महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दूसरे जन्मके समय अदितिके उदरमें पीड़ा होगी।' माता अदितिके पेटका वह अण्ड उस पीड़ाद्वारा मारा गया। मृत अण्डसे प्रकट होनेके कारण श्राद्धदेवसंज्ञक विवस्वान् मार्तण्ड नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ५६॥
दक्षस्य या वै दुहितरः षष्टिरासंस्ताभ्यः कश्यपाय त्रयोदश प्रादाद् दश धर्माय दश मनवे सप्तविंशतिमिन्दवे तासु तुल्यासु नक्षत्राख्यां गतासु सोमो रोहिण्यामभ्यधिकं प्रीतिमानभूत् ततस्ताः शिष्टाः पत्न्य ईर्ष्यावित्यः पितुः समीपं गत्वेममर्थं शशंसुर्भगवन्नस्मासु तुल्यप्रभावासु सोमो रोहिणीं प्रत्यधिकं भजतीति सोऽब्रवीद् यक्ष्मैनमाविश्येतेति दक्षशापात् सोमं राजानं यक्ष्मा विवेश स यक्ष्मणाऽऽविष्टो दक्षमगाद् दक्षश्चैनमब्रवीन्न समं वर्तयसीति तत्रर्षयः सोममब्रुवन् क्षीयसे यक्ष्मणा पश्चिमायां दिशि समुद्रे हिरण्यसरस्तीर्थं तत्र गत्वा आत्मानमभिषेचयस्वेत्यथागच्छत् सोमस्तत्र हिरण्यसरस्तीर्थं गत्वा चात्मनः सेचनमकरोत् स्नात्वा चात्मानं पाप्मनो मोक्षयामास तत्र चावभासितस्तीर्थे यदा सोमस्तदा प्रभृति च तीर्थं तत् प्रभासमिति नाम्ना ख्यातं बभूव॥ ५७॥
प्रजापति दक्षके साठ कन्याएँ थीं। उनमेंसे तेरहका विवाह उन्होंने कश्यपजीके साथ कर दिया। दस कन्याएँ धर्मको, दस मनुको और सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको दे डालीं। उन सत्ताईस कन्याओंकी नक्षत्र नामसे प्रसिद्धि हुई। यद्यपि वे सब-की-सब एक समान रूपवती थीं तो भी चन्द्रमा सबसे अधिक रोहिणीपर ही प्रेम करने लगे। यह देख शेष पत्नियोंके मनमें ईर्ष्या हुई और उन्होंने पिताके समीप जाकर यह बात बतायी—'भगवन्! हम सब बहिनोंका प्रभाव एक-सा है तो भी चन्द्रदेव रोहिणीपर ही अधिक स्नेह रखते हैं।' यह सुनकर दक्षने कहा—'इनके भीतर यक्ष्माका प्रवेश होगा।' इस प्रकार ब्राह्मण दक्षके शापसे राजा सोमके शरीरमें यक्ष्माने प्रवेश किया। यक्ष्मासे ग्रस्त होकर राजा सोम प्रजापति दक्षके पास गये। रोषका कारण पूछनेपर दक्षने उनसे कहा—'तुम अपनी सभी पत्नियोंके प्रति समान बर्ताव नहीं करते हो, उसीका यह दण्ड है।' वहाँ दूसरे ऋषियोंने सोमसे कहा—'तुम यक्ष्मासे क्षीण होते चले जा रहे हो। अतः पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर जो हिरण्यसर नामक तीर्थ है, वहाँ जाकर अपने-आपको स्नान कराओ।' तब सोमने हिरण्यसर तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान किया। स्नान करके उन्होंने अपने-आपको पापसे छुड़ाया। उस तीर्थमें वे दिव्य प्रभासे प्रभासित हो उठे थे, इसलिये उसी समयसे वह स्थान प्रभासतीर्थके नामसे विख्यात हो गया॥ ५७॥
तच्छापाद्यापि क्षीयते सोमोऽमावास्यान्तरस्थः पौर्णमासीमात्रेऽधिष्ठितो मेघलेखाप्रतिच्छन्नं वपुर्दर्शयति मेघसदृशं वर्णमगमत् तदस्य शशलक्ष्म विमलमभवत्॥ ५८॥
उसी शापसे आज भी चन्द्रमा कृष्णपक्षमें अमावास्यातक क्षीण होता रहता है और शुक्लपक्षमें पूर्णिमातक उसकी वृद्धि होती रहती है। उसका मण्डलाकार स्वरूप मेघकी
श्याम रेखासे आच्छन्न-सा दिखायी देता है। उसके शरीरमें खरगोशका-सा चिह्न मेघके समान श्यामवर्णका है। वह स्पष्टरूपसे प्रतीत होता है ॥ ५८ ॥
स्थूलशिरा महर्षिर्मेरोः प्रागुत्तरे दिग्विभागे तपस्तेपे ततस्तस्य तपस्तप्यमानस्य सर्वगन्धवहः शुचिर्वायुर्वायमानः शरीरमस्पृशत् स तपसा तापित-शरीरः कृशो वायुनोपवीज्यमानो हृदये परितोषमगमत् तत्र किल तस्यानिलव्यजनकृतपरितोषस्य सद्यो वनस्पतयः पुष्पशोभां निदर्शितवन्त इति स एतान् शशाप न सर्वकालं पुष्पवन्तो भविष्यथेति ॥ ५९ ॥
पूर्वकालकी बात है, मेरुपर्वतके पूर्वोत्तर भागमें स्थूलशिरा नामक महर्षि बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। उनके तपस्या करते समय सब प्रकार सुगन्ध लिये पवित्र वायु बहने लगी। उस वायुने प्रवाहित होकर मुनिके शरीरका स्पर्श किया। तपस्यासे संतप्त शरीरवाले उन कृशकाय मुनिने उस वायुसे वीजित हो अपने हृदयमें बड़े संतोषका अनुभव किया। वायुके द्वारा व्यजन डुलानेसे संतुष्ट हुए मुनिके समक्ष वृक्षोंने तत्काल फूलकी शोभा दिखलायी। इससे रुष्ट होकर मुनिने उन्हें शाप दिया कि तुम हर समय फूलोंसे भरे-पूरे नहीं रहोगे ॥ ५९ ॥
नारायणो लोकहितार्थं वडवामुखो नाम पुरा महर्षिर्बभूव तस्य मेरौ तपस्तप्यतः समुद्र आहूतो नागतस्तेनामर्षितेनात्मगात्रोष्मणा समुद्रः स्तिमितजलः कृतः स्वेदप्रस्यन्दनसदृशश्चास्य लवणभावो जनितः ॥ ६० ॥
एक समय भगवान् नारायण लोकहितके लिये बडवामुख नामक महर्षि हुए। जब वे मेरुपर्वतपर तपस्या कर रहे थे, उन्हीं दिनों उन्होंने समुद्रका आवाहन किया; किंतु वह नहीं आया। इससे अमर्षमें भरकर उन्होंने अपने शरीरकी गर्मीसे समुद्रके जलको चंचल कर दिया और पसीनेके प्रवाहकी भाँति उसमें खारापन प्रकट कर दिया ॥ ६० ॥
उक्तश्चाप्यपेयो भविष्यस्येतच्च ते तोयं वडवामुखसंज्ञितेन पेपीयमानं मधुरं भविष्यति तदेतदद्यापि वडवामुखसंज्ञितेनानुवर्तिना तोयं समुद्रात् पीयते ॥ ६१ ॥
साथ ही उससे कहा—‘समुद्र! तू पीनेयोग्य नहीं रह जायगा। तेरा यह जल बडवामुखके द्वारा बारंबार पीया जानेपर मधुर होगा।’ यह बात आज भी देखनेमें आती है। बडवामुखसंज्ञक अग्नि समुद्रसे जल लेकर पीती है ॥ ६१ ॥
हिमवतो गिरेर्दुहितरमुमां कन्यां रुद्रश्चकमे भृगुरपि च महर्षिर्हिमवन्तमागत्याब्रवीत् कन्यामिमां मे देहीति तमब्रवीद्धिमवानभिलक्षितो वरो रुद्र इति तमब्रवीद् भृगुर्यस्मात् त्वयाहं कन्यावरण-कृतभावः प्रत्याख्यातस्तस्मान्न रत्नानां भवान् भाजनं भविष्यतीति ॥ ६२ ॥
हिमवान्की पुत्री उमाको जब वह कुमारी अवस्थामें थी तभी रुद्रने पानेकी इच्छा की। दूसरी ओरसे महर्षि भृगु भी वहाँ आकर हिमवान्से बोले—‘अपनी यह कन्या मुझे दे दो।’ तब हिमवान्ने उनसे कहा—‘इस कन्याके लिये देख-सुनकर लक्षित किये हुए वर रुद्रदेव
हैं।' तब भृगुने कहा—'मैं कन्याका वरण करनेकी भावना लेकर यहाँ आया था, किंतु तुमने मेरी उपेक्षा कर दी है; इसलिये मैं शाप देता हूँ कि तुम रत्नोंके भण्डार नहीं होओगे'॥ ६२॥
अद्यप्रभृत्येतदवस्थितमृषिवचनं तदेवंविधं माहात्म्यं ब्राह्मणानाम्॥ ६३॥ आज भी महर्षिका वह वचन हिमवान्पर ज्यों-का-त्यों लागू हो रहा है। ऐसा ब्राह्मणोंका माहात्म्य है॥ ६३॥
क्षत्रमपि च ब्राह्मणप्रसादादेव शाश्वतीमव्ययां च पृथिवीं पत्नीमभिगम्य बुभुजे॥ ६४॥ क्षत्रिय जाति भी ब्राह्मणोंकी कृपासे ही सदा रहनेवाली इस अविनाशिनी पृथ्वीको पत्नीकी भाँति पाकर इसका उपभोग करती है॥ ६४॥
यदेतद् ब्रह्माग्नीषोमीयं तेन जगद् धार्यते॥ ६५॥ यह जो अग्नि और सोमसम्बन्धी ब्रह्म है, उसीके द्वारा सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है॥ ६५॥
उच्यते—
सूर्याचन्द्रमसौ चक्षुः केशाश्चैवांशवः स्मृताः।
बोधयंस्तापयंश्चैव जगदुत्तिष्ठते पृथक्॥ ६६॥
कहते हैं कि सूर्य और चन्द्रमा (अग्नि और सोम) मेरे नेत्र हैं तथा उनकी किरणोंको केश कहा गया है। सूर्य और चन्द्रमा जगत्को क्रमशः ताप और मोद प्रदान करते हुए पृथक्-पृथक् उदित होते हैं॥ ६६॥
(नाम्नां निरुक्तं वक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानसः।)
बोधनात् तापनाच्चैव जगतो हर्षणं भवेत्।
अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन।
हृषीकेशोऽहमीशानो वरदो लोकभावनः॥ ६७॥
अब मैं अपने नामोंकी व्याख्या करूँगा। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जगत्को मोद और ताप प्रदान करनेके कारण चन्द्रमा और सूर्य हर्षदायक होते हैं। पाण्डुनन्दन! अग्नि और सोमद्वारा किये गये इन कर्मोंद्वारा मैं विश्वभावन वरदायक ईश्वर ही 'हृषीकेश'* कहलाता हूँ॥ ६७॥
इलोपहूतयोगेन हरे भागं क्रतुष्वहम्।
वर्णश्च मे हरिः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिहं स्मृतः॥ ६८॥
यज्ञमें 'इलोपहूता सह दिवा' आदि मन्त्रसे आवाहन करनेपर मैं अपना भाग हरण (स्वीकार) करता हूँ तथा मेरे शरीरका रंग भी हरित (श्याम) है, इसलिये मुझे 'हरि' कहते हैं॥ ६८॥
धाम सारो हि भूतानाम् ऋतं चैव विचारितम्।
ऋतधामा ततो विप्रैः सद्यश्चाहं प्रकीर्तितः ॥ ६९ ॥
प्राणियोंके सारका नाम है धाम और ऋतका अर्थ है सत्य, ऐसा विद्वानोंने विचार किया है! इसीलिये ब्राह्मणोंने तत्काल मेरा नाम ‘ऋतधामा’ रख दिया था ॥
नष्टां च धरणीं पूर्वमविन्दं वै गुहागताम् ।
गोविन्द इति तेनाहं देवैर्वाग्भिरभिष्टुतः ॥ ७० ॥
मैंने पूर्वकालमें नष्ट होकर रसातलमें गयी हुई पृथ्वीको पुनः वराहरूप धारण करके प्राप्त किया था, इसलिये देवताओंने अपनी वाणीद्वारा ‘गोविन्द’ कहकर मेरी स्तुति की थी (गां विन्दति इति गोविन्दः—जो पृथ्वीको प्राप्त करे, उसका नाम गोविन्द है) ॥ ७० ॥
शिपिविष्टेति चाख्यायां हीनरोमा च यो भवेत् ।
तेनाविष्टं तु यत्किंचिच्छिपिविष्टेति च स्मृतः ॥ ७१ ॥
मेरे ‘शिपिविष्ट’ नामकी व्याख्या इस प्रकार है। रोमहीन प्राणीको शिपि कहते हैं—तथा विष्टका अर्थ है व्यापक। मैंने निराकाररूपसे समस्त जगत्को व्याप्त कर रखा है, इसलिये मुझे ‘शिपिविष्ट’ कहते हैं ॥ ७१ ॥
यास्को मामृषिरव्यग्रो नैकयज्ञेषु गीतवान् ।
शिपिविष्ट इति ह्यस्माद् गुह्यनामधरो ह्यहम् ॥ ७२ ॥
यास्कमुनिने शान्तचित्त होकर अनेक यज्ञोंमें शिपिविष्ट कहकर मेरी महिमाका गान किया है; अतः मैं इस गुह्यनामको धारण करता हूँ ॥ ७२ ॥
स्तुत्वा मां शिपिविष्टेति यास्क ऋषिरुदारधीः ।
मत्प्रसादादधो नष्टं निरुक्तमभिजग्मिवान् ॥ ७३ ॥
उदारचेता यास्क मुनिने शिपिविष्ट नामसे मेरी स्तुति करके मेरी ही कृपासे पाताललोकमें नष्ट हुए निरुक्तशास्त्रको पुनः प्राप्त किया था ॥ ७३ ॥
न हि जातो न जायेयं न जनिष्ये कदाचन ।
क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानां तस्मादहमजः स्मृतः ॥ ७४ ॥
मैंने न तो पहले कभी जन्म लिया है, न अब जन्म लेता हूँ और न आगे कभी जन्म लूँगा। मैं समस्त प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाला क्षेत्रज्ञ आत्मा हूँ। इसीलिये मेरा नाम ‘अज’ है ॥ ७४ ॥
नोक्तपूर्वं मया क्षुद्रमश्लीलं वा कदाचन ।
ऋता ब्रह्मसुता सा मे सत्या देवी सरस्वती ॥ ७५ ॥
सच्चासच्चैव कौन्तेय मयाऽऽवेशितमात्मनि ।
पौष्करे ब्रह्मसदने सत्यं मामृषयो विदुः ॥ ७६ ॥
मैंने कभी ओछी या अश्लील बात मुँहसे नहीं निकाली है। सत्यस्वरूपा ब्रह्मपुत्री सरस्वतीदेवी मेरी वाणी है। कुन्तीकुमार! सत् और असत्को भी मैंने अपने भीतर ही प्रविष्ट
कर रखा है; इसलिये मेरे नाभि-कमलरूप ब्रह्मलोकमें रहनेवाले ऋषिगण मुझे ‘सत्य’ कहते हैं॥ ७५-७६॥
सत्त्वान्नच्युतपूर्वोऽहं सत्त्वं वै विद्धि मत्कृतम्।
जन्मनीहा भवेत् सत्त्वं पौर्विकं मे धनंजय॥ ७७॥
निराशीः कर्मसंयुक्तः सत्त्वतश्चाप्यकल्मषः।
सात्त्वतज्ञानदृष्टोऽहं सत्त्वतामिति सात्त्वतः॥ ७८॥
धनंजय! मैं पहले कभी सत्त्वसे च्युत नहीं हुआ हूँ। सत्त्वको मुझसे ही उत्पन्न हुआ समझो। मेरा वह पुरातन सत्त्व इस अवतारकालमें भी विद्यमान है। सत्त्वके कारण ही मैं पापसे रहित हो निष्कामकर्ममें लगा रहता हूँ। भगवत्प्राप्त पुरुषोंके सात्त्वतज्ञान (पांचरात्रादि वैष्णवतन्त्र) से मेरे स्वरूपका बोध होता है। इन सब कारणोंसे लोग मुझे ‘सात्त्वत’ कहते हैं॥ ७७-७८॥
कृषामि मेदिनीं पार्थ भूत्वा कार्ष्णायसो महान्।
कृष्णो वर्णश्च मे यस्मात् तस्मात् कृष्णोऽहमर्जुन॥ ७९॥
पृथापुत्र अर्जुन! मैं काले लोहेका विशाल फाल बनकर इस पृथ्वीको जोतता हूँ तथा मेरे शरीरका रंग भी काला है, इसलिये मैं ‘कृष्ण’ कहलाता हूँ*॥ ७९॥
मया संश्लेषिता भूमिरद्भिर्व्योम च वायुना।
वायुश्च तेजसा सार्धं वैकुण्ठत्वं ततो मम॥ ८०॥
मैंने भूमिको जलके साथ, आकाशको वायुके साथ और वायुको तेजके साथ संयुक्त किया है। इसलिये (विगता कुण्ठा पंचानां भूतानां मेलने असामर्थ्यं यस्य सः विकुण्ठः, विकुण्ठ एव वैकुण्ठः—पाँचों भूतोंको मिलानेमें जिनकी शक्ति कभी कुण्ठित नहीं होती, वे भगवान् वैकुण्ठ हैं, इस व्युत्पत्ति के अनुसार) मैं ‘वैकुण्ठ’ कहलाता हूँ॥ ८०॥
निर्वाणं परमं ब्रह्म धर्मोऽसौ पर उच्यते।
तस्मान्न च्युतपूर्वोऽहमच्युतस्तेन कर्मणा॥ ८१॥
परम शान्तिमय जो ब्रह्म है, वही परम धर्म कहा गया है। उससे पहले कभी मैं च्युत नहीं हुआ हूँ, इसलिये लोग मुझे ‘अच्युत’ कहते हैं॥ ८१॥
पृथिवीनभसी चोभे विश्रुते विश्वतोमुखे।
तयोः संधारणार्थं हि मामधोक्षजमज्जसा॥ ८२॥
(‘अधः’ का अर्थ है पृथ्वी, ‘अक्ष’ का अर्थ है आकाश और ‘ज’ का अर्थ है इनको धारण करनेवाला) पृथ्वी और आकाश दोनों सर्वतोमुखी एवं प्रसिद्ध हैं। उनको अनायास ही धारण करनेके कारण लोग मुझे ‘अधोक्षज’ कहते हैं॥ ८२॥
निरुक्तं वेदविदुषो वेदशब्दार्थचिन्तकाः।
ते मां गायन्ति प्राग्वंशे अधोक्षज इति स्थितिः॥ ८३॥
वेदोंके शब्द और अर्थपर विचार करनेवाले वेदवेत्ता विद्वान् प्राग्वंश (यज्ञशालाके एक भाग) में बैठकर अधोक्षज नामसे मेरी महिमाका गान करते हैं; इसलिये भी मेरा नाम 'अधोक्षज' है ।। ८३ ।।
(अधो न क्षीयते यस्माद् वदन्त्यन्ये ह्यधोक्षजम् ।)
जिसके अनुग्रहसे जीव अधोगतिमें पड़कर क्षीण नहीं होता, उन भगवान्को दूसरे लोग इसी व्युत्पत्तिके अनुसार 'अधोक्षज' कहते हैं ।।
शब्द एकपदैरेष व्याहृतः परमर्षिभिः ।
नान्यो ह्यधोक्षजो लोके ऋते नारायणं प्रभुम् ।। ८४ ।।
महर्षि लोग अधोक्षज शब्दको पृथक्-पृथक् तीन पदोंका एक समुदाय मानते हैं—'अ' का अर्थ है लय-स्थान, 'धोक्ष' का अर्थ है पालन-स्थान और 'ज' का अर्थ है उत्पत्तिस्थान। उत्पत्ति, स्थिति और लयके स्थान एकमात्र नारायण ही हैं; अतः उन भगवान् नारायणको छोड़कर संसारमें दूसरा कोई 'अधोक्षज' नहीं कहला सकता ।। ८४ ।।
घृतं ममार्चिषो लोके जन्तूनां प्राणधारणम् ।
घृतार्चिरहमव्यग्रैर्वेदज्ञैः परिकीर्तितः ।। ८५ ।।
प्राणियोंके प्राणोंकी पुष्टि करनेवाला घृत मेरे स्वरूपभूत अग्निदेवकी अर्चिष् अर्थात् ज्वालाको जगानेवाला है; इसलिये शान्तचित्त वेदज्ञ विद्वानोंने मुझे 'घृतार्चि' कहा है ।। ८५ ।।
त्रयो हि धातवः ख्याताः कर्मजा इति ते स्मृताः ।
पित्तं श्लेष्मा च वायुश्च एष संघात उच्यते ।। ८६ ।।
एतैश्च धार्यते जन्तुरेतैः क्षीणैश्च क्षीयते ।
आयुर्वेदविदस्तस्मात् त्रिधातुं मां प्रचक्षते ।। ८७ ।।
शरीरमें तीन धातु विख्यात हैं वात, पित्त और कफ। वे सब-के-सब कर्मजन्य माने गये हैं। इनके समुदायको त्रिधातु कहते हैं। जीव इन धातुओंके रहनेसे जीवन धारण करते हैं और उनके क्षीण हो जानेपर क्षीण हो जाते हैं। इसलिये आयुर्वेदके विद्वान् मुझे 'त्रिधातु' कहते हैं ।। ८६-८७ ।।
वृषो हि भगवान् धर्मः ख्यातो लोकेषु भारत ।
नैघण्टुकपदाख्याने विद्धि मां वृषमुत्तमम् ।। ८८ ।।
भरतनन्दन! भगवान् धर्म सम्पूर्ण लोकोंमें वृषके नामसे विख्यात हैं। वैदिक शब्दार्थबोधक कोशमें वृषका अर्थ धर्म बताया गया है; अतः उत्तम धर्मस्वरूप मुझ वासुदेवको 'वृष' समझो ।। ८८ ।।
कपिवराहः श्रेष्ठश्च धर्मश्च वृष उच्यते ।
तस्माद् वृषाकपिं प्राह कश्यपो मां प्रजापतिः ।। ८९ ।।
कपि शब्दका अर्थ वराह एवं श्रेष्ठ है और वृष कहते हैं धर्मको। मैं धर्म और श्रेष्ठ वराहरूपधारी हूँ; इसलिये प्रजापति कश्यप मुझे ‘वृषाकपि’ कहते हैं ॥
न चादिं न मध्यं तथा चैव नान्तं
कदाचिद् विदन्ते सुराश्चासुराश्च ।
अनाद्यो ह्यमध्यस्तथा चाप्यनन्तः
प्रगीतोऽहमीशो विभुर्लोकसाक्षी ॥ ९० ॥
मैं जगत्का साक्षी और सर्वव्यापी ईश्वर हूँ। देवता तथा असुर भी मेरे आदि, मध्य और अन्तका कभी पता नहीं पाते हैं; इसलिये मैं ‘अनादि’, ‘अमध्य’ और ‘अनन्त’ कहलाता हूँ ॥ ९० ॥
शुचीनि श्रवणीयानि शृणोमीह धनंजय ।
न च पापानि गृह्णामि ततोऽहं वै शुचिश्रवाः ॥ ९१ ॥
धनंजय! मैं यहाँ पवित्र एवं श्रवण करने योग्य वचनोंको ही सुनता हूँ और पापपूर्ण बातोंको कभी ग्रहण नहीं करता हूँ, इसलिये मेरा नाम ‘शुचिश्रवा’ है ॥ ९१ ॥
एकशृङ्गः पुरा भूत्वा वराहो नन्दिवर्धनः ।
इमां चोद्धृतवान् भूमिमेकशृङ्गस्ततो ह्यहम् ॥ ९२ ॥
पूर्वकालमें मैंने एक सींगवाले वराहका रूप धारण करके इस पृथ्वीको पानीसे बाहर निकाला और सारे जगत्का आनन्द बढ़ाया; इसलिये मैं ‘एकशृंग’ कहलाता हूँ ॥ ९२ ॥
तथैवासं त्रिककुदो वाराहं रूपमास्थितः ।
त्रिककुत् तेन विख्यातः शरीरस्य तु मापनात् ॥ ९३ ॥
इसी प्रकार वराहरूप धारण करनेपर गौर शरीरमें तीन ककुद् (ऊँचे स्थान) थे; इसलिये शरीरके मापसे मैं ‘त्रिककुद्’ नामसे विख्यात हुआ ॥ ९३ ॥
विरिञ्च इति यत् प्रोक्तं कपिलज्ञानचिन्तकैः ।
स प्रजापतिरेवाहं चेतनात् सर्वलोककृत् ॥ ९४ ॥
कपिल मुनिके द्वारा प्रतिपादित सांख्यशास्त्रका विचार करनेवाले विद्वानोंने जिसे विरिंच कहा है, यह सर्वलोकस्रष्टा प्रजापति ‘विरिंच’ मैं ही हूँ, क्योंकि मैं ही सबको चेतना प्रदान करता हूँ ॥ ९४ ॥
विद्यासहायवन्तं मामादित्यस्थं सनातनम् ।
कपिलं प्राहुराचार्याः सांख्या निश्चितनिश्चयाः ॥ ९५ ॥
तत्त्वका निश्चय करनेवाले सांख्यशास्त्रके आचार्योंने मुझे आदित्य मण्डलमें स्थित, विद्या-शक्तिके साहचर्यसे सम्पन्न सनातन देवता ‘कपिल’ कहा है ॥ ९५ ॥
हिरण्यगर्भो द्युतिमान् य एष छन्दसि स्तुतः ।
योगैः सम्पूज्यते नित्यं स एवाहं भुवि स्मृतः ॥ ९६ ॥
वेदोंमें जिनकी स्तुति की गयी है तथा इस जगत्में योगीजन सदा जिनकी पूजा और स्मरण करते हैं, वह तेजस्वी 'हिरण्यगर्भ' मैं ही हूँ ।। ९६ ।। एकविंशतिसाहस्रं ऋग्वेदं मां प्रचक्षते । सहस्रशाखं यत् साम ये वै वेदविदो जनाः ।। ९७ ।। वेदके विद्वान् मुझे ही इक्कीस हजार ऋचाओंसे युक्त 'ऋग्वेद' और एक हजार शाखाओंवाला 'सामवेद' कहते हैं ।। ९७ ।। गायन्त्यारण्यके विप्रा मद्भक्तास्ते हि दुर्लभाः । षट्पञ्चाशतमष्टौ च सप्तत्रिंशतमित्युत ।। ९८ ।। यस्मिन् शाखा यजुर्वेदे सोऽहमाध्वर्यवे स्मृतः । आरण्यकोंमें ब्राह्मणलोग मेरा ही गान करते हैं। वे मेरे परम भक्त दुर्लभ हैं। जिस यजुर्वेदकी छप्पन+आठ+सैंतीस=एक सौ एक शाखाएँ मौजूद हैं, उस यजुर्वेदमें भी मेरा ही गान किया गया है ।। ९८ ½ ।। पञ्चकल्पमथर्वाणं कृत्याभिः परिबृंहितम् ।। ९९ ।। कल्पयन्ति हि मां विप्रा अथर्वाणविदस्तथा । अथर्ववेदी ब्राह्मण मुझे ही कृत्याओं आभिचारिक प्रयोगोंसे सम्पन्न पंचकल्पात्मक 'अथर्ववेद' मानते हैं ।। शाखाभेदाश्च ये केचिद् याश्च शाखासु गीतयः ।। १०० ।। स्वरवर्णसमुच्चाराः सर्वांस्तान् विद्धि मत्कृतान् । वेदोंमें जो भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं, उन शाखाओंमें जितने गीत हैं तथा उन गीतोंमें स्वर और वर्णके उच्चारण करनेकी जितनी रीतियाँ हैं, उन सबको मेरी बनायी हुई ही समझो ।। १०० ½ ।। यत् तद् हयशिरः पार्थ समुदेति वरप्रदम् ।। १०१ ।। सोऽहमेवोत्तरे भागे क्रमाक्षरविभागवित् । कुन्तीनन्दन! सबको वर देनेवाले जो हयग्रीव प्रकट होते हैं, उनके रूपमें मैं ही अवतीर्ण होता हूँ। मैं ही उत्तरभागमें वेद-मन्त्रोंके क्रम-विभाग और अक्षर-विभागका ज्ञाता हूँ* ।। १०१ ½ ।। वामादेशितमार्गेण मत्प्रसादान्महात्मना ।। १०२ ।। पाञ्चालेन क्रमः प्राप्तस्तस्माद् भूतात् सनातनात् । महात्मा पांचालने वामदेवके बताये हुए ध्यान-मार्गसे मेरी आराधना करके मुझ सनातन पुरुषके ही कृपाप्रसादसे वेदका क्रमविभाग प्राप्त किया था ।। बाभ्रव्यगोत्रः स बभौ प्रथमं क्रमपारगः ।। १०३ ।। नारायणाद् वरं लब्ध्वा प्राप्य योगमनुत्तमम् ।
क्रमं प्रणीय शिक्षां च प्रणयित्वा स गालवः ॥ १०४ ॥ बाभ्रव्य-गोत्रमें उत्पन्न हुए वे महर्षि गालव भगवान् नारायणसे वर एवं परम उत्तम योग पाकर वेदके क्रमविभाग एवं शिक्षाका प्रणयन करके सबसे पहले क्रमविभागके पारंगत विद्वान् हुए थे ॥ १०३-१०४ ॥
कण्डरीकोऽथ राजा च ब्रह्मदत्तः प्रतापवान् । जातीमरणजं दुःखं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः ॥ १०५ ॥ सप्तजातिषु मुख्यत्वाद् योगानां सम्पदं गतः । कण्डरीक-कुलमें उत्पन्न हुए प्रतापी राजा ब्रह्मदत्तने सात जन्मोंके जन्म-मृत्युसम्बन्धी दुःखोंका बार-बार स्मरण करके तीव्रतम वैराग्यके कारण शीघ्र ही योगजनित ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया था ॥ १०५ १/२ ॥
पुराहमात्मजः पार्थ प्रथितः कारणान्तरे ॥ १०६ ॥ धर्मस्य कुरुशार्दूल ततोऽहं धर्मजः स्मृतः । कुरुश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार! पूर्वकालमें किसी कारणवश मैं धर्मके पुत्ररूपसे प्रसिद्ध हुआ था। इसीलिये मुझे ‘धर्मज’ कहा गया है ॥ १०६ १/२ ॥
नरनारायणौ पूर्वं तपस्तेपतुरव्ययम् ॥ १०७ ॥ धर्मयानं समारूढौ पर्वते गन्धमादने । तत्कालसमये चैव दक्षयज्ञो बभूव ह ॥ १०८ ॥ पहले नर और नारायणने जब धर्ममय रथपर आरूढ हो गन्धमादन पर्वतपर अक्षय तप किया था, उसी समय प्रजापति दक्षका यज्ञ आरम्भ हुआ ॥ १०७-१०८ ॥
न चैवाकल्पयद् भागं दक्षो रुद्रस्य भारत । ततो दधीचिवचनाद् दक्षयज्ञमपाहरत् ॥ १०९ ॥ भारत! उस यज्ञमें दक्षने रुद्रके लिये भाग नहीं दिया था; इसलिये दधीचिके कहनेसे रुद्रदेवने दक्षके यज्ञका विध्वंस कर डाला ॥ १०९ ॥
ससर्ज शूलं कोपेन प्रज्वलन्तं मुहुर्मुहुः । तच्छूलं भस्मसात्कृत्वा दक्षयज्ञं सविस्तरम् ॥ ११० ॥ आवयोः सहसागच्छद् बदर्याश्रममन्तिकात् । रुद्रने क्रोधपूर्वक अपने प्रज्वलित त्रिशूलका बारंबार प्रयोग किया। वह त्रिशूल दक्षके विस्तृत यज्ञको भस्म करके सहसा बदरिकाश्रममें हम दोनों (नर और नारायण) के निकट आ पहुँचा ॥ ११० १/२ ॥
वेगेन महता पार्थ पतन्नारायणोरसि ॥ १११ ॥ ततस्तत् तेजसाऽऽविष्टः केशा नारायणस्य ह । बभूवुर्मुञ्जवर्णास्तु ततोऽहं मुञ्जकेशवान् ॥ ११२ ॥
पार्थ! उस समय नारायणकी छातीमें वह त्रिशूल बड़े वेगसे जा लगा। उससे निकलते हुए तेजकी लपेटमें आकर नारायणके केश मूँजके समान रंगवाले हो गये। इससे मेरा नाम 'मुञ्जकेश' हो गया ॥ १११-११२ ॥
तच्च शूलं विनिर्धूतं हुंकारेण महात्मना ।
जगाम शंकरकरं नारायणसमाहतम् ॥ ११३ ॥
तब महात्मा नारायणने हुंकारध्वनिके द्वारा उस त्रिशूलको पीछे हटा दिया। नारायणके हुंकारसे प्रतिहत होकर वह शंकरजीके हाथमें चला गया ॥ ११३ ॥
अथ रुद्र उपाधावत् तावृषी तपसान्वितौ ।
तत एनं समुद्भूतं कण्ठे जग्राह पाणिना ॥ ११४ ॥
नारायणः स विश्वात्मा तेनास्य शितिकण्ठता ।
यह देख रुद्र तपस्यामें लगे हुए उन ऋषियोंपर टूट पड़े। तब विश्वात्मा नारायणने अपने हाथसे उन आक्रमणकारी रुद्रदेवका गला पकड़ लिया। इसीसे उनका कण्ठ नीला हो जानेके कारण वे 'नीलकण्ठ' के नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ११४ १/२ ॥
अथ रुद्रविधातार्थमिषीकां नर उद्धरन् ॥ ११५ ॥
मन्त्रैश्च संयुयोजाशु सोऽभवत् परशुर्महान् ।
इसी समय रुद्रका विनाश करनेके लिये नरने एक सींक निकाली और उसे मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके शीघ्र ही छोड़ दिया। वह सींक एक बहुत बड़े परशुके रूपमें परिणत हो गयी ॥ ११५ १/२ ॥
क्षिप्तश्च सहसा तेन खण्डनं प्राप्तवांस्तदा ॥ ११६ ॥
ततोऽहं खण्डपरशुः स्मृतः परशुखण्डनात् ।
नरका चलाया हुआ वह परशु सहसा रुद्रके द्वारा खण्डित कर दिया गया। मेरे परशुका खण्डन हो जानेसे मैं 'खण्डपरशु' कहलाया ॥ ११६ १/२ ॥
अर्जुन उवाच
अस्मिन् युद्धे तु वार्ष्णेय त्रैलोक्यशमने तदा ॥ ११७ ॥
को जयं प्राप्तवांस्तत्र शंसैतन्मे जनार्दन ।
अर्जुनने पूछा—वृष्णिनन्दन! त्रिलोकीका संहार करनेवाले उस युद्धके उपस्थित होनेपर वहाँ रुद्र और नारायणमेंसे किसको विजय प्राप्त हुई? जनार्दन! आप यह बात मुझे बताइये ॥ ११७ १/२ ॥
श्रीभगवानुवाच
तयोः संलग्नयोर्युद्धे रुद्रनारायणात्मनोः ॥ ११८ ॥
उद्विग्नाः सहसा कृत्स्नाः सर्वे लोकास्तदाभवन् ।
नागृह्णात् पावकः शुभ्रं मखेषु सुहुतं हविः ॥ ११९ ॥
श्रीभगवान् बोले— अर्जुन! रुद्र और नारायण जब इस प्रकार परस्पर युद्धमें संलग्न हो गये, उस समय सम्पूर्ण लोकोंके समस्त प्राणी सहसा उद्विग्न हो उठे। अग्निदेव यज्ञोंमें विधिपूर्वक होम किये गये विशुद्ध हविष्यको भी ग्रहण नहीं कर पाते थे ॥ ११८-११९ ॥
वेदा न प्रतिभान्ति स्म ऋषीणां भावितात्मनाम् ।
देवान् रजस्तमश्चैव समाविविशतुस्तदा ॥ १२० ॥
पवित्रात्मा ऋषियोंको वेदोंका स्मरण नहीं हो पाता था। उस समय देवताओंमें रजोगुण और तमोगुणका आवेश हो गया था ॥ १२० ॥
वसुधा संचकम्पे च नभश्च विचचाल ह ।
निष्प्रभाणि च तेजांसि ब्रह्मा चैवासनच्युतः ॥ १२१ ॥
अगाच्छोषं समुद्रश्च हिमवांश्च व्यशीर्यत ।
पृथ्वी काँपने लगी, आकाश विचलित हो गया। समस्त तेजस्वी पदार्थ (ग्रह-नक्षत्र आदि) निष्प्रभ हो गये। ब्रह्मा अपने आसनसे गिर पड़े। समुद्र सूखने लगा और हिमालय पर्वत विदीर्ण होने लगा ॥ १२१ १/२ ॥
तस्मिन्नेवं समुत्पन्ने निमित्ते पाण्डुनन्दन ॥ १२२ ॥
ब्रह्मा वृतो देवगणैर्ऋषिभिश्च महात्मभिः ।
आजगामाशु तं देशं यत्र युद्धमवर्तत ॥ १२३ ॥
पाण्डुनन्दन! ऐसे अपशकुन प्रकट होनेपर ब्रह्माजी देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंको साथ ले शीघ्र उस स्थानपर आये, जहाँ वह युद्ध हो रहा था ॥ १२२-१२३ ॥
सोऽञ्जलिप्रग्रहो भूत्वा चतुर्वक्त्रो निरुक्तगः ।
उवाच वचनं रुद्रं लोकानामस्तु वै शिवम् ॥ १२४ ॥
न्यस्यायुधानि विश्वेश जगतो हितकाम्यया ।
निरुक्तगम्य भगवान् चतुर्मुखने हाथ जोड़कर रुद्रदेवसे कहा—‘प्रभो! समस्त लोकोंका कल्याण हो! विश्वेश्वर! आप जगत्के हितकी कामनासे अपने हथियार रख दीजिये ॥ १२४ १/२ ॥
यदक्षरमथाव्यक्तमीशं लोकस्य भावनम् ॥ १२५ ॥
कूटस्थं कर्तृ निर्द्वन्द्वमकतेति च यं विदुः ।
व्यक्तिभावगतस्यास्य एका मूर्तिरियं शुभा ॥ १२६ ॥
‘जो सम्पूर्ण जगत्का उत्पादक, अविनाशी और अव्यक्त ईश्वर हैं, जिन्हें ज्ञानी पुरुष कूटस्थ, निर्द्वन्द्व, कर्ता और अकर्ता मानते हैं, व्यक्त-भावको प्राप्त हुए उन्हीं परमेश्वरकी यह एक कल्याणमयी मूर्ति है ॥
नरो नारायणश्चैव जातौ धर्मकुलोद्भवौ ।
तपसा महता युक्तौ देवश्रेष्ठौ महाव्रतौ ॥ १२७ ॥
'धर्मकुलमें उत्पन्न हुए ये दोनों महाव्रती देवश्रेष्ठ नर और नारायण महान् तपस्यासे युक्त हैं ॥ १२७ ॥ अहं प्रसादजस्तस्य कुतश्चित् कारणान्तरे । त्वं चैव क्रोधजस्तात पूर्वसर्गे सनातनः ॥ १२८ ॥ 'किसी निमित्तसे उन्हीं नारायणके कृपाप्रसादसे मेरा जन्म हुआ है। तात! आप भी पूर्वसर्गमें उन्हीं भगवान्के क्रोधसे उत्पन्न हुए सनातन पुरुष हैं ॥ १२८ ॥ मया च सार्धं वरद विबुधैश्च महर्षिभिः । प्रसाद्याशु लोकानां शान्तिर्भवतु मा चिरम् ॥ १२९ ॥ 'वरद! आप देवताओं और महर्षियोंके तथा मेरे साथ शीघ्र इन भगवान्को प्रसन्न कीजिये, जिससे सम्पूर्ण जगत्में शीघ्र ही शान्ति स्थापित हो' ॥ १२९ ॥ ब्रह्मणा त्वेवमुक्तस्तु रुद्रः क्रोधाग्निमुत्सृजन् । प्रसादयामास ततो देवं नारायणं प्रभुम् । शरणं च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं प्रभुम् ॥ १३० ॥ ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर रुद्रदेवने अपनी क्रोधाग्निका त्याग किया। फिर आदिदेव, वरेण्य, वरदायक, सर्वसमर्थ भगवान् नारायणको प्रसन्न किया और उनकी शरण ली ॥ १३० ॥ ततोऽथ वरदो देवो जितक्रोधो जितेन्द्रियः । प्रीतिमानभवत् तत्र रुद्रेण सह संगतः ॥ १३१ ॥ तब क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लेनेवाले वरदायक देवता नारायण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए और रुद्रदेवसे गले मिले ॥ १३१ ॥ ऋषिभिर्ब्रह्मणा चैव विबुधैश्च सुपूजितः । उवाच देवमीशानमीशः स जगतो हरिः ॥ १३२ ॥ यस्त्वां वेत्ति स मां वेत्ति यस्त्वामनु स मामनु । नावयोरन्तरं किंचिन्मा तेऽभूद् बुद्धिरन्यथा ॥ १३३ ॥ तदनन्तर देवताओं, ऋषियों और ब्रह्माजीसे अत्यन्त पूजित हो जगदीश्वर श्रीहरिने रुद्रदेवसे कहा—'प्रभो! जो तुम्हें जानता है, वह मुझे भी जानता है। जो तुम्हारा अनुगामी है, वह मेरा भी अनुगामी है। हम दोनोंमें कुछ भी अन्तर नहीं है। तुम्हारे मनमें इसके विपरीत विचार नहीं होना चाहिये ॥ १३२-१३३ ॥ अद्यप्रभृति श्रीवत्सः शूलाङ्को मे भवत्वयम् । मम पाण्यङ्कितश्चापि श्रीकण्ठस्त्वं भविष्यसि ॥ १३४ ॥ 'आजसे तुम्हारे शूलका यह चिह्न मेरे वक्षः-स्थलमें 'श्रीवत्स' के नामसे प्रसिद्ध होगा और तुम्हारे कण्ठमें मेरे हाथके चिह्नसे अंकित होनेके कारण तुम भी 'श्रीकण्ठ' कहलाओगे' ॥ १३४ ॥
श्रीभगवानुवाच
एवं लक्षणमुत्पाद्य परस्परकृतं तदा ।
सख्यं चैवातुलं कृत्वा रुद्रेण सहितावृषी ॥ १३५ ॥
तपस्तेपतुरव्यग्रौ विसृज्य त्रिदिवौकसः ।
एष ते कथितः पार्थ नारायणजयो मृधे ॥ १३६ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—‘पार्थ! इस प्रकार अपने-अपने शरीरमें एक दूसरेके द्वारा किये हुए ऐसे लक्षण (चिह्न) उत्पन्न करके वे दोनों ऋषि रुद्रदेवके साथ अनुपम मैत्री स्थापित कर देवताओंको विदा करनेके पश्चात् शान्तचित्त हो पूर्ववत् तपस्या करने लगे। इस प्रकार मैंने तुम्हें युद्धमें नारायणकी विजयका वृत्तान्त बताया है ॥ १३५-१३६ ॥
नामानि चैव गुह्यानि निरुक्तानि च भारत ।
ऋषिभिः कथितानीह यानि संकीर्तितानि ते ॥ १३७ ॥
भारत! मेरे जो गोपनीय नाम हैं, उनकी व्युत्पत्ति मैंने बतायी है। ऋषियोंने मेरे जो नाम निश्चित किये हैं, उनका भी मैंने तुमसे वर्णन किया है ॥ १३७ ॥
एवं बहुविधे रूपैश्चरामीह वसुन्धराम् ।
ब्रह्मलोकं च कौन्तेय गोलोकं च सनातनम् ॥ १३८ ॥
कुन्तीनन्दन! इस प्रकार अनेक तरहके रूप धारण करके मैं इस पृथ्वीपर विचरता हूँ, ब्रह्मलोकमें रहता हूँ और सनातन गोलोकमें विहार करता हूँ ॥ १३८ ॥
मया त्वं रक्षितो युद्धे महान्तं प्राप्तवाञ्जयम् ।
यस्तु ते सोऽग्रतो याति युद्धे सम्प्रत्युपस्थिते ॥ १३९ ॥
तं विद्धि रुद्रं कौन्तेय देवदेवं कपर्दिनम् ।
कालः स एव कथितः क्रोधजेति मया तव ॥ १४० ॥
मुझसे सुरक्षित होकर तुमने महाभारत युद्धमें महान् विजय प्राप्त की है। कुन्तीनन्दन! युद्ध उपस्थित होनेपर जो पुरुष तुम्हारे आगे-आगे चलते थे, उन्हें तुम जटाजूटधारी देवाधिदेव रुद्र समझो। उन्हींको मैंने तुमसे क्रोधद्वारा उत्पन्न बताया है। वे ही काल कहे गये हैं ॥
निहतास्तेन वै पूर्वं हतवानसि यान् रिपून् ।
अप्रमेयप्रभावं तं देवदेवमुमापतिम् ।
नमस्व देवं प्रयतो विश्वेशं हरमक्षयम् ॥ १४१ ॥
तुमने जिन शत्रुओंको मारा है, वे पहले ही रुद्रदेवके हाथसे मार दिये गये थे। उनका प्रभाव अप्रमेय है। तुम उन देवाधिदेव, उमावल्लभ विश्वनाथ, पापहारी एवं अविनाशी महादेवजीको संयतचित्त होकर नमस्कार करो ॥
यश्च ते कथितः पूर्वं क्रोधजेति पुनः पुनः ।
तस्य प्रभाव एवाग्रे यच्छ्रुतं ते धनंजय ॥ १४२ ॥
धनंजय! जिन्हें क्रोधज बताकर मैंने तुमसे बारंबार उनका परिचय दिया है और पहले तुमने जो कुछ सुन रक्खा है, वह सब उन रुद्रदेवका ही प्रभाव है ॥ १४२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं)
* सूर्य और चन्द्रमा ही अग्नि एवं सोम हैं। वे जगत्को हर्ष प्रदान करनेके कारण ‘हृषी’ कहलाते हैं। वे ही भगवान्के केश अर्थात् किरणें हैं, इसलिये भगवान्का नाम ‘हृषीकेश’ है।
* ‘कृष्ण’ नामकी दूसरी व्युत्पत्ति भी इस प्रकार है—कृष् नाम है सत्का और ण कहते हैं आनन्दको। इन दोनोंसे उपलक्षित सच्चिदानन्दघन श्यामसुन्दर गोलोकविहारी नन्दनन्दन श्रीकृष्ण कहलाते हैं।
* वेदमन्त्रके दो-दो पदका उच्चारण करके पहले-पहलेको छोड़ते जाना और उत्तरोत्तर पदको मिलाकर दो-दो पदोंका एक साथ पाठ करते रहना क्रमविभाग कहलाता है। जैसे—‘अग्निमीले पुरोहितम्’ इस मन्त्रका क्रमपाठ इस प्रकार है—‘अग्नि मीले ईले पुरोहितं पुरोहितं यज्ञस्य’ इत्यादि। अक्षरविभागका अर्थ है पदविभाग—एक-एक पदको अलग-अलग करके पढ़ना। यथा ‘अग्निम् ईले पुरोहितम्’ इत्यादि।
जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना
त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना
शौनक उवाच
सौते सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् ।
यच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे विस्मयं परमं गताः ॥ १ ॥
शौनकनै कहा—सूतनन्दन! आपने यह बहुत बड़ा आख्यान सुनाया है। इसे सुनकर समस्त ऋषियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ है ॥ १ ॥
सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् ।
न तथा फलदं सौते नारायणकथा यथा ॥ २ ॥
सूतकुमार! सम्पूर्ण ऋषि-आश्रमोंकी यात्रा करना और समस्त तीर्थोंमें स्नान करना भी वैसा फलदायक नहीं है, जैसी कि भगवान् नारायणकी कथा है ॥ २ ॥
पाविताङ्गाः स्म संवृत्ताः श्रुत्वेमामादितः कथाम् ।
नारायणाश्रयां पुण्यां सर्वपापप्रमोचनीम् ॥ ३ ॥
समस्त पापोंसे छुड़ानेवाली नारायणसम्बन्धिनी इस पुण्यमयी कथाको आरम्भसे ही सुनकर हमारे तन-मन पवित्र हो गये ॥ ३ ॥
दुर्दर्शो भगवान् देवः सर्वलोकनमस्कृतः ।
सब्रह्मकैः सुरैः कृत्स्नैरन्यैश्चैव महर्षिभिः ॥ ४ ॥
सर्वलोकवन्दित भगवान् नारायणदेवका दर्शन तो ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवताओं तथा अन्यान्य महर्षियोंके लिये भी दुर्लभ है ॥ ४ ॥
दृष्टवान् नारदो यत्तु देवं नारायणं हरिम् ।
नूनमेतद्ध्यनुमतं तस्य देवस्य सूतज ॥ ५ ॥
सूतनन्दन! नारदजीने जो देवदेव नारायण हरिका दर्शन कर लिया, यह निश्चय ही उन भगवान्की अनुमतिसे ही सम्भव हुआ ॥ ५ ॥
यद् दृष्टवान् जगन्नाथमनिरुद्धतनौ स्थितम् ।
यत् प्राद्रवत् पुनर्भूयो नारदो देवसत्तमौ ॥ ६ ॥
नरनारायणौ द्रष्टुं कारणं तद् ब्रवीहि मे ।
नारदजीने जो अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित हुए जगन्नाथ श्रीहरिका दर्शन किया और पुनः जो वे वहाँसे देवश्रेष्ठ नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये उनके पास दौड़े गये, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥ ६ १/२ ॥
सौतिरुवाच
तस्मिन् यज्ञे वर्तमाने राज्ञः पारिक्षितस्य वै ॥ ७ ॥ कर्मान्तरेषु विधिवद् वर्तमानेषु शौनक । कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषिं वेदनिधिं प्रभुम् ॥ ८ ॥ परिपप्रच्छ राजेन्द्रः पितामहपितामहम् । **सूतपुत्रने कहा—**शौनक! राजा जनमेजयका वह यज्ञ विधिपूर्वक चल रहा था। उसमें विभिन्न कर्मोंके बीचमें अवकाश मिलनेपर राजेन्द्र जनमेजयने अपने पितामहोंके पितामह वेदनिधि भगवान् कृष्णद्वैपायन महर्षि व्याससे इस प्रकार पूछा ॥ ७-८ १/२ ॥
जनमेजय उवाच
श्वेतद्वीपान्निवृत्तेन नारदेन सुरर्षिणा ॥ ९ ॥ ध्यायता भगद्वाक्यं चेष्टितं किमतः परम् । **जनमेजय बोले—**भगवन्! भगवान् नारायणके कथनपर विचार करते हुए देवर्षि नारद जब श्वेतद्वीपसे लौट आये, तब उसके बाद उन्होंने क्या किया? ॥ ९ १/२ ॥
बदर्याश्रममागम्य समागम्य च तावृषी ॥ १० ॥ कियन्तं कालमवसत् कां कथां पृष्टवांश्च सः । बदरिकाश्रममें आकर उन दोनों ऋषियोंसे मिलनेके पश्चात् नारदजीने वहाँ कितने समयतक निवास किया और उन दोनोंसे कौन-सी कथा पूछी? ॥ १० १/२ ॥
इदं शतसहस्राद्धि भारताख्यानविस्तरात् ॥ ११ ॥ आमन्थ्य मतिमन्थेन ज्ञानोदधिमनुत्तमम् । एक लाख श्लोकोंसे युक्त विस्तृत महाभारत इतिहाससे निकालकर जो आपने यह सारभूत कथा सुनायी है, यह बुद्धिरूपी मथानीके द्वारा ज्ञानके उत्तम समुद्रको मथकर निकाले गये अमृतके समान है ॥ ११ १/२ ॥
नवनीतं यथा दध्नो मलयाच्चन्दनं यथा ॥ १२ ॥ आरण्यकं च वेदेभ्य ओषधिभ्योऽमृतं यथा । समुद्धृतमिदं ब्रह्मन् कथामृतमिदं तथा ॥ १३ ॥ ब्रह्मन्! जैसे दहीसे मक्खन, मलयपर्वतसे चन्दन, वेदोंसे आरण्यक और ओषधियोंसे अमृत निकाला गया है, उसी प्रकार आपने यह कथारूपी अमृत निकालकर रखा है ॥ १२-१३ ॥
तपोनिधे त्वयोक्तं हि नारायणकथाश्रयम् ।
स ईशो भगवान् देवः सर्वभूतात्मभावनः ॥ १४ ॥ तपोनिधे! आपने भगवान् नारायणकी कथासे सम्बन्ध रखनेवाली जो बातें कही हैं, वे सब इस ग्रन्थकी सारभूत हैं। सबके ईश्वर भगवान् नारायणदेव सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाले हैं ॥ १४ ॥ अहो नारायणं तेजो दुर्दर्शं द्विजसत्तम । यत्राविशन्ति कल्पान्ते सर्वे ब्रह्मादयः सुराः ॥ १५ ॥ ऋषयश्च सगन्धर्वा यच्च किंचिच्चराचरम् । न ततोऽस्ति परं मन्ये पावनं दिवि चेह च ॥ १६ ॥ द्विजश्रेष्ठ! उन भगवान् नारायणका तेज अद्भुत है। मनुष्यके लिये उसकी ओर देखना भी कठिन है। कल्पके अन्तमें जिनके भीतर ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता, ऋषि, गन्धर्व तथा जो कुछ भी चराचर जगत् है, वह सब विलीन हो जाता है, उनसे बढ़कर परम पावन एवं महान् इस भूतल और स्वर्गलोकमें मैं दूसरे किसीको नहीं मानता ॥ १५-१६ ॥ सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् । न तथा फलदं चापि नारायणकथा यथा ॥ १७ ॥ सम्पूर्ण ऋषि-आश्रमोंकी यात्रा करना और समस्त तीर्थोंमें स्नान करना भी वैसा फल देनेवाला नहीं है, जैसा कि भगवान् नारायणकी कथा प्रदान करती है ॥ १७ ॥ सर्वथा पाविताः स्मेह श्रुत्वेमामादितः कथाम् । हरेर्विश्वेश्वरस्येह सर्वपापप्रणाशनीम् ॥ १८ ॥ सम्पूर्ण विश्वके स्वामी श्रीहरिकी कथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। उसे आरम्भसे ही सुनकर हम सब लोग यहाँ सर्वथा पवित्र हो गये हैं ॥ १८ ॥ न चित्रं कृतवांस्तत्र यदार्यो मे धनंजयः । वासुदेवसहायो यः प्राप्तवाञ्जयमुत्तमम् ॥ १९ ॥ मेरे पितामह अर्जुनने जो भगवान् वासुदेवकी सहायता पाकर उत्तम विजय प्राप्त कर ली, वह वहाँ उन्होंने कोई अद्भुत कार्य नहीं किया है ॥ १९ ॥ न चास्य किंचिदप्राप्यं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु । त्रैलोक्यनाथो विष्णुः स यथाऽऽसीत् साह्यकृत् स वै ॥ २० ॥ त्रिलोकीनाथ भगवान् कृष्ण ही जब उनके सहायक थे, तब उनके लिये तीनों लोकोंमें किसी वस्तुकी प्राप्ति असम्भव रही हो, यह मैं नहीं मानता ॥ धन्याश्च सर्व एवासन् ब्रह्मंस्ते मम पूर्वजाः । हिताय श्रेयसे चैव येषामासीज्जनार्दनः ॥ २१ ॥ ब्रह्मन्! मेरे सभी पूर्वज धन्य थे, जिनका हित और कल्याण करनेके लिये साक्षात् जनार्दन तैयार रहते थे ॥ तपसाथ सुदृश्यो हि भगवान् लोकपूजितः ।
यं दृष्टवन्तस्ते साक्षाच्छ्रीवत्साङ्कविभूषणम् ।। २२ ।। लोकपूजित भगवान् नारायणका दर्शन तो तपस्यासे ही हो सकता है; किंतु मेरे पितामहोंने श्रीवत्सके चिह्नसे विभूषित उन भगवान्का साक्षात् दर्शन अनायास ही पा लिया था ।। २२ ।।
तेभ्यो धन्यतरश्चैव नारदः परमेष्ठिजः । न चाल्पतेजसमृषिं वेद्मि नारदमव्ययम् ।। २३ ।। श्वेतद्वीपं समासाद्य येन दृष्टः स्वयं हरिः । देवप्रसादानुगतं व्यक्तं तत् तस्य दर्शनम् ।। २४ ।। उन सबसे भी अधिक धन्यवादके योग्य ब्रह्मपुत्र नारदजी हैं। मैं अविनाशी नारदजीको कम तेजस्वी ऋषि नहीं समझता, जिन्होंने श्वेतद्वीपमें पहुँचकर साक्षात् श्रीहरिका दर्शन प्राप्त कर लिया। उनका वह भगवद्-दर्शन स्पष्ट ही उन भगवान्की कृपाका फल है ।।
तद् दृष्टवांस्तदा देवमनिरुद्धतनौ स्थितम् । बदरीमाश्रमं यत् तु नारदः प्राद्रवत् पुनः ।। २५ ।। नरनारायणौ द्रष्टुं किं तु तत् कारणं मुने । मुने! नारदजीने उस समय श्वेतद्वीपमें जाकर जो अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित नारायणदेवका साक्षात्कार किया तथा पुनः नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये जो बदरिकाश्रमको प्रस्थान किया, इसका क्या कारण है? ।। २५ १/२ ।।
श्वेतद्वीपान्निवृत्तश्च नारदः परमेष्ठिजः ।। २६ ।। बदरीमाश्रमं प्राप्य समागम्य च तावृषी । कियन्तं कालमवसत् प्रश्नान् कान् पृष्टवांश्च ह ।। २७ ।। ब्रह्मपुत्र नारदजी श्वेतद्वीपसे लौटनेपर जब बदरिकाश्रममें पहुँचकर उन दोनों ऋषियोंसे मिले, तब वहाँ उन्होंने कितने समयतक निवास किया? और वहाँ उनसे किन-किन प्रश्नोंको पूछा? ।। २६-२७ ।।
श्वेतद्वीपादुपावृत्ते तस्मिन् वा सुमहात्मनि । किमब्रूतां महात्मानौ नरनारायणावृषी ।। २८ ।। तदेतन्मे यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमर्हसि । श्वेतद्वीपसे लौटे हुए उन नारदजीसे महात्मा नर-नारायण ऋषियोंने क्या बात की थी? ये सब बातें आप यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें ।। २८ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे ।। २९ ।। यस्य प्रसादाद् वक्ष्यामि नारायणकथामिमाम् ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**अमिततेजस्वी भगवान् व्यासको नमस्कार है, जिनके कृपाप्रसादसे मैं भगवान् नारायणकी यह कथा कह रहा हूँ॥ २९ १/२ ॥ प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम्॥ ३०॥ निवृत्तो नारदो राजंस्तरसा मेरुमागमत्। हृदयेनोद्वहन् भारं यदुक्तं परमात्मना ॥ ३१ ॥ राजन्! श्वेतनामक महाद्वीपमें जाकर वहाँ अविनाशी श्रीहरिका दर्शन करके जब नारदजी लौटे, तब बड़े वेगसे मेरुपर्वतपर आ पहुँचे। परमात्मा श्रीहरिने उनसे जो कुछ कहा था, उस कार्यभारको वे हृदयसे ढो रहे थे ॥ ३०-३१ ॥ पश्चादस्याभवद् राजन्नात्मनः साध्वसं महत्। यद् गत्वा दूरमध्वानं क्षेमी पुनरिहागतः ॥ ३२ ॥ नरेश्वर! तत्पश्चात् उनके मनमें यह सोचकर बड़ा भारी विस्मय हुआ कि मैं इतनी दूरका मार्ग तय करके पुनः यहाँ सकुशल कैसे लौट आया? ॥ ३२ ॥ मेरोः प्रचक्राम ततः पर्वतं गन्धमादनम्। निपपात च खात् तूर्णं विशालां बदरीमनु ॥ ३३ ॥ तदनन्तर वे मेरुसे गन्धमादन पर्वतकी ओर चले और बदरीविशालतीर्थके समीप तुरंत ही आकाशसे नीचे उतर पड़े ॥ ३३ ॥ ततः स ददृशे देवौ पुराणावृषिसत्तमौ। तपश्चरन्तौ सुमहदात्मनिष्ठौ महाव्रतौ ॥ ३४ ॥ वहाँ उन्होंने उन दोनों पुरातन देवता ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायणका दर्शन किया, जो आत्मनिष्ठ हो महान् व्रत लेकर बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे ॥ ३४ ॥ तेजसाभ्यधिकौ सूर्यात् सर्वलोकविरोचनात्। श्रीवत्सलक्षणौ पूज्यौ जटामण्डलधारिणौ ॥ ३५ ॥ वे दोनों सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करनेवाले सूर्यसे भी अधिक तेजस्वी थे। उन पूज्य महात्माओंके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सके चिह्न सुशोभित हो रहे थे और वे अपने मस्तकपर जटामण्डल धारण किये हुए थे ॥ जालपादभुजौ तौ तु पादयोश्चक्रलक्षणौ। व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ तथा मुष्कचतुष्किणौ ॥ ३६ ॥ षष्टिदन्तावष्टदंष्ट्रौ मेघौघसदृशस्वनौ। स्वाक्यौ पृथुललाटौ च सुभ्रू सुहनुनासिकौ ॥ ३७ ॥ उनके हाथोंमें हंसका और चरणोंमें चक्रका चिह्न था। विशाल वक्षःस्थल, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, अण्डकोशमें चार-चार बीज, मुखमें साठ दाँत और आठ दाढ़ें, मेघके समान गम्भीर स्वर, सुन्दर मुख, चौड़े ललाट, बाँकी भौंहें, सुन्दर ठोढ़ी और मनोहर नासिकासे उन दोनोंकी अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ ३६-३७ ॥
आतपत्रेण सदृशे शिरसी देवयोस्तयोः । एवं लक्षणसम्पन्नौ महापुरुषसंज्ञितौ ॥ ३८ ॥ तौ दृष्ट्वा नारदो हृष्टस्ताभ्यां च प्रतिपूजितः । स्वागतेनाभिभाष्याथ पृष्टश्चानामयं तथा ॥ ३९ ॥ उन दोनों देवताओंके मस्तक छत्रके समान प्रतीत होते थे। ऐसे शुभलक्षणोंसे सम्पन्न उन दोनों महापुरुषोंका दर्शन करके नारदजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। भगवान् नर और नारायणने भी नारदजीका स्वागत-सत्कार करके उनका कुशल-समाचार पूछा ॥ ३८-३९ ॥ बभूवान्तर्गतमतिर्निरीक्ष्य पुरुषोत्तमौ । सदोगतास्तत्र ये वै सर्वभूतनमस्कृताः ॥ ४० ॥ श्वेतद्वीपे मया दृष्टास्तादृशावृषिसत्तमौ । तदनन्तर नारदजीने उन दोनों पुरुषोत्तमोंकी ओर देखकर मन-ही-मन विचार किया, अहो! मैंने श्वेतद्वीपमें भगवान्की सभाके भीतर जिन सर्वभूतवन्दित सदस्योंको देखा था, ये दोनों ऋषिश्रेष्ठ भी वैसे ही हैं ॥ इति संचिन्त्य मनसा कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ॥ ४१ ॥ स चोपविविशे तत्र पीठे कुशमये शुभे । मन-ही-मन ऐसा सोचकर वे उन दोनोंकी प्रदक्षिणा करके एक सुन्दर कुशासनपर बैठ गये ॥ ४१ १/२ ॥ ततस्तौ तपसां वासौ यशसां तेजसामपि ॥ ४२ ॥ ऋषी शमदमोपेतौ कृत्वा पौर्वाह्लिकं विधिम् । पश्चान्नारदमव्यग्रौ पाद्यार्घ्याभ्यामथार्चतः ॥ ४३ ॥ तदनन्तर तपस्या, यश और तेजके भी निवासस्थान वे शम-दमसम्पन्न दोनों ऋषि पूर्वाह्नकालका नित्य कर्म पूर्ण करके फिर शान्त-भावसे पाद्य और अर्घ्य आदि निवेदन करके नारदजीकी पूजा करने लगे ॥ ४२-४३ ॥ पीठयोश्चोपविष्टौ तौ कृतातिथ्याह्निकौ नृप । तेषु तत्रोपविष्टेषु स देशोऽभिव्यराजत ॥ ४४ ॥ आज्याहुतिमहाज्वालैर्यज्ञवाटो यथाग्निभिः । नरेश्वर! अपने नित्यकर्म तथा नारदजीका आतिथ्य-सत्कार करके वे दोनों ऋषि भी कुशासनपर बैठ गये। वहाँ उन तीनोंके बैठ जानेपर वह प्रदेश घीकी आहुतिसे प्रज्वलित विशाल लपटोंवाले तीन अग्नियोंसे प्रकाशित यज्ञमण्डपकी भाँति सुशोभित होने लगा ॥ ४४ १/२ ॥ अथ नारायणस्तत्र नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ ४५ ॥ सुखोपविष्टं विश्रान्तं कृतातिथ्यं सुखस्थितम् ।