महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पुत्राणामथ पौत्राणां पितॄणां च महीपते ।
आनुपूर्व्येण सर्वेषां प्रेतकार्याणि कारय ॥ ७ ॥
महाराज! अब आप क्रमशः अपने ताऊ, चाचा, पुत्र और पौत्रोंका मृतकसम्बन्धी कर्म करवाइये ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं घोरं संजयस्य महीपतिः ।
गतासुरिव निश्चेष्टो न्यपतत् पृथिवीतले ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! संजयका यह घोर वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र प्राणशून्यकी भाँति निश्चेष्ट हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ८ ॥
तं शयानमुपागम्य पृथिव्यां पृथिवीपतिम् ।
विदुरः सर्वधर्मज्ञ इदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
पृथिवीपति धृतराष्ट्रको पृथ्वीपर सोया देख सब धर्मोंके ज्ञाता विदुरजी उनके पास आये और इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥
उत्तिष्ठ राजन् किं शेषे मा शुचो भरतर्षभ ।
एषा वै सर्वसत्त्वानां लोकेश्वर परा गतिः ॥ १० ॥
'राजन्! उठिये, क्यों सो रहे हैं? भरतश्रेष्ठ! शोक न कीजिये। लोकनाथ! समस्त प्राणियोंकी यही अन्तिम गति है ॥ १० ॥
अभावादीनि भूतानि भावमध्यानि भारत ।
अभावनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ ११ ॥
'भरतनन्दन! सभी प्राणी जन्मसे पहले अव्यक्त थे, बीचमें व्यक्त हुए और अन्तमें मृत्युके बाद फिर अव्यक्त ही हो जायँगे, ऐसी दशामें उनके लिये शोक करनेकी क्या बात है? ॥ ११ ॥
न शोचन् मृतमन्वेति न शोचन् म्रियते नरः ।
एवं सांसिद्धिके लोके किमर्थमनुशोचसि ॥ १२ ॥
'शोक करनेवाला मनुष्य न तो मरे हुएके साथ जाता है और न स्वयं ही मरता है। जब लोककी यही स्वाभाविक स्थिति है, तब आप किसलिये बारंबार शोक कर रहे हैं? ॥ १२ ॥
अयुध्यमानो म्रियते युध्यमानस्तु जीवति ।
कालं प्राप्य महाराज न कश्चिदतिवर्तते ॥ १३ ॥
'महाराज! जो युद्ध नहीं करता, वह भी मरता है और युद्ध करनेवाला भी जीवित बच जाता है। कालको पाकर कोई भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ १३ ॥
कालः कर्षति भूतानि सर्वाणि विविधानि च ।
न कालस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यः कुरुसत्तम ॥ १४ ॥
'काल सभी विविध प्राणियोंको खींचता है। कुरुश्रेष्ठ! कालके लिये न तो कोई प्रिय है और न कोई द्वेषका पात्र ही ।। १४ ।। यथा वायुस्तृणाग्राणि संवर्तयति सर्वतः । तथा कालवशं यान्ति भूतानि भरतर्षभ ।। १५ ।। 'भरतश्रेष्ठ! जैसे वायु तिनकोंको सब ओर उड़ाती और गिराती रहती है, उसी प्रकार सारे प्राणी कालके अधीन होकर आते-जाते रहते हैं ।। १५ ।। एकसार्थप्रयातानां सर्वेषां तत्र गामिनाम् । यस्य कालः प्रयात्यग्रे तत्र का परिदेवना ।। १६ ।। 'एक साथ आये हुए सभी प्राणियोंको एक दिन वहीं जाना है। जिसका काल आ गया, वह पहले चला जाता है; फिर उसके लिये व्यर्थ शोक क्यों? ।। १६ ।। यांश्चापि निहतान् युद्धे राजंस्त्वमनुशोचसि । न शोच्या हि महात्मानः सर्वे ते त्रिदिवं गताः ।। १७ ।। 'राजन्! जो लोग युद्धमें मारे गये हैं और जिनके लिये आप बारंबार शोक कर रहे हैं, वे महामनस्वी वीर शोक करनेके योग्य नहीं हैं, वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें चले गये ।। १७ ।। न यज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्न तपोभिर्न विद्यया । तथा स्वर्गमुपायान्ति यथा शूरास्तनुत्यजः ।। १८ ।। 'अपने शरीरका त्याग करनेवाले शूरवीर जिस तरह स्वर्गमें जाते हैं, उस तरह दक्षिणावाले यज्ञों, तपस्याओं तथा विद्यासे भी कोई नहीं जा सकता ।। १८ ।। सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः । सर्वे चाभिमुखाः क्षीणास्तत्र का परिदेवना ।। १९ ।। 'वे सभी वीर वेदवेत्ता और अच्छी तरह ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले थे। वे सब-के-सब शत्रुओंका सामना करते हुए मारे गये थे; अतः उनके लिये शोक करनेकी क्या आवश्यकता है? ।। १९ ।। शरीराग्निषु शूराणां जुहुवुस्ते शराहुतीः । हूयमानान् शरांश्चैव सेहुरुत्तमपूरुषाः ।। २० ।। 'उन श्रेष्ठ पुरुषोंने शूरवीरोंके शरीररूपी अग्नियोंमें बाणरूपी हविष्यकी आहुतियाँ दी थीं और अपने शरीरमें जिनका हवन किया गया था, उन बाणोंका आघात सहन किया था ।। २० ।। एवं राजंस्तवाचक्षे स्वर्ग्यं पन्थानमुत्तमम् । न युद्धादधिकं किंचित् क्षत्रियस्येह विद्यते ।। २१ ।। 'राजन्! मैं तुम्हें स्वर्गप्राप्तिका सबसे उत्तम मार्ग बता रहा हूँ। इस जगत्में क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर स्वर्गसाधक दूसरा कोई उपाय नहीं है ।। २१ ।। क्षत्रियास्ते महात्मानः शूराः समितिशोभनाः ।
आशिषं परमां प्राप्ता न शोच्याः सर्व एव हि ॥ २२ ॥
‘वे सभी महामनस्वी क्षत्रिय वीर युद्धमें शोभा पानेवाले थे। वे उत्तम भोगोंसे सम्पन्न पुण्यलोकोंमें जा पहुँचे हैं, अतः उन सबके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ २२ ॥
आत्मनाऽऽत्मानमाश्वास्य मा शुचः पुरुषर्षभ ।
नाद्य शोकाभिभूतस्त्वं कार्यमुत्स्रष्टुमर्हसि ॥ २३ ॥
‘पुरुषप्रवर! आप स्वयं ही अपने मनको आश्वासन देकर शोकको त्याग दीजिये। आज शोकसे व्याकुल होकर आपको अपने कर्तव्य कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये’ ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि विदुरवाक्ये नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें विदुरजीका वाक्यविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3144)
दशमोऽध्यायः
स्त्रियों और प्रजाके लोगोंके सहित राजा धृतराष्ट्रका रणभूमिमें जानेके लिये नगरसे बाहर निकलना
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा तु पुरुषर्षभः ।
युज्यतां यानमित्युक्त्वा पुनर्वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! विदुरकी यह बात सुनकर पुरुषश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने रथ जोतनेकी आज्ञा देकर पुनः इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
शीघ्रमानय गान्धारीं सर्वाश्च भरतस्त्रियः ।
वधूं कुन्तीमुपादाय याश्चान्यास्तत्र योषितः ॥ २ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**गान्धारीको तथा भरतवंशी अन्य सब स्त्रियोंको शीघ्र ले आओ तथा वधू कुन्तीको साथ लेकर वहाँ जो दूसरी स्त्रियाँ हों, उन्हें भी बुला लो ॥ २ ॥
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा विदुरं धर्मवित्तमम् ।
शोकविप्रहतज्ञानो यानमेवान्वपद्यत ॥ ३ ॥
परम धर्मज्ञ विदुरजीसे ऐसा कहकर शोकसे जिनकी ज्ञानशक्ति नष्ट-सी हो गयी थी, वे धर्मात्मा राजा धृतराष्ट्र रथपर सवार हुए ॥ ३ ॥
गान्धारी पुत्रशोकार्ता भर्तुर्वचननोदिता ।
सह कुन्त्या यतो राजा सह स्त्रीभिरुपाद्रवत् ॥ ४ ॥
गान्धारी पुत्रशोकसे पीड़ित हो रही थीं, पतिकी आज्ञा पाकर वे कुन्ती तथा अन्य स्त्रियोंके साथ जहाँ राजा धृतराष्ट्र थे, वहाँ आयीं ॥ ४ ॥
ताः समासाद्य राजानं भृशं शोकसमन्विताः ।
आमन्त्र्यान्योन्यमीयुः स्म भृशमुच्चुक्रुशुस्ततः ॥ ५ ॥
वहाँ राजाके पास पहुँचकर अत्यन्त शोकमें डूबी हुई वे सारी स्त्रियाँ एक-दूसरीको पुकार-पुकारकर परस्पर गलेसे लग गयीं और जोर-जोरसे फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ ५ ॥
ताः समाश्वासयत् क्षत्ता ताभ्यश्चार्ततरः स्वयम् ।
अश्रुकण्ठीः समारोप्य ततोऽसौ निर्ययौ पुरात् ॥ ६ ॥
विदुरजीने उन सब स्त्रियोंको आश्वासन दिया। वे स्वयं भी उनसे अधिक आर्त हो गये थे। आँसुओंसे गद्गद कण्ठ हुई उन सबको रथपर चढ़ाकर वे नगरसे बाहर निकले ॥ ६ ॥
ततः प्रणादः संजज्ञे सर्वेषु कुरुवेश्मसु ।
आकुमारं पुरं सर्वमभवच्छोककर्षितम् ॥ ७ ॥ तदनन्तर कौरवोंके सभी घरोंमें बड़ा भारी आर्तनाद होने लगा। बूढ़ोंसे लेकर बच्चोंतक सारा नगर शोकसे व्याकुल हो उठा ॥ ७ ॥
अदृष्टपूर्वा या नार्यः पुरा देवगणैरपि । पृथग्जनेन दृश्यन्ते तास्तदा निहतेश्वराः ॥ ८ ॥ जिन स्त्रियोंको पहले कभी देवताओंने भी नहीं देखा था, उन्हींको उस समय पतियोंके मारे जानेपर साधारण लोग देख रहे थे ॥ ८ ॥
प्रकीर्य केशान् सुशुभान् भूषणान्यवमुच्य च । एकवस्त्रधरा नार्यः परिपेतुरनाथवत् ॥ ९ ॥ वे नारियाँ अपने सुन्दर केश बिखराये सारे आभूषण उतारकर एक ही वस्त्र धारण किये अनाथकी भाँति रणभूमिकी ओर जा रही थीं ॥ ९ ॥
श्वेतपर्वतरूपेभ्यो गृहेभ्यस्तास्त्वपाक्रमन् । गुहाभ्य इव शैलानां पृषत्यो हतयूथपाः ॥ १० ॥ कौरवोंके घर श्वेत पर्वतके समान जान पड़ते थे। उनसे जब वे स्त्रियाँ बाहर निकलीं, उस समय जिनका यूथपति मारा गया हो, पर्वतोंकी गुफासे निकली हुई उन चितकबरी हरिणियोंके समान दिखायी देने लगीं ॥ १० ॥
**तान्युदीर्णानि नारीणां तदा वृन्दान्यनेक turn / शः -> तान्युदीर्णानि नारीणां तदा वृन्दान्यनेकशः । शोकार्तान्यद्रवन् राजन् किशोरीणामिवाङ्गने ॥ ११ ॥ राजन्! राजभवनके विशाल आँगनमें एकत्र हुई उन किशोरी स्त्रियोंके अनेक समुदाय शोकसे पीड़ित होकर रणभूमिकी ओर उसी प्रकार चले, जैसे बछेडियाँ शिक्षाभूमिपर लायी जाती हैं ॥ ११ ॥
प्रगृह्य बाहून् क्रोशन्त्यः पुत्रान् भ्रातृन् पितॄनपि । दर्शयन्तीव ता ह स्म युगान्ते लोकसंक्षयम् ॥ १२ ॥ एक-दूसरीके हाथ पकड़कर पुत्रों, भाइयों और पिताओंके नाम ले-लेकर रोती हुई वे कुरुकुलकी नारियाँ प्रलयकालमें लोक-संहारका दृश्य दिखाती हुई-सी जान पड़ती थीं ॥ १२ ॥
विलपन्त्यो रुदत्यश्च धावमानास्ततस्ततः । शोकेनोपहतज्ञानाः कर्तव्यं न प्रजज्ञिरे ॥ १३ ॥ शोकसे उनकी ज्ञानशक्ति लुप्त-सी हो गयी थी। वे रोती और विलाप करती हुई इधर-उधर दौड़ रही थीं। उन्हें कोई कर्तव्य नहीं सूझ रहा था ॥ १३ ॥
व्रीडां जग्मुः पुरा याः स्म सखीनामपि योषितः । ता एकवस्त्रा निर्लज्जाः श्वश्रूणां पुरतोऽभवन् ॥ १४ ॥
जो युवतियाँ पहले सखियोंके सामने आनेमें भी लजाती थीं, वे ही उस दिन लाज छोड़कर एक वस्त्र धारण किये अपनी सासुओंके सामने उपस्थित हो गयी थीं ॥ १४ ॥
परस्परं सुसूक्ष्मेषु शोकेष्वाश्वासयंस्तदा ।
ताः शोकविह्वला राजन्नवैक्षन्त परस्परम् ॥ १५ ॥
राजन्! जो नारियाँ छोटे-से-छोटे शोकमें भी एक दूसरीके पास जाकर आश्वासन दिया करती थीं, वे ही शोकसे व्याकुल हो परस्पर दृष्टिपातमात्र कर रही थीं ॥
ताभिः परिवृतो राजा रुदतीभिः सहस्रशः ।
निर्ययौ नगराद् दीनस्तूर्णमायोधनं प्रति ॥ १६ ॥
उन रोती हुई सहस्रों स्त्रियोंसे घिरे हुए दुःखी राजा धृतराष्ट्र नगरसे युद्धस्थलमें जानेके लिये तुरंत निकल पड़े ॥ १६ ॥
शिल्पिनो वणिजो वैश्याः सर्वकर्मोपजीविनः ।
ते पार्थिवं पुरस्कृत्य निर्ययुर्नगराद् बहिः ॥ १७ ॥
कारीगर, व्यापारी वैश्य तथा सब प्रकारके कर्मोंसे जीवन-निर्वाह करनेवाले लोग राजाको आगे करके नगरसे बाहर निकले ॥ १७ ॥
तासां विक्रोशमानानामार्तानां कुरुसंक्षये ।
प्रादुरासीन्महान् शब्दो व्यथयन् भुवनान्युत ॥ १८ ॥
कौरवोंका संहार हो जानेपर आर्तभावसे रोती और विलपती हुई उन नारियोंका महान् आर्तनाद सम्पूर्ण लोकोंको व्यथित करता हुआ प्रकट होने लगा ॥ १८ ॥
युगान्तकाले सम्प्राप्ते भूतानां दह्यतामिव ।
अभावः स्यादयं प्राप्त इति भूतानि मेनिरे ॥ १९ ॥
प्रलयकाल आनेपर दग्ध होते हुए प्राणियोंके चीखने-चिल्लानेके समान उन स्त्रियोंके रोनेका वह महान् शब्द गूँज रहा था। सब प्राणी ऐसा समझने लगे कि यह संहारकाल आ पहुँचा है ॥ १९ ॥
भृशमुद्विग्नमनसस्ते पौराः कुरुसंक्षये ।
प्राक्रोशन्त महाराज स्वनुरक्तास्तदा भृशम् ॥ २० ॥
महाराज! कुरुकुलका संहार हो जानेसे अत्यन्त उद्विग्नचित्त हुए पुरवासी जो राजवंशके साथ पूर्ण अनुराग रखते थे, जोर-जोरसे रोने लगे ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्गमने दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रका नगरसे निकलनाविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
अध्याय (पृष्ठ 3147)
एकादशोऽध्यायः
राजा धृतराष्ट्रसे कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्माकी भेंट और कृपाचार्यका कौरव-पाण्डवोंकी सेनाके विनाशकी सूचना देना
वैशम्पायन उवाच
क्रोशमात्रं ततो गत्वा ददृशुस्तान् महारथान् ।
शारद्वतं कृपं द्रौणिं कृतवर्माणमेव च ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वे सब लोग हस्तिनापुरसे एक ही कोसकी दूरीपर पहुँचे होंगे कि उन्हें शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य, द्रोणकुमार अश्वत्थामा और कृतवर्मा—ये तीनों महारथी दिखायी दिये ॥ १ ॥
ते तु दृष्ट्वैव राजानं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् ।
अश्रुकण्ठा विनिःश्वस्य रुदन्तमिदमब्रुवन् ॥ २ ॥
रोते हुए ऐश्वर्यशाली प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रको देखते ही आँसुओंसे उनका गला भर आया और वे इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥
पुत्रस्तव महाराज कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
गतः सानुचरो राजन् शक्रलोकं महीपते ॥ ३ ॥
‘पृथ्वीनाथ महाराज! आपका पुत्र अत्यन्त दुष्कर कर्म करके अपने सेवकोंसहित इन्द्रलोकमें जा पहुँचा है ॥ ३ ॥
दुर्योधनबलान्मुक्ता वयमेव त्रयो रथाः ।
सर्वमन्यत् परिक्षीणं सैन्यं ते भरतर्षभ ॥ ४ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! दुर्योधनकी सेनासे केवल हम तीन रथी ही जीवित बचे हैं। आपकी अन्य सारी सेना नष्ट हो गयी’ ॥ ४ ॥
इत्येवमुक्त्वा राजानं कृपः शारद्वतस्ततः ।
गान्धारीं पुत्रशोकार्तामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
राजा धृतराष्ट्रसे ऐसा कहकर शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य पुत्रशोकसे पीड़ित हुई गान्धारीसे इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
अभीता युद्ध्यमानास्ते घ्नन्तः शत्रुगणान् बहून् ।
वीरकर्माणि कुर्वाणाः पुत्रास्ते निधनं गताः ॥ ६ ॥
‘देवि! आपके सभी पुत्र निर्भय होकर जूझते और बहुसंख्यक शत्रुओंका संहार करते हुए वीरोचित कर्म करके वीरगतिको प्राप्त हुए हैं ॥ ६ ॥
ध्रुवं सम्प्राप्य लोकांस्ते निर्मलान् शस्त्रनिर्जितान् । भास्वरं देहमास्थाय विहरन्त्यमरा इव ॥ ७ ॥ ‘निश्चय ही वे शस्त्रोंद्वारा जीते हुए निर्मल लोकोंमें पहुँचकर तेजस्वी शरीर धारण करके वहाँ देवताओंके समान विहार करते होंगे ॥ ७ ॥ न हि कश्चिद्धि शूराणां युद्ध्यमानः पराङ्मुखः । शस्त्रेण निधनं प्राप्तो न च कश्चित् कृताञ्जलिः ॥ ८ ॥ ‘उन शूरवीरोंमेंसे कोई भी युद्ध करते समय पीठ नहीं दिखा सका है। किसीने भी शत्रुके सामने हाथ नहीं जोड़े हैं। सभी शस्त्रके द्वारा मारे गये हैं ॥ ८ ॥ एवं तां क्षत्रियस्याहुः पुराणाः परमां गतिम् । शस्त्रेण निधनं संख्ये तन्न शोचितुमर्हसि ॥ ९ ॥ ‘इस प्रकार युद्धमें जो शस्त्रद्वारा मृत्यु होती है, उसे प्राचीन महर्षि क्षत्रियके लिये उत्तम गति बताते हैं; अतः उनके लिये आपको शोक नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥ न चापि शत्रवस्तेषामृद्ध्यन्ते राज्ञि पाण्डवाः । शृणु यत् कृतमस्माभिरश्वत्थामपुरोगमैः ॥ १० ॥ ‘महारानी! उनके शत्रु पाण्डव भी विशेष लाभमें नहीं हैं। अश्वत्थामाको आगे करके हमने जो कुछ किया है, उसे सुनिये ॥ १० ॥ अधर्मेण हतं श्रुत्वा भीमसेनेन ते सुतम् । सुप्तं शिबिरमासाद्य पाण्डूनां कदनं कृतम् ॥ ११ ॥ ‘भीमसेनेने आपके पुत्रको अधर्मसे मारा है, यह सुनकर हमलोग भी पाण्डवोंके सोते हुए शिविरमें जा पहुँचे और पाण्डववीरोंका संहार कर डाला ॥ ११ ॥ पञ्चाला निहताः सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रौपदेयाश्च पातिताः ॥ १२ ॥ ‘द्रुपदके पुत्र धृष्टद्युम्न आदि सारे पांचाल मार डाले गये और द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको भी हमने मार गिराया ॥ तथा विशसनं कृत्वा पुत्रशत्रुगणस्य ते । प्राद्रवाम रणे स्थातुं न हि शक्ष्यामहे त्रयः ॥ १३ ॥ ‘इस प्रकार आपके पुत्रके शत्रुओंका रणभूमिमें संहार करके हम तीनों भागे जा रहे हैं। अब यहाँ ठहर नहीं सकते ॥ १३ ॥ ते हि शूरा महेष्वासाः क्षिप्रमेष्यन्ति पाण्डवाः । अमर्षवशमापन्ना वैरं प्रतिजिहीर्षवः ॥ १४ ॥ ‘क्योंकि अमर्षमें भरे हुए वे महाधनुर्धर वीर पाण्डव वैरका बदला लेनेकी इच्छासे शीघ्र यहाँ आयेंगे ॥ १४ ॥ ते हतानात्मजान् श्रुत्वाप्रमत्ताः पुरुषर्षभाः ।
निरीक्षन्तः पदं शूराः क्षिप्रमेव यशस्विनि ॥ १५ ॥ 'यशस्विनि! अपने पुत्रोंके मारे जानेका समाचार सुनकर सदा सावधान रहनेवाले पुरुषप्रवर पाण्डव हमारा चरणचिह्न देखते हुए शीघ्र ही हमलोगोंका पीछा करेंगे ॥ तेषां तु कदनं कृत्वा संस्थातुं नोत्सहामहे । अनुजानीहि नो राज्ञि मा च शोके मनः कृथाः ॥ १६ ॥ 'रानीजी! उनके पुत्रों और सम्बन्धियोंका विनाश करके हम यहाँ ठहर नहीं सकते; अतः हमें जानेकी आज्ञा दीजिये और आप भी अपने मनसे शोकको निकाल दीजिये ॥ राजंस्त्वमनुजानीहि धैर्यमातिष्ठ चोत्तमम् । दिष्टान्तं पश्य चापि त्वं क्षात्रं धर्मं च केवलम् ॥ १७ ॥ (फिर वे धृतराष्ट्रसे बोले—) 'राजन्! आप भी हमें जानेकी आज्ञा प्रदान करें और महान् धैर्यका आश्रय लें, केवल क्षात्रधर्मपर दृष्टि रखकर इतना ही देखें कि उनकी मृत्यु कैसे हुई है?' ॥ १७ ॥ इत्येवमुक्त्वा राजानं कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्च भारत ॥ १८ ॥ अवेक्षमाणा राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् । गङ्गामनु महाराज तूर्णमश्वानचोदयन् ॥ १९ ॥ भारत! राजासे ऐसा कहकर उनकी प्रदक्षिणा करके कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामाने मनीषी राजा धृतराष्ट्रकी ओर देखते हुए तुरंत ही गङ्गातटकी ओर अपने घोड़े हाँक दिये ॥ १८-१९ ॥ अपक्रम्य तु ते राजन् सर्व एव महारथाः । आमन्त्र्यान्योन्यमुद्विग्नास्त्रिधा ते प्रययुस्तदा ॥ २० ॥ राजन्! वहाँसे हटकर वे सभी महारथी उद्विग्न हो एक-दूसरेसे विदा ले तीन मार्गोंपर चल दिये ॥ २० ॥ जगाम हास्तिनपुरं कृपः शारद्वतस्तदा । स्वमेव राष्ट्रं हार्दिक्यो द्रौणिर्व्यासाश्रमं ययौ ॥ २१ ॥ शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य तो हस्तिनापुर चले गये, कृतवर्मा अपने ही देशकी ओर चल दिया और द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने व्यास-आश्रमकी राह ली ॥ २१ ॥ एवं ते प्रययुर्वीरा वीक्षमाणाः परस्परम् । भयार्ताः पाण्डुपुत्राणामागस्कृत्वा महात्मनाम् ॥ २२ ॥ महात्मा पाण्डवोंका अपराध करके भयसे पीड़ित हुए वे तीनों वीर इस प्रकार एक-दूसरेकी ओर देखते हुए वहाँसे खिसक गये ॥ २२ ॥ समेत्य वीरा राजानं तदा त्वनुदिते रवौ । विप्रजग्मुर्महात्मानो यथेच्छकमरिंदमाः ॥ २३ ॥
राजा धृतराष्ट्रसे मिलकर शत्रुओंका दमन करनेवाले वे तीनों महामनस्वी वीर सूर्योदयसे पहले ही अपने अभीष्ट स्थानोंकी ओर चल पड़े ।। २३ ।।
समासाद्याथ वै द्रौणिं पाण्डुपुत्रा महारथाः ।
व्यजयंस्ते रणे राजन् विक्रम्य तदनन्तरम् ।। २४ ।।
राजन्! तदनन्तर महारथी पाण्डवोंने द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके पास पहुँचकर उसे बलपूर्वक युद्धमें पराजित किया ।। २४ ।।
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि कृपद्रौणिभोजदर्शने
एकादशोऽध्यायः ।। ११ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्माका दर्शनविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११ ।।
अध्याय (पृष्ठ 3151)
द्वादशोऽध्यायः
पाण्डवोंका धृतराष्ट्रसे मिलना, धृतराष्ट्रके द्वारा भीमकी लोहमयी प्रतिमाका भंग होना और शोक करनेपर श्रीकृष्णका उन्हें समझाना
वैशम्पायन उवाच
हतेषु सर्वसैन्येषु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
शुश्रुवे पितरं वृद्धं निर्यान्तं गजसाह्वयात् ॥ १ ॥
सोऽभ्ययात् पुत्रशोकार्तः पुत्रशोकपरिप्लुतम् ।
शोचमानं महाराज भ्रातृभिः सहितस्तदा ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज जनमेजय! समस्त सेनाओंका संहार हो जानेपर धर्मराज युधिष्ठिरने जब सुना कि हमारे बूढ़े ताऊ संग्राममें मरे हुए वीरोंका अन्त्येष्टिकर्म करानेके लिये हस्तिनापुरसे चल दिये हैं, तब वे स्वयं पुत्रशोकसे आतुर हो पुत्रोंके ही शोकमें डूबकर चिन्तामग्न हुए राजा धृतराष्ट्रके पास अपने सब भाइयोंके साथ गये ।। १-२ ।।
अन्वीयमानो वीरेण दाशार्हेण महात्मना ।
युयुधानेन च तथा तथैव च युयुत्सुना ॥ ३ ॥
उस समय दशार्हकुलनन्दन वीर महात्मा श्रीकृष्ण, सात्यकि और युयुत्सु भी उनके पीछे-पीछे गये ।। ३ ।।
तमन्वगात् सुदुःखार्ता द्रौपदी शोककर्शिता ।
सह पाञ्चालयोषिद्भिर्यास्तत्रासन् समागताः ॥ ४ ॥
अत्यन्त दुःखसे आतुर और शोकसे दुबली हुई द्रौपदीने भी वहाँ आयी हुई पांचाल-महिलाओंके साथ उनका अनुसरण किया ।। ४ ।।
स गङ्गामनु वृन्द्वानि स्त्रीणां भरतसत्तम ।
कुररीणामिवार्तानां क्रोशन्तीनां ददर्श ह ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! गंगातटपर पहुँचकर युधिष्ठिरने कुररीकी तरह आर्तस्वरसे विलाप करती हुई स्त्रियोंके कई दल देखे ।। ५ ।।
ताभिः परिवृतो राजा क्रोशन्तीभिः सहस्रशः ।
ऊर्ध्वबाहुभिरार्ताभी रुदतीभिः प्रियाप्रियैः ॥ ६ ॥
वहाँ पाण्डवोंके प्रिय और अप्रिय जनोंके लिये हाथ उठाकर आर्तस्वरसे रोती और करुण क्रन्दन करती हुई सहस्रों महिलाओंने राजा युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेर लिया ।।
क्व नु धर्मज्ञता राज्ञः क्व नु साद्यानृशंसता ।
यच्चावधीत् पितॄन् भ्रातॄन् गुरुपुत्रान् सखीनपि ॥ ७ ॥
वे बोलीं—'अहो! राजाकी वह धर्मज्ञता और दयालुता कहाँ चली गयी कि इन्होंने ताऊ, चाचा, भाई, गुरुपुत्रों और मित्रोंका भी वध कर डाला ॥ ७ ॥
घातयित्वा कथं द्रोणं भीष्मं चापि पितामहम् ।
मनस्तेऽभून्महाबाहो हत्वा चापि जयद्रथम् ॥ ८ ॥
'महाबाहो! द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म और जयद्रथका भी वध करके आपके मनकी कैसी अवस्था हुई? ॥ ८ ॥
किं नु राज्येन ते कार्यं पितॄन् भ्रातृनपश्यतः ।
अभिमन्युं च दुर्धर्षं द्रौपदेयांश्च भारत ॥ ९ ॥
'भरतवंशी नरेश! अपने ताऊ, चाचा और भाइयोंको, दुर्जय वीर अभिमन्युको तथा द्रौपदीके सभी पुत्रोंको न देखनेपर इस राज्यसे आपका क्या प्रयोजन है?' ॥ ९ ॥
अतीत्य ता महाबाहुः क्रोशन्तीः कुररीरिव ।
ववन्दे पितरं ज्येष्ठं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १० ॥
धर्मराज महाबाहु युधिष्ठिरने कुररीकी भाँति क्रन्दन करती हुई उन स्त्रियोंके घेरेको लाँघकर अपने ताऊ धृतराष्ट्रको प्रणाम किया ॥ १० ॥
ततोऽभिवाद्य पितरं धर्मेणामित्रकर्षणः ।
न्यवेदयन्त नामानि पाण्डवास्तेऽपि सर्वशः ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् सभी शत्रुसूदन पाण्डवोंने धर्मानुसार ताऊको प्रणाम करके अपने नाम बताये ॥ ११ ॥
तमात्मजान्तकरणं पिता पुत्रवधार्दितः ।
अप्रीयमाणः शोकार्तः पाण्डवं परिषस्वजे ॥ १२ ॥
पुत्रवधसे पीड़ित हुए पिताने शोकसे व्याकुल हो अपने पुत्रोंका अन्त करनेवाले पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको हृदयसे लगाया; परंतु उस समय उनका मन प्रसन्न नहीं था ॥ १२ ॥
धर्मराजं परिष्वज्य सान्त्वयित्वा च भारत ।
दुष्टात्मा भीममन्वैच्छद् दिधक्षुरिव पावकः ॥ १३ ॥
भरतनन्दन! धर्मराजको हृदयसे लगाकर उन्हें सान्त्वना दे धृतराष्ट्र भीमको इस प्रकार खोजने लगे, मानो आग बनकर उन्हें जला डालना चाहते हों। उस समय उनके मनमें दुर्भावना जाग उठी थी ॥ १३ ॥
स कोपपावकस्तस्य शोकवायुसमीरितः ।
भीमसेनमयं दावं दिधक्षुरिव दृश्यते ॥ १४ ॥
शोकरूपी वायुसे बढ़ी हुई उनकी क्रोधमयी अग्नि ऐसी दिखायी दे रही थी, मानो वह भीमसेनरूपी वनको जलाकर भस्म कर देना चाहती हो ॥ १४ ॥
तस्य संकल्पमाज्ञाय भीमं प्रत्यशुभं हरिः ।
भीममाक्षिप्य पाणिभ्यां प्रददौ भीममायसम् ॥ १५ ॥ भीमसेनके प्रति उनके अशुभ संकल्पको जानकर श्रीकृष्णने भीमसेनको झटका देकर हटा दिया और दोनों हाथोंसे उनकी लोहमयी मूर्ति धृतराष्ट्रके सामने कर दी ॥ १५ ॥
प्रागेव तु महाबुद्धिर्बुद्ध्वा तस्येङ्गितं हरिः । संविधानं महाप्राज्ञस्तत्र चक्रे जनार्दनः ॥ १६ ॥ महाज्ञानी और परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णको पहलेसे ही उनका अभिप्राय ज्ञात हो गया था, इसलिये उन्होंने वहाँ यह व्यवस्था कर ली थी ॥ १६ ॥
तं गृहीत्वैव पाणिभ्यां भीमसेनमयस्मयम् । बभञ्ज बलवान् राजा मन्यमानो वृकोदरम् ॥ १७ ॥ बलवान् राजा धृतराष्ट्रने उस लोहमय भीमसेन-को ही असली भीम समझा और उसे दोनों बाँहोंसे दबाकर तोड़ डाला ॥ १७ ॥
नागायुतबलप्राणः स राजा भीममायसम् । भङ्क्त्वा विमथितोरस्कः सुस्राव रुधिरं मुखात् ॥ १८ ॥ राजा धृतराष्ट्रमें दस हजार हाथियोंका बल था तो भी भीमकी लोहमयी प्रतिमाको तोड़कर उनकी छाती व्यथित हो गयी और मुँहसे खून निकलने लगा ॥ १८ ॥
ततः पपात मेदिन्यां तथैव रुधिरोक्षितः । प्रपुष्पिताग्रशिखरः पारिजात इव द्रुमः ॥ १९ ॥ वे उसी अवस्थामें खूनसे भींगकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो ऊपरकी डालीपर खिले हुए लाल फूलोंसे सुशोभित पारिजातका वृक्ष धराशायी हो गया हो ॥ १९ ॥
प्रत्यगृह्णाच्च तं विद्वान् सूतो गावलगणिस्तदा । मैवमित्यब्रवीच्चैनं शमयन् सान्त्वयन्निव ॥ २० ॥ उस समय उनके विद्वान् सारथि गवलगणपुत्र संजयने उन्हें पकड़कर उठाया और समझा-बुझाकर शान्त करते हुए कहा—'आपको ऐसा नहीं करना चाहिये' ॥ २० ॥
स तु कोपं समुत्सृज्य गतमन्युर्महामनाः । हा हा भीमेति चुक्रोश नृपः शोकसमन्वितः ॥ २१ ॥ जब रोषका आवेश दूर हो गया, तब वे महामना नरेश क्रोध छोड़कर शोकमें डूब गये और 'हा भीम! हा भीम!' कहते हुए विलाप करने लगे ॥ २१ ॥
तं विदित्वा गतक्रोधं भीमसेनवधार्दितम् । वासुदेवो वरः पुंसामिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥ उन्हें भीमसेनके वधकी आशंकासे पीड़ित और क्रोध-शून्य हुआ जान पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा— ॥
मा शुचो धृतराष्ट्र त्वं नैष भीमस्त्वया हतः । आयसी प्रतिमा ह्येषा त्वया निष्पातिता विभो ॥ २३ ॥
'महाराज धृतराष्ट्र! आप शोक न करें। ये भीम आपके हाथसे नहीं मारे गये हैं। प्रभो! यह तो लोहेकी एक प्रतिमा थी, जिसे आपने चूर-चूर कर डाला ॥ २३ ॥
त्वां क्रोधवशमापन्नं विदित्वा भरतर्षभ ।
मयापकृष्टः कौन्तेयो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतः ॥ २४ ॥
'भरतश्रेष्ठ! आपको क्रोधके वशीभूत हुआ जान मैंने मृत्युकी दाढ़ोंमें फँसे हुए कुन्तीकुमार भीमसेनको पीछे खींच लिया था ॥ २४ ॥
न हि ते राजशार्दूल बले तुल्योऽस्ति कश्चन ।
कः सहेत महाबाहो बाह्रोर्विग्रहणं नरः ॥ २५ ॥
'राजसिंह! बलमें आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। महाबाहो! आपकी दोनों भुजाओंकी पकड़ कौन मनुष्य सह सकता है? ॥ २५ ॥
यथान्तकमनुप्राप्य जीवन् कश्चिन्न मुच्यते ।
एवं बाह्वन्तरं प्राप्य तव जीवेन्न कश्चन ॥ २६ ॥
'जैसे यमराजके पास पहुँचकर कोई भी जीवित नहीं छूट सकता, उसी प्रकार आपकी भुजाओंके बीचमें पड़ जानेपर किसीके प्राण नहीं बच सकते ॥ २६ ॥
तस्मात् पुत्रेण या तेऽसौ प्रतिमा कारिताऽऽयसी ।
भीमस्य सेयं कौरव्य तवैवोपहृता मया ॥ २७ ॥
'कुरुनन्दन! इसलिये आपके पुत्रने जो भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमा बनवा रखी थी, वही मैंने आपको भेंट कर दी ॥ २७ ॥
पुत्रशोकाभिसंतप्तं धर्मादपकृतं मनः ।
तव राजेन्द्र तेन त्वं भीमसेनं जिघांससि ॥ २८ ॥
'राजेन्द्र! आपका मन पुत्रशोकसे संतप्त हो धर्मसे विचलित हो गया है; इसीलिये आप भीमसेनको मार डालना चाहते हैं ॥ २८ ॥
न त्वेतत् ते क्षमं राजन् हन्यास्त्वं यद् वृकोदरम् ।
न हि पुत्रा महाराज जीवेयुस्ते कथंचन ॥ २९ ॥
'राजन्! आपके लिये यह कदापि उचित न होगा कि आप भीमका वध करें। महाराज! (भीमसेन न मारते तो भी) आपके पुत्र किसी तरह जीवित नहीं रह सकते थे (क्योंकि उनकी आयु पूरी हो चुकी थी) ॥ २९ ॥
तस्माद् यत् कृतमस्माभिर्मन्यमानैः शमं प्रति ।
अनुमन्यस्व तत् सर्वं मा च शोके मनः कृथाः ॥ ३० ॥
'अतः हमलोगोंने सर्वत्र शान्ति स्थापित करनेके उद्देश्यसे जो कुछ किया है, उन सब बातोंका आप भी अनुमोदन करें। मनको व्यर्थ शोकमें न डालें' ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि आयसभीमभङ्गे द्वादशोऽध्यायः ।। १२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमाका भंग होनाविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।
अध्याय (पृष्ठ 3156)
त्रयोदशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका धृतराष्ट्रको फटकारकर उनका क्रोध शान्त करना और धृतराष्ट्रका पाण्डवोंको हृदयसे लगाना
वैशम्पायन उवाच
तत एनमुपातिष्ठन् शौचार्थं परिचारकाः ।
कृतशौचं पुनश्चैनं प्रोवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर सेवक-गण शौच-सम्बन्धी कार्य सम्पन्न करानेके लिये राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुए। जब वे शौचकृत्य पूर्ण कर चुके, तब भगवान् मधुसूदनने फिर उनसे कहा— ॥
राजन्नधीता वेदास्ते शास्त्राणि विविधानि च ।
श्रुतानि च पुराणानि राजधर्माश्च केवलाः ॥ २ ॥
‘राजन्! आपने वेदों और नाना प्रकारके शास्त्रोंका अध्ययन किया है। सभी पुराणों और केवल राजधर्मोंका भी श्रवण किया है ॥ २ ॥
एवं विद्वान् महाप्राज्ञः समर्थः सन् बलाबले ।
आत्मापराधात् कस्मात् त्वं कुरुषे कोपमीदृशम् ॥ ३ ॥
‘ऐसे विद्वान्, परम बुद्धिमान् और बलाबलका निर्णय करनेमें समर्थ होकर भी अपने ही अपराधसे होनेवाले इस विनाशको देखकर आप ऐसा क्रोध क्यों कर रहे हैं? ॥
उक्तवांस्त्वां तदैवाहं भीष्मद्रोणौ च भारत ।
विदुरः संजयश्चैव वाक्यं राजन् न तत् कृथाः ॥ ४ ॥
‘भरतनन्दन! मैंने तो उसी समय आपसे यह बात कह दी थी, भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर और संजयने भी आपको समझाया था। राजन्! परंतु आपने किसीकी बात नहीं मानी ॥ ४ ॥
स वार्यमाणो नास्माकमकार्षीर्वचनं तदा ।
पाण्डवानधिकाञ्जानन् बले शौर्ये च कौरव ॥ ५ ॥
‘कुरुनन्दन! हमलोगोंने आपको बहुत रोका; परंतु आपने बल और शौर्यमें पाण्डवोंको बढ़ा-चढ़ा जानकर भी हमारा कहना नहीं माना ॥ ५ ॥
राजा हि यः स्थिरप्रज्ञः स्वयं दोषानवेक्षते ।
देशकालविभागं च परं श्रेयः स विन्दति ॥ ६ ॥
‘जिसकी बुद्धि स्थिर है, ऐसा जो राजा स्वयं दोषोंको देखता और देश-कालके विभागको समझता है, वह परम कल्याणका भागी होता है ॥ ६ ॥
उच्यमानस्तु यः श्रेयो गृह्णीते नो हिताहिते ।
आपदः समनुप्राप्य स शोचत्यनये स्थितः ॥ ७ ॥
‘जो हितकी बात बतानेपर भी हिताहितकी बातको नहीं समझ पाता, वह अन्यायका आश्रय ले बड़ी भारी विपत्तिमें पड़कर शोक करता है ॥ ७ ॥
ततोऽन्यवृत्तमात्मानं समवेक्षस्व भारत ।
राजंस्त्वं ह्यविधेयात्मा दुर्योधनवशे स्थितः ॥ ८ ॥
‘भरतनन्दन! आप अपनी ओर तो देखिये। आपका बर्ताव सदा ही न्यायके विपरीत रहा है। राजन्! आप अपने मनको वशमें न करके सदा दुर्योधनके अधीन रहे हैं ॥
आत्मापराधादापन्नस्तत् किं भीमं जिघांससि ।
तस्मात् संयच्छ कोपं त्वं स्वमनुस्मर दुष्कृतम् ॥ ९ ॥
‘अपने ही अपराधसे विपत्तिमें पड़कर आप भीमसेनको क्यों मार डालना चाहते हैं? इसलिये क्रोधको रोकिये और अपने दुष्कर्मोंको याद कीजिये ॥ ९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3158)
व्यासजी गान्धारीको समझा रहे हैं
यस्तु तां स्पर्धया क्षुद्रः पाञ्चालीमानयत् सभाम् । स हतो भीमसेनेन वैरं प्रतिजिहीर्षता ॥ १० ॥ 'जिस नीच दुर्योधनने मनमें जलन रखनेके कारण पांचालराजकुमारी कृष्णाको भरी सभामें बुलाकर अपमानित किया, उसे वैरका बदला लेनेकी इच्छासे भीमसेनने मार डाला ॥ १० ॥
आत्मनोऽतिक्रमं पश्य पुत्रस्य च दुरात्मनः । यदनागसि पाण्डूनां परित्यागस्त्वया कृतः ॥ ११ ॥ 'आप अपने और दुरात्मा पुत्र दुर्योधनके उस अत्याचारपर तो दृष्टि डालिये, जब कि बिना किसी अपराधके ही आपने पाण्डवोंका परित्याग कर दिया था' ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स कृष्णेन सर्वं सत्यं जनाधिप । उवाच देवकीपुत्रं धृतराष्ट्रो महीपतिः ॥ १२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर! जब इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने सब सच्ची-सच्ची बातें कह डालीं, तब पृथ्वीपति धृतराष्ट्रने देवकीनन्दन श्रीकृष्णसे कहा— ॥
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव । पुत्रस्नेहस्तु बलवान् धैर्यान्मां समचालयत् ॥ १३ ॥ 'महाबाहु! माधव! आप जैसा कह रहे हैं, ठीक ऐसी ही बात है; परंतु पुत्रका स्नेह प्रबल होता है, जिसने मुझे धैर्यसे विचलित कर दिया था ॥ १३ ॥
दिष्ट्या तु पुरुषव्याघ्रो बलवान् सत्यविक्रमः । त्वद्गुप्तो नागमत् कृष्ण भीमो बाह्वन्तरं मम ॥ १४ ॥ 'श्रीकृष्ण! सौभाग्यकी बात है कि आपसे सुरक्षित होकर बलवान् सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह भीमसेन मेरी दोनों भुजाओंके बीचमें नहीं आये ॥ १४ ॥
इदानीं त्वहमव्यग्रो गतमन्युर्गतज्वरः । मध्यमं पाण्डवं वीर द्रष्टुमिच्छामि माधव ॥ १५ ॥ 'माधव! अब इस समय मैं शान्त हूँ। मेरा क्रोध उतर गया है और चिन्ता भी दूर हो गयी है; अतः मैं मध्यम पाण्डव वीर अर्जुनको देखना चाहता हूँ ॥ १५ ॥
हतेषु पार्थिवेन्द्रेषु पुत्रेषु निहतेषु च । पाण्डुपुत्रेषु वै शर्म प्रीतिश्चाप्यवतिष्ठते ॥ १६ ॥ 'समस्त राजाओं तथा अपने पुत्रोंके मारे जानेपर अब मेरा प्रेम और हितचिन्तन पाण्डुके इन पुत्रोंपर ही आश्रित है' ॥ १६ ॥
ततः स भीमं च धनंजयं च माद्रयाश्च पुत्रौ पुरुषप्रवीरौ ।
पस्पर्श गात्रैः प्ररुदन् सुगात्रा- नाश्वास्य कल्याणमुवाच चैतान् ॥ १७ ॥
तदनन्तर रोते हुए धृतराष्ट्रने सुन्दर शरीरवाले भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीके दोनों पुत्र नरवीर नकुल-सहदेवको अपने अंगोंसे लगाया और उन्हें सान्त्वना देकर कहा—'तुम्हारा कल्याण हो' ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रकोपविमोचने पाण्डवपरिष्वङ्गो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें 'धृतराष्ट्रका क्रोध छोड़कर पाण्डवोंको हृदयसे लगाना' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥