संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१०६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
हुए विद्यारूपी कुठारसे उस ममतारूपी वृक्षको काट डालते हैं, वे विद्वान् पुरुष ही उस मोक्षमार्गसे जाते हैं और धूल तथा काँटोंसे रहित शीतल ब्रह्मवनमें पहुँचकर सब प्रकारकी वृत्तियोंसे रहित हो परमानन्दको प्राप्त होते हैं।*
अलर्कने कहा—भगवन्! आपकी कृपासे मुझे ऐसा उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ, जो जड़ प्रकृति और चेतन शक्तिका विवेक करानेवाला है; किन्तु मेरा मन विषयोंके वशीभूत है, अतः वह इस ज्ञानमें स्थिर नहीं हो पाता। मैं नहीं जानता कि इस प्रकृतिके बन्धनसे कैसे छूट सकूँगा। कैसे मेरा इस संसारमें फिर जन्म न हो? किस प्रकार मैं निर्गुण भावको प्राप्त होऊँ और कैसे सनातन ब्रह्मके साथ एकता प्राप्त करूँ? ब्रह्मन्! मुझे ऐसा ही उत्तम योग बताइये, जिससे मैं मुक्त हो सकूँ। इसके लिये आपके चरणोंमें मस्तक रखकर याचना करता हूँ; क्योंकि आप-जैसे संतोंका सङ्ग ही मनुष्योंका परम उपकार करनेवाला है।
दत्तात्रेयजी बोले—राजन्! योगीको ज्ञानकी प्राप्ति होकर जो उसका अज्ञानसे वियोग होता है, वही मुक्ति है और वही ब्रह्मके साथ एकता एवं प्राकृत गुणोंसे पृथक् होना है। मुक्ति होती है योगसे। योग प्राप्त होता है सम्यक् ज्ञानसे, सम्यक् ज्ञान होता है वैराग्यजनक दुःखसे और दुःख होता है ममताके कारण स्त्री, पुत्र, धन आदिमें चित्तकी आसक्ति होनेसे। अतः मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला पुरुष आसक्तिको दुःखका मूल समझकर यत्नपूर्वक त्याग दे। आसक्ति न होनेपर 'यह मेरा है' ऐसी धारणा दूर हो जाती है। ममताका अभाव सुखका ही साधक है। वैराग्यसे सांसारिक विषयोंमें दोषका दर्शन होता है। ज्ञानसे वैराग्य और वैराग्यसे ज्ञान होता है। जहाँ रहना हो, वही घर है। जिससे जीवन चले, वही भोजन है और जिससे मोक्ष मिले, वही ज्ञान बताया गया है। इसके सिवा सब अज्ञान है। राजन्! पुण्य और पापोंको भोग लेनेसे, नित्यकर्मोंका निष्कामभावसे अनुष्ठान करनेसे, अपूर्वका संग्रह न होनेसे तथा पूर्वजन्मके किये हुए कर्मोंका क्षय हो जानेसे मनुष्य बारंबार देहके बन्धनमें नहीं पड़ता। राजन्! यह तुमसे ज्ञानके विषयमें कुछ बातें बतलायी गयीं। अब उस योगका वर्णन सुनो, जिसे प्राप्त कर योगी पुरुष सनातन ब्रह्मसे कभी पृथक् नहीं होता।
योगियोंको पहले आत्मा (बुद्धि)-के द्वारा आत्मा (मन)-को जीतनेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि उसको जीतना बहुत कठिन है। अतः उसपर विजय पानेके लिये सदा ही यत्न करना चाहिये। उसका उपाय बतलाता हूँ, सुनो। प्राणायामके द्वारा राग आदि दोषोंका, धारणाके<sup>१</sup> द्वारा पापका, प्रत्याहारके<sup>२</sup> द्वारा विषयोंका और ध्यानके द्वारा ईश्वरविरोधी गुणोंका निवारण करे। जैसे पर्वतीय
* अज्ञानावृतरूढोऽयं ममेतित्वान्वयान् महान्। गृहक्षेत्रोत्थशाखश्च पुत्रदारादिपल्लवः॥
धनधान्यमहापत्रो नैरुज्याग्र्यप्रवर्धितः। पुण्यापुण्यप्रसूनश्च सुखदुःखमहाफलः ॥
तत्र मुक्तिरथव्याधो गृहासक्तमवेक्षतः। विविक्त्याभुक्तमासाद्यो ह्यज्ञानावहहारः ॥
संसाराध्वपरिश्रान्ता ये ह्यस्याधां समाश्रिताः। भ्रान्तिज्ञानसुखाधीनास्तेषामत्यन्तिकं कुतः॥
येस्तु रुत्खङ्गपाषाणशितेन ममतारुः। छिन्नो विद्याकुठारेण ते गतास्तेन वर्त्मना ॥
प्राप्य ब्रह्मवनं शीतं नीरजाकण्टकास्पदम्। प्राप्नुवन्ति परां प्रज्ञां निर्वृता वृत्तिवर्जिताः ॥
(३८। ८-१३)
१. देशबन्धाश्चित्तस्य धारणा—किसी एक स्थानमें चित्तको बाँधना अर्थात् परमात्मामें मनको स्थापित करना 'धारणा' है।
२. इन्द्रियोंके विषयोंकी ओरसे हटाकर चित्तमें लीन करना 'प्रत्याहार' कहलाता है।
- सुबाहुकी प्रेरणासे काशिराजका अलर्कपर आक्रमण, अलर्कका दत्तात्रेयजीसे योगका उपदेश लेना * १०७
धातुओंको आगमें तपानेसे उनके दोष जल जाते हैं, उसी प्रकार प्राणायाम करनेसे इन्द्रियजनित दोष दूर हो जाते हैं। अतः योगके ज्ञाता पुरुषको पहले प्राणायामका ही साधन करना चाहिये। प्राण और अपानवायुको रोकनेका नाम ही प्राणायाम है। यह लघु, मध्य और उत्तरीयके भेदसे तीन प्रकारका बताया गया है। अलर्क! अब मैं उसकी मात्रा बतलाता हूँ, सुनो। लघु प्राणायाम बारह मात्राका होता है। इससे दूनी मात्राका मध्यम और तिगुनी मात्राका उत्तरीय अथवा उत्तम बताया गया है। पलकोंको उठाने और गिरानेमें जितना समय लगता है, वही प्राणायामकी संख्याके लिये मात्रा कहा गया है। ऐसी ही बारह मात्राओंका लघुनामक प्राणायाम होता है। प्रथम प्राणायामके द्वारा स्वेद (पसीने) को, मध्यमके द्वारा कम्पको और तृतीय प्राणायामके द्वारा विषादको जीते। इस प्रकार क्रमशः इन तीनों दोषोंपर विजय प्राप्त करे। जैसे सिंह, व्याघ्र और हाथी सेवाके द्वारा कोमल हो जाते हैं, उनकी कठोरता दब जाती है, उसी प्रकार प्राणायाम करनेसे प्राण योगीके वशमें हो जाता है। जैसे हाथीवान मत्तवाले हाथीको भी वशमें करके उसे इच्छानुसार चलाता है, उसी प्रकार योगी वशमें किये हुए प्राणको अपनी इच्छाके अधीन रखता है। जैसे वशमें किया हुआ सिंह केवल मृगोंको ही मारता है, मनुष्योंको नहीं, उसी प्रकार प्राणायामके द्वारा वशमें किया हुआ प्राण केवल पापोंका नाश करता है, मनुष्यके शरीरका नहीं। इसलिये योगी पुरुषको सदा प्राणायाममें संलग्न रहना चाहिये।
राजन्! ध्वस्ति, प्राप्ति, संवित् और प्रसाद—ये मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाली प्राणायामकी चार अवस्थाएँ हैं। अब क्रमशः इनके स्वरूपका वर्णन सुनो। जिस अवस्थामें शुभ और अशुभ सभी कर्मोंका फल क्षीण हो जाय और जिनकी वासना नष्ट हो जाय, उसका नाम 'ध्वस्ति' है। जब योगी इस लोक और परलोकके भोगोंके प्रति लोभ और मोह उत्पन्न करनेवाली समस्त कामनाओंको रोककर सदा अपने-आपमें ही संतुष्ट रहता है, वह निरन्तर रहनेवाली 'प्राप्ति' नामक अवस्था है। जिस समय योगी सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रहोंके समान प्रभावशाली होकर उत्तम ज्ञान-सम्पत्ति प्राप्त करता है और उस ज्ञान-सम्पत्तिसे भूत-भविष्यकी बातोंको तथा दूर स्थित एवं अदृश्य वस्तुओंको भी जान लेता है, उस समय प्राणायामकी 'संवित्' नामक अवस्था होती है। जिस प्राणायामसे मन, पाँच प्राणवायु, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय प्रसादको प्राप्त होते हैं, वह उसकी 'प्रसाद' अवस्था है।
राजन्! अब प्राणायामका लक्षण तथा योगाभ्यासमें निरन्तर प्रवृत्त रहनेवाले योगीके लिये विहित आसन बतलाता हूँ, सुनो। पद्मासन, अर्धासन, स्वस्तिकासन आदि आसनोंसे बैठकर मन ही मन प्रणवका चिन्तन करते हुए योगाभ्यास करे। शरीरको समभावसे रखे, आसन भी सम हो। दोनों पैरोंको समेटकर दोनों जाँघोंको आगेकी ओर स्थिर करे। मुँहको बंद किये रहे। एड़ियोंको इस प्रकार रखे, जिससे वे लिङ्ग और अण्डकोषका स्पर्श न कर सकें। मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए स्थिर रहे। मस्तकको कुछ ऊँच किये रहे। दाँतोंका दाँतोंसे स्पर्श न होने दे। अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए अन्य दिशाओंकी ओर न देखे। रजोगुणसे तमोगुणको और सत्त्वगुणसे रजोगुणकी वृत्तिको भलीभाँति आच्छादित करके निर्मल सत्त्वमें स्थित हो योगवेत्ता पुरुष योगका अभ्यास करे। इन्द्रिय, प्राण आदि और मनको उनके विषयोंसे हटाकर प्रत्याहार आरम्भ करे। जैसे कछुआ अपने सब अङ्गोंको समेट लेता है, उसी प्रकार जो समस्त कामनाओंको संकुचित कर लेता है, वह निरन्तर आत्मामें ही रमण करनेवाला और एकमात्र परमात्मामें स्थित
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हुआ पुरुष अपने आत्मामें ही आत्माका साक्षात्कार करता है। विद्वान् पुरुष बाहर-भीतरकी शुद्धिका सम्पादन करके कण्ठसे लेकर नाभितक शरीरको प्राणवायुसे परिपूर्ण करते हुए प्राणायाम आरम्भ करे। प्राणायाम बारह हैं। उन्हींको धारणा भी कहते हैं। तत्त्वदर्शी योगियोंने योगमें दो धारणाएँ बतलायी हैं। उनके अनुसार योगमें प्रवृत्त हुए नियतात्मा योगीके सभी दोष नष्ट हो जाते हैं तथा वह स्वस्थ भी हो जाता है। वह परब्रह्म परमात्माको और प्राकृत गुणोंको पृथक्-पृथक् देखता है, व्योमसे लेकर परमाणुतकका साक्षात्कार करता है तथा निष्पाप आत्माका भी दर्शन कर लेता है। इस प्रकार प्राणायामपरायण एवं मिताहारी योगी पुरुष धीरे-धीरे एक-एक भूमिको वशमें करके दूसरेपर पैर बढ़ाये, जैसे महलमें जाते समय एक-एक सीढ़ीको पार करके दूसरेपर चढ़ा जाता है। जो भूमि अपने वशमें नहीं हुई है, उसमें जानेसे वह दोष, रोग आदि दुःख तथा मोहको बढ़ाती है; अतः उसपर न चढ़े। प्राणवायुके निरोधको प्राणायाम कहते हैं। अपने मनको संयममें रखनेवाले योगी पुरुष शब्दादि विषयोंकी ओर जानेवाली इन्द्रियोंको उनकी ओरसे योगद्वारा प्रत्याहृत-निवृत्त करते हैं, इसलिये वह प्रत्याहार कहलाता है।
योगी महर्षियोंने इस विषयमें ऐसा उपाय भी बताया है, जिससे योगाभ्यासी पुरुषको रोग आदि दोष नहीं होते। जैसे जलार्थी मनुष्य यन्त्र और नली आदिकी सहायतासे धीरे-धीरे जल पीते हैं, उसी प्रकार योगी पुरुष श्रमको जीतकर धीरे-धीरे वायुका पान करे। पहले नाभिमें, फिर हृदयमें, तदनन्तर तीसरे स्थान—वक्षःस्थलमें। उसके बाद क्रमशः कण्ठ, मुख, नासिकाके अग्रभाग, नेत्र, भौंहोंके मध्यभाग तथा मस्तकमें प्राणवायुको धारण करे। उसके बाद परब्रह्म परमात्मामें उसकी धारणा करनी चाहिये। वह सबसे उत्तम धारणा मानी गयी है। इन दसों धारणाओंको प्राप्त होकर योगी अविनाशी ब्रह्मकी सत्ताको प्राप्त होता है।
राजन्! सिद्धिकी इच्छा रखनेवाला योगी पुरुष बड़े आदरके साथ योगमें प्रवृत्त हो। वह अधिक खाये हुए अथवा खाली पेट, थका और व्याकुलचित्त न हो। जब अधिक सर्दी या अधिक गर्मी पड़ती हो, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंकी प्रबलता हो अथवा बड़े जोरकी आँधी चलती हो, ऐसे अवसरोंपर ध्यानपरायण होकर योगका अभ्यास नहीं करना चाहिये। कोलाहलपूर्ण स्थानमें, आग और पानीके समीप, पुरानी गोशालामें, चौराहेपर, सूखे पत्तोंके ढेरपर, नदीमें, श्मशानभूमिमें, जहाँ सर्पोंका निवास हो वहाँ, भयपूर्ण स्थानमें, कुएँके तटपर, मन्दिरमें तथा दीमकोंकी मिट्टीके ढेरपर—इन सब स्थानोंमें तत्त्वज्ञ पुरुष योगाभ्यास न करे। जहाँ सात्त्विकभावकी सिद्धि न हो, ऐसे देश-कालका परित्याग करे। योगमें असत् वस्तुका दर्शन भी निषिद्ध है; अतः उसे भी छोड़ दे। जो मूर्खतावश उक्त स्थानोंकी परवा न करके वहीं योगाभ्यास आरम्भ करता है, उसके कार्यमें विघ्न डालनेके लिये बहरापन, जड़ता, स्मरणशक्तिका नाश, गूँगापन, अंधापन और ज्वर आदि अनेक दोष तत्काल प्रकट होते हैं।
यदि प्रमादवश योगीके सामने ये दोष प्रकट हों तो उनका नाश करनेके लिये जिस चिकित्साकी आवश्यकता है, उसे सुनो। यदि वातरोग, गुल्मरोग, उदावर्त (गुदा-सम्बन्धी रोग) तथा और कोई उदरसम्बन्धी रोग हो जाय तो उसकी शान्तिके लिये घी मिलायी हुई जौकी गरम-गरम लपसी खा ले अथवा केवल उसकी धारणा करे। वह रुकी हुई वायुको निकालती और वायुगोलाको दूर करती है। इसी प्रकार जब शरीरमें कम्प पैदा हो तो मनमें बड़े भारी पर्वतकी धारणा करे। बोलनेमें रुकावट होनेपर वाग्देवीकी और बहरापन आनेपर श्रवणशक्तिकी धारणा करे। इसी प्रकार प्याससे पीड़ित होनेपर ऐसी धारणा करे कि जिह्वापर आमका फल रखा हुआ है और उससे रस मिल
- योगके विघ्न, उनसे बचनेके उपाय, सात धारणा, आठ ऐश्वर्य तथा योगीकी मुक्ति * १०९
रहा है। तात्पर्य यह कि जिस-जिस अङ्गमें रोग पैदा हो, वहाँ-वहाँ उसमें लाभ पहुँचानेवाली धारणा करे। गर्मीमें सर्दीकी और सर्दीमें गर्मीकी धारणा करे। धारणाके द्वारा ही अपने मस्तकपर काष्ठकी कील रखकर दूसरे काष्ठके द्वारा उसे ठोंकनेकी भावना करे। इससे योगीकी लुप्त हुई स्मरणशक्तिका तत्काल ही आविर्भाव हो जाता है। इसके सिवा सर्वत्र व्यापक द्युलोक, पृथ्वी, वायु और अग्निकी भी धारणा करे। इससे अमानवीय शक्तियों तथा जीव-जन्तुओंसे होनेवाली बाधाओंकी चिकित्सा होती है। यदि कोई मानवेतर जीव योगीके भीतर प्रवेश कर जाय तो वह वायु और अग्निकी धारणा करके उसे अपने शरीरके भीतर ही जला डाले। राजन्! इस प्रकार योगवेत्ता पुरुषको सब प्रकारसे अपनी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि यह शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका साधक है।
योग-प्रवृत्तिके लक्षणोंको बतलाने तथा उनपर गर्व करनेसे योगीका विज्ञान लुप्त हो जाता है; इसलिये उन प्रवृत्तियोंको गुप्त ही रखना चाहिये। चञ्चलताका न होना, नीरोग रहना, निष्ठुरता न धारण करना, उत्तम सुगन्धका आना, मल-मूत्र कम होना, शरीरमें कान्ति, मनमें प्रसन्नता और वाणीके स्वरमें कोमलताका उदय होना—ये सब योगप्रवृत्तिके प्रारम्भिक चिह्न हैं। यदि योगीको देखकर लोगोंके मनमें अनुराग हो, परोक्षमें सब लोग उसके गुणोंका बखान करने लगें और कोई भी जीव-जन्तु उससे भयभीत न हो तो वह योगमें सिद्धि प्राप्त होनेकी उत्तम पहचान है। जिसे अत्यन्त भयानक सर्दी-गर्मी आदिसे कोई कष्ट नहीं होता तथा जो दूसरोंसे भयभीत नहीं होता, सिद्धि उसके निकट खड़ी है।
योगके विघ्न, उनसे बचनेके उपाय, सात धारणा, आठ ऐश्वर्य तथा योगीकी मुक्ति
दत्तात्रेयजी कहते हैं—आत्मसाक्षात्कारके समय योगी पुरुषके समक्ष जो विघ्न उपस्थित होते हैं, उनका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ; सुनो। उस समय वह सकाम कर्म करना चाहता है और मानवीय भोगोंकी अभिलाषा करता है। दानके उत्तमोत्तम फल, स्त्री, विद्या, माया, सोना-चाँदी आदि धन, याने आदिके अतिरिक्त वैभव, स्वर्गलोक, देवत्व, इन्द्रत्व, रसायनसंग्रह, उसे बनानेकी क्रियाएँ, हवामें उड़नेकी शक्ति, यज्ञ, जल और अग्निमें प्रवेश करना, श्राद्धों तथा समस्त दानोंका फल तथा नियम, व्रत, इष्ट, पूर्त एवं देव-पूजा आदिसे मिलनेवाले फलोंकी इच्छा करता है। जब चित्तकी ऐसी अवस्था हो तो योगी उसे कामनाओंकी ओरसे हटाये और परब्रह्मके चिन्तनमें लगाये। ऐसा करनेपर उसे विघ्नोंसे छुटकारा मिल जाता है।
इन विघ्नोंपर विजय पा लेनेके बाद योगीके सामने फिर दूसरे-दूसरे सात्त्विक, राजस और तामस विघ्न उपस्थित होते हैं। प्रतिभा, श्रावण, दैव, भ्रम और आवर्त—ये पाँच उपसर्ग योगियोंके योगमें विघ्न डालनेके लिये प्रकट होते हैं। इनका परिणाम बड़ा कटु होता है। जब सम्पूर्ण वेदोंके अर्थ, काव्य और शास्त्रोंके अर्थ, सम्पूर्ण विद्याएँ और शिल्पकला आदि अपने-आप योगीकी समझमें आ जायें तो प्रतिभासे सम्बन्ध रखनेके कारण वह 'प्रतिभ' उपसर्ग कहलाता है। जब योगी सहस्रों योजन दूरसे भी सम्पूर्ण शब्दोंको सुनने और उनके अभिप्रायको समझने लगता है, तब वह श्रवण-शक्तिसे सम्बन्ध रखनेके कारण 'श्रावण'
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- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
उपसर्ग कहा जाता है। जब वह देवताओंकी भाँति आठों दिशाओंकी वस्तुओंको प्रत्यक्ष देखने लगता है, तब उसे 'दैव' उपसर्ग कहते हैं। जब योगीका मन दोषके कारण सब प्रकारके आचारोंसे भ्रष्ट हो निराधार भटकने लगता है, तब वह 'भ्रम' कहलाता है। जलमें उठती हुई भँवरकी तरह जब ज्ञानका आवर्त्त सब ओर व्याप्त होकर चित्तको नष्ट कर देता है, तब वह 'आवर्त' नामक उपसर्ग कहा जाता है। इन महाघोर उपसर्गोंसे योगका नाश हो जानेके कारण सम्पूर्ण योगी देवतुल्य होकर भी बारंबार आवागमनके चक्रमें घूमते हैं। इसलिये योगी पुरुष शुद्ध मनोमय उज्ज्वल केवल ओङ्कार परब्रह्म परमात्मामें मनको लगाकर सदा उन्हींका चिन्तन करे।
पृथ्वी आदि सात प्रकारकी सूक्ष्म धारणाएँ हैं, जिन्हें योगी मस्तकमें धारण करे। सबसे पहले पृथ्वीकी धारणा है। उसे धारण करनेसे योगीको सुख प्राप्त होता है। वह अपनेको साक्षात् पृथ्वी मानता है, अतः पार्थिव विषय गन्धका त्याग कर देता है। इसी प्रकार वह जलकी धारणासे सूक्ष्म रसका, तेजकी धारणासे सूक्ष्म रूपका, वायुकी धारणासे स्पर्शका तथा आकाशकी धारणासे सूक्ष्म प्रवृत्ति तथा शब्दका त्याग करता है। जब अपने मनसे धारणाके द्वारा सम्पूर्ण भूतोंके मनमें प्रवेश करता है, तब उस मानसी धारणाको धारण करनेके कारण उसका मन अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है। इसी प्रकार योगवेत्ता पुरुष सम्पूर्ण जीवोंकी बुद्धिमें प्रवेश करके परम उत्तम सूक्ष्म बुद्धिको प्राप्त करता और फिर उसे त्याग देता है। अलर्क! जो योगी इन सातों सूक्ष्म धारणाओंका अनुभव करके उन्हें त्याग देता है, उसको इस संसारमें फिर नहीं आना पड़ता। जितात्मा पुरुष क्रमशः इन सातों धारणाओंके सूक्ष्म रूपको देखे और त्याग करता जाय। ऐसा करनेसे वह परम सिद्धिको प्राप्त होता है। राजन्! योगी पुरुष जिस-जिस भूतमें राग करता है, उसी-उसीमें आसक्त होकर नष्ट हो जाता है। इसलिये इन समस्त सूक्ष्म भूतोंको परस्पर संसक्त जानकर जो इन्हें त्याग देता है, उसे परमपदकी प्राप्ति होती है। पाँचों भूत और मन-बुद्धिके इन सातों सूक्ष्म रूपोंका विचार कर लेनेपर उनके प्रति वैराग्य होता है, जो सद्भावका ज्ञान रखनेवाले पुरुषकी मुक्तिका कारण बनता है। जो गन्ध आदि विषयोंमें आसक्त होता है, उसका विनाश हो जाता है और उसे बारंबार संसारमें जन्म लेना पड़ता है। योगी पुरुष इन सातों धारणाओंको जीत लेनेके बाद यदि चाहे तो किसी भी सूक्ष्म भूतमें लीन हो सकता है। देवता, असुर, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंके शरीरमें भी वह लीन हो जाता है, किन्तु कहीं भी आसक्त नहीं होता।
अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामावसायित्व—इन आठ ईश्वरीय गुणोंको जो निर्वाणकी सूचना देनेवाले हैं, योगी प्राप्त करता है। सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म रूप धारण करना 'अणिमा' है और शीघ्र-से-शीघ्र कोई काम कर लेना 'लघिमा' नामक गुण है। सबके लिये पूजनीय हो जाना 'महिमा' कहलाता है। जब कोई भी वस्तु अप्राप्य न रहे तो वह 'प्राप्ति' नामक सिद्धि है। सर्वत्र व्यापक होनेसे योगीको 'प्राकाम्य' नामक सिद्धिकी प्राप्ति मानी जाती है। जब वह सब कुछ करनेमें समर्थ—ईश्वर हो जाता है तो उसकी वह सिद्धि 'ईशित्व' कहलाती है। सबको वशमें कर लेनेसे 'वशित्व' की सिद्धि होती है। यह योगीका सातवाँ गुण है। जिसके द्वारा इच्छाके अनुसार कहीं भी रहना आदि सब काम हो सके, उसका नाम 'कामावसायित्व' है। ये ऐश्वर्यके साधनभूत आठ गुण हैं।
मुक्त होनेसे उसका कभी जन्म नहीं होता। वह वृद्धि और नाशको भी नहीं प्राप्त होता। न तो
- योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * | १९१ ---|---
उसका क्षय होता है और न परिणाम। पृथ्वी आदि भूतसमुदायसे न तो वह काटा जाता है, न भीगकर गलता है, न जलता है और न सूखता ही है। शब्द आदि विषय भी उसको लुभा नहीं सकते। उसके लिये शब्द आदि विषय हैं ही नहीं। न तो वह उनका भोक्ता है और न उनसे उसका संयोग होता है। जैसे अन्य खोटे द्रव्योंसे मिला और खण्ड-खण्ड हुआ सुवर्ण जब आगमें तपाया जाता है, तब उसका दोष जल जाता है और वह शुद्ध होकर अपने दूसरे टुकड़ोंसे मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार बलशील योगी जब योगाग्निसे तपता है, तब अन्तःकरणके समस्त दोष जल जानेके कारण ब्रह्मके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है। फिर वह किसीसे पृथक् नहीं रहता। जैसे आगमें डाली हुई आग उसमें मिलकर एक हो जाती है, उसका वही नाम और वही स्वरूप हो जाता है, फिर उसको विशेष रूपसे पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी तरह जिसके पाप दग्ध हो गये हैं, वह योगी परब्रह्मके साथ एकताको प्राप्त होनेपर फिर कभी उनसे पृथक् नहीं होता। जैसे जलमें डाला हुआ जल उसके साथ मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार योगीका आत्मा परमात्मामें मिलकर तदाकार हो जाता है।
योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना
अलर्क बोले— भगवन्! अब मैं योगीके आचार-व्यवहारका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ। वह किस प्रकार ब्रह्मके मार्गका अनुसरण करके कभी क्लेशमें नहीं पड़ता?
दत्तात्रेयजीने कहा— राजन्! ये जो मान और अपमान हैं, ये साधारण मनुष्योंको प्रसन्नता और उद्वेग देनेवाले होते हैं। उन्हें मानसे प्रसन्नता और अपमानसे उद्वेग होता है; किन्तु योगी उन दोनोंको ही ठीक उलटे अर्थमें ग्रहण करता है। अतः वे उसकी सिद्धिमें सहायक होते हैं। योगके लिये मान और अपमानको विष एवं अमृतके रूपमें बताया गया है। इनमें अपमान तो अमृत है और मान भयंकर विष। योगी मार्गको भलीभाँति देखकर पैर रखे। वस्त्रसे छानकर जल पीये, सत्य वचन बोले और बुद्धिसे विचार करके जो ठीक जान पड़े, उसीका चिन्तन करे।* योगवेत्ता पुरुष आतिथ्य, श्राद्ध, यज्ञ, देवयात्रा तथा उत्सवोंमें न जाय। कार्यकी सिद्धिके लिये किसी बड़े आदमीके यहाँ भी कभी न जाय। जब गृहस्थके यहाँ रसोई घरसे धुआँ न निकलता हो, आग बुझ गयी हो और घरके सब लोग खा-पी चुके हों, उस समय योगी भिक्षाके लिये जाय; परन्तु प्रतिदिन एक ही घरपर न जाय। योगमें प्रवृत्त रहनेवाला पुरुष सत्पुरुषोंके मार्गको कलङ्कित न करते हुए प्रायः ऐसा व्यवहार करे, जिससे लोग उसका सम्मान न करें, तिरस्कार ही करें। वह गृहस्थोंके यहाँसे अथवा घूमते-फिरते रहनेवाले लोगोंके घरोंसे भिक्षा ग्रहण करे; इनमें भी पहली अर्थात् गृहस्थके घरकी भिक्षा ही सर्वश्रेष्ठ एवं मुख्य है। जो गृहस्थ विनीत, श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, श्रोत्रिय एवं उदार हृदयवाले हों, उन्हींके यहाँ योगीको सदा भिक्षाके लिये जाना चाहिये। इनके बाद जो दुष्ट और पतित न हों, ऐसे अन्य लोगोंके
* मानापमानौ बालेतौ प्रीत्युद्वेगकरौ नृणाम्। तावेव विपरीतार्थौ योगिनः सिद्धिकारकौ॥
मानापमानौ यावेतौ तयोरेतद्विचिन्तयेत्। अपमानोऽमृतं तत्र मानस्तु विषमं विषम्॥
चक्षुःपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेद्वाणीं बुद्धिपूतं च चिन्तयेत्॥ (४१ । २—४)
१९२ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
यहाँ भी वह भिक्षाके लिये जा सकता है; परन्तु छोटे वर्णके लोगोंके यहाँ भिक्षा माँगना निकृष्ट वृत्ति मानी गयी है। योगीके लिये भिक्षाप्राप्त अन्न, जौकी लपसी, छाछ, दूध, जौकी खिचड़ी, फल, मूल, कँगनी, कण, तिलका चूर्ण और सत्तू—ये आहार उत्तम और सिद्धिदायक हैं। अतः योगी इन्हें भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्तसे भोजनके काममें ले। पहले एक बार जलसे आचमन करके मौन हो क्रमशः पाँच ग्रासोंकी प्राणरूप अग्निमें आहुति दे। 'प्राणाय स्वाहा' कहकर पहला ग्रास मुँहमें डाले। यही प्रथम आहुति मानी गयी है। इसी प्रकार 'अपानय स्वाहा' से दूसरी, 'समानाय स्वाहा' से तीसरी, 'उदानाय स्वाहा' से चौथी और 'व्यानाय स्वाहा' से पाँचवीं आहुति दे। फिर प्राणायामके द्वारा इन्हें पृथक् करके शेष अन्न इच्छानुसार भोजन करे। भोजनके अन्तमें फिर एक बार आचमन करे। तत्पश्चात् हाथ-मुँह धोकर हृदयका स्पर्श करे। चोरी न करना, ब्रह्मचर्यका पालन, त्याग, लोभका अभाव और अहिंसा—ये भिक्षुओंके पाँच व्रत हैं। क्रोधका अभाव, गुरुकी सेवा, पवित्रता, हल्का भोजन और प्रतिदिन स्वाध्याय—ये पाँच उनके नियम बताये गये हैं।*
जो योगी 'यह जानने योग्य है, वह जानने योग्य है' इस प्रकार भिन्न-भिन्न विषयोंकी जानकारीके लिये लालायित-सा होकर इधर-उधर बिचरता है, वह हजारों कल्पोंमें भी ज्ञातव्य वस्तुको नहीं पा सकता। आसक्तिका त्याग करके, क्रोधको जीतकर, स्वल्पाहारी और जितेन्द्रिय हो, बुद्धिसे इन्द्रियद्वारोंको रोककर मनको ध्यानमें लगावे। योगयुक्त रहनेवाला योगी सदा एकान्त स्थानोंमें, गुफाओं और वनोंमें भलीभाँति ध्यान करे। वाग्दण्ड, कर्मदण्ड और मनोदण्ड—ये तीन दण्ड जिसके अधीन हों, वही महायति त्रिदण्डी है। राजन्! जिसकी दृष्टिमें सत्-असत् तथा गुण-अवगुणरूप यह समस्त जगत् आत्मस्वरूप हो गया है, उस योगीके लिये कौन प्रिय है और कौन अप्रिय। जिसकी बुद्धि शुद्ध है, जो मिट्टीके ढेले और सुवर्णको समान समझता है, सब प्राणियोंके प्रति जिसका समान भाव है, वह एकाग्रचित्त योगी उस सनातन अविनाशी परम पदको प्राप्त होकर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। वेदोंसे सम्पूर्ण यज्ञकर्म श्रेष्ठ हैं, यज्ञोंसे जप, जपसे ज्ञानमार्ग और उससे आसक्ति एवं रागसे रहित ध्यान श्रेष्ठ है। ऐसे ध्यानके प्राप्त हो जानेपर सनातन ब्रह्मकी उपलब्धि होती है। जो एकाग्रचित्त, ब्रह्मपरायण, प्रमादरहित, पवित्र, एकान्तप्रेमी और जितेन्द्रिय होता है, वही महात्मा इस योगको पाता है और फिर अपने उस योगसे ही वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।†
* अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च त्यागोऽलोभस्तथैव च। व्रतानि पञ्च भिक्षूणामहिंसापरमाणि वै॥
अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचमाहारलाघवम्। नित्यस्वाध्याय इत्येते नियमाः पञ्च कीर्त्तिताः॥
(४१। १६-१७)
† त्यक्तसङ्गो जितक्रोधो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः। विधाय बुद्ध्या द्वाराणि मनो ध्याने निवेशयेत्॥
शून्येष्वेवावकाशेषु गुहासु च वनेषु च। नित्ययुक्तः सदा योगी ध्यानं सम्युगुपक्रमेत्॥
वाग्दण्डः कर्मदण्डश्च मनोदण्डश्च ते त्रयः। यस्यैते नियता दण्डाः स त्रिदण्डी महायतिः॥
सर्वमात्ममयं यस्य सदसज्जगदीदृशम्। गुणगुण्यमयं तस्य कः प्रियः को नृपाप्रियः॥
विशुद्धबुद्धिः समलोष्टकाञ्चनः समन्तभूतेषु समः समाहितः।
स्थानं परं शाश्वतमव्ययं च परं हि गत्वा न पुनः प्रजायते॥
वेदाच्छ्रेष्ठाः सर्वयज्ञक्रियाश्च यज्ञाज्जप्यं ज्ञानमार्गाश्च ध्यानात्।
ज्ञानाद्ध्यानं सङ्गरागव्यपेतं तस्मिन् प्राप्ते शाश्वतस्योपलब्धिः॥
समाहितो ब्रह्मपरोऽप्रमादी शुचिस्तथैकान्तगतिर्यतेन्द्रियः।
समाप्नुयाद् योगमिमं महात्मा विमुक्तिमाप्नोति ततः स्वयोगतः॥ (४१। २०-२६)
- योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * ११३
दत्तात्रेयजी कहते हैं—जो योगी इस प्रकार भलीभाँति योगचर्यामें स्थित होते हैं, उन्हें सैकड़ों जन्मोंमें भी अपने पथसे विचलित नहीं किया जा सकता। जिनके सब ओर चरण, मस्तक और कण्ठ हैं, जो इस विश्वके स्वामी तथा विश्वको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन विश्वरूपी परमात्माका प्रत्यक्ष दर्शन करके उनकी प्राप्तिके लिये परम पुण्यमय 'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रका जप करे; उसीका अध्ययन करे। अब उसके स्वरूपका वर्णन सुनो। अकार, उकार और मकार—ये जो तीन अक्षर हैं, ये ही तीन मात्राएँ हैं। ये क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस हैं। इनके सिवा एक अर्द्धमात्रा भी है जो अनुस्वार या बिन्दुके रूपमें इन सबके ऊपर स्थित है। वह अर्द्धमात्रा निर्गुण है। योगी पुरुषोंको ही उसका ज्ञान हो पाता है। उसका उच्चारण गान्धार स्वरसे होता है, इसलिये उसे 'गान्धारी' भी कहते हैं। उसका स्पर्श चींटीकी गतिके समान होता है। प्रयोग करनेपर वह मस्तक-स्थानमें दृष्टिगोचर होती है। जैसे ॐकार उच्चारण किया जानेपर मस्तकके प्रति गमन करता है, उसी प्रकार ॐकारमय योगी अक्षरब्रह्ममें मिलकर अक्षररूप हो जाता है। प्रणव (ॐकार) धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म वेधनेयोग्य उत्तम लक्ष्य है। उस लक्ष्यको सावधानीके साथ वेधना चाहिये और बाणकी ही भाँति लक्ष्यमें प्रवेश करके तन्मय हो जाना चाहिये। यह ॐकार ही तीनों वेद, तीनों लोक, तीनों अग्नि, ब्रह्मा विष्णु तथा महादेव एवं ऋक्-साम और यजुर्वेद है। इस ॐकारमें वस्तुतः साढ़े तीन मात्राएँ जाननी चाहिये। उनके चिन्तनमें लगा हुआ योगी उन्हींमें लयको प्राप्त होता है। अकार भूर्लोक, उकार भुवर्लोक और व्यञ्जनरूप मकार स्वर्लोक कहलाता है। पहली मात्रा व्यक्त, दूसरी अव्यक्त, तीसरी चिच्छक्ति तथा चौथी अर्द्धमात्रा परमपद कहलाती है। इसी क्रमसे इन मात्राओंको योगकी भूमि समझना चाहिये। ॐकारके उच्चारणसे सम्पूर्ण सत् और असत्का ग्रहण हो जाता है। पहली मात्रा ह्रस्व, दूसरी दीर्घ और तीसरी प्लुत है, किन्तु अर्द्धमात्रा वाणीका विषय नहीं है। इस प्रकार यह ॐकार नामक अक्षर परब्रह्मस्वरूप है। जो मनुष्य इसे भलीभाँति जानता अथवा इसका ध्यान करता है, वह संसार-चक्रका त्याग करके त्रिविध बन्धनोंसे मुक्त हो परब्रह्म परमात्मामें लीन हो जाता है।* जिसका
* तन्प्राप्तये महत् पुण्यामोमित्येकाक्षरं जपेत्। तदेवाध्ययनं तस्य स्वरूपं शृण्वतः परम्॥
अकारश्च तथोकारो मकारश्चाक्षरत्रयम्। एता एव त्रयो मात्राः सात्त्वराजसतामसाः॥
निर्गुणा योगिगम्यान्त्या चार्द्धमात्रोर्ध्वसंस्थिता।
गान्धारीति च विज्ञेया गान्धारस्वरसंश्रया। पिपीलिकागतिस्पर्शा प्रयुक्ता मूर्ध्नि लक्ष्यते॥
यथा प्रयुक्त ओङ्कारः प्रतियातीति मूर्द्धनि। तथोङ्कारमयी योगी त्वक्षरे त्वक्षरो भवेत्॥
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुत्तमम्। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥
ओमितिह्येतत् त्रयो वेदास्त्रयो लोकास्त्रयोऽग्नयः। विष्णुर्ब्रह्मा हरश्चैव ऋक्सामानि यजूंषि च॥
मात्राः सार्द्धाश्च तिस्रश्च विज्ञेयाः परमार्थतः। तत्र युक्तस्तु यो योगी स तल्लयमवाप्नुयात्॥
अकारस्त्वथ भूर्लोक उकारश्चोच्यते भुवः। सव्यञ्जने मकारश्च स्वर्लोकः परिकल्प्यते।
व्यक्ता तु प्रथमा मात्रा द्वितीयाव्यक्तसंज्ञिता। मात्रा तृतीया चिच्छक्तिरर्द्धमात्रा परं पदम्॥
अनेनैव क्रमेणैता विज्ञेया योगभूमयः। ओमित्युच्चारणात् सर्वं गृहीतं सदसद्द्वयम्॥
ह्रस्वा तु प्रथमा मात्रा द्वितीया दीर्घसंयुक्ता। तृतीया च प्लुता ज्ञेया वचसः सा न गोचरा॥
इत्येतदक्षरं ब्रह्म परमोङ्कारसंज्ञितम्। यस्तु वेद नरः सम्यक् तथा ध्यायति वा पुनः॥
संसारचक्रमुत्सृज्य त्यक्तत्रिविधबन्धनः। प्राप्नोति ब्रह्मणि लयं परमे परमात्मनि॥
(४२ ३—१५)
११४
- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
कर्मबन्धन क्षीण नहीं हुआ है, वह अरिष्टसे अपनी मृत्यु जानकर प्राणत्यागके समय भी योगका चिन्तन करे। इससे वह दूसरे जन्ममें पुनः योगी होता है। इसलिये जिसका योग सिद्ध नहीं हुआ है, वह तथा जिसका योग सिद्ध हो चुका है, वह भी सदा मृत्युसूचक अरिष्टोंको जाने, जिससे मृत्युके समय उसे कष्ट न उठाना पड़े।
महाराज! अब अरिष्टोंका वर्णन सुनो। मैं उन अरिष्टोंको बतलाता हूँ, जिनके देखनेसे योगवेत्ता पुरुष अपनी मृत्युको जान लेता है। जो मनुष्य देवमार्ग (आकाशगङ्गा), ध्रुव, शुक्र, चन्द्रमाकी छाया और अरुन्धतीको नहीं देख पाता, वह एक वर्षके बाद जीवित नहीं रहता। जो सूर्यके मण्डलको किरणोंसे रहित और अग्निको किरणमालाओंसे मण्डित देखता है, वह मनुष्य ग्यारह महीनेसे अधिक नहीं जी सकता। जो स्वप्नमें वमन, मूत्र और विष्ठाके भीतर सोने और चाँदीका प्रत्यक्ष दर्शन करता है, उसकी आयु दस महीनेतककी ही है। जो प्रेत, पिशाच आदि, गन्धर्वनगर तथा सुवर्णके वृक्ष देखने लगता है, वह नौ महीनेतक जीवित रहता है। जो अकस्मात् स्थूल शरीरसे दुर्बल शरीरका हो जाता है या दुर्बलसे स्थूल हो जाता है तथा जिसकी प्रकृति सहसा बदल जाती है, उसका जीवन आठ महीनेतक ही रहता है। धूल या कीचड़में पैर रखनेपर जिसकी एड़ी या पादाग्रभागका चिह्न खण्डित दिखायी दे, वह सात मासतक जीवित रहता है। यदि गीध, कबूतर, डाभ्र, कौआ, मांसखोर पक्षी या नीले रंगका पक्षी मस्तकपर बैठ जाय तो वह छः मास आयु शेष रहनेकी सूचना देता है। यदि कौए आकर चोंच मारें या धूलकी वर्षासे आहत होना पड़े तथा अपनी छाया और तरहकी दिखायी दे तो वह चार पाँच महीने ही जीवित रहता है। यदि बिना बादलके ही दक्षिण दिशाके आकाशमें बिजली चमकती दिखायी दे और रातमें इन्द्रधनुषका दर्शन हो तो उस मनुष्यका जीवन दो तीन महीनेका ही है। जो घी, तेल, दर्पण अथवा जलमें अपनी परछाईं न देख सके अथवा देखे भी तो बेसिरकी ही परछाईं दिखायी दे तो वह एक महीनेसे अधिक नहीं जी सकता। राजन्! जिस योगीके शरीरसे बकरे अथवा मुर्देकी-सी दुर्गन्ध आती हो, उसका जीवन पंद्रह दिनोंका ही समझना चाहिये। स्नान करते ही जिसकी छाती और पैर सूख जायें तथा जल पीनेपर भी कण्ठ सूखने लगे, वह केवल दस दिनतक ही जीवित रह सकता है। जिसके भीतरकी वायु पृथक् होकर मर्मस्थानोंको छेदती-सी जान पड़े तथा जलके स्पर्शसे भी जिसके शरीरमें रोमाञ्च न हो, उसकी मृत्यु पास खड़ी है। जो स्वप्नमें भालू और वानरकी सवारीपर बैठकर गीत गाता हुआ दक्षिण दिशामें जाय, उसकी मृत्यु समयकी प्रतीक्षा नहीं करती। स्वप्नमें ही लाल और काले कपड़े पहने हुए कोई स्त्री हँसती-गाती हुई जिसे दक्षिण दिशाकी ओर ले जाय, वह भी जीवित नहीं रहता। यदि स्वप्नमें नंगा एवं मूँड़ मुँड़ाया हुआ कोई महाबली मनुष्य हँसता और उछलता कूदता दिखायी दे तो समझना चाहिये कि मौत आ गयी। जो स्वप्नावस्थामें अपनेको पैरसे लेकर चोटीतक कीचड़के समुद्रमें डूबा देखता है, वह मनुष्य तत्काल मृत्युको प्राप्त होता है। जो स्वप्नमें केश, अँगार, भस्म, सर्प और बिना पानीकी नदी देखता है, उसकी दसवेंसे लेकर ग्यारहवें दिनतक मृत्यु हो जाती है। स्वप्नमें विकराल, भयंकर और काले रंगके पुरुष हाथोंमें हथियार लिये जिसको पत्थरोंसे मारते हैं, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। सूर्योदयके समय जिसके
- योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * ११५
| सम्मुख और बायें-दायें गीदड़ी रोती हुई जाय, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। भोजन कर लेनेपर भी जिसके हृदयमें भूखका कष्ट होता हो तथा जो दाँतोंसे दाँत घिसता रहे, उसकी आयु भी निश्चय ही समाप्त हो चुकी है। जिसको दीपककी गन्धका अनुभव न होता हो, जो रात और दिनमें भी डरता हो तथा दूसरेके नेत्रमें अपनी परछाईं न देखता हो, वह जीवित नहीं रहता। जो आधी रातके समय इन्द्रधनुष और दिनमें तारोंको देख ले, वह आत्मवेत्ता पुरुष अपनी आयु क्षीण हुई समझे। जिसकी नाक टेढ़ी और कान ऊँचे-नीचे हो जाते हैं तथा जिसके बायें नेत्रसे सदा पानी गिरता रहता है, उसकी आयु समाप्त हो चुकी है। यदि मुँह सब ओरसे लाल और जीभ काली पड़ जाय तो बुद्धिमान् पुरुषको अपनी मृत्यु निकट समझनी चाहिये। जो स्वप्नमें ऊँट या गदहेपर बैठकर दक्षिण दिशाकी ओर जाय, उसको तत्काल मृत्यु होनेवाली है—ऐसा जानना चाहिये। जो अपने दोनों कान बंद कर लेनेपर अपनी ही आवाज न सुने तथा जिसके नेत्रोंकी ज्योति नष्ट हो जाय, वह भी जीवित नहीं रह सकता। जो स्वप्नमें किसी गढ्ढेके भीतर गिरे और उससे निकलनेका द्वार बंद हो जाय तथा फिर वह उस गढ्ढेसे न निकल सके तो वहींतक उसका जीवन समझना चाहिये। जिसकी दृष्टि ऊपरकी ओर उठे किन्तु वहाँ ठहर न सके, बार-बार लाल होकर घूमती रहे, मुँह गरम हो और नाभि शीतल हो जाय तो ये लक्षण मनुष्यके शरीर-परिवर्तनकी सूचना देते हैं। जो स्वप्नमें अग्नि या जलके भीतर प्रवेश करके फिर न निकले, उसके जीवनका वही अन्त है। जिसको दुष्ट जीव रातमें और दिनमें भी मारें, वह सात रातके भीतर निश्चय ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जो अपने निर्मल श्वेत | वस्त्रको भी लाल या काले रंगका देखे, उसकी भी मृत्यु निकट समझनी चाहिये। स्वभावका विपरीत होना और प्रकृतिका बिल्कुल बदल जाना भी मृत्युके निकट होनेकी सूचना देते हैं।<br><br>जिसका काल निकट आ गया है, वह मनुष्य जिनके सामने सदा विनीत रहता था, जो लोग उसके परम पूजनीय थे, उन्हींकी अवहेलना और निन्दा करता है। वह देवताओंकी पूजा नहीं करता। बड़े-बूढ़ों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, माता-पिता तथा दामादका सत्कार नहीं करता। इतना ही नहीं, वह योगियों, ज्ञानी विद्वानों तथा अन्य महात्मा पुरुषोंके आदर-सत्कारसे भी मुँह मोड़ लेता है। बुद्धिमान् पुरुषोंको मृत्युके इन लक्षणोंकी जानकारी रखनी चाहिये। राजन्! योगी पुरुषोंको उचित है कि वे सदा यत्नपूर्वक इन अरिष्टोंपर दृष्टि रखें; क्योंकि ये वर्षके अन्तमें तथा दिन-रातके भीतर भी फल देनेवाले होते हैं। राजन्! इनके विशद फलोंको भलीभाँति देखना चाहिये और मन-ही-मन विचार करके उस समयके अनुसार कार्य करना चाहिये। मृत्युकालको जान लेनेपर योगी किसी निर्भय स्थानमें बैठकर योगाभ्यासमें प्रवृत्त हो जाय, जिससे उसका वह समय निष्फल न जाने पावे। अरिष्ट देखकर योगी मृत्युका भय छोड़ दे और उसके स्वभावका विचार करके जितने समयमें वह आनेवाली हो, उतने समयके प्रत्येक भागमें योगी योग-साधनमें लगा रहे। दिनके पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा अपराह्नमें अथवा रात्रिके जिस भागमें अरिष्टका दर्शन हो, तभीसे लेकर जबतक मृत्यु न आवे तबतक योगमें लगा रहे। तदनन्तर सारा भय छोड़कर जितात्मा पुरुष उस कालपर विजय प्राप्त करके उसी स्थानपर या और कहीं—जहाँ भी अपना चित्त स्थिर हो सके, योगमें संलग्न हो जाय और तीनों गुणोंको जीतकर परमात्मामें तन्मय हो |
१९६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
चिद्वृत्तिका भी त्याग कर दे। यों करनेसे वह उस इन्द्रियातीत परम निर्वाणस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है, जो न तो बुद्धिका विषय है और न वाणी ही जिसका वर्णन कर सकती है। अलर्क! इन सब बातोंका मैंने तुमसे यथार्थ वर्णन किया है; अब तुम जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त हो सकोगे, वह संक्षेपमें सुनो।
जैसे चन्द्रमाका संयोग पाकर ही चन्द्रकान्तमणि जलकी सृष्टि करती है, उनका संयोग पाये बिना नहीं, यही उपमा योगीके लिये भी है। योगी भी योगयुक्त होकर ही सिद्धि लाभ कर सकता है, अन्यथा नहीं। जैसे सूर्यकी किरणोंका संयोग पाकर ही सूर्यकान्तमणि आग पैदा करती है, अकेली रहकर नहीं, यही उपमा योगोंके लिये भी है। उसे योगका आश्रय कभी नहीं छोड़ना चाहिये। जैसे चींटी, चूहा, नेवला, छिपकली और गौरैया—ये सब घरमें गृहस्वामीकी ही भाँति रहते हैं और घर गिर जानेपर अन्यत्र चल देते हैं, किन्तु घरके गिरनेका दुःख केवल स्वामीको ही होता है, उन सबोंको उसके लिये कुछ भी कष्ट नहीं होता, योगकी सिद्धिके लिये भी यही उपमा है। अर्थात् योगीको अपने गृह, वैभव और शरीर आदिके प्रति तनिक भी ममता नहीं रखनी चाहिये। हरिनके बच्चेके मस्तकपर जब सींग उगने लगता है, तब पहले उसका अग्रभाग तिलके समान दिखायी देता है। फिर वह उस हरिनके साथ ही साथ बढ़ता है। इस दृष्टान्तपर विचार करनेसे योगी सिद्धिको प्राप्त होता है। अर्थात् उसे भी धीरे-धीरे अपनी योगसाधना बढ़ानी चाहिये। जैसे मनुष्य रोगसे पीड़ित होनेपर भी अपनी इन्द्रियोंसे काम लेता ही है, उसी प्रकार योगी बुद्धि आदि परकीय साधनोंसे, जो आत्मासे सर्वथा भिन्न हैं, परम पुरुषार्थका साधन करे।
अलर्ककी मुक्ति एवं पिता-पुत्रके संवादका उपसंहार
**सुमति कहते हैं—**तदनन्तर राजा अलर्कने अत्रिनन्दन दत्तात्रेयजीके चरणोंमें प्रणाम करके अत्यन्त प्रसन्नताके साथ विनीतभावसे कहा—‘ब्रह्मन्! देवताओंने मुझे शत्रुद्वारा पराजित कराकर जो मेरे समक्ष प्राणोंको संशयमें डालनेवाला अत्यन्त उग्र भय उपस्थित कर दिया, इसे मैं अपना परम सौभाग्य मानता हूँ। काशिराजका महान् बल-वैभवसे सम्पन्न पराक्रम मेरा विनाश करनेके लिये यहाँ प्रकट हुआ था; किन्तु उसने मुझे आपके सत्सङ्गका शुभ अवसर प्रदान किया, यह कितने आनन्दकी बात है। सौभाग्यसे ही मेरा सैनिक-बल घट गया, सौभाग्यसे ही मेरे सेवक मारे गये, सौभाग्यसे ही मेरा खजाना खाली हुआ, सौभाग्यसे ही मैं भयको प्राप्त हुआ, सौभाग्यने ही मुझे आपके युगल चरणोंकी स्मृति करायी और सौभाग्यसे ही आपका सारा उपदेश मेरे चित्तमें बैठ गया। ब्रह्मन्! सौभाग्यवश आपके सङ्गसे मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ और सौभाग्यसे ही आपने मुझपर कृपा की। जब पुरुषके शुभ दिन आते हैं तब अनर्थ भी अर्थका साधक बन जाता है, जैसे इस समय यह शत्रुजनित आपत्ति भी आपके समागमसे उपकार करनेवाली सिद्ध हुई। भगवन्! भाई सुबाहु तथा काशिराज दोनों ही मेरे उपकारी हैं, जिनके कारण मुझे आपके समीप आनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। आपके प्रसादरूपी अग्निसे मेरा अज्ञान और पाप जल गया। अब मैं ऐसा यत्न करूँगा, जिससे फिर इस प्रकार दुःखका भागी न बनूँ। आप मेरे ज्ञानदाता महात्मा हैं; अतः आपसे आज्ञा लेकर मैं गार्हस्थ्य-आश्रमका परित्याग करूँगा, जो विपत्तिरूपी वृक्षोंका वन है।’
- अलर्ककी मुक्ति एवं पिता-पुत्रके संवादका उपसंहार * १२७
दत्तात्रेयजी बोले—राजेन्द्र! जाओ, तुम्हारा कल्याण हो। मैंने जैसा तुम्हें बताया है, उसीके अनुसार ममता और अहङ्कारसे रहित हो मोक्षके लिये विचरते रहो।
सुमति कहते हैं—दत्तात्रेयजीके यों कहनेपर राजा अलर्कने उन्हें प्रणाम किया और बड़ी उतावलीके साथ वे उस स्थानपर आये, जहाँ उनके बड़े भाई सुबाहु और काशिराज मौजूद थे। महाबाहु वीरवर काशिराजके निकट पहुँचकर अलर्कने सुबाहुके सामने ही हँसते हुए कहा—
'राज्यकी इच्छा रखनेवाले काशिराज! अब तुम इस बढ़े हुए राज्यको भोगो। अथवा यदि तुम्हारी इच्छा हो तो भाई सुबाहुको ही दे डालो।'
काशिराजने कहा—अलर्क! तुमने युद्धके बिना ही राज्य क्यों छोड़ दिया? यह तो क्षत्रियका धर्म नहीं है और तुम क्षत्रियधर्मके ज्ञाता हो। जब अमात्यवर्ग पराजित हो जाय, तब राजा स्वयं ही मृत्युका भय छोड़कर अपने शत्रुको लक्ष्य करके बाणका संधान करे और उसे जीतकर इच्छानुसार श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करे। साथ ही परम सिद्धिके लिये बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान भी करता रहे।
अलर्क बोले—वीर! तुम्हारा कथन ठीक है, पहले मेरे मनमें भी ऐसे ही विचार उठते थे; किन्तु अब मेरी विपरीत धारणा हो गयी है। इसका कारण सुनो। नरेश्वर! तुम्हारे भयसे अत्यन्त दुःख पाकर मैंने योगीश्वर दत्तात्रेयजीकी शरण ली और उनकी कृपासे अब मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है। समस्त इन्द्रियोंको जीतकर तथा सब ओरसे आसक्ति हटाकर मनको ब्रह्ममें लगाना और इस प्रकार मनको जीतना ही सबसे बड़ी विजय है; अतः अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं हूँ, तुम भी मेरे शत्रु नहीं हो तथा ये सुबाहु भी मेरे अपकारी नहीं हैं। मैंने इन सब बातोंको अच्छी तरह समझ लिया है। अतः राजन्! अब अपने लिये तुम कोई दूसरा शत्रु ढूँढ़ो।
अलर्कके यों कहनेपर राजा सुबाहु अत्यन्त प्रसन्न होकर उठे और 'धन्य! धन्य!' कहकर अपने भाईका अभिनन्दन करनेके पश्चात् वे काशिराजसे इस प्रकार बोले—'नृपश्रेष्ठ! मैं जिस कार्यके लिये तुम्हारी शरणमें आया था, वह सब पूरा हो गया। अब मैं जाता हूँ। तुम सुखी रहो।'
काशिराजने कहा—सुबाहो! तुम किसलिये आये थे? और तुम्हारा कौन सा कार्य सिद्ध हुआ? यह बताओ। मुझे तुम्हारी बातोंसे बड़ा कौतूहल हो रहा है। तुमने मेरे पास आकर कहा था कि 'मेरे बाप-दादोंका बहुत बड़ा राज्य अलर्कने हड़प लिया है। वह उनसे जीतकर मुझे दे दो।' तब मैंने तुम्हारे भाईपर आक्रमण करके यह राज्य अपने वशमें किया। यह तुम्हें कुलपरम्परासे प्राप्त है, अतः इसका उपभोग करो।
सुबाहु बोले—काशिराज! मैंने जिस उद्देश्यसे यह प्रयत्न किया था और जिसके लिये तुमसे भी महान् उद्योग कराया, वह बतलाता हूँ; सुनो। मेरा यह छोटा भाई तत्त्वज्ञ होकर भी सांसारिक भोगोंमें फँसा हुआ था। मेरे दो बड़े भाई परम
११८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
ज्ञानी हैं। उन दोनोंको तथा मुझे भी हमारी माताने जब बचपनमें दूध पिलाया, उसी समय कानोंमें तत्त्वज्ञान भी भर दिया। मनुष्यमात्रको जिनका ज्ञान होना चाहिये, वे सभी पदार्थ माताने हमारे सामने प्रकाशित कर दिये। किन्तु यह अलर्क उस ज्ञानसे वंचित रह गया था। राजन् ! जैसे एक साथ यात्रा करनेवालोंमेंसे एकको कष्टमें पड़ा देखकर साधु पुरुषोंके हृदयमें दुःख होता है, उसी प्रकार इस अलर्कको गृहस्थ-आश्रमके मोहमें फँसकर कष्ट उठाते हुए देखकर हम तीनों भाइयोंको कष्ट होता था। क्योंकि यह इस शरीरका सम्बन्धी है, और इसके साथ 'भाई' की कल्पना जुड़ी हुई है। तब मैंने सोचा, दुःख पड़नेपर ही इसके मनमें वैराग्यकी भावना जाग्रत् होगी; अतः युद्धोद्योगके लिये तुम्हारा आश्रय लिया। फिर इस दुःखसे इसको वैराग्य हुआ और वैराग्यसे ज्ञानकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार जो कार्य मुझे अभीष्ट था, वह पूरा हो गया। अतः तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। मदालसाके गर्भमें रहकर और उसके स्तनोंका दूध पीकर यह अलर्क दूसरी स्त्रीके पुत्रोंद्वारा ग्रहण किये हुए मार्गपर न जाय, यही विचारकर मैंने तुम्हारा सहारा लिया था। सो सब कार्य पूरा हो गया, अब मैं सिद्धिके लिये जाता हूँ। नरेन्द्र ! जो लोग कष्टमें पड़े हुए अपने स्वजन, बन्धु और सुहृद्की उपेक्षा करते हैं, वे मेरे विचारसे विकलेन्द्रिय हैं, उनकी इन्द्रियाँ—हाथ-पैर आदि बेकार हैं। जो समर्थ सुहृद्, स्वजन और बन्धुके होते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्षसे वंचित हो कष्ट भोगता है, वहाँ उसके वे सुहृद् आदि ही निन्दाके पात्र होते हैं। राजन् ! तुम्हारे सङ्गसे मैंने यह बहुत बड़ा कार्य सिद्ध कर लिया। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाऊँगा। साधुश्रेष्ठ ! तुम भी ज्ञानी बनो।
काशिराजने कहा— महात्मन् ! तुमने अलर्कका तो बहुत बड़ा उपकार किया, अब मेरी भलाईमें अपना मन क्यों नहीं लगाते? सत्पुरुषोंका साधु पुरुषोंके साथ जो समागम होता है, वह सदा फल देनेवाला ही होता है, निष्फल नहीं; अतः तुम्हारे सङ्गसे मेरी भी उन्नति होनी चाहिये।
सुबाहु बोले— राजन् ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ हैं। इनमेंसे धर्म, अर्थ और काम तो तुम्हें प्राप्त हैं। केवल मोक्षसे तुम वंचित हो, अतः वही तुम्हें संक्षेपसे बतलाता हूँ। एकाग्रचित्त होकर सुनो। सुनकर भलीभाँति उसकी आलोचना करो और उसीके अनुसार अपने कल्याणके यत्नमें लग जाओ। राजन् ! 'यह मेरा है और यह मैं हूँ' इस प्रकारकी प्रतीति तुम्हें नहीं करनी चाहिये; क्योंकि आलोचनाका विषय तो बाह्य धर्म ही होता है। धर्मके अभावमें कोई आश्रय नहीं रहता। अहं (मैं) यह संज्ञा किसको है, इस बातका तुम्हें विचार करना चाहिये। बाह्य और आन्तरिक तत्त्वकी आलोचना करनी चाहिये। आधी रातके बाद भी इस तत्त्वका विचार करना चाहिये। अव्यक्तसे लेकर विशेषतक जो विकाररहित, अचेतन व्यक्त और अव्यक्त तत्त्व है, उसे जानना चाहिये और उनका ज्ञाता जो मैं हूँ, वह मैं
- मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि-संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन * १९९
कौन हूँ—इसे भी जानना चाहिये। इस 'मैं' को ही जान लेनेपर तुम्हें सबका ज्ञान हो जायगा। अनात्मामें आत्मबुद्धिका होना और जो अपना नहीं है उसे अपना मानना—यही अज्ञान है। भूपाल! वह मैं सर्वत्र व्यापक आत्मा हूँ, तथापि तुम्हारे पूछनेपर लोकव्यवहारकी दृष्टिसे मैंने ये सब बातें बता दी हैं। अब मैं जाता हूँ।
सुमति कहते हैं— काशीनरेशसे यों कहकर परम बुद्धिमान् सुबाहु चले गये। काशिराजने भी अलर्कका सत्कार करके अपने नगरकी राह ली। अलर्कने अपने ज्येष्ठ पुत्रको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके वे आत्मसिद्धिके लिये वनमें चले गये। वहाँ बहुत समयतक वे निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य होकर रहे और अनुपम योगसम्पत्तिको पाकर परम निर्वाणपदको प्राप्त हुए।
पिताजी! आप भी अपनी मुक्तिके लिये इस उत्तम योगका साधन कीजिये। इससे आप उस ब्रह्मको प्राप्त होंगे, जहाँ जानेपर आपको शोक नहीं होगा। अब मैं भी जाऊँगा। यज्ञ और जपसे मुझे क्या लेना है। कृतकृत्य पुरुषका प्रत्येक कार्य ब्रह्मभावकी प्राप्तिके लिये ही होता है, अतः आपकी आज्ञा लेकर मैं जाता हूँ। अब निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य होकर मुक्तिके लिये ऐसा यत्न करूँगा, जिससे मुझे परम सन्तोषकी प्राप्ति हो।
पक्षी कहते हैं— जैमिनिजी! अपने पितासे यों कहकर और उनकी आज्ञा ले परम बुद्धिमान् सुमति सब प्रकारके संग्रहको छोड़कर चले गये। उनके महाबुद्धिमान् पिता भी उसी प्रकार क्रमशः वानप्रस्थ आश्रममें जाकर चौथे आश्रममें प्रविष्ट हुए। वहाँ पुत्रसे पुनः उनकी भेंट हुई और उन्होंने गुण आदि बन्धनोंका त्याग करके तत्काल प्राप्त हुई उत्तम बुद्धिसे युक्त हो परम सिद्धि प्राप्त की।
ब्रह्मन्! आपने हमलोगोंसे जो प्रश्न किया था, उसका विस्तारपूर्वक हमने यथावत् वर्णन किया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?
मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन
जैमिनि बोले— श्रेष्ठ पक्षिगण! आपने प्रवृत्ति और निवृत्ति—दो प्रकारके वैदिक कर्म बतलाते हुए मुझे बहुत सुन्दर उपदेश दिया है। अहो! पिताकी कृपासे आपलोगोंका ज्ञान ऐसा है, जिससे तिर्यग्योनिको प्राप्त होकर भी आपने मोहका त्याग कर दिया। आपलोग धन्य हैं; क्योंकि उत्तम सिद्धिकी प्राप्तिके लिये आपलोगोंका मन आज भी पूर्वावस्थामें ही स्थित है। विषयजनित मोह उसे विचलित नहीं कर पाते। मेरा बड़ा भाग्य है कि महर्षि मार्कण्डेयजीने मुझे आपलोगोंका परिचय दिया। आप सब प्रकारके संदेहोंका निराकरण करनेमें सबसे श्रेष्ठ हैं। इस अत्यन्त सङ्कटपूर्ण संसारमें भटकते हुए मनुष्योंको बिना तपस्या किये आप-जैसे सन्तोंका सङ्ग प्राप्त होना दुर्लभ है। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि प्रवृत्ति, निवृत्ति एवं ज्ञानके विषयमें आपलोगोंकी बुद्धि जैसी निर्मल है, वैसी दूसरे किसीकी नहीं है। यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो मेरे लिये आगे बतायी जानेवाली बातोंका पूर्णरूपसे वर्णन करनेकी कृपा कीजिये।
यह स्थावर-जङ्गम जगत् कैसे उत्पन्न हुआ? कल्पान्तमें पुनः किस प्रकार यह लयको प्राप्त होगा? देवता, ऋषि, पितर और भूत आदिके वंश कैसे हुए? मन्वन्तर किस प्रकार होते हैं? उनके वंशमें उत्पन्न महापुरुषोंके जीवन चरित्र कैसे हैं? जितनी सृष्टि, जितने प्रलय, जैसे जैसे कल्पोंके विभाग, जो जो मन्वन्तरकी स्थिति, जैसी पृथ्वीकी स्थिति, जितना बड़ा पृथ्वीका विस्तार तथा समुद्र,
१२० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
पर्वत, नदी, वन, भूलोक आदि, खलोकसमुदाय और पातालकी जिस प्रकारकी स्थिति है, वह सब मुझे बताइये। सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र और तारोंकी गति तथा प्रलयकालतककी सारी बातें मैं सुनना चाहता हूँ। जब इस जगत्का संहार हो जायगा, तब उसके बाद क्या शेष रहेगा? इस प्रश्नपर भी प्रकाश डालिये।
पक्षियोंने कहा—मुनिश्रेष्ठ! आपने हमलोगोंपर प्रश्नोंका ऐसा भार रख दिया, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। अब हम आपके पूछे हुए विषयोंका वर्णन करते हैं, सुनिये। पूर्वकालमें मार्कण्डेयजीने ब्राह्मणकुमार क्रौष्टुकिसे, जो परम बुद्धिमान्, व्रतस्नात तथा शान्त स्वभाववाले थे, जो कुछ कहा था, वही हम आपसे कहते हैं। एक समय महात्मा मार्कण्डेय मुनि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे घिरे बैठे थे। वहीं क्रौष्टुकिने यही बात पूछी थी, जिसे आपने हमसे पूछा है। भृगुनन्दन मार्कण्डेयजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ क्रौष्टुकि के प्रश्नोंका उत्तर दिया। उसीका हम आपसे वर्णन करते हैं। आप ध्यान देकर सुनें। जो सृष्टिके समय ब्रह्मा, पालन-कालमें विष्णु तथा संहारके समय जगत्का अन्त करनेवाले अनन्त भयङ्कर रुद्र हैं, उन सम्पूर्ण जगत्के स्वामी पद्मयोनि पितामह ब्रह्माजीको मैं प्रणाम करता हूँ।
मार्कण्डेयजीने कहा—पूर्वकालमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके प्रकट होते ही उनके मुखोंसे क्रमशः पुराण और वेद प्रकट हुए, फिर महर्षियोंने पुराणकी बहुत-सी संहिताएँ रचीं और वेदोंके भी सैकड़ों विभाग किये। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—ये चारों महात्मा ब्रह्माजीके उपदेश बिना नहीं सिद्ध हो सकते थे। ब्रह्माजीके मानस पुत्र सप्तर्षियोंने उनसे वेदोंको ग्रहण किया और ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न हुए भृगु आदि ऋषियोंने पुराणको अपनाया। भृगुसे च्यवनने और च्यवनसे ब्रह्मर्षियोंने उसे प्राप्त किया। फिर उन्होंने दक्षको उपदेश दिया और दक्षने मुझे इस पुराणको सुनाया था। वही आज मैं तुमसे कहता हूँ। यह पुराण कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।
जो सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिका स्थान, अजन्मा, अविनाशी, आश्रयस्वरूप, चराचर जगत्को धारण करनेवाले तथा परमपदस्वरूप हैं, जिन्हें आदिपुरुष ब्रह्मा कहा जाता है, जो उत्पत्ति, पालन और संहारके कारण हैं, किसीके औरस पुत्र न होकर स्वयम्भू हैं, जिनमें सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है, जो हिरण्यगर्भ, लोकसृष्टिमें लगे रहनेवाले और परम बुद्धिमान् हैं, उन भगवान् ब्रह्माजीको नमस्कार करके मैं परम उत्तम भूतसर्गका वर्णन आरम्भ करता हूँ! यह भूतसमुदाय^१ पाँचोंकी संख्यामें जाननेके योग्य तथा त्रिविध^२ स्रोतोंसे युक्त है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त उसकी स्थिति है। उसमें किसका कैसा लक्षण है और किसके रूपमें कितनी विभिन्नता है, इन सब बातोंका ज्ञान कराते हुए भूतसमुदायका वर्णन करता हूँ। इस भौतिक जगत्का जो कारण है, उसे 'प्रधान' कहते हैं। उसीको महर्षियोंने अव्यक्त कहा है और वही सूक्ष्म, नित्य एवं सदसत्स्वरूप प्रकृति है। सृष्टिके आदिकालमें केवल ब्रह्म था, जो नित्य, अविनाशी, अजर और अप्रमेय है। उसका दूसरा कोई आधार नहीं है। वह गन्ध, रूप, रस, शब्द और स्पर्शसे रहित है। उसका आदि और अन्त नहीं है। वह सम्पूर्ण जगत्की योनि, तीनों गुणोंका कारण एवं अविनाशी है। उसे आधुनिक नहीं, पुरातन एवं सनातन कहा गया है। वह ज्ञान-विज्ञानका विषय नहीं है। प्रलयके पश्चात् उस ब्रह्मसे ही यह सब कुछ व्याप्त था।
१. पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच भूत हैं।
२. पशु-पक्षी आदिकी सृष्टिको 'तिर्यक्स्रोत', मानवसर्गको 'अर्वाक्स्रोत' और देवसर्गको 'ऊर्ध्वस्रोत' कहते हैं।
- मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन * १२१
मुने! फिर सृष्टिकाल आनेपर गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रकृति जब ब्रह्मके क्षेत्रज्ञरूपसे अधिष्ठित हुई, तब उससे महत्तत्त्वका आविर्भाव हुआ। उत्पन्न हुए उस महत्तत्त्वको प्रधान (प्रकृति) ने आवृत्त कर रखा है। जैसे बीज त्वचासे घिरा हुआ होता है, उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आच्छादित है। वह सात्त्विक, राजस और तामसभेदसे तीन प्रकारका बताया गया है। तत्पश्चात् उस महत्तत्त्वसे वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) तथा भूतादिरूप तामस—इन तीन भेदोंवाला अहङ्कार उत्पन्न हुआ। जैसे अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आवृत्त है, उसी प्रकार अहङ्कार भी महत्तत्त्वसे आवृत्त है। भूतादि नामक तामस अहङ्कारने शब्द-तन्मात्राकी सृष्टि की। उस शब्द-तन्मात्रासे शब्द-गुणवाला आकाश उत्पन्न हुआ; फिर भूतादि तामस अहङ्कारने शब्द-तन्मात्रारूप आकाशको आच्छादित किया। इससे स्पर्श-तन्मात्राकी सृष्टि हुई, जिससे बलवान् वायुका प्राकट्य हुआ। वायुका गुण स्पर्श माना गया है। शब्द-तन्मात्रारूप आकाशने जब स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुको आच्छादित किया, तब वायुने भी विकृत होकर रूप-तन्मात्राकी रचना की। इस प्रकार वायुसे अग्नितत्त्व प्रकट हुआ, जिसका गुण रूप बतलाया जाता है। तदनन्तर स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुने रूप-तन्मात्रावाले तेजको आवृत्त किया, जिससे विकृत होकर उस तेजने रस-तन्मात्राकी सृष्टि की। उस रस-तन्मात्रासे जल प्रकट हुआ, जो रस नामक गुणसे युक्त है। फिर रूप-तन्मात्रावाले अग्नितत्त्वने रस-तन्मात्रायुक्त जलको आवृत्त किया। इससे जलमें भी विकार आया और उसमें गन्ध-तन्मात्राकी सृष्टि हुई। उसीसे यह स्थूलरूपा पृथ्वी उत्पन्न हुई, जिसका गुण गन्ध है। उन-उन भूतोंमें कारणरूपसे तन्मात्राएँ हैं, इसलिये वे भूततन्मात्रारूप माने गये हैं। तन्मात्राएँ किसी विशेष भावका बोध नहीं करातीं। इसलिये वे अविशेष हैं। इस प्रकार तामस अहङ्कारसे यह भूततन्मात्रारूप सर्ग प्रकट हुआ।
वैकारिक अहङ्कारमें सत्त्वगुणकी अधिकता होनेसे वह सात्त्विक भी कहलाता है। उससे एक ही साथ वैकारिक सर्गकी उत्पत्ति होती है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ तैजस (राजस) अहङ्कारसे उत्पन्न बतलायी जाती हैं और उनके अधिष्ठाता दस देवता वैकारिक (सात्त्विक) अहङ्कारसे प्रकट हुए हैं। ग्यारहवें मनको भी वैकारिक सर्गमें ही जानना चाहिये। इस प्रकार मन तथा इन्द्रियाधिष्ठाता देवता वैकारिक माने गये हैं। श्रवण, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये पाँच इन्द्रियाँ शब्दादि विषयोंका ज्ञान करानेके लिये हैं, इसलिये इन्हें ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं। दोनों पैर, गुदा, उपस्थ, दोनों हाथ और वाक्—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। क्रमशः चलना, मलत्याग, रतिके आनन्दका अनुभव, शिल्परचना और बोलना—ये पाँच इनके कर्म हैं। शब्द-तन्मात्रायुक्त आकाश स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुमें प्रविष्ट है, इसलिये वायु दो गुणोंसे युक्त होता है। उसका अपना गुण स्पर्श है। उसके साथ आकाशका शब्द भी रहता है। इसी प्रकार शब्द और स्पर्श—ये दो गुण रूपमें प्रवेश करते हैं; इसलिये अग्नि शब्द, स्पर्श और रूप—इन तीन गुणोंसे युक्त होता है। फिर शब्द, स्पर्श और रूप—इन तीनोंका रसमें प्रवेश होता है। इसलिये रसात्मक जलको चार गुणोंसे युक्त समझना चाहिये। इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चारों गन्धमें प्रवेश करते हैं और उससे मिलकर सब ओरसे पृथ्वीको आवृत्त कर लेते हैं। इसलिये पृथ्वी पाँच गुणोंसे युक्त है और सब भूतोंमें स्थूल दिखायी देती है। ये पाँचों भूत शान्त, घोर और मूढ़ हैं। अर्थात् सुख, दुःख एवं मोहसे युक्त हैं। इसलिये ये विशेष कहलाते हैं।* परस्पर
* परस्पर मिलनेसे सभी भूत शान्त, घोर और मूढ़ प्रतीत होते हैं; किन्तु पृथक्-पृथक् विचार करनेपर पृथ्वी और जल शान्त हैं, तेज और वायु घोर हैं तथा आकाश मूढ़ है।
[ 539 ] सं० मा० पु०—५
५२२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
प्रवेश करनेपर वे एक-दूसरेको धारण करते हैं।
ये महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त सभी भूत एक दूसरेसे मिलकर और परस्पर आश्रित हो एक संघातको ही अपना लक्ष्य बना जब पूर्णरूपसे एक हो जाते हैं, तब पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण प्रधान तत्त्वके सम्बन्धसे अण्डकी उत्पत्ति करते हैं। वह महान् अण्ड जलके बुलबुलेके समान क्रमशः बढ़ता है और जलपर स्थित रहता है। उस प्राकृत अण्डमें ब्रह्मा नामसे प्रसिद्ध क्षेत्रज्ञ पुरुष भी वृद्धिको प्राप्त होता है। वे ब्रह्मा ही सबसे प्रथम शरीरधारी होनेके कारण पुरुष कहलाते हैं। भूतोंके आदिकर्ता ब्रह्माजी सबसे पहले प्रकट हुए; उन्होंने चर-अचरसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है। अण्डके गर्भमें स्थित उन महात्मा ब्रह्माजीके लिये मेरु पर्वत ही गर्भको ढकनेवाली झिल्ली हुआ। अन्य पर्वत जरायु (जेर) हुए तथा समुद्र ही उस गर्भाशयका जल था। उस अण्डमें ही देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ तथा पर्वत, द्वीप, समुद्र और नक्षत्र मण्डलके साथ त्रिभुवनका आविर्भाव हुआ। वह अण्ड क्रमशः जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा तामस अहङ्कारके द्वारा बाहरसे आवृत्त है। ये आवरण एककी अपेक्षा दूसरे दसगुने बड़े हैं। तामस-अहंकार उससे दसगुने बड़े महत्तत्त्वके द्वारा आवृत है और महत्तत्त्व भी उन सबके साथ अव्यक्त प्रकृतिके द्वारा घिरा हुआ है। इस प्रकार इन सात प्राकृत आवरणोंसे यह अण्ड आवृत्त है। इस तरह ये आठ प्रकृतियाँ एक-दूसरेको आवृत्त करके स्थित हैं। वह प्रकृति नित्य है और उसके भीतर वे ही पुरुष हैं, जो तुम्हें ब्रह्माके नामसे बताये गये हैं। अब संक्षेपसे पुनः इस विषयका वर्णन सुनो—जैसे कोई पुरुष जलमें डूबकर फिर निकलते समय जलको फेंकता है, उसी प्रकार भगवान् ब्रह्माजी भी प्रकृतिको हटाते हुए उससे प्रकट होते हैं। अव्यक्त प्रकृतिको क्षेत्र बताया गया है और ब्रह्माजी क्षेत्रज्ञ कहलाते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञरूप ही है—ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार यह प्राकृत सर्गका वर्णन हुआ। इसके भीतर अधिष्ठातारूपसे क्षेत्रज्ञ विराजमान रहता है। प्राकृत सर्ग ही प्रथम सृष्टि है।
एक ही परमात्माके त्रिविध रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन
क्रौष्टुकिने कहा— भगवन्! आपने ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका यथावत् वर्णन किया तथा महात्मा ब्रह्माजीके प्रादुर्भावकी बात भी बतलायी। भृगुकुलनन्दन! अब मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि प्रलयके अन्तमें, जब कि सबका उपसंहार हो जाता है और प्राणियोंकी सृष्टि नहीं हुई होती, क्या शेष रहता है? अथवा कुछ रहता ही नहीं?
मार्कण्डेयजी बोले— मुने! जब यह सम्पूर्ण जगत् प्रकृतिमें लीन होता है, उस समयकी स्थितिको विद्वान् पुरुष प्राकृत प्रलय कहते हैं। जब अव्यक्त प्रकृति अपने स्वरूप (गुणोंकी साम्यावस्था)-में स्थित होती है तथा महत्तत्त्वादि सम्पूर्ण विकारोंका उपसंहार हो जाता है, उस समय प्रकृति और पुरुष समानधर्मा (निष्क्रिय, निर्विकार) होकर रहते हैं। उस समय सत्त्व और तम समानरूपमें और परस्पर ओत-प्रोत रहते हैं तथा जैसे तिलमें तेल और दूधमें घी रहता है, उसी प्रकार तमोगुण और सत्त्वगुणमें रजोगुण घुला-मिला होता है। जब परमेश्वरकी योगदृष्टिसे प्रकृतिमें क्षोभ होता है, तब महान् अण्डके
- एक ही परमात्माके विभिन्न रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन * १२३
भीतरसे ब्रह्माजी प्रकट होते हैं—यह बात तुम्हें बतलायी जा चुकी है। यद्यपि ब्रह्माजी सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थान और निर्गुण हैं, तथापि रजोगुणका उपभोग करते हुए सृष्टिमें प्रवृत्त होते हैं और ब्रह्माके कर्तव्यका पालन करते हैं। फिर परमेश्वर सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त हो श्रीविष्णुका स्वरूप धारणकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हैं। फिर तमोगुणकी अधिकतासे युक्त हो रुद्ररूप धारण करके सम्पूर्ण जगत्का संहार करते और निश्चिन्त सोते हैं। इस प्रकार सृष्टि, पालन और संहार—इन तीनों कालोंमें तीन गुणोंसे युक्त होकर भी वे परमेश्वर वास्तवमें निर्गुण ही हैं। जैसे खेतिहर पहले बीजको बोता, फिर पौधेकी रक्षा करता और अन्तमें खेती पक जानेपर उसे काटता है तथा इन कार्योंके अनुसार बोनेवाला, रक्षा करनेवाला और काटनेवाला—ये तीन नाम धारण करता है, उसी प्रकार एक ही परमेश्वर भिन्न-भिन्न कार्योंके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र नाम धारण करते हैं। ब्रह्मा होकर संसारकी सृष्टि करते और रुद्र होकर उसका संहार करते हैं तथा विष्णुरूपमें इन दोनों कार्योंसे उदासीन रहकर सबका पालन करते हैं। इस तरह स्वयम्भू परमात्माकी तीन अवस्थाएँ होती हैं। रजोगुणप्रधान ब्रह्मा, तमोगुणप्रधान रुद्र और सत्त्वप्रधान विश्वपालक विष्णु हैं। ये ही तीन देवता हैं और ये ही तीन गुण हैं। ये परस्पर एक-दूसरेके आश्रित और एक-दूसरेसे मिले रहते हैं। इनमें एक क्षणका भी वियोग नहीं होता। ये एक-दूसरेका कभी त्याग नहीं करते।
इस प्रकार जगत्के आदिकारण देवाधिदेव चतुर्मुख ब्रह्माजी रजोगुणका आश्रय लेकर सृष्टिके कार्यमें संलग्न रहते हैं। उनकी आयु अपने ही मानसे सौ वर्षोंकी होती है। उसका परिमाण बतलाता हूँ, सुनो। पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठाओंकी एक कला, तीस कलाओंका एक मुहूर्त तथा तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात होता है। यह मनुष्योंके दिन-रातका मान है। तीस दिन-रात व्यतीत होनेपर दो पक्ष अथवा एक मास पूर्ण होता है। छह मासोंका एक अयन और दो अयनोंका एक वर्ष होता है। दो अयनोंका नाम क्रमशः दक्षिणायन और उत्तरायण है। इस प्रकार मनुष्योंका एक वर्ष देवताओंका एक दिन-रात है। उसमें दिन तो उत्तरायण और रात दक्षिणायन है। देवताओंके बारह हजार वर्षोंकी एक चतुर्युगी होती है, जिसे सत्ययुग, त्रेता आदि कहते हैं। अब इनका विभाग सुनो। चार हजार दिव्य वर्षोंका सत्ययुग होता है, चार सौ दिव्य वर्षोंकी उसकी सन्ध्या और उतने ही वर्षोंका सन्ध्यांश होता है। तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग है। उसकी सन्ध्या और सन्ध्यांशका समय तीन-तीन सौ दिव्य वर्षोंका है। दो हजार दिव्य वर्षोंका द्वापरयुग होता है और दो-दो सौ दिव्य वर्ष उसकी सन्ध्या तथा सन्ध्यांशके होते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! एक हजार दिव्य वर्षोंका कलियुग होता है तथा सौ-सौ दिव्य वर्ष उसकी सन्ध्या एवं सन्ध्यांशके बताये गये हैं। इस प्रकार विद्वानोंने बारह हजार दिव्य वर्षोंकी एक चतुर्युगी बतायी है। एक हजार चतुर्युगी बीतनेपर ब्रह्माका एक दिन होता है। ब्रह्मन् ! ब्रह्माजीके एक दिनमें बारी-बारीसे चौदह मनु होते हैं। देवता, सप्तर्षि, इन्द्र, मनु और मनुपुत्र—ये सब लोग एक ही साथ उत्पन्न होते हैं और एक ही साथ इनका संहार भी होता है। इस प्रकार इकहत्तर चतुर्युगोंसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है।* अब मनुष्य-
* इकहत्तर चतुर्युगोंके हिसाबसे चौदह मन्वन्तरोंमें ९९४ चतुर्युगी होते हैं और ब्रह्माके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग होते हैं, अतः छः चतुर्युग और बचे। छः चतुर्युगोंका चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है; इस प्रकार एक मन्वन्तरमें इकहत्तर चतुर्युगके अतिरिक्त इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं।
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- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
वर्ष-गणनाके अनुसार मन्वन्तरका मान सुनो। पूरे तीस करोड़ सरसठ लाख और बीस हजार वर्षोंका एक मन्वन्तर माना गया है। देवताओंके वर्षसे एक मन्वन्तरमें आठ लाख, बावन हजार वर्ष होते हैं। इस कालका चौदह गुणा करनेपर ब्रह्माका एक दिन होता है। इसके अन्तमें विद्वानोंने नैमित्तिक प्रलयका होना बतलाया है। उसमें भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक जलकर नष्ट हो जाते हैं। महर्लोक बच जाता है; किन्तु नीचेके लोकोंके जलनेसे वहाँ इतना ताप पहुँचता है कि उस लोकके निवासी जनलोकमें चले जाते हैं। फिर तीनों लोक एक महासमुद्रके गर्भमें छिप जाते हैं। ब्रह्माकी रात आ जाती है, इसलिये वे उसमें शयन करते हैं। ब्रह्माके दिनके बराबर ही उनकी रात भी होती है। उनके बीतनेपर फिर सृष्टिका क्रम चालू होता है। इस प्रकार क्रमशः ब्रह्माका एक वर्ष बीतता है और पूरे सौ वर्षतक उनका जीवन रहता है। उनके सौ वर्षको एक 'पर' कहते हैं। उसमेंसे पचास वर्षोंकी 'परार्द्ध' संज्ञा है। इस तरह ब्रह्माका एक परार्द्ध बीत चुका है। उसके अन्तमें पाद्म नामसे विख्यात महाकल्प हुआ था। ब्रह्मन्! अब उनका दूसरा परार्द्ध चल रहा है। इसमें यह वाराह कल्प प्रथम कल्प है।
**क्रौष्टुकि बोले—**सृष्टिके आदिकर्ता तथा प्रजापतियोंके स्वामी भगवान् ब्रह्माजीने जिस प्रकार प्रजाको उत्पन्न किया, उसका मेरे लिये विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
**मार्कण्डेयजीने कहा—**ब्रह्मन्! पाद्म कल्पके अन्तमें जो प्रलय हुआ था, उसके बाद रात्रि बीतनेपर जब सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त श्रीविष्णुरूप ब्रह्माजी सोकर उठे, उस समय उन्होंने संसारको शून्य देखा। जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले ब्रह्मस्वरूप भगवान् नारायणके विषयमें विद्वान् पुरुष यह श्लोक कहा करते हैं—
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
तासु शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः॥
'जल नरसे प्रकट हुआ है, इसलिये वह नार कहलाता है। भगवान् उसमें सोते हैं—भगवान्का वह अयन है, इसलिये वे नारायण कहे गये हैं।'
जागनेके बाद उन्होंने पृथ्वीको जलके भीतर डूबी हुई जानकर उसे निकालनेकी इच्छासे वाराहरूप धारण किया। उनका वह स्वरूप वेदमय, यज्ञमय एवं दिव्य था। उन सर्वव्यापी भगवान्ने वाराहरूपसे ही जलमें प्रवेश किया और पातालसे पृथ्वीको निकालकर जलके ऊपर रखा। उस समय जनलोकनिवासी सिद्धगण उन जगदीश्वरका चिन्तन एवं स्तवन कर रहे थे। पृथ्वी उस जल-राशिके ऊपर बहुत बड़ी नौकाकी भाँति स्थित हुई। पृथ्वीका आकार बहुत विशाल और विस्तृत है, इसलिये यह जलमें डूब नहीं पाती। तदनन्तर पृथ्वीको बराबर करके भगवान्ने उसपर पर्वतोंकी सृष्टि की। पूर्वकल्पकी सृष्टि जब प्रलयाग्निसे दग्ध होने लगी थी, उस समय सब पर्वत पृथ्वीपर खण्ड-खण्ड होकर बिखर गये और एकार्णवके जलमें डूब गये। फिर वायुके द्वारा वहाँ बहुत-सा जल एकत्रित हुआ। उस जलसे भीगकर और प्रवाहमें बहकर जो पर्वत जहाँ लग गये, वे वहाँ अचलरूपसे स्थित हो गये।
**क्रौष्टुकिने कहा—**ब्रह्मन्! आपने थोड़ेमें ही सृष्टिका भलीभाँति वर्णन किया, अब मुझे देवता आदिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त विस्तारके साथ बतलाइये।
**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्मन्! ब्रह्माजीने जब सृष्टि रचनेका विचार किया, तब पहले उनसे मानस पुत्र ही उत्पन्न हुए। तदनन्तर देवता, असुर, पितर और मनुष्य—इन चारोंको उत्पन्न
- एक ही परमात्माके त्रिविध रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन * १२५
करनेकी इच्छासे उन्होंने जलमें अपनेको योगयुक्त किया। योगस्थ होनेपर ब्रह्माजीके कटिप्रदेशसे पहले असुरोंकी उत्पत्ति हुई। तब उन्होंने अपने उस तमोगुणी शरीरको त्याग दिया। त्यागनेपर वह शरीर रात्रिके रूपमें परिणत हो गया। फिर दूसरा शरीर धारण करके जब प्रजापतिने सृष्टिका विचार किया, तब उन्हें प्रसन्नता हुई। उस अवस्थामें उनके मुखसे सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त देवता उत्पन्न हुए। फिर भगवान् ब्रह्माने उस शरीरको भी त्याग दिया। त्यागनेपर वह सत्त्वप्राय दिनके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर पुनः उन्होंने सत्त्वगुणी शरीरको ही धारण किया। उस समय उन्होंने अपनेको सबका पिता माना, इसलिये उनसे पितरोंकी उत्पत्ति हुई। पितरोंकी सृष्टिके बाद ब्रह्माजीने वह शरीर भी छोड़ दिया। वह छोड़ा हुआ शरीर सन्ध्याकालके रूपमें परिणत हुआ, जो दिन और रातके मध्यमें स्थित होता है। तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने रजोगुणकी अधिकतासे युक्त दूसरा शरीर धारण किया। उससे मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई। मनुष्योंकी सृष्टिके बाद उस शरीरको भी उन्होंने त्याग दिया। वह शरीर ज्योत्स्नाकालके रूपमें परिणत हुआ, जो रातके अन्त और दिनके प्रारम्भमें हुआ करता है। इस प्रकार ये रात दिन, सन्ध्या और ज्योत्स्नाकाल देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माके शरीर हैं।
ब्रह्माजीने अपने प्रथम मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत्, रथन्तर साम तथा अग्निष्टोम यज्ञको उत्पन्न किया। दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पञ्चदश स्तोम तथा बृहत्सामकी सृष्टि की। पश्चिम मुखसे सामवेद, जगती छन्द, पञ्चदश स्तोम, वैरूप साम तथा अतिरात्र यज्ञका निर्माण किया और उत्तर मुखसे इक्कीसवाँ अथर्व, आप्तोर्याम यज्ञ, अनुष्टुप् छन्द तथा वैराज सामको प्रकट किया। उन्होंने कल्पके आदिमें बिजली, वज्र, मेघ, लाल इन्द्रधनुष और पक्षियोंकी सृष्टि की। तथा उनके शरीरसे छोटे-बड़े अनेक प्राणी उत्पन्न हुए। पूर्वकालमें देवता, असुर, पितर और मनुष्य—इन चारोंकी सृष्टि करनेके पश्चात् उन्होंने अन्य स्थावर-जङ्गम प्राणियोंको उत्पन्न किया। यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, नर, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, मृग, सर्प आदि जङ्गम तथा स्थावर भूतोंकी सृष्टि की। उनमेंसे जिनके पूर्वकल्पमें जैसे कर्म थे, वैसे ही कर्म वे पुनः-पुनः नूतन सृष्टिमें प्राप्त करते हैं। हिंसा-अहिंसा, मृदुता क्रूरता, धर्म-अधर्म तथा सत्य असत्यको वे पूर्वजन्मकी भावनाके अनुसार ही प्राप्त करते हैं और उस भावनाके अनुकूल वस्तु ही उन्हें रुचिकर जान पड़ती है। इन्द्रियोंके विषयों, भूतों तथा शरीरोंमें स्वयं ब्रह्माजीने ही नानात्वका विधान किया है—उन्हें अनेक रूपोंमें उत्पन्न किया है। देवता आदि भूतोंके नाम और रूपका तथा कार्योंके विस्तारका उन्होंने वेदके शब्दोंसे ही प्रतिपादन किया है। ऋषियोंके नाम भी वेदोंसे ही निश्चित किये हैं। ब्रह्माजीकी रात्रिका अन्त होनेपर उन्होंने देवता आदि जिन-जिन भूतोंकी सृष्टि की है, उन सबके नाम-रूप और कर्तव्यका ज्ञान भी वे वेदोंसे ही प्रदान करते हैं। जिस ऋतुमें जिस प्रकारके अनेकों चिह्न देखे जाते हैं, युगादिमें सृष्टि होनेपर वे सभी वैसे ही दृष्टिगोचर होते हैं। रात्रिके अन्तमें जगे हुए अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी सृष्टि प्रत्येक कल्पमें ऐसी ही होती है।