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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

उलूको यमदूतश्च तथर्षिः सैन्धवायनः ॥ ५१ ॥ वल्गुजङ्घश्च भगवान् गालवश्च महानृषिः । ऋषिर्वज्रस्तथा ख्यातः सालंकायन एव च ॥ ५२ ॥ लीलाढ्यो नारदश्चैव तथा कूर्चामुखः स्मृतः । वादुलिर्मुसलश्चैव वक्षोग्रीवस्तथैव च ॥ ५३ ॥ आंघ्रिको नैकदृक् चैव शिलायूपः शितः शुचिः । चक्रको मारुतन्तव्यो वातघ्नोऽथाश्वलायनः ॥ ५४ ॥ श्यामायनोऽथ गार्ग्यश्च जाबालिः सुश्रुतस्तथा । कारीषिरथ संश्रुत्यः परपौरवतन्तवः ॥ ५५ ॥ महानृषिश्च कपिलस्तथर्षिस्ताडकायनः । तथैव चोपगहनस्तथर्षिश्चासुरायणः ॥ ५६ ॥ मार्दमर्षिर्हिरण्याक्षो जङ्गारिर्बाभ्रवायणिः । भूतिर्विभूतिः सूतश्च सुरकृत् तु तथैव च ॥ ५७ ॥ अरालिर्नाचिकश्चैव चाम्पेयोज्जयनौ तथा । नवतन्तुर्बकनखः सेयनो यतिरेव च ॥ ५८ ॥ अम्भोरुहश्चारुमत्स्यः शिरीषी चाथ गार्दभिः । ऊर्जयोनिरुदापेक्षी नारदी च महानृषिः ॥ ५९ ॥ विश्वामित्रात्मजाः सर्वे मुनयो ब्रह्मवादिनः ।

भगवान् मधुच्छन्दा, शक्तिशाली देवरात, अक्षीण, शकुन्त, बभ्रु, कालपथ, विख्यात याज्ञवल्क्य, महाव्रती स्थूण, उलूक, यमदूत, सैन्धवायन ऋषि, भगवान् वल्गुजंघ, महर्षि गालव, वज्रमुनि, विख्यात सालंकायन, लीलाढ्य, नारद, कूर्चामुख, वादुलि, मुसल, वक्षोग्रीव, आङ्घ्रिक, नैकदृक्, शिलायूप, शित, शुचि, चक्रक, मारुतन्तव्य, वातघ्न, आश्वलायन, श्यामायन, गार्ग्य, जाबालि, सुश्रुत, कारीषि, संश्रुत्य, पर, पौरव, तन्तु, महर्षि कपिल, मुनिवर ताडकायन, उपगहन, आसुरायण ऋषि, मार्दमर्षि, हिरण्याक्ष, जंगारि, बाभ्रवायणि, भूति, विभूति, सूत, सुरकृत्, अरालि, नाचिक, चाम्पेय, उज्जयन, नवतन्तु, बकनख, सेयन, यति, अम्भोरुह, चारुमत्स्य, शिरीषी, गार्दभि, ऊर्जयोनि, उदापेक्षी और महर्षि नारदी—ये सभी विश्वामित्रके पुत्र एवं ब्रह्मवादी ऋषि थे ॥ ५०—५९ १/२ ॥

तथैव क्षत्रियो राजन् विश्वामित्रो महातपाः ॥ ६० ॥ ऋचीकेनाहितं ब्रह्म परमेतद् युधिष्ठिर ।

राजा युधिष्ठिर! महातपस्वी विश्वामित्र यद्यपि क्षत्रिय थे तथापि ऋचीक मुनिने उनमें परम उत्कृष्ट ब्रह्मतेजका आधान किया था ॥ ६० १/२ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ६१ ॥ विश्वामित्रस्य वै जन्म सोमसूर्याग्नितेजसः ।

भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें सोम, सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी विश्वामित्रके जन्मका सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताया है ॥ ६१ १/२ ॥
यत्र यत्र च संदेहो भूयस्ते राजसत्तम ।
तत्र तत्र च मां ब्रूहि च्छेत्तास्मि तव संशयम् ॥ ६२ ॥
नृपश्रेष्ठ! अब फिर तुम्हें जहाँ-जहाँ संदेह हो उस-उस विषयकी बात मुझसे पूछो। मैं तुम्हारे संशयका निवारण करूँगा ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विश्वामित्रोपाख्याने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विश्वामित्रका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

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पञ्चमोऽध्यायः

स्वामिभक्त एवं दयालु पुरुषकी श्रेष्ठता बतानेके लिये इन्द्र और तोतेके संवादका उल्लेख

युधिष्ठिर उवाच

आनृशंस्यस्य धर्मज्ञ गुणान् भक्तजनस्य च ।
श्रोतुमिच्छामि धर्मज्ञ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**धर्मज्ञ पितामह! अब मैं दयालु और भक्त पुरुषोंके गुण सुनना चाहता हूँ; अतः कृपा करके मुझे उनके गुण ही बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वासवस्य च संवादं शुकस्य च महात्मनः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें भी महामनस्वी तोते और इन्द्रका जो संवाद हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥

विषये काशिराजस्य ग्रामान्निष्क्रम्य लुब्धकः ।
सविषं काण्डमादाय मृगयामास वै मृगम् ॥ ३ ॥
काशिराजके राज्यकी बात है, एक व्याध विषमें बुझाया हुआ बाण लेकर गाँवसे निकला और शिकारके लिये किसी मृगको खोजने लगा ॥ ३ ॥

तत्र चामिषलुब्धेन लुब्धकेन महावने ।
अविदूरे मृगान् दृष्ट्वा बाणः प्रतिसमाहितः ॥ ४ ॥
उस महान् वनमें थोड़ी ही दूर जानेपर मांसलोभी व्याधने कुछ मृगोंको देखा और उनपर बाण चला दिया ॥ ४ ॥

तेन दुर्वारितास्त्रेण निमित्तचपलेषुणा ।
महान् वनतरुस्तत्र विद्धो मृगजिघांसया ॥ ५ ॥
व्याधका वह बाण अमोघ था; परंतु निशाना चूक जानेके कारण मृगको मारनेकी इच्छासे छोड़े गये उस बाणने एक विशाल वृक्षको वेध दिया ॥ ५ ॥

स तीक्ष्णविषदिग्धेन शरेणातिबलात् क्षतः । उत्सृज्य फलपत्राणि पादपः शोषमागतः ।। ६ ।। तीखे विषसे पुष्ट हुए उस बाणसे बड़े जोरका आघात लगनेके कारण उस वृक्षमें जहर फैल गया। उसके फल और पत्ते झड़ गये और धीरे-धीरे वह सूखने लगा ।। ६ ।।

तस्मिन् वृक्षे तथाभूते कोटरेषु चिरोषितः । न जहाति शुको वासं तस्य भक्त्या वनस्पतेः ।। ७ ।। उस वृक्षके खोंखलेमें बहुत दिनोंसे एक तोता निवास करता था। उसका उस वृक्षके प्रति बड़ा प्रेम हो गया था, इसलिये वह उसके सूखनेपर भी वहाँका निवास छोड़ नहीं रहा था ।। ७ ।।

निष्प्रचारो निराहारो ग्लानः शिथिलवागपि । कृतज्ञः सह वृक्षेण धर्मात्मा सोऽप्यशुष्यत ।। ८ ।। वह धर्मात्मा एवं कृतज्ञ तोता कहीं आता-जाता नहीं था। चारा चुगना भी छोड़ चुका था। वह इतना शिथिल हो गया था कि उससे बोलातक नहीं जाता था। इस प्रकार उस वृक्षके साथ वह स्वयं भी सूखता चला जा रहा था ।। ८ ।।

तमुदारं महासत्त्वमतिमानुषचेष्टितम् । समदुःखसुखं दृष्ट्वा विस्मितः पाकशासनः ।। ९ ।।

उसका धैर्य महान् था। उसकी चेष्टा अलौकिक दिखायी देती थी। दुःख और सुखमें समान भाव रखनेवाले उस उदार तोतेको देखकर पाकशासन इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ९ ॥ ततश्चिन्तामुपगतः शक्रः कथमयं द्विजः । तिर्यग्योनावसम्भाव्यमानृशंस्यमवस्थितः ॥ १० ॥ इन्द्र यह सोचने लगे कि यह पक्षी कैसे ऐसी अलौकिक दयाको अपनाये बैठा है, जो पक्षीकी योनिमें प्रायः असम्भव है ॥ १० ॥ अथवा नात्र चित्रं हि अभवद् वासवस्य तु । प्राणिनामपि सर्वेषां सर्वं सर्वत्र दृश्यते ॥ ११ ॥ अथवा इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि सब जगह सब प्राणियोंमें सब तरहकी बातें देखनेमें आती हैं—ऐसी भावना मनमें लानेपर इन्द्रका मन शान्त हुआ ॥ ११ ॥ ततो ब्राह्मणवेषेण मानुषं रूपमास्थितः । अवतीर्य महीं शक्रस्तं पक्षिणमुवाच ह ॥ १२ ॥ तदनन्तर वे ब्राह्मणके वेशमें मनुष्यका रूप धारण करके पृथ्वीपर उतरे और उस शुक पक्षीसे बोले— ॥ १२ ॥ शुक भो पक्षिणां श्रेष्ठ दाक्षेयी सुप्रजा त्वया । पृच्छे त्वां शुकमेनं त्वं कस्मान्न त्यजसि द्रुमम् ॥ १३ ॥ ‘पक्षियोंमें श्रेष्ठ शुक! तुम्हें पाकर दक्षकी दौहित्री शुकी उत्तम संतानवाली हुई है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि अब इस वृक्षको क्यों नहीं छोड़ देते हो?’ ॥ १३ ॥ अथ पृष्टः शुकः प्राह मूर्ध्ना समभिवाद्य तम् । स्वागतं देवराज त्वं विज्ञातस्तपसा मया ॥ १४ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर शुकने मस्तक नवाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा—‘देवराज! आपका स्वागत है। मैंने तपस्याके बलसे आपको पहचान लिया है’ ॥ ततो दशशताक्षेण साधु साध्विति भाषितम् । अहो विज्ञानमित्येवं मनसा पूजितस्ततः ॥ १५ ॥ यह सुनकर सहस्रनेत्रधारी इन्द्रने मन-ही-मन कहा—‘वाह! वाह! क्या अद्भुत विज्ञान है!’ ऐसा कहकर उन्होंने मनसे ही उसका आदर किया ॥ १५ ॥ तमेवं शुभकर्माणं शुकं परमधार्मिकम् । विजानन्नपि तां प्रीतिं पप्रच्छ बलसूदनः ॥ १६ ॥ ‘वृक्षके प्रति इस तोतेका कितना प्रेम है’ इस बातको जानते हुए भी बलसूदन इन्द्रने शुभकर्म करनेवाले उस परम धर्मात्मा शुकसे पूछा— ॥ १६ ॥ निष्पत्रमफलं शुष्कमशरण्यं पतत्रिणाम् ।

किमर्थं सेवसे वृक्षं यदा महदिदं वनम् ॥ १७ ॥ ‘शुक! इस वृक्षके पत्ते झड़ गये, फल भी नहीं रहे। यह सूख जानेके कारण पक्षियोंके बसेरे लेने योग्य नहीं रह गया है। जब यह विशाल वन पड़ा हुआ है तब तुम इस ठूंठ वृक्षका सेवन किसलिये करते हो? ।। १७ ।।

अन्येऽपि बहवो वृक्षाः पत्रसंछन्नकोटराः । शुभाः पर्याप्तसंचारा विद्यन्तेऽस्मिन् महावने ॥ १८ ॥ ‘इस विशाल वनमें और भी बहुत-से वृक्ष हैं जिनके खोखले हरे-हरे पत्तोंसे आच्छादित हैं, जो सुन्दर हैं तथा जिनपर पक्षियोंके संचारके लिये योग्य पर्याप्त स्थान हैं ।। १८ ।।

गतायुषमसामर्थ्यं क्षीणसारं हतश्रियम् । विमृश्य प्रज्ञया धीर जहीमं स्थविरं द्रुमम् ॥ १९ ॥ ‘धीर शुक! इस वृक्षकी आयु समाप्त हो गयी, शक्ति नष्ट हो गयी। इसका सार क्षीण हो गया और इसकी शोभा भी छिन गयी। अपनी बुद्धिके द्वारा इन सब बातोंपर विचार करके अब इस बूढ़े वृक्षको त्याग दो’ ।। १९ ।।

भीष्म उवाच

तदुपश्रुत्य धर्मात्मा शुकः शक्रेण भाषितम् । सुदीर्घमतिनिःश्वस्य दीनो वाक्यमुवाच ह ॥ २० ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इन्द्रकी यह बात सुनकर धर्मात्मा शुकने लंबी साँस खींचकर दीनभावसे यह बात कही— ।। २० ।।

अनतिक्रमणीयानि दैवतानि शचीपते । यत्राभवत् तव प्रश्नस्तन्निबोध सुराधिप ॥ २१ ॥ ‘शचीवल्लभ! दैवका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। देवराज! जिसके विषयमें आपने प्रश्न किया है, उसकी बात सुनिये ।। २१ ।।

अस्मिन्नहं द्रुमे जातः साधुभिश्च गुणैर्युतः । बालभावेन संगुप्तः शत्रुभिश्च न धर्षितः ॥ २२ ॥ ‘मैंने इसी वृक्षपर जन्म लिया और यहीं रहकर अच्छे-अच्छे गुण सीखे हैं। इस वृक्षने अपने बालककी भाँति मुझे सुरक्षित रखा और मेरे ऊपर शत्रुओंका आक्रमण नहीं होने दिया।’ ।। २२ ।।

किमनुक्रोशय वैफल्यमुत्पादयसि मेऽनघ । आनृशंस्याभियुक्तस्य भक्तस्यानन्यगस्य च ॥ २३ ॥ ‘निष्पाप देवेन्द्र! इन्हीं सब कारणोंसे मेरी इस वृक्षके प्रति भक्ति है। मैं दयारूपी धर्मके पालनमें लगा हूँ और यहाँसे अन्यत्र नहीं जाना चाहता। ऐसी दशामें आप कृपा करके मेरी सद्भावनाको व्यर्थ बनानेकी चेष्टा क्यों करते हैं?’ ।। २३ ।।

अनुक्रोशो हि साधूनां महद्धर्मस्य लक्षणम् । अनुक्रोशश्च साधूनां सदा प्रीतिं प्रयच्छति ।। २४ ।। ‘श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये दूसरोंपर दया करना ही महान् धर्मका सूचक है। दयाभाव श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा ही आनन्द प्रदान करता है ।। २४ ।। त्वमेव दैवतैः सर्वैः पृच्छ्यसे धर्मसंशयात् । अतस्त्वं देवदेवानामाधिपत्ये प्रतिष्ठितः ।। २५ ।। ‘धर्मके विषयमें संशय होनेपर सब देवता आपसे ही अपना संदेह पूछते हैं। इसीलिये आप देवाधिदेवोंके अधिपति पदपर प्रतिष्ठित हैं ।। २५ ।। नार्हसे मां सहस्राक्ष द्रुमं त्याजयितुं चिरात् । समर्थमुपजीव्येमं त्यजेयं कथमद्य वै ।। २६ ।। ‘सहस्राक्ष! आप इस वृक्षको मुझसे छुड़ानेके लिये प्रयत्न न कीजिये। जब यह समर्थ था तब मैंने दीर्घकालसे इसीके आश्रयमें रहकर जीवन धारण किया है और आज जब यह शक्तिहीन हो गया तब इसे छोड़कर चल दूँ—यह कैसे हो सकता है?’ ।। २६ ।। तस्य वाक्येन सौम्येन हर्षितः पाकशासनः । शुकं प्रोवाच धर्मात्मा आनृशंस्येन तोषितः ।। २७ ।। तोतेकी इस कोमल वाणीसे पाकशासन इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। धर्मात्मा देवेन्द्रने शुककी दयालुतासे संतुष्ट हो उससे कहा— ।। २७ ।। वरं वृणीष्वेति तदा स च वव्रे वरं शुकः । आनृशंस्यपरो नित्यं तस्य वृक्षस्य सम्भवम् ।। २८ ।। ‘शुक! तुम मुझसे कोई वर माँगो।’ तब दयापरायण शुकने यह वर माँगा कि ‘यह वृक्ष पहलेकी ही भाँति हरा-भरा हो जाय’ ।। २८ ।। विदित्वा च दृढां भक्तिं तां शुके शीलसम्पदम् । प्रीतः क्षिप्रमथो वृक्षममृतेनावसिक्तवान् ।। २९ ।। तोतेकी इस सुदृढ़ भक्ति और शील-सम्पत्तिको जानकर इन्द्रको और भी प्रसन्नता हुई। उन्होंने तुरंत ही उस वृक्षको अमृतसे सींच दिया ।। २९ ।।

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धर्मात्मा शुक और इन्द्रकी बातचीत

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महर्षि वसिष्ठका ब्रह्माजीके साथ प्रश्नोत्तर

ततः फलानि पत्राणि शाखाश्चापि मनोहराः ।
शुकस्य दृढभक्तित्वात् श्रीमत्तां प्राप स द्रुमः ॥ ३० ॥
फिर तो उसमें नये-नये पत्ते, फल और मनोहर शाखाएँ निकल आयीं। तोतेकी दृढ़भक्तिके कारण वह वृक्ष पूर्ववत् श्रीसम्पन्न हो गया ॥ ३० ॥
शुकश्च कर्मणा तेन आनृशंस्यकृतेन वै ।
आयुषोऽन्ते महाराज प्राप शक्रसलोकताम् ॥ ३१ ॥
महाराज! वह शुक भी आयु समाप्त होनेपर अपने उस दयापूर्ण बर्तावके कारण इन्द्रलोकको प्राप्त हुआ ॥ ३१ ॥
एवमेव मनुष्येन्द्र भक्तिमन्तं समाश्रितः ।
सर्वार्थसिद्धिं लभते शुकं प्राप्य यथा द्रुमः ॥ ३२ ॥
नरेन्द्र! जैसे भक्तिमान् शुकका सहवास पाकर उस वृक्षने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त कर ली, उसी प्रकार अपनेमें भक्ति रखनेवाले पुरुषका सहारा पाकर प्रत्येक मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध कर लेता है ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शुकवासवसंवादे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुक और इन्द्रका संवादविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

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षष्ठोऽध्यायः

दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
दैवे पुरुषकारे च किंस्वित् श्रेष्ठतरं भवेत् ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ महाप्राज्ञ पितामह! दैव और पुरुषार्थमें कौन श्रेष्ठ है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वसिष्ठस्य च संवादं ब्रह्मणश्च युधिष्ठिर ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें वसिष्ठ और ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
दैवमानुष्ययोः किंस्वित् कर्मणोः श्रेष्ठमित्युत ।
पुरा वसिष्ठो भगवान् पितामहमपृच्छत ॥ ३ ॥

प्राचीन कालकी बात है, भगवान् वसिष्ठने लोकपितामह ब्रह्माजीसे पूछा—'प्रभो! दैव और पुरुषार्थमें कौन श्रेष्ठ है?' ॥ ३ ॥
ततः पद्मोद्भवो राजन् देवदेवः पितामहः ।
उवाच मधुरं वाक्यमर्थवद्धेतुभूषितम् ॥ ४ ॥

राजन्! तब कमलजन्मा देवाधिदेव पितामहने मधुर स्वरमें युक्तियुक्त सार्थक वचन कहा— ॥ ४ ॥

ब्रह्मोवाच
(बीजतो ह्यङ्कुरोत्पत्तिरङ्कुरात् पर्णसम्भवः ।
पर्णानालाः प्रसूयन्ते नालात् स्कन्धः प्रवर्तते ॥
स्कन्धात् प्रवर्तते पुष्पं पुष्पान्निर्वर्तते फलम् ।
फलान्निर्वर्त्यते बीजं बीजं नाफलमुच्यते ॥)

**ब्रह्माजीने कहा—**मुने! बीजसे अंकुरकी उत्पत्ति होती है, अंकुरसे पत्ते होते हैं। पत्तोंसे नाल, नालसे तने और डालियाँ होती हैं। उनसे पुष्प प्रकट होता है। फूलसे फल लगता है और फलसे बीज उत्पन्न होता है और बीज कभी निष्फल नहीं बताया गया है ॥
नाबीजं जायते किंचिन्न बीजेन बिना फलम् ।
बीजाद् बीजं प्रभवति बीजादेव फलं स्मृतम् ॥ ५ ॥

बीजके बिना कुछ भी पैदा नहीं होता, बीजके बिना फल भी नहीं लगता। बीजसे बीज प्रकट होता है और बीजसे ही फलकी उत्पत्ति मानी जाती है ।। ५ ।।

यादृशं वपते बीजं क्षेत्रमासाद्य कर्षकः ।
सुकृते दुष्कृते वापि तादृशं लभते फलम् ॥ ६ ॥
किसान खेतमें जाकर जैसा बीज बोता है उसीके अनुसार उसको फल मिलता है। इसी प्रकार पुण्य या पाप—जैसा कर्म किया जाता है वैसा ही फल मिलता है ।। ६ ।।

यथा बीजं विना क्षेत्रमुप्तं भवति निष्फलम् ।
तथा पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ ७ ॥
जैसे बीज खेतमें बोये बिना फल नहीं दे सकता, उसी प्रकार दैव (प्रारब्ध) भी पुरुषार्थके बिना नहीं सिद्ध होता ।। ७ ।।

क्षेत्रं पुरुषकारस्तु दैवं बीजमुदाहृतम् ।
क्षेत्रबीजसमायोगात् ततः सस्यं समृद्ध्यते ॥ ८ ॥
पुरुषार्थ खेत है और दैवको बीज बताया गया है। खेत और बीजके संयोगसे ही अनाज पैदा होता है ।। ८ ।।

कर्मणः फलनिर्वृत्तिं स्वयमश्नाति कारकः ।
प्रत्यक्षं दृश्यते लोके कृतस्यापकृतस्य च ॥ ९ ॥
कर्म करनेवाला मनुष्य अपने भले या बुरे कर्मका फल स्वयं ही भोगता है। यह बात संसारमें प्रत्यक्ष दिखायी देती है ।। ९ ।।

शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा ।
कृतं फलति सर्वत्र नाकृतं भुज्यते क्वचित् ॥ १० ॥
शुभ कर्म करनेसे सुख और पाप कर्म करनेसे दुःख मिलता है। अपना किया हुआ कर्म सर्वत्र ही फल देता है। बिना किये हुए कर्मका फल कहीं नहीं भोगा जाता ।। १० ।।

कृती सर्वत्र लभते प्रतिष्ठां भाग्यसंयुताम् ।
अकृती लभते भ्रष्टः क्षते क्षारावसेचनम् ॥ ११ ॥
पुरुषार्थी मनुष्य सर्वत्र भाग्यके अनुसार प्रतिष्ठा पाता है; परंतु जो अकर्मण्य है वह सम्मानसे भ्रष्ट होकर घावपर नमक छिड़कनेके समान असह्य दुःख भोगता है ।। ११ ।।

तपसा रूपसौभाग्यं रत्नानि विविधानि च ।
प्राप्यते कर्मणा सर्वं न दैवादकृतात्मना ॥ १२ ॥
मनुष्यको तपस्यासे रूप, सौभाग्य और नाना प्रकारके रत्न प्राप्त होते हैं। इस प्रकार कर्मसे सब कुछ मिल सकता है; परंतु भाग्यके भरोसे निकम्मे बैठे रहनेवालेको कुछ नहीं मिलता ।। १२ ।।

तथा स्वर्गश्च भोगश्च निष्ठा या च मनीषिना ।
सर्वं पुरुषकारेण कृतेनेहोपलभ्यते ॥ १३ ॥

इस जगत्में पुरुषार्थ करनेसे स्वर्ग, भोग, धर्ममें निष्ठा और बुद्धिमत्ता—इन सबकी उपलब्धि होती है ॥ १३ ॥ ज्योतींषि त्रिदशा नागा यक्षाश्चन्द्रार्कमरुतः । सर्व पुरुषकारेण मानुष्याद् देवतां गताः ॥ १४ ॥ नक्षत्र, देवता, नाग, यक्ष, चन्द्रमा, सूर्य और वायु आदि सभी पुरुषार्थ करके ही मनुष्यलोकसे देवलोकको गये हैं ॥ १४ ॥ अर्थो वा मित्रवर्गो वा ऐश्वर्यं वा कुलान्वितम् । श्रीश्चापि दुर्लभा भोक्तुं तथैवाकृतकर्मभिः ॥ १५ ॥ जो पुरुषार्थ नहीं करते वे धन, मित्रवर्ग, ऐश्वर्य, उत्तम कुल तथा दुर्लभ लक्ष्मीका भी उपभोग नहीं कर सकते ॥ १५ ॥ शौचेन लभते विप्रः क्षत्रियो विक्रमेण तु । वैश्यः पुरुषकारेण शूद्रः शुश्रूषया श्रियम् ॥ १६ ॥ ब्राह्मण शौचाचारसे, क्षत्रिय पराक्रमसे, वैश्य उद्योगसे तथा शूद्र तीनों वर्णोंकी सेवासे सम्पत्ति पाता है ॥ १६ ॥ नादातारं भजन्त्यर्था न क्लीबं नापि निष्क्रियम् । नाकर्मशीलं नाशूरं तथा नैवातपस्विनम् ॥ १७ ॥ न तो दान न देनेवाले कंजूसको धन मिलता है, न नपुंसकको, न अकर्मण्यको, न कामसे जी चुरानेवालेको, न शौर्यहीनको और न तपस्या न करनेवालेको ही मिलता है ॥ १७ ॥ येन लोकास्त्रयः सृष्टा दैत्याः सर्वाश्च देवताः । स एष भगवान् विष्णुः समुद्रे तप्यते तपः ॥ १८ ॥ जिन्होंने तीनों लोकों, दैत्यों तथा सम्पूर्ण देवताओंकी भी सृष्टि की है, वे ही ये भगवान् विष्णु समुद्रमें रहकर तपस्या करते हैं ॥ १८ ॥ स्वं चेत् कर्मफलं न स्यात् सर्वमेवाफलं भवेत् । लोको दैवं समालक्ष्य उदासीनो भवेन्ननु ॥ १९ ॥ यदि अपने कर्मोंका फल न प्राप्त हो तो सारा कर्म ही निष्फल हो जाय और सब लोग भाग्यको ही देखते हुए कर्म करनेसे उदासीन हो जायँ ॥ १९ ॥ अकृत्वा मानुषं कर्म यो दैवमनुवर्तते । वृथा श्राम्यति सम्प्राप्य पतिं क्लीबमिवाङ्गना ॥ २० ॥ मनुष्यके योग्य कर्म न करके जो पुरुष केवल दैवका अनुसरण करता है वह दैवका आश्रय लेकर व्यर्थ ही कष्ट उठाता है। जैसे कोई स्त्री अपने नपुंसक पतिको पाकर भी कष्ट ही भोगती है ॥ २० ॥ न तथा मानुषे लोके भयमस्ति शुभाशुभे ।

तथा त्रिदशलोके हि भयमल्पेन जायते ॥ २१ ॥
इस मनुष्यलोकमें शुभाशुभ कर्मोंसे उतना भय नहीं प्राप्त होता, जितना कि देवलोकमें थोड़े ही पापसे भय होता है ॥ २१ ॥
कृतः पुरुषकारस्तु दैवमेवानुवर्तते ।
न दैवमकृते किंचित् कस्यचिद् दातुमर्हति ॥ २२ ॥
किया हुआ पुरुषार्थ ही दैवका अनुसरण करता है; परंतु पुरुषार्थ न करनेपर दैव किसीको कुछ नहीं दे सकता ॥ २२ ॥
यथा स्थानान्यनित्यानि दृश्यन्ते दैवतेष्वपि ।
कथं कर्म विना दैवं स्थास्यति स्थापयिष्यति ॥ २३ ॥
देवताओंमें भी जो इन्द्रादिके स्थान हैं वे अनित्य देखे जाते हैं। पुण्यकर्मके बिना दैव कैसे स्थिर रहेगा और कैसे वह दूसरोंको स्थिर रख सकेगा ॥ २३ ॥
न दैवतानि लोकेऽस्मिन् व्यापारं यान्ति कस्यचित् ।
व्यासङ्गं जनयन्त्युग्रमात्माभिभवशङ्कया ॥ २४ ॥
देवता भी इस लोकमें किसीके पुण्यकर्मका अनुमोदन नहीं करते हैं, अपितु अपनी पराजयकी आशंकासे वे पुण्यात्मा पुरुषमें भयंकर आसक्ति पैदा कर देते हैं (जिससे उनके धर्ममें विघ्न उपस्थित हो जाय) ॥ २४ ॥
ऋषीणां देवतानां च सदा भवति विग्रहः ।
कस्य वाचा ह्यदैवं स्याद् यतो दैवं प्रवर्तते ॥ २५ ॥
ऋषियों और देवताओंमें सदा कलह होता रहता है (देवता ऋषियोंकी तपस्यामें विघ्न डालते हैं तथा ऋषि अपने तपोबलसे देवताओंको स्थानभ्रष्ट कर देते हैं।) फिर भी दैवके बिना केवल कथन मात्रसे किसको सुख या दुःख मिल सकता है? क्योंकि कर्मके मूलमें दैवका ही हाथ है ॥ २५ ॥
कथं तस्य समुत्पत्तिर्यतो दैवं प्रवर्तते ।
एवं त्रिदशलोकेऽपि प्राप्यन्ते बहवो गुणाः ॥ २६ ॥
दैवके बिना पुरुषार्थकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है? क्योंकि प्रवृत्तिका मूल कारण दैव ही है (जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्यकर्म किये हैं, वे ही दूसरे जन्ममें भी पूर्वसंस्कारवश पुण्यमें प्रवृत्त होते हैं। यदि ऐसा न हो तो सभी पुण्यकर्मोंमें ही लग जायँ)। देवलोकमें भी दैववश ही बहुत-से गुण (सुखद साधन) उपलब्ध होते हैं ॥ २६ ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी कृतस्याप्यकृतस्य च ॥ २७ ॥
आत्मा ही अपना बन्धु है, आत्मा ही अपना शत्रु है तथा आत्मा ही अपने कर्म और अकर्मका साक्षी है ॥ २७ ॥
कृतं चाप्यकृतं किंचित् कृते कर्मणि सिद्ध्यति ।

सुकृतं दुष्कृतं कर्म न यथार्थं प्रपद्यते ॥ २८ ॥ प्रबल पुरुषार्थ करनेसे पहलेका किया हुआ भी कोई कर्म बिना किया हुआ-सा हो जाता है और वह प्रबल कर्म ही सिद्ध होकर फल प्रदान करता है। इस तरह पुण्य या पापकर्म अपने यथार्थ फलको नहीं दे पाते हैं ॥ २८ ॥

देवानां शरणं पुण्यं सर्वं पुण्यैरवाप्यते । पुण्यशीलं नरं प्राप्य किं दैवं प्रकरिष्यति ॥ २९ ॥ देवताओंका आश्रय पुण्य ही है। पुण्यसे ही सब कुछ प्राप्त होता है। पुण्यात्मा पुरुषको पाकर दैव क्या करेगा? ॥ २९ ॥

पुरा ययातिर्विभ्रष्टश्च्यावितः पतितः क्षितौ । पुनरारोपितः स्वर्गं दौहित्रैः पुण्यकर्मभिः ॥ ३० ॥ पूर्वकालमें राजा ययाति पुण्य क्षीण होनेपर स्वर्गसे च्युत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े थे; परंतु उनके पुण्यकर्मा दौहित्रोंने उन्हें पुनः स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया ॥ ३० ॥

पुरूरवाश्च राजर्षिर्द्विजैरभिहितः पुरा । ऐल इत्यभिविख्यातः स्वर्गं प्राप्तो महीपतिः ॥ ३१ ॥ इसी तरह पूर्वकालमें ऐल नामसे विख्यात राजर्षि पुरूरवा ब्राह्मणोंके आशीर्वाद देनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त हुए थे ॥ ३१ ॥

अश्वमेधादिभिर्यज्ञैः सत्कृतः कोसलाधिपः । महर्षिशापात् सौदासः पुरुषादत्वमागतः ॥ ३२ ॥ (अब इसके विपरीत दृष्टान्त देते हैं—) अश्वमेध आदि यज्ञोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी कोशलनरेश सौदासको महर्षि वसिष्ठके शापसे नरभक्षी राक्षस होना पड़ा ॥ ३२ ॥

अश्वत्थामा च रामश्च मुनिपुत्रौ धनुर्धरौ । न गच्छतः स्वर्गलोकं सुकृतेनेह कर्मणा ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार अश्वत्थामा और परशुराम—ये दोनों ही ऋषिपुत्र और धनुर्धर वीर हैं। इन दोनोंने पुण्यकर्म भी किये हैं तथापि उस कर्मके प्रभावसे स्वर्गमें नहीं गये ॥ ३३ ॥

वसुर्यज्ञशतैरिष्ट्वा द्वितीय इव वासवः । मिथ्याभिधानेनैकेन रसातलतलं गतः ॥ ३४ ॥ द्वितीय इन्द्रके समान सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी राजा वसु एक ही मिथ्या भाषणके दोषसे रसातलको चले गये ॥ ३४ ॥

बलिवैरोचनिर्बद्धो धर्मपाशेन दैवतैः । विष्णोः पुरुषकारेण पातालसदनः कृतः ॥ ३५ ॥ विरोचनकुमार बलिको देवताओंने धर्मपाशसे बाँध लिया और भगवान् विष्णुके पुरुषार्थसे वे पातालवासी बना दिये गये ॥ ३५ ॥

शक्रस्योद्गम्य चरणं प्रस्थितो जनमेजयः ।

द्विजस्त्रीणां वधं कृत्वा किं दैवेन न वारितः ॥ ३६ ॥ राजा जनमेजय द्विज स्त्रियोंका वध करके इन्द्रके चरणका आश्रय ले जब स्वर्गलोकको प्रस्थित हुए, उस समय दैवने उसे आकर क्यों नहीं रोका ॥ ३६ ॥ अज्ञानाद् ब्राह्मणं हत्वा स्पृष्टो बालवधेन च । वैशम्पायनविप्रर्षिः किं दैवेन न वारितः ॥ ३७ ॥ ब्रह्मर्षि वैशम्पायन अज्ञानवश ब्राह्मणकी हत्या करके बाल-वधके पापसे भी लिप्त हो गये थे तो भी दैवने उन्हें स्वर्ग जानेसे क्यों नहीं रोका ॥ ३७ ॥ गोप्रदानेन मिथ्या च ब्राह्मणेभ्यो महामखे । पुरा नृगश्च राजर्षिः कृकलासत्वमागतः ॥ ३८ ॥ पूर्वकालमें राजर्षि नृग बड़े दानी थे। एक बार किसी महायज्ञमें ब्राह्मणोंको गोदान करते समय उनसे भूल हो गयी; अर्थात् एक गऊको दुबारा दानमें दे दिया, जिसके कारण उन्हें गिरगिटकी योनिमें जाना पड़ा ॥ ३८ ॥ धुन्धुमारश्च राजर्षिः सत्रेष्वेव जरां गतः । प्रीतिदायं परित्यज्य सुष्वाप स गिरिव्रजे ॥ ३९ ॥ राजर्षि धुन्धुमार यज्ञ करते-करते बूढ़े हो गये तथापि देवताओंके प्रसन्नतापूर्वक दिये हुए वरदानको त्यागकर गिरिव्रजमें सो गये (यज्ञका फल नहीं पा सके) ॥ पाण्डवानां हृतं राज्यं धार्तराष्ट्रैर्महाबलैः । पुनः प्रत्याहृतं चैव न दैवाद् भुजसंश्रयात् ॥ ४० ॥ महाबली धृतराष्ट्र-पुत्रोंने पाण्डवोंका राज्य हड़प लिया था। उसे पाण्डवोंने पुनः बाहुबलसे ही वापस लिया। दैवके भरोसे नहीं ॥ ४० ॥ तपोनियमसंयुक्ता मुनयः संशितव्रताः । किं ते दैवबलात् शापमुत्सृजन्ते न कर्मणा ॥ ४१ ॥ तप और नियममें संयुक्त रहकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि क्या दैवबलसे ही किसीको शाप देते हैं, पुरुषार्थके बलसे नहीं? ॥ ४१ ॥ पापमुत्सृजते लोके सर्वं प्राप्य सुदुर्लभम् । लोभमोहसमापन्नं न दैवं त्रायते नरम् ॥ ४२ ॥ संसारमें समस्त सुदुर्लभ सुख-भोग किसी पापीको प्राप्त हो जाय तो भी वह उसके पास टिकता नहीं, शीघ्र ही उसे छोड़कर चल देता है। जो मनुष्य लोभ और मोहमें डूबा हुआ है उसे दैव भी संकटसे नहीं बचा सकता ॥ यथाग्निः पवनोद्धूतः सुसूक्ष्मोऽपि महान् भवेत् । तथा कर्मसमायुक्तं दैवं साधु विवर्धते ॥ ४३ ॥ जैसे थोड़ी-सी भी आग वायुका सहारा पाकर बहुत बड़ी हो जाती है, उसी प्रकार पुरुषार्थका सहारा पाकर दैवका बल विशेष बढ़ जाता है ॥ ४३ ॥

यथा तैलक्षयाद् दीपः प्रह्रासमुपगच्छति ।
तथा कर्मक्षयाद् दैवं प्रह्रासमुपगच्छति ॥ ४४ ॥
जैसे तेल समाप्त हो जानेसे दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार कर्मके क्षीण हो जानेपर दैव भी नष्ट हो जाता है ॥ ४४ ॥

विपुलमपि धनौघं प्राप्य भोगान् स्त्रियो वा
पुरुष इह न शक्तः कर्महीनो हि भोक्तुम् ।
सुनिहितमपि चार्थं दैवतै रक्ष्यमाणं
पुरुष इह महात्मा प्राप्नुते नित्ययुक्तः ॥ ४५ ॥
उद्योगहीन मनुष्य धनका बहुत बड़ा भण्डार, तरह-तरहके भोग और स्त्रियोंको पाकर भी उनका उपभोग नहीं कर सकता; किंतु सदा उद्योगमें लगा रहनेवाला महामनस्वी पुरुष देवताओंद्वारा सुरक्षित तथा गाड़कर रखे हुए धनको भी प्राप्त कर लेता है ॥ ४५ ॥

व्ययगुणमपि साधुं कर्मणा संश्रयन्ते
भवति मनुजलोकाद् देवलोको विशिष्टः ।
बहुतरसुसमृद्ध्या मानुषाणां गृहाणि
पितृवनभवनाभं दृश्यते चामराणाम् ॥ ४६ ॥
जो दान करनेके कारण निर्धन हो गया है, ऐसे सत्पुरुषके पास उसके सत्कर्मके कारण देवता भी पहुँचते हैं और इस प्रकार उसका घर मनुष्यलोककी अपेक्षा श्रेष्ठ देवलोक-सा हो जाता है। परंतु जहाँ दान नहीं होता वह घर बड़ी भारी समृद्धिसे भरा हो तो भी देवताओंकी दृष्टिमें वह श्मशानके ही तुल्य जान पड़ता है ॥ ४६ ॥

न च फलति विकर्मा जीवलोके न दैवं
व्यपनयति विमार्गं नास्ति दैवे प्रभुत्वम् ।
गुरुमिव कृतमग्रयं कर्म संयाति दैवं
नयति पुरुषकारः संचितस्तत्र तत्र ॥ ४७ ॥
इस जीव-जगत्में उद्योगहीन मनुष्य कभी फूलता-फलता नहीं दिखायी देता। दैवमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह उसे कुमार्गसे हटाकर सन्मार्गमें लगा दे। जैसे शिष्य गुरुको आगे करके चलता है उसी तरह दैव पुरुषार्थको ही आगे करके स्वयं उसके पीछे चलता है। संचित किया हुआ पुरुषार्थ ही दैवको जहाँ चाहता है, वहाँ-वहाँ ले जाता है ॥ ४७ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं मया वै मुनिसत्तम ।
फलं पुरुषकारस्य सदा संदृश्य तत्त्वतः ॥ ४८ ॥
मुनिश्रेष्ठ! मैंने सदा पुरुषार्थके ही फलको प्रत्यक्ष देखकर यथार्थरूपसे ये सारी बातें तुम्हें बतायी हैं ॥ ४८ ॥

अभ्युत्थानेन दैवस्य समारब्धेन कर्मणा ।
विधिना कर्मणा चैव स्वर्गमार्गमवाप्नुयात् ॥ ४९ ॥

मनुष्य दैवके उत्थानसे आरम्भ किये हुए पुरुषार्थसे उत्तम विधि और शास्त्रोक्त सत्कर्मसे ही स्वर्गलोकका मार्ग पा सकता है ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दैवपुरुषकारनिर्देशे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दैव और पुरुषार्थका निर्देशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५१ श्लोक हैं)

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सप्तमोऽध्यायः

कर्मोंके फलका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

कर्मणां च समस्तानां शुभानां भरतर्षभ ।
फलानि महतां श्रेष्ठ प्रब्रूहि परिपृच्छतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महापुरुषोंमें प्रधान भरतश्रेष्ठ! अब मैं समस्त शुभ कर्मोंके फल क्या हैं? यह पूछ रहा हूँ, अतः यही बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां पृच्छसि भारत ।
रहस्यं यदृषीणां तु तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ।
या गतिः प्राप्यते येन प्रेत्यभावे चिरेप्सिता ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, यह ऋषियोंके लिये भी रहस्यका विषय है; किंतु मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। सुनो, मरनेके बाद जिस मनुष्यको जैसी चिर अभिलषित गति मिलती है, उसका भी वर्णन करता हूँ ॥ २ ॥

येन येन शरीरेण यद् यत् कर्म करोति यः ।
तेन तेन शरीरेण तत् तत् फलमुपाश्नुते ॥ ३ ॥
मनुष्य जिस-जिस (स्थूल या सूक्ष्म) शरीरसे जो-जो कर्म करता है उसी-उसी शरीरसे उस-उस कर्मका फल भोगता है ॥ ३ ॥

यस्यां यस्यामवस्थायां यत् करोति शुभाशुभम् ।
तस्यां तस्यामवस्थायां भुङ्क्ते जन्मनि जन्मनि ॥ ४ ॥
जिस-जिस अवस्थामें वह जो-जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, प्रत्येक जन्मकी उसी-उसी अवस्थामें वह उसका फल भोगता है ॥ ४ ॥

न नश्यति कृतं कर्म सदा पञ्चेन्द्रियैरिह ।
ते ह्यस्य साक्षिणो नित्यं षष्ठ आत्मा तथैव च ॥ ५ ॥
पाँचों इन्द्रियोंद्वारा किया हुआ कर्म कभी नष्ट नहीं होता है। वे पाँचों इन्द्रियाँ और छठा मन—ये उस कर्मके साक्षी होते हैं ॥ ५ ॥

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् ।
अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ॥ ६ ॥
अतः मनुष्यको उचित है कि यदि कोई अतिथि घरपर आ जाय तो उसको प्रसन्न दृष्टिसे देखे। उसकी सेवामें मन लगावे। मीठी बोली बोलकर उसे संतुष्ट करे। जब वह जाने लगे तो

उसके पीछे-पीछे कुछ दूरतक जाय और जबतक वह रहे उसके स्वागत-सत्कारमें लगा रहे—ये पाँच काम करना गृहस्थके लिये पाँच प्रकारकी दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञ कहलाता है॥ ६॥ यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते।
श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्॥ ७॥
जो थके-माँदे अपरिचित पथिकको प्रसन्नतापूर्वक अन्न दान करता है, उसे महान् पुण्यफलकी प्राप्ति होती है॥ ७॥
स्थण्डिलेषु शयानानां गृहाणि शयनानि च।
चीरवल्कलसंवीते वासांस्याभरणानि च॥ ८॥
जो वानप्रस्थी वेदीपर शयन करते हैं उन्हें जन्मान्तरमें उत्तम गृह और शय्याकी प्राप्ति होती है। जो चीर और वल्कल वस्त्र पहनते हैं उन्हें दूसरे जन्ममें उत्तम वस्त्र और उत्तम आभूषणोंकी प्राप्ति होती है॥ ८॥
वाहनानि च यानानि योगात्मनि तपोधने।
अग्नीनुपशयानस्य राज्ञः पौरुषमेव च॥ ९॥
जिसका चित्त योगयुक्त होता है उस तपोधन पुरुषको दूसरे जन्ममें अच्छे-अच्छे वाहन और यान उपलब्ध होते हैं तथा अग्निकी उपासना करनेवाले राजाको जन्मान्तरमें पौरुषकी प्राप्ति होती है॥ ९॥
रसानां प्रतिसंहारे सौभाग्यमनुगच्छति।
आमिषप्रतिसंहारे पशून् पुत्रांश्च विन्दति॥ १०॥
रसोंका परित्याग करनेसे सौभाग्यकी और मांसका त्याग करनेसे पशुओं तथा पुत्रोंकी प्राप्ति होती है॥ १०॥
अवाक्शिरास्तु यो लम्बेदुदवासं च यो वसेत्।
सततं चैकशायी यः स लभेतेप्सितां गतिम्॥ ११॥
जो तपस्वी नीचे सिर करके लटकता है अथवा जलमें निवास करता है; तथा जो सदा ही अकेला सोता (ब्रह्मचर्यका पालन करता) है, वह मनोवांछित गतिको प्राप्त होता है॥ ११॥
पाद्यमासनमेवाथ दीपमन्नं प्रतिश्रयम्।
दद्यादतिथिपूजार्थं स यज्ञः पञ्चदक्षिणः॥ १२॥
जो अतिथिको पैर धोनेके लिये जल, बैठनेके लिये आसन, प्रकाशके लिये दीपक, खानेके लिये अन्न और ठहरनेके लिये घर देता है, इस प्रकार अतिथिका सत्कार करनेके लिये इन पाँच वस्तुओंका दान ‘पंचदक्षिण यज्ञ’ कहलाता है॥ १२॥
वीरासनं वीरशय्यां वीरस्थानमुपागतः।
अक्षयास्तस्य वै लोकाः सर्वकामगमास्तथा॥ १३॥