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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

हंसोंका शिकार करने लगा। वह हिंसामें बड़ा प्रवीण था। उसमें दया नहीं थी। वह सदा प्राणियोंको मारनेकी ही ताकमें लगा रहता था ।। ३६-३७ ।।
गौतमः संनिकर्षेण दस्युभिः समतामियात् ।
तथा तु वसतरतस्य दस्युग्रामे सुखं तदा ।। ३८ ।।
अगमन् बहवो मासा निघ्नतः पक्षिणो बहून् ।
डाकुओंके सम्पर्कमें रहनेसे गौतम भी उनके ही समान पूरा डाकू बन गया। डाकुओंके गाँवमें सुखपूर्वक रहकर प्रतिदिन बहुत-से पक्षियोंका शिकार करते हुए उसके कई महीने बीत गये ।। ३८ १/२ ।।
ततः कदाचिदपरो द्विजस्तं देशमागतः ।। ३९ ।।
जटाचीराजिनधरः स्वाध्यायपरमः शुचिः ।
विनीतो नियताहारो ब्रह्मण्यो वेदपारगः ।। ४० ।।
तदनन्तर एक दिन कोई दूसरा ब्राह्मण उस गाँवमें आया जो जटा, वल्कल और मृगचर्म धारण किये हुए था। वह स्वाध्यायपरायण, पवित्र, विनयी, नियमके अनुकूल भोजन करनेवाला, ब्राह्मणभक्त तथा वेदोंका पारङ्गत विद्वान् था ।। ३९-४० ।।
स ब्रह्मचारी तद्देश्यः सखा तस्यैव सुप्रियः ।
तं दस्युग्राममगमद् यत्रासौ गौतमोऽवसत् ।। ४१ ।।
वह ब्रह्मचारी ब्राह्मण गौतमके ही गाँवका निवासी तथा उसका परमप्रिय मित्र था और घूमता हुआ डाकुओंके उसी गाँवमें जा पहुँचा था, जहाँ गौतम निवास करता था ।। ४१ ।।
स तु विप्रगृहान्tableवेषी शूद्रान्नपरिवर्जकः ।
ग्रामे दस्युसमाकीर्णे व्यचरत् सर्वतोदिशम् ।। ४२ ।।
वह शूद्रका अन्न नहीं खाता था; इसलिये दस्युओंसे भरे हुए उस गाँवमें ब्राह्मणके घरकी तलाश करता हुआ सब ओर घूमने लगा ।। ४२ ।।
ततः स गौतमगृहं प्रविवेश द्विजोत्तमः ।
गौतमश्चापि सम्प्राप्तस्तावन्त्योन्येन संगतौ ।। ४३ ।।
घूमता-घामता वह श्रेष्ठ ब्राह्मण गौतमके घरपर गया, इतनेहीमें गौतम भी शिकारसे लौटकर वहाँ आ पहुँचा। उन दोनोंकी एक-दूसरेसे भेंट हुई ।। ४३ ।।
चक्राङ्गभारस्कन्धं तं धनुष्पाणिं धृतायुधम् ।
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं गृहद्वारमुपागतम् ।। ४४ ।।
तं दृष्ट्वा पुरुषादाभमपध्वस्तं क्षयागतम् ।
अभिज्ञाय द्विजो व्रीडन्निदं वाक्यमथाब्रवीत् ।। ४५ ।।
ब्राह्मणने देखा, गौतमके कंधेपर मारे गये हंसकी लाश है, हाथमें धनुष और बाण है, सारा शरीर रक्तसे सींच उठा है, घरके दरवाजेपर आया हुआ गौतम नरभक्षी राक्षसके समान जान पड़ता है; और ब्राह्मणत्वसे भ्रष्ट हो चुका है। उसे इस अवस्थामें घरपर आया

देख ब्राह्मणने पहचान लिया। पहचानकर वे बड़े लज्जित हुए और उससे इस प्रकार बोले — ॥ ४४-४५ ॥

किमिदं कुरुषे मोहाद् विप्रस्त्वं हि कुलोद्वहः ।
मध्यदेशपरिज्ञातो दस्युभावं गतः कथम् ॥ ४६ ॥
‘अरे! तू मोहवश यह क्या कर रहा है? तू तो मध्यदेशका विख्यात एवं कुलीन ब्राह्मण था। यहाँ डाकू कैसे बन गया? ॥ ४६ ॥

पूर्वान् स्मर द्विज ज्ञातीन् प्रख्यातान् वेदपारगान् ।
तेषां वंशेऽभिजातस्त्वमीदृशः कुलपांसनः ॥ ४७ ॥
‘ब्रह्मन्! अपने पूर्वजोंको तो याद कर। उनकी कितनी ख्याति थी। वे कैसे वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे और तू उन्हींके वंशमें पैदा होकर ऐसा कुलकलङ्क निकला ॥ ४७ ॥

अवबुध्यात्मनाऽऽत्मानं सत्त्वं शीलं श्रुतं दमम् ।
अनुक्रोशं च संस्मृत्य त्यज वासमिमं द्विज ॥ ४८ ॥
‘अब भी तो अपने-आपको पहचान! तू द्विज है; अतः द्विजोचित सत्त्व, शील, शास्त्रज्ञान, संयम और दयाभावको याद करके अपने इस निवासस्थानको त्याग दे’ ॥ ४८ ॥

स एवमुक्तः सुहृदा तेन तत्र हितैषिणा ।
प्रत्युवाच ततो राजन् विनिश्चित्य तदार्तवत् ॥ ४९ ॥
राजन्! अपने उस हितैषी सुहृद्के इस प्रकार कहनेपर गौतम मन-ही-मन कुछ निश्चय करके आर्त-सा होकर बोला— ॥ ४९ ॥

निर्धनोऽस्मि द्विजश्रेष्ठ नापि वेदविदप्यहम् ।
वित्तार्थमिह सम्प्राप्तं विद्धि मां द्विजसत्तम ॥ ५० ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! मैं निर्धन हूँ और वेदको भी नहीं जानता; अतः द्विजप्रवर! मुझे धन कमानेके लिये इधर आया हुआ समझें ॥ ५० ॥

त्वद्दर्शनात् तु विप्रेन्द्र कृतार्थोऽस्म्यद्य वै द्विज ।
आवां हि सह यास्यावः श्वो वसस्वाद्य शर्वरीम् ॥ ५१ ॥
‘विप्रेन्द्र! आज आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। ब्रह्मन्! अब रातभर यहीं रहिये, कल सबेरे हम दोनों साथ ही चलेंगे’ ॥ ५१ ॥

स तत्र न्यवसद् विप्रो घृणी किञ्चिदसंस्पृशन् ।
क्षुधितश्छन्द्यमानोऽपि भोजनं नाभ्यनन्दत ॥ ५२ ॥
वह ब्राह्मण दयालु था। गौतमके अनुरोधसे उसके यहाँ ठहर गया, किंतु वहाँकी किसी भी वस्तुको हाथसे छूआ भी नहीं। यद्यपि वह भूखा था और भोजन करनेके लिये गौतमद्वारा उससे बड़ी अनुनय-विनय की गई तो भी किसी तरह वहाँका अन्न ग्रहण करना उसने स्वीकार नहीं किया ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥

इस प्रकार श्रीमद्भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६८ ॥

१६९-

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एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

गौतमका समुद्रकी ओर प्रस्थान और संध्याके समय एक दिव्य बकपक्षीके घरपर अतिथि होना

भीष्म उवाच

तस्यां निशायां व्युष्टायां गते तस्मिन् द्विजोत्तमे ।
निष्क्रम्य गौतमोऽगच्छत् समुद्रं प्रति भारत ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—भारत! जब रात बीती, सबेरा हुआ और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँसे चला गया, तब गौतम भी घर छोड़कर समुद्रकी ओर चल दिया ॥ १ ॥

सामुद्रिकान् स वणिजस्ततोऽपश्यत् स्थितान् पथि ।
स तेन सह सार्थेन प्रययौ सागरं प्रति ॥ २ ॥
रास्तेमें उसने देखा कि समुद्रके आस-पास रहनेवाले कुछ व्यापारी वैश्य ठहरे हुए हैं। वह उन्हींके दलके साथ हो लिया और समुद्रकी ओर जाने लगा ॥ २ ॥

स तु सार्थो महान् राजन् कस्मिंश्चिद् गिरिगह्वरे ।
मत्तेन द्विरदेनाथ निहतः प्रायशोऽभवत् ॥ ३ ॥
राजन्! वैश्योंका वह महान् दल किसी पर्वतकी गुफामें डेरा डाले हुए था। इतनेहीमें एक मतवाले हाथीने उसपर आक्रमण कर दिया। उस दलके अधिकांश मनुष्य उसके द्वारा मारे गये ॥ ३ ॥

स कथंचिद् भयात् तस्माद् विमुक्तो ब्राह्मणस्तथा ।
कांदिग्भूतो जीवितार्थी प्रदुद्रावोत्तरां दिशम् ॥ ४ ॥
गौतम ब्राह्मण किसी तरह उस भयसे छूट तो गया; परंतु उस घबराहटमें वह यह निर्णय न कर सका कि मुझे किस दिशामें जाना है? अपने प्राण बचानेके लिये वह उत्तर दिशाकी ओर भाग चला ॥ ४ ॥

स तु सार्थपरिभ्रष्टस्तस्माद् देशात् तथा च्युतः ।
एकाकी व्यचरत् तत्र वने किंपुरुषो यथा ॥ ५ ॥
व्यापारियोंके दलका साथ छूट गया, अतः उस देशसे भी भ्रष्ट होकर वह अकेला ही उस वनमें विचरने लगा; मानो कोई किंपुरुष घूम रहा हो ॥ ५ ॥

स पन्थानमथासाद्य समुद्राभिसरं तदा ।
आससाद वनं रम्यं दिव्यं पुष्पितपादपम् ॥ ६ ॥
उस समय समुद्रकी ओर जानेवाला एक मार्ग उसे मिल गया और उसीको पकड़कर वह दिव्य एवं रमणीय वनमें जा पहुँचा। वहाँके सभी वृक्ष सुन्दर फूलोंसे सुशोभित

थे ॥ ६ ॥ सर्वर्तुकैराम्रवणैः पुष्पितैरुपशोभितम् । नन्दनोद्देशसदृशं यक्षकिन्नरसेवितम् ॥ ७ ॥ सभी ऋतुओंमें फूलने-फलनेवाली आम्रवृक्षोंकी पंक्तियाँ उस वनकी शोभा बढ़ा रही थीं। यक्षों और किन्नरोंसे सेवित वह प्रदेश नन्दनवनके समान मनोरम जान पड़ता था ॥ ७ ॥ शालैस्तालैस्तमालैश्च कालागुरुवनैस्तथा । चन्दनस्य च मुख्यस्य पादपैरुपशोभितम् । गिरिप्रस्थेषु रम्येषु तेषु तेषु सुगन्धिषु ॥ ८ ॥ समन्ततो द्विजश्रेष्ठास्तत्राकूजन्त वै तदा । शाल, ताल, तमाल, काले अगुरुके वन तथा श्रेष्ठ चन्दनके वृक्ष उस वनको सुशोभित करते थे। वहाँके रमणीय और सुगन्धित पर्वतीय समतल प्रदेशोंमें चारों ओर उत्तमोत्तम पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ८ १/२ ॥ मनुष्यवदनाश्चान्ये भारुण्डा इति विश्रुताः ॥ ९ ॥ भूलिङ्गशकुनाश्चान्ये सामुद्राः पर्वतोद्भवाः । कहीं मनुष्योंके समान मुखवाले 'भारुण्ड' नामक पक्षी बोलते थे। कहीं समुद्रतट और पर्वतोंपर रहनेवाले भूलिङ्ग पक्षी तथा अन्य विहंगम चहचहा रहे थे ॥ ९ १/२ ॥ स तान्यतिमनोज्ञानि विहगानां रुतानि वै ॥ १० ॥ शृण्वन् सुरमणीयानि विप्रोऽगच्छत गौतमः । पक्षियोंके उन मधुर मनोहर एवं रमणीय कलरवोंको सुनता हुआ गौतम ब्राह्मण आगे बढ़ता चला गया ॥ १० १/२ ॥ ततोऽपश्यत् सुरम्येषु सुवर्णसिकताचिते ॥ ११ ॥ देशे समे सुखे चित्रे स्वर्गोद्देशसमे नृप । श्रिया जुष्टं महावृक्षं न्यग्रोधं च सुमण्डलम् ॥ १२ ॥ शाखाभिरनुरूपाभिर्भूयिष्ठं छत्रसंनिभम् । तस्य मूलं च संसिक्तं वरचन्दनवारिणा ॥ १३ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर उन रमणीय प्रदेशोंमेंसे एक ऐसे स्थानपर जो सुवर्णमयी बालुकाराशिसे व्याप्त, समतल, सुखद, विचित्र तथा स्वर्गीय भूमिके समान मनोहर था, गौतमने एक अत्यन्त शोभायमान बरगदका विशाल वृक्ष देखा, जो चारों ओर मण्डलाकार फैला हुआ था। अपनी बहुत-सी सुन्दर शाखाओंके कारण वह वृक्ष एक महान् छत्रके समान जान पड़ता था। उसकी जड़ चन्दनमिश्रित जलसे सींची गयी थी ॥ ११-१३ ॥ दिव्यपुष्पान्वितं श्रीमत् पितामहसभोपमम् । तं दृष्ट्वा गौतमः प्रीतो मनःकान्तमनुत्तमम् ॥ १४ ॥

ब्रह्माजीकी सभाके समान शोभा पानेवाला वह वृक्ष दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित था। उस परम उत्तम मनोरम वटवृक्षको देखकर गौतमको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १४ ॥
मेध्यं सुरगृहप्रख्यं पुष्पितैः पादपैर्वृतम् ।
तमासाद्य मुदा युक्तस्तस्याधस्तादुपाविशत् ॥ १५ ॥
वह पवित्र, देवगृहके समान सुन्दर और खिले हुए वृक्षोंसे घिरा हुआ था। उस वृक्षके पास जाकर वह बड़े हर्षके साथ उसके नीचे छायामें बैठा ॥ १५ ॥
तत्रासीनस्य कौन्तेय गौतमस्य सुखः शिवः ।
पुष्पाणि समुपस्पृश्य प्रववावनिलः शुभः ।
ह्लादयन् सर्वगात्राणि गौतमस्य तदा नृप ॥ १६ ॥
कुन्तीनन्दन! गौतमके वहाँ बैठते ही फूलोंका स्पर्श करके सुन्दर-मन्द-सुगन्ध वायु चलने लगी, जो बड़ी ही सुखद और कल्याणप्रद जान पड़ती थी। नरेश्वर! वह गौतमके सम्पूर्ण अङ्गोंको आह्लाद प्रदान कर रही थी ॥ १६ ॥
स तु विप्रः प्रशान्तश्च स्पृष्टः पुण्येन वायुना ।
सुखमासाद्य सुष्वाप भास्करश्चास्तमभ्ययात् ॥ १७ ॥
उस पवित्र वायुका स्पर्श पाकर गौतमको बड़ी शान्ति मिली। वह सुखका अनुभव करता हुआ वहीं लेट गया। उधर सूर्य भी डूब गया ॥ १७ ॥
ततोऽस्तं भास्करे याते संध्याकाल उपस्थिते ।
आजगाम स्वभवनं ब्रह्मलोकात् खगोत्तमः ॥ १८ ॥
तदनन्तर, सूर्यके अस्ताचलको चले जानेके पश्चात् संध्याकाल उपस्थित होनेपर ब्रह्मलोकसे वहाँ एक श्रेष्ठ पक्षी आया। वह वृक्ष ही उसका घर या वासस्थान था ॥ १८ ॥
नाडीजङ्घ इति ख्यातो दयितो ब्रह्मणः सखा ।
बकराजो महाप्राज्ञः कश्यपस्यात्मसम्भवः ॥ १९ ॥
वह महर्षि कश्यपका पुत्र और ब्रह्माजीका प्रिय सखा था। उसका नाम था नाडीजङ्घ। वह बगुलोंका राजा और महाबुद्धिमान् था ॥ १९ ॥
राजधर्मेति विख्यातो बभूवाप्रतिमो भुवि ।
देवकन्यासूतः श्रीमान् विद्वान् देवसमप्रभः ॥ २० ॥
वह अनुपम पक्षी इस भूतलपर राजधर्माके नामसे विख्यात था। देवकन्यासे उत्पन्न होनेके कारण उसके शरीरकी कान्ति देवताके समान थी। वह बड़ा विद्वान् था और दिव्य तेजसे सम्पन्न दिखायी देता था ॥ २० ॥
मृष्टाभरणसम्पन्नो भूषणैरर्कसंनिभैः ।
भूषितः सर्वगात्रेषु देवगर्भः श्रिया ज्वलन् ॥ २१ ॥
उसके अङ्गोंमें सूर्यदेवकी किरणोंके समान चमकीले आभूषण शोभा देते थे। वह देवकुमार अपने सभी अङ्गोंमें विशुद्ध एवं दिव्य आभरणोंसे विभूषित हो दिव्य दीप्तिसे

देदीप्यमान होता था ॥ २१ ॥
तमागतं खगं दृष्ट्वा गौतमो विस्मितोऽभवत् ।
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तो हिंसार्थी चाभ्यवैक्षत ॥ २२ ॥
उस पक्षीको आया देख गौतम आश्चर्यसे चकित हो उठा। उस समय वह भूखा-प्यासा तो था ही, रास्ता चलनेकी थकावटसे भी चूर-चूर हो रहा था। अतः राजधर्माको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर देखा ॥ २२ ॥

राजधर्मोवाच
स्वागतं भवतो विप्र दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मे गृहम् ।
अस्तं च सविता यातः संध्येयं समुपस्थिता ॥ २३ ॥
**राजधर्मा (पास आकर) बोला—**विप्रवर! आपका स्वागत है। यह मेरा घर है। आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। यह संध्याकाल उपस्थित है ॥ २३ ॥
मम त्वं निलयं प्राप्तः प्रियातिथिरनिन्दितः ।
पूजितो यास्यसि प्रातर्विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ २४ ॥
आप मेरे घर आये हुए प्रिय एवं उत्तम अतिथि हैं। मैं शास्त्रीय विधिके अनुसार आज आपकी पूजा करूँगा। रातमें मेरा आतिथ्य स्वीकार करके कल प्रातःकाल यहाँसे जाइयेगा ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६९ ॥

गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश

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सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश

भीष्म उवाच

गिरं तां मधुरां श्रुत्वा गौतमो विस्मितस्तदा ।
कौतूहलान्वितो राजन् राजधर्माणमैक्षत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! पक्षीकी वह मधुर वाणी सुनकर गौतमको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह कौतूहलपूर्ण दृष्टिसे राजधर्माकी ओर देखने लगा ॥ १ ॥

राजधर्मोवाच

भोः कश्यपस्य पुत्रोऽहं माता दाक्षायणी च मे ।
अतिथिस्त्वं गुणोपेतः स्वागतं ते द्विजोत्तम ॥ २ ॥
**राजधर्मा बोला—**द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि कश्यपका पुत्र हूँ। मेरी माता दक्ष प्रजापतिकी कन्या हैं। आप गुणवान् अतिथि हैं, मैं आपका स्वागत करता हूँ ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

तस्मै दत्त्वा स सत्कारं विधिदृष्टेन कर्मणा ।
शालपुष्पमयीं दिव्यां बृसीं वै समकल्पयत् ॥ ३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! ऐसा कहकर राजधर्माने शास्त्रीय विधिके अनुसार गौतमका सत्कार किया। शालके फूलोंका आसन बनाकर उसे बैठनेके लिये दिया ॥ ३ ॥

भगीरथरथाक्रान्तदेशान् गङ्गानिषेवितान् ।
ये चरन्ति महामीनास्तांश्च तस्यान्व कल्पयत् ॥ ४ ॥
राजा भगीरथके रथसे आक्रान्त हुए जिन भूभागोंमें श्रीगङ्गाजी प्रवाहित होती हैं, वहाँ गङ्गाजीके जलमें जो बड़े-बड़े मत्स्य विचरते हैं, उन्हींमेंसे कुछ मत्स्योंको लाकर राजधर्माने गौतमके लिये भोजनकी व्यवस्था की ॥ ४ ॥
वह्निं चापि सुसंदीप्तं मीनांश्चापि सुपीवरान् ।
स गौतमायातिथये न्यवेदयत काश्यपिः ॥ ५ ॥
कश्यपके उस पुत्रने अग्नि प्रज्वलित कर दी और मोटे-मोटे मत्स्य लाकर अपने अतिथि गौतमको अर्पित कर दिये ॥ ५ ॥
भुक्तवन्तं च तं विप्रं प्रीतात्मानं महातपाः ।
क्लमापनयनार्थं स पक्षाभ्यामभ्यवीजयत् ॥ ६ ॥
वह ब्राह्मण उन मत्स्योंको पकाकर जब खा चुका और उसकी अन्तरात्मा तृप्त हो गयी, तब वह महातपस्वी पक्षी उसकी थकावट दूर करनेके लिये अपने पंखोंसे हवा करने लगा ॥ ६ ॥

ततो विश्रान्तमासीनं गोत्रप्रश्नमपृच्छत । सोऽब्रवीद् गौतमोऽस्मीति ब्रह्म नान्यदुदाहरत् ॥ ७ ॥ विश्रामके पश्चात् जब वह बैठा, तब राजधर्मोने उससे गोत्र पूछा। गौतमने कहा—‘मेरा नाम गौतम है और मैं जातिसे ब्राह्मण हूँ।’ इससे अधिक कोई बात वह बता न सका ॥ ७ ॥

तस्मै पर्णमयं दिव्यं दिव्यपुष्पाधिवासितम् । गन्धाढ्यं शयनं प्रादात् स शिश्ये तत्र वै सुखम् ॥ ८ ॥ तब पक्षीने उसके लिये पत्तोंका दिव्य बिछावन तैयार किया, जो फूलोंसे अधिवासित होनेके कारण सुगन्धसे मँह-मँह महक रहा था। वह बिछावन उसे दिया और गौतम उसपर सुखपूर्वक सोया ॥ ८ ॥

अथोपविष्टं शयने गौतमं धर्मराट् तदा । पप्रच्छ काश्यपो वाग्मी किमागमनकारणम् ॥ ९ ॥ धर्मराज! जब गौतम उस बिछौनेपर बैठा तब बात-चीतमें कुशल कश्यपकुमारने पूछा—‘ब्रह्मन्! आप इधर किसलिये आये हैं? ॥ ९ ॥

ततोऽब्रवीद् गौतमस्तं दरिद्रोऽहं महामते । समुद्रगमनाकांक्षी द्रव्यार्थमिति भारत ॥ १० ॥ भारत! तब गौतमने उससे कहा—‘महामते! मैं दरिद्र हूँ और धनके लिये समुद्रतटपर जानेकी इच्छा लेकर घरसे चला हूँ’ ॥ १० ॥

तं काश्यपोऽब्रवीत् प्रीतो नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि । कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ सद्रव्यो यास्यसे गृहान् ॥ ११ ॥ यह सुनकर राजधर्मोने प्रसन्न होकर कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! अब आप वहाँतक जानेके लिये उत्सुक न हों, यहीं आपका काम हो जायगा। आप यहींसे धन लेकर अपने घरको जाइयेगा ॥ ११ ॥

चतुर्विधा ह्यर्थसिद्धिर्बृहस्पतिमंतं यथा । पारम्पर्यं तथा दैवं काम्यं मैत्रमिति प्रभो ॥ १२ ॥ ‘प्रभो! बृहस्पतिजीके मतके अनुसार अर्थकी सिद्धि चार प्रकारसे होती है—वंशपरम्परासे, प्रारब्धकी अनुकूलतासे, धनके लिये किये गये सकामकर्मसे और मित्रके सहयोगसे ॥ १२ ॥

प्रादुर्भूतोऽस्मि ते मित्रं सुहृत्त्वं च मम त्वयि । सोऽहं तथा यतिष्यामि भविष्यसि यथार्थवान् ॥ १३ ॥ ‘मैं आपका मित्र हो गया हूँ, आपके प्रति मेरा सौहार्द बढ़ गया है; अतः मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे आपको अर्थकी प्राप्ति हो जायगी’ ॥ १३ ॥

ततः प्रभातसमये सुखं दृष्ट्वाब्रवीदिदम् ।

गच्छ सौम्य पथानेन कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ १४ ॥
इतस्त्रियोजनं गत्वा राक्षसाधिपतिर्महान् ।
विरूपाक्ष इति ख्यातः सखा मम महाबलः ॥ १५ ॥
तदनन्तर! जब प्रातःकाल हुआ तब राजधर्माने ब्राह्मणके सुखका उपाय सोचकर इस प्रकार कहा—'सौम्य! इस मार्गसे जाइये, आपका कार्य सिद्ध हो जायगा। यहाँसे तीन योजन दूर जानेपर जो नगर मिलेगा, वहाँ महाबली राक्षसराज विरूपाक्ष रहते हैं, वे मेरे महान् मित्र हैं ॥

तं गच्छ द्विजमुख्य त्वं स मद्वाक्यप्रचोदितः ।
कामानभीप्सितांस्तुभ्यं दाता नास्त्यत्र संशयः ॥ १६ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! आप उनके पास जाइये। वे मेरे कहनेसे आपको यथेष्ट धन देंगे और आपकी मनोवाञ्छित कामनाएँ पूर्ण करेंगे, इसमें संशय नहीं है' ॥ १६ ॥

इत्युक्तः प्रययौ राजन् गौतमो विगतक्लमः ।
फलान्यमृतकल्पानि भक्षयन् स यथेष्टतः ॥ १७ ॥
चन्दनागुरुमुख्यानि त्वक्पत्राणां वनानि च ।
तस्मिन् पथि महाराज सेवमानो द्रुतं ययौ ॥ १८ ॥
राजन्! उसके ऐसा कहनेपर गौतम वहाँसे चल दिया। उसकी सारी थकावट दूर हो चुकी थी। महाराज! मार्गमें तेजपातोंके वनमें, जहाँ चन्दन और अगुरुके वृक्षोंकी प्रधानता थी, विश्राम करता और इच्छानुसार अमृतके समान मधुर फल खाता हुआ वह बड़ी तेजीसे आगे बढ़ता चला गया ॥ १७-१८ ॥

ततो मेरुव्रजं नाम नगरं शैलतोरणम् ।
शैलप्राकारवप्रं च शैलयन्त्राकुलं तथा ॥ १९ ॥
चलते-चलते वह मेरुव्रज नामक नगरमें जा पहुँचा, जिसके चारों ओर पर्वतोंके टीले और पर्वतोंकी ही चहारदीवारी थी। उसका सदर फाटक भी एक पर्वत ही था। नगरकी रक्षाके लिये सब ओर शिलाकी बड़ी-बड़ी चट्टानें और मशीनें थीं ॥ १९ ॥

विदितश्चाभवत् तस्य राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ।
प्रहितः सुहृदा राजन् प्रीयमाणः प्रियातिथिः ॥ २० ॥
परम बुद्धिमान् राक्षसराज विरूपाक्षको सेवकोंद्वारा यह सूचना दी गयी कि राजन्! आपके मित्रने अपने एक प्रिय अतिथिको आपके पास भेजा है, वह बहुत प्रसन्न है ॥ २० ॥

ततः स राक्षसेन्द्रः स्वान् प्रेष्यानाह युधिष्ठिर ।
गौतमो नगरद्वारात् शीघ्रामानीयतामिति ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर! यह समाचार पाते ही राक्षसराजने अपने सेवकोंसे कहा—'गौतमको नगरद्वारसे शीघ्र यहाँ लाया जाय' ॥ २१ ॥

ततः पुरवरात् तस्मात् पुरुषाः श्येनचेष्टनाः । गौतमेत्यभिभाषन्तः पुरद्वारमुपागमन् ॥ २२ ॥ यह आदेश प्राप्त होते ही राजसेवक गौतमको पुकारते हुए बाजकी तरह झपटकर उस श्रेष्ठ नगरके फाटकपर आये ॥ २२ ॥

ते तमूचुर्महाराज राजप्रेष्यास्तदा द्विजम् । त्वरस्व तूर्णमागच्छ राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ॥ २३ ॥ महाराज! राजाके उन सेवकोंने उस समय उस ब्राह्मणसे कहा—‘ब्रह्मन्! जल्दी कीजिये। शीघ्र आइये। महाराज आपसे मिलना चाहते हैं ॥ २३ ॥

राक्षसाधिपतिर्वीरो विरूपाक्ष इति श्रुतः । स त्वां त्वरति वै द्रष्टुं तत् क्षिप्रं संविधीयताम् ॥ २४ ॥ ‘विरूपाक्ष नामसे प्रसिद्ध वीर राक्षसराज आपको देखनेके लिये उतावले हो रहे हैं; अतः आप शीघ्रता कीजिये’ ॥ २४ ॥

ततः स प्राद्रवद् विप्रो विस्मयाद् विगतक्लमः । गौतमः परमर्द्धिं तां पश्यन् परमविस्मितः ॥ २५ ॥ बुलावा सुनते ही गौतमकी थकावट दूर हो गयी। वह विस्मित होकर दौड़ पड़ा। राक्षसराजकी उस महा-समृद्धिको देखकर उसे बड़ा आश्चर्य होता था ॥ २५ ॥

तैरेव सहितो राज्ञो वेश्म तूर्णमुपाद्रवत् । दर्शनं राक्षसेन्द्रस्य कांक्षमाणो द्विजस्तदा ॥ २६ ॥ राक्षसराजके दर्शनकी इच्छा मनमें लिये वह ब्राह्मण उन सेवकोंके साथ शीघ्र ही राजमहलमें जा पहुँचा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७० ॥

१७१-

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एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना

भीष्म उवाच

ततः स विदितो राज्ञः प्रविश्य गृहमुत्तमम् ।
पूजितो राक्षसेन्द्रेण निषसादासनोत्तमे ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर राजाको उसके आगमनकी सूचना दी गयी और वह उनके उत्तम भवनमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ राक्षसराजने उसका विधिवत् पूजन किया। तत्पश्चात् वह एक उत्तम आसनपर विराजमान हुआ ॥ १ ॥

पृष्टश्च गोत्रचरणं स्वाध्यायं ब्रह्मचारिकम् ।
न तत्र व्याजहारान्यद् गोत्रमात्रादृते द्विजः ॥ २ ॥
विरूपाक्षने गौतमसे उसके गोत्र, शाखा और ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक किये गये स्वाध्यायके विषयमें प्रश्न किया; परंतु उसने गोत्र (जाति)-के सिवा और कुछ नहीं बताया ॥ २ ॥

ब्रह्मवर्चसहीनस्य स्वाध्यायोपरतस्य च ।
गोत्रमात्रविदो राजा निवासं समपृच्छत ॥ ३ ॥
तब ब्राह्मणोचित तेजसे हीन, स्वाध्यायसे उपरत, केवल गोत्र अथवा जातिका नाम जाननेवाले उस ब्राह्मणसे राजाने उसका निवासस्थान पूछा ॥ ३ ॥

राक्षस उवाच

क्व ते निवासः कल्याण किंगोत्रा ब्राह्मणी च ते ।
तत्त्वं ब्रूहि न भीः कार्या विश्वसस्व यथासुखम् ॥ ४ ॥
**राक्षसराज बोले—**भद्र! तुम्हारा निवास कहाँ है? तुम्हारी पत्नी किस गोत्रकी कन्या है? यह सब ठीक-ठीक बताओ। भय न करो। मुझपर विश्वास करो और सुखसे रहो ॥ ४ ॥

गौतम उवाच

मध्यदेशप्रसूतोऽहं वासो मे शबरालये ।
शूद्रा पुनर्भूभार्या मे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ५ ॥
**गौतमने कहा—**राक्षसराज! मेरा जन्म तो हुआ है मध्यदेशमें, किंतु मैं एक भीलके घरमें रहता हूँ। मेरी स्त्री शूद्र जातिकी है और मुझसे पहले दूसरेकी पत्नी रह चुकी है। यह बात मैं आपसे सत्य ही कहता हूँ ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

ततो राजा विममृशे कथं कार्यमिदं भवेत् । कथं वा सुकृतं मे स्यादिति बुद्ध्यान्वचिन्तयत् ॥ ६ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! यह सुनकर राक्षसराज मन-ही-मन विचार करने लगे कि अब किस तरह काम करना चाहिये? कैसे मुझे पुण्य प्राप्त हो सकता है? इस प्रकार उन्होंने बारंबार बुद्धि लगाकर सोचा और विचारा ॥ ६ ॥

अयं वै जन्मना विप्रः सुहृत् तस्य महात्मनः । सम्प्रेषितश्च तेनायं काश्यपेन ममान्तिकम् ॥ ७ ॥ तस्य प्रियं करिष्यामि स हि मामाश्रितः सदा । भ्राता मे बान्धवश्चासौ सखा च हृदयङ्गमः ॥ ८ ॥ वे मन ही-मन कहने लगे, 'यह केवल जन्मसे ही ब्राह्मण है; परंतु महात्मा राजधर्माका सुहृद् है। उन कश्यपकुमारने ही इसे यहाँ मेरे पास भेजा है; अतः उनका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। वह सदा मुझपर भरोसा रखता है और मेरा भाई, बान्धव तथा हार्दिक मित्र भी है ॥ ७-८ ॥

कार्तिक्यामद्य भोक्तारः सहस्रं मे द्विजोत्तमाः । तत्रायमपि भोक्ता च देयमस्मै च मे धनम् ॥ ९ ॥ स चाद्य दिवसः पुण्यो ह्यतिथिश्चायमागतः । संकल्पितं चैव धनं किं विचार्यमतः परम् ॥ १० ॥ 'आज कार्तिककी पूर्णिमा है। आजके दिन सहस्रों श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे यहाँ भोजन करेंगे। उन्हींमें यह भी भोजन कर लेगा, उन्हींके साथ इसे भी धन देना चाहिये। आज पुण्य दिवस है, यह ब्राह्मण अतिथिरूपसे यहाँ आया है और मैंने धन दान करनेका संकल्प कर ही रक्खा है। अब इसके बाद क्या विचार करना है?' ॥

ततः सहस्रं विप्राणां विदुषां समलंकृतम् । स्नातानामनुसम्प्राप्तं सुमहत् क्षौमवाससाम् ॥ ११ ॥ तदनन्तर भोजनके समय हजारों विद्वान् ब्राह्मण स्नान करके रेशमी वस्त्र और अलंकार धारण किये वहाँ आ पहुँचे ॥ ११ ॥

तानागतान् द्विजश्रेष्ठान् विरूपाक्षो विशाम्पते । यथार्हं प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥ प्रजानाथ! विरूपाक्षने वहाँ पधारे हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार यथायोग्य स्वागत-सत्कार किया ॥ १२ ॥

बृस्यस्तेषां तु संन्यस्ता राक्षसेन्द्रस्य शासनात् । भूमौ वरकुशाः स्तीर्णाः प्रेष्यैर्भरतसत्तम ॥ १३ ॥

भरतश्रेष्ठ! राक्षसराजकी आज्ञासे सेवकोंने जमीनपर उनके लिये कुशके सुन्दर आसन बिछा दिये ।। १३ ।।

तासु ते पूजिता राज्ञा निषण्णा द्विजसत्तमाः ।
तिलदर्भौदकेनाथ अर्चिता विधिवद् द्विजाः ।। १४ ।।
राजाके द्वारा सम्मानित वे श्रेष्ठ ब्राह्मण जब उन आसनोंपर विराजमान हो गये तब विरूपाक्षने तिल, कुश और जल लेकर उनका विधिवत् पूजन किया ।। १४ ।।

विश्वेदेवाः सपितरः साग्नयश्चोपकल्पिताः ।
विलिप्ताः पुष्पवन्तश्च सुप्रचाराः सुपूजिताः ।
व्यराजन्त महाराज नक्षत्रपतयो यथा ।। १५ ।।
उनमें विश्वेदेवों, पितरों तथा अग्निदेवकी भावना करके उन सबको चन्दन लगाया, फूलोंकी मालाएँ पहनायीं और सुन्दर रीतिसे उनकी पूजा की। महाराज! उन आसनोंपर बैठकर वे ब्राह्मण चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगे ।। १५ ।।

ततो जाम्बूनदीः पात्रीर्वज्राङ्का विमलाः शुभाः ।
वरान्नपूर्णा विप्रेभ्यः प्रादान्मधुघृतप्लुताः ।। १६ ।।
तत्पश्चात् उसने हीरोंसे जड़ी हुई सोनेकी स्वच्छ सुन्दर थालियोंमें घीसे बने हुए मीठे पकवान परोसकर उन ब्राह्मणोंके आगे रख दिये ।। १६ ।।

तस्य नित्यं सदाऽऽषाढ्यां माघ्यां च बहवो द्विजाः ।
ईप्सितं भोजनवरं लभन्ते सत्कृतं सदा ।। १७ ।।
उसके यहाँ आषाढ़ और माघकी पूर्णिमाको सदा बहुत-से ब्राह्मण सत्कारपूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार उत्तम भोजन पाते थे ।। १७ ।।

विशेषतस्तु कार्त्तिक्यां द्विजेभ्यः सम्प्रयच्छति ।
शरद् व्यपाये रत्नानि पौर्णमास्यामिति श्रुतिः ।। १८ ।।
विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको, जब कि शरद्-ऋतुकी समाप्ति होती है, वह ब्राह्मणोंको रत्नोंका दान करता था; ऐसा सुननेमें आया है ।। १८ ।।

सुवर्णं रजतं चैव मणीनथ च मौक्तिकान् ।। १९ ।।
वज्रान् महाधनांश्चैव वैदूर्याजिनराङ्कवान् ।
रत्नराशीन् विनिक्षिप्य दक्षिणार्थे स भारत ।। २० ।।
ततः प्राह द्विजश्रेष्ठान् विरूपाक्षो महाबलः ।
गृह्णीत रत्नान्येतानि यथोत्साहं यथेष्टतः ।। २१ ।।
येषु येषु च भाण्डेषु भुक्तं वो द्विजसत्तमाः ।
तान्येवादाय गच्छध्वं स्ववेश्मानीति भारत ।। २२ ।।
भारत! भोजनके पश्चात् ब्राह्मणोंके समक्ष बहुत-से सोने, चाँदी, मणि, मोती, बहुमूल्य हीरे, वैदूर्यमणि, रंकुमृगके चर्म तथा रत्नोंके कई ढेर लगाकर महाबली विरूपाक्षने उन श्रेष्ठ

ब्राह्मणोंसे कहा—'द्विजवरो! आपलोग अपनी इच्छा और उत्साहके अनुसार इन रत्नोंको उठा ले जायँ और जिनमें आपलोगोंने भोजन किया है, उन पात्रोंको भी अपने घर लेते जायँ'॥ १९—२२॥
इत्युक्तवचने तस्मिन् राक्षसेन्द्रे महात्मनि।
यथेष्टं तानि रत्नानि जगृहूर्ब्राह्मणर्षभाः॥ २३॥
उन महात्मा राक्षसराजके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मणोंने इच्छानुसार उन सब रत्नोंको ले लिया॥ २३॥
ततो महार्हैस्ते सर्वे रत्नैर्भ्यर्चिताः शुभैः।
ब्राह्मणा मृष्टवसनाः सुप्रीताः स्म ततोऽभवन्॥ २४॥
तत्पश्चात् उन सुन्दर एवं महामूल्यवान् रत्नोंद्वारा पूजित हुए वे सभी उज्ज्वल वस्त्रधारी ब्राह्मण बड़े प्रसन्न हुए॥
ततस्तान् राक्षसेन्द्रश्च द्विजानाह पुनर्वचः।
नानादेशगतान् राजन् राक्षसान् प्रतिषिध्य वै॥ २५॥
अद्यैकं दिवसं विप्रा न वोऽस्तीह भयं क्वचित्।
राक्षसेभ्यः प्रमोदध्वमिष्टतो यात माचिरम्॥ २६॥
राजन्! इसके बाद राक्षसराज विरूपाक्षने नाना देशोंसे आये हुए राक्षसोंको हिंसा करनेसे रोककर उन ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रगण! आज एक दिनके लिये आपलोगोंको राक्षसोंकी ओरसे कहीं कोई भय नहीं है; अतः आनन्द कीजिये और शीघ्र ही अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइये। विलम्ब न कीजिये'॥ २५-२६॥
ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे विप्रसंघाः समन्ततः।
गौतमोऽपि सुवर्णस्य भारमादाय सत्वरः॥ २७॥
कृच्छ्रात् समुद्धरन् भारं न्यग्रोधं समुपागमत्।
न्यषीदच्च परिश्रान्तः क्लान्तश्च क्षुधितश्च सः॥ २८॥
यह सुनकर सब ब्राह्मणसमुदाय चारों ओर भाग चले। गौतम भी सुवर्णका भारी भार लेकर बड़ी कठिनाईसे ढोता हुआ जल्दी-जल्दी चलकर बरगदके पास आया। वहाँ पहुँचते ही थककर बैठ गया। वह भूखसे पीड़ित और क्लान्त हो रहा था॥ २७-२८॥
ततस्तमभ्यगाद् राजन् राजधर्मा खगोत्तमः।
स्वागतेनाभिनन्दंश्च गौतमं मित्रवत्सलः॥ २९॥
राजन्! तत्पश्चात् पक्षियोंमें श्रेष्ठ मित्रवत्सल राजधर्मा गौतमके पास आया और स्वागतपूर्वक उसका अभिनन्दन किया॥ २९॥
तस्य पक्षाग्रविक्षेपैः क्लमं व्यपनयत् खगः।
पूजां चाप्यकरोद् धीमान् भोजनं चाप्यकल्पयत्॥ ३०॥

उस बुद्धिमन् पक्षीने अपने पंखोंके अग्रभागका संचालन करके उसे हवा की और उसकी सारी थकावट दूर कर दी; फिर उसका पूजन किया तथा उसके लिये भोजनकी व्यवस्था की॥ ३०॥

स भुक्तवान् सुविश्रान्तो गौतमोऽचिन्तयत् तदा।
हाटकस्याभिरूपस्य भारोऽयं सुमहान् मया॥ ३१॥
गृहीतो लोभमोहाभ्यां दूरं च गमनं मम।
न चास्ति पथि भोक्तव्यं प्राणसंधारणं मम॥ ३२॥

भोजन करके विश्राम कर लेनेपर गौतम इस प्रकार चिन्ता करने लगा—'अहो! मैंने लोभ और मोहसे प्रेरित होकर सुन्दर सुवर्णका यह महान् भार ले लिया है। अभी मुझे बहुत दूर जाना है। रास्तेमें खानेके लिये कुछ भी नहीं है, जिससे मेरे प्राणोंकी रक्षा हो सके॥

किं कृत्वा धारयेयं वै प्राणानित्यभ्यचिन्तयत्।
ततः स पथि भोक्तव्यं प्रेक्षमाणो न किंचन॥ ३३॥
कृतघ्नः पुरुषव्याघ्र मनसेदमचिन्तयत्।
अयं बकपतिः पार्श्वे मांसराशिः स्थितो महान्॥ ३४॥
इमं हत्वा गृहीत्वा च यास्येऽहं समभिद्रुतम्॥ ३५॥

'अब मैं कौन-सा उपाय करके अपने प्राणोंको धारण कर सकूँगा?' इस प्रकारकी चिन्तामें वह मग्न हो गया। पुरुषसिंह! तदनन्तर मार्गमें भोजनके लिये कुछ भी न देखकर उस कृतघ्नने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—'यह बगुलोंका राजा राजधर्मा मेरे पास ही तो है। यह मांसका एक बहुत बड़ा ढेर है। इसीको मारकर ले लूँ और शीघ्रतापूर्वक यहाँसे चल दूँ'॥ ३३—३५॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७१॥

कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना

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द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना

भीष्म उवाच

अथ तत्र महार्चिष्माननलो वातसारथिः ।
तस्याविदूरे रक्षार्थं खगेन्द्रेण कृतोऽभवत् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! पक्षिराज राजधर्माने अपने मित्र गौतमकी रक्षाके लिये उससे थोड़ी दूरपर आग प्रज्वलित कर दी थी, जिससे हवाका सहारा पाकर बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं ॥ १ ॥

स चापि पार्श्वे सुष्वोप विश्वस्तो बकराट् तदा ।
कृतघ्नस्तु स दुष्टात्मा तं जिघांसुरथाग्रतः ॥ २ ॥
ततोऽलातेन दीप्तेन विश्वस्तं निजघान तम् ।
निहत्य च मुदा युक्तः सोऽनुबन्धं न दृष्टवान् ॥ ३ ॥
बकराजको भी मित्रपर विश्वास था; इसलिये उस समय उसके पास ही सो गया। इधर वह दुष्टात्मा कृतघ्न उसका वध करनेकी इच्छासे उठा और विश्वासपूर्वक सोये हुए राजधर्माको सामनेसे जलती हुई लकड़ी लेकर उसके द्वारा मार डाला। उसे मारकर वह बहुत प्रसन्न हुआ, मित्रके वधसे जो पाप लगता है, उसकी ओर उसकी दृष्टि नहीं गयी ॥ २-३ ॥

स तं विपक्षरोमाणं कृत्वाग्नावपचत् तदा ।
तं गृहीत्वा सुवर्णं च ययौ द्रुततरं द्विजः ॥ ४ ॥
उसने मरे हुए पक्षीके पंख और बाल नोचकर उसे आगमें पकाया और उसे साथमें ले सुवर्णका बोझ सिरपर उठाकर वह ब्राह्मण बड़ी तेजीके साथ वहाँसे चल दिया ॥ ४ ॥

(ततो दाक्षायणीपुत्रं नागतं तं तु भारत ।
विरूपाक्षश्चिन्तयन् वै हृदयेन विदूयता ॥)
भारत! उस दिन दक्षकन्याका पुत्र राजधर्मा अपने मित्र विरूपाक्षके यहाँ न जा सका; इससे विरूपाक्ष व्याकुल हृदयसे उसके लिये चिन्ता करने लगा ।।

ततोऽन्यस्मिन् गते चाह्नि विरूपाक्षोऽब्रवीत् सुतम् ।
न प्रेक्षे राजधर्माणमद्य पुत्र खगोत्तमम् ॥ ५ ॥
तदनन्तर दूसरा दिन भी व्यतीत हो जानेपर विरूपाक्षने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! मैं आज पक्षियोंमें श्रेष्ठ राजधर्माको नहीं देख रहा हूँ ॥ ५ ॥

स पूर्वसंध्यां ब्रह्माणं वन्दितुं याति सर्वदा । मां वा दृष्ट्वा कदाचित् स न गच्छति गृहं खगः ॥ ६ ॥ ‘वे पक्षिप्रवर प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्माजीकी वन्दना करनेके लिये जाया करते थे और वहाँसे लौटनेपर मुझसे मिले बिना कभी अपने घर नहीं जाते थे ॥ ६ ॥

उभे द्विरात्रिसंध्ये वै नाभ्यगात् स ममालयम् । तस्मान्न शुद्धयते भावो मम स ज्ञायतां सुहृत् ॥ ७ ॥ ‘आज दो संध्याएँ व्यतीत हो गयीं; किंतु वह मेरे घरपर नहीं पधारे, अतः मेरे मनमें संदेह पैदा हो गया है। तुम मेरे मित्रका पता लगाओ ॥ ७ ॥

स्वाध्यायेन वियुक्तो हि ब्रह्मवर्चसव्रर्जितः । तद्व्रतस्तत्र मे शंका हन्यात् तं स द्विजाधमः ॥ ८ ॥ ‘वह अधम ब्राह्मण गौतम स्वाध्यायरहित और ब्रह्मतेजसे शून्य था तथा हिंसक जान पड़ता था। उसीपर मेरा संदेह है। कहीं वह मेरे मित्रको मार न डाले ॥ ८ ॥

दुराचारस्तु दुर्बुद्धिरिङ्गितैर्लक्षितो मया । निष्कृपो दारुणाकारो दुष्टो दस्युरिवाधमः ॥ ९ ॥ ‘उसकी चेष्टाओंसे मैंने लक्षित किया तो वह मुझे दुर्बुद्धि एवं दुराचारी तथा दयाहीन प्रतीत होता था। वह आकारसे ही बड़ा भयानक और दुष्ट दस्युके समान अधम जान पड़ता था ॥ ९ ॥

गौतमः स गतस्तत्र तेनोद्विग्नं मनो मम । पुत्र शीघ्रमितो गत्वा राजधर्मनिवेशनम् ॥ १० ॥ ज्ञायतां स विशुद्धात्मा यदि जीवति मा चिरम् । ‘नीच गौतम यहाँसे लौटकर फिर उन्हींके निवास-स्थानपर गया था; इसलिये मेरे मनमें उद्वेग हो रहा है। बेटा! तुम शीघ्र यहाँसे राजधर्माके घरपर जाओ और पता लगाओ कि वे शुद्धात्मा पक्षिराज जीवित हैं या नहीं। इस कार्यमें विलम्ब न करो’ ॥ १० १/२ ॥

स एवमुक्तस्त्वरितो रक्षोभिः सहितो ययौ ॥ ११ ॥ न्यग्रोधं तत्र चापश्यत् कङ्कालं राजधर्मणः । पिताकी ऐसी आज्ञा पाकर वह तुरंत ही राक्षसोंके साथ उस वटवृक्षके पास गया। वहाँ उसे राजधर्माका कंकाल अर्थात् उसके पंख, हड्डियों और पैरोंका समूह दिखायी दिया ॥ ११ १/२ ॥

स रुदन्नगमत् पुत्रो राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ॥ १२ ॥ त्वरमाणः परं शक्त्या गौतमग्रहणाय वै । बुद्धिमान् राक्षसराजका पुत्र राजधर्माकी यह दशा देखकर रो पड़ा और उसने पूरी शक्ति लगाकर गौतमको शीघ्र पकड़नेकी चेष्टा की ॥ १२ १/२ ॥

ततोऽविदूरे जगृहुर्गौतमं राक्षसास्तदा ॥ १३ ॥

राजधर्मशरीरं च पक्षास्थिचरणोज्झितम् । तदनन्तर कुछ ही दूर जानेपर राक्षसोंने गौतमको पकड़ लिया। साथ ही उन्हें पंख, पैर और हड्डियोंसे रहित राजधर्माकी लाश भी मिल गयी ॥ १३ १/२ ॥ तमादायाथ रक्षांसि द्रुतं मेरुव्रजं ययुः ॥ १४ ॥ राज्ञश्च दर्शयामासुः शरीरं राजधर्मणः । कृतघ्नं परुषं तं च गौतमं पापकारिणम् ॥ १५ ॥ गौतमको लेकर वे राक्षस शीघ्र ही मेरुव्रजमें गये। वहाँ उन्होंने राजाको राजधर्माका मृत शरीर दिखाया और पापाचारी कृतघ्न गौतमको भी सामने खड़ा कर दिया ॥ रुरोद राजा तं दृष्ट्वा सामात्यः सपुरोहितः । आर्तनादश्च सुमहानभूत् तस्य निवेशने ॥ १६ ॥ सस्त्रीकुमारं च पुरं बभूवास्वस्थमानसम् । अपने मित्रको इस दशामें देखकर मन्त्री और पुरोहितोंके साथ राजा विरूपाक्ष फूट-फूटकर रोने लगे। उनके महलमें महान् आर्तनाद गूँजने लगा। स्त्री और बच्चोंसहित सारे नगरमें शोक छा गया। किसीका भी मन स्वस्थ न रहा ॥ अथाब्रवीन्नृपः पुत्रं पापोऽयं वध्यतामिति ॥ १७ ॥ अस्य मांसैरिमे सर्वे विहरन्तु यथेष्टतः । तब राजाने अपने पुत्रको आज्ञा दी—'बेटा! इस पापीको मार डालो। ये समस्त राक्षस इसके मांसका यथेष्ट उपयोग करें ॥ १७ १/२ ॥ पापाचारः पापकर्मा पापात्मा पापसाधनः ॥ १८ ॥ हन्तव्योऽयं मम मतिर्भवद्भिरिति राक्षसाः । 'राक्षसो! यह पापाचारी, पापकर्मा और पापात्मा है। इसके सारे साधन पापमय हैं; अतः तुम्हें इसका वध कर देना चाहिये, यही मेरा मत है' ॥ १८ १/२ ॥ इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसा घोरविक्रमाः ॥ १९ ॥ नैच्छन्त तं भक्षयितुं पापकर्माणमित्युत । राक्षसराजके इस प्रकार आदेश देनेपर भी भयानक पराक्रमी राक्षसोंने गौतमको खानेकी इच्छा नहीं की; क्योंकि वह घोर पापाचारी था ॥ १९ १/२ ॥ दस्यूनां दीयतामेष साध्वद्य पुरुषाधमः ॥ २० ॥ इत्यूचुस्ते महाराज राक्षसेन्द्रं निशाचराः । शिरोभिः प्रणताः सर्वे व्याहरन् राक्षसाधिपम् ॥ २१ ॥ न दातुमर्हसि त्वं नो भक्षणायस्य किल्विषम् ।