भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

नैव भान्ति न वर्धन्ते श्रिया हीनानि पार्थिव ॥ ७ ॥

जब कुलकी बहू-बेटियाँ दुःख मिलनेके कारण शोकमग्न होती हैं तब उस कुलका नाश हो जाता है। वे खिन्न होकर जिन घरोंको शाप दे देती हैं, वे कृत्याके द्वारा नष्ट हुए के समान उजाड़ हो जाते हैं। पृथ्वीनाथ! वे श्रीहीन गृह न तो शोभा पाते हैं और न उनकी वृद्धि ही होती है ॥ ६-७ ॥

स्त्रियः पुंसां परिददे मनुर्जिगमिषुर्दिवम् ।
अबलाः स्वल्पकौपीनाः सुहृदः सत्यजिष्णवः ॥ ८ ॥
ईर्षवो मानकामाश्च चण्डाश्च सुहृदोऽबुधाः ।
स्त्रियस्तु मानमर्हन्ति ता मानयत मानवाः ॥ ९ ॥
स्त्रीप्रत्ययो हि वै धर्मो रतिभोगाश्च केवलाः ।
परिचर्या नमस्कारास्तदायत्ता भवन्तु वः ॥ १० ॥

महाराज मनु जब स्वर्गको जाने लगे तब उन्होंने स्त्रियोंको पुरुषोंके हाथमें सौंप दिया और कहा—'मनुष्यो! स्त्रियाँ अबला, थोड़ेसे वस्त्रोंसे काम चलानेवाली, अकारण हितसाधन करनेवाली, सत्यलोकको जीतनेकी इच्छावाली (सत्यपरायणा), ईर्ष्यालु, मान चाहनेवाली, अत्यन्त कोप करनेवाली, पुरुषके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाली और भोली-भाली होती हैं। स्त्रियाँ सम्मान पानेके योग्य हैं, अतः तुम सब लोग उनका सम्मान करो; क्योंकि स्त्री-जाति ही धर्मकी सिद्धिका मूल कारण है। तुम्हारे रतिभोग, परिचर्या और नमस्कार स्त्रियोंके ही अधीन होंगे ॥ ८—१० ॥

उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् ।
प्रीत्यर्थं लोकयात्रायाः पश्यत स्त्रीनिबन्धनम् ॥ ११ ॥
सम्मान्यमानाश्चैता हि सर्वकार्याण्यवाप्स्यथ ।

'संतानकी उत्पत्ति, उत्पन्न हुए बालकका लालन-पालन तथा लोकयात्राका प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह—इन सबको स्त्रियोंके ही अधीन समझो। यदि तुमलोग स्त्रियोंका सम्मान करोगे तो तुम्हारे सब कार्य सिद्ध होंगे' ॥ ११ १/२ ॥

विदेहराजदुहिता चात्र श्लोकमगायत् ॥ १२ ॥
नास्ति यज्ञक्रिया काचिन्न श्राद्धं नोपवासकम् ।
धर्मः स्वभर्तृशुश्रूषा तया स्वर्गं जयन्त्युत ॥ १३ ॥

(स्त्रियोंके कर्तव्यके विषयमें) विदेहराज जनककी पुत्रीने एक श्लोकका गान किया है, जिसका सारांश इस प्रकार है—स्त्रीके लिये कोई यज्ञ आदि कर्म, श्राद्ध और उपवास करना आवश्यक नहीं है। उसका धर्म है अपने पतिकी सेवा। उसीसे स्त्रियाँ स्वर्गलोकपर विजय पा लेती हैं ॥ १२-१३ ॥

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
पुत्राश्च स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ १४ ॥

कुमारावस्थामें स्त्रीकी रक्षा उसका पिता करता है, जवानीमें पति उसका रक्षक है और वृद्धावस्थामें पुत्रगण उसकी रक्षा करते हैं। अतः स्त्रीको कभी स्वतन्त्र नहीं करना चाहिये ।। १४ ।।

श्रिय एताः स्त्रियो नाम सत्कार्या भूतिमिच्छता ।
पालिता निगृहीता च श्रीः स्त्री भवति भारत ।। १५ ।।

भरतनन्दन! स्त्रियाँ ही घरकी लक्ष्मी होती हैं। उन्नति चाहनेवाले पुरुषको उनका भलीभाँति सत्कार करना चाहिये। अपने वशमें रखकर उनका पालन करनेसे स्त्री श्री (लक्ष्मी)-का स्वरूप बन जाती है ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे स्त्रीप्रशंसा नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके प्रसंगमें स्त्रीकी प्रशंसानामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४६ ।।

ब्राह्मण आदि वर्णोंकी दायभाग-विधिका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

ब्राह्मण आदि वर्णोंकी दायभाग-विधिका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

सर्वशास्त्रविधानज्ञ राजधर्मविदुत्तम ।
अतीव संशयच्छेत्ता भवान् वै प्रथितः क्षितौ ॥ १ ॥
कश्चित्तु संशयो मेऽस्ति तन्मे ब्रूहि पितामह ।
जातेऽस्मिन् संशये राजन् नान्यं पृच्छेम कंचन ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—सम्पूर्ण शास्त्रोंके विधानके ज्ञाता तथा राजधर्मके विद्वानोंमें श्रेष्ठ पितामह! आप इस भूमण्डलमें सम्पूर्ण संशयोंका सर्वथा निवारण करनेके लिये प्रसिद्ध हैं। मेरे हृदयमें एक संशय और है, उसका मेरे लिये समाधान कीजिये। राजन्! इस उत्पन्न हुए संशयके विषयमें मैं दूसरे किसीसे नहीं पूछूँगा ॥ १-२ ॥

यथा नरेण कर्तव्यं धर्ममार्गानुवर्तिना ।
एतत् सर्वं महाबाहो भवान् व्याख्यातुमर्हति ॥ ३ ॥
महाबाहो! धर्ममार्गका अनुसरण करनेवाले मनुष्यका इस विषयमें जैसा कर्तव्य हो, इस सबकी आप स्पष्टरूपसे व्याख्या करें ॥ ३ ॥

चतस्रो विहिता भार्या ब्राह्मणस्य पितामह ।
ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या शूद्रा च रतिमिच्छतः ॥ ४ ॥
पितामह! ब्राह्मणके लिये चार स्त्रियाँ शास्त्र-विहित हैं—ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा। इनमेंसे शूद्रा केवल रतिकी इच्छावाले कामी पुरुषके लिये विहित है ॥ ४ ॥

तत्र जातेषु पुत्रेषु सर्वासां कुरुसत्तम ।
आनुपूर्व्येण कस्तेषां पित्र्यं दायादमर्हति ॥ ५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! इन सबके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हुए हों, उनमेंसे कौन क्रमशः पैतृक धनको पानेका अधिकारी है? ॥ ५ ॥

केन वा किं ततो हार्यं पितृवित्तात् पितामह ।
एतदिच्छामि कथितं विभागस्तेषु यः स्मृतः ॥ ६ ॥
पितामह! किस पुत्रको पिताके धनमेंसे कौन-सा भाग मिलना चाहिये? उनके लिये जो विभाग नियत किया गया है, उसका वर्णन मैं आपके मुहँसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥

भीष्म उवाच

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
एतेषु विहितो धर्मो ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ॥ ७ ॥

भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों वर्ण द्विजाति कहलाते हैं; अतः इन तीन वर्णोंमें ही ब्राह्मणका विवाह धर्मतः विहित है ।। ७ ।।
वैषम्यादथवा लोभात् कामाद् वापि परंतप ।
ब्राह्मणस्य भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ।। ८ ।।
परंतप नरेश! अन्यायसे, लोभसे अथवा कामनासे शूद्र जातिकी कन्या भी ब्राह्मणकी भार्या होती है; परंतु शास्त्रोंमें इसका कहीं विधान नहीं मिलता ।। ८ ।।
शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ।
प्रायश्चित्तीयते चापि विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ९ ।।
तत्र जातेष्वपत्येषु द्विगुणं स्याद् युधिष्ठिर ।
शूद्रजातिकी स्त्रीको अपनी शय्यापर सुलाकर ब्राह्मण अधोगतिको प्राप्त होता है। साथ ही शास्त्रीय विधिके अनुसार वह प्रायश्चित्तका भागी होता है। युधिष्ठिर! शूद्राके गर्भसे संतान उत्पन्न करनेपर ब्राह्मणको दूना पाप लगता है और उसे दूने प्रायश्चित्तका भागी होना पड़ता है ।। ९ १/२ ।।
आपद्यमानमृक्थं तु सम्प्रवक्ष्यामि भारत ।। १० ।।
लक्षण्यं गोवृषो यानं यत् प्रधानतमं भवेत् ।
ब्राह्मण्यास्तद्धरेत् पुत्र एकांशं वै पितुर्धनात् ।। ११ ।।
शेषं तु दशधा कार्यं ब्राह्मणस्वं युधिष्ठिर ।
तत्र तेनैव हर्तव्याश्चत्वारोऽंशाः पितुर्धनात् ।। १२ ।।
भरतनन्दन! अब मैं ब्राह्मण आदि वर्णोंकी कन्याओंके गर्भसे उत्पन्न होनेवाले पुत्रोंको पैतृक धनका जो भाग प्राप्त होता है, उसका वर्णन करूँगा। ब्राह्मणकी ब्राह्मणी पत्नीसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न गृह आदि, बैल, सवारी तथा अन्य जो-जो श्रेष्ठतम पदार्थ हों, उन सबको अर्थात् पैतृक धनके प्रधान अंशको पहले ही अपने अधिकारमें कर ले। युधिष्ठिर! फिर ब्राह्मणका जो शेष धन हो, उसके दस भाग करने चाहिये। पिताके उस धनमेंसे पुनः चार भाग ब्राह्मणीके पुत्रको ही ले लेने चाहिये ।। १०—१२ ।।
क्षत्रियायास्तु यः पुत्रो ब्राह्मणः सोऽप्यसंशयः ।
स तु मातुर्विशेषेण त्रीनंशान् हर्तुमर्हति ।। १३ ।।
क्षत्रियाका जो पुत्र है, वह भी ब्राह्मण ही होता है—इसमें संशय नहीं है। वह माताकी विशिष्टताके कारण पैतृक धनका तीन भाग ले लेनेका अधिकारी है ।। १३ ।।
वर्णे तृतीये जातस्तु वैश्यायां ब्राह्मणादपि ।
द्विरंशस्तेन हर्तव्यो ब्राह्मणस्वाद् युधिष्ठिर ।। १४ ।।
युधिष्ठिर! तीसरे वर्णकी कन्या वैश्यामें जो ब्राह्मणसे पुत्र उत्पन्न होता है, उसे ब्राह्मणके धनमेंसे दो भाग लेने चाहिये ।। १४ ।।

शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातो नित्यादेयधनः स्मृतः ।
अल्पं चापि प्रदातव्यं शूद्रापुत्राय भारत ।। १५ ।।
भारत! ब्राह्मणसे शूद्रामें जो पुत्र उत्पन्न होता है, उसे तो धन न देनेका ही विधान है तो भी शूद्राके पुत्रको पैतृक धनका स्वल्पतम भाग—एक अंश दे देना चाहिये ।। १५ ।।
दशधा प्रविभक्तस्य धनस्यैष भवेत् क्रमः ।
सवर्णासु तु जातानां समान् भागान् प्रकल्पयेत् ।। १६ ।।
दस भागोंमें विभक्त हुए बँटवारेका यही क्रम होता है। परंतु जो समान वर्णकी स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्र हैं, उन सबके लिये बराबर भागोंकी कल्पना करनी चाहिये ।। १६ ।।
अब्राह्मणं तु मन्यन्ते शूद्रापुत्रमनैपुणात् ।
त्रिषु वर्णेषु जातो हि ब्राह्मणाद् ब्राह्मणो भवेत् ।। १७ ।।
ब्राह्मणसे शूद्राके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, उसे ब्राह्मण नहीं मानते हैं; क्योंकि उसमें ब्राह्मणो-चित निपुणता नहीं पायी जाती। शेष तीन वर्णकी स्त्रियोंसे ब्राह्मणद्वारा जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह ब्राह्मण होता है ।। १७ ।।
स्मृताश्च वर्णाश्चत्वारः पञ्चमो नाधिगम्यते ।
हरेच्च दशमं भागं शूद्रापुत्रः पितुर्धनात् ।। १८ ।।
चार ही वर्ण बताये हैं, पाँचवाँ वर्ण नहीं मिलता। शूद्राका पुत्र ब्राह्मण पिताके धनसे उसका दसवाँ भाग ले सकता है ।। १८ ।।
तत्त दत्तं हरेत् पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति ।
अवश्यं हि धनं देयं शूद्रापुत्राय भारत ।। १९ ।।
वह भी पिताके देनेपर ही उसे लेना चाहिये, बिना दिये उसे लेनेका कोई अधिकार नहीं है। भरतनन्दन! किंतु शूद्राके पुत्रको भी धनका भाग अवश्य दे देना चाहिये ।। १९ ।।
आनृशंस्यं परो धर्म इति तस्मै प्रदीयते ।
यत्र तत्र समुत्पन्नं गुणायैवोपपद्यते ।। २० ।।
दया सबसे बड़ा धर्म है। यह समझकर ही उसे धनका भाग दिया जाता है। दया जहाँ भी उत्पन्न हो, वह गुणकारक ही होती है ।। २० ।।
यद्यप्येष सपुत्रः स्यादपुत्रो यदि वा भवेत् ।
नाधिकं दशमाद् दद्याच्छूद्रापुत्राय भारत ।। २१ ।।
भारत! ब्राह्मणके अन्य वर्णकी स्त्रियोंसे पुत्र हों या न हों, वह शूद्राके पुत्रको दसवें भागसे अधिक धन न दे ।। २१ ।।
त्रैवार्षिकाद् यदा भक्तादधिकं स्याद् द्विजस्य तु ।
यजेत तेन द्रव्येण न वृथा साधयेद् धनम् ।। २२ ।।
जब ब्राह्मणके पास तीन वर्षतक निर्वाह होनेसे अधिक धन एकत्र हो जाय तब वह उस धनसे यज्ञ करे। धनका व्यर्थ संग्रह न करे ।। २२ ।।

त्रिसहस्रपरो दायः स्त्रियै देयो धनस्य वै । भर्त्रा तच्च धनं दत्तं यथार्हं भोक्तुमर्हति ॥ २३ ॥ स्त्रीको तीन हजारसे अधिक लागतका धन नहीं देना चाहिये। पतिके देनेपर ही उस धनको वह यथोचित रूपसे उपभोगमें ला सकती है ॥ २३ ॥

स्त्रीणां तु पतिदायाद्यमुपभोगफलं स्मृतम् । नापहारं स्त्रियः कुर्युः पतिवित्तात् कथंचन ॥ २४ ॥ स्त्रियोंको पतिके धनसे जो हिस्सा मिलता है, उसका उपभोग ही (उसके लिये) फल माना गया है। पतिके दिये हुए स्त्रीधनसे पुत्र आदिको कुछ नहीं लेना चाहिये ॥ २४ ॥

स्त्रियास्तु यद् भवेत् वित्तं पित्रा दत्तं युधिष्ठिर । ब्राह्मण्यास्तद्धरेत् कन्या यथा पुत्रस्तथा हि सा ॥ २५ ॥ युधिष्ठिर! ब्राह्मणीको पिताकी ओरसे जो धन मिला हो, उस धनको उसकी पुत्री ले सकती है; क्योंकि जैसा पुत्र है, वैसी ही पुत्री भी है ॥ २५ ॥

सा हि पुत्रसमा राजन् विहिता कुरुनन्दन । एवमेव समुद्दिष्टो धर्मो वै भरतर्षभ । एवं धर्ममनुस्मृत्य न वृथा साधयेद् धनम् ॥ २६ ॥ कुरुनन्दन! भरतकुलभूषण नरेश! पुत्री पुत्रके समान ही है—ऐसा शास्त्रका विधान है। इस प्रकार वही धनके विभाजनकी धर्मयुक्त प्रणाली बतायी गयी है। इस तरह धर्मका चिन्तन एवं अनुस्मरण करते हुए ही धनका उपार्जन एवं संग्रह करे। परंतु उसे व्यर्थ न होने दे—यज्ञ-यागादिके द्वारा सफल कर ले ॥ २६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातो यद्यदेयधनः स्मृतः । केन प्रतिविशेषेण दशमोऽप्यस्य दीयते ॥ २७ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—दादाजी! यदि ब्राह्मणसे शूद्रामें उत्पन्न हुए पुत्रको धन न देने योग्य बताया गया है तो किस विशेषताके कारण उसको पैतृक धनका दसवाँ भाग भी दिया जाता है? ॥ २७ ॥

ब्राह्मण्यां ब्राह्मणाज्जातो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः । क्षत्रियायां तथैव स्याद् वैश्यायामपि चैव हि ॥ २८ ॥ ब्राह्मणसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न हुआ पुत्र ब्राह्मण हो—इसमें कोई संशय ही नहीं है; वैसे ही क्षत्रिया और वैश्याके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र भी ब्राह्मण ही होते हैं ॥ २८ ॥

कस्मात् तु विषमं भागं भजेरन् नृपसत्तम । यदा सर्वे त्रयो वर्णास्त्वयोक्ता ब्राह्मणा इति ॥ २९ ॥

नृपश्रेष्ठ! जब आपने ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंवाली स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्रोंको ब्राह्मण ही बताया है, तब वे पैतृक धनका समान भाग क्यों नहीं पाते हैं? क्यों वे विषम भाग ग्रहण करें? ।। २९ ।।

भीष्म उवाच

दारा इत्युच्यते लोके नाम्नैकेन परंतप ।
प्रोक्तेन चैव नाम्नायं विशेषः सुमहान् भवेत् ।। ३० ।।
भीष्मजीने कहा— शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! लोकमें सब स्त्रियोंका 'दारा' इस एक नामसे ही परिचय दिया जाता है। इस तथाकथित नामसे ही चारों वर्णोंकी स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्रोंमें महान् अन्तर हो जाता है* ।। ३० ।।

तिस्रः कृत्वा पुरो भार्याः पश्चाद् विन्देत ब्राह्मणीम् ।
सा ज्येष्ठा सा च पूज्या स्यात् सा च भार्या गरीयसी ।। ३१ ।।
ब्राह्मण पहले अन्य तीनों वर्णोंकी स्त्रियोंको ब्याह लानेके पश्चात् भी यदि ब्राह्मणकन्यासे विवाह करे तो वही अन्य स्त्रियोंकी अपेक्षा ज्येष्ठ, अधिक आदर-सत्कारके योग्य तथा विशेष गौरवकी अधिकारिणी होगी ।।

स्नानं प्रसाधनं भर्तुर्दन्तधावनमञ्जनम् ।
हव्यं कव्यं च यच्चान्यद् धर्मयुक्तं गृहे भवेत् ।। ३२ ।।
न तस्यां जातु तिष्ठन्त्यामन्या तत् कर्तुमर्हति ।
ब्राह्मणी त्वेव कुर्याद् वा ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ।। ३३ ।।
युधिष्ठिर! पतिको स्नान कराना, उनके लिये शृंगार-सामग्री प्रस्तुत करना, दाँतकी सफाईके लिये दातौन और मंजन देना, पतिके नेत्रोंमें आँजन या सुरमा लगाना, प्रतिदिन हवन और पूजनके समय हव्य और कव्यकी सामग्री जुटाना तथा घरमें और भी जो धार्मिक कृत्य हो उसके सम्पादनमें योग देना—ये सब कार्य ब्राह्मणके लिये ब्राह्मणीको ही करने चाहिये। उसके रहते हुए दूसरे किसी वर्णवाली स्त्रीको यह सब करनेका अधिकार नहीं है ।। ३२-३३ ।।

अन्नं पानं च माल्यं च वासांस्याभरणानि च ।
ब्राह्मण्यैतानि देयानि भर्तुः सा हि गरीयसी ।। ३४ ।।
पतिको अन्न, पान, माला, वस्त्र और आभूषण—ये सब वस्तुएँ ब्राह्मणी ही समर्पित करे; क्योंकि वही उसके लिये सब स्त्रियोंसे अधिक गौरवकी अधिकारिणी है ।। ३४ ।।

मनुनाभिहितं शास्त्रं यच्चापि कुरुनन्दन ।
तत्राप्येष महाराज दृष्टो धर्मः सनातनः ।। ३५ ।।
महाराज कुरुनन्दन! मनुने भी जिस धर्मशास्त्रका प्रतिपादन किया है, उसमें भी यही सनातन धर्म देखा गया है ।। ३५ ।।

अथ चेदन्यथा कुर्याद् यदि कामाद् युधिष्ठिर । यथा ब्राह्मण चाण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ॥ ३६ ॥ युधिष्ठिर! यदि ब्राह्मण कामके वशीभूत होकर इस शास्त्रीय पद्धतिके विपरीत बर्ताव करता है, वह ब्राह्मण चाण्डाल समझा जाता है जैसा कि पहले कहा गया है ॥ ३६ ॥

ब्राह्मण्याः सदृशः पुत्रः क्षत्रियायाश्च यो भवेत् । राजन् विशेषो यस्त्वत्र वर्णयोरुभयोरपि ॥ ३७ ॥ राजन्! ब्राह्मणके समान ही जो क्षत्रियाका पुत्र होगा, उसमें भी उभयवर्णसम्बन्धी अन्तर तो रहेगा ही ॥ ३७ ॥

न तु जात्या समा लोके ब्राह्मण्याः क्षत्रिया भवेत् । ब्राह्मण्याः प्रथमः पुत्रो भूयान् स्याद् राजसत्तम ॥ ३८ ॥ भूयो भूयोऽपि संहार्यः पितृवित्ताद् युधिष्ठिर । क्षत्रियकन्या संसारमें अपनी जातिद्वारा ब्राह्मण-कन्याके बराबर नहीं हो सकती। नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार ब्राह्मणीका पुत्र क्षत्रियाके पुत्रसे प्रथम एवं ज्येष्ठ होगा। युधिष्ठिर! इसलिये पिताके धनमेंसे ब्राह्मणीके पुत्रको अधिक-अधिक भाग देना चाहिये ॥ ३८ १/२ ॥

यथा न सदृशी जातु ब्राह्मण्याः क्षत्रिया भवेत् ॥ ३९ ॥ क्षत्रियायास्तथा वैश्या न जातु सदृशी भवेत् । जैसे क्षत्रिया कभी ब्राह्मणीके समान नहीं हो सकती वैसे ही वैश्या भी कभी क्षत्रियाके तुल्य नहीं हो सकती ॥ ३९ १/२ ॥

श्रीश्च राज्यं च कोशश्च क्षत्रियाणां युधिष्ठिर ॥ ४० ॥ विहितं दृश्यते राजन् सागरान्तां च मेदिनीम् । क्षत्रियो हि स्वधर्मेण श्रियं प्राप्नोति भूयसीम् । राजा दण्डधरो राजन् रक्षा नान्यत्र क्षत्रियात् ॥ ४१ ॥ राजा युधिष्ठिर! लक्ष्मी, राज्य और कोष—यह सब शास्त्रमें क्षत्रियोंके लिये ही विहित देखा जाता है। राजन्! क्षत्रिय अपने धर्मके अनुसार समुद्रपर्यन्त पृथ्वी तथा बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है। नरेश्वर! राजा (क्षत्रिय) दण्ड धारण करनेवाला होता है। क्षत्रियके सिवा और किसीसे रक्षाका कार्य नहीं हो सकता ॥ ४०-४१ ॥

ब्राह्मणा हि महाभागा देवानापि देवताः । तेषु राजन् प्रवर्तेत पूजया विधिपूर्वकम् ॥ ४२ ॥ राजन्! महाभाग! ब्राह्मण देवताओंके भी देवता हैं; अतः उनका विधिपूर्वक पूजन-आदर-सत्कार करते हुए ही उनके साथ बर्ताव करे ॥ ४२ ॥

प्रणीतमृषिभिर्ज्ञात्वा धर्मं शाश्वतमव्ययम् । लुप्यमानं स्वधर्मेण क्षत्रियो ह्येष रक्षति ॥ ४३ ॥

ऋषिर्योंद्वारा प्रतिपादित अविनाशी सनातन धर्मको लुप्त होता जानकर क्षत्रिय अपने धर्मके अनुसार उसकी रक्षा करता है ॥ ४३ ॥

दस्युभिर्ह्रियमाणं च धनं दारांश्च सर्वशः ।
सर्वेषामेव वर्णानां त्राता भवति पार्थिवः ॥ ४४ ॥
डाकुओंद्वारा लूटे जाते हुए सभी वर्णोंके धन और स्त्रियोंका राजा ही रक्षक होता है ॥ ४४ ॥

भूयान् स्यात् क्षत्रियापुत्रो वैश्यापुत्रान्न संशयः ।
भूयस्तेनापि हर्तव्यं पितृवित्ताद् युधिष्ठिर ॥ ४५ ॥
इन सब दृष्टियोंसे क्षत्रियाका पुत्र वैश्याके पुत्रसे श्रेष्ठ होता है—इसमें संशय नहीं है। युधिष्ठिर! इसलिये शेष पैतृक धनमेंसे उसको भी विशेष भाग लेना ही चाहिये ॥ ४५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

उक्तं ते विधिवद् राजन् ब्राह्मणस्य पितामह ।
इतरेषां तु वर्णानां कथं वै नियमो भवेत् ॥ ४६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! आपने ब्राह्मणके धनका विभाजन विधिपूर्वक बता दिया। अब यह बताइये कि अन्य वर्णोंके धनके बँटवारेका कैसा नियम होना चाहिये? ॥ ४६ ॥

भीष्म उवाच

क्षत्रियस्यापि भार्ये द्वे विहिते कुरुनन्दन ।
तृतीया च भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ॥ ४७ ॥
भीष्मजीने कहा— कुरुनन्दन! क्षत्रियके लिये भी दो वर्णोंकी भार्याएँ शास्त्रविहित हैं। तीसरी शूद्रा भी उसकी भार्या हो सकती है। परंतु शास्त्रसे उसका समर्थन नहीं होता ॥ ४७ ॥

एष एव क्रमो हि स्यात् क्षत्रियाणां युधिष्ठिर ।
अष्टधा तु भवेत् कार्यं क्षत्रियस्वं जनाधिप ॥ ४८ ॥
राजा युधिष्ठिर! क्षत्रियोंके लिये भी बँटवारेका यही क्रम है। क्षत्रियके धनको आठ भागोंमें विभक्त करना चाहिये ॥ ४८ ॥

क्षत्रियाया हरेत् पुत्रश्चतुरोंऽशान् पितुर्धनात् ।
युद्धावहारिकं यच्च पितुः स्यात् स हरेत् तु तत् ॥ ४९ ॥
क्षत्रियाका पुत्र उस पैतृक धनमेंसे चार भाग स्वयं ग्रहण कर ले तथा पिताकी जो युद्धसामग्री है, उसको भी वही ले ले ॥ ४९ ॥

वैश्यापुत्रस्तु भागांस्त्रीन् शूद्रापुत्रस्तथाष्टमम् ।
सोऽपि दत्तं हरेत् पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति ॥ ५० ॥

शेष धनमेंसे तीन भाग वैश्याका पुत्र ले ले और अवशिष्ट आठवाँ भाग शूद्राका पुत्र प्राप्त करे। वह भी पिताके देनेपर ही उसे लेना चाहिये। बिना दिया हुआ धन ले जानेका उसे अधिकार नहीं है ।। ५० ।।

एकैव हि भवेद् भार्या वैश्यस्य कुरुनन्दन ।
द्वितीया तु भवेत् शूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ।। ५१ ।।
कुरुनन्दन! वैश्यकी एक ही वैश्यकन्या धर्मानुसार भार्या हो सकती है। दूसरी शूद्रा भी होती है, परंतु शास्त्रसे उसका समर्थन नहीं होता है ।। ५१ ।।

वैश्यस्य वर्तमानस्य वैश्यायां भरतर्षभ ।
शूद्रायां चापि कौन्तेय तयोर्विनियमः स्मृतः ।। ५२ ।।
भरतश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार! वैश्यके वैश्या और शूद्रा दोनोंके गर्भसे पुत्र हों तो उनके लिये भी धनके बँटवारेका वैसा ही नियम है ।। ५२ ।।

पञ्चधा तु भवेत् कार्यं वैश्यस्वं भरतर्षभ ।
तयोरपत्ये वक्ष्यामि विभागं च जनाधिप ।। ५३ ।।
भरतभूषण नरेश! वैश्यके धनको पाँच भागोंमें विभक्त करना चाहिये। फिर वैश्या और शूद्राके पुत्रोंमें उस धनका विभाजन कैसे करना चाहिये, यह बताता हूँ ।।

वैश्यापुत्रेण हर्तव्याश्चत्वारोंऽशाः पितुर्धनात् ।
पञ्चमस्तु स्मृतो भागः शूद्रापुत्राय भारत ।। ५४ ।।
भरतनन्दन! उस पैतृक धनमेंसे चार भाग तो वैश्याके पुत्रको ले लेने चाहिये और पाँचवाँ अंश शूद्राके पुत्रका भाग बताया गया है ।। ५४ ।।

सोऽपि दत्तं हरेत् पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति ।
त्रिभिर्वर्णैः सदा जातः शूद्रोऽदेयधनो भवेत् ।। ५५ ।।
वह भी पिताके देनेपर ही उस धनको ले सकता है। बिना दिया हुआ धन लेनेका उसे कोई अधिकार नहीं है। तीनों वर्णोंसे उत्पन्न हुआ शूद्र सदा धन न देनेके योग्य ही होता है ।। ५५ ।।

शूद्रस्य स्यात् सवर्णैव भार्या नान्या कथंचन ।
समभागाश्च पुत्राः स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत् ।। ५६ ।।
शूद्रकी एक ही अपनी जातिकी ही स्त्री भार्या होती है। दूसरी किसी प्रकार नहीं। उसके सभी पुत्र, वे सौ भाई क्यों न हों, पैतृक धनमेंसे समान भागके अधिकारी होते हैं ।। ५६ ।।

जातानां समवर्णायाः पुत्राणामविशेषतः ।
सर्वेषामेव वर्णानां समभागो धनात् स्मृतः ।। ५७ ।।
समस्त वर्णोंके सभी पुत्रोंका, जो समान वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुए हैं, सामान्यतः पैतृक धनमें समान भाग माना गया है ।। ५७ ।।

ज्येष्ठस्य भागो ज्येष्ठः स्यादेकांशो यः प्रधानतः ।

एष दायविधिः पार्थ पूर्वमुक्तः स्वयम्भुवा ।। ५८ ।। कुन्तीनन्दन! ज्येष्ठ पुत्रका भाग भी ज्येष्ठ होता है। उसे प्रधानतः एक अंश अधिक मिलता है। पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने पैतृक धनके बँटवारेकी यह विधि बतायी थी ।। ५८ ।।

समवर्णासु जातानां विशेषोऽस्त्यपरो नृप । विवाहवैशिष्ट्यकृतः पूर्वपूर्वो विशिष्यते ।। ५९ ।। नरेश्वर! समान वर्णकी स्त्रियोंमें जो पुत्र उत्पन्न हुए हैं, उनमें यह दूसरी विशेषता ध्यान देने योग्य है। विवाहकी विशिष्टताके कारण उन पुत्रोंमें भी विशिष्टता आ जाती है। अर्थात् पहले विवाहकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ पुत्र श्रेष्ठ और दूसरे विवाहकी स्त्रीसे पैदा हुआ पुत्र कनिष्ठ होता है ।। ५९ ।।

हरेज्ज्येष्ठः प्रधानांशमेकं तुल्यासु तेष्वपि । मध्यमो मध्यमं चैव कनीयांस्तु कनीयसम् ।। ६० ।। तुल्य वर्णवाली स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए उन पुत्रोंमें भी जो ज्येष्ठ है, वह एक भाग ज्येष्ठांश ले सकता है। मध्यम पुत्रको मध्यम और कनिष्ठ पुत्रको कनिष्ठ भाग लेना चाहिये ।। ६० ।।

एवं जातिषु सर्वासु सवर्णः श्रेष्ठतां गतः । महर्षिरपि चैतद् वै मारीचः काश्यपोऽब्रवीत् ।। ६१ ।। इस प्रकार सभी जातियोंमें समान वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ पुत्र ही श्रेष्ठ होता है। मरीचि-पुत्र महर्षि काश्यपने भी यही बात बतायी है ।। ६१ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे रिक्थविभागो नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके अन्तर्गत पैतृक धनका विभागनामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।।


* 'दार' शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'आद्रियन्ते त्रिवर्गार्थिभिः इति दारा'। धर्म, अर्थ और कामकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंद्वारा जिनका आदर किया जाता है, वे दारा हैं। जहाँतक भोगविषयक आदर है, वह तो सभी स्त्रियोंके साथ समान है, परंतु व्यावहारिक जगत्में जो पतिके द्वारा आदर प्राप्त होता है, वह वर्णक्रमसे यथायोग्य न्यूनाधिक मात्रामें ही उपलब्ध होता है। यही बात उनके पुत्रोंके सम्बन्धमें भी लागू होती है। इसीलिये उनके पुत्रोंको पैतृक धनके विषयमें कम और अधिक भाग ग्रहण करनेका अधिकार है।

वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

अर्थाल्लोभाद् वा कामाद् वा वर्णानां चाप्यनिश्चयात् ।
अज्ञानाद् वापि वर्णानां जायते वर्णसंकरः ।। १ ।।
तेषामेतेन विधिना जातानां वर्णसंकरे ।
को धर्मः कानि कर्माणि तन्मे ब्रूहि पितामह ।। २ ।।

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! धन पाकर या धनके लोभमें आकर अथवा कामनाके वशीभूत होकर जब उच्च वर्णकी स्त्री नीच वर्णके पुरुषके साथ सम्बन्ध स्थापित कर लेती है तब वर्णसंकर संतान उत्पन्न होती है। वर्णोंका निश्चय अथवा ज्ञान न होनेसे भी वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है। इस रीतिसे जो वर्णोंके मिश्रणद्वारा उत्पन्न हुए मनुष्य हैं, उनका क्या धर्म है? और कौन-कौन-से कर्म हैं? यह मुझे बताइये ।। १-२ ।।

भीष्म उवाच

चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि चातुर्वर्ण्यं च केवलम् ।
असृजत् स हि यज्ञार्थे पूर्वमेव प्रजापतिः ।। ३ ।।

भीष्मजीने कहा— बेटा! पूर्वकालमें प्रजापतिने यज्ञके लिये केवल चार वर्णों और उनके पृथक्-पृथक् कर्मोंकी ही रचना की थी ।। ३ ।।

भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते ।
आनुपूर्व्याद् द्वयोर्हीनौ मातृजातौ प्रसूततः ।। ४ ।।

ब्राह्मणकी जो चार भार्याएँ बतायी गयी हैं, उनमेंसे दो स्त्रियों—ब्राह्मणी और क्षत्रियाके गर्भसे ब्राह्मण ही उत्पन्न होता है और शेष दो वैश्या और शूद्रा स्त्रियोंके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होते हैं, वे ब्राह्मणत्वसे हीन क्रमशः माताकी जातिके समझे जाते हैं ।। ४ ।।

परं शवाद् ब्राह्मणस्यैव पुत्रः
शूद्रापुत्रं पारशवं तमाहुः ।
शुश्रूषकः स्वस्य कुलस्य स स्यात्
स्वचारित्रं नित्यमथो न जह्यात् ।। ५ ।।

शूद्राके गर्भसे उत्पन्न हुआ ब्राह्मणका ही जो पुत्र है, वह शवसे अर्थात् शूद्रसे पर—उत्कृष्ट बताया गया है; इसीलिये ऋषिगण उसे पारशव कहते हैं। उसे अपने कुलकी सेवा करनी चाहिये और अपने इस सेवारूप आचारका कभी परित्याग नहीं करना चाहिये ।। ५ ।।

सर्वानुपायानथ सम्प्रधार्य समुद्धरेत् स्वस्य कुलस्य तन्त्रम् । ज्येष्ठो यवीयानपि यो द्विजस्य शुश्रूषया दानपरायणः स्यात् ।। ६ ।। शूद्रापुत्र सभी उपायोंका विचार करके अपनी कुल-परम्पराका उद्धार करे। वह अवस्थामें ज्येष्ठ होनेपर भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकी अपेक्षा छोटा ही समझा जाता है, अतः उसे त्रैवर्णिकोंकी सेवा करते हुए दानपरायण होना चाहिये ।। ६ ।।

तिस्रः क्षत्रियसम्बन्धाद् द्वयोरात्मास्य जायते । हीनवर्णास्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृतिः ।। ७ ।। क्षत्रियकी क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा—ये तीन भार्याएँ होती हैं। इनमेंसे क्षत्रिया और वैश्याके गर्भसे क्षत्रियके सम्पर्कसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह क्षत्रिय ही होता है। तीसरी शूद्राके गर्भसे हीन वर्णवाले शूद्र ही उत्पन्न होते हैं; जिनकी उग्र संज्ञा है। ऐसा धर्मशास्त्रका कथन है ।। ७ ।।

द्वे चापि भार्ये वैश्यस्य द्वयोरात्मास्य जायते । शूद्रा शूद्रस्य चाप्येका शूद्रमेव प्रजायते ।। ८ ।। वैश्यकी दो भार्याएँ होती हैं—वैश्या और शूद्रा। उन दोनोंके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह वैश्य ही होता है। शूद्रकी एक ही भार्या होती है शूद्रा, जो शूद्रको ही जन्म देती है ।। ८ ।।

अतोऽविशिष्टस्त्वधमो गुरुदारप्रधर्षकः । बाह्यं वर्णं जनयति चातुर्वर्ण्यविगर्हितम् ।। ९ ।। अतः वर्णोंमें नीचे दर्जेका शूद्र यदि गुरुजनों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी स्त्रियोंके साथ समागम करता है तो वह चारों वर्णोंद्वारा निन्दित वर्णबहिष्कृत (चाण्डाल आदि) को जन्म देता है ।। ९ ।।

विप्रायां क्षत्रियो बाह्यं सूतं स्तोमक्रियापरम् । वैश्यो वैदेहकं चापि मौद्गल्यमपवर्जितम् ।। १० ।। क्षत्रिय ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर उसके गर्भसे 'सूत' जातिका पुत्र उत्पन्न करता है, जो वर्णबहिष्कृत और स्तुति-कर्म करनेवाला (एवं रथीका काम करनेवाला) होता है। उसी प्रकार वैश्य यदि ब्राह्मणीके साथ समागम करे तो वह संस्कारभ्रष्ट 'वैदेहक' जातिवाले पुत्रको उत्पन्न करता है, जिससे अन्तःपुरकी रक्षा आदिका काम लिया जाता है और इसलिये जिसको 'मौद्गल्य' भी कहते हैं ।। १० ।।

शूद्रश्चाण्डालमत्युग्रं वध्यघ्नं बाह्यवासिनम् । ब्राह्मण्यां सम्प्रजायन्त इत्येते कुलपांसनाः । एते मतिमतां श्रेष्ठ वर्णसंकरजाः प्रभो ।। ११ ।।

इसी तरह शूद्र ब्राह्मणीके साथ समागम करके अत्यन्त भयंकर चाण्डालको जन्म देता है, जो गाँवके बाहर बसता है और वध्यपुरुषोंको प्राणदण्ड आदि देनेका काम करता है। प्रभो! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! ब्राह्मणीके साथ नीच पुरुषोंका संसर्ग होनेपर ये सभी कुलांगार पुत्र उत्पन्न होते हैं और वर्णसंकर कहलाते हैं ॥ ११ ॥

बन्दी तु जायते वैश्यान्मागधो वाक्यजीवनः ।
शूद्रान्निषादो मत्स्यघ्नः क्षत्रियायां व्यतिक्रमात् ॥ १२ ॥

वैश्यके द्वारा क्षत्रिय जातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र वन्दी और मागध कहलाता है। वह लोगोंकी प्रशंसा करके अपनी जीविका चलाता है। इसी प्रकार यदि शूद्र क्षत्रिय जातिकी स्त्रीके साथ प्रतिलोम समागम करता है तो उससे मछली मारनेवाले निषाद जातिकी उत्पत्ति होती है ॥ १२ ॥

शूद्रादायोगवश्चापि वैश्यायां ग्राम्यधर्मिणः ।
ब्राह्मणैरप्रतिग्राह्यस्तक्षा स्वधनजीवनः ॥ १३ ॥

और शूद्र यदि वैश्य जातिकी स्त्रीके साथ ग्राम्यधर्म (मैथुन) का आश्रय लेता है तो उससे ‘आयोगव’ जातिका पुत्र उत्पन्न होता है जो बढ़ईका काम करके अपने कमाये हुए धनसे जीवन निर्वाह करता है। ब्राह्मणोंको उससे दान नहीं लेना चाहिये ॥ १३ ॥

एतेऽपि सदृशान् वर्णान् जनयन्ति स्वयोनिषु ।
मातृजात्याः प्रसूयन्ते ह्यवरा हीनयोनिषु ॥ १४ ॥

ये वर्णसंकर भी जब अपनी ही जातिकी स्त्रीके साथ समागम करते हैं, तब अपने ही समान वर्णवाले पुत्रोंको जन्म देते हैं और जब अपनेसे हीन जातिकी स्त्रीसे संसर्ग करते हैं, तब नीच संतानोंकी उत्पत्ति होती है। ये संतानें अपनी माताकी जातिकी समझी जाती हैं ॥ १४ ॥

यथा चतुर्षु वर्णेषु द्वयोरात्मास्य जायते ।
आनन्तर्यात् प्रजायन्ते तथा बाह्याः प्रधानतः ॥ १५ ॥

जैसे चार वर्णोंमेंसे अपने और अपनेसे एक वर्ण नीचेकी स्त्रियोंसे जो पुत्र उत्पन्न किया जाता है, वह अपने ही वर्णका माना जाता है और एक वर्णका व्यवधान देकर नीचेके वर्णोंकी स्त्रियोंसे उत्पन्न किये जानेवाले पुत्र प्रधान वर्णसे बाह्य—माताकी जातिवाले होते हैं, उसी प्रकार ये नौ—अम्बष्ठ, पारशव, उग्र, सूत, वैदेहक, चाण्डाल, मागध, निषाद और आयोगव—अपनी जातिमें और अपने-से नीचेवाली जातिमें जब संतान उत्पन्न करते हैं, तब वह संतान पिताकी ही जातिवाली होती है और जब एक जातिका अन्तर देकर नीचेकी जातियोंमें संतान उत्पन्न करते हैं, तब वे संतानें पिताकी जातिसे हीन माताओंकी जातिवाली होती हैं ॥ १५ ॥

ते चापि सदृशं वर्णं जनयन्ति स्वयोनिषु ।
परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ॥ १६ ॥

इस प्रकार वर्णसंकर मनुष्य भी समान जातिकी स्त्रियोंमें अपने ही समान वर्णवाले पुत्रोंकी उत्पत्ति करते हैं और यदि परस्पर विभिन्न जातिकी स्त्रियोंसे उनका संसर्ग होता है तो वे अपनी अपेक्षा भी निन्दनीय संतानोंको ही जन्म देते हैं ।। १६ ।।

यथा शूद्रोऽपि ब्राह्मण्यां जन्तुं बाह्यं प्रसूयते । एवं बाह्यतराद् बाह्यश्चातुर्वर्ण्यात् प्रजायते ।। १७ ।।

जैसे शूद्र ब्राह्मणीके गर्भसे चाण्डाल नामक बाह्य (वर्ण-बहिष्कृत) पुत्र उत्पन्न करता है, उसी प्रकार उस बाह्य जातिका मनुष्य भी ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंकी एवं बाह्यतर जातिकी स्त्रियोंके साथ संसर्ग करके अपनी अपेक्षा भी नीच जातिवाला पुत्र पैदा करता है ।। १७ ।।

प्रतिलोमं तु वर्धन्ते बाह्याद् बाह्यतरात् पुनः । हीनाद्धीनाः प्रसूयन्ते वर्णाः पञ्चदशैव तु ।। १८ ।।

इस तरह बाह्य और बाह्यतर जातिकी स्त्रियोंसे समागम करनेपर प्रतिलोम वर्णसंकरोंकी सृष्टि बढ़ती जाती है। क्रमशः हीन-से-हीन जातिके बालक जन्म लेने लगते हैं। इन संकर जातियोंकी संख्या सामान्यतः पंद्रह है ।।

अगम्यागमनाच्चैव जायते वर्णसंकरः । बाह्यानामनुजायन्ते सैरन्ध्रयां मागधेषु च । प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम् ।। १९ ।।

अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेपर वर्णसंकर संतानकी उत्पत्ति होती है। मागध जातिकी सैरन्ध्री स्त्रियोंसे यदि बाह्यजातीय पुरुषोंका संसर्ग हो तो उससे जो पुत्र उत्पन्न होता है वह राजा आदि पुरुषोंके शृंगार करने तथा उनके शरीरमें अंगराग लगाने आदिकी सेवाओंका जानकार होता है और दास न होकर भी दासवृत्तिसे जीवन निर्वाह करनेवाला होता है ।। १९ ।।

अतश्चायोगवं सूते वागुराबन्धजीवनम् । मैरेयकं च वैदेहः सम्प्रसूतेऽथ माधुकम् ।। २० ।।

मागधोंके आवान्तर भेद सैरन्ध्र जातिकी स्त्रीसे यदि आयोगव जातिका पुरुष समागम करे तो वह आयोगव जातिका पुत्र उत्पन्न करता है, जो जंगलोंमें जाल बिछाकर पशुओंको फँसानेका काम करके जीवन निर्वाह करता है। उसी जातिकी स्त्रीके साथ यदि वैदेह जातिका पुरुष समागम करता है तो वह मदिरा बनानेवाले मैरेयक जातिके पुत्रको जन्म देता है ।। २० ।।

निषादो मद्गुरं सूते दासं नावोपजीविनम् । मृतपं चापि चाण्डालः श्वपाकमिति विश्रुतम् ।। २१ ।।

निषादके वीर्य और मागधसैरन्ध्रीके गर्भसे मद्गुर जातिका पुरुष उत्पन्न होता है, जिसका दूसरा नाम दास भी है। वह नावसे अपनी जीविका चलाता है। चाण्डाल और

मागधी सैरन्ध्रीके संयोगसे श्वपाक नामसे प्रसिद्ध अधम चाण्डालकी उत्पत्ति होती है। वह मुर्दोंकी रखवालीका काम करता है ।। २१ ।। चतुरो मागधी सूते क्रूरान् मायोपजीविनः । मांसं स्वादुकरं क्षौद्रं सौगन्धमिति विश्रुतम् ।। २२ ।। इस प्रकार मागध जातिकी सैरन्ध्री स्त्री आयोगव आदि चार जातियोंसे समागम करके मायासे जीविका चलानेवाले पूर्वोक्त चार प्रकारके क्रूर पुत्रोंको उत्पन्न करती है। इनके सिवा दूसरे भी चार प्रकारके पुत्र मागधी सैरन्ध्रीसे उत्पन्न होते हैं जो उसके सजातीय अर्थात् मागध-सैरन्ध्रसे ही उत्पन्न होते हैं। उनकी मांस, स्वादुकर, क्षौद्र और सौगन्ध—इन चार नामोंसे प्रसिद्धि होती है ।। वैदेहकाच्च पापिष्ठा क्रूरं मायोपजीविनम् । निषादान्मद्रनाथं च खरयानप्रयायिनम् ।। २३ ।। आयोगव जातिकी पापिष्ठा स्त्री वैदेह जातिके पुरुषसे समागम करके अत्यन्त क्रूर, मायाजीवी पुत्र उत्पन्न करती है। वही निषादके संयोगसे मद्रनाभ नामक जातिको जन्म देती है, जो गदहेकी सवारी करनेवाली होती है ।। २३ ।। चाण्डालात् पुल्कसं चापि खराश्वगजभोजिनम् । मृतचैलप्रतिच्छन्नं भिन्नभाजनभोजनम् ।। २४ ।। वही पापिष्ठा स्त्री जब चाण्डालसे समागम करती है तब पुल्कस जातिको जन्म देती है। पुल्कस गधे, घोड़े और हाथीके मांस खाते हैं। वे मुर्दोंपर चढ़े हुए कफन लेकर पहनते और फूटे बर्तनमें भोजन करते हैं ।। आयोगवीषु जायन्ते हीनवर्णास्तु ते त्रयः । क्षुद्रो वैदेहकादन्ध्रो बहिर्ग्रामप्रतिश्रयः ।। २५ ।। कारावरो निषाद्यां तु चर्मकारः प्रसूयते । इस प्रकार ये तीन नीच जातिके मनुष्य आयोगवीकी संतानें हैं। निषाद जातिकी स्त्रीका यदि वैदेहक जातिके पुरुषसे संसर्ग हो तो क्षुद्र, अन्ध्र और कारावर नामक जातिवाले पुत्रोंकी उत्पत्ति होती है। इनमेंसे क्षुद्र और अन्ध्र तो गाँवसे बाहर रहते हैं और जंगली पशुओंकी हिंसा करके जीविका चलाते हैं तथा कारावर मृत पशुओंके चमड़ेका कारबार करता है। इसलिये चर्मकार या चमार कहलाता है ।। २५ ½ ।। चाण्डालात् पाण्डुसौपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् ।। २६ ।। आहिण्डको निषादेन वैदेह्यां सम्प्रसूयते । चण्डालेन तु सौपाकश्चण्डालसमवृत्तिमान् ।। २७ ।। चाण्डाल पुरुष और निषाद जातिकी स्त्रीके संयोगसे पाण्डुसौपाक जातिका जन्म होता है। यह जाति बाँसकी डलिया आदि बनाकर जीविका चलाती है। वैदेह जातिकी स्त्रीके साथ निषादका सम्पर्क होनेपर आहिण्डकका जन्म होता है, किंतु वही स्त्री जब

चाण्डालके साथ सम्पर्क करती है तब उससे सौपाककी उत्पत्ति होती है। सौपाककी जीविका-वृत्ति चाण्डालके ही तुल्य है ।। २६-२७ ।।

निषादी चापि चाण्डालात् पुत्रमन्तेवसायिनम् । श्मशानगोचरं सूते बाह्यैरपि बहिष्कृतम् ।। २८ ।। निषाद जातिकी स्त्रीमें चाण्डालके वीर्यसे अन्तेवसायीका जन्म होता है। इस जातिके लोग सदा श्मशानमें ही रहते हैं। निषाद आदि बाह्यजातिके लोग भी उसे बहिष्कृत या अछूत समझते हैं ।। २८ ।।

इत्येते संकरे जाताः पितृमातृव्यतिक्रमात् । प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः ।। २९ ।। इस प्रकार माता-पिताके व्यतिक्रम (वर्णान्तरके संयोग)-से ये वर्णसंकर जातियाँ उत्पन्न होती हैं। इनमेंसे कुछकी जातियाँ तो प्रकट होती हैं और कुछकी गुप्त। इन्हें इनके कर्मोंसे ही पहचानना चाहिये ।। २९ ।।

चतुर्णामेव वर्णानां धर्मो नान्यस्य विद्यते । वर्णानां धर्महीनेषु संख्या नास्तीह कस्यचित् ।। ३० ।। शास्त्रोंमें चारों वर्णोंके धर्मोंका निश्चय किया गया है औरोंके नहीं। धर्महीन वर्णसंकर जातियोंमेंसे किसीके वर्णसम्बन्धी भेद और उपभेदोंकी भी यहाँ कोई नियत संख्या नहीं है ।। ३० ।।

यदृच्छयोपसम्पन्नैर्यज्ञसाधुबहिष्कृतैः । बाह्या बाह्यैश्च जायन्ते यथावृत्ति यथाश्रयम् ।। ३१ ।। जो जातिका विचार न करके स्वेच्छानुसार अन्य वर्णकी स्त्रियोंके साथ समागम करते हैं तथा जो यज्ञोंके अधिकार और साधु पुरुषोंसे बहिष्कृत हैं, ऐसे वर्णबाह्य मनुष्योंसे ही वर्णसंकर संतानें उत्पन्न होती हैं और वे अपनी रुचिके अनुकूल कार्य करके भिन्न-भिन्न प्रकारकी आजीविका तथा आश्रयको अपनाती हैं ।। ३१ ।।

चतुष्पथश्मशानानि शैलांश्चान्यान् वनस्पतीन् । कार्ष्णायसमलंकारं परिगृह्य च नित्यशः ।। ३२ ।। ऐसे लोग सदा लोहेके आभूषण पहनकर चौराहोंमें, मरघटमें, पहाड़ोंपर और वृक्षोंके नीचे निवास करते हैं ।। ३२ ।।

वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्तः स्वकर्मभिः । युञ्जन्तो वाप्यलंकारांस्तथोपकरणानि च ।। ३३ ।। इन्हें चाहिये कि गहने तथा अन्य उपकरणोंको बनायें तथा अपने उद्योग-धंधोंसे जीविका चलाते हुए प्रकटरूपसे निवास करें ।। ३३ ।।

गोब्राह्मणाय साहाय्यं कुर्वाणा वै न संशयः । आनृशंस्यमनुक्रोशः सत्यवाक्यं तथा क्षमा ।। ३४ ।।

स्वशरीरैरपि त्राणं बाह्यानां सिद्धिकारणम्। भवन्ति मनुजव्याघ्र तत्र मे नास्ति संशयः॥ ३५॥ पुरुषसिंह! यदि ये गौ और ब्राह्मणोंकी सहायता करें, क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग दें, सबपर दया करें, सत्य बोलें, दूसरोंके अपराध क्षमा करें और अपने शरीरको कष्टमें डालकर भी दूसरोंकी रक्षा करें तो इन वर्णसंकर मनुष्योंकी भी पारमार्थिक उन्नति हो सकती है—इसमें संशय नहीं है॥ ३४-३५॥

यथोपदेशं परिकीर्तितासु नरः प्रजायेत विचार्य बुद्धिमान्। निहीनयोनिर्हि सुतोऽवसादयेत् तितीर्षमाणं हि यथोपलो जले॥ ३६॥ राजन्! जैसा ऋषि-मुनियोंने उपदेश किया है, उसके अनुसार बतायी हुई वर्ण एवं बाह्यजातिकी स्त्रियोंमें बुद्धिमान् मनुष्यको अपने हिताहितका भलीभाँति विचार करके ही संतान उत्पन्न करनी चाहिये; क्योंकि नीच योनिमें उत्पन्न हुआ पुत्र भवसागरसे पार जानेकी इच्छावाले पिताको उसी प्रकार डुबोता है, जैसे गलेमें बँधा हुआ पत्थर तैरनेवाले मनुष्यको पानीके अतलगर्तमें निमग्न कर देता है॥ ३६॥

अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः। नयन्ति ह्यपथं नार्यः कामक्रोधवशानुगम्॥ ३७॥ संसारमें कोई मूर्ख हो या विद्वान्, काम और क्रोधके वशीभूत हुए मनुष्यको नारियाँ अवश्य ही कुमार्गपर पहुँचा देती हैं॥ ३७॥

स्वभावश्चैव नारीणां नराणामिह दूषणम्। अत्यर्थं न प्रसज्जन्ते प्रमदासु विपश्चितः॥ ३८॥ इस जगत्में मनुष्योंको कलंकित कर देना नारियोंका स्वभाव है; अतः विवेकी पुरुष युवती स्त्रियोंमें अधिक आसक्त नहीं होते हैं॥ ३८॥

युधिष्ठिर उवाच

वर्णापेतमविज्ञाय नरं कलुषयोनिजम्। आर्यरूपमिवानार्यं कथं विद्यामहे वयम्॥ ३९॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! जो चारों वर्णोंसे बहिष्कृत, वर्णसंकर मनुष्यसे उत्पन्न और अनार्य होकर भी ऊपरसे देखनेमें आर्य-सा प्रतीत हो रहा हो उसे हमलोग कैसे पहचान सकते हैं?॥ ३९॥

भीष्म उवाच

योनिसंकलुषे जातं नानाभावसमन्वितम्। कर्मभिः सज्जनाचीर्णैर्विज्ञेया योनिशुद्धता॥ ४०॥

**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो कलुषित योनिमें उत्पन्न हुआ है, वह ऐसी नाना प्रकारकी चेष्टाओंसे युक्त होता है, जो सत्पुरुषोंके आचारसे विपरीत हैं; अतः उसके कर्मोंसे ही उसकी पहचान होती है। इसी प्रकार सज्जनोचित आचरणोंसे योनिकी शुद्धताका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।। ४० ।।
अनार्यत्वमनाचारः क्रूरत्वं निष्क्रियात्मता ।
पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ।। ४१ ।।
इस जगत्में अनार्यता, अनाचार, क्रूरता और अकर्मण्यता आदि दोष मनुष्यको कलुषित योनिसे उत्पन्न (वर्णसंकर) सिद्ध करते हैं ।। ४१ ।।
पित्र्यं वा भजते शीलं मातृजं वा तथोभयम् ।
न कथंचन संकीर्णः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ।। ४२ ।।
वर्णसंकर पुरुष अपने पिता या माताके अथवा दोनोंके ही स्वभावका अनुसरण करता है। वह किसी तरह अपनी प्रकृतिको छिपा नहीं सकता ।। ४२ ।।
यथैव सदृशो रूपे मातापित्रोर्हि जायते ।
व्याघ्रश्चित्रैस्तथा योनिं पुरुषः स्वां नियच्छति ।। ४३ ।।
जैसे बाघ अपनी चित्र-विचित्र खाल और रूपके द्वारा माता-पिताके समान ही होता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी योनिका ही अनुसरण करता है ।। ४३ ।।
कुले स्रोतसि संच्छन्ने यस्य स्याद् योनिसंकरः ।
संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमथवा बहु ।। ४४ ।।
यद्यपि कुल और वीर्य गुप्त रहते हैं अर्थात् कौन किस कुलमें और किसके वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, यह बात ऊपरसे प्रकट नहीं होती है तो भी जिसका जन्म संकर-योनिसे हुआ है, वह मनुष्य थोड़ा-बहुत अपने पिताके स्वभावका आश्रय लेता ही है ।। ४४ ।।
आर्यरूपसमाचारं चरन्तं कृतके पथि ।
सुवर्णमन्यवर्णं वा स्वशीलं शास्ति निश्चये ।। ४५ ।।
जो कृत्रिम मार्गका आश्रय लेकर श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुरूप आचरण करता है, वह सोना है या काँच—शुद्ध वर्णका है या संकर वर्णका? इसका निश्चय करते समय उसका स्वभाव ही सब कुछ बता देता है ।। ४५ ।।
नानावृत्तेषु भूतेषु नानाकर्मरतेषु च ।
जन्मवृत्तसमं लोके सुश्लिष्टं न विरज्यते ।। ४६ ।।
संसारके प्राणी नाना प्रकारके आचार-व्यवहारमें लगे हुए हैं, भाँति-भाँतिके कर्मोंमें तत्पर हैं; अतः आचरणके सिवा ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो जन्मके रहस्यको साफ तौरपर प्रकट कर सके ।। ४६ ।।
शरीरमिह सत्त्वेन न तस्य परिकृष्यते ।
ज्येष्ठमध्यावरं सत्त्वं तुल्यसत्त्वं प्रमोदते ।। ४७ ।।

वर्णसंकरको शास्त्रीय बुद्धि प्राप्त हो जाय तो भी वह उसके शरीरको स्वभावसे नहीं हटा सकती। उत्तम, मध्यम या निकृष्ट जिस प्रकारके स्वभावसे उसके शरीरका निर्माण हुआ है, वैसा ही स्वभाव उसे आनन्ददायक जान पड़ता है ॥ ४७ ॥

ज्यायांसमपि शीलेन विहीनं नैव पूजयेत् ।
अपि शूद्रं च धर्मज्ञं सद्वृत्तमभिपूजयेत् ॥ ४८ ॥
ऊँची जातिका मनुष्य भी यदि उत्तम शील अर्थात् आचरणसे हीन हो तो उसका सत्कार न करे और शूद्र भी यदि धर्मज्ञ एवं सदाचारी हो तो उसका विशेष आदर करना चाहिये ॥ ४८ ॥

आत्मानमाख्याति हि कर्मभिर्नरः
सुशीलचारित्रकुलैः शुभाशुभैः ।
प्रणष्टमप्याशु कुलं तथा नरः
पुनः प्रकाशं कुरुते स्वकर्मतः ॥ ४९ ॥
मनुष्य अपने शुभाशुभ कर्म, शील, आचरण और कुलके द्वारा अपना परिचय देता है। यदि उसका कुल नष्ट हो गया हो तो भी वह अपने कर्मोंद्वारा उसे फिर शीघ्र ही प्रकाशमें ला देता है ॥ ४९ ॥

योनिष्वेतासु सर्वासु संकीर्णास्वितरासु च ।
यत्रात्मानं न जनयेद् बुधस्तां परिवर्जयेत् ॥ ५० ॥
इन सभी ऊपर बतायी हुई नीच योनियोंमें तथा अन्य नीच जातियोंमें भी विद्वान् पुरुषको सन्तानोत्पत्ति नहीं करनी चाहिये। उनका सर्वथा परित्याग करना ही उचित है ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे वर्णसंकरकथने अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके प्रसंगमें वर्णसंकरकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥