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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
८३६* मत्स्यपुराण *

दो सौ पाँचवाँ अध्याय

धेनु-दान-विधि

| मनुरुवाच <br> प्रसूयमाना दातव्या धेनुर्ब्राह्मणपुङ्गवे। <br> विधिना केन धर्मज्ञ दानं दद्याच्च किं फलम्॥ १ <br><br> मत्स्य उवाच <br> स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां मुक्तालाङ्गूलभूषिताम्। <br> कांस्योपदोहनां राजन् सवत्सां द्विजपुङ्गवे॥ २ <br> प्रसूयमानां गां दत्त्वा महत्पुण्यफलं लभेत्। <br> यावद्वत्सो योनिगतो यावद्गर्भं न मुञ्चति॥ ३ <br> तावद् वै पृथिवी ज्ञेया सशैलवनकानना। <br> प्रसूयमानां यो दद्याद् धेनुं द्रविणसंयुताम्॥ ४ <br> ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना। <br> चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशयः॥ ५ <br> यावन्ति धेनुरोमाणि वत्सस्य च नराधिप। <br> तावत्संख्यं युगगणं देवलोके महीयते॥ ६ <br> पितॄन् पितामहांश्चैव तथैव प्रपितामहान्। <br> उद्धरिष्यत्यसंदेहं नरकाद् भूरिदक्षिणः॥ ७ <br> घृतक्षीरवहाः कुल्या दधिपायसकर्दमाः। <br> यत्र तत्र गतिस्तस्य द्रुमाश्चेप्सितकामदाः। <br> गोलोकः सुलभस्तस्य ब्रह्मलोकश्च पार्थिव॥ ८ <br> स्त्रियश्च तं चन्द्रसमानवक्त्राः <br> प्रतप्तजाम्बूनदतुल्यरूपाः। <br> महानितम्बास्तनुवृत्तमध्या <br> भजन्त्यजस्रं नलिनाभनेत्राः॥ ९ | **मनुजीने पूछा—**धर्मके तत्त्वोंको जाननेवाले भगवन्! श्रेष्ठ ब्राह्मणको ब्याती हुई गौका दान किस विधिसे देना चाहिये और उस दानसे क्या फल प्राप्त होता है?॥ १॥ <br><br> **मत्स्यभगवान् बोले—**राजन्! जिसके सींग सुवर्णजटित हों, खुर चाँदीसे मढ़े गये हों, जिसकी पूँछ मोतियोंसे सुशोभित हो तथा जिसके निकट काँसेकी दोहनी रखी हो, ऐसी सवत्सा गौका दान श्रेष्ठ ब्राह्मणको देना चाहिये। ब्याती हुई गायका दान करनेपर महान् पुण्यफल प्राप्त होता है। जबतक बछड़ा योनिके भीतर रहता है एवं जबतक गर्भको नहीं छोड़ता, तबतक उस गौको वन-पर्वतोंसहित पृथ्वी समझना चाहिये। जो व्यक्ति द्रव्यसहित ब्याती हुई गायका दान देता है, उसने मानो सभी समुद्र, गुफा, पर्वत और जंगलोंके साथ चतुर्दिग्व्यास पृथ्वीका दान कर दिया, इसमें संदेह नहीं है। नरेश्वर! उस बछड़ेके तथा गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने युगोंतक दाता देवलोकमें पूजित होता है। विपुल दक्षिणा देनेवाला मनुष्य निश्चय ही अपने पिता, पितामह तथा प्रपितामहका नरकसे उद्धार कर देता है। वह जहाँ-कहीं जाता है, वहाँ उसे दही और पायसरूपी कीचड़से युक्त घृत एवं क्षीरकी नदियाँ प्राप्त होती हैं तथा मनोवाञ्छित फल प्रदान करनेवाले वृक्ष प्राप्त होते रहते हैं। राजन्! उसे गोलोक और ब्रह्मलोक सुलभ हो जाते हैं तथा चन्द्रमुखी, तपाये हुए सुवर्णके समान वर्णवाली, स्थूल नितम्बवाली, पतली कमरसे सुशोभित, कमलनयनी स्त्रियाँ निरन्तर उसकी सेवा करती हैं॥ २—९॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे धेनुदानं नाम पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें धेनु-दान-माहात्म्य नामक दो सौ पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०५॥

२०९- सत्यवान्‌का सावित्रीको वनकी शोभा दिखाना

* अध्याय २०६ * | ८३७


दो सौ छठा अध्याय

कृष्णमृगचर्मके दानकी विधि और उसका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>कृष्णाजिनप्रदानस्य विधिकारलौ ममानघ।<br>ब्राह्मणं च तथाऽऽचक्ष्व तत्र मे संशयो महान्॥ १**मनुजीने पूछा—**निष्पाप परमात्मन्! कृष्ण मृगचर्म प्रदान करनेकी विधि, उसका समय तथा कैसे ब्राह्मणको दान देना चाहिये—इसका विधान मुझे बताइये। इस विषयमें मुझे महान् संदेह है॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>वैशाखी पौर्णमासी च ग्रहणे शशिसूर्ययोः।<br>पौर्णमासी तु या माघी ह्याषाढी कार्तिकी तथा॥ २<br>उत्तरायणे च द्वादश्यां तस्यां दत्तं महाफलम्।<br>आहिताग्निर्द्विजो यस्तु तद् देयं तस्य पार्थिव॥ ३<br>यथा येन विधानेन तन्मे निगदतः शृणु।<br>गोमयेनोपलिप्ते तु शुचौ देशे नराधिप॥ ४<br>आदावेव समास्तीर्य शोभनं वस्त्रमाविकम्।<br>ततः सशृङ्गं सखुरमास्तरेत् कृष्णमार्गकम्॥ ५<br>कर्तव्यं रुक्मशृङ्गं तद् रौप्यदन्तं तथैव च।<br>लाङ्गूलं मौक्तिकैर्युक्तं तिलच्छन्नं तथैव च॥ ६<br>तिलैः सुपूरितं कृत्वा वाससाऽऽच्छादयेद् बुधः।<br>सुवर्णनाभं तत् कुर्यादलंकुर्याद् विशेषतः॥ ७<br>रत्नैर्गन्धैर्यथाशक्त्या तस्य दिक्षु च विन्यसेत्।<br>कांस्यपात्राणि चत्वारि तेषु दद्याद् यथाक्रमम्॥ ८<br>मृण्मयेषु च पात्रेषु पूर्वादिषु यथाक्रमम्।<br>घृतं क्षीरं दधि क्षौद्रमेवं दद्याद् यथाविधि॥ ९<br>चम्पकस्य तथा शाखामभ्रणं कुम्भमेव च।<br>बाह्योपस्थानकं कृत्वा शुभचित्तो निवेशयेत्॥ १०**मत्स्यभगवान् बोले—**राजन्! वैशाखकी पूर्णिमाको, चन्द्रमा एवं सूर्यके ग्रहणके अवसरपर, माघ, आषाढ़ तथा कार्तिककी पूर्णिमा तिथिमें, सूर्यके उत्तरायण रहनेपर तथा द्वादशी तिथिमें (कृष्णमृगचर्मके) दानका महाफल कहा गया है। जो ब्राह्मण नित्य अग्न्याधान करनेवाला हो उसीको वह दान देना चाहिये। अब जिस प्रकार और जिस विधानसे वह दान देना चाहिये, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। नरेश्वर! पवित्र स्थानपर गोबरसे लिपी हुई पृथ्वीपर सर्वप्रथम सुन्दर ऊनी वस्त्र बिछाकर फिर खुर और सींगोंसे युक्त उस कृष्णमृगचर्मको बिछा दे। उस मृगचर्मके सींगोंको सुवर्णसे, दाँतोंको चाँदीसे, पूँछको मोतियोंसे अलंकृत कर उसे तिलोंसे आवृत कर दे। बुद्धिमान् पुरुष उस मृगचर्मको तिलोंसे पूरित कर वस्त्रसे ढक दे। उसकी सुवर्णमय नाभि बनाकर उसे अपनी शक्तिके अनुकूल रत्नों तथा सुगन्धित पदार्थोंसे विशेषरूपसे अलंकृत कर दे। फिर क्रमानुसार काँसेके बने हुए चार पात्रोंको उसकी चारों दिशाओंमें रखे। फिर पूर्व आदि दिशाओंमें क्रमशः चार मिट्टीके पात्रोंमें घृत, दुग्ध, दही तथा मधु विधिवत् भर दे। तदुपरान्त चम्पककी एक डाल तथा छिद्ररहित एक कलश बाहर पूर्वकी ओर मङ्गलमय भावनासे स्थापित करे॥ २—१०॥
सूक्ष्मवस्त्रं शुभं पीतं मार्जनार्थं प्रयोजयेत्।<br>तथा धातुमयं पात्रं पादयोस्तस्य दापयेत्॥ ११<br>यानि कानि च पापानि मया लोभात् कृतानि वै।<br>लौहपात्रादिदानेन प्रणश्यन्तु ममाशु वै॥ १२मार्जनके लिये एक सुन्दर महीन पीले वस्त्रका प्रयोग करे तथा धातु-निर्मित पात्र उसके दोनों पैरोंके पास रख दे। तत्पश्चात् ऐसा कहे कि 'मैंने लोभमें पड़कर जिन-जिन पापोंको किया है, वे लौहमय पात्रादिका दान करनेसे शीघ्र ही नष्ट हो जायें।'
८३८* मत्स्यपुराण *

| तिलपूर्णं ततः कृत्वा वामपादे निवेशयेत्।<br>यानि कानि च पापानि कर्मोत्थानि कृतानि च॥ १३<br>कांस्यपात्रप्रदानेन तानि नश्यन्तु मे सदा।<br>मधुपूर्णं तु तत् कृत्वा पादे वै दक्षिणे न्यसेत्॥ १४<br>परापवादपैशुन्याद् वृथा मांसस्य भक्षणात्।<br>तत्रोत्थितं च मे पापं ताम्रपात्रात् प्रणश्यतु॥ १५<br>कन्यामृताद् गवां चैव परदाराभिमर्षणात्।<br>रौप्यपात्रप्रदानाद्धि क्षिप्रं नाशं प्रयातु मे॥ १६<br>ऊर्ध्वपादे त्विमे कार्यं ताम्रस्य रजतस्य च।<br>जन्मान्तरसहस्रेषु कृतं पापं कुबुद्धिना॥ १७<br>सुवर्णपात्रदानात् तु नाशयाशु जनार्दन।<br>हेममुक्ता विद्रुमं च दाडिमं बीजपूरकम्॥ १८<br>प्रशस्तपात्रे श्रवणे खुरे शृङ्गाटकानि च।<br>एवं कृत्वा यथोक्तेन सर्वशाकफलानि च॥ १९<br>तत्प्रतिग्रहविद् विद्वानाहिताग्निर्द्विजोत्तमः।<br>स्नातो वस्त्रयुगच्छन्नः स्वशक्त्या चाप्यलङ्कृतः॥ २०<br>प्रतिग्रहश्च तस्योक्तः पुच्छदेशे महीपते।<br>तत एवं समीपे तु मन्त्रमेनमुदीरयेत्॥ २१<br>कृष्णाजिनेति कृष्णान् हिरण्यं मधुसर्पिषी।<br>ददाति यस्तु विप्राय सर्वं तरति दुष्कृतम्॥ २२<br>यस्तु कृष्णाजिनं दद्यात् सखुरं शृङ्गसंयुतम्।<br>तिलैः प्रच्छाद्य वासोभिः सर्ववस्त्रैरलंकृतम्॥ २३<br>वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु विशाखायां विशेषतः।<br>ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना॥ २४<br>सप्तद्वीपान्विता दत्ता पृथिवी नात्र संशयः।<br>कृष्णकृष्णाङ्कलो देवः कृष्णाजिन नमोऽस्तु ते॥ २५<br>सुवर्णदानात् त्वद्दानाद् धूतपापस्य प्रीयताम्।<br>त्रयस्त्रिंशत्सुराणां त्वमाधारत्वे व्यवस्थितः॥ २६<br>कृष्णोऽसि मूर्तिमान् साक्षात् कृष्णाजिन नमोऽस्तु ते।<br>सुवर्णनाभिकं दद्यात् प्रीयतां वृषभध्वजः॥ २७ | फिर काँसेके पात्रको तिलोंसे भरकर बायें पैरके पास रखे और कहे कि 'मैंने प्रसङ्गवश जिन-जिन पापोंका आचरण किया है, मेरे वे सभी पाप इस कांस्य-पात्रके दानसे सदाके लिये नष्ट हो जायँ।' फिर ताम्र-पात्रमें मधु भरकर दाहिने पैरके पास रखे और कहे कि 'दूसरेकी निन्दा या चुगुली करने अथवा किसी अवैध मांसका भक्षण करनेसे उत्पन्न हुआ मेरा पाप इस ताम्र-पात्रका दान करनेसे नष्ट हो जाय।' 'कन्या और गौके लिये मिथ्या कहनेसे तथा परकीय स्त्रीका स्पर्श करनेसे जो पाप उत्पन्न हुआ हो, मेरा वह पाप चाँदीके पात्रदानसे शीघ्र ही नष्ट हो जाय।' चाँदी तथा ताँबेके बने हुए पात्रोंको पैरके ऊपरी भागमें रखना चाहिये। 'जनार्दन! मैंने अपनी दुष्ट बुद्धिके द्वारा हजारों जन्मोंमें जो पाप किया है उसे आप सुवर्णपात्रके दानसे शीघ्र ही नष्ट कर दें।' यह मन्त्र सुवर्णपात्र दान करते समय कहे। उस समय सुवर्ण, मोती, मूँगा, अनार और बिजौरा नींबूको अच्छे पात्रमें रखकर उस मृगचर्मके कान, खुर और सींगपर स्थापित कर दे। यथोक्त विधिके अनुसार ऐसा करके सभी प्रकारके शाक-फलोंको भी रख दे। महीपते! तत्पश्चात् जो ब्राह्मणश्रेष्ठ प्रतिग्रहकी विधिका ज्ञाता, विद्वान् और अग्न्याधान करनेवाला हो तथा स्नानके पश्चात् दो सुन्दर वस्त्रको धारणकर अपनी शक्तिके अनुसार अलंकृत भी हो, ऐसे ब्राह्मणको उस मृगचर्मके पुच्छदेशमें दान देनेका विधान है। उस समय उसके समीप इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। जो 'कृष्णाजिनेति०'—इस मन्त्रका उच्चारण कर कृष्णमृगचर्म, सुवर्ण, मधु और घृत ब्राह्मणको दान करता है, वह सभी दुष्कर्मोंसे छूट जाता है॥ ११—२२॥<br>जो मनुष्य खुर तथा सींगसहित कृष्णमृगचर्मको तिलोंसे ढककर एवं सभी प्रकारके वस्त्रोंसे अलङ्कृत कर विशेषतया विशाखा नक्षत्रसे युक्त वैशाखमासकी पूर्णिमा तिथिको दान करता है, उसने निःसंदेह समुद्रों, गुफाओं, पर्वतों एवं जंगलोंसमेत सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका दान कर दिया। कृष्णाजिन! तुम कृष्णस्वरूपधारी देवता हो, तुम्हें नमस्कार है। सुवर्णदान तथा तुम्हारे दानसे जिसके समस्त पाप नष्ट हो गये हैं, ऐसे मुझपर तुम प्रसन्न हो जाओ। कृष्णाजिन! तुम तैंतीस देवताओंके आधार-स्वरूप निश्चित किये गये हो और साक्षात् मूर्तिमान् श्रीकृष्ण हो, तुम्हें प्रणाम है। पुनः वृषभध्वज शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायँ—इस भावनासे सुवर्णयुक्त नाभिवाले मृगचर्मका दान |

* अध्याय २०६ * <span style="float: right;">८३९</span>

संस्कृतहिन्दी
कृष्णः कृष्णगलो देवः कृष्णाजिनधरस्तथा।<br>तद्दानाद्धतपापस्य प्रीयतां वृषभध्वजः॥ २८<br><br>अनेन विधिना दत्त्वा यथावत् कृष्णमार्गकम्।<br>न स्पृश्योऽसौ द्विजो राजञ्श्वितियूपसमो हि सः॥ २९<br><br>तं दाने श्राद्धकाले च दूरतः परिवर्जयेत्।<br>स्वगृहात् प्रेष्य तं विप्रं मङ्गलस्नानमाचरेत्॥ ३०करना चाहिये। जो श्यामवर्ण, कृष्णकण्ठ तथा कृष्णचर्म धारण करनेवाले देवता हैं, आपके दानसे पापशून्य हुए मुझपर वे शंकर प्रसन्न हों। राजन्! उपर्युक्त विधिसे कृष्णमृगचर्मका दान देनेके पश्चात् उस प्रतिगृहीता ब्राह्मणका स्पर्श नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह (श्मशानस्था अस्पृश्या) चिताके खूँटेके समान हो जाता है। उसका श्राद्ध और दानके समय दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये। उस ब्राह्मणको अपने घरसे विदाकर फिर मङ्गलस्नान करनेका विधान है॥ २३-३०॥
पूर्णकुम्भेन राजेन्द्र शाखया चम्पकस्य तु।<br>कृत्वाऽऽचार्यश्च कलशं मन्त्रेणानेन मूर्धनि॥ ३१<br><br>आप्यायस्व समुद्रज्येष्ठा ऋचा संस्नाप्य षोडश।<br>अहते वाससी वीत आचान्तः शुचितामियात्॥ ३२<br><br>तद्वासः कुम्भसहितं नीत्वा क्षेप्यं चतुष्पथे।<br>ततो मण्डलमाविशेत् कृत्वा देवान् प्रदक्षिणम्॥ ३३<br><br>पीते वृत्ते सपत्नीकं मार्जयेद् याज्यकं द्विजः।<br>मार्जयेन्मुक्तिकामं तु ब्राह्मणेन घटेन वै॥ ३४<br><br>श्रीकामं वैष्णवेनेह कलशेन तु पार्थिव।<br>राज्यकामं तथा मूर्ध्नि ऐन्द्रेण कलशेन तु॥ ३५<br><br>द्रव्यप्रतापकामं तु आग्नेयघटवारिणा।<br>मृत्युञ्जयविधानाय याम्येन कलशेन तु॥ ३६<br><br>ततस्तु तिलकं कार्यं ब्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम्।<br>दत्त्वा तत्कर्मसिद्धयर्थं ग्राह्याऽऽशीस्तु विशेषतः॥ ३७राजेन्द्र! तत्पश्चात् आचार्य चम्पककी शाखासे युक्त जलपूर्ण कलशके जलसे दाताके मस्तकपर ‘आप्यायस्व समुद्रज्येष्ठा०' आदि सोलह ऋचाओंसे अभिषेचन करे, तब वह दो बिना फटे वस्त्रोंको पहनकर आचमन करके पवित्र होता है। पुनः उस वस्त्रको कलशमें डालकर उसे चौराहेपर फेंक दे। इसके बाद देवताओंकी प्रदक्षिणा कर मण्डपमें प्रवेश करे। तदनन्तर ब्राह्मण उस पीत वस्त्रधारी सपत्नीक यजमानका मार्जन करे। यदि यजमान मुक्तिकी इच्छा रखता हो तो ब्राह्मणसम्बन्धी घटसे उसका मार्जन करे। राजन्! यदि यजमान लक्ष्मीका अभिलाषी हो तो विष्णुसम्बन्धी कलशके जलसे उसका मार्जन करे। यदि राज्यकी कामना हो तो इन्द्रसम्बन्धी कलशके जलसे यजमानके मस्तकपर अभिषेक करे। द्रव्य और प्रतापकी कामना करनेवाले यजमानका अग्निसम्बन्धी कलशके जलसे सिंचन करे। मृत्युपर विजय पानेके विधानके लिये यमसम्बन्धी कलशके जलसे अभिषेक करे। तत्पश्चात् यजमानको तिलक लगाये। दाता ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर कृष्णमृगचर्म-दानकी सिद्धिके लिये उनसे विशेष रूपसे आशीर्वाद ग्रहण करे॥ ३१-३७॥
कृतेनानेन या तुष्टिर्न सा शक्या सुरैरपि।<br>वक्तुं हि नृपतिश्रेष्ठ तथाप्युद्देशतः शृणु॥ ३८<br><br>समग्रभूमिदानस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्।<br>सर्वांल्लोकांश्च जयति कामचारी विहङ्गवत्॥३९<br><br>आभूतसम्प्लवं तावत् स्वर्गमाप्नोत्यसंशयम्।<br>न पिता पुत्रमरणं वियोगं भार्यया सह॥४०नृपतिश्रेष्ठ! इसके करनेसे जो तुष्टि प्राप्त होती है, उसका वर्णन करनेकी शक्ति यद्यपि देवताओंमें भी नहीं है तथापि मैं संक्षेपमें बतला रहा हूँ, सुनिये। वह दाता निश्चय ही समग्र पृथ्वीके दानका फल प्राप्त करता है, सभी लोकोंको जीत लेता है, पक्षीके समान सर्वत्र स्वेच्छानुसार विचरण करता है, महाप्रलयकालपर्यन्त निःसंदेह स्वर्गलोकमें स्थित रहता है, पिता पुत्रकी मृत्यु और पत्नीके वियोगको नहीं देखता।

२१०- यमराजका सत्यवान्‌के प्राणको बाँधना तथा सावित्री और यमराजका वार्तालाप

८४० * मत्स्यपुराण *


| धनदेशपरित्यागं न चैवेहाप्नुयात् क्वचित्।<br>कृष्णोप्सितं कृष्णमृगस्य चर्म<br>दत्त्वा द्विजेन्द्राय समाहितात्मा।<br>यथोक्तमेतन्मरणं न शोचेत्<br>प्राप्नोत्यभीष्टं मनसः फलं तत्॥ ४१ | उसे मर्त्यलोकमें कहीं भी धन और देशके परित्यागका अवसर नहीं प्राप्त होता। जो मनुष्य समाहितचित्त हो कुलीन ब्राह्मणको श्रीकृष्णकी प्रिय वस्तु कृष्ण-मृगचर्मका दान करता है वह कभी मृत्युकी चिन्तासे शोकग्रस्त नहीं होता और अपने मनके अनुकूल सभी फलोंको प्राप्त कर लेता है॥ ३८—४१॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कृष्णाजिनप्रदानं नाम षडधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कृष्णमृगचर्मप्रदान नामक दो सौ छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०६॥


दो सौ सातवाँ अध्याय

उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व

मनुरुवाच<br>भगवन् श्रोतुमिच्छामि वृषभस्य च लक्षणम्।<br>वृषोत्सर्गविधिं चैव तथा पुण्यफलं महत्॥ १मनुजीने कहा—भगवन्! अब मैं उत्सर्ग किये जानेवाले वृषभके लक्षणों, वृषोत्सर्गकी विधि और वृषोत्सर्गसे प्राप्त होनेवाले महान् पुण्यफलको सुनना चाहता हूँ॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>धेनुमादौ परीक्षेत सुशीलां च गुणान्विताम्।<br>अव्यङ्गामपरिक्लिष्टां जीववत्सामरोगिणीम्॥ २<br>स्निग्धवर्णां स्निग्धखुरां स्निग्धशृङ्गीं तथैव च।<br>मनोहराकृतिं सौम्यां सुप्रमाणामनुद्धताम्॥ ३<br>आवर्तैर्दक्षिणावर्तैर्युक्तां दक्षिणतस्तथा।<br>वामावर्तैर्वामतश्च विस्तीर्णजघनां तथा॥ ४<br>मृदुसंहतताम्रोष्ठीं रक्तग्रीवासुशोभिताम्।<br>अश्यामदीर्घा स्फुटिता रक्तजिह्वा तथा च या॥ ५<br>विस्रावामलनेत्रा च शफैर्विरलैरदृढैः।<br>वैदूर्यमधुवर्णैश्च जलबुद्बुदसंनिभैः॥ ६<br>रक्तस्निग्धैश्च नयनैस्तथा रक्तकनीनिकैः।<br>सप्तचतुर्दशदन्ता तथा वा श्यामतालुका॥ ७<br>षडुन्नता सुपाश्र्वोरुः पृथुपञ्चसमायता।<br>अष्टायतशिरोग्रीवा या राजन् सा सुलक्षणा॥ ८मत्स्यभगवान् बोले—राजन्! सर्वप्रथम धेनुकी परीक्षा करनी चाहिये। जो सुशीला, गुणवती, अविकृत अङ्गोवाली, मोटी-ताजी, जिसके बछड़े जीते हों, रोगरहित, मनोहर रंगवाली, चिकने खुरवाली, चिकने सींगोंवाली, सुदृश्य, सीधी-सादी, न अधिक ऊँची, न अधिक नाटी अर्थात् मध्यम कदवाली, अचञ्चल, भँवरीवाली, विशेषतः दाहिनी ओरकी भँवरियाँ दाहिनी ओर और बायीं ओरकी बायीं ओर हों, विस्तृत जाँघोंवाली, मुलायम एवं सटे हुए लाल होठोंवाली, लाल गलेसे सुशोभित, काली एवं लम्बी न हो ऐसी स्फुटित लाल जिह्वावाली, अश्रुसहित निर्मल नेत्रोंवाली, सुदृढ़ एवं सटे हुए खुरोंवाली, वैदूर्य, मधु अथवा जलके बुद्बुदके समान रंगोंवाली, लाल चिकने नेत्र और लाल कनीनिकासे युक्त, इक्कीस दाँत और श्यामवर्णके तालुसे सम्पन्न हो, जिसके छः स्थान उच्च, पाँच स्थान समान, सिर, ग्रीवा और आठ स्थान विस्तृत तथा बगल और ऊरु देश सुन्दर हों, वह गौ शुभ लक्षणोंसे युक्त मानी गयी है॥ २—८॥
मनुरुवाच<br>षडुन्नताः के भगवन् के च पञ्च समायताः।<br>आयताश्च तथैवाष्टौ धेनूनां के शुभावहाः॥ ९मनुने पूछा—भगवन्! आपने जो यह बतलाया कि गौओंके छः स्थान उन्नत, पाँच स्थान सम तथा आठ स्थान आयत होने चाहिये, वे शुभदायक स्थान कौन-कौन हैं?॥ ९॥
* अध्याय २०७ *८४१

| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— पृथ्वीपते! छाती, पीठ, सिर, दोनों कोख तथा कमर— इन छः उन्नत स्थानोंवाली धेनुओंको विज्ञलोग श्रेष्ठ मानते हैं। सूर्यपुत! दोनों कान, दोनों नेत्र तथा ललाट—इन पाँच स्थानोंका सम-आयत होना प्रशंसित है। पूँछ, गलकम्बल, दोनों सक्थियाँ (घुटनोंसे नीचेके भाग) और चारों स्तन—ये आठ तथा सिर और गर्दन—ये दो मिलाकर दस स्थान आयत होनेपर श्रेष्ठ माने गये हैं। भूपते! ऐसी सर्वलक्षणसम्पन्न धेनुके शुभ लक्षणोंसे युक्त बछड़ेकी भी परीक्षा करनी चाहिये। जिसका कंधा और ककुद् ऊँचा हो, पूँछ और गलेका कम्बल (चमड़ा) कोमल हो, कटितट और स्कन्ध विशाल हो, वैदूर्य मणिके समान नेत्र हों, सींगोंका अग्रभाग प्रबाल (मूँगे)-के सदृश हो, पूँछ लम्बी तथा मोटी हो, तीखे अग्रभागवाले नौ या अठारह सुन्दर दाँत हों तथा मल्लिका-पुष्पोंकी तरह श्वेत आँखें हों, ऐसे वृषका उत्सर्ग करना चाहिये, उसके गृहमें रहनेसे भी धन-धान्यकी वृद्धि होती है॥ १०—१५॥ | | उरः पृष्ठं शिरः कुक्षी श्रोणी च वसुधाधिप।<br>षडुन्नतानि धेनूनां पूजयन्ति विचक्षणाः॥ १०<br>कर्णौ नेत्रे ललाटं च पञ्च भास्करनन्दन।<br>समायतानि शस्यन्ते पुच्छं सास्ना च सक्थिनी॥ ११<br>चत्वारश्च स्तना राजन् ज्ञेया ह्यष्टौ मनीषिभिः।<br>शिरो ग्रीवायताश्चैते भूमिपाल दश स्मृताः॥ १२<br>तस्याः सुतं परीक्षेत वृषभं लक्षणान्वितम्।<br>उन्नतस्कन्ध ककुद्मृजुलाङ्गूलकम्बलम्॥ १३<br>महाकटितटस्कन्धं वैदूर्यमणिलोचनम्।<br>प्रवालगर्भशृङ्गाग्रं सुदीर्घपृथुवालधिम्॥ १४<br>नवाष्टादशसंख्यैर्वा तीक्ष्णाग्रैर्दशनैः शुभैः।<br>मल्लिकाक्षञ्च मोक्तव्यो गृहेऽपि धनधान्यदः॥ १५ | | | वर्णतस्ताम्रकपिलो ब्राह्मणस्य प्रशस्यते।<br>श्वेतो रक्तश्च कृष्णश्च गौरः पाटल एव च॥ १६<br>मद्रिकस्ताम्रपृष्ठश्च शबलः पञ्चवालकैः।<br>पृथुकर्णो महास्कन्धः श्लक्ष्णरोमा च यो भवेत्।<br>रक्ताक्षः कपिलो यश्च रक्तशृङ्गतलो भवेत्॥ १७<br>श्वेतोदरः कृष्णपार्श्वो ब्राह्मणस्य तु शस्यते।<br>स्निग्धो रक्तेन वर्णेन क्षत्रियस्य प्रशस्यते॥ १८<br>काञ्चनाभेन वैश्यस्य कृष्णोनाप्यन्त्यजन्मनः।<br>यस्य प्रागायते शृङ्गे भ्रूमुखाभिमुखे सदा॥ १९<br>सर्वेषामेव वर्णानां सर्वः सर्वार्थसाधकः।<br>मार्जारपादः कपिलो धन्यः कपिलपिङ्गलः॥ २०<br>श्वेतो मार्जारपादस्तु धन्यो मणिनिभेक्षणः।<br>करटः पिङ्गलश्चैव श्वेतपादस्तथैव च॥ २१<br>सर्वपादसितो यश्च द्विपादश्वेत एव च।<br>कपिञ्जलनिभो धन्यस्तथा तित्तिरिसंनिभः॥ २२ | ब्राह्मणके लिये ताम्रके समान लाल अथवा कपिल वर्णका वृषभ उत्तम है। जो सफेद, लाल, काला, भूरा, पाटल, पूरा ऊँचा लाल पीठवाला, पाँच प्रकारके रोएँसे चितकबरा, स्थूल कानोंवाला विशाल कंधेसे युक्त, चिकने रोमोंवाला, लाल आँखोंवाला, कपिल, सींगका निचला भाग लाल रंगवाला, सफेद पेट और कृष्ण पार्श्वभागवाला हो, ऐसा वृषभ ब्राह्मणके लिये श्रेष्ठ कहा गया है। लाल रंगके चिकने रोमवाला वृषभ क्षत्रिय जातिके लिये, सुवर्णके समान वर्णवाला वृषभ वैश्यके लिये और काले रंगका वृष शूद्रके लिये उत्तम माना गया है। जिस वृषभके सींग आगेकी ओर विस्तृत तथा भौंहें मुखकी ओर झुकी हों, वह सभी वर्णोंके लिये सर्वार्थ-सिद्ध करनेवाला होता है। बिलावके समान पैरोंवाला, कपिल या पीले रंगका मिश्रित वृषभ धन्य होता है। श्वेत रंगका, बिल्लीके समान पैरवाला और मणिके समान आँखोंवाला वृषभ धन्य है। कौवेके समान काले और पीले रंगवाला तथा श्वेत पैरोंवाला वृष धन्य है। जिसके सभी पैर अथवा दो पैर श्वेतवर्णके हों और जिसका रंग कपिञ्जल अथवा तीतरके समान हो, वह भी धन्य है॥ १६—२२॥ | | आकर्णमूलं श्वेतं तु मुखं यस्य प्रकाशते।<br>नन्दीमुखः स विज्ञेयो रक्तवर्णो विशेषतः॥ २३ | जिस वृषभका मुख कानतक श्वेत दिखायी पड़ता हो तथा विशेषतया वह लाल वर्णका हो, उसे नन्दीमुख जानना चाहिये। |

२११- सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति

८४२ * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
श्वेतं तु जठरं यस्य भवेत् पृष्ठं च गोपतेः।<br>वृषभः स समुद्राक्षः सततं कुलवर्धनः॥ २४<br><br>मल्लिकापुष्पचित्रश्च धन्यो भवति पुङ्गवः।<br>कमलैर्मण्डलैश्चापि चित्रो भवति भाग्यदः॥ २५<br><br>अतसीपुष्पवर्णश्च तथा धन्यतरः स्मृतः।<br>एते धन्यास्तथाऽन्यान् कीर्तयिष्यामि ते नृप॥ २६<br><br>कृष्णतालवोष्ठवदना रूक्षशृङ्गशफाश्च ये।<br>अव्यक्तवर्णा ह्रस्वाश्च व्याघ्रसिंहनिभाश्च ये॥ २७<br><br>ध्वाङ्क्षगृध्रसवर्णाश्च तथा मूषकसंनिभाः।<br>कुण्ठाः काणास्तथा खञ्जाः केकराक्षास्तथैव च॥ २८<br><br>विषमश्वेतपादाश्च उद्भ्रान्तनयनास्तथा।<br>नैते वृषाः प्रमोक्तव्या न च धार्यास्तथा गृहे॥ २९<br><br>मोक्तव्यानां च धार्याणां भूयो वक्ष्यामि लक्षणम्।<br>स्वस्तिकाकारशृङ्गाश्च तथा मेघौघनिःस्वनाः॥ ३०<br><br>महाप्रमाणाश्च तथा मत्तमातङ्गगामिनः।<br>महोरस्का महोच्छाया महाबलपराक्रमाः।<br>शिरः कर्णौ ललाटं च वालधिश्चरणास्तथा॥ ३१<br><br>नेत्रे पार्श्वे च कृष्णानि शस्यन्ते चन्द्रभासिनाम्।<br>श्वेतान्येतानि शस्यन्ते कृष्णस्य तु विशेषतः॥ ३२<br><br>भूमौ कर्षति लाङ्गूलं प्रलम्बस्थूलवालधिः।<br>पुरस्तादुद्यतो नीलो वृषभश्च प्रशस्यते॥ ३३जिस वृषभका पेट तथा पीठ श्वेतवर्ण हो, वह समुद्राक्ष नामक वृषभ कहा जाता है। वह सर्वदा कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है। जो वृष मल्लिकाके फूलके समान चितकबरे रंगवाला होता है, वह धन्य है। जो कमल-मण्डलके समान चितकबरा होता है, वह सौभाग्यवर्द्धक होता है तथा अलसीके फूलके समान नीले रंगवाला बैल धन्यतर कहा गया है। राजन्! ये उत्तम लक्षणोंवाले वृष हैं। अब मैं आपसे अशुभ लक्षणसम्पन्न वृषभोंका वर्णन कर रहा हूँ। जो काले तालु, ओंठ और मुखवाले, रूखे सींगों एवं खुरोंवाले, अव्यक्त रंगवाले, नाटे, बाघ तथा सिंहके समान भयानक, कौवे और गृध्रके समान रंगवाले या मूषकके समान अल्पकाय, मन्द स्वभाववाले, काने, लँगड़े, नीची-ऊँची आँखोंवाले, विषम (तीन या एक) पैरोंमें श्वेत रंगवाले तथा चञ्चल नेत्रोंवाले हों, ऐसे वृषभोंका न तो उत्सर्ग करना चाहिये और न उन्हें अपने घरमें ही रखना ठीक है। मैं पुनः उत्सर्ग करने तथा पालने योग्य (श्रेष्ठ) वृषभोंका लक्षण बतला रहा हूँ। जिनके सींग स्वस्तिकके आकारके हों और स्वर बादलोंकी गर्जनाके सदृश हो, जो ऊँचे कदवाले, हाथीके समान चलनेवाले, विशाल छातीवाले, बहुत ऊँचे, महान् बल-पराक्रमसे युक्त हों तथा चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णके जिन वृषभोंके सिर, दोनों कान, ललाट, पूँछ, चारों पैर, दोनों नेत्र, दोनों बगलें काले रंगके हों एवं काले रंगवाले वृषभोंके ये स्थान श्वेत हों तो वे उत्तम माने गये हैं। जिसकी लम्बी और मोटी पूँछ पृथ्वीपर रगड़ खाती हो और जिसका अगला भाग उठा हुआ हो, वह नील वृषभ प्रशंसनीय माना गया है॥ २३—३३॥
शक्तिध्वजपताकाढ्या येषां राजी विराजते।<br>अनड्वाहस्तु ते धन्याश्चित्रसिद्धिर्जयावहाः॥ ३४जिनके शरीरमें शक्ति, ध्वज और पताकाओंकी रेखा बनी हो, वे वृषभ धन्य हैं और विचित्र सिद्धि एवं विजय प्रदान करनेवाले हैं।
प्रदक्षिणं निवर्तन्ते स्वयं ये विनिवर्तिताः।<br>समुन्नतशिरोग्रीवा धन्यास्ते यूथवर्धनाः॥ ३५जो घुमाये जानेपर या स्वयं घूमनेपर दाहिनी ओर घूमते हों तथा जिनके सिर एवं कंधे समुन्नत हों, वे धन्य तथा अपने समूहके वृद्धिकारक हैं।
रक्तशृङ्गाग्रनयनः श्वेतवर्णो भवेद् यदि।<br>शफैः प्रवालसदृशैर्नास्ति धन्यतरस्ततः॥ ३६जिसके सींगोंके अग्रभाग तथा नेत्र लाल हों और वह यदि श्वेतवर्णका हो तथा उसके खुर प्रवालके समान लाल हों तो उससे श्रेष्ठ कोई वृषभ नहीं होता।
एते धार्याः प्रयत्नेन मोक्तव्या यदि वा वृषाः।<br>धारिताश्च तथा मुक्ता धनधान्यप्रवर्धनाः॥ ३७ऐसे वृषभोंका प्रयत्नपूर्वक पालन अथवा उत्सर्ग करना चाहिये; क्योंकि ये रखने अथवा उत्सर्ग करने—दोनों दशाओंमें धन-धान्यको बढ़ाते हैं।

* अध्याय २०८ * । ८४३


चरणानि मुखं पुच्छं यस्य श्वेतानि गोपतेः ।<br>लाक्षारससवर्णश्च तं नीलमिति निर्दिशेत् ॥ ३८<br><br>वृष एवं स मोक्तव्यो न सन्धार्यो गृहे भवेत्।<br>तदर्थमेषा चरति लोके गाथा पुरातनी ॥ ३९<br><br>एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्।<br>गौरीं चाप्युद्वहेत् कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ ४०<br><br>एवं वृषं लक्षणसम्प्रयुक्तं<br>गृहोद्भवं क्रीतमथापि राजन्।<br>मुक्त्वा न शोचेन्मरणं महात्मा<br>मोक्षं गतश्चाहमतोऽभिधास्ये ॥ ४१जिस वृषभके चारों चरण, मुख और पूँछ श्वेत हों तथा शेष शरीरका रंग लाह-रसके समान हो, उसे नील वृषभ कहते हैं। ऐसा वृषभ उत्सर्ग कर देना चाहिये, उसे घरमें पालना ठीक नहीं हैं; क्योंकि ऐसे वृषभके लिये लोकमें एक ऐसी पुरानी गाथा प्रचलित है कि बहुतेरे पुत्रोंकी कामना करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे कोई भी तो गयाकी यात्रा करेगा या गौरी कन्याका दान करेगा या नीले वृषभका उत्सर्ग करेगा। राजन्! ऐसे लक्षणयुक्त वृषभका चाहे वह घरमें उत्पन्न हुआ हो या खरीदा गया हो, उत्सर्ग कर महात्मा पुरुष कभी मृत्युके भयसे शोकग्रस्त नहीं होता; उसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ३४—४१॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वृषभलक्षणं नाम समाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृषभलक्षण नामक दो सौ सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०७॥


दो सौ आठवाँ अध्याय

सावित्री और सत्यवान्का चरित्र

सूत उवाच<br>ततः स राजा देवेशं पप्रच्छामितविक्रमः।<br>पतिव्रतानां माहात्म्यं तत्सम्बद्धां कथामपि॥ १सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर अपरिमित पराक्रमी राजा मनुने भगवान् मत्स्यसे पतिव्रता स्त्रियोंके माहात्म्य तथा तत्सम्बन्धी कथाके विषयमें प्रश्न किया॥ १॥
मनुरुवाच<br>पतिव्रतानां का श्रेष्ठा कया मृत्युः पराजितः।<br>नामसंकीर्तनं कस्याः कीर्तनीयं सदा नरैः।<br>सर्वपापक्षयकरमिदानीं कथयस्व मे॥ २मनुजीने पूछा—(प्रभो!) पतिव्रता स्त्रियोंमें कौन श्रेष्ठ है? किस स्त्रीने मृत्युको पराजित किया है? तथा मनुष्योंको सदा किस (सती नारी)-का नामोच्चारण करना चाहिये? आप अब मुझसे सभी पापोंको नष्ट करनेवाली इस कथाका वर्णन कीजिये॥ २॥
मत्स्य उवाच<br>वैलौम्यं धर्मराजोऽपि नाचरत्यथ योषिताम्।<br>पतिव्रतानां धर्मज्ञ पूज्यास्तस्यापि ताः सदा॥ ३<br><br>अत्र ते वर्णयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>यथा विमोक्षितो भर्ता मृत्युपाशगतः स्त्रिया॥ ४<br><br>मद्रेषु शाकलो राजा बभूवाश्वपतिः पुरा।<br>अपुत्रस्तप्यमानोऽसौ पुत्रार्थी सर्वकामदाम्॥ ५**मत्स्यभगवान्ने कहा—**धर्मज्ञ! धर्मराज भी पतिव्रता स्त्रियोंके प्रतिकूल कोई व्यवहार नहीं कर सकते; क्योंकि वे उनके लिये भी सर्वदा सम्माननीय हैं। इस विषयमें मैं तुमसे पापोंको नष्ट करनेवाली वैसी कथाका वर्णन कर रहा हूँ कि किस प्रकार पतिव्रता स्त्रीने मृत्युके पाशमें पड़े हुए अपने पतिको बन्धनमुक्त कराया था। प्राचीन समयमें मद्रदेश (वर्तमान स्यालकोट जनपद)-में शाकलवंशी अश्वपति नामक एक राजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था।

२१२- यमराज-सावित्री-संवाद तथा यमराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति

८४४ * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
आराध्यति सावित्रीं लक्षितोऽसौ द्विजोत्तमैः।<br>सिद्धार्थकैर्हूयमानां सावित्रीं प्रत्यहं द्विजैः॥ ६<br><br>शतसंख्यैश्चतुर्थ्यां तु दशमासागते दिने।<br>काले तु दर्शयामास स्वां तनुं मनुजेश्वरम्॥ ७तब ब्राह्मणोंके निर्देशपर वे पुत्रकी कामनासे सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली सावित्रीकी आराधना करने लगे। वे प्रतिदिन सैकड़ों ब्राह्मणोंके साथ सावित्रीदेवीकी प्रसन्नताके लिये सफेद सरसोंका हवन करते थे। दस महीना बीत जानेपर चतुर्थी तिथिको सावित्री (गायत्री) देवीने राजाको दर्शन दिया॥ ३–७॥
सावित्र्युवाच<br>राजन् भक्तोऽसि मे नित्यं दास्यामि त्वां सुतां सदा।<br>तां दत्तां मत्प्रसादेन पुत्रीं प्राप्स्यसि शोभनाम्॥ ८<br><br>एतावदुक्त्वा सा राज्ञः प्रणतस्यैव पार्थिव।<br>जगामादर्शनं देवी खे तथा नृप चञ्चला॥ ९<br><br>मालती नाम तस्यासीद् राज्ञः पत्नी पतिव्रता।<br>सुषुवे तनयां काले सावित्रीमिव रूपतः॥ १०<br><br>सावित्र्याहुतया दत्ता तद्रूपसदृशी तथा।<br>सावित्री च भवत्वेषा जगाद नृपतिर्द्विजान्॥ ११<br><br>नामाकुर्वन् द्विजश्रेष्ठाः सावित्रीति नृपोत्तम।<br>कालेन यौवनं प्राप्तं ददौ सत्यवते पिता॥ १२<br><br>नारदस्तु ततः प्राह राजानं दीप्ततेजसम्।<br>संवत्सरेण क्षीणायुर्भविष्यति नृपात्मजः।<br>सकृत् कन्याः प्रदीयन्ते चिन्तयित्वा नराधिपः॥ १३<br><br>तथापि प्रददौ कन्यां द्युमत्सेनात्मजे शुभे।<br>सावित्र्यपि च भर्त्तारमासाद्य नृपमन्दिरे॥ १४<br><br>नारदस्य तु वाक्येन दूयमानेन चेतसा।<br>शुश्रूषां परमां चक्रे भर्तुःश्वशुरयोर्वने॥ १५<br><br>राज्याद् भ्रष्टः सभार्यस्तु नष्टचक्षुर्नराधिपः।<br>न तुतोष समासाद्य राजपुत्रीं तथा स्नुषाम्॥ १६<br><br>चतुर्थेऽहनि मर्तव्यं तथा सत्यवता द्विजाः।<br>श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता तदा राजसुतापि सा॥ १७<br><br>चक्रे त्रिरात्रं धर्मज्ञा व्रतं तस्मिंस्तदा दिने।<br>दारुपुष्पफलाहारी सत्यवांस्तु ययौ वनम्॥ १८<br><br>श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता याचनामङ्गभीरुणा।<br>सावित्र्यपि जगामार्ता सह भर्त्रा महद्वनम्॥ १९सावित्रीने कहा— राजन्! तुम मेरे नित्य भक्त हो, अतः मैं तुम्हें कन्या प्रदान करूँगी। मेरी कृपासे तुम्हें मेरी दी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या प्राप्त होगी। राजन्! चरणोंमें पड़े हुए राजासे इतना कहकर वह देवी आकाशमें बिजलीकी भाँति अदृश्य हो गयी। नरेश! उस राजाकी मालती नामकी पतिव्रता पत्नी थी। समय आनेपर उसने सावित्रीके समान रूपवाली एक कन्याको जन्म दिया। तब राजाने ब्राह्मणोंसे कहा—तपके द्वारा आवाहन किये जानेपर सावित्रीने इसे मुझे दिया है तथा यह सावित्रीके समान रूपवाली है, अतः इसका नाम सावित्री होगा। नृपश्रेष्ठ! तब उन ब्राह्मणोंने उस कन्याका सावित्री नाम रख दिया। समयानुसार सावित्री युवती हुई, तब पिताने उसका सत्यवान्‌के लिये वाग्दान कर दिया। इसी बीच नारदने उस उद्दीप्त तेजस्वी राजासे कहा कि 'उस राजकुमारकी आयु एक ही वर्षमें समाप्त हो जायगी।' (नारदजीकी वाणी सुनकर) यद्यपि राजाके मनमें चिन्ता तो हुई, पर यह विचारकर कि 'कन्यादान एक ही बार किया जाता है' उन्होंने अपनी कन्या सावित्रीको द्युमत्सेनके सुन्दर पुत्र सत्यवान्‌को प्रदान कर दिया। सावित्री भी पतिको पाकर अपने भवनमें नारदकी अशुभ वाणी सुनकर दुःखित मनसे काल व्यतीत करने लगी। वह वनमें सास-श्वसुर तथा पतिदेवकी बड़ी शुश्रूषा करती थी; किंतु राजा द्युमत्सेन अपने राज्यसे च्युत हो गये थे तथा पत्नीसहित अन्धा होनेके कारण वैसी गुणवती राजपुत्रीको पुत्रवधू-रूपमें प्राप्तकर संतुष्ट नहीं थे। 'आजसे चौथे दिन सत्यवान् मर जायगा' ऐसा ब्राह्मणोंके मुखसे सुनकर धर्मपरायणा राजपुत्री सावित्रीने श्वशुरसे आज्ञा लेकर त्रिरात्र-व्रतका अनुष्ठान किया। चौथा दिन आनेपर जब सत्यवान्‌ने लकड़ी, पुष्प एवं फलकी टोहमें जंगलकी ओर प्रस्थान किया, तब याचनाभङ्गसे डरती हुई सावित्री भी सास-श्वशुरकी आज्ञा लेकर दुःखित मनसे पतिके साथ उस भयंकर जंगलमें गयी। (नारदके वचनका ध्यान कर) चित्तमें अतिशय कष्ट रहनेपर भी
* अध्याय २०९ *८४५
चेतसा दूयमानेन गूहमाना महद्भयम्।<br>वने पप्रच्छ भर्तारं द्रुमांश्चासद्दृशांस्तथा॥ २०<br>आश्वासयामास स राजपुत्रीं<br>क्लान्तां वने पद्मविशालनेत्राम्।<br>संदर्शनेनाथ द्रुमद्विजानां<br>तथा मृगाणां विपिने नृवीरः॥ २१उसने अपने इस महान् भयको अपने पतिसे व्यक्त नहीं किया, किंतु मन-बहलावके लिये वनमें छोटे-बड़े वृक्षोंके बारेमें पतिसे झूठ-मूठ पूछ-ताछ करती रही। शूरवीर सत्यवान् उस भयंकर वनमें विशाल वृक्षों, पक्षियों एवं पशुओंके दलको दिखला-दिखलाकर थकी हुई एवं कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली राजकुमारी सावित्रीको आश्वासन देता रहा॥ ८—२१॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने सावित्रीवनप्रवेशो नामाष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें सावित्रीवनप्रवेश नामक दो सौ आठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०८॥


दो सौ नवाँ अध्याय

सत्यवान्‌का सावित्रीको वनकी शोभा दिखाना

सत्यवानुवाच<br>वनेऽस्मिञ्शाद्वलाकीर्णे सहकारं मनोहरम्।<br>नेत्रघ्राणसुखं पश्य वसन्ते रतिवर्धनम्॥ १<br>वनेऽप्यशोकं दृष्ट्वैवं रागवन्तं सुपुष्पितम्।<br>वसन्तो हसतीवायं मामेवायतलोचने॥ २<br>दक्षिणे दक्षिणेनैतां पश्य रम्यां वनस्थलीम्।<br>पुष्पितैः किंशुकैर्युक्तां ज्वलितानलसप्रभैः॥ ३<br>सुगन्धिकुसुमामोदो वनराजिविनिर्गतः।<br>करोति वायुर्दाक्षिण्यमावयोः क्लमनाशनम्॥ ४<br>पश्चिमेन विशालाक्षि कर्णिकारैः सुपुष्पितैः।<br>काञ्चनेन विभात्येषा वनराजी मनोरमा॥ ५<br>अतिमुक्तलताजालरुद्धमार्गा वनस्थली।<br>रम्या सा चारुसर्वाङ्गि कुसुमोत्करभूषणा॥ ६<br>मधुमत्तालिझंकारव्याजेन वरवर्णिनि।<br>चापाकृष्टं करोतीव कामः पान्थजिघांसया॥ ७<br>फलास्वादलसद्वक्त्रपुंस्कोकिलविनादिता ।<br>विभाति चारुतिलका त्वमिवैषा वनस्थली॥ ८<br>कोकिलश्चूतशिखरे मञ्जरीरेणुपिञ्जरः।<br>गदितैर्व्यक्ततां याति कुलीनश्चेष्टितैरिव॥ ९<br>पुष्परेणुविलिप्ताङ्गीं प्रियामनुसरन् वने।<br>कुसुमं कुसुमं याति कूजन् कामी शिलीमुखः॥ १०सत्यवान्‌ने कहा—विशाल नेत्रोंवाली सावित्री! हरी-हरी घासोंसे भरे हुए इस वनमें वसन्तमें रतिकी वृद्धि करनेवाले एवं नेत्र तथा नासिकाको सुख प्रदान करनेवाले इस मनोहर आमके वृक्षको देखो। इस वनमें फूलोंसे लदे हुए इस लाल अशोक-वृक्षको भी देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो यह वसन्त मेरा ही परिहास कर रहा है। दाहिनी ओर दक्षिण दिशामें जलते हुए अंगारकी-सी कान्तिवाले फूलोंसे लदे हुए किंशुक-वृक्षोंसे युक्त इस रमणीय वनस्थलीको देखो। सुगन्धित पुष्पोंकी सुगन्धसे युक्त वन-पंक्तियोंसे निकली हुई वायु उदारतापूर्वक हमलोगोंकी थकावटका नाश कर रही है। विशाललोचने! इधर पश्चिममें फूले हुए कनेरके पुष्पोंसे युक्त स्वर्णिम शोभावाली वनपङ्क्ति शोभायमान हो रही है। सुन्दरि! तिनिसके लतासमूहोंसे वनस्थलीका मार्ग अवरुद्ध हो गया है। पुष्पोंके समूहोंसे विभूषित हुई वह पृथ्वी कितनी मनोहर लग रही है। मधुसे उन्मत्त हुए भ्रमर-समूहोंकी गुञ्जारके व्याजसे मालूम पड़ता है कि कामदेव (हम-जैसे) पथिकोंको मारनेके लिये धनुषकी प्रत्यञ्चा खींच रहा है। नाना प्रकारके फलोंके आस्वादनसे उल्लसित मुखवाले कोकिलोंके स्वरसे निनादित एवं सुन्दर तिलक-वृक्षोंसे सुशोभित यह वनस्थली तुम्हारे ही समान शोभा दे रही है। आमकी ऊँची डालीपर बैठी हुई कोकिला मञ्जरीकी धूलसे पीत वर्ण होकर अपने सुरीले शब्दोंसे चेष्टाओंद्वारा कुलीन पुरुषकी भाँति अपना परिचय दे रही है। कामी मधुकर वनमें गुनगुनाता हुआ प्रत्येक पुष्पपर पुष्पोंकी धूलिसे धूसरित प्रियतमाका अनुसरण करता हुआ उड़ रहा है॥ १—१०॥

२१३- सावित्रीकी विजय और सत्यवान्‌की बन्धन-मुक्ति

८४६ | * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मञ्जरीं सहकारस्य कान्ताचञ्च्वाग्रखण्डिताम्।<br>स्वदते बहुपुष्पेऽपि पुंस्कोकिलयुवा वने॥ ११वनमें तरुण पुंस्कोकिल अनेक पुष्पोंके रहते हुए भी अपनी प्रियतमाकी चोंचके अग्रभागसे खण्डित हुई आम्र-मञ्जरीका स्वाद ले रहा है।
काकः प्रसूतां वृक्षाग्रे स्वामेकाग्रेण चञ्चुना।<br>काकीं सम्भावयत्येष पक्षाच्छादितपुत्रिकाम्॥ १२कौआ वृक्षके अग्रभागपर बैठकर पंखोंसे बच्चेको छिपाकर बैठी हुई अपनी प्रसूता पत्नीको चोंचके अग्रभागसे आनन्दित कर रहा है।
भूभागं निम्नमासाद्य दयितासहितो युवा।<br>नाहारमपि चादत्ते कामाक्रान्तः कपिंजलः॥ १३अपनी पत्नीके साथ कामदेवसे अभिभूत हुआ तरुण कपिंजल (तीतर) निचले भूभागपर बैठा हुआ आहार भी नहीं ग्रहण कर रहा है।
कलविंकस्तु रमयन् प्रियोत्सङ्गं समास्थितः।<br>मुहुर्मुहुर्विशालाक्षि उत्कण्ठयति कामिनः॥ १४विशालनेत्रे ! चटक (गौरैया) अपनी प्रियाकी गोदमें स्थित हो बारम्बार रमण करता हुआ कामीजनॉंको उत्कण्ठित कर रहा है।
वृक्षशाखां समारूढः शुकोऽयं सह भार्यया।<br>भरेण लम्बयञ् शाखां करोति सफलामिव॥ १५अपनी प्रियाके साथ वृक्षकी डालीपर बैठा हुआ यह शुक पंजेसे शाखाको खींचता हुआ उसे फलयुक्त-सा कर रहा है।
वनेऽत्र पिशितास्वादतृप्तो निद्रामुपागतः।<br>शेते सिंहयुवा कान्ता चरणान्तरगामिनी॥ १६इस वनमें मांसाहारसे तृप्त युवा सिंह निद्रामें लीन हो सो रहा है और उसकी प्रियतमा उसके पैरोंके मध्यभागमें शयन कर रही है।
व्याघ्रयोर्मिथुनं पश्य शैलकन्दरसंस्थितम्।<br>ययोर्नेत्रप्रभालोके गुहा भिन्नेव लक्ष्यते॥ १७पर्वतकी कन्दरामें बैठे हुए व्याघ्र-दम्पतिको देखो, जिनके नेत्रोंकी कान्तिसे गुफा भिन्न-सी दिखायी दे रही है।
अयं द्वीपी प्रियां लेढि जिह्वाग्रेण पुनः पुनः।<br>प्रीतिमायाति च तया लिह्यमानः स्वकान्तया॥ १८यह गैंडा अपनी प्रियाको जीभके अग्रभागसे बारम्बार चाट रहा है और अपनी उस प्रियाद्वारा चाटे जानेपर आनन्दका अनुभव कर रहा है।
उत्सङ्गकृतमूर्धानं निद्रापहृतचेतसम्।<br>जन्तूद्धरणतः कान्तं सुखयत्येव वानरी॥ १९वह वानरी अपनी गोदमें सिर रखकर गाढ़ निद्रामें सोते हुए पतिको जूक आदि जन्तुओंको निकालकर सुख दे रही है।
भूमौ निपतितां रामां मार्जारो दर्शितोदरीम्।<br>नखैर्दन्तैर्दशत्येष न च पीडयते तथा॥ २०वह बिडाल पृथ्वीपर लेटकर पेटको दिखाती हुई अपनी प्रियतमाको नखों और दाँतोंसे काट रहा है, परंतु वास्तवमें वह पीड़ा नहीं दे रहा है॥ ११–२०॥
शशकः शशकी चोभे संसुप्ते पीडिते इमे।<br>संलीनगात्रचरणे कर्णैर्व्यक्तिमुपागते॥ २१ये खरगोश-दम्पति पीड़ित होकर अपने पैरोंको शरीरमें छिपाकर सो रहे हैं। ये कानोंद्वारा ही जाने जा सकते हैं।
स्नात्वा सरसि पद्माढ्ये नागस्तु मदनप्रियः।<br>सम्भावयति तन्वङ्गि मृणालकवलैः प्रियाम्॥ २२सूक्ष्माङ्गि ! कामार्त हाथी कमलयुक्त सरोवरमें स्नान कर कमल-डंठलोंके ग्रासोंसे प्रियाको संतुष्ट कर रहा है।
कान्तप्रोथसमुत्थानैः कान्तमार्गानुगामिनी।<br>करोति कवलं मुस्तैर्वराही पोतकानुगा॥ २३पीछे-पीछे चलनेवाले अपने बच्चोंसे घिरी हुई शूकरी प्रियतमके मार्गपर चलती हुई प्रियतमके द्वारा उखाड़े गये मोथोंको खाती जा रही है।
दृढाङ्गसंधिर्महिषः कर्दमाक्ततनुर्वने।<br>अनुव्रजति धावन्तीं प्रियामुद्धतमुत्सुकः॥ २४इस वनमें दृढ़ अङ्गोंवाला एवं शरीरमें कीचड़ पोते हुए कामार्त महिष भागती हुई प्रियाके पीछे दौड़ रहा है।
पश्य चार्वङ्गि सारङ्गं त्वं कटाक्षविभावनैः।<br>सभार्यं मां हि पश्यन्तं कौतूहलसमन्वितम्॥ २५सुन्दरि! अपनी प्रियाके सहित इस मृगको देखो, जो कुतूहलवश मुझे मनोहर कटाक्षोंसे देख रहा है।
पश्य पश्चिमपादेन रोही कण्डूयते मुखम्।<br>स्नेहार्द्रभावात् कर्षन्ती भर्तारं शृङ्गकोटिना॥ २६देखो, वह मृगी स्नेहयुक्त हो अपने सींगोंके अग्रभागसे प्रियतमको ढकेलती हुई पिछले पैरसे मुखको खुजला रही है। अरे, उस
* अध्याय २०९ *८४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्रागिमां चमरीं पश्य सितवालानुगच्छतीम्।<br>अन्वास्ते चमरः कामी मां च पश्यति गर्वितः॥ २७<br><br>आतपे गवयं पश्य प्रकृष्टं भार्यया सह।<br>रोमन्थनं प्रकुर्वाणं काकं ककुदि वारयन्॥ २८<br><br>पश्याजं भार्यया सार्धं न्यस्ताग्रचरणद्वयम्।<br>विपुले बदरीस्कन्धे बदराशनकाम्यया॥ २९<br><br>हंसं सभार्यं सरसि विचरन्तं सुनिर्मलम्।<br>सुमुक्तस्येन्दुबिम्बस्य पश्य वै श्रियमुद्वहन्॥ ३०<br><br>सभार्यश्चक्रवाकोऽयं कमलाकरमध्यगः।<br>करोति पद्मिनीं कान्तां सुपुष्पामिव सुन्दरि॥ ३१<br><br>मया फलोच्चयः सुभ्रु त्वया पुष्पोच्चयः कृतः।<br>इन्धनं न कृतं सुभ्रु तत्करिष्यामि साम्प्रतम्॥ ३२<br><br>त्वमस्य सरसस्तीरे द्रुमच्छायां समाश्रिता।<br>क्षणमात्रं प्रतीक्षस्व विश्रमस्व च भामिनि॥ ३३श्वेत चमरी गायको देखो, जो चमरके पीछे चली जा रही है। इधर कामार्त चमर खड़ा है और गर्वके साथ मेरी ओर देख रहा है। धूपमें बैठे हुए उस नीलगायको देखो, जो अपनी प्रियाके साथ आनन्दपूर्वक जुगाली कर रहा है और ककुदपर बैठे हुए कौवेका निवारण कर रहा है। प्रियाके साथ उस बकरेको देखो, जो बेर वृक्षकी मोटी शाखापर फल खानेकी इच्छासे अगले दोनों पैरोंको रखे हुए है। सरोवरमें विचरण करते हुए हंसिनीसहित उस अत्यन्त निर्मल हंसको देखो, जो सुप्रकाशित चन्द्रबिम्बकी शोभा धारण कर रहा है। सुन्दरि! चक्रवाक अपनी प्रियाके साथ कमलोंसे सुशोभित सरोवरमें अपनी प्रियाको फूली हुई पद्मिनीके समान कर रहा है। (ऐसा कहकर सत्यवान्‌ने फिर कहा—) सुन्दर भौंहोंवाली! मैं फलोंको एकत्र कर चुका तथा तुम पुष्पोंको एकत्र कर चुकी, किंतु अभी ईंधनका कोई प्रबन्ध नहीं किया गया, अतः अब मैं उसे एकत्र करूँगा। भामिनि! तबतक तुम इस सरोवरके तटपर वृक्षकी छायामें बैठकर क्षणभर प्रतीक्षा करते हुए विश्राम करो॥ २१—३३॥
सावित्र्युवाच<br>एवमेतत् करिष्यामि मम दृष्टिपथस्त्वया।<br>दूरं कान्त न कर्तव्यो बिभेमि गहने वने॥ ३४**सावित्री बोली—**कान्त! जैसा आप कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगी, परंतु आप मेरे नेत्रोंके सामनेसे दूर न जायें; क्योंकि मैं इस घने वनमें डर रही हूँ॥ ३४॥
मत्स्य उवाच<br>ततः स काष्ठानि चकार तस्मिन्<br>वने तदा राजसुतासमक्षम्।<br>तस्या हृदूरे सरसस्तदानीं<br>मेने च सा तं मृतमेव राजन्॥ ३५**मत्स्यभगवान्‌ने कहा—**राजन्! सावित्रीके ऐसा कहनेपर सत्यवान् उस वनमें राजपुत्रीके सम्मुख ही उस सरोवरसे थोड़ी ही दूरपर काष्ठ एकत्र करने लगे, परंतु राजपुत्री उतनी दूर जानेपर भी उन्हें मरा हुआ-सा मानने लगी॥ ३५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने वनदर्शनं नाम नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें वनदर्शन नामक दो सौ नवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०९॥

२१४- सत्यवान्‌को जीवनलाभ तथा पत्नीसहित राजाको नेत्रज्योति एवं राज्यकी प्राप्ति

८४८

* मत्स्यपुराण *


दो सौ दसवाँ अध्याय

यमराजका सत्यवान्‌के प्राणको बाँधना तथा सावित्री और यमराजका वार्तालाप

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
तस्य पाटयतः काष्ठं जज्ञे शिरसि वेदना।<br>स वेदनार्तः संगम्य भार्यां वचनमब्रवीत्॥ १<br>आयासेन ममानेन जाता शिरसि वेदना।<br>तमश्च प्रविशामीव न च जानामि किञ्चन॥ २<br>त्वदुत्सङ्गे शिरः कृत्वा स्वप्तुमिच्छामि साम्प्रतम्।<br>राजपुत्रीमेवमुक्त्वा तदा सुष्वाप पार्थिव ॥ ३<br>तदुत्सङ्गे शिरः कृत्वा निद्रयाऽऽविलोचनः।<br>पतिव्रता महाभागा ततः सा राजकन्यका॥ ४<br>ददर्श धर्मराजं तु स्वयं तं देशमागतम्।<br>नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं प्रभुम्॥ ५<br>विद्युल्लतानिबद्धाङ्गं सतोयमिव तोयदम्।<br>किरीटेनार्कवर्णेन कुण्डलाभ्यां विराजितम्॥ ६<br>हारभारार्पितोरस्कं तथाङ्गदविभूषितम्।<br>तथानुगम्यमानं च कालेन सह मृत्युना॥ ७<br>स तु सम्प्राप्य तं देशं देहात् सत्यवतस्तदा।<br>अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं पाशबद्धं वशं गतम्॥ ८<br>आकृष्य दक्षिणामाशां प्रययौ सत्वरं तदा।<br>सावित्र्यपि वरारोहा दृष्ट्वा तं गतजीवितम्॥ ९<br>अनुवव्राज गच्छन्तं धर्मराजमतन्द्रिता।<br>कृताञ्जलिरुवाचाथ हृदयेन प्रवेपता॥ १०<br>इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम्।<br>गुरुशुश्रूषया चैव ब्रह्मलोकं समश्नुते॥ ११<br>सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः।<br>अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः॥ १२<br>यावत् त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरे।<br>तेषां च नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः॥ १३<br>तेषामनुपरोधेन पारतन्त्र्यं यदा चरेत्।<br>तत्तन्निवेदयेत् तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः।<br>त्रिष्वप्येतेषु कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते॥ १४राजन्‌! लकड़ी काटते हुए सत्यवान्‌के सिरमें पीड़ा उत्पन्न हुई, तब वे पीड़ासे व्याकुल हो पत्नीके पास आकर इस प्रकार कहने लगे—‘इस परिश्रमसे मेरे सिरमें बहुत पीड़ा हो रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मैं अन्धकारमें प्रविष्ट हो रहा हूँ। मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा है। इस समय मैं तुम्हारी गोदमें सिर रखकर सोना चाहता हूँ।’ राजन्‌! राजपुत्रीसे ऐसा कहकर सत्यवान् उस समय उसकी गोदमें सो गये। जब सावित्रीकी गोंदमें सिर रखकर सोते हुए सत्यवान्‌के नेत्र निद्रावश मुँद गये, तब उस पतिव्रता महाभागा राजपुत्री सावित्रीने उस स्थानपर आये हुए सामर्थ्यशाली स्वयं धर्मराजको देखा, जो नीले कमलके-से श्यामवर्णसे सुशोभित और पीताम्बर धारण किये हुए थे। वे चमकती हुई बिजलियोंसे युक्त जलपूर्ण मेघ-जैसे दीख रहे थे तथा सूर्यके समान तेजस्वी मुकुट और दो कुण्डलोंसे सुशोभित थे। उनके वक्षःस्थलपर हार लटक रहा था। वे बाजूबंदसे विभूषित थे तथा उनके पीछे मृत्युसहित महाकाल भी था। धर्मराजने उस स्थानपर पहुँचकर उस समय सत्यवान्‌के शरीरसे अंगूठेके परिमाणवाले पुरुषको पाशमें बाँधकर अपने अधीन किया और उसे खींचकर शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया। तब आलस्यरहित हो सुन्दरी सावित्री पतिको प्राणरहित देखकर जाते हुए धर्मराजके पीछे-पीछे चली और काँपते हुए हृदयसे अञ्जलि बाँधकर धर्मराजसे बोली—‘माताकी भक्तिसे इस लोक, पिताकी भक्तिसे मध्यम लोक और गुरुकी शुश्रूषासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। जो इन तीनोंका आदर करता है, उसने मानो सभी धर्मोंका पालन कर लिया तथा जिसने इन तीनोंका आदर नहीं किया, उसकी सारी सत्क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। जबतक ये तीनों जीवित रहें, तबतक किसी अन्य धर्मके पालनकी आवश्यकता नहीं है। उनके प्रिय एवं सुखके कार्योंमें तत्पर रहकर नित्य उनकी शुश्रूषा करनी चाहिये। उनकी आज्ञासे यदि कभी परतन्त्रता भी स्वीकार करनी पड़े तो वह सब मन-वचन-कर्मद्वारा उन्हें निवेदित कर देना चाहिये। पुरुषके सारे कर्म माता, पिता और गुरु—इन्हीं तीनोंमें समाप्त हो जाते हैं॥ १—१४॥

२१५- राजाका कर्तव्य, राजकर्मचारियोंके लक्षण तथा राजधर्मका निरूपण

* अध्याय २१० *८४९

| यम उवाच<br>कृतेन कामेन निवर्तयाशु<br>धर्मो न तेभ्योऽपि हि उच्यते च।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ १५<br><br>गुरुपूजारतिर्भर्ता त्वं च साध्वी पतिव्रता।<br>विनिवर्तस्व धर्मज्ञे ग्लानिर्भवति तेऽधुना॥ १६ | यमराजने कहा— तुम हमसे जिस कामनाको पूर्ण करानेके लिये आ रही हो उस कामनाको छोड़ दो और शीघ्र लौट जाओ। सचमुच संसारमें माता-पिता तथा गुरुकी सेवासे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है। तुम्हारे इस प्रकार पीछे-पीछे आनेसे मेरे काममें विघ्न पड़ रहा है और तुम भी थकावटसे चूर हो रही हो। इसलिये मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ। धर्मज्ञे! तुम्हारा पति सचमुच गुरुजनोंकी पूजामें प्रेम करनेवाला है और तुम भी पतिव्रता साध्वी हो। इस समय तुम्हें कष्ट हो रहा है, अतः तुम लौट जाओ॥ १५-१६॥ | | सावित्र्युवाच<br>पतिर्हि दैवतं स्त्रीणां पतिरेव परायणम्।<br>अनुगम्यः स्त्रिया साध्व्या पतिः प्राणधनेश्वरः॥ १७<br>मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः।<br>अमितस्य प्रदातारं भर्तारं का न पूजयेत्॥ १८<br>नीयते यत्र भर्ता मे स्वयं वा यत्र गच्छति।<br>मयापि तत्र गन्तव्यं यथाशक्ति सुरोत्तम॥ १९<br>पतिमादाय गच्छन्तमनुगन्तुमहं यदा।<br>त्वां देव न हि शक्ष्यामि तदा त्यक्ष्यामि जीवितम्॥ २०<br>मनस्विनी तु या काचिद्वैधव्याक्षरदूषिता।<br>मुहूर्तंमपि जीवेत मण्डनार्हा ह्यमण्डिता॥ २१ | सावित्री बोली— स्त्रियोंका पति ही देवता है, पति ही उसको शरण देनेवाला है, इसलिये साध्वी स्त्रियोंको प्राणपति प्रियतमका अनुगमन करना चाहिये। पिता, भाई तथा पुत्र परिमित सम्पत्ति देनेवाले हैं, किंतु पति अपरिमित सम्पत्तिका दाता है। भला, ऐसे पतिकी कौन स्त्री पूजा नहीं करेगी। सुरोत्तम! आप मेरे पतिको जहाँ ले जा रहे हैं अथवा स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी यथाशक्ति जाना चाहिये। देव! मेरे प्राणपतिको ले जाते हुए आपके पीछे चलनेमें यदि मैं समर्थ न हो सकूँगी तो प्राणोंको त्याग दूँगी। जो कोई मनस्विनी स्त्री वैधव्य-धर्मसे दूषित होकर मुहूर्तभर जीवित रहती है तो वह सभी आभूषणोंसे अलंकृत होते हुए भी भाग्यहीन है॥ १७–२१॥ | | यम उवाच<br>पतिव्रते महाभागे परितुष्टोऽस्मि ते शुभे।<br>विना सत्यवतः प्राणैर्वरं वरय मा चिरम्॥ २२ | यमने कहा— महाभाग्यशालिनी पतिव्रते! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, अतः शुभे! सत्यवान्‌के प्राणोंको छोड़कर कोई भी वरदान माँग लो, देर मत करो॥ २२॥ | | सावित्र्युवाच<br>विनष्टचक्षुषो राज्यं चक्षुषा सह कारय।<br>च्युतराष्ट्रस्य धर्मज्ञ श्वशुरस्य महात्मनः॥ २३ | सावित्री बोली— धर्मज्ञ! जो राज्यसे च्युत हो गये हैं तथा जिनकी आँखें नष्ट हो गयी हैं, ऐसे मेरे महात्मा श्वशुरको राज्य और नेत्रसे संयुक्त कर दीजिये॥ २३॥ | | यम उवाच<br>दूरे पथे गच्छ निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ २४ | यमराजने कहा— भद्रे! तुम बहुत दूरतक चली आयी हो, अतः अब लौट जाओ। तुम्हारी यह सब अभिलाषा पूर्ण होगी। तुम्हारे मेरे पीछे चलनेसे मेरे काममें विघ्न पड़ेगा और तुम्हें भी थकावट होगी, इसीलिये इस समय मैं तुमसे ऐसा कह रहा हूँ॥ २४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने प्रथमवरलाभो नाम दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें प्रथम वरलाभ नामक दो सौ दसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१०॥

८५० * मत्स्यपुराण *


दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय

सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति

सावित्र्युवाचसावित्रीने कहा—
कुतः क्लमः कुतो दुःखं सद्भिः सह समागमे।<br>सतां तस्मान्न मे ग्लानिस्त्वत्समीपे सुरोत्तम॥ १देवश्रेष्ठ! सत्पुरुषोंके साथ समागम होनेपर कैसा परिश्रम? और कैसा दुःख? आप-जैसे महानुभावोंके समीपमें मुझे किसी प्रकारकी भी ग्लानि नहीं है।
साधूनां वाप्यसाधूनां संत एव सदा गतिः।<br>नैवासतां नैव सतामसन्तो नैवमात्मनः॥ २चाहे साधु प्रकृतिके हों या असाधु प्रकृतिके, सभीके निर्वाहक सदा सत्पुरुष ही होते हैं, किंतु असत्पुरुष न तो सज्जनोंके काम आ सकते हैं, न असत्पुरुषोंके ही और न स्वयं अपना ही कल्याण कर सकते हैं।
विषाग्निसर्पशस्त्रेभ्यो न तथा जायते भयम्।<br>अकारणजगद्वैरिखलेभ्यो जायते तथा॥ ३विष, अग्नि, सर्प तथा शस्त्रसे लोगोंको उतना भय नहीं होता, जितना अकारण जगत्‌से वैर करनेवाले दुष्टोंसे होता है।
संतः प्राणानपि त्यक्त्वा परार्थं कुर्वते यथा।<br>तथासंतोऽपि संत्यज्य परपीडासु तत्पराः॥ ४जैसे सत्पुरुष अपने प्राणोंका विसर्जन करके भी परोपकार करते हैं, उसी प्रकार दुर्जन भी अपने प्राणोंका परित्याग कर दूसरेको कष्ट देनेमें तत्पर रहते हैं।
त्यजत्यसूनयं लोकस्तृणवद् यस्य कारणात्।<br>परोपघातशक्तास्तं परलोकं तथासतः॥ ५जिस परलोककी प्राप्तिके लिये सत्पुरुष अपने प्राणोंको भी तृणके समान त्याग देते हैं, उसी परलोककी परायी हानिमें निरत रहनेवाले दुर्जन कुछ भी चिन्ता नहीं करते।
निकायेषु निकायेषु तथा ब्रह्मा जगद्गुरुः।<br>असतामुपघाताय राजानं ज्ञातवान् स्वयम्॥ ६स्वयं जगद्गुरु ब्रह्माने सभी प्राणि-समूहोंमें असत्प्राणियोंके निग्रहके लिये राजाको नियुक्त किया है।
नरान् परीक्ष्येद् राजा साधून् सम्मानयेत् सदा।<br>निग्रहं चासतां कुर्यात् स लोके लोकजित्तमः॥ ७राजा सर्वदा पुरुषोंकी परीक्षा करे। जो सज्जन हों उनका आदर करे और दुष्टोंको दण्ड दे। जो ऐसा करता है, वह सभी लोकविजेता राजाओंमें श्रेष्ठ है।
निग्रहेणासतां राजा सतां च परिपालनात्।<br>एतावदेव कर्तव्यं राज्ञा स्वर्गमभीप्सुना॥ ८सत्पुरुषोंको सम्मान देने तथा दुष्टोंका निग्रह करनेके कारण ही वह राजा है। स्वर्ग-प्राप्तिकी इच्छा करनेवाले राजाको इन दोनों कार्योंका पालन करना चाहिये।
राजकृत्यं हि लोकेषु नास्त्यन्यज्जगतीपते।<br>असतां निग्रहादेव सतां च परिपालनात्॥ ९जगतीपते! राजाओंके लिये सत्पुरुषोंके परिपालन तथा दुष्टोंके नियमनके अतिरिक्त दूसरा कोई राजधर्म संसारमें नहीं है।
राजभिश्चाप्यशास्तानामसतां शासिता भवान्।<br>तेन त्वमधिको देवो देवेभ्यः प्रतिभासि मे॥ १०उन राजाओंद्वारा भी जो दुष्ट शासित नहीं किये जा सके, ऐसे दुर्जनोंके शासक आप हैं, इसी कारण आप मुझे सभी देवताओंसे अधिक महत्त्वशाली देवता प्रतीत हो रहे हैं।
जगत्तु धार्यते सद्भिः सतामग्र्यस्तथा भवान्।<br>तेन त्वामनुयान्त्या मे क्लमो देव न विद्यते॥ ११यह जगत् सत्पुरुषोंद्वारा धारण किया जाता है तथा आप उन सत्पुरुषोंके अग्रणी हैं, इसलिये देव! आपके पीछे चलते हुए मुझे कुछ भी क्लेश नहीं है॥ १—११॥

* अध्याय २९१ * ८५१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यम उवाच<br>तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसङ्गतैः।<br>विना सत्यवतः प्राणाद् वरं वरय मा चिरम्॥ १२यमराज बोले— विशालाक्षि! तुम्हारे इन धर्मयुक्त वचनोंसे मैं प्रसन्न हूँ, अतः सत्यवान्‌के प्राणोंके अतिरिक्त दूसरा वर माँग लो, देर न करो॥ १२॥
सावित्र्युवाच<br>सहोदराणां भ्रातॄणां कामयामि शतं विभो।<br>अनपत्यः पिता प्रीतिं पुत्रलाभात् प्रयातु मे॥ १३सावित्रीने कहा— विभो! मैं सौ सहोदर भाइयोंकी अभिलाषिणी हूँ। मेरे पिता पुत्रहीन हैं, अतः वे पुत्रलाभसे प्रसन्न हों।
तामुवाच यमो गच्छ यथागतमनिन्दिते।<br>और्ध्वदेहिककार्येषु यत्नं भर्तुः समाचर॥ १४तब यमराजने सावित्रीसे कहा—‘अनिन्दिते! तुम जैसे आयी हो, वैसे ही लौट जाओ तथा अपने पतिके और्ध्वदैहिक क्रियाओंके लिये यत्न करो।
नानुगन्तुमयं शक्यस्त्वया लोकान्तरं गतः।<br>पतिव्रतासि तेन त्वं मुहूर्तं मम यास्यसि॥ १५अब यह दूसरे लोकमें चला गया है, अतः तुम इसके पीछे नहीं चल सकती। चूँकि तुम पतिव्रता हो, अतः दो घड़ीतक और मेरे साथ चल सकती हो।
गुरुशुश्रूषणाद् भद्रे तथा सत्यवता महत्।<br>पुण्यं समार्जितं येन नयाम्येनमहं स्वयम्॥ १६भद्रे! सत्यवान्‌ने गुरुजनोंकी शुश्रूषा कर महान् पुण्य अर्जित किया है, अतः मैं स्वयं इसे ले जा रहा हूँ।
एतावदेव कर्तव्यं पुरुषेण विजानता।<br>मातुः पितुश्च शुश्रूषा गुरोश्च वरवर्णिनि॥ १७सुन्दरि! विद्वान् पुरुषको माता, पिता तथा गुरुकी सेवामें सदा तत्पर रहना चाहिये।
तोषितं त्रयमेतच्च सदा सत्यवता वने।<br>पूजितं विजितः स्वर्गस्त्वयानेन चिरं शुभे॥ १८सत्यवान्‌ने वनमें इन तीनोंको अपनी शुश्रूषासे प्रसन्न किया है। शुभे! इसके साथ तुमने भी स्वर्गको जीत लिया है।
तपसा ब्रह्मचर्येण अग्निशुश्रूषया शुभे।<br>पुरुषाः स्वर्गमायान्ति गुरुशुश्रूषया तथा॥ १९शुभे! मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा अग्नि और गुरुकी शुश्रूषासे स्वर्गको प्राप्त करते हैं,
आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः।<br>नाचैतेऽप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन तु विशेषतः॥ २०अतः विशेषरूपसे ब्राह्मणको आचार्य, पिता, माता तथा बड़े भाईका कभी अपमान नहीं करना चाहिये;
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः।<br>माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता वै मूर्तिरात्मनः॥ २१क्योंकि आचार्य ब्रह्माका, पिता प्रजापतिका, माता पृथ्‍वीका और भाई अपना ही स्वरूप है।
जन्मना पितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।<br>न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥ २२मनुष्यके जन्मके समय माता और पिता जो कष्ट सहन करते हैं, उसका बदला सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं चुकाया जा सकता।
तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य तु सर्वदा।<br>तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते॥ २३अतः मनुष्यको माता, पिता तथा आचार्यका सर्वदा प्रिय कार्य करना चाहिये; क्योंकि इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सभी तपस्याएँ सम्पन्न हो जाती हैं।
तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते।<br>न च तैरननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्॥ २४इन तीनोंकी शुश्रूषा परम तपस्या कही गयी है, अतः उनकी आज्ञाके बिना किसी अन्य धर्मका आचरण नहीं करना चाहिये।
त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः।<br>त एव च त्रयो वेदास्तथैवोक्तास्त्रयोऽग्नयः॥ २५वे ही तीनों लोक हैं, वे ही तीनों आश्रम हैं, वे ही तीनों वेद हैं तथा तीनों अग्नियाँ भी वे ही कहलाते हैं।
पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माता दक्षिणातः स्मृतः।<br>गुरुराहवनीयश्च साग्नित्रेता गरीयसी॥ २६पिता गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि तथा गुरु आहवनीयाग्नि है। ये तीनों अग्नियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं।
८५२* मत्स्यपुराण *

| त्रिषु प्रमाद्यते नैषु त्रींल्लोकान् जयते गृही।<br>दीप्यमानः स्ववपुषा देववद् दिवि मोदते॥ २७<br><br>कृतेन कामेन निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ २८ | जो गृहस्थ इन तीनों गुरुजनोंकी सेवामें कभी असावधानी नहीं करता, वह तीनों लोकोंको जीत लेता है और अपने शरीरसे देवताओंके समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्गमें आनन्दका अनुभव करता है। भद्रे! तुम्हारा काम पूरा हो गया, अब तुम लौट जाओ। तुम्हारे द्वारा कही हुई वे सारी बातें पूर्ण होंगी। इस प्रकार हमारे पीछे आनेसे मेरे कार्यमें विघ्न पड़ता है और तुम्हें भी कष्ट हो रहा है, इसीलिये मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ॥ २३–२८॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने द्वितीयवरलाभो नामैकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें द्वितीय वरका लाभ नामक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २११॥


दो सौ बारहवाँ अध्याय

यमराज-सावित्री-संवाद तथा यमराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति

सावित्र्युवाचसावित्रीने कहा—
धर्मार्जने सुरश्रेष्ठ कुतो ग्लानिः क्लमस्तथा।<br>त्वत्पादमूलसेवा च परमं धर्मकारणम्॥ १<br><br>धर्मार्जनं तथा कार्यं पुरुषेण विजानता।<br>तल्लाभः सर्वलाभेभ्यो यदा देव विशिष्यते॥ २<br><br>धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गो जन्मनः फलम्।<br>धर्महीनस्य कामार्थौ वन्ध्यासुतसमौ प्रभौ॥ ३<br><br>धर्मादर्थस्तथा कामो धर्माल्लोकद्वयं तथा।<br>धर्म एकोऽनुयात्येनं यत्र क्वचनगामिनम्॥ ४<br><br>शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति।<br>एको हि जायते जन्तुरेक एव विपद्यते॥ ५<br><br>धर्मस्तमनुयात्येको न सुहृन्न च बान्धवाः।<br>क्रिया सौभाग्यलावण्यं सर्वं धर्मेण लभ्यते॥ ६<br><br>ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रशर्वेन्दुयमार्काग्न्यनिलाम्भसाम् ।<br>वस्वश्विधनदाद्यानां ये लोकाः सर्वकामदाः॥ ७<br><br>धर्मेण तानवाप्नोति पुरुषः पुरुषान्तक।<br>मनोहराणि द्वीपानि वर्षाणि सुसुखानि च॥ ८<br><br>प्रयान्ति धर्मेण नरास्तथैव नरगण्डिकाः।<br>नन्दनादीनि मुख्यानि देवोद्यानानि यानि च॥ ९<br><br>तानि पुण्येन लक्ष्यन्ते नाकपृष्ठं तथा नरैः।<br>विमानानि विचित्राणि तथैवाप्सरसः शुभाः॥ १०देवश्रेष्ठ! धर्मोपार्जनके कार्यमें कैसी ग्लानि और कैसा कष्ट? आपके चरणमूलकी सेवा ही परम धर्मका कारण है। देव! ज्ञानी पुरुषको सर्वदा धर्मोपार्जन करना चाहिये; क्योंकि उसका लाभ सभी लाभोंसे विशेष महत्त्वपूर्ण है। प्रभो! धर्म, अर्थ और काम—ये तीनों एक साथ संसारमें जन्म लेनेके फल हैं; क्योंकि धर्महीन पुरुषके अर्थ और काम वन्ध्याके पुत्रकी भाँति निष्फल हैं। धर्मसे अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है तथा धर्मसे ही दोनों लोक सिद्ध होते हैं। जहाँ-कहीं भी जानेवाले प्राणीके पीछे अकेले धर्म ही जाता है। अन्य सभी वस्तुएँ शरीरके साथ ही नष्ट हो जाती हैं। प्राणी अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरकर जाता है। एक धर्म ही उसके पीछे-पीछे जाता है, मित्र एवं भाई-बन्धु कोई भी साथ नहीं देता। कार्योंमें सफलता, सौभाग्य और सौन्दर्य आदि सब कुछ धर्मसे ही प्राप्त होते हैं। पुरुषान्तक! ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, शिव, चन्द्रमा, यम, सूर्य, अग्नि, वायु, वरुण, वसुगण, अश्विनीकुमार एवं कुबेर आदि देवताओंके जो सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले लोक हैं, उन सबको मनुष्य धर्मके द्वारा ही प्राप्त करता है। मनुष्य मनोहर द्वीपों एवं सुखदायी वर्षोंको धर्मके द्वारा ही प्राप्त करते हैं। देवताओंके जो नन्दनादि मुख्य उद्यान हैं, वे भी मनुष्योंको पुण्यसे ही प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार स्वर्ग, विचित्र विमान और सुन्दर अप्सराएँ पुण्यसे ही प्राप्त होती हैं॥ १–१०॥

* अध्याय २१२ *

श्लोकअर्थ
तेजसानि शरीराणि सदा पुण्यवतां फलम्।<br>राज्यं नृपतिपूजा च कामसिद्धिस्तथेप्सिता ॥ ११<br>संस्काराणि च मुख्यानि फलं पुण्यस्य दृश्यते।पुण्यशाली मनुष्योंके तेजस्वी शरीर पुण्यके ही फल हैं। राज्यकी प्राप्ति, राजाओंद्वारा सम्मान, अभीष्ट मनोरथोंकी सिद्धि तथा मुख्य संस्कार—ये सभी पुण्यके ही फल देखे जाते हैं।
रुक्मवैदूर्यदण्डानि चण्डांशुसदृशानि च ॥ १२<br>चामराणि सुराध्यक्ष भवन्ति शुभकर्मणाम्।देवाध्यक्ष! पुण्यवान् पुरुषोंके चँवर सुवर्ण तथा वैदूर्यके बने हुए डंडेवाले तथा सूर्यके समान तेजोमय होते हैं।
पूर्णेन्दुमण्डलाभेन रत्नांशुकविकासिना ॥ १३<br>धार्यतां याति छत्रेण नरः पुण्येन कर्मणा।पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् एवं रत्नजटित वस्त्रसे सुशोभित छत्र मनुष्यको पुण्य कर्मसे ही प्राप्त होता है।
जयशङ्खस्वरौघेण सूतमागधनिःस्वनैः ॥ १४<br>वरासनं सभृङ्गारं फलं पुण्यस्य कर्मणः।विजयकी सूचना देनेवाले शङ्ख-स्वरों तथा मागध-बन्दियोंकी माङ्गलिक ध्वनियोंके साथ अभिषेक-पात्रसहित श्रेष्ठ सिंहासनका प्राप्त होना पुण्यकर्मका ही फल है।
वरान्नपानं गीतं च भृत्यमाल्यानुलेपनम् ॥ १५<br>रत्नवस्त्राणि मुख्यानि फलं पुण्यस्य कर्मणः।उत्तम अन्न, जल, गीत, अनुचर, मालाएँ, चन्दन, रत्न तथा बहुमूल्य वस्त्र—ये सब पुण्यकर्मोंके फल हैं।
रूपौदार्यगुणोपेताः स्त्रियश्चातिमनोहराः ॥ १६<br>वासाः प्रासादपृष्ठेषु भवन्ति शुभकर्मिणाम्।सुन्दरता और औदार्य गुणोंसे युक्त अतिशय मनोहर स्त्रियाँ और उच्च महलोंपर निवास शुभ कर्मियोंको प्राप्त होते हैं।
सुवर्णकिङ्किणीमिश्रचामरापीडधारिणः ॥ १७<br>वहन्ति तुरगा देव नरं पुण्येन कर्मणा।देव! मस्तकपर स्वर्णकी घंटियोंसे युक्त चमर धारण करनेवाले घोड़े पुण्यकर्मसे ही मनुष्यको वहन करते हैं।
हेमकक्षैश्च मातङ्गैश्चलत्पर्वतसंनिभैः ॥ १८<br>खेलद्भिः पादविन्यासैर्यान्ति पुण्येन कर्मणा।चलते हुए पर्वतोंके समान, सुवर्णनिर्मित अम्बारीसे सुशोभित तथा चञ्चल पादविन्याससे युक्त हाथियोंकी सवारी पुण्यकर्मके प्रभावसे ही प्राप्त होती है।
सर्वकामप्रदे देव सर्वाघदुरितापहे ॥ १९<br>वहन्ति भक्तिं पुरुषः सदा पुण्येन कर्मणा।देव! सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले एवं सभी पापोंको दूर करनेवाले स्वर्गमें पुरुष सदा पुण्यकर्मोंके प्रभावसे ही भक्ति प्राप्त करते हैं।
तस्य द्वाराणि यजनं तपो दानं दमः क्षमा ॥ २०<br>ब्रह्मचर्यं तथा सत्यं तीर्थानुसरणं शुभम्।<br>स्वाध्यायसेवा साधूनां सहवासः सुरार्चनम् ॥ २१<br>गुरूणां चैव शुश्रूषा ब्राह्मणानां च पूजनम्।<br>इन्द्रियाणां जयश्चैव ब्रह्मचर्यममत्सरम् ॥ २२उसकी प्राप्तिके उपाय हैं—यज्ञ, तप, दान, इन्द्रियनिग्रह, क्षमाशीलता, ब्रह्मचर्य, सत्य, शुभदायक तीर्थोंकी यात्रा, स्वाध्याय, सेवा, सत्पुरुषोंकी संगति, देवार्चन, गुरुजनोंकी शुश्रूषा, ब्राह्मणोंकी पूजा, इन्द्रियोंको वशमें रखना तथा मत्सररहित ब्रह्मचर्य।
तस्माद् धर्मः सदा कार्यो नित्यमेव विजानता।<br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वाकृतम् ॥ २३इसलिये विद्वान् पुरुषको सर्वदा धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि मृत्यु इसकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य पूरा किया अथवा नहीं।
बाल एव चरेद् धर्ममनित्यं देव जीवितम्।<br>को हि जानाति कस्याद्य मृत्युरेवा पतिष्यति ॥ २४देव! मनुष्यको बाल्यावस्थासे ही धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि यह जीवन नश्वर है। यह कौन जानता है कि आज किसकी मृत्यु हो जायगी।
पश्यतोऽप्यस्य लोकस्य मरणं पुरतः स्थितम्।<br>अमरस्येव चरितमत्याश्चर्यं सुरोत्तम ॥ २५सुरोत्तम! इस जीवके देखते हुए भी मृत्यु सामने खड़ी रहती है, फिर भी वह मृत्युरहितकी भाँति आचरण करता है—यह महान् आश्चर्य है।
युवत्वापेक्षया बालो वृद्धत्वापेक्षया युवा।<br>मृत्योरुत्सङ्गमारूढः स्थविरः किमपेक्षते ॥ २६युवककी अपेक्षा बालक और वृद्धकी अपेक्षा युवक अपनेको मृत्युसे दूर मानता है, किंतु मृत्युकी गोदमें बैठा हुआ वृद्ध किसकी अपेक्षा करता है।
८५४* मत्स्यपुराण *
तत्रापि विन्दतस्त्राणं मृत्युना तस्य का गतिः।<br>न भयं मरणं चैव प्राणिनामभयं क्वचित्।<br>तत्रापि निर्भयाः सन्तः सदा सुकृतकारिणः॥ २७<br><br>यम उवाच<br>तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसंगतैः।<br>विना सत्यवतः प्राणान् वरं वरय मा चिरम्॥ २८<br><br>सावित्र्युवाच<br>वरयामि त्वया दत्तं पुत्राणां शतमौरसम्।<br>अनपत्यस्य लोकेषु गतिः किल न विद्यते॥ २९<br><br>यम उवाच<br>कृतेन कामेन निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सफलं यथोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्यात्<br>तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ ३०इतनेपर भी जो मृत्युसे रक्षाके उपाय सोचते हैं, उनकी क्या गति होगी? प्राणधारियोंको इस जगत्में केवल मृत्युसे भय ही नहीं है, उनके लिये कहीं अभयस्थान भी नहीं है। तथापि पुण्यवान् सत्पुरुष सर्वदा निर्भय होकर संसारमें जीवित रहते हैं॥ १९–२७॥<br><br>यमराज बोले— विशालाक्षि! तुम्हारी इन धर्मयुक्त बातोंसे मैं विशेष संतुष्ट हूँ, अतः तुम सत्यवान्‌के प्राणोंके अतिरिक्त अन्य वर माँग लो, देर मत करो॥ २८॥<br><br>सावित्रीने कहा— देव! मैं आपसे अपनी कोखसे उत्पन्न होनेवाले सौ पुत्रोंका वरदान माँगती हूँ; क्योंकि लोकोंमें पुत्रहीनकी सद्गति नहीं होती॥ २९॥<br><br>यमराज बोले— भद्रे! अब तुम शेष अभीष्ट कामनाको छोड़कर लौट जाओ, तुम्हारी यह याचना भी सफल होगी। इस प्रकार तुम्हारे अनुगमनसे मेरे कार्योंमें विघ्न होगा और तुम्हें भी कष्ट होगा, इसीलिये मैं तुमसे इस समय ऐसा कह रहा हूँ॥ ३०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने तृतीयवरलाभो नाम द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें तृतीय वर-लाभ नामक दो सौ बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१२॥


दो सौ तेरहवाँ अध्याय

सावित्रीकी विजय और सत्यवान्‌की बन्धन-मुक्ति

सावित्र्युवाच<br>धर्माधर्मविधानज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक।<br>त्वमेव जगतो नाथः प्रजासंयमनो यमः॥ १<br>कर्मणामनुरूपेण यस्माद् यमयसे प्रजाः।<br>तस्माद् वै प्रोच्यसे देव यम इत्येव नामतः॥ २<br>धर्मेणेमाः प्रजाः सर्वा यस्माद् रञ्जयसे प्रभो।<br>तस्मात् ते धर्मराजेति नाम सद्भिर्निगद्यते॥ ३<br>सुकृतं दुष्कृतं चोभे पुरोधाय यदा जनाः।<br>त्वत्सकाशं मृता यान्ति तस्मात् त्वं मृत्युरुच्यते॥ ४<br>कालं कलार्धं कलयन् सर्वेषां त्वं हि तिष्ठसि।<br>तस्मात् कालेति ते नाम प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः॥ ५<br>सर्वेषामेव भूतानां यस्मादन्तकरो महान्।<br>तस्मात् त्वमन्तकः प्रोक्तः सर्वदेवैर्महाद्युते॥ ६सावित्रीने कहा— धर्म-अधर्मके विधानको जाननेवाले एवं सभी धर्मोंके प्रवर्तक देव! आप ही जगत्‌के स्वामी तथा प्रजाओंका नियमन करनेवाले यम हैं। देव! चूँकि आप कर्मोंके अनुरूप प्रजाओंका नियमन करते हैं, इसलिये 'यम' नामसे पुकारे जाते हैं। प्रभो! चूँकि आप धर्मपूर्वक इस सारी प्रजाको आनन्दित करते हैं, इसीलिये सत्पुरुष आपको धर्मराज नामसे पुकारते हैं। लोग मरनेपर अपने सत्-असत्—दोनों प्रकारके कर्मोंको अपने आगे रखकर आपके समीप जाते हैं, इसलिये आप मृत्यु कहलाते हैं। आप सभी प्राणियोंके क्षण, कला आदिसे कालकी गणना करते रहते हैं, इसीलिये तत्त्वदर्शी लोग आपको 'काल' नामसे पुकारते हैं। महादीप्तिसम्पन्न! चूँकि आप संसारके सभी चराचर जीवोंके महान् अन्तकर्ता हैं, इसीलिये आप सभी देवताओंकेद्वारा 'अन्तक' कहे जाते हैं।
  • अध्याय २१३ * ८५५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विवस्वतस्त्वं तनयः प्रथमं परिकीर्तितः।<br>तस्माद् वैवस्वतो नाम्ना सर्वलोकेषु कथ्यसे ॥ ७<br>आयुष्ये कर्मणि क्षीणे गृह्णासि प्रसभं जनम्।<br>तदा त्वं कथ्यसे लोके सर्वप्राणहरेति वै ॥ ८<br>तव प्रसादाद् देवेश त्रयीधर्मो न नश्यति।<br>तव प्रसादाद् देवेश धर्मे तिष्ठन्ति जन्तवः।<br>तव प्रसादाद् देवेश संकरो न प्रजायते ॥ ९<br>सतां सदा गतिर्देव त्वमेव परिकीर्तितः।<br>जगतोऽस्य जगन्नाथ मर्यादापरिपालकः ॥ १०<br>पाहि मां त्रिदशश्रेष्ठ दुःखितां शरणागताम्।<br>पितरौ च तथैवास्य राजपुत्रस्य दुःखितौ ॥ ११आप विवस्वान्‌के प्रथम पुत्र कहे गये हैं, अतः सम्पूर्ण विश्वमें वैवस्वत नामसे कहे जाते हैं। आयुकर्मके क्षीण हो जानेपर आप लोगोंको हठात् पकड़ लेते हैं, इसी कारण लोकमें सर्वप्राणहर नामसे कहे जाते हैं। देवेश! आपकी कृपासे ऋक्, साम और यजुः—इन तीनों वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्मका विनाश नहीं होता। देवेश! आपकी महिमासे सभी प्राणी अपने-अपने धर्मोंमें स्थित रहते हैं। देवेश! आपकी सत्कृपासे वर्णसंकर संततिकी उत्पत्ति नहीं होती। देव! आप ही सदा सत्पुरुषोंकी गति बतलाये गये हैं। जगन्नाथ! आप इस जगत्‌की मर्यादाका पालन करनेवाले हैं। देवताओंमें श्रेष्ठ! अपनी शरणमें आयी हुई मुझ दुखियाकी रक्षा कीजिये। इस राजपुत्रके माता-पिता भी दुःखी हैं॥१—११॥
यम उवाच<br>स्तवेन भक्त्या धर्मज्ञे मया तुष्टेन सत्यवान्।<br>तव भर्त्ता विमुक्तोऽयं लब्धकामा व्रजाबले ॥ १२<br>राज्यं कृत्वा त्वया सार्धं वर्षाणां शतपञ्चकम्।<br>नाकपृष्ठमथारुह्य त्रिदशैः सह रंस्यते ॥ १३<br>त्वयि पुत्रशतं चापि सत्यवान् जनयिष्यति।<br>ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥ १४<br>मुख्यास्त्वन्नाम पुत्रस्ते भविष्यन्ति हि शाश्वताः।<br>पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि ॥ १५<br>मालव्यां मालवा नाम शाश्वताः पुत्रपौत्रिणः।<br>भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥ १६<br>स्तोत्रेणानेन धर्मज्ञे कल्पमुत्थाय यस्तु माम्।<br>कीर्तयिष्यति तस्यापि दीर्घमायुर्भविष्यति ॥ १७यमराज बोले—धर्मज्ञे! तुम्हारी स्तुति तथा भक्तिसे संतुष्ट होकर मैंने तुम्हारे पति इस सत्यवान्‌को विमुक्त कर दिया है। अबले! अब तुम सफलमनोरथ होकर लौट जाओ। यह सत्यवान् तुम्हारे साथ पाँच सौ वर्षोंतक राज्यसुख भोगकर अन्तकालमें स्वर्गलोकमें जायगा और देवताओंके साथ विहार करेगा। सत्यवान् तुम्हारे गर्भसे सौ पुत्रोंको भी उत्पन्न करेगा, वे सब-के-सब देवताओंके समान तेजस्वी तथा क्षत्रिय राजा होंगे। वे चिरकालतक जीवित रहते हुए तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होंगे। तुम्हारे पिताको भी तुम्हारी माताके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न होंगे। वे तुम्हारे भाई मालवा (मध्यदेश)-में उत्पन्न होनेके कारण मालव नामसे विख्यात होंगे और चिरकालतक जीवित रहते हुए पुत्र-पौत्रादिसे युक्त होंगे तथा देवताओंके समान ऐश्वर्यसम्पन्न एवं क्षत्रियोचित गुणोंका पालन करेंगे। धर्मज्ञे! जो कोई पुरुष प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्रद्वारा मेरा स्तवन करेगा, उसकी भी आयु दीर्घ होगी ॥ १२—१७ ॥
मत्स्य उवाच<br>एतावदुक्त्वा भगवान् यमस्तु<br>प्रमुच्य तं राजसुतं महात्मा।<br>अदर्शनं तत्र यमो जगाम<br>कालेन सार्धं सह मृत्युना च ॥ १८मत्स्यभगवान्‌ने कहा—राजन्! इतनी बातें कहकर ऐश्वर्यशाली महात्मा यमराज उस राजपुत्र सत्यवान्‌को छोड़कर काल तथा मृत्युके साथ वहीं अदृश्य हो गये॥१८॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने यमस्तुतिसत्यवज्जीवितलाभो नाम त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें यमस्तुति और सत्यवान्‌का जीवन-लाभ नामक दो सौ तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २१३ ॥