मानमेयोदय (नारायण भट्ट - भाट्ट मीमांसा प्रमाण एवं प्रमेय शास्त्र सटीक)
Manameyodaya of Narayana Bhatta with Commentary
नारायण भट्ट एवं नारायण पण्डित द्वारा
xxxiv \qquad\qquad आकरग्रन्थसंकेतः पुट. \quad पङ्क्ति. \quad सङ्केताः \qquad\qquad\quad\mid\quad पुट. \quad पङ्क्ति. \quad सङ्केताः ३२१ \quad १ \quad आप. ध. व्या १-१-२ \quad\mid\quad ३४५ \quad १९ \quad न्या. सू २-१-२८ ३२१ \quad १७ \quad श्लोक. ९१ \qquad\qquad\mid\quad ३४६ \quad ३ \quad न्या. म ४३२ ३२२ \quad ३ \quad न्या. सि १ परि \qquad\quad\mid\quad ३४६ \quad ५ \quad न्या र १७६ ३२२ \quad १३ \quad न्या. म १०५ \qquad\qquad\mid\quad ३४७ \quad ७ \quad ,, \qquad ५९० ३२४ \quad १ \quad स. सि ३-२ \qquad\qquad\mid\quad ३४७ \quad ९ \quad ,, \qquad ५९२ ३२४ \quad ३ \quad ,, \qquad ३-७६ \qquad\mid\quad ३४७ \quad १३ \quad श्लोक. १६९ ३२४ \quad ६ \quad न्या. म १०८ \qquad\qquad\mid\quad ३४७ \quad १७ \quad वा. प १-१२४ ३२४ \quad १० \quad स. सि ४-११६ \qquad\quad\mid\quad ३४८ \quad ७ \quad न्या. सू १-१-४ ३२५ \quad १९ \quad स. सं ३ द \qquad\qquad\mid\quad ३४९ \quad १ \quad सि. मु १३५ का ३२६ \quad ३ \quad भ. गी ४-३८ \qquad\qquad\mid\quad ३४९ \quad ३ \quad वि. वि ११४ ३२६ \quad ७ \quad भा. भा १२३ \qquad\qquad\mid\quad ३४९ \quad ११ \quad त कौ २७ का ३२६ \quad १९ \quad वै. भाष्यम्. \qquad\qquad\mid\quad ३५० \quad १ \quad न्या. र ५७८ ३२७ \quad ३ \quad न्या. म ५३६ \qquad\qquad\mid\quad ३५० \quad ७ \quad श्लोक १७३ ३२९ \quad ५ \quad न्या. र २६४ \qquad\qquad\mid\quad ३५२ \quad १ \quad वे. सं ४९ ३३३ \quad ३ \quad त. कौ ११ का \qquad\quad\mid\quad ३५२ \quad १९ \quad न्यायबिन्दुटीका ३३३ \quad ६ \quad न्या. ता १४६ \qquad\qquad\mid\quad ३५४ \quad ७ \quad मानमेयोदयः ३३३ \quad १३ \quad श्लोक. २९२ \qquad\qquad\mid\quad ३५४ \quad ११ \quad प्र. क ५ प्र ३३४ \quad १ \quad ,, \qquad २८५ \qquad\mid\quad ३५६ \quad ५ \quad न्या. म ६४ ३३६ \quad १९ \quad स. सि ४२० \qquad\qquad\mid\quad ३५६ \quad १५ \quad न्या. र ७५९ ३३८ \quad १९ \quad न्या. म ४४८ \qquad\qquad\mid\quad ३५८ \quad ७ \quad श्लोक. ७७५ ३४० \quad ७ \quad ,, \qquad ४५३ \qquad\mid\quad ३५९ \quad १६ \quad श्लोक. ४१३ ३४१ \quad ११ \quad श्लोक. ८४१ \qquad\qquad\mid\quad ३६० \quad १ \quad स. सि ४-४१ ३४३ \quad १ \quad न्या. सू ३-१-१९ \qquad\mid\quad ३६२ \quad ५ \quad प्र. त ३-९ ३४३ \quad ९ \quad स. सि १-२६ \qquad\qquad\mid\quad ३६२ \quad ७ \quad स. सि ४-५८ ३४३ \quad १७ \quad न्या. कु १ स्त \qquad\quad\mid\quad ३६३ \quad ९ \quad न्या. म १२४ २४३ \quad १९ \quad न्या. सि १ परि \qquad\quad\mid\quad ३६४ \quad ७ \quad न्या र ४८८ ३४४ \quad ९ \quad तन्त्र. ८१ \qquad\qquad\mid\quad ३६४ \quad ९ \quad न्या. त १०५ ३४४ \quad १३ \quad न्या. सू ४-२-२९ \qquad\mid\quad ३६६ \quad २ \quad स. सं २ द्. ३४५ \quad ७ \quad न्या. म ९२ \qquad\qquad\mid\quad ३६६ \quad ५ \quad न्या. कु. १ स्त ३४५ \quad १५ \quad प्रक. ५ प्र \qquad\qquad\mid\quad ३६६ \quad १५ \quad न्या. र ३९६
आकरग्रन्थसङ्केतः पुट. | पङ्कि. | सङ्केताः | पुट. | पङ्कि. | सङ्केताः 367 | 7 | न्या. र 402 | 383 | 16 | तत्त्वचिन्तामणि 368 | 7 | न्या. म 33 | 384 | 7 | न्या. म 122 368 | 9 | न्या. र 250 | 384 | 10 | न्या. मा 57 369 | 2 | न्यायक 167 | 384 | 11 | श्लोक 348 369 | 11 | स. सि 4-42 | 385 | 5 | न्या. मा 122 370 | 5 | न्या. म 109 | 385 | 17 | श्लोक 381 371 | 3 | सि. मु 136 ता. | 386 | 3 | न्या. मा 56 371 | 19 | श्लोक 359 | 386 | 13 | प्र. त 3-38 372 | 11 | स. सि 4-43 | 386 | 18 | न्या. म 111 374 | 8 | ,, 4-44 | 387 | 3 | न्या. र 387 374 | 15 | न्यायपरिशुद्धिः | 387 | 14 | श्लोक 585 375 | 13 | प्र. त 3-11 | 389 | 7 | न्यायपरि 79 375 | 14 | ,, 2-1 | 389 | 18 | स. सि 4-53 376 | 2 | न्यायपरि | 390 | 17 | तत्त्वमुक्ता 4-51 376 | 10 | न्या. र 402 | 391 | 2 | स सि 4-49 376 | 20 | प्र. त 13 | 391 | 15 | न्या. वा 120 377 | 7 | न्यायपरि 150 | 392 | 20 | न्या. म 118 377 | 17 | न्यायबिन्दुः | 393 | 3 | ,, 123 377 | 19 | न्या. र 377 | 394 | 3 | वैशेषिकभाष्यम् 378 | 8 | किर 143 | 394 | 6 | न्या. भा 1-1-32 378 | 11 | न्या. ता 109 | 395 | 8 | न्या. म 584 378 | 13 | वैशेषिकभाष्यम् | 395 | 11 | मानमेयोदयः 378 | 15 | न्या. सू 1-1-5 | 396 | 1 | प्र. त 3-9 379 | 5 | वै. सू 3-2-7 | 396 | 5 | ,, 3-13 380 | 1 | श्लोक 392 | 396 | 15 | ,, 3-42 381 | 9 | न्या. म 133 | 397 | 9 | न्या. र 250 381 | 15 | न्यायपरि 80 | 397 | 17 | ,, 258 382 | 7 | शा. भा 1-1-2 | 398 | 5 | श्लोक 260 382 | 10 | न्या. सू 2-1-8 | 398 | 11 | ब्र. सू. शं 2-1-1 383 | 7 | न्या. र 388 | 399 | 12 | मानमेय 305
xxxvi आकारग्रन्थसंकेताः पुट. पङ्कि. संकेताः | पुट. पङ्कि. संकेताः 399 13 वैशेषिकभाष्यम् | 419 7 श्लोक 488 400 1 सि. मु 71 का. | 419 13 न्याः र 482 400 13 प्र. त 6-47 | 419 17 श्लोक 197 401 3 स. सं 2 द् | 420 1 न्या. र 483 401 5 न्यायप 167 | 422 3 प्र. क 9 प्र. 401 8 न्या. कु 3 स्त. | 422 5 न्या. र 588 402 18 शास्त्रदी 1-1-5 | 422 17 ,, 941 403 5 श्लोक. 375 | 423 5 ,, 410 403 20 न्यायप. 175 | 423 7 ,, 562 404 5 न्या. म 590 | 424 5 श्लोक. 410 405 10 शतदू. 9 | 424 7 ,, 432 405 11 स सि 4-63 | 424 11 न्या. र 503 407 9 न्या. ता 499 | 425 10 मानमेय 411 408 11 श्लोक 433 | 427 17 सं. वा 500 श्लो 409 7 न्या. भा 1-1-6 | 427 20 न्या. र 402 409 17 न्या र 435 | 428 1 श्लोक. 418 409 19 न्या. कु 3 स्त | 428 8 न्याः कु 3 स्त 410 4 श्लोक. 433 | 428 19 श्लोक. 913 411 9 न्या. म 245 | 429 5 ध्वन्या 200 411 12 श्लोक. 680 | 430 12 मानमेयोदयः 411 17 वै. सू 7-2-20 | 430 17 मानमेय 110 412 3 श्लोक 450 | 431 7 न्या. कु 2 स्त 413 1 प्रक 5 प्र. | 431 9 न्या. र 909 413 19 न्या. कु. 3 स्त | 432 3 ,, 367 414 5 श्लोक 463 | 432 9 काव्यप्रकाशसं 2 415 3 पा. सू 1-4-36 | 433 2 मानमेय 519 415 7 श्लोक 49 | 433 11 न्या. सि 6 परि 415 11 ,, 475 | 434 9 स. सि 4-81 417 5 न्या. कु 3 स्त | 435 3 श्लोक. 924 418 1 न्या. र 486 | 435 6 शब्दशक्तिप्रका
आकरग्रन्थसङ्केतः पुट. पङ्क्ति सङ्केताः | पुट. पङ्क्ति सङ्केताः 436 1 वा. प 1-134 | 458 1 न्या. ता 42 436 7 तन्त्र 199 | 458 8 तन्त्र 80 437 8 स्तोत्ररक्षा 4 श्लो. | 458 15 जै. मा 12 437 9 तन्त्र 233 | 460 7 प्रक. अतिदेशपार 438 1 ,, 157 | 463 6 तन्त्र 731 438 5 ,, 429 | 463 11 न्यायसु 3-3-14 438 11 ,, 535 | 463 13 बालप्रकाशः 441 17 ऋक्संहिता 10-71-3 | 463 19 न्या. म 589 441 18 मनु 2-1 | 465 10 बालप्रकाशः 442 2 तन्त्र 132 | 469 12 सुधीविलोचनम् 442 12 स. सि 4-113 | 470 9 वि. वि 450 443 15 तन्त्र 115 | 485 6 तन्त्र 337 444 19 श्लोक 59 | 487 5 वै. सू. वृ 5-1-1 445 19 तन्त्र 170 | 487 19 न्या. सू 3-1-25 446 10 स. सं 2 दृ | 488 19 न्यायसु 26 446 18 न्या. कु 1 स्त | 489 4 वि. वि 243 449 20 आप-परिभाषा | 489 7 न्या. सू 1-1-24 450 15 स. सि 594 | 489 15 न्या. कु 5 स्त 451 7 स्मृतिचन्द्रिका | 490 3 वा. प 2-1 452 11 आगमप्रामाण्यम् | 490 17 ,, 2-30 452 20 न्यायपरिशुद्धिः | 491 3 रघुवं 1-1 453 15 श्रुत. अथशब्दार्थः | 491 19 वा. प 2-145 454 14 न्यायसुधा 183 | 492 1 ,, 2-30 455 4 न्या. भा 4-1-62 | 494 7 ,, 2-57 455 8 ब्र. सू 2-1-1 | 494 11 न्या. म 330 455 14 न्या. भा 1-1-1 | 495 15 तन्त्र 345 455 18 मनु 7-43 | 496 7 पा. भा 4-20 456 3 न्यायपरिशुद्धिः | 497 11 तन्त्र 351 456 11 प. म 15 भ. | 498 5 ,, 345 457 7 श्लोक 209 | 498 8 न्यायसु 579
xxxviii आकरग्रन्थसंकेताः पृट. पङ्क्ति सङ्केताः | पृट. पङ्क्ति सङ्केताः 499 5 भाट्टररहस्यम् | 526 12 रामा 7-74 499 15 वि. चि 48 | 526 16 हेमा 661 499 17 न्या. म 345 | 526 19 गौ. ध 3-36 501 3 तन्त्र 240 | 527 1 ब्र. सू 3-4-18 502 7 जै. सू 6-2-9 | 527 10 मनु 4-176 503 1 भगी 4-1 | 527 12 प. म 6 भ. 503 7 प्रक. वाक्यार्थमातृका | 528 3 भ. गी 16-21 507 11 वादावलिः | 528 5 बृ. उ 7-2 508 5 तात्पर्यदी 215 | 528 13 न्या. ता 97 508 11 श्लोक 930 | 528 17 संबन्ध. 1008 श्लो 511 5 याज्ञ 3-219 | 529 3 रामा 2-105 511 13 न्या. सु 603 | 531 3 गौ. का 2-29 512 2 न्या. सू 3-1-25 | 531 10 तै. उ 4-10 512 16 न्या. म 356 | 531 12 मनु. 2-94 513 17 तन्त्र 240 | 531 18 श्वेता. 4 अ. 514 14 न्या. सू 1-1-24 | 531 19 तै. सं 6-3-10 515 14 न्या. कु 5 स्त. | 531 20 गौ. ध 3-36 515 17 वे. सं 214 | 532 7 वे. सं 248 516 10 अधिकर 20 श्लो. | 532 15 स. सि 2-75 519 9 न्या. म 395 | 533 2 न्या. सि 2 परि. 519 18 स. सि 4-91 | 533 13 न्यायपरिशुद्धिः 520 8 श्लो. क 432 | 534 9 तै. उ. शं 1-1 521 1 न्या. र 909 | 534 11 किर. 8 521 17 न्या. म 401 | 534 14 तन्त्र. 241 523 4 मनु 2-224 | 534 14 प्रक. 8 प्र. 523 10 भारत 18-6 | 537 15 न्या. भा 4-1-63 524 9 विष्णु 1-18 | 540 7 प्रश्नो. शं 6-3 524 14 तन्त्र 16 | 540 11 स. सं 6 दृ. 525 10 वे. सं 199 | 541 4 श्लोक. 695 525 18 भ. गी 17-11 | 541 6 तन्त्र. 375
आकरग्रन्थसङ्केतः xxx पृष्ट. पङ्क्ति. सङ्केताः | पृष्ट. पङ्क्ति. सङ्केताः 541 13 संवित्सिद्धिः | 552 7 भा. भा 175 542 17 स. सि 2-17 | 552 15 वि. वि 440 542 20 न्या. कु 1 स्त. | 553 11 जै. सू 6-2-9 543 5 श्लोक. 696 | 554 1 याज्ञ. 1-123 544 7 ,, 105 | 554 2 मनु. 11-16 544 13 श्रीभा. 2-2-3 | 554 7 न्या. मा 193 545 1 श्लोक. 667 | 554 13 श्लोक 671 545 9 पा. भा 2-22 | 555 10 न्या. कु 1 स्त 545 13 न्यायक. 270 | 555 17 स. सं 3 द. 545 17 वै. भा गुणभागः | 557 11 याज्ञ. 3-113 546 5 न्यायसु. 330 | 559 13 स. सि 1-4 546 13 श्लोक. 671 | 560 16 सिद्धान्तलेशः 546 17 पा. भा 2-13 | 562 11 स. सि 4-18 547 5 न्या. म 520 | 563 11 शतदू. 7 स. 547 10 भ. गी 18-66 | 565 9 तात्पर्यदी. 2-3 547 12 ब्र. सू 4-1-7 | 565 5 वे. सं 248 548 4 संबन्ध. 117 | 565 9 काव्यालंका 2-2-2 548 15 न्या. सु 330 | 567 1 आगमप्रामाण्यम् 548 19 तै. उ शं 1-1 | 568 15 श्रीभा. 2-2-42 549 5 मु. उ 1-2 | 569 12 श्रीभाष्यारम्भे 549 6 भ. गी. 2-42 | 569 16 अधिकरण 15 श्लो 549 10 किर 12 | 571 1 ब्र. सू. 4-4-22 549 17 संबन्ध 238 श्लो. | 571 3 ,, 2-3-46 549 19 ब्र. सू 3-4-2 | 571 5 ,, 1-3-22 550 3 संबन्ध. 1133 श्लो. | 571 8 भ. गी. शं. 13-4 550 5 ,, 345 श्लो. | 571 13 ब्र. सू. 1-1-1 550 9 बृ. उ 6-4 | 572 3 भामत्यारम्भे 550 11 सिद्धान्तलेशसंग्रहः | 572 8 तत्त्वटीका 551 11 भा. भा 207 | 573 12 नैष्कर्म्य 90 श्लो. 552 1 श्रीभा. 1-1-4 | 574 11 स. सि 3-79
xi आकारग्रन्थसंकेताः पुट. पङ्क्ति. सङ्केताः | पुट. पङ्क्ति. सङ्केताः 575 11 वे. सं 170 | 593 13 स. सि 2-42 575 19 छान्दो 8-1-1 | 594 1 भ. गी 9 माध्यायः 576 19 तै. उ 4-50, 51 | 594 7 ,, 18-56 576 18 श्वेता 6-18 | 594 19 पाञ्चरात्ररक्षा 577 1 छान्दो 2-2-23 | 595 3 प्र. त 166 577 4 रहस्यत्रयसारः | 595 8 गौतमधर्ममस्करी 579 3 न्या. सि 2 प | 596 3 भ. गी भा व्या 18- 579 8 भ. गी 18-66 | 597 1 शा. भा 1-1-20 581 7 न्यासदशकम् | 597 1 ब्र. सू 4-4-5 581 9 न्या. म 507 | 598 9 पाणिनि 4-4-34 582 15 किर 12 | 598 19 मनु 12-9 584 7 दिनकरीयारम्भे | 599 2 श्रीभाष्य 584 13 तन्त्र 240 | 600 16 न्या. कु 1 स्त 586 7 श्लोक 669 | 602 3 तत्त्वचिन्ता मङ्गलव 586 11 ,, 667 | 603 8 श्रीभा महापूर्वपक्ष 586 13 ,, 670 | 603 14 श्लोक 362 587 9 तन्त्र 16 | 604 7 शतदू 11 भ 587 11 श्लोक 673 | 605 17 तै. ब्रा 3-12-9 589 20 शास्त्र-मोक्षवादः | 606 1 कठोप 2-8 590 1 जै. सू 6-1-2 | 606 3 ,, 6-12 590 6 ब्र. सू 1-3-33 | 606 7 ,, 2-9 590 7 बृ. उ 5-5 | 606 9 केनोप 4 590 13 स. सि 2-37 | 606 11 जै. सू 1-1-2 590 13 सिद्धान्तलेश 3 प. | 606 12 ब्र. सू 1-1-3 591 3 मुण्ड. शं 1-1-1 | 606 13 ,, 2-1-10 591 4 वेदान्तपरिभा. व्या | 606 15 वा. प 1-34 591 18 सिद्धान्तलेश 3 प. | 606 19 ,, 1-137 592 18 ब्र. सू. शं 3-4-50 | 607 1 ,, 2-316 593 5 छान्दो 8-15 | 607 3 ,, 1-139 593 7 बृ. उ 5-5 | 607 9 मनु. 12-106
आकरग्रन्थसङ्केतः XII [पृ]ट. पङ्कि. सङ्केतः | पुट. पङ्कि. सङ्केतः 607 11 मनु. 4-256 | 614 3 श्लोक. 75 607 13 स्मृतिचन्द्रिका | 614 5 ,, 88 608 1 न्या. सु 350 | 614 7 तन्त्र. 178 609 18 तन्त्र. 104 | 614 11 आ. ध-व्या 1-1-2 610 7 वा. प 2-119 | 615 16 प्र. चं 2-4 610 9 ,, 1-123 | 615 18 विष्णु. 3-18 610 11 ,, 2-149 | 619 1 स. सि 3-68 611 5 न्या. म 589 | 619 5 श्लोक. 202 612 11 वृ.-उ 4-4 | 619 9 ,, 331 612 13 स्मृतिचन्द्रिका | 622 5 मा. वृ 4 613 5 वा. प 2-140 | 622 9 त. टी 86 613 11 श्लोक. 520 | 628 17 रामा. 2-105 613 17 वा. प 2-143 | 628 18 भारत. शा 328
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॥ श्रीरस्तु ॥ मानमेय रहस्य श्लोकवार्तिक प्रारम्भः
प्रमेयकाण्डः. (1) पीठिका 1 शुद्धस्वाभाविकप्रज्ञाशक्तिकारुण्यभूषणम् । नमिकर्मीकरोम्यद्यं विद्यादेवं श्रियः पतिम् ॥ अभिवन्द्य महोदारामस्मद्गुरुपरंपरम् । किंचित् करोमि जगतां प्रज्ञाविभवतोऽधुना ॥ 2 यः श्रीलक्ष्मीपुरंश्रीनिवासार्यो विदुषां मणिः । यं जन्मना ब्रह्मणा च वेंकटस्वाम्यजीजनत् ॥ श्रीमान् रामानुजाचार्यो येन पौत्र्यजयत् क्षितौ श्रीमत्तिरुमलै नल्लान् वात्स्यवंशाब्धिचन्द्रमाः ॥ श्रीमत्कस्तूरिरङ्गेन्द्रविद्वद्रत्नकृपाभरः । सर्वतन्त्रस्वतन्त्रत्वं यस्मै प्रायच्छदव्ययम् ॥ पितृव्यस्स विरक्तश्रीरघूद्वहगुरुद्वहः । आत्मरक्षाभरं यस्मादादत्त करुणाकरः ॥ यस्य वृत्तिं प्रतिष्ठां चानन्यतुल्यामकल्पयत् । महीशूरमहीधुर्यतुर्यश्रीकृष्णभूपतिः ॥
२ मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके यस्मिन् लोकाः प्रसीदन्ति ताताम्बातपसां निधौ। स व्यातानीत् मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिकम् ॥ ३ शास्त्रेषु विस्तृतांशस्य गतार्थत्वान्न विस्तरः । सुखबोधाय सारांशः संक्षेपेण प्रदर्श्यते ॥ कुतो वा नूतनं वस्तु वयमुत्प्रेक्षितुं क्षमाः । वचोविन्यासवैचित्र्यमात्रमत्र विमृश्यताम् ॥ प्रायः प्रागनुभूतेषु सर्वेष्वपि च वस्तुषु । अपूर्वरचने तत्र तुष्यन्ति हि सुमानुषाः ॥ प्रज्ञाविवेकं लभते विभिन्नागमदर्शनैः । कियद्वा शक्यमुन्नेतुं स्वयत्नमनुधावता ॥ तत्तदुत्प्रेक्षमाणानां पुराणैरागमैर्विना । अनुपासितवृद्धानां विद्या नातिप्रसीदति ॥ संकेताद्वा वासनया तथा मीमांसयाऽपि वा । कस्मैचिद्रोचते किंचित् मध्यस्थमनसामपि ॥ सर्वसिद्धान्तसारार्थचिन्ताचातुर्यशालिनाम् । न कश्चिदपराधो नः निगूढार्थनिवेदनात् ॥ प्रकाश्यते च प्रायेण स्वाभिप्रायो निबन्धृभिः । अत्र त्वस्मदभिप्रायः सर्वाभिप्रायसंग्रहः ॥ प्रज्ञाप्रासादमारुह्य ह्यशोच्यः शोचतो जनान् । भूमिस्थानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥
शास्त्रारम्भः 4 मेयं मानाधीनमपि तदेवादौ निरूप्यते । प्रोपसर्गप्रयोगस्तु प्रमाभ्रमविवेकतः ॥ विज्ञानाद्वैतसिद्धान्ते प्रविवेको न कश्चन । तथाऽसत्ख्यातिसिद्धान्ते व्यवहारो ह्युपप्लवः ॥ मानाधीना मेयसिद्धिः मानसिद्धिश्च¹ लक्षणात् तल्लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिरितीर्यते ॥ ज्ञातं सम्यगसम्यग्वा यन्मोक्षाय भवाय वा । तत्प्रमेयमिहाभीष्टं न प्रमाणार्थमात्रकम् ॥ इति न्यायविदः प्राहुः प्रमाणपरिनिष्ठिताः । काणादास्तु पदार्थज्ञाः प्रमेयपरिनिष्ठिताः ॥ प्रमेयं च प्रमाणं च प्रयोजनमिति त्रिभिः । विभागैः प्रविभक्तोऽयं प्रबन्ध इति हि क्रमः ॥ (2) शास्त्रारम्भः. 1 विषयश्च फलं चैव संबन्धश्चाधिकार्यपि । प्रेक्षावतां प्रवृत्त्यङ्गमनुबन्धचतुष्टयम् ॥ अभिधेयादयश्शास्त्रे कथ्यन्ते प्रथमं बुधैः । न निश्चीयन्त एवैते कृत्स्नशास्त्रश्रुतेः पुरा ॥ प्रेक्षावतां प्रवृत्त्यङ्गं स्यात्तथाप्यर्थसंशयः । अनर्थसंशयो दृष्टः निवृत्त्यङ्गं परीक्षकैः ॥
4 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके 2 तेष्वनर्थेष्वशक्यानुष्ठानं प्रथममुच्यते । यथा च तक्षकमणिः ज्वरपीडां हरेदिति ॥ विफलं तु द्वितीयं स्यात् काकदन्तपरीक्षणम् । तृतीयं चानभिमतं जननीपाणिपीडनम् ॥ असंबद्धं तुरीयं स्यात् जरद्गववचो¹ यथा । संभावितेनाप्येकेन प्रवृत्तिः प्रतिबध्यते ॥ इति धार्मोत्तरं वर्त्म न्यायबिन्दुमुखे स्थितम् । न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकारम्भेऽपि सूचितम् ॥ व्यतिरेकदृशः केचित् केचिदन्वयदृष्टयः । प्राचीनाः प्रायशः पूर्वे पराचीनाः परे मताः ॥ ततोऽभिधेयसम्बन्धकथनं स्यादिहादितः । तच्चाभिधेयसम्बन्धसमर्थनमपीष्यते ॥ 3 प्रमाणनयतत्त्वाख्यालोकालंकारमूलके । रत्नाकरावतारेऽस्य निदानं विदितं यथा ॥ शास्त्रादावभिधेयार्थो दुर्निंरूपोऽभिधित्सितः । सोऽसंबद्धोऽथ संबद्धः नाद्यः प्रागेकवाक्यतः ॥ सर्वशास्त्रार्थसंदर्भगर्भाविर्भावसंभवात् । कृतं शास्त्रेण शेषेण बहलक्लेशकारिणा ॥ ¹ जरद्गवः कम्बलपादुकाभ्यां द्वारि स्थितो गायति मद्रकाणि । तं ब्राह्मणी पृच्छति पुत्रकामा राजन् रुमायां लवणस्य कोऽर्घः ॥
शास्त्रारम्भः 5 नान्त्यश्शब्दाभिसंबन्धे विकल्पानुपपत्तितः । संयोगाद्यास्तु संबन्धाः नैव संभावनापदम् ॥ तादात्म्यं वा तदुत्पत्तिः वाच्यवाचकताऽथवा । स्यादाद्यपक्षे प्रायेण जगतो मिश्ररूपता ॥ क्षुरमोदकशब्दाभ्यां स्यातां पाटनपूरणे । द्वितीयपक्षोऽपि मिथोऽनुपलम्भपराहतः ॥ तृतीयोऽपि स्वरूपं वा भिन्नो वेति विकल्प्यते । आद्ये नाधिकमुक्तं स्यात् अन्त्ये नित्योऽथवेतरः ॥ नित्यश्चेन्नित्यतापत्तिः एतत्संबंधिनोरपि । अनित्यश्चेत्स्वरूपं चेत् नाधिकं स्यादितीरितम् ॥ भिन्नश्चेदनवस्था स्यात् तादात्म्यादिविकल्पतः । सर्वेषामपि नित्यत्वं क्षणभङ्गपराहतम् ॥ दुर्ग्रहश्चापि संकेत: स्वरसक्षणभङ्गिनी । विकल्पयोनयश्शब्दा विकल्पाइशब्दयोनयः ॥ कार्यकारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यमी । इति प्राचामुक्तिरेषा सकलार्थप्रदर्शिनी ॥ अतोऽभिधेयसंबन्धभङ्गुरः शास्त्रडम्बरः । सोऽयं सौगतसिद्धान्तः शास्त्रारम्भप्रभञ्जकः ॥ 4 क्षेप्तुं वादानवमादीन् दृश्यते किल वार्तिके । सिद्धे शब्दार्थसंबन्ध इति वाररुचं वचः ॥
6 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके शब्दे चार्थे च संबन्धे नित्य एवेति तद्वचः । व्याख्यातं भाष्यकारेण पतञ्जलिमहर्षिणा ॥ औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन संबन्ध इत्यपि । जैमिनिसूत्रयामास शब्दार्थान्वयनित्यताम् ॥ नित्याश्शब्दार्थसंबन्धाः समाम्नाता महर्षिभिः । सूत्राणां सानुसन्त्राणां भाष्याणां च प्रणेतृभिः ॥ इति वाक्यपदीयेऽपि प्राह भर्तृहरिः स्वयम् । यश्शब्दाद्वैतसिद्धान्तप्रतिष्ठापनदेशिकः ॥ 5 सर्वस्यैव हि शास्त्रस्य कर्मणो वाऽपि कस्य चित् । यावत्प्रयोजनं नोक्तं तावत्तत्केन गृह्यते ॥ सिद्धार्थं सिद्धसंबन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते । ग्रन्थादौ तेन वक्तव्यस्संबन्धः सप्रयोजनः ॥ संबन्धोऽस्ति च नित्यश्चेत्युक्तमौत्पत्तिकादिना । अप्रामाण्यनिरासार्थं, तद्द्वयं नेष्यते परैः ॥ वाच्यवाचकसंबन्धनिषेधे लोकबाधनम् । विरोधश्च स्ववाक्येन न हि संबन्धवर्जितैः ॥ प्रतिज्ञार्थं पदैः शक्यः प्रतिपादयितुं परः । तस्माद्गमकतारूपः वृद्धेभ्यस्त्विह शिक्ष्यते ॥ इति कौमारिले श्लोकवार्तिके चोपबृंहणम् । अत एव हि शब्दादेर्नित्यताऽस्थापि सूरिभिः ॥
मङ्गलविचारः 6 जात्याख्यस्यातिरिक्तस्य नित्यस्यापि च वस्तुनः स्वीकारोऽपि च शिक्षायै स्यात्प्रपञ्चापलापिनाम् । कर्मैकं बुद्धिरप्येका जगत्येकस्सितो गुणः । वर्णोऽप्येको गकारादिरिति वादा अपीदृशाः ॥ तस्मादादौ शास्त्रकृतामर्थसम्बन्धसूचनम् । साधने पर्यवसितं शास्त्रारम्भोऽयमुच्यते ॥ इदानींतनशास्त्रेषु तद्विशेषविचिन्तना । प्रवर्तते युक्तिमूला सति कुड्येऽनुलेपवत् ॥ (3) मङ्गलविचारः. 1 प्रारिप्सितसमाप्त्यर्थं शिष्टाः कुर्वन्ति मङ्गलम् । आचारानुमितश्रुत्या तद्धेतुत्वं हि मीयते ॥ प्रमिते साधनत्वेऽस्मिन् श्रुत्यैव निरपेक्षया । व्यभिचारः परीहार्यः क्वचिच्चित्रादिनीतितः ॥ फलानन्तर्यनियमो यदि हेतुत्वमिष्यते । व्यभिचारस्य शङ्कैव न हि स्यादवकाशिनी ॥ तत्स्यादारब्धकर्माङ्गं प्रागनुष्ठानदर्शनात् । विघ्नध्वंसस्तदत्यन्ताभावो वा द्वारमिष्यते ॥ समाप्यतामिदं कर्म निर्विघ्नमिति कामना । यदा श्रुतित एव स्यात् तदा द्वारत्वनिर्णयः ॥
8 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके संशयो निश्चयो वाऽत्र विघ्नज्ञानं प्रवर्तकम् । समाप्तिकामो विघ्नज्ञः सोऽधिकार्यत्र बोध्यते ॥ २ प्रधानं मङ्गलं केचित् अदृष्टद्वारतः पुनः । फलं समाप्तिः तत्कामो ह्यधिकारीति जानते ॥ ३ प्रारिप्सितं निमित्तं स्यादाविघ्नेन समापनम् । प्रचयश्च फलं चेति केचिन्नैमित्तिकं विदुः ॥ मङ्गलाचरणे तस्मात्काम्यशङ्का व्यपोद्यते । समाप्तिकामना तु स्यादधिकारिविशेषणम् ॥ ४ परे त्वदृष्टद्वारेण मङ्गलस्य फलं विदुः । विघ्नसंसर्गविरहं समाप्तिस्तु ततः फलम् ॥ ५ चतुर्षु पक्षेष्वेतेषु कंचित्स्वीकृत्य सूरयः । विवदन्ते गुरुलघुविमर्शनविचक्षणाः ॥ प्रथमं परिगृह्णन्ति पक्षं प्राञ्चस्तु तार्किकाः । नव्यनैयायिकानां तु तुरीयः पक्ष ईप्सितः ॥ ६ आद्यपक्षे व्यभीचारं नास्तिकादिनिबन्धने । अन्यथासिद्धिमपि वा विघ्नध्वंसेन ते विदुः ॥ ७ न मङ्गलं महाभाष्ये दृश्यते नापि पाक्षिले । न शाबरे शाङ्करे वा तथेदानींतने क्वचित् ॥ मङ्गलं न निबध्नन्ति ग्रन्थे केचिद्विपश्चितः । कुर्वन्तो वा न कुर्वन्तो न हि तद्वेदितुं क्षमम् ॥
सिद्धान्तविचारः 9 माण्डूक्यगौडपादीयभाष्ये श्रीमति शाङ्करे । यथाबलं नमस्कारो व्यवहार इतीरितः ॥ 8 निबध्नतामयं भावश्शिष्याणां शिक्षणं तथा । महिष्ठमङ्गलावाप्तिः स्वकृतस्यानुकीर्तनात् ॥ 9 दण्ड्यादिभिर्महाकाव्यारम्भस्याङ्गमितीरितम् । सर्गबन्धो महाकाव्यमुच्यते तस्य लक्षणम् ॥ आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम् । तदाहुः मङ्गलं काव्यस्यैवाङ्गमिति केचन ॥ 10 तन्मानसं वाचिकं च कायिकं चेत्यपि त्रिधा । समष्टिव्यष्टिरूपेण सर्वत्रास्तीति केचन ॥ एवं मङ्गलतत्त्वार्थविचारो मङ्गलात्मकः । मङ्गलाचारयुक्तानां विनिपातं निवारयेत् ॥ (4) सिद्धान्तविचारः. 1 प्रामाणिक इति ज्ञातो ह्यर्थः सिद्धान्त इष्यते । आवापोद्वापभेदानामिदानीमपि दर्शनात् ॥ 2 अभिमानैकमूलत्वात् अन्योन्यं च विरोधतः । न कश्चिद्यदि सिद्धान्तः नैवं तत्सिद्धयसिद्धितः ॥ सिद्धान्ताभाव एवायं प्रामाणिक इतीष्यते । नेष्यते वा द्विधाऽप्येवं सिद्धः सिद्धान्तसंग्रहः ॥ M.R. 2
10 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके 3 सर्वं शून्यमिति प्राहुः केचिद्विज्ञानमित्यपि । अपोहवादिनस्सर्वं व्यावृत्तिरिति मेनिरे ॥ 4 सर्वं सदित्येकमिति संख्येकान्तेषु चादिमः । शून्याद्वैतं सदद्वैतं विज्ञानाद्वैतमेव च ॥ शब्दाद्वैतं तथा कालाद्वैतमित्यादि विस्तरः । सर्वं नित्यमनित्यं च द्विसंख्येकान्तवादिनाम् ॥ ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयमिति त्रिसंख्येकान्तवादिनाम् । मानं मेयं मितिर्मातेत्याहुरेवं ततः परे ॥ रूपं संज्ञा च संस्कारः वेदनाऽनुभवस्त्विति । पञ्च स्कन्धा इति प्राहुः सौत्रान्तिकमुखाः परे ॥ जीवो धर्मोऽप्यधर्मश्च पुद्गलः काल एवच । आकाश इति षड्द्रव्यं षडभिज्ञाः प्रचक्षते ॥ एवं सप्तादिसंख्यानामेकान्ता अपि सम्मताः । ततश्च षष्टितन्त्रं यत्संदृष्टं कपिलादिभिः ॥ संख्येकान्तानुरोधेन तत्सांख्यं प्रथितं भुवि । सांख्या हि तत्त्वगणनापरायणतया स्थिताः ॥ प्रबोधचन्द्रोदयोक्तिरप्येवं तत्र साक्षिणी । ज्ञानप्रधानं यच्छास्त्रं तत्सांख्यमिति केचन ॥ तपःप्रधानं शास्त्रं तु पातञ्जलमिति स्थितम् । यमादयस्तपोरूपास्तत्रैव हि विशोधिताः ॥
इत्थं संख्येकान्तवादो हेतुसाध्याविशेषतः । प्रत्यक्षादिप्रमाणानां विरोधाच्च न युज्यते ॥ इत्यक्षपादमुनिना दूषितो न्यायदर्शने । संख्याविवादः प्रथमः तदधीनं हि लक्षणम् ॥ 5 इत्यालोच्यापरे प्राज्ञाः नयसंस्कृतमानसाः । तस्मिन् संख्यां परित्यज्य तत्त्वे संख्यां न्यवेशयन् ॥ ततस्तत्त्वसमासस्तु पञ्चविंशतिधा कृतः । कार्यकारणयोरैक्यं तथा वै धर्मधर्मिणोः ॥ अभेद इति सिद्धान्ताद् द्विसंख्येकान्त एव सः । षट्त्रिंशत्संख्यतत्त्वानि विदुश्शैवागमानुगाः ॥ वैशेषिकादयस्सप्त षोडशेति च मन्वते । पदार्थतत्त्वविज्ञानान्निःश्रेयसमसूत्रयत ॥ यतो विवेककाष्ठैव फलं मानवजन्मनः । तयोपादित्सितजिहासितयोर्हि विनिश्चयः ॥ ततश्शास्त्रोपयुक्तानां पदार्थानां परीक्षणम् । समस्य च विभज्यापि पदार्थानां परीक्षणम् ॥ इति द्विधा प्रवृत्तं स्याच्छास्त्रमित्यवधार्यते । 6 पदमेव पदार्थं तं मन्यन्ते ये च शाब्दिकाः ॥ अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन वेति ये वा विदुः परे ॥