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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

गान्धारी च महाभागा जननी च पृथा तव ।। ३१ ।।
दावाग्निना समायुक्ते स च राजा पिता तव ।
संजयस्तु महामात्रस्तस्माद् दावाद्मुच्यत ।। ३२ ।।
इसके बाद महाभागा गान्धारी, तुम्हारी माता कुन्ती तथा तुम्हारे ताऊ राजा धृतराष्ट्र— ये तीनों ही दावाग्निमें जलकर भस्म हो गये; परंतु महामात्य संजय उस दावाग्निसे जीवित बच गये हैं ।। ३१-३२ ।।
गङ्गाकूले मया दृष्टस्तापसैः परिवारितः ।
स तानामन्त्र्य तेजस्वी निवेद्यैतच्च सर्वशः ।। ३३ ।।
प्रययौ संजयो धीमान् हिमवन्तं महीधरम् ।
मैंने संजयको गंगातटपर तापसोंसे घिरा देखा है। बुद्धिमान् और तेजस्वी संजय तापसोंको यह सब समाचार बताकर उनसे विदा ले हिमालयपर्वतपर चले गये ।। ३३ १/२ ।।
एवं स निधनं प्राप्तः कुरुराजो महामनाः ।। ३४ ।।
गान्धारी च पृथा चैव जनन्यौ ते विशाम्पते ।
प्रजानाथ! इस प्रकार महामनस्वी कुरुराज धृतराष्ट्र तथा तुम्हारी दोनों माताएँ गान्धारी और कुन्ती मृत्युको प्राप्त हो गयीं ।। ३४ १/२ ।।

यददृच्छयानुव्रजता मया राज्ञः कलेवरम् ।। ३५ ।।
तयोश्च देव्योरुभयोर्मया दृष्टानि भारत ।
भरतनन्दन! वनमें घूमते समय अकस्मात् राजा धृतराष्ट्र तथा उन देवियोंके मृत शरीर मेरी दृष्टिमें पड़े थे ।। ३५ १/२ ।।
ततस्तपोवने तस्मिन् समाजग्मुस्तपोधनाः ।। ३६ ।।
श्रुत्वा राज्ञस्तदा निष्ठां न त्वशोचन् गतींश्च ते ।
तदनन्तर राजाकी मृत्युका समाचार सुनकर बहुत-से तपोधन उस तपोवनमें आये। उन्होंने उनके लिये कोई शोक नहीं किया; क्योंकि उन तीनोंकी सद्गतिके विषयमें उनके मनमें संशय नहीं था ।। ३६ १/२ ।।
तत्राश्रौषमहं सर्वमेतत् पुरुषसत्तम ।। ३७ ।।
यथा च नृपतिर्दग्धो देव्यौ ते चेति पाण्डव ।
पुरुषप्रवर पाण्डव! जिस प्रकार राजा धृतराष्ट्र तथा उन दोनों देवियोंका दाह हुआ है, यह सारा समाचार मैंने वहीं सुना था ।। ३७ १/२ ।।
न शोचितव्यं राजेन्द्र स्वतः स पृथिवीपतिः ।। ३८ ।।
प्राप्तवानग्निसंयोगं गान्धारी जननी च ते ।
राजेन्द्र! राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और तुम्हारी माता कुन्ती—तीनोंने स्वतः अग्निसंयोग प्राप्त किया था; अतः उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ।। ३८ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा च सर्वेषां पाण्डवानां महात्मनाम् ।। ३९ ।।
निर्याणं धृतराष्ट्रस्य शोकः समभवन्महान् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रका यह परलोकगमनका समाचार सुनकर उन सभी महामना पाण्डवोंको बड़ा शोक हुआ ।। ३९ १/२ ।।
अन्तःपुराणां च तदा महानार्तस्वरोऽभवत् ।। ४० ।।
पौराणां च महाराज श्रुत्वा राजंस्तदा गतिम् ।
महाराज! उनके अन्तःपुरमें उस समय महान् आर्तनाद होने लगा। राजाकी वैसी गति सुनकर पुरवासियोंमें भी हाहाकार मच गया ।। ४० १/२ ।।
अहो धिगिति राजा तु विक्रुश्य भृशदुःखितः ।। ४१ ।।
ऊर्ध्वबाहुः स्मरन् मातुः प्ररुरोद युधिष्ठिरः ।
'अहो! धिक्कार है!' इस प्रकार अपनी निन्दा करके राजा युधिष्ठिर बहुत दुःखी हो गये तथा दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर अपनी माताको याद करके फूट-फूटकर रोने लगे ।। ४१ १/२ ।।
भीमसेनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते ।। ४२ ।।

अन्तःपुरेषु च तदा सुमहान् रुदितस्वनः ।
प्रादुरासीन्महाराज पृथां श्रुत्वा तथागताम् ॥ ४३ ॥
भीमसेन आदि सभी भाई रोने लगे। महाराज! कुन्तीकी वैसी दशा सुनकर अन्तःपुरमें भी रोने-बिलखनेका महान् शब्द सुनायी देने लगा ॥ ४२-४३ ॥

तं च वृद्धं तथा दग्धं हतपुत्रं नराधिपम् ।
अन्वशोचन्त ते सर्वे गान्धारीं च तपस्विनीम् ॥ ४४ ॥
पुत्रहीन बूढ़े राजा धृतराष्ट्र तथा तपस्विनी गान्धारी-देवीको इस प्रकार दग्ध हुई सुनकर सब लोग बारंबार शोक करने लगे ॥ ४४ ॥

तस्मिन्नुपरते शब्दे मुहूर्तादिव भारत ।
निगृह्य बाष्पं धैर्येण धर्मराजोऽब्रवीदिदम् ॥ ४५ ॥
भरतनन्दन! दो घड़ी बाद जब रोने-धोनेकी आवाज बंद हुई, तब धर्मराज युधिष्ठिर धैर्यपूर्वक अपने आँसू पोंछकर नारदजीसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि दावाग्निना
धृतराष्ट्रादिदाहे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें धृतराष्ट्र आदिका दावाग्निसे दाहविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः

नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन

युधिष्ठिर उवाच

तथा महात्मनस्तस्य तपस्युग्रे च वर्ततः ।
अनाथस्येव निधनं तिष्ठत्स्वास्मासु बन्धुषु ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भगवन्! हम-जैसे बन्धु-बान्धवोंके रहते हुए भी कठोर तपस्यामें लगे हुए महामना धृतराष्ट्रकी अनाथके समान मृत्यु हुई, यह कितने दुःखकी बात है? ॥ १ ॥

दुर्विज्ञेया गतिर्ब्रह्मन् पुरुषाणां मतिर्मम ।
यत्र वैचित्रवीर्योऽसौ दग्ध एवं वनाग्निना ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! मेरा तो ऐसा मत है कि मनुष्योंकी गतिका ठीक-ठीक ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है; जब कि विचित्रवीर्यकुमार धृतराष्ट्रको इस तरह दावानलसे दग्ध होकर मरना पड़ा ॥ २ ॥

यस्य पुत्रशतं श्रीमदभवद् बाहुशालिनः ।
नागायुतबलो राजा स दग्धो हि दवाग्निना ॥ ३ ॥
जिन बाहुबलशाली नरेशके सौ पुत्र थे, जो स्वयं भी दस हजार हाथियोंके समान बलवान् थे, वे ही दावानलसे जलकर मरे हैं, यह कितने दुःखकी बात है? ॥

यं पुरा पर्यवीजन्त तालवृन्तैर्वरस्त्रियः ।
तं गृध्राः पर्यवीजन्त दावाग्निपरिकालितम् ॥ ४ ॥
पूर्वकालमें सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें सब ओरसे ताड़के पंखोंद्वारा हवा करती थीं, उन्हें दावानलसे दग्ध हो जानेपर गीधोंने अपनी पाँखोंसे हवा की है ॥ ४ ॥

सूतमागधसंघैश्च शयानो यः प्रबोध्यते ।
धरण्यां स नृपः शेते पापस्य मम कर्मभिः ॥ ५ ॥
जो बहुमूल्य शय्यापर सोते थे और जिन्हें सूत तथा मागधोंके समुदाय मधुर गीतोंद्वारा जगाया करते थे, वे ही महाराज मुझ पापीकी करतूतोंसे पृथ्वीपर सो रहे हैं ॥ ५ ॥

न च शोचामि गान्धारीं हतपुत्रां यशस्विनीम् ।
पतिलोकमनुप्राप्तां तथा भर्तृव्रते स्थिताम् ॥ ६ ॥
मुझे पुत्रहीना यशस्विनी गान्धारीके लिये उतना शोक नहीं है, क्योंकि वे पातिव्रत्य-धर्मका पालन करती थीं; अतः पतिलोकमें गयी हैं ॥ ६ ॥

पृथामेव च शोचामि या पुत्रैश्वर्यमृद्धिमत् ।
उत्सृज्य सुमहद् दीप्तं वनवासमरोचयत् ॥ ७ ॥
मैं तो उन माता कुन्तीके लिये ही अधिक शोक करता हूँ, जिन्होंने पुत्रोंके समृद्धिशाली एवं परम समुज्ज्वल ऐश्वर्यको ठुकराकर वनमें रहना पसंद किया था ॥ ७ ॥

धिग् राज्यमिदमस्माकं धिग् बलं धिक् पराक्रमम् ।
क्षत्रधर्मं च धिग् यस्मान्मृता जीवामहे वयम् ॥ ८ ॥
हमारे इस राज्यको धिक्कार है, बल और पराक्रमको धिक्कार है तथा इस क्षत्रिय-धर्मको भी धिक्कार है! जिससे आज हमलोग मृतकतुल्‍य जीवन बिता रहे हैं ॥ ८ ॥

सुसूक्ष्मा किल कालस्य गतिर्द्विजवरोत्तम ।
यत् समुत्सृज्य राज्यं सा वनवासमरोचयत् ॥ ९ ॥
विप्रवर! कालकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है, जिससे प्रेरित होकर माता कुन्तीने राज्य त्यागकर वनमें ही रहना ठीक समझा ॥ ९ ॥

युधिष्ठिरस्य जननी भीमस्य विजयस्य च ।
अनाथवत् कथं दग्धा इति मुह्यामि चिन्तयन् ॥ १० ॥
युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुनकी माता अनाथकी भाँति कैसे जल गयी, यह सोचकर मैं मोहित हो जाता हूँ ॥ १० ॥

वृथा संतर्पितो वह्निः खाण्डवे सव्यसाचिना ।
उपकारमजानन् स कृतघ्न इति मे मतिः ॥ ११ ॥
सव्यसाची अर्जुनने जो खाण्डववनमें अग्निदेवको तृप्त किया था, वह व्यर्थ हो गया। वे उस उपकारको याद न रखनेके कारण कृतघ्न हैं—ऐसी मेरी धारणा है ॥ ११ ॥

यत्रादहत् स भगवान् मातरं सव्यसाचिनः ।
कृत्वा यो ब्राह्मणच्छद्म भिक्षार्थी समुपागतः ॥ १२ ॥
धिगग्निं धिक् च पार्थस्य विश्रुतां सत्यसंधताम् ।
जो एक दिन ब्राह्मणका वेश बनाकर अर्जुनसे भीख माँगने आये थे, उन्हीं भगवान् अग्निदेवने अर्जुनकी माँको जलाकर भस्म कर दिया। अग्निदेवको धिक्कार है! अर्जुनकी जो सुप्रसिद्ध सत्यप्रतिज्ञता है, उसको भी धिक्कार है! ॥ १२ १/२ ॥

इदं कष्टतरं चान्यद् भगवन् प्रतिभाति मे ॥ १३ ॥
वृथाग्निना समायोगो यदभूत् पृथिवीपतेः ।
भगवन्! राजा धृतराष्ट्रके शरीरको जो व्यर्थ (लौकिक) अग्निका संयोग प्राप्त हुआ, यह दूसरी अत्यन्त कष्ट देनेवाली बात जान पड़ती है ॥ १३ १/२ ॥

तथा तपस्विनस्तस्य राजर्षेः कौरवस्य ह ॥ १४ ॥
कथमेवंविधो मृत्युः प्रशास्य पृथिवीमिमाम् ।

जिन्होंने पहले इस पृथ्वीका शासन करके अन्तमें वैसी कठोर तपस्याका आश्रय लिया था, उन कुरुवंशी राजर्षिको ऐसी मृत्यु क्यों प्राप्त हुई? ।। १४ १/२ ।। तिष्ठत्सु मन्त्रपूतेषु तस्याग्निषु महावने ।। १५ ।। वृथाग्निना समायुक्तो निष्ठां प्राप्तः पिता मम । हाय, उस महान् वनमें मन्त्रोंसे पवित्र हुई अग्नियोंके रहते हुए भी मेरे ताऊ लौकिक अग्निसे दग्ध होकर क्यों मृत्युको प्राप्त हुए? ।। १५ १/२ ।। मन्ये पृथा वेपमाना कृशा धमनिसंतता ।। १६ ।। हा तात! धर्मराजेति समाक्रन्दन्महाभये । मैं तो समझता हूँ कि अत्यन्त दुर्बल हो जानेके कारण जिनके शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियोंतक स्पष्ट दिखायी देती थीं, वे मेरी माता कुन्ती अग्निका महान् भय उपस्थित होनेपर ‘हा तात! हा धर्मराज!’ कहकर कातर पुकार मचाने लगी होंगी ।। १६ १/२ ।। भीम पर्याप्नुहि भयादिति चैवाभिवाशती ।। १७ ।। समन्ततः परिक्षिप्ता माताभून्मे दवाग्निना । ‘भीमसेन! इस भयसे मुझे बचाओ, ऐसा कहकर चारों ओर चीखती-चिल्लाती हुई मेरी माताको दावानलने जलाकर भस्म कर दिया होगा ।। १७ १/२ ।। सहदेवः प्रियस्तस्याः पुत्रेभ्योऽधिक एव तु ।। १८ ।। न चैनां मोक्षयामास वीरो माद्रवतीसुतः । सहदेव मेरी माताको अपने सभी पुत्रोंसे अधिक प्रिय था; परंतु वह वीर माद्रीकुमार भी माँको उस संकटसे बचा न सका ।। १८ १/२ ।। तच्छ्रुत्वा रुरुदुः सर्वे समालिङ्ग्य परस्परम् ।। १९ ।। पाण्डवाः पञ्च दुःखार्ता भूतानीव युगक्षये । यह सुनकर समस्त पाण्डव एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर रोने लगे। जैसे प्रलयकालमें पाँचों भूत पीड़ित हो जाते हैं, उसी प्रकार उस समय पाँचों पाण्डव दुःखसे आतुर हो उठे ।। १९ १/२ ।। तेषां तु पुरुषेन्द्राणां रुदतां रुदितस्वनः ।। २० ।। प्रासादाभोगसंरुद्धे अन्वरौत्सीत् स रोदसी ।। २१ ।। वहाँ रोदन करते हुए उन पुरुषप्रवर पाण्डवोंके रोनेका शब्द महलके विस्तारसे अवरुद्ध हुए भूतल और आकाशमें गूँजने लगा ।। २०-२१ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि युधिष्ठिरविलापे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।। ३८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें युधिष्ठिरका विलापविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।।


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अध्याय (पृष्ठ 2428)

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एकोनचत्वारिंreflexoऽध्यायः / एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

राजा युधिष्ठिरद्वारा धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती—इन तीनोंकी हड्डियोंको गङ्गामें प्रवाहित कराना तथा श्राद्धकर्म करना

नारद उवाच

नासौ वृथाग्निना दग्धो यथा तत्र श्रुतं मया ।
वैचित्रवीर्यो नृपतिस्तत् ते वक्ष्यामि सुव्रत ॥ १ ॥
नारदजीने कहा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रका दाह व्यर्थ (लौकिक) अग्निसे नहीं हुआ है। इस विषयमें मैंने वहाँ जैसा सुना था, वह सब तुम्हें बताऊँगा ॥ १ ॥

वनं प्रविशतानेन वायुभक्षेण धीमता ।
अग्नयः कारयित्वेष्टिमुत्सृष्टा इति नः श्रुतम् ॥ २ ॥
हमारे सुननेमें आया है कि वायु पीकर रहनेवाले वे बुद्धिमान् नरेश जब घने वनमें प्रवेश करने लगे, उस समय उन्होंने याजकोंद्वारा इष्टि कराकर तीनों अग्नियोंको वहीं त्याग दिया ॥ २ ॥

याजकास्तु ततस्तस्य तानग्नीन्निर्जने वने ।
समुत्सृज्य यथाकामं जग्मुर्भरतसत्तम ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उनकी उन अग्नियोंको उसी निर्जन वनमें छोड़कर उनके याजकगण इच्छानुसार अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ३ ॥

स विवृद्धस्तदा वह्निर्वने तस्मिन्नभूत् किल ।
तेन तद् वनमादीप्तमिति ते तापसाब्रुवन् ॥ ४ ॥
कहते हैं, वही अग्नि बढ़कर उस वनमें सब ओर फैल गयी और उसीने उस सारे वनको भस्मसात् कर दिया—यह बात मुझसे वहाँके तापसोंने बतायी थी ॥ ४ ॥

स राजा जाह्नवीतीरे यथा ते कथितं मया ।
तेनाग्निना समायुक्तः स्वेनैव भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे राजा गंगाके तटपर, जैसा कि मैंने तुम्हें बताया है, उस अपनी ही अग्निसे दग्ध हुए हैं ॥

एवमावेदयामासुर्मुनयस्ते ममानघ ।
ये ते भागीरथीतीरे मया दृष्टा युधिष्ठिर ॥ ६ ॥

निष्पाप नरेश! गंगाजीके तटपर मुझे जिनके दर्शन हुए थे, उन मुनियोंने मुझसे ऐसा ही बताया था ॥ ६ ॥

एवं स्वेनाग्निना राजा समायुक्तो महीपते ।
मा शोचिथास्त्वं नृपतिं गतः स परमां गतिम् ॥ ७ ॥
पृथ्वीनाथ! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र अपनी ही अग्निसे दाहको प्राप्त हुए हैं, तुम उन नरेशके लिये शोक न करो। वे परम उत्तम गतिको प्राप्त हुए हैं ॥ ७ ॥

गुरुशुश्रूषया चैव जननी ते जनाधिप ।
प्राप्ता सुमहतीं सिद्धिमिति मे नात्र संशयः ॥ ८ ॥
जनेश्वर! तुम्हारी माता कुन्तीदेवी गुरुजनोंकी सेवाके प्रभावसे बहुत बड़ी सिद्धिको प्राप्त हुई हैं, इस विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है ॥ ८ ॥

कर्तुमर्हसि राजेन्द्र तेषां त्वमुदकक्रियाम् ।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैरेतदत्र विधीयताम् ॥ ९ ॥
राजेन्द्र! अब अपने सब भाइयोंके साथ जाकर तुम्हें उन तीनोंके लिये जलांजलि देनी चाहिये। इस समय यहाँ इसी कर्तव्यका पालन करना चाहिये ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः स पृथिवीपालः पाण्डवानां धुरंधरः ।
निर्ययौ सहसोदर्यः सदारश्च नरर्षभः ॥ १० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब पाण्डव-धुरन्धर पृथ्वीपाल नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने भाइयों और स्त्रियोंके साथ नगरसे बाहर निकले ॥ १० ॥

पौरजानपदाश्चैव राजभक्तिपुरस्कृताः ।
गङ्गां प्रजग्मुरभितो वाससैकेन संवृताः ॥ ११ ॥
उनके साथ राजभक्तिको सामने रखनेवाले पुरवासी और जनपदनिवासी भी थे। वे सब एक वस्त्र धारण करके गंगाजीके समीप गये ॥ ११ ॥

ततोऽवगाह्य सलिले सर्वे ते नरपुङ्गवाः ।
युयुत्सुमग्रतः कृत्वा ददुस्तोयं महात्मने ॥ १२ ॥
उन सभी श्रेष्ठ पुरुषोंने गंगाजीके जलमें स्नान करके युयुत्सुको आगे रखते हुए महात्मा धृतराष्ट्रके लिये जलांजलि दी ॥ १२ ॥

गान्धार्याश्च पृथायाश्च विधिवन्नामगोत्रतः ।
शौचं निर्वर्तयन्तस्ते तत्रोषुर्नगराद् बहिः ॥ १३ ॥
फिर विधिपूर्वक नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए गान्धारी और कुन्तीके लिये भी उन्होंने जल-दान किया। तत्पश्चात् शौचसम्पादन या अशौचनिवृत्तिके लिये प्रयत्न करते हुए वे सब लोग नगरसे बाहर ही ठहर गये ॥ १३ ॥

प्रेषयामास स नरान् विधिज्ञानाप्तकारिणः । गङ्गाद्वारं नरश्रेष्ठो यत्र दग्धोऽभवन्नृपः ॥ १४ ॥ तत्रैव तेषां कृत्यानि गङ्गाद्वारेऽन्वशात् तदा । कर्तव्यानीति पुरुषान् दत्तदेयान्महीपतिः ॥ १५ ॥ नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरने जहाँ राजा धृतराष्ट्र दग्ध हुए थे, उस स्थानपर भी हरिद्वारमें विधि-विधानके जाननेवाले विश्वासपात्र मनुष्योंको भेजा और वहीं उनके श्राद्धकर्म करनेकी आज्ञा दी। फिर उन भूपालने उन पुरुषोंको दानमें देनेयोग्य नाना प्रकारकी वस्तुएँ अर्पित कीं ॥

द्वादशेऽहनि तेभ्यः स कृतशौचो नराधिपः । ददौ श्राद्धानि विधिवद् दक्षिणावन्ति पाण्डवः ॥ १६ ॥ शौच-सम्पादनके लिये दशाह आदि कर्म कर लेनेके पश्चात् पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने बारहवें दिन धृतराष्ट्र आदिके उद्देश्यसे विधिवत् श्राद्ध किया तथा उन श्राद्धोंमें ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणाएँ दीं ॥ १६ ॥

धृतराष्ट्रं समुद्दिश्य ददौ स पृथिवीपतिः । सुवर्णं रजतं गाश्च शय्याश्च सुमहाधनाः ॥ १७ ॥ गान्धार्याश्चैव तेजस्वी पृथायाश्च पृथक् पृथक् । संकीर्त्य नामनी राजा ददौ दानमनुत्तमम् ॥ १८ ॥ तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्तीके लिये पृथक्-पृथक् उनके नाम ले-लेकर सोना, चाँदी, गौ तथा बहुमूल्य शय्याएँ प्रदान कीं तथा परम उत्तम दान दिया ॥ १७-१८ ॥

यो यदिच्छति यावच्च तावत् स लभते नरः । शयनं भोजनं यानं मणिरत्नमथो धनम् ॥ १९ ॥ यानमाच्छादनं भोगान् दासीश्च समलंकृताः । ददौ राजा समुद्दिश्य तयोर्मात्रोर्महीपतिः ॥ २० ॥ उस समय जो मनुष्य जिस वस्तुको जितनी मात्रामें लेना चाहता, वह उस वस्तुको उतनी ही मात्रामें प्राप्त कर लेता था। राजा युधिष्ठिरने अपनी उन दोनों माताओंके उद्देश्यसे शय्या, भोजन, सवारी, मणि, रत्न, धन, वाहन, वस्त्र, नाना प्रकारके भोग तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दासियाँ प्रदान कीं ॥ १९-२० ॥

ततः स पृथिवीपालो दत्त्वा श्राद्धान्यनेकGeneric -> श्राद्धान्यनेकशः । प्रविवेश पुरं राजा नगरं वारणाह्वयम् ॥ २१ ॥ इस प्रकार अनेक बार श्राद्धके दान देकर पृथिवीपाल राजा युधिष्ठिरने हस्तिनापुर नामक नगरमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥

ते चापि राजवचनात् पुरुषा ये गताभवन् । संकल्प्य तेषां कुल्यानि पुनः प्रत्यागमंस्ततः ॥ २२ ॥

॥ आश्रमवासिकपर्व सम्पूर्ण ॥

माल्यैर्गन्धैश्च विविधैरर्चयित्वा यथाविधि । कुल्यानि तेषां संयोज्य तदाचख्युर्महीपतेः ॥ २३ ॥

जो लोग राजाकी आज्ञासे हरिद्वारमें भेजे गये थे, वे उन तीनोंकी हड्डियोंको संचित करके वहाँसे फिर गंगाजीके तटपर गये। फिर भाँति-भाँतिकी मालाओं और चन्दनोंसे विधिपूर्वक उनकी पूजा की। पूजा करके उन सबको गंगाजीमें प्रवाहित कर दिया। इसके बाद हस्तिनापुरमें लौटकर उन्होंने यह सब समाचार राजाको कह सुनाया ॥ २२-२३ ॥

समाश्र्वास्य तु राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । नारदोऽप्यगमद् राजन् परमर्षिर्यथेप्सितम् ॥ २४ ॥

राजन्! तदनन्तर देवर्षि नारदजी धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन देकर अभीष्ट स्थानको चले गये ॥

एवं वर्षाण्यतीतानि धृतराष्ट्रस्य धीमतः । वनवासे तथा त्रीणि नगरे दश पञ्च च ॥ २५ ॥ हतपुत्रस्य संग्रामे दानानि ददतः सदा । ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणां भ्रातृणां स्वजनस्य च ॥ २६ ॥

इस प्रकार जिनके पुत्र रणभूमिमें मारे गये थे, उन राजा धृतराष्ट्रने अपने जाति-भाई, सम्बन्धी, मित्र, बन्धु और स्वजनोंके निमित्त सदा दान देते हुए (युद्ध समाप्त होनेके बाद) पंद्रह वर्ष हस्तिनापुर नगरमें व्यतीत किये थे और तीन वर्ष वनमें तपस्या करते हुए बिताये थे ॥ २५-२६ ॥

युधिष्ठिरस्तु नृपतिर्नातिप्रीतमनास्तदा । धारयामास तद् राज्यं निहतज्ञातिबान्धवः ॥ २७ ॥

जिनके बन्धु-बान्धव नष्ट हो गये थे, वे राजा युधिष्ठिर मनमें अधिक प्रसन्न न रहते हुए किसी प्रकार राज्यका भार सँभालने लगे ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि श्राद्धदाने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें श्राद्धदानविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥


॥ आश्रमवासिकपर्व सम्पूर्ण ॥

अनुष्टुप्(अन्य बड़े छन्द)बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपरकुल योग
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये१०६१(३४)४६॥।११०७॥।
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये१॥××१॥

आश्रमवासिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या — ११०९।


अध्याय (पृष्ठ 2433)

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साम्बके पेटसे यदुवंश-विनाशके लिये मूसल पैदा होनेका ऋषियोंद्वारा शाप

मौसलपर्व

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

मौसलपर्व

प्रथमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका अपशकुन देखना, यादवोंके विनाशका समाचार सुनना, द्वारकामें ऋषियोंके शापवश साम्बके पेटसे मूसलकी उत्पत्ति तथा मदिराके निषेधकी कठोर आज्ञा

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवी सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ॥

वैशम्पायन उवाच

षट्त्रिंशे त्वथ सम्प्राप्ते वर्षे कौरवनन्दनः ।
ददर्श विपरीतानि निमित्तानि युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! महाभारत युद्धके पश्चात् जब छत्तीसवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ तब कौरवनन्दन राजा युधिष्ठिरको कई तरहके अपशकुन दिखायी देने लगे ॥ १ ॥

ववुर्वाताश्च निर्घाता रूक्षाः शर्करवर्षिणः ।
अपसव्यानि शकुना मण्डलानि प्रचक्रिरे ॥ २ ॥
बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ बालू और कंकड़ बरसानेवाली प्रचण्ड आँधी चलने लगी। पक्षी दाहिनी ओर मण्डल बनाकर उड़ते दिखायी देने लगे ॥ २ ॥

प्रत्यगूहुर्महानद्यो दिशो नीहारसंवृताः ।
उल्काश्चाङ्गारवर्षिण्यः प्रापतन् गगनाद् भुवि ॥ ३ ॥

बड़ी-बड़ी नदियाँ बालूके भीतर छिपकर बहने लगीं। दिशाएँ कुहरेसे आच्छादित हो गयीं। आकाशसे पृथ्वीपर अंगार बरसानेवाली उल्काएँ गिरने लगीं ॥ आदित्यो रजसा राजन् समवच्छन्नमण्डलः । विरश्मिरुदये नित्यं कबन्धैः समदृश्यत ॥ ४ ॥ राजन्! सूर्यमण्डल धूलसे आच्छन्न हो गया था। उदयकालमें सूर्य तेजोहीन प्रतीत होते थे और उनका मण्डल प्रतिदिन अनेक कबन्धों (बिना सिरके धड़ों)-से युक्त दिखायी देता था ॥ ४ ॥ परिवेषाश्च दृश्यन्ते दारुणाश्चन्द्रसूर्ययोः । त्रिवर्णिः श्यामरूक्षान्तास्तथा भस्मारुणप्रभाः ॥ ५ ॥ चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके चारों ओर भयानक घेरे दृष्टिगोचर होते थे। उन घेरोंमें तीन रंग प्रतीत होते थे। उनका किनारेका भाग काला एवं रूखा होता था। बीचमें भस्मके समान धूसर रंग दीखता था और भीतरी किनारेकी कान्ति अरुणवर्णकी दृष्टिगोचर होती थी ॥ ५ ॥ एते चान्ये च बहव उत्पाता भयशंसिनः । दृश्यन्ते बहवो राजन् हृदयोद्वेगकारकाः ॥ ६ ॥ राजन्! ये तथा और भी बहुत-से भयसूचक उत्पात दिखायी देने लगे, जो हृदयको उद्विग्न कर देनेवाले थे ॥ कस्यचित् त्वथ कालस्य कुरुराजो युधिष्ठिरः । शुश्राव वृष्णिचक्रस्य मौसले कदनं कृतम् ॥ ७ ॥ विमुक्तं वासुदेवं च श्रुत्वा रामं च पाण्डवः । समानीयाब्रवीद् भ्रातॄन् किं करिष्याम इत्युत ॥ ८ ॥ इसके थोड़े ही दिनों बाद कुरुराज युधिष्ठिरने यह समाचार सुना कि मूसलको निमित्त बनाकर आपसमें महान् युद्ध हुआ है; जिसमें समस्त वृष्णिवंशियोंका संहार हो गया। केवल भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी ही उस विनाशसे बचे हुए हैं। यह सब सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने समस्त भाइयोंको बुलाया और पूछा—‘अब हमें क्या करना चाहिये? ॥ ७-८ ॥ परस्परं समासाद्य ब्रह्मदण्डबलात् कृतान् । वृष्णीन् विनष्टांस्ते श्रुत्वा व्यथिताः पाण्डवाभवन् ॥ ९ ॥ निधनं वासुदेवस्य समुद्रस्येव शोषणम् । वीरा न श्रद्दधुस्तस्य विनाशं शार्ङ्गधन्वनः ॥ १० ॥ ब्राह्मणोंके शापके बलसे विवश हो आपसमें लड़-भिड़कर सारे वृष्णिवंशी विनष्ट हो गये। यह बात सुनकर पाण्डवोंको बड़ी वेदना हुई। भगवान् श्रीकृष्णका वध तो समुद्रको

सोख लेनेके समान असम्भव था; अतः उन वीरोंने भगवान् श्रीकृष्णके विनाशकी बातपर विश्वास नहीं किया ॥ ९-१० ॥

मौसलं ते समाश्रित्य दुःखशोकसमन्विताः ।
विषण्णा हतसंकल्पाः पाण्डवाः समुपाविशन् ॥ ११ ॥
इस मौसलकाण्डकी बातको लेकर सारे पाण्डव दुःख-शोकमें डूब गये। उनके मनमें विषाद छा गया और वे हताश हो मन मारकर बैठ गये ॥ ११ ॥

जनमेजय उवाच

कथं विनष्टा भगवन्नन्धका वृष्णिभिः सह ।
पश्यतो वासुदेवस्य भोजाश्चैव महारथाः ॥ १२ ॥
जनमेजयने पूछा— भगवन्! भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते वृष्णियोंसहित अन्धक तथा महारथी भोजवंशी क्षत्रिय कैसे नष्ट हो गये? ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

षट्त्रिंशेऽथ ततो वर्षे वृष्णीनामनयो महान् ।
अन्योन्यं मुसलैस्ते तु निजघ्नुः कालचोदिताः ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! महाभारतयुद्धके बाद छत्तीसवें वर्ष वृष्णिवंशियोंमें महान् अन्यायपूर्ण कलह आरम्भ हो गया। उसमें कालसे प्रेरित होकर उन्होंने एक-दूसरेको मूसलों (अरों)-से मार डाला ॥ १३ ॥

जनमेजय उवाच

केनानुशप्तास्ते वीराः क्षयं वृष्ण्यन्धका गताः ।
भोजाश्च द्विजवर्य त्वं विस्तरेण वदस्व मे ॥ १४ ॥
जनमेजयने पूछा— विप्रवर! वृष्णि, अन्धक तथा भोजवंशके उन वीरोंको किसने शाप दिया था जिससे उनका संहार हो गया? आप यह प्रसंग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच

विश्वामित्रं च कण्वं च नारदं च तपोधनम् ।
सारणप्रमुखा वीरा ददृशुर्द्वारकां गतान् ॥ १५ ॥
ते तान् साम्बं पुरस्कृत्य भूषयित्वा स्त्रियं यथा ।
अब्रुवन्नुपसंगम्य दैवदण्डनिपीडिताः ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! एक समयकी बात है, महर्षि विश्वामित्र, कण्व और तपस्याके धनी नारदजी द्वारकामें गये हुए थे। उस समय दैवके मारे हुए सारण आदि वीर

साम्बको स्त्रीके वेषमें विभूषित करके उनके पास ले गये। उन सबने उन मुनियोंका दर्शन किया और इस प्रकार पूछा— ॥ १५-१६ ॥

इयं स्त्री पुत्रकामस्य बभ्रोरमिततेजसः । ऋषयः साधु जानीत किमियं जनयिष्यति ॥ १७ ॥ ‘महर्षियो! यह स्त्री अमित तेजस्वी बभ्रुकी पत्नी है। बभ्रुके मनमें पुत्रकी बड़ी लालसा है। आपलोग ऋषि हैं; अतः अच्छी तरह सोचकर बतावें, इसके गर्भसे क्या उत्पन्न होगा? ॥ १७ ॥ इत्युक्तास्ते तदा राजन् विप्रलम्भप्रधर्षिताः । प्रत्यब्रुवंस्तान् मुनयो यत् तच्छृणु नराधिप ॥ १८ ॥ राजन्! नरेश्वर! ऐसी बात कहकर उन यादवोंने जब ऋषियोंको धोखा दिया और इस प्रकार उनका तिरस्कार किया तब उन्होंने उन बालकोंको जो उत्तर दिया, उसे सुनो ॥ १८ ॥ वृष्ण्यन्धकविनाशाय मुसलं घोरमायसम् । वासुदेवस्य दायादः साम्बोऽयं जनयिष्यति ॥ १९ ॥ येन यूयं सुदुर्वृत्ता नृशंसा जातमन्यवः ।

उच्छेत्तारः कुलं कृत्स्नमृते रामजनार्दनौ ॥ २० ॥ समुद्रं यास्यति श्रीमांस्त्यक्त्वा देहं हलायुधः । जरा कृष्णं महात्मानं शयानं भुवि भेत्स्यति ॥ २१ ॥ इत्यब्रुवन्त ते राजन् प्रलब्धास्तैर्दुरात्मभिः । मुनयः क्रोधरक्ताक्षाः समीक्ष्याथ परस्परम् ॥ २२ ॥ राजन्! उन दुर्बुद्धि बालकोंके वञ्चनापूर्ण बर्तावसे वे सभी महर्षि कुपित हो उठे। क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे एक-दूसरेकी ओर देखकर इस प्रकार बोले—'क्रूर, क्रोधी और दुराचारी यादवकुमारो! भगवान् श्रीकृष्णका यह पुत्र साम्ब एक भयंकर लोहेका मूसल उत्पन्न करेगा जो वृष्णि और अन्धकवंशके विनाशका कारण होगा। उसीसे तुम लोग बलराम और श्रीकृष्णके सिवा अपने शेष समस्त कुलका संहार कर डालोगे। हलधारी श्रीमान् बलरामजी स्वयं ही अपने शरीरको त्यागकर समुद्रमें चले जायँगे और महात्मा श्रीकृष्ण जब भूतलपर सो रहे होंगे उस समय जरा नामक व्याध उन्हें अपने बाणोंसे बींध डालेगा ॥ १९—२२ ॥ तथोक्त्वा मुनयस्ते तु ततः केशवमभ्ययुः । अथाब्रवीत् तदा वृष्णीन् श्रुत्वैवं मधुसूदनः ॥ २३ ॥ ऐसा कहकर वे मुनि भगवान् श्रीकृष्णके पास चले गये। (वहाँ उन्होंने उनसे सारी बातें कह सुनायीं।) यह सब सुनकर भगवान् मधुसूदनने वृष्णिवंशियोंसे कहा— ॥ २३ ॥ अन्तज्ञो मतिमांस्तस्य भवितव्यं तथेति तान् । एवमुक्त्वा हृषीकेशः प्रविवेश पुरं तदा ॥ २४ ॥ 'ऋषियोंने जैसा कहा है, वैसा ही होगा।' बुद्धिमान् श्रीकृष्ण सबके अन्तको जाननेवाले हैं। उन्होंने उपर्युक्त बात कहकर नगरमें प्रवेश किया ॥ २४ ॥ कृतान्तमन्यथा नैच्छत् कर्तुं स जगतः प्रभुः । श्वोभूतेऽथ ततः साम्बो मुसलं तदसूत वै ॥ २५ ॥ यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं तथापि यदुवंशियोंपर आनेवाले उस कालको उन्होंने पलटनेकी इच्छा नहीं की। दूसरे दिन सबेरा होते ही साम्बने उस मूसलको जन्म दिया ॥ २५ ॥ येन वृष्ण्यन्धककुले पुरुषा भस्मसात् कृताः । वृष्ण्यन्धकविनाशाय किंकरप्रतिमं महत् ॥ २६ ॥ वह वही मूसल था जिसने वृष्णि और अन्धककुलके समस्त पुरुषोंको भस्मसात् कर दिया। वृष्णि और अन्धक वंशके वीरोंका विनाश करनेके लिये वह महान् यमदूतके ही तुल्य था ॥ २६ ॥ असूत शापजं घोरं तच्च राज्ञे न्यवेदयन् । विषण्णरूपस्तद् राजा सूक्ष्मं चूर्णमकारयत् ॥ २७ ॥

जब साम्बने उस शापजनित भयंकर मूसलको पैदा किया तब यदुवंशियोंने उसे ले जाकर राजा उग्रसेनको दे दिया। उसे देखते ही राजाके मनमें विषाद छा गया। उन्होंने उस मूसलको कुटवाकर अत्यन्त महीन चूर्ण करा दिया ॥ २७ ॥

तच्चूर्णं सागरे चापि प्राक्षिपन् पुरुषा नृप ।
अघोषयंश्च नगरे वचनादाहुकस्य ते ॥ २८ ॥
जनार्दनस्य रामस्य बभ्रोश्चैव महात्मनः ।
अद्यप्रभृति सर्वेषु वृष्ण्यन्धककुलेष्विह ॥ २९ ॥
सुरासवो न कर्तव्यः सर्वैर्नगरवासिभिः ।
नरेश्वर! राजाकी आज्ञासे उनके सेवकोंने उस लोहचूर्णको समुद्रमें फेंक दिया। फिर उग्रसेन, श्रीकृष्ण, बलराम और महामना बभ्रुके आदेशसे राजपुरुषोंने नगरमें यह घोषणा करा दी कि 'आजसे समस्त वृष्णिवंशी और अन्धकवंशी क्षत्रियोंके यहाँ कोई भी नगरनिवासी मदिरा न तैयार करें ॥ २८-२९ ½ ॥

यश्च नोऽविदितं कुर्यात् पेयं कश्चिन्नरः क्वचित् ॥ ३० ॥
जीवन् स शूलमारोहेत् स्वयं कृत्वा सबान्धवः ।
'जो मनुष्य कहीं भी हमलोगोंसे छिपकर कोई नशीली पीनेकी वस्तु तैयार करेगा वह स्वयं वह अपराध करके जीतेजी अपने भाई-बन्धुओंसहित शूलीपर चढ़ा दिया जायगा' ॥ ३० ½ ॥

ततो राजभयात् सर्वे नियमं चक्रिरे तदा ।
नराः शासनमाज्ञाय रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ३१ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले बलरामजीका यह शासन समझकर सब लोगोंने राजाके भयसे यह नियम बना लिया कि 'आजसे न तो मदिरा बनाना है न पीना' ॥

इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि मुसलोत्पत्तौ प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत मौसलपर्वमें मूसलकी उत्पत्तिविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2440)

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द्वितीयोऽध्यायः

द्वारकामें भयंकर उत्पात देखकर भगवान् श्रीकृष्णका यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये आदेश देना

वैशम्पायन उवाच

एवं प्रयतमानानां वृष्णीनामन्धकैः सह ।
कालो गृहाणि सर्वेषां परिचक्राम नित्यशः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार वृष्णि और अन्धकवंशके लोग अपने ऊपर आनेवाले संकटका निवारण करनेके लिये भाँति-भाँतिके प्रयत्न कर रहे थे और उधर काल प्रतिदिन सबके घरोंमें चक्कर लगाया करता था ॥ १ ॥

करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः ।
गृहाण्यावेक्ष्य वृष्णीनां नादृश्यत क्वचित् क्वचित् ॥ २ ॥
उसका स्वरूप विकराल और वेश विकट था। उसके शरीरका रंग काला और पीला था। वह मूँड़ मुड़ाये हुए पुरुषके रूपमें वृष्णिवंशियोंके घरोंमें प्रवेश करके सबको देखता और कभी-कभी अदृश्य हो जाता था ॥ २ ॥

तमघ्नन्त महेष्वासाः शरैः शतसहस्रशः ।
न चाशक्यत वेद्धुं स सर्वभूतात्ययस्तदा ॥ ३ ॥
उसे देखनेपर बड़े-बड़े धनुर्धर वीर उसके ऊपर लाखों बाणोंका प्रहार करते थे; परंतु सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाले उस कालको वे वेध नहीं पाते थे ॥ ३ ॥

उत्पेदिरे महावाता दारुणाश्च दिने दिने ।
वृष्ण्यन्धकविनाशाय बहवो लोमहर्षणाः ॥ ४ ॥
अब प्रतिदिन अनेक बार भयंकर आँधी उठने लगी, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। उससे वृष्णियों और अन्धकोंके विनाशकी सूचना मिल रही थी ॥ ४ ॥

विवृद्धमूषिका रथ्या विभिन्नमणिकास्तथा ।
केशा नखाश्च सुप्तानामद्यन्ते मूषिकैर्निशि ॥ ५ ॥
चूहे इतने बढ़ गये थे कि वे सड़कोंपर छाये रहते थे। मिट्टीके बरतनोंमें छेद कर देते थे तथा रातमें सोये हुए मनुष्योंके केश और नख कुतरकर खा जाया करते थे ॥ ५ ॥

चीचीकूचीति वाशन्ति सारिका वृष्णिवेश्मसु ।
नोपशाम्यति शब्दश्च स दिवारात्रमेव हि ॥ ६ ॥
वृष्णिवंशियोंके घरोंमें मैनाएँ दिन-रात चें-चें किया करती थीं। उनकी आवाज कभी एक क्षणके लिये भी बंद नहीं होती थी ॥ ६ ॥