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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1956)

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षट्सप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा वज्रदत्तकी पराजय

वैशम्पायन उवाच

एवं त्रिरात्रमभवत् तद् युद्धं भरतर्षभ ।
अर्जुनस्य नरेन्द्रेण वृत्रेणेव शतक्रतोः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ! जैसे इन्द्रका वृत्रासुरके साथ युद्ध हुआ था, उसी प्रकार अर्जुनका राजा वज्रदत्तके साथ तीन दिन तीन रात युद्ध होता रहा ॥ १ ॥

ततश्चतुर्थे दिवसे वज्रदत्तो महाबलः ।
जहास सस्वनं हासं वाक्यं चेदमथाब्रवीत् ॥ २ ॥
तदनन्तर चौथे दिन महाबली वज्रदत्त ठहाका मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला— ॥ २ ॥

अर्जुनार्जुन तिष्ठस्व न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ।
त्वां निहत्य करिष्यामि पितुस्तोयं यथाविधि ॥ ३ ॥
‘अर्जुन! अर्जुन! खड़े रहो। आज मैं तुम्हें जीवित नहीं छोड़ूँगा। तुम्हें मारकर पिताका विधिपूर्वक तर्पण करूँगा ॥ ३ ॥

त्वया वृद्धो मम पिता भगदत्तः पितुः सखा ।
हतो वृद्धो मम पिता शिशुं मामद्य योधय ॥ ४ ॥
‘मेरे वृद्ध पिता भगदत्त तुम्हारे बापके मित्र थे, तो भी तुमने उनकी हत्या की। मेरे पिता बूढ़े थे, इसलिये तुम्हारे हाथसे मारे गये। आज उनका बालक मैं तुम्हारे सामने उपस्थित हूँ; मेरे साथ युद्ध करो’ ॥ ४ ॥

इत्येवमुक्त्वा संक्रुद्धो वज्रदत्तो नराधिपः ।
प्रेषयामास कौरव्य वारणं पाण्डवं प्रति ॥ ५ ॥
कुरुनन्दन! ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए राजा वज्रदत्तने पुनः पाण्डुपुत्र अर्जुनकी ओर अपने हाथीको हाँक दिया ॥ ५ ॥

सम्प्रेष्यमाणो नागेन्द्रो वज्रदत्तेन धीमता ।
उत्पतिष्यन्निवाकाशमभिदुद्राव पाण्डवम् ॥ ६ ॥
बुद्धिमान् वज्रदत्तके द्वारा हाँके जानेपर वह गजराज पाण्डुपुत्र अर्जुनकी ओर इस प्रकार दौड़ा, मानो आकाशमें उड़ जाना चाहता हो ॥ ६ ॥

अग्रहस्तसमुक्तेन शीकरेण स नागराट् ।
समौक्षत गुडाकेशं शैलं नीलमिवाम्बुदः ॥ ७ ॥

उस गजराजने अपनी सूँडसे छोड़े गये जलकणोंद्वारा गुडाकेश अर्जुनको भिगो दिया। मानो मेघने नील पर्वतपर जलके फुहारे डाल दिये हों ॥ ७ ॥

स तेन प्रेषितो राज्ञा मेघवद् विनदन् मुहुः । मुखाडम्बरसंहादैर्भ्यद्रवत् फाल्गुनम् ॥ ८ ॥ राजासे प्रेरित होकर बारंबार मेघके समान गम्भीर गर्जना करता हुआ वह हाथी अपने मुखके चीत्कारपूर्ण कोलाहलके साथ अर्जुनपर टूट पड़ा ॥ ८ ॥

स नृत्यन्निव नागेन्द्रो वज्रदत्तप्रचोदितः । आससाद द्रुतं राजन् कौरवाणां महारथम् ॥ ९ ॥ राजन्! वज्रदत्तका हाँका हुआ वह गजराज नृत्य-सा करता हुआ तुरंत कौरव महारथी अर्जुनके पास जा पहुँचा ॥ ९ ॥

तमायान्तमथालक्ष्य वज्रदत्तस्य वारणम् । गाण्डीवमाश्रित्य बली न व्यकम्पत शत्रुहा ॥ १० ॥ वज्रदत्तके उस हाथीको आते देख शत्रुओंका संहार करनेवाले बलवान् अर्जुन गाण्डीवका सहारा लेकर तनिक भी विचलित नहीं हुए ॥ १० ॥

चुक्रोध बलवच्चापि पाण्डवस्तस्य भूपतेः । कार्यविघ्नमनुस्मृत्य पूर्ववैरं च भारत ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! वज्रदत्तके कारण जो कार्यमें विघ्न पड़ रहा था, उसको तथा पहलेके वैरको याद करके पाण्डुपुत्र अर्जुन उस राजापर अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ११ ॥

ततस्तं वारणं क्रुद्धः शरजालेन पाण्डवः । निवारयामास तदा वेलेव मकरालयम् ॥ १२ ॥ क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनने अपने बाणसमूहोंद्वारा उस हाथीको उसी तरह रोक दिया, जैसे तटकी भूमि उमड़ते हुए समुद्रको रोक देती है ॥ १२ ॥

स नागप्रवरः श्रीमानर्जुनेन निवारितः । तस्थौ शरैर्विमुन्नाङ्गः श्वाविच्छललितो यथा ॥ १३ ॥ उसके सारे अंगोंमें बाण धँसे हुए थे। अर्जुनके द्वारा रोका गया वह शोभाशाली गजराज काँटोंवाली साहीके समान खड़ा हो गया ॥ १३ ॥

निवारितं गजं दृष्ट्वा भगदत्तसुतो नृपः । उत्ससर्ज शितान् बाणानर्जुनं क्रोधमूर्च्छितः ॥ १४ ॥ अपने हाथीको रोका गया देख भगदत्तकुमार राजा वज्रदत्त क्रोधसे व्याकुल हो उठा और अर्जुनपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १४ ॥

अर्जुनस्तु महाबाहुः शरैररिनिघातिभिः । वारयामास तान् बाणांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १५ ॥

परंतु महाबाहु अर्जुनने अपने शत्रुघाती सायकोंद्वारा उन सारे बाणोंको पीछे लौटा दिया। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई ॥ १५ ॥ ततः पुनरभिक्रुद्धो राजा प्राग्ज्योतिषाधिपः । प्रेषयामास नागेन्द्रं बलवत् पर्वतोपमम् ॥ १६ ॥ तब प्राग्ज्योतिषपुरके स्वामी राजा वज्रदत्तने अत्यन्त कुपित हो अपने पर्वताकार गजराजको पुनः बलपूर्वक आगे बढ़ाया ॥ १६ ॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलवत् पाकशासनिः । नाराचमग्निसंकाशं प्राहिणोद् वारणं प्रति ॥ १७ ॥ उसे बलपूर्वक आक्रमण करते देख इन्द्रकुमार अर्जुनने उस हाथीके ऊपर एक अग्निके समान तेजस्वी नाराच चलाया ॥ १७ ॥ स तेन वारणो राजन् मर्मस्वभिहतो भृशम् । पपात सहसा भूमौ वज्ररुग्ण इवाचलः ॥ १८ ॥ राजन्! उस नाराचने हाथीके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी। वह वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति सहसा पृथ्वीपर ढह पड़ा ॥ १८ ॥ स पतन् शुशुभे नागो धनंजयशराहतः । विशन्निव महाशैलो महीं वज्रप्रपीडितः ॥ १९ ॥ अर्जुनके बाणोंसे घायल होकर गिरता हुआ वह हाथी ऐसी शोभा पाने लगा, मानो वज्रके आघातसे अत्यन्त पीड़ित हुआ महान् पर्वत पृथ्वीमें समा जाना चाहता हो ॥ १९ ॥ तस्मिन् निपतिते नागे वज्रदत्तस्य पाण्डवः । तं न भेतव्यमित्याह ततो भूमिगतं नृपम् ॥ २० ॥ वज्रदत्तके उस हाथीके धराशायी होते ही राजा वज्रदत्त स्वयं भी पृथ्वीपर जा पड़ा। उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुनने उससे कहा— 'राजन्! तुम्हें डरना नहीं चाहिये' ॥ २० ॥ अब्रवीद्धि महातेजाः प्रस्थितं मां युधिष्ठिरः । राजानस्ते न हन्तव्या धनंजय कथंचन ॥ २१ ॥ जब मैं घरसे प्रस्थित हुआ, उस समय महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने मुझसे कहा— 'धनंजय! तुम्हें किसी तरह भी राजाओंका वध नहीं करना चाहिये' ॥ २१ ॥ सर्वमेतन्नरव्याघ्र भवत्येतावता कृतम् । योधाश्चापि न हन्तव्या धनंजय रणे त्वया ॥ २२ ॥ "पुरुषसिंह! इतना करनेसे सब कुछ हो जायगा। अर्जुन! तुम्हें युद्ध ठानकर योद्धाओंका वध कदापि नहीं करना चाहिये ॥ २२ ॥ वक्तव्याश्चापि राजानः सर्वे सहसुहृज्जनैः । युधिष्ठिरस्याश्वमेधो भवद्भिरनुभूयताम् ॥ २३ ॥

‘तुम सभी राजाओंसे कह देना कि आप सब लोग अपने सुहृदोंके साथ पधारें और युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञ-सम्बन्धी उत्सवका आनन्द लें’ ॥ २३ ॥
इति भ्रातृवचः श्रुत्वा न हन्मि त्वां नराधिप ।
उत्तिष्ठ न भयं तेऽस्ति स्वस्तिमान् गच्छ पार्थिव ॥ २४ ॥
‘नरेश्वर! भाईके इस वचनको सुनकर इसे शिरोधार्य करके मैं तुम्हें मार नहीं रहा हूँ। भूपाल! उठो, तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम सकुशल अपने घरको लौट जाओ ॥ २४ ॥
आगच्छेथा महाराज परां चैत्रीमुपस्थिताम् ।
यदाश्वमेधो भविता धर्मराजस्य धीमतः ॥ २५ ॥
‘महाराज! आगामी चैत्रमासकी उत्तम पूर्णिमा तिथि उपस्थित होनेपर तुम हस्तिनापुरमें आना। उस समय बुद्धिमान् धर्मराजका वह उत्तम यज्ञ होगा’ ॥ २५ ॥
एवमुक्तः स राजा तु भगदत्तात्मजस्तदा ।
तथेत्येवाब्रवीद् वाक्यं पाण्डवेनाभिनिर्जितः ॥ २६ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर उनसे परास्त हुए भगदत्तकुमार राजा वज्रदत्तने कहा—‘बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा’ ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वज्रदत्तपराजयो षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें वज्रदत्तकी पराजयविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1960)

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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध

वैशम्पायन उवाच

(जित्वा प्रसाद्य राजानं भगदत्तसुतं तदा । विसृज्य याते तुरगे सैन्धवान् प्रति भारत ॥) सैन्धवैरभवद् युद्धं ततस्तस्य किरीटिनः । हतशेषैर्महाराज हतानां च सुतैरपि ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन! महाराज भगदत्तके पुत्र राजा वज्रदत्तको पराजित और प्रसन्न करनेके पश्चात् उसे विदा करके जब अर्जुनका घोड़ा सिंधुदेशमें गया, तब महाभारत-युद्धमें मरनेसे बचे हुए सिंधुदेशीय योद्धाओं तथा मारे गये राजाओंके पुत्रोंके साथ किरीटधारी अर्जुनका घोर संग्राम हुआ ॥ १ ॥

तेऽवतीर्णमुपश्रुत्य विषयं श्वेतवाहनम् । प्रत्युद्ययुरमृष्यन्तो राजानः पाण्डवर्षभम् ॥ २ ॥ यज्ञके घोड़ेको और श्वेतवाहन अर्जुनको अपने राज्यके भीतर आया हुआ सुनकर वे सिंधुदेशीय क्षत्रिय अमर्षमें भरकर उन पाण्डवप्रवर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ २ ॥

अश्वं च तं परामृश्य विष्यान्ते विषोपमाः । न भयं चक्रिरे पार्थाद् भीमसेनादनन्तरात् ॥ ३ ॥ वे विषके समान भयंकर क्षत्रिय अपने राज्यके भीतर आये हुए उस घोड़ेको पकड़कर भीमसेनके छोटे भाई अर्जुनसे तनिक भी भयभीत नहीं हुए ॥ ३ ॥

तेऽविदूराद् धनुष्पाणिं यज्ञियस्य हयस्य च । बीभत्सुं प्रत्यपद्यन्त पदातिनमवस्थितम् ॥ ४ ॥ यज्ञसम्बन्धी घोड़ेसे थोड़ी ही दूरपर अर्जुन हाथमें धनुष लिये पैदल ही खड़े थे। वे सभी क्षत्रिय उनके पास जा पहुँचे ॥ ४ ॥

ततस्ते तं महावीर्या राजानः पर्यवारयन् । जिगीषन्तो नरव्याघ्रं पूर्वं विनिकृता युधि ॥ ५ ॥ वे महापराक्रमी क्षत्रिय पहले युद्धमें अर्जुनसे परास्त हो चुके थे और अब उन पुरुषसिंह पार्थको जीतना चाहते थे। अतः उन सबने उन्हें घेर लिया ॥ ५ ॥

ते नामान्यपि गोत्राणि कर्माणि विविधानि च । कीर्तयन्तस्तदा पार्थं शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ६ ॥

वे अर्जुनसे अपने नाम, गोत्र और नाना प्रकारके कर्म बताते हुए उनपर बाणोंकी बौछार करने लगे ।। ६ ।।
ते किरन्तः शरव्रातान् वारणप्रतिवारणान् ।
रणे जयमभीप्सन्तः कौन्तेयं पर्यवारयन् ।। ७ ।।
वे ऐसे बाणसमूहोंकी वर्षा करते थे, जो हाथियोंको भी आगे बढ़नेसे रोक देनेवाले थे। उन्होंने रणभूमिमें विजयकी अभिलाषा रखकर कुन्तीकुमारको घेर लिया ।। ७ ।।
ते समीक्ष्य च तं कृष्णमुग्रकर्माणमाहवे ।
सर्वे युयुधिरे वीरा रथस्थास्तं पदातिनम् ।। ८ ।।
युद्धमें भयानक कर्म करनेवाले अर्जुनको पैदल देखकर वे सभी वीर रथपर आरूढ़ हो उनके साथ युद्ध करने लगे ।। ८ ।।
ते समाजघ्निरे वीरं निवातकवचान्तकम् ।
संशप्तकनिहन्तारं हन्तारं सैन्धवस्य च ।। ९ ।।
निवातकवचोंका विनाश, संशप्तकोंका संहार और जयद्रथका वध करनेवाले वीर अर्जुनपर सैन्धवोंने सब ओरसे प्रहार आरम्भ कर दिया ।। ९ ।।
ततो रथसहस्रेण हयानामयुतेन च ।
कोष्ठकीकृत्य बीभत्सुं प्रहृष्टमनसोऽभवन् ।। १० ।।
एक हजार रथ और दस हजार घोड़ोंसे अर्जुनको घेरकर उन्हें कोष्ठबद्ध-सा करके वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हो रहे थे ।। १० ।।
तं स्मरन्तो वधं वीराः सिन्धुराजस्य चाहवे ।
जयद्रथस्य कौरव्य समरे सव्यसाचिना ।। ११ ।।
कुरुनन्दन! कुरुक्षेत्रके समराङ्गणमें सव्यसाची अर्जुनके द्वारा जो सिंधुराज जयद्रथका वध हुआ था, उसकी याद उन वीरोंको कभी भूलती नहीं थी ।। ११ ।।
ततः पर्जन्यवत् सर्वे शरवृष्टीरवासृजन् ।
तैः कीर्णः शुशुभे पार्थो रविर्मेघान्तरे यथा ।। १२ ।।
वे सब योद्धा मेघके समान अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे। उन बाणोंसे आच्छादित होकर कुन्ती-नन्दन अर्जुन बादलोंमें छिपे हुए सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे ।। १२ ।।
स शरैः समवच्छन्नश्चकाशे पाण्डवर्षभः ।
पञ्जरान्तरसंचारी शकुन्त इव भारत ।। १३ ।।
भरतनन्दन! बाणोंसे आच्छादित हुए पाण्डवप्रवर अर्जुन पींजड़ेके भीतर फुदकनेवाले पक्षीकी भाँति जान पड़ते थे ।। १३ ।।
ततो हाहाकृतं सर्वं कौन्तेये शरपीडिते ।
त्रैलोक्यमभवद् राजन् रविरासीच्च निष्प्रभः ।। १४ ।।

राजन्! कुन्तीकुमार अर्जुन जब इस प्रकार बाणोंसे पीड़ित हो गये, तब उनकी ऐसी अवस्था देख त्रिलोकी हाहाकार कर उठी और सूर्यदेवकी प्रभा फीकी पड़ गयी ॥ १४ ॥

ततो ववौ महाराज मारुतो लोमहर्षणः ।
राहुग्रसदादित्यं युगपत् सोममेव च ॥ १५ ॥
महाराज! उस समय रोंगटे खड़े कर देनेवाली प्रचण्ड वायु चलने लगी। राहुने एक ही समय सूर्य और चन्द्रमा दोनोंको ग्रस लिये ॥ १५ ॥

उल्काश्च जघ्निरे सूर्यं विकीर्यन्त्यः समन्ततः ।
वेपथुश्चाभवद् राजन् कैलासस्य महागिरेः ॥ १६ ॥
चारों ओर बिखरकर गिरती हुई उल्काएँ सूर्यसे टकराने लगीं। राजन्! उस समय महापर्वत कैलास भी काँपने लगा ॥ १६ ॥

मुमुचुः श्वासमत्युष्णं दुःखशोकसमन्विताः ।
सप्तर्षयो जातभयास्तथा देवर्षयोऽपि च ॥ १७ ॥
सप्तर्षियों और देवर्षियोंको भी भय होने लगा। वे दुःख और शोकसे संतप्त हो अत्यन्त गरम-गरम साँस छोड़ने लगे ॥ १७ ॥

शशं चाशु विनिर्भिद्य मण्डलं शशिनोऽपतत् ।
विपरीता दिशश्चापि सर्वा धूमाकुलास्तथा ॥ १८ ॥
पूर्वोक्त उल्काएँ चन्द्रमामें स्थित हुए शश-चिह्नका भेदन करके चन्द्रमण्डलके चारों ओर गिरने लगीं । सम्पूर्ण दिशाएँ धूमाच्छन्न होकर विपरीत प्रतीत होने लगीं ॥ १८ ॥

रासभारुणसंकाशा धनुष्मन्तः सविद्युतः ।
आवृत्य गगनं मेघा मुमुचुर्मांसशोणितम् ॥ १९ ॥
गधेके समान रंग और लाल रंगके सम्मिश्रणसे जो रंग हो सकता है, वैसे वर्णवाले मेघ आकाशको घेरकर रक्त और मांसकी वर्षा करने लगे। उनमें इन्द्रधनुषका भी दर्शन होता था और बिजलियाँ भी कौंधती थीं ॥ १९ ॥

एवमासीत् तदा वीरे शरवर्षेण संवृते ।
फाल्गुने भरतश्रेष्ठ तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! वीर अर्जुनके उस समय शत्रुओंकी बाण-वर्षासे आच्छादित हो जानेपर ऐसे-ऐसे उत्पात प्रकट होने लगे। वह अद्भुत-सी बात हुई ॥ २० ॥

तस्य तेनावकीर्णस्य शरजालेन सर्वतः ।
मोहात् पपात गाण्डीवमावापश्च करादपि ॥ २१ ॥
उस बाणसमूहके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हुए अर्जुनपर मोह छा गया। उस समय उनके हाथसे गाण्डीव धनुष और दस्ताने गिर पड़े ॥ २१ ॥

तस्मिन् मोहमनुप्राप्ते शरजालं महत् तदा ।
सैन्धवा मुमुचुस्तूर्णं गतसत्त्वे महारथे ॥ २२ ॥

महारथी अर्जुन जब मोहग्रस्त एवं अचेत हो गये, उस समय भी सिंधुदेशीय योद्धा उनपर वेगपूर्वक महान् बाणसमूहकी वर्षा करते रहे ॥ २२ ॥ ततो मोहसमापन्नं ज्ञात्वा पार्थं दिवौकसः । सर्वे वित्रस्तमनसस्तस्य शान्तिकृतोऽभवन् ॥ २३ ॥ अर्जुनको मोहके वशीभूत हुआ जान सम्पूर्ण देवता मन-ही-मन संत्रस्त हो गये और उनके लिये शान्तिका उपाय करने लगे ॥ २३ ॥ ततो देवर्षयः सर्वे तथा सप्तर्षयोऽपि च । ब्रह्मर्षयश्च विजयं जेपुः पार्थस्य धीमतः ॥ २४ ॥ फिर तो समस्त देवर्षि, सप्तर्षि और ब्रह्मर्षि मिलकर बुद्धिमान् अर्जुनकी विजयके लिये मन्त्र-जप करने लगे ॥ २४ ॥ ततः प्रदीपिते देवैः पार्थतेजसि पार्थिव । तस्थावचलवद् धीमान् संग्रामे परमास्त्रवित् ॥ २५ ॥ पृथ्वीनाथ! तदनन्तर देवताओंके प्रयत्नसे अर्जुनका तेज पुनः उद्दीप्त हो उठा और उत्तम अस्त्र-विद्याके ज्ञाता परम बुद्धिमान् धनंजय संग्रामभूमिमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हो गये ॥ २५ ॥ विचकर्ष धनुर्दिव्यं ततः कौरवनन्दनः । यन्त्रस्येवेह शब्दोऽभून्महांस्तस्य पुनः पुनः ॥ २६ ॥ फिर तो कौरवनन्दन अर्जुनने अपने दिव्य धनुषकी प्रत्यंचा खींची। उस समय उससे बार-बार मशीनकी तरह बड़े जोर-जोरसे टंकार-ध्वनि होने लगी ॥ २६ ॥ ततः स शरवर्षाणि प्रत्यमित्रान् प्रति प्रभुः । ववर्ष धनुषा पार्थो वर्षाणीव पुरंदरः ॥ २७ ॥ इसके बाद जैसे इन्द्र पानीकी वर्षा करते हैं, उसी तरह प्रभावशाली पार्थने अपने धनुषद्वारा शत्रुओंपर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ २७ ॥ ततस्ते सैन्धवा योधाः सर्व एव सराजकाः । नादृश्यन्त शरैः कीर्णाः शलभैरिव पादपाः ॥ २८ ॥ फिर तो पार्थके बाणोंसे आच्छादित हो समस्त सैन्धव योद्धा टिड्डियोंसे ढँके हुए वृक्षोंकी भाँति अपने राजासहित अदृश्य हो गये ॥ २८ ॥ तस्य शब्देन वित्रेसुर्भयार्ताश्च विदुद्रुवुः । मुमुचुश्चाश्रु शोकार्ताः शुशुचुश्चापि सैन्धवाः ॥ २९ ॥ कितने ही गाण्डीवकी टंकार-ध्वनिसे ही थर्रा उठे। बहुतेरे भयसे व्याकुल होकर भाग गये और अनेक सैन्धव योद्धा शोकसे आतुर होकर आँसू बहाने एवं शोक करने लगे ॥ २९ ॥ तांस्तु सर्वान् नरव्याघ्रःसैन्धवान् व्यचरद् बली ।

अलातचक्रवद् राजन् शरजालैः समर्पयत् ॥ ३० ॥
राजन्! उस समय महाबली पुरुषसिंह अर्जुन अलातचक्रकी भाँति घूम-घूमकर सारे सैन्धवोंपर बाण-समूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥
तदिन्द्रजालप्रतिमं बाणजालममित्रहा ।
विसृज्य दिक्षु सर्वासु महेन्द्र इव वज्रभृत् ॥ ३१ ॥
शत्रुसूदन अर्जुनने वज्रधारी महेन्द्रकी भाँति सम्पूर्ण दिशाओंसे इन्द्रजालके समान बाणोंका जाल-सा फैला दिया ॥ ३१ ॥
मेघजालनिभं सैन्यं विदार्य शरवृष्टिभिः ।
विबभौ कौरवश्रेष्ठः शरदीव दिवाकरः ॥ ३२ ॥
जैसे शरत्कालके सूर्य मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कौरवश्रेष्ठ अर्जुन अपने बाणोंकी वृष्टिसे शत्रुसेनाको विदीर्ण करके अत्यन्त शोभा पाने लगे ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवयुद्धे
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंके साथ अर्जुनका युद्धविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं)

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुन युद्धके लिये उद्यत हो गये। वे शत्रुओंके लिये दुर्जय थे और युद्धभूमिमें हिमवान् पर्वतके

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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति

वैशम्पायन उवाच

ततो गाण्डीवभृच्छूरो युद्धाय समुपस्थितः ।
विबभौ युधि दुर्धर्षो हिमवानचलो यथा ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुन युद्धके लिये उद्यत हो गये। वे शत्रुओंके लिये दुर्जय थे और युद्धभूमिमें हिमवान् पर्वतके समान अचल भावसे डटे रहकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १ ॥

ततस्ते सैन्धवा योधाः पुनरेव व्यवस्थिताः ।
व्यमुञ्चन्त सुसंरब्धा शरवर्षाणि भारत ॥ २ ॥

भरतनन्दन! तदनन्तर सिन्धुदेशीय योद्धा फिरसे संगठित होकर खड़े हो गये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥

तान् प्रहस्य महाबाहुः पुनरेव व्यवस्थितान् ।
ततः प्रोवाच कौन्तेयो मुमूर्षून् श्लक्ष्णया गिरा ।
युध्यध्वं परया शक्त्या यतध्वं विजये मम ॥ ३ ॥

उस समय महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुन पुनः मरनेकी इच्छासे खड़े हुए सैन्धवोंको सम्बोधित करके हँसते हुए मधुर वाणीमें बोले—‘वीरो! तुम पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो और मुझपर विजय पानेका प्रयत्न करते रहो ॥ ३ ॥

कुरुध्वं सर्वकार्याणि महद् वो भयमागतम् ।
एष योत्स्यामि सर्वांस्तु निवार्य शरवागुराम् ॥ ४ ॥

‘तुम अपने सारे कार्य पूरे कर लो। तुमलोगोंपर महान् भय आ पहुँचा है। यह देखो—मैं तुम्हारे बाणोंका जाल छिन्न-भिन्न करके तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करनेको उद्यत हूँ ॥ ४ ॥

तिष्ठध्वं युद्धमनसो दर्पं शमयितास्मि वः ।
एतावदुक्त्वा कौरव्यो रोषाद् गाण्डीवभृत् तदा ॥ ५ ॥
ततोऽथ वचनं स्मृत्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत ।
न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिया विजिगीषवः ॥ ६ ॥
जेतव्याश्चेति यत् प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना ।
चिन्तयामास स तदा फाल्गुनः पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥

'मनमें युद्धका हौसला लेकर खड़े रहो। मैं तुम्हारा घमण्ड चूर किये देता हूँ।' भारत! गाण्डीवधारी करुनन्दन अर्जुन शत्रुओंसे ऐसा वचन कहकर अपने बड़े भाईकी कही हुई बातें याद करने लगे। महात्मा धर्मराजने कहा था कि 'तात! रणभूमिमें विजयकी इच्छा रखनेवाले क्षत्रियोंका वध न करना। साथ ही उन्हें पराजित भी करना।' इस बातको याद करके पुरुषप्रवर अर्जुन इस प्रकार चिन्ता करने लगे ।। ५—७ ।।

इत्युक्तोऽहं नरेन्द्रेण न हन्तव्या नृपा इति ।
कथं तन्न मृषेदं स्याद् धर्मराजवचः शुभम् ।। ८ ।।
न हन्येरंश्च राजानो राज्ञश्चाज्ञा कृता भवेत् ।
इति संचिन्त्य स तदा फाल्गुनः पुरुषर्षभः ।। ९ ।।
प्रोवाच वाक्यं धर्मज्ञः सैन्धवान् युद्धदुर्मदान् ।
'अहो! महाराजने कहा था कि क्षत्रियोंका वध न करना। धर्मराजका वह मंगलमय वचन कैसे मिथ्या न हो। राजालोग मारे न जायँ और राजा युधिष्ठिरकी आज्ञाका पालन हो जाय, इसके लिये क्या करना चाहिये।' ऐसा सोचकर धर्मके ज्ञाता पुरुषप्रवर अर्जुनने रणोन्मत्त सैन्धवोंसे इस प्रकार कहा— ।। ८-९ ½ ।।

श्रेयो वदामि युष्माकं न हिंसेयमवस्थितान् ।। १० ।।
यश्च वक्ष्यति संग्रामे तवास्मीति पराजितः ।
एतच्छ्रुत्वा वचो मह्यं कुरुध्वं हितमात्मनः ।। ११ ।।
'योद्धाओ! मैं तुम्हारे कल्याणकी बात बता रहा हूँ। तुममेंसे जो कोई अपनी पराजय स्वीकार करते हुए रणभूमिमें यह कहेगा कि मैं आपका हूँ, आपने मुझे युद्धमें जीत लिया है, वह सामने खड़ा रहे तो भी मैं उसका वध नहीं करूँगा। मेरी यह बात सुनकर तुम्हें जिसमें अपना हित दिखायी पड़े, वह करो ।। १०-११ ।।

ततोऽन्यथा कृच्छ्रगता भविष्यथ मयार्दिताः ।
एवमुक्त्वा तु तान् वीरान् युयुधे कुरुपुङ्गवः ।। १२ ।।
अर्जुनोऽतीव संक्रुद्धः संक्रुद्धैर्विजिगीषुभिः ।
'यदि मेरे कथनके विपरीत तुमलोग युद्धके लिये उद्यत हुए तो मुझसे पीड़ित होकर भारी संकटमें पड़ जाओगे।' उन वीरोंसे ऐसा कहकर कुरुकुलतिलक अर्जुन अत्यन्त कुपित हो क्रोधमें भरे हुए विजयाभिलाषी सैन्धवोंके साथ युद्ध करने लगे ।। १२ ½ ।।

शतं शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ।। १३ ।।
मुमुचुः सैन्धवा राजंस्तदा गाण्डीवधन्वनि ।
राजन्! उस समय सैन्धवोंने गाण्डीवधारी अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक करोड़ बाणोंका प्रहार किया ।। १३ ½ ।।

शरानापततः क्रूरानाशीविषविषोपमान् ।। १४ ।।
चिच्छेद निशितैर्बाणैरन्तरा स धनंजयः ।

विषधर सर्पोंके समान उन कठोर बाणोंको अपनी ओर आते देख अर्जुनने तीखे सायकोंद्वारा उन सबको बीचसे काट डाला ।। १४ १/२ ।।

छित्त्वा तु तानाशु चैव कङ्कपत्राञ् शिलाशितान् ।। १५ ।।
एकैकमेषां समरे बिभेद निशितैः शरैः ।
सानपर चढ़ाकर तेज किये गये उन कंकपत्रयुक्त बाणोंके तुरन्त ही टुकड़े-टुकड़े करके समरांगणमें अर्जुनने सैन्धव वीरोंमेंसे प्रत्येकको पैने बाण मारकर घायल कर दिया ।। १५ १/२ ।।

ततः प्रासांश्च शक्तीश्च पुनरेव धनंजयम् ।। १६ ।।
जयद्रथं हतं स्मृत्वा चिक्षिपुः सैन्धवा नृपाः ।
तदनन्तर जयद्रथ-वधका स्मरण करके सैन्धवोंने अर्जुनपर पुनः बहुत-से प्रासों और शक्तियोंका प्रहार किया ।। १६ १/२ ।।

तेषां किरीटी संकल्पं मोघं चक्रे महाबलः ।। १७ ।।
सर्वांस्तानन्तराच्छित्त्वा तदा चुक्रोश पाण्डवः ।
परंतु महाबली किरीटधारी पाण्डुकुमार अर्जुनने उनका सारा मनसूबा व्यर्थ कर दिया। उन्होंने उन सभी प्रासों और शक्तियोंको बीचसे ही काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ।। १७ १/२ ।।

तथैवापततां तेषां योधानां जयगृद्धिनाम् ।। १८ ।।
शिरांसि पातयामास भल्लैः संनतपर्वभिः ।
साथ ही विजयकी अभिलाषा लेकर आक्रमण करनेवाले उन सैन्धव योद्धाओंके मस्तकोंको वे झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा काट-काटकर गिराने लगे ।। १८ १/२ ।।

तेषां प्रद्रवतां चापि पुनरेवाभिधावताम् ।। १९ ।।
निवर्ततां च शब्दोऽभूत् पूर्णस्येव महोदधेः ।
उनमेंसे कुछ लोग भागने लगे, कुछ लोग फिरसे धावा करने लगे और कुछ लोग युद्धसे निवृत्त होने लगे। उन सबका कोलाहल जलसे भरे हुए महासागरकी गम्भीर गर्जनाके समान हो रहा था ।। १९ १/२ ।।

ते वध्यमानास्तु तदा पार्थेनामिततेजसा ।। २० ।।
यथाप्राणं यथोत्साहं योधयामासुरर्जुनम् ।
अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा मारे जानेपर भी सैन्धव योद्धा बल और उत्साहपूर्वक उनके साथ जूझते ही रहे ।। २० १/२ ।।

ततस्ते फाल्गुनेनाजौ शरैः संनतपर्वभिः ।। २१ ।।
कृता विसंज्ञा भूयिष्ठाः क्लान्तवाहनसैनिकाः ।

थोड़ी ही देरमें अर्जुनने युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा अधिकांश सैन्धव वीरोंको संज्ञाशून्य कर दिया। उनके वाहन और सैनिक भी थकावटसे खिन्न हो रहे थे ॥ २१ १/२ ॥

तांस्तु सर्वान् परिग्लानान् विदित्वा धृतराष्ट्रजा ॥ २२ ॥
दुःशला बालमादाय नप्तारं प्रययौ तदा ।
सुरथस्य सुतं वीरं रथेनाथागमत् तदा ॥ २३ ॥
शान्त्यर्थं सर्वयोधानामभ्यगच्छत पाण्डवम् ।
समस्त सैन्धव वीरोंको कष्ट पाते जान धृतराष्ट्रकी पुत्री दुःशला अपने बेटे सुरथके वीर बालकको जो उसका पौत्र था, साथ ले रथपर सवार हो रणभूमिमें पाण्डुकुमार अर्जुनके पास आयी। उसके आनेका उद्देश्य यह था कि सब योद्धा युद्ध छोड़कर शान्त हो जायँ ॥ २२-२३ १/२ ॥

सा धनंजयमासाद्य रुरोदार्तस्वरं तदा ॥ २४ ॥
धनंजयोऽपि तां दृष्ट्वा धनुर्विससृजे प्रभुः ।
वह अर्जुनके पास आकर आर्तस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगी। शक्तिशाली अर्जुनने भी उसे सामने देख अपना धनुष नीचे डाल दिया ॥ २४ १/२ ॥

समुत्सृज्य धनुः पार्थो विधिवद् भगिनीं तदा ॥ २५ ॥
प्राह किं करवाणीति सा च तं प्रत्युवाच ह ।
धनुष त्यागकर कुन्तीकुमारने विधिपूर्वक बहिनका सत्कार किया और पूछा—'बहिन! बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ?' तब दुःशलाने उत्तर दिया— ॥

एष ते भरतश्रेष्ठ स्वस्रीयस्यात्मजः शिशुः ॥ २६ ॥
अभिवादयते पार्थ तं पश्य पुरुषर्षभ ।

‘भैया! भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हारे भानजे सुरथका औरस पुत्र है। पुरुषप्रवर पार्थ! इसकी ओर देखो, यह तुम्हें प्रणाम करता है’ ।। २६ १/२ ।।
इत्युक्तस्तस्य पितरं स पप्रच्छार्जुनस्तथा ।। २७ ।।
क्वासाविति ततो राजन् दुःशला वाक्यमब्रवीत् ।
राजन्! दुःशलाके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उस बालकके पिताके विषयमें जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा—‘बहिन! सुरथ कहाँ है?’ तब दुःशला बोली— ।। २७ १/२ ।।
पितृशोकाभिसंतप्तो विषादार्तोऽस्य वै पिता ।। २८ ।।
पञ्चत्वमगमद् वीरो यथा तन्मे निशामय ।
‘भैया! इस बालकका पिता वीर सुरथ पितृशोकसे संतप्त और विषादसे पीड़ित हो जिस प्रकार मृत्युको प्राप्त हुआ है, वह मुझसे सुनो ।। २८ १/२ ।।
स पूर्वं पितरं श्रुत्वा हतं युद्धे त्वयानघ ।। २९ ।।
त्वामागतं च संश्रुत्य युद्धाय हयसारिणम् ।
पितुश्च मृत्युदुःखार्तोऽजहात् प्राणान् धनंजय ।। ३० ।।
‘निष्पाप अर्जुन! मेरे पुत्र सुरथने पहलेसे सुन रखा था कि अर्जुनके हाथसे ही मेरे पिताकी मृत्यु हुई है। इसके बाद जब उसके कानोंमें यह समाचार पड़ा है कि तुम घोड़ेके

पीछे-पीछे युद्धके लिये यहाँतक आ पहुँचे हो तो वह पिताकी मृत्युके दुःखसे आतुर हो अपने प्राणोंका परित्याग कर बैठा है ।। २९-३० ।।
प्राप्तो बीभत्सुरित्येव नाम श्रुत्वैव तेऽनघ ।
विषादार्तः पपातोर्व्यां ममार च ममात्मजः ।। ३१ ।।
‘अनघ! ‘अर्जुन आये’ इन शब्दोंके साथ तुम्हारा नाममात्र सुनकर ही मेरा बेटा विषादसे पीड़ित हो पृथ्वीपर गिरा और मर गया ।। ३१ ।।
तं दृष्ट्वा पतितं तत्र ततस्तस्यात्मजं प्रभो ।
गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी ।। ३२ ।।
‘प्रभो! उसको ऐसी अवस्थामें पड़ा हुआ देख उसके पुत्रको साथ ले मैं शरण खोजती हुई आज तुम्हारे पास आयी हूँ’ ।। ३२ ।।
इत्युक्त्वाऽऽर्तस्वरं सा तु मुमोच धृतराष्ट्रजा ।
दीना दीनं स्थितं पार्थमब्रवीच्चाप्यधोमुखम् ।। ३३ ।।
ऐसा कहकर धृतराष्ट्र-पुत्री दुःशला दीन होकर आर्तस्वरसे विलाप करने लगी। उसकी दीनदशा देख अर्जुन भी दीन भावसे अपना मुँह नीचे किये खड़े रहे। उस समय दुःशला उनसे फिर बोली— ।। ३३ ।।
स्वसारं समवेक्षस्व स्वस्त्रीयात्मजमेव च ।
कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ दयां कुरु कुलोद्वह ।। ३४ ।।
‘भैया! तुम कुरुकुलमें श्रेष्ठ और धर्मको जाननेवाले हो, अतः दया करो। अपनी इस दुखिया बहिनकी ओर देखो और भानजेके बेटेपर भी कृपादृष्टि करो ।। ३४ ।।
विस्मृत्य कुरुराजानं तं च मन्दं जयद्रथम् ।
अभिमन्योर्यथा जातः परिक्षित् परवीरहा ।। ३५ ।।
तथायं सुरथाज्जातो मम पौत्रो महाभुजः ।
‘मन्दबुद्धि दुर्योधन और जयद्रथको भूलकर हमें अपनाओ। जैसे अभिमन्युसे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले परीक्षित्‌का जन्म हुआ है, उसी प्रकार सुरथसे यह मेरा महाबाहु पौत्र उत्पन्न हुआ है ।। ३५ १/२ ।।
तमादाय नरव्याघ्र सम्प्राप्तास्मि तवान्तिकम् ।। ३६ ।।
शमार्थं सर्वयोधानां शृणु चेदं वचो मम ।
‘पुरुषसिंह! मैं इसीको लेकर समस्त योद्धाओंको शान्त करनेके लिये आज तुम्हारे पास आयी हूँ। तुम मेरी यह बात सुनो ।। ३६ १/२ ।।
आगतोऽयं महाबाहो तस्य मन्दस्य पुत्रकः ।। ३७ ।।
प्रसादमस्य बालस्य तस्मात् त्वं कर्तुमर्हसि ।
‘महाबाहो! यह उस मन्दबुद्धि जयद्रथका पौत्र तुम्हारी शरणमें आया है। अतः इस बालकपर तुम्हें कृपा करनी चाहिये ।। ३७ १/२ ।।

एष प्रसाद्य शिरसा प्रशमार्थमरिंदम ।। ३८ ।।
याचते त्वां महाबाहो शमं गच्छ धनंजय ।
‘शत्रुदमन महाबाहु धनंजय! यह तुम्हारे चरणोंमें सिर रखकर तुम्हें प्रसन्न करके तुमसे शान्तिके लिये याचना करता है। अब तुम शान्त हो जाओ ।। ३८ १/२ ।।

बालस्य हतबन्धोश्च पार्थ किंचिदजानतः ।। ३९ ।।
प्रसादं कुरु धर्मज्ञ मा मन्युवशमन्वगाः ।
‘यह अबोध बालक है, कुछ नहीं जानता है। इसके भाई-बन्धु नष्ट हो चुके हैं। अतः धर्मज्ञ अर्जुन! तुम इसके ऊपर कृपा करो। क्रोधके वशीभूत न होओ ।। ३९ १/२ ।।

तमनार्यं नृशंसं च विस्मृत्यास्य पितामहम् ।। ४० ।।
आगस्कारिणमत्यर्थं प्रसादं कर्तुमर्हसि ।
‘इस बालकका पितामह (जयद्रथ) अनार्य, नृशंस और तुम्हारा अपराधी था। उसको भूल जाओ और इस बालकपर कृपा करो’ ।। ४० १/२ ।।

एवं ब्रुवत्यां करुणं दुःशलायां धनंजयः ।। ४१ ।।
संस्मृत्य देवीं गान्धारीं धृतराष्ट्रं च पार्थिवम् ।
उवाच दुःखशोकार्तः क्षत्रधर्मं व्यगर्हयत् ।। ४२ ।।
जब दुःशला इस प्रकार करुणायुक्त वचन कहने लगी, तब अर्जुन राजा धृतराष्ट्र और गान्धारी देवीको याद करके दुःख और शोकसे पीड़ित हो क्षत्रिय-धर्मकी निन्दा करने लगे — ।। ४१-४२ ।।

यस्कृते बान्धवाः सर्वे मया नीता यमक्षयम् ।
इत्युक्त्वा बहु सान्त्वादिप्रसादमकरोज्जयः ।। ४३ ।।
परिष्वज्य च तां प्रीतो विससर्ज गृहान् प्रति ।। ४४ ।।
‘उस क्षात्र-धर्मको धिक्कार है, जिसके लिये मैंने अपने सारे बान्धवजनोंको यमलोक पहुँचा दिया।’ ऐसा कहकर अर्जुनने दुःशलाको बहुत सान्त्वना दी और उसके प्रति अपने कृपाप्रसादका परिचय दिया। फिर प्रसन्नतापूर्वक उससे गले मिलकर उसे घरकी ओर विदा किया ।। ४३-४४ ।।

दुःशला चापि तान् योधान् निवार्य महतो रणात् ।
सम्पूज्य पार्थं प्रययौ गृहानेव शुभानना ।। ४५ ।।
तदनन्तर सुमुखी दुःशलाने उस महान् समरसे अपने समस्त योद्धाओंको पीछे लौटाया और अर्जुनकी प्रशंसा करती हुई वह अपने घरको लौट गयी ।। ४५ ।।

एवं निर्जित्य तान् वीरान् सैन्धवान् स धनंजयः ।
अन्वधावत धावन्तं हयं कामविचारिणम् ।। ४६ ।।
इस प्रकार सैन्धव वीरोंको परास्त करके अर्जुन इच्छानुसार विचरने और दौड़नेवाले उस घोड़ेके पीछे-पीछे स्वयं भी दौड़ने लगे ।। ४६ ।।

ततो मृगमिवाकाशे यथा देवः पिनाकधृक् ।
ससार तं तथा वीरो विधिवद् यज्ञियं हयम् ॥ ४७ ॥
जैसे पिनाकधारी महादेवजी आकाशमें मृगके पीछे दौड़े थे, उसी प्रकार वीर अर्जुनने उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ४७ ॥

स च वाजी यथेष्टेन तांस्तान् देशान् यथाक्रमम् ।
विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धयन् ॥ ४८ ॥
वह अश्व यथेष्टगतिसे क्रमशः सभी देशोंमें घूमता और अर्जुनके पराक्रमका विस्तार करता हुआ इच्छानुसार विचरने लगा ॥ ४८ ॥

क्रमेण स हयस्त्वेवं विचरन् पुरुषर्षभ ।
मणिपूरपतेर्देशमुपायात् सहपाण्डवः ॥ ४९ ॥
पुरुषप्रवर जनमेजय! इस प्रकार क्रमशः विचरण करता हुआ वह अश्व अर्जुनसहित मणिपुर-नरेशके राज्यमें जा पहुँचा ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवपराजये
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंकी पराजयविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1973)

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एकोनाशीतितमोऽध्यायः

अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध एवं अर्जुनकी मृत्यु

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तु नृपतिः प्राप्तं पितरं बभ्रुवाहनः ।
निर्ययौ विनयेनाथ ब्राह्मणार्थपुरःसरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनने जब सुना कि मेरे पिता आये हैं, तब वह ब्राह्मणोंको आगे करके बहुत-सा धन साथमें लेकर बड़ी विनयके साथ उनके दर्शनके लिये नगरसे बाहर निकला ॥ १ ॥

मणिपूरेश्वरं त्वेवमुपयातं धनंजयः ।
नाभ्यनन्दत् स मेधावी क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ २ ॥
मणिपुर-नरेशको इस प्रकार आया देख परम बुद्धिमान् धनंजयने क्षत्रिय-धर्मका आश्रय लेकर उसका आदर नहीं किया ॥ २ ॥

उवाच च स धर्मात्मा समन्युः फाल्गुनस्तदा ।
प्रक्रियेयं न ते युक्ता बहिस्त्वं क्षत्रधर्मतः ॥ ३ ॥
उस समय धर्मात्मा अर्जुन कुछ कुपित होकर बोले—'बेटा! तेरा यह ढंग ठीक नहीं है। जान पड़ता है, तू क्षत्रिय-धर्मसे बहिष्कृत हो गया है ॥ ३ ॥

संरक्ष्यमाणं तुरगं यौधिष्ठिरमुपागतम् ।
यज्ञियं विषयान्ते मां नायौत्सीः किं नु पुत्रक ॥ ४ ॥
'पुत्र! मैं महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वकी रक्षा करता हुआ तेरे राज्यके भीतर आया हूँ। फिर भी तू मुझसे युद्ध क्यों नहीं करता? ॥ ४ ॥

धिक् त्वामस्तु सुदुर्बुद्धिं क्षत्रधर्मबहिष्कृतम् ।
यो मां युद्धाय सम्प्राप्तं साम्नैव प्रत्यगृह्णथाः ॥ ५ ॥
'तुझ दुर्बुद्धिको धिक्कार है, तू निश्चय ही क्षत्रियधर्मसे भ्रष्ट हो गया है, क्योंकि युद्धके लिये आये हुए मेरा स्वागत-सत्कार तू सामनीतिसे कर रहा है ॥

न त्वया पुरुषार्थो हि कश्चिदस्तीह जीवता ।
यस्त्वं स्त्रीवद् यथाप्राप्तं मां साम्ना प्रत्यगृह्णथाः ॥ ६ ॥
'तूने संसारमें जीवित रहकर भी कोई पुरुषार्थ नहीं किया। तभी तो एक स्त्रीकी भाँति तू यहाँ युद्धके लिये आये हुए मुझे शान्तिपूर्वक साथ लेनेके लिये चेष्टा कर रहा है ॥ ६ ॥

यद्यहं न्यस्तशस्त्रस्त्वामागच्छेयं सुदुर्मते ।
प्रक्रियेयं भवेद् युक्ता तावत् तव नराधम ॥ ७ ॥

‘दुर्बुद्धे! नराधम! यदि मैं हथियार रखकर खाली हाथ तेरे पास आता तो इस ढंगसे मिलना ठीक हो सकता था’ ।। ७ ।।
तमेवमुक्तं भर्त्रा तु विदित्वा पन्नगात्मजा ।
अमृष्यमाणा भित्त्वोर्वीमुलूपी समुपागमत् ।। ८ ।।
पतिदेव अर्जुन जब अपने पुत्र बभ्रुवाहनसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय नागकन्या उलूपी उस बातको सुनकर उनके अभिप्रायको जान गयी और उनके द्वारा किये गये पुत्रके तिरस्कारको सहन न कर सकनेके कारण वह धरती छेदकर वहाँ चली आयी ।। ८ ।।
सा ददर्श ततः पुत्रं विमृशन्तमधोमुखम् ।
संतर्ज्यमानमसकृत् पित्रा युद्धार्थिना प्रभो ।। ९ ।।
ततः सा चारुसर्वाङ्गी समुपेत्योरगात्मजा ।
उलूपी प्राह वचनं धर्म्यं धर्मविशारदम् ।। १० ।।
प्रभो! उसने देखा कि पुत्र बभ्रुवाहन नीचे मुँह किये किसी सोच-विचारमें पड़ा हुआ है और युद्धार्थी पिता उसे बारंबार डाँट-फटकार रहे हैं। तब मनोहर अंगोंवाली नागकन्या उलूपी धर्म-निपुण बभ्रुवाहनके पास आकर यह धर्मसम्मत बात बोली— ।। ९-१० ।।
उलूपीं मां निबोध त्वं मातरं पन्नगात्मजाम् ।
कुरुष्व वचनं पुत्र धर्मस्ते भविता परः ।। ११ ।।
‘बेटा! तुम्हें विदित होना चाहिये कि मैं तुम्हारी विमाता नागकन्या उलूपी हूँ। तुम मेरी आज्ञाका पालन करो। इससे तुम्हें महान् धर्मकी प्राप्ति होगी’ ।। ११ ।।
युध्यस्वैनं कुरुश्रेष्ठं पितरं युद्धदुर्मदम् ।
एवमेष हि ते प्रीतो भविष्यति न संशयः ।। १२ ।।
‘तुम्हारे पिता कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर और युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले हैं। अतः इनके साथ अवश्य युद्ध करो। ऐसा करनेसे ये तुमपर प्रसन्न होंगे। इसमें संशय नहीं है’ ।। १२ ।।
एवं दुर्मर्षितो राजा स मात्रा बभ्रुवाहनः ।
मनश्चक्रे महातेजा युद्धाय भरतर्षभ ।। १३ ।।
भरतश्रेष्ठ! माताके द्वारा इस प्रकार अमर्ष दिलाये जानेपर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहनने मन-ही-मन युद्ध करनेका निश्चय किया ।। १३ ।।
संनह्य काञ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत् ।
तूणीरशतसम्बाधमारुरोह रथोत्तमम् ।। १४ ।।
सुवर्णमय कवच पहनकर तेजस्वी शिरस्त्राण (टोप) धारण करके वह सैकड़ों तरकसोंसे भरे हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ ।। १४ ।।
सर्वोपकरणोपेतं युक्तमश्वैर्मनोजवैः ।
सचक्रोपस्करं श्रीमान् हेमभाण्डपरिष्कृतम् ।। १५ ।।
परमार्चितमुच्छ्रित्य ध्वजं सिंहं हिरण्मयम् ।

प्रययौ पार्थमुद्दिश्य स राजा बभ्रुवाहनः ॥ १६ ॥
उस रथमें सब प्रकारकी युद्ध-सामग्री सजाकर रखी गयी थी। मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। चक्र और अन्य आवश्यक सामान भी प्रस्तुत थे। सोनेके भाण्ड उसकी शोभा बढ़ाते थे। सुवर्णसे ही उस रथका निर्माण हुआ था। उसपर सिंहके चिह्नवाली ऊँची ध्वजा फहरा रही थी। उस परम पूजित उत्तम रथपर सवार हो श्रीमान् राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा ॥ १५-१६ ॥
ततोऽभ्येत्य हयं वीरो यज्ञियं पार्थरक्षितम् ।
ग्राहयामास पुरुषैर्हयशिक्षाविशारदैः ॥ १७ ॥
पार्थद्वारा सुरक्षित उस यज्ञसम्बन्धी अश्वके पास जाकर उस वीरने अश्वशिक्षाविशारद पुरुषोंद्वारा उसे पकड़वा लिया ॥ १७ ॥
गृहीतं वाजिनं दृष्ट्वा प्रीतात्मा स धनंजयः ।
पुत्रं रथस्थं भूमिष्ठः संन्यवारयदाहवे ॥ १८ ॥
घोड़ेको पकड़ा गया देख अर्जुन मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। यद्यपि वे भूमिपर खड़े थे तो भी रथपर बैठे हुए अपने पुत्रको युद्धके मैदानमें आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ १८ ॥
स तत्र राजा तं वीरं शरसंघैरनेकशः ।
अर्दयामास निशितैराशीविषविषोपमैः ॥ १९ ॥
राजा बभ्रुवाहनने वहाँ अपने वीर पिताको विषैले साँपोंके समान जहरीले और तेज किये हुए सैकड़ों बाण-समूहोंद्वारा बींधकर अनेक बार पीड़ित किया ॥ १९ ॥
तयोः समभवद् युद्धं पितुः पुत्रस्य चातुलम् ।
देवासुररणप्रख्यमुभयोः प्रीयमाणयोः ॥ २० ॥
वे पिता और पुत्र दोनों प्रसन्न होकर लड़ रहे थे। उन दोनोंका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था। उसकी इस जगत्‌में कहीं भी तुलना नहीं थी ॥ २० ॥
किरीटिनं प्रविव्याध शरेणानतपर्वणा ।
जत्रुदेशे नरव्याघ्रं प्रहसन् बभ्रुवाहनः ॥ २१ ॥
बभ्रुवाहनने हँसते-हँसते पुरुषसिंह अर्जुनके गलेकी हँसलीमें झुकी हुई गाँठवाले एक बाणद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ २१ ॥
सोऽभ्यगात् सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः ।
विनिर्भिद्य च कौन्तेयं प्रविवेश महीतलम् ॥ २२ ॥
जैसे साँप बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह बाण अर्जुनके शरीरमें पंखसहित घुस गया और उसे छेदकर पृथिवीमें समा गया ॥ २२ ॥
स गाढवेदनो धीमानालम्ब्य धनुरुत्तमम् ।
दिव्यं तेजः समाविश्य प्रमीत इव सोऽभवत् ॥ २३ ॥