महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विशाल नेत्रोंवाले सनातन महात्मा महादेवजीने अपने आपको रुद्रोंका अधीश्वर तथा शक्तिशाली संरक्षक बनाया ॥ ३० ॥
वसिष्ठमीशं विप्राणां वसूनां जातवेदसम् । तेजसां भास्करं चक्रे नक्षत्राणां निशाकरम् ॥ ३१ ॥ वसिष्ठको ब्राह्मणोंका, जातवेदा अग्निको वसुओंका, सूर्यको तेजस्वी ग्रहोंका और चन्द्रमाको नक्षत्रोंका अधिपति बनाया ॥ ३१ ॥
वीरुधामंशुमन्तं च भूतानां च प्रभुं वरम् । कुमारं द्वादशभुजं स्कन्दं राजानमादिशत् ॥ ३२ ॥ अंशुमान्को लताओंका तथा बारह भुजाओंसे विभूषित शक्तिशाली कुमार स्कन्दको भूतोंका श्रेष्ठ राजा नियुक्त किया ॥ ३२ ॥
कालं सर्वेशमकरोत् संहारविनयात्मकम् । मृत्योश्चतुर्विभागस्य दुःखस्य च सुखस्य च ॥ ३३ ॥ संहार और विनय (उत्पादन) जिसका स्वरूप है, उस सर्वेश्वर कालको चार प्रकारकी मृत्युका, सुखका और दुःखका भी स्वामी बनाया ॥ ३३ ॥
ईश्वरः सर्वदेवस्तु राजराजो नराधिपः । सर्वेषामेव रुद्राणां शूलपाणिरिति श्रुतिः ॥ ३४ ॥ सबके देवता, राजाओंके राजा और मनुष्योंके अधिपति शूलपाणि भगवान् शिव स्वयं समस्त रुद्रोंके अधीश्वर हुए। ऐसा सुना जाता है ॥ ३४ ॥
तमेनं ब्रह्मणः पुत्रमनुजातं क्षुपं ददौ । प्रजानामधिपं श्रेष्ठं सर्वधर्मभृतामपि ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजीके छोटे पुत्र क्षुपको उन्होंने समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण धर्मधारियोंका श्रेष्ठ अधिपति बना दिया ॥ ३५ ॥
महादेवस्ततस्तस्मिन् वृत्ते यज्ञे यथाविधि । दण्डं धर्मस्य गोप्तारं विष्णवे सत्कृतं ददौ ॥ ३६ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजीका वह यज्ञ जब विधिपूर्वक सम्पन्न हो गया, तब महादेवजीने धर्मरक्षक भगवान् विष्णुका सत्कार करके उन्हें वह दण्ड समर्पित किया ॥ ३६ ॥
विष्णुरङ्गिरसे प्रादादङ्गिरा मुनिसत्तमः । प्रादादिन्द्रमरीचिभ्यां मरीचिर्भार्गवे ददौ ॥ ३७ ॥ भगवान् विष्णुने उसे अंगिराको दे दिया। मुनिवर अंगिराने इन्द्र और मरीचिको दिया और मरीचिने भृगुको सौंप दिया ॥ ३७ ॥
भृगुर्ददावृषिभ्यस्तु दण्डं धर्मसमाहितम् । ऋषयो लोकपालेभ्यो लोकपालाः क्षुपाय च ॥ ३८ ॥ क्षुपस्तु मनवे प्रादादादित्यतनयाय च ।
पुत्रेभ्यः श्राद्धदेवस्तु सूक्ष्मधर्मार्थकारणात् ॥ ३९ ॥
भृगुने वह धर्मसमाहित दण्ड ऋषियोंको दिया। ऋषियोंने लोकपालोंको, लोकपालोंने क्षुपको, क्षुपने सूर्यपुत्र मनु (श्राद्धदेव) को और श्राद्धदेवने सूक्ष्म धर्म तथा अर्थकी रक्षाके लिये उसे अपने पुत्रोंको सौंप दिया ॥ ३८-३९ ॥
विभज्य दण्डः कर्तव्यो धर्मेण न यदृच्छया ।
दुष्टानां निग्रहो दण्डो हिरण्यं बाह्यतः क्रिया ॥ ४० ॥
अतः धर्मके अनुसार न्याय-अन्यायका विचार करके ही दण्डका विधान करना चाहिये, मनमानी नहीं करनी चाहिये। दुष्टोंका दमन करना ही दण्डका मुख्य उद्देश्य है, स्वर्णमुद्राएँ लेकर खजाना भरना नहीं। दण्डके तौरपर सुवर्ण (धन) लेना तो बाह्यांग—गौण कर्म है ॥ ४० ॥
व्यङ्गत्त्वं व शरीरस्य वधो नाल्पस्य कारणात् ।
शरीरपीडास्तास्ताश्च देहत्यागो विवासनम् ॥ ४१ ॥
किसी छोटे-से अपराधपर प्रजाका अंग-भंग करना, उसे मार डालना, उसे तरह-तरहकी यातनाएँ देना तथा उसको देहत्यागके लिये विवश करना अथवा देशसे निकाल देना कदापि उचित नहीं है ॥ ४१ ॥
तं ददौ सूर्यपुत्रस्तु मनुर्वै रक्षणार्थकम् ।
आनुपूर्व्याच्च दण्डोऽयं प्रजा जागर्ति पालयन् ॥ ४२ ॥
सूर्यपुत्र मनुने प्रजाकी रक्षाके लिये ही अपने पुत्रोंके हाथोंमें दण्ड सौंपा था, वही क्रमशः उत्तरोत्तर अधिकारियोंके हाथमें आकर प्रजाका पालन करता हुआ जागता रहता है ॥ ४२ ॥
इन्द्रो जागर्ति भगवानिन्द्रादग्निर्विभावसुः ।
अग्नेर्जागर्ति वरुणो वरुणाच्च प्रजापतिः ॥ ४३ ॥
भगवान् इन्द्र दण्ड-विधान करनेमें सदा जागरूक रहते हैं। इन्द्रसे प्रकाशमान अग्नि, अग्निसे वरुण और वरुणसे प्रजापति उस दण्डको प्राप्त करके उसके यथोचित प्रयोगके लिये सदा जाग्रत् रहते हैं ॥ ४३ ॥
प्रजापतेस्ततो धर्मो जागर्ति विनयात्मकः ।
धर्माच्च ब्रह्मणः पुत्रो व्यवसायः सनातनः ॥ ४४ ॥
जो सम्पूर्ण जगत्को शिक्षा देनेवाले हैं, वे धर्म प्रजापतिसे दण्डको ग्रहण करके प्रजाकी रक्षाके लिये सदा जागरूक रहते हैं। ब्रह्मपुत्र सनातन व्यवसाय वह दण्ड धर्मसे लेकर लोकरक्षाके लिये जागते रहते हैं ॥
व्यवसायात् ततस्तेजो जागर्ति परिपालयत् ।
ओषध्यस्तेजसस्तस्मादोषधीभ्यश्च पर्वताः ॥ ४५ ॥
पर्वतेभ्यश्च जागर्ति रसो रसगुणात् तथा ।
जागर्ति निर्ऋतिर्देवी ज्योतींषि निर्ऋतेरपि ॥ ४६ ॥
व्यवसायसे दण्ड लेकर तेज जगत्की रक्षा करता हुआ सजग रहता है। तेजसे ओषधियाँ, ओषधियोंसे पर्वत, पर्वतोंसे रस, रससे निर्ऋति और निर्ऋतिसे ज्योतियाँ क्रमशः उस दण्डको हस्तगत करके लोक-रक्षाके लिये जागरूक बनी रहती हैं॥ ४५-४६॥
वेदाः प्रतिष्ठा ज्योतिर्भ्यस्ततो हयशिरः प्रभुः ।
ब्रह्मा पितामहस्तस्माज्जागर्ति प्रभुरव्ययः ॥ ४७ ॥
ज्योतियोंसे दण्ड ग्रहण करके वेद प्रतिष्ठित हुए हैं। वेदोंसे भगवान् हयग्रीव और हयग्रीवसे अविनाशी प्रभु ब्रह्मा वह दण्ड पाकर लोक-रक्षाके लिये जागते रहते हैं॥ ४७ ॥
पितामहान्महादेवो जागर्ति भगवान् शिवः ।
विश्वेदेवाः शिवाच्चापि विश्वेभ्यश्च तथर्षयः ॥ ४८ ॥
ऋषिभ्यो भगवान् सोमः सोमाद् देवाः सनातनाः ।
देवेभ्यो ब्राह्मणा लोके जाग्रतीत्युपधारय ॥ ४९ ॥
पितामह ब्रह्मासे दण्ड और रक्षाका अधिकार पाकर महान् देव भगवान् शिव जागते हैं। शिवसे विश्वेदेव, विश्वेदेवोंसे ऋषि, ऋषियोंसे भगवान् सोम, सोमसे सनातन देवगण और देवताओंसे ब्राह्मण वह अधिकार लेकर लोक-रक्षाके लिये सदा जाग्रत् रहते हैं। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ ४८-४९॥
ब्राह्मणेभ्यश्च राजन्या लोकान् रक्षन्ति धर्मतः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव क्षत्रियेभ्यः सनातनम् ॥ ५० ॥
तदनन्तर ब्राह्मणोंसे दण्ड धारणका अधिकार पाकर क्षत्रिय धर्मानुसार सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करते हैं। क्षत्रियोंसे ही यह सनातन चराचर जगत् सुरक्षित होता रहा है॥ ५० ॥
प्रजा जागर्ति लोकेऽस्मिन् दण्डो जागर्ति तासु च ।
सर्वं संक्षिपते दण्डः पितामहसमप्रभः ॥ ५१ ॥
इस लोकमें प्रजा जागती है और प्रजाओंमें दण्ड जागता है। वह ब्रह्माजीके समान तेजस्वी दण्ड सबको मर्यादाके भीतर रखता है॥ ५१ ॥
जागर्ति कालः पूर्वं च मध्ये चान्ते च भारत ।
ईश्वरः सर्वलोकस्य महादेवः प्रजापतिः ॥ ५२ ॥
भारत! यह कालरूप दण्ड सृष्टिके आदिमें, मध्यमें और अन्तमें भी जागता रहता है। यह सर्वलोकेश्वर महादेवका स्वरूप है। यही समस्त प्रजाओंका पालक है॥ ५२ ॥
देवदेवः शिवः सर्वो जागर्ति सततं प्रभुः ॥
कपर्दी शङ्करो रुद्रः शिवः स्थाणुरुमापतिः ॥ ५३ ॥
इस दण्डके रूपमें देवाधिदेव कल्याणस्वरूप सर्वात्मा प्रभु जटाजूटधारी उमावल्लभ दुःखहारी स्थाणु-स्वरूप एवं लोक-मंगलकारी भगवान् शिव ही सदा जाग्रत रहते
हैं ।। ५३ ।। इत्येष दण्डो विख्यात आदौ मध्ये तथावरे । भूमिपालो यथान्यायं वर्तेतानेन धर्मवित् ।। ५४ ।। इस तरह यह दण्ड आदि, मध्य और अन्तमें विख्यात है। धर्मज्ञ राजाको चाहिये कि इसके द्वारा न्यायोचित बर्ताव करे ।। ५४ ।।
भीष्म उवाच इतीदं वसुहोमस्य शृणुयाद् यो मतं नरः । श्रुत्वा सम्यक् प्रवर्तेत सर्वान् कामानवाप्नुयात् ।। ५५ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जो नरेश इस प्रकार बताये हुए वसुहोमके इस मतको सुनता और सुनकर यथोचित बर्ताव करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। ५५ ।।
इति ते सर्वमाख्यातं यो दण्डो मनुजर्षभ । नियन्ता सर्वलोकस्य धर्माक्रान्तस्य भारत ।। ५६ ।। नरश्रेष्ठ! भरतनन्दन! जो दण्ड सम्पूर्ण धार्मिक जगत्के नियमके भीतर रखनेवाला है, उसके सम्बन्धमें जितनी बातें हैं, उन्हें मैंने तुम्हें बता दीं ।। ५६ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दण्डोत्पत्युपाख्याने द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दण्डकी उत्पत्तिकी कथाविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२२ ।।
त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद
त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
तात धर्मार्थकामानां श्रोतुमिच्छामि निश्चयम् ।
लोकयात्रा हि कात्स्न्र्येन तिष्ठेत् केषु प्रतिष्ठिता ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**तात! मैं धर्म, अर्थ और कामके सम्बन्धमें आपका निश्चित मत सुनना चाहता हूँ। किनपर अवलम्बित होनेपर लोकयात्राका पूर्ण रूपसे निर्वाह होता है? ॥ १ ॥
धर्मार्थकामाः किंमूलास्त्रयाणां प्रभवश्च कः ।
अन्योन्यं चानुषज्जन्ते वर्तन्ते च पृथक् पृथक् ॥ २ ॥
धर्म, अर्थ और कामका मूल क्या है? इन तीनोंकी उत्पत्तिका कारण क्या है? ये कहीं एक साथ मिले हुए और कहीं पृथक्-पृथक् क्यों रहते हैं? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
यदा ते स्युः सुमनसो लोके धर्मार्थनिश्चये ।
कालप्रभवसंस्थासु सज्जन्ते च त्रयस्तदा ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! संसारमें जब मनुष्योंका चित्त शुद्ध होता है और वे धर्मपूर्वक किसी अर्थकी प्राप्तिका निश्चय करके प्रवृत्त होते हैं, उस समय उचित काल, कारण तथा कर्मानुष्ठानवश धर्म, अर्थ और काम-तीनों एक साथ मिले हुए प्रकट होते हैं ॥ ३ ॥
धर्ममूलः सदैवार्थः कामोऽर्थफलमुच्यते ।
संकल्पमूलास्ते सर्वे संकल्पो विषयात्मकः ॥ ४ ॥
इनमें धर्म सदा ही अर्थकी प्राप्तिका कारण है और काम अर्थका फल कहलाता है, परंतु इन तीनोंका मूल कारण है संकल्प और संकल्प है विषयरूप ॥ ४ ॥
विषयाश्चैव कात्स्न्र्येन सर्व आहारसिद्धये ।
मूलमेतत् त्रिवर्गस्य निवृत्तिर्मोक्ष उच्यते ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण विषय पूर्णतः इन्द्रियोंके उपभोगमें आनेके लिये हैं। यही धर्म, अर्थ और कामका मूल है, इससे निवृत्त होना ही 'मोक्ष' कहा जाता है ॥ ५ ॥
धर्माच्छरीरसंगुप्तिर्धर्मार्थं चार्थ उच्यते ।
कामो रतिफलश्चात्र सर्वे ते च रजस्वलाः ॥ ६ ॥ धर्मसे शरीरकी रक्षा होती है, धर्मका उपार्जन करनेके लिये ही अर्थकी आवश्यकता बतायी जाती है तथा कामका फल है रति। वे सभी रजोगुणमय हैं ॥ ६ ॥
संनिकृष्टांश्चरेदेतान् न चैतान् मनसा त्यजेत् । विमुक्तस्तपसा सर्वान् धर्मादीन् कामनैष्ठिकान् ॥ ७ ॥ ये धर्म आदि जिस प्रकार संनिकृष्ट अर्थात् अपना वास्तविक हित करनेवाले हों, उसी रूपमें इनका सेवन करे अर्थात् इनको कल्याणसाधन बनाकर ही उपयोगमें लावे। मनद्वारा भी इनका त्याग न करे, फिर स्वरूपसे शरीरद्वारा त्याग करना तो दूरकी बात है। केवल तप अथवा विचारके द्वारा ही उनसे अपनेको मुक्त रखे अर्थात् आसक्ति और फलका त्याग करके ही इन सब धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये ॥ ७ ॥
श्रेष्ठे बुद्धिस्त्रिवर्गस्य यदयं प्राप्नुयान्नरः । कर्मणा बुद्धिपूर्वेण भवत्यर्थो न वा पुनः ॥ ८ ॥ आसक्ति और फलेच्छाको त्यागकर त्रिवर्गका सेवन किया जाय तो उसका पर्यवसान कल्याणमें ही होता है। यदि मनुष्य उसे प्राप्त कर सके तो बड़े सौभाग्यकी बात है। अर्थसिद्धिके लिये समझ-बूझकर धर्मानुष्ठान करनेपर भी कभी अर्थकी सिद्धि होती है, कभी नहीं होती है ॥ ८ ॥
अर्थार्थमन्यद् भवति विपरीतमथापरम् । अनर्थार्थमवाप्यार्थमन्यत्राद्योपकारकम् । बुद्ध्याबुद्धिर्हिहार्थे न तदज्ञाननिकृष्टया ॥ ९ ॥ इसके सिवा, कभी दूसरे-दूसरे उपाय भी अर्थके साधक हो जाते हैं और कभी अर्थसाधक कर्म भी विपरीत फल देनेवाला हो जाता है। कभी धन पाकर भी मनुष्य अनर्थकारी कर्मोंमें प्रवृत्त हो जाता है और धनसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे साधन हैं, वे धर्ममें सहायक हो जाते हैं। अतः धर्मसे धन होता है और धनसे धर्म, इस मान्यताके विषयमें अज्ञानमयी निकृष्ट बुद्धिसे मोहित हुआ मूढ़ मानव विश्वास नहीं रखता, इसलिये उसे दोनोंका फल सुलभ नहीं होता ॥ ९ ॥
अपध्यानमलो धर्मो मलोऽर्थस्य निगूहनम् । सम्प्रमोदमलः कामो भूयः स्वगुणवर्जितः ॥ १० ॥ फलकी इच्छा धर्मका मल है, संगृहीत करके रखना अर्थका मल है और आमोद-प्रमोद कामका मल है, परंतु यह त्रिवर्ग यदि अपने दोषोंसे रहित हो तो कल्याणकारक होता है ॥ १० ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । कामन्दकस्य संवादमाङ्गिरिष्ठस्य चोभयोः ॥ ११ ॥
इस विषयमें जानकार लोग राजा आंगरिष्ठ और कामन्दक मुनिका संवादरूप प्राचीन इतिहास सुनाया करते हैं ।। ११ ।।
कामन्दमृषिमासीनमभिवाद्य नराधिपः ।
आङ्गरिष्ठोऽथ पप्रच्छ कृत्वा समयपर्ययम् ।। १२ ।।
एक समयकी बात है, कामन्दक ऋषि अपने आश्रममें बैठे थे। उन्हें प्रणाम करके राजा आंगरिष्ठने प्रश्नके उपयुक्त समय देखकर पूछा— ।। १२ ।।
यः पापं कुरुते राजा काममोहबलात्कृतः ।
प्रत्यासन्नस्य तस्यर्षे किं स्यात् पापप्रणाशनम् ।। १३ ।।
‘महर्षे! यदि कोई राजा काम और मोहके वशीभूत होकर पाप कर बैठे, किंतु फिर उसे पश्चात्ताप होने लगे तो उसके उस पापको दूर करनेके लिये कौन-सा प्रायश्चित्त है? ।। १३ ।।
अधर्मं धर्म इति च योऽज्ञानादाचरेन्नरः ।
तं चापि प्रथितं लोके कथं राजा निवर्तयेत् ।। १४ ।।
‘जो अज्ञानवश अधर्मको ही धर्म मानकर उसका आचरण कर रहा हो, उस लोकविख्यात सम्मानित पुरुषको राजा किस प्रकार उस अधर्मसे दूर हटावे? ।। १४ ।।
कामन्दक उवाच
यो धर्मार्थौ परित्यज्य काममेवानुवर्तते ।
स धर्मार्थपरित्यागात् प्रज्ञानाशमिहाच्छति ।। १५ ।।
**कामन्दकने कहा—**राजन्! जो धर्म और अर्थका परित्याग करके केवल कामका ही सेवन करता है, उन दोनोंके त्यागसे उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है ।। १५ ।।
प्रज्ञानाशात्मको मोहस्तथा धर्मार्थनाशकः ।
तस्मान्नास्तिकता चैव दुराचारश्च जायते ।। १६ ।।
बुद्धिका नाश ही मोह है। वह धर्म और अर्थ दोनोंका विनाश करनेवाला है। इससे मनुष्यमें नास्तिकता आती है और वह दुराचारी हो जाता है ।। १६ ।।
दुराचारान् यदा राजा प्रदुष्टान् न नियच्छति ।
तस्मादुद्विजते लोकः सर्पाद् वेश्मगतादिव ।। १७ ।।
जब राजा दुष्टों और दुराचारियोंको दण्ड देकर काबूमें नहीं करता है, तब सारी प्रजा घरमें रहनेवाले सर्पकी भाँति उस राजासे उद्विग्न हो उठती है ।। १७ ।।
तं प्रजा नानुवर्तन्ते ब्राह्मणा न च साधवः ।
ततः संशयमाप्नोति तथा वध्यत्वमेति च ।। १८ ।।
उस दशामें प्रजा उसका साथ नहीं देती। साधु और ब्राह्मण भी उसका अनुसरण नहीं करते हैं। फिर तो उसका जीवन खतरेमें पड़ जाता है और अन्ततोगत्वा वह प्रजाके ही हाथसे मारा भी जाता है ।। १८ ।।
अपध्वस्तस्त्ववमतो दुःखं जीवितमृच्छति । जीवेच्च यदपध्वस्तस्तच्छुद्रं मरणं भवेत् ॥ १९ ॥ वह अपने पदसे भ्रष्ट और अपमानित होकर दुःखमय जीवन बिताता है। यदि पदभ्रष्ट होकर भी वह जीता है तो वह जीवन भी स्पष्टरूपमें मरण ही है ॥ १९ ॥
अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिगर्हणम् । सेवितव्या त्रयी विद्या सत्कारो ब्राह्मणेषु च ॥ २० ॥ इस अवस्थामें आचार्यगण उसके लिये यह कर्तव्य बतलाते हैं कि वह अपने पापोंकी निन्दा करे, वेदोंका निरन्तर स्वाध्याय करे और ब्राह्मणोंका सत्कार करे ॥ २० ॥
महामना भवेद् धर्मे विवहेच्च महाकुले । ब्राह्मणांश्चापि सेवेत क्षमायुक्तान् मनस्विनः ॥ २१ ॥ धर्माचरणमें विशेष मन लगावे। उत्तम कुलमें विवाह करे। उदार एवं क्षमाशील ब्राह्मणोंकी सेवामें रहे ॥
जपेदुदकशीलः स्यात् सततं सुखमास्थितः । धर्मान्वितान् सम्प्रविशेद् बहिः कृत्वेह दुष्कृतीन् ॥ २२ ॥ वह जलमें खड़ा होकर गायत्रीका जप करे। सदा प्रसन्न रहे। पापियोंको राज्यसे बाहर निकालकर धर्मात्मा पुरुषोंका संग करे ॥ २२ ॥
प्रसादयेन्मधुरया वाचा वाप्यथ कर्मणा । तवास्मीति वदेन्नित्यं परेषां कीर्तयन् गुणान् ॥ २३ ॥ मीठी वाणी तथा उत्तम कर्मके द्वारा सबको प्रसन्न रखे, दूसरोंके गुणोंका बखान करे और सबसे यही कहे—मैं आपका ही हूँ—आप मुझे अपना ही समझें ॥ २३ ॥
अपापो ह्येवमाचारः क्षिप्रं बहुमतो भवेत् । पापान्यपि हि कृच्छ्राणि शमयेन्नात्र संशयः ॥ २४ ॥ जो राजा इस प्रकार अपना आचरण बना लेता है, वह शीघ्र ही निष्पाप होकर सबके सम्मानका पात्र बन जाता है। वह अपने कठिन-से-कठिन पापोंको भी शान्त (नष्ट) कर देता है—इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥
गुरवो हि परं धर्मं यं ब्रूयुस्तं तथा कुरु । गुरूणां हि प्रसादाद् वै श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥ २५ ॥ राजन्! गुरुजन तुम्हारे लिये जिस उत्तम धर्मका उपदेश करें, उसका उसी रूपमें पालन करो। गुरुजनोंकी कृपासे तुम परम कल्याणके भागी होओगे ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कामन्दकाङ्गिरिषसंवादे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कामन्दक और आंगरिष्ठका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥
इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
इमे जना नरश्रेष्ठ प्रशंसन्ति सदा भुवि ।
धर्मस्य शीलमेवादौ ततो मे संशयो महान् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नरश्रेष्ठ! पितामह! भूमण्डलके ये सभी मनुष्य सर्वप्रथम धर्मके अनुरूप शीलकी ही अधिक प्रशंसा करते हैं; अतः इस विषयमें मुझे बड़ा भारी संदेह हो गया है ॥ १ ॥
यदि तच्छक्यमस्माभिर्ज्ञातुं धर्मभृतां वर ।
श्रोतुमिच्छामि तत् सर्वं यथैतदुपलभ्यते ॥ २ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ! यदि मै उसे जान सकूँ तो जिस प्रकार शीलकी उपलब्धि होती है, वह सब सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत ।
किंलक्षणं च तत् प्रोक्तं ब्रूहि मे वदतां वर ॥ ३ ॥
भारत! वह शील कैसे प्राप्त होता है? यह सुननेकी मेरी बड़ी इच्छा है। वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! उसका क्या लक्षण बताया गया है? यह मुझसे कहिये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
पुरा दुर्योधनेनेह धृतराष्ट्राय मानद ।
आख्यातं तप्यमानेन श्रियं दृष्ट्वा तथागताम् ॥ ४ ॥
इन्द्रप्रस्थे महाराज तव सभ्रातृकस्य ह ।
सभायां चाह वचनं तत् सर्वं शृणु भारत ॥ ५ ॥
भवतस्तां सभां दृष्ट्वा समृद्धिं चाप्यनुत्तमाम् ।
दुर्योधनस्तदाऽऽसीनः सर्वं पित्रे न्यवेदयत् ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**दूसरोंको मान देनेवाले महाराज! भरतनन्दन! पहले इन्द्रप्रस्थमें (राजसूययज्ञके समय) भाइयोंसहित तुम्हारी वैसी अद्भुत श्री-सम्पत्ति, वह परम उत्तम सभा और समृद्धि देखकर संतप्त हुए दुर्योधनने कौरवसभामें बैठकर पिता धृतराष्ट्रसे अपनी गहरी चिन्ता प्रकट की—सारी मनोव्यथा कह सुनायी। उसने सभामें जो बातें कही थीं, वह सब सुनो ॥
श्रुत्वा हि धृतराष्ट्रश्च दुर्योधनवचस्तदा ।
अब्रवीत् कर्णसहितं दुर्योधनमिदं वचः ॥ ७ ॥
उस समय धृतराष्ट्रने दुर्योधनकी बात सुनकर कर्णसहित उससे इस प्रकार कहा ॥ ७ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
किमर्थं तप्यसे पुत्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
श्रुत्वा त्वामनुनेष्यामि यदि सम्यग् भविष्यति ॥ ८ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**बेटा! तुम किसलिये संतप्त हो रहे हो? यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ, सुनकर यदि उचित होगा तो तुम्हें समझानेका प्रयत्न करूँगा ॥ ८ ॥
त्वया च महदैश्वर्यं प्राप्तं परपुरञ्जय ।
किंकरा भ्रातरः सर्वे मित्रसम्बन्धिनः सदा ॥ ९ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले वीर! तुमने भी तो महान् ऐश्वर्य प्राप्त किया है? तुम्हारे समस्त भाई, मित्र और सम्बन्धी सदा तुम्हारी सेवामें उपस्थित रहते हैं ॥
आच्छादयसि प्रावारानश्नासि पिशितौदनम् ।
आजानेया वहन्त्यश्वाः केनासि हरिणः कृशः ॥ १० ॥
तुम अच्छे-अच्छे वस्त्र ओढ़ते-पहनते हो, पिशितौदन खाते हो और 'आजानेय' अश्व (अरबी घोड़े) तुम्हारा रथ खींचते हैं, फिर तुम क्यों सफेद और दुबले हुए जाते हो? ॥ १० ॥
दुर्योधन उवाच
दश तानि सहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् ।
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ११ ॥
**दुर्योधनने कहा—**पिताजी! युधिष्ठिरके महलमें दस हजार महामनस्वी स्नातक ब्राह्मण प्रतिदिन सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ॥ ११ ॥
दृष्ट्वा च तां सभां दिव्यां दिव्यपुष्पफलान्विताम् ।
अश्वांस्तित्तिरकल्माषान् वस्त्राणि विविधानि च ॥ १२ ॥
दृष्ट्वा तां पाण्डवेयानामृद्धिं वैश्रवणीं शुभाम् ।
अमित्राणां सुमहतीमनुशोचामि भारत ॥ १३ ॥
भारत! दिव्य फल-फूलोंसे सुशोभित वह दिव्य सभा, वे तीतरके समान रंगवाले चितकबरे घोड़े और वे भाँति-भाँतिके दिव्य वस्त्र (अपने पास कहाँ हैं? वह सब) देखकर अपने शत्रु पाण्डवोंके उस कुबेरके समान शुभ एवं विशाल ऐश्वर्यका अवलोकन करके मैं निरन्तर शोकमें डूबा जा रहा हूँ ॥ १२-१३ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
यदीच्छसि श्रियं तात यादृशी सा युधिष्ठिरे । विशिष्टां वा नरव्याघ्र शीलवान् भव पुत्रक ॥ १४ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**तात! पुरुषसिंह! बेटा! युधिष्ठिरके पास जैसी सम्पत्ति है, वैसी या उससे भी बढ़कर राजलक्ष्मीको यदि तुम पाना चाहते हो तो शीलवान् बनो ॥ १४ ॥ शीलेन हि त्रयो लोकाः शक्या जेतुं न संशयः । न हि किंचिदसाध्यं वै लोके शीलवतां भवेत् ॥ १५ ॥ इसमें संशय नहीं है कि शीलके द्वारा तीनों लोकोंपर विजय पायी जा सकती है। शीलवानोंके लिये संसारमें कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १५ ॥ एकरात्रेण मान्धाता त्र्यहेण जनमेजयः । सप्तरात्रेण नाभागः पृथिवीं प्रतिपेदिरे ॥ १६ ॥ मान्धाताने एक ही दिनमें, जनमेजयने तीन ही दिनोंमें और नाभागने सात दिनोंमें ही इस पृथिवीका राज्य प्राप्त किया था ॥ १६ ॥ एते हि पार्थिवाः सर्वे शीलवन्तो दयान्विताः । अतस्तेषां गुणक्रीता वसुधा स्वयमागता ॥ १७ ॥ ये सभी राजा शीलवान् और दयालु थे। अतः उनके द्वारा गुणोंके मोल खरीदी हुई यह पृथ्वी स्वयं ही उनके पास आयी थी ॥ १७ ॥
दुर्योधन उवाच
कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत । येन शीलेन तैः प्राप्ता क्षिप्रमेव वसुन्धरा ॥ १८ ॥ **दुर्योधनने पूछा—**भारत! जिसके द्वारा उन राजाओंने शीघ्र ही भूमण्डलका राज्य प्राप्त कर लिया, वह शील कैसे प्राप्त होता है? यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १८ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदेन पुरा प्रोक्तं शीलमाश्रित्य भारत ॥ १९ ॥ **धृतराष्ट्र बोले—**भरतनन्दन! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसे नारदजीने पहले शीलके प्रसंगमें कहा था ॥ १९ ॥ प्रह्लादेन हृतं राज्यं महेन्द्रस्य महात्मनः । शीलमाश्रित्य दैत्येन त्रैलोक्यं च वशे कृतम् ॥ २० ॥ दैत्यराज प्रह्लादने शीलका ही आश्रय लेकर महामना महेन्द्रका राज्य हर लिया और तीनों लोकोंको भी अपने वशमें कर लिया ॥ २० ॥ ततो बृहस्पतिं शक्रः प्राञ्जलिः समुपस्थितः । तमुवाच महाप्राज्ञः श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥ २१ ॥
तब महाबुद्धिमान् इन्द्र हाथ जोड़कर बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हुए और उनसे बोले—‘भगवन्! मैं अपने कल्याणका उपाय जानना चाहता हूँ’ ॥ २१ ॥
ततो बृहस्पतिस्तस्मै ज्ञानं नैःश्रेयसं परम् ।
कथयामास भगवान् देवेन्द्राय कुरूद्वह ॥ २२ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तब भगवान् बृहस्पतिने उन देवेन्द्रको कल्याणकारी परम ज्ञानका उपदेश दिया ॥ २२ ॥
एतावच्छ्रेय इत्येव बृहस्पतिरभाषत ।
इन्द्रस्तु भूयः पप्रच्छ को विशेषो भवेदिति ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् इतना ही श्रेय (कल्याणका उपाय) है, ऐसा बृहस्पतिने कहा। तब इन्द्रने फिर पूछा—‘इससे विशेष वस्तु क्या है?’ ॥ २३ ॥
बृहस्पतिरुवाच
विशेषोऽस्ति महांस्तात भार्गवस्य महात्मनः ।
अत्रागमय भद्रं ते भूय एव सुरर्षभ ॥ २४ ॥
बृहस्पतिने कहा— तात! सुरश्रेष्ठ! इससे भी विशेष महत्त्वपूर्ण वस्तुका ज्ञान महात्मा शुक्राचार्यको है। तुम्हारा कल्याण हो। तुम उन्हींके पास जाकर पुनः उस वस्तुका ज्ञान प्राप्त करो ॥ २४ ॥
आत्मनस्तु ततः श्रेयो भार्गवात् सुमहातपाः ।
ज्ञानमागमयत् प्रीत्या पुनः स परमद्युतिः ॥ २५ ॥
तब परम तेजस्वी महातपस्वी इन्द्रने प्रसन्नता-पूर्वक शुक्राचार्यसे पुनः अपने लिये श्रेयका ज्ञान प्राप्त किया ॥ २५ ॥
तेनापि समनुज्ञातो भार्गवेण महात्मना ।
श्रेयोऽस्तीति पुनर्भूयः शुक्रम्राह शतक्रतुः ॥ २६ ॥
महात्मा भार्गवने जब उन्हें उपदेश दे दिया, तब इन्द्रने पुनः शुक्राचार्यसे पूछा—‘क्या इससे भी विशेष श्रेय है’? ॥ २६ ॥
भार्गवस्त्वाह सर्वज्ञः प्रह्लादस्य महात्मनः ।
ज्ञानमस्ति विशेषेणेत्युक्तो हृष्टश्च सोऽभवत् ॥ २७ ॥
तब सर्वज्ञ शुक्राचार्यने कहा— ‘महात्मा प्रह्लादको इससे विशेष श्रेयका ज्ञान है।’ यह सुनकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए ॥ २७ ॥
स ततो ब्राह्मणो भूत्वा प्रह्लादं पाकशासनः ।
गत्वा प्रोवाच मेधावी श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥ २८ ॥
तदनन्तर बुद्धिमान् इन्द्र ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रह्लादके पास गये और बोले—‘राजन्! मैं श्रेय जानना चाहता हूँ’ ॥ २८ ॥
प्रह्लादस्त्वब्रवीद् विप्रं क्षणो नास्ति द्विजर्षभ । त्रैलोक्यराज्यसक्तस्य ततो नोपदिशामि ते ॥ २९ ॥ प्रह्लादने ब्राह्मणसे कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! त्रिलोकीके राज्यकी व्यवस्थामें व्यस्त रहनेके कारण मेरे पास समय नहीं है, अतः मैं आपको उपदेश नहीं दे सकूँगा’ ॥ २९ ॥
ब्राह्मणस्त्वब्रवीद् राजन् यस्मिन् काले क्षणो भवेत् । तदोपदेष्टुमिच्छामि यदाचर्यमनुत्तमम् ॥ ३० ॥ यह सुनकर ब्राह्मणने कहा—‘राजन्! जब आपको अवसर मिले, उसी समय मैं आपसे सर्वोत्तम आचरणीय धर्मका उपदेश ग्रहण करना चाहता हूँ’ ॥ ३० ॥
ततः प्रीतोऽभवद् राजा प्रह्लादो ब्रह्मवादिनः । तथेत्युक्त्वा शुभे काले ज्ञानतत्त्वं ददौ तदा ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणकी इस बातसे राजा प्रह्लादको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ‘तथास्तु’ कहकर उसकी बात मान ली और शुभ समयमें उसे ज्ञानका तत्त्व प्रदान किया ॥
ब्राह्मणोऽपि यथान्यायं गुरुवृत्तिमनुत्तमाम् । चकार सर्वभावेन यदस्य मनसेप्सितम् ॥ ३२ ॥ ब्राह्मणने भी उनके प्रति यथायोग्य परम उत्तम गुरु-भक्तिपूर्ण बर्ताव किया और उनके मनकी रुचिके अनुसार सब प्रकारसे उनकी सेवा की ॥ ३२ ॥
पृष्टश्च तेन बहुशः प्राप्तं कथमनुत्तमम् । त्रैलोक्यराज्यं धर्मज्ञ कारणं तद् ब्रवीहि मे । प्रह्लादोऽपि महाराज ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणने प्रह्लादसे बारंबार पूछा—‘धर्मज्ञ! आपको यह त्रिलोकीका उत्तम राज्य कैसे प्राप्त हुआ? इसका कारण मुझे बताइये। महाराज! तब प्रह्लाद भी ब्राह्मणसे इस प्रकार बोले— ॥ ३३ ॥
प्रह्लाद उवाच
नासूयामि द्विजान् विप्र राजास्मीति कदाचन । काव्यानि वदतां तेषां संयच्छामि वहामि च ॥ ३४ ॥ **प्रह्लादने कहा—**विप्रवर! ‘मैं राजा हूँ’ इस अभिमानमें आकर कभी ब्राह्मणोंकी निन्दा नहीं करता; बल्कि जब वे मुझे शुक्रनीतिका उपदेश करते हैं, तब मैं संयमपूर्वक उनकी बातें सुनता हूँ और उनकी आज्ञा शिरोधार्य करता हूँ ॥ ३४ ॥
ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते संयच्छन्ति च मां सदा । ते मां काव्यपथे युक्तं शुश्रूषुमनसूयकम् ॥ ३५ ॥ धर्मात्मानं जितक्रोधं नियतं संयतेन्द्रियम् । समासिञ्चन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥ ३६ ॥
वे ब्राह्मण विश्वस्त होकर मुझे नीतिका उपदेश देते और सदा संयममें रखते हैं। मैं सदा ही यथाशक्ति शुक्राचार्यके बताये हुए नीतिमार्गपर चलता, ब्राह्मणोंकी सेवा करता, किसीके दोष नहीं देखता और धर्ममें मन लगाता हूँ। क्रोधको जीतकर मन और इन्द्रियोंको काबूमें किये रहता हूँ। अतः जैसे मधुकी मक्खियाँ शहदके छत्तेको फूलोंके रससे सींचती रहती हैं, उसी प्रकार उपदेश देनेवाले ब्राह्मण मुझे शास्त्रके अमृतमय वचनोंसे सींचा करते हैं॥ ३५-३६॥
सोऽहं वागग्रविद्यानां रसानामवलेहिता ।
स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥ ३७ ॥
मैं उनकी नीति-विद्याओंके रसका आस्वादन करता हूँ और जैसे चन्द्रमा नक्षत्रोंपर शासन करते हैं, उसी प्रकार मैं भी अपनी जातिवालोंपर राज्य करता हूँ॥
एतत् पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् ।
यद् ब्राह्मणमुखे काव्यमेतच्छ्रुत्वा प्रवर्त्तते ॥ ३८ ॥
ब्राह्मणके मुखमें जो शुक्राचार्यका नीतिवाक्य है, यही इस भूतपर अमृत है, यही सर्वोत्तम नेत्र है। राजा इसे सुनकर इसीके अनुसार बर्ताव करे॥ ३८ ॥
एतावच्छ्रेय इत्याह प्रह्लादो ब्रह्मवादिनम् ।
शुश्रूषितस्तेन तदा दैत्येन्द्रो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३९ ॥
इतना ही श्रेय है, यह बात प्रह्लादने उस ब्रह्मवादी ब्राह्मणसे कहा। इसके बाद भी उसके सेवा-शुश्रूषा करनेपर दैत्यराजने उससे यह बात कही—॥ ३९ ॥
यथावद् गुरुवृत्त्या ते प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रदातास्मि न संशयः ॥ ४० ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हारे द्वारा की हुई यथोचित गुरुसेवासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। मैं उसे दूँगा। इसमें संशय नहीं है’॥ ४० ॥
कृतमित्येव दैत्येन्द्रमुवाच स च वै द्विजः ।
प्रह्लादस्त्वब्रवीत् प्रीतो गृह्यतां वर इत्युत ॥ ४१ ॥
तब उस ब्राह्मणने दैत्यराजसे कहा—‘आपने मेरी सारी अभिलाषा पूर्ण कर दी’। यह सुनकर प्रह्लाद और भी प्रसन्न हुए और बोले—‘कोई वर अवश्य माँगो’॥ ४१ ॥
ब्राह्मण उवाच
यदि राजन् प्रसन्नस्त्वं मम चेदिच्छसि प्रियम् ।
भवतः शीलमिच्छामि प्राप्तुमेष वरो मम ॥ ४२ ॥
**ब्राह्मण बोला—**राजन्! यदि आप प्रसन्न हैं और मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे आपका ही शील प्राप्त करनेकी इच्छा है, यही मेरा वर है॥ ४२ ॥
ततः प्रीतस्तु दैत्येन्द्रो भयमस्याभवन्महत् ।
वरे प्रदिष्टे विप्रेण नाल्पतेजायमित्युत ॥ ४३ ॥
यह सुनकर दैत्यराज प्रह्लाद प्रसन्न तो हुए; परंतु उनके मनमें बड़ा भारी भय समा गया। ब्राह्मणके वर माँगनेपर वे सोचने लगे कि यह कोई साधारण तेजवाला पुरुष नहीं है ॥ ४३ ॥
एवमस्त्विति स प्राह प्रह्लादो विस्मितस्तदा ।
उपाकृत्य तु विप्राय वरं दुःखान्वितोऽभवत् ॥ ४४ ॥
फिर भी ‘एवमस्तु’ कहकर प्रह्लादने वह वर दे दिया। उस समय उन्हें बड़ा विस्मय हो रहा था। ब्राह्मणको वह वर देकर वे बहुत दुखी हो गये ॥ ४४ ॥
दत्ते वरे गते विप्रे चिन्ताऽऽसीन्महती तदा ।
प्रह्लादस्य महाराज निश्चयं न च जग्मिवान् ॥ ४५ ॥
महाराज! वर देनेके पश्चात् जब ब्राह्मण चला गया, तब प्रह्लादको बड़ी भारी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—क्या करना चाहिये? परंतु किसी निश्चयपर पहुँच न सके ॥ ४५ ॥
तस्य चिन्तयतस्तावच्छायाभूतं महाद्युति ।
तेजो विग्रहवत् तात शरीरमजहात् तदा ॥ ४६ ॥
तात! वे चिन्ता कर ही रहे थे कि उनके शरीरसे परम कान्तिमान् छायामय तेज मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उसने उनके शरीरको त्याग दिया था ॥ ४६ ॥
तमपृच्छन्महाकायं प्रह्लादः को भवानिति ।
प्रत्याहतं तु शीलोऽस्मि त्यक्तो गच्छाम्यहं त्वया ॥ ४७ ॥
प्रह्लादने उस विशालकाय पुरुषसे पूछा—‘आप कौन हैं?’ उसने उत्तर दिया—‘मैं शील हूँ। तुमने मुझे त्याग दिया है, इसलिये मैं जा रहा हूँ’ ॥ ४७ ॥
तस्मिन् द्विजोत्तमे राजन् वत्स्याम्यहमनिन्दिते ।
योऽसौ शिष्यत्वमागम्य त्वयि नित्यं समाहितः ॥ ४८ ॥
‘राजन्! अब मैं उस अनिन्दित श्रेष्ठ ब्राह्मणके शरीरमें निवास करूँगा, जो प्रतिदिन तुम्हारा शिष्य बनकर यहाँ बड़ी सावधानीके साथ रहता था’ ॥ ४८ ॥
इत्युक्त्वान्तर्हितं तद् वै शक्रं चान्वाविशत् प्रभो ।
तस्मिंस्तेजसि याते तु तादृग्रूपस्ततोऽपरः ॥ ४९ ॥
शरीरान्निःसृतस्तस्य को भवानिति चाब्रवीत् ।
धर्मं प्रह्लाद मां विद्धि यत्रासौ द्विजसत्तमः ॥ ५० ॥
तत्र यास्यामि दैत्येन्द्र यतः शीलं ततो ह्यहम् ।
प्रभो! ऐसा कहकर शील अदृश्य हो गया और इन्द्रके शरीरमें समा गया। उस तेजके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे दूसरा वैसा ही तेज प्रकट हुआ। प्रह्लादने पूछा—‘आप कौन हैं?’ उसने उत्तर दिया—‘प्रह्लाद! मुझे धर्म समझो। जहाँ वह श्रेष्ठ ब्राह्मण है, वहीं जाऊँगा। दैत्यराज! जहाँ शील होता है, वहीं मैं भी रहता हूँ’ ॥ ४९-५० ½ ॥
ततोऽपरो महाराज प्रज्वलन्निव तेजसा ।। ५१ ।। शरीरान्निःसृतस्तस्य प्रह्लादस्य महात्मनः । महाराज! तदनन्तर महात्मा प्रह्लादके शरीरसे एक तीसरा पुरुष प्रकट हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था ।। ५१ १/२ ।।
को भवानिति पृष्टश्च तमाह स महाद्युतिः ।। ५२ ।। सत्यं विद्ध्यसुरेन्द्राद्य प्रयास्ये धर्ममन्वहम् । 'आप कौन हैं?' यह प्रश्न होनेपर उस महातेजस्वीने उन्हें उत्तर दिया—'असुरेन्द्र! मुझे सत्य समझो! मैं अब धर्मके पीछे-पीछे जाऊँगा' ।। ५२ १/२ ।।
तस्मिन्ननुगते सत्ये महान् वै पुरुषोऽपरः ।। ५३ ।। निष्चक्राम ततस्तस्मात् पृष्टश्चाह महाबलः । वृत्तं प्रह्लाद मां विद्धि यतः सत्यं ततो ह्यहम् ।। ५४ ।। सत्यके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे दूसरा महापुरुष प्रकट हुआ। परिचय पूछनेपर उस महाबलीने उत्तर दिया—प्रह्लाद! मुझे सदाचार समझो। जहाँ सत्य होता है, वहीं मैं भी रहता हूँ ।। ५३-५४ ।।
तस्मिन् गते महाशब्दः शरीरात् तस्य निर्ययौ । पृष्टश्चाह बलं विद्धि यतो वृत्तमहं ततः ।। ५५ ।। उसके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे महान् शब्द करता हुआ पुनः एक पुरुष प्रकट हुआ। उसने पूछनेपर बताया—'मुझे बल समझो। जहाँ सदाचार होता है, वहीं मेरा भी स्थान है' ।। ५५ ।।
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र यतो वृत्तं नराधिप । ततः प्रभामयी देवी शरीरात् तस्य निर्ययौ ।। ५६ ।। तामपृच्छत् स दैत्येन्द्रः सा श्रीरित्येनमब्रवीत् । उषितास्मि स्वयं वीर त्वयि सत्यपराक्रम ।। ५७ ।। त्वया त्यक्ता गमिष्यामि बलं ह्यनुगता ह्यहम् । नरेश्वर! ऐसा कहकर बल सदाचारके पीछे चला गया। तत्पश्चात् प्रह्लादके शरीरसे एक प्रभामयी देवी प्रकट हुई। दैत्यराजने उससे पूछा—'आप कौन हैं?' वह बोली—'मैं लक्ष्मी हूँ। सत्यपराक्रमी वीर! मैं स्वयं ही आकर तुम्हारे शरीरमें निवास करती थी, परंतु अब तुमने मुझे त्याग दिया; इसलिये चली जाऊँगी; क्योंकि मैं बलकी अनुगामिनी हूँ' ।। ५६-५७ १/२ ।।
ततो भयं प्रादुरासीत् प्रह्लादस्य महात्मनः ।। ५८ ।। अपृच्छत् स ततो भूयः क्व यासि कमलालये । त्वं हि सत्यव्रता देवी लोकस्य परमेश्वरी । कश्चासौ ब्राह्मणश्रेष्ठस्तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।। ५९ ।।
तब महात्मा प्रह्लादको बड़ा भय हुआ। उन्होंने पुनः पूछा—'कमलालये! तुम कहाँ जा रही हो, तुम तो सत्यव्रता देवी और सम्पूर्ण जगत्की परमेश्वरी हो। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था? यह मैं ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ' ।। ५८-५९ ।।
श्रीरुवाच
स शक्रो ब्रह्मचारी यस्त्वत्तश्चैवोपशिक्षितः ।
त्रैलोक्ये ते यदैश्वर्यं तत् तेनापहृतं प्रभो ।। ६० ।।
लक्ष्मीने कहा— प्रभो! तुमने जिसे उपदेश दिया है, उस ब्रह्मचारी ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् इन्द्र थे। तीनों लोकोंमें जो तुम्हारा ऐश्वर्य फैला हुआ था, वह उन्होंने हर लिया ।। ६० ।।
शीलेन हि त्रयो लोकास्त्वया धर्मज्ञ निर्जिताः ।
तद्विज्ञाय सुरेन्द्रेण तव शीलं हृतं प्रभो ।। ६१ ।।
धर्मज्ञ! तुमने शीलके द्वारा ही तीनों लोकोंपर विजय पायी थी। प्रभो! यह जानकर ही सुरेन्द्रने तुम्हारे शीलका अपहरण कर लिया है ।। ६१ ।।
धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाप्यहम् ।
शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशयः ।। ६२ ।।
महाप्राज्ञ! धर्म, सत्य, सदाचार, बल और मैं (लक्ष्मी)—ये सब सदा शीलके ही आधारपर रहते हैं—शील ही इन सबकी जड़ है। इसमे संशय नहीं है ।। ६२ ।।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा गता श्रीस्तु ते च सर्वे युधिष्ठिर ।
दुर्योधनस्तु पितरं भूय एवाब्रवीद् वचः ।। ६३ ।।
शीलस्य तत्त्वमिच्छामि वेत्तुं कौरवनन्दन ।
प्राप्यते च यथा शीलं तं चोपायं वदस्व मे ।। ६४ ।।
भीष्मजी कहते हैं— 'युधिष्ठिर! यों कहकर लक्ष्मी तथा वे शील आदि समस्त सद्गुण इन्द्रके पास चले गये। इस कथाको सुनकर दुर्योधनने पुनः अपने पितासे कहा—'कौरवनन्दन! मैं शीलका तत्त्व जानना चाहता हूँ। शील जिस तरह प्राप्त हो सके, वह उपाय भी मुझे बताइये' ।। ६३-६४ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
सोपायं पूर्वमुद्दिष्टं प्रह्रादेन महात्मना ।
संक्षेपेण तु शीलस्य शृणु प्राप्तिं नरेश्वर ।। ६५ ।।
धृतराष्ट्रने कहा— नरेश्वर! शीलका स्वरूप और उसे पानेका उपाय—ये दोनों बातें महात्मा प्रह्लादने पहले ही बतायी हैं। मैं संक्षेपसे शीलकी प्राप्तिका उपायमात्र बता रहा हूँ,
ध्यान देकर सुनो ।। ६५ ।।
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते ।। ६६ ।।
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दया करना और यथाशक्ति दान देना—यह शील कहलाता है, जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं ।। ६६ ।।
यदन्येषां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुषम् ।
अपत्रपेत वा येन न तत् कुर्यात् कथंचन ।। ६७ ।।
अपना जो भी पुरुषार्थ और कर्म दूसरोंके लिये हितकर न हो अथवा जिसे करनेमें संकोचका अनुभव होता हो, उसे किसी तरह नहीं करना चाहिये ।। ६७ ।।
तत्तु कर्म तथा कुर्याद् येन श्लाघ्येत संसदि ।
शीलं समासेनेतत् ते कथितं कुरुसत्तम ।। ६८ ।।
जो कर्म जिस प्रकार करनेसे भरी सभामें मनुष्यकी प्रशंसा हो, उसे उसी प्रकार करना चाहिये। कुरुश्रेष्ठ! यह तुम्हें थोड़ेमें शीलका स्वरूप बताया गया है ।। ६८ ।।
यद्यप्यशीला नृपते प्राप्नुवन्ति श्रियं क्वचित् ।
न भुञ्जते चिरं तात समूलाश्च न सन्ति ते ।। ६९ ।।
तात! नरेश्वर! यद्यपि कहीं-कहीं शीलहीन मनुष्य भी राजलक्ष्मीको प्राप्त कर लेते हैं, तथापि वे चिरकालतक उसका उपभोग नहीं कर पाते और जड़मूलसहित नष्ट हो जाते हैं ।। ६९ ।।
एतद् विदित्वा तत्त्वेन शीलवान् भव पुत्रक ।
यदिच्छसि श्रियं तात सुविशिष्टां युधिष्ठिरात् ।। ७० ।।
बेटा! यदि तुम युधिष्ठिरसे भी अच्छी सम्पत्ति प्राप्त करना चाहो तो इस उपदेशको यथार्थरूपसे समझकर शीलवान् बनो ।। ७० ।।
भीष्म उवाच
एतत् कथितवान् पुत्रे धृतराष्ट्रो नराधिपः ।
एतत् कुरुष्व कौन्तेय ततः प्राप्स्यसि तत् फलम् ।। ७१ ।।
भीष्मजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! राजा धृतराष्ट्रने अपने पुत्रको यह उपदेश दिया था। तुम भी इसका आचरण करो, इससे तुम्हें भी वही फल प्राप्त होगा ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि शीलवर्णनं नाम चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें शीलवर्णनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२४ ।।