मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
कष्ट हो सकता है, इसीलिये माँ बच्चेको दूध पिलानेके लिये बाध्य होती है।' अतः 'माता पितासे सहस्रगुणित पूज्य है'-'सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते' (मनु० २ । १४५) का मार्क्सवादमें कोई महत्त्व नहीं है। सीता, सावित्री, दमयन्ती, अरुन्धती आदिके पातिव्रत्यका भी मार्क्सवादमें कोई गौरव नहीं, केवल भूख- प्यासकी तरह शारीरिक आवश्यकताकी पूर्तिमात्र ही वहाँ स्त्री-पुरुषके सम्बन्धका आधार है। राम राज्यमें पातिव्रत्य सर्वधर्मसार है और सीता, सावित्री आदि उसके उच्च आदर्श एवं मार्गदर्शक हैं। भूत और शक्ति मार्क्सवादी कहते हैं, "कुछ आधुनिक वैज्ञानिक अब रहस्यवादकी शरण लेते हैं। उन वैज्ञानिकोंका कहना है कि 'भूत शक्ति ही है और शक्तिका पूर्णरूपसे बोध नहीं हो सकता।' लेकिन यह बात सही नहीं है। यदि यह मान लिया जाय कि भूत बिजली ही है, तथापि इस बिजलीका परिमाण और वजन है, इसलिये भूतकी धारणा भले ही बदल जाय इसका अस्तित्व नहीं मिट जाता। जेम्सनके शब्दोंमें 'उन वैज्ञानिकोंकी, जो भूतको केवल शक्तिका ही संगठन मानते हैं, तुलना उस वीरसे की जा सकती है, जिसने केवल धारसे तलवार बनायी अथवा उन केवटोंसे जिन्होंने जालकी यह परिभाषा की कि यह सुतलीसे बँधा हुआ छेद है।' आईस्टीनके सापेक्षताके नियमका प्रारम्भ है कि निरपेक्ष गतिकी न तो धारणा की जा सकती है और न इसको मापा जा सकता है। किसी दी हुई रेखा या बिन्दुसे ही इसको मापा जा सकता है। इससे कुछ वैज्ञानिक इस नतीजेपर पहुँचे कि 'गति वास्तविक नहीं है', किंतु यह हीगेलका ही सिद्धान्त है कि 'अस्तित्व सम्बन्ध बोधक है। किसी वस्तुको दूसरी वस्तुद्वारा ही मापा जा सकता है और किसी पदार्थका गुण किसी दूसरे पदार्थपर प्रतिक्रियाका नाम है।' द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद प्रयोगको ही प्रथम स्थान देता है। निरपेक्ष गति हो या न हो हमारे लिये घड़ी और स्थान दोनोंकी आवश्यकता है; इसलिये दोनों ही वास्तविक हैं।" वस्तुतः ईमानदार वैज्ञानिक ही कहीं भूतके रूपमें शक्ति मानते हैं और उसे दुर्ज्ञेय मानते हैं। पूर्वोक्त न्यायसे कहा गया है कि सूक्ष्मसे ही स्थूलकी उत्पत्ति होती है। धारसे तलवार तथा सुतलीसे बँधे हुए छेदसे और शक्तिसे भूतनिर्माणमे पर्याप्त अन्तर है। तन्तुसे पट बनता है, फिर भी पटका तन्तु हे, यह भी व्यवहार होता है। मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है, फिर भी घटकी मृत्तिका है, यह भी व्यवहार होता है। आमतौरपर पृथिवीका गन्ध, जलका रस, तेजका रूप, वायुका स्पर्श और आकाशका शब्द गुण माना जाता है। फिर भी सांख्य वेदान्त- सिद्धान्तानुसार शब्दतन्मात्रासे ही आकाश, स्पर्शतन्मात्रासे ही वायु, रूपतन्मात्रासे
तेज, रसतन्मात्रासे जल तथा गन्धतन्मात्रासे पृथिवीकी उत्पत्ति होती है । यह स्पष्ट है कि जिन भूतोंमें केवल शब्द है, वह सूक्ष्म आकाश है । वायुमें शब्द, स्पर्श दो गुणोंका उपलम्भ होता है। वह आकाशकी अपेक्षा स्थूल है । उत्तरोत्तर रूप, रस, गन्ध गुणोंकी जैसे-जैसे अधिकता होती है, वैसे ही तेज आदिमें स्थूलता उपलब्ध होती है । इस दृष्टिसे शब्दस्पर्शात्मक ही भूत है । उपनिषदोंके अनुसार सत्से आकाशादिकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाशादिकी सत्ताका व्यवहार होता है । कारणसे कार्य उत्पन्न होनेपर मायाद्वारा प्रधान कारणकी अप्रधानता तथा अप्रधान कार्यकी प्रधानता हो जाती है इसीलिये कार्य विशेष्य हो जाता है, कारण विशेषण हो जाता है । इसी कारण आकाशकी सत्ता, घटकी मृत्तिका, पटका तन्तु आदिका व्यवहार होता है। हर जगह शक्तिसे ही कार्य उत्पन्न होता है, मृत्तिकामें घट-शक्ति होती है, बीजमें अङ्कुर-शक्ति होती है। ऐसे ही सम्पूर्ण कार्योंके उत्पादनानुकूल उन-उन कारणोंमें शक्तियाँ रहती हैं, इस दृष्टिसे सत्में प्रपञ्चोत्पादिनी शक्ति रहती है । उसी सत्-शक्तिसे भूतोंकी उत्पत्ति होती है । सूक्ष्मरूपसे स्थूल भिन्न नहीं होता । सूक्ष्म कारण है, स्थूल कार्य है, यह कहा जा चुका है । घट कपालमात्र है, कपाल चूर्णरूप है, वह भी रजोमात्रा है । रज भी परमाणु रह जाता है । मृत्तिकासे भिन्न घट नहीं होता, रससे भिन्न जल नहीं, रूपसे भिन्न तेज नहीं । ऐसे ही धारसे भिन्न तलवार नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता । उसी तरह सुतलीसे भिन्न होकर सच्छिद्र जाल नहीं है; परन्तु जालसे भिन्न होकर सुतली नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता; अतः विषम दृष्टान्त है । गति पदार्थकी आवश्यकता है, अवस्था अवस्थावान्से भिन्न नहीं । नाप तौल तथा मार्क्सवादियोंका प्रयोग भी बिना ज्ञानके नहीं होता है, अतः प्रयोगवादको भी सर्वकारण परममूलका अन्वेषण तो करना ही चाहिये । क्या मनुष्यकी इच्छाशक्ति स्वाधीन है ? ‘मनुष्यकी इच्छा स्वतन्त्र है या नहीं', यह दार्शनिक क्षेत्रमें एक प्राचीन प्रश्न है । द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी इसका उत्तर देते हैं—"नहीं, इस प्रश्नका मूल भी धर्मविद्यामें है । यदि मनुष्यका कर्म उसकी स्वेच्छासे नहीं है तो वह पाप-पुण्यके भारसे मुक्त हो जाता है तथा स्वर्ग और नरकका कोई अर्थ नहीं रह जाता । यही कारण है कि धर्म-विद्या मनुष्यकी इच्छाको स्वतन्त्र मानती है । “इस प्रश्नका यों विचार कीजिये । सारा संसार कार्य-कारणके नियमसे बँधा हुआ है । क्या मनुष्य इस संसारका अंश नहीं ? केवलमात्र मनुष्यकी इच्छा ही क्या इस प्राकृतिक नियमसे परे है ? सब वस्तुओंकी तरह मनुष्यकी इच्छा भी कारणजनित है । उसकी इच्छाके प्राकृतिक तथा सामाजिक कारण हैं । मनुष्य ऐसा सोचता अवश्य है कि वह अपनी इच्छानुसार ही सब कुछ करता है।
लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। कविने उदाहरण दिया है कि प्रत्येक वारिबिन्दु भी यह सोचता है कि अपनी इच्छासे ही वह जमीनपर गिरता है। मातृ-स्तन पीते समय बच्चा भी यह सोचता है कि अपनी इच्छाको ही वह पूरी कर रहा है। यदि हमारी इच्छा स्वाधीन नहीं है तो बाध्य होनेपर ही हम कोई काम करते हैं। इस बाध्यताके सम्बन्धमें हीगेलने लिखा है—‘बाध्यता उसी हदतक दृष्टिहीन है, जहाँतक हम इसको समझते नहीं।’ इसपर टीका करते हुए एजिल्सने लिखा है कि ‘प्रकृति और मनुष्यके समाजमें ही स्वतन्त्रताका निवास है और इसकी बुनियाद है प्रकृतिकी मजबूरियोंका ज्ञान ।’ इसका खण्डन करते हुए यह कहा जाता है कि—‘जहाँ हम मजबूरीके सामने सर झुकाते हैं वहाँ स्वतन्त्रता कहाँ ?’ यहाँपर मजबूरीके अर्थपर हमें गौर करना चाहिये। “अरस्तूने इस अवश्यम्भाविवाद या नियतिवादके विभिन्न अर्थोंपर बहुत पहले ही विचार किया था। यदि हमें रोगमुक्त होना है तो हम दवा लेनेके लिये बाध्य हैं ! जीवनधारणके लिये श्वास लेना आवश्यक है। किसी स्थलमें दिये गये ऋणकी वसूलीके
५८८ मार्क्सवाद और रामराज्य
तभी स्वेच्छाधीन भला या बुरा काम करनेवाला मनुष्य निग्रह या अनुग्रहका भागी होता है। बिन्दुकी पृथ्वीपर गिरनेकी इच्छा तो काल्पनिक ही है, क्योंकि इच्छा चेतनका धर्म है, अचेतनका नहीं। फिर भी 'नद्याः कूलं पिपतिषति' (नदीका कगार गिरना चाहता है), इस प्रकारकी इच्छाएँ वस्तुतः काल्पनिक हैं। आसन्न- पतनता देखकर ऐसा व्यवहार किया जाता है। मातृस्तन पीनेकी इच्छा तो चेतनकी इच्छा है, वह क्षुधासे भी होती है। फिर भी इष्टसाधनता-ज्ञानसे ही इच्छा मुख्य है। रोगमुक्त होनेके लिये भी एक तो स्वेच्छासे ओषधि खायी जाती है, दूसरे अभिभावकोंद्वारा बाध्य किये जानेपर भी ओषधि खायी जाती है। इसी प्रकार जीवन-धारण करनेके लिये श्वास लेनेकी भी बात है। वस्तुतः प्रयोजनकी स्वीकृति ही स्वतन्त्रता है। इस परिभाषासे 'स्वतन्त्रः कर्त्ता' यह पाणिनीकी परिभाषा ही श्रेष्ठ है, जिसका आशय है 'क्रियामें स्वतन्त्ररूपसे विवक्षित अर्थ ही कर्त्ता होता है।' स्वेतर समस्त कारकोंका प्रयोजक होकर स्वयं किसीसे प्रयुक्त न होना ही स्वतन्त्रता है। व्यवहारमें भी जितने विधि-निषेध होते हैं, सभी स्वतन्त्रके ही होते हैं। जिसके हाथ-पैर हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़े हो, ऐसे परतन्त्र व्यक्तिको जल लाने या दौड़नेको कौन आदेश दे सकता है? यों कोई भी बुरा काम करता है तो परिस्थितियोसे बाध्य होकर ही करना पड़ता है। काम, क्रोध, लोभ—सभी परिस्थितियोंके अनुसार ही होते हैं। चोरी कोई तभी करता है, जब वह परिस्थितियों- से उसके लिये बाध्य हो। तो भी क्या समाजसे चोरी करनेको अपराध मानना बंद हो जाना चाहिये? संसारमें सभी कार्य कामना या इच्छापूर्वक ही होते हैं। इच्छामें भी जब प्राणी सदा परतन्त्र ही है, तब तो फिर किसी बुरे कामसे हटनेका उपदेश या प्रयत्न व्यर्थ ही होगे। इसी तरह किसी अच्छे काममें प्रवृत्त होनेका उपदेश और प्रयत्न भी व्यर्थ है। अतः सुस्पष्ट है कि परिस्थितियोंसे सम्बन्ध होते हुए भी इच्छाके अनुसार होनेवाले कार्योंको स्वाधीनतापूर्वक कर्म कहा जाता है। तभी शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार प्राणीको निग्रह एव अनुग्रहका भागी होना पड़ता है। अन्यथा यह तो कोई भी अपराधी कह सकता है कि 'अमुक परिस्थितियोने ही हमसे यह काम कराया है, अतः दण्ड उन परिस्थितियोंको मिलना चाहिये या परिस्थिति उत्पन्न करनेवालेको मिलना चाहिये।' परिस्थिति उत्पन्न करनेवाले भी यही कह सकते हैं कि 'हमने भी परिस्थितिवश ही ऐसा किया है।' मार्क्सवादी कहते हैं कि 'श्रेणी विभाजन समाजमें जितना ही सुदृढ होता गया, शासक-श्रेणी उतनी ही उत्पादनशक्तियोंसे दूर हटती गयी। कृषिकार्यका भार, कारखाना चलानेका भार होता है गुलामोके ऊपर, मजदूरोंके ऊपर। पूँजीपति सोच-विचारकर समाजव्यवस्थाके नीतिविधानकी रचनामात्र करते हैं, वस्तुजगत्का उनसे कोई सम्पर्क नहीं। हाथ-पैरसे काम करनेके लिये हैं मजदूर, मिस्त्री या इंजीनियर; लाभकारी आविष्कारके लिये हैं वैज्ञानिक। यहाँतक कि पूँजीपतिको
देखभालकी आवश्यकता नहीं। ईरानमें तेलकी खानें चलती हैं और लाखों मील दूर बैठकर पूँजीपति मुनाफा कमाता है। धनिक वस्तुजगत्के जिस अंशका भोग करता है, वहाँ वह देखता है कि वही कर्त्ता है, वह स्वाधीन और सर्वसर्वा है और उसीकी आज्ञासे सब चलता है। इसलिये आधुनिक संस्कृति और दर्शनमें इच्छा-स्वाधीनताका दावा सहज ही मजूर हो जाता है। "वर्तमान आदर्शवादी दार्शनिक इच्छा स्वतन्त्रताके दावेके प्रमाणके लिये आधुनिक विज्ञानकी शरण लेते हैं। आइसनवर्गके—'प्रिंसिपुल आफ मिनेसी' में उनको एक सहारा मिलता है। संक्षेपमें इसका सिद्धान्त यह है कि 'कोई इलेक्ट्रन दूसरे मुहूर्त्तमें क्या करेगा, यह निश्चित नहीं है। इलेक्ट्रन एक कक्षसे दूसरे कक्षको कूद रहा है, लेकिन कौन इलेक्ट्रन कूदेगा, इसका निश्चय नहीं।' जेम्स, एलिंगटन, श्रोडिंगगेर इसीकी इच्छा स्वतन्त्रताके प्रमाणके रूपमें सादर अभ्यर्थना करते हैं। यहाँपर दो बातें जान लेनेकी हैं; एक यह कि किसी एक इलेक्ट्रनकी गतिविधिका लक्ष्य करनेके लिये उसके ऊपर जो आलोक पार किया जाता है, उसीसे उसका स्थान परिवर्तन हो जाता है। दूसरी बात यह है कि मोरके 'करमपाण्डेंस प्रिंसिपुल' के अनुसार परमाणुओंके संख्याधिक्यसे उनकी गतिकी निश्चयता बढ़ जाती है। इस प्रकार आधुनिक विज्ञान भी कारणविहीन स्वतन्त्रता- का अन्त कर देता है।" परंतु यह बात भी ठीक नहीं है । इच्छा-स्वतन्त्रताका प्रश्न केवल पूँजीपतियोंसे ही नहीं है, क्योंकि इच्छा और तदनुसार विविध चेष्टाओंका प्रश्न तो सभीके साथ रहता है, भेद होता है, इच्छापूर्तिमें। जिनके पास पर्याप्त साधन हैं, उनकी इच्छाओंकी पूर्ति होती है, जिनके पास साधन नहीं हैं, उनकी इच्छापूर्तिमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जबतक पूँजीपतियोंके पास साधन है, उनकी इच्छापूर्तिमें सरलता रहेगी। जब मजदूरोंके हाथमें साधन हो जायेंगे, तब फिर उनकी इच्छा- पूर्तिमें सरलता हो जायगी, यद्यपि साधनोंके मिलनेके साथ साथ इच्छाएँ भी बढ़ती जाती हैं। शास्त्रकारोंका तो कहना है कि संसारमें विवेक-वैराग्यके बिना भोगप्राप्तिसे कभी कामनाओ और इच्छाओकी पूर्ति नहीं हो सकती । जैसे घीकी आहुतिसे अग्निज्वाला बढ़ती है, वैसे ही भोगप्राप्तिसे इच्छाएँ बढ़ती हैं—'न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्द्धते ॥' (विष्णुपुराण १० । १० । २३) यहाँतक कि संसारभरकी सम्पूर्ण धन-धान्य, हिरण्य आदि सम्पत्तियाँ मिल जायें, तब भी एक पुरुषकी भी तृप्ति सम्भव नहीं— 'यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रिय । सर्वं नैकस्य पर्याप्त इति मत्वा शमं व्रजेत् ॥' (लिङ्गपुराण पूर्व० ६७ । १८ ) । संसारकी सभी स्वतन्त्रताएँ तो सीमित ही हैं। अविद्या-काम-कर्मके परतन्त्र प्राणीमें स्वतन्त्रताकी भी एक सीमा होती है, पूर्ण स्वतन्त्रता तो निरूपाधिक स्वप्रकाश आत्मामें ही है। जिनमें 'जायते,
५९० मार्क्सवाद और रामराज्य वर्धते, अस्ति, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति'—ये छः विकार होते हैं, उनकी पूर्ण स्वतन्त्रता कभी कैसे हो सकती है ? षड्भावविकारवर्जित कूटस्थ आत्मा ही सर्वथा स्वतन्त्र है, फिर भी आपेक्षिक स्वतन्त्रता तो रज्जुमुक्त गोवत्सादिकी भी स्वतन्त्रतामें व्यवहृत होती है। वैसे कारागारमें बंद प्राणी भी बहुत अंशोंमें स्वतन्त्र कहा जाता है। यों राष्ट्रकी पराधीनतासे भी प्राणी पराधीन कहा जाता है। वेदान्तकी दृष्टिसे स्थूल-सूक्ष्म-कारण-शरीरत्रयवर्जित होनेपर ही पूर्ण स्वतन्त्रताका व्यवहार होता है। कार्योंकी सुविधाके लिये श्रेणीविभाजन अनिवार्य ही है, सभीको सब कामका उत्तरदायित्व देनेसे कोई भी सुव्यवस्था नहीं बन सकती । वकील, इंजीनियर, चिकित्सक आदिसे कृषिका कार्य या मिलोके करघे चलानेका काम करानेसे हानि ही है। इसीलिये प्राचीन कालमे प्रधानरूपसे ज्ञानार्जन, ज्ञानवितरणका काम ब्राह्मणोंपर, बलार्जन, बलवितरण, राष्ट्ररक्षण आदिका काम क्षत्रियोंपर; कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य आदिद्वारा धनार्जन, धनवितरण आदिका काम वैश्योंपर, राष्ट्रोपयोगी विभिन्न कर्मों, शिल्पादि कलाओंके अर्जन, रक्षण आदिका भार शूद्रो- पर डाला गया था। इससे उन-उन विषयोंके लोग निरन्तर विशेषता-सम्पादनके लिये प्रयत्नशील रहते थे। आज भी शिल्प, चिकित्सा आदि विविध विषयोंमें विशेषज्ञता-सम्पादनके लिये 'स्पेशलिस्ट' तैयार किये जाते हैं। आज 'भी संग्राम लड़नेवाले सिपाही अलग होते हैं, विचारकर युद्धनीति निर्धारित करनेवाले अन्य होते हैं, वैज्ञानिक अनुसंधान करनेवाले दूसरे लोग होते हैं और अनुसंधानके फलभूत विविध यन्त्रोंके निर्माण तथा सचालन करनेवाले दूसरे लोग हुआ करते हैं। जैसे कोई अपने शारीरिक बलसे लाभ उठाता है, वैसे ही बौद्ध-बलसे फायदा उठानेका बुद्धिजीवियोंका अधिकार है ही। व्यावहारिक भौतिक-जगत्में कारणविहीन निरपेक्ष स्वतन्त्रता तो अध्यात्मवादी कभी नहीं मानते, इसके लिये विज्ञानकी खोज व्यर्थ है, किंतु सापेक्ष सकारण होनेपर भी इच्छा तथा कर्मोंकी स्वतन्त्रता अवश्य मान्य है जिससे इच्छानुसार कर्त्तापर उत्तरदायित्व होता है और अपनी इच्छाओं तथा कर्मोके सुपरिणाम-दुष्परिणामको वह भोगता है। जहाँतक किसी ढंगकी राज्यव्यवस्था होगी, वहाँतक अपराध एवं दण्डविधानकी भी आवश्यकता रहेगी। फिर उन-उन अपराधियोंकी इच्छाके आधारपर होनेवाले अपराधोंका उत्तरदायित्व भी उनपर मानना पड़ेगा, तभी दण्डविधान न्यायपूर्ण कहा जा सकेगा। ऐसी स्थितिमें इच्छाओ एवं कर्मोंमें स्वतन्त्रता स्वीकार किये बिना निग्रहानुग्रहकी कोई भी व्यवस्था नहीं चलेगी। सभी लोग परिस्थितिके ही जिम्मे सब दोष डालकर बरी हो जानेका प्रयत्न करेंगे।
मार्क्सीय समाज-व्यवस्था ५९१ द्वन्द्व न्याय और अन्तिम सत्य कहा जाता है 'द्वन्द्वमान किसी भी अन्तिम सत्यको नहीं मानता, इसके विपरीत आदर्शवादी दर्शन हर समय एक अन्तिम सत्यकी खोज करता रहता है। यह सत्य अनादि, अनन्त और निर्विकार है, लेकिन द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इस परिवर्तनशील जगत्में अपरिवर्तनीय सत्यकी खोज नहीं करता। इस दृष्टिकोणकी कहीं अन्तिम समाप्ति नहीं है। भूत-जगत् निरन्तर प्रवहमान है, कहीं विराम नहीं। हम व्यावहारिक सुविधाकी दृष्टिसे और प्रकृतिको विचारबद्ध करनेकी दृष्टिसे वस्तुजगत्की किसी एक दिशाकी विशेषताओंको अलग कर लेते हैं, लेकिन सनातन युक्तिका अनुसरणकर इनको अपरिवर्तनीय नहीं मानते। परमाणु गतिशील तरङ्गकी तरह है, लेकिन यह केवल वस्तु-जगत्के एक विशेष क्षेत्रके लिये ही सत्य है। दूसरे जगत्में यही ठोस पदार्थका आकार ग्रहण करता है। चेतन और अचेतन पदार्थको हम 'पृथक्रूपमें देखते हैं और इस पार्थक्यकी आपेक्षिकताको भी देखते हैं। चेतन पदार्थके बीच भी अचेतन पदार्थका उपादान है, भूत-जगत्के अन्तर्निहित विरोधी गुण ही कभी चेतन और कभी अचेतन पदार्थकी सृष्टि करते हैं। एक अवस्थामें परमाणु अविभाज्य और मौलिक दीखता है और फिर यही अपनी शक्तिसे टूटकर नये परमाणुको जन्म देता है। पञ्चेन्द्रिय- की क्षमताकी सीमाको हम देखते हैं, पुनः ये ही यन्त्रकी सहायतासे अदृश्यको दृश्यमान करते हैं। 'इनफरारेड' फोटो प्लेटमें कुहरेके भीतरसे १५, २० मील दूरकी तस्वीर उतर जाती है। 'वस्तु जगत्के गतिप्रवाहमें कोई विराम नहीं है, एक ही वस्तुकी विरोधी शक्ति उसको एक जगहसे दूसरी जगह ले जाती है, कणिकासे तरङ्ग और अचेतनसे सचेतन हो रही है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इसी प्रकार वैज्ञानिक 'परीक्षाके क्षेत्रमें प्रमाणित हो रहा है। 'बन्धी पगडण्डीपर चलनेवाले बुर्जुआ, बुद्धिजीवी अवज्ञाके साथ कहते हैं कि विज्ञानके सिद्धान्त तो रोज बदलते रहते हैं, उनकी सत्यता कहाँ ! नासिकाग्रपर दृष्टि स्थिर कर जो योगबलसे सब कुछ जान लेते हैं, उनके सिद्धान्त नहीं बदलते, क्योंकि उन्होंने तो अन्तिम सत्यपर अधिकार जमा लिया है, लेकिन वैज्ञानिक सिद्धान्त तो बदलते रहते हैं। व्यवहारमें इन सिद्धान्तोंकी जाँच होती रहती है और यहींपर वैज्ञानिक सिद्धान्तकी सार्थकता है।' अध्यात्मवादमें भौतिक पदार्थोंकी सत्यताके अनेक तारतम्य हो सकते हैं। परंतु भौतिक प्रपञ्चका आधारभूत स्वप्रकाश चेतन आत्मा तो परमार्थ सत्य ही है। अत्यन्ताबाध्यता ही पारमार्थिक सत्यता है। सर्वाधिष्ठान, सर्वसाक्षी, अत्यन्ताबाध्य है ही। साक्षीविहीन बाध भी सिद्ध नहीं होता। जब सर्वबाधका साक्षी होना अनिवार्य है ही और उस साक्षीका कोई बाधक प्रमाण सिद्ध नहीं है,
५९२ मार्क्सवाद और रामराज्य तत्र त्रिकालाबाध्य परमार्थसत्का अपलाप कौन कर सकता है १ व्यावहारिक सत्य भी ऐसा ढुलमुल नहीं है, जैसी मार्क्सवादियोंकी धारणा है । मार्क्सवादियोंका टूटनेवाला, विभक्त होनेवाला परमाणु अध्यात्मवादियोंको मान्य नहीं है । यहाँ तो जिसका विभाग न हो सके उसी अन्तिम अवयवको परमाणु कहा जाता है । किसी तरह भी जिसका विभाजन हो सकता है, वह परमाणु है ही नहीं । परिवर्तन- शील जगत् है, इस सिद्धान्तको तो सत्य मानना ही चाहिये । इसी प्रकार चेतन- अचेतन भूत-जगत्के अन्तर्निहित विरोधी गुण हैं, यह भी नही कहा जा सकता; क्योकि वस्तुको भी चेतन या अचेतन किसीमें अन्तर्निहित करना पड़ेगा । अचेतनसे चेतनकी उत्पत्तिकी अपेक्षा चेतनसे अचेतनकी उत्पत्तिमें अधिक युक्तियाँ हैं, यह बात कही जा चुकी है । पञ्चेन्द्रियोंकी क्षमताकी सीमामें साधनोंके साहित्य, राहित्यसे अन्तर पड सकता है । फिर भी उनकी इस सीमामे कोई अन्तर नहीं होता कि श्रोत्रसे शब्दका ही ग्रहण होता है, रूपका नहीं; घ्राणसे गन्धका ही ग्रहण होता है, शब्दका नहीं, इत्यादि । ‘अचेतनसे चेतनकी उत्पत्ति होती है’ इस सम्बन्धमें कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है । विज्ञानमे परिवर्तन आये दिन होता ही रहता है । इसका अपलाप प्रौढिवादसे नहीं हो सकता । जैसे बुर्जुआलोग बन्धी पगडण्डीके अन्धविश्वासी हैं, वैसे ही मार्क्सवादी राजमार्गको छोड़कर विपथगामी होनेके अन्धविश्वासी हैं । कोई भी मार्ग हो आखिर मार्ग ही है, उसपर चलनेसे वैज्ञानिक जाँच होती रहे; परन्तु इसीसे एकान्तनिश्चित सिद्धान्तका परित्याग नहीं किया जा सकता । धार्मिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक कोई भी कार्यपद्धति अनिश्चित अवस्थामें नहीं चल सकती । एक निश्चिन चिकित्सापद्धतिको छोड़कर कोई बुद्धिमान् अपने शरीरको नवसिखिये वैज्ञानिकोंकी प्रयोगशाला बनानेको प्रस्तुत न होगा । जिस आध्यात्मिक, धार्मिक सत्य-निर्णयसे लौकिक, पारलौकिक कल्याणका सम्बन्ध है, उसे अनिश्चित अवस्थामें डालकर कोई भी बुद्धिमान् संतुष्ट नहीं हो सकता । फिर विज्ञानकी भी तो कुछ सीमाएँ हैं । यह कहा जा चुका है कि घ्राण या रसनाद्वारा रूप या शब्दके निर्णयकी वैज्ञानिक चेष्टा व्यर्थ ही है । मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘ज्ञान-विज्ञान सभी मनुष्यके कर्म और विचारके बीच सृष्ट होते हैं। वैज्ञानिक तत्त्व पारस पत्थरकी तरह एकाएक नहीं मिल जाता । मनुष्यके कर्म और विचारकी क्षमता उसकी शिक्षा पारिपार्श्विक और यन्त्रादिके ऊपर यदि अलौकिक प्रेरणा ही ज्ञानका मूल होती तो पाँच सालकी उम्रका बालक भी जगलमें बैठकर ही सब कुछ आविष्कार कर लेता । वैज्ञानिक सिद्धान्तोंकी आपेक्षिकताका कारण यह है कि वैज्ञानिक ज्ञान उत्पादन-व्यवस्थाकी उन्नति तथा वैज्ञानिक शिक्षाका स्तर और पारिपार्श्विकके
ऊपर निर्भर हैं। दूसरा कारण यह है कि वैज्ञानिक तत्त्वका संग्रह हम भूत-जगत्से करते हैं। यदि यह भूत-जगत् अपरिवर्तनीय होता तो हम सब कुछ बिना अवशिष्टके जान सकते। लेकिन यह भूत-जगत् ही द्वन्द्वात्मक रीतिसे बनता- बिगड़ता है। इस ध्वंस और निर्माणके एक विशेष अंगको अलगकर इसकी परीक्षाकर अपनी ज्ञानकी सत्यताको हम प्रमाणित करते हैं। परन्तु द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद हमको आगाह कर देता है कि चरम ज्ञानकी खोज मत करो, क्योंकि जिसको जान रहे हो, उसीका कोई चरम शेष नहीं है। भूत जगत् निरन्तर परिवर्तित हो रहा है। नुख्ताबन्द घोड़ेकी तरह चलनेवाले बुर्जुआ दार्शनिक तब नसीब ठोककर कहते हैं—'इसीलिये तो सभी माया है, हम कुछ नहीं जान सकते, परम पिता परमेश्वर ही जान सकते हैं।' व्यावहारिक ज्ञान यह सिद्ध करता है कि भूत-जगत्को हम जान सकते हैं। वह इसका पूर्व विभाग है, लेकिन इसकी कोई सीमा नहीं है। यदि तुम्हारा यह ख्याल है कि एक विराम-दण्ड खींचे बिना तुम्हारे मनको सान्त्वना नहीं मिलेगी, समुद्रके उच्छ्वासके स्तब्ध हुए बिना समुद्रका ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकेगा, तो यह तुम्हारी दुर्बलता है। न भूत-जगत्का कोई अपराध है, न वैज्ञानिक धाराकी कोई त्रुटि। वैज्ञानिक हर समय नये तत्त्व और नये तथ्यका संधान करता रहता है और हरेक वैज्ञानिक सत्यभूत जगत्के गति-प्रवाहका अपेक्षित और आंशिक विवरणमात्र है। इसको भ्रम कहकर उड़ाया नहीं जा सकता। "भौगोलिक तत्त्वका एक दृष्टान्त लीजिये, भारतवर्षका जो वर्तमान मान- चित्र हम आज देख रहे हैं, वह क्या सदासे ऐसा ही रहा है? दो हजार वर्ष पूर्व भारतवर्षका जो रूप था, वह आजसे बहुत भिन्न था और दस हजार वर्षोंके बाद इसका रूप और भी बदल जायगा। बंगालकी खाड़ीके बीच रेत उठ सकती है, कोई पहाड़ ऊँचा या नीचा हो सकता है। किसी नदीका प्रवाह बदल सकता है। इसलिये आजका मानचित्र, जो परीक्षित सत्य है, दस हजार वर्ष बाद एक ऐतिहासिक सत्यमात्र रह जायगा। ग्रीनलैंडकी वर्तमान अवस्थाके वर्णनका दो हजार वर्ष पूर्वकी अवस्थासे कोई सम्बन्ध नहीं है। आज वह जनविहीन है। एक समय वह जन- बहुल था और वहाँका जलवायु मनुष्यके निवासके लिये उपयुक्त था। यह भौगोलिक सत्य चरम सिद्धान्त नहीं हो सकते, क्योंकि भौगोलिक अवस्था परिवर्तन- शील है। वैज्ञानिक सिद्धान्त भी इसीलिये आपेक्षिक हैं। तथापि यह परीक्षासिद्ध और कार्यकारी है। तर्ककी आतिशबाजीसे इस सत्यको उड़ाया नहीं जा सकता। "वैज्ञानिक सत्यमें कुछ दूसरे प्रकारकी आपेक्षिकता है। एक दृष्टान्त ले लीजिये। जब चन्द्रके ऊपर पृथ्वीकी छाया पड़ती है, तो हम कहते हैं कि चन्द्र- ग्रहण हो गया। हमारी यह दृष्टि पृथ्वीसे सम्पृक्त है। इसी घटनाको यदि कोई चन्द्रके ऊपरसे देख ले तो वह कहेगा कि सूर्यग्रहण हो गया; क्योंकि चन्द्रके ऊपर-
मा० रा० ३८—
५९४ मार्क्सवाद और रामराज्य से वह देखेगा कि सूर्यके ऊपर पृथिवीकी छाया पड़ी है। जिस घटनाका यह अवलोकन किया जा रहा है, वह न भूल है और न मायादृष्टिकेन्द्र (फ्रेम-आफ- रिफरेन्स) की विभिन्नताके कारण एक ही घटना दो प्रकारसे दीख रही है। यहाँ भी वैज्ञानिक ज्ञानकी आपेक्षिकता प्रमाणित हो रही है। सत्य आपेक्षिक है सही, लेकिन इस आपेक्षिकताको अति तक पहुँचाया जा सकता है और तब यह हास्यास्पद बन जाता है। इसी प्रकारकी आपेक्षिकताकी आड़ लेकर वर्तमान पूँजीवादी भविष्यके एक वैज्ञानिक चित्रको देखनेसे मुँह मोड़ता है। सत्यकी परिभाषा करते हुए लेनिनने लिखा है कि यह दृश्यगत घटनाके सब पहलुओंका जोड है, उनकी वास्तविकता है, पारस्परिक निर्भरता है।'" अध्यात्मवादी इसे अनुक्तोपालम्भ कहते हैं। यह रामराज्यवादीका कभी भी मत नहीं है। विज्ञानके लिये शिक्षा अपेक्षित नहीं है। अवश्य ही शिक्षा, विचार, कर्म और पारिपार्श्विक यन्त्र आदि ज्ञान-विज्ञानमें सहायक होते हैं। इन सामग्रियोंसे एक ज्ञानशक्तिसम्पन्न चेतनको ही ज्ञान-विज्ञान उत्पन्न होते हैं। इन सब सामग्रियोंके रहनेपर भी किसी काष्ठ, पाषाणको ज्ञान-विज्ञान नहीं सम्पन्न होता । काष्ठमें अग्नि है, तिलमें तैल है—वह प्रयत्नसे प्रकट होता है। इसी तरह चेतन प्राणीमें ज्ञानशक्ति है, वही प्रयत्नसे व्यक्त होती है। इसमे पूर्वके संस्कार भी हेतु होते हैं। आद्य शंकराचार्य आठ ही वर्षकी अवस्थामें सर्वशास्त्रोके विद्वान् हो गये थे, परंतु सबमें यह क्षमता नहीं। ध्रुवको ईश्वरके विशेष अनुग्रहसे सम्पूर्ण ज्ञान हो गया था। गीताके कृष्ण तो स्वीकार करते हैं कि भगवान् आराधनाओंसे संतुष्ट होकर प्राणीको वह ज्ञानयोग प्रदान करते हैं, जिससे वह भगवान्को प्राप्त कर लेता है— ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते । (गीता १०।१०) बहुत प्रकारके ज्ञान पशु-पक्षियोको भी होता ही है, हसका क्षीरनीर- विवेक, मधुमक्खियोद्वारा मधुका निर्माण, भेड़ियों, बाजो तथा बिल्ली आदिद्वारा शिकारकी दक्षता आदि गुण बिना शिक्षाके भी हो जाते हैं। पक्षियोंमें उड़नेकी कला, मछलियोंमें तैरनेकी कला जन्मजात ही होती है; फिर वैज्ञानिकोंका घमण्ड क्या अर्थ रखता है ? भूतजगत्का परिवर्तन तो परिणामवादी, आरम्भवादी सभी मानते हैं; परंतु उनके भी कुछ नियम हैं ही। वैज्ञानिकोको भी कुछ नियम निश्चित करने पडते हैं। मार्क्सवादियोको भी आखिर निर्वाण एवं निर्माणका नियम तथा परिवर्तनशील होनेका नियम, क्रम-परिवर्तन और क्रान्तिकारी परिवर्तन आदिके कुछ-न-कुछ नियम मानने ही पडते हैं। द्वन्द्वात्मक रीतिसे बनने-बिगड़नेका भी आखिर नियम हुआ ही। जैसे कूपमण्डूक या उदुम्बरफलके बीचमें रहनेवाला नगण्य जन्तु अपनी जानकारीको ही बहुत मानता है, उसी तरह मार्क्सवादी अपनेको सर्वज्ञ होनेका घमण्ड करते है। पर वस्तुस्थिति यह है कि हर बातमें वैज्ञानिककी भी खोपड़ीपर अज्ञान ही सवार रहता है। समझदार वैज्ञानिक नत-
मस्तक होकर यही कहता है कि 'आजका सबसे बडा ज्ञान यही है कि अभी हमलोग कुछ भी नहीं जानते ।' फिर विज्ञान या वैज्ञानिकको यह अधिकार कहाँसे प्राप्त हुआ कि वह अन्तिम सत्य ज्ञानकी खोजको मना करे ? अल्पज्ञान ( अधूराज्ञान ) और सम्यक् ज्ञानका भेद स्पष्ट प्रतीत हो तो किसी भी सम्बन्धमें तत्त्वज्ञानकी रुचि स्वाभाविक है । सिवा अल्पज्ञके आज भी कौन दावा कर सकता है कि हम सभी भूत-जगत्को जानते हैं ? ० वैज्ञानिक हो चाहे और कोई, वह सत्यको बनाता नहीं; किंतु सत्यकी जान- कारी प्राप्त करता है । यथाभूत वस्तु ही सत्य कहलाती है, उसको अयथाभूत जानना भ्रान्ति है । एक अल्पायु अज्ञ प्राणी अपने परिमित साधनोंसे, निःसीम संसारमेंसे बहुत-सी वस्तुओंको बहुत अंशमें जानता है, उन्हींको नयी नयी वस्तु, नये-नये तथ्यके रूपमें जानता-समझता है । परंतु एतावता दीर्घायु, दीर्घतपा, दीर्घ- दर्शियोंकी ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा होनेवाले परमार्थ सत्यज्ञानका अपलाप नहीं किया जा सकता । भौगोलिक उथल-पुथलका परिज्ञान भी उन महातपस्वियोंको था ही । [L1
प्रातिभासिक सत्य होते हैं। आकाशादि व्यवहारकालमें अबाधित होनेसे व्यावहारिक सत्य हैं। सर्वाधिष्ठान; अखण्डबोधस्वरूप सर्वसाक्षी अत्यन्ताबाध्य होनेसे वही परमार्थ सत्य है। "प्रेग्मेटिज्मके जन्मदाता विलियम जेम्सका कहना है कि जिसकी व्यावहारिक उपयोगिता है, वही सत्य है। सत्य हमारे विचारोंमें प्रतिबिम्बित वास्तविकताका रूप नहीं है, बल्कि जो व्यक्तिविशेषकी भावनाओ और आवश्यकताओके साथ खप जाता है। शीलरका मत भी इसी प्रकार है। सामाजिक मनुष्य वास्तवभूतकी विचार-क्रियासे सत्यपर उपनीत नहीं होता, बल्कि मनुष्य ही सत्यकी सृष्टि करता है। पिलैंडेलोके नाटक 'तुम सही हो, यदि तुम अपनेको ठीक समझते हो' में इस दर्शनवादका सुन्दर चित्र मिलता है। तुमको हाँ या ना करनेके लिये दस्तावेज- का प्रमाण चाहिये। मेरे लिये इनकी कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि मेरी रायमें इन दस्तावेजोंमें सत्यका निवास नहीं, बल्कि उन व्यक्तियोके मनमें है, जिनके अन्दर सिवा उन्होंके दिये हुए प्रमाणसे हम प्रवेश नहीं कर सकते। डीवीके शब्दोमे 'हमारे लिये सत्य वही है, जिससे हमको सहायता मिलती है और जिसका हमारे ऊपर प्रभाव है।' प्रयोजनवादका सारतत्त्व यही है कि व्यावहारिकता ही हमारे लिये सब कुछ है। इससे अधिक हम कुछ नहीं जान सकते। यह दर्शन साम्राज्यवादकी अवनतिका द्योतक है।" मार्क्सवादियोका यह कहना कि 'अन्य दर्शन मायाविमूढकी तरह हमें पथ- भ्रष्ट करते हैं, मार्क्सयदर्शन जीवनपथ निर्देश करता है' अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना है। जैसे किसी आंशिक दृष्टिकोणसे मार्क्सयदर्शन दर्शन कहला सकता है, वैसे ही अन्य पाश्चात्त्य-दर्शन भी भारतीयदर्शनोंकी दृष्टिसे तो यह-सब 'दर्शन' कहलानेके योग्य ही नहीं हैं। समुचित प्रमाण, प्रमेय, फल तथा साधनोका निरूपण पूर्णरूपसे किसी पाश्चात्त्य दर्शनमे नहीं है। छायावादी ढंगके वाक्योंसे केवल आपेक्षिक एकाङ्गी दृष्टिकोणसे ही सिद्धान्तोका निरूपण किया जाता है। इस दृष्टिसे उपर्युक्त दृष्टिकोण ठीक नहीं है। हजार अन्य सत्य भले ही हो, परंतु प्रयोजनवादी- के लिये अगर वे उपयोगी नहीं तो प्रयोजनवादी दृष्टिकोणसे व्यर्थ ही हैं। शीलरका सत्य भी इसी दृष्टिका है। अपनी सच्चाई-झुठाई प्राणी जितना अपने आप जान सकता है उतना दूसरा नहीं समझ सकता। इस दृष्टिसे 'तुम सही हो यदि तुम अपने आपको ठीक समझते हो,' कितनी सुन्दर बात है। दर्शन साम्राज्यकी अवनतिका जीता-जागता नमूना तो है, मार्क्सका जडवादी दर्शन, जिसमें 'धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' के बदले 'अर्थो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' के सिद्धान्तको भी सिद्धान्तनामसे पुकारा जाता है। आमतौरपर वादि-प्रतिवादि-सम्भव प्रमाणो, तर्कों, सिद्धान्तोंके आधारपर ही विप्रतिपन्न विषयोंकी सिद्धि की जाती है। परंतु मार्क्सवादी किन्हीं भी सिद्धान्तो-
तथ्यो, न्यायोँको स्थिर नहीं मानते । कारण, उन कसौटियोँपर वे एक क्षण भी नहीं टिक सकते । अतः उनके पास यह कहनेके सिवा कि 'परमात्मा, ईश्वर, धर्मके अतिरिक्त मार्क्सवादी स्थिर आत्माका भी अस्तित्व नहीं मानता', कोई दूसरा चारा नहीं । भला इसे दर्शन भी कैसे कहा जा सकता है ? मार्क्सवादी स्वयं ही कहते हैं—'जो दार्शनिक जिस परिस्थितिमें रहता है, उसी ढगका उसका दर्शन होता है', एतावता सिद्ध है कि उस दर्शनपर उस दार्शनिकके दिमागी फितूरके अतिरिक्त सत्यका अश कुछ भी नही रहता । कांटका ज्ञान-सिद्धान्त “काट इससे सहमत है कि हमारा ज्ञान अनुभवसे आरम्भ होता है और इस अनुभवकी प्रारम्भिक बात है—बाहरी वस्तुओका अस्तित्व । वह केवल इस बातसे इनकार करता है कि यहीं इसका अन्त होता है; क्योंकि हमें ऐसी चीजोँका ज्ञान है जो अनुभवसे परे हैं । वह इसको मान लेता है कि शेषोक्त प्रकारका ज्ञान पूर्वोक्त प्रकारके ज्ञानका अनुमान कर लेता है । क्योंकि यह कैसे सम्भव है कि पहचान ( ज्ञान ) की शक्तिका उद्वोध न हो सिवा उन वस्तुओँके सयोगसे, जिनका प्रभाव हमारी इन्द्रियोँपर पड़ता है और जो स्वयं अपने प्रतिबिम्ब उत्पन्न करती हैं और अशतः हमारी बुद्धिको जाग्रत् करती हैं, ताकि वह इन प्रतिबिम्बोँकी तुलना कर सके, इनको जोड़ सके तथा अलग-अलग कर सके और इस प्रकार हमारे इन्द्रिय लब्ध चित्रोंके सच्चे मालको वस्तुओके ज्ञानके रूपमें परिणत करता है और जिसको हम अनुभवका नाम देते हैं । इसलिये समयके ख्यालसे हमारा कोई ज्ञान अनुभवसे पहले नहीं है बल्कि इसके साथ ही आरम्भ होता है । “वह आगे चलकर कहता है कि 'ज्ञानका एक और अङ्ग है । यद्यपि हमारा ज्ञान अनुभवसे आरम्भ होता है, इसका यह अर्थ नहीं कि अनुभवसे ही सब ज्ञ नकी उत्पत्ति होती है । क्योकि इसके विपरीत यह बहुत सम्भव है कि जो कुछ हमको इन्द्रिय-सयोगसे प्राप्त होता है और जो कुछ हमारी पहचानकी शक्ति स्वयं, अपना अंश मिलाती है, इन दोनोके मिश्रणसे ही हमारा व्यावहारिक ज्ञान बनता है । लेकिन मुद्दतकी आदतसे ही हमारे अन्दर वह कौशल और एकाग्रता आती है, जिससे हम इन दोनोंको पृथक् करनेमें समर्थ होते हैं । काटके पहलेके दार्शनिक दो मुख्य दलोमें बँटे हुए थे, एक भौतिकवादी जो इन्द्रियानुभव तथा उसके ऊपर सोच विचारके दूसरे रास्तेद्वारा बाहरी दुनियाँसे एक ज्ञानकी उत्पत्ति बताते थे और दूसरे आदर्शवादी, जो कहते थे कि मानसमें ऐसे विचार हैं, जिनका कारण नहीं बताया जा सकता । ऐसे विचार जिनकी सार्व- भौमिकता और अमूर्तरूप यह निर्देश करता है कि ये स्वयं प्राप्त हैं और सब अनुभवके मूलमें हैं ।
"कांटकी ऐतिहासिक स्थिति यह है कि, दोनो दृष्टिकोणोंके समन्वयके द्वारा उसने इस विरोधका अन्त किया । और उसका यह दावा था कि इस नये दृष्टि- कोणमें उसने इन दोनोंका सम्मेलन एक ऊँचे स्तरपर कराया है। उसने यह मान लिया कि स्थान, काल, कारण इत्यादि अमूर्त कल्पनाओको केवल अनुभवमें रूपान्तरित नहीं किया जा सकता, दूसरी ओर यद्यपि ये स्वयं प्राप्त हैं। यह कल्पना नहीं की जा सकती कि ये बिल्कुल ही अनुभवपर निर्भर नहीं हैं। उसका दावा था कि वास्तविकता यह है कि सब अनुभवके मूलमें पूर्व परि- स्थितिके रूपमे ये विद्यमान हैं और इस तरह ये अनुभवके रूपोंका निर्णय करते हैं। "उसने यह दलील दी कि बाहरी वस्तु और दूसरी मानव बुद्धि—ये ज्ञान- के दो उद्गम नहीं हैं—ज्ञानका एक ही उद्गम है—वह है कर्ता और कर्म (बुद्धि- युक्त मनुष्य और वस्तु) का सम्मेलन । जैसे जलका कारण अम्लजन और उद्- जनका सम्मेलन है। यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि जलके दो कारण हैं, किंतु दोनोका सम्मेलनरूप एक ही कारण है । उसी तरह प्रकृतमें भी समझना चाहिये । कर्ता और कर्मका सम्मेलन ही जलका कारण है । सारा ससार हमारे लिये दृश्यमान घटनाओंकी एक परम्परा है । क्या ये दृश्य मानसकी उपज हैं, जिसके सामने ये दर्शित होते हैं या कि ये वस्तुओके विशुद्ध प्रतिनिधि हैं ? आदर्शवाद या वस्तुवाद—दोनोमेसे कोई नहीं और दोनो मानव और वस्तु सयुक्त होकर दृश्य या प्रत्यक्षीकरणको उत्पन्न करते हैं। अत्यक्षीकरण दोनोके सम्मेलनका ही फल है।" 'अनुभवसे ज्ञानका आरम्भ होता है', इत्यादि काटका कथन इन्द्रिय-व्यापार व्यादिके अभिप्रायसे सङ्गत होता है। इन्द्रिय, मन, अहंकार एवं बुद्धिके व्यापारो- को ही अनुभव, सकल्प आदि अनेक नाम दिये गये हैं। वस्तुतः ये सभी जड हैं। जडोमे जब अपने ही प्रकाशकी शक्ति नहीं है, तब उनसे विषय-प्रकाशकी कल्पना सर्वथा निरर्थक है। मन या अन्तःकरणकी वृत्ति भी ज्ञानपदसे कही जाती है, परंतु यह सब कथन औपचारिक ही है । इन्ही जड व्यापारोकी उत्पत्ति और नाश कहा जा सकता है । सर्वप्रकाशक बोधका न प्रागभाव सिद्ध होगा और न तो प्रध्वंसाभाव ही। वस्तुओके संयोगसे इन्द्रियोंपर प्रभाव पड़ता है और विषय- रूपी वस्तुओका प्रतिबिम्ब भी वृत्तिमें उत्पन्न हो बुद्धिके जागरणमें भी वस्तुओंका उपयोग होता है। फिर भी इनके द्वारा नित्य-बोधकी अभिव्यक्ति ही होती है, उत्पत्ति नहीं। जैसे काष्ठोंके संघर्षसे दाहकत्व-प्रकाशकत्वविशिष्ट अग्निका प्राकट्य होता है, ठडे-गरम तारोके योगसे विद्युत्प्रकाशका प्राकट्य होता है, किंवा सूर्य- कान्तमणिके योगसे व्यापक सौरालोकका अग्निके रूपमें प्राकट्य होता है, स्वच्छ काच आदिके योगसे सौरालोक चमत्कृत होता है, उसी तरह वृत्तियोंके योगसे व्यापक अखण्ड बोध चमत्कृत होता है। इस तरह अनुभव और ज्ञानका भिन्न-
भिन्न अर्थोंमें प्रयोग केवल ज्ञानको उपाधियोंमें ही होता है। वस्तुतः स्वतन्त्र नित्य नीरूप चित्प्रकाश ही अनुभव एवं ज्ञान आदि शब्दोंका लक्ष्य अर्थ है। व्याव- हारिक ज्ञान-पहचान, अनुभव, इनकी उत्पत्ति, विनाश, स्पष्टता, अस्पष्टता, एकता एवं अनेकता--ये भी बातें इन्द्रिय, मन, अहंकार एवं बुद्धिके ही विभिन्न व्यापारोंसे सम्भव हैं। परंतु एक समान प्रकाश तो सर्वत्र एक-सा ही रहता है। उसी एक नित्यप्रकाशको ही किन्हीं पाश्चात्त्योंने मानसमे स्वयंसिद्ध माना है। अतएव 'अनुभवकी स्पष्टता या उसका निरूपण बाह्यवस्तुसापेक्ष है'--यह कांटका कथन भी इसी दृष्टिसे सङ्गत होता है। बुद्धियुक्त मनुष्य और बाह्यवस्तुओंसे अनुभव उत्पन्न होता है, यह कथन भी वृत्तिरूप ज्ञानके सम्बन्धमें है। बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानके उत्पन्न होनेपर उसीके द्वारा नित्य ज्ञानका प्राकट्य होता है। यद्यपि परमार्थ सत्य यही है कि सम्पूर्ण संसार मानसकी ही उपज है। इतना ही क्यों ? मानस भी तो अखण्ड बोधका ही एक भ्रान्तिसिद्ध रूप है। क्या हम देखते नहीं कि स्वप्नका देह, स्वप्नका प्रपञ्च, स्वप्नका सभी दृश्य एक ढंगके बोधका ही विवर्त है। कुछ निम्नस्तरकी दृष्टिसे मानस ओर बाह्य-वस्तुओंके सम्मेलनसे प्रत्यक्षीकरण आदि व्यापारके भासक साक्षीका अपलाप नहीं किया जा सकता। “हीगेलके बहुतेरे सिद्धान्तोका मूल कांटके दर्शनमें मिलता है। जब कांटने सब सम्भव ज्ञानके क्षेत्रको उन रूपोंमें सीमित कर दिया, जिनमें मनुष्य बाहरी दुनियाँको देखता है तो उसने हीगेलके इस वाक्यकी नींव डाली कि जो कुछ वास्तव है, वह तर्कसङ्गत है और जो कुछ तर्कसङ्गत है, वह वास्तव है। यह ठीक है कि कांटने अस्वीकार किया कि वस्तुस्वरूपका कोई ज्ञान प्राप्त हो सकता है, लेकिन हीगेलको दो दिशाओंमें यह असम्बद्ध मालूम हुआ। पहली बात तो यह है कि इस सिद्धान्तके अनुसार कि 'विचाररूप' के अंदरकी वास्तविकताको देनेवाला अनुभव ही है। वस्तुस्वरूप नामक विचाररूप तभी सत्य हो सकता है, जब इसकी उत्पत्ति किसी अनुभवसे ही हो। दूसरी बात यह है कि दृश्यगत घटनाओंमें तथा इनके और बुद्धिके बीचके सम्बन्धमें ही अनुभवका निवास है। एजिल्सने इसीका भाषान्तर करके कहा 'यदि हम किसी वस्तुके सभी गुणोंको जान लें, तो वस्तुस्वरूपके विषयमें कुछ आविष्कार करना बाकी नहीं रह जाता, सिवा इसके कि वह वस्तु हमारे बाहर है और उसका अस्तित्व हमारे ऊपर निर्भर नहीं है। “इन्द्रियानुभूतिवादियो ( लॉक इत्यादि ) के खण्डनकी क्रियामें कांटके सिद्धान्तोंने उसको यह कहनेके लिये बाध्य किया कि हम पृथक् रूपसे केवल गुणों- का प्रत्यक्षीकरण नहीं करते। सम्पूर्ण प्रत्यक्षकारी संज्ञा क्रियाशील प्रत्यक्षीकरणमें सम्पूर्ण बाहरी वास्त^ ताकें द्वारा संशोधित और परिवर्तित होती है। हीगेलने इन
दोनों सम्पूर्णोंको एक विकासमान सम्पूर्णके धनात्मक और ऋणात्मकरूपमें माना और इस प्रकार पूर्ण आदर्शवादको पहुँचे । 'काटने कर्ता और कर्म ( वस्तु ) के विरोधात्मक एकत्वको अपनी दर्शन-व्यवस्थाका केन्द्र बनाया । लेकिन उसकी इस कल्पनामे यह असङ्गति थी कि एक ही ओर यानी कर्ताकी ओर ही यह एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है । हीगेलने इस असङ्गतिको दूर किया और इस बुनियादपर अपनी सारी प्रथाका निर्माण किया कि सत्यका अवस्थान न केवल शुद्ध कर्तामें और न केवल शुद्ध वस्तुमें है, बल्कि इनके बीचके क्रियाशील सम्बन्धमें है—जिस सम्बन्धके द्वारा कर्ता और वस्तु, दोनोंमें क्रमवर्धनशील रूपान्तर होता रहता है । आदर्शवादके स्तरपर यह कल्पना हमको ले जाती है, मार्क्सीय विश्वकल्पनाकी ओर । आदर्शवादने क्रियाशील पक्षको विकसित किया, लेकिन केवल अमूर्त- रूपमें द्वन्द्वमान, तर्क और विचारके व्यापक नियमोंके विकासमें तथा मनुष्यकी मस्तिष्क-क्रियाकी सीमाओंको रेखाङ्कित करनेमें । वस्तुओंके द्वारा रक्तमांससम्पन्न मनुष्य-व्यवहारके क्रियाशील पक्षका विकास भौतिकवादियोंने किया नहीं और आदर्शवादी अपने आदर्शवादके कारण कर न सके । “प्रारम्भमें दिये गये ज्ञानकी परिभाषाका द्वन्द्वात्मकरूप अब समझा जा सकता है । मनुष्यके बाहर स्थित प्रकृति ही ज्ञानका उद्गम है । ज्ञानप्रक्रिया मनुष्य और वस्तुके बीच एक क्रिया प्रतिक्रिया है जो मनुष्य और वस्तुको भिन्न बना देती है ज्ञात होनेके कारण । ज्ञात वस्तु अपने पहले रूपसे विभिन्न बन जाती है और ज्ञानी मनुष्य भी अपने पहले रूपसे भिन्न है । ज्ञानका मूल है मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया—वस्तुओंके द्वारा, अनुभवके द्वारा । ज्ञान- प्राप्तिकी पहली सीढ़ी है इन्द्रियानुभूति । इन्द्रियानुभूति कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो मनुष्य-अवयवके साथ सदा एक-सी बनी रहती हो । यह इन्द्रियानुभूति एक विशेष उपज है और यह पैदा होती है पशुओकी इन्द्रियानुभूतिसे भिन्नरूपमें; ऐतिहासिक, सामाजिक प्रयोगकी बुनियादपर । सामाजिक ज्ञानका विकास इन्द्रियानुभूति तथा युक्तियुक्त ज्ञान दोनोंको समृद्ध करता है । किसी भी असभ्य मनुष्यके विचार और इन्द्रियानुभूतिका स्तर इतना निम्न होता है कि किसी सभ्य मनुष्यसे उसकी तुलना नहीं हो सकती । उसके निम्नस्तर और अत्यन्त सीमित पार्थिव आचार-व्यवहारपर ही उसके विचार और इन्द्रियानुभूति दोनों ही निर्भर हैं । ज्ञानकी दूमरी सीढ़ी है तर्कबुद्धि । यह बुद्धि भी प्रयोग और व्यवहारके द्वारा आती है ।" वृत्तिरूप ज्ञानका ही क्षेत्र किन्हीं रूपोंमें सीमित हो सकता है । निर्विषय, निर्द्वन्द्य शुद्धबोधके सम्बन्धमें यह नहीं कहा जा सकता । साथ ही बाह्यरूप भी
मार्क्ससीय समाज-व्यवस्था ६०१ सीमित नहीं है। केवल जो कुछ मानवबुद्धिग्राह्य है वही सब कुछ नहीं है। मनुष्यकी अल्पज्ञता तो स्पष्ट ही है। यदि हम वस्तुका सभी गुण जान लें तो वस्तु- स्वरूपके विषयमें कुछ आविष्कार बाकी नहीं रह जाता। ऐंजिल्सका यह विचार भी आकाशकुसुमकी कल्पना ही है। स्वाप्निक दृश्यवस्तु जैसे द्रष्टापर ही निर्भर होती है, उसी तरह जाग्रत्-प्रपञ्च भी द्रष्टापर ही निर्भर है। इसीलिये हीगेलको चेतनसे अचेतनकी उत्पत्ति माननेको बाध्य होना पड़ा। कांट और हीगेलके इस भेदमें कोई तथ्य नहीं है कि कर्ता और कर्मका क्रियाशील एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है, या क्रियाशील सम्बन्ध फलोत्पादक है। क्योंकि ज्ञान स्वयं चेतन एवं प्रकाशात्मक होनेसे कर्ताकी जातिका है, अतः कर्ताकी ओर फलोत्पत्तिका व्यवहार होता है—यह काटका अभिप्राय है। निर्विकार, निर्दृश्य अखण्ड बोधमें विषयो- पराग स्वतः सम्भव नहीं है। अतः दृक्, दृश्य, चेतन, अचेतनके अन्योन्याध्याससे ही व्यावहारिक सप्रपञ्च ज्ञान होता है। यही हीगेलका अभिप्राय है। मार्क्सके अनुसार 'मनुष्य एवं वस्तुके बीचकी क्रिया-प्रतिक्रिया ही ज्ञानप्रक्रिया है और ज्ञानका मूल मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया है। इन्द्रियानुभूत और तर्क-बुद्धि ही प्रयोग एवं व्यव- हारके द्वारा युक्तियुक्त ज्ञानका निर्माण करती है।' जहाँतक व्यावहारिक वृत्तिरूप ज्ञानकी बात है, सांख्यवादी भी यही मानते हैं। इतना अवश्य है कि सांख्योंका मनुष्य रक्त मास-अस्थिपञ्जरमात्र नहीं; किंतु वह चेतन असङ्ग आत्मा है। और उसी दृष्टिसे द्रष्टा तथा दृश्य, कर्ता और कर्म, भोक्ता तथा भोग्यका भेद भी सिद्ध होता है। अथवा इससे निम्नस्तरपर उतरें तो कह सकते हैं कि सूक्ष्म सत्त्वात्मक बुद्धि- तत्त्व ही कर्ता या ज्ञाता है। तामस, राजस, स्थूल-प्रपञ्च वस्तु हैं। यही कर्ता, कर्म, ज्ञाता एव ज्ञेयका भेद है। परंतु मार्क्सके अनुसार 'भूत ही सब कुछ है। उसका ही परिणाम वस्तु है, और उसीका परिणाम मनुष्य है।' फिर उसकी क्रिया-प्रति- क्रियामे भी अति विलक्षण प्रकाशरूप ज्ञान किस तरह उत्पन्न हो सकेगा, यह विचारणीय विषय है। व्यवहार और तथ्य मार्क्सवादी कहते हैं कि "भूत पहले या मानस, यह प्रश्न एक दूसरे रूपमें भी जीवनके सामने उठ खड़ा होता है। प्रयोग पहले या सिद्धान्त ? व्यवहार पहले या तथ्य ? इसका उत्तर हमको जीवनपथमें एक विशिष्ट दिशाकी ओर ले जाता है। इस विषयमें मार्क्सवादी दृष्टिकोण भी अपनी विशेषता रखता है। कुछ लोग कहते हे कि प्रयोग और सिद्धान्तमें कोई समन्वय नहीं हो सकता। प्रयोग इम गंदी, स्थूल, असत्य, मायावी दुनियाँकी चीज है। सिद्धान्त चिरसत्य, शिव और सुन्दर है। दोनोंका क्या सम्बन्ध है ? 'सिद्धान्त दर्शन-ज्ञान ही सब कुछ है, इसके अति- रिक्त कुछ है ही नहीं', इस तरहके विचार रखनेवाले लोग मकड़ीकी भाँति अपने भीतरसे सिद्धान्तको निकालते हैं। दूसरे लोग हैं, जो प्रयोगसे एकदम इनकार तो
६०२ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं करते; किंतु वे सिद्धान्तको ही प्रधान मानते हैं । उनकी दृष्टिमें सिद्धान्त प्रयोगकी संतान नहीं है, वह एक स्वयम्भू तत्त्व है । ऐसे मतवालोंके लिये प्रयोगका आश्रित होना निम्नकोटिके लोगोंको ही शोभा देता है । सिद्ध महर्षि इसके ऊपर हैं । यह गौर करनेकी बात है कि प्राचीन भारतका प्रगतिशील युग प्रयोग- निर्भर ही था, जैसा कि अलबेरूनीद्वारा उद्धृत आर्य भट्ट ( ४७६ ई० ) के निम्न सूत्रसे स्पष्ट हो जाता है । 'सूर्यकी किरणें जो कुछ प्रकाशित करती हैं वही हमारे लिये पर्याप्त है । उनसे परे जो कुछ है और वह अनन्त दूरतक फैला हो सकता है, उसका हम प्रयोग नहीं कर सकते। जहाँ सूर्यकी किरणें नहीं पहुँचती, वहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं और जहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं, उसे हम जान नहीं सकते ।' "पूर्वोक्त दृष्टिकोण श्रेणी-विभाजित समाजका और उस समाजमें शारीरिक और मानसिक श्रमके विभाजनका परिणाम है। पूँजीवादमें शारीरिक और मानसिक श्रमका विच्छेद पूरे तौरपर हो जाता है। श्रमके इस विभाजनके कारण प्रयोगसे बिल्कुल स्वतन्त्र होकर सिद्धान्तका निर्माण होता है और ऐसे विद्व
नामक लेखमें हेसेनने न्यूटनपर जो प्रकाश डाला है उससे इस भ्रमका निराकरण होता है कि न्यूटन किसी द्युलोकका स्वप्नद्रष्टा है जिसका पार्थिव व्यवहारसे कोई संस्पर्श नहीं है । उसने यह दिखलाया है कि न्यूटनने जिन समस्याओंका समाधान किया है, उनकी उत्पत्ति उस समयके मानव-समाजकी व्यावहारिक आवश्यकताओं- से ही हुई है ।” ‘भूत पहले या मानस’ यह प्रश्न इस अभिप्रायसे है कि दृक्-दृश्य, ज्ञान- ज्ञेय इनमेंसे कौन पहलेसे है ? यदि मानसका अर्थ उस मानससे है जो कि एक आन्तर इन्द्रिय या सूक्ष्म पञ्चमहाभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंगोसे निर्मित अन्तः- करणरूपसे प्रसिद्ध है, तब अधिक मतभेद नहीं रह जाता । प्रयोग पहले या सिद्धान्त, व्यवहार पहले या तथ्य ? कोई भी समझ सकता है कि प्रमाणसे ही प्रमेयकी सिद्धि होती है । कभी भी बोधसे ही बोध्यकी सिद्धि होती है । फिर बोध तो वह वस्तु है कि प्रमाण भी उसीसे सिद्ध होता है । इस बोधका प्रागभाव एवं प्रध्वंस समझनेके लिये भी बोध आवश्यक ही है । जड अंगोसे उसका प्रागभाव समझना कठिन ही नहीं असम्भव है । बोधमें सविशेषता लानेके लिये इन्द्रिय- मन आदिका व्यापार आवश्यक होता है । प्रयोगोसे नियमो एव सिद्धान्तोकी जानकारी हेती है, निर्माण नहीं होता । किन-किन वस्तुओंमें क्या-क्या गुण हैं, यह हमारी जानकारीसे पहले भी कम-से-कम भौतिकवादीको तो मान्य होना ही चाहिये । इसलिये व्यापार, विजय-यात्राके कारण भौगोलिक स्थितिका ज्ञान होता है निर्माण नहीं । इसी प्रकार पैदावार, उद्योग, लड़ाई और औजारोंने खनिजके ज्ञानमें सहायता की है, परंतु इनके कारण खनिजका निर्माण नहीं हुआ । कृषिके कारण ऋतुओका ज्ञान भले ही हुआ हो, परंतु ऋतुओका अस्तित्व कृषिके कारण नहीं हुआ । प्रयोगके आधारपर विधमान वस्तुका ही ज्ञान और उपयोग कहा जा सकता है । अग्निकी उष्णता, जलकी शीतलता, वायुकी प्रवहण शीलता, हमारे प्रयोगके आधारपर नहीं बनी । इस तरह प्रयोग और आवश्यकताके अनुसार गुण-उपयोगिता एव सिद्धान्तोका ज्ञान होता है । परंतु गुण-उपयोगिता और सिद्धान्त पहलेसे ही होते हैं । इतना ही क्यो ? सभी प्रवृत्तियोंमें सकल्प या ज्ञान हेतु होते हैं । क्रियाओ, अनुभवोसे जानकारीमें विशेषताएँ होती हैं । ये ज्ञान भी सदा प्रयोगोके आधारपर नहीं होते । व्यवहारमें देखते हैं कि जो गाँवके किसान खेती करते हैं, उन्हे इतना कृषिविज्ञान नहीं रहता जितना पुस्तको और प्रयोगशालाओंके द्वारा विद्यार्थियोंको होता है । सदा संग्राम करनेवालोको भी इतना परिज्ञान नहीं होता जितना एक फील्डमार्शलको, और मजदूरोको शिल्पका इतना ज्ञान नही होना जितना इजीनियरोंको । बुद्धिका महत्त्व तो सभीको मान्य होना ही चाहिये । सहस्रों मनुष्य जो काम नहीं कर पाते, वह काम बुद्धिनिर्मित मशीनोंसे सरलतासे हो जाता है ।
६०४ मार्क्सवाद और रामराज्य
इसी तरह लाखो वर्षोंकी वृत्तियोंसे भी जो ज्ञान सम्पन्न नहीं होता, वह ज्ञान शान्त-समाहित, योग-शक्तिसम्पन्न मनसे हो जाता है । जैसे बुद्धिनिर्मित दूर- वीक्षण या सूक्ष्मवीक्षणसे दूर-सूक्ष्म वस्तुओंका ज्ञान हो सकता है, वैसे ही योग- जन्यशक्तिविशिष्ट मनसे बाह्य प्रयोगके बिना भी अनेक वस्तुओ, उनके गुणो एव सिद्धान्तोंका ज्ञान हो जाता है । 'जहाँ सूर्यकी किरणे नहीं पहुँचतीं वहाँ इन्द्रियोकी गति नही और जहाँ इन्द्रियोकी गति नही, उसे हम जान नहीं सकते'— यह कथन योगज-ज्ञानविहीन व्यक्तियोके लिये ही ठीक है । यह भी रूपवान् वस्तुके ही सम्बन्धमें कहा गया है । शब्द और स्पर्शके सम्बन्धमें सूर्यकिरणे प्रकाश नहीं फैला सकतीं; फिर भी श्रोत्रत्वके द्वारा उनका ज्ञान होता ही है । प्रकृति-परमाणु आदिका ज्ञान अनुमानसे होता है। इन्द्रियो, मन एव बुद्धिमें सूर्यकी किरणे नहीं पहुँचतीं; फिर भी उनका ज्ञान साक्षीसे होता ही है। रेडियो, टेलीविजनद्वारा इस समय अतिदूरस्थ शब्द एवं रूपका अनुभव किया ही जा रहा है। यह सामान्य इन्द्रियगतिसे भिन्न ही यान्त्रिक शक्तिका चमत्कार है । इसी तरह यौगिक चमत्कार भी है । रसायनशास्त्रके कारण भी जिन-जिन सम्बन्धोंसे जिन-जिन धातुओंमें सुवर्ण बननेकी शक्ति है, उन्हीं धातुओसे उन्हीं सम्बन्धोंके द्वारा सुवर्णनिष्पत्ति होती है। इसी तरह क्या गणित क्या अन्य विषय—सबमें सिद्धान्त स्थायी ही होते हैं। उनकी जानकारीके लिये ही शिक्षा-प्रयोग आदि अपेक्षित होते हैं। मार्क्सवादी कहते हैं कि "अनुभव सामाजिक प्रयोगोका परिणाम तथा जोड़ है। लेनिनके शब्दोंमें अनुभवमे हमारी बुद्धिपर अनिर्भर होकर बुद्धिके विषयोंका आविर्भाव होता है। मौसमी हवा और सामुद्रिक धाराएँ जीवरूपके आविर्भावके बहुत पहलेसे थीं। मानव-ज्ञान और सामाजिक प्रयोगके आविर्भावके करोड़ों वर्ष पहले ये वर्तमान थीं, लेकिन बहुत दिनोंके समुद्रयात्राके अनुभवसे ही इन हवाओ और धाराओका ज्ञान सम्भव हो सका । फिर लेनिनके ही शब्दोंमें वह इसी रूपमें अनन्तकालसे चली आ रही है। युक्तियुक्त बुद्धिका आधार है, मानव- व्यवहार, जो लाखो बार दोहरानेपर सज्ञाके अंदर तर्कज्ञानके रूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है । यद्यपि व्यावहारिक आवश्यकताओकी पूर्ति के लिये ही सिद्धान्तका जन्म होता है । जन्म ग्रहण करनेके बाद एक सीमातक इसका स्वतन्त्र विकास होता है । और जिस व्यावहारिक आधारपर यह उठ खड़ा होता है, उसको प्रभावित, संशोधित और परिवर्धित किये बिना नहीं रहता । इस प्रकार प्रयोग और सिद्धान्त 'विरोधियोंका एकत्व' है जिनके परस्पर प्रभावका कोई अन्त नहीं है—जबतक मनुष्य-जातिका अस्तित्व है, मानव- व्यवहार प्राथमिक है । गोटेके शब्दोंमें—'आरम्भमें था कर्म' लेकिन चूँकि व्यवहार पूर्णता लाता है, इसलिये प्रयोगका विकास सिद्धान्तको आगे बढाता है और यह पुनः प्रयोगको प्रभावित करता है ।