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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

युधिष्ठिराय प्रोवाच जामदग्न्यस्य विक्रमम् ।। ७ ।। रास्तेमें चलते-चलते ही महाबाहु भगवान् यादवनन्दन श्रीकृष्ण युधिष्ठिरको जमदग्निकुमार परशुरामजीका पराक्रम सुनाने लगे— ।। ७ ।।

अमी रामह्रदाः पञ्च दृश्यन्ते पार्थ दूरतः । तेषु संतर्पयामास पितॄन् क्षत्रियशोणितैः ।। ८ ।। ‘कुन्तीनन्दन! ये जो पाँच सरोवर कुछ दूरसे दिखायी देते हैं, ‘राम-ह्रद’ के नामसे प्रसिद्ध हैं। इन्हींमें उन्होंने क्षत्रियोंके रक्तसे अपने पितरोंका तर्पण किया था ।। ८ ।।

त्रिःसप्तकृत्वो वसुधां कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः । इहेदानीं ततो रामः कर्मणो विरराम ह ।। ९ ।। ‘शक्तिशाली परशुरामजी इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य करके यहीं आनेके पश्चात् अब उस कर्मसे विरत हो गये हैं’ ।। ९ ।।

युधिष्ठिर उवाच

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा । रामेणेति तथाऽऽत्थ त्वमत्र मे संशयो महान् ।। १० ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**प्रभो! आपने यह बताया है कि पहले परशुरामजीने इक्कीस बार यह पृथ्वी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी थी, इस विषयमें मुझे बहुत बड़ा संदेह हो गया है ।। १० ।।

क्षत्रबीजं यथा दग्धं रामेण यदुपुङ्गव । कथं भूयः समुत्पत्तिः क्षत्रस्यामितविक्रम ।। ११ ।। अमित पराक्रमी यदुनाथ! जब परशुरामजीने क्षत्रियोंका बीजतक दग्ध कर दिया, तब फिर क्षत्रिय-जातिकी उत्पत्ति कैसे हुई? ।। ११ ।।

महात्मना भगवता रामेण यदुपुङ्गव । कथमुत्सादितं क्षत्रं कथं वृद्धिमुपागतम् ।। १२ ।। यदुपुङ्गव! महात्मा भगवान् परशुरामने क्षत्रियोंका संहार किसलिये किया और उसके बाद इस जातिकी वृद्धि कैसे हुई? ।। १२ ।।

महता रथयुद्धेन कोटिशः क्षत्रिया हताः । तथाभूच्च मही कीर्णा क्षत्रियैर्वदतां वर ।। १३ ।। वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! महारथयुद्धके द्वारा जब करोड़ों क्षत्रिय मारे गये होंगे, उस समय उनकी लाशोंसे यह सारी पृथ्वी ढक गयी होगी ।। १३ ।।

किमर्थं भार्गवेणेदं क्षत्रमुत्सादितं पुरा । रामेण यदुशार्दूल कुरुक्षेत्रे महात्मना ।। १४ ।। यदुसिंह! भृगुवंशी महात्मा परशुरामने पूर्वकालमें कुरुक्षेत्रमें यह क्षत्रियोंका संहार किसलिये किया? ।। १४ ।।

एतन्मे छिन्धि वार्ष्णेय संशयं तार्क्ष्यकेतन ।
आगमो हि परः कृष्ण त्वत्तो नो वासवानुज ॥ १५ ॥
गरुडध्वज श्रीकृष्ण! इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्र! आप मेरे संदेहका निवारण कीजिये; क्योंकि कोई भी शास्त्र आपसे बढ़कर नहीं है ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो यथावत् स गदाग्रजः प्रभुः
शशंस तस्मै निखिलेन तत्त्वतः ।
युधिष्ठिरायाप्रतिमौजसे तदा
यथाभवत् क्षत्रियसंकुला मही ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर गदाग्रज भगवान् श्रीकृष्णने अप्रतिम तेजस्वी युधिष्ठिरसे वह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे कह सुनाया कि किस प्रकार यह सारी पृथ्वी क्षत्रियोंकी लाशोंसे ढक गयी थी ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि
रामोपाख्यानेऽष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें परशुरामके
उपाख्यानका आरम्भविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुनः उत्पन्न होनेकी कथा

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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुनः उत्पन्न होनेकी कथा

वासुदेव उवाच

शृणु कौन्तेय रामस्य प्रभावो यो मया श्रुतः ।
महर्षीणां कथयतां विक्रमं तस्य जन्म च ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—कुन्तीनन्दन! मैंने महर्षियोंके मुखसे परशुरामजीके प्रभाव, पराक्रम तथा जन्मकी कथा जिस प्रकार सुनी है, वह सब आपको बताता हूँ, सुनिये ॥ १ ॥

यथा च जामदग्न्येन कोटिशः क्षत्रिया हताः ।
उद्भूता राजवंशेषु ये भूयो भारते हताः ॥ २ ॥
जिस प्रकार जगदग्निनन्दन परशुरामने करोड़ों क्षत्रियोंका संहार किया था, पुनः जो क्षत्रिय राजवंशोंमें उत्पन्न हुए, वे अब फिर भारतयुद्धमें मारे गये ॥ २ ॥

जह्रोरजस्तु तनयो बलाकाश्वस्तु तत्सुतः ।
कुशिको नाम धर्मज्ञस्तस्य पुत्रो महीपते ॥ ३ ॥
प्राचीनकालमें जह्नुनामक एक राजा हो गये हैं, उनके पुत्रका नाम था अज। पृथ्वीनाथ! अजसे बलाकाश्व नामक पुत्रका जन्म हुआ। बलाकाश्वके कुशिक नामक पुत्र हुआ। कुशिक बड़े धर्मज्ञ थे ॥ ३ ॥

अग्र्यं तपः समातिष्ठत् सहस्राक्षसमो भुवि ।
पुत्रं लभेयमजितं त्रिलोकेश्वरमित्युत ॥ ४ ॥
वे इस भूतलपर सहस्रनेत्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी थे। उन्होंने यह सोचकर कि मैं एक ऐसा पुत्र प्राप्त करूँ, जो तीनों लोकोंका शासक होनेके साथ ही किसीसे पराजित न हो, उत्तम तपस्या आरम्भ की ॥ ४ ॥

तमुग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरंदरः ।
समर्थं पुत्रजनने स्वयमेवान्वपद्यत ॥ ५ ॥
पुत्रत्वमगमद् राजंस्तस्य लोकेश्वरेश्वरः ।
गाधिर्नामाभवत् पुत्रः कौशिकः पाकशासनः ॥ ६ ॥
उनकी भयंकर तपस्या देखकर और उन्हें शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न करनेमें समर्थ जानकर लोकपालोंके स्वामी सहस्र नेत्रोंवाले पाकशासन इन्द्र स्वयं ही उनके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए। राजन्! कुशिकका वह पुत्र गाधिनामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ५-६ ॥

तस्य कन्याभवद् राजन् नाम्ना सत्यवती प्रभो ।
तां गाधिर्भृगुपुत्राय सर्चीकाय ददौ प्रभुः ॥ ७ ॥
प्रभो! गाधिके एक कन्या थी, जिसका नाम था सत्यवती। राजा गाधिने अपनी इस कन्याका विवाह भृगुपुत्र ऋचीकके साथ कर दिया ॥ ७ ॥
तस्याः प्रीतः स शौचेन भार्गवः कुरुनन्दन ।
पुत्रार्थं श्रपयामास चरुं गाधेस्तथैव च ॥ ८ ॥
कुरुनन्दन! सत्यवती बड़े शुद्ध आचार-विचारसे रहती थी। उसकी शुद्धतासे प्रसन्न हो ऋचीक मुनिने उसे तथा राजा गाधिको भी पुत्र देनेके लिये चरु तैयार किया ॥
आहूयोवाच तां भार्यां सर्चीको भार्गवस्तदा ।
उपयोज्यश्चरुरयं त्वया मात्राप्ययं तव ॥ ९ ॥
भृगुवंशी ऋचीकने उस समय अपनी पत्नी सत्यवतीको बुलाकर कहा—'यह चरु तो तुम खा लेना और यह दूसरा अपनी माँको खिला देना ॥ ९ ॥
तस्या जनिष्यते पुत्रो दीप्तिमान् क्षत्रियर्षभः ।
अजय्यः क्षत्रियैर्लोके क्षत्रियर्षभसूदनः ॥ १० ॥
'तुम्हारी माताके जो पुत्र होगा, वह अत्यन्त तेजस्वी एवं क्षत्रियशिरोमणि होगा। इस जगत्के क्षत्रिय उसे जीत नहीं सकेंगे। वह बड़े-बड़े क्षत्रियोंका संहार करनेवाला होगा ॥ १० ॥
तवापि पुत्रं कल्याणि धृतिमन्तं शमात्मकम् ।
तपोऽन्वितं द्विजश्रेष्ठं चरुरेष विधास्यति ॥ ११ ॥
'कल्याणि! तुम्हारे लिये जो यह चरु तैयार किया है, यह तुम्हे धैर्यवान्, शान्त एवं तपस्यापरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण पुत्र प्रदान करेगा' ॥ ११ ॥
इत्येवमुक्त्वा तां भार्यां सर्चीको भृगुनन्दनः ।
तपस्यभिरतः श्रीमाञ्जगामारण्यमेव हि ॥ १२ ॥
अपनी पत्नीसे ऐसा कहकर भृगुनन्दन श्रीमान् ऋचीक मुनि तपस्यामें तत्पर हो जंगलमें चले गये ॥ १२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु तीर्थयात्रापरो नृपः ।
गाधिः सदारः सम्प्राप्तः सर्चीकस्याश्रमं प्रति ॥ १३ ॥
इसी समय तीर्थयात्रा करते हुए राजा गाधि अपनी पत्नीके साथ ऋचीक मुनिके आश्रमपर आये ॥ १३ ॥
चरुद्वयं गृहीत्वा च राजन् सत्यवती तदा ।
भर्तुर्वाक्यं तदाव्यग्रा मात्रे हृष्टा न्यवेदयत् ॥ १४ ॥
राजन्! उस समय सत्यवती वह दोनों चरु लेकर शान्तभावसे माताके पास गयी और बड़े हर्षके साथ पतिकी कही हुई बातको उससे निवेदित किया ॥ १४ ॥

माता तु तस्याः कौन्तेय दुहित्रे स्वं चरुं ददौ ।
तस्याश्चरुमथाज्ञानादात्मसंस्थं चकार ह ॥ १५ ॥
कुन्तीकुमार! सत्यवतीकी माताने अज्ञानवश अपना चरु तो पुत्रीको दे दिया और उसका चरु लेकर भोजनद्वारा अपनेमें स्थित कर लिया ॥ १५ ॥
अथ सत्यवती गर्भं क्षत्रियान्तकरं तदा ।
धारयामास दीप्तेन वपुषा घोरदर्शनम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर सत्यवतीने अपने तेजस्वी शरीरसे एक ऐसा गर्भ धारण किया, जो क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला था और देखनेमें बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ १६ ॥
तामृचीकस्तदा दृष्ट्वा तस्या गर्भगतं द्विजम् ।
अब्रवीद् भृगुशार्दूलः स्वां भार्यां देवरूपिणीम् ॥ १७ ॥
मात्रासि व्यंसिता भद्रे चरुव्यत्यासहेतुना ।
भविष्यति हि ते पुत्रः क्रूरकर्मात्यमर्षणः ॥ १८ ॥
सत्यवतीके गर्भगत बालकको देखकर भृगुश्रेष्ठ ऋचीकने अपनी उस देवरूपिणी पत्नीसे कहा—'भद्रे! तुम्हारी माताने चरु बदलकर तुम्हें ठग लिया। तुम्हारा पुत्र अत्यन्त क्रोधी और क्रूरकर्म करनेवाला होगा ॥
उत्पत्स्यति च ते भ्राता ब्रह्मभूतस्तपोरतः ।
विश्वं हि ब्रह्म सुमहच्चरौ तव समाहितम् ॥ १९ ॥
क्षत्रवीर्यं च सकलं तव मात्रे समर्पितम् ।
विपर्ययेण ते भद्रे नैतदेवं भविष्यति ॥ २० ॥
मातुस्ते ब्राह्मणो भूयात् तव च क्षत्रियः सुतः ।
'परंतु तुम्हारा भाई ब्राह्मणस्वरूप एवं तपस्यापरायण होगा। तुम्हारे चरुमें मैंने सम्पूर्ण महान् तेज ब्रह्मकी प्रतिष्ठा की थी और तुम्हारी माताके लिये जो चरु था, उसमें सम्पूर्ण क्षत्रियोचित बल-पराक्रमका समावेश किया गया था, परंतु कल्याणि! चरुके बदल देनेसे अब ऐसा नहीं होगा। तुम्हारी माताका पुत्र तो ब्राह्मण होगा और तुम्हारा क्षत्रिय' ॥ १९-२० १/२ ॥
सैवमुक्ता महाभागा भर्त्रा सत्यवती तदा ॥ २१ ॥
पपात शिरसा तस्मै वेपन्ती चाब्रवीदिदम् ।
नार्होऽसि भगवन्नद्य वक्तुमेवंविधं वचः ।
ब्राह्मणापसदं पुत्रं प्राप्स्यसीति हि मां प्रभो ॥ २२ ॥
पतिके ऐसा कहनेपर महाभागा सत्यवती उनके चरणोंमें सिर रखकर गिर पड़ी और काँपती हुई बोली—'प्रभो! भगवन्! आज आप मुझसे ऐसी बात न कहें कि तुम ब्राह्मणाधम पुत्र उत्पन्न करोगी' ॥ २१-२२ ॥

ऋचीक उवाच नैष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथा त्वयि । उग्रकर्मा समुत्पन्नश्चरुव्यत्यासहेतुना ॥ २३ ॥ **ऋचीक बोले—**कल्याणि! मैंने यह संकल्प नहीं किया था कि तुम्हारे गर्भसे ऐसा पुत्र उत्पन्न हो। परंतु चरु बदल जानेके कारण तुम्हें भयंकर कर्म करनेवाले पुत्रको जन्म देना पड़ रहा है ॥ २३ ॥

सत्यवत्युवाच इच्छँल्लोँकानपि मुने सृजेथाः किं पुनः सुतम् । शमात्मकमृजुं पुत्रं दातुमर्हसि मे प्रभो ॥ २४ ॥ **सत्यवती बोली—**मुने! आप चाहें तो सम्पूर्ण लोकोंकी नयी सृष्टि कर सकते हैं; फिर इच्छानुसार पुत्र उत्पन्न करनेकी तो बात ही क्या है? अतः प्रभो! मुझे तो शान्त एवं सरल स्वभाववाला पुत्र ही प्रदान कीजिये ॥ २४ ॥

ऋचीक उवाच नोक्तपूर्वानृतं भद्रे स्वैरेष्वपि कदाचन । किमुताग्निं समाधाय मन्त्रवच्चरुसाधने ॥ २५ ॥ **ऋचीक बोले—**भद्रे! मैंने कभी हास-परिहासमें भी झूठी बात नहीं कही है; फिर अग्निकी स्थापना करके मन्त्रयुक्त चरु तैयार करते समय मैंने जो संकल्प किया है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है? ॥ २५ ॥ दृष्टमेतत् पुरा भद्रे ज्ञातं च तपसा मया । ब्रह्मभूतं हि सकलं पितुस्तव कुलं भवेत् ॥ २६ ॥ कल्याणि! मैंने तपस्याद्वारा पहले ही यह बात देख और जान ली है कि तुम्हारे पिताका समस्त कुल ब्राह्मण होगा ॥ २६ ॥

सत्यवत्युवाच काममेवं भवेत् पौत्रो ममेह तव च प्रभो । शमात्मकमहं पुत्रं लभेयं जपतां वर ॥ २७ ॥ **सत्यवती बोली—**प्रभो! आप जप करनेवाले ब्राह्मणोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, आपका और मेरा पौत्र भले ही उग्र स्वभावका हो जाय; परंतु पुत्र तो मुझे शान्तस्वभावका ही मिलना चाहिये ॥ २७ ॥

ऋचीक उवाच पुत्रे नास्ति विशेषो मे पौत्रे च वरवर्णिनि । यथा त्वयोक्तं वचनं तथा भद्रे भविष्यति ॥ २८ ॥

**ऋचीक बोले—**सुन्दरी! मेरे लिये पुत्र और पौत्रमें कोई अन्तर नहीं है। भद्रे! तुमने जैसा कहा है, वैसा ही होगा ॥ २८ ॥

वासुदेव उवाच

ततः सत्यवती पुत्रं जनयामास भार्गवम् ।
तपस्यभिरतं शान्तं जमदग्निं यतव्रतम् ॥ २९ ॥
**श्रीकृष्ण बोले—**राजन्! तदनन्तर सत्यवतीने शान्त, संयमपरायण और तपस्वी भृगुवंशी जमदग्निको पुत्रके रूपमें उत्पन्न किया ॥ २९ ॥
विश्वामित्रं च दायादं गाधिः कुशिकनन्दनः ।
यः प्राप ब्रह्मसमितं विश्वैर्ब्रह्मगुणैर्युतम् ॥ ३० ॥
कुशिकनन्दन गाधिने विश्वामित्र नामक पुत्र प्राप्त किया, जो सम्पूर्ण ब्राह्मणोचित गुणोंसे सम्पन्न थे और ब्रह्मर्षि पदवीको प्राप्त हुए ॥ ३० ॥
ऋचीको जनयामास जमदग्निं तपोनिधिम् ।
सोऽपि पुत्रं ह्यजनयज्जमदग्निः सुदारुणम् ॥ ३१ ॥
सर्वविद्यान्तगं श्रेष्ठं धनुर्वेदस्य पारगम् ।
रामं क्षत्रियहन्तारं प्रदीप्तमिव पावकम् ॥ ३२ ॥
ऋचीकने तपस्याके भंडार जमदग्निको जन्म दिया और जमदग्निने अत्यन्त उग्र स्वभाववाले जिस पुत्रको उत्पन्न किया, वही ये सम्पूर्ण विद्याओं तथा धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी क्षत्रियहन्ता परशुरामजी हैं ॥ ३१-३२ ॥
तोषयित्वा महादेवं पर्वते गन्धमादने ।
अस्त्राणि वरयामास परशुं चातितेजसम् ॥ ३३ ॥
परशुरामजीने गन्धमादन पर्वतपर महादेवजीको संतुष्ट करके उनसे अनेक प्रकारके अस्त्र और अत्यन्त तेजस्वी कुठार प्राप्त किये ॥ ३३ ॥
स तेनाकुण्ठधारेण ज्वलितानलवर्चसा ।
कुठारेणाप्रमेयेण लोकेष्वप्रतिमोऽभवत् ॥ ३४ ॥
उस कुठारकी धार कभी कुण्ठित नहीं होती थी। वह जलती हुई आगके समान उद्दीप्त दिखायी देता था। उस अप्रमेय शक्तिशाली कुठारके कारण परशुरामजी सम्पूर्ण लोकोंमें अप्रतिम वीर हो गये ॥ ३४ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु कृतवीर्यात्मजो बली ।
अर्जुनो नाम तेजस्वी क्षत्रियो हैहयाधिपः ॥ ३५ ॥
इसी समय राजा कृतवीर्यका बलवान् पुत्र अर्जुन हैहयवंशका राजा हुआ, जो एक तेजस्वी क्षत्रिय था ॥ ३५ ॥
दत्तात्रेयप्रसादेन राजा बाहुसहस्रवान् ।

चक्रवर्ती महातेजा विप्राणामाश्वमेधिके ॥ ३६ ॥ ददौ स पृथिवीं सर्वां सप्तद्वीपां सपर्वताम् । स्वबाहुस्वबलेनाजौ जित्वा परमधर्मवित् ॥ ३७ ॥ दत्तात्रेयजीकी कृपासे राजा अर्जुनने एक हजार भुजाएँ प्राप्त की थीं। वह महातेजस्वी चक्रवर्ती नरेश था। उस परम धर्मज्ञ नरेशने अपने बाहुबलसे पर्वतों और द्वीपोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीको युद्धमें जीतकर अश्वमेध यज्ञमें ब्राह्मणोंको दान कर दिया था ॥ ३६-३७ ॥

तृषितेन च कौन्तेय भिक्षितश्चित्रभानुना । सहस्रबाहुर्विक्रान्तः प्रादाद् भिक्षामथाग्नये ॥ ३८ ॥ कुन्तीनन्दन! एक समय भूखे-प्यासे हुए अग्निदेवने पराक्रमी सहस्रबाहु अर्जुनसे भिक्षा माँगी और अर्जुनने अग्निको वह भिक्षा दे दी ॥ ३८ ॥

ग्रामान् पुराणि राष्ट्राणि घोषांश्चैव तु वीर्यवान् । जज्वाल तस्य बाणाग्राच्चित्रभानुर्दिधक्षया ॥ ३९ ॥ तत्पश्चात् बलशाली अग्निदेव कार्तवीर्य अर्जुनके बाणोंके अग्रभागसे गाँवों, गोष्ठों, नगरों और राष्ट्रोंको भस्म कर डालनेकी इच्छासे प्रज्वलित हो उठे ॥ ३९ ॥

स तस्य पुरुषेन्द्रस्य प्रभावेण महौजसः । ददाह कार्तवीर्यस्य शैलानथ वनस्पतीन् ॥ ४० ॥ उन्होंने उस महापराक्रमी नरेश कार्तवीर्यके प्रभावसे पर्वतों और वनस्पतियोंको जलाना आरम्भ किया ॥ ४० ॥

स शून्यमाश्रमं रम्यमापवस्य महात्मनः । ददाह पवनेनेद्धश्चित्रभानुः सहैहयः ॥ ४१ ॥ हवाका सहारा पाकर उत्तरोत्तर प्रज्वलित होते हुए अग्निदेवने हैहयराजको साथ लेकर महात्मा आपवके सूने एवं सुरम्य आश्रमको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ४१ ॥

आपवस्तु ततो रोषाच्छापार्जुनमच्युत । दग्धेऽश्रमे महाबाहो कार्तवीर्येण वीर्यवान् ॥ ४२ ॥ महाबाहु अच्युत! कार्तवीर्यके द्वारा अपने आश्रमके जला दिये जानेपर शक्तिशाली आपव मुनिको बड़ा रोष हुआ। उन्होंने कृतवीर्यपुत्र अर्जुनको शाप देते हुए कहा — ॥ ४२ ॥

त्वया न वर्जितं यस्मान्ममेदं हि महत् वनम् । दग्धं तस्माद् रणे रामो बाहूंस्ते छेत्स्यतेऽर्जुन ॥ ४३ ॥ 'अर्जुन! तुमने मेरे इस विशाल वनको भी जलाये बिना नहीं छोड़ा, इसलिये संग्राममें तुम्हारी इन भुजाओंको परशुरामजी काट डालेंगे' ॥ ४३ ॥

अर्जुनस्तु महातेजा बली नित्यं शमात्मकः । ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च दाता शूरश्च भारत ॥ ४४ ॥

भारत! अर्जुन महातेजस्वी, बलवान्, नित्य शान्ति-परायण, ब्राह्मण-भक्त शरणागतोंको शरण देनेवाला, दानी और शूरवीर था ॥ ४४ ॥
नाचिन्तयत् तदा शापं तेन दत्तं महात्मना ।
तस्य पुत्रास्तु बलिनः शापेनासन् पितुर्वधे ॥ ४५ ॥
अतः उसने उस समय उन महात्माके दिये हुए शापपर कोई ध्यान नहीं दिया। शापवश उसके बलवान् पुत्र ही पिताके वधमें कारण बन गये ॥ ४५ ॥
निमित्तादवलिप्ता वै नृशंसाश्चैव सर्वदा ।
जमदग्निधेन्वास्ते वत्समानिन्युर्भरतर्षभ ॥ ४६ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस शापके ही कारण सदा क्रूरकर्म करनेवाले वे घमंडी राजकुमार एक दिन जमदग्नि मुनिकी होमधेनुके बछड़ेको चुरा ले आये ॥ ४६ ॥
अज्ञातं कार्तवीर्येण हैहयेन्द्रेण धीमता ।
तन्निमित्तमभूद् युद्धं जामदग्नेर्महात्मनः ॥ ४७ ॥
उस बछड़ेके लाये जानेकी बात बुद्धिमान् हैहय-राज कार्तवीर्यको मालूम नहीं थी, तथापि उसीके लिये महात्मा परशुरामका उसके साथ घोर युद्ध छिड़ गया ॥ ४७ ॥
ततोऽर्जुनस्य बाहुंस्तांश्छित्त्वा रामो रुषान्वितः ।
तं भ्रमन्तं ततो वत्सं जामदग्न्यः स्वमाश्रमम् ॥ ४८ ॥
प्रत्यानयत राजेन्द्र तेषामन्तःपुरात् प्रभुः ।
राजेन्द्र! तब रोषमें भरे हुए प्रभावशाली जमदग्निनन्दन परशुरामने अर्जुनकी उन भुजाओंको काट डाला और इधर-उधर घूमते हुए उस बछड़ेको वे हैहयोंके अन्तःपुरसे निकालकर अपने आश्रममें ले आये ॥ ४८ १/२ ॥
अर्जुनस्य सुतास्ते तु सम्भूयाबुद्धयस्तदा ॥ ४९ ॥
गत्वाऽऽश्रममसम्बुद्धा जमदग्नेर्महात्मनः ।
अपातयन्त भल्लाग्रैः शिरः कायान्नराधिप ॥ ५० ॥
समित्कुशार्थं रामस्य निर्यातस्य यशस्विनः ।
नरेश्वर! अर्जुनके पुत्र बुद्धिहीन और मूर्ख थे। उन्होंने संगठित हो महात्मा जमदग्निके आश्रमपर जाकर भल्लोंके अग्रभागसे उनके मस्तकको धड़से काट गिराया। उस समय यशस्वी परशुरामजी समिधा और कुशा लानेके लिये आश्रमसे दूर चले गये थे ॥ ४९-५० १/२ ॥
ततः पितृवधामर्षाद् रामः परममन्युमान् ॥ ५१ ॥
निःक्षत्रियां प्रतिश्रुत्य महीं शस्त्रमगृह्णत ।
पिताके इस प्रकार मारे जानेसे परशुरामके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे सूनी कर देनेकी भीषण प्रतिज्ञा करके हथियार उठाया ॥ ५१ १/२ ॥
ततः स भृगुशार्दूलः कार्तवीर्यस्य वीर्यवान् ॥ ५२ ॥

विक्रम्य निजघानाशु पुत्रान् पौत्रांश्च सर्वशः ।
भृगुकुलके सिंह पराक्रमी परशुरामने पराक्रम प्रकट करके कार्तवीर्यके सभी पुत्रों तथा पौत्रोंका शीघ्र ही संहार कर डाला ॥ ५२ १/२ ॥
स हैहयसहस्राणि हत्वा परममन्युमान् ॥ ५३ ॥
चकार भार्गवो राजन् महीं शोणितकर्दमाम् ।
राजन्! परम क्रोधी परशुरामने सहस्रों हैहयोंका वध करके इस पृथ्वीपर रक्तकी कीच मचा दी ॥ ५३ १/२ ॥
स तथाऽऽशु महातेजाः कृत्वा निःक्षत्रियां महीम् ॥ ५४ ॥
कृपया परयाऽऽविष्टो वनमेव जगाम ह ।
इस प्रकार शीघ्र ही पृथ्वीको क्षत्रियोंसे हीन करके महातेजस्वी परशुराम अत्यन्त दयासे द्रवित हो वनमें ही चले गये ॥ ५४ १/२ ॥
ततो वर्षसहस्रेषु समतीतेषु केषुचित् ॥ ५५ ॥
क्षेपं सम्प्राप्तवांस्तत्र प्रकृत्या कोपनः प्रभुः ।
तदनन्तर कई हजार वर्ष बीत जानेपर एक दिन वहाँ स्वभावतः क्रोधी परशुरामपर आक्षेप किया गया ॥ ५५ १/२ ॥
विश्वामित्रस्य पौत्रस्तु रैभ्यपुत्रो महातपाः ॥ ५६ ॥
परावसुर्महाराज क्षिप्त्वाऽऽह जनसंसदि ।
ये ते ययातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः ॥ ५७ ॥
प्रतर्दनप्रभृतयो राम किं क्षत्रिया न ते ।
मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि ॥ ५८ ॥
भयात् क्षत्रियवीराणां पर्वत सम्मुपाश्रितः ।
सा पुनः क्षत्रियशतैः पृथिवी सर्वतः स्तृता ॥ ५९ ॥
महाराज! विश्वामित्रके पौत्र तथा रैभ्यके पुत्र महातेजस्वी परावसुने भरी सभामें आक्षेप करते हुए कहा—‘राम! राजा ययातिके स्वर्गसे गिरनेके समय जो प्रतर्दन आदि सज्जन पुरुष यज्ञमें एकत्र हुए थे, क्या वे क्षत्रिय नहीं थे? तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी है। तुम व्यर्थ ही जनताकी सभामें डींग हाँका करते हो कि मैंने क्षत्रियोंका अन्त कर दिया। मैं तो समझता हूँ कि तुमने क्षत्रिय वीरोंके भयसे ही पर्वतकी शरण ली है। इस समय पृथ्वीपर सब ओर पुनः सैकड़ों क्षत्रिय भर गये हैं’ ॥ ५६—५९ ॥
परावसोर्वचः श्रुत्वा शस्त्रं जग्राह भार्गवः ।
ततो ये क्षत्रिया राजन् शतशस्तेन वर्जिताः ॥ ६० ॥
ते विवृद्धा महावीर्याः पृथिवीपतयोऽभवन् ।

राजन्! परावसुकी बात सुनकर भृगुवंशी परशुरामने पुनः शस्त्र उठा लिया। पहले उन्होंने जिन सैकड़ों क्षत्रियोंको छोड़ दिया था, वे ही बढ़कर महापराक्रमी भूपाल बन बैठे थे॥ ६० १/२ ॥

स पुनस्ताञ्जघानाशु बालानपि नराधिप ॥ ६१ ॥
गर्भस्थैस्तु मही व्याप्ता पुनरेवाभवत् तदा ।
जातं जातं स गर्भं तु पुनरेव जघान ह ॥ ६२ ॥
अरक्षंश्च सुतान् कांश्चित् तदा क्षत्रिययोषितः ।
नरेश्वर! उन्होंने पुनः उन सबके छोटे-छोटे बच्चों-तकको शीघ्र ही मार डाला। जो बच्चे गर्भमें रह गये थे, उन्हींसे पुनः यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी। परशुरामजी एक-एक गर्भके उत्पन्न होनेपर पुनः उसका वध कर डालते थे। उस समय क्षत्राणियाँ कुछ ही पुत्रोंको बचा सकी थीं॥ ६१-६२ १/२ ॥

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ॥ ६३ ॥
दक्षिणामश्वमेधान्ते कश्यपायाददत् ततः ।
इस प्रकार शक्तिशाली परशुरामजीने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे हीन करके अश्वमेध यज्ञ किया और उसकी समाप्ति होनेपर दक्षिणाके रूपमें यह सारी पृथ्वी उन्होंने कश्यपजीको दे दी॥ ६३ १/२ ॥

स क्षत्रियाणां शेषार्थं करेणोद्दिश्य कश्यपः ॥ ६४ ॥
स्रुक्प्रग्रहवता राजंस्ततो वाक्यमथाब्रवीत् ।
गच्छ तीरं समुद्रस्य दक्षिणस्य महामुने ॥ ६५ ॥
न ते मद् विषये राम वस्तव्यमिह कर्हिचित् ।
राजन्! तदनन्तर कुछ क्षत्रियोंको बचाये रखनेकी इच्छासे कश्यपजीने स्रुक् लिये हुए हाथसे संकेत करते हुए यह बात कही—‘महामुने! अब तुम दक्षिण समुद्रके तटपर चले जाओ। अब कभी मेरे राज्यमें निवास न करना’॥ ६४-६५ १/२ ॥

ततः शूर्पारकं देशं सागरस्तस्य निर्ममे ॥ ६६ ॥
सहसा जामदग्न्यस्य सोऽपरान्तमहीतलम् ।
(यह सुनकर परशुरामजी चले गये) समुद्रने सहसा जमदग्निकुमार परशुरामजीके लिये जगह खाली करके शूर्पारक देशका निर्माण किया; जिसे अपरान्तभूमि भी कहते हैं॥ ६६ १/२ ॥

कश्यपस्तां महाराज प्रतिगृह्य वसुन्धराम् ॥ ६७ ॥
कृत्वा ब्राह्मणसंस्थां वै प्रविष्टः सुमहद् वनम् ।
महाराज! कश्यपने पृथ्वीको दानमें लेकर उसे ब्राह्मणोंके अधीन कर दिया और वे स्वयं विशाल वनके भीतर चले गये॥ ६७ १/२ ॥

ततः शूद्राश्च वैश्याश्च यथा स्वैरप्रचारिणः ॥ ६८ ॥ अवर्तन्त द्विजाग्र्याणां दारेषु भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! फिर तो स्वेच्छाचारी वैश्य और शूद्र श्रेष्ठ द्विजोंकी स्त्रियोंके साथ अनाचार करने लगे ॥ ६८ १/२ ॥ अराजके जीवलोके दुर्बला बलवत्तरैः ॥ ६९ ॥ पीड्यन्ते न हि विप्रेषु प्रभुत्वं कस्यचित् तदा । सारे जीवजगत्में अराजकता फैल गयी। बलवान् मनुष्य दुर्बलोंको पीड़ा देने लगे। उस समय ब्राह्मणोंमेंसे किसीकी प्रभुता कायम न रही ॥ ६९ १/२ ॥ ततः कालेन पृथिवी पीड्यमाना दुरात्मभिः ॥ ७० ॥ विपर्ययेण तेनाशु प्रविवेश रसातलम् । अरक्ष्यमाणा विधिवत् क्षत्रियैर्धर्मरक्षिभिः ॥ ७१ ॥ कालक्रमसे दुरात्मा मनुष्य अपने अत्याचारोंसे पृथ्वीको पीड़ित करने लगे। इस उलट-फेरसे पृथ्वी शीघ्र ही रसातलमें प्रवेश करने लगी; क्योंकि उस समय धर्मरक्षक क्षत्रियोंद्वारा विधिपूर्वक पृथ्वीकी रक्षा नहीं की जा रही थी ॥ ७०-७१ ॥ तां दृष्ट्वा द्रवन्तीं तत्र संत्रासात् स महामनाः । ऊरुणा धारयामास कश्यपः पृथिवीं ततः ॥ ७२ ॥ भयके मारे पृथ्वीको रसातलकी ओर भागती देख महामनस्वी कश्यपने अपने ऊरुओंका सहारा देकर उसे रोक दिया ॥ ७२ ॥ धृता तेनोरुणा येन तेनोर्वीति मही स्मृता । रक्षणार्थं समुद्दिश्य ययाचे पृथिवी तदा ॥ ७३ ॥ प्रसाद्य कश्यपं देवी वरयामास भूमिपम् । कश्यपजीने ऊरुसे इस पृथ्वीको धारण किया था; इसलिये यह उर्वी नामसे प्रसिद्ध हुई। उस समय पृथ्वीदेवीने कश्यपजीको प्रसन्न करके अपनी रक्षाके लिये यह वर माँगा कि मुझे भूपाल दीजिये ॥ ७३ १/२ ॥

पृथिव्युवाच

सन्ति ब्रह्मन् मया गुप्ताः स्त्रीषु क्षत्रियपुङ्गवाः ॥ ७४ ॥ हैहयानां कुले जातास्ते संरक्षन्तु मां मुने । पृथ्वी बोली—ब्रह्मन्! मैंने स्त्रियोंमें कई क्षत्रियशिरोमणियोंको छिपा रखा है। मुने! वे सब हैहयकुलमें उत्पन्न हुए हैं, जो मेरी रक्षा कर सकते हैं ॥ ७४ १/२ ॥ अस्ति पौरवदायादो विदूरथसुतः प्रभो ॥ ७५ ॥ ऋक्षैः संवर्धितो विप्र ऋक्षवत्यथ पर्वते ।

प्रभो! उनके सिवा पुरुवंशी विदूरथका भी एक पुत्र जीवित है, जिसे ऋक्षवान् पर्वतपर रीछोंने पालकर बड़ा किया है ।। ७५ १/२ ।।
तथानुकम्पमानेन यज्वनाथामितौजसा ।। ७६ ।।
पराशरेण दायादः सौदासस्याभिरक्षितः ।
सर्वकर्माणि कुरुते शूद्रवत् तस्य स द्विजः ।। ७७ ।।
सर्वकर्मेत्यभिख्यातः स मां रक्षतु पार्थिवः ।
इसी प्रकार अमित शक्तिशाली यज्ञपरायण महर्षि पराशरने दयावश सौदासके पुत्रकी जान बचायी है, वह राजकुमार द्विज होकर भी शूद्रोंके समान सब कर्म करता है; इसलिये 'सर्वकर्मा' नामसे विख्यात है। वह राजा होकर मेरी रक्षा करे ।। ७६-७७ १/२ ।।
शिबिपुत्रो महातेजा गोपतिर्नाम नामतः ।। ७८ ।।
वने संवर्धितो गोभिः सोऽभिरक्षतु मां मुने ।
राजा शिबिका एक महातेजस्वी पुत्र बचा हुआ है, जिसका नाम है गोपति। उसे वनमें गौओंने पाल-पोसकर बड़ा किया है। मुने! आपकी आज्ञा हो तो वही मेरी रक्षा करे ।। ७८ १/२ ।।
प्रतर्दनस्य पुत्रस्तु वत्सो नाम महाबलः ।। ७९ ।।
वत्सैः संवर्धितो गोष्ठे स मां रक्षतु पार्थिवः ।
प्रतर्दनका महाबली पुत्र वत्स भी राजा होकर मेरी रक्षा कर सकता है। उसे गोशालामें बछड़ोंने पाला था, इसलिये उसका नाम 'वत्स' हुआ है ।। ७९ १/२ ।।
दधिवाहनपौत्रस्तु पुत्रो दिविरथस्य च ।। ८० ।।
गुप्तः स गौतमेनासीद् गङ्गाकूलेऽभिरक्षितः ।
दधिवाहनका पौत्र और दिविरथका पुत्र भी गङ्गातटपर महर्षि गौतमके द्वारा सुरक्षित है ।। ८० १/२ ।।
बृहद्रथो महातेजा भूरिभूतिपरिष्कृतः ।। ८१ ।।
गोलाङ्गुलैर्महाभागो गृध्रकूटेऽभिरक्षितः ।
महातेजस्वी महा भाग बृहद्रथ महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न है। उसे गृध्रकूट पर्वतपर लंगूरोंने बचाया था ।। ८१ १/२ ।।
मरुत्तस्यान्ववाये च रक्षिताः क्षत्रियात्मजाः ।। ८२ ।।
मरुत्पतिसमा वीर्ये समुद्रेणाभिरक्षिताः ।
राजा मरुत्तके वंशमें भी कई क्षत्रिय बालक सुरक्षित हैं, जिनकी रक्षा समुद्रने की है। उन सबका पराक्रम देवराज इन्द्रके तुल्य है ।। ८२ १/२ ।।
एते क्षत्रियदायादास्तत्र तत्र परिश्रुताः ।। ८३ ।।
द्योकारहेमकारादिजातिं नित्यं समाश्रिताः ।

ये सभी क्षत्रिय बालक जहाँ-तहाँ विख्यात हैं। वे सदा शिल्पी और सुनार आदि जातियोंके आश्रित होकर रहते हैं ॥ ८३ १/२ ॥

यदि मामभिरक्षन्ति ततः स्थास्यामि निश्चला ॥ ८४ ॥
एतेषां पितरश्चैव तथैव च पितामहाः ।
मदर्थं निहता युद्धे रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ८५ ॥
यदि वे क्षत्रिय मेरी रक्षा करें तो मैं अविचल भावसे स्थिर हो सकूँगी। इन बेचारोंके बाप-दादे मेरे ही लिये युद्धमें अनायास ही महान् कर्म करनेवाले परशुरामजीके द्वारा मारे गये हैं ॥ ८४-८५ ॥

तेषामपचितिश्चैव मया कार्या महामुने ।
न ह्याहं कामये नित्यमतिक्रान्तेन रक्षणम् ।
वर्तमानेन वर्तेयं तत् क्षिप्रं संविधीयताम् ॥ ८६ ॥
महामुने! मुझे उन राजाओंसे उऋण होनेके लिये उनके इन वंशजोंका सत्कार करना चाहिये। मैं धर्मकी मर्यादाको लाँघनेवाले क्षत्रियके द्वारा कदापि अपनी रक्षा नहीं चाहती। जो अपने धर्ममें स्थित हो, उसीके संरक्षणमें रहूँ, यही मेरी इच्छा है; अतः आप इसकी शीघ्र व्यवस्था करें ॥ ८६ ॥

वासुदेव उवाच

ततः पृथिव्या निर्दिष्टांस्तान् समानीय कश्यपः ।
अभ्यषिञ्चन्महीपालान् क्षत्रियान् वीर्यसम्मतान् ॥ ८७ ॥
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर पृथ्वीके बताये हुए उन सब पराक्रमी क्षत्रिय भूपालोंको बुलाकर कश्यपजीने उनका भिन्न-भिन्न राज्योंपर अभिषेक कर दिया ॥ ८७ ॥

तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च येषां वंशाः प्रतिष्ठिताः ।
एवमेतत् पुरावृत्तं यन्मां पृच्छसि पाण्डव ॥ ८८ ॥
उन्हींके पुत्र-पौत्र बढ़े, जिनके वंश इस समय प्रतिष्ठित हैं। पाण्डुनन्दन! तुमने जिसके विषयमें मुझसे पूछा था, वह पुरातन वृत्तान्त ऐसा ही है ॥ ८८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं ब्रुवंस्तं च यदुप्रवीरो
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम् ।
रथेन तेनाशु ययौ महात्मा
दिशः प्रकाशन् भगवानिवार्कः ॥ ८९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरसे इस प्रकार वार्तालाप करते हुए यदुकुल-तिलक महात्मा श्रीकृष्ण उस रथके द्वारा भगवान् सूर्यके समान सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश फैलाते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ते चले गये ॥ ८९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि रामोपाख्याने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें परशुरामोपाख्यानविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥

श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण-प्रभावका सविस्तर वर्णन

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण-प्रभावका सविस्तर वर्णन

वैशम्पायन उवाच

ततो रामस्य तत् कर्म श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः ।
विस्मयं परमं गत्वा प्रत्युवाच जनार्दनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! परशुरामजीका वह अलौकिक कर्म सुनकर राजा युधिष्ठिरको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे भगवान् श्रीकृष्णसे बोले— ॥ १ ॥

अहो रामस्य वार्ष्णेय शक्रस्येव महात्मनः ।
विक्रमो वसुधा येन क्रोधान्निःक्षत्रिया कृता ॥ २ ॥
‘वृष्णिनन्दन! महात्मा परशुरामका पराक्रम तो इन्द्रके समान अत्यन्त अद्भुत है, जिन्होंने क्रोध करके यह सारी पृथ्वी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी ॥ २ ॥

गोभिः समुद्रेण तथा गोलाङ्गूलर्क्षवानरैः ।
गुप्ता रामभयोद्विग्नाः क्षत्रियाणां कुलोद्वहाः ॥ ३ ॥
‘क्षत्रियोंके कुलका भार वहन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष परशुरामजीके भयसे उद्विग्न हो छिपे हुए थे और गाय, समुद्र, लंगूर, रीछ तथा वानरोंद्वारा उनकी रक्षा हुई थी ॥ ३ ॥

अहो धन्यो नृलोकोऽयं सभाग्याश्च नरा भुवि ।
यत्र कर्मेदृशं धर्म्यं द्विजेन कृतमित्युत ॥ ४ ॥
‘अहो! यह मनुष्यलोक धन्य है और इस भूतलके मनुष्य बड़े भाग्यवान् हैं, जहाँ द्विजवर परशुरामजीने ऐसा धर्मसंगत कार्य किया’ ॥ ४ ॥

तथावृत्तौ कथां तात तावच्युतयुधिष्ठिरौ ।
जग्मतुर्यत्र गाङ्गेयः शरतल्पगतः प्रभुः ॥ ५ ॥
तात! युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण इस प्रकार बातचीत करते हुए उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ प्रभावशाली गङ्गानन्दन भीष्म बाणशय्यापर सोये हुए थे ॥ ५ ॥

ततस्ते ददृशुर्भीष्मं शरप्रस्तरशायिनम् ।
स्वरश्मिजालसंवीतं सायंसूर्यसमप्रभम् ॥ ६ ॥
उन्होंने देखा कि भीष्मजी शरशय्यापर सो रहे हैं और अपनी किरणोंसे घिरे हुए सायंकालिक सूर्यके समान प्रकाशित होते हैं ॥ ६ ॥

उपास्यमानं मुनिभिर्देवैरिव शतक्रतुम् ।
देशे परमधर्मिष्ठे नदीमोघवतीमनु ॥ ७ ॥
जैसे देवता इन्द्रकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार बहुत-से महर्षि ओघवती नदीके तटपर परम धर्ममय स्थानमें उनके पास बैठे हुए थे ॥ ७ ॥

दूरादेव तमालोक्य कृष्णो राजा च धर्मजः । चत्वारः पाण्डवाश्चैव ते च शारद्वतादयः ॥ ८ ॥ अवस्कन्द्याथ वाहेभ्यः संयम्य प्रचलं मनः । एकीकृत्येन्द्रियग्राममुपतस्थुर्महामुनीन् ॥ ९ ॥ श्रीकृष्ण, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, अन्य चारों पाण्डव तथा कृपाचार्य आदि सब लोग दूरसे ही उन्हें देखकर अपने-अपने रथसे उतर गये और चंचल मनको काबूमें करके सम्पूर्ण इन्द्रियोंको एकाग्र कर वहाँ बैठे हुए महामुनियोंकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ८-९ ॥ अभिवाद्य तु गोविन्दः सात्यकिस्ते च पार्थिवाः । व्यासादीनृषिमुख्यांश्च गाङ्गेयमुपतस्थिरे ॥ १० ॥ श्रीकृष्ण, सात्यकि तथा अन्य राजाओंने व्यास आदि महर्षियोंको प्रणाम करके गङ्गानन्दन भीष्मको मस्तक झुकाया ॥ १० ॥ ततो वृद्धं तथा दृष्ट्वा गाङ्गेयं यदुकौरवाः । परिवार्य ततः सर्वे निषेदुः पुरुषर्षभाः ॥ ११ ॥ तदनन्तर वे सभी यदुवंशी और कौरव नरश्रेष्ठ बूढ़े गङ्गानन्दन भीष्मजीका दर्शन करके उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ११ ॥ ततो निशाम्य गाङ्गेयं शाम्यमानमिवानलम् । किंचिद् दीनमना भीष्ममिति होवाच केशवः ॥ १२ ॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन कुछ दुखी हो बुझती हुई आगके समान दिखायी देनेवाले गङ्गानन्दन भीष्मको सुनाकर इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥ कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि यथा पुरा । कच्चिन्न व्याकुला चैव बुद्धिस्ते वदतां वर ॥ १३ ॥ 'वक्ताओंमें श्रेष्ठ भीष्मजी! क्या आपकी सारी ज्ञानेन्द्रियाँ पहलेकी ही भाँति प्रसन्न हैं? आपकी बुद्धि व्याकुल तो नहीं हुई है? ॥ १३ ॥ शराभिघातदुःखात् ते कच्चिद् गात्रं न दूयते । मानसादपि दुःखाद्धि शारीरं बलवत्तरम् ॥ १४ ॥ 'आपको बाणोंकी चोट सहनेका जो कष्ट उठाना पड़ा है उससे आपके शरीरमें विशेष पीड़ा तो नहीं हो रही है? क्योंकि मानसिक दुःखसे शारीरिक दुःख अधिक प्रबल होता है—उसे सहना कठिन हो जाता है ॥ १४ ॥ वरदानात् पितुः कामं छन्दमृत्युरसि प्रभो । शान्तनोर्धर्मनित्यस्य न त्वेतन्मम कारणम् ॥ १५ ॥ 'प्रभो! आपने निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले पिता शान्तनुके वरदानसे मृत्युको अपने अधीन कर लिया है। जब आपकी इच्छा हो तभी मृत्यु हो सकती है अन्यथा नहीं। यह आपके पिताके वरदानका ही प्रभाव है, मेरा नहीं ॥ १५ ॥

सुसूक्ष्मोऽपि तु देहे वै शल्यो जनयते रुजम् । किं पुनः शरसंघातैश्चितस्य तव पार्थिव ॥ १६ ॥ ‘राजन्! यदि शरीरमें कोई महीन-से-महीन भी काँटा गड़ जाय तो वह भारी वेदना पैदा करता है। फिर जो बाणोंके समूहसे चुन दिया गया है, उस आपके शरीरकी पीड़ाके विषयमें तो कहना ही क्या? ॥ १६ ॥

कामं नैतत् तवाख्येयं प्राणिनां प्रभवाप्ययौ । उपदेष्टुं भवान् शक्तो देवानामपि भारत ॥ १७ ॥ ‘भरतनन्दन! अवश्य ही आपके सामने यह कहना उचित न होगा कि ‘सभी प्राणियोंके जन्म और मरण प्रारब्धके अनुसार नियत हैं। अतः आपको दैवका विधान समझकर अपने मनमें कोई दुःख नहीं मानना चाहिये।' आपको कोई क्या उपदेश देगा? आप तो देवताओंको भी उपदेश देनेमें समर्थ हैं ॥ १७ ॥

यच्च भूतं भविष्यं च भवच्च पुरुषर्षभ । सर्वं तज्ज्ञानवृद्धस्य तव भीष्म प्रतिष्ठितम् ॥ १८ ॥ ‘पुरुषप्रवर भीष्म! आप ज्ञानमें सबसे बढ़े-चढ़े हैं। आपकी बुद्धिमें भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ १८ ॥

संहारश्चैव भूतानां धर्मस्य च फलोदयः । विदितस्ते महाप्राज्ञ त्वं हि धर्ममयो निधिः ॥ १९ ॥ ‘महामते! प्राणियोंका संहार कब होता है? धर्मका क्या फल है? और उसका उदय कब होता है? ये सारी बातें आपको ज्ञात हैं; क्योंकि आप धर्मके प्रचुर भण्डार हैं ॥ १९ ॥

त्वां हि राज्ये स्थितं स्फीते समग्राङ्गमरोगिणम् । स्त्रीसहस्रैः परिवृतं पश्यामीवोर्ध्वरेतसम् ॥ २० ॥ ‘आप एक समृद्धिशाली राज्यके अधिकारी थे, आपके संपूर्ण अङ्ग ठीक थे, किसी अङ्गमें कोई न्यूनता नहीं थी; आपको कोई रोग भी नहीं था और आप हजारों स्त्रियोंके बीचमें रहते थे, तो भी मैं आपको ऊर्ध्वरेता (अखण्ड ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न) ही देखता हूँ ॥ २० ॥

ऋते शान्तनवाद् भीष्मात् त्रिषु लोकेषु पार्थिव । सत्यधर्मान्महावीर्याच्छूराद् धर्मैकतत्परात् ॥ २१ ॥ मृत्युमावार्य तपसा शरसंस्तरशायिनः । निसर्गप्रभवं किंचिन्न च तातानुशुश्रुम ॥ २२ ॥ ‘तात! पृथ्वीनाथ! मैंने तीनों लोकोंमें सत्यवादी, एकमात्र धर्ममें तत्पर, शूरवीर, महापराक्रमी तथा बाण-शय्यापर शयन करनेवाले आप शान्तनुनन्दन भीष्मके सिवा दूसरे किसी ऐसे प्राणीको ऐसा नहीं सुना है, जिसने शरीरके लिये स्वभावसिद्ध मृत्युको अपनी तपस्यासे रोक दिया हो ॥ २१-२२ ॥

सत्ये तपसि दाने च यज्ञाधिकरणे तथा । धनुर्वेदे च वेदे च नीत्यां चैवानुरक्षणे ॥ २३ ॥ अनृशंसं शुचिं दान्तं सर्वभूतहिते रतम् । महारथं त्वत्सदृशं न कंचिदनुशुश्रुम ॥ २४ ॥ 'सत्य, तप, दान और यज्ञके अनुष्ठानमें, वेद, धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानमें, प्रजाके पालनमें, कोमलतापूर्ण बर्ताव, बाहर-भीतरकी शुद्धि, मन और इन्द्रियोंके संयम तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितसाधनमें आपके समान मैंने दूसरे किसी महारथीको नहीं सुना है ॥ २३-२४ ॥

त्वं हि देवान् सगन्धर्वानसुरान् यक्षराक्षसान् । शक्तस्त्वेकरथेनैव विजेतुं नात्र संशयः ॥ २५ ॥ आप सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व, असुर, यक्ष और राक्षसोंको एकमात्र रथके द्वारा ही जीत सकते थे, इसमें संशय नहीं है ॥ २५ ॥

स त्वं भीष्म महाबाहो वसूनां वासवोपमः । नित्यं विप्रैः समाख्यातो नवमोऽनवमो गुणैः ॥ २६ ॥ 'महाबाहो भीष्म! आप वसुओंमें वासव (इन्द्र) के समान हैं। ब्राह्मणोंने सदा आपको आठ वसुओंके अंशसे उत्पन्न नवाँ वसु बताया है। आपके समान गुणोंमें कोई नहीं है ॥ २६ ॥

अहं च त्वाभिजानामि यस्त्वं पुरुषसत्तम । त्रिदशेष्वपि विख्यातस्त्वं शक्त्या पुरुषोत्तमः ॥ २७ ॥ पुरुषप्रवर! आप कैसे हैं और क्या हैं, यह मैं जानता हूँ। आप पुरुषोंमें उत्तम और अपनी शक्तिके लिये देवताओंमें भी विख्यात हैं ॥ २७ ॥

मनुष्येषु मनुष्येन्द्र न दृष्टो न च मे श्रुतः । भवतो वा गुणैर्युक्तः पृथिव्यां पुरुषः क्वचित् ॥ २८ ॥ 'नरेन्द्र! मनुष्योंमें आपके समान गुणोंसे युक्त पुरुष इस पृथ्वीपर न तो मैंने कहीं देखा है और न सुना ही है ॥ २८ ॥

त्वं हि सर्वगुणै राजन् देवानप्यतिरिच्यसे । तपसा हि भवान् शक्तः स्रष्टुं लोकांश्चराचरान् ॥ २९ ॥ 'राजन्! आप अपने सम्पूर्ण गुणोंके द्वारा तो देवताओंसे भी बढ़कर हैं तथा तपस्याके द्वारा चराचर लोकोंकी भी सृष्टि कर सकते हैं ॥ २९ ॥

किं पुनश्चात्मनो लोकानुत्तमानुत्तमैर्गुणैः । तदस्य तप्यमानस्य ज्ञातीनां संक्षयेन वै ॥ ३० ॥ ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य शोकं भीष्म व्यपानुद ।

‘फिर अपने लिये उत्तम गुणसम्पन्न लोकोंकी सृष्टि करना आपके लिये कौन बड़ी बात है? अतः भीष्म! आपसे यह निवेदन है कि ये ज्येष्ठ पाण्डव अपने कुटुम्बीजनोंके वधसे बहुत संतप्त हो रहे हैं। आप इनका शोक दूर करें॥ ३०१/२॥

ये हि धर्माः समाख्याताश्चातुर्वर्ण्यस्य भारत॥ ३१॥
चातुराश्रम्यसंयुक्ताः सर्वे ते विदितास्तव ।
चातुर्विद्ये च ये प्रोक्ताश्चातुर्होत्रे च भारत॥ ३२॥
‘भारत! शास्त्रोंमें चारों वर्णों और आश्रमोंके लिये जो-जो धर्म बताये गये हैं, वे सब आपको विदित हैं। चारों विद्याओंमें जिन धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है तथा चारों होताओंके जो कर्तव्य बताये गये हैं, वे भी आपको ज्ञात हैं॥ ३१-३२॥

योगे सांख्ये च नियता ये च धर्माः सनातनाः ।
चातुर्वर्ण्यस्य यश्चोक्तो धर्मो न स्म विरुध्यते॥ ३३॥
सेव्यमानः सवैाख्यो गाङ्गेय विदितास्तव ।
‘गङ्गानन्दन! योग और सांख्यमें जो सनातन धर्म नियत हैं तथा चारों वर्णोंके लिये जो अविरोधी धर्म बताया गया है, जिसका सभी लोग सेवन करते हैं, वह सब आपको व्याख्यासहित ज्ञात है॥ ३३१/२॥

प्रतिलोमप्रसूतानां वर्णानां चैव यः स्मृतः॥ ३४॥
देशजातिकुलानां च जानीषे धर्मलक्षणम् ।
वेदोक्तो यश्च शिष्टोक्तः सदैव विदितास्तव ॥ ३५॥
विलोम क्रमसे उत्पन्न हुए वर्णसंकरोंका जो धर्म है, उससे भी आप अपरिचित नहीं हैं। देश, जाति और कुलके धर्मोंका क्या लक्षण है, उसे आप अच्छी तरह जानते हैं। वेदोंमें प्रतिपादित तथा शिष्ट पुरुषोंद्वारा कथित धर्मोंको भी आप सदासे ही जानते हैं॥ ३४-३५॥

इतिहासपुराणार्थाः कार्त्स्न्येन विदितास्तव ।
धर्मशास्त्रं च सकलं नित्यं मनसि ते स्थितम्॥ ३६॥
‘इतिहास और पुराणोंके अर्थ आपको पूर्णरूपसे ज्ञात हैं। सारा धर्मशास्त्र सदा आपके मनमें स्थित है॥ ३६॥

ये च केचन लोकेऽस्मिन्नर्थाः संशयकारकाः ।
तेषां छेत्ता नास्ति लोके त्वदन्यः पुरुषर्षभ॥ ३७॥
‘पुरुषप्रवर! संसारमें जो कोई संदेहग्रस्त विषय हैं, उनका समाधान करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है॥ ३७॥

स पाण्डवेयस्य मनःसमुत्थितं
** नरेन्द्र शोकं व्यपकर्ष मेधया ।**
भवद्विधा ह्युत्तमबुद्धिविस्तरा