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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

(प्रतिज्ञापर्व)

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(प्रतिज्ञापर्व)

द्विसप्ततितमोऽध्यायः

अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध

(धृतराष्ट्र उवाच
अथ संशप्तकैः सार्धं युध्यमाने धनंजये ।
अभिमन्यौ हते चापि बाले बलवतां वरे ।।
महर्षिसत्तमे याते युधिष्ठिरपुरोगमाः ।
पाण्डवाः किमथाकार्षुः शोकेन हतचेतसः ।।
कथं संशप्तकेभ्यो वा निवृत्तो वानरध्वजः ।
केन वा कथितः तस्य प्रशान्तः सुतपावकः ।।
एतन्मे शंस तत्त्वेन सर्वमेवेह संजय ।)

**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब अर्जुन संशप्तकोंके साथ युद्ध कर रहे थे, जब बलवानोंमें श्रेष्ठ बालक अभिमन्यु मारा गया और जब महर्षियोंमें श्रेष्ठ व्यास (युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर) चले गये, तब शोकसे व्याकुल चित्तवाले युधिष्ठिर और अन्य पाण्डवोंने क्या किया? कपिध्वज अर्जुन संशप्तकोंकी ओरसे कैसे लौटे तथा किसने उनसे कहा कि तुम्हारा अग्निके समान तेजस्वी पुत्र सदाके लिये शान्त हो गया। इन सब बातोंको तुम यथार्थरूपसे मुझे बताओ।

संजय उवाच
तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते घोरे प्राणभृतां क्षये ।
आदित्येऽस्तं गते श्रीमान् संध्याकाल उपस्थिते ।। १ ।।
व्यपयातेषु वासाय सर्वेषु भरतर्षभ ।
हत्वा संशप्तकव्रातान् दिव्यैरस्त्रैः कपिध्वजः ।। २ ।।
प्रायात् स शिविरं जिष्णुर्जैत्रमास्थाय तं रथम् ।
गच्छन्नेव च गोविन्दं साश्रुकण्ठोऽभ्यभाषत ।। ३ ।।

**संजय बोले—**भरतश्रेष्ठ! प्राणधारियोंका संहार करनेवाले उस भयंकर दिनके बीत जानेपर जब सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और संध्याकाल उपस्थित हुआ, उस समय समस्त सैनिक जब शिविरमें विश्रामके लिये चल दिये, तब विजयशील श्रीमान् कपिध्वज अर्जुन अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा संशप्तकसमूहोंका वध करके अपने उस विजयी रथपर बैठे हुए

शिविरकी ओर चले। चलते-चलते ही वे अश्रुगद्गदकण्ठ हो भगवान् गोविन्दसे इस प्रकार बोले— ॥ १—३ ॥

किं नु मे हृदयं त्रस्तं वाक् च सज्जति केशव । स्पन्दन्ति चाप्यनिष्टानि गात्रं सीदति चाप्युत ॥ ४ ॥ ‘केशव! न जाने क्यों आज मेरा हृदय धड़क रहा है, वाणी लड़खड़ा रही है, अनिष्ट-सूचक बायें अंग फड़क रहे हैं और शरीर शिथिल होता जा रहा है ॥ ४ ॥

अनिष्टं चैव मे श्लिष्टं हृदयान्नापसर्पति । भुवि ये दिक्षु चात्युग्रा उत्पातास्त्रासयन्ति माम् ॥ ५ ॥ ‘मेरे हृदयमें अनिष्टकी चिन्ता घुसी हुई है, जो किसी प्रकार वहाँसे निकलती ही नहीं है। पृथ्वीपर तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें होनेवाले भयंकर उत्पात मुझे डरा रहे हैं ॥ ५ ॥

बहुप्रकारा दृश्यन्ते सर्व एवाघशंसिनः । अपि स्वस्ति भवेद् राज्ञः सामात्यस्य गुरोर्मम ॥ ६ ॥ ‘ये उत्पात अनेक प्रकारके दिखायी देते हैं और सब-के-सब भारी अमंगलकी सूचना दे रहे हैं। क्या मेरे पूज्य भ्राता राजा युधिष्ठिर अपने मन्त्रियोंसहित सकुशल होंगे?’ ॥ ६ ॥

वासुदेव उवाच

व्यक्तं शिवं तव भ्रातुः सामात्यस्य भविष्यति । मा शुचः किञ्चिदेवान्यत् तत्रानिष्टं भविष्यति ॥ ७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण बोले—अर्जुन! शोक न करो। मुझे स्पष्ट जान पड़ता है कि मन्त्रियोंसहित तुम्हारे भाईका कल्याण ही होगा। इस अपशकुनके अनुसार कोई दूसरा ही

अनिष्ट हुआ होगा ॥ ७ ॥

संजय उवाच

ततः संध्यामुपास्यैव वीरौ वीरावसादने । कथयन्तौ रणे वृत्तं प्रयातौ रथमास्थितौ ॥ ८ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर वे दोनों वीर उस वीरसंहारक रणभूमिमें संध्या-वन्दन करके पुनः रथपर बैठकर युद्धसम्बन्धी बातें करते हुए आगे बढ़े ॥ ८ ॥

ततः स्वशिविरं प्राप्तौ हतानन्दं हतत्विषम् । वासुदेवोऽर्जुनश्चैव कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ९ ॥ फिर श्रीकृष्ण और अर्जुन जो अत्यन्त दुष्कर कर्म करके आ रहे थे, अपने शिविरके निकट आ पहुँचे। उस समय वह शिविर आनन्दशून्य और श्रीहीन दिखायी देता था ॥ ९ ॥

ध्वस्ताकारं समालक्ष्य शिविरं परवीरहा । बीभत्सुरब्रवीत् कृष्णमस्वस्थहृदयस्ततः ॥ १० ॥ अपनी छावनीको विध्वस्त हुई-सी देखकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनका हृदय चिन्तित हो उठा। अतः वे भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ॥ १० ॥

नदन्ति नाद्य तूर्याणि मङ्गल्यानि जनार्दन । मिश्रा दुन्दुभिनिर्घोषैः शङ्खाश्चाडम्बरैः सह ॥ ११ ॥ ‘जनार्दन! आज इस शिविरमें मांगलिक बाजे नहीं बज रहे हैं। दुन्दुभिनाद तथा तुरहीके शब्दोंके साथ मिली हुई शंखध्वनि भी नहीं सुनायी देती है ॥ ११ ॥

वीणा नैवाद्य वाद्यन्ते शम्यातालस्वनैः सह । मङ्गल्यानि च गीतानि न गायन्ति पठन्ति च ॥ १२ ॥ स्तुतियुक्तानि रम्याणि ममानीकेषु बन्दिनः । ‘ढाक और करतारकी ध्वनिके साथ आज वीणा भी नहीं बज रही है। मेरी सेनाओंमें वन्दीजन न तो मंगलगीत गा रहे हैं और न स्तुतियुक्त मनोहर श्लोकोंका ही पाठ करते हैं ॥ १२१/२ ॥

योधाश्चापि हि मां दृष्ट्वा निवर्तन्ते ह्यधोमुखाः ॥ १३ ॥ कर्माणि च यथापूर्वं कृत्वा नाभिवदन्ति माम् । अपि स्वस्ति भवेदद्य भ्रातृभ्यो मम माधव ॥ १४ ॥ ‘मेरे सैनिक मुझे देखकर नीचे मुख किये लौट जाते हैं। पहलेकी भाँति अभिवादन करके मुझसे युद्धका समाचार नहीं बता रहे हैं। माधव! क्या आज मेरे भाई सकुशल होंगे?’ ॥ १३-१४ ॥

न हि शुद्ध्यति मे भावो दृष्ट्वा स्वजनमाकुलम् । अपि पाञ्चालराजस्य विराटस्य च मानद ॥ १५ ॥

सर्वेषां चैव योधानां सामग्र्यं स्यान्ममाच्युत । ‘आज इन स्वजनोंको व्याकुल देखकर मेरे हृदयकी आशंका नहीं दूर होती है। दूसरोंको मान देनेवाले अच्युत श्रीकृष्ण! राजा द्रुपद, विराट तथा मेरे अन्य सब योद्धाओंका समुदाय तो सकुशल होगा न? ।। १५ १/२ ।। न च मामद्य सौभद्रः प्रहृष्टो भ्रातृभिः सह । रणादायान्तुमुचितं प्रत्युद्याति हसन्निव ।। १६ ।। ‘आज प्रतिदिनकी भाँति सुभद्रकुमार अभिमन्यु अपने भाइयोंके साथ हर्षमें भरकर हँसता हुआ-सा युद्धसे लौटते हुए मेरी उचित अगवानी करने नहीं आ रहा है (इसका क्या कारण है?)’ ।। १६ ।।

संजय उवाच

एवं संकथयन्तौ तौ प्रविष्टौ शिविरं स्वकम् । ददृशाते भृशास्वस्थान् पाण्डवान् नष्टचेतसः ।। १७ ।। **संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार बातें करते हुए उन दोनोंने शिविरमें पहुँचकर देखा कि पाण्डव अत्यन्त व्याकुल और हतोत्साह हो रहे हैं ।। १७ ।। दृष्ट्वा भ्रातूंश्च पुत्रांश्च विमना वानरध्वजः । अपश्यंश्चैव सौभद्रमिदं वचनमब्रवीत् ।। १८ ।। भाइयों तथा पुत्रोंको इस अवस्थामें देख और सुभद्रकुमार अभिमन्युको वहाँ न पाकर कपिध्वज अर्जुनका मन अत्यन्त उदास हो गया तथा वे इस प्रकार बोले— ।। १८ ।। मुखवर्णोऽप्रसन्नो वः सर्वेषामेव लक्ष्यते । न चाभिमन्युं पश्यामि न च मां प्रतिनन्दथ ।। १९ ।। ‘आज आप सभी लोगोंके मुखकी कान्ति अप्रसन्न दिखायी दे रही है, इधर मैं अभिमन्युको नहीं देख पाता हूँ और आपलोग भी मुझसे प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप नहीं कर रहे हैं ।। १९ ।। मया श्रुतश्च द्रोणेन चक्रव्यूहो विनिर्मितः । न च वस्तस्य भेत्तास्ति विना सौभद्रमर्भकम् ।। २० ।। ‘मैंने सुना है कि आचार्य द्रोणने चक्रव्यूहकी रचना की थी। आपलोगोंमेंसे बालक अभिमन्युके सिवा दूसरा कोई उस व्यूहका भेदन नहीं कर सकता था ।। २० ।। न चोपदिष्टस्तस्यासीन्मयानीकाद् विनिर्गमः । कच्चिन्न बालो युष्माभिः परानीकं प्रवेशितः ।। २१ ।। ‘परंतु मैंने उसे उस व्यूहसे निकलनेका ढंग अभी नहीं बताया था। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि आपलोगोंने उस बालकको शत्रुके व्यूहमें भेज दिया हो? ।। २१ ।। भित्त्वानीकं महेष्वासः परेषां बहुशो युधि ।

कच्चिन्न निहतः संख्ये सौभद्रः परवीरहा ॥ २२ ॥ 'शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला महाधनुर्धर सुभद्राकुमार अभिमन्यु युद्धमें शत्रुओंके उस व्यूहका अनेकों बार भेदन करके अन्तमें वहीं मारा तो नहीं गया? ॥ २२ ॥ लोहिताक्षं महाबाहुं जातं सिंहमिवाद्रिषु । उपेन्द्रसदृशं ब्रूत कथमायोधने हतः ॥ २३ ॥ 'पर्वतोंमें उत्पन्न हुए सिंहके समान लाल नेत्रोंवाले, श्रीकृष्णतुल्य पराक्रमी महाबाहु अभिमन्युके विषयमें आपलोग बतावें। वह युद्धमें किस प्रकार मारा गया? ॥ २३ ॥ सुकुमारं महेष्वासं वासवस्यात्मजात्मजम् । सदा मम प्रियं ब्रूत कथमायोधने हतः ॥ २४ ॥ 'इन्द्रके पौत्र तथा मुझे सदा प्रिय लगनेवाले सुकुमार शरीर महाधनुर्धर अभिमन्युके विषयमें बताइये। वह युद्धमें कैसे मारा गया? ॥ २४ ॥ सुभद्रायाः प्रियं पुत्रं द्रौपद्याः केशवस्य च । अम्बायाश्च प्रियं नित्यं कोऽवधीत् कालमोहितः ॥ २५ ॥ 'सुभद्रा और द्रौपदीके प्यारे पुत्र अभिमन्युको, जो श्रीकृष्ण और माता कुन्तीका सदा दुलारा रहा है, किसने कालसे मोहित होकर मारा है? ॥ २५ ॥ सदृशो वृष्णिवीरस्य केशवस्य महात्मनः । विक्रमश्रुतमाहात्म्यैः कथमायोधने हतः ॥ २६ ॥ 'वृष्णिकुलके वीर महात्मा केशवके समान पराक्रमी, शास्त्रज्ञ और महत्त्वशाली अभिमन्यु युद्धमें किस प्रकार मारा गया है? ॥ २६ ॥ वार्ष्णेयदियितं शूरं मया सततलालितम् । यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ॥ २७ ॥ 'सुभद्राके प्राणप्यारे शूरवीर पुत्रको, जिसको मैंने सदा लाड़-प्यार किया है, यदि नहीं देखूँगा तो मैं भी यमलोक चला जाऊँगा ॥ २७ ॥ मृदुकुञ्चितकेशान्तं बालं बालमृगेक्षणम् । मत्तद्विरदविक्रान्तं शालपोतमिवोद्गतम् ॥ २८ ॥ स्मिताभिभाषिणं शान्तं गुरुवाक्यकरं सदा । बाल्येऽप्यतुलकर्माणं प्रियवाक्यममत्सरम् ॥ २९ ॥ महोत्साहं महाबाहुं दीर्घराजीवलोचनम् । भक्तानुकम्पिनं दान्तं न च नीचानुसारिणम् ॥ ३० ॥ कृतज्ञं ज्ञानसम्पन्नं कृतास्त्रमनिवर्तिनम् । युद्धाभिनन्दिनं नित्यं द्विषतां भयवर्धनम् ॥ ३१ ॥ स्वेषां प्रियहिते युक्तं पितॄणां जयगृद्धिनम् । न च पूर्वं प्रहर्तारं संग्रामे नष्टसम्भ्रमम् ॥ ३२ ॥

यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् । ‘जिसके केशप्रान्त कोमल और घुँघराले थे, दोनों नेत्र मृगछौनेके समान चंचल थे, जिसका पराक्रम मतवाले हाथीके समान और शरीर नूतन शालवृक्षके समान ऊँचा था, जो मुसकराकर बातें करता था, जिसका मन शान्त था, जो सदा गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करता था, बाल्यावस्थामें भी जिसके पराक्रमकी कोई तुलना नहीं थी, जो सदा प्रिय वचन बोलता और किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखता था, जिसमें महान् उत्साह भरा था, जिसकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और दोनों नेत्र विकसित कमलके समान सुन्दर एवं विशाल थे, जो भक्तजनोंपर दया करता, इन्द्रियोंको वशमें रखता और नीच पुरुषोंका साथ कभी नहीं करता था, जो कृतज्ञ, ज्ञानवान्, अस्त्र-विद्यामें पारंगत, युद्धसे मुँह न मोड़नेवाला, युद्धका अभिनन्दन करनेवाला तथा सदा शत्रुओंका भय बढ़ानेवाला था, जो स्वजनोंके प्रिय और हितमें तत्पर तथा अपने पितृकुलकी विजय चाहनेवाला था, संग्राममें जिसे कभी घबराहट नहीं होती थी और जो शत्रुपर पहले प्रहार नहीं करता था, अपने उस पुत्र बालक अभिमन्युको यदि नहीं देखूँगा तो मैं भी यमलोककी राह लूँगा ॥ २८—३२ ½ ॥ रधेषु गण्यमानेषु गणितं तं महारथम् ॥ ३३ ॥ मयाध्यर्धगुणं संख्ये तरुणं बाहुशालिनम् । प्रद्युम्नस्य प्रियं नित्यं केशवस्य ममैव च ॥ ३४ ॥ यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् । ‘रथियोंकी गणना होते समय जो महारथी गिना गया था, जिसे युद्धमें मेरी अपेक्षा ड्यौढ़ा समझा जाता था तथा अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाला जो तरुण वीर प्रद्युम्नको, श्रीकृष्णको और मुझे भी सदैव प्रिय था, उस पुत्रको यदि मैं नहीं देखूँगा तो यमराजके लोकमें चला जाऊँगा ॥ ३३-३४ ½ ॥ सुनसं सुललाटान्तं स्वक्षिभ्रूदशनच्छदम् ॥ ३५ ॥ अपश्यतस्तद्वदनं का शान्तिर्हृदयस्य मे । ‘जिसकी नासिका, ललाटप्रान्त, नेत्र, भौंह तथा ओष्ठ—ये सभी परम सुन्दर थे, अभिमन्युके उस मुखको न देखनेपर मेरे हृदयमें क्या शान्ति होगी? ॥ ३५ ½ ॥ तन्त्रीस्वनसुखं रम्यं पुंस्कोकिलसमध्वनिम् ॥ ३६ ॥ अशृण्वतः स्वनं तस्य का शान्तिर्हृदयस्य मे । ‘अभिमन्युका स्वर वीणाकी ध्वनिके समान सुखद, मनोहर तथा कोयलकी काकलीके तुल्य मधुर था। उसे न सुननेपर मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी? ॥ ३६ ½ ॥ रूपं चाप्रतिमं तस्य त्रिदशैरपि दुर्लभम् ॥ ३७ ॥ अपश्यतो हि वीरस्य का शान्तिर्हृदयस्य मे ।

'उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। देवताओंके लिये भी वैसा रूप दुर्लभ है। यदि वीर अभिमन्युके उस रूपको नहीं देख पाता हूँ तो मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी? ।। ३७ १/२ ।।'

अभिवादनदक्षं तं पितॄणां वचने रतम् ॥ ३८ ॥
नाद्याहं यदि पश्यामि का शान्तिर्हृदयस्य मे ।
'प्रणाम करनेमें कुशल और पितृवर्गकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर अभिमन्युको यदि आज मैं नहीं देखता हूँ तो मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी? ।। ३८ १/२ ।।
सुकुमारः सदा वीरो महार्हशयनोचितः ॥ ३९ ॥
भूमावनाथवच्छेते नूनं नाथवतां वरः ।
'जो सदा बहुमूल्य शय्यापर सोनेके योग्य और सुकुमार था, वह सनाथशिरोमणि वीर अभिमन्यु आज निश्चय ही अनाथकी भाँति पृथ्वीपर सो रहा है ।। ३९ १/२ ।।
शयानं समुपासन्ति यं पुरा परमस्त्रियः ॥ ४० ॥
तमद्य विप्रविद्धाङ्गमुपासन्त्यशिवाः शिवाः ।
'आजसे पहले सोते समय परम सुन्दरी स्त्रियाँ जिसकी उपासना करती थीं, अपने क्षत-विक्षत अंगोंसे पृथ्वीपर पड़े हुए उस अभिमन्युके पास आज अमंगलजनक शब्द करनेवाली सियारिनें बैठी होंगी ।। ४० १/२ ।।
यः पुरा बोध्यते सुप्तः सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४१ ॥
बोधयन्त्यद्य तं नूनं श्वापदा विकृतैः स्वनैः ।
'जिसे पहले सो जानेपर सूत, मागध और बन्दीजन जगाया करते थे, उसी अभिमन्युको आज निश्चय ही हिंसक जन्तु अपने भयंकर शब्दोंद्वारा जगाते होंगे ।। ४१ १/२ ।।
छत्रच्छायासमुचितं तस्य तद् वदनं शुभम् ॥ ४२ ॥
नूनमद्य रजोध्वस्तं रणरेणुः करिष्यति ।
'उसका वह सुन्दर मुख सदा छत्रकी छायामें रहने योग्य था; परंतु आज युद्धभूमिमें उड़ती हुई धूल उसे आच्छादित कर देगी ।। ४२ १/२ ।।
हा पुत्रकावितृप्तस्य सततं पुत्रदर्शने ॥ ४३ ॥
भाग्यहीनस्य कालेन यथा मे नीयसे बलात् ।
'हा पुत्र! मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ। निरन्तर तुम्हें देखते रहनेपर भी मुझे तृप्ति नहीं होती थी, तो भी काल आज बलपूर्वक तुम्हें मुझसे छीनकर लिये जा रहा है ।। ४३ १/२ ।।
सा च संयमनी नूनं सदा सुकृतिनां गतिः ॥ ४४ ॥
स्वभाभिर्भासिता रम्या त्वयात्यर्थं विराजते ।

‘निश्चय ही वह संयमनी पुरी सदा पुण्यवानोंका आश्रय है; जो आज अपनी प्रभासे प्रकाशित और मनोहारिणी होती हुई भी तुम्हारे द्वारा अत्यन्त उद्भासित हो उठी होगी॥ ४४ ½॥

नूनं वैवस्वतश्च त्वां वरुणश्च प्रियातिथिम्॥ ४५॥ शतक्रतुर्धनेशश्च प्राप्तमर्चन्त्यभीरुकम्। ‘अवश्य ही आज वैवस्वत यम, वरुण, इन्द्र और कुबेर वहाँ तुम-जैसे निर्भय वीरको अपने प्रिय अतिथिके रूपमें पाकर तुम्हारा बड़ा आदर-सत्कार करते होंगे’॥ ४५ ½ ॥

एवं विलप्य बहुधा भिन्नपोतो वणिग् यथा॥ ४६॥ दुःखेन महताऽऽविष्टो युधिष्ठिरमपृच्छत। इस प्रकार बारंबार विलाप करके टूटे हुए जहाजवाले व्यापारीकी भाँति महान् दुःखसे व्याप्त हो अर्जुनने युधिष्ठिरसे इस प्रकार पूछा—॥ ४६ ½ ॥

कच्चित्स कदनं कृत्वा परेषां कुरुनन्दन॥ ४७॥ स्वर्गतोऽभिमुखः संख्ये युध्यमानो नरर्षभैः। ‘कुरुनन्दन! क्या उन श्रेष्ठ वीरोंके साथ युद्ध करता हुआ अभिमन्यु रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करके सम्मुख मारा जाकर स्वर्गलोकमें गया है?॥ ४७ ½ ॥

स नूनं बहुभिर्यत्तैर्युध्यमानो नरर्षभैः॥ ४८॥ असहायः सहायार्थी मामनुध्यातवान् ध्रुवम्। ‘अवश्य ही बहुत-से श्रेष्ठ एवं सावधानीके साथ प्रयत्नपूर्वक युद्ध करनेवाले योद्धाओंके साथ अकेले लड़ते हुए अभिमन्युने सहायताकी इच्छासे मेरा बारंबार स्मरण किया होगा॥ ४८ ½ ॥

पीड्यमानः शरैस्तीक्ष्णैः कर्णद्रोणकृपादिभिः॥ ४९॥ नानालिङ्गैः सुधौताग्रैर्मम पुत्रोऽल्पचेतनः। इह मे स्यात् परित्राणं पितेति स पुनः पुनः॥ ५०॥ इत्येवं विलपन् मन्ये नृशंसैर्भुवि पातितः। ‘जब कर्ण, द्रोण और कृपाचार्य आदिने चमकते हुए अग्रभागवाले नाना प्रकारके तीखे बाणोंद्वारा मेरे पुत्रको पीड़ित किया होगा और उसकी चेतना मन्द होने लगी होगी, उस समय अभिमन्युने बारंबार विलाप करते हुए यह कहा होगा कि यदि यहाँ मेरे पिताजी होते तो मेरे प्राणोंकी रक्षा हो जाती। मैं समझता हूँ, उसी अवस्थामें उन निर्दयी शत्रुओंने उसे पृथ्वीपर मार गिराया होगा॥ ४९-५० ½ ॥

अथवा मत्प्रसूतः स स्वस्रीयो माधवस्य च॥ ५१॥ सुभद्रायां च सम्भूतो न चैवं वक्तुमर्हति।

'अथवा वह मेरा पुत्र, श्रीकृष्णका भानजा था, सुभद्राकी कोखसे उत्पन्न हुआ था; इसलिये ऐसी दीनतापूर्ण बात नहीं कह सकता था ।। ५१ १/२ ।। वज्रसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम ।। ५२ ।। अपश्यतो दीर्घबाहुं रक्ताक्षं यन्न दीर्यते । 'निश्चय ही मेरा यह हृदय अत्यन्त सुदृढ़ एवं वज्रसारका बना हुआ है, तभी तो लाल नेत्रोंवाले महाबाहु अभिमन्युको न देखनेपर भी यह फट नहीं जाता है ।। ५२ १/२ ।। कथं बाले महेष्वासा नृशंसा मर्मभेदिनः ।। ५३ ।। स्वस्त्रीये वासुदेवस्य मम पुत्रेऽक्षिपन् शरान् । 'उन क्रूरकर्मा महान् धनुर्धरोंने श्रीकृष्णके भानजे और मेरे बालक पुत्रपर मर्मभेदी बाणोंका प्रहार कैसे किया? ।। ५३ १/२ ।। यो मां नित्यमदीनात्मा प्रत्युद्गम्याभिनन्दति ।। ५४ ।। उपायान्तं रिपून् हत्वा सोऽद्य मां किं न पश्यति । 'जब मैं शत्रुओंको मारकर शिविरको लौटता था, उस समय जो प्रतिदिन प्रसन्नचित्त हो आगे बढ़कर मेरा अभिनन्दन करता था, वह अभिमन्यु आज मुझे क्यों नहीं देख रहा है? ।। ५४ १/२ ।। नूनं स पातितः शेते धरण्यां रुधिरोक्षितः ।। ५५ ।। शोभयन् मेदिनीं गात्रैरादित्य इव पातितः । 'निश्चय ही शत्रुओंने उसे मार गिराया है और वह खूनसे लथपथ होकर धरतीपर पड़ा सो रहा है एवं आकाशसे नीचे गिराये हुए सूर्यकी भाँति वह अपने अंगोंसे इस भूमिकी शोभा बढ़ा रहा है ।। ५५ १/२ ।। सुभद्रामनुशोचामि या पुत्रमपलायिनम् ।। ५६ ।। रणे विनिहतं श्रुत्वा शोकार्ता वै विनङ्क्ष्यति । 'मुझे बारंबार सुभद्राके लिये शोक हो रहा है, जो युद्धसे मुँह न मोड़नेवाले अपने वीर पुत्रको रणभूमिमें मारा गया सुनकर शोकसे आतुर हो प्राण त्याग देगी ।। ५६ १/२ ।। सुभद्रा वक्ष्यते किं मामभिमन्युमपश्यती ।। ५७ ।। द्रौपदी चैव दुःखार्ते ते च वक्ष्यामि किं न्वहम् । 'अभिमन्युको न देखकर सुभद्रा मुझे क्या कहेगी? द्रौपदी भी मुझसे किस प्रकार वार्तालाप करेगी? इन दोनों दुःखकातर देवियोंको मैं क्या जवाब दूँगा? ।। ५७ १/२ ।। वज्रसारमयं नूनं हृदयं यन्न यास्यति ।। ५८ ।। सहस्रधा वधूं दृष्ट्वा रुदतीं शोककर्शिताम् । 'निश्चय ही मेरा हृदय वज्रसारका बना हुआ है, जो शोकसे कातर हुई बहू उत्तराको रोती देखकर सहस्रों टुकड़ोंमें विदीर्ण नहीं हो जाता? ।। ५८ १/२ ।।

दृप्तानां धार्तराष्ट्राणां सिंहनादो मया श्रुतः ।। ५९ ।।
युयुत्सुश्चापि कृष्णेन श्रुतो वीरानुपालभन् ।
'मैंने घमण्डमें भरे हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंका सिंहनाद सुना है और श्रीकृष्णने यह भी सुना है कि युयुत्सु उन कौरववीरोंको इस प्रकार उपालम्भ दे रहा था ।। ५९ १/२ ।।'
अशक्नुवन्तो बीभत्सुं बालं हत्वा महारथाः ।। ६० ।।
किं मोदध्वमधर्मज्ञाः पाण्डवं दृश्यतां बलम् ।
'युयुत्सु कह रहा था, धर्मको न जाननेवाले महारथी कौरवो! अर्जुनपर जब तुम्हारा वश न चला, तब तुम एक बालककी हत्या करके क्यों आनन्द मना रहे हो? कल पाण्डवोंका बल देखना ।। ६० १/२ ।।'
किं तयोर्विप्रियं कृत्वा केशवार्जुनयोर्मृधे ।। ६१ ।।
सिंहवन्नदथ प्रीताः शोककाल उपस्थिते ।
'रणक्षेत्रमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका अपराध करके तुम्हारे लिये शोकका अवसर उपस्थित है, ऐसे समयमें तुमलोग प्रसन्न होकर सिंहनाद कैसे कर रहे हो? ।। ६१ १/२ ।।'
आगमिष्यति वः क्षिप्रं फलं पापस्य कर्मणः ।। ६२ ।।
अधर्मो हि कृतस्तीव्रः कथं स्यादफलश्चिरम् ।
'तुम्हारे पापकर्मका फल तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होगा। तुमलोगोंने घोर पाप किया है। उसका फल मिलनेमें अधिक विलम्ब कैसे हो सकता है? ।। ६२ १/२ ।।'
इति तान् परिभाषन् वै वैश्यापुत्रो महामतिः ।। ६३ ।।
अपायाच्छस्त्रमुत्सृज्य कोपदुःखसमन्वितः ।
'राजा धृतराष्ट्रकी वैश्यजातीय पत्नीका परम बुद्धिमान् पुत्र युयुत्सु कोप और दुःखसे युक्त हो कौरवोंसे उपर्युक्त बातें कहकर शस्त्र त्यागकर चला आया है' ।।
किमर्थमेतन्नाख्यातं त्वया कृष्ण रणे मम ।। ६४ ।।
अधाक्षं तानहं क्रूरांस्तदा सर्वान् महारथान् ।
'श्रीकृष्ण! आपने रणक्षेत्रमें ही यह बात मुझसे क्यों नहीं बता दी? मैं उसी समय उन समस्त क्रूर महारथियोंको जलाकर भस्म कर डालता' ।। ६४ १/२ ।।

संजय उवाच

पुत्रशोकार्दितं पार्थं ध्यायन्तं साश्रुलोचनम् ।। ६५ ।।
निगृह्य वासुदेवस्तं पुत्राधिभिरभिप्लुतम् ।
मैवमित्यब्रवीत् कृष्णस्तीव्रशोकसमन्वितम् ।। ६६ ।।
संजय कहते हैं—महाराज! इस प्रकार अर्जुनको पुत्रशोकसे पीड़ित और उसीका चिन्तन करते हुए नेत्रोंसे आँसू बहाते देख भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें पकड़कर सँभाला। वे

पुत्रवियोगके कारण होनेवाली गहरी मनोव्यथामें डूबे हुए थे और तीव्र शोक उन्हें संतप्त कर रहा था। भगवान् बोले—‘मित्र! ऐसे व्याकुल न होओ।। ६५-६६ ।। सर्वेषामेष वै पन्थाः शूराणामनिवर्तिनाम् । क्षत्रियाणां विशेषेण येषां युद्धेन जीविका ।। ६७ ।। ‘युद्धमें पीठ न दिखानेवाले सभी शूरवीरोंका यही मार्ग है। विशेषतः उन क्षत्रियोंको, जिनकी युद्धसे जीविका चलती है, इस मार्गसे जाना ही पड़ता है ।। ६७ ।। एषा वै युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । विहिता सर्वशास्त्रज्ञैर्गतिर्मतिमतां वर ।। ६८ ।। ‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वीर! जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं, उन युद्धपरायण शूरवीरोंके लिये सम्पूर्ण शास्त्रज्ञोंने यही गति निश्चित की है ।। ६८ ।। ध्रुवं हि युद्धे मरणं शूराणामनिवर्तिनाम् । गतः पुण्यकृतां लोकानभिमन्युर्न संशयः ।। ६९ ।। ‘पीछे पैर न हटानेवाले शूरवीरोंका युद्धमें मरण अवश्यम्भावी है। अभिमन्यु पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकमें गया है, इसमें संशय नहीं है ।। ६९ ।। एतच्च सर्ववीराणां काङ्क्षितं भरतर्षभ । संग्रामेऽभिमुखो मृत्युं प्राप्नुयादिति मानद ।। ७० ।। ‘दूसरोंको मान देनेवाले भरतश्रेष्ठ! संग्राममें सम्मुख युद्ध करते हुए वीरको मृत्युकी प्राप्ति हो, यही सम्पूर्ण शूरवीरोंका अभीष्ट मनोरथ हुआ करता है ।। ७० ।। स च वीरान् रणे हत्वा राजपुत्रान् महाबलान् । वीरैराकाङ्क्षितं मृत्युं सम्प्राप्तोऽभिमुखं रणे ।। ७१ ।। ‘अभिमन्युने रणक्षेत्रमें महाबली वीर राजकुमारोंका वध करके वीर पुरुषोंद्वारा अभिलषित संग्राममें सम्मुख मृत्यु प्राप्त की है ।। ७१ ।। मा शुचः पुरुषव्याघ्र पूर्वैरेष सनातनः । धर्मकृद्भिः कृतो धर्मः क्षत्रियाणां रणे क्षयः ।। ७२ ।। ‘पुरुषसिंह! शोक न करो। प्राचीन धर्मशास्त्रकारोंने संग्राममें वध होना क्षत्रियोंका सनातनधर्म नियत किया है ।। ७२ ।। इमे ते भ्रातरः सर्वे दीना भरतसत्तम । त्वयि शोकसमाविष्टे नृपाश्च सुहृदस्तव ।। ७३ ।। ‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे शोकाकुल हो जानेसे ये तुम्हारे सभी भाई, नरेशगण तथा सुहृद् दीन हो रहे हैं ।। ७३ ।। एतांश्च वचसा साम्ना समाश्वासय मानद । विदितं वेदितव्यं ते न शोकं कर्तुमर्हसि ।। ७४ ।।

‘मानद! इन सबको अपने शान्तिपूर्ण वचनसे आश्वासन दो। तुम्हें जाननेयोग्य तत्त्वका ज्ञान हो चुका है। अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये' ॥ ७४ ॥

एवमाश्वासितः पार्थः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा । ततोऽब्रवीत् तदा भ्रातॄन् सर्वान् पार्थः सगद्गदान् ॥ ७५ ॥ अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके इस प्रकार समझाने-बुझानेपर अर्जुन उस समय वहाँ गद्गद कण्ठवाले अपने सब भाइयोंसे बोले— ॥ ७५ ॥

स दीर्घबाहुः पृथ्वंसो दीर्घराजीवलोचनः । अभिमन्युर्यथावृत्तः श्रोतुमिच्छाम्यहं तथा ॥ ७६ ॥ ‘मोटे कंधों, बड़ी भुजाओं तथा कमलसदृश विशाल नेत्रोंवाला अभिमन्यु संग्राममें जिस प्रकार लड़ा था, वह सब वृत्तान्त मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ७६ ॥

सनागस्यन्दनहयान् द्रक्ष्यध्वं निहतान् मया । संग्रामे सानुबन्धांस्तान् मम पुत्रस्य वैरिणः ॥ ७७ ॥ ‘कल आपलोग देखेंगे कि मेरे पुत्रके वैरी अपने हाथी, रथ, घोड़े और सगे-सम्बन्धियोंसहित युद्धमें मेरे द्वारा मार डाले गये ॥ ७७ ॥

कथं च वः कृतास्त्राणां सर्वेषां शस्त्रपाणिनाम् । सौभद्रो निधनं गच्छेद्वज्रिणापि समागतः ॥ ७८ ॥ ‘आप सब लोग अस्त्रविद्याके पण्डित और हाथमें हथियार लिये हुए थे। सुभद्रकुमार अभिमन्यु साक्षात् वज्रधारी इन्द्रसे भी युद्ध करता हो तो भी आपके सामने कैसे मारा जा सकता था? ॥ ७८ ॥

यद्येवमहमज्ञास्यमशक्तान् रक्षणे मम । पुत्रस्य पाण्डुपञ्चालान् मया गुप्तो भवेत् ततः ॥ ७९ ॥ ‘यदि मैं ऐसा जानता कि पाण्डव और पांचाल मेरे पुत्रकी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं तो मैं स्वयं उसकी रक्षा करता ॥ ७९ ॥

कथं च वो रथस्थानां शरवर्षाणि मुञ्चताम् । नीतोऽभिमन्युर्निधनं कदर्थीकृत्य वः परैः ॥ ८० ॥ ‘आपलोग रथपर बैठे हुए बाणोंकी वर्षा कर रहे थे तो भी शत्रुओंने आपकी अवहेलना करके कैसे अभिमन्युको मार डाला? ॥ ८० ॥

अहो वः पौरुषं नास्ति न च वोऽस्ति पराक्रमः । यत्राभिमन्युः समरे पश्यतां वो निपातितः ॥ ८१ ॥ ‘अहो! आपलोगोंमें पुरुषार्थ नहीं है और पराक्रम भी नहीं है; क्योंकि समरभूमिमें आपलोगोंके देखते-देखते अभिमन्यु मार डाला गया ॥ ८१ ॥

आत्मानमेव गर्हेयं यदहं वै सुदुर्बलान् । युष्मानाज्ञाय निर्यातो भीरूनकृतनिश्चयान् ॥ ८२ ॥

‘मैं अपनी ही निन्दा करूँगा; क्योंकि आपलोगोंको अत्यन्त दुर्बल, डरपोक और सुदृढ़ निश्चयसे रहित जानकर भी मैं (अभिमन्युको आपलोगोंके भरोसे छोड़कर) अन्यत्र चला गया ॥ ८२ ॥

आहोस्विद् भूषणार्थाय वर्म शस्त्रायुधानि वः ।
वाचस्तु वक्तुं संसद्सु मम पुत्रमरक्षताम् ॥ ८३ ॥
‘अथवा आपलोगोंके ये कवच और अस्त्र-शस्त्र क्या शरीरका आभूषण बनानेके लिये हैं? मेरे पुत्रकी रक्षा न करके वीरोंकी सभामें केवल बातें बनानेके लिये हैं?’ ॥

एवमुक्त्वा ततो वाक्यं तिष्ठंश्चापवरासिमान् ।
न स्माशक्यत बीभत्सुः केनचित्प्रसमीक्षितुम् ॥ ८४ ॥
ऐसा कहकर फिर अर्जुन धनुष और श्रेष्ठ तलवार लेकर खड़े हो गये। उस समय कोई उनकी ओर आँख उठाकर देख भी न सका ॥ ८४ ॥

तमन्तकमिव क्रुद्धं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तमश्रुपूर्णमुखं तदा ॥ ८५ ॥
वे यमराजके समान कुपित हो बारंबार लंबी साँसें छोड़ रहे थे। उस समय पुत्रशोकसे संतप्त हुए अर्जुनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी ॥ ८५ ॥

न भाषितुं शक्नुवन्ति द्रष्टुं वा सुहृदोऽर्जुनम् ।
अन्यत्र वासुदेवाद्वा ज्येष्ठाद्वा पाण्डुनन्दनात् ॥ ८६ ॥
उस अवस्थामें वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण अथवा ज्येष्ठ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको छोड़कर दूसरे सगे-सम्बन्धी न तो उनसे कुछ बोल सकते थे और न तो देखनेका ही साहस करते थे ॥ ८६ ॥

सर्वास्ववस्थासु हितावर्जुनस्य मनोऽनुगौ ।
बहुमानात् प्रियत्वाच्च तावेनं वक्तुमर्हतः ॥ ८७ ॥
श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर सभी अवस्थाओंमें अर्जुनके हितैषी और उनके मनके अनुकूल चलनेवाले थे; क्योंकि अर्जुनके प्रति उनका बड़ा आदर और प्रेम था। अतः वे ही दोनों इनसे उस समय कुछ कहनेका अधिकार रखते थे ॥ ८७ ॥

ततस्तं पुत्रशोकेन भृशं पीडितमानसम् ।
राजीवलोचनं क्रुद्धं राजा वचनमब्रवीत् ॥ ८८ ॥
तदनन्तर मन-ही-मन पुत्रशोकसे अत्यन्त पीड़ित हुए क्रोधभरे कमलनयन अर्जुनसे राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा— ॥ ८८ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनकोपे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनकोपविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ९१ १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 481)

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त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा

युधिष्ठिर उवाच

त्वयि याते महाबाहो संशप्तकबलं प्रति ।
प्रयत्नमकरोत् तीव्रमाचार्यो ग्रहणे मम ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— महाबाहो! जब तुम संशप्तक सेनाके साथ युद्धके लिये चले गये, उस समय आचार्य द्रोणने मुझे पकड़नेके लिये घोर प्रयत्न किया ॥ १ ॥

व्यूढानीका वयं द्रोणं वारयामः स्म सर्वशः ।
प्रतिव्यूह्य रथानीकं यतमानं तथा रणे ॥ २ ॥
वे रथोंकी सेनाका व्यूह बनाकर बारंबार उद्योग करते थे और हमलोग रणक्षेत्रमें अपनी सेनाको व्यूहाकारमें संघटित करके सब प्रकारसे द्रोणाचार्यको आगे बढ़नेसे रोक देते थे ॥ २ ॥

स वार्यमाणो रथिभिर्मयि चापि सुरक्षिते ।
अस्मानभिजगामाशु पीडयन् निशितैः शरैः ॥ ३ ॥
जब रथियोंके द्वारा आचार्य रोक दिये गये और मैं सर्वथा सुरक्षित रह गया, तब उन्होंने अपने तीखे बाणोंद्वारा हमें पीड़ा देते हुए हमलोगोंपर तीव्र वेगसे आक्रमण किया ॥ ३ ॥

ते पीड्यमाना द्रोणेन द्रोणानीकं न शक्नुमः ।
प्रतिवीक्षितुमप्याजौ भेत्तुं तत् कुत एव तु ॥ ४ ॥
द्रोणाचार्यसे पीड़ित होनेके कारण हमलोग उनके सैन्यव्यूहकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते थे; फिर युद्धभूमिमें उसका भेदन तो कर ही कैसे सकते थे? ॥ ४ ॥

वयं त्वप्रतिमं वीर्ये सर्वे सौभद्रमात्मजम् ।
उक्तवन्तः स्म तं तात भिन्ध्यनीकमिति प्रभो ॥ ५ ॥
तब हम सब लोग अनुपम पराक्रमी अपने पुत्र सुभद्रानन्दन अभिमन्युसे बोले—‘तात! तुम इस व्यूहका भेदन करो; क्योंकि तुम ऐसा करनेमें समर्थ हो’ ॥ ५ ॥

स तथा नोदितोऽस्माभिः सदश्व इव वीर्यवान् ।
असह्यमपि तं भारं वोढुमेवोपचक्रमे ॥ ६ ॥
हमारे इस प्रकार आज्ञा देनेपर उस पराक्रमी वीरने अच्छे घोड़ेकी भाँति उस असह्य भारको भी वहन करनेका ही प्रयत्न किया ॥ ६ ॥

स तवास्त्रोपदेशेन वीर्येण च समन्वितः ।

प्राविशत् तद्बलं बालः सुपर्ण इव सागरम् ।। ७ ।।
तुम्हारे दिये हुए अस्त्र-विद्याके उपदेश और पराक्रमसे सम्पन्न बालक अभिमन्युने उस सेनामें उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे गरुड़ समुद्रमें घुस जाते हैं ।।
तेऽनुयाता वयं वीरं सात्वतीपुत्रमाहवे ।
प्रवेष्टुकामास्तेनैव येन स प्राविशच्चमूमू ।। ८ ।।
तत्पश्चात् हमलोग रणक्षेत्रमें वीर सुभद्राकुमार अभिमन्युके पीछे उस व्यूहमें प्रवेश करनेकी इच्छासे चले। हम भी उसी मार्गसे उसमें घुसना चाहते थे, जिसके द्वारा उसने शत्रुसेनामें प्रवेश किया था ।। ८ ।।
ततः सैन्धवको राजा क्षुद्रस्तात जयद्रथः ।
वरदानेन रुद्रस्य सर्वान् नः समवारयत् ।। ९ ।।
तात! ठीक इसी समय नीच सिंधुनरेश राजा जयद्रथने सामने आकर भगवान् शंकरके दिये हुए वरदानके प्रभावसे हम सब लोगोंको रोक दिया ।। ९ ।।
ततो द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणिः कौसल्य एव च ।
कृतवर्मा च सौभद्रं षड् रथाः पर्यवारयन् ।। १० ।।
तदनन्तर द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, बृहद्वल और कृतवर्मा—इन छः महारथियोंने सुभद्राकुमारको चारों ओरसे घेर लिया ।। १० ।।
परिवार्य तु तैः सर्वैर्युधि बालो महारथैः ।
यतमानः परं शक्त्या बहुभिर्विरथीकृतः ।। ११ ।।
घिरा होनेपर भी वह बालक पूरी शक्ति लगाकर उन सबको जीतनेका प्रयत्न करता रहा; तथापि वे संख्यामें अधिक थे, अतः उन समस्त महारथियोंने उसे घेरकर रथहीन कर दिया ।। ११ ।।
ततो दौःशासनिः क्षिप्रं तथा तैर्विरथीकृतम् ।
संशयं परमं प्राप्य दिष्टान्तेनाभ्ययोजयत् ।। १२ ।।
तत्पश्चात् दुःशासनपुत्रने अभिमन्युके प्रहारसे भारी प्राणसंकटमें पड़कर पूर्वोक्त महारथियोंद्वारा रथहीन किये हुए अभिमन्युको शीघ्र ही (गदाके आघातसे) मार डाला ।। १२ ।।
स तु हत्वा सहस्राणि नराश्वरथदन्तिनाम् ।
अष्टौ रथसहस्राणि नव दन्तिशतानि च ।। १३ ।।
राजपुत्रसहस्रे द्वे वीरांश्चालक्षितान् बहून् ।
बृहद्वलं च राजानं स्वर्गेणाजौ प्रयोज्य ह ।। १४ ।।
ततः परमधर्मात्मा दिष्टान्तमुपजग्मिवान् ।

इसके पहले उसने हजारों हाथी, रथ, घोड़े और मनुष्योंको मार डाला था। आठ हजार रथों और नौ सौ हाथियोंका संहार किया था। दो हजार राजकुमारों तथा और भी बहुत-से अलक्षित वीरोंका वध करके राजा बृहद्दलको भी युद्धस्थलमें स्वर्गलोकका अतिथि बनाया। इसके बाद परम धर्मात्मा अभिमन्यु स्वयं मृत्युको प्राप्त हुआ ।। १३-१४ १/२ ।। (गतःसुकृतिनां लोकान् ये च स्वर्गजितां शुभाः । अदीनस्त्रासयञ्छत्रून् नन्दयित्वा च बान्धवान् ।। असकृन्नाम विश्राव्य पितॄणां मातुलस्य च । वीरो दिष्टान्तमापन्नः शोचयन् बान्धवान् बहून् ।। ततः स्म शोकसंतप्ता भवताद्य समेयुषः ।) वह पुण्यात्माओंके लोकोंमें गया है। अपने पुण्यके बलसे स्वर्गलोकपर विजय पानेवाले धर्मात्मा पुरुषोंको जो शुभ लोक सुलभ होते हैं, वे ही उसे भी प्राप्त हुए हैं। उसने कभी युद्धमें दीनता नहीं दिखायी। वह वीर शत्रुओंको त्रास और बान्धवोंको आनन्द प्रदान करता हुआ अपने पितरों और मामाके नामको बारंबार विख्यात करके अपने बहुसंख्यक बन्धुओंको शोकमें डालकर मृत्युको प्राप्त हुआ है। तभीसे हमलोग शोकसे संतप्त हैं और इस समय तुमसे हमारी भेंट हुई है। एतावदेव निर्वृत्तमस्माकं शोकवर्धनम् ।। १५ ।। स चैवं पुरुषव्याघ्रः स्वर्गलोकमवाप्तवान् । यही हमलोगोंके लिये शोक बढ़ानेवाली घटना घटित हुई है। पुरुषसिंह अभिमन्यु इस प्रकार स्वर्गलोकमें गया है ।। १५ १/२ ।। ततोऽर्जुनो वचः श्रुत्वा धर्मराजेन भाषितम् ।। १६ ।। हा पुत्र इति निःश्वस्य व्यथितो न्यपतद् भुवि । धर्मराज युधिष्ठिरकी कही हुई यह बात सुनकर अर्जुन व्यथासे पीड़ित हो लंबी साँस खींचते हुए ‘हा पुत्र’ कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। १६ १/२ ।। विषण्णवदनाः सर्वे परिवार्य धनंजयम् ।। १७ ।। नेत्रैरनिमिषैर्दीनाः प्रत्यवैक्षन् परस्परम् । उस समय सबके मुखपर विषाद छा गया। सब लोग अर्जुनको घेरकर दुःखी हो एकटक नेत्रोंसे एक-दूसरेकी ओर देखने लगे ।। १७ १/२ ।। प्रतिलभ्य ततः संज्ञां वासविः क्रोधमूर्च्छितः ।। १८ ।। कम्पमानो ज्वरेणेव निःश्वसंश्च मुहुर्मुहुः । पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य श्वसमानोऽश्रुनेत्रवान् ।। १९ ।। उन्मत्त इव विप्रेक्षन्निदं वचनमब्रवीत् ।

तदनन्तर इन्द्रपुत्र अर्जुन होशमें आकर क्रोधसे व्याकुल हो मानो ज्वरसे काँप रहे हों— इस प्रकार बारंबार लंबी साँस खींचते और हाथपर हाथ मलते हुए नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे और उन्मत्तके समान देखते हुए इस तरह बोले— ।। १८-१९ १/२ ।।

अर्जुन उवाच

सत्यं वः प्रतिजानामि श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् ।
न चेद् वधभयाद् भीतो धार्तराष्ट्रान् प्रहास्यति ।। २० ।।
न चास्मान् शरणं गच्छेत् कृष्णं वा पुरुषोत्तमम् ।
भवन्तं वा महाराज श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् ।। २१ ।।
अर्जुनने कहा— मैं आपलोगोंके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, कल जयद्रथको अवश्य मार डालूँगा। महाराज! यदि वह मारे जानेके भयसे डरकर धृतराष्ट्रपुत्रोंको छोड़ नहीं देगा, मेरी, पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी अथवा आपकी शरणमें नहीं आ जायगा तो कल उसे अवश्य मार डालूँगा ।। २०-२१ ।।

धार्तराष्ट्रप्रियकरं मयि विस्मृतसौहृदम् ।
पापं बालवधे हेतुं श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् ।। २२ ।।
जो धृतराष्ट्रके पुत्रोंका प्रिय कर रहा है, जिसने मेरे प्रति अपना सौहार्द भुला दिया है तथा जो बालक अभिमन्युके वधमें कारण बना है, उस पापी जयद्रथको कल अवश्य मार डालूँगा ।। २२ ।।

रक्षमाणांश्च तं संख्ये ये मां योत्स्यन्ति केचन ।
अपि द्रोणकृपौ राजन् छादयिष्यामि ताञ्छरैः ।। २३ ।।
राजन्! युद्धमें जयद्रथकी रक्षा करते हुए जो कोई मेरे साथ युद्ध करेंगे, वे द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ही क्यों न हों, उन्हें अपने बाणोंके समूहसे आच्छादित कर दूँगा ।। २३ ।।

यद्येतदेवं संग्रामे न कुर्यां पुरुषर्षभाः ।
मा स्म पुण्यकृतां लोकान् प्राप्नुयां शूरसम्मतान् ।। २४ ।।
पुरुषश्रेष्ठ वीरो! यदि संग्रामभूमिमें मैं ऐसा न कर सकूँ तो पुण्यात्मा पुरुषोंके उन लोकोंको, जो शूरवीरोंको प्रिय हैं, न प्राप्त करूँ ।। २४ ।।

ये लोका मातृहन्तॄणां ये चापि पितृघातिनाम् ।
गुरुदारगतानां ये पिशुनानां च ये सदा ।। २५ ।।
साधूनसूयतां ये च ये चापि परिवादिनाम् ।
ये च निक्षेपहर्तॄणां ये च विश्वासघातिनाम् ।। २६ ।।
भुक्तपूर्वां स्त्रियं ये च विन्दतामघशंसिनाम् ।
ब्रह्मघ्नानां च ये लोका ये च गोघातिनामपि ।। २७ ।।
पायसं वा यवान्नं वा शाकं कृसरमेव वा ।

संयावापूपमांसानि ये च लोका वृथाश्नताम् ॥ २८ ॥
तानन्वायाधिगच्छेयं न चेद्धन्यां जयद्रथम् ।

माता-पिताकी हत्या करनेवालोंको जो लोक प्राप्त होते हैं, गुरु-पत्नीगामी और चुगलखोरोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, साधुपुरुषोंकी निन्दा करनेवालों और दूसरोंको कलंक लगानेवालोंको जो लोक प्राप्त होते हैं, धरोहर हड़पने और विश्वासघात करनेवालोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, दूसरेके उपभोगमें आयी हुई स्त्रीको ग्रहण करनेवाले, पापकी बातें करनेवाले, ब्रह्महत्यारे और गोघातियोंको जो लोक प्राप्त होते हैं, खीर, यवान्न, साग, खिचड़ी, हलवा, पूआ आदिको बलिवैश्वदेव किये बिना ही खानेवाले मनुष्योंको जो लोक प्राप्त होते हैं, यदि मैं कल जयद्रथका वध न कर डालूँ तो मुझे भी तत्काल उन्हीं लोकोंको जाना पड़े ॥ २५—२८ १/२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 486)

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अर्जुनका जयद्रथवधके लिये प्रतिज्ञा करना