माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २०३ |
|---|
| प्रज्ञप्तिः शब्दादिप्रतीतिः स्यात् , तस्याः सनिमित्तत्वात् । अन्यथा निर्विषयत्वे शब्दस्पर्शनीलपीत-लोहितादिप्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्य नाशतो नाशोऽभावः प्रसज्येतेत्यर्थः । न च प्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्याभावोऽस्ति प्रत्यक्षत्वात् । अतः प्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्य दर्शनात्, परेषां तन्त्रं परतन्त्रमित्यन्यशास्त्रम्, तस्य परतन्त्रस्य परतन्त्राश्रयस्य बाह्यार्थस्य ज्ञानव्यतिरिक्तस्यास्तिता मताभिप्रेता । <br><br> न हि प्रज्ञप्तेः प्रकाशमात्रस्वरूपाया नीलपीतादिबाह्यालम्बनवैचित्र्यमन्तरेण स्वभावभेदेनैव वैचित्र्यं संभवति । स्फटिकस्येव नीलाद्युपाध्याश्रयैर्विना वैचित्र्यं न घटत इत्यभिप्रायः । | हमारा कथन है कि ] प्रज्ञप्ति यानी शब्दादि-प्रतीति निर्विषया नहीं हो सकती, क्योंकि वह सनिमित्ता है । अन्यथा उसे निर्विषय माननेपर तो शब्द, स्पर्श एवं नील, पीत और लोहित आदि प्रतीतिकी विचित्रतारूप द्वैतका नाश हो जायगा अर्थात् उसके नाश यानी अभावका प्रसंग उपस्थित हो जायगा और प्रत्यक्ष-सिद्ध होनेके कारण प्रत्ययवैचित्र्यरूप द्वैतका अभाव है नहीं । अतः प्रत्ययवैचित्र्यरूप द्वैतकी उपलब्धिसे, परतन्त्र यानी दूसरोंके शास्त्र; उन परकीय तन्त्रोंका अर्थात् परकीय तन्त्रोंके आश्रित जो प्रज्ञानके अतिरिक्त अन्य बाह्य पदार्थ हैं उनका अस्तित्व भी स्वीकार किया गया है । <br><br> केवल प्रकाशमात्रस्वरूपा प्रज्ञप्तिकी यह विचित्रता नील-पीतादि बाह्य आलम्बनोंकी विचित्रताके सिवा केवल स्वभावभेदसे ही होनी सम्भव नहीं है । तात्पर्य यह है कि स्फटिकके समान, नील-पीतादि उपाधियोंको आश्रय किये बिना, यह विचित्रता नहीं हो सकती । |
२०४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
इतश्च परतन्त्राश्रयस्य बाह्यार्थस्य ज्ञानव्यतिरिक्तस्यास्तित्वम् । संक्लेशनं संक्लेशो दुःखमित्यर्थः । उपलभ्यते ह्यग्निदाहादिनिमित्तं दुःखम् । यद्यग्न्यादिबाह्यं दाहादिनिमित्तं विज्ञानव्यतिरिक्तं न स्यात्ततो दाहादिदुःखं नोपलभ्येत । उपलभ्यते तु । अतस्तेन मन्यामहेऽस्ति बाह्योऽर्थ इति । न हि विज्ञानमात्रे संक्लेशो युक्तः, अन्यत्रादर्शनादित्यभिप्रायः ॥२४॥
इसके सिवा इसलिये भी दूसरोंके शास्त्रोंके आश्रित ज्ञानव्यतिरिक्त बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व स्वीकार किया गया है कि अग्निदाहादिके कारणसे होनेवाला संक्लेश यानी दुःख उपलब्ध होता है । संक्लेशका अर्थ संक्लेशन अर्थात् दुःख है । यदि विज्ञानसे अतिरिक्त दाहादिका निमित्तभूत अग्नि आदि कोई बाह्य पदार्थ न होता तो दाहादिजनित दुःख उपलब्ध नहीं होना चाहिये था । किन्तु उपलब्ध होता ही है; इससे हम मानते हैं कि बाह्य पदार्थ अवश्य हैं । अभिप्राय यह है कि केवल विज्ञानमात्रमें क्लेश होना सम्भव नहीं है, क्योंकि अन्यत्र ऐसा नहीं देखा गया ॥ २४ ॥
विज्ञानवादिकर्तृक बाह्यार्थवादनिषेध
अत्रोच्यते—
इस विषयमें हमारा कथन है कि
प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमिष्यते युक्तिदर्शनात् ।
निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनात् ॥ २५ ॥
पूर्वोक्त युक्तिके अनुसार तुम प्रज्ञप्तिका सविषयत्व स्वीकार करते हो । परन्तु तत्त्वदृष्टिसे हम उस विषयका अविषयत्व मानते हैं ॥ २५ ॥
बाढमेवं प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वं द्वयसंक्लेशोपलब्धियुक्तिदर्शना-
ठीक है, इस प्रकार दुःखमय द्वैतकी उपलब्धिरूप युक्तिके अनुसार
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २०५ |
|---|
| दिष्यते त्वया । स्थिरीभव तावत्त्वं युक्तिदर्शनं वस्तुनस्तथात्वाभ्युपगमे कारणमित्यत्र । | तुम प्रज्ञप्तिका सविषयत्व स्वीकार करते हो; परन्तु 'युक्तिदर्शन वस्तुकी यथार्थताके ज्ञानमें कारण है'—अपने इस सिद्धान्तमें तुम स्थिर हो जाओ। |
| ब्रूहि किं तत इति । | बाह्यार्थवादी— कहिये, उससे क्या आपत्ति होती है? |
| उच्यते । निमित्तस्य प्रज्ञप्त्यालम्बनाभिमतस्य घटादेर्निमित्तत्वमनालम्बनत्वं वैचित्र्याहेतुत्वमिष्यतेऽस्माभिः । कथम् ? भूतदर्शनात्परमार्थदर्शनादित्येतत् । न हि घटो यथाभूतमृद्रूपदर्शने सति तद्व्यतिरेकेणास्ति, यथाश्वान्महिषः पटो वा तन्तुव्यतिरेकेण, तन्तवश्चांशुव्यतिरेकेणेत्येवमुत्तरोत्तरभूतदर्शन आ शब्दप्रत्ययनिरोधान्नैव निमित्तमुपलभामह इत्यर्थः । | विज्ञानवादी— हमारा कथन है कि प्रज्ञप्तिके आश्रयरूपसे स्वीकार किये हुए घटादि विषयका हम अविषयत्व—प्रतीतिका अनाश्रयत्व अर्थात् विचित्रताका अहेतुत्व मानते हैं। कैसे मानते हैं ? भूतदृष्टिसे अर्थात् परमार्थदृष्टिसे। जिस प्रकार अश्वसे महिष पृथक् है, उस प्रकार मृत्तिकाके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान होनेपर, घट उससे पृथक् सिद्ध नहीं होता। इसी प्रकार तन्तुसे पृथक् पट और अंशुसे पृथक् तन्तु भी सिद्ध नहीं होते। तात्पर्य यह है कि इसी तरह उत्तरोत्तर यथार्थ तत्त्वको देखते-देखते शब्द प्रतीतिका निरोध हो जानेपर हम कोई भी विषय नहीं देखते। |
| अथ चाभूतदर्शनाद्वाह्यार्थस्यानिमित्तत्वमिष्यते, रज्ज्वादाविव सर्पादिरित्यर्थः । भ्रान्ति- | अथवा [ यों समझो कि ] जिस प्रकार रज्जु आदिमें आरोपित सर्पादि वस्तुतः प्रतीतिके आलम्बन नहीं हैं उसी प्रकार अभूतदर्शनके कारण हम बाह्यार्थोंको प्रतीतिका आलम्बन |
| २०६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
दर्शनविषयत्वाच्च निमित्तस्या- | नहीं मानते। भ्रान्तिदृष्टिके विषय होनेके कारण इन निमित्तोंका अ- निमित्तत्वं भवेत् । तदभावे- | निमित्तत्व है, क्योंकि उसका अभाव ऽभावात् । न हि सुषुप्तसमाहित- | होनेपर इनकी भी उपलब्धि नहीं होती। सोये हुए, समाधिस्थ और मुक्तानां भ्रान्तिदर्शनाभाव | मुक्त पुरुषोंको, उनकी भ्रान्तिदृष्टिका आत्मव्यतिरिक्तो बाह्योऽर्थ | अभाव हो जानेपर, आत्मासे अतिरिक्त किसी बाह्य पदार्थकी उपलब्धि नहीं उपलभ्यते । न ह्युन्मत्तावगतं | होती। उन्मत्त पुरुषको दिखायी देनेवाली वस्तु उन्मादशून्य मनुष्यको वस्त्वनुन्मत्तैरपि तथाभूतं गम्यते । | भी यथार्थ नहीं जान पड़ती। इस एतेन द्वयदर्शनं संक्लेशोपलब्धिश्च | कथनसे द्वैतदर्शन और क्लेशकी उपलब्धि दोनोंहीका निराकरण प्रत्युक्ता ॥२५॥ | किया गया है ॥ २५ ॥
यस्मान्नास्ति बाह्यं निमित्तमतः | क्योंकि बाह्य विषय हैं ही नहीं, इसलिये—
चित्तं न संस्पृशत्यर्थं नार्थाभासं तथैव च ।
अभूतो हि यतश्चार्थो नार्थाभासस्ततः पृथक् ॥ २६ ॥
चित्त किसी पदार्थका स्पर्श नहीं करता और इसी प्रकार न किसी अर्थाभासका ही ग्रहण करता है। क्योंकि पदार्थ है ही नहीं इसलिये पदार्थाभास भी उस चित्तसे पृथक् नहीं है ॥ २६ ॥
चित्तं न स्पृशत्यर्थं बाह्या- | चित्त, चित्त होनेके कारण ही लम्बनविषयम्, नाप्यर्थाभासं | स्वप्नचित्तके समान, बाह्य आलम्बन- चित्तत्वात्स्वप्नचित्तवत् । अभूतो | के विषयभूत किसी पदार्थको स्पर्श नहीं करता और न अर्थाभासको ही
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २०७ |
|---|
| हि जागरितेऽपि स्वप्नार्थवदेव बाह्यः शब्दाद्यर्थो यत उक्तहेतुत्वाच्च । नाप्यर्थाभासाश्चित्तात्पृथक्किञ्चित्तमेव हि घटाद्यर्थवदवभासते यथा स्वप्ने ॥ २६ ॥ | ग्रहण करता है, क्योंकि उपर्युक्त हेतुसे ही स्वप्नगत पदार्थोंके समान जागरित अवस्थामें भी शब्दादि बाह्य पदार्थ हैं नहीं, और न चित्तसे पृथक् अर्थाभास ही है। घटादि पदार्थोंके समान चित्त ही भासता है, जैसा कि वह स्वप्नमें भासा करता है ॥ २६ ॥ |
| ननु विपर्यासस्तर्ह्यसति घटादौ घटाद्याभासता चित्तस्य । तथा च सत्यविपर्यासः क्वचिद्वक्तव्य इति । अत्रोच्यते— | घटादिके न होनेपर भी चित्तको घटादिकी प्रतीति होना—यह तो विपरीत ज्ञान है। ऐसी अवस्थामें अविपरीत (सम्यक्) ज्ञान कब होगा? यह बतलाना चाहिये। इसपर कहते हैं— |
निमित्तं न सदा चित्तं संस्पृशत्यध्वसु त्रिषु ।
अनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य भविष्यति ॥ २७ ॥
[भूत, भविष्यत् और वर्तमान] तीनों अवस्थाओंमें चित्त कभी किसी विषयको स्पर्श नहीं करता। फिर उसे बिना निमित्तके ही विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है? ॥ २७ ॥
| निमित्तं विषयमतीतानागतवर्त्तमानाध्वसु त्रिष्वपि सदा चित्तं न स्पृशेदेव हि । यदि हि क्वचित् संस्पृशेत् सोऽविपर्यासः परमार्थ इति । अतस्तदपेक्षया- | अतीत, अनागत और वर्तमान—इन तीनों ही अवस्थाओंमें चित्त कभी निमित्त यानी विषयको स्पर्श नहीं करता। यदि वह कभी उसे स्पर्श करता तो 'वह अविपर्यास अर्थात् परमार्थ है' ऐसा माना जाता। अतः |
| २०८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
सति घटे घटाभासता विपर्यासः स्यान्न तु तदस्ति कदाचिदपि चित्तस्यार्थसंस्पर्शनम् । तस्मादनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य चित्तस्य भविष्यति; न कथंचिद्विपर्यासोऽस्तीत्यभिप्रायः । अयमेव हि स्वभावश्चित्तस्य यदुतासति निमित्ते घटादौ तद्वदवभासनम् २७ | उसकी अपेक्षासे ही घटके न होनेपर भी घटका प्रतीत होना विपर्यास कहलाता । किन्तु चित्तका पदार्थके साथ कभी स्पर्श है ही नहीं। अतः बिना निमित्तके ही उस चित्तको विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि उसे किसी प्रकार विपरीत ज्ञान है ही नहीं। चित्तका यही स्वभाव है कि घटादि निमित्तके न होनेपर भी उनकी प्रतीति होती रहे ॥ २७ ॥
विज्ञानवादका खण्डन
'प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमित्याद्ये-' तदन्तं विज्ञानवादिनो बौद्धस्य वचनं बाह्यार्थवादिपक्षप्रतिषेधपरमाचार्येणानुमोदितम् । तदेव हेतुं कृत्वा तत्पक्षप्रतिषेधाय तदिदमुच्यते— | "प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वम्" इस (पच्चीसवें) श्लोकसे लेकर यहाँतक आचार्यने विज्ञानवादी बौद्धके, बाह्यार्थवादीके पक्षका प्रतिषेध करनेवाले वचनका अनुमोदन किया। अब उसीको हेतु बनाकर उसीके पक्षका प्रतिषेध करनेके लिये इस प्रकार कहा जाता है—
तस्मान्न जायते चित्तं चित्तदृश्यं न जायते ।
तस्य पश्यन्ति ये जातिं खे वै पश्यन्ति ते पदम् ॥ २८ ॥
इसलिये चित्त भी उत्पन्न नहीं होता और न चित्तका दृश्य ही उत्पन्न होता है । जो लोग उसका जन्म देखते हैं वे निश्चय ही आकाशमें [ पक्षी आदिके ] चरण ( चरण-चिह्न ) देखते हैं ॥ २८ ॥
यस्मादसत्येव घटादौ घटाद्याभासता चित्तस्य विज्ञानवादिना- | क्योंकि विज्ञानवादीने घटादिके न होनेपर भी चित्तको घटादिकी प्रतीति होनी स्वीकार की है और
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २०९
| भ्युपगता तदनुमोदितम् अस्माभिरपि भूतदर्शनात्, तस्मात्तस्यापि चित्तस्य जायमानावभासतासत्येव जन्मनि युक्ता भवितुमित्यतो न जायते चित्तम्, यथा चित्तदृश्यं न जायते ।<br><br>अतस्तस्य चित्तस्य ये जातिं पश्यन्ति विज्ञानवादिनः क्षणिकत्वदुःखित्वशून्यत्वानात्मत्वादि च, तेनैव चित्तेन चित्तस्वरूपं द्रष्टुमशक्यं पश्यन्तः खे वै पश्यन्ति ते पदं पक्ष्यादीनाम् । अत इतरेभ्योऽपि द्वैतिभ्योऽत्यन्तसाहसिका इत्यर्थः । येऽपि शून्यवादिनः पश्यन्त एव सर्वशून्यतां स्वदर्शनस्यापि शून्यतां प्रतिजानते ते ततोऽपि साहसिकतराः खं मुष्टिनापि जिघृक्षन्ति ॥ २८ ॥ | यथार्थदृष्टि होनेके कारण उसका हमने भी अनुमोदन किया है, इसलिये उसकी मानी हुई चित्तकी उत्पत्तिकी प्रतीति भी उसकी उत्पत्तिके अभावमें ही होनी सम्भव है । अतः जिस प्रकार चित्तके दृश्यका जन्म नहीं होता उसी प्रकार चित्तकी भी उत्पत्ति नहीं होती ।<br><br>इसलिये जो विज्ञानवादी उस चित्तकी उत्पत्ति तथा उसके क्षणिकत्व, दुःखित्व, शून्यत्व एवं अनात्मत्व आदि देखते हैं—उस चित्तसे ही, जिसका देखना सर्वथा असम्भव है ऐसे चित्तके स्वरूपको देखनेवाले वे निश्चय ही आकाशमें पक्षी आदिके चरण देखते हैं। अतः तात्पर्य यह है कि वे अन्य द्वैतवादियोंकी अपेक्षा भी अधिक साहसी हैं। और जो शून्यवादी सबकी शून्यता देखते हुए अपने दर्शनकी भी शून्यताकी प्रतिज्ञा करते हैं वे तो उनसे भी बढ़कर साहसी हैं—वे आकाशको मुट्ठीसे ही पकड़ना चाहते हैं ॥ २८ ॥ |
| २१० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
उपक्रमका उपसंहार
| उक्तैर्हेतुभिरजमेकं ब्रह्मेति सिद्धं यत्पुनरादौ प्रतिज्ञातं तत्फलोपसंहारार्थोऽयं श्लोकः— | पूर्वोक्त हेतुओंसे यह सिद्ध हुआ कि एक अजन्मा ब्रह्म ही है । अब, पहले जिसकी प्रतिज्ञा की है उसके फलका उपसंहार करनेके लिये यह श्लोक है— |
|---|
अजातं जायते यस्मादजातिः प्रकृतिस्ततः ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ २९ ॥
क्योंकि अजन्मा [चित्त] का ही जन्म होता है इसलिये अजाति ही उसका स्वभाव है; और स्वभावकी विपरीतता किसी प्रकार नहीं होगी ॥ २९ ॥
| अजातं यच्चित्तं ब्रह्मैव जायत इति वादिभिः परिकल्प्यते तदजातं जायते यस्मादजातिः प्रकृतिस्तस्य । ततस्तस्मादजातरूपायाः प्रकृतेरन्यथाभावो जन्म न कथंचिद्भविष्यति ॥ २९ ॥ | अजात जो ब्रह्मरूप चित्त है वही उत्पन्न होता है—ऐसी वादियोंद्वारा कल्पना की जाती है; क्योंकि उस अजातका ही जन्म होता है इसलिये अजाति उसका स्वभाव है। तब, इसीलिये उस अजातरूप स्वभावका जन्मरूप विपरीतभाव किसी प्रकार नहीं होगा ॥ २९ ॥ |
|---|
| अयं चापर आत्मनः संसारमोक्षयोः परमार्थसद्भाववादिनां दोष उच्यते— | आत्माके संसार और मोक्ष—दोनोंहीका पारमार्थिक अस्तित्व स्वीकार करनेवाले वादियोंके पक्षका यह एक दूसरा दोष बतलाया जाता है— |
|---|
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २११ |
|---|
अनादेरन्तवत्त्वं च संसारस्य न सेत्स्यति ।
अनन्तता चादिमतो मोक्षस्य न भविष्यति ॥ ३० ॥
अनादि संसारका तो कभी अन्तवत्त्व सिद्ध नहीं हो सकेगा और सादि मोक्षकी कभी अनन्तता नहीं हो सकेगी ॥ ३० ॥
| अनादेरतीतकोटिरहितस्य संसारस्यान्तवत्त्वं समाप्तिर्न सेत्स्यति युक्तितः सिद्धिं नोपयास्यति । न ह्यनादिः सन्नन्तवान्कश्चित्पदार्थो दृष्टो लोके । बीजाङ्कुरसंबन्धनैरन्तर्यविच्छेदो दृष्ट इति चेत्, न; एकवस्त्वभावेनापोदितत्वात् । | अनादि-अतीतकोटिसे रहित संसारका अन्तवत्त्व अर्थात् समाप्त होना युक्तिसे सिद्ध नहीं होगा। लोकमें कोई भी पदार्थ अनादि होकर अन्तवान् होता नहीं देखा गया है। यदि कहो कि बीजाङ्कुरसम्बन्धकी निरन्तरताका विच्छेद होता देखा गया है ? तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि बीजाङ्कुरसन्तति कोई एक पदार्थ न होनेके कारण उसके अनादित्वका निराकरण तो पहले कर दिया गया है। |
| तथानन्ततापि विज्ञानप्राप्तिकालप्रभवस्य मोक्षस्यादिमतो न भविष्यति, घटादिष्वदर्शनात् । घटादिविनाशवदवस्तुत्वाददोष इति चेत्, तथा च मोक्षस्य परमार्थसद्भावप्रतिज्ञाहानिः । | इसी प्रकार विज्ञानप्राप्तिके समय होनेवाले सादि मोक्षकी अनन्तता भी नहीं होगी, क्योंकि घटादि [जन्य पदार्थों] में ऐसा देखा नहीं गया । यदि कहो कि घटादिनाशके समान अवस्तुरूप होनेसे [मोक्षमें] यह दोष नहीं आ सकता तो इससे मोक्षके पारमार्थिक सद्भावविषयक प्रतिज्ञाकी हानि होगी। इसके सिवा |
| २१२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
| असत्त्वादेव शशविषाणस्येवा- | भी ] शशशृङ्गके समान असत् होनेके कारण भी उसके आदिमत्त्व- |
| दिमत्त्वाभावश्च ॥ ३० ॥ | का अभाव ही है ॥ ३० ॥ |
प्रपञ्चके असत्यत्वमें हेतु
आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ ३१ ॥
जो आदि और अन्तमें नहीं है वह वर्तमानमें भी वैसा [ अर्थात् असद्रूप ] ही है । ये पदार्थसमूह असत्के समान होकर भी सत्-जैसे दिखायी देते हैं ॥ ३१ ॥
सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।
तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ३२ ॥
उन (जाग्रत्-पदार्थों) की सप्रयोजनता स्वप्नावस्था में असिद्ध हो जाती है। अतः आदि-अन्तयुक्त होनेके कारण वे निश्चय ही मिथ्या माने गये हैं ॥ ३२ ॥
| वैतथ्ये कृतव्याख्यानौ | वैतथ्यप्रकरणमें इन दोनों |
| श्लोकाविह संसारमोक्षाभाव- | श्लोकोंकी व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ संसार और मोक्षके अभावके |
| प्रसङ्गेन पठितौ ॥ ३१-३२ ॥ | प्रसङ्गमें उन्हें फिर पढ़ दिया है ॥ ३१-३२ ॥ |
सर्वे धर्मा मृषा स्वप्ने कायस्यान्तर्निदर्शनात् ।
संवृतेऽस्मिन्प्रदेशे वै भूतानां दर्शनं कुतः ॥ ३३ ॥
शां०भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २१३
जब कि शरीरके भीतर देखे जानेके कारण स्वप्नावस्था में सभी पदार्थ मिथ्या हैं तो इस संकुचित स्थानमें (निरवकाश ब्रह्ममें) ही भूतोंका दर्शन कैसे हो सकता है? ॥ ३३ ॥
| निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनादित्यस्यार्थः प्रपञ्च्यत एतैः श्लोकैः ॥ ३३ ॥ | इन श्लोकोंद्वारा “निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनात्” (४।२५) इस श्लोकके ही अर्थका विस्तार किया गया है ॥ ३३ ॥ |
स्वप्नका मिथ्यात्वनिरूपण
न युक्तं दर्शनं गत्वा कालस्यानियमाद्गतौ ।
प्रतिबुद्धश्च वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥ ३४ ॥
देशान्तरमें जानेमें जो समय लगता है [स्वप्नावस्था में] उसका नियम न होनेके कारण स्वप्नके पदार्थोंको उनके पास जाकर देखना तो सम्भव नहीं है। इसके सिवा जागनेपर भी कोई उस (स्वप्नदृष्ट) देशमें नहीं रहता ॥ ३४ ॥
| जागरिते गत्यागमनकालो नियतो देशः प्रमाणतो यस्तस्यानियमान्नियमस्याभावात्स्वप्ने न देशान्तरगमनमित्यर्थः ॥ ३४ ॥ | जागृतिमें जो आने-जानेके समय और प्रमाणसिद्ध देश नियत हैं उनका नियम न होनेके कारण स्वप्नावस्था में देशान्तरमें जाना नहीं होता—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३४ ॥ |
मित्राद्यैः सह संमन्त्र्य संबुद्धो न प्रपद्यते ।
गृहीतं चापि यत्किंचित्प्रतिबुद्धो न पश्यति ॥ ३५ ॥
| १८४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
[ स्वप्नावस्थामें ] मित्रादिके साथ मन्त्रणा कर [ वह स्वप्नदर्शी पुरुष ] जागनेपर उसे नहीं पाता; तथा उसने जो कुछ [ स्वप्नावस्थामें ] ग्रहण किया होता है उसे जागनेपर नहीं देखता ॥ ३५ ॥
| मित्राद्यैः सह संमन्त्र्य तदेव मन्त्रणं प्रतिबुद्धो न प्रपद्यते । गृहीतं च यत्किंचिद्धिरण्यादि न प्राप्नोति । अतश्च न देशान्तरं गच्छति स्वप्ने ॥ ३५ ॥ | [ स्वप्नमें ] मित्रादिके साथ मन्त्रणा करके जाग पड़नेपर फिर उसी मन्त्रणाको नहीं पाता और [ उस समय ] उसने जो कुछ स्वर्णादि ग्रहण किया होता है उसे भी प्राप्त नहीं करता । इसलिये भी स्वप्नावस्थामें वह किसी देशान्तरको नहीं जाता ॥ ३५ ॥ |
स्वप्ने चावस्तुकः कायः पृथगन्यस्य दर्शनात् ।
यथा कायस्तथा सर्वं चित्तदृश्यमवस्तुकम् ॥ ३६ ॥
स्वप्नमें जो शरीर होता है वह भी अवस्तु है, क्योंकि उससे भिन्न एक दूसरा शरीर [ शय्यापर पड़ा हुआ ] देखा जाता है । जैसा वह शरीर है वैसा ही सम्पूर्ण चित्तदृश्य अवस्तुरूप है ॥ ३६ ॥
| स्वप्ने चाटन्दृश्यते यः कायः सोऽवस्तुकस्ततोऽन्यस्य स्वापदेशस्थस्य पृथक्कायान्तरस्य दर्शनात् । यथा स्वप्नदृश्यः कायोऽसंस्तथा सर्वं चित्तदृश्यमवस्तुकं जागरितेऽपि चित्तदृश्य- | स्वप्नमें घूमता हुआ जो शरीर देखा जाता है वह अवस्तु है, क्योंकि उस स्वप्नप्रदेशस्थ शरीरसे भिन्न एक और शरीर [ शय्यापर पड़ा हुआ ] देखा जाता है । जिस प्रकार स्वप्नमें दिखायी देनेवाला शरीर असत् है उसी प्रकार जागरित अवस्थामें सारा चित्तदृश्य, केवल चित्तका ही दृश्य होनेके कारण, |
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २१५
| न्वादित्यर्थः । स्वप्नसमत्वाद्- | असत् है—यह इसका तात्पर्य है । |
| प्रकृत अर्थ यह हुआ कि स्वप्नके समान | |
| सज्जागरितमपीति प्रकरणार्थः ३६ | होनेके कारण जाग्रत्-अवस्था भी |
| असत् ही है ॥ ३६ ॥ |
स्वप्न और जाग्रत्का कार्य-कारणत्व व्यावहारिक है
| इतश्चासत्त्वं जाग्रद्वस्तुनः— | जाग्रत्पदार्थोंकी असत्ता इसलिये भी है कि— |
ग्रहणाज्जागरितवत्तद्धेतुः स्वप्न इष्यते ।
तद्धेतुत्वात्तु तस्यैव सज्जागरितमिष्यते ॥ ३७ ॥
जाग्रत्के समान ग्रहण किया जानेके कारण स्वप्न उसका कार्य माना जाता है । किन्तु जाग्रत्का कार्य होनेके कारण स्वप्नद्रष्टाके लिये ही जाग्रत्-अवस्था सत्य मानी जाती है ॥ ३७ ॥
| जागरितवज्जागरितस्य इव ग्रहणाद्ग्राह्यग्राहकरूपेण स्वप्नस्य तज्जागरितं हेतुरस्य स्वप्नस्य स स्वप्नस्तद्धेतुर्जागरितकार्यमिष्यते । तद्धेतुत्वाज्जागरितकार्यत्वात्तस्यैव स्वप्नदृश एव सज्जागरितं न त्वन्येषाम् । यथा स्वप्न इत्य-भिप्रायः । | जागरितके समान ही ग्राह्य-ग्राहकरूपसे स्वप्नका भी ग्रहण होनेसे इस स्वप्नावस्थाका जाग्रत् कारण है, इसलिये वह स्वप्नावस्था तद्धेतुक यानी जाग्रत्का कार्य मानी जाती है । तद्धेतुक अर्थात् जाग्रत्का कार्य होनेके कारण उस स्वप्नद्रष्टाके ही लिये जाग्रत्-अवस्था सत्य है, औरोंके लिये नहीं; जैसा कि स्वप्न—यह इसका तात्पर्य है । |
| २१६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
| यथा स्वप्नः स्वप्नदृश एव सन्साधारणविद्यमानवस्तुवदवभासते तथा तत्कारणत्वात्साधारणविद्यमानवस्तुवदवभासमानं न तु साधारणं विद्यमानवस्तु स्वप्नवदेवेत्यभिप्रायः ॥ ३७ ॥ | जिस प्रकार स्वप्न स्वप्नद्रष्टाको ही सत् अर्थात् जागरण विद्यमान वस्तुके समान भासता है उसी प्रकार उसका कारण होनेसे जाग्रत्-की भी साधारण विद्यमान वस्तुके समान प्रतीति होती है। किन्तु वस्तुतः स्वप्नके समान ही वह साधारण विद्यमान वस्तु है नहीं—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३७ ॥ |
| ननु समकारणत्वेऽपि जागरितवस्तुनो न स्वप्नवद्वस्तुत्वम् । अत्यन्तचलो हि स्वप्नो जागरितं तु स्थिरं लक्ष्यते । | शंका—समके कारण होनेपर भी जाग्रदवस्थाका स्वप्नके समान अवस्तुत्व नहीं है, क्योंकि स्वप्न तो अत्यन्त चञ्चल है, किन्तु जाग्रद्-अवस्था स्थिर देखी जाती है । | | सत्यमेवमविवेकिनां स्यात् । विवेकिनां तु न कस्यचिद्वस्तुन उत्पादः प्रसिद्धोऽतः— | समाधान—ठीक है, अविवेकियोंके लिये ऐसी बात हो सकती है; किन्तु विवेकियोंकी तो किसी वस्तुकी उत्पत्ति सिद्ध ही नहीं है । अतः— |
उत्पादस्याप्रसिद्धत्वादजं सर्वमुदाहृतम् ।
न च भूतादभूतस्य संभवोऽस्ति कथञ्चन ॥ ३८ ॥
उत्पत्तिके प्रसिद्ध न होनेके कारण सब कुछ अज ही कहा जाता है। इसके सिवा सत् वस्तुसे असत्की उत्पत्ति किसी प्रकार हो भी नहीं सकती ॥ ३८ ॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २१७
| अप्रसिद्धत्वादुत्पादस्यात्मैव सर्वमित्यजं सर्वमुदाहृतं वेदान्तेषु “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २ । १ । २) इति । यदपि मन्यसे जागरितात्सतोऽसत्स्वप्नो जायत इति तदसत् ।<br><br>न भूताद्विद्यमानादभूतस्यासतः सम्भवोऽस्ति लोके । न ह्यसतः शशविषाणादेः सम्भवो दृष्टः कथञ्चिदपि ॥ ३८ ॥ | उत्पत्तिके सिद्ध न होनेसे सब कुछ आत्मा ही है; इसलिये वेदान्तोंमें “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” इत्यादि रूपसे सबको अज ही कहा है। और तुम जो मानते हो कि सत् जाग्रत्से असत् स्वप्नकी उत्पत्ति होती है, सो भी ठीक नहीं; क्योंकि लोकमें भूत-विद्यमान वस्तुसे असत्-का जन्म नहीं हुआ करता । शश-शृङ्गादि असत्पदार्थोंका जन्म किसी भी प्रकार देखनेमें नहीं आता ॥ ३८ ॥ |
|---|
| ननूक्तं त्वयैव स्वप्नो जागरितकार्यमिति तत्कथमुत्पादोऽप्रसिद्ध इत्युच्यते ? | शंका—यह तो तुम्हींने कहा था कि स्वप्न जागरितका कार्य है; फिर ऐसा क्यों कहते हो कि उत्पत्ति सिद्ध ही नहीं होती ? |
|---|---|
| शृणु तत्र यथा कार्यकारणभावोऽस्माभिरभिप्रेत इति— | समाधान—हम जिस प्रकार उनका कार्य-कारणभाव मानते हैं, सो सुनो— |
असज्जागरिते दृष्ट्वा स्वप्ने पश्यति तन्मयः ।
असत्स्वप्नेऽपि दृष्ट्वा च प्रतिबुद्धो न पश्यति ॥ ३९ ॥
[ जीव ] जाग्रत्-अवस्थामें असत्पदार्थोंको देखकर उन्हींके संस्कारसे युक्त हो उन्हें स्वप्नमें देखता है, किन्तु स्वप्नावस्थामें भी असत्पदार्थोंको ही देखकर जागनेपर उन्हें नहीं देखता ॥ ३९ ॥
| असदविद्यमानं रज्जुसर्पवद्विकल्पितं वस्तु जागरिते दृष्ट्वा | जागरित अवस्थामें असत् अर्थात् रज्जुमें सर्पके समान कल्पना किये हुए अविद्यमान पदार्थोंको देखकर |
|---|
| २१८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
| तद्भावभावितस्तन्मयः स्वप्नेऽपि जागरितवद्ग्राह्यग्राहकरूपेण विकल्पयन्पश्यति। तथासत्स्वप्नेऽपि दृष्ट्वा च प्रतिबुद्धो न पश्यत्यविकल्पयन् । च शब्दात्तथा जागरितेऽपि दृष्ट्वा स्वप्ने न पश्यति कदाचिदित्यर्थः। तस्माज्जागरितं स्वप्नहेतुरुच्यते न तु परमार्थसदिति कृत्वा ॥ ३९ ॥ | उनके भावसे भावित हो स्वप्नमें भी तन्मयभावसे जागरितके समान ग्राह्य-ग्राहकरूपसे विकल्प करता हुआ उन्हें देखता है। तथा स्वप्नमें भी असत्पदार्थोंको देखकर जागनेपर विकल्प न करनेके कारण उन्हें नहीं देखता । 'च' शब्दसे यह अभिप्राय है कि इसी प्रकार कभी जाग्रत्में देखकर भी उन पदार्थोंको स्वप्नमें नहीं देखता । इसीलिये यह कहा जाता है कि जाग्रत्-अवस्था स्वप्नका कारण है, उसे परमार्थसत् मानकर ऐसा नहीं कहा जाता ॥ ३९ ॥ |
| परमार्थतस्तु न कस्यचित्केनचिदपि प्रकारेण कार्यकारणभाव उपपद्यते । कथम् ?— | परमार्थतः तो किसीका किसी भी प्रकार कार्य-कारणभाव होना सम्भव नहीं है । किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं—] |
नास्त्यसद्धेतुकमसत्सदसद्धेतुकं तथा ।
सच्च सद्धेतुकं नास्ति सद्धेतुकमसत्कुतः ॥ ४० ॥
न तो असत्पदार्थ ही असत् कारणवाला है और न सत् पदार्थ ही असत् कारणवाला है। इसी प्रकार सत् पदार्थ भी सत् कारणवाला नहीं है; फिर असत् पदार्थ ही सत् कारणवाला कैसे हो सकता है ? ॥४०॥
शां० भा० ] अversion/अलातशान्तिप्रकरण २१९
| नास्त्यसद्धेतुकमसच्छश-<br>विषाणादि हेतुः कारणं यस्यासत<br>एव खकुसुमादेस्तदसद्धेतुकमसन्न<br>विद्यते । तथा सदपि घटादि-<br>वस्तु असद्धेतुकं शशविषाणादि-<br>कार्यं नास्ति । तथा सच्च<br>विद्यमानं घटादि विद्यमान-<br>घटादिवस्त्वन्तरकार्यं नास्ति ।<br>सत्कार्यमसत्कृत एव सम्भवति ?<br>न चान्यः कार्यकारणभावः<br>सम्भवति शक्यो वा कल्पयितुम् ?<br>अतो विवेकिनामसिद्ध एव कार्य-<br>कारणभावः कस्यचिदित्य-<br>भिप्रायः ॥ ४० ॥ | असत् कारणवाला असत्पदार्थ<br>भी नहीं है—जिस आकाशपुष्प<br>आदि असत्पदार्थका कोई शश-<br>शृङ्गादि असत् कारण हो ऐसा कोई<br>असद्धेतुक असत् पदार्थ भी विद्यमान<br>नहीं है । तथा घटादि सद्वस्तु भी<br>असद्धेतुक अर्थात् शशविषाणादि<br>[असत्पदार्थ] का कार्य नहीं है। इसी<br>प्रकार सत् यानी विद्यमान घट<br>आदि किसी अन्य सद्वस्तुका भी कार्य<br>नहीं है। फिर सत्का कार्य असत् ही<br>कैसे हो सकता है? इनके सिवा किसी<br>अन्य कार्य-कारण भावकी न तो<br>सम्भावना है और न कल्पना<br>ही की जा सकती है । अतः<br>तात्पर्य यह है कि विवेकियाेंके लिये<br>तो किसी वस्तुका भी कार्य-कारण-<br>भाव सिद्ध है ही नहीं ॥ ४० ॥ |
| पुनरपि जाग्रत्स्वप्नयोरसतोपि<br>कार्यकारणभावाशङ्कामपनयन्<br>आह— | जाग्रत् और स्वप्न असत् होनेपर<br>भी उनके कार्य-कारणभावके सम्बन्ध-<br>में जो शङ्का है उसकी निवृत्ति<br>करते हुए फिर भी कहते हैं— |
विपर्यासाद्यथा जाग्रदचिन्त्यान्भूतवत्स्पृशेत् ।
तथा स्वप्ने विपर्यासाद्धर्मांस्तत्रैव पश्यति ॥ ४१ ॥
जिस प्रकार मनुष्य भ्रान्तिवश जाग्रत्कालीन अचिन्त्य पदार्थोंको यथार्थवत् ग्रहण करता है उसी प्रकार स्वप्नमें भी भ्रान्तिवश [ स्वप्नकालीन ] पदार्थोंको वहीं ( उसी अवस्थामें ) देखता है ॥ ४१ ॥
| २२० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
विपर्यासादविवेक्तो यथा जाग्रज्जागरितेऽचिन्त्यान्भावान्-शक्यचिन्तनीयान् रज्जुसर्पादीन् भूतवत्परमार्थवत्स्पृशन्निव विकल्पयेदित्यर्थः कश्चिद्यथा, तथा स्वप्ने विपर्यासाद्धस्त्यादीन्धर्मान् पश्यन्निव विकल्पयति; तत्रैव पश्यति न तु जागरितादुत्पद्यमानानित्यर्थः ॥ ४१ ॥ | जिस प्रकार कोई पुरुष विपर्यास अर्थात् अविवेकके कारण जाग्रत्-अवस्था में रज्जु-सर्पादि अचिन्तनीय अर्थात् जिनका चिन्तन नहीं किया जा सकता ऐसे पदार्थोंको भूत—परमार्थवत् स्पर्श करते हुए-से कल्पना करता है । उसी प्रकार स्वप्नमें विपर्यासके कारण ही वह हाथी आदिको देखता हुआ-सा कल्पना करता है; अर्थात् उन्हें वह उसी अवस्थामें देखता है, न कि जाग्रत्से उत्पन्न होते हुए ॥४१॥
जगदुत्पत्तिका उपदेश किनके लिये हैं ?
उपसम्भात्समाचारादस्तिवस्तुत्ववादिनाम् ।
जातिस्तु देशिता बुद्धैरजातेस्त्रसतां सदा ॥ ४२ ॥
[ वस्तुओंकी ] उपलब्धि और [ वर्णाश्रमादि ] आचारके कारण जो पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करते हैं तथा अजातिसे भय मानते हैं, विद्वानोंने सर्वदा उन्हींके लिये जातिका उपदेश दिया है ॥ ४२ ॥
यापि बुद्धैरद्वैतवादिभिर्जातिर्दर्शितापदष्टा, उपलम्भनम् उपलम्भस्तस्मादुपलब्धेरित्यर्थः; समाचाराद्वर्णाश्रमादिधर्मसमाचरणात् , ताभ्यां हेतुभ्यामस्तिवस्तुत्ववादिनाम् अस्ति वस्तुभाव इत्येवं वदनशीलानां | तथा बुद्ध यानी अद्वैतवादी विद्वानोंने जो जाति (जगत्की उत्पत्ति) का उपदेश दिया है [ उसका यह कारण है— ] उपलम्भनका नाम उपलम्भ है उस उपलम्भ अर्थात् उपलब्धिसे और समाचार—वर्णाश्रमादि धर्मोंके सम्यक् आचरणसे—इन दोनों कारणोंसे वस्तुओंका अस्तित्व माननेवाले अर्थात् ‘[ द्वैत पदार्थोंका ] वस्तुत्व है' ऐसा कहने-
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २२१
| दृढांग्रहवतां श्रद्दधानानां मन्द-<br><br>विवेकिनामर्थोपायत्वेन सा<br><br>दर्शिता जातिः । तां गृह्णन्तु<br><br>तावत् । वेदान्ताभ्यासिनां तु<br><br>स्वयमेवाजाद्वयात्मविषयो विवेको<br><br>भविष्यतीति न तु परमार्थ-<br><br>बुद्ध्या। ते हि श्रोत्रियाः स्थूल-<br><br>बुद्धित्वादजातेः अजातिवस्तुनः<br><br>सदा त्रस्यन्त्यात्मनाशं मन्यमाना<br><br>अविवेकिन इत्यर्थः । उपायः<br><br>सोऽवतारायेत्युक्तम् ॥ ४२ ॥ | वाले दृढ आग्रही, श्रद्धालु और मन्द विवेकशील पुरुषोंको [ ब्रह्मात्मैक्य-बोधकी प्राप्तिरूप ] अर्थके उपाय-रूपसे उस जातिका उपदेश दिया है। [ उसमें उनका यही तात्पर्य है कि ] 'अभी वे भले ही उसे स्वीकार कर लें, परन्तु वेदान्तका अभ्यास करते-करते उन्हें स्वयं ही अजन्मा और अद्वितीय आत्मा-सम्बन्धी विवेक हो जायगा' उन्होंने परमार्थबुद्धिसे उसका उपदेश नहीं दिया; क्योंकि वे केवल श्रुति-परायण 'अविवेकी लोग स्थूलबुद्धि होनेके कारण अपना नाश मानते हुए अजाति अर्थात् जन्मरहित वस्तुसे सदा भय मानते हैं—यह इसका तात्पर्य है। यही बात हमने "उपायः सोऽवताराय" इत्यादि श्लोकमें (अद्वैतप्रकरण श्लो० १५ में ) कही है ॥४२॥ |
सन्मार्गगामी द्वैतवादियोंकी गति
अजातेस्त्रसतां तेषामुपलम्भाद्वियन्ति ये ।
जातिदोषा न सेत्स्यन्ति दोषोऽप्यल्पो भविष्यति ॥४३॥
द्वैतकी उपलब्धिके कारण जो विपरीत मार्गमें प्रवृत्त होते हैं अजातिसे भय माननेवाले उन लोगोंके लिये जातिसम्बन्धी दोष सिद्ध नहीं
| २२२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
हो सकते, [क्योंकि द्वैतवादी होनेपर भी वे सन्मार्गमें प्रवृत्त तो हुए ही रहते हैं]। [और यदि होगा भी तो] थोड़ा-सा ही दोष होगा ॥ ४२ ॥
| ये चैवमुपलम्भात्समाचाराच्चाजातेरजातिवस्तुनस्त्रसन्तोऽस्तिवस्त्वित्यद्वयादात्मनो वियन्ति विरुद्धं यन्ति द्वैतं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः । तेषामजातेस्त्रसतां श्रद्दधानानां सन्मार्गावलम्बिनां जातिदोषा जात्युपलम्भकृता दोषा न सेत्स्यन्ति सिद्धिं नोपयास्यन्ति, विवेकमार्गप्रवृत्तत्वात् । यद्यपि कश्चिद्दोषः स्यात्सोऽप्यल्प एव भविष्यति । सम्यग्दर्शनाप्रतिपत्तिहेतुक इत्यर्थः ॥ ४३ ॥ | जो लोग इस प्रकार [पदार्थोंकी] उपलब्धि और [वर्णाश्रमादिके] आचारोंके कारण अजन्मा वस्तुसे डरनेवाले हैं और 'द्वैत पदार्थ हैं' ऐसा समझकर अद्वय आत्मासे विरुद्ध चलते हैं, अर्थात् द्वैत स्वीकार करते हैं; उन अजातिसे भय माननेवाले श्रद्धालु और सन्मार्गावलम्बी पुरुषोंको जातिदोष—जातिकी उपलब्धिके कारण होनेवाले दोष सिद्ध नहीं होंगे, क्योंकि वे विवेकमार्गमें प्रवृत्त हैं। और यदि कुछ दोष होगा भी तो वह भी अल्प ही होगा; अर्थात् केवल सम्यग्दर्शनकी अप्राप्तिके कारण होनेवाला दोष ही होगा॥४३॥ |
उपलब्धि और आचरणकी अप्रमाणता
| ननूपलम्भसमाचारयोःप्रमाणत्वादस्त्येव द्वैतं वस्त्विति, न; उपलब्धिसमाचारयोर्व्यभिचारात्। कथं व्यभिचार इत्युच्यते— | यदि कहो कि उपलब्धि और आचरण तो प्रमाण हैं, इसलिये द्वैतवस्तु है ही, तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि उपलब्धि और आचरणका तो व्यभिचार भी होता है। किस प्रकार व्यभिचार होता है? सो बतलाया जाता है— |