संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३६ - संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण -
जबतक पापोंका भोग समाप्त नहीं हो जाता, तबतक वहाँ भी मनुष्योंको अन्धकारमें महान् कष्ट भोगना पड़ता है।
इससे भिन्न एक निकृन्तन नामक नरक है, जो सब नरकोंमें प्रधान है। उसमें कुम्हारकी चाकके समान बहुत से चक्र निरन्तर घूमते रहते हैं। यमराजके दूत पापी जीवोंको उन चक्रोंपर चढ़ा देते और अपनी अँगुलियोंमें कालसूत्र लेकर उसीके द्वारा उनके पैरसे लेकर मस्तकतक प्रत्येक अङ्ग काटा करते हैं। फिर भी उन पापियोंके प्राण नहीं निकलते। उनके शरीरके सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं, किन्तु फिर वे जुड़कर एक हो जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव हजारों वर्षोंतक वहाँ काटे जाते हैं। यह यातना उन्हें तबतक दी जाती है, जबतक कि उनके सारे पापोंका नाश नहीं हो जाता। अब अप्रतिष्ठ नामक नरकका वर्णन सुनिये, जिसमें पड़े हुए जीवोंको असह्य दुःखका अनुभव करना पड़ता है। वहाँ भी वे ही कुलालचक्र होते हैं; साथ ही दूसरी ओर घटीयन्त्र भी बने होते हैं, जो पापी मनुष्योंको दुःख पहुँचानेके लिये बनाये गये हैं। वहाँ कुछ मनुष्य उन चक्रोंपर चढ़ाकर घुमाये जाते हैं। हजारों वर्षोंतक उन्हें बीचमें विश्राम नहीं मिलता। इसी प्रकार दूसरे पापी घटीयन्त्रोंमें बाँध दिये जाते हैं, ठीक उसी तरह, जैसे रहटमें छोटे-छोटे घड़े बँधे होते हैं। वहाँ
- जीवके जन्मका वृत्तान्त तथा महारौरव आदि नरकोंका वर्णन * ३७
बँधे हुए मनुष्य उन यन्त्रोंके साथमें जब घूमने लगते हैं, तो बारंबार रक्त वमन करते हैं। उनके मुखसे लार गिरती है और नेत्रोंसे अश्रु झरते रहते हैं। उस समय उन्हें इतना दुःख होता है, जो जीवमात्रके लिये असह्य है।
अब असिपत्रवन नामक अन्य नरकका वर्णन सुनिये—जहाँ एक हजार योजनतककी भूमि प्रज्वलित अग्निसे आच्छादित रहती है तथा ऊपरसे सूर्यकी अत्यन्त भयङ्कर एवं प्रचण्ड किरणें ताप देती हैं, जिनसे उस नरकमें निवास करनेवाले जीव सदा सन्तप्त होते रहते हैं। उसके बीचमें एक बहुत ही सुन्दर वन है, जिसके पत्ते चिकने जान पड़ते हैं; किन्तु वे सभी पत्ते तलवारकी तीखी धारके समान हैं। उस वनमें बड़े बलवान् कुत्ते भौंकते रहते हैं, जो दस हजारकी संख्यामें सुशोभित होते हैं। उनके मुख और दाढ़ें बड़ी-बड़ी होती हैं। वे व्याघ्रोंके समान भयानक प्रतीत होते हैं। वहाँकी भूमिपर जो आग बिछी होती है, उससे जब दोनों पैर जलने लगते हैं तब वहाँ गये हुए पापी जीव 'हाय माता ! हाय पिता !' आदि कहते हुए अत्यन्त दुःखित होकर कराहने लगते हैं। उस समय तीव्र पिपासाके कारण उन्हें बड़ी पीड़ा होती है, फिर अपने सामने शीतल छायासे युक्त असिपत्रवनको देखकर वे प्राणों विश्रामकी इच्छासे वहाँ जाते हैं। उनके वहाँ पहुँचनेपर बड़े जोरकी हवा चलती है, जिससे उनके ऊपर तलवारके समान तीखे पत्ते गिरने लगते हैं। उनसे आहत होकर वे पृथ्वीपर जलते हुए अँगारोंके ढेरमें गिर पड़ते हैं। वह आग अपनी लपटोंसे सर्वत्र व्याप्त हो सम्पूर्ण भूतलको चाटती हुई-सी जान पड़ती है। इसी समय अत्यन्त भयानक कुत्ते वहाँ तुरंत ही दौड़ते हुए आते हैं और रोते हुए पापियोंके सब अङ्गोंको टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। पिताजी ! इस प्रकार मैंने आपसे यह असिपत्रवनका वर्णन किया है।
अब इससे भी अत्यन्त भयङ्कर तप्तकुम्भ नामक जो नरक है, उसका हाल सुनिये—वहाँ चारों ओर आगकी लपटोंसे घिरे हुए बहुत-से लोहेके घड़े मौजूद हैं, जो खूब तपे होते हैं। उनमेंसे किन्हींमें तो प्रज्वलित अग्निकी आँचसे
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खौलता हुआ तेल भरा रहता है और किन्हींमें तपाये हुए लोहेका चूर्ण होता है। यमराजके दूत पापी मनुष्योंको उनका मुँह नीचे करके उन्हीं बड़ोंमें डाल देते हैं। वहाँ पड़ते ही उनके शरीर टूट-फूट जाते हैं। शरीरकी मज्जाका भाग गलकर पानी हो जाता है। कपाल और नेत्रोंकी हड्डियाँ चटककर फूटने लगती हैं। भयानक गृध्र उनके अङ्गोंको नोच नोचकर टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। और फिर उन टुकड़ोंको उन्हीं घड़ोंमें डाल देते हैं। वहाँ वे सभी टुकड़े सीझकर तेलमें मिल जाते हैं। मस्तक, शरीर, स्नायु, मांस, त्वचा और हड्डियाँ—सभी गल जाती हैं। तदनन्तर यमराजके दूत करछुलसे उलट-पुलटकर खौलते हुए तेलमें उन पापियोंको अच्छी तरह मथते हैं। पिताजी! इस प्रकार यह तप्तकुम्भ नामक नरककी बात मैंने आपको विस्तारपूर्वक बतलायी है।
जनक-यमदूत-संवाद, भिन्न-भिन्न पापोंसे विभिन्न नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन
पुत्र (सुमति) कहता है—पिताजी! इससे पहले सातवें जन्ममें मैं एक वैश्यके कुलमें उत्पन्न हुआ था। उस समय पौंसलेपर पानी पीनेको जाती हुई गौओंको मैंने वहाँ जानेसे रोक दिया था। उस पापकर्मके फलसे मुझे अत्यन्त भयङ्कर नरकमें जाना पड़ा, जो आगकी लपटोंके कारण घोर दुःखदायी प्रतीत होता था। उसमें लोहेकी-सी चोंचवाले पक्षी भरे पड़े थे। वहाँ पापियोंके शरीरको कोल्हूमें पेरनेके कारण जो रक्तकी धारा बहती थी, उससे कीचड़ जम गयी थी और काटे जानेवाले दुष्कर्मियोंके नरकमें पड़नेसे सब ओर घोर हाहाकार मचा रहता था। उस नरकमें पड़े मुझे सौ वर्षसे कुछ अधिक समय बीत गया। मैं महान् ताप और पीड़ासे सन्तप्त रहता था। प्यास और जलन बराबर बनी रहती थी। तदनन्तर एक दिन सहसा सुख देनेवाली ठंडी हवा चलने लगी। उस समय मैं तप्तवालुका और तप्तकुम्भ नामक नरकोंके बीच था। उस शीतल वायुके सम्पर्कसे उन नरकोंमें पड़े हुए सभी जीवोंकी यातना दूर हो गयी। मुझे भी उतना ही आनन्द हुआ, जितना स्वर्गमें रहनेवालोंको वहाँ प्राप्त होता है। 'यह क्या बात हो गयी?' यों सोचते हुए हम सभी जीवोंने आनन्दकी अधिकताके कारण एकटक नेत्रोंसे जब चारों ओर देखा, तब हमें बड़े ही उत्तम एक नररत्न दिखायी दिये। उनके साथ बिजलीके समान कान्तिमान् एक भयङ्कर यमदूत था, जो आगे होकर रास्ता दिखा रहा था और कहता था, 'महाराज! इधरसे आइये' सैकड़ों यातनाओंसे व्याप्त नरकको देखकर उन पुरुषरत्नको बड़ी दया आयी। उन्होंने यमदूतसे कहा।
आगन्तुक पुरुष बोले—यमदूत! बताओ तो सही, मैंने कौन-सा ऐसा पाप किया है, जिसके कारण अनेक प्रकारकी यातनाओंसे पूर्ण इस
- जनक-यमदूत-संवाद, भिन्न-भिन्न पापोंसे विभिन्न नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन * ३९
भयंकर नरकमें मुझे आना पड़ा है? मेरा जन्म जनकवंशमें हुआ था! मैं विदेह देशमें विपश्चित् नामसे विख्यात राजा था और प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन करता था। मैंने बहुत-से यज्ञ किये। धर्मके अनुसार पृथ्वीका पालन किया। कभी युद्धमें पीठ नहीं दिखायी तथा अतिथिको कभी निराश नहीं लौटने दिया। पितरों, देवताओं, ऋषियों और भृत्योंको उनका भाग दिये बिना कभी मैंने अन्न ग्रहण नहीं किया। परायी स्त्री और पराये धन आदिकी अभिलाषा मेरे मनमें कभी नहीं हुई। जैसे गौएँ पानी पीनेकी इच्छासे स्वयं ही पौंसलेपर चली जाती हैं, उसी प्रकार पर्वके समय पितर और पुण्यतिथि आनेपर देवता स्वयं ही अपना भाग लेनेको मनुष्यके पास आते हैं। जिस गृहस्थके घरसे वे लंबी साँस लेकर निराश लौट जाते हैं, उसके इष्ट और पूर्त—दोनों प्रकारके धर्म नष्ट हो जाते हैं। पितरोंके दुःखपूर्ण उच्छ्वाससे सात जन्मोंका पुण्य नष्ट होता है और देवताओंका निःश्वास तीन जन्मोंका पुण्य क्षीण कर देता है—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है; इसलिये मैं देवकर्म और पितृकर्मके लिये सदा ही सावधान रहता था। ऐसी दशामें मुझे इस अत्यन्त दारुण नरकमें कैसे आना पड़ा?
उन महात्माके इस प्रकार पूछनेपर यमराजका दूत देखनेमें भयंकर होनेपर भी हमलोगोंके सुनते-सुनते विनययुक्त वाणीमें बोला।
यमदूतने कहा—महाराज! आप जैसा कहते हैं, वह सब ठीक है। उसमें तनिक भी सन्देहके लिये स्थान नहीं है। किन्तु आपके द्वारा एक छोटा-सा पाप भी बन गया है। मैं उसे याद दिलाता हूँ। विदर्भराजकुमारी पीवरी, जो आपकी पत्नी थी, एक समय ऋतुमती हुई थी; किन्तु उस अवसरपर केकयराजकुमारी सुशोभनामें आसक्त होनेके कारण आपने उसके ऋतुकालको सफल नहीं बनाया। वह आपके समागमसुखसे वञ्चित रह गयी। ऋतुकालका उल्लङ्घन करनेके कारण ही आपको ऐसे भयंकर नरकतक आना पड़ा है। जो धर्मात्मा पुरुष काममें आसक्त होकर स्त्रीके ऋतुकालका उल्लङ्घन करता है, वह पितरोंका ऋणी होनेसे पापको प्राप्त हो नरकमें पड़ता है। राजन्! इतना ही आपका पाप है। इसके अतिरिक्त और कोई पाप नहीं है। इसलिये आइये, अब पुण्यलोकोंका उपभोग करनेके लिये चलिये।
राजा बोले—देवदूत! तुम जहाँ मुझे ले चलोगे, वहाँ चलूँगा; किन्तु इस समय कुछ पूछ रहा हूँ, उसका तुम्हें ठीक-ठीक उत्तर देना चाहिये। वे वज्रके समान चोंचवाले कौए, जो इन पुरुषोंकी आँखें निकाल लेते हैं और फिर उन्हें नये नेत्र प्राप्त हो जाते हैं, इन लोगोंने कौन-सा निन्दित कर्म किया है? इस बातको बताओ। मैं देखता हूँ, कौए इनकी जीभ उखाड़ लेते हैं, किन्तु फिर नयी जीभ उत्पन्न हो जाती है। इनके सिवा ये दूसरे लोग क्यों आरेसे चीरे जाते हैं और अत्यन्त दुःख भोगते हैं? कुछ लोग तपायी हुई बालूकामें भुने जाते हैं और कुछ लोग खौलते
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हुए तेलमें पड़कर पक रहे हैं। लोहेके समान चोंचवाले पक्षी इन्हें नोच-नोचकर खोंच रहे हैं। ये कैसे लोग हैं? ये बेचारे शरीरकी नस-नाड़ियोंके कटनेसे पीड़ित हो बड़े जोर-जोरसे चीखते और चिल्लाते हैं। लोहेकी चोंचके आघातसे इनके सारे अङ्गोंमें घाव हो गया है, जिससे इन्हें बड़ा कष्ट होता है। इन्होंने ऐसा कौन-सा अनिष्ट किया है, जिसके कारण ये रात-दिन सताये जा रहे हैं? ये तथा और भी जो पापियोंकी यातनाएँ देखी जाती हैं, वे किन कर्मोंके परिणाम हैं? ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे बतलाओ।
यमदूतने कहा—राजन्! मनुष्यको पुण्य और पाप बारी-बारीसे भोगने पड़ते हैं। भोगनेसे ही पाप अथवा पुण्यका क्षय होता है। लाखों जन्मोंके सञ्चित पुण्य और पाप मनुष्योंके लिये सुख-दुःखका अंकुर उत्पन्न करते हैं। जैसे बीज जलकी इच्छा रखते हैं, उसी प्रकार पुण्य और पाप देश-काल, अन्यान्य कर्म और कर्ताकी अपेक्षा करते हैं। जैसे राह चलते समय काँटेपर पैर पड़ जानेसे उसके चुभनेपर थोड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार किसी भी देश-कालमें किया हुआ थोड़ा पाप थोड़े दुःखका कारण होता है; किन्तु वही पाप जब बहुत अधिक मात्रामें हो जाता है तब पैरमें शूल अथवा लोहेकी कील गड़नेके समान अधिक दुःख प्रदान करता है—सिरदर्द आदि दुस्सह रोगोंका कारण बनता है। जैसे अपथ्य भोजन और सर्दी-गर्मीका सेवन श्रम और ताप आदिका जनक होता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न पाप भी फलकी प्राप्ति करानेमें एक-दूसरेकी अपेक्षा रखते हैं। ऐसे ही बड़े-बड़े पाप दीर्घकालतक रहनेवाले रोग और विकारोंके उत्पादक होते हैं। उन्हींसे शस्त्र और अग्निका भय प्राप्त होता है। वे ही असह्य पीड़ा और बन्धन आदि फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार जीव अनेक जन्मोंके सञ्चित पुण्य और पापोंके फलस्वरूप सुख और दुःखोंको भोगता हुआ इस लोकमें स्थित रहता है।
राजन्! जैसे नरकोंमें पड़े हुए जीव अपने घोर महापापका फल भोगते हैं, उसी प्रकार वे स्वर्गलोकमें देवताओंके साथ रहकर गन्धर्व, सिद्ध और अप्सराओंके संगीत आदिका सुख उठाते हुए पुण्योंका उपभोग करते हैं। देवता, मनुष्य और पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेकर जीव अपने पुण्य-पापजनित सुख-दुःखरूप शुभाशुभ फलोंको भोगता है। राजन्! आप जो यह पूछ रहे हैं कि किस-किस पापसे पापियोंको कौन-कौन-सी यातनाएँ मिलती हैं, वह सब मैं आपको बतला रहा हूँ। जो नीच मनुष्य कामना और लोभके वशीभूत हो दूषित दृष्टि एवं कलुषित चित्तसे परायी स्त्री और पराये धनपर आँखें गड़ाते हैं, उनकी दोनों आँखोंको ये वज्रतुल्य चोंचवाले पक्षी निकाल लेते हैं और पुनः-पुनः इनके नये नेत्र उत्पन्न हो जाते हैं। इन पापी मनुष्योंने जितने निमेषतक पापपूर्ण दृष्टिपात किया है, उतने ही हजार वर्षोंतक ये नेत्रकी पीड़ा भोगते हैं। जिन लोगोंने असत्-शास्त्रका उपदेश किया है तथा
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किसीको बुरी सलाह दी है, जिन्होंने शास्त्रका उलटा अर्थ लगाया है, मुँहसे झूठी बातें निकाली हैं तथा वेद, देवता, ब्राह्मण और गुरुकी निन्दा की है, उन्हींकी जिह्वाको ये वज्रतुल्य चोंचवाले भयङ्कर पक्षी उखाड़ते हैं और वह जिह्वा नयी-नयी उत्पन्न होती रहती है। जितने निमेषतक उनके द्वारा जिह्वाजनित पाप हुआ होता है, उतने वर्षोंतक उन्हें यह कष्ट भोगना पड़ता है। जो नराधम दो मित्रोंमें फूट डालते हैं, पिता-पुत्रमें, स्वजनोंमें, यजमान और पुरोहितमें, माता और पुत्रमें, सङ्गी-साथियोंमें तथा पति और पत्नीमें वैर डालते हैं, वे ही ये आरेसे चीरे जा रहे हैं। आप इनकी दुर्गति देखिये। जो दूसरोंको ताप देते, उनकी प्रसन्नतामें बाधा पहुँचाते, पंखे, हवादार स्थान, चन्दन और खसकी टट्टी आदिका अपहरण करते हैं तथा निर्दोष व्यक्तियोंको भी प्राणान्तक कष्ट पहुँचाते हैं, वे ही ये अधम पापी हैं जो तपायी हुई बालूमें पड़कर कष्ट भोगते हैं। जो ब्राह्मण किसी देवकार्य या पितृकार्यमें दूसरेके द्वारा निमन्त्रित होकर भी दूसरे किसीके यहाँ श्राद्ध-भोजन कर लेता है, उसके यहाँ आनेपर ये पक्षी दो टुकड़े कर डालते हैं। जो अपनी अनुचित बातोंसे साधु पुरुषोंके मर्मपर आघात पहुँचाता है, उसको ये पक्षी अत्यन्त पीड़ा देते हैं। इन्हें ऐसा करनेसे कोई रोक नहीं सकता। जो झूठी बातें कहकर और विपरीत धारणा बनाकर किसीकी चुगली खाते हैं, उनकी जिह्वाके इस प्रकार तेज किये हुए छुरोंसे दो टुकड़े कर दिये जाते हैं।
जिन्होंने उद्दण्डतावश माता, पिता तथा गुरुजनोंका अनादर किया है, वे ही ये पीब, विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए गड्ढोंमें नीचे मुख करके डुबाये जा रहे हैं। जो लोग देवता, अतिथि, अन्यान्य प्राणी, भृत्यवर्ग, अभ्यागत, पितर, अग्नि तथा पक्षियोंको अन्नका भाग दिये बिना ही स्वयं भोजन कर लेते हैं, वे ही दुष्ट यहाँ पीब और गोंद चाटकर रहते हैं। उनका शरीर तो पहाड़के समान विशाल होता है, किन्तु मुख सुईकी नोकके बराबर रहता है। देखिये, येही वे लोग हैं। जो लोग ब्राह्मण अथवा किसी अन्य वर्णके मनुष्यको एक पङ्क्तिमें बिठाकर भोजनमें भेद करते हैं, उन्हें यहाँ विष्ठा खाकर रहना पड़ता है। जो लोग एक समुदायमें साथ-साथ आये हुए अशार्थी मनुष्यको निर्धन जानकर छोड़ देते और अकेले अपना अन्न भोजन करते हैं, वे ही यहाँ थूक और खँखार भोजन करते हैं। राजन्! जिन लोगोंने जूठे हाथोंसे गौ, ब्राह्मण और अग्नियोंका स्पर्श किया है, उन्हींमेंसे ये लोग यहाँ मौजूद हैं, जो जलते हुए लोहेके खंभोंपर हाथ रखकर उन्हें चाट रहे हैं। जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक जूठे मुँह होकर भी सूर्य-चन्द्रमा और तारोंपर दृष्टिपात किया है, उनकी आँखोंमें आग रखकर यमराजके दूत उसे धौंकते हैं। गौ, अग्नि, माता, ब्राह्मण, ज्येष्ठ भ्राता, पिता, बहिन, कुटुम्बकी स्त्री, गुरु तथा बड़े-बूढ़ोंका जो पैरोंसे स्पर्श करते हैं, उनके दोनों पैर यहाँ आगमें तपाये
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हुई लोहेकी बेड़ियोंसे जकड़ दिये जाते हैं और उन्हें अँगारोंके ढेरमें खड़ा कर दिया जाता है। उसमें उनके पैरसे लेकर घुटनेतकका भाग जलता रहता है। जो नराधम अपने कानोंसे गुरु, देवता, द्विज और वेदोंकी निन्दा सुनते हैं और उसे सुनकर प्रसन्न होते हैं, उन पापियोंके कानोंमें ये यमराजके दूत आगमें तपायी हुई लोहेकी कीलें ठोंक देते हैं। विलाप करनेपर भी उन्हें छुटकारा नहीं मिलता। जो लोग क्रोध और लोभके वशमें होकर पौंसले, देवमन्दिर, ब्राह्मणके घर तथा देवालयके सभाभवन तुड़वाकर नष्ट करा देते हैं, उनके यहाँ आनेपर ये अत्यन्त कठोर स्वभाववाले यमदूत इन तीखे शस्त्रोंसे शरीरकी खाल उधेड़ लेते हैं। उनके चीखने-चिल्लानेपर भी ये दया नहीं करते! जो मनुष्य गौ, ब्राह्मण तथा सूर्यकी ओर मुँह करके मल-मूत्रका त्याग करते हैं, उनकी आँतोंको कौए गुदामार्गसे खींचते हैं। जो किसी एकको कन्या देकर फिर दूसरेके साथ उसका विवाह कर देता है, उसके शरीरमें बहुत-से घाव करके उसे खारे पानीकी नदीमें बहा दिया जाता है। जो मनुष्य दुर्भिक्ष अथवा सङ्कटकालमें अपने पुत्र, भृत्य, पत्नी आदि तथा बन्धुवर्गको अकिञ्चन जानकर भी त्याग देता और केवल अपना पेट पालनेमें लग जाता है, वह भी जब इस लोकमें आता है तो यमराजके दूत भूख लगनेपर उसके मुखमें उसके ही शरीरका मांस नोचकर डाल देते हैं और वही उसे खाना पड़ता है। जो अपनी शरणमें आये हुए तथा अपनी ही दी हुई वृत्तिसे जीविका चलानेवाले मनुष्योंको लोभवश त्याग देता है, वह भी यमदूतोंद्वारा इसी प्रकार कोल्हूमें पेरे जानेके कारण यन्त्रणा भोगता है।
जो मनुष्य अपने जीवनभरके किये हुए पुण्यको धनके लोभसे बेच डालते हैं, वे इन्हीं पापियोंकी तरह चक्कियोंमें पीसे जाते हैं। किसीकी धरोहर हड़प लेनेवाले लोगोंके सब अङ्ग रस्सियोंसे बाँध दिये जाते हैं और उन्हें दिन-रात कीड़े, बिच्छू तथा सर्प काटते-खाते रहते हैं। जो पापी दिनमें मैथुन करते और परायी स्त्रीको भोगते हैं, वे यहाँ भूखसे दुर्बल रहते हैं, प्यासकी पीड़ासे उनको जीभ और तालू गिर जाते हैं और वे वेदनासे व्याकुल हो जाते हैं। यह देखिये, सामने लोहेके बड़े-बड़े काँटोंसे भरा हुआ सेमरका वृक्ष खड़ा है। इसपर चढ़ाये हुए पापियोंके सब अङ्ग विदीर्ण हो गये हैं और अधिक मात्रामें गिरते हुए खूनसे ये लथपथ हो रहे हैं। नरश्रेष्ठ! इधर दृष्टि डालिये, ये परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करनेवाले लोग हैं। इन्हें यमराजके दूत घरियामें रखकर गला रहे हैं। जो उद्दण्ड मनुष्य गुरुको नीचे बिठाकर और स्वयं ऊँचे आसनपर बैठकर अध्ययन करता अथवा शिल्पकलाकी शिक्षा ग्रहण करता है, वह इसी प्रकार अपने मस्तकपर शिलाका भारी भार ढोता हुआ क्लेश पाता है। यमलोकके मार्गमें वह अत्यन्त पीड़ित एवं भूखसे दुर्बल रहता है और उसका मस्तक दिन-रात बोझ ढोनेकी पीड़ासे व्यथित होता रहता है। जिन्होंने
* जनक-यमदूत-संवाद, भिन्न-भिन्न पापोंसे विभिन्न नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन * ४३
जलमें मूत्र, थूक और विष्ठाका त्याग किया है, वे ही लोग इस समय थूक, विष्ठा और पूँयसे भरे हुए दुर्गन्धयुक्त नरकमें पड़े हैं। ये लोग जो भूखसे व्याकुल होनेपर एक-दूसरेका मांस खा रहे हैं, इन्होंने पूर्वकालमें अतिथियोंको भोजन दिये बिना ही भोजन किया है। जिन लोगोंने अग्निहोत्री होकर भी वेदों और वैदिक अग्नियोंका परित्याग किया है, वे ही ये पर्वतोंकी चोटीसे बारंबार नीचे गिराये जाते हैं।* जो लोग दूसरी बार ब्याही जानेवाली स्त्रीके पति होकर जीवन बिता चुके हैं, वे ही इस समय यहाँ कीड़े हुए हैं, जिन्हें चींटियाँ खा रही हैं। पतितोंका दिया हुआ दान लेने, उनका यज्ञ कराने तथा प्रतिदिन उनकी सेवामें रहनेसे मनुष्य पत्थरके भीतर कीड़ा होकर सदा निवास करता है। जो कुटुम्बके लोगों, मित्रों तथा अतिथिके देखते-देखते अकेले ही मिठाई उड़ाता है, उसे यहाँ जलते हुए अँगारे चबाने पड़ते हैं। राजन्! इस पापीने लोगोंकी पीठका मांस खाया है—पीठ-पीछे सबकी बुराई की है, इसीलिये भयङ्कर भेड़िये प्रतिदिन इसका मांस खा रहे हैं।†
इस नीचने उपकार करनेवाले लोगोंके साथ कृतघ्नता की है; अतएव यह भूखसे व्याकुल तथा अंधा, बहरा और गूँगा होकर भटक रहा है। इस खोटी बुद्धिवाले कृतघ्नने अपने मित्रोंकी बुराई की है, इसीलिये यह तप्तकुम्भ नरकमें गिर रहा है। इसके बाद चक्कियोंमें पीसा जायगा, फिर तपायी हुई बालूमें भूना जायगा। उसके बाद कोल्हूमें पेरा जायगा। तत्पश्चात् असिपत्रवनमें इसे यातना दी जायगी। फिर आरेसे यह चीरा जायगा। तदनन्तर कालसूत्रसे काटा जायगा। इसके बाद और भी बहुत-सी यातनाएँ इसे भोगनी पड़ेंगी। इसपर भी मित्रोंके साथ विश्वासघात
* अपविद्धास्तु यैर्वेदा यद्वच्चाग्निहोत्रिभिः। त इमे शैलशृङ्गाग्रात् पात्यन्तेऽधः पुनः पुनः॥ (अ० १४।८१)
† वृकैर्भयङ्करैः पृष्ठं नित्यमस्योपभुज्यते। पृष्ठमांसं नृपैतेन सतां क्रंकस्य भक्षितम्॥ (अ० १४।८५)
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करनेके पापसे इसका उद्धार कैसे होगा—यह मैं भी नहीं जानता। जो ब्राह्मण एक दूसरेसे मिलकर सदा श्राद्धान्न भोजन करनेमें ही आसक्त रहते हैं, उन्हें दुष्ट सर्पोंके सर्वाङ्गसे निकला हुआ फेन पीना पड़ता है। सुवर्णकी चोरी करनेवाले, ब्रह्महत्यारे, शराबी तथा गुरुपत्नीगामी—ये चारों प्रकारके महापापी नीचे और ऊपर धधकती हुई आगके बीचमें झोंककर सब ओरसे जलाये जाते हैं। इस अवस्थामें उन्हें कई हजार वर्षोंतक रहना पड़ता है। तदनन्तर वे मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होते तथा कोढ़ एवं यक्ष्मा आदि रोगोंसे युक्त रहते हैं। वे मरनेके बाद फिर नरकमें जाते हैं और पुनः उसी प्रकार नरकसे लौटनेपर रोगयुक्त जन्म धारण करते हैं। इस प्रकार कल्पके अन्ततक उनके आवागमनका यह चक्र चलता रहता है। गौकी हत्या करनेवाला मनुष्य तीन जन्मोंतक नीच-से-नीच नरकोंमें पड़ता है। अन्य सभी उपपातकोंका फल भी ऐसा ही निश्चय किया गया है। नरकसे निकले हुए पापी जीव जिन-जिन पातकोंके कारण जिन-जिन योनियोंमें जन्म लेते हैं, वह सब मैं बतला रहा हूँ; आप ध्यान देकर सुनें।
पापोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंकी प्राप्ति तथा विपश्चित्के पुण्यदानसे पापियोंका उद्धार
यमदूत कहता है— राजन्! पतितसे दान लेनेपर ब्राह्मण गदहेकी योनिमें जाता है। पतितका यज्ञ करानेवाला द्विज नरकसे लौटनेपर काँड़ा होता है। अपने गुरुके साथ छल करनेपर उसे कुत्तेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है तथा गुरुकी पत्नी और उनके धनको मन-ही-मन लेनेकी इच्छा होनेपर भी उसे निस्सन्देह यही दण्ड मिलता है। माता-पिताका अपमान करनेवाला मनुष्य उनके प्रति कटु वचन कहनेसे मैनाकी योनिमें जन्म लेता है। भाईकी स्त्रीका अपमान करनेवाला कबूतर होता है और उसे पीड़ा देनेवाला मनुष्य कछुएकी योनिमें जन्म लेता है। जो मालिकका अन्न तो खाता है, किन्तु उसका अभीष्ट साधन नहीं करता, वह मोहाच्छन्न मनुष्य मरनेके बाद वानर होता है। धरोहर हड़पनेवाला मनुष्य नरकसे लौटनेपर कीड़ा होता है और दूसरोंका दोष देखनेवाला पुरुष नरकसे निकलकर राक्षस होता है। विश्वासघाती मनुष्यको मछलीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। जो मनुष्य अज्ञानवश धान, जौ, तिल, उड़द, कुलथी, सरसों, चना, मटर, कलमी धान, मूँग, गेहूँ तीसी तथा दूसरे-दूसरे अनाजोंकी चोरी करता है, वह नेवलेके समान बड़े पूँछका चूहा होता है। परायी स्त्रीके साथ सम्भोग करनेसे मनुष्य भयङ्कर भेड़िया होता है। उसके बाद क्रमशः कुत्ता, सियार, बगुला,
- पापोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंकी प्राप्ति तथा विपश्चित्के पुण्यदानसे पापियोंका उद्धार * ४५
गिद्ध, साँप तथा कौएकी योनिमें जन्म लेता है।
जो खोटी बुद्धिवाला पापी मनुष्य अपने भाईकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, वह नरकसे लौटनेपर कोयल होता है। जो पापी कामके अधीन होकर मित्र तथा राजाकी पत्नीके साथ सहवास करता है, वह सूअर होता है।
यज्ञ, दान और विवाहमें विघ्न डालनेवाला तथा कन्याका दुबारा दान करनेवाला पुरुष कीड़ा होता है। जो देवता, पितर और ब्राह्मणोंको दिये बिना ही अन्न भोजन करता है, वह नरकसे निकलनेपर कौआ होता है; जो पिताके समान पूजनीय बड़े भाईका अपमान करता है, वह नरकसे निकलनेपर क्रौञ्च पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। ब्राह्मणकी स्त्रीके साथ सहवास करनेवाला शूद्र भी कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। यदि उसने ब्राह्मणके गर्भसे सन्तान उत्पन्न कर दिया हो तो वह कालके भीतर रहनेवाला कीड़ा होता है। उसके बाद क्रमशः सूअर, कृमि, विष्ठाका कीड़ा और चाण्डाल होता है। जो नीच मनुष्य अकृतज्ञ एवं कृतघ्न होता है, वह नरकसे निकलनेपर कृमि, कीट, पतङ्ग, बिच्छू, मछली, कौआ, कछुआ और चाण्डाल होता है। शस्त्रहीन पुरुषकी हत्या करनेवाला मनुष्य गदहा होता है। स्त्री और बालकोंकी हत्या करनेवालेका घोड़ेकी योनिमें जन्म होता है। भोजनकी चोरी करनेसे मक्खीकी योनिमें जाना पड़ता है। उसमें भी जो भोजनके विशेष भेद हैं, उन्हें चुरानेके पृथक्-पृथक् फल सुनिये। साधारण अन्न चुरानेवाला मनुष्य नरकसे छूटनेपर बिल्लीकी योनिमें जन्म लेता है। तिलचूर्णमिश्रित अन्नका अपहरण करनेसे मनुष्यको चूहेकी योनिमें जाना पड़ता है। घी चुरानेवाला नेवला होता है। नमककी चोरी करनेपर जलकागकी और दही चुरानेपर कीड़ेकी योनिमें जन्म होता है। दूधकी चोरी करनेसे बगुलेकी योनि मिलती है। जो तेल चुराता है, वह तेल पीनेवाला कीड़ा होता है। मधु चुरानेवाला मनुष्य डाँस और पूआ चुरानेवाला चींटी होता है। हविष्यान्नकी चोरी करनेवाला बिसतुइया होता है।
लोहा चुरानेवाला पापात्मा कौआ होता है। काँसेका अपहरण करनेसे हारीत (हरियल) पक्षीकी
४६ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
योनि मिलती है और चाँदीका बर्तन चुरानेसे कबूतर होना पड़ता है। सुवर्णका पात्र चुरानेवाला मनुष्य कोढ़ेकी योनिमें जन्म लेता है। रेशमी वस्त्रकी चोरी करनेपर चकवेकी योनि मिलती है तथा रेशमका कीड़ा भी होना पड़ता है। हरिणके रोएँसे बना हुआ वस्त्र, महीन वस्त्र, भेड़ और बकरीके रोएँसे बना हुआ वस्त्र तथा पाटोम्बर चुरानेपर तोतेकी योनि मिलती है। रूईका बना हुआ वस्त्र चुरानेसे क्रौञ्च और अग्निके अपहरणसे बगुला अथवा गदहा होना पड़ता है। अङ्गराग और पत्तियोंका साग चुरानेवाला मोर होता है। लाल वस्त्रकी चोरी करनेवालेको चकवेकी योनि मिलती है। उत्तम सुगन्धयुक्त पदार्थोंकी चोरी करनेपर छछूँदर और वस्त्रका अपहरण करनेपर खरगोशकी योनिमें जाना पड़ता है। फल चुरानेवाला नपुंसक और काष्ठकी चोरी करनेवाला घुन होता है। फूल चुरानेवाला दरिद्र और वाहनका अपहरण करनेवाला पङ्गु होता है। साग चुरानेवाला हारीत और पानीकी चोरी करनेवाला पपीहा होता है। जो भूमिको अपहरण करता है, वह अत्यन्त भयङ्कर रौरव आदि नरकोंमें जाकर वहाँसे लौटनेके बाद क्रमशः तृण, झाड़ी, लता, बेल और बाँसका वृक्ष होता है। फिर थोड़ा-सा पाप शेष रहनेपर वह मनुष्यकी योनिमें आता है। जो बैलके अण्डकोषका छेदन करता है, वह नपुंसक होता है और इसी रूपमें इक्कीस जन्म बितानेके पश्चात् वह क्रमशः कृमि, कीट, पतङ्ग, पक्षी, जलचर जीव तथा मृग होता है। इसके बाद बैलका शरीर धारण करनेके बाद चाण्डाल और डोम आदि घृणित योनियोंमें जन्म लेता है। मनुष्य योनिमें वह पङ्गु, अंधा, बहरा, कोढ़ी, राजयक्ष्मासे पीड़ित तथा मुख, नेत्र एवं गुदाके रोगोंसे ग्रस्त रहता है। इतना ही नहीं, उसे मिरगीका भी रोग होता है तथा वह शूद्रकी योनिमें भी जन्म लेता है। गाय और सोनेकी चोरी करनेवालोंकी दुर्गतिका भी यही क्रम है। गुरुको दक्षिणा न देकर उनकी विद्याका अपहरण करनेवाले छात्र भी इसी गतिको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य किसी दूसरेकी स्त्रीको लाकर दूसरेको दे देता है, वह मूर्ख नरककी यातनाओंसे छूटनेपर नपुंसक होता है। जो मनुष्य अग्निको प्रज्वलित किये बिना ही उसमें हवन करता है, वह अजीर्णताके रोगसे पीड़ित एवं मन्दाग्निकी बीमारीसे युक्त होता है।
दूसरेकी निन्दा करना, कृतघ्नता, दूसरोंके गुप्त भेदको खोलना, निष्ठुरता दिखाना, निर्दय होना, परायी स्त्रीका सेवन करना, दूसरेका धन हड़प लेना, अपवित्र रहना, देवताओंकी निन्दा करना, शठतापूर्वक मनुष्योंको ठगना, कंजूसी करना, मनुष्योंके प्राण लेना तथा और भी जितने निषिद्ध कर्म हैं, उनमें निरन्तर प्रवृत्त रहना—ये सब नरक भोगकर लौटे हुए मनुष्योंकी पहचान हैं, ऐसा जानना चाहिये। जीवोंपर दया करना, अच्छे वचन बोलना, परलोकके लिये पुण्यकर्म करना, सत्य बोलना, सम्पूर्ण भूतोंके लिये हितकारक वचन
- पापोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंकी प्राप्ति तथा विपश्चित्के पुण्यदानसे पापियोंका उद्धार * ४७
कहना, वेद स्वतः प्रमाण हैं—ऐसी दृष्टि रखना, गुरु, देवता, ऋषि, सिद्ध और महात्माओंका सत्कार करना, साधु पुरुषोंके सङ्गमें रहना, अच्छे कर्मोंका अभ्यास करना, सबके प्रति मित्रभाव रखना तथा और भी जो उत्तम धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्य हैं, वे सब स्वर्गसे लौटे हुए पुण्यात्मा पुरुषोंके चिह्न हैं—ऐसा विद्वान् पुरुषोंको समझना चाहिये।*
राजन्! अपने-अपने कर्मोंका फल भोगनेवाले पुण्यात्मा और पापियोंसे सम्बन्ध रखनेवाली ये सब बातें मैंने आपको संक्षेपसे बतायी हैं। अच्छा, अब आप आइये; अन्यत्र चलें। इस समय यहाँ सब कुछ आपने देख लिया।
**पुत्र कहता है—**पिताजी! तदनन्तर राजा विपश्चित् यमदूतको आगे करके वहाँसे जानेको उद्यत हुए। यह देख यातनामें पड़े हुए सभी मनुष्योंने चिल्लाकर कहा—'महाराज! हमपर कृपा कीजिये। दो घड़ी और ठहर जाइये। आपके शरीरको छूकर बहनेवाली वायु हमारे चित्तको आनन्द प्रदान करती है और समस्त शरीरोंमें जो सन्ताप, वेदना और बाधाएँ हैं, उनका नाश किये देती है; अतः नरश्रेष्ठ महीपते! हमपर अवश्य कृपा कीजिये।' उनकी यह बात सुनकर राजाने यमदूतसे पूछा—'मेरे रहनेसे इन्हें आनन्द क्योंकर प्राप्त होता है? मैंने मर्त्यलोकमें रहकर कौन-सा महान् पुण्यकर्म किया है, जिससे इन लोगोंपर आनन्ददायिनी वायुकी वृष्टि हो रही है? इस बातको बताओ।'†
* परनिन्दा कृतघ्नत्वं परम्पोषविघ्ननम्।
नैष्ठुर्यं निर्घृणत्वं च परदारोपसेवनम्। परस्वहरणाशौचं देवतानां च कुत्सनम्॥
निकृत्या वञ्चनं नृणां कार्पण्यं च नृणां वधः। यानि च प्रतिषिद्धानि तत्प्रवृत्तिश्च संतता॥
उपलक्ष्याणि जानीयान्नृणानां नरकादनु। दया भूतेषु सद्वादः परलोकप्रतिक्रिया॥
सत्यं भूतहितार्थोक्तिर्वेदप्रामाण्यदर्शनम्। गुरुदेवर्षिसिद्धर्षिपूजनं साधुसङ्गमः॥
सत्क्रियाभ्यसनं मैत्रीमिति बुध्येत पण्डितः। अन्यानि चैव सद्धर्मक्रियाभूतानि यानि च॥
स्वर्गच्युतानां लिङ्गानि पुरुषाणामपापिनाम्॥
(अ० १५। ३१—४४ १/२)
†पुत्र उवाच
ततस्तमग्रतः कृत्वा स राजा गन्तुमुद्यतः। ततश्च सर्वैरुत्क्रुष्टं यातनास्थाथिभिर्नृभिः॥
प्रसादं कुरु भूपेति तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्। त्वदङ्गसङ्गी पवनो मनो ह्लादयते हि नः॥
परितापं च गात्रेभ्यः पीडाबाधाश्च कृत्स्नशः। अपहन्ति नरव्याघ्र दयां कुरु महीपते॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां तं याम्यपुरुषं नृपः। पप्रच्छ कथमेतेषामाह्लादो मयि तिष्ठति॥
किं मया कर्म तत् पुण्यं मर्त्यलोके महत् कृतम्। आह्लाददायिनी वृष्टिर्येनेयं तदुदोरय॥
(अ० १५। ४७—५१)
| ४८ | * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण * |
|---|
यमदूतने कहा— राजन्! आपका यह शरीर पितरों, देवताओं, अतिथियों और भृत्यजनोंसे बचे हुए अन्नके सेवनसे पुष्ट हुआ है तथा आपका मन भी इन्हींकी सेवामें संलग्न रहा है। इसीलिये आपके शरीरको छूकर बहनेवाली वायु आनन्ददायिनी जान पड़ती है और इसके लगनेसे इन पापियोंको नरककी यातना कष्ट नहीं पहुँचाती। आपने अश्वमेध आदि यज्ञोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया है; अतः आपके दर्शनसे यमलोकके यन्त्र, शस्त्र, अग्नि और कौए आदि पक्षी, जो पीड़न, छेदन और जलन आदि महान् दुःखके कारण हैं, कोमल हो गये हैं। आपके तेजसे इनका क्रूर स्वभाव दब गया है।
राजा बोले— भद्रमुख! मेरा तो ऐसा विचार है कि पीड़ित प्राणियोंको दुःखसे मुक्त करके उन्हें शान्ति प्रदान करनेसे जो सुख मिलता है, वह मनुष्योंको स्वर्गलोक अथवा ब्रह्मलोकमें भी नहीं प्राप्त होता। यदि मेरे समीप रहनेसे इन दुःखी जीवोंको नरकयातना कष्ट नहीं पहुँचाती तो मैं सूखे काठकी तरह अचल होकर यहाँ रहूँगा।
यमदूतने कहा— राजन्! आइये, अब यहाँसे चलें। आप पापियोंकी इन यातनाओंको यहाँ छोड़कर अपने पुण्यसे प्राप्त हुए दिव्य भोगोंका उपभोग कीजिये।
राजा बोले— जबतक ये लोग अत्यन्त दुःखी रहेंगे तबतक तो मैं यहाँसे नहीं जाऊँगा; क्योंकि मेरे निकट रहनेसे इन नरकवासियोंको सुख मिलता है। जो शरणमें आनेकी इच्छा रखनेवाले आतुर एवं पीड़ित मनुष्यपर, भले ही वह शत्रुपक्षका ही क्यों न हो, कृपा नहीं करता, उस पुरुषके जीवनको धिक्कार है। जिसका मन सङ्कटमें पड़े हुए प्राणियोंकी रक्षा करनेमें नहीं लगता, उसके यज्ञ, दान और तप इहलोक और परलोकमें भी कल्याणके साधन नहीं होते। जिसका हृदय बालक, वृद्ध तथा आतुर प्राणियोंके प्रति कठोरता धारण करता है, मैं उसे मनुष्य नहीं मानता; वह तो निरा राक्षस है। माना, इनके निकट रहनेसे अग्निजनित संतापका कष्ट सहना होगा, नरककी भयानक दुर्गन्धका भोग करना पड़ेगा, भूख-प्यासका महान् दुःख, जो मूर्च्छित कर देनेवाला है, भोगना पड़ेगा; तथापि इन दुखियोंकी रक्षा करनेमें जो सुख है, उसे मैं स्वर्गीय सुखसे भी बढ़कर मानता हूँ। यदि अकेले मेरे दुखी होनेसे बहुत-से आर्त मनुष्योंको सुख प्राप्त होता है तो मुझे कौन-सा सुख नहीं मिला? इसलिये दूत! अब तुम शीघ्र लौट जाओ, मैं यहीं रहूँगा।*
* यमपुरुष उवाच
पितृदेवातिथिभ्रैष्याशिष्टान्नेन तं तनुः। पुष्टिमभ्यागता यस्मात् तद्गतं च मनो यतः॥
तत्सङ्गात्प्रसंसर्गी पवनो ह्लाददायकः। पापकर्मकृतां राजन् यातना न प्रबाधते॥
• पापोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंकी प्राप्ति तथा विपश्चित्के पुण्यदानसे पापियोंका उद्धार • ४९
| **यमदूतने कहा—**महाराज! ये धर्मराज और इन्द्र आपको लेनेके लिये आये हैं। यहाँसे आपको अवश्य जाना है, अतः चले चलिये। | चलता हूँ। इस विमानपर चढ़कर चलो, विलम्ब न करो। |
|---|---|
| **राजाने कहा—**धर्मराज! यहाँ नरकमें हजारों मनुष्य कष्ट भोगते हैं और मुझे लक्ष्य करके आर्त्तभावसे त्राहि-त्राहि पुकार रहे हैं, इसलिये मैं यहाँसे नहीं जाऊँगा। देवराज इन्द्र! और धर्म! यदि आप दोनों जानते हों कि मेरा पुण्य कितना है तो उसे बतानेकी कृपा करें। | |
| **धर्म बोले—**महाराज! जिस प्रकार समुद्रके जलबिन्दु, आकाशके तारे, वर्षाकी धाराएँ, गङ्गाकी बालुकाके कण तथा जलकी बूँदें आदि असंख्य हैं, उसी प्रकार तुम्हारे पुण्यकी भी कोई नियत संख्या नहीं हो सकती। आज यहाँ इन नरकमें पड़े हुए जीवोंपर कृपा करनेसे तुम्हारा पुण्य लाखोंगुना बढ़ गया। नृपश्रेष्ठ! अपने इस पुण्यका फल भोगनेके लिये अब देवलोकमें चलो और ये पापी जीव भी नरकमें रहकर अपने कर्मोंका फल भोगें। | |
| **धर्मराज बोले—**राजन्! तुमने मेरी भलीभाँति उपासना की है, अतः मैं तुम्हें स्वर्गलोकमें ले | **राजाने कहा—**देवराज! यदि मेरे समीपमें आनेपर भी इन दुखी जीवोंको कोई ऊँचा पद नहीं प्राप्त हुआ तो मनुष्य मेरे सम्पर्कमें रहनेकी |
अश्वमेधादयो यज्ञास्त्वयेष्टा विधिवद् यतः। ततस्त्वद्दर्शनाच्चान्या यन्त्रशस्त्राग्निभावजाः॥
पीडनच्छेददाहादिमहादुःखस्य हेतवः। मृदुत्वमागता राजन् तेजस्याहतास्त्वयि॥
राजोवाच
न स्वर्गं ब्रह्मलोके वा तत् सुखं प्राप्यते नरैः। यदार्तजन्तुनिर्वाणदानोत्थमिति मे मतिः॥
यदि मत्संन्निधावेतान् यातना न प्रबाधते। ततो भद्रमुखात्राहं स्थास्ये स्थाणुरिवाचलः॥
यमपुरुष उवाच
एहि राजन् प्रगच्छामो निजपुण्यसमर्जितान्। भुङ्क्ष्व भोगानपास्येह यातनाः पापकर्मणाम्॥
राजोवाच
तस्मान्न तावद् यास्यामि यावदेते सुदुःखिताः। मत्संन्निधानात् सुखिनो भवन्ति नरकौकसः॥
धिक् तस्य जीवनं पुंसः शरणार्थिनमातुरम्। यो नार्त्तिमनुगृह्णाति वैरिपक्षमपि ध्रुवम्॥
यज्ञादानात्सर्वलोके परत्र च न भूयते। भवन्ति तस्य यस्यार्त्तपरित्राणे न मानसम्॥
नरस्य यस्य कठिनं मनो बालातुरादिषु। वृद्धेषु च न तं मन्ये मानुषं राक्षसो हि सः॥
एतेषां संनिकर्षात्तु पद्मगन्धानिलात्मजम्। तद्योगगन्धजं वापि दुःखं नरकसम्भवम्॥
क्षुत्पिपासाभवं दुःखं यच्च मूर्च्छाप्रदं महत्। एतेषां त्राणदानं तु मन्ये स्वर्गसुखात् परम्॥
प्राप्स्यन्त्यर्त्ता यदि सुखं बहवो दुःखिते मयि। किं तुष्टं तर्हि मया न स्यात् तस्मात् त्वं व्रज मा चिरम्॥
(अ० १५। ५२–६५)
३. दत्तात्रेय-चरित्र, कार्तवीर्यार्जुन व अलर्क-संवाद
५० * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
अभिलाषा क्यों करेंगे? अतः मेरा जो कुछ भी पुण्य है, उसके द्वारा ये यातनामें पड़े हुए पापी जीव नरकसे छुटकारा पा जायें।
इन्द्र बोले—राजन्! इस उदारताके कारण तुमने और भी ऊँचा स्थान प्राप्त कर लिया। देखो, ये पापी जीव भी नरकसे मुक्त हो गये।
पुत्र कहता है—पिताजी! तदनन्तर राजा विपश्चित्के ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी और स्वयं भगवान् विष्णु उन्हें विमानमें बिठाकर दिव्यधाममें ले गये।* उस समय मैं तथा और भी जितने पापी जीव थे, वे सब नरकयातनासे छूटकर अपने-अपने कर्मफलके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें चले गये। द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने इन नरकोंका वर्णन किया; साथ ही पूर्वकालमें मैंने जैसा अनुभव किया था, उसके अनुसार जिस-जिस पापके कारण मनुष्य जिस-जिस योनिमें जाता है, वह सब भी बतला दिया।
दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र
पिता बोले—बेटा! तुमने अत्यन्त हेय संसारके व्यवस्थित स्वरूपका वर्णन किया, जो घटी-यन्त्रकी भाँति निरन्तर आवागमनशील और प्रवाहरूपसे अविनाशी है। इस प्रकार मैंने इसके स्वरूपको भलीभाँति समझ लिया है। ऐसी स्थितिमें अब मुझे क्या करना चाहिये? यह बताओ।
पुत्र (सुमति) ने कहा—पिताजी! यदि आप शङ्का छोड़कर मेरे वचनोंमें पूर्ण श्रद्धा रखते हैं तो मेरी राय यह है कि आप गृहस्थाश्रमका परित्याग करके वानप्रस्थके नियमोंका पालन
* यमपुरुष उवाच—एष धर्मश्च शक्रश्च त्वां नेतुं समुपागतौ। अवस्थानमदन्तव्यं तस्मात् पार्थिव गम्यताम्॥
धर्म उवाच—नयामि त्वामहं स्वर्गं त्वया सम्यगुपासितः। विमानमेतदारुह्य मा विलम्बस्व गम्यताम्॥
राजोवाच—नरके मानवा धर्म पीड्यन्तेऽत्र सहस्रशः। त्राहीति चार्त्ताः क्रन्दन्ति तन्मतो न व्रजाम्यहम्॥
यदि जानसि धर्म त्वं त्वां वा शक्र शचीपते। मम यावत्प्रमाणं तु शुभं तद्वक्तुमर्हथः॥
धर्म उवाच—अब्बिन्दवो यथाभ्रोंत्था यथा वा दिवि तारकाः। यथा वा वर्षतो धारा गङ्गायां सिकता यथा॥
असंख्येया महाराज यथा विन्द्याटव्यां तृणाम्। तथा तथापि पुण्यस्य संख्या नैवोपपद्यते॥
अनुकम्पामिमाञ्चाद्य भारूढेऽसि कुर्वतः। तदेव राजशार्दूल संख्येयानुपगतं तव॥
तद् गच्छ त्वं नृपश्रेष्ठ तद्भौङ्क्तुममरालयम्। एतेऽपि पापं नरके शमयन्तु स्वकर्मजम्॥
राजोवाच—कथं स्पृहां करिष्यन्ति मदङ्गेभ्यो मुदिता मानवाः। यदि मत्संनिधावेषामनुकल्पो नोपजायते॥
तस्माद् यत् सुकृतं किञ्चिन्ममास्ति त्रिदशाधिप। तेन मुञ्चन्तु नरकात् पापिनो यातनां गताः॥
इन्द्र उवाच—एवमुच्चैस्तरं स्थानं त्वयावाप्तं महोदय। एतांश्च नरकात् पश्य विमुक्तान् पापकारिणः॥
पुत्र उवाच—अथोऽपतत् पुष्पवृष्टिस्तस्योपरि महीपतेः। विमानं चारुरोहैनं स्वलोकं नयत हरिः॥
(अ० १५। ६६—६८, ७०—७८)
- दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र * ५१
कीजिये। वानप्रस्थ आश्रमके कर्तव्यका भलीभाँति अनुष्ठान करके फिर आहवनीय आदि अग्नियोंका संग्रह भी छोड़ दीजिये और आत्मा (बुद्धि) को आत्मामें लगाकर द्वन्द्वरहित एवं परिग्रहशून्य हो जाइये। एकान्तमें रहते हुए अपने मनको वशमें कीजिये और आलस्य छोड़कर भिक्षु (संन्यासी)-का जीवन व्यतीत कीजिये। संन्यासाश्रममें योगपरायण होकर बाह्य विषयोंके सम्पर्कसे अलग हो जाइये। इससे आपको उस योगकी प्राप्ति होगी, जो दुःख-संयोगको दूर करनेकी ओषधि, मोक्षका साधन, तुलनारहित, अनिर्वचनीय एवं असङ्ग है और जिसका संयोग प्राप्त होनेपर आपको फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें नहीं आना पड़ेगा।
**पिता बोले—**बेटा! अब तुम मुझे मोक्षके साधनभूत उस उत्तम योगका उपदेश दो, जिससे मैं फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें आकर ऐसा दुःख न उठाऊँ। यद्यपि आत्मा स्वभावतः सब प्रकारके योगसे रहित है तो भी जिस योगमें आसक्त होनेपर मेरे आत्माका सांसारिक बन्धनोंसे योग न हो, उसी योगको इस समय मुझे बताओ। संसाररूपी सूर्यके प्रचण्ड तापकी पीड़ासे मेरे शरीर और मन दोनों सूख रहे हैं। तुम ब्रह्मज्ञानरूपी जलकी शीतलतासे युक्त अपने वचनरूपी सलिलसे इन्हें सींच दो। मुझे अविद्यारूपी काले नागने डस लिया है। मैं उसके विषसे पीड़ित होकर मर रहा हूँ। तुम अपने वचनामृतसे मुझे पुनः जीवित कर दो। मैं स्त्री-पुत्र, घर-द्वार, खेती-बारीकी ममतारूपी बेड़ीमें जकड़ा जाकर कष्ट पा रहा हूँ; तुम प्रिय एवं उत्तम भावसे युक्त विज्ञानद्वारा इस बन्धनको खोलकर मुझे शीघ्र मुक्त करो।
**पुत्रने कहा—**पिताजी! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् दत्तात्रेयजीने राजा अलर्कको उनके पूछनेपर जिस योगका भलीभाँति विस्तारपूर्वक उपदेश किया था, वही आपको बता रहा हूँ; सुनिये।
**पिता बोले—**दत्तात्रेयजी किसके पुत्र थे? उन्होंने किस प्रकार योगका उपदेश किया था और महाभाग अलर्क कौन थे, जिन्होंने योगके विषयमें प्रश्न किया था?
**पुत्रने कहा—**प्रतिष्ठानपुरमें एक कौशिक नामक ब्राह्मण था। वह पूर्वजन्ममें किये हुए पापोंके कारण कोढ़के रोगसे व्याकुल रहने लगा। ऐसे घृणित रोगसे युक्त होनेपर भी उसे उसकी पत्नी देवताकी भाँति पूजती थी। वह अपने पतिके पैरोंमें तेल मलती, उसका शरीर दबाती, अपने हाथसे उसे नहलाती, कपड़े पहनाती और भोजन कराती थी; इतना ही नहीं, उसके थूक, खँखार, मल-मूत्र और रक्त भी वह स्वयं ही धोकर साफ करती थी। वह एकान्तमें भी पतिकी सेवा करती और उसे मीठी वाणीसे प्रसन्न रखती थी। इस प्रकार अत्यन्त विनीत भावसे वह सदा अपने स्वामीकी पूजा किया करती तो भी अधिक क्रोधी स्वभावका होनेके कारण वह निष्ठुर प्रायः अपनी पत्नीको फटकारता ही रहता था। इतनेपर भी वह उसके पैरों पड़ती और उसे देवताके समान समझती थी। यद्यपि उसका शरीर अत्यन्त घृणाके योग्य था तो भी वह साध्वी उसे सबसे श्रेष्ठ मानती थी। कौशिकसे चला-फिरा नहीं जाता था तो भी एक दिन उसने अपनी पत्नीसे कहा—'धर्मज्ञे! उस दिन मैंने घरपर बैठे-बैठे ही सड़कपर जिस वेश्याको जाते देखा था, उसके घरमें आज मुझे ले चलो। मुझे उससे मिला दो। वही मेरे हृदयमें बसी हुई है। जबसे मैंने उसे देखा है, तबसे वह मेरे मनसे दूर नहीं होती। यदि वह आज मेरा आलिङ्गन नहीं करेगी तो कल तुम मुझे मरा हुआ देखोगी। मनुष्योंके लिये कामदेव प्रायः टेढ़ा होता है। उस वेश्याको बहुत लोग चाहते हैं और मुझमें उसके पासतक जानेकी शक्ति नहीं है; इसलिये आज मुझे बड़ा सङ्कट प्रतीत होता है।'
अपने कामातुर स्वामीका यह वचन सुनकर
| ५२ | * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण * |
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उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई इस परम सौभाग्यशालिनी पतिव्रता पत्नीने अपनी कमर खूब कस ली और अधिक शुल्क लेकर पतिको कंधेपर चढ़ा लिया। फिर धीरे-धीरे वेश्याके घरकी ओर प्रस्थान किया। रात्रिका समय था, आकाश मेघोंसे आच्छन्न हो रहा था। केवल बिजलीके चमकनेसे मार्ग दिखायी दे जाता था। ऐसी वेलामें वह ब्राह्मणी अपने पतिका अभीष्ट साधन करनेके लिये राजमार्गसे जा रही थी। मार्गमें सूली थी, जिसके ऊपर चोर न होते हुए भी चोरके सन्देहसे माण्डव्य नामक ब्राह्मणको चढ़ा दिया गया था। वे दुःखसे आतुर हो रहे थे। कौशिक पत्नीके कंधेपर बैठा था, उस अन्धकारमें देख न सकनेके कारण उसने अपने पैरोंसे छूकर सूलीको हिला दिया। इससे कुपित होकर माण्डव्यने कहा—'जिसने पैरसे हिलाकर मुझे इस कष्टकी दशामें पहुँचा दिया और मुझे अत्यन्त दुखी कर दिया, वह पापात्मा नराधम सूर्योदय होनेपर विवश हो निस्सन्देह अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा। सूर्यका दर्शन होते ही उसका विनाश हो जायगा।' इस अत्यन्त दारुण शापको सुनकर उसकी पत्नी व्यथित होकर बोली—'अब सूर्यका उदय ही नहीं होगा।'* तदनन्तर सूर्योदय न होनेके कारण चराचर रात ही रहने लगी। कितने ही दिनोंके बराबर समय रातभरमें ही बीत गया। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ। वे सोचने लगे—स्वाध्याय, वषट्कार, स्वधा (श्राद्ध) तथा स्वाहा (यज्ञ)-से रहित होकर यह सारा जगत् नष्ट हुए बिना कैसे रह सकता है। दिन-रातकी व्यवस्था हुए बिना मास और ऋतुका भी लोप हो जायगा। उनके लोप होनेसे दक्षिणायन और उत्तरायणका भी ज्ञान नहीं होगा। अयनका ज्ञान हुए बिना वर्ष कैसे हो सकता है, और वर्षके बिना कालका ज्ञान होना असम्भव है। पतिव्रताके वचनसे सूर्यका उदय ही नहीं होता; उसके बिना स्नान, दान आदि क्रियाएँ बंद हो गयीं। अग्निहोत्र और यज्ञका अभाव भी दृष्टिगोचर होने लगा है। होमके बिना हमलोगोंकी तृप्ति नहीं होती। जब मनुष्य यज्ञका यथोचित भाग देकर हमें तृप्त करते हैं, तब हम खेतोंकी उपजके लिये वर्षा करके मनुष्योंपर अनुग्रह करते हैं। नया अन्न पैदा होनेपर मनुष्य फिर हमारे लिये यज्ञ करते हैं और हमलोग यज्ञादिद्वारा पूजित होनेपर उन्हें मनोवाञ्छित भोग प्रदान करते हैं। हम नीचेकी ओर वर्षा करते हैं और मनुष्य ऊपरकी ओर। हम जलकी वर्षासे मनुष्योंको और मनुष्य हविष्यकी वर्षासे हमलोगोंको तृप्त करते हैं। जो दुरात्मा लोभवश हमारा यज्ञभाग स्वयं खा लेते हैं, उन अपकारी पापियोंके नाशके लिये हम जल, सूर्य, अग्नि, वायु तथा पृथ्वीको भी दूषित कर देते हैं। उन दूषित वस्तुओंका उपयोग करनेसे उन कुकर्मियोंको मृत्युके लिये भयङ्कर महामारी आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
* तस्य भार्या ततः श्रुत्वा तं शापमतिदारुणम् । प्रोवाच व्यथिता सूर्यो नैवोदेष्यत्युदर्धितः । (१६ । ३१)
- दत्तात्रेयजीके जन्म प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र * ५३
जो हमें तृप्त करके शेष अन्न अपने उपभोगमें लाते हैं, उन महात्माओंको हम पुण्यलोक प्रदान करते हैं। किन्तु इस समय प्रभातकाल हुए बिना इन मनुष्योंके लिये वह सब पुण्यकर्म असम्भव हो रहा है। अब दिनकी सृष्टि कैसे हो ?' इस प्रकार सब देवता आपसमें बात करने लगे। यज्ञोंके विनाशकी आशङ्कासे वहाँ एकत्रित हुए देवताओंके वचन सुनकर प्रजापति ब्रह्माजीने कहा—'पतिव्रताके माहात्म्यसे इस समय सूर्यका उदय नहीं हो रहा है और सूर्योदय न होनेसे मनुष्यों तथा तुम देवताओंकी भी हानि है; अतः तुमलोग महर्षि अत्रिकी पतिव्रता पत्नी तपस्विनी अनसूयाके पास जाओ और सूर्योदयकी कामनासे उन्हें प्रसन्न करो।'*
तब देवताओंने जाकर अनसूयाजीको प्रसन्न किया। वे बोलीं—'तुम क्या चाहते हो, बतलाओ।' देवताओंने याचना की कि 'पूर्ववत् दिन होने लगे।'
अनसूयाने कहा—देवताओ! पतिव्रताका महत्त्व किसी प्रकार कम नहीं हो सकता; इसलिये मैं उस साध्वीको मनाकर दिनकी सृष्टि करूँगी। मुझे ऐसा उपाय करना है, जिससे फिर पहलेकी ही भाँति दिन-रातकी व्यवस्था चलती रहे और उस पतिव्रताके पतिका भी नाश न हो।†
सूतने कहा—देवताओंसे यों कहकर अनसूया देवी उस ब्राह्मणीके घर गयीं और उसके कुशल पूछनेपर उन्होंने अपनी, अपने स्वामीकी तथा अपने धर्मकी कुशल बतायी।
अनसूया बोलीं—कल्याणी! तुम अपने स्वामीके मुखका दर्शन करके प्रसन्न तो रहती हो न? पतिको सम्पूर्ण देवताओंसे बड़ा मानती हो न? पतिकी सेवासे ही मुझे महान् फलकी प्राप्ति हुई है तथा सम्पूर्ण कामनाओं एवं फलोंकी प्राप्तिके साथ ही मेरे सारे विघ्न भी दूर हो गये।‡ साध्वी! मनुष्यको पाँच ऋण सदा ही चुकाने चाहिये। अपने वर्णधर्मके अनुसार धनका संग्रह करना आवश्यक है। उसके प्राप्त होनेपर शास्त्रविधिके अनुसार उसका सत्पात्रको दान करना चाहिये। सत्य, सरलता, तपस्या, दान और दयासे सदा युक्त रहना चाहिये। राग-द्वेषका परित्याग करके शास्त्रोक्त कर्मोंका अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य अपने वर्णके लिये विहित उत्तम लोकोंको प्राप्त होता है। पतिव्रते! इस प्रकार महान् क्लेश उठानेपर पुरुषोंको प्राजापत्य आदि लोकोंकी प्राप्ति होती है; परन्तु स्त्रियाँ केवल पतिकी सेवा करनेमात्रसे पुरुषोंके दुःख सहकर उपार्जित किये हुए पुण्यका आधा भाग प्राप्त कर लेती हैं। स्त्रियोंके लिये अलग यज्ञ, श्राद्ध या उपवासका विधान नहीं है। वे पतिकी सेवामात्रसे ही उन अभीष्ट लोकोंको प्राप्त कर लेती हैं। अतः महाभागे! तुम्हें सदा पतिकी सेवामें अपना मन लगाना चाहिये; क्योंकि स्त्रीके लिये पति ही परम गति है। पति जो देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंकी
* पतिव्रताया माहात्म्यान्नोदेच्छति दिवाकरः। तस्य चानुदयाद्धानिर्मर्त्यानां भवतां तथा ॥
तस्मात् पतिव्रतामग्रेऽनसूयां तपस्विनीम्। प्रसादयत वै पत्नीं भानोरुदयकाम्यया ॥ (१६। ४८-४९)
अनसूयोवाच
† पतिव्रताया माहात्म्यं न हीयेत कथं त्विति। सान्त्वयित्वाऽथ तां साध्वीमहं सृक्ष्याम्यहं सुराः ॥
यथा पुनरहोरात्रसंस्थानमुपजायते। यथा च तस्याः स्वपतिर्न साध्व्या नाशमेष्यति ॥ (१६। ५१-५२)
‡ कञ्चिन्नन्दसि कल्याणि! स्वभर्तुर्मुखदर्शनात्। काञ्चित्सर्वाधिकंदेवेभ्यो मन्यसेऽभ्यधिकं पतिम् ॥
भर्तृशुश्रूषयाद्येव मया प्राप्तं महत् फलम्। सर्वकामफलावाप्त्या प्रत्यूहाः परिनिर्जिताः ॥ (१६। ५४-५५)
५४ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
सत्कारपूर्वक पूजा करता है, उसके भी पुण्यका आधा भाग स्त्री अनन्यचित्तसे पतिकी सेवा करनेमात्रसे प्राप्त कर लेती है।*
अनसूयाजीका वचन सुनकर पतिव्रता ब्राह्मणीने बड़े आदरके साथ उनका पूजन किया और इस प्रकार कहा—'स्वभावतः सबका कल्याण करनेवाली देवी! स्वयं आप यहाँ पधारकर पतिकी सेवामें मेरी पुनः श्रद्धा बढ़ा रही हैं। इससे मैं धन्य हो गयी। यह आपका मुझपर बहुत बड़ा अनुग्रह है। इसीसे देवताओंने भी आज मुझपर कृपादृष्टि की है। मैं जानती हूँ कि स्त्रियोंके लिये पतिके समान दूसरी कोई गति नहीं है। पतिमें किया हुआ प्रेम इहलोक और परलोकमें भी उपकार करनेवाला होता है। यशस्विनि! पतिके प्रसादसे ही नारी इस लोक और परलोकमें भी सुख पाती है; क्योंकि पति ही नारीका देवता है। महाभागे! आज आप मेरे घरपर पधारी हैं। मुझसे अथवा मेरे इन पतिदेवसे आपको जो भी कार्य हो, उसे बतानेकी कृपा करें।†
अनसूयोवाच
एते देवाः सहेन्द्रेण मामुपागम्य दुःखिताः।
त्वद्वाक्यापास्तसत्कर्मदिननक्तनिरूपणाः ॥
याचन्तेऽहर्निशासंस्थां यथावदविखण्डिताम्।
अहं तदर्थमायाता शृणु चैतद्वचो मम॥
दिनाभावात् समस्तानाम्भावो यागकर्मणाम्।
तदभावात् सुराः पुष्टिं नोपयान्ति तपस्विनि॥
अह्नश्चैव समुच्छेदादुच्छेदः सर्वकर्मणाम्।
तदुच्छेदादनावृष्ट्या जगदुच्छेदमेष्यति॥
तत्त्वमिच्छसि चेदेतज्जगदुद्धर्तुमापदः।
प्रसीद साध्वि लोकानां पूर्ववद्वर्त्ततां रविः॥
अनसूया बोलीं—देवि! तुम्हारे वचनसे दिन-रातकी व्यवस्थाका लोप हो जानेके कारण शुभ कर्मोंका अनुष्ठान बंद हो गया है; इसलिये ये इन्द्र आदि देवता मेरे पास दुःखी होकर आये हैं और प्रार्थना करते हैं कि दिन-रातकी व्यवस्था पहलेकी तरह अखण्डरूपसे चलती रहे। मैं उसीके लिये तुम्हारे पास आयी हूँ। मेरी यह बात सुनो। दिन न होनेसे समस्त यज्ञकर्मोंका अभाव हो गया है और यज्ञोंके अभावसे देवताओंकी पुष्टि नहीं हो पाती है; अतः तपस्विनि! दिनके नाशसे समस्त शुभ कर्मोंका नाश हो जायगा और उनके नाशसे वृष्टिमें बाधा पड़नेके कारण इस संसारका ही उच्छेद हो जायगा। अतः यदि तुम इस जगत्को आपत्तिसे बचाना चाहती हो तो सम्पूर्ण लोकोंपर दया करो, जिससे पहलेकी भाँति सूर्योदय हो।
ब्राह्मण्युवाच
माण्डव्येन महाभागे शप्तो भर्ता ममेश्वरः।
सूर्योदये विनाशं त्वं प्राप्स्यसीत्यतिमन्युना॥
ब्राह्मणीने कहा—महाभागे! माण्डव्य ऋषिने अत्यन्त क्रोधमें भरकर मेरे स्वामी—मेरे ईश्वरको शाप दिया है कि सूर्योदय होते ही तेरी मृत्यु हो जायगी।
अनसूयोवाच
यदि वा रोचते भद्रे ततस्त्वद्वचनादहम्।
करोमि पूर्ववद्देहं भर्तारं च नवं तव॥
मया हि सर्वथा स्त्रीणां माहात्म्यं वरवर्णिनि।
पतिव्रतानामाराध्यमिति सम्मान्यासि ते॥
अनसूया बोलीं—कल्याणी! यदि तुम्हारी इच्छा हो और तुम कहो तो मैं तुम्हारे पतिको पूर्ववत् शरीर एवं नयी स्वस्थ अवस्थाका कर दूँगी।
* नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न श्राद्धं नाप्युपोषितम्। भर्तृशुश्रूषयैवैतान् लोकांनिष्टान् ब्रजन्ति हि॥
तस्मात् साध्वि महाभागे पतिशुश्रूषणं प्रति। त्वया गतिः सदा कार्या यतो भर्त्ता परा गतिः॥
यद्देवेभ्यो यच्च पित्रागतेभ्यः कुर्याद्धनीयार्चनं शक्तिभावः। तस्यान्वद्धं केवलानन्यचित्ता नारी भुङ्क्ते भर्तृशुश्रूषयैव॥ (१६।६१-६३)
† स त्वं ब्रूहि महाभागे प्रसाद्य मम मन्दिरम्। आर्याया कस्यवा कार्ये मयाऽऽद्यैणापि वा श्रुते॥ (१६।६८)
- दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र * ५५
सुन्दरी! मुझे पतिव्रता स्त्रियोंके माहात्म्यका सर्वथा आदर करना है, इसीलिये तुम्हें मनाती हूँ।
पुत्र उवाच
तथेत्युक्ते तया सूर्यमाजुहाव तपस्विनी।
अनसूयार्घ्यमुद्यम्य दशरात्रे तदा निशि॥
ततो विवस्वान् भगवान् फुल्लपद्मारुणाकृतिः।
शैलराजानमुदयमारुरोहोरुमण्डलः ॥
समनन्तरमेवास्या भर्ता प्राणैर्व्ययुज्यत।
पपात च महीपृष्ठे पतन्तं जगृहे च सा॥
पुत्र (सुमति) कहता है—ब्राह्मणीके 'तथास्तु' कहकर स्वीकार करनेपर तपस्विनी अनसूयाने अर्घ्य हाथमें लेकर सूर्यदेवका आवाहन किया। उस समयतक दस दिनोंके बराबर रात बीत चुकी थी। तदनन्तर भगवान् सूर्य खिले हुए कमलके समान अरुण आकृति धारण किये अपने महान् मण्डलके साथ गिरिराज उदयाचलपर आरूढ़ हुए। सूर्यदेवके प्रकट होते ही ब्राह्मणीका पति प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिरा; किन्तु उसकी पत्नीने गिरते समय उसे पकड़ लिया।
अनसूयोवाच
न विषादस्त्वया भद्रे कर्तव्यः पश्य मे बलम्।
पतिशुश्रूषयावाप्तं तपसः किं चिरेण ते॥
यथा भर्तृसमं नान्यमपश्यं पुरुषं क्वचित्।
रूपतः शीलतो बुद्ध्या वाङ्माधुर्यादिभूषणैः॥
तेन सत्येन विप्रोऽयं व्याधिमुक्तः पुनर्युवा।
प्राप्नोतु जीवितं भार्यासहायः शरदां शतम्॥
यथा भर्तृसमं नान्यमहं पश्यामि दैवतम्।
तेन सत्येन विप्रोऽयं पुनर्जीवत्वनामयः॥
कर्मणा मनसा वाचा भर्तुराराधनं प्रति।
यथा ममोद्यमो नित्यं तथायं जीवताद् द्विजः ॥
अनसूया बोलीं—भद्रे! तुम विषाद न करना। पतिकी सेवासे जो तपोबल मुझे प्राप्त हुआ है, उसे तुम अभी देखो; विलम्बकी क्या आवश्यकता? मैंने जो रूप, शील, बुद्धि एवं मधुर भाषण आदि सद्गुणोंमें अपने पतिके समान दूसरे किसी पुरुषको कभी नहीं देखा है, उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगसे मुक्त हो फिरसे तरुण हो जाय और अपनी स्त्रीके साथ सौ वर्षोंतक जीवित रहे। यदि मैं स्वामीके समान और किसी देवताको नहीं समझती तो उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगमुक्त होकर पुनः जीवित हो जाय। यदि मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा मेरा सारा उद्योग प्रतिदिन स्वामीकी सेवाके ही लिये होता हो तो यह ब्राह्मण जीवित हो जाय।
पुत्र उवाच
ततो विप्रः समुत्तस्थौ व्याधिमुक्तः पुनर्युवा।
स्वभाभिर्भासयन् वेश्म वृन्दारक इवाजरः॥
ततोऽपतन् पुष्पवृष्टिर्देववाद्यादिनिःस्वनः।
लेभिरे च मुदं देवा अनसूयामथाब्रुवन् ॥
पुत्र कहता है—पिताजी! अनसूयादेवीके इतना कहते ही वह ब्राह्मण अपनी प्रभासे उस भवनको प्रकाशमान करता हुआ रोगमुक्त तरुण शरीरसे जीवित हो उठा, मानो जरावस्थासे रहित देवता हो। तदनन्तर दुन्दुभि आदि देवताओंके बाजोंकी आवाजके