संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •
नहीं है, इसपर केवल शूलपाणि भगवान् शङ्करका अधिकार है; अतः यह मेरे राज्यसे बाहर है। ऐसा निश्चय करके दुःखसे पीड़ित हो उन्होंने अपनी अनुकूल पत्नीके साथ पैदल ही काशीमें प्रवेश किया। पुरमें प्रवेश करते ही उन्हें महर्षि विश्वामित्र सामने खड़े दिखायी दिये। उन्हें उपस्थित देख राजा हरिश्चन्द्र हाथ जोड़कर विनीत भावसे खड़े हो गये और बोले—'मुने ! ये मेरे प्राण, यह पुत्र और यह पत्नी यहाँ प्रस्तुत हैं। इनमेंसे जिसकी आपको आवश्यकता हो, उसे उत्तम अर्घ्यके रूपमें स्वीकार कीजिये अथवा हमलोग यदि आपकी और कोई सेवा कर सकते हों तो उसके लिये भी आज्ञा दीजिये।'
विश्वामित्र बोले—राजर्षे ! आज एक मास पूर्ण हो गया। यदि आपको अपनी बातका स्मरण हो तो मुझे राजसूय यज्ञके लिये दक्षिणा दीजिये।
हरिश्चन्द्रने कहा—तपोधन ! अभी आज ही महीना पूरा हो रहा है। उसमें आधा दिन शेष है। इतने समयतक और प्रतीक्षा कीजिये। अब अधिक देरी नहीं होगी।
विश्वामित्र बोले—महाराज ! ऐसा ही सही। मैं फिर आऊँगा। यदि आज मुझे दक्षिणा न दोगे तो मैं तुम्हें शाप दे दूँगा।
यों कहकर विश्वामित्र चले गये। उस समय राजा इस चिन्तामें पड़े कि पहले स्वीकार की हुई दक्षिणा मैं इन्हें किस प्रकार दूँ। क्या मैं अपने प्राण त्याग दूँ ? इस अकिञ्चन दशामें किधर जाऊँ ? यदि प्रतिज्ञा की हुई दक्षिणा दिये बिना ही मर जाऊँ तो ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेके कारण पापात्मा समझा जाऊँगा और मुझे अधम-से-अधम कीटयोनिमें जन्म लेना पड़ेगा। अथवा यह दक्षिणा चुकानेके लिये अपनेको बेचकर किसीकी दासता स्वीकार कर लूँ ? बस, अपनेको बेचना ही ठीक है।
राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त व्याकुल एवं दीन होकर नीचा मुख किये जब इस प्रकार चिन्ता कर रहे थे, उस समय उनकी पत्नीने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गद्गदवाणीमें कहा—'महाराज ! चिन्ता छोड़िये। अपने सत्यकी रक्षा कीजिये। जो मनुष्य सत्यसे विचलित होता है, वह श्मशानकी भाँति त्याग देने योग्य है। नरश्रेष्ठ ! पुरुषके लिये अपने सत्यकी रक्षासे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं बतलाया गया है। जिसका वचन निरर्थक (मिथ्या) हो जाता है, उसके अग्निहोत्र, स्वाध्याय तथा दान आदि सम्पूर्ण कर्म निष्फल हो जाते हैं। धर्मशास्त्रोंमें बुद्धिमान् पुरुषोंने सत्यको ही संसारसागरसे तारनेके लिये सर्वोत्तम साधन बताया है। इसी प्रकार जिनका मन अपने वशमें नहीं है, ऐसे पुरुषोंको पतनके गर्तमें गिरानेके लिये असत्यको ही प्रधान कारण बताया गया है।* कृति नामके राजा सात
* त्यज चिन्तां महाराज स्वसत्यमनुपालय। श्मशानवद्वर्जनीयो नरः सत्यबहिष्कृतः ॥
यतः परतरं धर्मं वदन्ति पुरुषस्य तु। तादृशं पुरुषव्याघ्र स्वसत्यपरिपालनम् ॥
- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * ११
अश्वमेध और एक राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके भी एक ही बार असत्य बोलनेके कारण स्वर्गसे गिर गये थे। महाराज ! मुझसे पुत्रका जन्म हो चुका है.......।' इतना कहकर रानी शैव्या फूट-फूटकर रोने लगी।
हरिश्चन्द्र बोले—कल्याणि ! यह सन्ताप छोड़ो और जो कुछ कहना चाहती थी, उसे साफ-साफ कहो।
रानीने कहा—महाराज ! मुझसे पुत्रका जन्म हो चुका है। श्रेष्ठ पुरुष स्त्री संग्रहका फल पुत्र ही बतलाते हैं। वह फल आपको मिल चुका है, अतः मुझको बेंचकर ब्राह्मणको दक्षिणा चुका दीजिये।
महारानीका यह वचन सुनकर राजा हरिश्चन्द्र मूर्च्छित हो गये। फिर होशमें आनेपर वे अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे—'कल्याणी ! वह महान् दुःखकी बात है, जो तुम मुझसे ऐसा कह रही हो।' यों कहकर नरश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र पृथ्वीपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। महाराज हरिश्चन्द्रको पृथ्वीपर पड़ा देख रानी अत्यन्त दुःखित होकर बड़ी करुणाके साथ बोलीं—'हा महाराज! यह किसका चीता हुआ अनिष्ट फल आपको प्राप्त हुआ ? आप तो रंकुनामक मृगके रोएँसे बने हुए कोमल एवं चिकने वस्त्रपर शयन करने योग्य हैं, किन्तु आज भूमिपर पड़े हैं। जिन्होंने करोड़ोंसे भी अधिक गोधन ब्राह्मणोंको दान दिया है, वे ही ये मेरे प्राणनाथ महाराज इस समय धरतीपर सो रहे हैं! हाय! कितने कष्टकी बात है। अरे ओ दुर्दैव! इन महाराजने तेरा क्या बिगाड़ा था, जो इन्द्र और भगवान् विष्णुके तुल्य होकर भी ये यहाँ मूर्च्छित दशामें पड़े हैं' इतना कहकर सुन्दरी शैव्या पतिके दुःखोंके असह्य बोझसे पीड़ित हो स्वयं भी गिरकर मूर्च्छित हो गयी।
इसी बीचमें महातपस्वी विश्वामित्रजी भी आ धमके। उन्होंने राजा हरिश्चन्द्रको मूर्च्छित होकर भूमिपर पड़ा देख उनपर जलके छींटे डाले और इस प्रकार कहा—'राजेन्द्र ! उठो, उठो। यदि तुम्हारी दृष्टि धर्मपर हो तो मुझे पूर्वोक्त दक्षिणा दे दो। सत्यसे ही सूर्य तप रहा है। सत्यपर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य-भाषण सबसे बड़ा धर्म है। सत्यपर ही स्वर्ग प्रतिष्ठित है। एक हजार अश्वमेध और एक सत्यको यदि तराजूपर तोला जाय तो हजार अश्वमेधसे सत्य ही भारी सिद्ध होगा।*
अग्निहोत्रमधीतं वा दानाद्याश्चाखिलाः क्रियाः। भजन्ते तस्य वैफल्यं यस्य वाक्यमकारणम्॥
सत्यन्वयन्तमुदितं धर्मशास्त्रेषु धीमताम्। तपसावानृतं तद्वत् पतनायाकृतात्मनाम्॥
(अ० ८। १७–२०)
* सत्येनार्कः प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी। सत्यं चोक्तं परो धर्मः स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः ॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्। अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥
(अ० ८। ४१-४२)
२०
- संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
राजन्! यदि आज तुम मुझे दक्षिणा न दोगे तो सूर्यास्त होनेपर तुम्हें निश्चय ही शाप दे दूँगा।' इतना कहकर विश्वामित्र चले गये। इधर राजा हरिश्चन्द्र उनके भयसे व्याकुल हो उठे। सोचने लगे—'हाय! मैं अधम कहाँ भागकर जाऊँ।' उनकी दशा क्रूर स्वभाववाले धनीसे पीड़ित निर्धन पुरुषकी-सी हो रही थी। उस समय उनकी पत्नीने फिर कहा—'नाथ! मेरी बात मानकर वैसा ही कीजिये, अन्यथा आपको शापाग्निसे दग्ध होकर मरना पड़ेगा।' जब पत्नीने बार-बार उन्हें प्रेरित किया, तब राजा बोले—'कल्याणी! मैं बड़ा निर्दयी हूँ। लो, अब तुम्हें बेचने चलता हूँ। क्रूर-से-क्रूर मनुष्य भी जो कार्य नहीं कर सकते, वही आज मैं करूँगा।' पत्नीसे यों कहकर राजा व्याकुलचित्तसे नगरमें गये और नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठसे बोले।
राजा ने कहा—ओ नागरिको! तुम सब लोग मेरी बात सुनो, क्या तुम मेरा परिचय पूछ रहे हो? लो, सुनो, मैं मनुष्य नहीं, अत्यन्त क्रूर प्राणी हूँ; क्योंकि अपनी प्राणप्यारी पत्नीको यहाँ बेचनेके लिये आया हूँ। यदि आपलोगोंमेंसे किसीको मेरी इस प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा पत्नीसे दासीका काम लेनेकी आवश्यकता हो तो वह शीघ्र बोले; इस असह्य दुःखमें भी जबतक मैं जीवन धारण किये हुए हूँ, तभीतक बात कर ले।
तदनन्तर कोई बूढ़ा ब्राह्मण सामने आकर राजासे बोला—'दासीको मेरे हवाले करो। मैं इसे धन देकर खरीदता हूँ। मेरे पास धन बहुत है और मेरी प्यारी पत्नी अत्यन्त सुकुमारी है। वह घरके काम-काज नहीं कर सकती। इसलिये यह दासी मुझे दे दो। तुम अपनी इस पत्नीकी कार्यदक्षता, अवस्था, रूप और स्वभावके अनुरूप यह धन लो और इसे मेरे हवाले करो।' ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजा हरिश्चन्द्रका हृदय दुःखसे विदीर्ण हो गया। वे उसे कोई उत्तर न दे सके। तब उस ब्राह्मणने राजाके वल्कल-वस्त्रमें उस धनको अच्छी तरह बाँध दिया और उनकी पत्नीको खींचकर वह अपने साथ ले चला। माताको इस दशामें देखकर बालक रोहिताश्व रो उठा और हाथसे उसका वस्त्र पकड़कर अपनी ओर खींचने
- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २१
लगा। उस समय रानीने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! आओ, जी भरकर देख लो। तुम्हारी माता अब दासी हो गयी। तुम राजपुत्र हो, मेरा स्पर्श न करो। अब मैं तुम्हारे स्पर्श करनेयोग्य न रही।' फिर सहसा अपनी माताको खींचकर ले जाये जाते हुए देख बालक रोहिताश्व 'मा, मा' कहकर रोता हुआ दौड़ा। उस समय उसके नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे। जब बालक पास आया, तब उस ब्राह्मणने क्रोधमें भरकर उसे लातसे मारा तो भी उसने अपनी मांको नहीं छोड़ा। केवल 'माई, माई' कहकर बिलखता रहा।
तब रानीने ब्राह्मणसे कहा—स्वामिन् ! आप मुझपर कृपा कीजिये। इस बालकको भी खरीद लीजिये। यद्यपि आपने मुझे खरीद लिया है, तथापि इस बालकके बिना मैं आपके कार्यको अच्छी तरह नहीं कर सकती। मैं बड़ी अभागिनी हूँ। आप मुझपर दया करके प्रसन्न हों और बछड़ेसे गायकी तरह इस बालकसे मुझे मिलाइये।
ब्राह्मण बोला—राजन् ! यह धन लो और इस बालकको भी मेरे हवाले करो।
यों कहकर उसने पूर्ववत् राजाके उत्तरीय-खण्डमें वह धन बाँध दिया और बालकको उसकी माताके साथ लेकर चल दिया। इस प्रकार पत्नी और पुत्रको ले जाये जाते देख राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त दुःखसे कातर हो गये और विलाप करने लगे—'हाय! पहले जिसे वायु, सूर्य, चन्द्रमा तथा बाहरी लोग कभी नहीं देख पाते थे, वही मेरी पत्नी आज दासी बन गयी। जिसके हाथोंकी अँगुलियाँ अत्यन्त सुकुमार हैं, यह सूर्यवंशमें उत्पन्न मेरा बालक आज बेच दिया गया। हा प्रिये ! हा पुत्र !! हा वत्स !!! मुझ नीचके अन्यायसे तुम्हें दैवाधीन दशाको प्राप्त होना पड़ा। फिर भी मेरी मृत्यु नहीं होती—मुझे धिक्कार है।'
राजा हरिश्चन्द्र इस प्रकार विलाप कर रहे थे, इतनेमें ही वह ब्राह्मण उन दोनोंको साथ ले ऊँचे-ऊँचे वृक्ष और गृह आदिकी ओटमें छिप गया। वह बड़ी शीघ्रतासे चल रहा था। तदनन्तर विश्वामित्रने वहाँ पहुँचकर राजासे धन माँगा। हरिश्चन्द्रने भी वह धन उन्हें समर्पित कर दिया। पत्नी और पुत्रको बेचनेसे प्राप्त हुए उस धनको थोड़ा देखकर कौशिक मुनिने शोकाकुल राजासे कुपित होकर कहा—'क्षत्रियाधम ! क्या तू इसको मेरे यज्ञके अनुरूप दक्षिणा मानता है ? यदि ऐसी बात है तो मेरे महान् बलको देख। अपनी भलीभाँति की हुई तपस्याका, निर्मल ब्राह्मणत्वका, उग्र प्रभावका तथा विशुद्ध स्वाध्यायका बल तुझे दिखाता हूँ।'
हरिश्चन्द्रने कहा—भगवन् ! कुछ काल और प्रतीक्षा कीजिये और भी दक्षिणा दूँगा। इस समय नहीं है। मेरी पत्नी और पुत्र बिक चुके हैं।
विश्वामित्रने कहा—राजन् ! दिनका चौथा भाग शेष है। इतने ही समयतक मुझे प्रतीक्षा करनी है। बस, इसके उत्तरमें तुम्हें कुछ कहनेकी आवश्यकता नहीं है।
राजा हरिश्चन्द्रसे इस प्रकार निर्दयतापूर्ण निष्ठुर वचन कहकर और उस धनको लेकर कोपमें भरे हुए विश्वामित्र तुरंत वहाँसे चल दिये। उनके
२२ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •
आनेपर राजा भय और शोकके समुद्रमें डूब गये; उन्होंने सब प्रकार विचार करके अपना कर्तव्य निश्चित किया और नीचा मुँह करके आवाज लगायी—‘जो मनुष्य मुझे धनसे खरीदकर दासका काम लेना चाहता हो, वह सूर्यके रहते-रहते शीघ्र ही बोले।’ उसी समय धर्म चाण्डालका रूप धारण करके तुरंत वहाँ आये। उस चाण्डालके शरीरसे दुर्गन्ध निकल रही थी। विकृत आकार, रूखा बदन, दाढ़ी-मूँछें बढ़ी हुई और दाँत निकले हुए थे। निर्दयताकी तो वह मूर्ति ही था। काला रंग, लंबा पेट, पीलापन लिये हुए रूखे नेत्र और कठोर वाणी—यही उसकी हुलिया थी। उसने झुंड-के-झुंड पक्षियोंको पकड़ रखा था। मुर्दोंपर चढ़ी हुई मालाओंसे वह अलङ्कृत था। उसने एक हाथमें खोपड़ी और दूसरेमें लाठी ले रखी थी। उसका मुँह बहुत बड़ा था। वह देखनेमें भयानक तथा बारंबार बहुत बकवाद करनेवाला था। कुत्तोंसे घिरे होनेके कारण उसकी भयंकरता और भी बढ़ गयी थी।
**चाण्डाल बोला—**मुझे तुम्हारी आवश्यकता है। तुम शीघ्र ही अपनी कीमत बताओ। थोड़े अथवा बहुत, जितने धनसे तुम प्राप्त हो सको, उसे कहो।
चाण्डालकी दृष्टिसे क्रूरता टपक रही थी। वह बड़ी निष्ठुरताके साथ बातें करता था। देखनेसे अत्यन्त दुराचारी प्रतीत होता था। इस रूपमें उसे देखकर राजाने पूछा—‘तू कौन है ?’
**चाण्डालने कहा—**मैं चाण्डाल हूँ। इस श्रेष्ठ नगरीमें मुझे सब लोग प्रवीरके नामसे पुकारते हैं। मैं वध्य मनुष्योंका वध करनेवाला और मुर्दोंका वस्त्र लेनेवाला प्रसिद्ध हूँ।
**हरिश्चन्द्र बोले—**मैं चाण्डालका दास होना नहीं चाहता। यह बहुत ही निन्दित कर्म है। शापाग्निसे जल मरना अच्छा, किन्तु चाण्डालके अधीन होना कदापि अच्छा नहीं है।
वे इस प्रकार कह ही रहे थे कि महान् तपस्वी विश्वामित्र मुनि आ पहुँचे और क्रोध एवं अमर्षसे आँखें फाड़कर राजासे बोले—‘यह चाण्डाल तुम्हें बहुत-सा धन देनेके लिये उपस्थित है। उसे ग्रहण करके मुझे यज्ञकी पूरी दक्षिणा क्यों नहीं देते ? यदि तुम चाण्डालके हाथ अपनेको बेचकर उससे मिला हुआ धन मुझे नहीं दोगे, तो मैं निःसन्देह तुम्हें शाप दे दूँगा।’
**हरिश्चन्द्रने कहा—**ब्रह्मर्षे ! मैं आपका दास हूँ, दुःखी हूँ, भयभीत हूँ और विशेषतः आपका भक्त हूँ। आप मुझपर कृपा करें। चाण्डालका सम्पर्क बड़ा ही निन्दनीय है। मुनिश्रेष्ठ ! शेष धनके बदले मैं आपका ही सब कार्य करनेवाला, आपके अधीन रहनेवाला तथा आपकी इच्छाके अनुसार चलनेवाला दास बनकर रहूँगा।
**विश्वामित्र बोले—**यदि तुम मेरे दास हो तो मैंने एक अरब स्वर्णमुद्रा लेकर तुम्हें चाण्डालको दे दिया। अब तुम इसके दास हो गये।
मुनिके ऐसा कहनेपर चाण्डाल मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुआ। उसने विश्वामित्रको धन देकर
- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २३
स्मरण किया करते थे। अपना सर्वस्व छिन जानेके कारण राजा बहुत व्याकुल रहते थे। कुछ कालके बाद राजा हरिश्चन्द्र चाण्डालके वशमें होनेके कारण श्मशानघाटपर मुर्दोंके कपड़े (कफ़न) संग्रह करनेके काममें नियुक्त हुए। चाण्डालने उन्हें आज्ञा दी थी कि 'तुम मुर्दोंके आनेकी प्रतीक्षामें रात-दिन यहीं रहो।' वह आदेश पाकर राजा काशीपुरीके दक्षिण श्मशान-भूमिमें बने हुए शवमन्दिरमें गये। उस श्मशानमें बड़ा भयङ्कर शब्द होता था। वहाँ सैकड़ों सियारिनें भरी रहती थीं। चारों ओर मुर्दोंकी खोपड़ियाँ बिखरी पड़ी थीं। सारा श्मशान दुर्गन्धसे व्याप्त और अत्यन्त धूमसे आच्छादित था। उसमें पिशाच, भूत, वेताल, डाकिनी और यक्ष रहा करते थे। गिद्धों और गोहड़ोंसे भी वह स्थान भरा रहता था। झुंड-के-झुंड कुत्ते उसे घेरे रहते थे। यत्र-तत्र हड्डियोंके ढेर लगे हुए थे। सब ओरसे बड़ी दुर्गन्ध आती थी। अनेकों मृत व्यक्तियोंके बन्धु-बान्धवोंके करुण-क्रन्दनसे वह श्मशान-भूमि बड़ी ही भयानक और कोलाहलपूर्ण रहती थी। 'हा पुत्र! हा मित्र!
राजाको बाँध लिया और उन्हें डंडोंकी मारसे अचेत-सा करता हुआ वह अपने घरकी ओर ले चला। उस समय राजाकी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो गयी थीं। तदनन्तर राजा हरिश्चन्द्र चाण्डालके घरमें रहने लगे। वे प्रतिदिन सबेरे, दोपहर और शामको निम्नाङ्कित बातें गुनगुनाया करते थे। 'हाय! मेरी दीनमुखी पत्नी अपने आगे दीनमुख बालक रोहिताश्वको देखकर अत्यन्त दुःखमें मग्न हो जाती होगी और उस समय इस आशासे कि राजा धन कमाकर हम दोनोंको छुड़ायेंगे, बारंबार मेरा स्मरण करती होगी। उसे इस बातका पता न होगा कि मैं ब्राह्मणको और भी अधिक धन देकर अत्यन्त पापमय संसर्गमें जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। राज्यका नाश, सुहृदोंका त्याग, पत्नी और पुत्रका विक्रय तथा अन्तमें चाण्डालत्वकी प्राप्ति— अहो! यह एकके बाद एक दुःखोंकी कैसी परम्परा चली आती है।'
इस प्रकार वे चाण्डालके घरमें रहते हुए प्रतिदिन अपने प्रिय पुत्र तथा अनुकूल पत्नीका
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- संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
हा बन्धु ! हा भ्राता ! हा वत्स ! हा प्रियतम ! हा पतिदेव ! हाय बहिन ! हा माता ! हा मामा ! हा पितामह ! हा मातामह ! हा पिताजी ! हा पौत्र ! हा बान्धव ! तुम कहाँ चले गये ? लौट आओ !' इस प्रकार विलाप करनेवालोंकी करुणापूर्ण ध्वनि वहाँ जोर-जोरसे सुनायी पड़ती थी। ऐसी भूमिमें निवास करनेके कारण राजा न रातमें सो पाते थे, न दिनमें। बारंबार हाहाकार करते रहते थे। इस प्रकार उनके बारह महीने सौ वर्षोंके समान बीते। अन्तमें राजाने दुःखी होकर देवताओंकी शरण ली और कहा—'महान् धर्मको नमस्कार है। जो सच्चिदानन्दस्वरूप, सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करनेवाले विधाता, परात्पर ब्रह्म, शुद्ध, पुराणपुरुष एवं अविनाशी हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। देवगुरु बृहस्पति ! तुम्हें नमस्कार है। इन्द्रको भी नमस्कार है।' यों कहकर राजा पुनः चाण्डालके कार्यमें लग गये।
तदनन्तर महाराज हरिश्चन्द्रकी पत्नी शैब्या साँपके काटनेसे मरे हुए अपने बालकको गोदमें उठाये विलाप करती हुई श्मशान-भूमिमें आयी। वह बार-बार यही कहती थी, 'हा वत्स ! हा पुत्र ! हा शिशो !' उसका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था। कान्ति मलिन पड़ गयी थी। मन बेचैन था। सिरके बालोंमें धूल जम गयी थी। शैब्याके विलापका शब्द सुनकर राजा हरिश्चन्द्र तुरंत उसके पास गये। उन्हें आशा थी, यहाँ भी मुर्देके शरीरका कफन मिलेगा। वे जोर-जोरसे रोती हुई अपनी पत्नीको पहचान न सके। अधिक कालतक प्रवासमें रहनेके कारण वह बहुत सन्तप्त थी। ऐसी जान पड़ती थी, मानो उसका दूसरा जन्म हुआ हो। शैब्याने भी पहले उनके मस्तकको मनोहर केशोंसे सुशोभित देखा था। अब उनके सिरपर जटा थी। वे सूखे हुए वृक्षके समान जान पड़ते थे। इस अवस्थामें वह भी अपने पतिको न पहचान सकी। राजाने काले कपड़ेमें लिपटे हुए बालकको, जिसे साँपने काट खाया था तथा जिसके अङ्गोंमें राजोचित चिह्न दिखायी देते थे, जब देखा तो उन्हें बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—'अहो ! बड़े कष्टकी बात है, यह बालक किसी राजाके कुलमें उत्पन्न हुआ था; किन्तु दुरात्मा कालने इसे किसी और ही दशाको पहुँचा दिया। अपनी माताकी गोदमें पड़े हुए इस बालकको देखकर मुझे कमलके समान नेत्रोंवाला अपना पुत्र रोहिताश्व याद आ रहा है। यदि उसे भयंकर कालने अपना ग्रास न बनाया होगा तो वह मेरा लाड़ला भी इसी उम्रका हुआ होगा।'
इतनेमें ही रानीने विलाप करते हुए कहा—हा वत्स ! किस पापके कारण यह अत्यन्त भयंकर दुःख आ पड़ा है, जिसका कभी अन्त ही नहीं आता। हा प्राणनाथ ! आप कहाँ हैं ? ओ विधाता ! तूने राज्यका नाश किया, सुहृदोंसे विक्षोह कराया और स्त्री तथा पुत्रको भी बिकवा दिया। अरे ! तूने राजर्षि हरिश्चन्द्रकी कौन-सी दुर्दशा नहीं की।
रानीका यह वचन सुनकर अपने पथसे भ्रष्ट हुए राजा हरिश्चन्द्रने अपनी प्राणप्यारी पत्नी तथा मृत्युके मुखमें पड़े हुए पुत्रको पहचान लिया। 'ओह ! कितने कष्टकी बात है, यह शैब्या इस अवस्थामें और यह वही मेरा पुत्र है ?' यों कहते हुए वे दुःखसे सन्तप्त होकर रोते-रोते मूर्च्छित हो गये। इस अवस्थामें पहुँचे हुए राजाको पहचानकर रानीको भी बड़ा दुःख हुआ। वह भी मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। उसका शरीर निश्चेष्ट हो गया। फिर थोड़ी देर बाद होशमें आनेपर महाराज और महारानी दोनों साथ-ही-साथ शोकके भारसे पीड़ित एवं सन्तप्त हो विलाप करने लगे।
राजाने कहा—हा वत्स ! सुन्दर नेत्र, भौंह, नासिका और बालोंसे युक्त तुम्हारा यह सुकुमार एवं दीन मुख देखकर मेरा हृदय क्यों नहीं विदीर्ण हो जाता। हा बेटा ! तुम मेरे अङ्ग-प्रत्यङ्गसे उत्पन्न
- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २५
तथा मन और हृदयको आनन्द देनेवाले थे, किन्तु मुझ-जैसे दुष्ट पिताने तुम्हें एक साधारण वस्तुकी भाँति बेच डाला। हाय ! दुर्दैवरूपी क्रूर सर्पने सब प्रकारके साधन और वैभवसे पूर्ण मेरे महान् राज्यका अपहरण करके अब मेरे पुत्रको भी काट खाया। दैवरूपी सर्पसे डसे हुए अपने पुत्रके मुख कमलको देखते हुए भी मैं इस समय उसीके भयंकर विषके प्रभावसे अंधा हो रहा हूँ।
आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठसे यों कहकर राजाने बालकको उठाकर छातीसे लगा लिया और मूर्च्छासे निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।
उस समय रानी इस प्रकार बोली—ये तो वही नरश्रेष्ठ जान पड़ते हैं। केवल स्वरसे इनकी पहचान हो रही है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि ये विद्वज्जनोंके हृदयरूपी चकोरको आह्लादित करनेवाले चन्द्ररूप महाराज हरिश्चन्द्र ही हैं; किन्तु वे महाराज इस समय श्मशानमें कैसे आ पहुँचे ?
अब शैव्या पुत्र-शोकको भूलकर गिरे हुए पतिको देखने लगी। पति और पुत्र दोनोंकी चिन्तासे पीड़ित, विस्मित एवं दीन हुई रानी जब पतिकी दशाका निरीक्षण कर रही थी, उस समय उसकी दृष्टि अपने स्वामीके उस दण्डपर पड़ी, जो बहुत ही घृणित एवं चाण्डालके धारण करने योग्य था। वह देखते ही वह बेहोश होकर गिर पड़ी। फिर धीरे-धीरे जब चेत हुआ तो गद्गद-वाणीमें कहने लगी—'ओ दैव! तूने देवताके समान कान्तिमान् इन महाराजको चाण्डालकी दशाको पहुँचा दिया। तूने इनके राज्यका नाश, सुहृदोंका त्याग और स्त्री-पुत्रका विक्रय कराकर भी इन्हें नहीं छोड़ा। आखिर इन्हें राजासे चाण्डाल बना दिया ! हा राजन् ! आज मैं आपके पास छत्र, झारी, चँवर और व्यजन—कुछ भी नहीं देखती। यह विधाताका कैसा विपरीत भाव है ! पूर्वकालमें जिनके आगे आगे चलनेपर कितने ही राजा सेवक बनकर अपनी चादरोंसे धरती बुहारा करते थे, वे ही महाराज अब दुःखसे पीड़ित हो इस अपवित्र श्मशानभूमिमें विचरते हैं, जहाँ खोपड़ियोंसे सटे कितने ही मिट्टीके घड़े चारों ओर बिखरे पड़े हैं। जहाँ मृतकोंकी लाशसे चर्बी गल-गलकर पृथ्वीके सूखे दोनोंमें पड़ रही है। चिताकी राख, अँगारे, अधजली हड्डियों और मज्जाके ढेरसे यहाँकी भयंकरता बहुत बढ़ गयी है। यहाँसे गृध्रों और गीदड़ोंके भयंकर नाद सुनकर छोटे-छोटे पक्षी भाग गये हैं। चिताके धुएँसे यहाँकी सारी दिशाएँ काली दिखायी देती हैं।'
यों कहकर महारानी शैव्या महाराज हरिश्चन्द्रके कण्ठमें लग गयी तथा कष्ट एवं सैकड़ों प्रकारके शोकसे आक्रान्त हो आर्तवाणीमें विलाप करने लगी—'राजन् ! यह स्वप्न है या सत्य ? महाभाग ! आप इसे जैसा समझते हों, बतलायें। मेरा मन अचेत होता जा रहा है?'
रानीकी यह बात सुनकर महाराज हरिश्चन्द्रने गरम साँस ली और गद्गदवाणीमें अपनेको चाण्डालत्व प्राप्त होनेकी सारी कथा कह सुनायी। उसे
[ 539 ] सं० मा० पु०—२
२४ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
सुनकर रानीको बड़ा दुःख हुआ और उसने गरम साँस खींचकर बहुत देरतक रोनेके पश्चात् अपने पुत्रकी मृत्युकी यथार्थ घटना निवेदित की। पुत्रके मरनेकी बात सुनकर राजा पुनः पृथ्वीपर गिर पड़े और विलाप करते हुए बोले—'प्रिये ! अब मैं अधिक दिनोंतक जीवित रहकर क्लेश भोगना नहीं चाहता; परन्तु मेरा अभाग्य तो देखो, मेरा आत्मा भी मेरे अधीन नहीं है। तुम मेरे अपराधोंको क्षमा करना। मैं आज्ञा देता हूँ, तुम ब्राह्मणके घर चली जाओ। शुभे ! 'मैं राजपत्नी हूँ', इस अभिमानमें आकर कभी उस ब्राह्मणका अपमान न करना। सब प्रकारके यत्न करके उसे सन्तुष्ट रखना; क्योंकि स्वामी देवताके समान होता है।'
रानी बोली—राजर्षे! मुझसे भी अब यह दुःखका भार नहीं सहा जाता, अतः आपके साथ ही मैं भी चिताकी जलती हुई आगमें प्रवेश करूँगी।
यह सुनकर राजाने कहा—'पतिव्रते ! जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा ही करो।' तदनन्तर राजाने चिता बनाकर उसके ऊपर अपने पुत्रको रखा और अपनी पत्नीके साथ हाथ जोड़कर सबके ईश्वर परमात्मा नारायण श्रीहरिका स्मरण किया, जो हृदयरूपी गुफामें विराजमान हैं तथा जिनका वासुदेव, सुरेश्वर, आदि-अन्तरहित, ब्रह्म, कृष्ण, पीताम्बर एवं शृंग आदि नामोंसे चिन्तन किया जाता है। उनके इस प्रकार भगवत्स्मरण करनेपर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता धर्मको अगुआ बनाकर तुरंत वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'राजन्! हमारी बात सुनो, तुम्हारे स्मरण करनेपर सम्पूर्ण देवता यहाँ उपस्थित हुए हैं। ये साक्षात् पितामह ब्रह्माजी हैं और ये स्वयं भगवान् धर्म हैं। इनके सिवा साध्यगण, विश्वेदेव, मरुद्गण और लोकपाल भी अपने वाहनोंसहित पधारे हैं। नाग, सिद्ध, गन्धर्व, रुद्र, अश्विनीकुमार तथा और भी बहुत-से देवता यहाँ उपस्थित हुए हैं। साथ ही बाबा विश्वामित्रजी भी हैं।'
तत्पश्चात् धर्मने कहा—राजन् ! प्राण त्यागनेका साहस न करो। मैं साक्षात् धर्म तुम्हारे पास आया हूँ। तुमने अपने क्षमा, इन्द्रियसंयम तथा सत्य आदि गुणोंसे मुझे सन्तुष्ट किया है।
इन्द्र बोले—महाभाग हरिश्चन्द्र ! मैं इन्द्र तुम्हारे पास आया हूँ। तुमने स्त्री-पुत्रके साथ सनातन लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है। राजन्! पत्नी और पुत्रको साथ लेकर स्वर्गलोकको चलो, जिसे तुमने अपने शुभकर्मोंसे प्राप्त किया है तथा जो दूसरे मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है।
इसके बाद इन्द्रने चिताके ऊपर आकाशसे अमृतकी वृष्टि की, जो अकालमृत्युका निवारण करनेवाली है। फिर फूलोंकी भी वर्षा होने लगी। देवताओंकी दुन्दुभि जोर-जोरसे बज उठी। इस प्रकार वहाँ एकत्रित हुए देवताओंके समाजमें महात्मा राजाका पुत्र रोहिताश्व चितासे जीवित हो उठा। उसका शरीर सुकुमार और स्वस्थ था। उसकी इन्द्रियों और मनमें प्रसन्नता थी। फिर तो महाराज हरिश्चन्द्रने अपने पुत्रको
- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २७
तुरंत छातीसे लगा लिया। वे स्त्रीसहित पूर्ववत् तेज और कान्तिसे सम्पन्न हो गये। उनकी देहपर दिव्य हार और वस्त्र शोभा पाने लगे। राजा स्वस्थ एवं पूर्णमनोरथ हो परम आनन्दमें निमग्न हो गये। उस समय इन्द्रने पुनः उनसे कहा—'महाभाग! स्त्री और पुत्रसहित तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी, अतः अपने कर्मोंके फल भोगनेके लिये दिव्य लोकको चलो।'
हरिश्चन्द्रने कहा—देवराज! मैं अपने स्वामी चाण्डालकी आज्ञा लिये बिना तथा उसके ऋणसे उद्धार पाये बिना देवलोकको नहीं चल सकूँगा।*
धर्म बोले—राजन् ! तुम्हारे इस भावी संकटको जानकर मैंने ही मायासे अपनेको चाण्डालके रूपमें प्रकट किया तथा चाण्डालत्वका प्रदर्शन किया था।
इन्द्रने कहा—हरिश्चन्द्र ! पृथ्वीके समस्त मनुष्य जिस परमधामके लिये प्रार्थना करते हैं, केवल पुण्यवान् मनुष्योंको प्राप्त होनेवाले उस धामको चलो।
हरिश्चन्द्र बोले—देवराज! आपको नमस्कार है। मेरा यह वचन सुनिये; आप मुझपर प्रसन्न हैं, अतएव मैं विनीतभावसे आपके सम्मुख कुछ निवेदन करता हूँ। अयोध्याके सब मनुष्य मेरे विरह-शोकमें मग्न हैं। आज उन्हें छोड़कर मैं दिव्यलोकको कैसे जाऊँगा? ब्राह्मणकी हत्या, गुरुकी हत्या, गौका वध और स्त्रीका वध—इन सबके समान ही भक्तोंका त्याग करनेमें भी महान् पाप बताया गया है। जो दोषरहित एवं त्यागनेके अयोग्य भक्त पुरुषको त्याग देता है, उसे इहलोक या परलोकमें कहीं भी सुखकी प्राप्ति नहीं दिखायी देती; इसलिये इन्द्र! आप स्वर्गको लौट जाइये। सुरेश्वर! यदि अयोध्यावासी पुरुष मेरे साथ ही स्वर्ग चल सकें तब तो मैं भी चलूँगा; अन्यथा उन्होंके साथ नरकमें भी जाना मुझे स्वीकार है।
इन्द्रने कहा—राजन्! उन सब लोगोंके पृथक्-पृथक् नाना प्रकारके बहुत-से पुण्य और पाप हैं। फिर तुम स्वर्गको सबका भोग्य बनाकर वहाँ कैसे चल सकोगे ?
हरिश्चन्द्र बोले—इन्द्र! राजा अपने कुटुम्बियोंके ही प्रभावसे राज्य भोगता है। प्रजावर्ग भी राजाका कुटुम्बी ही है। उन्हींके सहयोगसे राजा बड़े बड़े यज्ञ करता, पोखरे खुदवाता और बगीचे आदि लगवाता है। वह सब कुछ मैंने अयोध्यावासियोंके प्रभावसे किया है, अतः स्वर्गके लोभमें पड़कर मैं अपने उपकारियोंका त्याग नहीं कर सकता। देवेश! यदि मैंने कुछ भी पुण्य किया हो, दान, यज्ञ अथवा जपका अनुष्ठान मुझसे हुआ हो, उन सबका फल उन सबके साथ ही मुझे मिले। उसमें
* देवराजाननुज्ञातः स्वामिना ऋणेन वै। अगत्वा निष्कृतिं तस्य नारोक्ष्येऽहं सुरालयम् ॥ (देवी० ८। २४५)
२८ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
उनका समान अधिकार हो।*
'ऐसा ही होगा' यों कहकर त्रिभुवनपति इन्द्र, धर्म और गाधिनन्दन विश्वामित्र मन ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। लोगोंपर अनुग्रह रखनेवाले देवेन्द्रने स्वर्गलोकसे भूतलतक करोड़ों विमानोंका ताँता बाँध दिया। फिर चारों वर्णों और आश्रमोंसे युक्त अयोध्या नगरमें प्रवेश करके राजा हरिश्चन्द्रके समीप ही देवराज इन्द्रने कहा—'प्रजाजनो! तुम सब लोग शीघ्र आओ। धर्मके प्रसादसे तुम सब लोगोंको अत्यन्त दुर्लभ स्वर्गलोक प्राप्त हुआ है।'
इन्द्रकी यह बात सुनकर महाराज हरिश्चन्द्रकी प्रसन्नताके लिये महातपस्वी विश्वामित्रने राजकुमार रोहिताश्वको परम रमणीय अयोध्यापुरीमें ला वहाँ राज्य-सिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया। देवताओं, मुनियों और सिद्धोंके साथ रोहिताश्वका राज्याभिषेक करके राजासहित सभी बन्धु-बान्धव बहुत प्रसन्न हुए। उसके बाद वहाँके सब लोग अपने पुत्र, भृत्य और स्त्रियोंसहित स्वर्गलोकको चले। वे पग-पगपर एक विमानसे दूसरे विमानपर जा पहुँचते थे। विमानोंके सहित यह अनुपम ऐश्वर्य पाकर महाराज हरिश्चन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। स्वर्गमें नगरके आकारवाले सुन्दर विमानोंमें, जो परकोटोंसे सुशोभित था, महाराज हरिश्चन्द्र विराजमान हुए। उनकी यह समृद्धि देखकर सब शास्त्रोंका तत्त्व जाननेवाले दैत्याचार्य महाभाग शुक्रने इस प्रकार उनका यशोगान किया—'अहो! क्षमाका कैसा माहात्म्य है। दानका कितना महान् फल है, जिससे हरिश्चन्द्र अमरावतीपुरीमें आये और इन्द्रपदको प्राप्त हुए।'
पक्षीगण कहते हैं—जैमिनिजी! राजा हरिश्चन्द्रका यह सारा चरित्र मैंने आपसे वर्णन किया। दुःखमें पड़ा हुआ जो मनुष्य इसका श्रवण करता है, वह महान् सुख पाता है। इसके श्रवणसे पुत्रार्थीको पुत्र, सुखार्थीको सुख, स्त्रीकी इच्छा रखनेवालेको स्त्री और राज्यकी कामनावालेको राज्यकी प्राप्ति होती है। उसको संग्राममें विजय होती है और वह कभी नरकमें नहीं पड़ता।
* हरिश्चन्द्र उवाच
देवराज नमस्तुभ्यं वाक्यं चैतन्निबोध मे। प्रसादसुमुखं यत् त्वां ब्रवीमि प्रणयान्वितः॥
मच्छोकशमनसः कोसलानगरे जनाः। तिष्ठन्ति तानपोत्सृज्य कथं यास्याम्यहं दिवम्॥
ब्रह्महत्या गुरोर्घातो गोवधः स्त्रीवधस्तथा। तुल्यमेभिर्महापापं भक्तत्यागोऽप्युदाहृतम्॥
भजतो भक्तमल्पाभ्यामहृष्टं त्यजतः सुखम्। नेह नामुत्र पश्यामि तस्माच्छक्र दिवं व्रज॥
यदि ते सहिताः स्वर्गं मया यान्ति सुरेश्वर। ततोऽहमपि यास्यामि नरकं वापि तैः सह॥
इन्द्र उवाच
बहूनि पुण्यपापानि तेषां भिन्नानि वै पृथक्। कथं सहैकभोग्यं त्वं भूयः स्वर्गमवाप्स्यसि॥
हरिश्चन्द्र उवाच
शक्र भुङ्क्ते नृपो राज्यं प्रभावेण कुटुम्बिनाम्। कश्चित् करोति यन्महायज्ञैः कर्म शौचं करोति च॥
तन्न तेषां प्रभावेण मया सर्वमनुष्ठितम्। उपकर्तॄन् न सन्त्यक्ष्ये तानहं स्वर्गलिप्सया॥
तस्माद् यन्मम देवेश किञ्चिदस्ति सुचेष्टितम्। दत्तमिष्टमथो जप्तं सामान्यं तैस्तदस्तु नः॥
(अ० ८। २४८—२५६)
२. जड़-सुमति-पिता-संवाद व कर्मविपाक
- पिता-पुत्र-संवादका आरम्भ, जीवकी मृत्यु तथा नरक-गतिका वर्णन * २९
पिता-पुत्र-संवादका आरम्भ, जीवकी मृत्यु तथा नरक-गतिका वर्णन
जैमिनिने पूछा—श्रेष्ठ पक्षियो! प्राणियोंकी उत्पत्ति और लय कहाँ होते हैं ? इस विषयमें मुझे सन्देह है। मेरे प्रश्नके अनुसार आपलोग इसका समाधान करें। जीव कैसे जन्म लेता है? कैसे मरता है? और किस प्रकार गर्भमें पीड़ा सहकर माताके उदरमें निवास करता है? फिर गर्भसे बाहर निकलनेपर वह किस प्रकार बुद्धिको प्राप्त होता है? और मृत्युकालमें किस तरह चैतन्यस्वरूपके द्वारा शरीरसे विलग होता है। सभी प्राणी मृत्युके पश्चात् पुण्य और पाप दोनोंका फल भोगते हैं; किन्तु वे पुण्य और पाप किस प्रकार अपना फल देते हैं? ये सारी बातें मुझे बताइये, जिससे मेरा सब सन्देह दूर हो जाय।
पक्षी बोले—महर्षे ! आपने हमलोगोंपर बहुत बड़े प्रश्नका भार रख दिया। इसकी कहीं तुलना नहीं है। महाभाग! इस विषयमें एक प्राचीन वृत्तान्त सुनिये। पूर्वकालमें एक परम बुद्धिमान् भृगुवंशी ब्राह्मण थे। उनके सुमति नामका एक पुत्र था। वह बड़ा ही शान्त और जड़रूपमें रहनेवाला था। उपनयन संस्कार हो जानेके बाद उस बालकसे उसके पिताने कहा—‘सुमते! तुम सभी वेदोंको क्रमशः आद्योपान्त पढ़ो, गुरुकी सेवामें लगे रहो और भिक्षाके अन्नका भोजन किया करो। इस प्रकार ब्रह्मचर्यकी अवधि पूरी करके गृहस्थाश्रममें प्रवेश करो और वहाँ उत्तम-उत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने मनके अनुरूप सन्तान उत्पन्न करो। तदनन्तर वनकी शरण लो और वानप्रस्थके नियमोंका पालन करनेके पश्चात् परिग्रहरहित, सर्वस्वत्यागी संन्यासी हो जाओ। ऐसा करनेसे तुम्हें उस ब्रह्मकी प्राप्ति होगी, जहाँ जाकर तुम शोकसे मुक्त हो जाओगे।'
इस प्रकार अनेकों बार कहनेपर भी सुमति जड़ होनेके कारण कुछ भी नहीं बोलता था। पिता भी स्नेहवश बारंबार अनेक प्रकारसे ये बातें उसके सामने रखते थे। उन्होंने पुत्रप्रेमके कारण मीठी वाणीमें अनेक बार उसे लोभ दिखाया। इस प्रकार उनके बार-बार कहनेपर एक दिन सुमतिने हँसकर कहा—'पिताजी! आज आप जो उपदेश दे रहे हैं, उसका मैंने बहुत बार अभ्यास किया है। इसी प्रकार दूसरे-दूसरे शास्त्रों और भौति-भौतिकी शिल्पकलाओंका भी सेवन किया है। इस समय मुझे अपने दस हजारसे भी अधिक जन्म स्मरण हो आये हैं। खेद, सन्तोष, क्षय, वृद्धि और उदयका भी मैंने बहुत अनुभव किया है। शत्रु, मित्र और पत्नीके संयोग-वियोग भी मुझे देखनेको मिले हैं। अनेक प्रकारके माता-पिताके भी दर्शन हुए हैं। मैंने हजारों बार सुख और दुःख भोगे हैं। कितनी ही स्त्रियोंके विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए गर्भमें निवास किया है। सहस्रों
३० • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •
प्रकारके रोगोंकी भयानक पीड़ाएँ सहन की हैं। गर्भावस्थामें मैंने जो अनेकों प्रकारके दुःख भोगे हैं, बचपन, जवानी और बुढ़ापेमें भी जो क्लेश सहन किये हैं, वे सब मुझे याद आ रहे हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंकी योनियोंमें, फिर पशु, मृग, कीट और पक्षियोंकी योनियोंमें तथा राजसेवकों एवं युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले राजाओंके घरोंमें भी मेरे कई बार जन्म हो चुके हैं। इसी तरह अबकी बार आपके घरमें भी मैंने जन्म लिया है। मैं बहुत बार मनुष्योंका भृत्य, दास, स्वामी, ईश्वर और दरिद्र रह चुका हूँ। दूसरोंने मुझे और मैंने दूसरोंको अनेक बार दान दिये हैं। पिता, माता, सुहृद्, भाई और स्त्री इत्यादिके कारण कई बार संतुष्ट हुआ हूँ और कई बार दीन हो-होकर रोते हुए मुझे आँसुओंसे मुँह धोना पड़ा है। पिताजी! यों ही इस संसार-चक्रमें भटकते हुए मैंने अब वह ज्ञान प्राप्त किया है, जो मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है। उस ज्ञानको प्राप्त कर लेनेपर अब यह ऋक्, यजु और सामवेदोक्त समस्त क्रिया कलाप गुणशून्य दिखायी देनेके कारण मुझे अच्छा नहीं लगता। अतः जब ज्ञान प्राप्त हो गया तब वेदोंसे मुझे क्या प्रयोजन है। अब तो मैं गुरु-विज्ञानसे परितृप्त, निरीह एवं सदात्मा हूँ। अतः छः प्रकारके भावविकार (जन्म, सत्ता, वृद्धि, परिणाम, क्षय और नाश), दुःख, सुख, हर्ष, राग तथा सम्पूर्ण गुणोंसे वर्जित उस परमपदरूप ब्रह्मको प्राप्त होऊँगा। पिताजी! जो राग, हर्ष, भय, उद्वेग, क्रोध, अमर्ष और वृद्धावस्थासे व्याप्त है तथा कुत्ते, मृग आदिकी योनिमें बाँधनेवाले सैकड़ों बन्धनोंसे युक्त है, उस दुःखकी परम्पराका परित्याग करके अब मैं चला जाऊँगा।'
पुत्रकी यह बात सुनकर महाभाग पिताका हृदय प्रसन्नतासे भर गया। उन्होंने हर्ष और विस्मयसे गद्गदवाणीमें अपने पुत्रसे कहा— 'बेटा! तुम यह क्या कहते हो? तुम्हें कहाँसे ज्ञान प्राप्त हो गया? पहले तुममें जड़ता क्यों थी और इस समय ज्ञान कहाँसे जग उठा? क्या यह मुनियों अथवा देवताओंके दिये हुए शापका विकार था, जिससे पहले तुम्हारा ज्ञान छिप गया था और इस समय पुनः प्रकट हो गया? मैं यह सारा रहस्य सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। बेटा! तुमपर पहले जो कुछ बीत चुका है, वह सब मुझे बताओ।'
पुत्रने कहा—पिताजी! मेरा जो यह सुख और दुःख देनेवाला पूर्व वृत्तान्त है, उसे सुनिये। इस जन्मके पहले पूर्वजन्ममें मैं जो कुछ था, वह सब बताता हूँ। पूर्वकालमें मैं परमात्माके ध्यानमें मन लगानेवाला एक ब्राह्मण था। आत्मविद्याके विचारमें मैं पराकाष्ठाको पहुँचा हुआ था। मैं सदा योगसाधनमें संलग्न रहता था। निरन्तर अभ्यासमें लगने, सत्पुरुषोंका सङ्ग करने, अपने स्वभावसे ही विचारपरायण होने, तत्त्वमसि आदि महावाक्योंके विचारने और तत्पदार्थके शोधन करने आदिके कारण उस परमात्मतत्त्वमें ही मेरी परम प्रीति हो गयी। फिर मैं शिष्योंके सन्देहका निवारण करनेवाला आचार्य बन गया। फिर बहुत समयके पश्चात् मैं एकान्तसेवी हो गया; किन्तु दैवात् अज्ञानसे सद्भावका नाश हो जानेके कारण प्रमादमें पड़कर मेरी मृत्यु हो गयी। तथापि मृत्युकालसे लेकर अबतक मेरी स्मरणशक्तिका लोप नहीं हुआ। मेरे जन्मोंके जितने वर्ष बीत गये हैं, उन सबकी स्मृति हो आयी है। पिताजी! उस पूर्वजन्मके अभ्याससे ही जितेन्द्रिय होकर अब फिर मैं वैसा ही यत्न करूँगा, जिससे भविष्यमें फिर मेरा जन्म न हो। मैंने जो दूसरोंको ज्ञान दिया था, उसीका यह फल है कि मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण हो रहा है। केवल त्रयीधर्म (कर्मकाण्ड) का सहारा लेनेवाले मनुष्योंको इसकी प्राप्ति नहीं होती, अतः मैं इस प्रथम आश्रमसे ही संन्यास-धर्मका आश्रय ले एकान्तसेवी हो आत्माके
• पिता-पुत्र-संवादका आरम्भ, जीवकी मृत्यु तथा नरक-गतिका वर्णन • ३१
उद्धारके लिये यत्न करूँगा। अतः महाभाग! आपके हृदयमें जो संशय है, उसे कहिये। मैं उसका समाधान करूँगा। इतनी-सी सेवासे भी आपकी प्रसन्नताका सम्पादन करके मैं पिताके ऋणसे मुक्त हो सकूँगा।
पक्षी कहते हैं—तब पुत्रकी बातपर श्रद्धा करते हुए पिताने उससे वही बात पूछी, जो आपने अभी संसारमें जन्म ग्रहण करनेके सम्बन्धमें हमलोगोंसे पूछी है।
पुत्रने कहा—पिताजी! जिस प्रकार मैंने तत्त्वका बारंबार अनुभव किया है, उसे बतलाता हूँ; सुनिये। वह क्षणभङ्गुर संसार-चक्र प्रवाहरूपसे अजर है, निरन्तर चलते रहनेवाला है, कभी स्थिर नहीं रहता। तात! आपकी आज्ञासे मैं मृत्युकालसे लेकर अबतककी सब बातोंका वर्णन करता हूँ। शरीरमें जो गर्मी या पित्त है, वह तीव्र वायुसे प्रेरित होकर जब अत्यन्त कुपित हो जाता है, उस समय बिना ईंधनके ही उदीप्त हुई अग्निकी भाँति बढ़कर मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर देता है, तत्पश्चात् उदान नामक वायु ऊपरकी ओर उठता है और खाये-पीये हुए अन्न-जलको नीचेकी ओर जानेसे रोक देता है। उस आपत्तिकी अवस्थामें भी उसीको प्रसन्नता रहती है, जिसने पहले जल, अन्न एवं रसका दान किया है। जिस पुरुषने श्रद्धासे पवित्र किये हुए अन्तःकरणके द्वारा पहले अन्नदान किया है, वह उस रुग्णावस्थामें अन्नके बिना भी तृप्ति लाभ करता है। जिसने कभी मिथ्या भाषण नहीं किया, दो प्रेमियोंके पारस्परिक प्रेममें बाधा नहीं डाली तथा जो आस्तिक और श्रद्धालु है, वह सुखपूर्वक मृत्युको प्राप्त होता है। जो देवता और ब्राह्मणोंकी पूजामें संलग्न रहते, किसीकी निन्दा नहीं करते तथा सात्त्विक, उदार और लज्जाशील होते हैं, ऐसे मनुष्योंको मृत्युके समय कष्ट नहीं होता। जो कामनासे, क्रोधसे अथवा द्वेषके कारण धर्मका त्याग नहीं करता, शास्त्रोक्त आज्ञाका पालन करनेवाला तथा सौम्य होता है, उसकी मृत्यु भी सुखसे होती है। जिन्होंने कभी जलका दान नहीं किया है, उन मनुष्योंको मृत्युकाल उपस्थित होनेपर अधिक जलन होती है तथा अन्नदान न करनेवालोंको उस समय भूखका भारी कष्ट भोगना पड़ता है। जो लोग जाड़ेके दिनोंमें लकड़ी दान करते हैं, वे शीतके कष्टको जीत लेते हैं। जो चन्दन दान करते हैं, वे तापपर विजय पाते हैं तथा जो किसी भी जीवको उद्वेग नहीं पहुँचाते, वे मृत्युकालमें प्राणघातिनी वेदनाका अनुभव नहीं करते। मोह और अज्ञान फैलानेवाले लोग महान् भयको प्राप्त होते हैं। नीच मनुष्य तीव्र वेदनाओंसे पीड़ित होते रहते हैं। जो झूठी गवाही देते, झूठ बोलते, बुरी बातोंका उपदेश देते और वेदोंकी निन्दा करते हैं, वे सब लोग मूर्च्छाग्रस्त होकर मृत्युको प्राप्त होते हैं।
ऐसे लोगोंकी मृत्युके समय यमराजके दुष्ट दूत हाथोंमें हथौड़ी एवं मुद्गर लिये आते हैं, वे बड़े भयङ्कर होते हैं और उनकी देहसे दुर्गन्ध निकलती रहती है। उन यमदूतोंपर दृष्टि पड़ते ही मनुष्य काँप उठता है और भ्राता, माता तथा पुत्रोंका नाम लेकर बारंबार चिल्लाने लगता है। उस समय उसकी वाणी स्पष्ट समझमें नहीं आती। एक ही शब्द, एक ही आवाज-सी जान पड़ती है। भयके मारे रोगीकी आँखें झूमने लगती हैं और उसका मुख सूख जाता है। उसकी साँस ऊपरको उठने लगती है। दृष्टिकी शक्ति भी नष्ट हो जाती है, फिर वह अत्यन्त वेदनासे पीड़ित होकर उस शरीरको छोड़ देता है और वायुके सहारे चलता हुआ वैसे ही दूसरे शरीरको धारण कर लेता है, जो रूप, रंग और अवस्थामें पहले शरीरके समान ही होता है। वह शरीर माता-पिताके गर्भसे उत्पन्न नहीं, कर्मजनित होता है और यातना भोगनेके लिये ही मिलता है। तदनन्तर यमराजके दूत शीघ्र ही उसे दारुण
३२
- संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
पाशोंसे बाँध लेते हैं और डंडोंकी मारसे व्याकुल करते हुए दक्षिण दिशाकी ओर खींच ले जाते हैं। उस मार्गपर कहीं तो कुश जमे होते हैं, कहीं काँटे फैले होते हैं, कहीं बाँबीकी मिट्टियाँ जमी होती हैं, कहीं लोहेकी कीलें गड़ी होती हैं और कहीं पथरीली भूमि होनेके कारण वह पथ अत्यन्त कठोर जान पड़ता है। कहीं जलती हुई आगकी लपटें मिलती हैं तो कहीं सैकड़ों गड्ढोंके कारण वह मार्ग अत्यन्त दुर्गम प्रतीत होता है। कहीं सूर्य इतने तपते हैं कि उस राहसे जानेवाला जीव उनकी किरणोंसे जलने लगता है। ऐसे पथसे यमराजके दूत उसे घसीटकर ले जाते हैं। वे दूत घोर शब्द करनेके कारण अत्यन्त भयङ्कर जान पड़ते हैं। जिस समय वे जीवको घसीटकर ले जाते हैं, सैकड़ों गीदड़ियाँ जुटकर उसके शरीरको नोच-नोचकर खाने लगती हैं। पापी जीव ऐसे ही भयंकर मार्गसे यमलोककी यात्रा करते हैं।
जो मनुष्य छाता, जूता, वस्त्र और अन्न-दान करनेवाले होते हैं, वे उस मार्गपर सुखसे यात्रा करते हैं। इस प्रकार अनेक प्रकारका कष्ट भोगता हुआ पापपीड़ित जीव विवश होकर बारह दिनोंमें धर्मराजके नगरतक पहुँचाया जाता है। उसके यातनामय शरीरके जलाये जानेपर जीव स्वयं भी अत्यन्त दाहका अनुभव करता है, उसी प्रकार मारे और काटे जानेपर भी उसे अत्यन्त भयङ्कर वेदना होती है। अधिक देरतक जलमें भिगोये जानेके कारण भी जीवको भारी दुःख उठाना पड़ता है। इस प्रकार दूसरे शरीरको प्राप्त होनेपर भी उसे अपने कर्मोंके फलस्वरूप कष्ट भोगने पड़ते हैं। उसके भाई-बन्धु जो तिल और जलकी अञ्जलि देते तथा पिण्डदान करते हैं, वही उस मार्गपर जाते समय उसे खानेको मिलता है। भाई-बन्धु यदि अशौचके भीतर तेल लगावें और उबटन मलवावें तो उसीसे जीवका पोषण किया जाता है अर्थात् वह मैल ही उन्हें खानी पड़ती है [अतः ये वस्तुएँ वर्जित हैं]। इसी प्रकार बान्धवगण जो कुछ खाते-पीते हैं, वह मृतक जीवको मिलता है; अतः उन्हें भोजनकी शुद्धिपर भी ध्यान रखना चाहिये। यदि भाई-बन्धु भूमिपर शयन करें तो उससे जीवको कष्ट नहीं होता और यदि वे उसके निमित्त दान करें तो उससे मृत जीवको बड़ी तृप्ति होती है। यमदूत जब उसे साथ लेकर जाते हैं तो वह बारह दिनोंतक अपने घरकी ओर देखता रहता है। उस समय पृथ्वीपर उसके निमित्त जो जल और पिण्ड दिये जाते हैं, उन्हींका वह उपभोग करता है।*
मृत्युसे बारह दिन बीतनेके पश्चात् यमपुरीकी ओर खींचकर ले जाया जानेवाला जीव अपने सामने यमराजके नगरको देखता है, जो बड़ा ही भयानक है। उस नगरमें पहुँचनेपर उसे मृत्यु, काल और अन्तक आदिके बीचमें बैठे हुए यमराजका दर्शन होता है, जो कज्जलगराशिके समान काले हैं और अत्यन्त क्रोधसे लाल-लाल आँखें किये रहते हैं। दाढ़ोंके कारण उनका मुख बड़ा विकराल दिखलायी पड़ता है। टेढ़ी भौंहोंसे युक्त उनकी आकृति बड़ी भयङ्कर है। वे कुरूप, भीषण और टेढ़े-मेढ़े सैकड़ों रोगोंसे घिरे रहते हैं। उनकी भुजाएँ विशाल हैं। उनके एक हाथमें यमदण्ड और दूसरेमें पाश है। देखनेमें वे बड़े
* तत्र यद्बान्धवास्तोयं प्रयच्छन्ति तिलैः सह। यच्च पिण्डं प्रयच्छन्ति नीयमानस्तदश्नुते ॥
तैलाभ्यङ्गो बान्धवानामङ्गसंवाहनं च यत्। तेन चाप्याय्यते जन्तुर्यच्चाश्नन्ति सबान्धवाः ॥
भूमौ स्वपन्द्भिरत्यन्तं क्लेशमाप्नोति बान्धवैः। दानं ददद्भिस्त्वं तथा जन्तुराप्याय्यते मृतः ॥
नीयमानः स्वकं गेहं द्वादशाहं स पश्यति। उपभुङ्क्ते तथा दत्तं तोयपिण्डादिकं भुवि ॥
(अ० १०। ७२-७५)
• पिता-पुत्र-संवादका आरम्भ, जीवकी मृत्यु तथा नरक-गतिका वर्णन • ३३
भयानक प्रतीत होते हैं। पापी जीव उन्हींकी बतायी हुई शुभाशुभ गतिको प्राप्त होता है। झूठी गवाही देने और झूठ बोलनेवाला मनुष्य रौरव नरकमें जाता है। अब मैं रौरवका स्वरूप बतलाता हूँ, आप ध्यान देकर उसे सुनें। रौरव नरककी लंबाई-चौड़ाई दो हजार योजनकी है। वह एक गड्ढेके रूपमें है, जिसकी गहराई घुटनोंतककी है। वह नरक अत्यन्त दुस्तर है। उसमें भूमिके बराबरतक अङ्गारराशि बिछी रहती है। उसके भीतरकी भूमि दहकते हुए अङ्गारोंसे बहुत तपी होती है। सारा नरक तीव्रवेगसे प्रज्वलित होता रहता है। उसीके भीतर यमराजके दूत पापी मनुष्यको डाल देते हैं। वह धधकती हुई आगमें जब जलने लगता है तो इधर-उधर दौड़ता है, किन्तु पग-पगपर उसका पैर जल-भुनकर राख होता रहता है। वह दिन-रातमें कभी एक बार पैर उठाने और रखनेमें समर्थ होता है। इस प्रकार सहस्रों योजन पार करनेपर वह उससे छुटकारा पाता है। फिर दूसरे पापोंकी शुद्धिके लिये उसे वैसे ही अन्य नरकोंमें जाना पड़ता है। इस प्रकार सब नरकोंमें यातना भोगकर निकलनेके बाद पापी जीव तिर्यग्योनिमें जन्म लेता है। क्रमशः कीड़े मकोड़े, पतङ्ग, हिंसक जीव, मच्छर, हाथी, वृक्ष आदि, गौ, अश्व तथा अन्यान्य दुःखदायिनी पापयोनियोंमें जन्म धारण करनेके पश्चात् वह मनुष्ययोनिमें आता है। उसमें भी वह कुरूप, कुबड़ा, नाटा और चाण्डाल आदि होता है। फिर अवशिष्ट पाप और पुण्यसे युक्त हो, वह क्रमशः ऊँचे चढ़नेवाली योनियोंमें जन्म लेता—शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण, देवता तथा इन्द्र आदिके रूपमें उत्पन्न होता है।
इस प्रकार पाप करनेवाले जीव नरकोंमें नीचे गिरते हैं। अब पुण्यात्मा जीव जिस प्रकार यात्रा करते हैं उसको सुनिये; वे पुण्यात्मा मनुष्य धर्मराजकी बतायी हुई पुण्यमयी गतिको प्राप्त होते हैं। उनके साथ गन्धर्व गीत गाते चलते हैं, अप्सराएँ नृत्य करती रहती हैं तथा वे भाँति-भाँतिके दिव्य आभूषणोंसे सुशोभित हो सुन्दर विमानोंपर बैठकर यात्रा करते हैं। वहाँसे पृथ्वीपर आनेपर वे राजाओं तथा अन्य महात्माओंके कुलमें जन्म लेते और सदाचारका पालन करते हैं। वहाँ उन्हें श्रेष्ठ भोग प्राप्त होते हैं। तदनन्तर शरीर त्यागनेके बाद वे पुनः स्वर्ग आदि ऊपरके लोकोंमें जाते हैं। ऊपरके लोकोंमें होनेवाली गतिको 'आरोहिणी' कहते हैं। फिर वहाँसे पुण्यभोगके पश्चात् जो मृत्युलोकमें उतरना होता है, वह 'अवरोहिणी' गति है। इस अवरोहिणी गतिको प्राप्त होनेपर मनुष्य फिर पहलेकी ही भाँति आरोहिणी गतिको प्राप्त होते हैं। ब्रह्मर्षे ! जीवकी जिस प्रकार मृत्यु होती है, वह सब प्रसङ्ग मैंने आपसे कह सुनाया। अब जिस तरह जीव गर्भमें आता है, उस विषयका वर्णन सुनिये।
५०
- संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
जीवके जन्मका वृत्तान्त तथा महारौरव आदि नरकोंका वर्णन
पुत्र कहता है—पिताजी ! मनुष्य स्त्री-सहवासके समय गर्भमें जो वीर्य स्थापित करता है, वह स्त्रीके रजमें मिल जाता है। नरक अथवा स्वर्गसे निकलकर आया हुआ जीव उसी रज-वीर्यका आश्रय लेता है। जीवसे व्याप्त होनेपर वे दोनों बीज (स्त्री और पुरुष दोनोंके रज-वीर्य) स्थिर हो जाते हैं। फिर वे क्रमशः कलल, बुद्बुद एवं मांसपिण्डके रूपमें परिणत होते हैं। जैसे बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है, उसी प्रकार उस मांसपिण्डसे विभागपूर्वक पाँच अङ्ग प्रकट होते हैं। फिर उन अङ्गोंसे अँगुली, नेत्र, नासिका, मुख, कान आदि प्रकट होते हैं। इसी प्रकार अँगुली आदिसे नख आदिकी उत्पत्ति होती है। फिर त्वचा में रोम और मस्तकपर बाल उग आते हैं। जीवके शरीरकी वृद्धिके साथ ही स्त्रीका गर्भकोष भी बढ़ता है। जैसे नारियलका फल अपने आवरणकोषके साथ ही बढ़ता है, उसी प्रकार गर्भस्थ शिशु भी गर्भकोषके साथ ही वृद्धिको प्राप्त होता है। उसका मुख नीचेकी ओर होता है। दोनों हाथोंको घुटनों और पसलियोंके नीचे रखकर वह बढ़ता है। हाथके दोनों अँगूठे दोनों घुटनोंके ऊपर होते हैं और अँगुलियाँ उनके अग्रभागमें रहती हैं। उन घुटनोंके पृष्ठभागमें दोनों आँखें रहती हैं और नासिका उनके मध्यभागमें होती है। दोनों चूतड़ एड़ियोंपर टिके होते हैं। दोनों बाँहें और पिंडलियाँ बाहरी किनारेपर रहती हैं। इसी स्थितिमें स्त्रीके गर्भमें रहनेवाला जीव क्रमशः वृद्धिको प्राप्त होता है। गर्भस्थ शिशुकी नाभिमें एक नाल बँधी होती है, जिसे आप्यायनी नाड़ी कहते हैं। इसी प्रकार वह नाल स्त्रीकी आँतके छिद्रमें भी जुड़ी होती है। स्त्री जो कुछ खाती-पीती है, वह उस नाड़ीके ही मार्गसे गर्भस्थ शिशुके भी उदरमें पहुँचता है। उसीसे शरीरका पोषण होते रहनेसे जीव क्रमशः वृद्धिको प्राप्त होता है। उस गर्भमें उसे अनेक जन्मोंकी बातें याद आती हैं, जिससे व्यथित होकर वह इधर उधर फिरता और निर्वेद (खेद)-को प्राप्त होता है। अपने मनमें सोचता है, ‘अब इस उदरसे छुटकारा पानेपर मैं फिर ऐसा कार्य नहीं करूँगा, बल्कि इस बातके लिये चेष्टा करूँगा कि मुझे फिर गर्भके भीतर न आना पड़े।’ सैकड़ों जन्मोंके दुःखोंका स्मरण करके वह इसी प्रकार चिन्ता करता है। दैवकी प्रेरणासे पूर्वजन्मोंमें उसने जो-जो क्लेश भोगे होते हैं, वे सब उसे याद आ जाते हैं। तत्पश्चात् कालक्रमसे वह अधोमुख जीव जब नवें या दसवें महीनेका होता है, तब उसका जन्म हो जाता है। गर्भसे निकलते समय वह प्राजापत्य वायुसे पीड़ित होता है और मन ही-मन दुःखसे व्यथित हो रोते हुए गर्भसे बाहर आता है। उदरसे निकलनेपर असह्य पीड़ाके कारण उसे मूर्च्छा आ जाती है। फिर वायुके स्पर्शसे वह सचेत होता है। तदनन्तर भगवान् विष्णुकी मोहिनी माया उसको अपने वशमें कर लेती है। उससे मोहित हो जानेके कारण उसका पूर्वज्ञान नष्ट हो जाता है। इस प्रकार ज्ञानभ्रष्ट हो जानेपर वह जीव पहले तो बाल्यावस्थाको प्राप्त होता है, फिर क्रमशः कौमारावस्था, यौवनावस्था और वृद्धावस्थामें प्रवेश करता है। इसके बाद मृत्युको प्राप्त होता और मृत्युके बाद फिर जन्म लेता है। इस प्रकार इस संसार-चक्रमें वह घटीयन्त्र (रहट) की भाँति घूमता रहता है। कभी स्वर्गमें जाता है, कभी नरकमें। कभी इस संसारमें पुनः जन्म लेकर अपने कर्मोंको भोगता है, कभी कर्मोंका भोग समाप्त होनेपर थोड़े ही समयमें मरकर परलोकमें चला जाता है। कभी स्वर्ग और नरकको प्रायः भोग चुकनेके बाद थोड़ेसे शुभाशुभ कर्म शेष रहनेपर इस संसारमें जन्म लेता है।
- जीवके जन्मका वृत्तान्त तथा महारौरव आदि नरकोंका वर्णन * ३५
नारकी जीव घोर दुःखदायी नरकोंमें गिराये जाते हैं। स्वर्गमें भी ऐसा दुःख होता है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। स्वर्गमें पहुँचनेके बादसे ही मनमें इस बातकी चिन्ता बनी रहती है कि पुण्य-क्षय होनेपर हमें यहाँसे नीचे गिरना पड़ेगा। साथ ही नरकमें पड़े हुए जीवोंको देखकर महान् दुःख होता है कि कभी हमें भी ऐसी ही दुर्गति भोगनी पड़ेगी। इस बातसे दिन-रात अशान्ति बनी रहती है। गर्भवासमें तो भारी दुःख होता ही है, योनिसे जन्म लेते समय भी थोड़ा क्लेश नहीं होता। जन्म लेनेके पश्चात् बाल्यावस्था और वृद्धावस्थामें भी दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ता है। जवानीमें भी काम, क्रोध और ईर्ष्यामें बँधे रहनेके कारण अत्यन्त दुःसह कष्ट उठाना पड़ता है। बुढ़ापेमें तो अधिकांश दुःख ही होता है। मरनेमें भी सबसे अधिक दुःख है। यमदूतोंद्वारा घसीटकर ले जाये जाने और नरकमें गिराये जानेपर जो महान् क्लेश होता है, उसकी चर्चा हो चुकी है। यहाँसे लौटनेपर फिर गर्भवास, जन्म, मृत्यु तथा नरकका क्रम चालू हो जाता है। इस तरह जीव प्राकृत बन्धनोंमें बँधकर घटीयन्त्रकी भाँति इस संसारचक्रमें घूमते रहते हैं।
पिताजी ! मैंने आपसे रौरव नामक प्रथम नरकका वर्णन किया है। अब महारौरवका वर्णन सुनिये—इसका विस्तार सब ओरसे बारह हजार योजन है। वहाँकी भूमि ताँबेकी है, जिसके नीचे आग धधकती रहती है। उसकी आँचसे तपकर वह सारी ताम्रमयी भूमि चमकती हुई बिजलीके समान ज्योतिर्मयी दिखायी देती है। उसकी ओर देखना और स्पर्श आदि करना अत्यन्त भयङ्कर है। यमराजके दूत हाथ और पैर बाँधकर पापी जीवको उसके भीतर डाल देते हैं और वह लोटता हुआ आगे बढ़ता है। मार्गमें कौवे, बगुले, बिच्छू, मच्छर और गिद्ध उसे जल्दी-जल्दी नोच खाते हैं। उसमें जलते समय वह व्याकुल होकर छटपटाता है और बारंबार 'अरे बाप! अरे मैया! हाथ भैया! हा तात !' आदिकी रट लगाता हुआ करुण क्रन्दन करता है, किन्तु उसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती। इस प्रकार उसमें पड़े हुए जीव, जिन्होंने दूषित बुद्धिके कारण पाप किये हैं, दस करोड़ वर्ष बीतनेपर उससे छुटकारा पाते हैं।
इसके सिवा तम नामक एक दूसरा नरक है, जहाँ स्वभावसे ही कड़ाकेकी सर्दी पड़ती है। उसका विस्तार भी महारौरवके ही बराबर है, किन्तु वह घोर अन्धकारसे आच्छादित रहता है। वहाँ पापी मनुष्य सर्दीसे कष्ट पाकर भयानक अन्धकारमें दौड़ते हैं और एक-दूसरेसे भिड़कर लिपटे रहते हैं। जाड़ेके कष्टसे काँपकर कटकटाते हुए उनके दाँत टूट जाते हैं। भूख-प्यास भी वहाँ बड़े जोरकी लगती है। इसी प्रकार अन्यान्य उपद्रव भी होते रहते हैं। ओलोंके साथ बहनेवाली भयङ्कर वायु शरीरमें लगकर हड्डियोंको चूर्ण किये देती है और उनसे जो मज्जा तथा रक्त गिरता है, उसीको वे क्षुधातुर प्राणी खाते हैं। एक-दूसरेके शरीरसे सटकर वे परस्पर रक्त चाटा करते हैं। इस प्रकार
३६ - संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण -
जबतक पापोंका भोग समाप्त नहीं हो जाता, तबतक वहाँ भी मनुष्योंको अन्धकारमें महान् कष्ट भोगना पड़ता है।
इससे भिन्न एक निकृन्तन नामक नरक है, जो सब नरकोंमें प्रधान है। उसमें कुम्हारकी चाकके समान बहुत से चक्र निरन्तर घूमते रहते हैं। यमराजके दूत पापी जीवोंको उन चक्रोंपर चढ़ा देते और अपनी अँगुलियोंमें कालसूत्र लेकर उसीके द्वारा उनके पैरसे लेकर मस्तकतक प्रत्येक अङ्ग काटा करते हैं। फिर भी उन पापियोंके प्राण नहीं निकलते। उनके शरीरके सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं, किन्तु फिर वे जुड़कर एक हो जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव हजारों वर्षोंतक वहाँ काटे जाते हैं। यह यातना उन्हें तबतक दी जाती है, जबतक कि उनके सारे पापोंका नाश नहीं हो जाता। अब अप्रतिष्ठ नामक नरकका वर्णन सुनिये, जिसमें पड़े हुए जीवोंको असह्य दुःखका अनुभव करना पड़ता है। वहाँ भी वे ही कुलालचक्र होते हैं; साथ ही दूसरी ओर घटीयन्त्र भी बने होते हैं, जो पापी मनुष्योंको दुःख पहुँचानेके लिये बनाये गये हैं। वहाँ कुछ मनुष्य उन चक्रोंपर चढ़ाकर घुमाये जाते हैं। हजारों वर्षोंतक उन्हें बीचमें विश्राम नहीं मिलता। इसी प्रकार दूसरे पापी घटीयन्त्रोंमें बाँध दिये जाते हैं, ठीक उसी तरह, जैसे रहटमें छोटे-छोटे घड़े बँधे होते हैं। वहाँ
- जीवके जन्मका वृत्तान्त तथा महारौरव आदि नरकोंका वर्णन * ३७
बँधे हुए मनुष्य उन यन्त्रोंके साथमें जब घूमने लगते हैं, तो बारंबार रक्त वमन करते हैं। उनके मुखसे लार गिरती है और नेत्रोंसे अश्रु झरते रहते हैं। उस समय उन्हें इतना दुःख होता है, जो जीवमात्रके लिये असह्य है।
अब असिपत्रवन नामक अन्य नरकका वर्णन सुनिये—जहाँ एक हजार योजनतककी भूमि प्रज्वलित अग्निसे आच्छादित रहती है तथा ऊपरसे सूर्यकी अत्यन्त भयङ्कर एवं प्रचण्ड किरणें ताप देती हैं, जिनसे उस नरकमें निवास करनेवाले जीव सदा सन्तप्त होते रहते हैं। उसके बीचमें एक बहुत ही सुन्दर वन है, जिसके पत्ते चिकने जान पड़ते हैं; किन्तु वे सभी पत्ते तलवारकी तीखी धारके समान हैं। उस वनमें बड़े बलवान् कुत्ते भौंकते रहते हैं, जो दस हजारकी संख्यामें सुशोभित होते हैं। उनके मुख और दाढ़ें बड़ी-बड़ी होती हैं। वे व्याघ्रोंके समान भयानक प्रतीत होते हैं। वहाँकी भूमिपर जो आग बिछी होती है, उससे जब दोनों पैर जलने लगते हैं तब वहाँ गये हुए पापी जीव 'हाय माता ! हाय पिता !' आदि कहते हुए अत्यन्त दुःखित होकर कराहने लगते हैं। उस समय तीव्र पिपासाके कारण उन्हें बड़ी पीड़ा होती है, फिर अपने सामने शीतल छायासे युक्त असिपत्रवनको देखकर वे प्राणों विश्रामकी इच्छासे वहाँ जाते हैं। उनके वहाँ पहुँचनेपर बड़े जोरकी हवा चलती है, जिससे उनके ऊपर तलवारके समान तीखे पत्ते गिरने लगते हैं। उनसे आहत होकर वे पृथ्वीपर जलते हुए अँगारोंके ढेरमें गिर पड़ते हैं। वह आग अपनी लपटोंसे सर्वत्र व्याप्त हो सम्पूर्ण भूतलको चाटती हुई-सी जान पड़ती है। इसी समय अत्यन्त भयानक कुत्ते वहाँ तुरंत ही दौड़ते हुए आते हैं और रोते हुए पापियोंके सब अङ्गोंको टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। पिताजी ! इस प्रकार मैंने आपसे यह असिपत्रवनका वर्णन किया है।
अब इससे भी अत्यन्त भयङ्कर तप्तकुम्भ नामक जो नरक है, उसका हाल सुनिये—वहाँ चारों ओर आगकी लपटोंसे घिरे हुए बहुत-से लोहेके घड़े मौजूद हैं, जो खूब तपे होते हैं। उनमेंसे किन्हींमें तो प्रज्वलित अग्निकी आँचसे