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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

‘दशार्हनन्दन! आप ही इस यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करें; क्योंकि आप हमारे परम गुरु हैं। आपके यज्ञानुष्ठान पूर्ण कर लेनेपर निश्चय ही हमारे सब पाप नष्ट हो जायँगे ॥ २१ ॥ त्वं हि यज्ञोऽक्षरः सर्वस्त्वं धर्मस्त्वं प्रजापतिः । त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥ २२ ॥ ‘आप ही यज्ञ, अक्षर, सर्वस्वरूप, धर्म, प्रजापति एवं सम्पूर्ण भूतोंकी गति हैं—यह मेरी निश्चित धारणा है’ ॥ २२ ॥

वासुदेव उवाच त्वमेवैतन्महाबाहो वक्तुमर्हस्यरिंदम । त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥ २३ ॥ **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**महाबाहो! शत्रुदमन नरेश! आप ही ऐसी बात कह सकते हैं। मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके अवलम्ब हैं ॥ २३ ॥ त्वं चाद्य कुरुवीराणां धर्मेण हि विराजसे । गुणीभूताः स्म ते राजंस्त्वं नो राजा गुरुर्मतः ॥ २४ ॥ राजन्! समस्त कौरववीरोंमें एकमात्र आप ही धर्मसे सुशोभित होते हैं। हमलोग आपके अनुयायी हैं और आपको अपना राजा एवं गुरु मानते हैं ॥ २४ ॥ यजस्व मदनुज्ञातः प्राप्य एष क्रतुस्त्वया । युनक्तु नो भवान् कार्ये यत्र वाञ्छसि भारत ॥ २५ ॥ इसलिये भारत! आप हमारी अनुमतिसे स्वयं ही इस यज्ञका अनुष्ठान कीजिये तथा हमलोगोंमेंसे जिसको जिस कामपर लगाना चाहते हों, उसे उस कामपर लगनेकी आज्ञा दीजिये ॥ २५ ॥ सत्यं ते प्रतिजानामि सर्वं कर्तास्मि तेऽनघ । भीमसेनार्जुनौ चैव तथा माद्रवतीसुतौ । इष्टवन्तो भविष्यन्ति त्वयीष्टवति पार्थिवे ॥ २६ ॥ निष्पाप नरेश! मैं आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप जो कुछ कहेंगे, वह सब करूँगा। आप राजा हैं, आपके द्वारा यज्ञ होनेपर भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवको भी यज्ञानुष्ठानका फल मिल जायगा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णव्यासानुज्ञायामेकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्ण और व्यासकी युधिष्ठिरको यज्ञ करनेके लिये आज्ञाविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥

एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

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द्विसप्ततितमोऽध्यायः

व्यासजीकी आज्ञासे अश्वकी रक्षाके लिये अर्जुनकी, राज्य और नगरकी रक्षाके लिये भीमसेन और नकुलकी तथा कुटुम्ब-पालनके लिये सहदेवकी नियुक्ति

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
व्यासमामन्त्र्य मेधावी ततो वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
यदा कालं भवान् वेत्ति हयमेधस्य तत्त्वतः ।
दीक्षयस्व तदा मां त्वं त्वय्यायत्तो हि मे क्रतुः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर मेधावी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने व्यासजीको सम्बोधित करके कहा—‘भगवन्! जब आपको अश्वमेध यज्ञ आरम्भ करनेका ठीक समय जान पड़े तभी आकर मुझे उसकी दीक्षा दें; क्योंकि मेरा यज्ञ आपके ही अधीन है’ ॥ १-२ ॥

व्यास उवाच

अहं पैलोऽथ कौन्तेय याज्ञवल्क्यस्तथैव च ।
विधानं यद् यथाकालं तत् कर्तारो न संशयः ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**कुन्तीनन्दन! जब यज्ञका समय आयेगा, उस समय मैं, पैल और याज्ञवल्क्य—ये सब आकर तुम्हारे यज्ञका सारा विधि-विधान सम्पन्न करेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ ३ ॥

चैत्र्यां हि पौर्णमास्यां तु तव दीक्षा भविष्यति ।
सम्भाराः सम्भ्रियन्तां च यज्ञार्थं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
पुरुषप्रवर! आगामी चैत्रकी पूर्णिमाको तुम्हें यज्ञकी दीक्षा दी जायगी, तबतक तुम उसके लिये सामग्री संचित करो ॥ ४ ॥

अश्वविद्याविदश्चैव सूता विप्राश्च तद्विदः ।
मेध्यमश्वं परीक्षन्तां तव यज्ञार्थसिद्धये ॥ ५ ॥
अश्वविद्याके ज्ञाता सूत और ब्राह्मण यज्ञार्थकी सिद्धिके लिये पवित्र अश्वकी परीक्षा करें ॥ ५ ॥

तमुत्सृज यथाशास्त्रं पृथिवीं सागराम्बराम् ।
स पर्यैतु यशो दीप्तं तव पार्थिव दर्शयन् ॥ ६ ॥

पृथ्वीनाथ! जो अश्व चुना जाय, उसे शास्त्रीय विधिके अनुसार छोड़ो और वह तुम्हारे दीप्तिमान् यशका विस्तार करता हुआ समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वीपर भ्रमण करे ।। ६ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पाण्डवः पृथिवीपतिः ।
चकार सर्वं राजेन्द्र यथोक्तं ब्रह्मवादिना ।। ७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र! यह सुनकर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने 'बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्मवादी व्यासजीके कथनानुसार सारा कार्य सम्पन्न किया ।। ७ ।।
सम्भारश्चैव राजेन्द्र सर्वे संकल्पिताऽभवन् ।
स सम्भारान् समाहृत्य नृपो धर्मसुतस्तदा ।। ८ ।।
न्यवेदयदमेयात्मा कृष्णद्वैपायनाय वै ।
राजेन्द्र! उन्होंने मनमें जिन-जिन सामानोंको एकत्र करनेका संकल्प किया था, उन सबको जुटाकर धर्मपुत्र अमेयात्मा राजा युधिष्ठिरने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीको सूचना दी ।। ८ १/२ ।।
ततोऽब्रवीन्महातेजा व्यासो धर्मात्मजं नृपम् ।। ९ ।।
यथाकालं यथायोगं सज्जाः स्म तव दीक्षणे ।
तब महातेजस्वी व्यासने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! हमलोग यथासमय उत्तम योग आनेपर तुम्हें दीक्षा देनेको तैयार हैं ।। ९ १/२ ।।
स्फ्यश्च कूर्चश्च सौवर्णो यच्चान्यदपि कौरव ।। १० ।।
तत्र योग्यं भवेत् किंचिद् रौक्मं तत् क्रियतामिति ।
'कुरुनन्दन! इस बीचमें तुम सोनेके 'स्फ्य' और 'कूर्च' बनवा लो तथा और भी जो सुवर्णमय सामान आवश्यक हों, उन्हें तैयार करा डालो ।। १० १/२ ।।
अश्वश्चोत्सृज्यतामद्य पृथ्व्यामथ यथाक्रमम् ।
सुगुप्तं चरतां चापि यथाशास्त्रं यथाविधि ।। ११ ।।
'आज शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ-सम्बन्धी अश्वको क्रमशः सारी पृथ्वीपर घूमनेके लिये छोड़ना चाहिये तथा ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये, जिससे वह सुरक्षितरूपसे सब ओर विचर सके' ।। ११ ।।

युधिष्ठिर उवाच

अयमश्वो यथा ब्रह्मन्नुत्सृष्टः पृथिवीमिमाम् ।
चरिष्यति यथाकामं तत्र वै संविधीयताम् ।। १२ ।।
पृथिवीं पर्यटन्तं हि तुरगं कामचारिणम् ।
कः पालयेदिति मुने तद् भवान् वक्तुमर्हति ।। १३ ।।

युधिष्ठिरने कहा— ब्रह्मन्! यह घोड़ा उपस्थित है। इसे किस प्रकार छोड़ा जाय, जिससे यह समूची पृथ्वीपर इच्छानुसार घूम आवे। इसकी व्यवस्था आप ही कीजिये तथा मुने! यह भी बताइये कि भूमण्डलमें इच्छानुसार घूमनेवाले इस घोड़ेकी रक्षा कौन करे? ।। १२-१३ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः स तु राजेन्द्र कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।
भीमसेनादवरजः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ।। १४ ।।
जिष्णुः सहिष्णुर्धृष्णुश्च स एनं पालयिष्यति ।
शक्तः स हि महीं जेतुं निवातकवचान्तकः ।। १५ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजेन्द्र! युधिष्ठिरके इस तरह पूछनेपर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने कहा—‘राजन्! अर्जुन सब धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ हैं। वे विजयमें उत्साह रखनेवाले, सहनशील और धैर्यवान् हैं; अतः वे ही इस घोड़ेकी रक्षा करेंगे। उन्होंने निवातकवचोंका नाश किया था। वे सम्पूर्ण भूमण्डलको जीतनेकी शक्ति रखते हैं ।। १४-१५ ।।
तस्मिन् ह्यस्त्राणि दिव्यानि दिव्यं संहननं तथा ।
दिव्यं धनुश्चेषुधी च स एनमनुयास्यति ।। १६ ।।
‘उनके पास दिव्य अस्त्र, दिव्य कवच, दिव्य धनुष और दिव्य तरकस हैं; अतः वे ही इस घोड़ेके पीछे-पीछे जायँगे ।। १६ ।।
स हि धर्मार्थकुशलः सर्वविद्याविशारदः ।
यथाशास्त्रं नृपश्रेष्ठ चारयिष्यति ते हयम् ।। १७ ।।
‘नृपश्रेष्ठ! वे धर्म और अर्थमें कुशल तथा सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण हैं, इसलिये आपके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वका शास्त्रीय विधिके अनुसार संचालन करेंगे ।। १७ ।।
राजपुत्रो महाबाहुः श्यामो राजीवलोचनः ।
अभिमन्योः पिता वीरः स एनं पालयिष्यति ।। १८ ।।
‘जिनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं, श्याम वर्ण है, कमल-जैसे नेत्र हैं, वे अभिमन्युके वीर पिता राजपुत्र अर्जुन इस घोड़ेकी रक्षा करेंगे ।। १८ ।।
भीमसेनोऽपि तेजस्वी कौन्तेयोऽमितविक्रमः ।
समर्थो रक्षितुं राष्ट्रं नकुलश्च विशाम्पते ।। १९ ।।
‘प्रजानाथ! कुन्तीकुमार भीमसेन भी अत्यन्त तेजस्वी और अमितपराक्रमी हैं। नकुलमें भी वे ही गुण हैं। ये दोनों ही राज्यकी रक्षा करनेमें पूर्ण समर्थ हैं (अतः वे ही राज्यके कार्य देखें) ।। १९ ।।
सहदेवस्तु कौरव्य समाधास्यति बुद्धिमान् ।
कुटुम्बतन्त्रं विधिवत् सर्वमेव महायशाः ।। २० ।।

‘कुरुनन्दन! महायशस्वी बुद्धिमान् सहदेव कुटुम्ब-पालनसम्बन्धी समस्त कार्योंकी देखभाल करेंगे’॥ २० ॥ तत् तु सर्वं यथान्यायमुक्तः कुरुकुलोद्वहः । चकार फाल्गुनं चापि संदेश हयं प्रति ॥ २१ ॥ व्यासजीके इस प्रकार बतलानेपर कुरुकुलतिलक युधिष्ठिरने सारा कार्य उसी प्रकार यथोचित रीतिसे सम्पन्न किया और अर्जुनको बुलाकर घोड़ेकी रक्षाके लिये इस प्रकार आदेश दिया॥ २१ ॥

युधिष्ठिर उवाच एह्यर्जुन त्वया वीर हयोऽयं परिपाल्यताम् । त्वमर्हो रक्षितुं ह्येनं नान्यः कश्चन मानवः ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर बोले—वीर अर्जुन! यहाँ आओ, तुम इस घोड़ेकी रक्षा करो; क्योंकि तुम्हीं इसकी रक्षा करनेके योग्य हो। दूसरा कोई मनुष्य इसके योग्य नहीं है॥ २२ ॥ ये चापि त्वां महाबाहो प्रत्युद्यान्ति नराधिपाः । तैर्विग्रहो यथा न स्यात् तथा कार्यं त्वयानघ ॥ २३ ॥ महाबाहो! निष्पाप अर्जुन! अश्वकी रक्षाके समय जो राजा तुम्हारे सामने आवें, उनके साथ भरसक युद्ध न करना पड़े, ऐसी चेष्टा तुम्हें करनी चाहिये॥ २३ ॥ आख्यातव्यश्च भवता यज्ञोऽयं मम सर्वशः । पार्थिवेभ्यो महाबाहो समये गम्यतामिति ॥ २४ ॥ महाबाहो! मेरे इस यज्ञका समाचार तुम्हें समस्त राजाओंको बताना चाहिये और उनसे यह कहना चाहिये कि आपलोग यथासमय यज्ञमें पधारें॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा स धर्मात्मा भ्रातरं सव्यसाचिनम् । भीमं च नकुलं चैव पुरगुप्तौ समादधत् ॥ २५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! अपने भाई सव्यसाची अर्जुनसे ऐसा कहकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने भीमसेन और नकुलको नगरकी रक्षाका भार सौंप दिया॥ २५ ॥ कुटुम्बतन्त्रे च तदा सहदेवं युधां पतिम् । अनुमान्य महीपालं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ॥ २६ ॥ फिर महाराज धृतराष्ट्रकी सम्मति लेकर युधिष्ठिरने योद्धाओंके स्वामी सहदेवको कुटुम्ब-पालन-सम्बन्धी कार्यमें नियुक्त कर दिया॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि यज्ञसामग्रीसम्पादने द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥

इस प्रकार श्रीमद्दाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें यज्ञसामग्रीका सम्पादनविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७२ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1942)

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त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

सेनासहित अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरण

वैशम्पायन उवाच

दीक्षाकाले तु सम्प्राप्ते ततस्ते सुमहर्त्विजः ।
विधिवद् दीक्षयामासुरश्वमेधाय पार्थिवम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब दीक्षाका समय आया, तब उन व्यास आदि महान् ऋत्विजोंने राजा युधिष्ठिरको विधिपूर्वक अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा दी ॥ १ ॥

कृत्वा स पशुबन्धांश्च दीक्षितः पाण्डुनन्दनः ।
धर्मराजो महातेजाः सहर्त्विग्भिर्व्यरोचत ॥ २ ॥
पशुबन्ध-कर्म करके यज्ञकी दीक्षा लिये हुए महातेजस्वी पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर ऋत्विजोंके साथ बड़ी शोभा पाने लगे ॥ २ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1943)

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अश्वमेधयज्ञके लिये छोड़े हुए घोड़ेका अर्जुनके द्वारा अनुगमन

हयश्च हयमेधार्थं स्वयं स ब्रह्मवादिना । उत्सृष्टः शास्त्रविधिना व्यासेनामिततेजसा ॥ ३ ॥ अमिततेजस्वी ब्रह्मवादी व्यासजीने अश्वमेधयज्ञके लिये चुने गये अश्वको स्वयं ही शास्त्रीय विधिके अनुसार छोड़ा ॥ ३ ॥

स राजा धर्मराड् राजन् दीक्षितो विभभौ तदा । हेममाली रुक्मकण्ठः प्रदीप्त इव पावकः ॥ ४ ॥ राजन्! यज्ञमें दीक्षित हुए धर्मराज राजा युधिष्ठिर सोनेकी माला और कण्ठमें सोनेकी कण्ठी धारण किये प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४ ॥

कृष्णाजिनी दण्डपाणिः क्षौमवासाः स धर्मजः । विबभौ द्युतिमान् भूयः प्रजापतिरिवाध्वरे ॥ ५ ॥ काला मृगचर्म, हाथमें दण्ड और रेशमी वस्त्र धारण किये धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अधिक कान्तिमान् हो यज्ञमण्डपमें प्रजापतिकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ५ ॥

तथैवास्यर्त्विजः सर्वे तुल्यवेषा विशाम्पते । बभूवुरर्जुनश्चापि प्रदीप्त इव पावकः ॥ ६ ॥ प्रजानाथ! उनके समस्त ऋत्विज् भी उन्हींके समान वेश-भूषा धारण किये सुशोभित होते थे। अर्जुन भी प्रज्वलित अग्निके समान दीप्तिमान् हो रहे थे ॥ ६ ॥

श्वेताश्वः कृष्णसारं तं ससाराश्वं धनंजयः । विधिवत् पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥ ७ ॥ भूपाल जनमेजय! श्वेत घोड़ेवाले अर्जुनने धर्मराजकी आज्ञासे उस यज्ञसम्बन्धी अश्वका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ७ ॥

विक्षिपन् गाण्डिवं राजन् बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । तमश्वं पृथिवीपाल मुदा युक्तः ससार च ॥ ८ ॥ पृथिवीपाल! राजन्! अर्जुनने अपने हाथोंमें गोधाके चमड़ेके बने दस्ताने पहन रखे थे। वे गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ अश्वके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ ८ ॥

आकुमारं तदा राजन्नागमत् तत्पुरं विभो । द्रष्टुकामं कुरुश्रेष्ठं प्रयास्यन्तं धनंजयम् ॥ ९ ॥ जनमेजय! प्रभो! उस समय यात्रा करते हुए कुरुश्रेष्ठ अर्जुनको देखनेके लिये बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सारा हस्तिनापुर वहाँ उमड़ आया था ॥ ९ ॥

तेषामन्योन्यसम्मर्दादूष्मेव समजायत । दिदृक्षूणां हयं तं च तं चैव हयसारिणम् ॥ १० ॥ यज्ञके घोड़े और उसके पीछे जानेवाले अर्जुनको देखनेकी इच्छासे लोगोंकी इतनी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी कि आपसकी धक्का-मुक्कीसे सबके बदनमें पसीने निकल

आये ।। १० ।। ततः शब्दो महाराज दिशः खं प्रति पूरयन् । बभूव प्रेक्षतां नृणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ।। ११ ।। महाराज! उस समय कुन्तीपुत्र धनंजयका दर्शन करनेवाले लोगोंके मुखसे जो शब्द निकलता था, वह सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशमें गूँज रहा था ।। ११ ।। एष गच्छति कौन्तेय तुरगश्चैव दीप्तिमान् । यमन्वेति महाबाहुः संस्पृशन् धनुरुत्तमम् ।। १२ ।। (लोग कहते थे—) 'ये कुन्तीकुमार अर्जुन जा रहे हैं और वह दीप्तिमान् अश्व जा रहा है, जिसके पीछे महाबाहु अर्जुन उत्तम धनुष धारण किये जा रहे हैं' ।। १२ ।। एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः । स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत ।। १३ ।। उदारबुद्धि अर्जुनने परस्पर वार्तालाप करते हुए लोगोंकी बातें इस प्रकार सुनीं—'भारत! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सुखसे जाओ और पुनः कुशलपूर्वक लौट आओ' ।। १३ ।। अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमब्रुवन् । नैनं पश्याम सम्मर्दे धनुरेतत् प्रदृश्यते ।। १४ ।। एतद्धि भीमनिर्ह्रादं विश्रुतं गाण्डिवं धनुः । स्वस्ति गच्छत्वरिष्टो वै पन्थानमकुतोभयम् ।। १५ ।। निवृत्तमेनं द्रक्ष्यामः पुनरेष्यति च ध्रुवम् । नरेन्द्र! दूसरे लोग ये बातें कहते थे—'इस भीड़में हम अर्जुनको तो नहीं देखते हैं; किंतु उनका यह धनुष दिखायी देता है। यही वह भयंकर टंकार करनेवाला विख्यात गाण्डीव धनुष है। अर्जुनकी यात्रा सकुशल हो। उन्हें मार्गमें कोई कष्ट न हो। ये निर्भय मार्गपर आगे बढ़ते रहें। ये निश्चय ही कुशलपूर्वक लौटेंगे और उस समय हम फिर इनका दर्शन करेंगे' ।। १४-१५ १/२ ।। एवमाद्या मनुष्याणां स्त्रीणां च भरतर्षभ ।। १६ ।। शुश्राव मधुरा वाचः पुनः पुनरुदारधीः । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उदारबुद्धि अर्जुन स्त्रियों और पुरुषोंकी कही हुई मीठी-मीठी बातें बारंबार सुनते थे ।। १६ १/२ ।। याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि ।। १७ ।। प्रायात् पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः । याज्ञवल्क्य मुनिके एक विद्वान् शिष्य, जो यज्ञकर्ममें कुशल तथा वेदोंमें पारंगत थे, विघ्नकी शान्तिके लिये अर्जुनके साथ गये ।। १७ १/२ ।। ब्राह्मणाश्च महीपाल बहवो वेदपारगाः ।। १८ ।।

अनुजग्मुर्महात्मानं क्षत्रियाश्च विशाम्पते ।
विधिवत् पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥ १९ ॥
महाराज! प्रजानाथ! उनके सिवा और भी बहुत-से वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणों और क्षत्रियोंने धर्मराजकी आज्ञासे विधिपूर्वक महात्मा अर्जुनका अनुसरण किया ॥ १८-१९ ॥
पाण्डवैः पृथिवीमश्वो निर्जितामस्त्रतेजसा ।
चचार स महाराज यथादेशं च सत्तम ॥ २० ॥
महाराज! साधुशिरोमणे! पाण्डवोंने अपने अस्त्रके प्रतापसे जिस पृथिवीको जीता था, उसके सभी देशोंमें वह अश्व क्रमशः विचरण करने लगा ॥ २० ॥
तत्र युद्धानि वृत्तानि यान्यासन् पाण्डवस्य ह ।
तानि वक्ष्यामि ते वीर विचित्राणि महान्ति च ॥ २१ ॥
वीर! उन देशोंमें अर्जुनको जो बड़े-बड़े अद्भुत युद्ध करने पड़े, उनकी कथा तुम्हें सुना रहा हूँ ॥ २१ ॥
स हयः पृथिवीं राजन् प्रदक्षिणमवर्तत ।
ससारोत्तरतः पूर्वं तन्निबोध महीपते ॥ २२ ॥
अवमृद्नन् स राष्ट्राणि पार्थिवानां हयोत्तमः ।
शनैस्तदा परिययौ श्वेताश्वश्च महारथः ॥ २३ ॥
पृथ्‍वीनाथ! वह घोड़ा पृथ्‍वीकी प्रदक्षिणा करने लगा। सबसे पहले वह उत्तर दिशाकी ओर गया। फिर राजाओंके अनेक राज्योंको रौंदता हुआ वह उत्तम अश्व पूर्वकी ओर मुड़ गया। उस समय श्वेतवाहन महारथी अर्जुन धीरे-धीरे उसके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥
तत्र संगणना नास्ति राज्ञामयुतशस्तदा ।
येऽयुध्यन्त महाराज क्षत्रिया हतबान्धवाः ॥ २४ ॥
महाराज! महाभारत-युद्धमें जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, ऐसे जिन-जिन क्षत्रियोंने उस समय अर्जुनके साथ युद्ध किया था, उन हजारों नरेशोंकी कोई गिनती नहीं है ॥ २४ ॥
किराता यवना राजन् बहवोऽसिधनुर्धराः ।
म्लेच्छाश्चान्ये बहुविधाः पूर्वं ये निकृता रणे ॥ २५ ॥
राजन्! तलवार और धनुष धारण करनेवाले बहुत-से किरात, यवन और म्लेच्छ, जो पहले महाभारत-युद्धमें पाण्डवोंद्वारा परास्त किये गये थे, अर्जुनका सामना करनेके लिये आये ॥ २५ ॥
आर्याश्च पृथिवीपालाः प्रहृष्टनरवाहनाः ।
समीयुः पाण्डुपुत्रेण बहवो युद्धदुर्मदाः ॥ २६ ॥
हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों और वाहनोंसे युक्त बहुत-से रणदुर्मद आर्य नरेश भी पाण्डुपुत्र अर्जुनसे भिड़े थे ॥
एवं वृत्तानि युद्धानि तत्र तत्र महीपते ।

अर्जुनस्य महीपालैर्नानादेशसमागतैः ॥ २७ ॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानोंमें नाना देशोंसे आये हुए राजाओंके साथ अर्जुनको अनेक बार युद्ध करने पड़े ॥ २७ ॥ यानि तूभयतो राजन् प्रतप्तानि महान्ति च । तानि युद्धानि वक्ष्यामि कौन्तेयस्य तवानघ ॥ २८ ॥ निष्पाप नरेश! जो युद्ध दोनों पक्षके योद्धाओंके लिये अधिक कष्टदायक और महान् थे, अर्जुनके उन्हीं युद्धोंका मैं यहाँ तुमसे वर्णन करूँगा ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरणविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1948)

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चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय

वैशम्पायन उवाच

त्रिगर्तैरभवद् युद्धं कृतवैरैः किरीटिनः ।
महारथसमाज्ञातैर्हतानां पुत्रनप्तृभिः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कुरुक्षेत्रके युद्धमें जो त्रिगर्त वीर मारे गये थे, उनके महारथी पुत्रों और पौत्रोंने किरीटधारी अर्जुनके साथ वैर बाँध लिया था। त्रिगर्तदेशमें जानेपर अर्जुनका उन त्रिगर्तोंके साथ घोर युद्ध हुआ था ॥ १ ॥

ते समाज्ञाय सम्प्राप्तं यज्ञियं तुरगोत्तमम् ।
विषयान्तं ततो वीरा दंशिताः पर्यवारयन् ॥ २ ॥
रथिनो बद्धतूणीराः सदश्वैः समलंकृतैः ।
परिवार्य हयं राजन् ग्रहीतुं सम्प्रचक्रमुः ॥ ३ ॥
‘पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है’ यह जानकर त्रिगर्तवीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे-सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया। राजन्! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे ॥ २-३ ॥

ततः किरीटी संचिन्त्य तेषां तत्र चिकीर्षितम् ।
वारयामास तान् वीरान् सान्त्वपूर्वमरिंदमः ॥ ४ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले अर्जुन यह जान गये कि वे क्या करना चाहते हैं। उनके मनोभावका विचार करके वे उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए युद्धसे रोकने लगे ॥ ४ ॥

तदनादृत्य ते सर्वे शरैरभ्यहनंस्तदा ।
तमोरजोभ्यां संछन्नांस्तान् किरीटी न्यवारयत् ॥ ५ ॥
किंतु वे सब उनकी बातकी अवहेलना करके उन्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचाने लगे। तमोगुण और रजोगुणके वशीभूत हुए उन त्रिगर्तोंको किरीटीने युद्धसे रोकनेकी पूरी चेष्टा की ॥ ५ ॥

तानब्रवीत् ततो जिष्णुः प्रहसन्निव भारत ।
निवर्तध्वमधर्मज्ञाः श्रेयो जीवितमेव च ॥ ६ ॥
भारत! तदनन्तर विजयशील अर्जुन हँसते हुए-से बोले—‘धर्मको न जाननेवाले पापात्माओ! लौट जाओ। जीवनकी रक्षामें ही तुम्हारा कल्याण है’ ॥ ६ ॥

स हि वीरः प्रयास्यन् वै धर्मराजेन वारितः ।
हतबान्धवा न ते पार्थ हन्तव्याः पार्थिवा इति ॥ ७ ॥

वीर अर्जुनने ऐसा इसलिये कहा कि चलते समय धर्मराज युधिष्ठिरने यह कहकर मना कर दिया था कि ‘कुन्तीनन्दन! जिन राजाओंके भाई-बन्धु कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये हैं, उनका तुम्हें वध नहीं करना चाहिये’ ॥ ७ ॥ स तदा तद् वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः । तान् निवर्तध्वमित्याह न न्यवर्तन्त चापि ते ॥ ८ ॥ बुद्धिमान् धर्मराजके इस आदेशको सुनकर उसका पालन करते हुए ही अर्जुनने त्रिगर्तोंको लौट जानेकी आज्ञा दी तथापि वे नहीं लौटे ॥ ८ ॥ ततस्त्रिगर्तराजानं सूर्यवर्माणमाहवे । विचित्य शरजालेन प्रजहास धनंजयः ॥ ९ ॥ तब उस युद्धस्थलमें त्रिगर्तराज सूर्यवर्माके सारे अंगोंमें बाण धँसाकर अर्जुन हँसने लगे ॥ ९ ॥ ततस्ते रथघोषेण रथनेमिस्वनेन च । पूरयन्तो दिशः सर्वा धनंजयमुपाद्रवन् ॥ १० ॥ यह देख त्रिगर्तदेशीय वीर रथकी घरघराहट और पहियोंकी आवाजसे सारी दिशाओंको गूँजाते हुए वहाँ अर्जुनपर टूट पड़े ॥ १० ॥ सूर्यवर्मा ततः पार्थे शराणां नतपर्वणाम् । शतान्यमुञ्चद् राजेन्द्र लघ्वस्त्रमभिदर्शयन् ॥ ११ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर सूर्यवर्माने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक सौ बाणोंका प्रहार किया ॥ ११ ॥ तथैवान्ये महेष्वासा ये च तस्यानुयायिनः । मुमुचुः शरवर्षाणि धनंजयवधैषिणः ॥ १२ ॥ इसी प्रकार उसके अनुयायी वीरोंमें भी जो दूसरे-दूसरे महान् धनुर्धर थे, वे भी अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १२ ॥ स तान् ज्यामुखनिर्मुक्तैर्बहुभिः सुबहून् शरान् । चिच्छेद पाण्डवो राजंस्ते भूमौ न्यपतंस्तदा ॥ १३ ॥ राजन्! पाण्डुपुत्र अर्जुनने अपने धनुषकी प्रत्यंचासे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंद्वारा शत्रुओंके बहुत-से बाणोंको काट डाला। वे कटे हुए बाण टुकड़े-टुकड़े होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३ ॥ केतुवर्मा तु तेजस्वी तस्यैवावरजो युवा । युयुधे भ्रातुरर्थाय पाण्डवेन यशस्विना ॥ १४ ॥ (सूर्यवर्माके परास्त होनेपर) उसका छोटा भाई केतुवर्मा जो एक तेजस्वी नवयुवक था, अपने भाईका बदला लेनेके लिये यशस्वी वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ॥ १४ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य केतुवर्माणमाहवे । अभ्यघ्नन्निशितैर्बाणैर्बीभत्सुः परवीरहा ॥ १५ ॥ केतुवर्माको युद्धस्थलमें धावा करते देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे उसे मार डाला ॥ १५ ॥

केतुवर्माण्यभिहते धृतवर्मा महारथः । रथेनाशु समुत्पत्य शरैर्जिष्णुमवाकिरत् ॥ १६ ॥ केतुवर्माके मारे जानेपर महारथी धृतवर्मा रथके द्वारा शीघ्र ही वहाँ आ धमका और अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १६ ॥

तस्य तां शीघ्रतामीक्ष्य तुतोषातीव वीर्यवान् । गुडाकेशो महातेजा बालस्य धृतवर्मणः ॥ १७ ॥ धृतवर्मा अभी बालक था तो भी उसकी उस फुर्तीको देखकर महातेजस्वी पराक्रमी अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए ॥

न संदधानं ददृशे नाददानं च तं तदा । किरन्तमेव स शरान् ददृशे पाकशासनिः ॥ १८ ॥ वह कब बाण हाथमें लेता है और कब उसे धनुषपर चढ़ाता है, उसको इन्द्रकुमार अर्जुन भी नहीं देख पाते थे। उन्हें केवल इतना ही दिखायी देता था कि वह बाणोंकी वर्षा कर रहा है ॥ १८ ॥

स तु तं पूजयामास धृतवर्माणमाहवे । मनसा तु मुहूर्तं वै रणे समभिहर्षयन् ॥ १९ ॥ उन्होंने रणभूमिमें थोड़ी देरतक मन-ही-मन धृतवर्माकी प्रशंसा की और युद्धमें उसका हर्ष एवं उत्साह बढ़ाते रहे ॥ १९ ॥

तं पन्नगमिव क्रुद्धं कुरुवीरः स्मयन्निव । प्रीतिपूर्वं महाबाहुः प्राणैर्न व्यपरोपयत् ॥ २० ॥ यद्यपि धृतवर्मा सर्पके समान क्रोधमें भरा हुआ था तो भी कुरुवीर महाबाहु अर्जुन प्रेमपूर्वक मुसकराते हुए युद्ध करते थे। उन्होंने उसके प्राण नहीं लिये ॥ २० ॥

स तथा रक्ष्यमाणो वै पार्थेनामिततेजसा । धृतवर्मा शरं दीप्तं मुमोच विजये तदा ॥ २१ ॥ इस प्रकार अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा जानबूझकर छोड़ दिये जानेपर धृतवर्माने उनके ऊपर एक अत्यन्त प्रज्वलित बाण चलाया ॥ २१ ॥

स तेन विजयस्तूर्णमासीद् विद्धः करे भृशम् । मुमोच गाण्डिवं मोहात् तत् पपाताथ भूतले ॥ २२ ॥ उस बाणने तुरन्त आकर अर्जुनके हाथमें गहरी चोट पहुँचायी। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनका गाण्डीव धनुष हाथसे छूटकर पृथ्वीपर जा पड़ा ॥ २२ ॥

धनुषः पततस्तस्य सव्यसाचिकराद् विभो । बभूव सदृशं रूपं शक्रचापस्य भारत ॥ २३ ॥ प्रभो! भरतनन्दन! अर्जुनके हाथसे गिरते हुए उस धनुषका रूप इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होता था ॥ २३ ॥ तस्मिन् निपतिते दिव्ये महाधनुषि पार्थिवः । जहास सस्वनं हासं धृतवर्मा महाहवे ॥ २४ ॥ उस दिव्य महाधनुषके गिर जानेपर महासमरमें खड़ा हुआ धृतवर्मा ठहाका मारकर जोर-जोरसे हँसने लगा ॥ २४ ॥ ततो रोषार्दितो जिष्णुः प्रमृज्य रुधिरं करात् । धनुरादत्त तद् दिव्यं शरवर्षैरवर्ष च ॥ २५ ॥ इससे अर्जुनका रोष बढ़ गया। उन्होंने हाथसे रक्त पोंछकर उस दिव्य धनुषको पुनः उठा लिया और धृतवर्मापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २५ ॥ ततो हलहलाशब्दो दिवस्पृगभवत् तदा । नानाविधानां भूतानां तत्कर्माणि प्रशंसताम् ॥ २६ ॥ फिर तो अर्जुनके उस पराक्रमकी प्रशंसा करते हुए नाना प्रकारके प्राणियोंका कोलाहल समूचे आकाशमें व्याप्त हो गया ॥ २६ ॥ ततः सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धं कालान्तकयमोपमम् । जिष्णुं त्रैगर्तका योधाः परीताः पर्यवारयन् ॥ २७ ॥ अर्जुनको काल, अन्तक और यमराजके समान कुपित हुआ देख त्रिगर्तदेशीय योद्धाओंने चारों ओरसे आकर उन्हें घेर लिया ॥ २७ ॥ अभिसृत्य परीप्सार्थं ततस्ते धृतवर्मणः । परिवव्रुर्गुडाकेशं तत्राक्रुद्ध्यद् धनंजयः ॥ २८ ॥ धृतवर्माकी रक्षाके लिये सहसा आक्रमण करके त्रिगर्तोंने गुडाकेश अर्जुनको जब सब ओरसे घेर लिया, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ ॥ २८ ॥ ततो योधन् जघानाशु तेषां स दश चाष्ट च । महेन्द्रवज्रप्रतिमैरायसैर्बहुभिः शरैः ॥ २९ ॥ फिर तो उन्होंने इन्द्रके वज्रकी भाँति दुस्सह लौहनिर्मित बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बात-की-बातमें उनके अठारह प्रमुख योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दिया ॥ २९ ॥ तान् सम्प्रभग्नान् सम्प्रेक्ष्य त्वरमाणो धनंजयः । शरैराशीविषाकारैर्जघान स्वनवद्धसन् ॥ ३० ॥ तब तो त्रिगर्तोंमें भगदड़ मच गयी। उन्हें भागते देख अर्जुनने जोर-जोरसे हँसते हुए बड़ी उतावलीके साथ सर्पाकार बाणोंद्वारा उन सबको मारना आरम्भ किया ॥ ३० ॥ ते भग्नमनसः सर्वे त्रैगर्तकमहारथाः ।

दिशोऽभिदुद्रुवू राजन् धनंजयशरार्दिताः ॥ ३१ ॥
राजन्! धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए समस्त त्रिगर्तदेशीय महारथियोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया; अतः वे चारों दिशाओंमें भाग चले ॥ ३१ ॥
तमूचुः पुरुषव्याघ्रं संशप्तकनिषूदनम् ।
तवास्म किंकराः सर्वे सर्वे वै वशगास्तव ॥ ३२ ॥
उनमेंसे कितने ही संशप्तकसूदन पुरुषसिंह अर्जुनसे इस प्रकार कहने लगे—‘कुन्तीनन्दन! हम सब आपके आज्ञाकारी सेवक हैं और सभी सदा आपके अधीन रहेंगे ॥ ३२ ॥
आज्ञापयस्व नः पार्थ प्रह्वान् प्रेष्यानवस्थितान् ।
करिष्यामः प्रियं सर्वं तव कौरवनन्दन ॥ ३३ ॥
‘पार्थ! हम सभी सेवक विनीत भावसे आपके सामने खड़े हैं। आप हमें आज्ञा दें। कौरवनन्दन! हम सब लोग आपके समस्त प्रिय कार्य सदा करते रहेंगे’ ॥ ३३ ॥
एतदाज्ञाय वचनं सर्वांस्तानब्रवीत् तदा ।
जीवितं रक्षत नृपाः शासनं प्रतिगृह्यताम् ॥ ३४ ॥
उनकी ये बातें सुनकर अर्जुनने उनसे कहा—‘राजाओ! अपने प्राणोंकी रक्षा करो। इसका एक ही उपाय है, हमारा शासन स्वीकार कर लो’ ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि त्रिगर्तपराभवे
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें त्रिगर्तोकी पराजयविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1953)

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनका प्राग्ज्योतिषपुरके राजा वज्रदत्तके साथ युद्ध

वैशम्पायन उवाच

प्राग्ज्योतिषमथाभ्येत्य व्यचरत् स हयोत्तमः ।
भगदत्तात्मजस्तत्र निर्ययौ रणकर्कशः ॥ १ ॥
स हयं पाण्डुपुत्रस्य विषयान्तमुपागतम् ।
युयुधे भरतश्रेष्ठ वज्रदत्तो महीपतिः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर वह उत्तम अश्व प्राग्ज्योतिषपुरके पास पहुँचकर विचरने लगा। वहाँ भगदत्तका पुत्र वज्रदत्त राज्य करता था, जो युद्धमें बड़ा ही कठोर था। भरतश्रेष्ठ! जब उसे पता लगा कि पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरका अश्व मेरे राज्यकी सीमामें आ गया है, तब राजा वज्रदत्त नगरसे बाहर निकला और युद्धके लिये तैयार हो गया ॥ १-२ ॥

सोऽभिनिर्याय नगराद् भगदत्तसुतो नृपः ।
अश्वमायान्तमुन्मथ्य नगराभिमुखो ययौ ॥ ३ ॥
नगरसे निकलकर भगदत्तकुमार राजा वज्रदत्तने अपनी ओर आते हुए घोड़ेको बलपूर्वक पकड़ लिया और उसे साथ लेकर वह नगरकी ओर चला ॥ ३ ॥

तमालक्ष्य महाबाहुः कुरूणामृषभस्तदा ।
गाण्डीवं विक्षिपंस्तूर्णं सहसा समुपाद्रवत् ॥ ४ ॥
उसको ऐसा करते देख कुरुश्रेष्ठ महाबाहु अर्जुनने गाण्डीव धनुषपर टंकार देते हुए सहसा वेगपूर्वक उसपर धावा किया ॥ ४ ॥

ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैरिषुभिर्मोहितो नृपः ।
हयमुत्सृज्य तं वीरस्ततः पार्थमुपाद्रवत् ॥ ५ ॥
पुनः प्रविश्य नगरं दंशितः स नृपोत्तमः ।
आरुह्य नागप्रवरं निर्ययौ रणकर्कशः ॥ ६ ॥
गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंके प्रहारसे व्याकुल हो वीर राजा वज्रदत्तने उस घोड़ेको तो छोड़ दिया और स्वयं पुनः नगरमें प्रवेश करके कवच आदिसे सुसज्जित हो एक श्रेष्ठ गजराजपर चढ़कर वह रणकर्कश नरेश युद्धके लिये बाहर निकला। आते ही उसने पार्थपर धावा बोल दिया ॥ ५-६ ॥

पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।
दोधूयता चामरेण श्वेतेन च महारथः ॥ ७ ॥
ततः पार्थं समासाद्य पाण्डवानां महारथम् ।

आह्वयामास बीभत्सुं बाल्यान्मोहाच्च संयुगे ॥ ८ ॥
उसने मस्तकपर श्वेत छत्र धारण कर रखा था। सेवक श्वेत चवँर झुला रहे थे। पाण्डव महारथी पार्थके पास पहुँचकर उस महारथी नरेशने बालचापल्य और मूर्खताके कारण उन्हें युद्धके लिये ललकारा ॥ ७-८ ॥
स वारणं नगप्रख्यं प्रभिन्नकरटामुखम् ।
प्रेषयामास संक्रुद्धः श्वेताश्वं प्रति पार्थिवः ॥ ९ ॥
क्रोधमें भरे हुए राजा वज्रदत्तने श्वेतवाहन अर्जुनकी ओर अपने पर्वताकार विशालकाय गजराजको, जिसके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही थी, बढ़ाया ॥ ९ ॥
विक्षरन्तं महामेघं परवारणवारणम् ।
शास्त्रवत् कल्पितं संख्ये विवशं युद्धदुर्मदम् ॥ १० ॥
वह महान् मेघके समान मदकी वर्षा करता था। शत्रुपक्षके हाथियोंको रोकनेमें समर्थ था। उसे शास्त्रीय विधिके अनुसार युद्धके लिये तैयार किया गया था। वह स्वामीके अधीन रहनेवाला और युद्धमें दुर्धर्ष था ॥ १० ॥
प्रचोद्यमानः स गजस्तेन राज्ञा महाबलः ।
तदाङ्कुशेन विबभावुत्पतिष्यन्निवाम्बरम् ॥ ११ ॥
राजा वज्रदत्तने जब अंकुशसे मारकर उस महाबली हाथीको आगे बढ़नेके लिये प्रेरित किया, तब वह इस तरह आगेकी ओर झपटा, मानो वह आकाशमें उड़ जायगा ॥ ११ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य क्रुद्धो राजन् धनंजयः ।
भूमिष्ठो वारणगतं योधयामास भारत ॥ १२ ॥
राजन्! भरतनन्दन! उसे इस प्रकार आक्रमण करते देख अर्जुन कुपित हो उठे। वे पृथ्वीपर स्थित होते हुए भी हाथीपर चढ़े हुए वज्रदत्तके साथ युद्ध करने लगे ॥ १२ ॥
वज्रदत्तस्ततः क्रुद्धो मुमोचाशु धनंजये ।
तोमरानग्निसंकाशान् शलभानिव वेगितान् ॥ १३ ॥
उस समय वज्रदत्तने कुपित होकर तुरंत ही अर्जुनपर अग्निके समान प्रज्वलित तोमर चलाये, जो वेगसे उड़नेवाले पतंगोंके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
अर्जुनस्तानसम्प्राप्तान् गाण्डीवप्रभवैः शरैः ।
द्विधा त्रिधा च चिच्छेद ख एव खगमैस्तदा ॥ १४ ॥
वे तोमर अभी पास भी नहीं आने पाये थे कि अर्जुनने गाण्डीव धनुषद्वारा छोड़े गये आकाशचारी बाणोंद्वारा आकाशमें ही एक-एक तोमरके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर डाले ॥ १४ ॥
स तान् दृष्ट्वा तथा छिन्नांस्तोमरान् भगदत्तजः ।
इषूनसक्तांस्त्वरितः प्राहिणोत् पाण्डवं प्रति ॥ १५ ॥

इस प्रकार उन तोमरोंके टुकड़े-टुकड़े हुए देख भगदत्तके पुत्रने पाण्डुनन्दन अर्जुनपर शीघ्रतापूर्वक लगातार बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १५ ॥

ततोऽर्जुनस्तूर्णतरं रुक्मपुङ्खानजिह्मगान् ।
प्रेषयामास संक्रुद्धो भगदत्तात्मजं प्रति ॥ १६ ॥
स तैर्विद्धो महातेजा वज्रदत्तो महामृधे ।
भृशाहतः पपातोर्व्यां न त्वेनमजहात् स्मृतिः ॥ १७ ॥
तब कुपित हुए अर्जुनने तुरंत ही सोनेके पंखोंसे युक्त सीधे जानेवाले बाण वज्रदत्तपर चलाये। उन बाणोंसे अत्यन्त आहत और घायल होकर उस महासमरमें महातेजस्वी वज्रदत्त हाथीकी पीठसे पृथ्वीपर गिर पड़ा; परंतु इतनेपर भी वह बेहोश नहीं हुआ ॥ १६-१७ ॥

ततः स पुनरारुह्य वारणप्रवरं रणे ।
अव्यग्रः प्रेषयामास जयार्थी विजयं प्रति ॥ १८ ॥
तदनन्तर वज्रदत्तने पुनः उस श्रेष्ठ गजराजपर आरूढ़ हो रणभूमिमें बिना किसी घबराहटके विजयकी अभिलाषा रखकर अर्जुनकी ओर उस हाथीको बढ़ाया ॥ १८ ॥

तस्मै बाणांस्ततो जिष्णुर्निर्मुक्ताशीविषोपमान् ।
प्रेषयामास संक्रुद्धो ज्वलितज्वलनोपमान् ॥ १९ ॥
यह देख अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने उस हाथीके ऊपर केंचुलसे निकले हुए सर्पोंके समान भयंकर तथा प्रज्वलित अग्निके तुल्य तेजस्वी बाणोंका प्रहार किया ॥ १९ ॥

स तैर्विद्धो महानागो विस्रवन् रुधिरं वभौ ।
गैरिकाक्तमिवाम्भोऽद्रिर्बहुप्रस्रवणं तदा ॥ २० ॥
उन बाणोंसे घायल होकर वह महानाग खूनकी धारा बहाने लगा। उस समय वह गेरूमिश्रित जलकी धारा बहानेवाले अनेक झरनोंसे युक्त पर्वतके समान जान पड़ता था ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वज्रदत्तयुद्धे पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनका वज्रदत्तके साथ युद्धविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥