महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2248)
द्वितीयोऽध्यायः
पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव
वैशम्पायन उवाच
एवं सम्पूजितो राजा पाण्डवैरम्बिकासुतः । विजहार यथापूर्वमृषिभिः पर्युपासितः ॥ १ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार पाण्डवोंसे भलीभाँति सम्मानित हो अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र पूर्ववत् ऋषियोंके साथ गोष्ठी-सुखका अनुभव करते हुए वहाँ सानन्द निवास करने लगे ॥ १ ॥
ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च प्रददौ स कुरूद्वहः । तच्च कुन्तीसुतो राजा सर्वमेवान्वपद्यत ॥ २ ॥ कुरुकुलके स्वामी महाराज धृतराष्ट्र ब्राह्मणोंको देनेयोग्य अग्रहार (माफी जमीन) देते थे और कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर सभी कार्योंमें उन्हें सहयोग देते थे ॥ २ ॥
आनृशंस्यपरो राजा प्रीयमाणो युधिष्ठिरः । उवाच स तदा भ्रातॄनमात्यांश्च महीपतिः ॥ ३ ॥ मया चैव भवद्भिश्च मान्य एष नराधिपः । निदेशे धृतराष्ट्रस्य यस्तिष्ठति स मे सुहृत् ॥ ४ ॥ विपरीतश्च मे शत्रुर्नियम्यश्च भवेन्नरः । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि ‘ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है। विपरीत आचरण करनेवाला मेरा शत्रु है। वह मेरे दण्डका भागी होगा ॥ ३-४ १/२ ॥
पितृवृत्तेषु चाहःसु पुत्राणां श्राद्धकर्मणि ॥ ५ ॥ सुहृदां चैव सर्वेषां यावदस्य चिकीर्षितम् । ‘पिता आदिकी क्षयाह तिथियोंपर तथा पुत्रों और समस्त सुहृदोंके श्राद्धकर्ममें राजा धृतराष्ट्र जितना धन खर्च करना चाहें, वह सब इन्हें मिलना चाहिये’ ॥ ५ १/२ ॥
ततः स राजा कौरव्यो धृतराष्ट्रो महामनाः ॥ ६ ॥ ब्राह्मणेभ्यो यथार्हेभ्यो ददौ वित्तान्यनेकशः । धर्मराजश्च भीमश्च सव्यसाची यमावपि ॥ ७ ॥ तत् सर्वमन्ववर्तन्त तस्य प्रियचिकीर्षया । तदनन्तर महामना कुरुकुलनन्दन राजा धृतराष्ट्र उक्त अवसरोंपर सुयोग्य ब्राह्मणोंको बारम्बार प्रचुर धनका दान करते थे। धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, सव्यसाची अर्जुन और
नकुल-सहदेव भी उनका प्रिय करनेकी इच्छासे सब कार्योंमें उनका साथ देते थे ॥ कथं नु राजा वृद्धः स पुत्रपौत्रवधार्दितः ॥ ८ ॥ शोकमस्मत्कृतं प्राप्य न म्रियेतेति चिन्त्यते । उन्हें सदा इस बातकी चिन्ता बनी रहती थी कि पुत्र-पौत्रोंके वधसे पीड़ित हुए बूढ़े राजा धृतराष्ट्र हमारी ओरसे शोक पाकर कहीं अपने प्राण न त्याग दें ॥ ८ ½ ॥ यावद्धि कुरुवीरस्य जीवत्पुत्रस्य वै सुखम् ॥ ९ ॥ बभूव तदवाप्नोति भोगांश्चेति व्यवस्थिताः । अपने पुत्रोंकी जीवितावस्थामें कुरुवीर धृतराष्ट्रको जितने सुख और भोग प्राप्त थे, वे अब भी उन्हें मिलते रहें—इसके लिये पाण्डवोंने पूरी व्यवस्था की थी ॥ ९ ½ ॥ ततस्ते सहिताः पञ्च भ्रातरः पाण्डुनन्दनाः ॥ १० ॥ तथाशीलाः समातस्थुर्धृतराष्ट्रस्य शासने । इस प्रकारके शील और बर्तावसे युक्त होकर वे पाँचों भाई पाण्डव एक साथ धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अधीन रहते थे ॥ १० ½ ॥ धृतराष्ट्रश्च तान् सर्वान् विनीतान् नियमे स्थितान् ॥ ११ ॥ शिष्यवृत्तिं समापन्नान् गुरुवत् प्रत्यपद्यत । धृतराष्ट्र भी उन सबको परम विनीत, अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले और शिष्य-भावसे सेवामें संलग्न जानकर पिताकी भाँति उनसे स्नेह रखते थे ॥ गान्धारी चैव पुत्राणां विविधैः श्राद्धकर्मभिः ॥ १२ ॥ आनृण्यमगमत् कामान् विप्रेभ्यः प्रतिपाद्य सा । गान्धारी देवीने भी अपने पुत्रोंके निमित्त नाना प्रकारके श्राद्धकर्मका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन दान किया और ऐसा करके वे पुत्रोंके ऋणसे मुक्त हो गयीं ॥ १२ ½ ॥ एवं धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥ भ्रातृभिः सहितो धीमान् पूजयामास तं नृपम् । इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ रहकर सदा राजा धृतराष्ट्रका आदर-सत्कार करते रहते थे ॥ १३ ½ ॥ स राजा सुमहातेजा वृद्धः कुरुकुलोद्वहः ॥ १४ ॥ न ददर्श तदा किंचिदप्रियं पाण्डुनन्दने । कुरुकुलशिरोमणि महातेजस्वी बूढ़े राजा धृतराष्ट्रने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका कोई ऐसा बर्ताव नहीं देखा, जो उनके मनको अप्रिय लगनेवाला हो ॥ १४ ½ ॥ वर्तमानेषु सद्वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु ॥ १५ ॥ प्रीतिमानभवद् राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
महात्मा पाण्डव सदा अच्छा बर्ताव करते थे; इसलिये अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र उनके ऊपर बहुत प्रसन्न रहते थे ॥ १५ १/२ ॥ सौबलेयी च गान्धारी पुत्रशोकमपास्य तम् ॥ १६ ॥ सदैव प्रीतिमत्यासीत् तनयेषु निजेष्विव । सुबलपुत्री गान्धारी भी अपने पुत्रोंका शोक छोड़कर पाण्डवोंपर सदा अपने सगे पुत्रोंके समान प्रेम करती थीं ॥ १६ १/२ ॥ प्रियाण्येव तु कौरव्यो नाप्रियाणि कुरूद्वहः ॥ १७ ॥ वैचित्रवीर्ये नृपतौ समाचरत वीर्यवान् । पराक्रमी कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठिर महाराज धृतराष्ट्रका सदा प्रिय ही करते थे, अप्रिय नहीं करते थे ॥ १७ १/२ ॥ यद् यद् ब्रूते च किंचित् स धृतराष्ट्रो जनाधिपः ॥ १८ ॥ गुरु वा लघु वा कार्यं गान्धारी च तपस्विनी । तं स राजा महाराज पाण्डवानां धुरंधरः ॥ १९ ॥ पूजयित्वा वचस्तत् तदकार्षीत् परवीरहा । महाराज! राजा धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारी देवी ये दोनों जो कोई भी छोटा या बड़ा कार्य करनेके लिये कहते, पाण्डवधुरन्धर शत्रुसूदन राजा युधिष्ठिर उनके उस आदेशको सादर शिरोधार्य करके वह सारा कार्य पूर्ण करते थे ॥ १८-१९ १/२ ॥ तेन तस्याभवत् प्रीतो वृत्तेन स नराधिपः ॥ २० ॥ अन्वतप्यत संस्मृत्य पुत्रं तं मन्दचेतसम् । उनके उस बर्तावसे राजा धृतराष्ट्र सदा प्रसन्न रहते और अपने उस मन्दबुद्धि दुर्योधनको याद करके पछताया करते थे ॥ २० १/२ ॥ सदा च प्रातरुत्थाय कृतजप्यः शुचिर्नृपः ॥ २१ ॥ आशास्ते पाण्डुपुत्राणां समरेष्वपराजयम् । प्रतिदिन सबेरे उठकर स्नान-संध्या एवं गायत्रीजप कर लेनेके पश्चात् पवित्र हुए राजा धृतराष्ट्र सदा पाण्डवोंको समरविजयी होनेका आशीर्वाद देते थे ॥ ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्याथ हुत्वा चैव हुताशनम् ॥ २२ ॥ आयूंषि पाण्डुपुत्राणामाशंसत नराधिपः । ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अग्निमें हवन करनेके पश्चात् राजा धृतराष्ट्र सदा यह शुभकामना करते थे कि पाण्डवोंकी आयु बढ़े ॥ २२ १/२ ॥ न तां प्रीतिं परामाप पुत्रेभ्यः स कुरूद्वहः ॥ २३ ॥ यां प्रीतिं पाण्डुपुत्रेभ्यः सदावाप नराधिपः ।
राजा धृतराष्ट्रको सदा पाण्डवोंके बर्तावसे जितनी प्रसन्नता होती थी, उतनी उत्कृष्ट प्रीति उन्हें अपने पुत्रोंसे भी कभी प्राप्त नहीं हुई थी ॥ २३ १/२ ॥
ब्राह्मणानां यथावृत्तः क्षत्रियाणां यथाविधिः ॥ २४ ॥
तथा विट्शूद्रसंघानामभवत् स प्रियस्तदा ।
युधिष्ठिर ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके साथ जैसा सद्बर्ताव करते थे, वैसा ही वैश्यों और शूद्रोंके साथ भी करते थे। इसलिये वे उन दिनों सबके प्रिय हो गये थे ॥
यच्च किंचित् तदा पापं धृतराष्ट्रसुतैः कृतम् ॥ २५ ॥
अकृत्वा हृदि तत् पापं तं नृपं सोऽन्ववर्तत ।
धृतराष्ट्रके पुत्रोंने उनके साथ जो कुछ बुराई की थी, उसे अपने हृदयमें स्थान न देकर वे युधिष्ठिर राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें संलग्न रहते थे ॥ २५ १/२ ॥
यश्च कश्चिन्नरः किंचिदप्रियं वाम्बिकासुते ॥ २६ ॥
कुरुते द्वेष्यतामेति स कौन्तेयस्य धीमतः ।
जो कोई मनुष्य राजा धृतराष्ट्रका थोड़ा-सा भी अप्रिय कर देता, वह बुद्धिमान् कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके द्वेषका पात्र बन जाता था ॥ २६ १/२ ॥
न राज्ञो धृतराष्ट्रस्य न च दुर्योधनस्य वै ॥ २७ ॥
उवाच दुष्कृतं कश्चिद् युधिष्ठिरभयान्नरः ।
युधिष्ठिरके भयसे कोई भी मनुष्य कभी राजा धृतराष्ट्र और दुर्योधनके कुकृत्योंकी चर्चा नहीं करता था ॥
धृत्या तुष्टो नरेन्द्रः स गान्धारी विदुरस्तथा ॥ २८ ॥
शौचेन चाजातशत्रोर्न तु भीमस्य शत्रुहन् ।
शत्रुसूदन जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुरजी अजातशत्रु युधिष्ठिरके धैर्य और शुद्ध व्यवहारसे विशेष प्रसन्न थे, किंतु भीमसेनके बर्तावसे उन्हें संतोष नहीं था ॥ २८ १/२ ॥
अन्ववर्तत भीमोऽपि निश्चितो धर्मजं नृपम् ॥ २९ ॥
धृतराष्ट्रं च सम्प्रेक्ष्य सदा भवति दुर्मनाः ।
यद्यपि भीमसेन भी दृढ़ निश्चयके साथ युधिष्ठिरके ही पथका अनुसरण करते थे, तथापि धृतराष्ट्रको देखकर उनके मनमें सदा ही दुर्भावना जाग उठती थी ॥ २९ १/२ ॥
राजानमनुवर्तन्तं धर्मपुत्रममित्रहा ।
अन्ववर्तत कौरव्यो हृदयेन पराङ्मुखः ॥ ३० ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके अनुकूल बर्ताव करते देख शत्रुसूदन कुरुनन्दन भीमसेन स्वयं भी ऊपरसे उनका अनुसरण ही करते थे, तथापि उनका हृदय धृतराष्ट्रसे विमुख ही रहता था ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2253)
तृतीयोऽध्यायः
राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दुःखी होना
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्य नृपतेर्दुर्योधनपितुस्तदा ।
नान्तरं ददृशु राज्ये पुरुषाः प्रणयं प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा युधिष्ठिर और धृतराष्ट्रमें जो पारस्परिक प्रेम था, उसमें राज्यके लोगोंने कभी कोई अन्तर नहीं देखा ॥ १ ॥
यदा तु कौरवो राजा पुत्रं सस्मार दुर्मतिम् ।
तदा भीमं हृदा राजन्नपध्याति स पार्थिवः ॥ २ ॥
राजन्! परंतु वे कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र जब अपने दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधनका स्मरण करते थे, तब मन-ही-मन भीमसेनका अनिष्ट-चिन्तन किया करते थे ॥ २ ॥
तथैव भीमसेनोऽपि धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ।
नामर्षयत राजेन्द्र सदैव दुष्टवद्धृदा ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! उसी प्रकार भीमसेन भी सदा ही राजा धृतराष्ट्रके प्रति अपने मनमें दुर्भावना रखते थे। वे कभी उन्हें क्षमा नहीं कर पाते थे ॥ ३ ॥
अप्रकाशान्यप्रियाणि चकारास्य वृकोदरः ।
आज्ञां प्रत्यहरच्चापि कृतज्ञैः पुरुषैः सदा ॥ ४ ॥
भीमसेन गुप्त रीतिसे धृतराष्ट्रको अप्रिय लगनेवाले काम किया करते थे तथा अपने द्वारा नियुक्त किये हुए कृतज्ञ पुरुषोंसे उनकी आज्ञा भी भंग करा दिया करते थे ॥
स्मरन् दुर्मन्त्रितं तस्य वृत्तान्यप्यस्य कानिचित् ।
अथ भीमः सुहृन्मध्ये बाहुशब्दं तथाकरोत् ॥ ५ ॥
संश्रवे धृतराष्ट्रस्य गान्धार्याश्चाप्यमर्षणः ।
स्मृत्वा दुर्योधनं शत्रुं कर्णदुःशासनावपि ॥ ६ ॥
प्रोवाचेदं सुसंरब्धो भीमः स परुषं वचः ।
राजा धृतराष्ट्रकी जो दुष्टतापूर्ण मन्त्रणाएँ होती थीं और तदनुसार ही जो उनके कई दुर्वर्ताव हुए थे, उन्हें सदा भीमसेन याद रखते थे। एक दिन अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने अपने मित्रोंके बीचमें बारंबार अपनी भुजाओंपर ताल ठोंका और धृतराष्ट्र एवं गान्धारीको सुनाते हुए रोषपूर्वक यह कठोर वचन कहा। वे अपने शत्रु दुर्योधन, कर्ण और दुःशासनको याद करके यों कहने लगे— ॥ ५-६½ ॥
अन्धस्य नृपतेः पुत्रा मया परिघबाहुना ॥ ७ ॥
नीता लोकममुं सर्वे नानाशास्त्रास्त्रयोधिनः ।
'मित्रो! मेरी भुजाएँ परिघके समान सुदृढ़ हैं। मैंने ही उस अंधे राजाके समस्त पुत्रोंको, जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा युद्ध करते थे, यमलोकका अतिथि बनाया है ॥ ७½ ॥
इमौ तौ परिघप्रख्यौ भुजौ मम दुरासदौ ॥ ८ ॥
ययोरन्तरमासाद्य धार्तराष्ट्राः क्षयं गताः ।
'देखो, ये हैं मेरे दोनों परिघके समान सुदृढ़ एवं दुर्जय बाहुदण्ड; जिनके बीचमें पड़कर धृतराष्ट्रके बेटे पिस गये हैं ॥ ८½ ॥
ताविमौ चन्दनेनाक्तौ चन्दनाहौँ च मे भुजौ ॥ ९ ॥
याभ्यां दुर्योधनो नीतः क्षयं ससुतबान्धवः ।
'ये मेरी दोनों भुजाएँ चन्दनसे चर्चित एवं चन्दन लगानेके ही योग्य हैं, जिनके द्वारा पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंसहित राजा दुर्योधन नष्ट कर दिया गया' ॥ ९½ ॥
एताश्चान्याश्च विविधाः शल्यभूता नराधिपः ॥ १० ॥
वृकोदरस्य ता वाचः श्रुत्वा निर्वेदमागमत् ।
ये तथा और भी नाना प्रकारकी भीमसेनकी कही हुई कठोर बातें जो हृदयमें काँटोंके समान कसक पैदा करनेवाली थीं, राजा धृतराष्ट्रने सुनीं। सुनकर उन्हें बड़ा खेद हुआ ॥ १०½ ॥
सा च बुद्धिमती देवी कालपर्यायवेदिनी ॥ ११ ॥
गान्धारी सर्वधर्मज्ञा तान्यलीकानि शुश्रुवे ।
समयके उलट-फेरको समझने और समस्त धर्मोंको जाननेवाली बुद्धिमती गान्धारी देवीने भी इन कठोर वचनोंको सुना था ॥ ११½ ॥
ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः ॥ १२ ॥
राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीडितः ।
उस समयतक उन्हें राजा युधिष्ठिरके आश्रयमें रहते पंद्रह वर्ष व्यतीत हो चुके थे। पंद्रहवाँ वर्ष बीतनेपर भीमसेनके वाग्बाणोंसे पीड़ित हुए राजा धृतराष्ट्रको खेद एवं वैराग्य हुआ ॥ १२½ ॥
नान्वबुध्यत तद् राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥
श्वेताश्वो वाथ कुन्ती वा द्रौपदी वा यशस्विनी ।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरको इस बातकी जानकारी नहीं थी। अर्जुन, कुन्ती तथा यशस्विनी द्रौपदीको भी इसका पता नहीं था ।। १३ १/२ ।।
माद्रीपुत्रौ च धर्मज्ञौ चित्तं तस्यान्ववर्तताम् ।। १४ ।।
राज्ञस्तु चित्तं रक्षन्तौ नोचतुः किंचिदप्रियम् ।
धर्मके ज्ञाता माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव सदा राजा धृतराष्ट्रके मनोऽनुकूल ही बर्ताव करते थे। वे उनका मन रखते हुए कभी कोई अप्रिय बात नहीं कहते थे ।।
ततः समानयामास धृतराष्ट्रः सुहृज्जनम् ।। १५ ।।
वाष्पसंदिग्धमत्यर्थमिदमाह च तान् भृशम् ।
तदनन्तर धृतराष्ट्रने अपने मित्रोंको बुलवाया और नेत्रोंमें आँसू भरकर अत्यन्त गद्गद वाणीमें इस प्रकार कहा ।। १५ १/२ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
विदितं भवतामेतद् यथा वृत्तं कुरुक्षयः ।। १६ ।।
ममापराधात् तत् सर्वमनुज्ञातं च कौरवैः ।
**धृतराष्ट्र बोले—**मित्रो! आपलोगोंको यह मालूम ही है कि कौरववंशका विनाश किस प्रकार हुआ है। समस्त कौरव इस बातको जानते हैं कि मेरे ही अपराधसे सारा अनर्थ हुआ है ।। १६ १/२ ।।
योऽहं दुष्टमतिं मन्दो ज्ञातीनां भयवर्धनम् ।। १७ ।।
दुर्योधनं कौरवाणामाधिपत्येऽभ्यषेचयम् ।
दुर्योधनकी बुद्धिमें दुष्टता भरी थी। वह जाति-भाइयोंका भय बढ़ानेवाला था तो भी मुझ मूर्खने उसे कौरवोंके राजसिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया ।। १७ १/२ ।।
यच्चाहं वासुदेवस्य नाश्रौषं वाक्यमर्थवत् ।। १८ ।।
वध्यतां साध्ययं पापः सामात्य इति दुर्मतिः ।
पुत्रस्नेहाभिभूतस्तु हितमुक्तो मनीषिभिः ।। १९ ।।
मैंने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णकी अर्थभरी बातें नहीं सुनी। मनीषी पुरुषोंने मुझे यह हितकी बात बतायी थी कि इस खोटी बुद्धिवाले पापी दुर्योधनको मन्त्रियोंसहित मार डाला जाय, इसीमें संसारका हित है; किंतु पुत्रस्नेहके वशीभूत होकर मैंने ऐसा नहीं किया ।।
विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च ।
पदे पदे भगवता व्यासेन च महात्मना ।। २० ।।
संजयेनाथ गान्धार्या तदिदं तप्यते च माम् ।
विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, महात्मा भगवान् व्यास, संजय और गान्धारी देवीने भी मुझे पग-पगपर उचित सलाह दी, किंतु मैंने किसीकी बात नहीं मानी। यह भूल मुझे सदा संताप देती रहती है।। २० १/२ ।।
यच्चाहं पाण्डुपुत्रेषु गुणवत्सु महात्मसु ।। २१ ।।
न दत्तवान् श्रियं दीप्तां पितृपैतामहीमिमाम् ।
महात्मा पाण्डव गुणवान् हैं तथापि उनके बाप-दादोंकी यह उज्ज्वल सम्पत्ति भी मैंने उन्हें नहीं दी ।।
विनाशं पश्यमानो हि सर्वराज्ञां गदाग्रजः ।। २२ ।।
एतच्छ्रेयस्तु परमममन्यत जनार्दनः ।
समस्त राजाओंका विनाश देखते हुए गदाग्रज भगवान् श्रीकृष्णने यही परम कल्याणकारी माना कि मैं पाण्डवोंका राज्य उन्हें लौटा दूँ; परंतु मैं वैसा नहीं कर सका ।। २२ १/२ ।।
सोऽहमेतान्यलीकानि निवृत्तान्यात्मनस्तदा ।। २३ ।।
हृदये शल्यभूतानि धारयामि सहस्रशः ।
इस तरह अपनी की हुई हजारों भूलें मैं अपने हृदयमें धारण करता हूँ, जो इस समय काँटोंके समान कसक पैदा करती हैं ।। २३ १/२ ।।
विशेषतस्तु पश्यामि वर्षे पञ्चदशेऽद्य वै ।। २४ ।।
अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं नियतोऽस्मि सुदुर्मतिः ।
विशेषतः पंद्रहवें वर्षमें आज मुझ दुर्बुद्धिकी आँखें खुली हैं और अब मैं इस पापकी शुद्धिके लिये नियमका पालन करने लगा हूँ ।। २४ १/२ ।।
चतुर्थे नियते काले कदाचिदपि चाष्टमे ।। २५ ।।
तृष्णाविनयनं भुञ्जे गान्धारी वेद तन्मम ।
करोत्याहारमिति मां सर्वः परिजनः सदा ।। २६ ।।
कभी चौथे समय (अर्थात् दो दिनपर) और कभी आठवें समय अर्थात् चार दिनपर केवल भूखकी आग बुझानेके लिये मैं थोड़ा-सा आहार करता हूँ। मेरे इस नियमको केवल गान्धारी देवी जानती हैं। अन्य सब लोगोंको यही मालूम है कि मैं प्रतिदिन पूरा भोजन करता हूँ ।। २५-२६ ।।
युधिष्ठिरभयादेति भृशं तप्यति पाण्डवः ।
भूमौ शये जप्यपरो दर्भेष्वजिनसंवृतः ।। २७ ।।
नियमव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी ।
लोग युधिष्ठिरके भयसे मेरे पास आते हैं। पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझे आराम देनेके लिये अत्यन्त चिन्तित रहते हैं। मैं और यशस्विनी गान्धारी दोनों नियम-पालनके व्याजसे मृगचर्म पहन कुशासनपर बैठकर मन्त्रजप करते और भूमिपर सोते हैं ।। २७ १/२ ।। हतं शतं तु पुत्राणां ययोर्युद्धेऽपलायिनाम् ॥ २८ ॥ नानुतप्यामि तच्चाहं क्षत्रधर्मं हि ते विदुः । हम दोनोंके युद्धमें पीठ न दिखानेवाले सौ पुत्र मारे गये हैं, किंतु उनके लिये मुझे दुःख नहीं है; क्योंकि वे क्षत्रिय-धर्मको जानते थे (और उसीके अनुसार उन्होंने युद्धमें प्राण-त्याग किया है) ।। २८ १/२ ।। इत्युक्त्वा धर्मराजानमभ्यभाषत कौरवः ॥ २९ ॥ भद्रं ते यादवीमातर्वचश्चेदं निबोध मे । अपने सुहृदोंसे ऐसा कहकर धृतराष्ट्र राजा युधिष्ठिरसे बोले—'कुन्तीनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी यह बात सुनो ।। २९ १/२ ।। सुखमस्म्युषितः पुत्र त्वया सुपरिपालितः ॥ ३० ॥ महादानानि दत्तानि श्राद्धानि च पुनः पुनः । 'बेटा! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर मैं यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। मैंने बड़े-बड़े दान दिये हैं और बारंबार श्राद्धकर्मोंका अनुष्ठान किया है ।। ३० १/२ ।। प्रकृष्टं च यया पुत्र पुण्यं चीर्णं यथाबलम् ॥ ३१ ॥ गान्धारी हतपुत्रेयं धैर्येणोदीक्षते च माम् । 'पुत्र! जिसने अपनी शक्तिके अनुसार उत्कृष्ट पुण्यका अनुष्ठान किया है और जिसके सौ पुत्र मारे गये हैं, वही यह गान्धारीदेवी धैर्यपूर्वक मेरी देख-भाल करती है ।। ३१ १/२ ।। द्रौपद्या ह्यपकर्तारस्तव चैश्वर्यहारिणः ॥ ३२ ॥ समतीता नृशंसास्ते स्वधर्मेण हता युधि । न तेषु प्रतिकर्तव्यं पश्यामि कुरुनन्दन ॥ ३३ ॥ 'कुरुनन्दन! जिन्होंने द्रौपदीके साथ अत्याचार किया, तुम्हारे ऐश्वर्यका अपहरण किया, वे क्रूरकर्मी मेरे पुत्र क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्धमें मारे गये हैं। अब उनके लिये कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं दिखायी देती है ।। ३२-३३ ।। सर्वे शस्त्रभृतां लोकान् गतास्तेऽभिमुखं हताः । आत्मनस्तु हितं पुण्यं प्रतिकर्तव्यमद्य वै ॥ ३४ ॥ गान्धार्याश्चैव राजेन्द्र तदनुज्ञातुमर्हसि । 'वे सब युद्धमें सम्मुख मारे गये हैं, अतः शस्त्रधारियोंको मिलनेवाले लोकोंमें गये हैं। राजेन्द्र! अब तो मुझे और गान्धारीदेवीको अपने हितके लिये पवित्र तप करना है; अतः इसके लिये हमें अनुमति दो ।। ३४ १/२ ।।
त्वं तु शस्त्रभृतां श्रेष्ठः सततं धर्मवत्सलः ।। ३५ ।। राजा गुरुः प्राणभृतां तस्मादेतद् ब्रवीम्यहम् । अनुज्ञातस्त्वया वीर संश्रयेयं वनान्यहम् ।। ३६ ।। ‘तुम शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले हो। राजा समस्त प्राणियोंके लिये गुरुजनकी भाँति आदरणीय होता है। इसलिये तुमसे ऐसा अनुरोध करता हूँ। वीर! तुम्हारी अनुमति मिल जानेपर मैं वनको चला जाऊँगा ।। ३५-३६ ।। चीरवल्कलभृद् राजन् गान्धार्या सहितोऽनया । तवाशिषः प्रयुञ्जानो भविष्यामि वनेचरः ।। ३७ ।। ‘राजन्! वहाँ मैं चीर और वल्कल धारण करके इस गान्धारीके साथ वनमें विचरूँगा और तुम्हें आशीर्वाद देता रहूँगा ।। ३७ ।। उचितं नः कुले तात सर्वेषां भरतर्षभ । पुत्रेष्वैश्वर्यमाधाय वयसोऽन्ते वनं नृप ।। ३८ ।। ‘तात! भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! हमारे कुलके सभी राजाओंके लिये यही उचित है कि वे अन्तिम अवस्थामें पुत्रोंको राज्य देकर स्वयं वनमें पधारें ।। ३८ ।। तत्राहं वायुभक्षो वा निराहारोऽपि वा वसन् । पत्न्या सहानया वीर चरिष्यामि तपः परम् ।। ३९ ।। ‘वीर! वहाँ मैं वायु पीकर अथवा उपवास करके रहूँगा तथा अपनी इस धर्मपत्नीके साथ उत्तम तपस्या करूँगा ।। ३९ ।। त्वं चापि फलभाक् तात तपसः पार्थिवो ह्यसि । फलभाजो हि राजानः कल्याणस्येतरस्य वा ।। ४० ।। ‘बेटा! तुम भी उस तपस्याके उत्तम फलके भागी बनोगे; क्योंकि तुम राजा हो और राजा अपने राज्यके भीतर होनेवाले भले-बुरे सभी कर्मोंके फलभागी होते हैं’ ।। ४० ।। युधिष्ठिर उवाच न मां प्रीणयते राज्यं त्वय्येवं दुःखिते नृप । धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धिं राज्यसक्तं प्रमादिनम् ।। ४१ ।। युधिष्ठिरने कहा—महाराज! आप यहाँ रहकर इस प्रकार दुःख उठा रहे थे और मुझे इसकी जानकारी न हो सकी, इसलिये अब यह राज्य मुझे प्रसन्न नहीं रख सकता। हाय! मेरी बुद्धि कितनी खराब है? मुझ-जैसे प्रमादी और राज्यासक्त पुरुषको धिक्कार है ।। ४१ ।। योऽहं भवन्तं दुःखार्तमुपवासकृशं भृशम् । जिताहारं क्षितिशयं न विन्दे भ्रातृभिः सह ।। ४२ ।।
आप दुःखसे आतुर और उपवास करनेके कारण अत्यन्त दुर्बल होकर पृथ्वीपर शयन
कर रहे हैं तथा भोजनपर भी संयम कर लिया है और मैं भाइयोंसहित आपकी इस
अवस्थाका पता ही न पा सका ।। ४२ ।।
अहोऽस्मि वञ्चितो मूढो भवता गूढबुद्धिना ।
विश्वासयित्वा पूर्वं मां यदिदं दुःखमश्रुथाः ।। ४३ ।।
अहो! आपने अपने विचारोंको छिपाकर मुझ मूर्खको अबतक धोखेमें ही डाल रखा
था; क्योंकि पहले मुझे यह विश्वास दिलाकर कि मैं सुखी हूँ, आप आजतक यह दुःख
भोगते रहे ।। ४३ ।।
किं मे राज्येन भोगैर्वा किं यज्ञैः किं सुखेन वा ।
यस्य मे त्वं महीपाल दुःखान्येतान्यवाप्तवान् ।। ४४ ।।
महाराज! इस राज्यसे, इन भोगोंसे, इन यज्ञोंसे अथवा इस सुख-सामग्रीसे मुझे क्या
लाभ हुआ? जब कि मेरे ही पास रहकर आपको इतने दुःख उठाने पड़े ।।
पीडितं चापि जानामि राज्यमात्मानमेव च ।
अनेन वचसा तुभ्यं दुःखितस्य जनेश्वर ।। ४५ ।।
जनेश्वर! आप दुःखी होकर जो ऐसी बात कह रहे हैं, इससे मैं उस समस्त राज्यको
और अपनेको भी दुःखित समझता हूँ ।। ४५ ।।
भवान् पिता भवान् माता भवान् नः परमो गुरुः ।
भवता विप्रहीणा वै क्व नु तिष्ठामहे वयम् ।। ४६ ।।
आप ही हमारे पिता, आप ही माता और आप ही हमारे परम गुरु हैं। आपसे विलग
होकर हम कहाँ रहेंगे ।। ४६ ।।
औरसो भवतः पुत्रो युयुत्सुर्नृपसत्तम ।
अस्तु राजा महाराज यमन्यं मन्यते भवान् ।। ४७ ।।
अहं वनं गमिष्यामि भवान् राज्यं प्रशासतु ।
न मामयशसा दग्धं भूयस्त्वं दग्धुमर्हसि ।। ४८ ।।
नृपश्रेष्ठ! महाराज! युयुत्सु आपके औरस पुत्र हैं; ये ही राजा हों अथवा और किसीको
जिसे आप उचित समझते हों, राजा बना दें या स्वयं ही इस राज्यका शासन करें। मैं ही
वनको चला जाऊँगा। पिताजी! मैं पहलेसे ही अपयशकी आगमें जल चुका हूँ, अब पुनः
आप भी मुझे न जलाइये ।। ४७-४८ ।।
नाहं राजा भवान् राजा भवतः परवानहम् ।
कथं गुरुं त्वां धर्मज्ञमनुज्ञातुमिहोत्सहे ।। ४९ ।।
मैं राजा नहीं, आप ही राजा हैं। मैं तो आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ।
आप धर्मके ज्ञाता गुरु हैं। मैं आपको कैसे आज्ञा दे सकता हूँ ।। ४९ ।।
न मन्युर्हृदि नः कश्चित् सुयोधनकृतेऽनघ ।
भवितव्यं तथा तद्धि वयं चान्ये च मोहिताः ॥ ५० ॥ निष्पाप नरेश! दुर्योधनने जो कुछ किया है, उसके लिये हमारे हृदयमें तनिक भी क्रोध नहीं है। जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी। हम और दूसरे लोग उसीसे मोहित थे ॥ ५० ॥
वयं पुत्रा हि भवतो यथा दुर्योधनादयः ।
गान्धारी चैव कुन्ती च निर्विशेषे मते मम ॥ ५१ ॥
जैसे दुर्योधन आदि आपके पुत्र थे, वैसे ही हम भी हैं। मेरे लिये गान्धारी और कुन्तीमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ५१ ॥
स मां त्वं यदि राजेन्द्र परित्यज्य गमिष्यसि ।
पृष्ठतस्त्वनुयास्यामि सत्यमात्मानमालभे ॥ ५२ ॥
राजन्! यदि आप मुझे छोड़कर चले जायँगे तो मैं अपनी सौगन्ध खाकर सत्य कहता हूँ कि मैं भी आपके पीछे-पीछे चल दूँगा ॥ ५२ ॥
इयं हि वसुसम्पूर्णा मही सागरमेखला ।
भवता विप्रहीणस्य न मे प्रीतिकरी भवेत् ॥ ५३ ॥
आपके त्याग देनेपर यह धन-धान्यसे परिपूर्ण समुद्रसे घिरी हुई सारी पृथ्वीका राज्य भी मुझे प्रसन्न नहीं रख सकता ॥ ५३ ॥
भवदीयमिदं सर्वं शिरसा त्वां प्रसादये ।
त्वदधीनाः स्म राजेन्द्र व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ५४ ॥
राजेन्द्र! यह सब कुछ आपका है। मैं आपके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रार्थना करता हूँ कि आप प्रसन्न हो जाइये। हम सब लोग आपके अधीन हैं। आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ५४ ॥
भवितव्यमनुप्राप्तो मन्ये त्वं वसुधाधिप ।
दिष्ट्या शुश्रूषमाणस्त्वां मोक्षिष्ये मनसो ज्वरम् ॥ ५५ ॥
पृथ्वीनाथ! मैं समझता हूँ कि आप भवितव्यताके वशमें पड़ गये थे। यदि सौभाग्यवश मुझे आपकी सेवाका अवसर मिलता रहा तो मेरी मानसिक चिन्ता दूर हो जायगी ॥ ५५ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
तापस्ये मे मनस्तात वर्तते कुरुनन्दन ।
उचितं च कुलेऽस्माकमरण्यगमनं प्रभो ॥ ५६ ॥
धृतराष्ट्र बोले—बेटा! कुरुनन्दन! अब मेरा मन तपस्यामें ही लग रहा है। प्रभो! जीवनकी अन्तिम अवस्थामें वनको जाना हमारे कुलके लिये उचित भी है ॥ ५६ ॥
चिरमस्म्युषितः पुत्र चिरं शुश्रूषितस्त्वया ।
वृद्धं मामप्यनुज्ञातुमर्हसि त्वं नराधिप ॥ ५७ ॥
पुत्र! नरेश्वर! मैं दीर्घकालतक तुम्हारे पास रह चुका और तुमने भी बहुत दिनोंतक मेरी सेवा-शुश्रूषा की। अब मेरी वृद्धावस्था आ गयी। अब तो मुझे वनमें जानेकी अनुमति देनी ही चाहिये ॥ ५७ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजानं वेपमानं कृताञ्जलिम् ।
उवाच वचनं राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ ५८ ॥
संजयं च महात्मानं कृपं चापि महारथम् ।
अनुनेतुमिहेच्छामि भवद्भिर्वसुधाधिपम् ॥ ५९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर काँपने लगे और हाथ जोड़कर चुपचाप बैठे रहे। अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने उनसे उपर्युक्त बात कहकर महात्मा संजय और महारथी कृपाचार्यसे कहा—'मैं आपलोगोंके द्वारा राजा युधिष्ठिरको समझाना चाहता हूँ' ॥ ५८–५९ ॥
म्लायते मे मनो हीदं मुखं च परिशुष्यति ।
वयसा च प्रकृष्टेन वाग्व्यायामेन चैव ह ॥ ६० ॥
'एक तो मेरी वृद्धावस्था और दूसरे बोलनेका परिश्रम, इन कारणोंसे मेरा जी घबरा रहा है और मुँह सूखा जाता है' ॥ ६० ॥
इत्युक्त्वा स तु धर्मात्मा वृद्धो राजा कुरूद्वहः ।
गान्धारीं शिश्रिये धीमान् सहसैव गतासुवत् ॥ ६१ ॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा बूढ़े राजा कुरुकुलशिरोमणि बुद्धिमान् धृतराष्ट्रने सहसा ही निर्जीवकी भाँति गान्धारीका सहारा ले लिया ॥ ६१ ॥
तं तु दृष्ट्वा समासीनं विसंज्ञमिव कौरवम् । आर्तिं राजागमत् तीव्रां कौन्तेयः परवीरहा ॥ ६२ ॥ कुरुराज धृतराष्ट्रको संज्ञाहीन-सा बैठा देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरको बड़ा दुःख हुआ ॥ ६२ ॥
युधिष्ठिर उवाच यस्य नागसहस्रेण शतसंख्येन वै बलम् । सोऽयं नारीं व्यपाश्रित्य शेते राजा गतासुवत् ॥ ६३ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**ओह! जिसमें एक लाख हाथियोंके समान बल था, वे ही ये राजा धृतराष्ट्र आज प्राणहीन-से होकर स्त्रीका सहारा लिये सो रहे हैं ॥ ६३ ॥ आयसी प्रतिमा येन भीमसेनस्य सा पुरा । चूर्णीकृता बलवता सोऽबलामाश्रितः स्त्रियम् ॥ ६४ ॥ जिन बलवान् नरेशने पहले भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमाको चूर्ण कर डाला था, वे आज अबला नारीके सहारे पड़े हैं ॥ ६४ ॥ धिगस्तु मामधर्मज्ञं धिग् बुद्धिं धिक् च मे श्रुतम् । यत्कृते पृथिवीपालः शेतेऽयमतथोचितः ॥ ६५ ॥
मुझे धर्मका कोई ज्ञान नहीं है। मुझे धिक्कार है। मेरी बुद्धि और विद्याको भी धिक्कार है, जिसके कारण ये महाराज इस समय अपने लिये अयोग्य अवस्थामें पड़े हुए हैं ।। ६५ ।। अहमप्युपवत्स्यामि यथैवायं गुरुर्मम । यदि राजा न भुङ्क्तेऽयं गान्धारी च यशस्विनी ।। ६६ ।। यदि यशस्विनी गान्धारी देवी और राजा धृतराष्ट्र भोजन नहीं करते हैं तो अपने इन गुरुजनोंकी भाँति मैं भी उपवास करूँगा ।। ६६ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततोऽस्य पाणिना राजन् जलशीतेन पाण्डवः । उरो मुखं च शनकैः पर्यमार्जत धर्मवित् ।। ६७ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! यह कहकर धर्मके ज्ञाता पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने जलसे शीतल किये हुए हाथसे धृतराष्ट्रकी छाती और मुँहको धीरे-धीरे पोंछा ।। ६७ ।। तेन रत्नौषधिमता पुण्येन च सुगन्धिना । पाणिस्पर्शन राज्ञः स राजा संज्ञामवाप ह ।। ६८ ।। महाराज युधिष्ठिरके रत्नौषधिसम्पन्न उस पवित्र एवं सुगन्धित कर-स्पर्शसे राजा धृतराष्ट्रकी चेतना लौट आयी ।। ६८ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
स्पृश मां पाणिना भूयः परिष्वज च पाण्डव । जीवामीवातिसंस्पर्शात् तव राजीवलोचन ।। ६९ ।। **धृतराष्ट्र बोले—**कमलनयन पाण्डुनन्दन! तुम फिरसे मेरे शरीरपर अपना हाथ फेरो और मुझे छातीसे लगा लो। तुम्हारे सुखदायक स्पर्शसे मानो मेरे शरीरमें प्राण आ जाते हैं ।। ६९ ।। मूर्धानं च तवाघ्रातुमिच्छामि मनुजाधिप । पाणिभ्यां हि परिस्प्रष्टुं प्रीणनं हि महन्मम ।। ७० ।। नरेश्वर! मैं तुम्हारा मस्तक सूँघना चाहता हूँ और अपने दोनों हाथोंसे तुम्हें स्पर्श करनेकी इच्छा रखता हूँ। इससे मुझे परम तृप्ति मिल रही है ।। ७० ।। अष्टमो ह्यद्य कालोऽयमाहारस्य कृतस्य मे । येनाहं कुरुशार्दूल शक्नोमि न विचेष्टितुम् ।। ७१ ।। पिछले दिनों जब मैंने भोजन किया था, तबसे आज यह आठवाँ समय—चौथा दिन पूरा हो गया है। कुरुश्रेष्ठ! इसीसे शिथिल होकर मैं कोई चेष्टा नहीं कर पाता ।। ७१ ।। व्यायामश्चायमत्यर्थं कृतस्त्वामभियाचता । ततो ग्लानमनास्तात नष्टसंज्ञ इवाभवम् ।। ७२ ।।
तात! तुमसे अनुरोध करनेके लिये बोलते समय मुझे बड़ा भारी परिश्रम करना पड़ा है। अतः क्षीणशक्ति होकर मैं अचेत-सा हो गया था ॥ ७२ ॥
तवामृतरसप्रख्यं हस्तस्पर्शमिमं प्रभो ।
लब्ध्वा संजीवितोऽस्मीति मन्ये कुरुकुलोद्वह ॥ ७३ ॥
प्रभो! तुम्हारे हाथोंका यह स्पर्श अमृत-रसके समान शीतल एवं सुखद है। कुरुकुलनाथ! इसे पाकर मुझमें नया जीवन आ गया है, मैं ऐसा मानता हूँ ॥ ७३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पित्रा ज्येष्ठेन भारत ।
पस्पर्श सर्वगात्रेषु सौहार्दात् तं शनैस्तदा ॥ ७४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! अपने ज्येष्ठ पितृव्य धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने बड़े स्नेहके साथ उनके समस्त अंगोंपर धीरे-धीरे हाथ फेरा ॥ ७४ ॥
उपलभ्य ततः प्राणान् धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूर्ध्न्याजिघ्रत पाण्डवम् ॥ ७५ ॥
उनके स्पर्शसे राजा धृतराष्ट्रके शरीरमें मानो नूतन प्राण आ गये और उन्होंने अपनी दोनों भुजाओंसे युधिष्ठिरको छातीसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा ॥ ७५ ॥
विदुरादयश्च ते सर्वे रुरुदुर्दुःखिता भृशम् ।
अतिदुःखात् तु राजानं नोचुः किंचन पाण्डवम् ॥ ७६ ॥
यह करुण दृश्य देखकर विदुर आदि सब लोग अत्यन्त दुःखी हो रोने लगे। अधिक दुःखके कारण वे लोग पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरसे कुछ न बोले ॥ ७६ ॥
गान्धारी त्वेव धर्मज्ञा मनसोद्वहती भृशम् ।
दुःखान्यधारयद् राजन् मैवमित्येव चाब्रवीत् ॥ ७७ ॥
धर्मको जाननेवाली गान्धारी अपने मनमें दुःखका बड़ा भारी बोझ ढो रही थी। उसने दुःखोंको मनमें ही दबा लिया और रोते हुए लोगोंसे कहा—'ऐसा न करो' ॥ ७७ ॥
इतरास्तु स्त्रियः सर्वाः कुन्त्या सह सुदुःखिताः ।
नेत्रैरागतविक्लेदैः परिवार्य स्थिताऽभवन् ॥ ७८ ॥
कुन्तीके साथ कुरुकुलकी अन्य स्त्रियाँ भी अत्यन्त दुःखी हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई उन्हें घेरकर खड़ी हो गयीं ॥ ७८ ॥
अथाब्रवीत् पुनर्वाक्यं धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।
अनुजानीहि मां राजंस्तापस्ये भरतर्षभ ॥ ७९ ॥
तदनन्तर धृतराष्ट्रने पुनः युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! भरतश्रेष्ठ! मुझे तपस्याके लिये अनुमति दे दो ॥ ७९ ॥
ग्लायते मे मनस्तात भूयो भूयः प्रजल्पतः ।
न मामतः परं पुत्र परिक्लेष्टुमिहार्हसि ॥ ८० ॥
'तात! बार-बार बोलनेसे मेरा जी घबराता है, अतः बेटा! अब मुझे अधिक कष्टमें न डालो' ॥ ८० ॥
तस्मिंस्तु कौरवेन्द्रे तं तथा ब्रुवति पाण्डवम् ।
सर्वेषामेव योधानामार्त्तनादो महानभूत् ॥ ८१ ॥
कौरवराज धृतराष्ट्र जब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय वहाँ उपस्थित हुए समस्त योद्धा महान् आर्तनाद (हाहाकार) करने लगे ॥ ८१ ॥
दृष्ट्वा कृशं विवर्णं च राजानमथोचितम् ।
उपवासपरिश्रान्तं त्वगस्थिपरिवारणम् ॥ ८२ ॥
धर्मपुत्रः स्वपितरं परिष्वज्य महाप्रभुम् ।
शोकजं बाष्पमुत्सृज्य पुनर्वचनमब्रवीत् ॥ ८३ ॥
अपने ताऊ महाप्रभु राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार उपवास करनेके कारण थके हुए, दुर्बल, कान्तिहीन, अस्थिचर्मावशिष्ट और अयोग्य अवस्थामें स्थित देख धर्मपुत्र युधिष्ठिर क्षोभजनित आँसू बहाते हुए उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ८२-८३ ॥
न कामये नरश्रेष्ठ जीवितं पृथिवीं तथा ।
यथा तव प्रियं राजंश्चिकीर्षामि परंतप ॥ ८४ ॥
'नरश्रेष्ठ! मैं न तो जीवन चाहता हूँ न पृथ्वीका राज्य। परंतप नरेश! जिस तरह भी आपका प्रिय हो, वही मैं करना चाहता हूँ ॥ ८४ ॥
यदि चाहमनुग्राह्यो भवतो दयितोऽपि वा ।
क्रियतां तावदाहारस्ततो वेत्स्याम्यहं परम् ॥ ८५ ॥
'यदि आप मुझे अपनी कृपाका पात्र समझते हों और यदि मैं आपका प्रिय होऊँ तो मेरी प्रार्थनासे इस समय भोजन कीजिये। इसके बाद मैं आगेकी बात सोचूँगा' ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।
अनुज्ञातस्त्वया पुत्र भुञ्जीयामिति कामये ॥ ८६ ॥
तब महातेजस्वी धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरसे कहा—'बेटा! तुम मुझे वनमें जानेकी अनुमति दे दो तो मैं भोजन करूँ; यही मेरी इच्छा है' ॥ ८६ ॥
इति ब्रुवति राजेन्द्र धृतराष्ट्रे युधिष्ठिरम् ।
ऋषिः सत्यवतीपुत्रो व्यासोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ॥ ८७ ॥
महाराज धृतराष्ट्र युधिष्ठिरसे ये बातें कह ही रहे थे कि सत्यवतीनन्दन महर्षि व्यासजी वहाँ आ पहुँचे और इस प्रकार कहने लगे ॥ ८७ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्वेदे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका निर्वेदविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2267)
चतुर्थोऽध्यायः
व्यासजीके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना
व्यास उवाच
युधिष्ठिर महाबाहो यथाह कुरुनन्दनः ।
धृतराष्ट्रो महातेजास्तत् कुरुष्वाविचारयन् ॥ १ ॥
**व्यासजी बोले—**महाबाहु युधिष्ठिर! कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले महातेजस्वी धृतराष्ट्र जो कुछ कह रहे हैं, उसे बिना विचारे पूरा करो ॥ १ ॥
अयं हि वृद्धो नृपतिर्हतपुत्रो विशेषतः ।
नेदं कृच्छ्रं चिरतरं सहेदिति मतिर्मम ॥ २ ॥
अब ये राजा बूढ़े हो गये हैं, विशेषतः इनके सभी पुत्र नष्ट हो चुके हैं। मेरा ऐसा विश्वास है कि अब ये इस कष्टको अधिक कालतक नहीं सह सकेंगे ॥ २ ॥
गान्धारी च महाभागा प्राज्ञा करुणवेदिनी ।
पुत्रशोकं महाराज धैर्येणोद्वहते भृशम् ॥ ३ ॥
महाराज! महाभागा गान्धारी परम विदुषी और करुणाका अनुभव करनेवाली हैं; इसलिये ये महान् पुत्रशोकको धैर्यपूर्वक सहती चली आ रही हैं ॥ ३ ॥