महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
**दुर्योधन बोला—**युधिष्ठिर! तुमलोग एक-एक करके मेरे साथ युद्धके लिये आते जाओ। रणभूमिमें किसी एक वीरको बहुसंख्यक वीरोंके साथ युद्धके लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं है ॥ ५२ ॥
न्यस्तवर्मा विशेषेण श्रान्तश्चाप्सु परिप्लुतः ।
भृशं विक्षतगात्रश्च हतवाहनसैनिकः ॥ ५३ ॥
विशेषतः उस वीरको जिसने अपना कवच उतार दिया हो, जो थककर जलमें गोता लगाकर विश्राम कर रहा हो, जिसके सारे अंग अत्यन्त घायल हो गये हों तथा जिसके वाहन और सैनिक मार डाले गये हों, किसी समूहके साथ युद्धके लिये बाध्य करना कदापि उचित नहीं है ॥ ५३ ॥
अवश्यमेव योद्धव्यं सर्वैरेव मया सह ।
युक्तं त्वयुक्तमित्येतद् वेत्सि त्वं चैव सर्वदा ॥ ५४ ॥
मुझे तो तुम सब लोगोंके साथ अवश्य युद्ध करना है; परंतु इसमें क्या उचित है और क्या अनुचित; इसे तुम सदा अच्छी तरह जानते हो ॥ ५४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
मा भूदियं तव प्रज्ञा कथमेवं सुयोधन ।
यदाभिमन्युं बहवो जघ्नुर्युधि महारथाः ॥ ५५ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**सुयोधन! जब तुम बहुत-से महारथियोंने मिलकर युद्धमें अभिमन्युको मारा था, उस समय तुम्हारे मनमें ऐसा विचार क्यों नहीं उत्पन्न हुआ? ॥ ५५ ॥
क्षत्रधर्मं भृशं क्रूरं निरपेक्षं सुनिर्घृणम् ।
अन्यथा तु कथं हन्युरभिमन्युं तथा गतम् ॥ ५६ ॥
सर्वे भवन्तो धर्मज्ञाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः ।
वास्तवमें क्षत्रियधर्म बड़ा ही क्रूर, किसीकी भी अपेक्षा न रखनेवाला तथा अत्यन्त निर्दय है; अन्यथा तुम सब लोग धर्मज्ञ, शूरवीर तथा युद्धमें शरीरका विसर्जन करनेको उद्यत रहनेवाले होकर भी उस असहाय-अवस्थामें अभिमन्युका वध कैसे कर सकते थे ॥ ५६ १/२ ॥
न्यायेन युध्यतां प्रोक्ता शक्रलोकगतिः परा ॥ ५७ ॥
यद्येकस्तु न हन्तव्यो बहुभिर्धर्म एव तु ।
तदाभिमन्युं बहवो निजघ्नुस्त्वन्मते कथम् ॥ ५८ ॥
न्यायपूर्वक युद्ध करनेवाले वीरोंके लिये परम उत्तम इन्द्रलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है। 'बहुत-से योद्धा मिलकर किसी एक वीरको न मारें' यदि यही धर्म है तो तुम्हारी सम्मतिसे अनेक महारथियोंने अभिमन्युका वध कैसे किया? ॥ ५८ ॥
सर्वो विमृशते जन्तुः कृच्छ्रस्थो धर्मदर्शनम् ।
पदस्थः पिहितं द्वारं परलोकस्य पश्यति ॥ ५९ ॥
प्रायः सभी प्राणी जब स्वयं संकटमें पड़ जाते हैं तो अपनी रक्षाके लिये धर्मशास्त्रकी दुहाई देने लगते हैं और जब अपने उच्च पदपर प्रतिष्ठित होते हैं, उस समय उन्हें परलोकका दरवाजा बंद दिखायी देता है ॥ ५९ ॥
आमुञ्च कवचं वीर मूर्धजान् यमयस्व च ।
यच्चान्यदपि ते नास्ति तदप्यादत्स्व भारत ॥ ६० ॥
वीर भरतनन्दन! तुम कवच धारण कर लो, अपने केशोंको अच्छी तरह बाँध लो तथा युद्धकी और कोई आवश्यक सामग्री जो तुम्हारे पास न हो, उसे भी ले लो ॥
इममेकं च ते कामं वीर भूयो ददाम्यहम् ।
पञ्चानां पाण्डवेयानां येन त्वं योद्धुमिच्छसि ॥ ६१ ॥
तं हत्वा वै भवान् राजा हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ।
ऋते च जीविताद् वीर युद्धे किं कर्म ते प्रियम् ॥ ६२ ॥
वीर! मैं पुनः तुम्हें एक अभीष्ट वर देता हूँ—'पाँचों पाण्डवोंमेंसे जिसके साथ युद्ध करना चाहो, उस एकका ही वध कर देनेपर तुम राजा हो सकते हो अथवा यदि स्वयं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे। शूरवीर! बताओ, युद्धमें जीवनकी रक्षाके सिवा तुम्हारा और कौन-सा प्रिय कार्य हम कर सकते हैं? ॥ ६१-६२ ॥
संजय उवाच
ततस्तव सुतो राजन् वर्म जग्राह काञ्चनम् ।
विचित्रं च शिरस्त्राणं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ॥ ६३ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर आपके पुत्रने सुवर्णमय कवच तथा स्वर्णजटित विचित्र शिरस्त्राण धारण किया ॥ ६३ ॥
सोऽवबद्धशिरस्त्राणः शुभकाञ्चनवर्मभृत् ।
रराज राजन् पुत्रस्ते काञ्चनः शैलराडिव ॥ ६४ ॥
महाराज! शिरस्त्राण बाँधकर सुन्दर सुवर्णमय कवच धारण करके आपका पुत्र स्वर्णमय गिरिराज मेरुके समान शोभा पाने लगा ॥ ६४ ॥
संनद्धः सगदो राजन् सज्जः संग्राममूर्धनि ।
अब्रवीत् पाण्डवान् सर्वान् पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ ६५ ॥
नरेश्वर! युद्धके मुहानेपर सुसज्जित हो कवच बाँधे और गदा हाथमें लिये आपके पुत्र दुर्योधनने समस्त पाण्डवोंसे कहा— ॥ ६५ ॥
भ्रातृणां भवतामेको युध्यतां गदया मया ।
सहदेवेन वा योत्स्ये भीमेन नकुलेन वा ॥ ६६ ॥
अथवा फाल्गुनेनाद्य त्वया वा भरतर्षभ ।
‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे भाइयोंमेंसे कोई एक मेरे साथ गदाद्वारा युद्ध करे। मैं सहदेव, नकुल, भीमसेन, अर्जुन अथवा स्वयं तुमसे भी युद्ध कर सकता हूँ ।। ६६ १/२ ।।
योत्स्येऽहं संगरं प्राप्य विजेष्ये च रणाजिरे ।। ६७ ।।
अहमद्य गमिष्यामि वैरस्यान्तं सुदुर्गमम् ।
गदया पुरुषव्याघ्र हेमपट्टनिबद्धया ।। ६८ ।।
‘रणक्षेत्रमें पहुँचकर मैं तुममेंसे किसी एकके साथ युद्ध करूँगा और मेरा विश्वास है कि समरांगणमें विजय पाऊँगा। पुरुषसिंह! आज मैं सुवर्णपत्रजटित गदाके द्वारा वैरके उस पार पहुँच जाऊँगा, जहाँ जाना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ।। ६७-६८ ।।
गदायुद्धे न मे कश्चित् सदृशोऽस्तीति चिन्तये ।
गदया वो हनिष्यामि सर्वानैव समागतान् ।। ६९ ।।
‘मैं इस बातको सदा याद रखता हूँ कि ‘गदायुद्धमें मेरी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है।’ गदाके द्वारा सामने आनेपर मैं तुम सभी लोगोंको मार डालूँगा ।। ६९ ।।
न मे समर्थाः सर्वे वै योद्धुं न्यायेन केचन ।
न युक्तमात्मना वक्तुमेवं गर्वोद्धतं वचः ।
अथवा सफलं ह्येतत् करिष्ये भवतां पुरः ।। ७० ।।
‘तुम सभी लोग अथवा तुममेंसे कोई भी मेरे साथ न्यायपूर्वक युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हो। मुझे स्वयं ही अपने विषयमें इस प्रकार गर्वसे उद्धत वचन नहीं कहना चाहिये, तथापि कहना पड़ा है अथवा कहनेकी क्या आवश्यकता? मैं तुम्हारे सामने ही यह सब सफल कर दिखाऊँगा ।। ७० ।।
अस्मिन् मुहूर्ते सत्यं वा मिथ्या वै तद् भविष्यति ।
गृह्णातु च गदां यो वै योत्स्यतेऽद्य मया सह ।। ७१ ।।
‘मेरा वचन सत्य है या मिथ्या, यह इसी मुहूर्तमें स्पष्ट हो जायगा। आज मेरे साथ जो भी युद्ध करनेको उद्यत हो, वह गदा उठावे’ ।। ७१ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि युधिष्ठिरदुर्योधनसंवादे द्वात्रिंशोऽध्यायः ।। ३२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें युधिष्ठिर और दुर्योधनका संवादविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३२ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2710)
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको फटकारना, भीमसेनकी प्रशंसा तथा भीम और दुर्योधनमें वाग्युद्ध
संजय उवाच
एवं दुर्योधने राजन् गर्जमाने मुहुर्मुहुः ।
युधिष्ठिरस्य संक्रुद्धो वासुदेवोऽब्रवीदिदम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जब यों कहकर दुर्योधन बारंबार गर्जना करने लगा, उस समय भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त कुपित होकर युधिष्ठिरसे बोले— ॥ १ ॥
यदि नाम ह्ययं युद्धे वरयेत् त्वां युधिष्ठिर ।
अर्जुनं नकुलं चैव सहदेवमथापि वा ॥ २ ॥
‘युधिष्ठिर! यदि यह दुर्योधन युद्धमें तुमको, अर्जुनको अथवा नकुल या सहदेवको ही युद्धके लिये वरण कर ले, तब क्या होगा? ॥ २ ॥
किमिदं साहसं राजंस्त्वया व्याहृतमीदृशम् ।
एकमेव निहत्याजौ भव राजा कुरुष्विति ॥ ३ ॥
‘राजन्! आपने क्यों ऐसी दुःसाहस पूर्ण बात कह डाली कि ‘तुम हममेंसे एकको ही मारकर कौरवोंका राजा हो जाओ' ॥ ३ ॥
न समर्थानिहं मन्ये गदाहस्तस्य संयुगे ।
एतेन हि कृता योग्या वर्षाणीह त्रयोदश ॥ ४ ॥
आयसे पुरुषे राजन् भीमसेनजिघांसया ।
‘मैं नहीं मानता कि आपलोग युद्धमें गदाधारी दुर्योधनका सामना करनेमें समर्थ हैं। राजन्! इसने भीमसेनका वध करनेकी इच्छासे उनकी लोहेकी मूर्तिके साथ तेरह वर्षोंतक गदायुद्धका अभ्यास किया है ॥ ४ ½ ॥
कथं नाम भवेत् कार्यमस्माभिर्भरतर्षभ ॥ ५ ॥
साहसं कृतवांस्त्वं तु ह्यनुक्रोशान्नृपोत्तम ।
‘भरतभूषण! अब हमलोग अपना कार्य कैसे सिद्ध कर सकते हैं? नृपश्रेष्ठ! आपने दयावश यह दुःसाहसपूर्ण कार्य कर डाला है ॥ ५ ½ ॥
नान्यमस्यानुपश्यामि प्रतियोद्धारमाहवे ॥ ६ ॥
ऋते वृकोदरात् पार्थात् स च नातिकृतश्रमः ।
‘मैं कुन्तीपुत्र भीमसेनके सिवा, दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो गदायुद्धमें दुर्योधनका सामना कर सके, परंतु भीमसेनने भी अधिक परिश्रम नहीं किया है ॥ ६ ½ ॥
तदिदं द्यूतमारब्धं पुनरेव यथा पुरा ।। ७ ।। विषमं शकुनेश्चैव तव चैव विशाम्पते । ‘इस समय आपने पहलेके समान ही पुनः यह जूएका खेल आरम्भ कर दिया है। प्रजानाथ! आपका यह जूआ शकुनिके जूएसे कहीं अधिक भयंकर है ।। ७ १/२ ।।
बली भीमः समर्थश्च कृती राजा सुयोधनः ।। ८ ।। बलवान् वा कृती वेति कृती राजन् विशिष्यते । ‘राजन्! माना कि भीमसेन बलवान् और समर्थ हैं, परंतु राजा दुर्योधनने अभ्यास अधिक किया है। एक ओर बलवान् हो और दूसरी ओर युद्धका अभ्यासी, तो उनमें युद्धका अभ्यास करनेवाला ही बड़ा माना जाता है ।। ८ १/२ ।।
सोऽयं राजंस्त्वया शत्रुः समे पथि निवेशितः ।। ९ ।। न्यस्तश्चात्मा सुविषमे कृच्छ्रमापादिता वयम् । ‘अतः महाराज! आपने अपने शत्रुको समान मार्गपर ला दिया है। अपने-आपको तो भारी संकटमें फँसाया ही है, हमलोगोंको भी भारी कठिनाईमें डाल दिया है ।। ९ १/२ ।।
को नु सर्वान् विनिर्जित्य शत्रूनेकेन वैरिणा ।। १० ।। कृच्छ्रप्राप्तेन च तथा हारयेद् राज्यमागतम् । पणित्वा चैकपाणेन रोचयेदेवमाहवम् ।। ११ ।। ‘भला कौन ऐसा होगा, जो सब शत्रुओंको जीत लेनेके बाद जब एक ही बाकी रह जाय और वह भी संकटमें पड़ा हो तो उसके साथ अपने हाथमें आये हुए राज्यको दाँवपर लगाकर हार जाय और इस प्रकार एकके साथ युद्ध करनेकी शर्त रखकर लड़ना पसंद करे? ।। १०-११ ।।
न हि पश्यामि तं लोके योऽद्य दुर्योधनं रणे । गदाहस्तं विजेतुं वै शक्तः स्यादमरोऽपि हि ।। १२ ।। ‘मैं संसारमें किसी भी शूरवीरको, वह देवता ही क्यों न हो, ऐसा नहीं देखता, जो आज रणभूमिमें गदाधारी दुर्योधनको परास्त करनेमें समर्थ हो ।। १२ ।।
न त्वं भीमो न नकुलः सहदेवोऽथ फाल्गुनः । जेतुं न्यायेन शक्तो वै कृती राजा सुयोधनः ।। १३ ।। ‘आप, भीमसेन, नकुल, सहदेव अथवा अर्जुन—कोई भी न्यायपूर्वक युद्ध करके दुर्योधनपर विजय नहीं पा सकते; क्योंकि राजा सुयोधनने गदायुद्धका अधिक अभ्यास किया है ।। १३ ।।
स कथं वदसे शत्रुं युध्यस्व गदयेति हि । एकं च नो निहत्याजौ भव राजेति भारत ।। १४ ।। ‘भारत! जब ऐसी अवस्था है, तब आपने अपने शत्रुसे कैसे यह कह दिया कि ‘तुम गदाद्वारा युद्ध करो और हममेंसे किसी एकको मारकर राजा हो जाओ’ ।। १४ ।।
वृकोदरं समासाद्य संशयो वै जये हि नः ।
न्यायतो युध्यमानानां कृती ह्येष महाबलः ॥ १५ ॥
‘भीमसेनपर युद्धका भार रखा जाय तो भी हमें विजय मिलनेमें संदेह है; क्योंकि न्यायपूर्वक युद्ध करनेवाले योद्धाओंमें महाबली सुयोधनका अभ्यास सबसे अधिक है ॥ १५ ॥
एकं वास्मान् निहत्य त्वं भव राजेति वै पुनः ।
नूनं न राज्यभागेषा पाण्डोः कुन्त्याश्च संततिः ॥ १६ ॥
अत्यन्तवनवासाय सृष्टा भैक्ष्याय वा पुनः ।
‘फिर भी आपने बारंबार कहा है कि ‘तुम हमलोगोंमेंसे एकको भी मारकर राजा हो जाओ।’ निश्चय ही राजा पाण्डु और कुन्तीदेवीकी संतान राज्य भोगनेकी अधिकारिणी नहीं है। विधाताने इसे अनन्त कालतक वनवास करने अथवा भीख माँगनेके लिये ही पैदा किया है’ ॥ १६ १/२ ॥
भीमसेन उवाच
मधुसूदन मा कार्षीर्विषादं यदुनन्दन ॥ १७ ॥
अद्य पारं गमिष्यामि वैरस्य भृशदुर्गमम् ।
यह सुनकर भीमसेन बोले—मधुसूदन! आप विषाद न करें। यदुनन्दन! मैं आज वैरकी उस अन्तिम सीमापर पहुँच जाऊँगा, जहाँ जाना दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ १७ १/२ ॥
अहं सुयोधनं संख्ये हनिष्यामि न संशयः ॥ १८ ॥
विजयो वै ध्रुवः कृष्ण धर्मराजस्य दृश्यते ।
श्रीकृष्ण! इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि मैं युद्धमें सुयोधनको मार डालूँगा। मुझे तो धर्मराजकी निश्चय ही विजय दिखायी देती है ॥ १८ १/२ ॥
अध्यर्धेन गुणेनेयं गदा गुरुतरी मम ॥ १९ ॥
न तथा धार्तराष्ट्रस्य मा कार्षीर्माधव व्यथाम् ।
अहमेनं हि गदया संयुगे योद्धुमुत्सहे ॥ २० ॥
मेरी यह गदा दुर्योधनकी गदासे डेढ़गुनी भारी है। ऐसी दुर्योधनकी गदा नहीं है, अतः माधव! आप व्यथित न हों। मैं समरांगणमें इस गदाद्वारा इससे भिड़नेका उत्साह रखता हूँ ॥ १९-२० ॥
भवन्तः प्रेक्षकाः सर्वे मम सन्तु जनार्दन ।
सामरानपि लोकांस्त्रीन् नानाशस्त्रधरान् युधि ॥ २१ ॥
योधयेयं रणे कृष्ण किमुताद्य सुयोधनम् ।
जनार्दन! आप सब लोग दर्शक बनकर मेरा युद्ध देखते रहें। श्रीकृष्ण! मैं रणक्षेत्रमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले देवताओंसहित तीनों लोकोंके साथ युद्ध कर सकता हूँ; फिर इस सुयोधनकी तो बात ही क्या है? ।।
संजय उवाच
तथा सम्भाषमाणं तु वासुदेवो वृकोदरम् ।। २२ ।। हृष्टः सम्पूजयामास वचनं चेदमब्रवीत् । संजय कहते हैं—महाराज! भीमसेनने जब ऐसी बात कही, तब भगवान् श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होकर उनकी प्रशंसा करने लगे और इस प्रकार बोले— ।। २२ १/२ ।। त्वामाश्रित्य महाबाहो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। २३ ।। निहतारिः स्वकां दीप्तां श्रियं प्राप्तो न संशयः । त्वया विनिहताः सर्वे धृतराष्ट्रसुता रणे ।। २४ ।। ‘महाबाहो! इसमें संदेह नहीं कि धर्मराज युधिष्ठिरने तुम्हारा आश्रय लेकर ही शत्रुओंका संहार करके पुनः अपनी उज्ज्वल राज्यलक्ष्मीको प्राप्त कर लिया है। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र तुम्हारे ही हाथसे युद्धमें मारे गये हैं ।। राजानो राजपुत्राश्च नागाश्च विनिपातिताः । कलिङ्गा मागधाः प्राच्या गान्धाराः कुरवस्तथा ।। २५ ।। त्वामासाद्य महायुद्धे निहताः पाण्डुनन्दन । ‘तुमने कितने ही राजाओं, राजकुमारों और गजराजोंको मार गिराया है। पाण्डुनन्दन! कलिंग, मगध, प्राच्य, गान्धार और कुरुदेशके योद्धा भी इस महायुद्धमें तुम्हारे सामने आकर कालके गालमें चले गये हैं ।। २५ १/२ ।। हत्वा दुर्योधनं चापि प्रयच्छोर्वीं ससागराम् ।। २६ ।। धर्मराजाय कौन्तेय यथा विष्णुः शचीपतेः । ‘कुन्तीकुमार! जैसे भगवान् विष्णुने शचीपति इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य प्रदान किया था, उसी प्रकार तुम भी दुर्योधनका वध करके समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी धर्मराज युधिष्ठिरको समर्पित कर दो ।। २६ १/२ ।। त्वां च प्राप्य रणे पापो धार्तराष्ट्रो विनङ्क्ष्यति ।। २७ ।। त्वमस्य सक्थिनी भङ्क्त्वा प्रतिज्ञां पालयिष्यसि । ‘अवश्य ही रणभूमिमें तुमसे टक्कर लेकर पापी दुर्योधन नष्ट हो जायगा और तुम उसकी दोनों जाँघें तोड़कर अपनी प्रतिज्ञाका पालन करोगे ।। २७ १/२ ।। यत्नेन तु सदा पार्थ योद्धव्यो धृतराष्ट्रजः ।। २८ ।। कृती च बलवांश्चैव युद्धशौण्डश्च नित्यदा ।
‘किंतु पार्थ! तुम्हें दुर्योधनके साथ सदा प्रयत्नपूर्वक युद्ध करना चाहिये; क्योंकि वह अभ्यासकुशल, बलवान् और युद्धकी कलामें निरन्तर चतुर है’॥ २८ १/२ ॥ ततस्तु सात्यकी राजन् पूजयामास पाण्डवम् ॥ २९ ॥ पञ्चालाः पाण्डवेयाश्च धर्मराजपुरोगमाः । तद् वचो भीमसेनस्य सर्व एवाभ्यपूजयन् ॥ ३० ॥ राजन्! तदनन्तर सात्यकिने पाण्डुपुत्र भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। धर्मराज आदि पाण्डव तथा पांचाल सभीने भीमसेनके उस वचनका बड़ा आदर किया॥ २९-३०॥ ततो भीमबलो भीमो युधिष्ठिरमथाब्रवीत् । सृञ्जयैः सह तिष्ठन्तं तपन्तमिव भास्करम् ॥ ३१ ॥ तदनन्तर भयंकर बलशाली भीमसेनने सृञ्जयोंके साथ खड़े हुए तपते सूर्यके समान तेजस्वी युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ३१ ॥ अहमेतेन संगम्य संयुगे योद्धुमुत्सहे । न हि शक्तो रणे जेतुं मामेष पुरुषाधमः ॥ ३२ ॥ ‘भैया! मैं रणभूमिमें इस दुर्योधनके साथ भिड़कर लड़नेका उत्साह रखता हूँ। यह नराधम मुझे युद्धमें परास्त नहीं कर सकता॥ ३२॥ अद्य क्रोधं विमोक्ष्यामि निहितं हृदये भृशम् । सुयोधने धार्तराष्ट्रे खाण्डवेऽग्निमिवार्जुनः ॥ ३३ ॥ ‘मेरे हृदयमें दीर्घकालसे जो अत्यन्त क्रोध संचित है, उसे आज मैं धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनपर उसी प्रकार छोड़ूँगा, जैसे अर्जुनने खाण्डव वनमें अग्निदेवको छोड़ा था॥ ३३॥ शल्यमद्योद्धरिष्यामि तव पाण्डव हृच्छयम् । निहत्य गदया पापमद्य राजन् सुखी भव ॥ ३४ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! नरेश! आज मैं गदाद्वारा पापी दुर्योधनका वध करके आपके हृदयका काँटा निकाल दूँगा; अतः आप सुखी होइये॥ ३४॥ अद्य कीर्तिमयीं मालां प्रतिमोक्ष्ये तवानघ । प्राणाम् श्रियं च राज्यं च मोक्ष्यतेऽद्य सुयोधनः ॥ ३५ ॥ ‘अनघ! आज आपके गलेमें मैं कीर्तिमयी माला पहनाऊँगा तथा आज यह दुर्योधन अपने राज्यलक्ष्मी और प्राणोंका परित्याग करेगा॥ ३५॥ राजा च धृतराष्ट्रोऽद्य श्रुत्वा पुत्रं मया हतम् । स्मरिष्यत्यशुभं कर्म यत् तच्छकुनिबुद्धिजम् ॥ ३६ ॥ ‘आज मेरे हाथसे पुत्रको मारा गया सुनकर राजा धृतराष्ट्र शकुनिकी सलाहसे किये हुए अपने अशुभ कर्मोंको याद करेंगे’॥ ३६॥
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठो गदामुद्यम्य वीर्यवान् । उदतिष्ठत युद्धाय शक्रो वृत्रमिवाह्वयन् ॥ ३७ ॥ ऐसा कहकर भरतवंशी वीरोंमें श्रेष्ठ पराक्रमी भीमसेन गदा उठाकर युद्धके लिये उठ खड़े हुए और जैसे इन्द्रने वृत्रासुरको ललकारा था, उसी प्रकार उन्होंने दुर्योधनका आह्वान किया ॥ ३७ ॥
तदाह्वानममृष्यन् वै तव पुत्रोऽतिवीर्यवान् । प्रत्युपस्थित एवाशु मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥ ३८ ॥ महाराज! उस समय आपका अत्यन्त पराक्रमी पुत्र दुर्योधन भीमसेनकी उस ललकारको न सह सका। वह तुरंत ही उनका सामना करनेके लिये उपस्थित हो गया, मानो एक मतवाला हाथी दूसरे मदोन्मत्त गजराजसे भिड़नेको उद्यत हो गया हो ॥ ३८ ॥
गदाहस्तं तव सुतं युद्धाय समुपस्थितम् । ददृशुः पाण्डवाः सर्वे कैलासमिव शृङ्गिणम् ॥ ३९ ॥ हाथमें गदा लेकर युद्धके लिये उपस्थित हुए आपके पुत्रको समस्त पाण्डवोंने शृंगधारी कैलासपर्वतके समान देखा ॥ ३९ ॥
तमेकाकिनमासाद्य धार्तराष्ट्रं महाबलम् । वियूथमिव मातङ्गं समहृष्यन्त पाण्डवाः ॥ ४० ॥ जैसे कोई मतवाला हाथी अपने यूथसे बिछुड़ गया हो, उसी प्रकार अकेले आये हुए आपके महाबली पुत्र दुर्योधनको पाकर समस्त पाण्डव हर्षसे खिल उठे ॥ ४० ॥
न सम्भ्रमो न च भयं न च ग्लानिर्न च व्यथा । आसीद् दुर्योधनस्यापि स्थितः सिंह इवाहवे ॥ ४१ ॥ उस समय दुर्योधनके मनमें न घबराहट थी, न भय। न ग्लानि थी, न व्यथा। वह युद्धस्थलमें सिंहके समान निर्भय खड़ा था ॥ ४१ ॥
समुद्यतगदं दृष्ट्वा कैलासमिव शृङ्गिणम् । भीमसेनस्तदा राजन् दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥ ४२ ॥ राजन्! शृंगधारी कैलासपर्वतके समान गदा उठाये दुर्योधनको देखकर भीमसेनने उससे कहा— ॥ ४२ ॥
राज्ञापि धृतराष्ट्रेण त्वया चास्मासु यत् कृतम् । स्मर तद् दुष्कृतं कर्म यद् भूतं वारणावते ॥ ४३ ॥ 'दुर्योधन! तूने तथा राजा धृतराष्ट्रने भी हमलोगोंपर जो-जो अत्याचार किया था और वारणावत नगरमें जो कुछ हुआ था, उन सारे पापकर्मोंको याद कर ले ॥ ४३ ॥
द्रौपदी च परिक्लिष्टा सभामध्ये रजस्वला । द्यूते यद् विजितो राजा शकुनेर्बुद्धिनिश्चयात् ॥ ४४ ॥ यानि चान्यानि दुष्टात्मन् पापानि कृतवानसि ।
अनागःसु च पार्थेषु तस्य पश्य महत् फलम् ॥ ४५ ॥
‘दुरात्मन्! तूने भरी सभामें रजस्वला द्रौपदीको क्लेश पहुँचाया, शकुनिकी सलाह लेकर राजा युधिष्ठिरको कपटपूर्वक जूएमिं हराया तथा निरपराध कुन्तीपुत्रोंपर दूसरे-दूसरे जो पाप एवं अत्याचार किये थे, उन सबका महान् अशुभ फल आज तू अपनी आँखों देख ले ॥ ४४-४५ ॥
त्वत्कृते निहतः शेते शरतल्पे महायशाः ।
गाङ्गेयो भरतश्रेष्ठः सर्वेषां नः पितामहः ॥ ४६ ॥
‘तेरे ही कारण हम सब लोगोंके पितामह महायशस्वी गङ्गानन्दन भरतश्रेष्ठ भीष्मजी आज शरशय्यापर पड़े हुए हैं ॥ ४६ ॥
हतो द्रोणश्च कर्णश्च हतः शल्यः प्रतापवान् ।
वैरस्य चादिकर्त्तासौ शकुनिर्निहतो रणे ॥ ४७ ॥
‘तेरी ही करतूतोंसे आचार्य द्रोण, कर्ण, प्रतापी शल्य तथा वैरका आदिस्रष्टा वह शकुनि—ये सभी रणभूमिमें मारे गये हैं ॥ ४७ ॥
भ्रातरस्ते हताः शूराः पुत्राश्च सहसैनिकाः ।
राजानश्च हताः शूराः समरेष्वनिवर्तिनः ॥ ४८ ॥
‘तेरे भाई, शूरवीर पुत्र, सैनिक तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाले अन्य बहुत-से शौर्यसम्पन्न नरेश भी मृत्युके अधीन हो गये हैं ॥ ४८ ॥
एते चान्ये च निहता बहवः क्षत्रियर्षभाः ।
प्रातिकामी तथा पापो द्रौपद्याः क्लेशकृद्धतः ॥ ४९ ॥
‘ये तथा दूसरे बहुसंख्यक क्षत्रियशिरोमणि वीर मार डाले गये हैं। द्रौपदीको क्लेश पहुँचानेवाले पापी प्रातिकामीका भी वध हो चुका है ॥ ४९ ॥
अवशिष्टस्त्वमेवैकः कुलघ्नोऽधमपूरुषः ।
त्वामप्यद्य हनिष्यामि गदया नात्र संशयः ॥ ५० ॥
‘अब इस वंशका नाश करनेवाला नराधम एकमात्र तू ही बच गया है। आज इस गदासे तुझे भी मार डालूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ ५० ॥
अद्य तेऽहं रणे दर्पं सर्वं नाशयिता नृप ।
राज्याशां विपुलां राजन् पाण्डवेषु च दुष्कृतम् ॥ ५१ ॥
‘नरेश्वर! आज रणभूमिमें मैं तेरा सारा घमंड चूर्ण कर दूँगा। राजन्! तेरे मनमें राज्य पानेकी जो बड़ी भारी लालसा है, उसका तथा पाण्डवोंपर तेरे द्वारा किये जानेवाले अत्याचारोंका भी अन्त कर डालूँगा’ ॥ ५१ ॥
दुर्योधन उवाच
किं कथित्तेन बहुना युद्ध्यस्वाद्य मया सह ।
अद्य तेऽहं विनेष्यामि युद्धश्रद्धां वृकोदर ॥ ५२ ॥ **दुर्योधन बोला—**वृकोदर! बहुत बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे क्या लाभ? आज मेरे साथ भिड़ तो सही। मैं युद्धका तेरा सारा हौसला मिटा दूँगा ॥ ५२ ॥ किं न पश्यसि मां पाप गदायुद्धे व्यवस्थितम् । हिमवच्छिखराकारां प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ ५३ ॥ पापी! क्या तू देखता नहीं कि मैं हिमालयके शिखरकी भाँति विशाल गदा हाथमें लेकर युद्धके लिये खड़ा हूँ ॥ ५३ ॥ गदिनं कोऽद्य मां पाप हन्तुमुत्सहते रिपुः । न्यायतो युध्यमानश्च देवेष्वपि पुरन्दरः ॥ ५४ ॥ ओ पापी! आज कौन ऐसा शत्रु है, जो मेरे हाथमें गदा रहते हुए भी मुझे मार सके। न्यायपूर्वक युद्ध करते हुए देवताओंके राजा इन्द्र भी मुझे परास्त नहीं कर सकते ॥ ५४ ॥ मा वृथा गर्ज कौन्तेय शारदाभ्रमिवाजलम् । दर्शयस्व बलं युद्धे यावत् तत् तेऽद्य विद्यते ॥ ५५ ॥ कुन्तीपुत्र! शरद्-ऋतुके निर्जल मेघकी भाँति व्यर्थ गर्जना न कर। आज तेरे पास जितना बल हो, वह सब युद्धमें दिखा ॥ ५५ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा पाण्डवाः सहसृञ्जयाः । सर्वे सम्पूजयामासुस्तद्वचो विजिगीषवः ॥ ५६ ॥ दुर्योधनका यह वचन सुनकर विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त पाण्डवों और सृञ्जयोंने भी उसकी बड़ी सराहना की ॥ ५६ ॥ उन्मत्तमिव मातङ्गं तलशब्देन मानवाः । भूयः संहर्षयामासू राजन् दुर्योधनं नृपम् ॥ ५७ ॥ राजन्! जैसे मतवाले हाथीको मनुष्य ताली बजाकर कुपित कर देते हैं, उसी प्रकार उन्होंने बारंबार ताल ठोककर राजा दुर्योधनके युद्धविषयक हर्ष और उत्साहको बढ़ाया ॥ ५७ ॥ बृंहन्ति कुञ्जरास्तत्र हया हेषन्ति चासकृत् । शस्त्राणि सम्प्रदीप्यन्ते पाण्डवानां जयैषिणाम् ॥ ५८ ॥ उस समय वहाँ विजयाभिलाषी पाण्डवोंके हाथी बारंबार चिग्घाड़ने और घोड़े हिनहिनाने लगे। साथ ही उनके अस्त्र-शस्त्र दीप्तिसे प्रकाशित हो उठे ॥ ५८ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि भीमसेनदुर्योधनसंवादे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें भीमसेन और दुर्योधनका संवादविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
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अध्याय (पृष्ठ 2719)
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
बलरामजीका आगमन और स्वागत तथा भीमसेन और दुर्योधनके युद्धका आरम्भ
संजय उवाच
तस्मिन् युद्धे महाराज सुसंवृत्ते सुदारुणे ।
उपविष्टेषु सर्वेषु पाण्डवेषु महात्मसु ॥ १ ॥
ततस्तालध्वजो रामस्तयोर्युद्ध उपस्थिते ।
श्रुत्वा तच्छिष्ययो राजन्नाजगाम हलायुधः ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! वह अत्यन्त भयंकर युद्ध जब आरम्भ होने लगा और समस्त महात्मा पाण्डव उसे देखनेके लिये बैठ गये, उस समय अपने दोनों शिष्योंका संग्राम उपस्थित होनेपर उसका समाचार सुन तालचिह्नित ध्वजवाले हलधारी बलरामजी वहाँ आ पहुँचे ॥ १-२ ॥
तं दृष्ट्वा परमप्रीताः पाण्डवाः सहकेशवाः ।
उपगम्योपसंगृह्य विधिवत् प्रत्यपूजयन् ॥ ३ ॥
उन्हें देखकर श्रीकृष्णसहित पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने निकट जाकर उनका चरणस्पर्श किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा की ॥ ३ ॥
पूजयित्वा ततः पश्चादिदं वचनमब्रुवन् ।
शिष्ययोः कौशलं युद्धे पश्य रामेति पार्थिव ॥ ४ ॥
राजन्! पूजनके पश्चात् उन्होंने इस प्रकार कहा—'बलरामजी! अपने दोनों शिष्योंका युद्धकौशल देखिये' ॥ ४ ॥
अब्रवीच्च तदा रामो दृष्ट्वा कृष्णं सपाण्डवम् ।
दुर्योधनं च कौरव्यं गदापाणिमवस्थितम् ॥ ५ ॥
चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च मे निःसृतस्य वै ।
पुष्येण सम्प्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः ॥ ६ ॥
शिष्ययोर्वै गदायुद्धं द्रष्टुकामोऽस्मि माधव ।
उस समय बलरामजीने श्रीकृष्ण, पाण्डव तथा हाथमें गदा लेकर खड़े हुए कुरुवंशी दुर्योधनकी ओर देखकर कहा—'माधव! तीर्थयात्राके लिये निकले हुए आज मुझे बयालीस दिन हो गये। पुष्य नक्षत्रमें चला था और श्रवण नक्षत्रमें पुनः वापस आया हूँ। मैं अपने दोनों शिष्योंका गदायुद्ध देखना चाहता हूँ' ॥ ५-६½ ॥
ततस्तदा गदाहस्तौ दुर्योधनवृकोदरौ ॥ ७ ॥
युद्धभूमिं गतौ वीरावुभावेव रराजतुः । तदनन्तर गदा हाथमें लेकर दुर्योधन और भीमसेन युद्ध-भूमिमें उतरे। वे दोनों ही वीर वहाँ बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ७ १/२ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा परिष्वज्य हलायुधम् ।। ८ ।। स्वागतं कुशलं चास्मै पर्यपृच्छद् यथातथम् । उस समय राजा युधिष्ठिरने बलरामजीको हृदयसे लगाकर उनका स्वागत किया और यथोचितरूपसे उनका कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ १/२ ॥
कृष्णौ चापि महेष्वासावभिवाद्य हलायुधम् ।। ९ ।। सस्वजाते परिप्रीतौ प्रीयमाणौ यशस्विनौ । यशस्वी महाधनुर्धर श्रीकृष्ण और अर्जुन भी बलरामजीको प्रणाम करके अत्यन्त प्रसन्न हो प्रेमपूर्वक उनके हृदयसे लग गये ॥ ९ १/२ ॥
माद्रीपुत्रौ तथा शूरौ द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ।। १० ।। अभिवाद्य स्थिता राजन् रौहिणेयं महाबलम् । राजन्! माद्रीके दोनों शूरवीर पुत्र नकुल-सहदेव और द्रौपदीके पाँचों पुत्र भी रोहिणीनन्दन महाबली बलरामजीको प्रणाम करके उनके पास विनीतभावसे खड़े हो गये ।।
भीमसेनोऽथ बलवान् पुत्रस्तव जनाधिप ।। ११ ।। तथैव चोद्यतगदौ पूजयामासुर्बलम् । नरेश्वर! भीमसेन और आपका बलवान् पुत्र दुर्योधन इन दोनोंने गदाको ऊँचे उठाकर बलरामजीके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया ॥ ११ १/२ ॥
स्वागतेन च ते तत्र प्रतिपूज्य समन्ततः ।। १२ ।। पश्य युद्धं महाबाहो इति ते राममब्रुवन् । एवमूचुर्महात्मानं रौहिणेयं नराधिपाः ।। १३ ।। वे सब नरेश सब ओरसे स्वागतपूर्वक समादर करके वहाँ महात्मा रोहिणीपुत्र बलरामजीसे बोले—‘महाबाहो! युद्ध देखिये’ ॥ १२-१३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2721)
पाण्डवोंद्वारा बलरामजीकी पूजा
परिष्वज्य तदा रामः पाण्डवान् सहसृञ्जयान् । अपृच्छत् कुशलं सर्वान् पार्थिवांश्चामितौजसः ॥ १४ ॥ उस समय बलरामजीने पाण्डवों, सृंजयों तथा अमित बलशाली सम्पूर्ण भूपालोंको हृदयसे लगाकर उनका कुशल-मंगल पूछा ॥ १४ ॥
तथैव ते समासाद्य पप्रच्छुस्तमनामयम् । प्रत्यभ्यर्च्य हली सर्वान् क्षत्रियांश्च महात्मनः ॥ १५ ॥ कृत्वा कुशलसंयुक्तां संविदं च यथावयः । जनार्दनं सात्यकिं च प्रेम्णा स परिषस्वजे ॥ १६ ॥ उसी प्रकार वे राजा भी उनसे मिलकर उनके आरोग्यका समाचार पूछने लगे। हलधरने सम्पूर्ण महामनस्वी क्षत्रियोंका समादर करके अवस्थाके अनुसार क्रमशः उनसे कुशल-मंगलकी जिज्ञासा की और श्रीकृष्ण तथा सात्यकिको प्रेमपूर्वक छातीसे लगा लिया ॥
मूर्ध्नि चैतावुपाघ्राय कुशलं पर्यपृच्छत । तौ च तं विधिवद् राजन् पूजयामासतुर्गुरुम् ॥ १७ ॥ ब्रह्माणमिव देवेशमिन्द्रोपेन्द्रौ मुदान्वितौ । राजन्! इन दोनोंका मस्तक सूंघकर उन्होंने कुशल-समाचार पूछा और उन दोनोंने भी अपने गुरुजन बलरामजीका विधिपूर्वक पूजन किया। ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्र और उपेन्द्रने प्रसन्नतापूर्वक देवेश्वर ब्रह्माजीकी पूजा की थी ॥ १७ १/२ ॥
ततोऽब्रवीद् धर्मसुतो रौहिणेयमरिंदमम् ॥ १८ ॥ इदं भ्रात्रोर्महायुद्धं पश्य रामेति भारत । भारत! तत्पश्चात् धर्मपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुदमन रोहिणीकुमारसे कहा—'बलरामजी! दोनों भाइयोंका यह महान् युद्ध देखिये' ॥ १८ १/२ ॥
तेषां मध्ये महाबाहुः श्रीमान् केशवपूर्वजः ॥ १९ ॥ न्यविशत् परमप्रीतः पूज्यमानो महारथैः । उनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णके बड़े भ्राता महाबाहु बलवान् श्रीबलरामजी उन महारथियोंसे पूजित हो उनके बीचमें अत्यन्त प्रसन्न होकर बैठे ॥ १९ १/२ ॥
स बभौ राजमध्यस्थो नीलवासाः सितप्रभः ॥ २० ॥ दिवीव नक्षत्रगणैः परिकीर्णो निशाकरः । राजाओंके मध्यभागमें बैठे हुए नीलाम्बरधारी गौरकान्ति बलरामजी आकाशमें नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे ॥ २० १/२ ॥
ततस्तयोः संनिपातस्तुमुलो लोमहर्षणः ॥ २१ ॥ आसीदन्तकरो राजन् वैरस्य तव पुत्रयोः ॥ २२ ॥ राजन्! तदनन्तर आपके उन दोनों पुत्रोंमें वैरका अन्त कर देनेवाला भयंकर एवं रोमांचकारी संग्राम होने लगा ॥ २१-२२ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवागमने चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलरामजीका आगमनविषयक
चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४ ।।
बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा
जनमेजय उवाच
पूर्वमेव यदा रामस्तस्मिन् युद्ध उपस्थिते ।
आमन्त्र्य केशवं यातो वृष्णिभिः सहितः प्रभुः ॥ १ ॥
साहाय्यं धार्तराष्ट्रस्य न च कर्तास्मि केशव ।
न चैव पाण्डुपुत्राणां गमिष्यामि यथागतम् ॥ २ ॥
जनमेजयने कहा—ब्रह्मन्! जब महाभारतयुद्ध आरम्भ होनेका समय निकट आ गया, उस समय युद्ध प्रारम्भ होनेसे पहले ही भगवान् बलराम श्रीकृष्णकी सम्मति ले, अन्य वृष्णिवंशियोंके साथ तीर्थयात्राके लिये चले गये और जाते समय यह कह गये कि 'केशव! मैं न तो धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनकी सहायता करूँगा और न पाण्डवोंकी ही' ॥ १-२ ॥
एवमुक्त्वा तदा रामो यातः क्षत्रनिबर्हणः ।
तस्य चागमनं भूयो ब्रह्मन् शंसितुमर्हसि ॥ ३ ॥
विप्रवर! उन दिनों ऐसी बात कहकर जब क्षत्रियसंहारक बलरामजी चले गये, तब उनका पुनः आगमन कैसे हुआ, यह बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥
आख्याहि मे विस्तरशः कथं राम उपस्थितः ।
कथं च दृष्टवान् युद्धं कुशलो ह्यसि सत्तम ॥ ४ ॥
साधुशिरोमणे! आप कथा कहनेमें कुशल हैं; अतः मुझे विस्तारपूर्वक बताइये कि बलरामजी कैसे वहाँ उपस्थित हुए और किस प्रकार उन्होंने युद्ध देखा? ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
उपप्लव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
प्रेषितो धृतराष्ट्रस्य समीपं मधुसूदनः ॥ ५ ॥
शमं प्रति महाबाहो हितार्थं सर्वदेहिनाम् ।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! जिन दिनों महामनस्वी पाण्डव उपप्लव्य नामक स्थानमें छावनी डालकर ठहरे हुए थे, उन्हीं दिनोंकी बात है। महाबाहो! पाण्डवोंने समस्त प्राणियोंके हितके लिये सन्धिके उद्देश्यसे भगवान् श्रीकृष्णको धृतराष्ट्रके पास भेजा ॥ ५ १/२ ॥
स गत्वा हास्तिनपुरं धृतराष्ट्रं समेत्य च ॥ ६ ॥
उक्तवान् वचनं तथ्यं हितं चैव विशेषतः ।
भगवान्ने हस्तिनापुर जाकर धृतराष्ट्रसे भेंट की और उनसे सबके लिये विशेष हितकारक एवं यथार्थ बातें कहीं॥ ६ १/२ ॥
न च तत् कृतवान् राजा यथा ख्यातं हि तत् पुरा ॥ ७ ॥
अनवाप्य शमं तत्र कृष्णः पुरुषसत्तमः ।
आगच्छत महाबाहुरुपप्लव्यं जनाधिप ॥ ८ ॥
नरेश्वर! किंतु राजा धृतराष्ट्रने भगवान्का कहना नहीं माना। यह सब बात पहले यथार्थरूपसे बतायी गयी है। महाबाहु पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ संधि करानेमें सफलता न मिलनेपर पुनः उपप्लव्यमें ही लौट आये ॥ ७-८ ॥
ततः प्रत्यागतः कृष्णो धार्तराष्ट्रविसर्जितः ।
अक्रियायां नरव्याघ्र पाण्डवानिदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
नरव्याघ्र! कार्य न होनेपर धृतराष्ट्रसे विदा ले वहाँसे लौटे हुए श्रीकृष्णने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥
न कुर्वन्ति वचो मह्यं कुरवः कालनोदिताः ।
निर्गच्छध्वं पाण्डवेयाः पुष्येण सहिता मया ॥ १० ॥
‘कौरव कालके अधीन हो रहे हैं, इसलिये वे मेरा कहना नहीं मानते हैं। पाण्डवो! अब तुमलोग मेरे साथ पुष्य नक्षत्रमें युद्धके लिये निकल पड़ो, ॥ १० ॥
ततो विभज्यमानेषु बलेषु बलिनां वरः ।
प्रोवाच भ्रातरं कृष्णं रौहिणेयो महामनाः ॥ ११ ॥
इसके बाद जब सेनाका बँटवारा होने लगा, तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महामना बलदेवजीने अपने भाई श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ११ ॥
तेषामपि महाबाहो साहाय्यं मधुसूदन ।
क्रियतामिति तत् कृष्णो नास्य चक्रे वचस्तदा ॥ १२ ॥
‘महाबाहु मधुसूदन! उन कौरवोंकी भी सहायता करना। परंतु श्रीकृष्णने उस समय उनकी यह बात नहीं मानी’ ॥ १२ ॥
ततो मन्युपरीतात्मा जगाम यदुनन्दनः ।
तीर्थयात्रां हलधरः सरस्वत्यां महायशाः ॥ १३ ॥
इससे मन-ही-मन कुपित और खिन्न होकर महायशस्वी यदुनन्दन हलधर सरस्वतीके तटपर तीर्थयात्राके लिये चल दिये ॥ १३ ॥
मैत्रनक्षत्रयोगे स्म सहितः सर्वयादवैः ।
आश्रयामास भोजस्तु दुर्योधनमरिंदमः ॥ १४ ॥
इसके बाद शत्रुओंका दमन करनेवाले कृतवर्माने सम्पूर्ण यादवोंके साथ अनुराधानक्षत्रमें दुर्योधनका पक्ष ग्रहण किया ॥ १४ ॥
युयुधानेन सहितो वासुदेवस्तु पाण्डवान् ।
रौहिणेये गते शूरे पुष्येण मधुसूदनः ।। १५ ।।
पाण्डवेयान् पुरस्कृत्य ययावभिमुखः कुरून् ।
सात्यकिसहित भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंका पक्ष लिया। रोहिणीनन्दन शूरवीर बलरामजीके चले जानेपर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंको आगे करके पुष्यनक्षत्रमें कुरुक्षेत्रकी ओर प्रस्थान किया ।। १५ १/२ ।।
गच्छन्नेव पथिस्थस्तु रामः प्रेष्यानुवाच ह ।। १६ ।।
सम्भारांस्तीर्थयात्रायां सर्वोपकरणानि च ।
आनयध्वं द्वारकायामग्नीन् वै याजकांस्तथा ।। १७ ।।
यात्रा करते हुए बलरामजीने स्वयं मार्गमें ही रहकर अपने सेवकोंसे कहा—'तुमलोग शीघ्र ही द्वारका जाकर वहाँसे तीर्थयात्रामें काम आनेवाली सब सामग्री, समस्त आवश्यक उपकरण, अग्निहोत्रकी अग्नि तथा पुरोहितोंको ले आओ ।। १६-१७ ।।
सुवर्णं रजतं चैव धेनूर्वासांसि वाजिनः ।
कुञ्जरांश्च रथांश्चैव खरोष्ट्रं वाहनानि च ।। १८ ।।
क्षिप्रमानीयतां सर्वं तीर्थहेतोः परिच्छदम् ।
'सोना, चाँदी, दूध देनेवाली गायें, वस्त्र, घोड़े, हाथी, रथ, गदहा और ऊँट आदि वाहन एवं तीर्थोपयोगी सब सामान शीघ्र ले आओ ।। १८ १/२ ।।
प्रतिस्रोतः सरस्वत्या गच्छध्वं शीघ्रगामिनः ।। १९ ।।
ऋत्विजश्चानयध्वं वै शतशश्च द्विजर्षभान् ।
'शीघ्रगामी सेवको! तुम सरस्वतीके स्रोतकी ओर चलो और सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा ऋत्विजोंको ले आओ' ।।
एवं संदिश्य तु प्रेष्यान् बलदेवो महाबलः ।। २० ।।
तीर्थयात्रां ययौ राजन् कुरूणां वैशसे तदा ।
सरस्वतीं प्रतिस्रोतः समन्तादभिजग्मिवान् ।। २१ ।।
ऋत्विग्भिश्च सुहृद्भिश्च तथान्यैर्द्विजसत्तमैः ।
रथैर्गजैस्तथाश्वैश्च प्रेष्यैश्च भरतर्षभ ।। २२ ।।
गोखरोष्ट्रप्रयुक्तैश्च यानैश्च बहुभिर्वृतः ।
राजन्! महाबली बलदेवजीने सेवकोंको ऐसी आज्ञा देकर उस समय कुरुक्षेत्रमें ही तीर्थयात्रा आरम्भ कर दी। भरतश्रेष्ठ! वे सरस्वतीके स्रोतकी ओर चलकर उसके दोनों तटोंपर गये। उनके साथ ऋत्विज, सुहृद्, अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मण, रथ, हाथी, घोड़े और सेवक भी थे। बैल, गदहा और ऊँटोंसे जुते हुए बहुसंख्यक रथोंसे बलरामजी घिरे हुए थे ।। २०—२२ १/२ ।।
श्रान्तानां क्लान्तवपुषां शिशूनां विपुलायुषाम् ।। २३ ।।
देशे देशे तु देयानि दानानि विविधानि च ।