महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
हतोऽपि लभते स्वर्गं हत्वा च लभते यशः । उभयं नो बहुगुणं नास्ति निष्फलता रणे ॥ १४ ॥ युद्धमें जो मारा जाता है, वह स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है और जो शत्रुको मारता है, उसे यशकी प्राप्ति होती है। ये दोनों ही अवस्थाएँ हमलोगोंके लिये बहुत लाभदायक हैं। युद्धमें निष्फलता तो है ही नहीं ॥ १४ ॥
तेषां कामदुघाँल्लोकानिन्द्रः संकल्पयिष्यति । इन्द्रस्यातिथयो ह्येते भवन्ति भरतर्षभ ॥ १५ ॥ भरतश्रेष्ठ! इन्द्र उन वीरोंके लिये इच्छानुसार भोग प्रदान करनेवाले लोकोंकी व्यवस्था करेंगे। वे सब-के-सब इन्द्रके अतिथि होंगे ॥ १५ ॥
न यज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्न तपोभिर्न विद्यया । स्वर्गं यान्ति तथा मर्त्या यथा शूरा रणे हताः ॥ १६ ॥ युद्धमें मारे गये शूरवीर जितनी सुगमतासे स्वर्गलोकमें जाते हैं, उतनी सुविधासे मनुष्य प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ, तपस्या और विद्याद्वारा भी नहीं जा सकते ॥ १६ ॥
शरीराग्निषु शूराणां जुहुवुस्ते शराहुतीः । हूयमानान् शराँश्चैव सेहुस्तेजस्विनो मिथः ॥ १७ ॥ शूरवीरोंके शरीररूपी अग्नियोंमें उन्होंने बाणोंकी आहुतियाँ दी हैं और उन तेजस्वी वीरोंने एक-दूसरेकी शरीराग्नियोंमें होम किये जानेवाले बाणोंको सहन किया है ॥ १७ ॥
एवं राजंस्तवाचक्षे स्वर्ग्यं पन्थानमुत्तमम् । न युद्धादधिकं किंचित् क्षत्रियस्येह विद्यते ॥ १८ ॥ राजन्! इसलिये मैं आपसे कहता हूँ कि क्षत्रियके लिये इस जगत्में धर्मयुद्धसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्ग-प्राप्तिका उत्तम मार्ग नहीं है ॥ १८ ॥
क्षत्रियास्ते महात्मानः शूराः समितिशोभनाः । आशिषः परमाः प्राप्ता न शोच्याः सर्व एव हि ॥ १९ ॥ वे महामनस्वी वीर क्षत्रिय युद्धमें शोभा पानेवाले थे, अतः उन्होंने अपनी कामनाओंके अनुरूप उत्तम लोक प्राप्त किये हैं। उन सबके लिये शोक करना तो किसी प्रकार उचित ही नहीं है ॥ १९ ॥
आत्मानमात्मनाऽऽश्वास्य मा शुचः पुरुषर्षभ । नाद्य शोकाभिभूतस्त्वं कायमुत्स्रष्टुमर्हसि ॥ २० ॥ पुरुषप्रवर! आप स्वयं ही अपने मनको सान्त्वना देकर शोकका परित्याग कीजिये। आज शोकसे व्याकुल होकर आपको अपने शरीरका त्याग नहीं करना चाहिये ॥
मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च । संसारेष्वनुभूतानि कस्य ते कस्य वा वयम् ॥ २१ ॥
हमलोगोंने बारंबार संसारमें जन्म लेकर सहस्रों माता-पिता तथा सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके सुखका अनुभव किया है; परंतु आज वे किसके हैं अथवा हम उनमेंसे किसके हैं? ॥ २१ ॥
शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ २२ ॥
शोकके हजारों स्थान हैं और भयके भी सैकड़ों स्थान हैं। वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्यपर ही अपना प्रभाव डालते हैं, विद्वान् पुरुषपर नहीं ॥ २२ ॥
न कालस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यः कुरुसत्तम ।
न मध्यस्थः क्वचित्कालः सर्वं कालः प्रकर्षति ॥ २३ ॥
कुरुश्रेष्ठ! कालका न किसीसे प्रेम है और न किसीसे द्वेष, उसका कहीं उदासीनभाव भी नहीं है। काल सभीको अपने पास खींच लेता है ॥ २३ ॥
कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥ २४ ॥
काल ही प्राणियोंको पकाता है, काल ही प्रजाओंका संहार करता है और काल ही सबके सो जानेपर भी जागता रहता है। कालका उल्लंघन करना बहुत ही कठिन है ॥ २४ ॥
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः ।
आरोग्यं प्रियसंवासो गृद्ध्येदेषु न पण्डितः ॥ २५ ॥
रूप, जवानी, जीवन, धनका संग्रह, आरोग्य तथा प्रियजनोंका एक साथ निवास—ये सभी अनित्य हैं, अतः विद्वान् पुरुष इनमें कभी आसक्त न हो ॥ २५ ॥
न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हसि ।
अप्यभावेन युज्येत तच्चास्य न निवर्तते ॥ २६ ॥
जो दुःख सारे देशपर पड़ा है, उसके लिये अकेले आपको ही शोक करना उचित नहीं है। शोक करते-करते कोई मर जाय तो भी उसका वह शोक दूर नहीं होता है ॥ २६ ॥
अशोचन् प्रतिकुर्वीत यदि पश्येत् पराक्रमम् ।
भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत् ॥ २७ ॥
चिन्त्यमानं हि न व्येति भूयश्चापि प्रवर्धते ।
यदि अपनेमें पराक्रम देखे तो शोक न करते हुए शोकके कारणका निवारण करनेकी चेष्टा करे। दुःखको दूर करनेके लिये सबसे अच्छी दवा यही है कि उसका चिन्तन छोड़ दिया जाय, चिन्तन करनेसे दुःख कम नहीं होता बल्कि और भी बढ़ जाता है ॥ २७ १/२ ॥
अनिष्टसम्प्रयोगाच्च विप्रयोगात् प्रियस्य च ॥ २८ ॥
मानुषा मानसैर्दुःखैर्दह्यन्ते चाल्पबुद्धयः ।
मन्दबुद्धि मनुष्य ही अप्रिय वस्तुका संयोग और प्रिय वस्तुका वियोग होनेपर मानसिक दुःखोंसे दग्ध होने लगते हैं ॥ २८ १/२ ॥
नार्थो न धर्मो न सुखं यदेतदनुशोचसि ॥ २९ ॥
न च नापैति कार्यार्थात्तिवर्गाच्चैव हीयते ।
जो आप यह शोक कर रहे हैं, यह न अर्थका साधक है, न धर्मका और न सुखका ही। इसके द्वारा मनुष्य अपने कर्तव्यपथसे तो भ्रष्ट होता ही है, धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्गसे भी वंचित हो जाता है ॥ २९ १/२ ॥
अन्यामन्यां धनावस्थां प्राप्य वैशेषिकीं नराः ॥ ३० ॥
असंतुष्टाः प्रमुह्यन्ति संतोषं यान्ति पण्डिताः ।
धनकी भिन्न-भिन्न अवस्थाविशेषको पाकर असंतोषी मनुष्य तो मोहित हो जाते हैं; परंतु विद्वान् पुरुष सदा संतुष्ट ही रहते हैं ॥ ३० १/२ ॥
प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः ।
एतद् विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥ ३१ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह मानसिक दुःखको बुद्धि एवं विचारधारा और शारीरिक कष्टको ओषधियोंद्वारा दूर करे, यही विज्ञानकी शक्ति है। उसे बालकोंके समान अविवेकपूर्ण बर्ताव नहीं करना चाहिये ॥ ३१ ॥
शयानं चानुशेते हि तिष्ठन्तं चानुतिष्ठति ।
अनुधावति धावन्तं कर्म पूर्वकृतं नरम् ॥ ३२ ॥
मनुष्यका पूर्वकृत कर्म उसके सोनेपर साथ ही सोता है, उठनेपर साथ ही उठता है और दौड़नेपर भी साथ-ही-साथ दौड़ता है ॥ ३२ ॥
यस्यां यस्यामवस्थायां यत् करोति शुभाशुभम् ।
तस्यां तस्यामवस्थायां तत्फलं समुपाश्नुते ॥ ३३ ॥
मनुष्य जिस-जिस अवस्थामें जो-जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसी-उसी अवस्थामें उसका फल भी पा लेता है ॥ ३३ ॥
येन येन शरीरेण यद्यत् कर्म करोति यः ।
तेन तेन शरीरेण तत्फलं समुपाश्नुते ॥ ३४ ॥
जो जिस-जिस शरीरसे जो-जो कर्म करता है, दूसरे जन्ममें वह उसी-उसी शरीरसे उसका फल भोगता है ॥ ३४ ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी कृतस्यापकृतस्य च ॥ ३५ ॥
मनुष्य आप ही अपना बन्धु है, आप ही अपना शत्रु है और आप ही अपने शुभ या अशुभ कर्मका साक्षी है ॥ ३५ ॥
शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा ।
कृतं भवति सर्वत्र नाकृतं विद्यते क्वचित् ॥ ३६ ॥ शुभकर्मसे सुख मिलता है और पापकर्मसे दुःख, सर्वत्र किये हुए कर्मका ही फल प्राप्त होता है, कहीं भी बिना कियेका नहीं ॥ ३६ ॥ न हि ज्ञानविरुद्धेषु बह्वपायेषु कर्मसु । मूलघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ ३७ ॥ आप-जैसे बुद्धिमान् पुरुष अनेक विनाशकारी दोषोंसे युक्त तथा मूलभूत शरीरका भी नाश करनेवाले बुद्धिविरुद्ध कर्मोंमें नहीं आसक्त होते हैं ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रशोककरणे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3113)
तृतीयोऽध्यायः
विदुरजीका शरीरकी अनित्यता बताते हुए धृतराष्ट्रको शोक त्यागनेके लिये कहना
धृतराष्ट्र उवाच
सुभाषितैर्महाप्राज्ञ शोकोऽयं विगतो मम ।
भूय एव तु वाक्यानि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**परम बुद्धिमान् विदुर! तुम्हारा उत्तम भाषण सुनकर मेरा यह शोक दूर हो गया, तथापि तुम्हारे इन तात्त्विक वचनोंको मैं अभी और सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
अनिष्टानां च संसर्गादिष्टानां च विसर्जनात् ।
कथं हि मानसैर्दुःखैः प्रमुच्यन्ते तु पण्डिताः ॥ २ ॥
विद्वान् पुरुष अनिष्टके संयोग और इष्टके वियोगसे होनेवाले मानसिक दुःखोंसे किस प्रकार छुटकारा पाते हैं? ॥ २ ॥
विदुर उवाच
यतो यतो मनो दुःखात् सुखाद् वा विप्रमुच्यते ।
ततस्ततो नियम्यैतच्छान्तिं विन्देत वै बुधः ॥ ३ ॥
**विदुरजीने कहा—**महाराज! विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जिन-जिन साधनोंमें लगनेसे मन दुःख अथवा सुखसे मुक्त होता हो, उन्हींमें इसे नियमपूर्वक लगाकर शान्ति प्राप्त करे ॥ ३ ॥
अशाश्वतमिदं सर्वं चिन्त्यमानं नरर्षभ ।
कदलीसन्निभो लोकः सारो ह्यस्य न विद्यते ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ! विचार करनेपर यह सारा जगत् अनित्य ही जान पड़ता है। सम्पूर्ण विश्व केलेके समान सारहीन है; इसमें सार कुछ भी नहीं है ॥ ४ ॥
यदा प्राज्ञाश्च मूढाश्च धनवन्तोऽथ निर्धनाः ।
सर्वे पितृवनं प्राप्य स्वपन्ति विगतज्वराः ॥ ५ ॥
निर्मांसैरस्थिभूयिष्ठैर्गात्रैः स्नायुनिबन्धनैः ।
किं विशेषं प्रपश्यन्ति तत्र तेषां परे जनाः ॥ ६ ॥
येन प्रत्यवगच्छेयुः कुलरूपविशेषणम् ।
कस्मादन्योन्यमिच्छन्ति विप्रलब्धधियो नराः ॥ ७ ॥
जब विद्वान्-मूर्ख, धनवान् और निर्धन सभी श्मशान-भूमिमें जाकर निश्चिन्त सो जाते हैं, उस समय उनके मांसरहित नाड़ियोंसे बँधे हुए तथा अस्थिबहुल अंगोंको देखकर क्या
दूसरे लोग वहाँ उनमें कोई ऐसा अन्तर देख पाते हैं, जिससे वे उनके कुल और रूपकी विशेषताको समझ सकें; फिर भी वे मनुष्य एक-दूसरेको क्यों चाहते हैं? इसलिये कि उनकी बुद्धि ठगी गयी है ॥ ५—७ ॥ गृहाणीव हि मर्त्यानामाहुर्देहानि पण्डिताः । कालेन विनियुज्यन्ते सत्त्वमेकं तु शाश्वतम् ॥ ८ ॥ पण्डितलोग मरणधर्मा प्राणियोंके शरीरोंको घरके तुल्य बतलाते हैं; क्योंकि सारे शरीर समयपर नष्ट हो जाते हैं, किंतु उसके भीतर जो एकमात्र सत्त्वस्वरूप आत्मा है, वह नित्य है ॥ ८ ॥ यथा जीर्णमजीर्णं वा वस्त्रं त्यक्त्वा तु पूरुषः । अन्यद् रोचयते वस्त्रमेवं देहाः शरीरिणाम् ॥ ९ ॥ जैसे मनुष्य नये अथवा पुराने वस्त्रको उतारकर दूसरे नूतन वस्त्रको पहननेकी रुचि रखता है, उसी प्रकार देहधारियोंके शरीर उनके द्वारा समय-समयपर त्यागे और ग्रहण किये जाते हैं ॥ ९ ॥ वैचित्रवीर्य प्राप्यं हि दुःखं वा यदि वा सुखम् । प्राप्नुवन्तीह भूतानि स्वकृतेनैव कर्मणा ॥ १० ॥ विचित्रवीर्यनन्दन! यदि दुःख या सुख प्राप्त होनेवाला है तो प्राणी उसे अपने किये हुए कर्मके अनुसार ही पाते हैं ॥ १० ॥ कर्मणा प्राप्यते स्वर्गः सुखं दुःखं च भारत । ततो वहति तं भारमवशः स्ववशोऽपि वा ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! कर्मके अनुसार ही परलोकमें स्वर्ग या नरक तथा इहलोकमें सुख और दुःख प्राप्त होते हैं; फिर मनुष्य सुख या दुःखके उस भारको स्वाधीन या पराधीन होकर ढोता रहता है ॥ ११ ॥ यथा च मृण्मयं भाण्डं चक्रारूढं विपद्यते । किंचित् प्रक्रियमाणं वा कृतमात्रमथापि वा ॥ १२ ॥ छिन्नं वाप्यवरोप्यन्तमवतीर्णमथापि वा । आर्द्रं वाप्यथवा शुष्कं पच्यमानमथापि वा ॥ १३ ॥ उत्तार्यमाणमापाकादुद्धृतं चापि भारत । अथवा परिभुज्यन्तमेवं देहाः शरीरिणाम् ॥ १४ ॥ जैसे मिट्टीका बर्तन बनाये जानेके समय कभी चाकपर चढ़ाते ही नष्ट हो जाता है, कभी कुछ-कुछ बननेपर, कभी पूरा बन जानेपर, कभी सूतसे काट देनेपर, कभी चाकसे उतारते समय, कभी उतर जानेपर, कभी गीली या सूखी अवस्थामें, कभी पकाये जाते समय, कभी आवाँसे उतारते समय, कभी पाकस्थानसे उठाकर ले जाते समय अथवा कभी उसे उपयोगमें लाते समय फूट जाता है; ऐसी ही दशा देहधारियोंके शरीरोंकी भी होती है ॥
गर्भस्थो वा प्रसूतो वाप्यथ वा दिवसान्तरः । अर्धमासगतो वापि मासमात्रगतोऽपि वा ॥ १५ ॥ संवत्सरगतो वापि द्विसंवत्सर एव वा । यौवनस्थोऽथ मध्यस्थो वृद्धो वापि विपद्यते ॥ १६ ॥ कोई गर्भमें रहते समय, कोई पैदा हो जानेपर, कोई कई दिनोंका होनेपर, कोई पंद्रह दिनका, कोई एक मासका तथा कोई एक या दो सालका होनेपर, कोई युवावस्थामें, कोई मध्यावस्थामें अथवा कोई वृद्धावस्थामें पहुँचनेपर मृत्युको प्राप्त हो जाता है ॥ १५-१६ ॥
प्राक्कर्मभिस्तु भूतानि भवन्ति न भवन्ति च । एवं सांसिद्धिके लोके किमर्थमनुतप्यसे ॥ १७ ॥ प्राणी पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार ही इस जगत्में रहते और नहीं रहते हैं। जब लोककी ऐसी ही स्वाभाविक स्थिति है, तब आप किसलिये शोक कर रहे हैं? ॥ १७ ॥
यथा तु सलिलं राजन् क्रीडार्थमनुसंतरेत् । उन्मज्जेच्च निमज्जेच्च किंचित् सत्त्वं नराधिप ॥ १८ ॥ एवं संसारगहने उन्मज्जननिमज्जने । कर्मभोगेन बध्यन्ते क्लिश्यन्ते चाल्पबुद्धयः ॥ १९ ॥ राजन्! नरेश्वर! जैसे क्रीडाके लिये पानीमें तैरता हुआ कोई प्राणी कभी डूबता है और कभी ऊपर आ जाता है, इसी प्रकार इस अगाध संसार-समुद्रमें जीवोंका डूबना और उतराना (मरना और जन्म लेना) लगा रहता है, मन्दबुद्धि मनुष्य ही यहाँ कर्मभोगसे बँधते और कष्ट पाते हैं ॥
ये तु प्राज्ञाः स्थिताः सत्त्वे संसारेऽस्मिन् हितैषिणः । समागमज्ञा भूतानां ते यान्ति परमां गतिम् ॥ २० ॥ जो बुद्धिमान् मानव इस संसारमें सत्त्वगुणसे युक्त, सबका हित चाहनेवाले और प्राणियोंके समागमको कर्मानुसार समझनेवाले हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रशोककरणे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
दुःखमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय
चतुर्थोऽध्यायः
दुःखमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय
धृतराष्ट्र उवाच
कथं संसारगहनं विज्ञेयं वदतां वर ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वमाख्याहि पृच्छतः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ विदुर! इस गहन संसारके स्वरूपका ज्ञान कैसे हो? यह मैं सुनना चाहता हूँ। मेरे प्रश्नके अनुसार तुम इस विषयका यथार्थरूपसे वर्णन करो ॥ १ ॥
विदुर उवाच
जन्मप्रभृति भूतानां क्रिया सर्वोपलक्ष्यते ।
पूर्वमेवेह कलिले वसते किंचिदन्तरम् ॥ २ ॥
ततः स पञ्चमेऽतीते मासे वासमकल्पयत् ।
ततः सर्वाङ्गसम्पूर्णो गर्भो वै स तु जायते ॥ ३ ॥
**विदुरजीने कहा—**महाराज! जब गर्भाशयमें वीर्य और रजका संयोग होता है तभीसे जीवोंकी गर्भवृद्धिरूप सारी क्रिया शास्त्रके अनुसार देखी जाती हैं।* आरम्भमें जीव कलिल (वीर्य और रजके संयोग)-के रूपमें रहता है, फिर कुछ दिन बाद पाँचवाँ महीना बीतनेपर वह चैतन्यरूपसे प्रकट होकर पिण्डमें निवास करने लगता है। इसके बाद वह गर्भस्थ पिण्ड सर्वांगपूर्ण हो जाता है ॥ २-३ ॥
अमेध्यमध्ये वसति मांसशोणितलेपने ।
ततस्तु वायुवेगेन ऊर्ध्वपादो ह्यधःशिराः ॥ ४ ॥
इस समय उसे मांस और रुधिरसे लिपे हुए अत्यन्त अपवित्र गर्भाशयमें रहना पड़ता है। फिर वायुके वेगसे उसके पैर ऊपरकी ओर हो जाते हैं और सिर नीचेकी ओर ॥
योनिद्वारमुपागम्य बहून् क्लेशान् समृच्छति ।
योनिसम्पीडनाच्चैव पूर्वकर्मभिरन्वितः ॥ ५ ॥
तस्मान्मुक्तः स संसारादन्यान् पश्यत्युपद्रवान् ।
ग्राहास्तमनुगच्छन्ति सारमेया इवामिषम् ॥ ६ ॥
इस स्थितिमें योनिद्वारके समीप आ जानेसे उसे बड़े दुःख सहने पड़ते हैं। फिर पूर्व कर्मोंसे संयुक्त हुआ वह जीव योनिमार्गसे पीड़ित हो उससे छुटकारा पाकर बाहर आ जाता
है और संसारमें आकर अन्यान्य प्रकारके उपद्रवोंका सामना करता है। जैसे कुत्ते मांसकी ओर झपटते हैं, उसी प्रकार बालग्रह उस शिशुके पीछे लगे रहते हैं ॥
ततः प्राप्तोत्तरे काले व्याधयश्चापि तं तथा ।
उपसर्पन्ति जीवन्तं बध्यमानं स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥
तदनन्तर ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है, त्यों-ही-त्यों अपने कर्मोंसे बँधे हुए उस जीवको जीवित अवस्थामें नयी-नयी व्याधियाँ प्राप्त होने लगती हैं ॥ ७ ॥
तं बद्धमिन्द्रियैः पाशैः संगस्वादुभिरावृतम् ।
व्यसनान्यपि वर्तन्ते विविधानि नराधिप ॥ ८ ॥
नरेश्वर! फिर आसक्तिके कारण जिनमें रसकी प्रतीति होती है, उन विषयोंसे घिरे और इन्द्रियरूपी पाशोंसे बँधे हुए उस संसारी जीवको नाना प्रकारके संकट घेर लेते हैं ॥
बध्यमानश्च तैर्भूयो नैव तृप्तिमुपैति सः ।
तदा नावैति चैवायं प्रकुर्वन् साध्वसाधु वा ॥ ९ ॥
उनसे बँध जानेपर पुनः इसे कभी तृप्ति ही नहीं होती है। उस अवस्थामें वह भले-बुरे कर्म करता हुआ भी उनके विषयमें कुछ समझ नहीं पाता ॥ ९ ॥
तथैव परिरक्षन्ति ये ध्यानपरिनिष्ठिताः ।
अयं न बुध्यते तावद् यमलोकमथागतम् ॥ १० ॥
जो लोग भगवान्के ध्यानमें लगे रहनेवाले हैं, वे ही शास्त्रके अनुसार चलकर अपनी रक्षा कर पाते हैं। साधारण जीव तो अपने सामने आये हुए यमलोकको भी नहीं समझ पाता है ॥ १० ॥
यमदूतैर्विकृष्यंश्च मृत्युं कालेन गच्छति ।
वाग्विहीनस्य च यन्मात्रमिष्टानिष्टं कृतं मुखे ।
भूय एवात्मनाऽऽत्मानं बध्यमानमुपेक्षते ॥ ११ ॥
तदनन्तर कालसे प्रेरित हो यमदूत उसे शरीरसे बाहर खींच लेते हैं और वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है। उस समय उसमें बोलनेकी भी शक्ति नहीं रहती। उसके जितने भी शुभ या अशुभ कर्म हैं वे सामने प्रकट होते हैं। उनके अनुसार पुनः अपने-आपको देहबन्धनमें बँधता हुआ देखकर भी वह उपेक्षा कर देता है—अपने उद्धारका प्रयत्न नहीं करता ॥ ११ ॥
अहो विनिकृतो लोको लोभेन च वशीकृतः ।
लोभक्रोधभयोन्मत्तो नात्मानमवबुध्यते ॥ १२ ॥
अहो! लोभके वशीभूत होकर यह सारा संसार ठगा जा रहा है। लोभ, क्रोध और भयसे यह इतना पागल हो गया है कि अपने-आपको भी नहीं जानता ॥ १२ ॥
कुलीनत्वे च रमते दुष्कुलीनान् विकुत्सयन् ।
धनदर्पेण दृप्तश्च दरिद्रान् परिकुत्सयन् ॥ १३ ॥
जो लोग हीन कुलमें उत्पन्न हुए हैं, उनकी निन्दा करता हुआ कुलीन मनुष्य अपनी कुलीनतामें ही मस्त रहता है और धनी धनके घमंडसे चूर होकर दरिद्रोंके प्रति अपनी घृणा प्रकट करता है ।। १३ ।। मूर्खानिति परानाह नात्मानं समवेक्षते । दोषान् क्षिपति चान्येषां नात्मानं शास्तुमिच्छति ।। १४ ।। वह दूसरोंको तो मूर्ख बताता है, पर अपनी ओर कभी नहीं देखता। दूसरोंके दोषोंके लिये उनपर आक्षेप करता है, परंतु उन्हीं दोषोंसे स्वयंको बचानेके लिये अपने मनको काबूमें नहीं रखना चाहता ।। १४ ।। यदा प्राज्ञाश्च मूर्खाश्च धनवन्तश्च निर्धनाः । कुलीनाश्चाकुलीनाश्च मानिनोऽथाप्यमानिनः ।। १५ ।। सर्वे पितृवनं प्राप्ताः स्वपन्ति विगतत्वचः । निर्मांसैरस्थिभूयिष्ठैर्गात्रैः स्नायुनिबन्धनैः ।। १६ ।। विशेषं न प्रपश्यन्ति तत्र तेषां परे जनाः । येन प्रत्यवगच्छेयुः कुलरूपविशेषणम् ।। १७ ।। जब ज्ञानी और मूर्ख, धनवान् और निर्धन, कुलीन और अकुलीन तथा मानी और मानरहित सभी मरघटमें जाकर सो जाते हैं, उनकी चमड़ी भी नष्ट हो जाती है और नाड़ियोंसे बँधे हुए मांसरहित हड्डियोंके ढेररूप उनके नग्न शरीर सामने आते हैं, तब वहाँ खड़े हुए दूसरे लोग उनमें कोई ऐसा अन्तर नहीं देख पाते हैं, जिससे एककी अपेक्षा दूसरेके कुल और रूपकी विशेषताको जान सकें ।। यदा सर्वे समं न्यस्ताः स्वपन्ति धरणीतले । कस्मादन्योन्यमिच्छन्ति प्रलब्धुमिह दुर्बुधाः ।। १८ ।। जब मरनेके बाद श्मशानमें डाल दिये जानेपर सभी लोग समानरूपसे पृथ्वीकी गोदमें सोते हैं, तब वे मूर्ख मानव इस संसारमें क्यों एक-दूसरेको ठगनेकी इच्छा करते हैं? ।। १८ ।। प्रत्यक्षं च परोक्षं च यो निशम्य श्रुतिं त्विमाम् । अध्रुवे जीवलोकेऽस्मिन् यो धर्ममनुपालयन् । जन्मप्रभृति वर्तेत प्राप्नुयात् परमां गतिम् ।। १९ ।। इस क्षणभंगुर जगत्में जो पुरुष इस वेदोक्त उपदेशको साक्षात् जानकर या किसीके द्वारा सुनकर जन्मसे ही निरन्तर धर्मका पालन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ।। १९ ।। एवं सर्वं विदित्वा वै यस्तत्त्वमनुवर्तते । स प्रमोक्षाय लभते पन्थानं मनुजेश्वर ।। २० ।।
नरेश्वर! जो इस प्रकार सब कुछ जानकर तत्त्वका अनुसरण करता है, वह मोक्षतक पहुँचनेके लिये मार्ग प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
* 'एकरात्रोषितं कलिलं भवति पंचरात्राद् बुद्बुदः' एक रातमें रज और वीर्य मिलकर 'कलिल' रूप होते हैं और पाँच रातमें 'बुद्बुद' के आकारमें परिणत हो जाते हैं। इत्यादि शास्त्रवचनोंके अनुसार गर्भके बढ़ने आदिकी सारी क्रिया ज्ञात होती है।
गहन वनके दृष्टान्तसे संसारके भयंकर स्वरूपका वर्णन
पञ्चमोऽध्यायः
गहन वनके दृष्टान्तसे संसारके भयंकर स्वरूपका वर्णन
धृतराष्ट्र उवाच
यदिदं धर्मगहनं बुद्ध्या समनुगम्यते ।
तद्धि विस्तरतः सर्वं बुद्धिमार्गं प्रशंस मे ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**विदुर! यह जो धर्मका गूढ़ स्वरूप है, वह बुद्धिसे ही जाना जाता है; अतः तुम मुझसे सम्पूर्ण बुद्धिमार्गका विस्तारपूर्वक वर्णन करो ॥ १ ॥
विदुर उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ।
यथा संसारगहनं वदन्ति परमर्षयः ॥ २ ॥
**विदुरजीने कहा—**राजन्! मैं भगवान् स्वयम्भूको नमस्कार करके संसाररूप गहन वनके उस स्वरूपका वर्णन करता हूँ, जिसका निरूपण बड़े-बड़े महर्षि करते हैं ॥
कश्चिन्महति कान्तारे वर्तमानो द्विजः किल ।
महद् दुर्गमनुप्राप्तो वनं क्रव्यादसंकुलम् ॥ ३ ॥
कहते हैं कि किसी विशाल दुर्गम वनमें कोई ब्राह्मण यात्रा कर रहा था। वह वनके अत्यन्त दुर्गम प्रदेशमें जा पहुँचा, जो हिंसक जन्तुओंसे भरा हुआ था ॥ ३ ॥
सिंहव्याघ्रगजर्क्षौघैरतिघोरं महास्वनैः ।
पिशितादैरतिभयैर्महोग्राकृतिभिस्तथा ॥ ४ ॥
समन्तात् सम्परिक्षिप्तं यत् स्म दृष्ट्वा त्रसेद् यमः ।
जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले सिंह, व्याघ्र, हाथी और रीछोंके समुदायोंने उस स्थानको अत्यन्त भयानक बना दिया था। भीषण आकारवाले अत्यन्त भयंकर मांसभक्षी प्राणियोंने उस वनप्रान्तको चारों ओरसे घेरकर ऐसा बना दिया था, जिसे देखकर यमराज भी भयसे थर्रा उठे ॥ ४ १/२ ॥
तदस्य दृष्ट्वा हृदयमुद्वेगमगमत् परम् ॥ ५ ॥
अभ्युच्चयश्च रोम्णां वै विक्रियाश्च परंतप ।
शत्रुदमन नरेश! वह स्थान देखकर ब्राह्मणका हृदय अत्यन्त उद्विग्न हो उठा। उसे रोमांच हो आया और मनमें अन्य प्रकारके भी विकार उत्पन्न होने लगे ॥ ५ १/२ ॥
स तद् वनं व्यनुसरन् सम्प्रधावन्नितस्ततः ॥ ६ ॥
वीक्षमाणो दिशः सर्वाः शरणं क्व भवेदिति ।
वह उस वनका अनुसरण करता इधर-उधर दौड़ता तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें ढूँढ़ता फिरता था कि कहीं मुझे शरण मिले ।। ६१/२ ।। स तेषां छिद्रमन्विच्छन् प्रद्रुतो भयपीडितः ।। ७ ।। न च निर्याति वै दूरं न वा तैर्विप्रमोच्यते । वह उन हिंसक जन्तुओंका छिद्र देखता हुआ भयसे पीड़ित हो भागने लगा; परंतु न तो वहाँसे दूर निकल पाता था और न वे ही उसका पीछा छोड़ते थे ।। ७१/२ ।। अथापश्यद् वनं घोरं समन्ताद् वागुरावृतम् ।। ८ ।। बाहुभ्यां सम्परिक्षिप्तं स्त्रिया परमघोरया । इतनेहीमें उसने देखा कि वह भयानक वन चारों ओरसे जालसे घिरा हुआ है और एक बड़ी भयानक स्त्रीने अपनी दोनों भुजाओंसे उसको आवेष्टित कर रखा है ।। पञ्चशीर्षधरैर्नागैः शैलैरिव समुन्नतैः ।। ९ ।। नभःस्पृशैर्महावृक्षैः परिक्षिप्तं महावनम् । पर्वतोंके समान ऊँचे और पाँच सिरवाले नागों तथा बड़े-बड़े गगनचुम्बी वृक्षोंसे वह विशाल वन व्याप्त हो रहा है ।। ९१/२ ।। वनमध्ये च तत्राभूदुदपानः समावृतः ।। १० ।। वल्लीभिस्तृणछन्नाभिर्दृढाभिरभिसंवृतः । उस वनके भीतर एक कुआँ था, जो घासोंसे ढकी हुई सुदृढ़ लताओंके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हो गया था ।। पपात स द्विजस्तत्र निगूढे सलिलाशये ।। ११ ।। विलग्नश्चाभवत् तस्मिन् लतासंतानसंकुले । वह ब्राह्मण उस छिपे हुए कुएँमें गिर पड़ा; परंतु लतावेलोंसे व्याप्त होनेके कारण वह उसमें फँसकर नीचे नहीं गिरा, ऊपर ही लटका रह गया ।। १११/२ ।। पनसस्य यथा जातं वृन्तबद्धं महाफलम् ।। १२ ।। स तथा लम्बते तत्र ह्यूर्ध्वपादो ह्यधःशिराः । जैसे कटहलका विशाल फल वृन्तमें बँधा हुआ लटकता रहता है, उसी प्रकार वह ब्राह्मण ऊपरको पैर और नीचेको सिर किये उस कुएँमें लटक गया ।। १२१/२ ।। अथ तत्रापि चान्योऽस्य भूयो जात उपद्रवः ।। १३ ।। कूपमध्ये महानागमपश्यत महाबलम् । कूपवीनाहवेलायामपश्यत महागजम् ।। १४ ।। षड्वक्त्रं कृष्णशुक्लं च द्विषट्कपदचारिणम् ।
वहाँ भी उसके सामने पुनः दूसरा उपद्रव खड़ा हो गया। उसने कूपके भीतर एक महाबली महानाग बैठा हुआ देखा तथा कुएँके ऊपरी तटपर उसके मुखबन्धके पास एक विशाल हाथीको खड़ा देखा, जिनके छः मुँह थे। वह सफेद और काले रंगका था तथा बारह पैरोंसे चला करता था ।। १३-१४ १/२ ।। क्रमेण परिसर्पन्तं वल्लीवृक्षसमावृतम् ॥ १५ ॥ तस्य चापि प्रशाखासु वृक्षशाखावलम्बिनः । नानारूपा मधुकरा घोररूपा भयावहाः ॥ १६ ॥ आसते मधु संवृत्य पूर्वमेव निकेतजाः । वह लताओं तथा वृक्षोंसे घिरे हुए उस कूपमें क्रमशः बढ़ा आ रहा था। वह ब्राह्मण, जिस वृक्षकी शाखापर लटका था, उसकी छोटी-छोटी टहनियोंपर पहलेसे ही मधुके छत्तोंसे पैदा हुई अनेक रूपवाली, घोर एवं भयंकर मधुमक्खियाँ मधुको घेरकर बैठी हुई थीं ।। १५-१६ १/२ ।। भूयो भूयः समीहन्ते मधूनि भरतर्षभ ॥ १७ ॥ स्वादनीयानि भूतानां यैर्बालो विप्रकृष्यते । भरतश्रेष्ठ! समस्त प्राणियोंको स्वादिष्ट प्रतीत होनेवाले उस मधुको, जिसपर बालक आकृष्ट हो जाते हैं, वे मक्खियाँ बारंबार पीना चाहती थीं ।। १७ १/२ ।। तेषां मधूनां बहुधा धारा प्रस्रवते तदा ॥ १८ ॥ आलम्बमानः स पुमान् धारां पिबति सर्वदा । उस समय उस मधुकी अनेक धाराएँ वहाँ झर रही थीं और वह लटका हुआ पुरुष निरन्तर उस मधुधाराको पी रहा था ।। १८ १/२ ।। न चास्य तृष्णा विरता पिबमानस्य संकटे ॥ १९ ॥ अभीप्सति तदा नित्यमतृप्तः स पुनः पुनः । यद्यपि वह संकटमें था तो भी उस मधुको पीते-पीते उसकी तृष्णा शान्त नहीं होती थी। वह सदा अतृप्त रहकर ही बारंबार उसे पीनेकी इच्छा रखता था ।। १९ १/२ ।। न चास्य जीविते राजन् निर्वेदः समजायत ॥ २० ॥ तत्रैव च मनुष्यस्य जीविताशा प्रतिष्ठिता । राजन्! उसे अपने उस संकटपूर्ण जीवनसे वैराग्य नहीं हुआ है। उस मनुष्यके मनमें वहीं उसी दशासे जीवित रहकर मधु पीते रहनेकी आशा जड़ जमाये हुए है ।। २० १/२ ।। कृष्णाः श्वेताश्च तं वृक्षं कुट्टयन्ति च मूषिकाः ॥ २१ ॥ व्यालैश्च वनदुर्गान्ते स्त्रिया च परमोग्रया । कूपाधस्ताच्च नागेन वीनाहे कुञ्जरेण च ॥ २२ ॥ वृक्षप्रपाताच्च भयं मूषिकेभ्यश्च पञ्चमम् ।
मधुलोभान्मधुकरैः षष्ठमाहुर्महद् भयम् ॥ २३ ॥
जिस वृक्षके सहारे वह लटका हुआ है, उसे काले और सफेद चूहे निरन्तर काट रहे हैं। पहले तो उसे वनके दुर्गम प्रदेशके भीतर ही अनेक सर्पोंसे भय है, दूसरा भय सीमापर खड़ी हुई उस भयंकर स्त्रीसे है, तीसरा कुँएके नीचे बैठे हुए नागसे है, चौथा कुँएके मुखबन्धके पास खड़े हुए हाथीसे है और पाँचवाँ भय चूहोंके काट देनेपर उस वृक्षसे गिर जानेका है। इनके सिवा, मधुके लोभसे मधुमक्खियोंकी ओरसे जो उसको महान् भय प्राप्त होनेवाला है, वह छठा भय बताया गया है ॥ २१—२३ ॥
एवं स वसते तत्र क्षिप्तः संसारसागरे ।
न चैव जीविताशायां निर्वेदमुपगच्छति ॥ २४ ॥
इस प्रकार संसार-सागरमें गिरा हुआ वह मनुष्य इतने भयोंसे घिरकर वहाँ निवास करता है तो भी उसे जीवनकी आशा बनी हुई है और उसके मनमें वैराग्य नहीं उत्पन्न होता है ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रशोककरणे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3124)
षष्ठोऽध्यायः
संसाररूपी वनके रूपकका स्पष्टीकरण
धृतराष्ट्र उवाच
अहो खलु महद् दुःखं कृच्छ्रवासश्च तस्य ह ।
कथं तस्य रतिस्तत्र तुष्टिर्वा वदतां वर ।। १ ।।
**धृतराष्ट्र बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ विदुर! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! उस ब्राह्मणको तो महान् दुःख प्राप्त हुआ था। वह बड़े कष्टसे वहाँ रह रहा था तो भी वहाँ कैसे उसका मन लगता था और कैसे उसे संतोष होता था? ।। १ ।।
स देशः क्व नु यत्रासौ वसते धर्मसंकटे ।
कथं वा स विमुच्येत नरस्तस्मान्महाभयात् ।। २ ।।
कहाँ है वह देश, जहाँ बेचारा ब्राह्मण ऐसे धर्मसंकटमें रहता है? उस महान् भयसे उसका छुटकारा किस प्रकार हो सकता है? ।। २ ।।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व साधु चेष्टामहे तदा ।
कृपा मे महती जाता तस्याभ्युद्धरणेन हि ।। ३ ।।
यह सब मुझे बताओ; फिर हम सब लोग उसे वहाँसे निकालनेकी पूरी चेष्टा करेंगे। उसके उद्धारके लिये मुझे बड़ी दया आ रही है ।। ३ ।।
विदुर उवाच
उपमानमिदं राजन् मोक्षविद्भिरुदाहृतम् ।
सुकृतं विन्दते येन परलोकेषु मानवः ।। ४ ।।
**विदुरजीने कहा—**राजन्! मोक्षतत्त्वके विद्वानोंद्वारा बताया गया यह एक दृष्टान्त है, जिसे समझकर वैराग्य धारण करनेसे मनुष्य परलोकमें पुण्यका फल पाता है ।।
उच्यते यत् तु कान्तारं महासंसार एव सः ।
वन दुर्गं हि यच्चैतत् संसारगहनं हि तत् ।। ५ ।।
जिसे दुर्गम स्थान बताया गया है, वह महासंसार ही है और जो यह दुर्गम वन कहा गया है, यह संसारका ही गहन स्वरूप है ।। ५ ।।
ये च ते कथिता व्याला व्याधयस्ते प्रकीर्तिताः ।
या सा नारी बृहत्काया अध्यतिष्ठत तत्र वै ।। ६ ।।
तामाहुस्तु जरां प्राज्ञा रूपवर्णविनाशिनीम् ।
जो सर्प कहे गये हैं, वे नाना प्रकारके रोग हैं। उस वनकी सीमापर जो विशालकाय नारी खड़ी थी, उसे विद्वान् पुरुष रूप और कान्तिका विनाश करनेवाली वृद्धावस्था बताते हैं॥ ६ १/२ ॥
यस्तत्र कूपो नृपते स तु देहः शरीरिणाम् ॥ ७ ॥
यस्तत्र वसतेऽधस्तान्महाहिः काल एव सः।
अन्तकः सर्वभूतानां देहिनां सर्वहार्यसौ ॥ ८ ॥
नरेश्वर! उस वनमें जो कुआँ कहा गया है, वह देहधारियोंका शरीर है। उसमें नीचे जो विशाल नाग रहता है, वह काल ही है। वही सम्पूर्ण प्राणियोंका अन्त करनेवाला और देहधारियोंका सर्वस्व हर लेनेवाला है॥ ७-८॥
कूपमध्ये च या जाता वल्ली यत्र स मानवः।
प्रताने लम्बते लग्नो जीविताशा शरीरिणाम् ॥ ९ ॥
कुँएके मध्यभागमें जो लता उत्पन्न हुई बतायी गयी है, जिसको पकड़कर वह मनुष्य लटक रहा है, वह देहधारियोंके जीवनकी आशा ही है॥ ९॥
स यस्तु कूपवीनाहे तं वृक्षं परिसर्पति।
षड्वक्त्रः कुञ्जरो राजन् स तु संवत्सरः स्मृतः ॥ १० ॥
राजन्! जो कुएँके मुखबन्धके समीप छः मुखों-वाला हाथी उस वृक्षकी ओर बढ़ रहा है, उसे संवत्सर माना गया है॥ १०॥
मुखानि ऋतवो मासाः पादा द्वादश कीर्तिताः।
ये तु वृक्षं निकृन्तन्ति मूषिकाः सततोत्थिताः ॥ ११ ॥
रात्र्यहानि तु तान्याहुर्भूतानां परिचिन्तकाः।
छः ऋतुएँ ही उसके छः मुख हैं और बारह महीने ही बारह पैर बताये गये हैं। जो चूहे सदा उद्यत रहकर उस वृक्षको काटते हैं, उन चूहोंको विचारशील विद्वान् प्राणियोंके दिन और रात बताते हैं॥ ११ १/२ ॥
ये ते मधुकरास्तत्र कामास्ते परिकीर्तिताः ॥ १२ ॥
यास्तु ता बहुशो धाराः स्रवन्ति मधुनिस्स्रवम्।
तांस्तु कामरसान् विद्याद् यत्र मज्जन्ति मानवाः ॥ १३ ॥
और जो-जो वहाँ मधुमक्खियाँ कही गयी हैं, वे सब कामनाएँ हैं। जो बहुत-सी धाराएँ मधुके झरने झरती रहती हैं, उन्हें कामरस जानना चाहिये, जहाँ सभी मानव डूब जाते हैं॥ १२-१३॥
एवं संसारचक्रस्य परिवृत्तिं विदुर्बुधाः।
येन संसारचक्रस्य पाशांश्छिन्दन्ति वै बुधाः ॥ १४ ॥
विद्वान् पुरुष इस प्रकार संसारचक्रकी गतिको जानते हैं, इसीलिये वे वैराग्यरूपी शस्त्रसे इसके सारे बन्धनोंको काट देते हैं॥ १४॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना
सप्तमोऽध्यायः
संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना
धृतराष्ट्र उवाच
अहोऽभिहितमाख्यानं भवता तत्त्वदर्शिना ।
भूय एव तु मे हर्षः श्रुत्वा वागमृतं तव ।। १ ।।
**धृतराष्ट्रने कहा—**विदुर! तुमने अद्भुत आख्यान सुनाया। वास्तवमें तुम तत्त्वदर्शी हो। पुनः तुम्हारी अमृतमयी वाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष होगा ।। १ ।।
विदुर उवाच
शृणु भूयः प्रवक्ष्यामि मार्गस्यैतस्य विस्तरम् ।
यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यन्ते संसारेभ्यो विचक्षणाः ।। २ ।।
**विदुरजीने कहा—**राजन्! सुनिये। मैं पुनः विस्तार-पूर्वक इस मार्गका वर्णन करता हूँ, जिसे सुनकर बुद्धिमान् पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ।। २ ।।
यथा तु पुरुषो राजन् दीर्घमध्वानमास्थितः ।
क्वचित् क्वचिच्छ्रमाच्छ्रान्तः कुरुते वासमेव वा ।। ३ ।।
एवं संसारपर्याये गर्भवासेषु भारत ।
कुर्वन्ति दुर्बुधा वासं मुच्यन्ते तत्र पण्डिताः ।। ४ ।।
नरेश्वर! जिस प्रकार किसी लंबे रास्तेपर चलने-वाला पुरुष परिश्रमसे थककर बीचमें कहीं-कहीं विश्रामके लिये ठहर जाता है, उसी प्रकार इस संसारयात्रामें चलते हुए अज्ञानी पुरुष विश्रामके लिये गर्भवास किया करते हैं। भारत! किंतु विद्वान् पुरुष इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं ।। ३-४ ।।
तस्मादध्वानमेवैतमाहुः शास्त्रविदो जनाः ।
यत्तु संसारगहनं वनमाहुर्मनीषिणः ।। ५ ।।
इसीलिये शास्त्रज्ञ पुरुषोंने गर्भवासको मार्गका ही रूपक दिया है और गहन संसारको मनीषी पुरुष वन कहा करते हैं ।। ५ ।।
सोऽयं लोकसमावर्तो मर्त्यानां भरतर्षभ ।
चराणां स्थावराणां च न गृध्येत् तत्र पण्डितः ।। ६ ।।
भरतश्रेष्ठ! यही मनुष्यों तथा स्थावर-जंगम प्राणियोंका संसारचक्र है। विवेकी पुरुषको इसमें आसक्त नहीं होना चाहिये ।। ६ ।।
शारीरा मानसाश्चैव मर्त्यानां ये तु व्याधयः ।
प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च ते व्यालाः कथिता बुधैः ॥ ७ ॥ मनुष्योंकी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शारीरिक और मानसिक व्याधियाँ हैं, उन्हींको विद्वानोंने सर्प एवं हिंसक जीव बताया है ॥ ७ ॥ क्लिश्यमानाश्च तैर्नित्यं वार्यमाणाश्च भारत । स्वकर्मभिर्महाव्यालैर्नोद्विजन्त्यल्पबुद्धयः ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! अपने कर्मरूपी इन महान् हिंसक जन्तुओंसे सदा सताये तथा रोके जानेपर भी मन्दबुद्धि मानव संसारसे उद्विग्न या विरक्त नहीं होते हैं ॥ ८ ॥ अथापि तैर्विमुच्येत व्याधिभिः पुरुषो नृप । आवृणोत्येव तं पश्चाज्जरा रूपविनाशिनी ॥ ९ ॥ शब्दरूपरसस्पर्शैर्गन्धैश्च विविधैरपि । मज्जमांसमहापङ्के निरालम्बे समन्ततः ॥ १० ॥ नरेश्वर! यदि शब्द, स्पर्श, रूप, रस और नाना प्रकारकी गन्धोंसे युक्त, मज्जा और मांसरूपी बड़ी भारी कीचड़से भरे हुए एवं सब ओरसे अवलम्बशून्य इस शरीररूपी कूपमें रहनेवाला मनुष्य इन व्याधियोंसे किसी तरह मुक्त हो जाय तो भी अन्तमें रूप-सौन्दर्यका विनाश करनेवाली वृद्धावस्था तो उसे घेर ही लेती है ॥ संवत्सराश्च मासाश्च पक्षाहोरात्रसंधयः । क्रमेणास्योपयुञ्जन्ति रूपमायुस्तथैव च ॥ ११ ॥ एते कालस्य निधयो नैतान् जानन्ति दुर्बुधाः । धात्राभिलिखितान्याहुः सर्वभूतानि कर्मणा ॥ १२ ॥ वर्ष, मास, पक्ष, दिन-रात और संध्याएँ क्रमशः इसके रूप और आयुका शोषण करती ही रहती हैं। ये सब कालके प्रतिनिधि हैं। मूढ़ मनुष्य इन्हें इस रूपमें नहीं जानते हैं। श्रेष्ठ पुरुषोंका कथन है कि विधाताने सम्पूर्ण भूतोंके ललाटमें कर्मके अनुसार रेखा खींच दी है (प्रारब्धके अनुसार उनकी आयु और सुख-दुःखके भोग नियत कर दिये हैं) ॥ रथः शरीरं भूतानां सत्त्वमाहुस्तु सारथिम् । इन्द्रियाणि हयानाहुः कर्मबुद्धिस्तु रश्मयः ॥ १३ ॥ तेषां हयानां यो वेगं धावतामनुधावति । स तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत् परिवर्तते ॥ १४ ॥ विद्वान् पुरुष कहते हैं कि प्राणियोंका शरीर रथके समान है, सत्त्व (सत्त्वगुणप्रधान बुद्धि) सारथि है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं और मन लगाम है। जो पुरुष स्वेच्छापूर्वक दौड़ते हुए उन घोड़ोंके वेगका अनुसरण करता है, वह तो इस संसारचक्रमें पहियेके समान घूमता रहता है ॥ यस्तान् संयमते बुद्ध्या संयतो न निवर्तते । ये तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत् परिवर्तते ॥ १५ ॥