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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन

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पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन

उमोवाच

किंशीलः किंसमाचारः पुरुषः कैश्च कर्मभिः ।
स्वर्गं समभिपद्येत सम्प्रदानेन केन वा ॥ १ ॥

पार्वतीने पूछा—भगवन्! मनुष्य किस प्रकारके शील, कैसे सदाचार और किन कर्मोंसे युक्त होकर अथवा किस दानके द्वारा स्वर्गमें जाता है ॥ १ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

दाता ब्राह्मणसत्कर्ता दीनार्तकृपणादिषु ।
भक्ष्यभोज्यान्नपानानां वाससां च प्रदायकः ॥ २ ॥
प्रतिश्रयान् सभाः कूपान् प्रपाः पुष्करिणीस्तथा ।
नैत्यकानि च सर्वाणि किमिच्छकमतीव च ॥ ३ ॥
आसनं शयनं यानं गृहं रत्नं धनं तथा ।
सस्यजातानि सर्वाणि गाः क्षेत्राण्यथ योषितः ॥ ४ ॥
सुप्रतीतमना नित्यं यः प्रयच्छति मानवः ।
एवंभूतो नरो देवि देवलोकेऽभिजायते ॥ ५ ॥

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो मनुष्य ब्राह्मणोंका सम्मान और दान करता है दीन, दुःखी और दरिद्र आदि मनुष्योंको भक्ष्य-भोज्य, अन्न-पान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरनेके स्थान, धर्मशाला, कुआँ, प्याऊ, पोखरी या बावड़ी आदि बनवाता है, लेनेवाले लोगोंकी इच्छा पूछ-पूछकर नित्य देनेयोग्य वस्तुएँ दान करता है, समस्त नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन, धान्य, गौ, खेत और कन्याओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, देवि! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है ॥ २—५ ॥

तत्रोष्य सुचिरं कालं भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् ।
सहाप्सतेभिर्मुदितो रमते नन्दनादिषु ॥ ६ ॥

वहाँ चिरकालतक निवास करके उत्तम भोगोंका भोग करते हुए नन्दन आदि वनोंमें अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रमण करता है ॥ ६ ॥

तस्मात् स्वर्गाच्च्युतो लोकान् मानुषेषु प्रजायते ।
महाभोगकुले देवि धनधान्यसमन्वितः ॥ ७ ॥

देवि! फिर वह स्वर्गलोकसे नीचे आनेपर मनुष्य-जातिके भीतर महान् भोगोंसे सम्पन्न कुलमें जन्म लेता है और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है॥ ७॥
तत्र कामगुणैः सर्वैः समुपेतो मुदा युतः ।
महाभोगो महाकोशो धनी भवति मानवः ॥ ८ ॥
मानवयोनिमें वह समस्त कमनीय गुणोंसे सम्पन्न एवं प्रसन्न होता है। उसके पास महान् भोगसामग्री संचित रहती है। उसका खजाना भी विशाल होता है। वह मनुष्य सभी दृष्टियोंसे धनवान् होता है॥ ८॥
एते देवि महाभागाः प्राणिनो दानशीलिनः ।
ब्रह्मणा वै पुरा प्रोक्ताः सर्वस्य प्रियदर्शनाः ॥ ९ ॥
देवि! ये दानशील प्राणी ही ऐसे महान् सौभाग्यसे सम्पन्न होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इनका ऐसा ही परिचय दिया है। दाता मनुष्य सभीकी दृष्टिमें प्रिय होते हैं॥ ९॥
अपरे मानवा देवि प्रदानकृपणा द्विजैः ।
याचिता न प्रयच्छन्ति विद्यमानेऽप्यबुद्धयः ॥ १० ॥
देवि! दूसरे बहुत-से मनुष्य दान देनेमें कृपण होते हैं। वे मन्दबुद्धि मानव ब्राह्मणोंके माँगनेपर अपने पास धन होते हुए भी उन्हें कुछ नहीं देते॥ १०॥
दीनान्धकृपणान् दृष्ट्वा भिक्षुकानतिथीनपि ।
याच्यमाना निवर्तन्ते जिह्वालोभसमन्विताः ॥ ११ ॥
वे दीनों, अन्धों, दरिद्रों, भिखमंगों और अतिथियोंको देखते ही हट जाते हैं। उनके याचना करनेपर भी जिह्वाकी लोलुपताके कारण उन्हें अन्न नहीं देते॥ ११॥
न धनानि न वासांसि न भोगान् न च काञ्चनम् ।
न गावो नान्नविकृतिं प्रयच्छन्ति कदाचन ॥ १२ ॥
वे न धन, न वस्त्र, न भोग, न सुवर्ण, न गौ और न अन्नकी बनी हुई नाना प्रकारकी खाद्य वस्तुओंका कभी दान करते हैं॥ १२॥
अप्रवृत्ताश्च ये लुब्धा नास्तिका दानवर्जिताः ।
एवंभूता नरा देवि निरयं यान्त्यबुद्धयः ॥ १३ ॥
देवि! ऐसे अकर्मण्य, लोभी, नास्तिक तथा दानधर्मसे दूर रहनेवाले बुद्धिहीन मनुष्य नरकमें पड़ते हैं॥ १३॥
ते वै मनुष्यतां यान्ति यदा कालस्य पर्ययात् ।
धनरिक्ते कुले जन्म लभन्ते स्वल्पबुद्धयः ॥ १४ ॥
यदि कालचक्रके फेरसे वे मन्दबुद्धि मानव पुनः मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं तो निर्धन कुलमें ही उत्पन्न होते हैं॥ १४॥
क्षुत्पिपासापरीताश्च सर्वलोकबहिष्कृताः ।
निराशाः सर्वभोगेभ्यो जीवन्त्यधर्मजीविकाम् ॥ १५ ॥

वहाँ सदा भूख-प्यासका कष्ट सहते हैं। सब लोग उन्हें समाजसे बाहर कर देते हैं तथा वे सब प्रकारके भोगोंसे निराश होकर पापाचारसे जीविका चलाते हैं ॥ १५ ॥
अल्पभोगकुले जाता अल्पभोगरता नराः ।
अनेन कर्मणा देवि भवन्त्यधनिनो नराः ॥ १६ ॥
देवि! इस पापकर्मसे ही मनुष्य अल्प भोगवाले कुलमें जन्म लेता है, थोड़े-से ही भोग भोगते और सदा निर्धन रहते हैं ॥ १६ ॥
अपरे स्तम्भिनो नित्यं मानिनः पापतो रताः ।
आसनार्हस्य ये पीठं न प्रयच्छन्त्यचेतसः ॥ १७ ॥
इनके सिवा दूसरे भी ऐसे मनुष्य हैं, जो सदा गर्व और अभिमानमें फूले तथा पापमें रत रहते हैं। वे मूर्ख आसन देनेयोग्य पूज्य पुरुषको बैठनेके लिये कोई पीढ़ा या चौकीतक नहीं देते हैं ॥ १७ ॥
मार्गार्हस्य च ये मार्गं न यच्छन्त्यल्पबुद्धयः ।
पाद्यार्हस्य च ये पाद्यं न ददत्यल्पबुद्धयः ॥ १८ ॥
वे बुद्धिहीन अथवा मन्दबुद्धि पुरुष मार्ग देनेयोग्य पुरुषोंको जानेके लिये मार्ग नहीं देते और पाद्य अर्पण करनेयोग्य पूजनीय पुरुषोंको पाद्य (पैर धोनेके लिये जल) नहीं देते हैं ॥ १८ ॥
अर्घ्यार्हान् न च सत्कारैरर्चयन्ति यथाविधि ।
अर्घ्यमाचमनीयं वा न यच्छन्त्यल्पबुद्धयः ॥ १९ ॥
इतना ही नहीं, वे अर्घ्य देनेयोग्य माननीय व्यक्तियोंका नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा विधिपूर्वक पूजन नहीं करते अथवा वे मूर्ख उन्हें अर्घ्य या आचमनीय नहीं देते हैं ॥ १९ ॥
गुरुं चाभिगतं प्रेम्णा गुरुवन्न बुभूषते ।
अभिमानप्रवृत्तेन लोभेन समवस्थिताः ॥ २० ॥
सम्मान्यांश्चावमन्यन्ते वृद्धान् परिभवन्ति च ।
एवंविधा नरा देवि सर्वे निरयगामिनः ॥ २१ ॥
गुरुके आनेपर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते—उन्हें गुरुवत् सम्मान नहीं देना चाहते, अभिमान और लोभके वशीभूत होकर वे सम्माननीय मनुष्योंका अपमान और बड़े-बूढ़ोंका तिरस्कार करते हैं। देवि! ऐसा करनेवाले सभी मनुष्य नरकगामी होते हैं ॥ २०-२१ ॥
ते वै यदि नरास्तस्मान्निरयादुत्तरन्ति वै ।
वर्षपूगैस्ततो जन्म लभन्ते कुत्सिते कुले ॥ २२ ॥
श्वपाकपुल्कसादीनां कुत्सितानामचेतसाम् ।
कुलेषु तेषु जायन्ते गुरुवृद्धापचायिनः ॥ २३ ॥

बहुत वर्षोंके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं। गुरुजनों और वृद्धोंका तिरस्कार करनेवाले वे अधम मानव चाण्डालोंके उन्हीं निन्दित कुलोंमें उत्पन्न होते हैं ।। २२-२३ ।।
न स्तम्भी न च मानी यो देवताद्विजपूजकः ।
लोकपूज्यो नमस्कर्ता प्रश्रितो मधुरं वचः ।। २४ ।।
सर्ववर्णप्रियकरः सर्वभूतहितः सदा ।
अद्वेषी सुमुखः श्लक्ष्णः स्निग्धवाणीप्रदः सदा ।। २५ ।।
स्वागतेनैव सर्वेषां भूतानामविहिंसकः ।
यथार्हसत्क्रियापूर्वमर्चयन्तवतिष्ठति ।। २६ ।।
मार्गाहाय ददन्मार्गं गुरुं गुरुवदर्चयन् ।
अतिथिप्रग्रहरतस्तथाभ्यागतपूजकः ।। २७ ।।
एवंभूतो नरो देवि स्वर्गतिं प्रतिपद्यते ।
ततो मानुषतां प्राप्य विशिष्टकुलजो भवेत् ।। २८ ।।
देवि ! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोंका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात् मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है ।। २४—२८ ।।
तत्रासौ विपुलैर्भोगैः सर्वरत्नसमायुतः ।
यथार्हदाता चार्हेषु धर्मचर्यापरो भवेत् ।। २९ ।।
उस जन्ममें वह महान् भोगों और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न हो सुयोग्य ब्राह्मणोंको यथायोग्य दान देता और धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहता है ।। २९ ।।
सम्मतः सर्वभूतानां सर्वलोकनमस्कृतः ।
स्वकर्मफलमाप्नोति स्वयमेव नरः सदा ।। ३० ।।
वहाँ सब प्राणी उसका सम्मान करते हैं और सब लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मोंका फल सदा स्वयं ही भोगता है ।। ३० ।।
उदात्तकुलजातीय उदात्ताभिजनः सदा ।
एष धर्मो मया प्रोक्तो विधात्रा स्वयमीरितः ।। ३१ ।।

धर्मात्मा मनुष्य सर्वदा उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम स्थानमें जन्म धारण करता
है। यह साक्षात् ब्रह्माजीके बताये हुए धर्मका मैंने वर्णन किया है॥ ३१॥
यस्तु रौद्रसमाचारः सर्वसत्त्वभयंकरः ।
हस्ताभ्यां यदि वा पद्भ्यां रज्ज्वा दण्डेन वा पुनः ॥ ३२॥
लोष्टैः स्तम्भैरायुधैर्वा जन्तून् बाधति शोभने ।
हिंसार्थं निकृतिप्रज्ञः प्रोद्वेजयति चैव ह ॥ ३३ ॥
उपक्रामति जन्तूंश्च उद्वेगजननः सदा ।
एवंशीलसमाचारो निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३४ ॥
शोभने! जिस मनुष्यका आचरण क्रूरतासे भरा हुआ है, जिससे समस्त जीवोंको भय
प्राप्त होता है, जो हाथ, पैर, रस्सी, डंडे और ढेलेसे मारकर, खम्भोंमें बाँधकर तथा घातक
शस्त्रोंका प्रहार करके जीव-जन्तुओंको सताता है, छल-कपटमें प्रवीण होकर हिंसाके लिये
उन जीवोंमें उद्वेग पैदा करता है तथा उद्वेगजनक होकर सदा उन जन्तुओंपर आक्रमण
करता है, ऐसे स्वभाव और आचारवाले मनुष्यको नरकमें गिरना पड़ता है॥
स वै मनुष्यतां गच्छेद यदि कालस्य पर्ययात् ।
बह्वाबाधपरिक्लिष्टे जायते सोऽधमे कुले ॥ ३५ ॥
यदि वह कालचक्रके फेरसे फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो अनेक प्रकारकी विघ्न-
बाधाओंसे कष्ट उठानेवाले अधम कुलमें उत्पन्न होता है॥ ३५॥
लोकद्वेष्योऽधमः पुंसां स्वयं कर्मफलैः कृतैः ।
एष देवि मनुष्येषु बोद्धव्यो ज्ञातिबन्धुषु ॥ ३६॥
देवि! ऐसा मनुष्य अपने ही किये हुए कर्मोंके फलके अनुसार मनुष्योंमें तथा जाति-
बन्धुओंमें नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं॥
अपरः सर्वभूतानि दयावाननुपश्यति ।
मैत्रदृष्टिः पितृसमो निर्वैरो नियतेन्द्रियः ॥ ३७ ॥
नोद्वेजयति भूतानि न विघातयते तथा ।
हस्तपादैः सुनियतैर्विश्वास्यः सर्वजन्तुषु ॥ ३८ ॥
न रज्ज्वा न च दण्डेन न लोष्टैर्नायुधेन च ।
उद्वेजयति भूतानि श्लक्ष्णकर्मा दयापरः ॥ ३९ ॥
एवंशीलसमाचारः स्वर्गे समुपजायते ।
तत्रासौ भवने दिव्ये मुदा वसति देववत् ॥ ४० ॥
इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता
है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको
वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो
उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे,

ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है ॥ ३७—४० ॥

स चेत् कर्मक्षयान्मर्त्यो मनुष्येषूपजायते ।
अल्पाबाधो निरातङ्कः स जातः सुखमेधते ॥ ४१ ॥
सुखभागी निरायासो निरुद्वेगः सदा नरः ।
एष देवि सतां मार्गो बाधा यत्र न विद्यते ॥ ४२ ॥

फिर पुण्यकर्मोंके क्षीण होनेपर यदि वह मृत्यु-लोकमें जन्म लेता है, तो उसके ऊपर बाधाओंका आक्रमण कम होता है। वह निर्भय हो सुखसे अपनी उन्नति करता है। सुखका भागी होकर आयास और उद्वेगसे रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि! यह सत्पुरुषोंका मार्ग है, जहाँ किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा नहीं आने पाती ॥ ४१-४२ ॥

उमोवाच

इमे मनुष्या दृश्यन्ते ऊहापोहविशारदाः ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः प्रज्ञावन्तोऽर्थकोविदाः ॥ ४३ ॥

पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! इन मनुष्योंमेंसे कुछ तो ऊहापोहमें कुशल, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान् और अर्थनिपुण देखे जाते हैं ॥ ४३ ॥

दुष्प्रज्ञाश्चापरे देव ज्ञानविज्ञानवर्जिताः ।
केन कर्मविशेषेण प्रज्ञावान् पुरुषो भवेत् ॥ ४४ ॥

देव! कुछ दूसरे मानव ज्ञान-विज्ञानसे शून्य और दुर्बुद्धि दिखायी देते हैं। ऐसी दशामें मनुष्य कौन-सा विशेष कर्म करनेसे बुद्धिमान् हो सकता है? ॥ ४४ ॥

अल्पप्रज्ञो विरूपाक्ष कथं भवति मानवः ।
एतन्मे संशयं छिन्धि सर्वधर्मविदां वर ॥ ४५ ॥

विरूपाक्ष! मनुष्य मन्दबुद्धि कैसे होता है? सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महादेव! आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ॥ ४५ ॥

जात्यन्धाश्चापरे देव रोगार्ताश्चापरे तथा ।
नराः क्लीबाश्च दृश्यन्ते कारणं ब्रूहि तत्र वै ॥ ४६ ॥

देव! कुछ लोग जन्मान्ध, कुछ रोगसे पीड़ित और कितने ही नपुंसक देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥ ४६ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ब्राह्मणान् वेदविदुषः सिद्धान् धर्मविदस्तथा ।
परिपृच्छन्त्यहरहः कुशलाः कुशलं तथा ॥ ४७ ॥

वर्जयन्तोऽशुभं कर्म सेवमानाः शुभं तथा ।
लभन्ते स्वर्गतिं नित्यमिहलोके तथा सुखम् ॥ ४८ ॥
श्रीमहादेवजीने कहा— देवि! जो कुशल मनुष्य सिद्ध, वेदवेत्ता और धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे प्रतिदिन उनकी कुशल पूछते हैं और अशुभ कर्मका परित्याग करके शुभकर्मका सेवन करते हैं, वे परलोकमें स्वर्ग और इहलोकमें सदा सुख पाते हैं ॥ ४७-४८ ॥
स चेन्मानुषतां याति मेधावी तत्र जायते ।
श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य कल्याणमुपजायते ॥ ४९ ॥
ऐसे आचरणवाला पुरुष यदि स्वर्गसे लौटकर फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो वह मेधावी होता है। शास्त्र उसकी बुद्धिका अनुसरण करता है, अतः वह सदा कल्याणका भागी होता है ॥ ४९ ॥
परदारेषु ये चापि चक्षुर्दुष्टं प्रयुञ्जते ।
तेन दुष्टस्वभावेन जात्यन्धास्ते भवन्ति ह ॥ ५० ॥
जो परायी स्त्रियोंके प्रति सदा दोषभरी दृष्टि डालते हैं, उस दुष्ट स्वभावके कारण वे जन्मान्ध होते हैं ॥
मनसा तु प्रदुष्टेन नग्नां पश्यन्ति ये स्त्रियम् ।
रोगार्तास्ते भवन्तीह नरा दुष्कृतकर्मिणः ॥ ५१ ॥
जो दूषित हृदयसे किसी नंगी स्त्रीकी ओर निहारते हैं, वे पापकर्मी मनुष्य इस लोकमें रोगसे पीड़ित होते हैं ॥ ५१ ॥
ये तु मूढा दुराचारा वियोनौ मैथुने रताः ।
पुरुषेषु सुदुष्प्रज्ञा क्लीबत्वमुपयान्ति ते ॥ ५२ ॥
जो दुराचारी, दुर्बुद्धि एवं मूढ़ मनुष्य पशु आदिकी योनिमें मैथुन करते हैं, वे पुरुषोंमें नपुंसक होते हैं ॥
पशूंश्च ये घातयन्ति ये चैव गुरुतल्पगाः ।
प्रकीर्णमैथुना ये च क्लीबा जायन्ति ते नसः ॥ ५३ ॥
जो पशुओंकी हत्या कराते, गुरुकी शय्यापर सोते और वर्णसंकर जातिकी स्त्रियोंसे समागम करते हैं, वे मनुष्य नपुंसक होते हैं ॥ ५३ ॥

उमोवाच

सावद्यं किन्नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च ।
श्रेयः कुर्वन्नवाप्नोति मानवो देवसत्तम ॥ ५४ ॥
पार्वतीने पूछा— देवश्रेष्ठ! कौन सदोष कर्म हैं और कौन निर्दोष, कौन-सा कर्म करके मनुष्य कल्याणका भागी होता है? ॥ ५४ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

श्रेयांसं मार्गमन्विच्छन् सदा यः पृच्छति द्विजान् ।
धर्मान्वेषी गुणाकांक्षी स स्वर्गं समुपानुते ॥ ५५ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— जो श्रेष्ठ मार्गको पानेकी इच्छा रखकर सदा ही ब्राह्मणोंसे उसके विषयमें पूछता है, धर्मका अन्वेषण करता और सद्गुणोंकी अभिलाषा रखता है, वही स्वर्गलोकके सुखका अनुभव करता है ॥ ५५ ॥

यदि मानुषतां देवि कदाचित् स निगच्छति ।
मेधावी धारणायुक्तः प्रायस्तत्राभिजायते ॥ ५६ ॥
देवि! ऐसा मनुष्य यदि कभी मानवयोनिको प्राप्त होता है तो वहाँ प्रायः मेधावी एवं धारण शक्तिसे सम्पन्न होता है ॥ ५६ ॥

एष देवि सतां धर्मो मन्तव्यो भूतिकारकः ।
नृणां हितार्थाय मया तव वै समुदाहृतः ॥ ५७ ॥
देवि! यह सत्पुरुषोंका धर्म है, उसे कल्याणकारी मानना चाहिये। मैंने मनुष्योंके हितके लिये इस धर्मका तुम्हें भलीभाँति उपदेश किया है ॥ ५७ ॥

उमोवाच

अपरे स्वल्पविज्ञाना धर्मविद्वेषिणो नराः ।
ब्राह्मणान् वेदविदुषो नेच्छन्ति परिसर्पितुम् ॥ ५८ ॥
पार्वतीने पूछा— भगवन्! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं, जो अल्पबुद्धि होनेके कारण धर्मसे द्वेष करते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पास नहीं जाना चाहते हैं ॥ ५८ ॥

व्रतवन्तो नराः केचिच्छ्रद्धाधर्मपरायणाः ।
अव्रता भ्रष्टनियमास्तथान्ये राक्षसोपमाः ॥ ५९ ॥
कुछ मनुष्य व्रतधारी, श्रद्धालु और धर्मपरायण होते हैं तथा दूसरे व्रतहीन, नियमभ्रष्ट तथा राक्षसोंके समान होते हैं ॥ ५९ ॥

यज्वानश्च तथैवान्ये निर्होमाश्च तथापरे ।
केन कर्मविपाकेन भवन्तीह वदस्व मे ॥ ६० ॥
कितने ही यज्ञशील होते हैं और दूसरे मनुष्य होम और यज्ञसे दूर ही रहते हैं। किस कर्मविपाकसे मनुष्य इस प्रकार परस्परविरोधी स्वभावके हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ॥ ६० ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

आगमा लोकधर्माणां मर्यादाः सर्वनिर्मिताः ।
प्रामाण्येनानुवर्तन्ते दृश्यन्ते च दृढव्रताः ॥ ६१ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! शास्त्र लोकधर्मोंकी उन मर्यादाओंको स्थापित करते हैं, जो सबके हितके लिये निर्मित हुई हैं। जो उन शास्त्रोंको प्रमाण मानते हैं, वे दृढ़तापूर्वक उत्तम

व्रतका पालन करते देखे जाते हैं ।।
अधर्मं धर्ममित्याहुर्ये च मोहवशं गताः ।
अव्रता नष्टमर्यादास्ते प्रोक्ता ब्रह्मराक्षसाः ।। ६२ ।।
जो मोहके वशीभूत होकर अधर्मको धर्म कहते हैं, वे व्रतहीन मर्यादाको नष्ट करनेवाले पुरुष ब्रह्मराक्षस कहे गये हैं ।। ६२ ।।
ते चेत्कालकृतोद्योगात् सम्भवन्तीह मानुषाः ।
निर्होमा निर्वषट्कारास्ते भवन्ति नराधमाः ।। ६३ ।।
वे मनुष्य यदि कालयोगसे इस संसारमें मनुष्य होकर जन्म लेते हैं तो होम और वषट्कारसे रहित तथा नराधम होते हैं ।। ६३ ।।
एष देवि मया सर्वः संशयच्छेदनाय ते ।
कुशलाकुशलो नृणां व्याख्यातो धर्मसागरः ।। ६४ ।।
देवि! यह धर्मका समुद्र, धर्मात्माओंके लिये प्रिय और पापात्माओंके लिये अप्रिय है। मैंने तुम्हारे संदेहका निवारण करनेके लिये यह सब विस्तारपूर्वक बताया है ।।

[राजधर्मका वर्णन]

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[राजधर्मका वर्णन]
उमोवाच

देवदेव नमस्तुभ्यं त्र्यक्ष वृषभध्वज ।
श्रुतं मे भगवन् सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वर ॥
उमाने कहा— देवदेव! त्रिलोचन! वृषभध्वज! भगवन्! महेश्वर! आपकी कृपासे मैंने पूर्वोक्त सब विषयोंको सुना है ।।
संगृहीतं मया तच्च तव वाक्यमनुत्तमम् ।
इदानीमस्ति संदेहो मानुषेष्विह कश्चन ॥
सुनकर आपके उस परम उत्तम उपदेशको मैंने बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया है। इस समय मनुष्योंके विषयमें एक संदेह ऐसा रह गया है, जिसका समाधान आवश्यक है ।।
तुल्यप्राणशिरःकायो राजायमिति दृश्यते ।
केन कर्मविपाकेन सर्वप्राधान्यमर्हति ॥
मनुष्योंमें यह जो राजा दिखायी देता है, उसके भी प्राण, सिर और धड़ दूसरे मनुष्योंके समान ही हैं; फिर किस कर्मके फलसे यह सबमें प्रधान पद पानेका अधिकारी हुआ है? ।।
स चापि दण्डयन् मर्त्यान् भर्त्सयन् विविधानपि ।
प्रेत्यभावे कथं लोकाँल्लभते पुण्यकर्मणाम् ॥
राजवृत्तमहं तस्माच्छ्रोतुमिच्छामि मानद ।
यह राजा नाना प्रकारके मनुष्योंको दण्ड देता और उन्हें डाँटता-फटकारता है। यह मृत्युके पश्चात् कैसे पुण्यात्माओंके लोक पाता है? मानद! अतः मैं राजाके आचार-व्यवहारका वर्णन सुनना चाहती हूँ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि राजधर्मं शुभानने ॥
राजायत्तं हि यत् सर्वं लोकवृत्तं शुभाशुभम् ।
महत्तस्तपसो देवि फलं राज्यमिति स्मृतम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— शुभानने! अब मैं तुम्हें राजधर्मकी बात बताऊँगा; क्योंकि जगत्का सारा शुभाशुभ आचार-व्यवहार राजाके ही अधीन है। देवि! राज्यको बहुत बड़ी तपस्याका फल माना गया है ।।
अराजके पुरा त्वासीत् प्रजानां संकुलं महत् ।
तद् दृष्ट्वा संकुलं ब्रह्मा मनुं राज्ये न्यवेशयत् ॥
प्राचीन कालकी बात है, सर्वत्र अराजकता फैली हुई थी। प्रजापर महान् संकट आ गया। प्रजाकी यह संकटापन्न अवस्था देख ब्रह्माजीने मनुको राजसिंहासनपर बिठाया ।।
तदाप्रभृति संदृष्टं राज्ञां वृत्तं शुभाशुभम् ।

तन्मे शृणु वरारोहे तस्य पथ्यं जगद्धितम् ॥
तभीसे राजाओंका शुभाशुभ बर्ताव देखनेमें आया है। वरारोहे! राजाका जो आचरण जगत्‌के लिये हितकर और लाभदायक है, वह मुझसे सुनो ॥
यथा प्रेत्य लभेत् स्वर्गं यथा वीर्यं यशस्तथा ।
पित्र्यं वा भूतपूर्वं वा स्वयमुत्पाद्य वा पुनः ॥
राज्यधर्ममनुष्ठाय विधिवद् भोक्तुमर्हति ॥
जिस बर्तावके कारण वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गका भागी हो सकता है, वही बता रहा हूँ। उसमें जैसा पराक्रम और जैसा यश होना चाहिये, वह भी सुनो। पिताकी ओरसे प्राप्त हुए अथवा और पहलेसे चले आते हुए अथवा स्वयं ही पराक्रमद्वारा प्राप्त करके वशमें किये हुए राज्यको राजा धर्मका आश्रय ले विधिपूर्वक उपभोगमें लाये ॥
आत्मानमेव प्रथमं विनयैरुपपादयेत् ।
अनुभृत्यान् प्रजाः पश्चादित्येष विनयक्रमः ॥
पहले अपने आपको ही विनयसे सम्पन्न करे। तत्पश्चात् सेवकों और प्रजाओंको विनयकी शिक्षा दे। यही विनयका क्रम है ॥
स्वामिनं चोपमां कृत्वा प्रजास्तद्वृत्तकाङ्क्षया ।
स्वयं विनयसम्पन्ना भवन्तीह शुभेक्षणे ॥
शुभेक्षणे! राजाको ही आदर्श मानकर उसके आचरण सीखनेकी इच्छासे प्रजावर्गके लोग स्वयं भी विनयसे सम्पन्न होते हैं ॥
स्वस्मात् पूर्वतरं राजा विनयत्येव वै प्रजाः ।
अपहास्यो भवेत्तादृक् स्वदोषस्यानवेक्षणात् ॥
जो राजा स्वयं विनय सीखनेके पहले प्रजाको ही विनय सिखाता है, वह अपने दोषोंपर दृष्टि न डालनेके कारण उपहासका पात्र होता है ॥
विद्याभ्यासैर्वृद्धयोगैरात्मानं विनयं नयेत् ।
विद्या धर्मार्थफलिनी तद्विदो वृद्धसंज्ञिताः ॥
विद्याके अभ्यास और वृद्ध पुरुषोंके संगसे अपने आपको विनयशील बनाये। विद्या धर्म और अर्थरूप फल देनेवाली है। जो उस विद्याके ज्ञाता हैं, उन्हींको वृद्ध कहते हैं ॥
इन्द्रियाणां जयो देवि अत ऊर्ध्वमुदाहृतः ।
अजये सुमहान् दोषो राजानं विनिपातयेत् ॥
देवि! इसके बाद राजाको अपनी इन्द्रियोंपर विजय पाना चाहिये—यह बात बतायी गयी। इन्द्रियोंको काबूमें न रखनेसे जो महान् दोष प्राप्त होता है, वह राजाको नीचे गिरा देता है ॥
पञ्चैव स्ववशे कृत्वा तदर्थान् पञ्च शोषयेत् ।
षडुत्सृज्य यथायोगं ज्ञानेन विनयेन च ॥

शास्त्रचक्षुर्नयपरो भूत्वा भृत्यान् समाहरेत् ॥
पाँचों इन्द्रियोंको अपने अधीन करके उनके पाँचों विषयोंको सुखा डाले। ज्ञान और विनयके द्वारा आवश्यक प्रयत्न करके काम-क्रोध आदि छः दोषोंको त्याग दे तथा शास्त्रीय दृष्टिका सहारा लेकर न्यायपरायण हो सेवकोंका संग्रह करे ॥
वृत्तश्रुतकुलोपेतानुपधाभिः परीक्षितान् ।
अमात्यानुपधातीतान् सापसर्पान् जितेन्द्रियान् ॥
योजयेत यथायोगं यथार्हं स्वेषु कर्मसु ॥
जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न हों, जिनकी सच्चाई और ईमानदारीकी परीक्षा ले ली गयी हो, जो उस परीक्षामें उत्तीर्ण हुए हों, जिनके साथ बहुत-से जासूस हों और जो जितेन्द्रिय हों—ऐसे अमात्योंको यथायोग्य अपने कर्मोंमें उनकी योग्यताके अनुसार नियुक्त करे ॥
अमात्या बुद्धिसम्पन्ना राष्ट्रं बहुजनप्रियम् ।
दुराधर्षं पुरश्रेष्ठं कोषः कृच्छ्रसहः स्मृतः ॥
अनुरक्तं बलं साम्नामद्वैधं मित्रमेव च ।
एताः प्रकृतयः स्वेषु स्वामी विनयतत्त्ववित् ॥
बुद्धिमान् मन्त्री, बहुजनप्रिय राष्ट्र, दुर्धर्ष श्रेष्ठ नगर या दुर्ग, कठिन अवसरोंपर काम देनेवाला कोष, सामनीतिके द्वारा राजामें अनुराग रखनेवाली सेना, दुविधामें न पड़ा हुआ मित्र और विनयके तत्त्वको जाननेवाला राज्यका स्वामी—ये सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं ॥
प्रजानां रक्षणार्थाय सर्वमेतद् विनिर्मितम् ।
आभिः करणभूताभिः कुर्याल्लोकहितं नृपः ॥
प्रजाकी रक्षाके लिये ही यह सारा प्रबन्ध किया गया है। रक्षाकी हेतुभूत जो ये प्रकृतियाँ हैं, इनके सहयोगसे राजा लोकहितका सम्पादन करे ॥
आत्मरक्षा नरेन्द्रस्य प्रजारक्षार्थमिष्यते ।
तस्मात् सततमात्मानं संरक्षेद्प्रमादवान् ॥
राजाको प्रजाकी रक्षाके लिये ही अपनी रक्षा अभीष्ट होती है, अतः वह सदा सावधान होकर आत्मरक्षा करे ॥
भोजनाच्छादनस्नानाद् बहिर्निष्क्रमणादपि ।
नित्यं स्त्रीगणसंयोगाद् रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥
मनको वशमें रखनेवाला राजा भोजन-आच्छादन-स्नान, बाहर निकलना तथा सदा स्त्रियोंके समुदायसे संयोग रखना—इन सबसे अपनी रक्षा करे ॥
स्वेभ्यश्चैव परेभ्यश्च शस्त्रादपि विषादपि ।
सततं पुत्रदारेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥

वह मनको सदा अपने अधीन रखकर स्वजनोंसे, दूसरोंसे, शस्त्रसे, विषसे तथा स्त्री-पुत्रोंसे भी निरन्तर अपनी रक्षा करे ।।
सर्वेभ्य एव स्थानेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ।
प्रजानां रक्षणार्थाय प्रजाहितकरो भवेत् ।।
आत्मवान् राजा प्रजाकी रक्षाके लिये सभी स्थानोंसे अपनी रक्षा करे और सदा प्रजाके हितमें संलग्न रहे ।।
प्रजाकार्यं तु तत्कार्यं प्रजासौख्यं तु तत्सुखम् ।
प्रजाप्रियं प्रियं तस्य स्वहितं तु प्रजाहितम् ।।
प्रजार्थं तस्य सर्वस्वमात्मार्थं न विधीयते ।।
प्रजाका कार्य ही राजाका कार्य है, प्रजाका सुख ही उसका सुख है, प्रजाका प्रिय ही उसका प्रिय है तथा प्रजाके हितमें ही उसका अपना हित होता है। प्रजाके हितके लिये ही उसका सर्वस्व है, अपने लिये कुछ भी नहीं है ।।
प्रकृतीनां हि रक्षार्थं रागद्वेषौ व्युदस्य च ।
उभयोः पक्षयोर्वादं श्रुत्वा चैव यथातथम् ।।
तमर्थं विमृशेद् बुद्ध्या स्वयमातत्त्वदर्शनात् ।।
प्रकृतियोंकी रक्षाके लिये राग-द्वेष छोड़कर किसी विवादके निर्णयके लिये पहले दोनों पक्षोंकी यथार्थ बातें सुन ले। फिर अपनी बुद्धिके द्वारा स्वयं उस मामलेपर तबतक विचार करे, जबतक कि उसे यथार्थताका सुस्पष्ट ज्ञान न हो जाय ।।
तत्त्वविद्भिश्च बहुभिः सहासीनो नरोत्तमैः ।
कर्तारमपराधं च देशकालौ नयानयौ ।।
ज्ञात्वा सम्यग्यथाशास्त्रं ततो दण्डं नयेन्नृषु ।।
तत्त्वको जाननेवाले अनेक श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ बैठकर परामर्श करनेके बाद अपराधी, अपराध, देश, काल, न्याय और अन्यायका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त करके फिर शास्त्रके अनुसार राजा अपराधी मनुष्योंको दण्ड दे ।।
एवं कुर्वल्लभेद् धर्मं पक्षपातविवर्जनात् ।।
प्रत्यक्षाप्तोपदेशाभ्यामनुमानेन वा पुनः ।
बोद्धव्यं सततं राज्ञा देशवृत्तं शुभाशुभम् ।।
पक्षपात छोड़कर ऐसा करनेवाला राजा धर्मका भागी होता है। प्रत्यक्ष देखकर, माननीय पुरुषोंके उपदेश सुनकर अथवा युक्तियुक्त अनुमान करके राजाको सदा ही अपने देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानना चाहिये ।।
चारैः कर्मप्रवृत्त्या च तद् विज्ञाय विचारयेत् ।
अशुभं निर्हरेत् सद्यो जोषयच्छुभमात्मनः ।।

गुप्तचरोंद्वारा और कार्यकी प्रवृत्तिसे देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानकर उसपर विचार करे। तत्पश्चात् अशुभका तत्काल निवारण करे और अपने लिये शुभका सेवन करे ।।
गर्ह्यान् विगर्हयेदेव पूज्यान् सम्पूजयेत् तथा ।
दण्ड्यांश्च दण्डयेद् देवि नात्र कार्या विचारणा ।।
देवि! राजा निन्दनीय मनुष्योंकी निन्दा ही करे, पूजनीय पुरुषोंका पूजन करे और दण्डनीय अपराधियोंको दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।।
पञ्चापेक्षं सदा मन्त्रं कुर्याद् बुद्धियुतैनरैः ।
कुलवृत्तश्रुतोपेतैर्नित्यं मन्त्रपरो भवेत् ।।
पाँच व्यक्तियोंकी अपेक्षा रखकर अर्थात् पाँच मन्त्रियोंके साथ बैठकर सदा ही राज-कार्यके विषयमें गुप्त मन्त्रणा करे। जो बुद्धिमान्, कुलीन, सदाचारी और शास्त्रज्ञानसम्पन्न हों, उन्हींके साथ राजाको सदा मन्त्रणा करनी चाहिये ।।
कामकारेण वैमुख्यैर्नैव मन्त्रमना भवेत् ।
राजा राष्ट्रहितापेक्षं सत्यधर्माणि कारयेत् ।।
जो इच्छानुसार राज्यकार्यसे विमुख हो जाते हों, ऐसे लोगोंके साथ मन्त्रणा करनेका विचार भी मनमें नहीं लाना चाहिये। राजाको राष्ट्रके हितका ध्यान रखकर सत्य-धर्मका पालन करना और कराना चाहिये ।।
सर्वोद्योगं स्वयं कुर्याद् दुर्गादिषु सदा नृषु ।
देशवृद्धिकरान् भृत्यानप्रमादेन कारयेत् ।।
देशक्षयकरान् सर्वानप्रियांश्च विसर्जयेत् ।
अहन्यहनि सम्पश्येदनुजीविगणं स्वयं ।।
दुर्ग आदि तथा मनुष्योंकी देखभालके लिये राजा सम्पूर्ण उद्योग सदा स्वयं ही करे। वह देशकी उन्नति करनेवाले भृत्योंको सावधानीके साथ कार्यमें नियुक्त करे और देशको हानि पहुँचानेवाले समस्त अप्रियजनोंका परित्याग कर दे। जो राजाके आश्रित होकर जीविका चला रहे हों, ऐसे लोगोंकी देखभाल भी राजा प्रतिदिन स्वयं ही करे ।।
सुमुखः सुप्रियो दत्त्वा सम्यग्वृत्तं समाचरेत् ।
अधर्म्यं परुषं तीक्ष्णं वाक्यं वक्तुं न चार्हति ।।
वह प्रसन्नमुख और सबका परम प्रिय होकर लोगोंको जीविका दे, उनके साथ उत्तम बर्ताव करे। किसीसे पापपूर्ण, रूखा और तीखा वचन बोलना उसके लिये कदापि उचित नहीं ।।
अविश्वास्यं हि वचनं वक्तुं सत्सु न चार्हति ।
नरे नरे गुणान् दोषान् सम्यग्वेदितुमर्हति ।।
सत्पुरुषोंके बीचमें वह कभी ऐसी बात न कहे, जो विश्वासके योग्य न हो। प्रत्येक मनुष्यके गुणों और दोषोंको उसे अच्छी तरह समझना चाहिये ।।

स्वेङ्गितं वृणुयाद् धैर्यान्न कुर्यात् क्षुद्रसंविदम् ।
परेङ्गितज्ञो लोकेषु भूत्वा संसर्गमाचरेत् ॥
अपनी चेष्टाको धैर्यपूर्वक छिपाये रखे। क्षुद्र बुद्धिका प्रदर्शन न करे अथवा मनमें क्षुद्र विचार न लाये। दूसरेकी चेष्टाको अच्छी तरह समझकर संसारमें उनके साथ सम्पर्क स्थापित करे ॥

स्वतश्च परतश्चैव परस्परभयादपि ।
अमानुषभयेभ्यश्च स्वाः प्रजाः पालयेन्नृपः ॥
राजाको चाहिये कि वह अपने भयसे, दूसरोंके भयसे, पारस्परिक भयसे तथा अमानुष भयोंसे अपनी प्रजाको सुरक्षित रखे ॥

लुब्धाः कठोराश्चाप्यस्य मानवा दस्युवृत्तयः ।
निग्राह्या एव ते राज्ञा संगृहीत्वा यतस्ततः ॥
जो लोभी, कठोर तथा डाका डालनेवाले मनुष्य हों, उन्हें जहाँ-तहाँसे पकड़वाकर राजा कैदमें डाल दे ॥

कुमारान् विनयैरेव जन्मप्रभृति योजयेत् ।
तेषामात्मगुणोपेतं यौवराज्येन योजयेत् ॥
राजकुमारोंको जन्मसे ही विनयशील बनावे। उनमेंसे जो भी अपने अनुरूप गुणोंसे युक्त हो, उसे युवराजपदपर नियुक्त करे ॥

अराजकं क्षणमपि राज्यं न स्याद्धि शोभने ।
आत्मनोऽनुविधानाय यौवराज्यं सदेष्यते ॥
शोभने! एक क्षणके लिये भी बिना राजाका राज्य नहीं रहना चाहिये। अतः अपने पीछे राजा होनेके लिये एक युवराजको नियत करना सदा ही आवश्यक है ॥

कुलजानां च वैद्यानां श्रोत्रियाणां तपस्विनाम् ।
अन्येषां वृत्तियुक्तानां विशेषं कर्तुमर्हति ॥
आत्मार्थं राज्यतन्त्रार्थं कोशार्थं च समाचरेत् ॥
कुलीन पुरुषों, वैद्यों, श्रोत्रिय ब्राह्मणों, तपस्वी मुनियों तथा वृत्तियुक्त दूसरे पुरुषोंका भी राजा विशेष सत्कार करे। अपने लिये, राज्यके हितके लिये तथा कोष-संग्रहके लिये ऐसा करना आवश्यक है ॥

चतुर्धा विभजेत् कोशं धर्मभृत्यात्मकारणात् ।
आपदर्थं च नीतिज्ञो देशकालवशेन तु ॥
नीतिज्ञ पुरुष अपने कोषको चार भागोंमें विभक्त करे—धर्मके लिये, पोष्य वर्गके पोषणके लिये, अपने लिये तथा देश-कालवश आनेवाली आपत्तिके लिये ॥

अनाथान् व्याधितान् वृद्धान् स्वदेशे पोषयेन्नृपः ॥
सन्धिं च विग्रहं चैव तद् विशेषांस्तथा परान् ।

यथावत् संविमृश्यैव बुद्धिपूर्वं समाचरेत् ॥
राजाको चाहिये कि अपने देशमें जो अनाथ, रोगी और वृद्ध हों, उनका स्वयं पोषण करे। संधि, विग्रह तथा अन्य नीतियोंका बुद्धिपूर्वक भलीभाँति विचार करके प्रयोग करे ॥

सर्वेषां सम्प्रियो भूत्वा मण्डलं सततं चरेत् ।
शुभेष्वपि च कार्येषु न चैकान्तः समाचरेत् ॥
राजा सबका प्रिय होकर सदा अपने मण्डल (देशके भिन्न-भिन्न भाग) में विचरे। शुभ कार्योंमें भी वह अकेला कुछ न करे ॥

स्वतश्च परतश्चैव व्यसनानि विमृश्य सः ।
परेण धार्मिकान् योगान् नातीयाद् द्वेषलोभतः ॥
अपने और दूसरोंसे संकटकी सम्भावनाका विचार करके द्वेष या लोभवश धार्मिक पुरुषोंके साथ सम्बन्धका त्याग न करे ॥

रक्ष्यत्वं वै प्रजाधर्मः क्षत्रधर्मस्तु रक्षणम् ।
कुनृपैः पीडितास्तस्मात् प्रजाः सर्वत्र पालयेत् ॥
प्रजाका धर्म है रक्षणीयता और क्षत्रिय राजाका धर्म है रक्षा; अतः दुष्ट राजाओंसे पीड़ित हुई प्रजाकी सर्वत्र रक्षा करे ॥

व्यसनेभ्यो बलं रक्षेन्नयतो व्ययतोऽपि वा ।
प्रायशो वर्जयेद् युद्धं प्राणरक्षणकारणात् ॥
सेनाको संकटोंसे बचावे, नीतिसे अथवा धन खर्च करके भी प्रायः युद्धको टाले। सैनिकों तथा प्रजाजनोंके प्राणोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही ऐसा करना चाहिये ॥

कारणादेव योद्धव्यं नात्मनः परदोषतः ।
सुयुद्धे प्राणमोक्षश्च तस्य धर्माय इष्यते ॥
अनिवार्य कारण उपस्थित होनेपर ही युद्ध करना चाहिये, अपने या पराये दोषसे नहीं। उत्तम युद्धमें प्राण-विसर्जन करना वीर योद्धाके लिये धर्मकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥

अभियुक्तो बलवता कुर्यादापद्विधिं नृपः ।
अनुनीय तथा सर्वान् प्रजानां हितकारणात् ॥
एष देवि समासेन राजधर्मः प्रकीर्तितः ॥
किसी बलवान् शत्रुके आक्रमण करनेपर राजा उस आपत्तिसे बचनेका उपाय करे। प्रजाके हितके लिये समस्त विरोधियोंको अनुनय-विनयके द्वारा अनुकूल बना ले। देवि! यह संक्षेपसे राजधर्म बताया गया है ॥

एवं संवर्तमानस्तु दण्डयन् भर्त्सयन् प्रजाः ।
निष्कल्मषमवाप्नोति पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
इस प्रकार बर्ताव करनेवाला राजा प्रजाको दण्ड देता और फटकारता हुआ भी जलसे लिप्त न होनेवाले कमलदलके समान पापसे अछूता ही रहता है ॥

एवं संवर्तमानस्य कालधर्मो यदा भवेत् ।
स्वर्गलोके तदा राजा त्रिदशैः सह तोष्यते ॥

इस बर्तावसे रहनेवाले राजाकी जब मृत्यु होती है, तब वह स्वर्गलोकमें जाकर देवताओंके साथ आनन्द भोगता है ॥
(दाक्षिणात्यप्रतिमें अध्याय समाप्त)

[योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा]

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[योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा]

श्रीमहेश्वर उवाच

अथ यस्तु सहायार्थमुक्ताः स्यात् पार्थिवैनरैः ।।

भोगानां संविभागेन वस्त्राभरणभूषणैः ।

सहभोजनसम्बन्धैः सत्कारैर्विविधैरपि ।।

सहायकाले सम्प्राप्ते संग्रामे शस्त्रमुद्धरेत् ।।

भगवान् महेश्वर कहते हैं—राजा भाँति-भाँतिके भोग, वस्त्र और आभूषण देकर जिन

लोगोंको अपनी सहायताके लिये बुलाता और रखता है, उनके साथ भोजन करके घनिष्ठ

सम्बन्ध स्थापित करता है और नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा उन्हें संतुष्ट करता है, ऐसे

योद्धाओंको उचित है कि युद्ध छिड़ जानेपर सहायताके समय उस राजाके लिये शस्त्र

उठावे ।।

हन्यमानेष्वभिघ्नत्सु शूरेषु रणसंकटे ।

पृष्ठं दत्त्वा च ये तत्र नायकस्य नराधमाः ।।

अनाहता निवर्तन्ते नायके चाप्यनीप्सति ।

ते दुष्कृतं प्रपद्यन्ते नायकस्याखिलं नराः ।।

यच्चास्ति सुकृतं तेषां युज्यते तेन नायकः ।

जब घोर संग्राममें शूरवीर एक-दूसरेको मारते और मारे जाते हों, उस अवसरपर जो

नराधम सैनिक पीठ देकर सेनानायककी इच्छा न होते हुए भी बिना घायल हुए ही युद्धसे

मुँह मोड़ लेते हैं, वे सेनापतिके सम्पूर्ण पापोंको स्वयं ही ग्रहण कर लेते हैं और उन भगोड़ोंके

पास जो कुछ भी पुण्य होता है, वह सेनानायकको प्राप्त हो जाता है ।।

अहिंसा परमो धर्म इति येऽपि नरा विदुः ।

संग्रामेषु न युध्यन्ते भृत्याश्चैवानुरूपतः ।।

नरकं यान्ति ते घोरं भर्तृपिण्डापहारिणः ।।

‘अहिंसा परम धर्म है,’ ऐसी जिनकी मान्यता है, वे भी यदि राजाके सेवक हैं, उनसे

भरण-पोषणकी सुविधा एवं भोजन पाते हैं, ऐसी दशामें भी वे अपनी शक्तिके अनुरूप

संग्रामोंमें जूझते नहीं हैं तो घोर नरकमें पड़ते हैं; क्योंकि वे स्वामीके अन्नका अपहरण

करनेवाले हैं ।।

यस्तु प्राणान् परित्यज्य प्रविशेदुद्यतायुधः ।

संग्राममग्निप्रतिमं पतंग इव निर्भयः ।।

स्वर्गमाविशते ज्ञात्वा योधस्य गतिनिश्चयम् ।।

जो अपने प्राणोंकी परवाह छोड़कर पतंगकी भाँति निर्भय हो हाथमें हथियार उठाये

अग्निके समान विनाशकारी संग्राममें प्रवेश कर जाता है और योद्धाको मिलनेवाली निश्चित

गतिको जानकर उत्साहपूर्वक जूझता है, वह स्वर्गलोकमें जाता है ।।

यस्तु स्वं नायकं रक्षेद्तिघोरे रणाङ्गणे ।

तापयन्नरिसैन्यानि सिंहो मृगगणानिव ।।

आदित्य इव मध्याह्ने दुर्निरीक्ष्यो रणाजिरे ।।

निर्दयो यस्तु संग्रामे प्रहरन्तुद्यतायुधः ।

यजते स तु पूतात्मा संग्रामेण महाक्रतुम् ।।

जो अत्यन्त घोर समरांगणमें मृगोंके झुडोंको संतप्त करनेवाले सिंहके समान

शत्रुसैनिकोंको ताप देता हुआ अपने नायक (राजा या सेनापति) की रक्षा करता है,

मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति रणक्षेत्रमें जिसकी ओर देखना शत्रुओंके लिये अत्यन्त कठिन

हो जाता है तथा जो संग्राममें शस्त्र उठाये निर्दयतापूर्वक प्रहार करता है, वह शुद्धचित्त

होकर उस युद्धके द्वारा ही मानो महान् यज्ञका अनुष्ठान करता है ।।

वर्म कृष्णाजिनं तस्य दन्तकाष्ठं धनुः स्मृतम् ।

रथो वेदिर्ध्वजो यूपः कुशाश्च रथरश्मयः ।।

मानो दर्पस्त्वहङ्कारस्त्रयस्त्रेताग्नयः स्मृताः ।

प्रतोदश्च स्रुवस्तस्य उपाध्यायो हि सारथिः ।।

स्रुग्भाण्डं चापि यत् किंचिद् यज्ञोपकरणानि च ।।

आयुधान्यस्य तत् सर्वं समिधः सायकाः स्मृताः ।।

उस समय कवच ही उसका काला मृगचर्म है, धनुष ही दाँतुन या दन्तकाष्ठ है, रथ ही

वेदी है, ध्वज यूप है और रथकी रस्सियाँ ही बिछे हुए कुशोंका काम देती हैं। मान, दर्प और

अहंकार—ये त्रिविध अग्नियाँ हैं, चाबुक, सुवा है, सारथि उपाध्याय है, स्रुक्-भाण्ड आदि

जो कुछ भी यज्ञकी सामग्री है, उसके स्थानमें उस योद्धाके भिन्न-भिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं।

सायकोंको ही समिधा माना गया है ।।

स्वेदस्रवश्च गात्रेभ्यः क्षौद्रं तस्य यशस्विनः ।

पुरोडाशा नृशीर्षाणि रुधिरं चाहुतिः स्मृता ।।

तूणाश्चैव चरुर्ज्ञेया वसोर्धारा वसाः स्मृताः ।।

क्रव्यादा भूतसंघाश्च तस्मिन् यज्ञे द्विजातयः ।

तेषां भक्तान्नपानानि हता नृगजवाजिनः ।।

उस यशस्वी वीरके अंगोंसे जो पसीने ढलते हैं, वे ही मानो मधु हैं। मनुष्योंके मस्तक

पुरोडाश हैं, रुधिर आहुति है, तूणीरोंको चरु समझना चाहिये। वसाको ही वसुधारा माना

गया है, मांसभक्षी भूतोंके समुदाय ही उस यज्ञमें द्विज हैं। मारे गये मनुष्य, हाथी और घोड़े

ही उनके भोजन और अन्नपान हैं ।।

निहतानां तु योधानां वस्त्राभरणभूषणम् ।

हिरण्यं च सुवर्णं च यद् वै यज्ञस्य दक्षिणा ।।

मारे गये योद्धाओंके जो वस्त्र, आभूषण और सुवर्ण हैं, वे ही मानो उस रणयज्ञकी दक्षिणा हैं ।।
यस्तत्र हन्यते देवि गजस्कन्धगतो नरः ।
ब्रह्मलोकमवाप्नोति रणेष्वभिमुखो हतः ।।
देवि! जो संग्राममें हाथीकी पीठपर बैठा हुआ युद्धके मुहानेपर मारा जाता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ।।
रथमध्यगतो वापि हयपृष्ठगतोऽपि वा ।
हन्यते यस्तु संग्रामे शक्रलोके महीयते ।।
रथके बीचमें बैठा हुआ या घोड़ेकी पीठपर चढ़ा हुआ जो वीर युद्धमें मारा जाता है, वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ।।
स्वर्गे हताः प्रपूज्यन्ते हन्ता त्वत्रैव पूज्यते ।
द्वावेतौ सुखमेधेते हन्ता यश्चैव हन्यते ।।
मारे गये योद्धा स्वर्गमें पूजित होते हैं; किन्तु मारनेवाला इसी लोकमें प्रशंसित होता है। अतः युद्धमें दोनों ही सुखी होते हैं—जो मारता है वह और जो मारा जाता है वह ।।
तस्मात् संग्राममासाद्य प्रहर्तव्यमभीतवत् ।।
निर्भयो यस्तु संग्रामे प्रहरेदुद्यतायुधः ।।
यथा नदीसहस्राणि प्रविष्टानि महोदधिम् ।
तथा सर्वे न संदेहो धर्मा धर्मभृतां वरम् ।।
अतः संग्रामभूमिमें पहुँच जानेपर निर्भय होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये। जो हथियार उठाकर संग्राममें निर्भय होकर प्रहार करता है, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ उस वीरको निस्संदेह सभी धर्म प्राप्त होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे महासागरमें सहस्रों नदियाँ आकर मिलती हैं ।।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद् धर्मो न हन्तव्यः पार्थिवेन विशेषतः ।।
धर्म ही, यदि उसका हनन किया जाय तो मारता है और धर्म ही सुरक्षित होनेपर रक्षा करता है; अतः प्रत्येक मनुष्यको, विशेषतः राजाको धर्मका हनन नहीं करना चाहिये ।।
प्रजाः पालयते यत्र धर्मेण वसुधाधिपः ।
षट्कर्मनिरता विप्राः पूज्यन्ते पितृदैवतैः ।।
नैव तस्मिन्ननावृष्टिर्न रोगा नाप्युपद्रवाः ।
धर्मशीलाः प्रजाः सर्वाः स्वधर्मनिरते नृपे ।।
जहाँ राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है तथा जहाँ पितरों और देवताओंके साथ षट्कर्मपरायण ब्राह्मणोंकी पूजा होती है, उस देशमें न तो कभी अनावृष्टि होती है, न