महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उपलभ्य मतिं चाग्रामरिमित्रान्तरं तथा ।। २१४ ।। संधिविग्रहकालौ च मोक्षोपायस्तथैव च । श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर शत्रु और मित्रके भेद, संधि और विग्रह के अवसरका तथा विपत्तिसे छूटनेके उपायका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।। २१४ १/२ ।। शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ।। २१५ ।। समागतश्चरेद् युक्त्या कृतार्थो न च विश्वसेत् । अपने और शत्रुके प्रयोजन यदि समान हों तो बलवान् शत्रुके साथ संधि करके उससे मिलकर युक्तिपूर्वक अपना काम बनावे और कार्य पूरा हो जानेपर फिर कभी उसका विश्वास न करे ।। २१५ ।। अविरुद्धं त्रिवर्गेण नीतिमेतां महीपते ।। २१६ ।। अभ्युत्तिष्ठ श्रुतादस्माद् भूयः संरक्षयन् प्रजाः । पृथ्वीनाथ! यह नीति धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल है। तुम इसका आश्रय लो। मुझसे सुने हुए इस उपदेशके अनुसार कर्तव्यपालनमें तत्पर हो सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते हुए अपनी उन्नतिके लिये उठकर खड़े हो जाओ ।। ब्राह्मणैश्चापि ते सार्धं यात्रा भवतु पाण्डव ।। २१७ ।। ब्राह्मणा वै परं श्रेयो दिवि चेह च भारत । पाण्डुनन्दन! तुम्हारी जीवनयात्रा ब्राह्मणोंके साथ होनी चाहिये। भरतनन्दन! ब्राह्मणलोग इहलोक और परलोकमें भी परम कल्याणकारी होते हैं ।। २१७ १/२ ।। एते धर्मस्य वेत्तारः कृतज्ञाः सततं प्रभो ।। २१८ ।। पूजिताः शुभकर्तारः पूजयेत् तान् नराधिप । प्रभो! नरेश्वर! ये ब्राह्मण धर्मज्ञ होनेके साथ ही सदा कृतज्ञ होते हैं। सम्मानित होनेपर शुभकारक एवं शुभचिन्तक होते हैं; अतः इनका सदा आदर-सम्मान करना चाहिये ।। २१८ १/२ ।। राज्यं श्रेयः परं राजन् यशः कीर्तिं च लप्स्यसे ।। २१९ ।। कुलस्य संततिं चैव यथान्यायं यथाक्रमम् ।। २२० ।। राजन्! तुम ब्राह्मणोंके यथोचित सत्कारसे क्रमशः राज्य, परम कल्याण, यश, कीर्ति तथा वंशपरम्पराको बनाये रखनेवाली संतति सब कुछ प्राप्त कर लोगे ।। द्वयोरिमं भारत संधिविग्रहं सुभाषितं बुद्धिविशेषकारकम् । यथा त्ववेक्ष्य क्षितिपेन सर्वदा निषेवितव्यं नृप शत्रुमण्डले ।। २२१ ।। भरतनन्दन! नरेश्वर! चूहे और बिलावका जो यह सुन्दर उपाख्यान कहा गया है, यह संधि और विग्रहका ज्ञान तथा विशेष बुद्धि उत्पन्न करनेवाला है। भूपालको सदा इसीके
अनुसार दृष्टि रखकर शत्रुमण्डलके साथ यथोचित व्यवहार करना चाहिये ।। २२१ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि मार्जारमूषिकसंवादे अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें चूहे और बिलावका संवादविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३८ ।।
शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद
एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
उक्तो मन्त्रो महाबाहो विश्वासो नास्ति शत्रुषु ।
कथं हि राजा वर्तेत यदि सर्वत्र नाश्वसेत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महाबाहो! आपने यह सलाह दी है कि शत्रुओंपर विश्वास नहीं करना चाहिये। साथ ही यह कहा है कि कहीं भी विश्वास करना उचित नहीं है, परंतु यदि राजा सर्वत्र अविश्वास ही करे तो किस प्रकार वह राज्यसम्बन्धी व्यवहार चला सकता है? ॥
विश्वासाद्धि परं राजन् राज्ञामुत्पद्यते भयम् ।
कथं हि नाश्वसन् राजा शत्रून् जयति पार्थिवः ॥ २ ॥
राजन्! यदि विश्वाससे राजाओंपर महान् भय आता है तो सर्वत्र अविश्वास करनेवाला भूपाल अपने शत्रुओंपर विजय कैसे पा सकता है? ॥ २ ॥
एतन्मे संशयं छिन्धि मतिर्मे सम्प्रमुह्यति ।
अविश्वासकथामेतामुपश्रुत्य पितामह ॥ ३ ॥
पितामह! आपकी यह अविश्वास-कथा सुनकर तो मेरी बुद्धिपर मोह छा गया। कृपया आप मेरे इस संशयका निवारण कीजिये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
शृणुष्व राजन् यद् वृत्तं ब्रह्मदत्तनिवेशने ।
पूजन्या सह संवादं ब्रह्मदत्तस्य भूपतेः ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! राजा ब्रह्मदत्तके घरमें पूजनी चिड़ियाके साथ जो उनका संवाद हुआ था, उसे ही तुम्हारे समाधानके लिये उपस्थित करता हूँ, सुनो ॥
काम्पिल्ये ब्रह्मदत्तस्य त्वन्तःपुरनिवासिनी ।
पूजनी नाम शकुनिर्दीर्घकालं सहोषिता ॥ ५ ॥
काम्पिल्य नगरमें ब्रह्मदत्त नामके एक राजा राज्य करते थे। उनके अन्तःपुरमें पूजनी नामसे प्रसिद्ध एक चिड़िया निवास करती थी। वह दीर्घकालतक उनके साथ रही थी ॥ ५ ॥
रुतज्ञा सर्वभूतानां यथा वै जीवजीवकः ।
सर्वज्ञा सर्वतत्त्वज्ञा तिर्यग्योनिं गतापि सा ॥ ६ ॥
वह चिड़िया 'जीवजीवक' नामक विशेष पक्षीके समान समस्त प्राणियोंकी बोली समझती थी तथा तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होनेपर भी सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण तत्त्वोंको जाननेवाली थी ॥ ६ ॥
अभिप्रजाता सा तत्र पुत्रमेकं सुवर्चसम् ।
समकालं च राज्ञोऽपि देव्यां पुत्रो व्यजायत ॥ ७ ॥
एक दिन उसने रनिवासमें ही एक बच्चा दिया, जो बड़ा तेजस्वी था; उसी दिन उसके साथ ही राजाकी रानीके गर्भसे भी एक बालक उत्पन्न हुआ ॥ ७ ॥
तयोरर्थे कृतज्ञा सा खेचरी पूजनी सदा ।
समुद्रतीरं सा गत्वा आजहार फलद्वयम् ॥ ८ ॥
आकाशमें विचरनेवाली वह कृतज्ञ पूजनी चिड़िया प्रतिदिन समुद्रतटपर जाकर वहाँसे उन दोनों बच्चोंके लिये दो फल ले आया करती थी ॥ ८ ॥
पुष्ट्यर्थं च स्वपुत्रस्य राजपुत्रस्य चैव ह ।
फलमेकं सुतायादाद् राजपुत्राय चापरम् ॥ ९ ॥
वह अपने बच्चेकी पुष्टिके लिये एक फल उसे देती तथा राजाके बेटेकी पुष्टिके लिये दूसरा फल उस राजकुमारको अर्पित कर देती थी ॥ ९ ॥
अमृतास्वादसदृशं बलतेजोऽभिवर्धनम् ।
आदायादाय सैवाशु तयोः प्रादात् पुनः पुनः ॥ १० ॥
पूजनीका लाया हुआ वह फल अमृतके समान स्वादिष्ट और बल तथा तेजकी वृद्धि करनेवाला होता था। वह बारंबार उस फलको ला-लाकर शीघ्रतापूर्वक उन दोनोंको दिया करती थी ॥ १० ॥
ततोऽगच्छत् परां वृद्धिं राजपुत्रः फलाशनात् ।
ततः स धात्र्या कक्षेण उह्यमानो नृपात्मजः ॥ ११ ॥
ददर्श तं पक्षिसुतं बाल्यादागत्य बालकः ।
ततो बाल्याच्च यत्नेन तेनाक्रीडत पक्षिणा ॥ १२ ॥
राजकुमार उस फलको खा-खाकर बड़ा हृष्ट-पुष्ट हो गया। एक दिन धाय उस राजपुत्रको गोदमें लिये घूम रही थी। वह बालक ही तो ठहरा, बाल-स्वभाववश आकर उसने उस चिड़ियाके बच्चेको देखा और उसके साथ यत्नपूर्वक वह खेलने लगा ॥ ११-१२ ॥
शून्ये च तमुपादाय पक्षिणं समजातकम् ।
हत्वा ततः स राजेन्द्र धात्र्या हस्तमुपागतः ॥ १३ ॥
राजेन्द्र! अपने साथ ही पैदा हुए उस पक्षीको सूने स्थानमें ले जाकर राजकुमारने मार डाला और मारकर वह धायकी गोदमें जा बैठा ॥ १३ ॥
अथ सा पूजनी राजन्नागमत् फलहारिणी ।
अपश्यन्निहतं पुत्रं तेन बालेन भूतले ॥ १४ ॥ राजन्! तदनन्तर जब पूजनी फल लेकर लौटी तो उसने देखा कि राजकुमारने उसके बच्चेको मार डाला है और वह धरतीपर पड़ा है ॥ १४ ॥ बाष्पपूर्णमुखी दीना दृष्ट्वा तं रुदती सुतम् । पूजनी दुःखसंतप्ता रुदती वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥ अपने बच्चेकी ऐसी दुर्गति देखकर पूजनीके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वह दुःखसे संतप्त हो रोती हुई इस प्रकार कहने लगी— ॥ १५ ॥ क्षत्रिये संगतं नास्ति न प्रीतिर्न च सौहृदम् । कारणात् सान्त्वयन्त्येते कृतार्थाः संत्यजन्ति च ॥ १६ ॥ ‘क्षत्रियमें संगति निभानेकी भावना नहीं होती। उसमें न प्रेम होता है, न सौहार्द। ये किसी हेतु या स्वार्थसे ही दूसरोंको सान्त्वना देते हैं। जब इनका काम निकल जाता है, तब ये आश्रित व्यक्तिको त्याग देते हैं ॥ १६ ॥ क्षत्रियेषु न विश्वासः कार्यः सर्वापकारिषु । अपकृत्यापि सततं सान्त्वयन्ति निरर्थकम् ॥ १७ ॥ ‘क्षत्रिय सबकी बुराई ही करते हैं। इनपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। ये दूसरोंका अपकार करके भी सदा उसे व्यर्थ सान्त्वना दिया करते हैं ॥ अहमस्य करोम्यद्य सदृशीं वैरयातनाम् । कृतघ्नस्य नृशंसस्य भृशं विश्वासघातिनः ॥ १८ ॥ ‘देखो तो सही, यह राजकुमार कैसा कृतघ्न, अत्यन्त क्रूर और विश्वासघाती है! अच्छा, आज मैं इससे इस वैरका बदला लेकर ही रहूँगी ॥ १८ ॥ सहसंजातवृद्धस्य तथैव सहभोजिनः । शरणागतस्य च वधस्त्रिविधं ह्येव पातकम् ॥ १९ ॥ ‘जो साथ ही पैदा हुआ और साथ ही पाला-पोसा गया हो, साथ ही भोजन करता हो और शरणमें आकर रहता हो, ऐसे व्यक्तिका वध करनेसे उपर्युक्त तीन प्रकारका पातक लगता है’ ॥ १९ ॥ इत्युक्त्वा चरणाभ्यां तु नेत्रे नृपसुतस्य सा । भित्त्वा स्वस्था तत इदं पूजनी वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥ ऐसा कहकर पूजनीने अपने दोनों पंजोंसे राजकुमारकी दोनों आँखें फोड़ डालीं। फोड़कर वह आकाशमें स्थिर हो गयी और इस प्रकार बोली— ॥ इच्छयेह कृतं पापं सद्यस्तं चोपसर्पति । कृतं प्रतिकृतं येषां न नश्यति शुभाशुभम् ॥ २१ ॥ ‘इस जगत्में स्वेच्छासे जो पाप किया जाता है, उसका फल तत्काल ही कर्ताको मिल जाता है। जिनके पापका बदला मिल जाता है, उनके पूर्वकृत शुभाशुभ कर्म नष्ट नहीं होते
हैं ॥ २१ ॥
पापं कर्म कृतं किंचिद् यदि तस्मिन् न दृश्यते ।
नृपते तस्य पुत्रेषु पौत्रेष्वपि च नप्तृषु ॥ २२ ॥
‘राजन्! यदि यहाँ किये हुए पापकर्मका कोई फल कर्ताको मिलता न दिखायी दे तो यह समझना चाहिये कि उसके पुत्रों, पोतों और नातियोंको उसका फल भोगना पड़ेगा’ ॥ २२ ॥
ब्रह्मदत्तः सुतं दृष्ट्वा पूजन्याहृतलोचनम् ।
कृते प्रतिकृतं मत्वा पूजनीमिदमब्रवीत् ॥ २३ ॥
राजा ब्रह्मदत्तने देखा कि पूजनीने मेरे पुत्रकी आँखें ले लीं, तब उन्होंने यह समझ लिया कि राजकुमारको उसके कुकर्मका ही बदला मिला है। यह सोचकर राजाने रोष त्याग दिया और पूजनीसे इस प्रकार कहा ॥ २३ ॥
ब्रह्मदत्त उवाच
अस्ति वै कृतमस्माभिरस्ति प्रतिकृतं त्वया ।
उभयं तत् समीभूतं वस पूजनि मा गमः ॥ २४ ॥
ब्रह्मदत्त बोले— पूजनी! हमने तेरा अपराध किया था और तूने उसका बदला चुका लिया। अब हम दोनोंका कार्य बराबर हो गया। इसलिये अब यहीं रह। किसी दूसरी जगह न जा ॥ २४ ॥
पूजन्युवाच
सकृत् कृतापराधस्य तत्रैव परिलम्बतः ।
न तद् बुधाः प्रशंसन्ति श्रेयस्तत्रापसर्पणम् ।। २५ ।।
**पूजनी बोली—**राजन्! एक बार किसीका अपराध करके फिर वहीं आश्रय लेकर रहे तो विद्वान् पुरुष उसके इस कार्यकी प्रशंसा नहीं करते हैं। वहाँसे भाग जानेमें ही उसका कल्याण है ।। २५ ।।
सान्त्वे प्रयुक्ते सततं कृतवैरे न विश्वसेत् ।
क्षिप्रं स बध्यते मूढो न हि वैरं प्रशाम्यति ।। २६ ।।
जब किसीसे वैर बँध जाय तो उसकी चिकनी-चुपड़ी बातोंमें आकर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे वैरकी आग तो बुझती नहीं, वह विश्वास करनेवाला मूर्ख शीघ्र ही मारा जाता है ।। २६ ।।
अन्योन्यकृतवैराणां पुत्रपौत्रं नियच्छति ।
पुत्रपौत्रविनाशे च परलोकं नियच्छति ।। २७ ।।
जो लोग आपसमें वैर बाँध लेते हैं, उनका वह वैरभाव पुत्रों और पौत्रोंतकको पीड़ा देता है। पुत्रों-पौत्रोंका विनाश हो जानेपर परलोकमें भी वह साथ नहीं छोड़ता है ॥ २७ ॥ सर्वेषां कृतवैराणामविश्वासः सुखोदयः । एकान्ततो न विश्वासः कार्यो विश्वासघातकैः ॥ २८ ॥ जो लोग आपसमें वैर रखनेवाले हैं, उन सबके लिये सुखकी प्राप्तिका उपाय यही है कि परस्पर विश्वास न करे। विश्वासघाती मनुष्योंका सर्वथा विश्वास तो करना ही नहीं चाहिये ॥ २८ ॥ न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद् भयमुत्पन्नमपि मूलं निकृन्तति । कामं विश्वासयेदन्यान् परेषां च न विश्वसेत् ॥ २९ ॥ जो विश्वासपात्र न हो, उसपर विश्वास न करे। जो विश्वासका पात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि विश्वाससे उत्पन्न होनेवाला भय विश्वास करनेवालेका मूलोच्छेद कर डालता है। अपने प्रति दूसरोंका विश्वास भले ही उत्पन्न कर ले; किंतु स्वयं दूसरोंका विश्वास न करे ॥ २९ ॥ माता पिता बान्धवानां वरिष्ठौ भार्या जरा बीजमात्रं तु पुत्रः । भ्राता शत्रुः क्लिन्नपाणिर्वयस्य आत्मा ह्येकः सुखदुःखस्य भोक्ता ॥ ३० ॥ माता और पिता स्वाभाविक स्नेह होनेके कारण बान्धवगणोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, पत्नी वीर्यकी नाशक (होनेसे) वृद्धावस्थाका मूर्तिमान् रूप है, पुत्र अपना ही अंश है, भाई (धनमें हिस्सा बँटानेके कारण) शत्रु समझा जाता है और मित्र तभीतक मित्र है, जबतक उसका हाथ गीला रहता है अर्थात् जबतक उसका स्वार्थ सिद्ध होता रहता है; केवल आत्मा ही सुख और दुःखका भोग करनेवाला कहा गया है ॥ ३० ॥ अन्योन्यकृतवैराणां न संधिरुपपद्यते । स च हेतुरतिक्रान्तो यदर्थमहमावसम् ॥ ३१ ॥ जब आपसमें वैर हो जाय, तब संधि करना ठीक नहीं होता। मैं अबतक जिस उद्देश्यसे यहाँ रही हूँ, वह तो समाप्त हो गया ॥ ३१ ॥ पूजितस्यार्थमानाभ्यां जन्तोः पूर्वापकारिणः । मनो भवत्यविश्वस्तं कर्म त्रासयतेऽबलान् ॥ ३२ ॥ जो पहलेका अपकार करनेवाला प्राणी है, वह दान और मानसे पूजित हो तो भी उसका मन विश्वस्त नहीं होता। अपना किया हुआ अनुचित कर्म ही दुर्बल प्राणियोंको डराता रहता है ॥ ३२ ॥ पूर्वं सम्मानना यत्र पश्चाच्चैव विमानना ।
जह्यात् तत् सत्त्ववान् स्थानं शत्रोः सम्मानितोऽपि सन् ॥
जहाँ पहले सम्मान मिला हो, वहीं पीछे अपमान होने लगे तो प्रत्येक शक्तिशाली पुरुषको पुनः सम्मान मिलनेपर भी उस स्थानका परित्याग कर देना चाहिये ॥ ३३ ॥
उषितास्मि तवागारे दीर्घकालं समर्चिता ।
तदिदं वैरमुत्पन्नं सुखमाशु व्रजाम्यहम् ॥ ३४ ॥
राजन्! मैं आपके घरमें बहुत दिनोंतक बड़े आदरके साथ रही हूँ; परंतु अब यह वैर उत्पन्न हो गया; इसलिये मैं बहुत जल्दी यहाँसे सुखपूर्वक चली जाऊँगी ॥ ३४ ॥
ब्रह्मदत्त उवाच
यः कृते प्रतिकुर्याद् वै न स तत्रापराध्नुयात् ।
अनृणस्तेन भवति वस पूजनि मा गमः ॥ ३५ ॥
**ब्रह्मदत्तने कहा—**पूजनी! जो एक व्यक्तिके अपराध करनेपर बदलेमें स्वयं भी कुछ करे, वह कोई अपराध नहीं करता—अपराधी नहीं माना जाता। इससे तो पहलेका अपराधी ऋणमुक्त हो जाता है; इसलिये तू यहीं रह। कहीं मत जा ॥ ३५ ॥
पूजन्युवाच
न कृतस्य तु कर्तुश्च सख्यं संधीयते पुनः ।
हृदयं तत्र जानाति कर्तुश्चैव कृतस्य च ॥ ३६ ॥
**पूजनी बोली—**राजन्! जिसका अपकार किया जाता है और जो अपकार करता है, उन दोनोंमें फिर मेल नहीं हो सकता। जो अपराध करता है और जिसपर किया जाता है, उन दोनोंके ही हृदयोंमें वह बात खटकती रहती है ॥ ३६ ॥
ब्रह्मदत्त उवाच
कृतस्य चैव कर्तुश्च सख्यं संधीयते पुनः ।
वैरस्योपशमो दृष्टः पापं नोपाश्नुते पुनः ॥ ३७ ॥
**ब्रह्मदत्तने कहा—**पूजनी! बदला ले लेनेपर तो वैर शान्त हो जाता है और अपकार करनेवालेको उस पापका फल भी नहीं भोगना पड़ता; अतः अपराध करने और सहनेवालेका मेल पुनः हो सकता है ॥ ३७ ॥
पूजन्युवाच
नास्ति वैरमतिक्रान्तं सान्त्वितोऽस्मीति नाश्वसेत् ।
विश्वासाद् वध्यते लोके तस्माच्छ्रेयोऽप्यदर्शनम् ॥ ३८ ॥
**पूजनी बोली—**राजन्! इस प्रकार कभी वैर शान्त नहीं होता है। 'शत्रुने मुझे सान्त्वना दी है,' ऐसा समझकर उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। ऐसी अवस्थामें विश्वास
करनेसे जगत्में अपने प्राणोंसे भी (कभी-न-कभी) हाथ धोना पड़ता है, इसलिये वहाँ मुँह न दिखाना ही अच्छा है ॥ ३८ ॥
तरसा ये न शक्यन्ते शस्त्रैः सुनिशितैरपि ।
साम्ना तेऽपि निगृह्यन्ते गजा इव करेणुभिः ॥ ३९ ॥
जो लोग बलपूर्वक तीखे शस्त्रोंसे भी वशमें नहीं किये जा सकते, उन्हें भी मीठी वाणीद्वारा बंदी बना लिया जाता है। जैसे हथिनियोंकी सहायतासे हाथी कैद कर लिये जाते हैं ॥ ३९ ॥
ब्रह्मदत्त उवाच
संवासाज्जायते स्नेहो जीवितान्तकरेष्वपि ।
अन्योन्यस्य च विश्वासः श्वपचेन शुनो यथा ॥ ४० ॥
**ब्रह्मदत्तने कहा—**पूजनी! प्राणोंका नाश करनेवाले भी यदि एक साथ रहने लगें तो उनमें परस्पर स्नेह उत्पन्न हो जाता है और वे एक-दूसरेका विश्वास भी करने लगते हैं; जैसे श्वपच (चाण्डाल) के साथ रहनेसे कुत्तेका उसके प्रति स्नेह और विश्वास हो जाता है ॥
अन्योन्यकृतवैराणां संवासान्मृदुतां गतम् ।
नैव तिष्ठति तद् वैरं पुष्करस्थमिवोदकम् ॥ ४१ ॥
आपसमें जिनका वैर हो गया है, उनका वह वैर भी एक साथ रहनेसे मृदु हो जाता है, अतः कमल के पत्तेपर जैसे जल नहीं ठहरता है, उसी प्रकार वह वैर भी टिक नहीं पाता है ॥ ४१ ॥
पूजन्युवाच
वैरं पञ्चसमुत्थानं तच्च बुध्यन्ति पण्डिताः ।
स्त्रीकृतं वास्तुजं वाग्जं ससापत्नापराधजम् ॥ ४२ ॥
**पूजनी बोली—**राजन्! वैर पाँच कारणोंसे हुआ करता है; इस बातको विद्वान् पुरुष अच्छी तरह जानते हैं। १. स्त्रीके लिये, २. घर और जमीनके लिये, ३. कठोर वाणीके कारण, ४. जातिगत द्वेषके कारण और ५. किसी समय किये हुए अपराधके कारण ॥ ४२ ॥
तत्र दाता न हन्तव्यः क्षत्रियेण विशेषतः ।
प्रकाशं वाप्रकाशं वा बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ४३ ॥
इन कारणोंसे भी ऐसे व्यक्तिका वध नहीं करना चाहिये जो दाता हो अर्थात् परोपकारी हो, विशेषतः क्षत्रियनरेशको छिपकर या प्रकटरूपमें ऐसे व्यक्तिपर हाथ नहीं उठाना चाहिये। पहले यह विचार कर लेना चाहिये कि उसका दोष हल्का है या भारी। उसके बाद कोई कदम उठाना चाहिये ॥ ४३ ॥
कृतवैरे न विश्वासः कार्यस्त्विह सुहृद्यपि ।
छन्नं संतिष्ठते वैरं गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ ४४ ॥
जिसने वैर बाँध लिया हो, ऐसे सुहृद्पर भी इस जगत्में विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जैसे लकड़ीके भीतर आग छिपी रहती है, उसी प्रकार उसके हृदयमें वैरभाव छिपा रहता है ॥ ४४ ॥
न वित्तेन न पारुष्यैर्न सान्त्वेन न च श्रुतैः ।
कोपाग्निः शाम्यते राजंस्तोयाग्निरिव सागरे ॥ ४५ ॥
राजन्! जिस प्रकार बडवानल समुद्रमें किसी तरह शान्त नहीं होता, उसी प्रकार क्रोधाग्नि भी न धनसे, न कठोरता दिखानेसे, न मीठे वचनों द्वारा समझाने-बुझानेसे और न शास्त्रज्ञानसे ही शान्त होती है ॥ ४५ ॥
न हि वैराग्निरुद्धूतः कर्म चाप्यपराधजम् ।
शाम्यत्यदग्ध्वा नृपते विना ह्येकतरक्षयात् ॥ ४६ ॥
नरेश्वर! प्रज्वलित हुई वैरकी आग एक पक्षको दग्ध किये बिना नहीं बुझती है और अपराधजनित कर्म भी एक पक्षका संहार किये बिना शान्त नहीं होता है ॥
सत्कृतस्यार्थमानाभ्यां तत्र पूर्वापकारिणः ।
नादेयोऽमित्रविश्वासः कर्म त्रासयतेऽबलान् ॥ ४७ ॥
जिसने पहले अपकार किया है, उसका यदि अपकृत व्यक्तिके द्वारा धन और मानसे सत्कार किया जाय तो भी उसे उस शत्रु का विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि अपना किया हुआ पापकर्म ही दुर्बलोंको डराता रहता है ॥ ४७ ॥
नैवापकारे कस्मिंश्चिदहं त्वयि तथा भवान् ।
उषितास्मि गृहेऽहं ते नेदानीं विश्वसाम्यहम् ॥ ४८ ॥
अब तक तो न मैंने कोई आपका अपकार किया था और न आपने ही मेरी कोई हानि की थी; इसलिये मैं आपके महलमें रहती थी, किंतु अब मैं आपका विश्वास नहीं कर सकती ॥ ४८ ॥
ब्रह्मदत्त उवाच
कालेन क्रियते कार्यं तथैव विविधाः क्रियाः ।
कालेनैते प्रवर्तन्ते कः कस्येहापराध्यति ॥ ४९ ॥
ब्रह्मदत्तने कहा— पूजनी! काल ही समस्त कार्य करता है तथा कालके ही प्रभावसे भाँति-भाँतिकी क्रियाएँ आरम्भ होती हैं। इसमें कौन किसका अपराध करता है? ॥
तुल्यं चोभे प्रवर्तते मरणं जन्म चैव ह ।
कार्यते चैव कालेन तन्निमित्तं न जीवति ॥ ५० ॥
जन्म और मृत्यु—ये दोनों क्रियाएँ समानरूपसे चलती रहती हैं। और काल ही इन्हें कराता है। इसीलिये प्राणी जीवित नहीं रह पाता ॥ ५० ॥
वध्यन्ते युगपत् केचिदेकैकस्य न चापरे । कालो दहति भूतानि सम्प्राप्याग्निरिवेन्धनम् ॥ ५१ ॥ कुछ लोग एक साथ ही मारे जाते हैं; कुछ एक-एक करके मरते हैं और बहुत-से लोग दीर्घकालतक मरते ही नहीं हैं। जैसे आग ईंधनको पाकर उसे जला देती है, उसी प्रकार काल ही समस्त प्राणियोंको दग्ध कर देता है ॥
नाहं प्रमाणं नैव त्वमन्योन्यं कारणं शुभे । कालो नित्यमुपादत्ते सुखं दुःखं च देहिनाम् ॥ ५२ ॥ शुभे! एक दूसरेके प्रति किये गये अपराधमें न तो तुम यथार्थ कारण हो और न मैं ही वास्तविक हेतु हूँ। काल ही सदा समस्त देहधारियोंके सुख-दुःखको ग्रहण या उत्पन्न करता है ॥ ५२ ॥
एवं वसेह सस्नेहा यथाकाममहिंसिता । यत् कृतं तत् तु मे क्षान्तं त्वं च वै क्षम पूजनि ॥ ५३ ॥ पूजनी! मैं तेरी किसी प्रकार हिंसा नहीं करूँगा। तू यहाँ अपनी इच्छा के अनुसार स्नेहपूर्वक निवास कर। तूने जो कुछ किया है, उसे मैंने क्षमा कर दिया और मैंने जो कुछ किया हो, उसे तू भी क्षमा कर दे ॥ ५३ ॥
पूजन्युवाच
यदि कालः प्रमाणं ते न वैरं कस्यचिद् भवेत् । कस्मात् त्वपचितिं यान्ति बान्धवा बान्धवैर्हतैः ॥ ५४ ॥ **पूजनी बोली—**राजन्! यदि आप कालको ही सब क्रियाओंका कारण मानते हैं, तब तो किसीका किसीके साथ वैर नहीं होना चाहिये; फिर अपने भाई-बन्धुओंके मारे जानेपर उनके सगे-सम्बन्धी बदला क्यों लेते हैं? ॥ ५४॥
कस्माद् देवासुराः पूर्वमन्योन्यमभिजघ्निरे । यदि कालेन निर्याणं सुखं दुःखं भवाभवौ ॥ ५५ ॥ यदि कालसे ही मृत्यु, दुःख-सुख और उन्नति अवनति आदिका सम्पादन होता है, तब पूर्वकालमें देवताओं और असुरों ने क्यों आपसमें युद्ध करके एक दूसरे का वध किया? ॥ ५५ ॥
भिषजो भेषजं कर्तुं कस्मादिच्छन्ति रोगिणः । यदि कालेन पच्यन्ते भेषजैः किं प्रयोजनम् ॥ ५६ ॥ वैद्यलोग रोगियोंकी दवा करनेकी अभिलाषा क्यों करते हैं? यदि काल ही सबको पका रहा है तो दवाओंका क्या प्रयोजन है? ॥ ५६ ॥
प्रलापः सुमहान् कस्मात् क्रियते शोकमूर्च्छितैः । यदि कालः प्रमाणं ते कस्माद् धर्मोऽस्ति कर्तृषु ॥ ५७ ॥
यदि आप कालको ही प्रमाण मानते हैं तो शोकसे मूर्च्छित हुए प्राणी क्यों महान् प्रलाप एवं हाहाकार करते हैं? फिर कर्म करनेवालोंके लिये विधि-निषेधरूपी धर्मके पालनका नियम क्यों रखा गया है? ।। ५७ ।। तव पुत्रो ममापत्यं हतवान् स हतो मया । अनन्तरं त्वयाहं च हन्तव्या हि नराधिप ।। ५८ ।। नरेश्वर! आपके बेटेने मेरे बच्चेको मार डाला और मैंने भी उसकी आँखोंको नष्ट कर दिया। इसके बाद अब आप मेरा वध कर डालेंगे ।। ५८ ।। अहं हि पुत्रशोकेन कृतपापा तवात्मजे । यथा त्वया प्रहर्तव्यं तथा तत्त्वं च मे शृणु ।। ५९ ।। जैसे मैं पुत्र शोकसे संतप्त होकर आपके पुत्रके प्रति पापपूर्ण बर्ताव कर बैठी, उसी प्रकार आप भी मुझपर प्रहार कर सकते हैं। यहाँ जो यथार्थ बात है, वह मुझसे सुनिये ।। ५९ ।। भक्ष्यार्थं क्रीडनार्थं च नरा वाञ्छन्ति पक्षिणः । तृतीयो नास्ति संयोगो वधबन्धादृते क्षमः ।। ६० ।। मनुष्य खाने और खेलनेके लिये ही पक्षियोंकी कामना करते हैं। वध करने या बन्धनमें डालनेके सिवा तीसरे प्रकारका कोई सम्पर्क पक्षियोंके साथ उनका नहीं देखा जाता है ।। ६० ।। वधबन्धभयादेते मोक्षतन्त्रमुपाश्रिताः । जनीमरणजं दुःखं प्राहुर्वेदविदो जनाः ।। ६१ ।। इस वध और बन्धनके भयसे ही मुमुक्षुलोग मोक्ष-शास्त्रका आश्रय लेकर रहते हैं; क्योंकि वेदवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि जन्म और मरणका दुःख असह्य होता है ।। ६१ ।। सर्वस्य दयिताः प्राणाः सर्वस्य दयिताः सुताः । दुःखादुद्विजते सर्वः सर्वस्य सुखमीप्सितम् ।। ६२ ।। सबको अपने प्राण प्रिय होते हैं, सभीको अपने पुत्र प्यारे लगते हैं; सब लोग दुःखसे उद्विग्न हो उठते हैं और सभीको सुखकी प्राप्ति अभीष्ट होती है ।। ६२ ।। दुःखं जरा ब्रह्मदत्त दुःखमर्थविपर्ययः । दुःखं चानिष्टसंवासो दुःखमिष्टवियोजनम् ।। ६३ ।। महाराज ब्रह्मदत्त! दुःखके अनेक रूप हैं। बुढ़ापा दुःख है, धनका नाश दुःख है, अप्रियजनोंके साथ रहना दुःख है और प्रियजनोंसे बिछुड़ना दुःख है ।। ६३ ।। वधबन्धकृतं दुःखं स्वीकृतं सहजं तथा । दुःखं सुतेन सततं जनान् विपरिवर्तते ।। ६४ ।। वध और बन्धनसे भी सबको दुःख होता है। स्त्रीके कारण और स्वाभाविक रूपसे भी दुःख हुआ करता है तथा पुत्र यदि नष्ट हो जाय या दुष्ट निकल जाय तो उससे भी लोगोंको
सदा दुःख प्राप्त होता रहता है ।। ६४ ।। न दुःखं परदुःखे वै केचिदाहुरबुद्धयः । यो दुःखं नाभिजानाति स जल्पति महाजने ।। ६५ ।। कुछ मूढ़ मनुष्य कहा करते हैं कि पराये दुःखमें दुःख नहीं होता; परंतु वही ऐसी बात श्रेष्ठ पुरुषोंके निकट कहा करता है, जो दुःखके तत्त्वको नहीं जानता ।। ६५ ।। यस्तु शोचति दुःखार्तः स कथं वक्तुमुत्सहेत् । रसज्ञः सर्वदुःखस्य यथाऽऽत्मनि तथा परे ।। ६६ ।। जो दुःखसे पीड़ित होकर शोक करता है तथा जो अपने और पराये सभीके दुःखका रस जानता है, वह ऐसी बात कैसे कह सकता है? ।। ६६ ।। यत् कृतं ते मया राजंस्त्वया च मम यत् कृतम् । न तद् वर्षशतैः शक्यं व्यपोहितुमरिंदम ।। ६७ ।। शत्रुदमन नरेश! आपने जो मेरा अपकार किया है तथा मैंने बदलेमें जो कुछ किया है, उसे सैकड़ों वर्षोंमें भी भुलाया नहीं जा सकता ।। ६७ ।। आवयोः कृतमन्योन्यं पुनः संधिर्न विद्यते । स्मृत्वा स्मृत्वा हि ते पुत्रं नवं वैरं भविष्यति ।। ६८ ।। इस प्रकार आपसमें एक दूसरेका अपकार करनेके कारण अब हमारा फिर मेल नहीं हो सकता। अपने पुत्रको याद कर-करके आपका वैर ताजा होता रहेगा ।। ६८ ।। वैरमन्तिकमासाद्य यः प्रीतिं कर्तुमिच्छति । मृन्मयस्येव भग्नस्य यथा संधिर्न विद्यते ।। ६९ ।। इस प्रकार मरणान्त वैर ठन जानेपर जो प्रेम करना चाहता है, उसका वह प्रेम उसी प्रकार असम्भव है, जैसे मिट्टीका बर्तन एक बार फूट जानेपर फिर नहीं जुटता है ।। ६९।। निश्चयः स्वार्थशास्त्रेषु विश्वासश्चासुखोदयः । उशना चैव गाथे द्वे प्रह्रादायाब्रवीत् पुरा ।। ७० ।। विश्वास दुःख देनेवाला है, यही नीतिशास्त्रोंका निश्चय है। प्राचीनकालमें शुक्राचार्यने भी प्रह्लादसे दो गाथाएँ कही थीं, जो इस प्रकार हैं ।। ७० ।। ये वैरिणः श्रद्दधते सत्ये सत्येतरेऽपि वा । वध्यन्ते श्रद्दधानास्तु मधु शुष्कतृणैर्यथा ।। ७१ ।। जैसे सूखे तिनकोंसे ढके हुए गड्ढेके ऊपर रखे हुए मधुको लेने जानेवाले मनुष्य मारे जाते हैं, उसी प्रकार जो लोग वैरीकी झूठी या सच्ची बातपर विश्वास करते हैं, वे भी बेमौत मरते हैं ।। ७१ ।। न हि वैराणि शाम्यन्ति कुले दुःखगतानि च । आख्यातारश्च विद्यन्ते कुले वै ध्रियते पुमान् ।। ७२ ।।
जब किसी कुलमें दुःखदायी वैर बँध जाता है, तब वह शान्त नहीं होता। उसे याद दिलानेवाले बने ही रहते हैं, इसलिये जबतक कुलमें एक भी पुरुष जीवित रहता है, तबतक वह वैर नहीं मिटता है ।। ७२ ।।
उपगृह्य तु वैराणि सान्त्वयन्ति नराधिप । अथैनं प्रतिपिंषन्ति पूर्णं घटमिवाश्मनि ॥ ७३ ॥
नरेश्वर! दुष्ट प्रकृतिके लोग मनमें वैर रखकर ऊपरसे शत्रुको मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना देते रहते हैं। तदनन्तर अवसर पाकर उसे उसी प्रकार पीस डालते हैं, जैसे कोई पानीसे भरे हुए घड़ेको पत्थरपर पटककर चूर-चूर कर दे ।। ७३ ।।
सदा न विश्वसेद् राजन् पापं कृत्वेह कस्यचित् । अपकृत्य परेषां हि विश्वासाद् दुःखमश्रुते ॥ ७४ ॥
राजन्! किसीका अपराध करके फिर उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। जो दूसरोंका अपकार करके भी उनपर विश्वास करता है, उसे दुःख भोगना पड़ता है ।। ७४ ।।
ब्रह्मदत्त उवाच
नाविश्वासाद् विन्दतेऽर्थानीहते चापि किंचन । भयात् त्वेकतरान्नित्यं मृतकल्पा भवन्ति च ॥ ७५ ॥
**ब्रह्मदत्तने कहा—**पूजनी! अविश्वास करनेसे तो मनुष्य संसारमें अपने अभीष्ट पदार्थोंको कभी नहीं प्राप्त कर सकता और न किसी कार्यके लिये कोई चेष्टा ही कर सकता है। यदि मनमें एक पक्षसे सदा भय बना रहे तो मनुष्य मृतकतुल्य हो जायेंगे—उनका जीवन ही मिट्टी हो जायगा ।। ७५ ।।
पूजन्युवाच
यस्येह व्रणिनौ पादौ पद्भ्यां च परिसर्पति । खन्येते तस्य तौ पादौ सुगुप्तमिह धावतः ॥ ७६ ॥
**पूजनीने कहा—**राजन्! जिसके दोनों पैरोंमें घाव हो गया हो; फिर भी वह उन पैरोंसे ही चलता रहे तो कितना ही बचा-बचाकर क्यों न चले; यहाँ दौड़ते हुए उन पैरोंमें पुनः घाव होते ही रहेंगे ।। ७६ ।।
नेत्राभ्यां सरुजाभ्यां यः प्रतिवातमुदीक्षते । तस्य वायुरुजात्यर्थं नेत्रयोर्भवति ध्रुवम् ॥ ७७ ॥
जो मनुष्य अपने रोगी नेत्रोंसे हवाकी ओर रुख करके देखता है, उसके उन नेत्रोंमें वायुके कारण अवश्य ही बहुत पीड़ा बढ़ जाती है ।। ७७ ।।
दुष्टं पन्थानमासाद्य यो मोहादुपपद्यते । आत्मनो बलमज्ञाय तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ ७८ ॥
जो अपनी शक्तिको न समझकर मोहवश दुर्गम मार्गपर चल देता है, उसका जीवन वहीं समाप्त हो जाता है ।। ७८ ।।
यस्तु वर्षमविज्ञाय क्षेत्रं कर्षति कर्षकः ।
हीनः पुरुषकारेण सस्यं नैवाश्नुते ततः ।। ७९ ।।
जो किसान वर्षाके समयका विचार न करके खेत जोतता है, उसका पुरुषार्थ व्यर्थ जाता है; और उस जुताईसे उसको अनाज नहीं मिल पाता ।। ७९ ।।
यस्तु तिक्तं कषायं वा स्वादु वा मधुरं हितम् ।
आहारं कुरुते नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।। ८० ।।
जो प्रतिदिन तीता, कसैला, स्वादिष्ट अथवा मधुर, जैसा भी हो, हितकर भोजन करता है, वही अन्न उसके लिये अमृतके समान लाभकारी होता है ।। ८० ।।
पथ्यं मुक्त्वा तु यो मोहाद् दुष्टमश्नाति भोजनम् ।
परिणाममविज्ञाय तदन्तं तस्य जीवितम् ।। ८१ ।।
परंतु जो परिणामके विचार किये बिना ही मोहवश पथ्य छोड़कर अपथ्य भोजन करता है, उसके जीवनका वहीं अन्त हो जाता है ।। ८१ ।।
दैवं पुरुषकारश्च स्थितावन्योन्यसंश्रयात् ।
उदाराणां तु सत्कर्म दैवं क्लीबा उपासते ।। ८२ ।।
दैव और पुरुषार्थ दोनों एक-दूसरेके सहारे रहते हैं, परंतु उदार विचारवाले पुरुष सर्वदा शुभ कर्म करते हैं और नपुंसक दैवके भरोसे पड़े रहते हैं ।। ८२ ।।
कर्म चात्महितं कार्यं तीक्ष्णं वा यदि वा मृदु ।
ग्रस्यतेऽकर्मशीलस्तु सदानर्थैरकिञ्चनः ।। ८३ ।।
कठोर अथवा कोमल, जो अपने लिये हितकर हो, वह कर्म करते रहना चाहिये। जो कर्मको छोड़ बैठता है, वह निर्धन होकर सदा अनर्थोंका शिकार बना रहता है ।। ८३ ।।
तस्मात् सर्वं व्यपोह्यार्थं कार्य एव पराक्रमः ।
सर्वस्वमपि संत्यज्य कार्यमात्महितं नरैः ।। ८४ ।।
अतः काल, दैव और स्वभाव आदि सारे पदार्थोंका भरोसा छोड़कर पराक्रम ही करना चाहिये। मनुष्यको सर्वस्वकी बाजी लगाकर भी अपने हितका साधन ही करना चाहिये ।। ८४ ।।
विद्या शौर्यं च दाक्ष्यं च बलं धैर्यं च पञ्चमम् ।
मित्राणि सहजान्याहुर्वर्तयन्तीह तैर्बुधाः ।। ८५ ।।
विद्या, शूरवीरता, दक्षता, बल और पाँचवाँ धैर्य—ये पाँच मनुष्य के स्वाभाविक मित्र बताये गये हैं। विद्वान् पुरुष इनके द्वारा ही इस जगत्में सारे कार्य करते हैं ।। ८५ ।।
निवेशनं च कुप्यं च क्षेत्रं भार्या सुहृज्जनः ।
एतान्युपहितान्याहुः सर्वत्र लभते पुमान् ।। ८६ ।।
घर, ताँबा आदि धातु, खेत, स्त्री और सुहृद्जन—ये उपमित्र बताये गये हैं। इन्हें मनुष्य सर्वत्र पा सकता है ॥ ८६ ॥
सर्वत्र रमते प्राज्ञः सर्वत्र च विराजते । न विभीषयते कश्चिद् भीषितो न बिभेति च ॥ ८७ ॥ विद्वान् पुरुष सर्वत्र आनन्दमें रहता है और सर्वत्र उसकी शोभा होती है। उसे कोई डराता नहीं है और किसीके डरानेपर भी वह डरता नहीं है ॥ ८७ ॥
नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते । दाक्ष्येण कुर्वतः कर्म संयमात् प्रतितिष्ठति ॥ ८८ ॥ बुद्धिमान्के पास थोड़ा-सा धन हो तो वह भी सदा बढ़ता रहता है। वह दक्षतापूर्वक काम करते हुए संयमके द्वारा प्रतिष्ठित होता है ॥ ८८ ॥
गृहस्नेहावबद्धानां नराणामल्पमेधसाम् । कुस्त्री खादति मांसानि माघमां सेगवा इव ॥ ८९ ॥ घरकी आसक्तिमें बँधे हुए मन्दबुद्धि मनुष्योंके मांसोंको कुटिल स्त्री खा जाती है अर्थात् उसे सुखा डालती है, जैसे केकड़ेकी मादाको उसकी संतानें ही नष्ट कर देती हैं ॥ ८९ ॥
गृहं क्षेत्राणि मित्राणि स्वदेश इति चापरे । इत्येवमवसीदन्ति नरा बुद्धिविपर्यये ॥ ९० ॥ बुद्धिके विपरीत हो जानेसे दूसरे-दूसरे बहुतेरे मनुष्य घर, खेत, मित्र और अपने देश आदिकी चिन्तासे ग्रस्त होकर सदा दुखी बने रहते हैं ॥ ९० ॥
उत्पतेत् सहजाद् देशाद् व्याधिदुर्भिक्षपीडितात् । अन्यत्र वस्तुं गच्छेद् वा वसेद् वा नित्यमानितः ॥ ९१ ॥ अपना जन्मस्थान भी यदि रोग और दुर्भिक्षसे पीडित हो तो आत्मरक्षाके लिये वहाँसे हट जाना या अन्यत्र निवासके लिये चले जाना चाहिये। यदि वहाँ रहना ही हो तो सदा सम्मानित होकर रहे ॥ ९१ ॥
तस्मादन्यत्र यास्यामि वस्तुं नाहमिहोत्सहे । कृतमेतदनार्यं मे तव पुत्रे च पार्थिव ॥ ९२ ॥ भूपाल! मैंने तुम्हारे पुत्रके साथ दुष्टतापूर्ण बर्ताव किया है, इसलिये मैं अब यहाँ रहनेका साहस नहीं कर सकती, दूसरी जगह चली जाऊँगी ॥ ९२ ॥
कुभार्यां च कुपुत्रं च कुराजानं कुसौहृदम् । कुसम्बन्धं कुदेशं च दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ९३ ॥ दुष्टा भार्या, दुष्ट पुत्र, कुटिल राजा, दुष्ट मित्र, दूषित सम्बन्ध और दुष्ट देशको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ ९३ ॥
कुपुत्रे नास्ति विश्वासः कुभार्यायां कुतो रतिः । कुराज्ये निर्वृतिर्नास्ति कुदेशे नास्ति जीविका ॥ ९४ ॥
कुपुत्रपर कभी विश्वास नहीं हो सकता। दुष्टा भार्यापर प्रेम कैसे हो सकता है? कुटिल राजाके राज्यमें कभी शान्ति नहीं मिल सकती और दुष्ट देशमें जीवन-निर्वाह नहीं हो सकता ॥ ९४ ॥
कुमित्रे संगतिर्नास्ति नित्यमस्थिरसौहृदे ।
अवमानः कुसम्बन्धे भवत्यर्थविपर्यये ॥ ९५ ॥
कुमित्रका स्नेह कभी स्थिर नहीं रह सकता, इसलिये उसके साथ सदा मेल बना रहे— यह असम्भव है और जहाँ दूषित सम्बन्ध हो, वहाँ स्वार्थमें अन्तर आनेपर अपमान होने लगता है ॥ ९५ ॥
सा भार्या या प्रियं ब्रूते स पुत्रो यत्र निर्वृतिः ।
तन्मित्रं यत्र विश्वासः स देशो यत्र जीव्यते ॥ ९६ ॥
पत्नी वही अच्छी है, जो प्रिय वचन बोले। पुत्र वही अच्छा है, जिससे सुख मिले। मित्र वही श्रेष्ठ है, जिसपर विश्वास बना रहे और देश भी वही उत्तम है, जहाँ जीविका चल सके ॥ ९६ ॥
यत्र नास्ति बलात्कारः स राजा तीव्रशासनः ।
भीरेव नास्ति सम्बन्धो दरिद्रं यो बुभूषते ॥ ९७ ॥
उग्र शासनवाला राजा वही श्रेष्ठ है, जिसके राज्यमें बलात्कार न हो, किसी प्रकारका भय न रहे, जो दरिद्रका पालन करना चाहता हो तथा प्रजाके साथ जिसका पाल्य-पालक सम्बन्ध सदा बना रहे ॥ ९७ ॥
भार्या देशोऽथ मित्राणि पुत्रसम्बन्धिबान्धवाः ।
एते सर्वे गुणवति धर्मनेत्रे महीपतौ ॥ ९८ ॥
जिस देशका राजा गुणवान् और धर्मपरायण होता है, वहाँ स्त्री, पुत्र, मित्र सम्बन्धी तथा देश सभी उत्तम गुणसे सम्पन्न होते हैं ॥ ९८ ॥
अधर्मज्ञस्य विलयं प्रजा गच्छन्ति निग्रहात् ।
राजा मूलं त्रिवर्गस्य स्वप्रमत्तोऽनुपालयेत् ॥ ९९ ॥
जो राजा धर्मको नहीं जानता, उसके अत्याचारसे प्रजाका नाश हो जाता है। राजा ही धर्म, अर्थ और काम—इन तीनोंका मूल है। अतः उसे पूर्ण सावधान रहकर निरन्तर अपनी प्रजाका पालन करना चाहिये ॥
बलिषड्भागमुद्धृत्य बलिं समुपयोजयेत् ।
न रक्षति प्रजाः सम्यग् यः स पार्थिवतस्करः ॥ १०० ॥
जो प्रजाकी आयका छठा भाग कररूपसे ग्रहण करके उसका उपभोग करता है और प्रजाका भलीभाँति पालन नहीं करता, वह तो राजाओंमें चोर है ॥ १०० ॥
दत्त्वाभयं यः स्वयमेव राजा
न तत् प्रमाणं कुरुतेऽर्थलोभात् ।
स सर्वलोकादुपलभ्य पापं सोऽधर्मबुद्धिर्निरयं प्रयाति ॥ १०१ ॥ जो प्रजाको अभयदान देकर धनके लोभसे स्वयं ही उसका पालन नहीं करता, वह पापबुद्धि राजा सारे जगत्का पाप बटोरकर नरकमें जाता है ॥ १०१ ॥
दत्त्वाभयं स्वयं राजा प्रमाणं कुरुते यदि । स सर्वसुखकृज्ज्ञेयः प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ १०२ ॥ जो अभयदान देकर प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए स्वयं ही अपनी प्रतिज्ञाको सत्य प्रमाणित कर देता है, वह राजा सबको सुख देनेवाला समझा जाता है ॥
माता पिता गुरुर्गोप्ता वह्निर्वैश्रवणो यमः । सप्त राज्ञो गुणानेतान् मनुराह प्रजापतिः ॥ १०३ ॥ प्रजापति मनुने राजाके सात गुण बताये हैं, और उन्हींके अनुसार उसे माता, पिता, गुरु, रक्षक, अग्नि, कुबेर और यमकी उपमा दी है ॥ १०३ ॥
पिता हि राजा राष्ट्रस्य प्रजानां योऽनुकम्पनः । तस्मिन् मिथ्याविनीतो हि तिर्यग् गच्छति मानवः ॥ १०४ ॥ जो राजा प्रजापर सदा कृपा रखता है, वह अपने राष्ट्रके लिये पिताके समान है। उसके प्रति जो मिथ्याभाव प्रदर्शित करता है, वह मनुष्य दूसरे जन्ममें पशु-पक्षीकी योनिमें जाता है ॥ १०४ ॥
सम्भावयति मातेव दीनमप्युपपद्यते । दहत्याग्निरिवानिष्टान् यमयन्नसतो यमः ॥ १०५ ॥ राजा दीन-दुःखियोंकी भी सुधि लेता और सबका पालन करता है, इसलिये वह माताके समान है। अपने और प्रजाके अप्रियजनोंको वह जलाता रहता है; अतः अग्निके समान है और दुष्टोंका दमन करके उन्हें संयममें रखता है; इसलिये यम कहा गया है ॥
इष्टेषु विसृजन्नर्थान् कुबेर इव कामदः । गुरुर्धर्मोपदेशेन गोप्ता च परिपालयन् ॥ १०६ ॥ प्रियजनोंको खुले हाथ धन लुटाता है और उनकी कामना पूरी करता है, इसलिये कुबेरके समान है। धर्मका उपदेश करनेके कारण गुरु और सबका संरक्षण करनेके कारण रक्षक है ॥ १०६ ॥
यस्तु रञ्जयते राजा पौरजानपदान् गुणैः । न तस्य भ्रमते राज्यं स्वयं धर्मानुपालनात् ॥ १०७ ॥ जो राजा अपने गुणोंसे नगर और जनपदके लोगोंको प्रसन्न रखता है, उसका राज्य कभी डावाँडोल नहीं होता क्योंकि वह स्वयं धर्मका निरन्तर पालन करता रहता है ॥ १०७ ॥
स्वयं समुपजानन् हि पौरजानपदार्चनम् ।
स सुखं प्रेक्षते राजा इह लोके परत्र च ॥ १०८ ॥ जो स्वयं नगर और गाँवोंके लोगोंका सम्मान करना जानता है, वह राजा इहलोक और परलोकमें सर्वत्र सुख-ही-सुख देखता है ॥ १०८ ॥
नित्योद्विग्नाः प्रजा यस्य करभारप्रपीडिताः । अनर्थैर्विप्रलुप्यन्ते स गच्छति पराभवम् ॥ १०९ ॥ जिसकी प्रजा सर्वदा करके भारसे पीड़ित हो नित्य उद्विग्न रहती है और नाना प्रकारके अनर्थ उसे सताते रहते हैं, वह राजा पराभवको प्राप्त होता है ॥ १०९ ॥
प्रजा यस्य विवर्धन्ते सरसीव महोत्पलम् । स सर्वफलभाग् राजा स्वर्गलोके महीयते ॥ ११० ॥ इसके विपरीत जिसकी प्रजा सरोवरमें कमलोंके समान विकास एवं वृद्धिको प्राप्त होती रहती है, वह सब प्रकारके पुण्यफलोंका भागी होता है और स्वर्गलोकमें भी सम्मान पाता है ॥ ११० ॥
बलिना विग्रहो राजन् न कदाचित् प्रशस्यते । बलिना विग्रहो यस्य कुतो राज्यं कुतः सुखम् ॥ १११ ॥ राजन्! बलवान्के साथ युद्ध छेड़ना कभी अच्छा नहीं माना जाता। जिसने बलवान्के साथ झगड़ा मोल ले लिया, उसके लिये कहाँ राज्य है और कहाँ सुख? ॥ १११ ॥
भीष्म उवाच
सैवमुक्त्वा शकुनिका ब्रह्मदत्तं नराधिप । राजानं समनुज्ञाप्य जगामाभीप्सितां दिशम् ॥ ११२ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! राजा ब्रह्मदत्तसे ऐसा कहकर वह पूजनी चिड़िया उनसे विदा ले अभीष्ट दिशाको चली गयी ॥ ११२ ॥
एतत् ते ब्रह्मदत्तस्य पूजन्या सह भाषितम् । मयोक्तं नृपतिश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ११३ ॥ नृपश्रेष्ठ! राजा ब्रह्मदत्तका पूजनी चिड़ियाके साथ जो संवाद हुआ था, यह मैंने तुम्हें सुना दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ११३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि ब्रह्मदत्तपूजन्योः संवाद एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें ब्रह्मदत्त और पूजनीका संवादविषयक एकसौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥