे ही मार डालना है।' तुम धर्मज्ञ हो तो भी जैसा मैंने बताया है, उसके अनुसार धर्मराजके लिये 'तू' शब्दका प्रयोग करो ॥ ८६ ॥

वधं ह्ययं पाण्डव धर्मराज-
स्त्वत्तोऽयुक्तं वेत्स्यते चैवमेषः ।
ततोऽस्य पादावभिवाद्य पश्चात्
समं ब्रूयाः सान्त्वयित्वा च पार्थम् ॥ ८७ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम्हारे द्वारा किये गये इस अनुचित शब्दके प्रयोगको सुनकर ये धर्मराज अपना वध हुआ ही समझेंगे। इसके बाद तुम इनके चरणोंमें प्रणाम करके इन्हें सान्त्वना देते हुए क्षमा माँग लेना और इनके प्रति न्यायोचित वचन बोलना ॥ ८७ ॥

भ्राता प्राज्ञस्तव कोपं न जातु
कुर्याद् राजा धर्ममवेक्ष्य चापि ।
मुक्तोऽनृताद् भ्रातृवधाच्च पार्थ
हृष्टः कर्णं त्वं जहि सूतपुत्रम् ॥ ८८ ॥
कुन्तीनन्दन! तुम्हारे भाई राजा युधिष्ठिर समझदार हैं। ये धर्मका ख्याल करके भी तुमपर कभी क्रोध नहीं करेंगे। इस प्रकार तुम मिथ्याभाषण और भ्रातृ-वधके पापसे मुक्त हो बड़े हर्षके साथ सूतपुत्र कर्णका वध करना ॥ ८८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कृष्णार्जुनसंवादे एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवादविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2145)

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्ततितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना

संजय उवाच

इत्येवमुक्तस्तु जनार्दनेन
पार्थः प्रशस्याथ सुहृद्वचस्तत् ।
ततोऽब्रवीदर्जुनो धर्मराज-
मनुक्तपूर्वं परुषं प्रसह्य ॥ १ ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनने हितैषी सखाके उस वचनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर वे हठपूर्वक धर्मराजके प्रति ऐसे कठोर वचन कहने लगे, जैसे उन्होंने पहले कभी नहीं कहे थे ॥ १ ॥

अर्जुन उवाच

मा त्वं राजन् व्याहर व्याहरस्व
यस्तिष्ठसे क्रोशमात्रे रणाद् वै ।
भीमस्तु मामर्हति गर्हणाय
यो युध्यते सर्वलोकप्रवीरैः ॥ २ ॥

**अर्जुन बोले—**राजन्! तू तो स्वयं ही युद्धसे भागकर एक कोस दूर आ बैठा है, अतः तू मुझसे न बोल, न बोल। हाँ, भीमसेनको मेरी निन्दा करनेका अधिकार है, जो कि समस्त संसारके प्रमुख वीरोंके साथ अकेले ही जूझ रहे हैं ॥

काले हि शत्रून् परिपीड्य संख्ये
हत्वा च शूरान् पृथिवीपतींस्तान् ।
रथप्रधानोत्तमनागमुख्यान्
सादिप्रवेकानमितांश्च वीरान् ॥ ३ ॥
यः कुञ्जराणामधिकं सहस्रं
हत्वा नदंस्तुमुलं सिंहनादम् ।
काम्बोजानामयुतं पर्वतीयान्
मृगान् सिंहो विनिहत्येव चाजौ ॥ ४ ॥
सुदुष्करं कर्म करोति वीरः

कर्तुं यथा नार्हसि त्वं कदाचित् । रथादवप्लुत्य गदां परामृशं- स्तया निहन्त्यश्वरथद्विपान् रणे ॥ ५ ॥ वरासिना चापि नराश्वकुञ्जरां- स्तथा रथाङ्गैर्धनुषा दहत्यरीन् । प्रमृद्य पद्भ्यामहितान् निहन्ति पुनस्तु दोर्भ्यां शतमन्युविक्रमः ॥ ६ ॥ महाबलो वैश्रवणान्तकोपमः प्रसह्य हन्ता द्विषतामनीकिनीम् । स भीमसेनोऽर्हति गर्हणां मे न त्वं नित्यं रक्ष्यसे यः सुहृद्भिः ॥ ७ ॥ जो यथासमय शत्रुओंको पीड़ा देते हुए युद्धस्थलमें उन समस्त शौर्यसम्पन्न भूपतियों, प्रधान-प्रधान रथियों, श्रेष्ठ गजराजों, प्रमुख अश्वारोहियों, असंख्य वीरों, सहस्रसे भी अधिक हाथियों, दस हजार काम्बोजदेशीय अश्वों तथा पर्वतीय वीरोंका वध करके जैसे मृगोंको मारकर सिंह दहाड़ रहा हो, उसी प्रकार भयंकर सिंहनाद करते हैं, जो वीर भीमसेन हाथमें गदा ले रथसे कूदकर उसके द्वारा रणभूमिमें हाथी, घोड़ों एवं रथोंका संहार करते हैं तथा ऐसा अत्यन्त दुष्कर पराक्रम प्रकट कर रहे हैं जैसा कि तू कभी नहीं कर सकता, जिनका पराक्रम इन्द्रके समान है, जो उत्तम खड्ग, चक्र और धनुषके द्वारा हाथी, घोड़ों, पैदल-योद्धाओं तथा अन्यान्य शत्रुओंको दग्ध किये देते हैं और जो पैरोंसे कुचलकर दोनों हाथोंसे वैरियोंका विनाश करते हैं, वे महाबली, कुबेर और यमराजके समान पराक्रमी एवं शत्रुओंकी सेनाका बलपूर्वक संहार करनेमें समर्थ भीमसेन ही मेरी निन्दा करनेके अधिकारी हैं। तू मेरी निन्दा नहीं कर सकता; क्योंकि तू अपने पराक्रमसे नहीं, हितैषी सुहृदोंद्वारा सदा सुरक्षित होता है ॥ ३—७ ॥

महारथान् नागवरान् हयांश्च पदातिमुख्यानपि च प्रमथ्य । एको भीमो धार्तराष्ट्रेषु मग्नः स मामुपालब्धुमरिंदमोऽर्हति ॥ ८ ॥ जो शत्रुपक्षके महारथियों, गजराजों, घोड़ों और प्रधान-प्रधान पैदल योद्धाओंको भी रौंदकर दुर्योधनकी सेनाओंमें घुस गये हैं, वे एकमात्र शत्रुदमन भीमसेन ही मुझे उलाहना देनेके अधिकारी हैं ॥ ८ ॥

कलिङ्गवङ्गाङ्कनिषादमागधान् सदामदानीलबलाहकोपमान् । निहन्ति यः शत्रुगजाननेकान्

स मामुपालब्धुमरिंदमोऽर्हति ॥ ९ ॥
जो कलिंग, वंग, अंग, निषाद और मगध देशोंमें उत्पन्न सदा मदमत्त रहनेवाले तथा काले मेघोंकी घटाके समान दिखायी देनेवाले शत्रुपक्षीय अनेकानेक हाथियोंका संहार करते हैं, वे शत्रुदमन भीमसेन ही मुझे उलाहना देनेके अधिकारी हैं ॥ ९ ॥

स युक्तमास्थाय रथं हि काले
धनुर्विधुन्वन् शरपूर्णमुष्टिः ।
सृजत्यसौ शरवर्षाणि वीरो
महाहवे मेघ इवाम्बुधाराः ॥ १० ॥
वीरवर भीमसेन यथासमय जुते हुए रथपर आरूढ़ हो धनुष हिलाते हुए मुट्ठीभर बाण निकालते और जैसे मेघ जलकी धारा गिराते हैं, उसी प्रकार महासमरमें बाणोंकी वर्षा करते हैं ॥ १० ॥

शतान्यष्टौ वारणानामपश्यं
विशातितैः कुम्भकराग्रहस्तैः ।
भीमेनाजौ निहतान्यद्य बाणैः
स मां क्रूरं वक्तुमर्हत्यरिघ्नः ॥ ११ ॥
मैंने देखा है आज भीमसेनने युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा शत्रुपक्षके आठ सौ हाथियोंको उनके कुम्भस्थल, शुण्ड और शुण्डाग्रभाग काटकर मार डाला है, वे शत्रुहन्ता भीमसेन ही मुझसे कठोर वचन कहनेके अधिकारी हैं ॥ ११ ॥

(नकुलेन राजन् गजवाजियोधा
हताश्च शूराः सहसा समेत्य ।
त्यक्त्वा प्राणान् समरे युद्धकाङ्क्षी
स मामुपालब्धुमरिंदमोऽर्हति ॥
राजन्! नकुलने समरभूमिमें प्राणोंका मोह छोड़कर सहसा आगे बढ़-बढ़कर बहुत-से हाथी, घोड़े और शूरवीर योद्धाओंका वध किया है। युद्धकी अभिलाषा रखनेवाला वह शत्रुदमन वीर भी मुझे उलाहना दे सकता है।

कृतं कर्म सहदेवेन दुष्करं
यो युध्यते परसैन्यावमर्दी ।
न चाब्रवीत् किंचिदिहागतो बली
पश्यान्तरं तस्य चैवात्मनश्च ॥
सहदेवने भी दुष्कर कर्म किया है। शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाला वह बलवान् वीर निरन्तर युद्धमें लगा रहता है। वह भी यहाँ आया था, किंतु कुछ भी न बोला। देख ले, तुझमें और उसमें कितना अन्तर है।

धृष्टद्युम्नः सात्यकिर्द्रौपदेया

युधामन्युश्चोत्तमौजाः शिखण्डी । एते च सर्वे युधि सम्प्रपीडिता- स्ते मामुपालब्धुमर्हन्ति न त्वम् ॥) धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके पुत्र, युधामन्यु, उत्तमौजा और शिखण्डी—ये सभी वीर युद्धमें अत्यन्त पीड़ा सहन करते आये हैं; अतः ये ही मुझे उपालम्भ दे सकते हैं, तू नहीं।

बलं तु वाचि द्विजसत्तमानां क्षात्रं बुधा बाहुबलं वदन्ति । त्वं वाग्बलो भारत निष्ठुरश्च त्वमेव मां वेत्थ यथाबलोऽहम् ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका बल उनकी वाणीमें होता है और क्षत्रियका बल उनकी दोनों भुजाओंमें; परंतु तेरा बल केवल वाणीमें है, तू निष्ठुर है; मैं जैसा बलवान् हूँ, उसे तू ही अच्छी तरह जानता है ॥ १२ ॥

यते हि नित्यं तव कर्तुमिष्टं दारैः सुतैर्जीवितेनात्मना च । एवं यन्मां वाग्विशिखेन हंसि त्वत्तः सुखं न वयं विद्म किंचित् ॥ १३ ॥ मैं सदा स्त्री, पुत्र, जीवन और यह शरीर लगाकर तेरा प्रिय कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रयत्नशील रहता हूँ। ऐसी दशामें भी तू मुझे अपने वाग्बाणोंसे मार रहा है; हमलोग तुझसे थोड़ा-सा भी सुख न पा सके ॥ १३ ॥

मां मावमंस्था द्रौपदीतल्पसंस्थो महारथान् प्रतिहन्मि त्वदर्थे । तेनातिशङ्की भारत निष्ठुरोऽसि त्वत्तः सुखं नाभिजानामि किंचित् ॥ १४ ॥ तू द्रौपदीकी शय्यापर बैठा-बैठा मेरा अपमान न कर। मैं तेरे ही लिये बड़े-बड़े महारथियोंका संहार कर रहा हूँ। इसीसे तू मेरे प्रति अधिक संदेह करके निष्ठुर हो गया है। तुझसे कोई सुख मिला हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥ १४ ॥

प्रोक्तः स्वयं सत्यसंधेन मृत्यु- स्तव प्रियार्थं नरदेव युद्धे । वीरः शिखण्डी द्रौपदोऽसौ महात्मा मयाभिगुप्तेन हतश्च तेन ॥ १५ ॥ नरदेव! तेरा प्रिय करनेके लिये सत्यप्रतिज्ञ भीष्मजीने युद्धमें महामनस्वी वीर द्रुपदकुमार शिखण्डीको अपनी मृत्यु बताया था। मेरे ही द्वारा सुरक्षित होकर शिखण्डीने उन्हें मारा है ॥ १५ ॥

न चाभिनन्दामि तवाधिराज्यं यतस्त्वमक्षेष्वहिताय सक्तः। स्वयं कृत्वा पापमनार्यजुष्ट- मस्माभिर्वा तर्तुमिच्छस्यरींस्त्वम्॥ १६॥ मैं तेरे राज्यका अभिनन्दन नहीं करता; क्योंकि तू अपना ही अहित करनेके लिये जूएमें आसक्त है। स्वयं नीच पुरुषोंद्वारा सेवित पापकर्म करके अब तू हमलोगोंके द्वारा शत्रुसेनारूपी समुद्रको पार करना चाहता है॥ १६॥

अक्षेषु दोषा बहवो विधर्माः श्रुतास्त्वया सहदेवोऽब्रवीद् यान्। तान् नैषि त्वं त्यक्तुमसाधुजुष्टां- स्तेन स्म सर्वे निरयं प्रपन्नाः॥ १७॥ जूआ खेलनेमें बहुत-से पापमय दोष बताये गये हैं, जिन्हें सहदेवने तुझसे कहा था और तूने सुना भी था, तो भी तू उन दुर्जनसेवित दोषोंका परित्याग न कर सका; इसीसे हम सब लोग नरकतुल्य कष्टमें पड़ गये॥ १७॥

सुखं त्वत्तो नाभिजानीम किंचिद् यतस्त्वमक्षैर्देवितुं सम्प्रवृत्तः। स्वयं कृत्वा व्यसनं पाण्डव त्व- मस्मांस्तीव्राः श्रावयस्यद्य वाचः॥ १८॥ पाण्डुकुमार! तुझसे थोड़ा-सा भी सुख मिला हो—यह हम नहीं जानते हैं; क्योंकि तू जूआ खेलनेके व्यसनमें पड़ा हुआ है। स्वयं यह दुर्व्यसन करके अब तू हमें कठोर बातें सुना रहा है॥ १८॥

शेतेऽस्माभिर्निहता शत्रुसेना छिन्नैर्गात्रैर्भूतितले नदन्ती। त्वया हि तत् कर्म कृतं नृशंसं यस्माद् दोषःकौरवाणां वधश्च॥ १९॥ हमारे द्वारा मारी गयी शत्रुओंकी सेना अपने कटे हुए अंगोंके साथ पृथ्वीपर पड़ी-पड़ी कराह रही है। तूने वह क्रूरतापूर्ण कर्म कर डाला है, जिससे पाप तो होगा ही; कौरववंशका विनाश भी हो जायगा॥ १९॥

हता उदीच्या निहताः प्रतीच्या नष्टाः प्राच्या दाक्षिणात्या विशस्ताः। कृतं कर्माप्रतिरूपं महद्भि- स्तेषां योधैरस्मदीयैश्च युद्धे॥ २०॥

उत्तर दिशाके वीर मारे गये, पश्चिमके योद्धाओंका संहार हो गया, पूर्वदेशके क्षत्रिय नष्ट हो गये और दक्षिणदेशीय योद्धा काट डाले गये। शत्रुओंके और हमारे पक्षके बड़े-बड़े योद्धाओंने युद्धमें ऐसा पराक्रम किया है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ २० ॥ त्वं देवितात्वत्कृते राज्यनाश- स्त्वत्सम्भवं नो व्यसनं नरेन्द्र । मास्मान् क्रूरैर्वाक्प्रतोदैस्तुदंस्त्वं भूयो राजन् कोपयेस्त्वल्पभाग्यः ॥ २१ ॥ नरेन्द्र! तू भाग्यहीन जुआरी है। तेरे ही कारण हमारे राज्यका नाश हुआ और तुझसे ही हमें घोर संकटकी प्राप्ति हुई। राजन्! अब तू अपने वचनरूपी चाबुकोंसे हमें पीड़ा देते हुए फिर कुपित न कर ॥ २१ ॥

संजय उवाच

एता वाचः परुषाः सव्यसाची स्थिरप्रज्ञः श्रावयित्वा तु रूक्षाः । बभूवासौ विमना धर्मभीरुः कृत्वा प्राज्ञः पातकं किंचिदेवम् ॥ २२ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! सव्यसाची अर्जुन धर्मभीरु हैं। उनकी बुद्धि स्थिर है तथा वे उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न हैं। उस समय राजा युधिष्ठिरको वैसी रूखी और कठोर बातें सुनाकर वे ऐसे अनमने और उदास हो गये, मानो कोई पातक करके इस प्रकार पछता रहे हों ॥ २२ ॥ तदानुतेपे सुरराजपुत्रो विनिःश्वसंश्चासिमथोद्धबर्ह । तमाह कृष्णः किमिदं पुनर्भवान् विकोशमाकाशनिभं करोत्यसिम् ॥ २३ ॥ ब्रवीहि मां त्वं पुनरुत्तरं वच- स्तथा प्रवक्ष्याम्यहमर्थसिद्धये । देवराजकुमार अर्जुनको उस समय बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने लंबी साँस खींचते हुए फिरसे तलवार खींच ली। यह देख भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'अर्जुन! यह क्या? तुम आकाशके समान निर्मल इस तलवारको पुनः क्यों म्यानसे बाहर निकाल रहे हो? तुम मुझे मेरी बातका उत्तर दो। मैं तुम्हारा अभीष्ट अर्थ सिद्ध करनेके लिये पुनः कोई योग्य उपाय बताऊँगा' ॥ २३ १/२ ॥ इत्येवमुक्तः पुरुषोत्तमेन सुदुःखितः केशवमर्जुनोऽब्रवीत् ॥ २४ ॥

अहं हनिष्ये स्वशरीरमेव प्रसह्य येनाहितमाचरं वै। पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर अर्जुन अत्यन्त दुःखी हो उनसे इस प्रकार बोले—‘भगवन्! मैंने जिसके द्वारा हठपूर्वक भाईका अपमानरूप अहितकर कार्य कर डाला है, अपने उस शरीरको ही अब नष्ट कर डालूँगा’॥ २४ १/२ ॥

निशम्य तत् पार्थवचोऽब्रवीदिदं धनंजयं धर्मभृतां वरिष्ठः॥ २५॥ राजानमेनं त्वमितीदमुक्त्वा किं कश्मलं प्राविशः पार्थ घोरम्। त्वं चात्मानं हन्तुमिच्छस्वरिघ्न नेदं सद्भिः सेवितं वै किरीटिन्॥ २६॥ अर्जुनका यह वचन सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने उनसे कहा—‘पार्थ! राजा युधिष्ठिरको ‘तू’ ऐसा कहकर तुम इतने घोर दुःखमें क्यों डूब गये? शत्रुसूदन! क्या तुम आत्मघात करना चाहते हो? किरीटधारी वीर! साधुपुरुषोंने कभी ऐसा कार्य नहीं किया है॥ २५-२६॥

धर्मात्मानं भ्रातरं ज्येष्ठमद्य खड्गेन चैनं यदि हन्या नृवीर। धर्माद् भीतस्तत् कथं नाम ते स्यात् किंचोत्तरं वाकरिष्यस्त्वमेव॥ २७॥ ‘नरवीर! यदि आज धर्मसे डरकर तुमने अपने बड़े भाई इन धर्मात्मा युधिष्ठिरको तलवारसे मार डाला होता तो तुम्हारी कैसी दशा होती और इसके बाद तुम क्या करते?॥ २७॥

सूक्ष्मो धर्मो दुर्विदश्चापि पार्थ विशेषतोऽज्ञैः प्रोच्यमानं निबोध। हत्वाऽऽत्मानमात्मना प्राप्नुयास्त्वं वधाद् भ्रातुर्नरकं चातिघोरम्॥ २८॥ ‘कुन्तीनन्दन! धर्मका स्वरूप सूक्ष्म है। उसको जानना या समझना बहुत कठिन है। विशेषतः अज्ञानी पुरुषोंके लिये तो उसका जानना और भी मुश्किल है। अब मैं जो कुछ कहता हूँ उसे ध्यान देकर सुनो, भाईका वध करनेसे जिस अत्यन्त घोर नरककी प्राप्ति होती है, उससे भी भयानक नरक तुम्हें स्वयं ही अपनी हत्या करनेसे प्राप्त हो सकता है॥ २८॥

ब्रवीहि वाचाद्य गुणानिहात्मन- स्तथा हतात्मा भवितासि पार्थ। तथास्तु कृष्णेत्यभिनन्द्य तद्वचो

धनंजयः प्राह धनुर्विनाम्य ॥ २९ ॥
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठं
शृणुष्व राजन्निति शक्रसूनुः ।
‘अतः पार्थ! अब तुम यहाँ अपनी ही वाणीद्वारा अपने गुणोंका वर्णन करो। ऐसा करनेसे यह मान लिया जायगा कि तुमने अपने ही हाथों अपना वध कर लिया।’ यह सुनकर अर्जुनने उनकी बातका अभिनन्दन करते हुए कहा—‘श्रीकृष्ण! ऐसा ही हो’। फिर इन्द्रकुमार अर्जुन अपने धनुषको नवाकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले—‘राजन्! सुनिये ॥ २९ १/२ ॥
न मादृशोऽन्यो नरदेव विद्यते
धनुर्धरो देवमृते पिनाकिनम् ॥ ३० ॥
अहं हि तेनानुमतो महात्मना
क्षणेन हन्यां सचराचरं जगत् ।
‘नरदेव! पिनाकधारी भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कोई भी मेरे समान धनुर्धर नहीं है। उन महात्मा महेश्वरने मेरी वीरताका अनुमोदन किया है। मैं चाहूँ तो क्षणभरमें चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण जगत्‌को नष्ट कर डालूँ ॥ ३० १/२ ॥
मया हि राजन् सदिगीश्वरा दिशो
विजित्य सर्वा भवतः कृता वशे ॥ ३१ ॥
स राजसूयश्च समाप्तदक्षिणः
सभा च दिव्या भवतो ममौरसा ।
‘राजन्! मैंने सम्पूर्ण दिशाओं और दिक्पालोंको जीतकर आपके अधीन कर दिया था। पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त राजसूययज्ञका अनुष्ठान तथा आपकी दिव्य सभाका निर्माण मेरे ही बलसे सम्भव हुआ है ॥ ३१ १/२ ॥
पाणौ पृषत्का निशिता ममैव
धनुश्च सज्यं विततं सबाणम् ॥ ३२ ॥
पादौ च मे सरथौ सध्वजौ च
न मादृशं युद्धगतं जयन्ति ।
‘मेरे ही हाथमें तीखे तीर और बाण तथा प्रत्यंचासहित विशाल धनुष हैं। मेरे चरणोंमें रथ और ध्वजाके चिह्न हैं। मेरे-जैसा वीर यदि युद्धभूमिमें पहुँच जाय तो उसे शत्रु जीत नहीं सकते ॥ ३२ १/२ ॥
हता उदीच्या निहताः प्रतीच्याः
प्राच्या निरस्ता दाक्षिणात्या विशस्ताः ॥ ३३ ॥
संशप्तकानां किंचिदेवास्ति शिष्टं
सर्वस्य सैन्यस्य हतं मयार्धम् ।

शेते मया निहता भारतीयं
चमू राजन् देवचमूप्रकाशा ॥ ३४ ॥
‘मेरे द्वारा उत्तर दिशाके वीर मारे गये, पश्चिमके योद्धाओंका संहार हो गया, पूर्वदेशके क्षत्रिय नष्ट हो गये और दक्षिणदेशीय योद्धा काट डाले गये। संशप्तकोंका भी थोड़ा-सा ही भाग शेष रह गया है। मैंने सारी कौरव-सेनाके आधे भागको स्वयं ही नष्ट किया है। राजन्! देवताओंकी सेनाके समान प्रकाशित होनेवाली भरतवंशियोंकी यह विशाल वाहिनी मेरे ही हाथों मारी जाकर रणभूमिमें सो रही है ॥ ३३-३४ ॥
ये चास्त्रज्ञास्तानहं हन्मि चास्त्रै-
स्तस्माल्लोकांन्नेह करोमि भस्मसात् ।
जैत्रं रथं भीममास्थाय कृष्ण
यावः शीघ्रं सूतपुत्रं निहन्तुम् ॥ ३५ ॥
‘जो अस्त्रविद्याके ज्ञाता हैं, उन्हींको मैं अस्त्रोंद्वारा मारता हूँ; इसीलिये मैं यहाँ सम्पूर्ण लोकोंको भस्म नहीं करता हूँ। श्रीकृष्ण! अब हम दोनों विजयशाली एवं भयंकर रथपर बैठकर सूतपुत्रका वध करनेके लिये शीघ्र ही चल दें ॥ ३५ ॥
राजा भवत्वद्य सुनिर्वृतोऽयं
कर्णं रणे नाशयितास्मि बाणैः ।
इत्येवमुक्त्वा पुनराह पार्थो
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम् ॥ ३६ ॥
‘आज ये राजा युधिष्ठिर संतुष्ट हों। मैं रणभूमिमें अपने बाणोंद्वारा कर्णका नाश कर डालूँगा।’ यों कहकर अर्जुन पुनः धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरसे बोले— ॥ ३६ ॥
अद्यापुत्रा सूतमाता भवित्री
कुन्ती वाथो वा मया तेन वापि ।
सत्यं वदाम्यद्य न कर्णमाजौ
शरैरहत्वा कवचं विमोक्ष्ये ॥ ३७ ॥
‘आज मेरेद्वारा सूतपुत्रकी माता पुत्रहीन हो जायगी अथवा मेरी माता कुन्ती ही कर्णके द्वारा मुझ एक पुत्रसे हीन हो जायगी। मैं सत्य कहता हूँ, आज युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा कर्णको मारे बिना मैं कवच नहीं उतारूँगा ॥ ३७ ॥

संजय उवाच

इत्येवमुक्त्वा पुनरेव पार्थो
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम् ।
विमुच्य शस्त्राणि धनुर्विसृज्य
कोशे च खड्गं विनिधाय तूर्णम् ॥ ३८ ॥

स व्रीडया नम्रशिराः किरीटी युधिष्ठिरं प्राञ्जलिरभ्युवाच । प्रसीद राजन् क्षम यन्मयोक्तं काले भवान् वेत्स्यति तन्नमस्ते ॥ ३९ ॥ **संजय कहते हैं—**महाराज! किरीटधारी कुन्तीकुमार अर्जुन धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरसे पुनः ऐसा कहकर शस्त्र खोल, धनुष नीचे डाल और तलवारको तुरंत ही म्यानमें रखकर लज्जासे नतमस्तक हो हाथ जोड़ पुनः उनसे इस प्रकार बोले—‘राजन्! आप प्रसन्न हों। मैंने जो कुछ कहा है, उसके लिये क्षमा करें। समयपर आपको सब कुछ मालूम हो जायगा। इसलिये आपको मेरा नमस्कार है’॥ ३९॥

प्रसाद्य राजानममित्रसाहं स्थितोऽब्रवीच्चैव पुनः प्रवीरः । नेदं चिरात् क्षिप्रमिदं भविष्य- त्यावर्ततेऽसावभियामि चैनम् ॥ ४० ॥ इस प्रकार शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ राजा युधिष्ठिरको प्रसन्न करके प्रमुख वीर अर्जुन खड़े होकर फिर बोले—‘महाराज! अब कर्णके वधमें देर नहीं है। यह कार्य शीघ्र ही होगा। वह इधर ही आ रहा है; अतः मैं भी उसीपर चढ़ाई कर रहा हूँ’॥ ४०॥

याम्येष भीमं समरात् प्रमोक्तुं सर्वात्मना सूतपुत्रं च हन्तुम् । तव प्रियार्थं मम जीवितं हि ब्रवीमि सत्यं तदवेहि राजन् ॥ ४१ ॥ ‘राजन्! मैं अभी भीमसेनको संग्रामसे छुटकारा दिलाने और सब प्रकारसे सूतपुत्र कर्णका वध करनेके लिये जा रहा हूँ। मेरा जीवन आपका प्रिय करनेके लिये ही है। यह मैं सत्य कहता हूँ। आप इसे अच्छी तरह समझ लें’॥ ४१॥

इति प्रयास्यन्नुपगृह्य पादौ समुत्थितो दीप्ततेजाः किरीटी । एतच्छ्रुत्वा पाण्डवो धर्मराजो भ्रातुर्वाक्यं परुषं फाल्गुनस्य ॥ ४२ ॥ उत्थाय तस्माच्छयनादुवाच पार्थं ततो दुःखपरीतचेताः । इस प्रकार जानेके लिये उद्यत हो राजा युधिष्ठिरके चरण छूकर उद्दीप्त तेजवाले किरीटधारी अर्जुन उठ खड़े हुए। इधर अपने भाई अर्जुनका पूर्वोक्तरूपसे कठोर वचन सुनकर पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर दुःखसे व्याकुलचित्त होकर उस शय्यासे उठ गये और अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ ४२ ½ ॥

कृतं मया पार्थ यथा न साधु येन प्राप्तं व्यसनं वः सुघोरम् ॥ ४३ ॥ तस्माच्छिरश्छिन्धि ममेदमाद्य कुलान्तकस्याधमपूरुषस्य । पापस्य पापव्यसनान्वितस्य विमूढबुद्धेरल्सस्य भीरोः ॥ ४४ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! अवश्य ही मैंने अच्छा कर्म नहीं किया है, जिससे तुमलोगोंपर अत्यन्त भयंकर संकट आ पड़ा है। मैं कुलान्तकारी नराधम पापी, पापमय दुर्व्यसनमें आसक्त, मूढ़बुद्धि, आलसी और डरपोक हूँ; इसलिये आज तुम मेरा यह मस्तक काट डालो ॥ ४३-४४ ॥ वृद्धावमन्तुः परुषस्य चैव किं ते चिरं मे ह्यनुसृत्य रूक्षम् । गच्छाम्यहं वनमेवाद्य पापः सुखं भवान् वर्ततां मद्विहीनः ॥ ४५ ॥ ‘मैं बड़े बूढ़ोंका अनादर करनेवाला और कठोर हूँ। तुम्हें मेरी रूखी बातोंका दीर्घकालतक अनुसरण करनेकी क्या आवश्यकता है। मैं पापी आज वनमें ही चला जा रहा हूँ। तुम मुझसे अलग होकर सुखसे रहो ॥ ४५ ॥ योग्यो राजा भीमसेनो महात्मा क्लीबस्य वा मम किं राज्यकृत्यम् । न चापि शक्तः परुषाणि सोढुं पुनस्तवेमानि रुषान्वितस्य ॥ ४६ ॥ ‘महामनस्वी भीमसेन सुयोग्य राजा होंगे। मुझ कायरको राज्य लेनेसे क्या काम है? अब पुनः मुझमें तुम्हारे रोषपूर्वक कहे हुए इन कठोर वचनोंको सहनेकी शक्ति नहीं है ॥ ४६ ॥ भीमोऽस्तु राजा मम जीवितेन न कार्यमद्यावमतस्य वीर । इत्येवमुक्त्वा सहसोत्पपात राजा ततस्तच्छयनं विहाय ॥ ४७ ॥ इयेष निर्गन्तुमथो वनाय तं वासुदेवः प्रणतोऽभ्युवाच ॥ ४८ ॥ ‘वीर! भीमसेन राजा हों। आज इतना अपमान हो जानेपर मुझे जीवित रहनेकी आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर सहसा पलंग छोड़कर वहाँसे नीचे कूद

पड़े और वनमें जानेकी इच्छा करने लगे। तब भगवान् श्रीकृष्णने उनके चरणोंमें प्रणाम करके इस प्रकार कहा।।

राजन् विदितमेतद् वै यथा गाण्डीवधन्वनः । प्रतिज्ञा सत्यसंधस्य गाण्डीवं प्रति विश्रुता ॥ ४९ ॥

‘राजन्! आपको तो यह विदित ही है कि गाण्डीवधारी सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनने गाण्डीव धनुषके विषयमें कैसी प्रतिज्ञा कर रखी है? उनकी वह प्रतिज्ञा प्रसिद्ध है ।।

ब्रूयाद् य एवं गाण्डीवमन्यस्मै देयमित्युत । वध्योऽस्य स पुमाँल्लोके त्वया चोक्तोऽयमीदृशम् ॥ ५० ॥

‘जो अर्जुनसे यह कह दे कि ‘तुम्हें अपना गाण्डीवधनुष दूसरेको दे देना चाहिये’ वह मनुष्य इस जगत्में उनका वध्य है।’ आपने आज अर्जुनसे ऐसी ही बात कह दी है ।।

ततः सत्यां प्रतिज्ञां तां पार्थेन प्रतिरक्षता । मच्छन्दादवमानोऽयं कृतस्तव महीपते ॥ ५१ ॥ गुरूणामवमानो हि वध इत्यभिधीयते ।

‘अतः भूपाल! अर्जुनने अपनी उस सच्ची प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए मेरी आज्ञासे आपका यह अपमान किया; क्योंकि गुरुजनोंका अपमान ही उनका वध कहा जाता है ।।

तस्मात् त्वं वै महाबाहो मम पार्थस्य चोभयोः ॥ ५२ ॥ व्यतिक्रममिमं राजन् सत्यसंरक्षणं प्रति ।

‘इसलिये महाबाहो! राजन्! मेरे और अर्जुन दोनोंके सत्यकी रक्षाके लिये किये गये इस अपराधको आप क्षमा करें ।। ५२ १/२ ।।

शरणं त्वां महाराज प्रपन्नौ स्व उभावपि ॥ ५३ ॥ क्षन्तुमर्हसि मे राजन् प्रणतस्याभियाचतः ।

‘महाराज! हम दोनों आपकी शरणमें आये हैं और मैं चरणोंमें गिरकर आपसे क्षमा-याचना करता हूँ; आप मेरे अपराधको क्षमा करें ।। ५३ १/२ ।।

राधेयस्याद्य पापस्य भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ५४ ॥ सत्यं ते प्रतिजानामि हतं विद्ध्यद्य सूतजम् । यस्येच्छसि वधं तस्य गतमप्यस्य जीवितम् ॥ ५५ ॥

‘आज पृथ्वी पापी राधापुत्र कर्णके रक्तका पान करेगी। मैं आपसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, समझ लीजिये कि अब सूतपुत्र कर्ण मार दिया गया। आप जिसका वध चाहते हैं, उसका जीवन समाप्त हो गया’ ।।

इति कृष्णवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । ससम्भ्रमं हृषीकेशमुत्थाप्य प्रणतं तदा ॥ ५६ ॥ कृताञ्जलिस्ततो वाक्यमुवाचानन्तरं वचः ।

भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने अपने चरणोंमें पड़े हुए हृषीकेशको वेगपूर्वक उठाकर फिर दोनों हाथ जोड़कर यह बात कही— ।।

एवमेव यथाऽऽत्थ त्वमस्येषोऽतिक्रमो मम ।। ५७ ।।
अनुनीतोऽस्मि गोविन्द तारितश्चास्मि माधव ।
मोचिता व्यसनाद् घोराद् वयमद्य त्वयाच्युत ।। ५८ ।।

‘गोविन्द! आप जैसा कहते हैं, वह ठीक है। वास्तवमें मुझसे यह नियमका उल्लंघन हो गया है। माधव! आपने अनुनयद्वारा मुझे संतुष्ट कर दिया और संकटके समुद्रमें डूबनेसे बचा लिया। अच्युत! आज आपके द्वारा हमलोग घोर विपत्तिसे बच गये ।। ५७-५८ ।।

भवन्तं नाथमासाद्य ह्यावां व्यसनसागरात् ।
घोरादद्य समुत्तीर्णावुभावज्ञानमोहितौ ।। ५९ ।।
त्वद्बुद्धिप्लवमासाद्य दुःखशोकार्णवाद् वयम् ।
समुत्तीर्णाः सहामात्याः सनाथाः स्म त्वयाच्युत ।। ६० ।।

‘आज आपको अपना रक्षक पाकर हम दोनों संकटके भयानक समुद्रसे पार हो गये। हम दोनों ही अज्ञानसे मोहित हो रहे थे; परंतु आपकी बुद्धिरूपी नौकाका आश्रय लेकर दुःख-शोकके समुद्रसे मन्त्रियोंसहित पार हो गये। अच्युत! हम आपसे ही सनाथ हैं’ ।। ५९-६० ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरसमाश्वासने सप्ततितमोऽध्यायः ।। ७० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2158)

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एकसप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनसे भगवान् श्रीकृष्णका उपदेश, अर्जुन और युधिष्ठिरका प्रसन्नतापूर्वक मिलन एवं अर्जुनद्वारा कर्णवधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरका आशीर्वाद

संजय उवाच

धर्मराजस्य तच्छ्रुत्वा प्रीतियुक्तं वचस्ततः ।
पार्थं प्रोवाच धर्मात्मा गोविन्दो यदुनन्दनः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! धर्मराजके मुखसे यह प्रेमपूर्ण वचन सुनकर यदुकुलको आनन्दित करनेवाले धर्मात्मा गोविन्द अर्जुनसे कुछ कहने लगे ॥ १ ॥

इति स्म कृष्णवचनात् प्रत्युच्चार्य युधिष्ठिरम् ।
बभूव विमनाः पार्थः किंचित् कृत्वेव पातकम् ॥ २ ॥
अर्जुन श्रीकृष्णके कहनेसे युधिष्ठिरके प्रति जो तिरस्कारपूर्ण वचन बोले थे, इसके कारण वे मन-ही-मन ऐसे उदास हो गये थे मानो कोई पाप कर बैठे हों ॥

ततोऽब्रवीद् वासुदेवः प्रहसन्निव पाण्डवम् ।
कथं नाम भवेदेतद् यदि त्वं पार्थ धर्मजम् ॥ ३ ॥
असिना तीक्ष्णधारेण हन्या धर्मे व्यवस्थितम् ।
त्वमित्युक्त्वाथ राजानमेवं कश्मलमाविशः ॥ ४ ॥
उनकी यह अवस्था देख भगवान् श्रीकृष्ण हँसते हुए-से उन पाण्डुकुमारसे बोले—'पार्थ! तुम तो राजाके प्रति केवल 'तू' कह देनेमात्रसे ही इस प्रकार शोकमें डूब गये हो। फिर यदि धर्ममें स्थित रहनेवाले धर्मकुमार युधिष्ठिरको तीखी धारवाले तलवारसे मार डालते, तब तुम्हारी दशा कैसी हो जाती? ॥ ३-४ ॥

हत्वा तु नृपतिं पार्थ अकरिष्यः किमुत्तरम् ।
एवं हि दुर्विदो धर्मो मन्दप्रज्ञैर्विशेषतः ॥ ५ ॥
'कुन्तीनन्दन! तुम राजाका वध करनेके पश्चात् क्या करते? इस तरह धर्मका स्वरूप सभीके लिये दुर्विज्ञेय है। विशेषतः उन लोगोंके लिये, जिनकी बुद्धि मन्द है, उसके सूक्ष्म स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है ॥ ५ ॥

स भवान् धर्मभीरुत्वाद् ध्रुवमैष्यन्महत्तमः ।
नरकं घोररूपं च भ्रातुर्ज्येष्ठस्य वै वधात् ॥ ६ ॥
'अतः तुम धर्मभीरु होनेके कारण अपने ज्येष्ठ भाईके वधसे निश्चय ही घोर नरकरूप महान् अन्धकार (दुःख)-में डूब जाते ॥ ६ ॥

स त्वं धर्मभृतां श्रेष्ठं राजानं धर्मसंहितम् । प्रसादय कुरुश्रेष्ठमेतदत्र मतं मम ॥ ७ ॥ ‘इसलिये इस विषयमें मेरा विचार यह है कि तुम धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मपरायण कुरुश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरको प्रसन्न करो ॥ ७ ॥

प्रसाद्य भक्त्या राजानं प्रीते चैव युधिष्ठिरे । प्रयावस्त्वरितौ योद्धुं सूतपुत्ररथं प्रति ॥ ८ ॥ ‘राजा युधिष्ठिरको भक्तिभावसे प्रसन्न कर लो। जब वे प्रसन्न हो जायँ, तब हमलोग तुरंत ही युद्धके लिये सूतपुत्रके रथपर चढ़ाई करेंगे ॥ ८ ॥

हत्वा तु समरे कर्णं त्वमद्य निशितैः शरैः । विपुलां प्रीतिमाधत्स्व धर्मपुत्रस्य मानद ॥ ९ ॥ ‘मानद! आज तुम तीखे बाणोंसे समरभूमिमें कर्णका वध करके धर्मपुत्र युधिष्ठिरके हृदयमें अत्यन्त हर्षोल्लास भर दो ॥ ९ ॥

एतदत्र महाबाहो प्राप्तकालं मतं मम । एवं कृते कृतं चैव तव कार्यं भविष्यति ॥ १० ॥ ‘महाबाहो! मुझे तो इस समय यहाँ यही करना उचित जान पड़ता है। ऐसा कर लेनेपर तुम्हारा सारा कार्य सम्पन्न हो जायगा’ ॥ १० ॥

ततोऽर्जुनो महाराज लज्जया वै समन्वितः । धर्मराजस्य चरणौ प्रपद्य शिरसा नतः ॥ ११ ॥ उवाच भरतश्रेष्ठं प्रसीदेति पुनः पुनः । क्षमस्व राजन् यत्र प्रोक्तं धर्मकामेन भीरुणा ॥ १२ ॥ ‘महाराज! तब अर्जुन लज्जित हो धर्मराजके चरणोंमें गिरकर मस्तक नवाकर उन भरतश्रेष्ठ नरेशसे बारंबार बोले—‘राजन्! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये। मैंने धर्मपालनकी इच्छासे भयभीत होकर जो अनुचित वचन कहा है, उसके लिये क्षमा कीजिये’ ॥ ११-१२ ॥

दृष्ट्वा तु पतितं पद्भ्यां धर्मराजो युधिष्ठिरः । धनंजयमित्रघ्नं रुदन्तं भरतर्षभ ॥ १३ ॥ उत्थाय भ्रातरं राजा धर्मराजो धनंजयम् । समाश्लिष्य च सस्नेहं प्ररुरोद महीपतिः ॥ १४ ॥ भरतश्रेष्ठ! धर्मराज युधिष्ठिरने शत्रुसूदन, भाई धनंजयको अपने चरणोंपर गिरकर रोते देख बड़े स्नेहसे उठाकर हृदयसे लगा लिया। फिर वे भूपाल धर्मराज भी फूट-फूटकर रोने लगे ॥ १३-१४ ॥

रुदित्वा सुचिरं कालं भ्रातरौ सुमहाद्युती । कृतशौचौ महाराज प्रीतिमन्तौ बभूवतुः ॥ १५ ॥

महाराज! वे दोनों महातेजस्वी भाई दीर्घकालतक रोते रहे। इससे उनके मनकी मैल धुल गयी और वे दोनों भाई परस्पर प्रेमसे भर गये ॥ १५ ॥
तत आश्लिष्य तं प्रेम्णा मूर्ध्नि चाघ्राय पाण्डवः ।
प्रीत्या परमया युक्तो विस्मयंश्च पुनः पुनः ॥ १६ ॥
अब्रवीत् तं महेष्वासं धर्मराजो धनंजयम् ।
तदनन्तर अत्यन्त प्रसन्न हो बारंबार मुसकराते हुए पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने महाधनुर्धर धनंजयको बड़े प्रेमसे हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा और उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १६ १/२ ॥
कर्णेन मे महाबाहो सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ १७ ॥
कवचं च ध्वजं चैव धनुः शक्तिर्हयाः शराः ।
शरैः कृत्ता महेष्वास यतमानस्य संयुगे ॥ १८ ॥
'महाधनुर्धर! महाबाहो! मैं युद्धमें यत्नपूर्वक लगा हुआ था, किंतु कर्णने सारी सेनाके देखते-देखते अपने बाणोंद्वारा मेरे कवच, ध्वज, धनुष, शक्ति, घोड़े और बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले हैं' ॥ १७-१८ ॥
सोऽहं ज्ञात्वा रणे तस्य कर्म दृष्ट्वा च फाल्गुन ।
व्यवसीदामि दुःखेन न च मे जीवितं प्रियम् ॥ १९ ॥
'फाल्गुन! रणभूमिमें उसके इस कर्मको देख और समझकर मैं दुःखसे पीड़ित हो रहा हूँ। मुझे अपना जीवन प्रिय नहीं रह गया है ॥ १९ ॥
न चेदद्य हि तं वीरं निहनिष्यसि संयुगे ।
प्राणानेव परित्यक्ष्ये जीवितार्थो हि को मम ॥ २० ॥
'यदि आज युद्धस्थलमें तुम वीर कर्णका वध नहीं करोगे तो मैं अपने प्राणोंका ही परित्याग कर दूँगा। फिर मेरे जीवनका प्रयोजन ही क्या है?' ॥ २० ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच विजयो भरतर्षभ ।
सत्येन ते शपे राजन् प्रसादेन तथैव च ।
भीमेन च नरश्रेष्ठ यमाभ्यां च महीपते ॥ २१ ॥
यथाद्य समरे कर्णं हनिष्यामि हतोऽपि वा ।
महीतले पतिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उत्तर दिया—'राजन्! नरश्रेष्ठ महीपाल! मैं आपसे सत्यकी, आपके कृपापूर्ण प्रसादकी, भीमसेनकी तथा नकुल और सहदेवकी शपथ खाकर सत्यके द्वारा अपने धनुषको छूकर कहता हूँ कि आज समरमें या तो कर्णको मार डालूँगा या स्वयं ही मारा जाकर पृथ्वीपर गिर जाऊँगा' ॥ २१-२२ ॥
एवमाभाष्य राजानमब्रवीन्माधवं वचः ।
अद्य कर्णं रणे कृष्ण सूदयिष्ये न संशयः ॥ २३ ॥

तव बुद्ध्या हि भद्रं ते वधस्तस्य दुरात्मनः ।
राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले—'श्रीकृष्ण! आज रणभूमिमें मैं कर्णका वध करूँगा, इसमें संशय नहीं है। आपका कल्याण हो। आपकी बुद्धिसे ही उस दुरात्माका वध होगा' ॥ २३ ½ ॥
एवमुक्तोऽब्रवीत् पार्थं केशवो राजसत्तम ॥ २४ ॥
शक्तोऽसि भरतश्रेष्ठ हन्तुं कर्णं महाबलम् ।
एष चापि हि मे कामो नित्यमेव महारथ ॥ २५ ॥
कथं भवान् रणे कर्णं निहन्यादिति सत्तम ।
नृपश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—'भरतश्रेष्ठ! तुम महाबली कर्णका वध करनेमें समर्थ हो। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महारथी वीर! मेरे मनमें भी सदा यही इच्छा बनी रहती है कि तुम रणभूमिमें कर्णको किसी तरह मार डालो' ॥ २४-२५ ½ ॥
भूयश्चोवाच मतिमान् माधवो धर्मनन्दनम् ॥ २६ ॥
युधिष्ठिरेमं बीभत्सुं त्वं सान्त्वयितुमर्हसि ।
अनुज्ञातुं च कर्णस्य वधायाद्य दुरात्मनः ॥ २७ ॥
फिर बुद्धिमान् भगवान् माधवने धर्मनन्दन युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा—'महाराज! आप अर्जुनको सान्त्वना और दुरात्मा कर्णके वधके लिये आज्ञा प्रदान करें ॥
श्रुत्वा ह्यहमयं चैव त्वां कर्णशरपीडितम् ।
प्रवृत्तिं ज्ञातुमायाताविहावां पाण्डुनन्दन ॥ २८ ॥
'पाण्डुनन्दन! राजन्! आप कर्णके बाणोंसे बहुत पीड़ित हो गये हैं—यह सुनकर मैं और ये अर्जुन दोनों आपका समाचार जाननेके लिये यहाँ आये थे ॥ २८ ॥
दिष्ट्यासि राजन् न हतो दिष्ट्या न ग्रहणं गतः ।
परिसान्त्वय बीभत्सुं जयमाशाधि चानघ ॥ २९ ॥
'निष्पाप नरेश! सौभाग्यकी बात है कि (कर्णके द्वारा) न तो आप मारे गये और न पकड़े ही गये। अब आप अर्जुनको सान्त्वना दें और उन्हें विजयके लिये आशीर्वाद प्रदान करें' ॥ २९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

एह्योहि पार्थ बीभत्सो मां परिष्वज पाण्डव ।
वक्तव्यमुक्तोऽस्मि हितं त्वया क्षान्तं च तन्मया ॥ ३० ॥
**युधिष्ठिर बोले—**कुन्तीनन्दन! बीभत्सो! आओ, आओ! पाण्डुकुमार! मेरे हृदयसे लग जाओ। तुमने तो मेरे प्रति कहनेयोग्य और हितकी ही बात कही है तथा मैंने उसके लिये क्षमा भी कर दी ॥ ३० ॥
अहं त्वामनुजानामि जहि कर्णं धनंजय ।