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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

ही है। इसी तरह मस्तिष्क आदिद्वारा अभौतिक आत्मा, ब्रह्म आदिका बोध होता ही है। परिवर्तनशील भौतिकवादियोंका भूत ही नयी-नयी पोशाकोंमें भले उपस्थित हो, उपनिषदोंका ब्रह्म तो सदासे ही औपाधिकरूपमें अनेक रस और निरुपाधिक- रूपसे एकरस ही रहा है और वैसे ही रहेगा। जिसको भौतिकवादी वस्तु कहते हैं, वही अवस्तु है। जिसे वे अवस्तु समझते हैं, विचारकी दृष्टिसे वही वस्तु है। स्थूलदर्शी कार्यको ही वस्तु समझता है। एक स्थूलदर्शी पटको सत्य मानता है, परंतु एक सूक्ष्मदर्शी तन्तुभिन्न पटको ही असत् कहता है। इसी तरह कारण- परम्पराका विचार करते हुए तन्तु भी अंशुसे भिन्न असत् है। अंशु भी बिनौला- मात्र है, बिनौला भी पृथ्वीमात्र है, पृथ्वी भी जलमात्र ही है, जल तेजसे भिन्न होकर कुछ नहीं ठहरता। तेज वायुमात्र है, वायु आकाशमात्र ठहरता है; किंतु स्थूलदर्शियोंको यह सब ढोंग ही जँचता है। अन्तिम सत्यका विचार सर्वदा ही उपयुक्त है, चाहे श्रेणीविभाजित जीवन हो चाहे समष्टिवादी जीवन। सभीके लिये विक्षेपशून्य, निष्प्रपञ्च, सत्य, स्वप्रकाश ब्रह्म अपेक्षित है। इन्द्र भी अनन्त आनन्दसामग्री भुलाकर निष्प्रपञ्च सौषुप्त सुखकी ओर प्रवृत्त होता है। कोई कितना भी निर्द्वन्द्व, शान्त एव सुखी क्यो न हो, सुषुप्तिकी निष्प्रपञ्चताके बिना उसे विश्राम नहीं मिलता। 'ईश्वरको न युक्तिसे जाना जा सकता है, न उसे प्रकाशित किया जा सकता है' यह कान्ट का कथन; तथा 'ईश्वर वाङ्मनसगोचर नहीं है' यह हिंदूदर्शनोंका कथन, यह सिद्ध नहीं करते कि ईश्वर अवास्तव एव असत् है। किंतु उनका अभिप्राय यही है कि श्रद्धा, समाधान तथा एकाग्रताके बिना ईश्वरका साक्षात्कार नही हो सकता। ईश्वरके अस्तित्वमें अनुमान, आगमादि अनेको प्रमाण हैं। श्रुति ब्रह्म या आत्माको साक्षात् अपरोक्ष ही बतलाती है—'यदेव साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म ।' (बृहदा० उप० ३। ५। १) विज्ञाता प्रमाता प्रमाणानपेक्षरूपसे ही स्वतःसिद्ध होता है। सशय, विपर्यय एवं अज्ञान मिटानेके लिये ही प्रमाण अपेक्षित होते हैं। आत्मा अन्यत्र सदिहान होता हुआ भी स्वयं असंदिग्ध है, अन्यत्र विपर्ययज्ञानवान् होता हुआ भी स्वयं अविपर्यस्त रहता है। अन्यत्र अनुमिमान होता हुआ भी (अनुमान करता हुआ भी) स्वयं अपरोक्ष रहता है। फिर प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि सभी जिस अखण्ड बोधके अनुग्रहसे भासित होते हैं, उसे किससे सिद्ध किया जाय ? यही बात 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' इत्यादि श्रुतियोद्वारा कही गयी है। अतएव प्रमाणसिद्ध एव स्वतःसिद्ध ईश्वर या ब्रह्म परमकल्याणकारी होनेसे ग्राह्य, उपास्य एव ज्ञेय है। अनादि स्वतःसिद्ध वस्तुको बुद्ध्यारूढ करनेके लिये युक्ति, श्रुति आदि अपेक्षित होती है। इतिहास घटनाओं- का ही होता है, फिर भी औपचारिकरूपसे 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्', 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इत्यादि श्रौत इतिहासके आधारपर सर्वकारण-स्वप्रकाश ब्रह्म- का अस्तित्व सिद्ध होता ही है। तदनुगुण युक्ति भी श्रुतिने ही दी है। जैसे अन्न

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(पृथ्वी) रूप अङ्कुरसे जलरूपी बीजका पता लगता है, जलरूपी अङ्कुरसे तेजरूपी मूलका पता लगता है, वैसे ही तेजरूपी अङ्कुरसे सदरूपी मूलका पता लगता है—'तेजसा सौम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ ।' दार्शनिक पण्डितोंके इन तत्त्वविचारोंको गलत कहना बुद्धिकी अजीर्णताका ही द्योतक है । वास्तविक अभिज्ञता और व्यावहारिक ज्ञानसे तो भौतिकवादियोंने ही शत्रुता कर रक्खी है । विश्वके उपादानकारणरूपसे, विश्वके निमित्तकारणरूपसे, विश्वके आधार या अधिष्ठानरूपसे, विश्वके प्रकाशक तथा व्यवस्थापकरूपसे, कर्मफलदातारूपसे, सर्वशासकरूपसे ईश्वरकी सिद्धि होती ही है । जैसे दर्पणके अंदर प्रतिबिम्ब भासित होता है, वैसे ही अनन्त चिद्रूप दर्पणमें मनुष्य, पश्वादि, जङ्गम-स्थावरादि सभी प्रपञ्च भासित होते हैं । काष्ठपर व्यक्त अग्निको काष्ठसे भिन्न समझना ही पड़ेगा, ज्ञान या चेतनाको मनुष्यादि देहोंसे भिन्न समझना ही पड़ेगा । आदिम जंगली मनुष्योंके वस्तु और चेतनासम्बन्धी विचारोंको इतिहासके बलसे सिद्ध करनेकी दुश्चेष्टा निराधार है । यह इतिहास कपोलकल्पित, मिथ्या एव पूरा मनगढन्त है । जड़वादियोंका इतिहास-सम्बन्धी मनोराज्य केवल विनोदका विषय है । कोई प्रमाणचक्षु पुरुष इसे केवल भौतिकवादियोंका दिमागी फितूर ही कहेगा । प्रामाणिक आस्तिकोंके इतिहासोंके अनुसार तो विश्वकारण ईश्वरकी संताने ईश्वरीय ज्ञानरूप वेदादि शास्त्रोंद्वारा पूर्णरूपसे शिक्षित ही होती हैं । उत्तरोत्तर जहाँ-कहीं सच्छिक्षा एवं सत्सङ्गमे विच्छेद हुआ, वहीं असभ्यता, अज्ञता एवं मिथ्या धारणाएँ बनती हैं । भौतिकवादियोंकी यह धारणा नितान्त असत्य है कि 'अध्यात्मवादियोंकी अतिभौतिक देवता, ईश्वर या ब्रह्म इत्यादि कल्पनाएँ हैं और इनका मूल असभ्यो, जंगलियोंकी तन्त्र-मन्त्र, भूत प्रेतकी कल्पनाएँ है ।' जिन्होंने सच्चे इतिहासोंका अध्ययन किया है, रामायण, महाभारत, पुराणों, उप- पुराणों, तन्त्रों, आगमों एवं मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदो एवं उनके आरण्यक, उपनिषदों- का मनन किया है और जिन्होने व्यास, वसिष्ठ एवं श्रीकृष्ण भगवान्‌के दिव्य दर्शनोंका अध्ययन किया है, उनको यह समझनेमें कठिनाई न होगी । भौतिक- वादी जिन बाह्य भौतिक वस्तुओंको सत्य मानते हैं, देवता, ईश्वर, ब्रह्मकी बात तो पृथक् रहे भूत-प्रेतकी कल्पना भी उनसे अधिक सत्य है । इसीलिये उपनिषद् या गीताके जिस निर्गुण ब्रह्मको भौतिकवादी अन्तिम कल्पना मानते हैं, उस कल्पनाके साथ भी भूत-प्रेत एवं देवताओंकी कल्पनाएँ हैं । यह समझना नितान्त भ्रम है कि विकासक्रमसे भिन्न-भिन्न कालोकी ही यह कल्पनाएँ हैं । एक उच्च- कोटिका ब्रह्मदर्शन परमार्थ-दृष्टिमें सजातीय-विजातीय-स्वगतभेदशून्य ब्रह्मतत्त्व बतलाता है । परंतु वही अन्य अधिकारियोंके लिये ईश्वरकी उपासना बतलाता है । कुछ और ढंगके अधिकारियोंके लिये सगुण ईश्वरकी आराधना, अन्य लोगोंके लिये विभिन्न देवताओंकी आराधना बतलाता है । अन्य ढंग-

के लोगोंके लिये प्रेत-पिशाचकी आराधना भी उचित मानता है। 'बृहदारण्यक' आदि उपनिषदोंमें भी निर्गुण ब्रह्म, ईश्वर और साथ-ही-साथ अनेक देवताओंका भी वर्णन है। भारत, रामायण, गीता आदिमें तो सबका वर्णन है ही। यदि पिछली-पिछली कल्पनाएँ उत्तरोत्तर कल्पनाओंकी दृष्टिसे असत्य हैं, तब तो उनको मिथ्या ही कहना चाहिये। किसीके लिये भी उनकी ग्राह्यता एव उपासनाका उपदेश कैसे हो सकता है? इसलिये व्यावहारिक दृष्टिसे प्रेत, पिशाच आदि सभी तत्त्वोंका अस्तित्व है। प्रेतादि केवल कल्पना नहीं, उनकी देवयोनिमें गणना है। परलोकविद्या- वालोंकी दृष्टिसे प्रेत-तत्त्वकी सिद्धि होती है। भूतावेश, प्रेतावेश आज भी वैसी ही सत्य वस्तु है, जैसी पुराने कालमें। इसके अतिरिक्त भौतिकवादियोंकी प्रेतकल्पनाका युग कितना पुराना है? जब मानवका इतिहास ही लाखों नहीं हजारों ही वर्षोंका है, तब उनके प्रेतकल्पनाका युग भी उनकी दृष्टिमें हजारों वर्ष- का ही पुराना है। परंतु आर्ष इतिहासके अनुसार निर्गुण ब्रह्मकी कल्पना तो लाखों वर्ष पुरानी है। द्वापरके कृष्ण, त्रेताके राम और सृष्टिके मूल कारण ब्रह्मा, विष्णु एव महेशकी अतिप्राचीन दृष्टिमें भी निर्गुण ब्रह्मकी सत्ता स्वतःसिद्ध है। भौतिकवादियोंके तथाकथित मनगढंत मिथ्या इतिहासोंकी अपेक्षा आर्ष इतिहासोंकी तथ्यता कहीं अधिक श्रेष्ठ है। अतएव जागरण, निद्रा तथा स्वप्न- के आधारपर देह-भिन्न आत्माका निर्णय करना, प्राणधारणसे जीवन, प्राणराहित्यसे मरण आदिकी धारणा जंगली असभ्योंकी नहीं, किंतु सभ्यशिरोमणि महा- दार्शनिकोंकी भी यही धारणा थी और आज भी है। श्रीशंकराचार्यका कहना है कि जो स्वप्न, जागर एव सुषुप्तिको जानता है, वही आत्मा है, भूतसत्र नहीं— 'यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघः।' भागवतमें कहा गया है कि स्वप्न, सुषुप्ति बुद्धिकी वृत्तियाँ हैं, जिस द्रष्टासे इनका बोध या प्रकाश होता है, वही अध्यक्ष पर पुरुष है—'बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः । ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ॥' (श्रीमद्भा० ७।७।२५)। इस शरीरकी विभिन्न अवस्थाओंमें उसके भीतर अन्तरसे भी अन्तरतम- रूपसे आत्माको देखनेकी पद्धति लाखों वर्ष पुरानी है। जैसे मुञ्जमेंसे बुद्धिमानीसे इषीका (सींक) निकाली जाती है, वैसे ही शरीरसे, इन्द्रियो, मन, बुद्धि, अहंकार या आनन्दमयसे, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिसे अन्वयव्यतिरेकादि युक्तियों- द्वारा समझकर पृथक्रूपसे आत्मा समझा जाता है। शरीरके भीतर ही अ-तत्त्वको त्याग करते हुए भगवत्तत्त्वको समझा जा सकता है—'अन्तर्भवेऽनन्त भवन्तमेव ह्यतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः।' (श्रीमद्भा० १०।१४।२८) 'गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्', 'यो वेद निहितं गुहायाम्।' शरीरके भीतर बुद्धिरूपा गुहामें अभिव्यक्त अनन्त चित्-स्वरूप आत्माका उपलब्ध होता है। प्राणधारणके आधारपर जीवशब्दकी

५६८ मार्क्सवाद और रामराज्य

प्रवृत्ति भी अति प्राचीन ही है। यह हजार दो हजार वर्षके जंगली मनुष्योंकी कल्पना नहीं, बल्कि यह कहना चाहिये कि अतिप्राचीन वास्तविक आर्षज्ञानका विकृत- रूप अवशेष है। उपनिषदोंने मरनेके सम्बन्धमें बड़ी गम्भीरतासे विचार किया है। नचिकेताका प्रश्न ही मुख्य यही था—'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।' (कठोप० १।१।२०) अर्थात् मरनेके बाद जो यह सदेह होता है, कुछ लोग कहते हैं कि देह-भिन्न आत्मा बचा रहता है, कुछ कहते है कि कुछ भी बाकी नहीं बचता इसमें तथ्य क्या है? इसीपर यमराजने वरप्रदानके रूपमें अनन्त, सर्वाधिष्ठान, सर्वद्रष्टा आत्माका निरूपण किया है।

देवताओंके सम्बन्धमे तो भगवान् व्यासकी उत्तरमीमांसामें (१।३।९) शाङ्करभाष्यद्वारा स्पष्ट ही बतलाया गया है कि 'इन्द्रो ह वै देवानामभि प्रवव्राज' इत्यादि आख्यायिकाओद्वारा ऐश्वर्यशील देवतातत्त्वका स्पष्ट बोध होता है। महादार्शनिक विद्यारण्य स्वामीने सर्वाधिष्ठान ब्रह्मको अनिर्वचनीय तथा प्रकृतिविशिष्ट रूपको ईश्वर बतलाया है। प्रकृतिके सूक्ष्म कार्य समष्टि सप्तदशतत्त्वात्मक लिङ्गशरीरसे विशिष्ट उसी ईश्वरको हिरण्यगर्भ बतलाया है और समष्टि स्थूलशरीर एवं स्थूलप्रपञ्चविशिष्ट उसी हिरण्यगर्भको विराट् कहा है। ईश्वर, हिरण्यगर्भ, विराट्— तीनो ही ईश्वरके ही रूप हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरोसे विशिष्ट ब्रह्म ही तीनो रूपमें व्यक्त होता है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों प्रपञ्च और उसका प्रत्येक अंश ईश्वर ही है। ईश्वररूपसे आराधना करनेपर इसीलिये निम्ब, पिप्पल, पाषाणादि भी फलप्रद होते हैं। अस्ति, भाति, प्रिय, नाम, रूप यह पाँच रूप सर्वत्र उप- लब्ध होते हैं। नाम, रूप मायाके अंश हैं और शेष—अस्ति, भाति, प्रिय— तीनों ब्रह्मके ही रूप हैं।

जंगली लोगोंकी विचारधाराओका यह निष्कर्ष नही कि 'प्रेततत्त्व, जादूविद्या, अनेकेश्वरवाद, एकेश्वरवाद मनुष्यकी चिन्ताधाराके विभागकी सीढ़ियाँ हैं और अध्यात्मवादका मूल भीरुतामय प्रेतकल्पना ही है।' उसका निष्कर्ष तो यह है कि ईश्वरसे निहित ऋषियो, महर्षियोके उच्च स्तरका ब्रह्मविज्ञान, आत्मविज्ञानका ही विकृत अवशेष जंगलियोंमें मिलता है। उच्चकोटिका ब्रह्मविज्ञान, आत्म- विज्ञान कालक्रमसे लुप्त हो गया। सदिच्छा, सत्सङ्ग लुप्त हो जानेसे उदात्त विचार नष्ट हो गये। निम्नश्रेणीकी प्रेतविद्या, जादूगरी आदिके भाव रह गये। अतः उस आधारपर चलनेसे भ्रम ही बढ़ेगा।

नवम परिच्छेद मार्क्सीय समाज-व्यवस्था मार्क्सके अनुसार 'समाज' व्यक्तियो और परिवारोका समूह है। समाजकी व्यवस्थामे आनेवाला कोई भी परिवर्तन व्यक्तियो और परिवारोपर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकता। परिवार-स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध समाजका केन्द्र है। समाजकी आर्थिक अवस्था मनुष्योंको जिस अवस्थामे रहनेके लिये मजबूर करती है, उसी ढंगपर मनुष्य परिवारको बना लेता है। कुछ देशोंमें बहुत बड़े-बड़े सम्मिलित परिवार होते हैं और कुछ देशोंमें छोटे छोटे। कहीं परिवार पिताके वंशसे होते हैं और कहीं माताके वंशसे। स्त्री समाजकी उत्पत्तिका स्रोत है। इसके साथ ही वह कई तरहसे पुरुषसे शारीरिकरूपसे कमजोर भी है। इन सब बातोका प्रभाव समाजमें स्त्रीकी स्थितिपर पडता है। 'समाज जब बिल्कुल आदि अवस्थामें था और मनुष्य जंगलोंमे घूम-फिरकर जंगली फलो और शिकारसे पेट भर लिया करते थे, या जब वे खेती और पशु- पालनद्वारा अपना निर्वाह करते थे, उस समय कबीलोमें भूमिके भाग या इस प्रकारकी दूसरी चीजोके लिये लड़ाइयाँ होती रहती थीं। इन लडाइयोमें शारीरिक- रूपसे स्त्रीके कमजोर होनेके कारण उसका अधिक महत्त्व नहीं था। इसके अलावा स्त्रीको लड़ाई लडनेके लिये आगे भेजना खतरेसे खाली न था। क्योकि स्त्रियोके लड़ाईमें मारे जाने या उनके कैदी होकर शत्रुके हाथमें पड़नेसे कबीलोंमें पैदा होनेवाले पुरुषोकी संख्यामें घाटा पड़ जाता था और कबीला कमजोर हो जाता था। इसलिये स्त्रियोंको लड़ाईमें पीछे रखा जाने लगा; बल्कि सम्पत्तिकी दूमरी वस्तुओकी तरह उनकी भी रक्षा की जाने लगी। सम्पत्तिकी ही तरह उनका उपयोग भी किया जाता था। उस समय साधनोंका विकास न हो सकनेके कारण पैदावारके कामोंमें विशेष परिश्रम करना पडता था; क्योकि स्त्रीकी अपेक्षा पुरुष पैदावारके कठिन कामको अधिक अच्छी तरह कर सकता था, इसलिये स्त्रीको पुरुषकी प्रधानता मानकर उसकी सम्पत्ति बन जाना पड़ा। उस समय वैयक्तिक सम्पत्तिका चलन था, इसलिये स्त्री सम्पूर्ण कबीले या परिवारकी साझी सम्पत्ति थी। "जब विकाससे वैयक्तिक सम्पत्तिका काल आया तो स्त्री भी पुरुषकी वैयक्तिक सम्पत्ति बन गयी, जिसका काम पुरुषके घरेलू कामोंको करना और उसके लिये संतानके रूपमें उत्तराधिकारी पैदा करना था। परंतु स्त्री दूसरे घरेलू पशुओके ही समान उपयोगकी वस्तु न बन सकी। पुरुषके समान ही उसका भी विकास होनेके कारण या कहिये उसके भी पुरुषके समान ही मनुष्य होनेके कारण, पुरुषकी सम्पत्तिमें ठीक पुरुषके बाद उसका दर्जा मुकर्रर हुआ। आलंकारिक भाषामें इसे यों कहा गया कि वैयक्तिक सम्पत्ति या परिवारके राजमें पुरुष राजा है तो स्त्री मन्त्री। मनुष्य-जीवके विकासके नाते स्त्री और पुरुषमें कुछ भी अन्तर नहीं। मनुष्य समाजकी रक्षाके लिये वे दोनों एक समान आवश्यक ह। पुरुष यदि

शारीरिक बलमें या मस्तिष्कके कामोंमें अधिक सफलता प्राप्त कर सकता है, तो स्त्रीका महत्त्व पुरुषको उत्पन्न करनेमे कम नही है। पुरुष-समाजका जीवन स्त्री के बिना सम्भव नहीं, इसलिये पुरुषकी सम्पत्ति होकर भी स्त्री पुरुषके बराबर ही आसनपर बैठती रही है। "मार्क्सवादमें स्त्री-पुरुष-सदाचारका चाहे कितनी भी लीपा-पोतीके साथ महत्त्व गाया जाय, परन्तु यह प्रश्न प्रमुखरूपसे बना ही रहेगा कि 'क्या एक गिलास पानीके लिये गलेमें बाल्टी बाँधकर घूमते रहें ? कहीं भी गिलासभर पानी मिल सकता है।' व्यक्ति एव परिवारका समूह ही समाज है और स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध परिवार और समाजका केन्द्र है। समाजमें सम्पत्ति-विपत्तिका कारण बहुत प्रकारके रद्दोबदल होते रहते हैं, फिर भी बहुत-से धार्मिक-सामाजिक नियम प्राकृतिक नियमो- के समान सुस्थिर होते हैं।" मार्क्सवादियोंकी ऐतिहासिक कल्पनाएँ सर्वथा निराधार है। जगत्-प्रपञ्च निरीश्वर नहीं है। सर्वज्ञ ईश्वरकी सृष्टि लावारिस एवं निर्विवेक भी नही थी। आदिम कालके ब्रह्मा, वशिष्ठ, अत्रि, अङ्गिरा, भृगु, बृहस्पति, शुक्र आदि आधु- निक लोगोंकी अपेक्षा कही अधिक बुद्धिमान् और बलवान् थे। स्वार्थ मूलक सघर्ष जैसे आज चलता है, वैसे ही कभी पहले भी चलता था। कठिन अवसरोंपर स्त्रियाँ भी लडाईमें शामिल होती थीं। इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है दुर्गाके अनेक अवतारों—महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि द्वारा मधुकैटभ, महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ, चण्ड, मुण्ड, धूम्रलोचनादि दानवोंका सहार। पत्नी- रूपमें नारी पुरुषकी भोग्या है, परन्तु माताके रूपमें वही पुत्रकी पूज्या है। शृङ्गार- रसके लिये नारी कोमलाङ्गी है, परंतु प्रचण्ड दैत्य-दर्प-दलनमें वही भीषण कराल कालिका है। भगवतीकी यह गर्जना मार्क्सवादियोने कभी नहीं सुनी कि जो मुझे सग्राममे जीत ले, जो मेरा दर्प दूर कर सके और जो मेरे समान बलवान् हो, वही मेरा भर्त्ता हो सकता है—'यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति । यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ॥' (दुर्गासप्त० ५। १२०) नारी सदासे ही शक्तिकी प्रतीक रही है और पुरुष शिवका प्रतीक रहा है। उसका ही रामके साथ सीतारूपमें, विष्णुके साथ लक्ष्मीरूपमें, ब्रह्माके साथ सरस्वतीरूपमें और कृष्णके साथ राधा, रुक्मिणीके रूपमे आदर होता रहा है। वह रणाङ्गणमे प्रचण्डरूप धारिणी होने- पर भी शिवके विश्राम एवं विनोदके लिये 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' की प्रतिमा बन- कर परम कोमलाङ्गी एवं रक्षिणीरूपमें व्यक्त होती थी। वह साझेकी सम्पत्ति कभी नहीं रही। वह सदा ही गृहस्वामिनी एवं गृहलक्ष्मी रही है। द्रौपदी, मारिषाका उदाहरण विशेष वर-शापमूलक अपवादस्वरूप घटनाएँ हैं। वे आचारमें प्रमाण नहीं हैं। आचारमे उदाहरणका आदर न होकर विधि (कॉस्टि-

ट्यूशन ) का ही आदर होता है। उसके उदाहरण सती, सीता, सावित्री, दमयन्ती, अरुन्धती, अनसूया, लोपामुद्रा, शाण्डिली आदि पतिव्रताएँ हैं। क्वचित् स्त्रियोंके अनावृत होनेकी कहानियाँ अनादि, अपौरुषेय, समस्त पुदोष-शङ्का-कलङ्कशून्य शास्त्रोंके विरुद्ध होनेसे सर्वथा तात्पर्यशून्य है । अपवादभूत विपत्कालिक नियोग-प्रवर्त्तनकी पशु-तुल्य प्रवृत्तियोंका समर्थन ही उन मिथ्यार्थ-बोधक अर्थवादों- का उद्देश्य था। मन्वादिकोंने पतिके मरनेपर भी पत्यन्तरवरणका वर्जन किया है और नियोग आदिको वेन-राज्यका विगर्हित पशुधर्म बतलाया है।

पूँजीवादी युग और स्त्री

मार्क्सवादी कहते हैं—'औद्योगिक युग आनेपर जब सम्मिलित परिवार आर्थिक कारणोंसे बिखर गये, जब पुरुषोंको प्रत्येक नगरमें जीवन-निर्वाहके लिये भटकना पड़ा, उस समय सम्पूर्ण परिवारको साथ लिये फिरना सम्भव न था। इसके साथ ही पैदावारके साधन, मशीनोंका विकास हो जानेसे ऐसे हो गये कि उनमें कठोर शारीरिक परिश्रमकी जरूरत कम पड़ने लगी और स्त्रियाँ भी उन कामोको करने लगीं। बहुधा ऐसा भी हुआ कि जीवनके लिये उपयोगी पदार्थोंकी संख्या बढ़ जानेसे, जिसे दूसरे शब्दोंमें यों भी कहा जा सकता है कि जीवनका दर्जा (Standard of living) ऊँचा हो जानेसे अकेले पुरुषकी कमाई उसके परिवारके लिये काफी न थी, तब स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर मजदूरी करने लगे और घरका खर्च चलाने लगे। इन अवस्थाओंमें पुरुषका स्त्रीपर वह कब्जा न रहा जो कृषि और घरेलू-उद्योग- धंधोंकी प्रधानताके जमानेमें था। ऊपर जिस ऐतिहासिक विकासका जिक्र हम करते आ रहे हैं, वह औद्योगिक विकासके साथ हुआ और चूँकि यह विकास यूरोपमें अधिक तेजीसे हुआ, इसलिये वही लोगोंने इसे अधिक उग्ररूपमें अनुभव भी किया। इस विकासका प्रभाव समाजके रहन-सहनके ढंगपर पड़नेसे स्त्रियोंकी अवस्थापर भी पड़ा। स्त्रियोंकी स्थिति पुरुषोंके बराबर होने लगी। उन्हें भी पुरुषोंके समान ही सामाजिक और राजनैतिक अधिकार मिलने लगे, परंतु वैयक्तिक सम्पत्तिकी प्रथा जारी रही, क्योंकि वह पूँजीवादके लिये आवश्यक थी। परिणाम स्वरूप स्त्रीके एक पुरुषसे बँधे रहनेका नियम भी जारी रहा। अब स्त्रीको पुरुषका दास न कहकर उसका साथी कहा गया, जिसे यह उपदेश दिया गया कि परिवारकी रक्षाके लिये उसे एक पुरुषके सिवा और किसी तरफ न देखना चाहिये। मौजूदा पूँजीवादी-प्रणालीमें स्त्रीकी स्थिति इसी नियमपर है। "फिर भी आर्थिक दृष्टिकोणसे जीवनके उपायोंको प्राप्त करनेके लिये स्त्री पुरुषके आधीन रही; क्योंकि परिवारके हितके ख्यालसे पुरुषने स्त्रीको अपने वशमे रखना आवश्यक समझा। जबतक समाज भूमिकी उपजसे या घरेलू

५७२ मार्क्सवाद और रामराज्य

धंधोंसे अपने जीवन-निर्वाहके साधन प्राप्त करता रहा, स्त्रीकी अवस्था परिवार और समाजमें ऐसी ही रही । क्योकि स्त्रीकी खोपड़ीमें भी पुरुषकी तरह सोचने- विचारने और उपाय ढूँढ निकालनेकी सामर्थ्य है, अतः पुरुष उसे गलेमें रस्सी बाँधकर नहीं रख सका । समाजने अपने कल्याण और हितके विचारसे स्त्रीको भी पुरुषकी तरह ही जिम्मेदार ठहराया; लेकिन स्त्रीके व्यवहारपर ऐसे प्रतिबन्ध लगाये गये जो कि सम्पत्तिके आधारपर बने परिवारकी रक्षाके लिये आवश्यक थे । उदाहरणतः स्त्रीका एक समय एक ही पुरुषसे सम्बन्ध रखना ताकि उसके दो व्यक्तियोकी सम्पत्ति बननेसे झगड़ा न उठे । पुरुषकी संतानके बारेमें झगड़ा न उठे कि संतान किसकी है, कौन पुरुष उस संतानको अपनी सम्पत्ति देगा ? यह सब ऐसे झगड़े थे जिनके कारण परिवारोंका नाश हो जाता । इसलिये स्त्रियोंके आचरणके बारेमें ऐसे नियम बनाये गये कि झगड़े उत्पन्न न हो । पतिव्रताधर्म- अर्थात् एक पुरुषसे सम्बन्ध रखनेको स्त्रीके लिये सबसे बड़ा धर्म बताया गया ताकि व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारपर बना हुआ समाज तहस-नहस न हो जाय । जैसा कि ऊपर बताया गया है, स्त्री बुद्धिकी दृष्टिसे मनुष्यके समान ही सामर्थ्यवान् है, इसलिये पशुओकी तरह उसके गलेमे रस्सी बाँध देनेसे काम नहीं चल सकता था । उसे समझाकर और विश्वास दिलाकर समाजमें मुख्य 'पुरुष' के हितके अनुसार चलानेकी जरूरत थी । इस कारण पुरुष और समाजके हाथमें जितने भी ऐसे साधन धर्म, नीति, रिवाज आदिके रूपमें थे, उन सबसे स्त्रीको पुरुषके आधीन होकर चलनेकी शिक्षा दी गयी । उसे समझाया गया, यहाँ चाहे वह पुरुषका मुकाबला भले ही कर ले, परंतु बादमें उसे पछताना पड़ेगा, क्योकि उसकी स्वतन्त्रतासे भगवान् और धर्म नाराज होते हैं ।" वैयक्तिक सम्पत्तिके सम्बन्धकी भी मार्क्सीय प्रथा अप्रामाणिक है । ईश्वरकी सृष्टि उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति ही थी, उसीसे उत्तराधिकार रूपमें वह उसकी संतानभूत विभिन्न प्राणियोको मिली । जिस तरह आज अखण्ड भूमण्डलमे कोई भी पर्वत, वृक्ष, नदी, क्षेत्र, ग्राम, नगर बिना मालिकके नहीं हैं, उसी तरह संसारका कोई भी अंश कभी भी बिना मालिकके नहीं था । हॉब्स या लॉकके मतानुसार निरीश्वर राज्य कभी भी नहीं था और केवल किसी व्यक्तिके द्वारा सीमाकी एक रेखामात्र बना देनेसे ही कोई भूमि उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं बन गयी और न तो रिकार्डोके अनुसार कुछ श्रममिश्रित हो जाने मात्रसे वस्तुओपर व्यक्तिगत स्वत्वका जन्म ही हुआ । किंतु मुख्यरूपसे दायसे और फिर जय, क्रय, दान, पुरस्कारादि रूपमें ही भूमि-सम्पत्ति आदिपर व्यक्तिगत अधिकार हुए हैं। अपने-अपने कर्मोंसे सुख- दुःख एवं तत्तत्साधनोंका व्यक्तिगत सम्बन्ध हुआ है । कर्मोंके ही तारतम्यसे साधनोंकी भी तारतम्यरूपसे प्राप्ति होती है । कन्यापर उसके माता-पिताका स्वत्व रहता है । पिता जिसे देता है, वही कन्याका पति होता है । माता-पिताके न

रहनेपर भाड़े आदिका उसपर स्वत्व होता है। वे जिसे देते हैं, वही उसका पति होता है। कन्याका भी अपनेपर स्वत्व होता है। अतः वह स्वयं भी जिसे आत्म- समर्पण करती है, वह उसका पति होता है। कन्या ऐसी वस्तु नहीं है कि जो भी चाहे उसे अपना ले या साझेदारीकी चीज बना ले। स्त्रीसम्बन्धकी मार्क्सीय ऐतिहासिक धारणा अत्यन्त भ्रमपूर्ण है। मनुकी दृष्टिसे तो जहाँ नारीकी पूजा होती है, वहाँ देवता एवं सभी सद्गुण रमते हैं, और जहाँ उसकी पूजा नहीं होती वहाँ सब क्रियाएँ निष्फल होती हैं— यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ (मनु० ३।५६) पुरुष सदासे ही नारीको मातारूपमें पूज्य एवं मार्गदर्शक मानता रहा है। पत्नीरूपमें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय एवं हृदयेश्वरी बनाकर उसे अपना सर्वस्व समर्पण करके उसके रक्षण, पोषणके लिये, भूषण-आभरण जुटानेके लिये दिन- रात परिश्रम करता रहा है। इतना ही नहीं—नारीके इशारेपर ही पुरुष सब काम करता रहा है। प्रेमसे ही पुरुष स्त्रीको वशीभूत रखता था, प्रेमसे ही स्त्री भी पुरुषको अपने इशारेपर नचाती रही है। किन्हीं धार्मिक, आध्यात्मिक संस्कारशून्य जंगली प्रदेशके लोगोंमें स्त्रीको गलेमें रस्सी बाँधकर रखनेकी प्रथा हो सकती है, पर वह भारतमें नहीं रही। स्त्रीका एक ही पुरुषके साथ सम्बन्ध शुद्ध धर्ममूलक ही है, धर्म-नियन्त्रित स्नेह एवं अर्थ-व्यवस्था उसका आनुषङ्गिक फल है। यह पहले कहा जा चुका है कि पशुओंकी अपेक्षा मनुष्योंकी मनुष्यता एवं विशेषता ही यह है कि मनुष्य प्रत्यक्षानुमानसे अतिरिक्त आगम-प्रमाण भी मानता है और तदनुकूल वह धार्मिक होता है। धर्ममूलक ही उनमें पति-पत्नीका धार्मिक सम्बन्ध होता है। पति-पत्नीके असाधारण सम्बन्धसे ही पत्नी, पुत्री, भगिनी, माता आदिकी असाधारण व्यवस्था होती है। तदनुकूल ही उत्तराधिकारकी व्यवस्था भी चलती है। इसीलिये आस्तिकोंका कहना है कि प्रत्यक्षानुमानाश्रित मति जहाँतक दौड़ती है, वहाँतक ही चलनेवाले वानर आदि पशु होते हैं और प्रत्यक्षानुमानातिरिक्त आगमके अनुसार धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक व्यवस्था करके चलनेवाले लोग ही नर अर्थात् मानव होते हैं— मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः । शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नराः ॥ (तन्त्रवार्तिक) पातिव्रत-धर्म मार्क्सके अनुसार 'पातिव्रत धर्म' केवल व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारपर ही बना है। व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारपर बना हुआ समाज तहस-नहस न हो जाय, इसीलिये एक ही पुरुषके साथ सम्बन्ध रखनेके लिये स्त्रीको बाध्य-

५७४ मार्क्सवाद और रामराज्य बुझाकर राजी किया गया। तदनुसार ही धर्म, नीति, रिवाज गढ़े गये। स्त्रीकी स्वतन्त्रतासे धर्म और भगवान्‌के नाराज होनेका डर दिखलाया गया।' ठीक ही है, जड़वादी मार्क्ससे इसके सिवा और अधिककी आशा भी क्या की जा सकती थी ? जिसकी दृष्टिमे विश्वका कारण सर्वज्ञ ईश्वर ही नहीं जँचता, जो भूत-प्रेतकी कल्पनाको ही परिष्कृतरूपमें ईश्वर-कल्पना समझता है, जिसके अनुसार धर्म-कल्पना भीरु मस्तिष्कका फितूरमात्र है, वह सीता, सावित्री आदिके परम गम्भीर पातिव्रत-धर्मको कैसे समझ सकता था ? अनसूयाद्वारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रको पातिव्रतवलसे तीन महीनेके बालक बनाया जाना, सावित्रीका यमराजसे अपने मृत पतिको पुनः प्राप्त कर लेना, शाण्डिलीका सूर्यनारायणके उदयपर प्रतिबन्ध लगा देना आदि मार्क्सवादकी दृष्टिसे कोरी कल्पनाएँ ही ठहरेगी । आश्चर्य है कि परम सत्य आर्ष इतिहास मार्क्सवादियोकी दृष्टिमें झूठे हैं, परंतु निराधार बंदरसे मनुष्य उत्पन्न होनेका विकासवादी इतिहास सत्य है ! भारतमे अभी-अभी हालहीमे ५० वर्षोंके भीतर सैकड़ो सतियाँ हुई हैं। वे हँसती-हँसती चितापर अपने पतिके साथ परलोक चली गयीं । उत्तर- प्रदेश तथा राजस्थानमें तो कई सतियाँ बिना अग्निके ही अपने शरीरसे दिव्याग्नि प्रकट करके सती हुई हैं । चित्तौड़गढ़की पद्मिनी आदिके ऐतिहासिक सतीत्वसे कोई समझदार व्यक्ति आँख नहीं मूँद सकता । मार्क्सवादी सिवा अनर्गल प्रलापके इन बातोका क्या उत्तर दे सकते हैं ? स्पष्ट है कि जिन्हे धर्म, सभ्यता, संस्कृति, पातिव्रत मान्य है, ऐसे स्त्री-पुरुषोके लिये मार्क्सवाद धर्म एवं मानवताका शत्रु ही है । मार्क्सवादकी दृष्टिसे व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा उत्तराधिकारका सम्बन्ध तो अब समाप्त हो गया; क्योकि मार्क्सवादी दृष्टिकोणसे भूमि एवं सम्पत्तिका उत्तराधिकार-नियम समाप्त करके सबका राष्ट्रियकरण या समाजीकरण होना ही उचित है। जब व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा उत्तराधिकारकी प्रथा समाप्त हुई, तब फिर तदर्थ स्त्रीका एक पुरुषसे सम्बन्धवाला नियम क्यो रहेगा ? सम्बन्धित पतिके मरनेके बाद ही नहीं, अपितु एक साथ ही स्त्री यदि सैकड़ो पुरुषोसे सम्बन्ध रखे तो भी कोई आपत्ति नही। जैसे एक पानीभरी बाल्टीसे अनेक व्यक्ति प्यास बुझा सकते हैं, वैसे ही एक स्त्रीसे भी यदि असंख्य पुरुष प्यास बुझा लें तो भी कोई हर्ज नहीं है । लेनिनके शब्दोमें 'गदी नालीके जलसे प्यास बुझाना ठीक नहीं; किंतु जैसे स्वास्थ्यकर, तृप्तिकर स्वच्छ जलसे ही प्यास बुझाना उचित है, वैसे ही तृप्तिकर, स्वास्थ्यवर्द्धक स्त्री-पुरुष-सम्बन्धमें कोई भी हानि नहीं है। और अब तो गर्भपात करानेकी स्वाधीनता भी रूसमें मिल गयी है । 'पुरुष-समाजके हाथमे ही धर्म, नीति, रिवाज सब कुछ था,

इसलिये पुरुषने स्त्रीको स्वाधीन बनानेका प्रयत्न किया, मार्क्सवादियोंका यह कथन भी दुरभिसन्धिपूर्ण है । मार्क्सवादी अधिकार पाकर जैसे दूसरोंको सदाके लिये कुचल देना चाहते हैं, महर्षियों तथा ईश्वरके सम्बन्धमे भी उनकी वैसी ही धारणा होती है । उनके मस्तिष्कमे अब्भक्ष, वायुभक्ष, परम निष्काम लोककल्याण-परायण महर्षियोंमें भी पक्षपात ही प्रतीत होता है । परंतु मार्क्सवादियोंकी यह धारणा सङ्गत नहीं है। धर्मबुद्धिसे शिष्य जैसे स्वेच्छापूर्वक गुरुका अनुसरण ( दास्य ) करनेमें लज्जित नहीं होता, पुत्र जैसे माता-पिताका दास्य करनेमे नहीं हिचकता, वैसे ही स्त्री भी अपने पति एव सास-ससुरका दास्य या सेवन एव अनुसरण करनेमें लज्जित नहीं होती । जबतक धर्मबुद्धि रहेगी, वहाँ यह भाव भी पहलेके समान ही जारी रहेगा । इसपर सम्पत्ति- विपत्तिका असर नहीं पड़ता है, बल्कि आपत्तिकालमें तो धीरज, धर्म, मित्र एव नारीकी विशेषरूपसे परीक्षा होती है- 'धीरज धर्म मित्र अरु नारी । आपद् काल परखिये चारी।' रामराज्य-जैसी धन सम्पदा, ऐश्वर्य-वैभवमें भी स्त्री-पुरुष अपने पूज्यो, गुरुजनोंके प्रति दास्यभाव ही रखते थे- 'दासवत् संनतार्याङ्घ्रि.' ( भागवत ७। ४। ३२) । प्रह्लाद गुरुजनोंके चरणोंमें सदा दासतुल्य विनत रहते थे । धन एव सम्पत्तिकी वृद्धि खलोंको ही घमंडी एव उद्दण्ड बनाती है, सत्पुरुषोंको नही । इसीलिये औद्योगिक समृद्धिके युगमे भी सन्नारियोंके शील- स्वभावमें कोई अन्तर नहीं पडा । प्राचीन कालमें भी असत् स्त्री-पुरुष होते ही थे, वे उस कालमे भी उद्दण्ड ही थे, कोई किसीके नियन्त्रणमें नही रहता था । वैयक्तिक सम्पत्ति एव नर-नारीके धर्ममूलक सम्बन्ध शाश्वतिक हैं । जडवाद एव नास्तिकताके प्रचारसे कुछ थोड़ा-बहुत ह्रास होना सम्भव है, फिर भी इनका मिट सकना सम्भव नहीं । पुरुषकी अपेक्षा भी नारी-जाति श्रद्धालु है । वह अपने पतिसे भिन्न पुरुषको भ्राता, पिता, पुत्रकी ही दृष्टिसे देखना उचित समझती है, धर्महीन मनमाने यौन सम्बन्धको वह पाप ही समझती है । वेदोंकी नीतिमें तो मुख्य विशेषता ही यह थी कि देशमे कोई स्वैरी पुरुष भी नहीं होता था, फिर स्वैरिणी स्त्रीका तो होना सम्भव ही कैसे था - 'न स्वैरी स्वैरिणी कुतः' ( छान्दो० ५ । ११ । ५) । स्त्री सर्वदा ही लज्जाशील होती है, वह कभी भी अभि- योक्त्री नहीं होती । वेश्या भी अभियुक्ता होनेमें ही सुखका अनुभव करती है । पुरुष ही स्वैरी होकर स्त्रीको स्वैरिणी बनाता है । जहाँ पुरुष स्वैरी न होगा, वहाँ स्त्री भी स्वैरिणी नहीं हो सकती । स्त्री पुरुषकी हृदयेश्वरी है, प्राणेश्वरी है, आत्मा है, सब कुछ है । उसके हिस्से एव अधिकारकी बात जडवादी नास्तिकोंके द्वारा ही उठायी जाती है । स्त्रीको पुरुषके बराबर बनानेका प्रयत्न करना उसका अपमान करना है, उसको हजारगुना नीचे उतारना है । शास्त्रोने पितासे सहस्रगुना अधिक माताका सम्मान करना बतलाया है - 'सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते ।' ( मनु० २ । १४५ ) धार्मिक

दृष्टिसे चतुर्थाश्रमी यति सर्ववन्द्य है। गृहस्थ पिता भी पुत्र सन्यासीका वन्दन करता है, परंतु उस सन्यासीको धर्मानुसार मातृवन्दन विहित है—'सर्ववन्द्येन यतिना प्रसूर्वन्द्या प्रयत्नतः।' (स्कं० पु० काशी० ११।५०) इस तरह माताको कुछ अधिकार प्रदान करना, क्या उसके सर्वाधिकारको सीमित करना नहीं है ? किसी भी उपासना एवं साधनामें शिष्यको जैसे अपनी आत्मा गुरुकी आत्मामे मिलानी पड़ती है, गुरुकी इच्छामें शिष्यको अपनी इच्छा विलीन कर देनी पड़ती है, वैसे ही पत्नीको अपनी आत्मा, अपनी इच्छा पतिकी आत्मा तथा इच्छामे मिलानी पड़ती है । पतिद्वारा किये हुए सत्कर्मों तथा आराधनाओमें पत्नीका भाग रहता है। पाश्चात्त्य राजतन्त्रने जडवादकी धुनमें ईश्वर एव धर्मसे नाता तोड़ लिया, फिर पूँजीपतियोने राजतन्त्रको भी समाप्त कर दिया। जहाँ ईश्वर एव धर्मका राजतन्त्रपर नियन्त्रण नहीं, वहाँ सामाजिक बन्धनोका ढीला पड़ना स्वाभाविक है । पाश्चात्त्य शिक्षाका प्रभाव भारतपर अवश्य ही पड़ रहा है। इतना ही क्यो, भारतकी परिस्थिति तो अन्य देशोकी अपेक्षा भी बदतर होती जा रही है। सर्वप्रथम औद्योगिक विकास जिस इंग्लैंडमे हुआ था, वहाँके सर्वप्रथम एव सर्वोत्कृष्ट नागरिक राज्य-सिंहासनाधीश तथा उसके परिवारके सिंहासन-सम्बन्धित व्यक्तियोके लिये अभी भी पर्याप्त धार्मिक नियन्त्रण अधिक है। उन्हे तलाक देने- वाले स्त्री-पुरुषके साथ शादी करनेकी मनाही है। तलाक दी हुई स्त्रीके साथ शादी करनेके लिये अष्टम एडवर्डको राजगद्दी छोड़नी पड़ी। वर्तमान रानीकी बहन कुमारी मार्गरेटको धार्मिक नियन्त्रणके कारण अपने प्रेमीसे शादीका निश्चय छोड़ना पडा । वहाँ 'बाइबिल'के अनुसार पति-पत्नीका सम्बन्ध-विच्छेद ईश्वरीय नियमके विरुद्ध एवं पाप कहा गया है । परंतु जडवादसे प्रभावित, समाजवाद- का अन्धानुकरण करनेवाली भारतसरकार तलाकका नियम बनाकर स्त्रियोको स्वाधीन करनेके नामपर उनका सर्वनाश कर रही है। घटना अवश्य समाजवादियो- के अनुसार घट रही है, परंतु यह घटना कॉलरा और प्लेगके समान अनिष्ट ही है, इष्ट नहीं । मार्क्सवादी-वर्णित स्त्रीसमाजकी दुर्दशाका मूल कारण धर्माविमुखता ही है, इसीसे बरक्कतमें भी कमी हुई। पहले घरमें एक व्यक्ति कमाता था, उससे घरभरका काम चलता था । आज पुरुष कमाता है, स्त्री कमाती है और बच्चे भी कमाते है, तब भी परिवारका पेट नहीं भरता। प्राचीन कालमें यथोचित वयमें कन्याओंका विवाह हो जाता था, स्त्रीको अनाथकी तरह भटकनेकी नौबत नहीं आती थी । अविवाहित दशामें प्रसवकालका, अनाथ-अवस्थाका उसेकोई अनुभव नहीं करना पड़ता था। मार्क्सवादी उत्तरोत्तर प्रगतिकी कल्पनाका स्वप्न देख रहे हैं, परंतु स्थिति यह दिखायी देती है, कि समाजका उत्तरोत्तर अधिक पतन होता जा रहा है। स्त्रीसमाजकी दीनदशा उत्तरोत्तर बढ रही है। स्वतन्त्रताके नामपर तलाक-प्रथाके विस्तार होनेका परिणाम भीषण होगा। अल्पवयस्क लडकी भले ही तलाक देकर

अपनी दूसरी शादी कर पाये, परन्तु वही जब चार बच्चोंकी माँ हो चुकी होगी, उसका यौवन ढल गया होगा और सुन्दरता समाप्त हो गयी होगी, तब उसे यदि तलाक मिल गया तो उस अवस्थामें उसकी पुनः शादी होनी मुश्किल हो जायगी। उस दशामें वह औरत क्या स्वयं खायेगी और क्या बच्चोंको खिलायेगी? उस समय वह खूनके आँसू बहाती हुई भारतको नरककुण्ड बनायेगी। धर्महीन क्या पूँजीवाद, क्या समाजवाद, सर्वत्र ही स्त्री समाजकी दुर्गति ध्रुव है। रामराज्य-प्रणालीमें बाल्यावस्थामें ही लडकियोंकी शादी हो जायगी। प्रत्येक कुटुम्ब एवं नागरिककी बेकारी, बेरोजगारी दूर करके सबका ही जीवनस्तर उन्नत बनाया जायगा। रामराज्यके अनुसार स्त्रियाँ गृह-लक्ष्मी, घरकी रानी होंगी, उन्हें नौकरानी बननेकी आवश्यकता ही न रहेगी। पुरुषोंका काम घरके बाहर होगा और स्त्रियोंका काम घरके भीतर। वैसे किसी खास अवसरपर उनकी बाहर आवश्यकता अपवादरूपमें ही होगी। सीता सदा गृहके भीतर रहती हुई भी शतमुख रावणका दर्प दलन करनेके लिये रणचण्डीका रूप धारण कर पुष्कर द्वीप गयी थीं। (अद्भु० रामा० १७। २४) इसी वोटिस्न हॉडी और झाँसीकी रानी आदिका उदाहरण है। विवाह कर परिवार- पालन करनेके उदात्त कर्तव्यको झगडा या झंझट समझनेकी प्रवृत्ति जडवादी उच्छृङ्खलपथियोंकी ही प्रेरणा है। स्त्री और पुरुष सभी यदि नौकर-नौकरानी बनेंगे, तो उनकी संतानें भी अवश्य ही नौकर मनोवृत्तिकी ही बनेंगी। माताका दुग्ध न पाकर, जननीका लाड-प्यार, लालन-पालन न पाकर, डिब्बोंके दूध पीने- वाले बच्चे निम्न श्रेणीके ही होंगे। माता-पिताका भी बच्चोंमें कोई प्रेम न होगा; बच्चोंका भी माँ-बापके प्रति कुछ आकर्षण-अनुराग न होगा। पति-पत्नीका भी परस्पर स्थायी प्रेम न होनेसे किसी भी सम्बन्धकी स्थिरता न होगी। सभी सम्बन्ध वासना-तृप्ति और पैसेके कारण होंगे। विवाह और तलाककी अबाध परम्परा चलती ही रहेगी।

अर्थमूलक समाजमें सामाजिक सम्बन्ध

मार्क्सवादी सभी सम्बन्धोंकी धार्मिकता एवं परम्परामूलकताका नष्ट हो जाना आवश्यक मानते हैं। उनकी दृष्टिमें सब सम्बन्ध जब अर्थमूलक हो जायेंगे, तब पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-बहन, शिक्षक-शिष्यका अर्थमूलक सीधा संघर्ष हो सकेगा। किसी परम्पराकी ओटमें संघर्षके कारणको छिपाया न जा सकेगा। सीधा संघर्ष क्रान्तिके अनुकूल ही होगा। परन्तु जिन्हें कुटुम्ब, समाज, धर्म, कर्म, सभ्यता, संस्कृति, भक्ति, प्रेम एवं आध्यात्मिक उन्नति अभीष्ट है, उनके लिये तो ये बाते गुण नहीं, अपितु कॉलरा एवं प्लेगके समान एक रोग ही होंगी। रामराज्य-प्रणालीमें स्त्रियोंकी यह दुर्दशा किसीको स्वप्नमें भी नहीं देखनी पड़ेगी। जैसे लता, वल्लरी आदि वृक्षाश्रित रहकर ही पनपती, फलती-फूलती मा० रा० ३७-

५७८ मार्क्सवाद और रामराज्य

हैं, उन्हें यदि अपने ही पैरों खड़ा करनेका प्रयत्न किया जाय तो भी वे वृक्षके समान सीधी खड़ी नहीं हो सकती हैं, पृथ्वीपर ही वे फैलती हैं और फिर उन्हें शतशः पादप्रहारकी भागिनी बनना पड़ता है, वैसी ही स्त्रियोंकी भी स्थिति है। उन्हें स्वतन्त्रताका पाठ पढ़ाकर ही पाश्चात्त्य जगत्ने भीषण दुर्दशातक पहुँचा दिया है। यह तो सभीको मानना पड़ता है कि अनेक अंशोंमें स्त्रीसमाज तथा पुरुषसमाजमें समानता होते हुए भी अनेक अंशोंमें भिन्नता भी है। स्त्रियोंमें जितनी कोमलता, सुन्दरता और विश्रान्तहेतुता है उतनी पुरुषोंमें नहीं है। वह गर्भ-धारण करती है और शिशुका पालन-पोषण करती है, अतः उसे पुरुषका आश्रय अपेक्षित है। बुद्धि एवं मस्तिष्ककी विचक्षणता होते हुए भी उसमें श्रद्धा एवं भक्तिका भी अंश अधिक होता है। पुरुषके कठोर, परिश्रमपूर्ण एवं रूक्ष जीवनको इसीसे सरसता मिलती है। प्राचीन दार्शनिकोंका तो मत है कि जैसे अग्नि एवं दाहिकाशक्ति, जल एवं शीतलता, दुग्ध एवं उसकी स्वच्छता, बीज एवं उसकी अङ्कुरोत्पादिनी शक्तिका अविच्छेद्य सम्बन्ध है, वैसे ही पति-पत्नीका भी अविच्छेद्य सम्बन्ध है। शक्ति आधेय है और शक्तिमान् आधार। शक्तिके बिना शक्तिमान् अकिञ्चित्कर है। शिव जब शक्तिसे समन्वित होता है, तभी संसारका उत्पादन, पालन, संहरण कर सकता है, अन्यथा शक्तिके बिना देव शिव हिल-डुल भी नहीं सकता—'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम् । न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥' (सौन्दर्यल० १) विश्व-निर्माण जैसे महाकार्य- निर्माणकी बात तो दूर रही, शक्तिमान्‌से शक्तिके पृथक् करनेसे दोनोंकी ही दुर्गति होती है। इसीलिये भारतीय सभ्यतामें शक्तिसहित ही शक्तिमान्‌की आराधना होती है। अतएव मन्दिरोंमें गौरी-शंकर, लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, राधा कृष्ण, शक्ति- शक्तिमान् दोनोंकी आराधना चलती है। अभ्यर्हित होनेसे, पिताकी अपेक्षा भी माताके सहस्रगुणिन अधिक पूज्य होनेके कारण ही नाममें पहले गौरी और पीछे शंकरका, पहले लक्ष्मी और पश्चात् नारायणका, प्रथम सीता एवं राधाका तथा पश्चात् राम और कृष्णका उच्चारण होता है। राष्ट्ररूपी मन्दिरमें भी लक्ष्मी स्थानीय नीतिके सहित ही नारायण स्थानीय धर्मका सम्मान श्रेयस्कर होता है। धर्महीन नीति विधवा-तुल्य और नीतिहीन धर्म विधुर-तुल्य माना जाता है। व्यष्टिरूपमें दस वर्षपर्यन्तकी कुमारी नव-दुर्गारूपमे और सुवासिनी साक्षात् भगवतीके रूपमें पूजित होती है। साक्षात् परमेश्वर ही जैसे शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आदि रूपमे पूजित होता है, वैसे ही शक्तिप्रधान परमेश्वर ही दुर्गा, लक्ष्मी, सीता, राधा आदिके रूपमें पूजित होता है। अधार्मिक, जडवादी लोग ही स्त्रीको केवल भोगकी सामग्री समझकर उसका अपमान करते हैं और उसे विपज्जालमे डालते हैं तथा उसी पापके कारण वे स्वयं भी सर्वनाशके गर्तमें निपतित होते हैं।

स्वतन्त्रता, आत्मनिर्णयका अधिकार आदि मोहक नामोंसे स्त्रियोंको बरगला- कर अपना शिकार बनाना और उन्हें मजदूरी या वेश्यावृत्ति करनेके लिये निराश्रय एवं असहाय छोड़ देना उनके साथ घोर अन्याय करना है । पुरुष जब सहर्ष अपनी कमाई स्त्रियोंको खर्च करनेके लिये समर्पण करता है, तब उन्हें भी कमानेके काममें लगानेका अर्थ ही क्या है ? इसके अतिरिक्त गृहका कार्य भी कुछ कम नहीं है । यदि गृहिणी सुप्रबन्ध करनेवाली गृहलक्ष्मी न हो तो पुरुषके लाखो कमानेपर भी घरमें बरकत नहीं होती । मानव-जीवन और गृहको सरस एव माङ्गलिक बनानेवाली स्त्रीके सिरपर कमानेका भार न होना ही अच्छा है । स्त्री- द्वारा उत्पादित रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, प्रह्लाद, ध्रुव, शिवि, दिलीप, भगीरथ-जैसी एक भी सतान समष्टि व्यष्टि जगत्‌के लोक-परलोकका जीवन माङ्गलिक एव समुन्नत बना सकती है । उपयोगितावादी स्मिथ तो धर्म, संस्कृति, प्रेम, सौन्दर्य, कला, क्षमा, दया, त्याग आदि सभी उदात्त गुणोंमें उपयोगिता ही ढूँढता है । लोक- कल्याणार्थ अपने प्राणतकको बलिदान कर देनेमें स्मिथको कुछ भी उपयोगिता नहीं दिखायी दे सकती, परन्तु क्या इतनेसे ही यह त्याग व्यर्थ कहा जा सकता है ? ससारमें उपयोगिता ही सब कुछ नहीं है । माता, भगिनी, पुत्री, पत्नी- का महत्त्व उपयोगिताकी कसौटीपर नहीं परखा जा सकता । वर्गवाद मार्क्सके मतसे 'भारतमें औद्योगिक विकाससे होनेवाला परिवर्तन यूरोपके प्रभावसे देरमें आरम्भ हुआ बल्कि अभी शनैः-शनैः हो रहा है और पूरे रूपमें हो भी नही पाया, स्त्रियोंकी अवस्थामें भी परिवर्तन अभीतक यहाँ नहीं हो पाया है । जन- साधारण या जमींदार-श्रेणी और पूँजीपति-श्रेणीकी स्त्रियाँ इस देशमें अभीतक उसी अवस्थामें हैं, परन्तु मध्यम श्रेणीकी स्त्रियोंकी अवस्थामें - जिनपर आर्थिक परिवर्तनका प्रभाव गहरा पड़ा है, परिवर्तन तेजीसे आ रहा है । 'यूरोपमें जहाँ पूँजीवाद पूर्ण उन्नति कर चुकनेके बाद ठोकरें खाने लगा है, स्त्रियोंकी अवस्था पुरुषोंकी अपेक्षा जीवन-निर्वाहके सङ्घर्षमें कम योग्य होनेके कारण पुरुषोंसे भी गयी-बीती है । बेकारी और जीवन-निर्वाहकी तंगीके कारण लोग व्याह- कर परिवार पालनेके झगड़ेमें नहीं फँसना चाहते, इसलिये स्त्रियोंके लिये घर बैठकर बच्चे पालने और निर्वाहके लिये रोटी-कपड़ा पाते रहनेका भी मौका गया । अब उन्हे भी मिलो, कारखानों, खानो, खेतों और दफ्तरोंमें मजदूरी कर पेट पालना पड़ता है । यदि उनका विवाह हो जाता है तो माता बननेका उनका काम ज्यो- त्यों निभ जाता है और वे फिर मजदूरी करने चल देती हैं । यदि विवाह नहीं हुआ और शरीरकी स्वाभाविक प्रवृत्तिके कारण वे माता बन गयीं तो उनकी मुसीबत है । प्रसवकी अवस्थामें उनके निर्वाहका सवाल बहुत कठिन हो जाता है और प्रसवकालमें ही उन्हे सहायताकी अधिक आवश्यकता रहती है । प्रसवकालमें यदि

५८० मार्क्सवाद और रामराज्य वे कामपर नहीं जा सकतीं तो उनकी जीविका छूट जाती है और प्रसवकालके बाद जब उन्हें एकके बजाय दो जीवोकी जरूरतोको पूरा करना पड़ता है, तो वे बिना साधनके हो जाती हैं। इससे समाजमें उत्पन्न होनेवाली संतानके पोषण और अवस्था- पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह समझ लेना कठिन नहीं । 'स्त्रियोंकी इस अवस्थाके कारण देशकी जनताके स्वास्थ्यपर जो बुरा प्रभाव पड़ता है, उसके कारण अनेक पूँजीवादी सरकारने स्त्रियोंकी रक्षाके लिये मजदूरी- सम्बन्धी कुछ नियम बनाये हैं। जिनके अनुसार मिल-मालिकोको प्रसवके समय स्त्रियोंको बिना काम किये कुछ तनख्वाह देनी पड़ती है और बच्चा होनेपर मिलमें काम करते समय माँको बच्चेको दूध आदि पिलानेकी सुविधा भी देनी पड़ती है। इन कानूनी अड़चनोंसे बचनेके लिये मिलें प्रायः विवाहित स्त्रियोंको और खासकर बच्चेवाली स्त्रियोंको मिलमे नौकरी देना पसंद नहीं करतीं। यूरोपमें अस्सी या नब्बे प्रतिशत लड़कियाँ विवाहसे पहले किसी-न-किसी प्रकारकी मजदूरी या नौकरी कर अपना निर्वाह करती हैं या अपने परिवारको सहायता देती हैं, परंतु विवाह हो जानेपर उन्हें जीविका कमानेकी सुविधा नहीं रहती। इन कारणोंसे स्त्रियाँ विवाह न करने या विवाह करनेपर भी गर्भ हटा देनेके लिये मजबूर होती हैं। जीविकाका कोई उपाय न मिलनेपर उन्हे अपने शरीरको पुरुषोके क्षणिक आनन्दके लिये बेचकर अपना पेट भरनेके लिये मजबूर होना पडता है। 'वैयक्तिक सम्पत्तिके आधारपर कायम पूँजीवादी-समाजमें स्त्री व्यक्तिकी सम्पत्ति और मिल्कियतका केन्द्र होनेके कारण या तो पुरुषके आधिपत्यमें रहकर उसके वंशको चलाने, उसके उपयोग-भोगमें आनेकी वस्तु रहेगी या फिर आर्थिक संकट और बेकारीके शिकंजोंमें निचोड़े जाते हुए समाजके तंग होते हुए दायरेसे, अपनी शारीरिक निर्बलताके कारण—जिस गुणके कारण वह समाजको उत्पन्न कर सकती है, समाजमें जीविकाका स्थान न पाकर केवल पुरुषके शिकारकी वस्तु बनती जायगी। पर यह अवस्था है साधनहीन गरीब और मध्यम श्रेणीकी स्त्रियोंकी । साधन-सम्पन्न और अमीर श्रेणीकी स्त्रियाँ यद्यपि भूख और गरीबीसे तड़पती नहीं, परंतु उनके जीवनमे भी आत्मनिर्णय और विकासका द्वार बंद रहता है।' मार्क्सके अनुसार 'समाजमें स्त्रियोंका समान अधिकार होनेके लिये उन्हे भी समाजमें पैदावारके कार्यमें सहयोग देनेका अवसर मिलना चाहिये ।' मार्क्सवाद इस बातको स्वीकार करता है कि 'समाजमें संतान उत्पन्न करना न केवल स्त्रीके बल्कि सम्पूर्ण समाजके सभी कामोंमें महत्त्वपूर्ण काम है; क्योकि मनुष्य-समाजका अस्तित्व इसीपर निर्भर करता है। इस महत्त्वपूर्ण कार्यके ठीक रूपसे होनेके लिये अनुकूल परिस्थितियाँ होनी चाहिये। स्त्रीको संतानोत्पत्ति मजबूर होकर या दूसरेके भोगका साधन बनकर न करनी पड़े, बल्कि वह अपने आपको समाजका एक स्वतन्त्र अङ्ग-

समझकर, अपनी इच्छासे संतान पैदा करे । संतान पैदा करनेके लिये समाजकी सभी स्त्रियोंके लिये ऐसी परिस्थितियाँ होनी चाहिये, जो स्वयं स्त्री और संतानके स्वास्थ्यके लिये अनुकूल हों । गर्भावस्था में स्त्रीके लिये इस प्रकारकी परिस्थिति होनी चाहिये कि वह अपने स्वास्थ्यको ठीक रख सके और स्वस्थ संतानको जन्म दे सके । परंतु पूँजीवादी-समाजमें साधनहीन तथा पूँजीपति दोनो ही श्रेणियोंके लिये ऐसी परिस्थितियाँ नहीं हैं । साधनहीन श्रेणीकी स्त्रियोंको गर्भावस्था में उचितसे अधिक परिश्रम करना पड़ता है और पूँजीवादी श्रेणीकी स्त्रियाँ बिलकुल निष्क्रिय रहनेके कारण जैसी संतान पैदा करना चाहिये, वैसी नहीं कर पातीं । 'समाजवादी और समष्टिवादी-समाजमें स्त्री भी समाजका परिश्रम या पैदावार करनेवाला अङ्ग समझी जाती है। उसे केवल पुरुषके भोग और रिझावका साधन नहीं समझा जाता । 'मार्क्सवाद' मनुष्यमें आनन्द, विनोद और रिझावकी जगह भी स्वीकार करता है, परंतु उसमें पुरुषको प्रधान बनाकर स्त्रीको केवल साधन बना देना उसे स्वीकार नहीं । पूँजीवादी-समाजमें स्त्री अपने माता बननेके कार्यके कारण पुरुषके सामने आत्मसमर्पण करनेके लिये मजबूर होती है ( क्योंकि पुरुष जीविका कमाकर लाता है ) । समाजवाद और समष्टिवादमें स्त्रीके गर्भवती होने, प्रसवकाल और उसके बाद जबतक वह फिर परिश्रमके काममें भाग लेनेके योग्य न हो जाय, स्त्रीकी आवश्यकताओंकी पूर्ति और स्वास्थ्यकी देख-भालकी जिम्मेदारी समाजपर होगी । प्रसवसे दो-ढाई मास पूर्वसे लेकर प्रसवके एक मास पश्चात्‌तक वह समाजके खर्चपर रहेगी । संतान पैदा होनेके बाद समाज जो काम उसे करनेके लिये देगा, उसमें बच्चेकी देख-भालका समय और सुविधा भी उसे देगा । बच्चेके पालने-पोसने और शिक्षाकी जिम्मेदारी भी गरीब स्त्रीके ही कंधों- पर न होकर समाजके सिर होगी । इस प्रकार संतान पैदा करना स्त्रीके लिये भय और मुसीबतका कारण न होकर उत्साह और प्रसन्नताका विषय होगा ।' उपर्युक्त मार्क्सवादी मन्तव्यसे यह स्पष्ट है कि मार्क्सवादियोंको स्त्री-हितसे उतना प्रयोजन नहीं है, जितना कि स्त्रीको अपने पति पुत्रादि परिवारसे विच्छिन्न कर उसे समाजकी वस्तु बनानेसे है । स्पष्ट है कि पतिको अपनी पत्नीमें जितनी प्रीति है, पुत्रको अपनी मातामें जितना स्नेह है, उतनी प्रीति, उतना स्नेह समाजकी साधारण वस्तुमें समाजका क्यों होगा ? जेलो एव अनाथालयोंमें भी स्त्रियो-पुरुषोंको भोजन मिलता है, वस्त्र मिलते हैं, इलाज मिलता है और गर्भ तथा प्रसवकालमे बहुत सी सुविधाएँ भी मिलती हैं । परंतु क्या स्वाधीनतापूर्वक गरीबी हालतके भी जीवनका सुख उपर्युक्त स्थितिमे सम्भव है ? पति, सास-ससुर, देवर-जेठ, पुत्र-पौत्र आदिके सहज सम्बन्ध और स्नेहकी तुलना समाजमें कहाँ प्राप्त हो सकती है ? रामराज्य-प्रणालीमें स्त्री गृहलक्ष्मी रहेगी । वेदोंने विवाहके

समय वरके मुखसे वधूको कहलाया है कि तुम श्वशुर, श्वश्रू, ननद और देवरमे सम्राज्ञी बनो-‘सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वा भव। ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु।’ (ऋक् सं० १०।८५।४६) स्त्री ससुर, पति, पुत्रादिकी कमाईकी रानी एवं मालकिन होगी, परिवारके लोग उसके इशारेपर काम करेंगे, उसका ही दिया हुआ खायेंगे और खर्च करेंगे। उसे मिलोंमें मजदूरी करने नहीं जाना पड़ेगा, समाजके नामपर हुकूमत करनेवाले मुट्ठीभर तानाशाहोंके प्रबन्ध-स्थापनमें कोई वस्तु पानेके लिये पंक्तिबद्ध खड़े रहकर उसे बाट नहीं जोहना पड़ेगा। बिना मजदूरी किये ही वह समाजमें पुरुषोंके बराबरका ही नहीं उनसे हजारगुना अधिक ऊँचा स्थान प्राप्त करेगी। रामराज्यके अनुसार सन्नारीके बलपर कुल, गोत्र एवं वंशकी रक्षा होगी। समाजवादी-व्यवस्थामें इच्छानुसार किन्हीं नये-नये पुरुषोंसे संतान उत्पन्न करनेवाली नारीके पुत्र-पुत्रीका कुल, गोत्र, धर्म क्या होगा ? एक ही माँसे उत्पन्न अनेक भाई, बहने कितने ही पिताओंसे उत्पन्न हुए होंगे, उनका परस्पर क्या सम्बन्ध होगा ? इससे मार्क्सवादीसे क्या मतलब होगा ? मार्क्सवादमें तो जैसे सभी सम्पत्ति सरकारी, भूमि सरकारी; वैसे ही सब औरतें सरकारी, सब मर्द सरकारी और सभी बच्चे भी सरकारी होंगे। जैसे गाय-बैल, घोड़े-घोड़ी, ऊँट-ऊँटिनी आदि पशुओंका अपना न निजी कोई पति है, न पत्नी है, न अपना कोई माता-पिता है, न अपना कोई बच्चा-बच्ची है, सब सरकारी-ही-सरकारी हैं, वैसे ही स्त्री-पुरुष, बच्चे- बच्ची सब सरकारी-ही-सरकारी होंगे। फिर कहाँका पिण्डदान, कहाँका श्राद्धतर्पण, कहाँका गयाश्राद्ध, कहाँका धर्म, दान, पुण्य, मोक्ष, कहाँका परिवार, कुटुम्ब और कैसा पारिवारिक स्नेह ?—सब पशुवत् जीवन होगा। सरकारी अफसरके आदेशा- नुसार जैसे किसी घोड़ा-घोड़ीका सम्बन्ध कराया जाता है, वैसे ही समाज या समाज- वादी सरकारके आदेशानुसार अनियतरूपसे स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध करा दिया जायगा। समाजके नामपर तानाशाही सरकार और उसके नौकर सब व्यवस्था करेंगे। वे ही लोगोंसे विभिन्न काम करायेंगे, वे ही रोटी-कपड़ा देंगे, वे ही गर्भधारण करायेंगे, वे गर्भ तथा प्रसवकालका सब प्रबन्ध करेंगे। फिर पति-पुत्र और कुटुम्बका कोई भी स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रहेगा। गो, गर्दभ, श्वान, शूकरादि जानवरोंके या काक, कुक्कुट, कपोत आदि पक्षियोंके समूहके तुल्य ही मानव-समूह होगा। ‘गरीब स्त्रीसमाजके कंधेपर कोई भार न दिया जायगा, दयालु समाज और समाजवादी सरकारके कंधोंपर ही सब भार रहेगा’, यह है समाजवादमें स्त्रियोंका स्थान। समाजमें यदि समानाधिकार लेना है, तो स्त्रियोंको यह सब स्वीकार करना पड़ेगा। बिना क्रम ये उन्हें अधिकार न मिल सकेगा। मार्क्सवादमे स्त्रियोंके लिये सरकारी गुलामी और सरकारी मजदूरी ठीक समझी जाती है, परंतु अपने सास-ससुर, पति- पुत्र आदिकी सेवा, लालन-पालन असह्य है। यह स्त्रीके लिये गुलामी है, उसे आत्म समर्पणके लिये बाध्य करना है। श्वशुरकुलकी सम्राज्ञी पतिके घर एवं हृदय-

की, पुत्रोंकी पूज्या महारानी होकर गृहस्वामिनी, गृहलक्ष्मी बनना श्रेष्ठ है या सर- कारी नौकरानी बनकर बिल्ली-कुतियाका जीवन व्यतीत करना श्रेष्ठ है, इसे समझ- दार स्त्रियाँ स्वयं सोचें और सोचें वे पुरुष जिन्हें आगेसे ऐसी ही पत्नी और माता पाना है। व्यभिचारका उन्मूलन मार्क्स लिखता है कि 'हम स्त्रीको पुरुषकी सम्पत्ति बनाने और धर्मके भयसे जकड़ देनेके पक्षमें नहीं हैं। यह भी हमें स्वीकार नहीं है कि एक सन्तान उत्पन्न करनेके लिये किसी स्त्रीका एक पुरुष-विशेषकी दासी या सम्पत्ति बन जाना जरूरी है। वह स्त्री-पुरुषके सम्बन्धको स्त्री-पुरुषकी शारीरिक आवश्य- कताका सम्बन्ध मानता है; परंतु इसके लिये वह दोनोंमेंसे एक-दूसरेका दास बन जाना आवश्यक नहीं समझता। इस सम्बन्धमें वह कानूनके भी दखल देनेकी जरूरत नहीं समझता, परंतु इसके साथ ही वह स्त्री-पुरुषके सम्बन्धकी उच्छृङ्खलताको भी स्वीकार नहीं करता। किसी स्त्री या पुरुषका दूसरोंके शारीरिक भोगके लिये अपने शरीरको किरायेपर चढ़ाना वह अपराध समझता है। समाजवादी और समष्टि वादी समाजमें जीविकाके साधन अपनी योग्यता और अवस्थाके अनुसार सभीको प्राप्त होंगे, इसलिये जीविकाके लिये व्यभिचारसे धन कमानेकी आवश्यकता हो नहीं सकती और जो लोग पूँजीवादी-समाजके संस्कारोंके कारण ऐसा करेंगे, वे अपराधी होंगे। संक्षेपमें स्त्री-पुरुष और विवाहके सम्बन्धमें मार्क्सवाद समाजके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्यके विचारसे पूर्ण स्वतन्त्रता देता है, परंतु उच्छृङ्खलता, गड़बड़ या भोगको पेशा बना लेनेको और इसके साथ ही अपने भोगकी इच्छाके लिये दूसरे व्यक्तियो और समाजकी जीवन-व्यवस्था में अड़चन डालनेको वह भयंकर अपराध समझता है। स्त्री पुरुषके सम्बन्धमें मार्क्सवादका रुख लेनिनकी एक बातसे स्पष्ट हो जाता है। लेनिनने कहा था—स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध शरीरकी दूसरी आवश्यकताओं—भूख, प्यास, नींद—की तरह ही एक आवश्यकता है। इसमें मनुष्यको स्वतन्त्रता होनी चाहिये, परंतु प्यास लगनेपर शहरकी गंदी नालीमें मुँह डालकर पानी पीना उचित नहीं। उचित है स्वच्छ जल, स्वच्छ गिलाससे पीना। स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध मनुष्योंकी शारीरिक, मानसिक- तृप्ति और समाजकी रक्षाके लिये होना चाहिये न कि स्त्री पुरुषोंको रोग और कलहका घर बना देनेके लिये। अबतकके पारिवारिक और विवाह सम्बन्धी बन्धन पूँजीवादी आर्थिक सगठनपर कायम हैं, जिनमें स्त्रीका निरन्तर शोषण होता रहा है; इसलिये अब समाजको इसे बदलकर स्त्री-पुरुषकी समानतापर लाना चाहिये।' यह सही है कि मार्क्सवादमें जीविकाके लिये स्त्रियोंको व्यभिचार न करना पड़ेगा, परंतु काम-प्रेरणासे होनेवाले व्यभिचारपर मार्क्सवादमें क्या रोक है ?

५८४ मार्क्सवाद और रामराज्य गंदी नालीका पानी पागल ही पीता है, अन्य सभी स्वास्थ्यकर स्वच्छ ही जल पीना चाहते हैं । क्या मार्क्सवादमें अपने पति या अपनी पत्नीसे अन्य स्त्री-पुरुषसे सम्बन्ध गंदी नालीके जल पीनेके तुल्य मान्य है ? किसी भी मार्क्सवादी ग्रन्थमें ढूँढ़नेपर भी स्त्री-पुरुषके स्वेच्छापूर्वक सम्बन्धोंमें कोई रुकावटकी बात नहीं दिखलायी देती, सिर्फ दूसरेकी इच्छाके बिना या पेशा किंवा जीविकाके लिये व्यभिचार करना अपराध माना गया है । परन्तु शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्यके विचारसे नितान्त स्वेच्छापूर्ण स्त्री-पुरुष-सम्बन्धकी मार्क्सवादमें पूरी स्वाधीनता है । फिर इससे भिन्न और उच्छृङ्खलता या गडबड़ क्या है ? स्त्री-पुरुष दोनोंमें किसीकी जिसमें अनिच्छा न हो, जो पेशेके लिये न हो, जो शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्यके प्रतिकूल न हो; ऐसे स्वेच्छापूर्ण मनमाने सम्बन्धमे कोई रुकावट नही है । फिर जब पाप पुण्यका प्रश्न है ही नहीं, तब ऐसे सरल, सुखकर कामसे पेशेपर ही रुकावट क्यों हो ? किन्हीं मार्क्सवादी वाक्योसे भी चारित्रिक जीवनका समर्थन नही मिलता और पुलिस एवं गुप्तचरकी आँखोंमें धूल डालकर, अदालत- को धोखा देकर कोई दुराचार कर सके तो क्या होगा ? अध्यात्मवादीकी दृष्टिमें तो प्रथम संयतात्मा सावधान व्यक्तियोंका गुरु ही शास्ता है, उनके लिये राज्यशासन आवश्यक ही नहीं है। परंतु दुरात्मा प्राणीका नियन्त्रण करनेके लिये राजा शास्ता होता है। किंतु जो प्रच्छन्न पातकी होते हैं, जो पुलिस एवं अदालतको चकमा देकर पाप करते हैं, उनका शासक वैवस्वत यम ही हैं । ( नारदस्मृ० १८ । १०८; विदु० नी० ) एक जड़वादीके मतमें यदि निर्विघ्न रूपसे दूसरेका धन या दूसरेका सुन्दर कलत्र प्राप्त हो जाय, तो उससे बचना, उसे अस्वीकार कर देना या वह जिसकी है, उसके पास सही-सलामत पहुँचा देना शुद्ध मूर्खता ही कही जायगी, क्योंकि उसके सिद्धान्तानुसार किसीकी व्यक्तिगत सम्पत्ति जायज नहीं है, सब सम्पत्ति राज्यकी ही है । स्त्री-पुरुष कोई भी किसीकी वस्तु नहीं है, सब समाजकी वस्तु है, उसके लेनेमें पाप-पुण्यकी कोई बात ही नहीं है। परंतु एक अध्यात्मवादी, परान्न, पर-वित्तको स्वीकार करना जघन्य कृत्य समझता है । वह कहता है कि पर-वित्त, परान्न यदि मार्गमें पड़ा हो चाहे घरमे, अपना वैध स्वत्व हुए बिना उसे कभी ग्रहण नहीं करना चाहिये, यही सत्पुरुषका लक्षण है—'परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे। अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद् ब्राह्मणलक्षणम् ॥' अपने यहाँ पति- पत्नी, माता-पुत्र आदिका सम्बन्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक, शास्त्र एवं परम्परामूलक समझा जाता है, जब कि मार्क्सवादी सम्पूर्ण धार्मिकताओ, परम्पराओको मिटाकर शुद्ध अर्थमूलक सम्बन्धको ही क्रान्तिके लिये लाभदायक मानते हैं। इनके मतानुसार 'अपनी शारीरिक प्रेरणाओसे ही स्त्री-पुरुष सम्बन्धित होते हैं, उनसे तीसरा व्यक्ति बतौर 'एक्सिडेंट' ( आकस्मिक घटना ) के उत्पन्न हो जाता है । माँका दूध पिलाना भी उसके लिये अनिवार्य है, बिना स्तनसे दूध निकले उसे