मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* अध्याय २२७ * । ९०१
| कर्षकेभ्योऽर्थमादाय यः कुर्यात् करमन्यथा।<br>तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत्॥ १५७<br><br>ये नियुक्ताः स्वकार्येषु हन्युः कार्याणि कार्यिणाम्।<br>निर्घृणाः क्रूरमनसः सर्वे कर्मापराधिनः॥ १५८<br><br>धनोष्मणा पच्यमानांस्तान् निःस्वान् कारयेन्नृपः।<br>कूटशासनकर्तृंश्च प्रकृतीनां च दूषकान्॥ १५९<br><br>स्त्रीबालब्राह्मणघ्नांश्च वध्यात् तत्सेविनस्तथा।<br>अमात्यः प्राड् विवाको वा यः कुर्यात् कार्यमन्यथा॥ १६०<br><br>तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत्।<br>ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च तस्करो गुरुतल्पगः॥ १६१<br><br>एतान् सर्वान् पृथग्दिश्यान्महापातकिनो नरान्।<br>महापातकिनो वध्या ब्राह्मणं तु विवासयेत्॥ १६२<br><br>कृतचिह्नं स्वदेशाच्च शृणु चिह्नाकृतिं ततः।<br>गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने सुराध्वजः॥ १६३<br><br>स्तेने तु श्वपदं तद्वद् ब्रह्महन्यशिराः पुमान्।<br>असम्भाष्या ह्यसम्भाज्या असंवाह्या विशेषतः॥ १६४<br><br>त्यक्तव्याश्च तथा राजन्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः।<br>महापातकिनो वित्तमादाय नृपतिः स्वयम्॥ १६५<br><br>अप्सु प्रवेशयेद् दण्डं वरुणायोपपादयेत्।<br>सहोढं न विना चोरं घातयेद् धार्मिको नृपः॥ १६६<br><br>सहोढं सोपकरणं घातयेदविचारयन्।<br>ग्रामेष्वपि च ये केचिच्चोराणां भक्ष्यदायकाः॥ १६७<br><br>भाण्डावकाशादाश्चैव सर्वांस्तानपि घातयेत्।<br>राष्ट्रेषु राज्ञाधिकृताः सामन्ताश्चैव दूषकाः॥ १६८<br><br>अभ्याघातेषु मध्यस्थाः क्षिप्रं शास्यास्तु चोरवत्।<br>ग्रामघाते मठाभङ्गे पथि मोषाभिमर्दने॥ १६९<br><br>शक्तितो नाभिधावन्तो निर्वास्याः सपरिच्छदाः।<br>राज्ञः कोषापहर्तूंश्च प्रतिकूलेषु संस्थितान्॥ १७० | लेते हैं या किसानोंसे कर लेकर उसे दूसरे कार्योंमें लगा देते हैं तो राजा उनका सर्वस्व छीनकर उन्हें निर्वासनका दण्ड दे। जो लोग अपने पदपर नियुक्त होकर अन्य कर्मचारियोंके कार्योंको हानि पहुँचाते हैं, वे सभी निर्दय, क्रूरात्मा, कर्मके अपराधी और धनकी गर्मीसे उन्मत्त हो जाते हैं, राजाको चाहिये कि उन्हें निर्धन बना दे। यदि राजाके सेवकगण कूटनीतिसे शासन करनेवाले, प्रजावर्गको राजाके विरुद्ध भड़कानेवाले, स्त्री, बालक और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले हों तो राजा उन्हें प्राण-दण्ड दे। चाहे अमात्य हो या प्रधान न्यायकर्ता, यदि वह अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता तो राजा उसका सर्वस्व छीनकर उसे अपने देशसे बाहर निकाल दे। ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, चोर तथा गुरु-स्त्रीगामी—इन महापातकी पुरुषोंको राजा पृथक्-पृथक् प्राण-दण्डकी व्यवस्था करे। ऐसे महापापियोंको राजा प्राण-दण्ड दे, किंतु ब्राह्मणको चिह्नित करके अपने देशसे निकाल दे। उक्त चिह्नका आकार बताता हूँ, सुनिये। यदि ब्राह्मण गुरुपत्नीके साथ समागम करता है तो उसके शरीरमें भगका आकार, मदिरापायी हो तो सुराध्वजका चिह्न, चोरीके अपराधमें कुत्तेके पैरोंका चिह्न तथा ब्रह्मघातीके शरीरमें बिना सिरके पुरुषका चिह्न बनाना चाहिये। राजन्! ऐसे घोर पापियोंके साथ उनकी जातिवाले, सम्बन्धी तथा भाई-बन्धुओंको विशेषतया सम्भाषण, सहभोज तथा विवाहादि-सम्बन्ध त्याग देना चाहिये॥ १५१—१६४ १/२ ॥<br><br>राजा महापापी पुरुषोंकी सम्पत्तिको अपने अधीन कर ले और उसमेंसे दण्डभागको वरुणके उद्देश्यसे जलमें छोड़ दे। धार्मिक राजाको सपत्नीक चोरको प्राण-दण्ड नहीं देना चाहिये, किंतु चुरायी हुई वस्तुके साथ ही यदि सपत्नीक चोर पकड़ा जाता है तो उसे भी राजा बिना किसी विचारके प्राण-दण्ड दे। ग्रामोंमें भी जो कोई चोरोंको भोजन, पात्र तथा रहनेका आश्रय देनेवाले हों तो इन सभीको प्राण-दण्ड देना चाहिये। राष्ट्रमें राजाके अधिकारी तथा अधीनस्थ सामन्तगण यदि दुष्ट हो गये हों या बुरे अवसरपर तटस्थ रहते हों तो वे भी चोरोंके समान दण्डके भागी होते हैं। ग्राममें किसी विनाशके उपस्थित होनेपर, किसी घर आदिके गिरनेके अवसरपर या मार्गमें किसी रमणीपर अत्याचार किये जानेपर राजाके जो अधिकारी या सामन्त अपनी शक्तिके अनुसार उसकी रक्षाके लिये नहीं दौड़ते, वे परिवार तथा साधनसहित निर्वासित कर देने योग्य हैं। राजाके कोशको अपहृत करनेवालों, |
२३०- अद्भुत उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय
९०२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अरीणामुपकर्तॄंश्च घातयेद् विविधैर्वधैः।<br>संधिं कृत्वा तु ये चौर्यं रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः॥ १७१<br>तेषां छित्त्वा नृपो हस्तौ तीक्ष्णशूले निवेशयेत्।<br>तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन तु॥ १७२<br>यस्तु पूर्वं निविष्टं स्यात् तडागस्योदकं हरेत्।<br>आगमं चाप्यपां भिन्द्यात् स दाप्यः पूर्वसाहसम्॥ १७३<br>कोष्ठागारायुधागारदेवागारविभेदकान् ।<br>पापान् पापसमाचारान् पातयेच्छीघ्रमेव च॥ १७४ | शत्रु-पक्षसे मिले रहनेवालों तथा शत्रुओंका उपकार करनेवालोंको विविध वधोपायोंद्वारा मरवा डालना चाहिये। जो चोर रातमें सेंध लगाकर चोरी करते हैं, राजाको उनके हाथोंको काटकर तीखे शूलपर बैठा देना चाहिये। तड़ागका भेदन करनेवालेको राजा जलमें डुबोकर मृत्युदण्ड दे। जो व्यक्ति तालाबमें भरे हुए जलकी चोरी करता है या उसमें जलके आनेके मार्गोंको रोक देता है, उसे पूर्ववत् साहस-दण्ड देना चाहिये। कोष्ठागार, आयुधागार तथा देवागारोंको तोड़नेवाले पापाचारियों एवं पापयुक्त किंवदन्तीसे लिप्त पुरुषोंको राजा शीघ्र ही प्राण-दण्ड दे ॥१६५-१७४॥ |
| समुत्सृजेद् राजमार्गं यस्त्वमेध्यमनापदि।<br>स हि कार्षापणं दण्ड्यस्तत्त्वमेध्यं च शोधयेत्॥ १७५<br>आपद्गतोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव च।<br>परिभाषणमर्हन्ति न च शोध्यमिति स्थितिः॥ १७६ | जो किसी आपत्तिके न होनेपर भी सड़कपर मल आदि अपवित्र वस्तुओंको फेंकता है, उसे एक कार्षापणका दण्ड देना चाहिये और उसीसे उस गंदी वस्तुको हटवाना चाहिये। यदि आपत्तिग्रस्त, वृद्ध, गर्भिणी स्त्री अथवा बालक ऐसा अपराध करते हैं तो उन्हें कहकर मना कर दे, उनसे सफाई न कराये, ऐसी मर्यादा है। |
| प्रथमं साहसं दण्ड्यो यश्च मिथ्या चिकित्सते।<br>परुषे मध्यमं दण्डमुत्तमं च तथोत्तमे॥ १७७ | जो वैद्य झूठी दवा करता है या वैद्य न होकर भी दवा देता है, उसे प्रथम साहसका दण्ड देना चाहिये। जिसकी दवा निकृष्ट है, उसे मध्यम साहसका दण्ड तथा जिसकी दवा अत्यन्त अवगुणकारी है, उसे उत्तमसाहसका दण्ड देना चाहिये। |
| छत्रस्य ध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकाः।<br>प्रतिकुर्युस्ततः सर्वे पञ्च दण्ड्याः शतानि च॥ १७८ | छत्र, ध्वजाके दण्डों तथा प्रतिमाओंको तोड़नेवालेको पाँच सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये और उन्हींसे इन सबका प्रतिशोध भी कराना चाहिये। |
| अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा।<br>मणीनामपि भेदेन दण्ड्यः प्रथमसाहसम्॥ १७९ | अदूषित वस्तुओंको दूषित करने या तोड़नेवालेको तथा मणि आदि मूल्यवान् वस्तुओंको नष्ट करनेवालेको प्रथमसाहसका दण्ड देना चाहिये। |
| समं च विषमं चैव कुरुते मूल्यतोऽपि वा।<br>समाप्नुयात् स वै पूर्वं दमं मध्यममेव च॥ १८० | किसी वस्तुके मूल्यमें जो कमी या वृद्धि करता है, उसे क्रमशः पूर्व और मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये। |
| बन्धनानि च सर्वाणि राजमार्गे निवेशयेत्।<br>कर्षन्तो यत्र दृश्यन्ते विकृताः पापकारिणः॥ १८१ | राजाको अपराधियोंके सभी प्रकारके दण्डोंकी व्यवस्था मुख्य सड़कपर करनी चाहिये जिससे उस दण्डको भुगतनेवाले पापात्माको सभी लोग देख सकें। |
| प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च भेदकम्।<br>द्वाराणां चैव भेत्तारं क्षिप्रं निर्वासयेत् पुरात्॥ १८२ | दुर्गकी चहारदीवारी, खाइयों तथा दरवाजोंको तोड़नेवालेको राजा तुरंत अपने पुरसे बाहर निकाल दे। |
| मूलकर्मार्भिचारेषु कर्तव्यो द्विशतो दमः।<br>अबीजविक्रयी यश्च बीजोत्कर्षक एव च॥ १८३ | वशीकरण, अभिचार आदि करनेवालेको राजा दो सौ पणका दण्ड दे। घटिया बीज बेचनेवाले, बोये हुए खेतको जोतनेवाले |
| मर्यादाभेदकश्चापि विकृतं वधमाप्नुयात्।<br>सर्वसंकरपापिष्ठं हेमकारं नराधिप॥ १८४ | तथा खेतोंकी मेड़को तोड़नेवालेको विकृत मृत्युका दण्ड देना चाहिये। नराधिप! अच्छी धातुमें नकली धातु |
२३१- अग्निसम्बन्धी उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय
| * अध्याय २२७ * | ९०३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अन्याये वर्तमानं च छेदयेल्लवशः क्षुरैः।<br>द्रव्यमादाय वणिजामनर्घेणावरुन्धताम् ॥ १८५<br><br>द्रव्याणां दूषको यस्तु प्रतिच्छन्नस्य विक्रयी।<br>मध्यमं प्राप्नुयाद् दण्डं कूटकर्ता तथोत्तमम् ॥ १८६<br><br>राजा पृथक् पृथक् कुर्याद् दण्डं चोत्तमसाहसम्।<br>शास्त्राणां यज्ञतपसां देशानां क्षेपको नरः ॥ १८७<br><br>देवतानां सतीनां च उत्तमं दण्डमर्हति।<br>एकस्य दण्डपारुष्ये बहूनां द्विगुणो दमः ॥ १८८ | मिलानेवाले पापात्मा एवं अन्यायी सोनारको छुरेसे खण्ड-खण्ड काट डालना चाहिये। जो बनियेसे वस्तु लेकर उसका दाम नहीं चुकाता, अच्छी वस्तुको बुरी बतलाता है और वस्तुको बाजारमें छिपाकर बेंचता है, उसे मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार कूटनीतिका प्रयोग करनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देनेका विधान है। इन सभी अपराधियोंको राजा अलग-अलगसे उत्तम साहसका दण्ड दे। शास्त्र, यज्ञ, तपस्या, देश, देवता तथा सतीकी निन्दा करनेवाला पुरुष उत्तम साहसके दण्डका पात्र है। अनेक व्यक्ति किसी एक व्यक्तिके प्रति कठोर दण्डनीय अपराध करते हैं तो उन सबको दुगुना दण्ड देना चाहिये ॥१८५–१८८॥ |
| कलहो यद्गतो दाप्यो दण्डश्च द्विगुणस्ततः।<br>मध्यमं ब्राह्मणं राजा विषयाद् विप्रवासयेत् ॥ १८९<br><br>लशुनं च पलाण्डुं न शूकरं ग्रामकुक्कुटम्।<br>तथा पञ्चनखं सर्वं भक्ष्यादन्यत्तु भक्षयेत् ॥ १९०<br><br>विवासयेत् क्षिप्रमेव ब्राह्मणं विषयात् स्वकात्।<br>अभक्ष्यभक्षणे दण्ड्यः शूद्रो भवति कृष्णलम् ॥ १९१<br><br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां चतुस्त्रिद्विगुणं स्मृतम्।<br>यः साहसं कारयति स दण्ड्यो द्विगुणं दमम् ॥ १९२<br><br>यस्त्वेवमुक्तवाहं दाता कारयेत् स चतुर्गुणम्।<br>संदिष्टस्याप्रदाता च समुद्रगृहभेदकः ॥ १९३<br><br>पञ्चाशतपणिको दण्डस्तत्र कार्यो महीक्षिता।<br>अस्पृश्यं च स्पृशन्नार्यो ह्ययोग्यो योग्यकर्मकृत् ॥ १९४<br><br>पुंस्त्वहर्ता पशूनां च दासीगर्भविनाशकृत्।<br>शूद्रप्रव्रजितानां च दैवे पित्र्ये च भोजकः ॥ १९५<br><br>अव्रजन् बाढमुक्त्वा तु तथैव च निमन्त्रणे।<br>एते कार्षापणशतं सर्वे दण्ड्या महीक्षिता ॥ १९६<br><br>दुःखोत्पादि गृहे द्रव्यं क्षिपन् दण्ड्यस्तु कृष्णलम्।<br>पितापुत्रविरोधे च साक्षिणां द्विशतो दमः।<br>स्यान्नरश्च तथार्यः स्यात् तस्याप्यष्टशतो दमः ॥ १९७ | जिस व्यक्तिपर कलहका आरोप हो, उसे दूना दण्ड देना चाहिये। जो ब्राह्मण अपने आचार-विचारसे अधम हो गया हो, उसे राजा अपने देशसे निकाल दे। भक्ष्य पदार्थोंको छोड़कर जो लहसुन, प्याज, सूअर, ग्रामीण मुरगे, पाँच नखवाले जीवों तथा अन्य अभक्ष्य पदार्थोंको खाता है, उस ब्राह्मणको शीघ्र ही अपने राष्ट्रसे निकाल देना चाहिये। अभक्ष्य पदार्थोंको खानेसे शूद्रको एक कृष्णलका दण्ड देना चाहिये तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको क्रमशः चौगुना, तिगुना तथा दुगुना दण्ड देनेका विधान है। जो अभक्ष्य-भक्षणके लिये उत्साहित करता है, उसे दूना दण्ड देना चाहिये। जो मनुष्य 'मैं देता हूँ' ऐसा कहकर अभक्ष्य वस्तुओंके भक्षणमें दूसरेको प्रवृत्त करता है, उसे भी चौगुना दण्ड मिलना चाहिये। संदेशको न देनेवाला तथा समुद्रमें बने हुए अड्डेको नष्ट करनेवाले व्यक्तियोंको राजा पचास मुद्राका दण्ड दे। जो श्रेष्ठ होकर अस्पृश्यका स्पर्श करता है, अयोग्य होकर योग्य कार्यमें हाथ लगाता है, पशुओंके पुंस्त्वका अपहरण करता है, दासीके गर्भको नष्ट करता है, शूद्र और संन्यासियोंके घर देव-कार्य और पितृकार्यमें भोजन करता है तथा निमन्त्रण स्वीकार करनेपर भोजन करने नहीं जाता—ये सभी राजाद्वारा सौ पण कार्षापण-दण्डके भागी हैं। अपने घरमें पीडोत्पादक वस्तु रखनेवालेको एक कृष्णलका दण्ड देना चाहिये। पिता और पुत्रके पारस्परिक विरोधमें साक्षी देनेवालोंको दो सौ पणका दण्ड लगाना चाहिये। यदि कोई माननीय व्यक्ति यह अपराध करता है तो उसपर एक सौ आठ पणका दण्ड लगाना चाहिये ॥१८९–१९७॥ |
२३२- वृक्षजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय
९०४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुलाशासनमानानां कूटकृन्मानकस्य च।<br>एभिश्च व्यवहर्ता च स दण्ड्यो दममुत्तमम्॥ १९८<br><br>विषाग्निदां पतिगुरुनिजापत्यप्रमापणीम्।<br>विकर्णनासिकां व्योष्ठीं कृत्वा गोभिः प्रमापयेत्॥ १९९<br><br>ग्रामस्य दाहका ये च ये च क्षेत्रस्य वेश्मनः।<br>राजपत्यभिगामी च दग्धव्यास्ते कटाग्निना॥ २००<br><br>ऊनं वाप्यधिकं चापि लिखेद् यो राजशासनम्।<br>पारदारिकचौरं वा मुञ्चतो दण्ड उत्तमः॥ २०१<br><br>अभक्ष्येण द्विजं दूष्य दण्ड्य उत्तमसाहसम्।<br>क्षत्रियं मध्यमं वैश्यं प्रथमं शूद्रमर्धकम्॥ २०२<br><br>मृताङ्गलग्नविक्रेतुर्गुरुं ताडयतस्तथा।<br>राजयानासनारोढुर्दण्ड उत्तमसाहसः॥ २०३<br><br>यो मन्येताजितोऽस्मीति न्यायेनापि पराजितः।<br>तमायान्तं पुनर्जित्वा दण्डयेद् द्विगुणं दमम्॥ २०४<br><br>आह्वानकारी मध्यः स्यादनाह्वाने तथाह्वयन्।<br>दण्डिकस्य च यो हस्तादभियुक्तः पलायते॥ २०५<br><br>हीनः पुरुषकारेण तं दण्ड्याद् दाण्डिको धनम्।<br>प्रेष्यापराधात् प्रेष्यस्तु स दण्ड्यश्चार्धमेव च॥ २०६<br><br>दण्डार्थं नियमार्थं च नीयमानेषु बन्धनम्।<br>यदि कश्चित् पलायेत दण्डश्चाष्टगुणो भवेत्॥ २०७<br><br>अनिन्दिते विवादे तु नखरोमावतारणम्।<br>कारयेद् यः स पुरुषो मध्यमं दण्डमर्हति॥ २०८ | तराजू, शासन, मानदण्ड और धर्मकाँटेके प्रति कूटनीतिका प्रयोग करनेवाले तथा ऐसे व्यक्तिके साथ व्यवहार करनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। विष देनेवाली, आग लगानेवाली, पति, गुरुजन एवं अपने बच्चोंकी हत्या करनेवाली स्त्रीको कान, ओष्ठ और नाकसे रहित करके पशुओंद्वारा मरवा डालना चाहिये। जो गाँव, खेत और घरमें आग लगानेवाले तथा राजपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाले हैं, उन्हें घास-फूसकी अग्निमें जला देना चाहिये। जो (राजाका अधिकारी) राजाज्ञाको घटा-बढ़ाकर लिखता है तथा दूसरेकी स्त्रीके साथ अपराध करनेवाले एवं चोरको छोड़ देता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति अभक्ष्य वस्तु खिलाकर ब्राह्मणको दूषित करता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार क्षत्रियको विधर्मी करनेवालेको मध्यम, वैश्यको प्रथम तथा शूद्रको अर्धसाहसका दण्ड देना चाहिये। मृतकके शरीरपर लगे हुए आभूषण तथा वस्त्रादिको बेंचनेवाले, गुरुको पीटनेवाले, राजाके वाहन और आसनपर बैठनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति न्यायद्वारा या युद्धमें पराजित होनेपर भी अपनेको 'मैं पराजित नहीं हूँ'-ऐसा मानता है, उसे आता हुआ देखकर राजाको चाहिये कि उसे पुनः जीतकर दुगुने पणका दण्ड दे। जो व्यक्ति अपराध होनेपर सूचनाद्वारा बुलानेसे नहीं आता है और जो बिना बुलाये ही आकर सम्मुख उपस्थित होता है तथा जो अपराधी दण्ड देनेवालेके हाथसे छुड़ाकर भाग जाता है-ऐसे हीन लोगोंको पौरुषपूर्वक दण्ड देनेवाला न्यायकर्ता आर्थिक दण्ड दे। जो व्यक्ति दूत होनेपर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसे उपर्युक्त दण्डका आधा दण्ड देना चाहिये। दण्ड या नियमनके लिये बाँधकर ले जाते समय यदि कोई अपराधी भाग जाता है तो उसे आठगुना दण्ड देना चाहिये। जो पुरुष सामान्य वाद-विवादमें किसीके नख या बालको काट लेता है, वह मध्यम दण्डका भागी होता है॥ १९८-२०८॥ |
| बन्धनं चाप्यवध्यस्य बलान्मोचयते तु यः।<br>वध्यं विमोचयेद् यस्तु दण्ड्यो द्विगुणभाग् भवेत्॥ २०९<br><br>दुर्द्दृष्टव्यवहाराणां सभ्यानां द्विगुणो दमः।<br>राज्ञा त्रिंशद्गुणो दण्डः प्रक्षेप्य उदके भवेत्॥ २१० | जो व्यक्ति बलपूर्वक अवध्य अपराधीके बन्धनोंको खोल देता है तथा जो मृत्यु-दण्डके अपराधीको छोड़ देता है, वह दुगुने दण्डका भागी होता है। राजाके जो सभासद उपस्थित विषयोंमें कुशलतासे मनोयोग नहीं देते, उन्हें दूना दण्ड देना चाहिये। राजा ऐसे अपराधियोंको तीसगुना अधिक दण्ड दे और जलमें फेंकवा दे। |
| * अध्याय २२८ * | ९०५ |
|---|
| अल्पदण्डेऽधिकं कुर्याद् विपुले चाल्पमेव च।<br>ऊनाधिकं तु तं दण्डं सभ्यो दद्यात् स्वकाद् गृहात्॥ २११<br>यावानवध्यस्य वधे तावान् वध्यस्य रक्षणे।<br>अधर्मो नृपतेर्दृष्ट एतयोरुभयोरपि॥ २१२<br>ब्राह्मणं नैव हन्यात्तु सर्वपापेष्ववस्थितम्।<br>प्रवासयेत् स्वकाद् राष्ट्रात् समग्रधनसंयुतम्॥ २१३<br>न जातु ब्राह्मणं वध्यात् पातकं त्वधिकं भवेत्।<br>यस्मात् तस्मात् प्रयत्नेन ब्रह्महत्यां विवर्जयेत्॥ २१४<br>अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।<br>अयशो महदाप्नोति नरकं चाधिगच्छति॥ २१५<br>ज्ञात्वापराधं पुरुषस्य राजा<br>कालं तथा चानुमतं द्विजानाम्।<br>दण्ड्येषु दण्डं परिकल्पयेत्तु<br>यो यस्य युक्तः स समीक्ष्य कुर्यात्॥ २१६ | थोड़ेसे अपराधमें अधिक दण्ड देनेवाले तथा भीषण अपराधमें अल्प दण्ड देनेवाले नायककर्ताको जितना कम या अधिक दण्ड हो, उसे अपने घरसे पूर्ण करना या अपराधीको लौटाना चाहिये। अवध्य अपराधीका वध करनेमें जितना पाप लगता है उतना ही पाप वध्यको छोड़ देनेमें लगता है। राजाको इन दोनों दशाओंमें समानरूपसे पापभागी होना पड़ता है। सभी प्रकारके पापोंमें अपराधी पाये गये ब्राह्मणको मृत्युदण्ड नहीं देना चाहिये, उसे सम्पूर्ण सम्पत्तिके साथ अपने राष्ट्रसे निर्वासित कर देना चाहिये। कभी भूलकर भी ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये; क्योंकि इससे अधिक पाप होता है। इसलिये राजाको ब्रह्महत्यासे बचना चाहिये। अदण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देने तथा दण्डनीयको दण्ड न देनेसे राजा महान् अयशका भागी बनता है और मरनेपर नरकगामी होता है। इसलिये राजा मनुष्यके अपराधको भलीभाँति जानकर तथा यथासमय ब्राह्मणोंकी अनुमति लेकर दण्डनीयोंके प्रति दण्डकी कल्पना करे और जो जिस प्रकारके दण्डका पात्र हो, उसकी भलीभाँति समीक्षा कर उसे उसी प्रकारका समुचित दण्ड दे॥ २०९—२१६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे दण्डप्रणयनं नाम सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-कीर्तन-प्रसङ्गमें दण्डनीति नामक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२७॥
दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय
अद्भुत शान्तिका *वर्णन
| मनुरुवाच<br>दिव्यान्तरिक्षभौमेषु या शान्तिरभिधीयते।<br>तामहं श्रोतुमिच्छामि महोत्पातेषु केशव॥ १ | मनुने पूछा—केशव! दिव्य, अन्तरिक्ष और पृथ्वीसम्बन्धी बड़े-बड़े अद्भुत उपद्रवोंके होनेपर जिस शान्तिका विधान किया जाता है, उसे मैं श्रवण करना चाहता हूँ॥ १॥ |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि त्रिविधामद्भुतादिषु।<br>विशेषेण तु भौमेषु शान्तिः कार्या तथा भवेत्॥ २<br>अभया चान्तरिक्षेषु सौम्या दिव्येषु पार्थिव।<br>विजिगीषुः परं राजन् भूतिकामस्तु यो भवेत्॥ ३ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! अब मैं उत्पातोंके समय की जानेवाली तीनों प्रकारकी शान्तियाँ बतला रहा हूँ। उनमें विशेषरूपसे पृथ्वी-सम्बन्धी महोत्पातोंके अवसरपर शान्ति करनी चाहिये। राजन्! अन्तरिक्ष-सम्बन्धी उत्पातोंके लिये अभया तथा दिव्य उत्पातोंके लिये सौम्या शान्ति करनी चाहिये। राजन्! जो विजयाभिलाषी तथा ऐश्वर्यकामी |
* इन अद्भुतोंका वर्णन तथा इनकी शान्तियोंका विस्तृत विधान पञ्चम आथर्वण शान्तिकल्प एवं अथर्वपरिशिष्टादिमें है।
२३३- वृष्टिजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय
| ९०६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विजिगीषोः परानेवमभियुक्तस्तथा परैः।<br>तथाभिचारशङ्कायां शत्रूणामभिनाHolder/शने॥ ४<br>भये महति सम्प्राप्ते अभया शान्तिरिष्यते।<br>राजयक्ष्माभिभूतस्य क्षतक्षीणस्य चाप्यथ॥ ५<br>सौम्या प्रशस्यते शान्तिर्यज्ञकामस्य चाप्यथ।<br>भूकम्पे च समुत्पन्ने प्राप्ते चान्नक्षये तथा॥ ६<br>अतिवृष्ट्यामनावृष्ट्यां शलभानां भयेषु च।<br>प्रमत्तेषु च चौरेषु वैष्णवी शान्तिरिष्यते॥ ७<br>पशूनां मारणे प्राप्ते नराणामपि दारुणे।<br>भूतेषु दृश्यमानेषु रौद्री शान्तिस्तथेष्यते॥ ८<br>वेदनाशे समुत्पन्ने जने जाते च नास्तिके।<br>अपूज्यपूजने जाते ब्राह्मी शान्तिस्तथेष्यते॥ ९<br>भविष्यत्यभिषेके च परचक्रभयेऽपि च।<br>स्वराष्ट्रभेदेऽरिवधे रौद्री शान्तिः प्रशस्यते॥ १० | हो, उस शत्रुओंपर विजय पानेके इच्छुक, शत्रुओंद्धारा आक्रान्त, आभिचारिक कर्मोंकी शङ्कासे युक्त, शत्रुओंको विनष्ट करनेके लिये उद्यत राजाके लिये महान् भय उपस्थित होनेपर अभया शान्ति कही गयी है। राजयक्ष्मा रोगसे ग्रस्त, घावसे दुर्बल तथा यज्ञकी कामनावालेके लिये सौम्या शान्तिकी प्रशंसा की गयी है। भूकम्प आनेपर, अकाल पड़नेपर, अतिवृष्टि, अनावृष्टि एवं टिड्डियोंसे भय होनेपर, पागल और चोरसे भय उपस्थित होनेपर राजाको वैष्णवी शान्ति करानी चाहिये। पशुओं और मनुष्योंका भीषण संहार उपस्थित होनेपर तथा भूत-पिशाचादिके दिखायी देनेपर रौद्री शान्ति करानी चाहिये। वेदोंका विनाश उपस्थित होनेपर, लोगोंके नास्तिक हो जानेपर तथा अपूज्य लोगोंकी पूजा होनेपर, ब्राह्मी शान्ति करानी चाहिये। भावी अभिषेक, शत्रुसेनासे उत्पन्न भय, अपने राष्ट्रमें भेद तथा शत्रु-वधका अवसर प्राप्त होनेपर रौद्री शान्तिकी प्रशंसा की गयी है॥ २-१०॥ |
| त्र्यहातिरिक्ते पवने भक्ष्ये सर्वविगर्हिते।<br>वैकृते वातजे व्याधौ वायवी शान्तिरिष्यते॥ ११ | तीन दिनोंसे अधिक प्रबल वायुके चलनेपर, सभी भक्ष्य पदार्थोंके विकृत हो जानेपर तथा वातज व्याधिके बिगड़ जानेपर वायवी शान्ति करानी चाहिये। |
| अनावृष्टिभये जाते प्राप्ते विकृतिवर्षणे।<br>जलाशयविकारेषु वारुणी शान्तिरिष्यते॥ १२ | सूखा पड़ जानेका भय हो, वृष्टिसे अधिक हानि हो तथा जलाशयोंमें कोई विकार उत्पन्न हो गया हो तो ऐसे अवसरपर वारुणी शान्ति करानी चाहिये। |
| अभिशापभये प्राप्ते भार्गवी च तथैव च।<br>जाते प्रसववैकृत्ये प्राजापत्या महाभुज॥ १३ | महाबाहो! अभिशापका भय उपस्थित होनेपर, भार्गवी तथा स्त्रीके प्रसवमें विकार उत्पन्न होनेपर प्राजापत्या नामकी शान्ति करानी चाहिये। |
| उपस्कराणां वैकृत्ये त्वाष्ट्री पार्थिवनन्दन।<br>बालानां शान्तिकामस्य कौमारी च तथा नृप॥ १४ | पार्थिवनन्दन! गृह-सामग्रियोंमें विकार उत्पन्न होनेपर त्वाष्ट्री (विश्वकर्मासम्बन्धी) शान्ति करानी चाहिये। राजन्! बालकोंकी बाधा दूर करनेके लिये कौमारी शान्ति होनी चाहिये। |
| कुर्याच्छान्तिमथाग्नेयीं सम्प्राप्ते वह्निवैकृते।<br>आज्ञाभङ्गे तु संजाते तथा भृत्यादिसंक्षये॥ १५ | अग्नि-विकार उपस्थित होनेपर, आज्ञा-भङ्ग होनेपर तथा सेवकादिके विनाश होनेपर आग्नेयी शान्ति करानी चाहिये। |
| अश्वानां शान्तिकामस्य तद्विकारे समुत्थिते।<br>अश्वानां कामयानस्य गान्धर्वी शान्तिरिष्यते॥ १६ | अश्वोंकी शान्ति-कामनासे उनमें रोग उत्पन्न होनेपर तथा अधिक संख्याकी अभिलाषासे गान्धर्वी शान्ति करानी चाहिये। |
| गजानां शान्तिकामस्य तद्विकारे समुत्थिते।<br>गजानां कामयानस्य शान्तिराङ्गिरसी भवेत्॥ १७ | हाथियोंकी शान्ति-कामनासे, उनमें रोग उपस्थित होनेपर तथा उनकी रक्षाकी भावनासे आङ्गिरसी शान्ति करानी चाहिये। |
| पिशाचादिभये जाते शान्तिर्वै नैर्ऋती स्मृता।<br>अपमृत्युभये जाते दुःस्वप्ने च तथा स्थिते॥ १८ | पिशाचादिका तथा अकालमृत्युका भय उपस्थित होनेपर और दुःस्वप्न देखनेपर नैर्ऋती शान्ति कही गयी है। |
२३४- जलाशयजनित विकृतियाँ और उनकी शान्तिके उपाय
| * अध्याय २२८ * | ९०७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| याम्यां तु कारयेच्छान्तिं प्राप्ते तु नरके तथा।<br>धननाशे समुत्पन्ने कौबेरी शान्तिरिष्यते॥ १९<br>वृक्षाणां च तथार्थानां वैकृते समुपस्थिते।<br>भूतिकामस्तथा शान्तिं पार्थिवीं प्रतियोजयेत्॥ २०<br><br>प्रथमे दिनयामे च रात्रौ वा मनुजोत्तम।<br>हस्ते स्वातौ च चित्रायामादित्ये चाश्विने तथा॥ २१<br>अर्यम्णि सौम्यजातेषु वायव्यां त्वद्भुतेषु च।<br>द्वितीये दिनयामे तु रात्रौ च रविनन्दन॥ २२<br>पुष्याग्नेयविशाखासु पित्र्यासु भरणीषु च।<br>उत्पातेषु तथा भाग आग्नेयीं तेषु कारयेत्॥ २३<br>तृतीये दिनयामे च रात्रौ च रविनन्दन।<br>रोहिण्यां वैष्णवे ब्राह्मे वासवे वैश्वदेवते॥ २४<br>ज्येष्ठायां च तथा मैत्रे ये भवन्त्यद्भुताः क्वचित्।<br>ऐन्द्री तेषु प्रयोक्तव्या शान्ती रविकुलोद्भव॥ २५<br>चतुर्थे दिनयामे च रात्रौ वा रविनन्दन।<br>सार्पे पौष्णे तथाऽऽर्द्रायामहिर्बुध्न्ये च दारुणे॥ २६<br>मूले वरुणदैवत्ये ये भवन्त्यद्भुतास्तथा।<br>वारुणी तेषु कर्तव्या महाशान्तिर्महीक्षिता॥ २७<br>मित्रमण्डलवेलासु ये भवन्त्यद्भुताः क्वचित्।<br>तत्र शान्तिद्वयं कार्यं निमित्तेषु च नान्यथा।<br>निर्निमित्तकृता शान्तिर्निमित्तेनोपयुज्यते॥ २८<br>बाणप्रहारा न भवन्ति यद्वद्<br>राजन् नृणां सन्नहनैर्युतानाम्।<br>दैवोपघाता न भवन्ति तद्वद्<br>धर्मात्मनां शान्तिपरायणानाम्॥ २९ | मृत्युका भय होनेपर याम्या शान्ति कराये तथा धनका नाश उत्पन्न होनेपर कौबेरी शान्ति करानी चाहिये। ऐश्वर्यकामी मनुष्यको वृक्षों तथा सम्पत्तियोंका विनाश उपस्थित होनेपर पार्थिवी शान्तिका प्रयोग करना चाहिये॥ १९—२०॥<br><br>मानवश्रेष्ठ! दिनके या रात्रिके पहले पहरमें सूर्यके हस्त, स्वाती, चित्रा, पुनर्वसु या अश्विनी नक्षत्रमें जानेपर वायव्यकोणमें यदि अद्भुत उपद्रव दिखायी पड़े तो आग्नेयी शान्ति करानी चाहिये। रविनन्दन! दिनके अथवा रात्रिके दूसरे पहरमें सूर्यके पुष्य, भरणी, कृत्तिका, मघा और विशाखा नक्षत्रमें जानेपर आग्नेयकोण या दक्षिण दिशामें यदि कोई उत्पात दिखायी दे तो आग्नेयी शान्ति करानी चाहिये। रविनन्दन! दिनके या रात्रिके तीसरे पहरमें रोहिणी, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तराषाढ़, अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्रमें सूर्यके जानेपर यदि ईशान, पूर्व या अग्निकोणमें कोई उत्पात दिखायी दे तो ऐन्द्री शान्ति करानी चाहिये। रविनन्दन! दिन या रात्रिके चौथे पहरमें आश्लेषा, रेवती, आर्द्रा, उत्तराभाद्र, शतभिषा या मूल नक्षत्रमें सूर्यके जानेपर पश्चिम दिशामें उत्पात दिखायी देनेपर राजाको वारुणी शान्ति करानी चाहिये। यदि मध्याह्नके समय कहींपर अद्भुत उत्पात होते हैं तो उस समय दोनों प्रकारकी शान्ति करानी चाहिये। इन उपर्युक्त कारणोंके उपस्थित होनेपर ही शान्ति करानी चाहिये, अन्यथा नहीं। बिना किसी कारणके की गयी शान्ति निष्फल हो जाती है। राजन्! जिस प्रकार कवचसे सुरक्षित शरीरवाले मनुष्योंको बाणोंका प्रहार किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुँचाता, उसी प्रकार धर्मात्मा एवं शान्तिपरायण मनुष्योंको दैव-प्रहार किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुँचा सकते॥ २१—२९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तिर्नामाष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुतशान्ति नामक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२८॥
२३६- उपस्कर-विकृतिके लक्षण और उनकी शान्ति
| ९०८ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ उनतीसवाँ अध्याय
उत्पातोंके भेद तथा कतिपय ऋतुस्वभावजन्य शुभदायक अद्भुतोंका वर्णन
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनुरुवाच<br>अद्भुतानां फलं देव शमनं च तथा वद।<br>त्वं हि वेत्सि विशालाक्ष ज्ञेयं सर्वमशेषतः॥ १ | मनुने पूछा—विशाल नेत्रोंवाले देव! अब मुझे इन अद्भुतोंका फल तथा उनकी शान्तिका उपाय बतलाइये; क्योंकि आप सभी ज्ञेय विषयोंके पूर्ण ज्ञाता हैं॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>अत्र ते वर्णयिष्यामि यदुवाच महातपाः।<br>अत्रये वृद्धगर्गस्तु सर्वधर्मभृतां वरः॥ २<br>सरस्वत्याः सुखासीनं गर्गं स्रोतसि पार्थिव।<br>पप्रच्छासौ महातेजा अत्रिर्मुनिजनप्रियम्॥ ३ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! इस विषयमें सभी धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातपस्वी वृद्ध गर्गने अत्रिको जो कुछ कहा था, वह सब मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। एक समय मुनिजनोंके प्रिय महर्षि गर्गाचार्य सरस्वती नदीके तटपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उसी समय महातेजस्वी अत्रिने उनसे प्रश्न किया॥ २-३॥ |
| अत्रिरुवाच<br>नश्यतां पूर्वरूपाणि जनानां कथयस्व मे।<br>नगराणां तथा राज्ञां त्वं हि सर्वं वदस्व माम्॥ ४ | अत्रि ऋषिने पूछा—महर्षे! आप मुझे विनाशोन्मुख मनुष्यों, राजाओं तथा नगरोंके सभी पूर्वलक्षण बतलाइये॥ ४॥ |
| गर्ग उवाच<br>पुरुषापचारान्नियतमपरज्यन्ति देवताः।<br>ततोऽपरागाद् देवानामुपसर्गः प्रवर्तते॥ ५<br>दिव्यान्तरिक्षभौमं च त्रिविधं सम्प्रकीर्तितम्।<br>ग्रहर्क्षवैकृतं दिव्यमान्तरिक्षं निबोध मे॥ ६<br>उल्कापातो दिशां दाहः परिवेषस्तथैव च।<br>गन्धर्वनगरं चैव वृष्टिश्च विकृता तु या॥ ७<br>एवमादीनि लोकेऽस्मिन्नान्तरिक्षं विनिर्दिशेत्।<br>चरस्थिरभवो भौमो भूकम्पश्चापि भूमिजः॥ ८<br>जलाशयानां वैकृत्यं भौमं तदपि कीर्तितम्।<br>भौमे त्वल्पफलं ज्ञेयं चिरेण च विपच्यते॥ ९<br>अभ्रजं मध्यफलदं मध्यकालफलप्रदम्।<br>अद्भुते तु समुत्पन्ने यदि वृष्टिः शिवा भवेत्॥ १०<br>सप्ताहाभ्यन्तरे ज्ञेयमद्भुतं निष्फलं भवेत्।<br>अद्भुतस्य विपाकश्च विना शान्त्या न दृश्यते॥ ११ | गर्गजी बोले—अत्रिजी! मनुष्योंके अत्याचारसे निश्चय ही देवता प्रतिकूल हो जाते हैं। तत्पश्चात् उन देवताओंके अप्रसन्न होनेसे उत्पात प्रारम्भ होता है। वह उत्पात दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम—तीन प्रकारका कहा गया है। ग्रहों और नक्षत्रोंके विकारको दिव्य उत्पात जानना चाहिये। अब मुझसे आन्तरिक्ष उत्पातका वर्णन सुनिये। उल्कापात, दिशाओंका दाह, मण्डलोंका उदय, आकाशमें गन्धर्व-नगरका दिखायी देना, खण्डवृष्टि, अनावृष्टि या अतिवृष्टि—इस प्रकारके उत्पातोंको इस लोकमें आन्तरिक्ष उत्पात कहना चाहिये। स्थावर-जंगमसे उत्पन्न हुआ उत्पात तथा भूमिजन्य भूकम्प भौम उत्पात हैं। जलाशयोंका विकार भी भौम उत्पात कहलाता है। भौम उत्पात होनेपर उसका थोड़ा फल जानना चाहिये, किंतु वह बहुत देरमें शान्त होता है। आन्तरिक्ष उत्पात मध्यम फल देनेवाला होता है और मध्यमकालमें परिणामदायी होता है। इस महोत्पातके उदय होनेपर यदि कल्याणकारिणी वृष्टि होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि एक सप्ताहके भीतर यह उत्पात निष्फल हो जायगा, किंतु इस महान् उत्पातका अवसान शान्तिके बिना नहीं होता। |
२३७- पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पात और उनकी शान्ति
| * अध्याय २२९ * | ९०९ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिभिर्वर्षैस्तथा ज्ञेयं सुमहद्भयकारकम्।<br>राज्ञः शरीरे लोके च पुरद्वारे पुरोहिते॥ १२<br>पाकमायाति पुत्रेषु तथा वै कोशवाहने।<br>ऋतुस्वभावाद् राजेन्द्र भवन्त्यद्भुतसंज्ञिताः॥ १३<br>शुभावहास्ते विज्ञेयास्तांश्च मे गदतः शृणु। | इसे तीन वर्षोंतक महान् भयदायक मानना चाहिये। इसका परिणाम राजाके शरीर, राज्य, पुरद्वार, पुरोहित, पुत्र, कोश और वाहनोंपर प्रकट होता है। राजेन्द्र! जो अद्भुतसंज्ञक उत्पात ऋतुओंके स्वभावके अनुकूल होते हैं, उन्हें शुभदायक मानना चाहिये। मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये॥ ५—१३ १/२ ॥ |
| वज्राशनिमहीकम्पसंध्यानिर्घातनिःस्वनाः॥ १४<br>परिवेषरजोधूम्ररक्ताकार्कस्तमयोदयाः ।<br>द्रुमोद्भेदकरस्नेहो बहुशः सफलद्रुमः॥ १५<br>गोपक्षिमधुवृद्धिश्च शुभानि मधुमाधवे। | वज्र एवं बिजलीका गिरना, पृथ्वीका कम्पन, संध्याके समय वज्रका शब्द, सूर्य तथा चन्द्रमामें मण्डलोंका होना, धूलि और धूएँका उद्भव, उदय एवं अस्तके समय सूर्यकी अतिलालिमा, वृक्षोंके टूट जानेपर उनसे रसका गिरना, फलवाले वृक्षोंकी अधिकता, गौ, पक्षी और मधुकी वृद्धि—ये चैत्र और वैशाखमासमें शुभप्रद हैं। |
| ऋक्षोल्कापातकलुषं कपिलार्केन्दुमण्डलम्॥ १६<br>कृष्णश्वेतं तथा पीतं धूसरध्वान्तलोहितम्।<br>रक्तपुष्पारुणं सांध्यं नभः क्षुब्धार्णवोपमम्॥ १७<br>सरितां चाम्बुसंशोषं दृष्ट्वा ग्रीष्मे शुभं वदेत्। | ग्रीष्म ऋतुमें कलुषित नक्षत्रों और ग्रहोंका पतन, सूर्य और चन्द्रके मण्डलोंका कपिल वर्ण होना, सायंकालीन नभके काले और सफेद मिश्रित, पीले, धूसरित, श्यामल, लाल, लाल पुष्पके समान अरुण और क्षुब्ध सागरकी तरह संक्षुब्ध होना तथा नदियोंका जल सूख जाना—इन उत्पातोंको देखकर इन्हें शुभ कहना चाहिये। |
| शक्रायुधपरीवेषं विद्युदुल्काधिरोहणम्॥ १८<br>कम्पोद्धर्तनवैकृत्यं हसनं दारणं क्षितेः।<br>नद्युदपानसरसां विधूनतरणप्लवाः॥ १९<br>शृङ्गिणां च वराहाणां वर्षासु शुभमिष्यते। | इन्द्रधनुषका मण्डलाकार उदय, विद्युत् और उल्काका पतन, पृथ्वीका अकस्मात् कम्पन, उलट-पलट विकृति, हास और फटना, नदियों एवं तालाबोंमें जलकी न्यूनता, नाव, जहाज और पुलका काँपना, सींगवाले जानवरों तथा शूकरोंकी वृद्धि—ये उत्पात वर्षा ऋतुमें मङ्गलकारी हैं। |
| शीतानिलतुषारत्वं नर्दनं मृगपक्षिणाम्॥ २०<br>रक्षोभूतपिशाचानां दर्शनं वागमानुषी।<br>दिशो धूमान्धकाराश्च सनभोवनपर्वताः॥ २१<br>उच्चैः सूर्योदयास्तौ च हेमन्ते शोभनाः स्मृताः। | शीतल वायु, तुषार, पशु एवं पक्षियोंका चीत्कार, राक्षस, भूत और पिशाचोंका दर्शन, दैवी वाणी, सूर्यके उदय-अस्तके समय आकाश, वन और पर्वतोंसहित दिशाओंका गाढ़रूपमें धूएँसे अन्धकारित हो जाना—ये उत्पात हेमन्त-ऋतुमें उत्तम माने जाते हैं। |
| दिव्यस्त्रीरूपगन्धर्वविमानाद्भुतदर्शनम् ॥ २२<br>ग्रहनक्षत्रताराणां दर्शनं वागमानुषी।<br>गीतवादित्रनिर्घोषो वनपर्वतसानुषु॥ २३<br>सस्यवृद्धी रसोत्पत्तिः शरत्काले शुभाः स्मृताः। | दिव्य स्त्रीका रूप, गन्धर्व-विमान, ग्रह, नक्षत्र और ताराओंका दर्शन, दैवी वाणी, वनोंमें और पर्वतोंकी चोटियोंपर गाने-बजानेका शब्द सुनायी पड़ना, अन्नोंकी वृद्धि, रसकी विशेष उत्पत्ति—ये उत्पात शरत्कालमें माङ्गलिक कहे गये हैं। |
| हिमपातानिलोत्पातविरूपादभुतदर्शनम् ॥ २४<br>कृष्णाञ्जनाभमाकाशं तारोल्कापातपिञ्जरम्।<br>चित्रगर्भोद्भवः स्त्रीषु गोऽजाश्वमृगपक्षिषु।<br>पत्राङ्कुरलतानां च विकाराः शिशिरे शुभाः॥ २५ | हिमपात, वातका बहना, विरूप एवं अद्भुत उत्पातोंका दर्शन, आकाशका काले कज्जलके समान दिखायी पड़ना तथा ताराओं एवं उल्काओंके गिरनेसे पीले रंगका दीख पड़ना, स्त्री, गाय, बकरी, घोड़ी, मृगी और पक्षियोंसे विचित्र प्रकारके बच्चोंका पैदा होना, पत्तों, अङ्कुरों और लताओंमें अनेकों प्रकारके |
२३८- राजाकी मृत्यु तथा देशके विनाश-सूचक लक्षण और उनकी शान्ति
९१० * मत्स्यपुराण *
| ऋतुस्वभावेन विनाद्भुतस्य<br>जातस्य दृष्टस्य तु शीघ्रमेव।<br>यथागमं शान्तिरनन्तरं तु<br>कार्या यथोक्ता वसुधाधिपेन॥ २६॥ | विकारोंका हो जाना—ये उत्पात शिशिर-ऋतुमें शुभदायी माने गये हैं। इन ऋतु-स्वभावके अतिरिक्त अन्य उत्पन्न हुए अद्भुत उत्पातके देखे जानेके बाद राजाको शीघ्र ही शास्त्रानुकूल कही गयी शान्तिका विधान करना चाहिये॥ १४—२६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तिकोत्पत्तिर्नामैकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुत उत्पातोंकी शान्ति नामक दो सौ उनतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२९॥
दो सौ तीसवाँ अध्याय
अद्भुत उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय
| गर्ग उवाच<br>देवतार्चाः प्रनृत्यन्ति वेपन्ते प्रज्वलन्ति च।<br>वमन्त्यग्निं तथा धूमं स्नेहं रक्तं तथा वसाम्॥ १<br>आरटन्ति रुदन्त्येताः प्रस्विद्यन्ति हसन्ति च।<br>उत्तिष्ठन्ति निषीदन्ति प्रधावन्ति धमन्ति च॥ २<br>भुञ्जते विक्षिपन्ते वा कोशप्रहरणध्वजान्।<br>अवाङ्मुखा वा तिष्ठन्ति स्थानात् स्थानं भ्रमन्ति च॥ ३<br>एवमाद्या हि दृश्यन्ते विकाराः सहसोत्थिताः।<br>लिङ्गायतनविप्रेषु तत्र वासं न रोचयेत्॥ ४<br>राज्ञो वा व्यसनं तत्र स च देशो विनश्यति।<br>देवयात्रासु चोत्पातान् दृष्ट्वा देशभयं वदेत्॥ ५ | गर्गजी बोले— जब देव-मूर्तियाँ नाचने लगती हैं, काँपती हैं, जल उठती हैं, अग्नि, धुआँ, तेल, रक्त और चर्बी उगलने लगती हैं, जोर-जोरसे चिल्लाती हैं, रोती हैं, पसीना बहाने लगती हैं, हँसती हैं, उठती हैं, बैठती हैं, दौड़ने लगती हैं, मुँह बजाने लगती हैं, खाती हैं, कोश, अस्त्र और ध्वजाओंको फेंकने लगती हैं, नीचे मुख किये बैठी रहती हैं अथवा एक स्थानसे दूसरे स्थानपर भ्रमण करने लगती हैं—इस प्रकारके सहसा उत्पन्न हुए उत्पात यदि शिव-लिङ्ग, देवमन्दिर तथा ब्राह्मणोंके पुरमें दिखायी पड़ें तो उस स्थानपर निवास नहीं करना चाहिये। ऐसे उत्पातोंके होनेपर या तो राजापर कोई बड़ी आपत्ति आती है अथवा उस देशका विनाश होता है। देवताके दर्शनके लिये जाते समय यदि उपर्युक्त उत्पात दिखायी पड़ें तो उस देशको भय बतलाना चाहिये॥ १—५॥ | | पितामहस्य हर्म्येषु तत्र वासं न रोचयेत्।<br>पशूनां रुद्रजं ज्ञेयं नृपाणां लोकपालजम्॥ ६<br>ज्ञेयं सेनापतीनां तु यत् स्यात् स्कन्दविशाखजम्।<br>लोकानां विष्णुवस्विन्द्रविश्वकर्मसमुद्भवम्॥ ७<br>विनायकोद्भवं ज्ञेयं गणानां ये तु नायकाः।<br>देवप्रेष्यान् नृपप्रेष्या देवस्त्रीभिर्नृपस्त्रियः॥ ८<br>वासुदेवोद्भवं ज्ञेयं ग्रहाणामेव नान्यथा।<br>देवतानां विकारेषु श्रुतिवेत्ता पुरोहितः॥ ९ | गृहसम्बन्धी उत्पातोंको ब्रह्मासे सम्बद्ध जानना चाहिये, अतः वहाँ निवास न करे। पशुओंके उत्पातोंको रुद्रसे उत्पन्न और राजाओंके उत्पातोंको लोकपालसे उत्पन्न जानना चाहिये। सेनापतियोंके उत्पातोंको स्कन्द तथा विशाखसे उत्पन्न तथा लोकोंके उत्पातोंको विष्णु, वसु, इन्द्र और विश्वकर्मासे उद्भूत समझना चाहिये। जो गणोंके नायक हैं, उनपर घटित होनेवाला उत्पात विनायकसे उद्भूत जानना चाहिये। देवदूतोंकी अप्रसन्नतासे राजदूतोंपर तथा देवाङ्गनाओंके द्वारा राजपत्नियोंपर उत्पात घटित होते हैं। ग्रहोंके उपद्रवको भगवान् वासुदेवसे उत्पन्न हुआ समझना चाहिये। महाभाग! देवताओंमें |
२३९- ग्रहयागका विधान
| * अध्याय २३१ * | ९११ |
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| देवतार्चां तु गत्वा वै स्नानमाच्छाद्य भूषयेत्।<br>पूजयेच्च महाभाग गन्धमाल्यान्नसम्पदा॥ १०<br>मधुपर्केण विधिवदुपतिष्ठेदनन्तरम्।<br>तल्लिङ्गेन च मन्त्रेण स्थालीपाकं यथाविधि।<br>पुरोधा जुहुयाद् वह्नौ सप्तरात्रमतन्द्रितः॥ ११<br>विप्रांश्च पूज्या मधुरान्नपानैः<br>सदक्षिणं सप्तदिनं नरेन्द्र।<br>प्राप्तेऽष्टमेऽह्नि क्षितिगोप्रदानैः<br>सकाञ्चनैः शान्तिमुपैति पापम्॥ १२ | उपर्युक्त विकारोंके उत्पन्न होनेपर वेदज्ञ पुरोहित देवमूर्तिके पास जाकर उसे स्नान कराये, वस्त्रादिसे अलंकृत करे तथा चन्दन, पुष्पमाला और भक्ष्यपदार्थसे उसकी पूजा करे। तदनन्तर विधिपूर्वक मधुपर्क निवेदन करे। फिर वह पुरोहित ब्राह्मण सावधानीपूर्वक उक्त प्रतिमाके मन्त्रसे स्थालीपाकद्वारा सात दिनोंतक विधिपूर्वक अग्निमें आहुति डाले। नरेन्द्र! उक्त सातों दिनोंतक मधुर अन्न-पानादि सामग्रियोंद्वारा तथा उत्तम दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। आठवें दिन पृथ्वी, सुवर्ण तथा गौका दान करनेसे पाप शान्त हो जाता है॥ ६—१२ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावर्चवाधिकारो नाम त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुत-शान्तिके प्रसङ्गमें पूजाधिकार नामक दो सौ तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २३० ॥
दो सौ इकतीसवाँ अध्याय
अग्निसम्बन्धी उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय
| गर्ग उवाच | गर्गजीने कहा— |
|---|---|
| अनग्निर्ददीप्यते यत्र राष्ट्रे यस्य निरिन्धनः।<br>न दीप्यते चेन्धनवांस्तद्राष्ट्रं पीड्यते नृपैः॥ १ | जिस देशमें ईंधनके बिना ही अग्नि जल उठती है और ईंधन लगानेपर भी अग्नि प्रज्वलित नहीं होती, वह देश राजाओंसे पीड़ित होता है। |
| प्रज्वलेदप्सु मांसं वा तदर्थं वापि किञ्चन।<br>प्राकारं तोरणं द्वारं नृपवेश्म सुरालयम्॥ २<br>एतानि यत्र दीप्यन्ते तत्र राज्ञो भयं भवेत्।<br>विद्युता वा प्रदह्यन्ते तदापि नृपतेर्भयम्॥ ३ | जहाँ जलमें मांस जलने लगता है या उसका कोई भाग जल जाता है, किलेकी चहारदीवारी, प्रवेशद्वार, तोरण, राजभवन और देवालय—ये अकस्मात् जल उठते हैं वहाँ राजाको भय प्राप्त होता है। यदि ये उपर्युक्त वस्तुएँ बिजली गिरनेसे जल जाती हैं तब भी राजाको भय प्राप्त होता है। |
| अनैशानि तमांसि स्युर्विना पांसुरजांसि च।<br>धूमश्चानग्निजो यत्र तत्र विन्द्यान्महाभयम्॥ ४ | जहाँ रात्रि तथा धूलि एवं रजःकणोंके बिना ही अन्धकार छा जाय और अग्निके बिना धुआँ दिखायी पड़े, वहाँ महाभयकी प्राप्ति जाननी चाहिये। |
| तडित् त्वनभ्रे गगने भयं स्यादृक्षवर्जिते।<br>दिवा सतारे गगने तथैव भयमादिशेत्॥ ५ | बादल और नक्षत्रोंसे रहित आकाशमें बिजली कौंधने लगे तो भय प्राप्त होता है। इसी प्रकार दिनमें गगनमण्डल तारायुक्त हो जाय तो भी उसी प्रकारका भय कहना चाहिये॥१—५॥ |
९१२ * मत्स्यपुराण *
| ग्रहनक्षत्रवैकृत्ये ताराविषमदर्शने।<br>पुरवाहनयानेषु चतुष्पान्मृगपक्षिषु॥ ६<br>आयुधेषु च दीप्तेषु धूमायत्सु तथैव च।<br>निगमत्सु च कोशाच्च संग्रामस्तुमुलो भवेत्॥ ७<br>विनाग्निं विस्फुलिङ्गाश्च दृश्यन्ते यत्र कुत्रचित्।<br>स्वभावाच्चापि पूर्यन्ते धनूंषि विकृतानि च॥ ८<br>विकारश्चायुधानां स्यात् तत्र संग्राममादिशेत्।<br>त्रिरात्रोपोषितश्चात्र पुरोधाः सुसमाहितः॥ ९<br>समिद्भिः क्षीरवृक्षाणां सर्षपैश्च घृतेन च।<br>होमं कुर्यादग्निमन्त्रैर्ब्राह्मणांश्चैव भोजयेत्॥ १०<br>दद्यात् सुवर्णं च तथा द्विजेभ्यो<br>गाश्चैव वस्त्राणि तथा भुवं च।<br>एवं कृते पापमुपैति नाशं<br>यदग्निवैकृत्यभवं द्विजेन्द्र॥ ११ | ग्रहों और नक्षत्रोंमें विकारका हो जाना, ताराओंमें विषमताका दिखायी पड़ना, ग्राम, वाहन, रथ, चौपाये, मृग, पक्षी तथा शस्त्रास्त्रोंका अपने-आप प्रज्वलित हो उठना अथवा धूमिल हो जाना और कोशसे अस्त्रादिका निकलना तुमुल संग्रामका सूचक है। जहाँ-कहीं भी अग्निके बिना चिनगारियाँ दिखायी पड़ने लगें, स्वाभाविक ढंगसे ही धनुषकी डोरियाँ चढ़ जायें या विकृत हो जायें तथा शस्त्रास्त्रोंमें विकार उत्पन्न हो जाय तो वहाँ संग्राम बतलाना चाहिये। ऐसी दशामें वहाँका पुरोहित तीन रात्रितक उपवासकर अत्यन्त समाहित-चित्तसे दूधवाले वृक्षोंकी लकड़ियों, सरसों तथा घीसे अग्नि-मन्त्रोंद्वारा हवन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा उन्हें सुवर्ण, गौएँ, वस्त्र और पृथिवीका दान दे। द्विजेन्द्र! ऐसा करनेसे अग्नि-विकार-सम्बन्धी पाप नष्ट हो जाता है॥ ६—११॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावग्निवैकृत्यं नामैकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुत-शान्तिके प्रसंगमें अग्निविकार नामक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३१॥
दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय
वृक्षजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय
| गर्ग उवाच<br>पुरेषु येषु दृश्यन्ते पादपा देवचोदिताः।<br>रुदन्तो वा हसन्तो वा स्रवन्तो वा रसान् बहून्॥ १<br>अरोगा वा विना वातं शाखां मुञ्चन्त्यथ द्रुमाः।<br>फलं पुष्पं तथाकाले दर्शयन्ति त्रिहायनाः॥ २<br>पूर्ववत् स्वं दर्शयन्ति फलं पुष्पं तथान्तरे।<br>क्षीरं स्नेहं तथा रक्तं मधु तोयं स्रवन्ति च॥ ३<br>शुष्यन्त्यरोगाः सहसा शुष्का रोहन्ति वा पुनः।<br>उत्तिष्ठन्तीह पतिताः पतन्ति च तथोत्थिताः॥ ४<br>तत्र वक्ष्यामि ते ब्रह्मन् विपाकं फलमेव च। | गर्गजीने कहा—ब्रह्मन्! जिन ग्रामोंमें दैव-प्रेरित वृक्ष अपने-आप रोते, हँसते, प्रचुर परिमाणमें रस बहाते हुए किसी रोग अथवा वायुके बिना डालियाँ गिराते हैं, तीन ही वर्षके वृक्ष असमयमें फलने-फूलने लगते हैं, अन्यत्र कोई-कोई वृक्ष ऋतुकालकी भाँति अपनेको फलों और पुष्पोंसे लदे हुए दिखलाते हैं तथा दुग्ध, तैल, रक्त, मधु और जल बहाते हैं, किसी रोगके बिना ही सहसा सूख जाते हैं अथवा सूखे हुए पुनः अङ्कुरित हो जाते हैं, गिरे हुए उठकर खड़े हो जाते हैं तथा खड़े हुए गिर पड़ते हैं, वहाँ होनेवाला परिणाम और फल मैं आपको बतला रहा हूँ, सुनिये॥ १—४ ½ ॥ |
| * अध्याय २३२ * | ९१३ |
|---|
| रोदने व्याधिमभ्येति हसने देशविभ्रमम् ॥ ५<br>शाखाप्रपतनं कुर्यात् संग्रामे योधपातनम् ।<br>बालानां मरणं कुर्युरकाले पुष्पिता द्रुमाः ॥ ६<br>स्वराष्ट्रभेदं कुरुते फलपुष्पमथान्तरे ।<br>क्षयः सर्वत्र गोक्षीरे स्नेहे दुर्भिक्षलक्षणम् ॥ ७<br>वाहनापचयं मद्ये रक्ते संग्राममादिशेत् ।<br>मधुस्रावे भवेद् व्याधिर्जंलस्रावे न वर्षति ॥ ८<br>अरोगशोषणं ज्ञेयं ब्रह्मन् दुर्भिक्षलक्षणम् ।<br>शुष्केषु सम्प्ररोहस्तु वीर्यमन्नं च हीयते ॥ ९<br>उत्थाने पतितानां च भयं भेदकरं भवेत् ।<br>स्थानात् स्थानं तु गमने देशभङ्गस्तथा भवेत् ॥ १०<br>ज्वलत्स्वपि च वृक्षेषु रुदत्स्वपि धनक्षयम् ।<br>एतत्पूजितवृक्षेषु सर्वं राज्ञो विपद्यते ॥ ११<br>पुष्पे फले वा विकृते राज्ञो मृत्युं तथाऽऽदिशेत् ।<br>अन्येषु चैव वृक्षेषु वृक्षोत्पातेष्वतन्द्रितः ॥ १२<br>आच्छादयित्वा तं वृक्षं गन्धमाल्यैर्विभूषयेत् ।<br>वृक्षोपरि तथा च्छत्रं कुर्यात् पापप्रशान्तये ॥ १३<br>शिवमभ्यर्चयेद् देवं पशुं चास्मै निवेदयेत् ।<br>रुद्रेभ्य इति वृक्षेषु हुत्वा रुद्रं जपेत् ततः ॥ १४<br>मध्वाज्ययुक्तेन तु पायसेन<br> सम्पूज्य विप्रांश्च भुवं च दद्यात् ।<br>गीतेन नृत्येन तथार्चयेत्तु<br> देवं हरं पापविनाशहेतोः ॥ १५ | ब्रह्मन्! वृक्षोंके रुदन करनेपर व्याधियाँ फैलती हैं, हँसनेपर देशमें संकटकी वृद्धि होती है, शाखाओंके गिरनेसे संग्राममें योद्धाओंका विनाश होता है, असमयमें फूले हुए वृक्ष बालकोंकी मृत्यु सूचित करते हैं, वृक्षसमूहोंमेंसे किसी-किसीके फलने-फूलनेपर अपने राष्ट्रमें भेद उत्पन्न होता है, गायके दूध गिरनेसे चारों ओर विनाश उपस्थित होता है, तेलका गिरना दुर्भिक्षका लक्षण है, मदिराके गिरनेसे वाहनोंका विनाश होता है, रक्त गिरनेपर संग्राम बतलाना चाहिये, मधु चूनेसे व्याधियाँ फैलती हैं, जल गिरनेसे वृष्टि नहीं होती। किसी रोगके बिना वृक्षोंका सूख जाना दुर्भिक्षका लक्षण जानना चाहिये। सूखे हुए वृक्षसे अंकुर फूटनेपर वीर्य (पराक्रम) और अन्नकी हानि होती है। गिरे हुए वृक्षोंके उठनेपर भेदकारी भय होता है तथा एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जानेसे देश-भङ्ग होता है, वृक्षोंके अकस्मात् जलने तथा रुदन करनेपर सम्पत्तिका विनाश होता है। ये उपद्रव यदि पूजित वृक्षोंमें होते हैं तो अवश्य ही राजापर विपत्तियाँ आती हैं। वृक्षोंके फलों तथा फूलोंमें विकार होनेपर राजाकी मृत्यु कहनी चाहिये। इसी प्रकार अन्यान्य वृक्षोंमें भी उपद्रवके लक्षणोंके दिखायी पड़नेपर उत्साही ब्राह्मण उस वृक्षको ऊपरसे ढककर चन्दन और पुष्पमालासे भूषित करे और पापकी शान्तिके लिये वृक्षके ऊपर छत्र लगाये। तदनन्तर शिवकी पूजा करे और पशुको 'रुद्रेभ्यः०' इस संकल्पसे निवेदित कर वृक्षोंके नीचे हवन करनेके पश्चात् शिवका जप करे। फिर मधु तथा घृतयुक्त खीरसे ब्राह्मणोंको संतुष्ट कर उन्हें पृथ्वीका दान दे और उस पापकी शान्तिके लिये गीत तथा नृत्यका आयोजन कराकर भगवान् शंकरकी अर्चना करे॥ ५–१५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ वृक्षोत्पातप्रशमनं नाम द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुत-शान्ति-प्रकरणमें वृक्षोत्पात-प्रशमन नामक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २३२ ॥
२४०- राजाओंकी विजयर्थ यात्राका विधान
| ९९४ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय
वृष्टिजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय
| गर्ग उवाच | गर्गजीने कहा— |
|---|---|
| अतिवृष्टिरनावृष्टिर्दुर्भिक्षादि भयं मतम्।<br>अनृतौ तु दिवानन्ता वृष्टिर्ज्ञेया भयानका॥ १ | मुने! अतिवृष्टि और अनावृष्टि—ये दोनों दुर्भिक्षादिजन्य भयका कारण मानी गयी हैं। वर्षा-ऋतुके बिना दिनमें अनन्त वृष्टिका होना अत्यन्त भयानक है। |
| अनभ्रे वैकृता चैव विज्ञेया राजमृत्यवे।<br>शीतोष्णानां विपर्यासे नृपाणां रिपुजं भयम्॥ २ | बादलरहित आकाशमें विकृत हुई वृष्टिको राजाकी मृत्युका कारण जानना चाहिये। शीतकालमें गर्मी एवं ग्रीष्ममें सर्दी पड़नेसे राजाओंपर शत्रुपक्षसे भय होता है। |
| शोणितं वर्षते यत्र तत्र शस्त्रभयं भवेत्।<br>अङ्गारपांशुवर्षेषु नगरं तद् विनश्यति॥ ३ | जिस स्थानपर आकाशसे रक्तकी वर्षा होती है वहाँ शस्त्रभय प्राप्त होता है। अङ्गार और धूलिकी वृष्टि होनेपर वह नगर विनष्ट हो जाता है। |
| मज्जास्थिस्नेहमांसानां जनमारभयं भवेत्।<br>फलं पुष्पं तथा धान्यं परेणातिभयाय तु॥ ४ | मज्जा, हड्डी, तेल और मांसकी वृष्टि होनेपर प्रजावर्गमें मृत्युका भय उपस्थित होता है। आकाशसे फल, पुष्प तथा अन्नकी वृष्टि शत्रुपक्षसे अत्यन्त भयका द्योतन करती है। |
| पांशुजन्तूपलानां च वर्षतो रोगजं भयम्।<br>छिद्रे चान्नप्रवर्षेण सस्यानां भीतिवर्धनम्॥ ५ | धूलि, जन्तु और उपलोंके गिरनेसे रोगजन्य भय प्राप्त होता है। रुक-रुककर अन्नकी वृष्टि होनेसे फसलके भयकी वृद्धि होती है। |
| विरजस्के रवौ व्यभ्रे यदा छाया न दृश्यते।<br>दृश्यते तु प्रतीपा वा तत्र देशभयं भवेत्॥ ६ | सूर्यके बादल एवं धूलिसे रहित रहनेपर जब परछाई नहीं दीखती अथवा विपरीत दिखायी पड़ती है, तब सारे देशको भय प्राप्त होता है। |
| निरभ्रे वाथ रात्रौ वा श्वेतं याम्योत्तरेण तु।<br>इन्द्रायुधं तथा दृष्ट्वा उल्कापातं तथैव च॥ ७ | बादलरहित रात्रिमें दक्षिण अथवा उत्तर दिशामें श्वेत रंगका इन्द्रधनुष, उल्कापात, |
| दिग्दाहपरिवेषौ च गन्धर्वनगरं तथा।<br>परचक्रभयं ब्रूयाद् देशोपद्रवमेव च॥ ८ | दिशाओंमें दाह, सूर्य तथा चन्द्रमामें मण्डल तथा गन्धर्वनगर दिखायी पड़े तो उस समय देशपर शत्रु-पक्षकी सेनाका आक्रमण और देशमें विविध उपद्रवोंके संघटित होनेकी सम्भावना कहनी चाहिये। |
| सूर्येन्दुपर्जन्यसमीरणानां<br>यागस्तु कार्यो विधिवद् द्विजेन्द्र।<br>धनानि गौः काञ्चनदक्षिणा च<br>देया द्विजानामघनाशहेतोः॥ ९ | द्विजेन्द्र! ऐसे अवसरपर सूर्य, चन्द्रमा, मेघ और वायुके उद्देश्यसे विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिये और इस पापके विनाशके लिये ब्राह्मणोंको धन, गौ तथा सुवर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये॥ १—९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ वृष्टिवैकृतिप्रशमनं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रसंगमें वृष्टि-विकारशमन नामक दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३३॥
| * अध्याय २३५ * | ९९५ |
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दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय
जलाशयजनित विकृतियाँ और उनकी शान्तिके उपाय
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| गर्ग उवाच<br><br>नगरादपसर्पन्ते समीपमुपयान्ति च।<br>नद्यो ह्रदप्रस्रवाणि विरसाश्च भवन्ति च॥ १<br><br>विवर्णं कलुषं तप्तं फेनवज्जन्तुसंकुलम्।<br>स्नेहं क्षीरं सुरां रक्तं वहन्ते व्याकुलोदकाः॥ २<br><br>षण्मासाभ्यन्तरे तत्र परचक्रभयं भवेत्।<br>जलाशया नदन्ते वा प्रज्वलन्ति कथञ्चन॥ ३<br><br>विमुञ्चन्ति तथा ब्रह्मन् ज्वालाधूमरजांसि च।<br>अखाते वा जलोत्पत्तिः सुसत्त्वा वा जलाशयाः॥ ४<br><br>संगीतशब्दाः श्रूयन्ते जनमारभयं भवेत्।<br>दिव्यमम्भोमयं सर्पिर्मधुतेलावेसेचनम्॥ ५<br><br>जप्तव्या वारुणा मन्त्रास्तैश्च होमो जले भवेत्॥ ६<br><br>मध्वाज्ययुक्तं परमान्नमत्र<br>देयं द्विजानां द्विजभोजनार्थम्।<br><br>गावश्च देयाः सितवस्त्रयुक्ता-<br>स्तथोदकुम्भाः सलिलाघशान्त्यै॥ ७ | **गर्गजीने कहा—**ब्रह्मन्! जब नदियाँ, सरोवर या झरने नगरसे दूर हट जाते हैं या अत्यन्त समीप चले आते हैं, सूख जाते हैं, मलिन, कलुषित, संतप्त तथा फेनके समान जन्तुओंसे व्याप्त हो जाते हैं, तेल, दूध, मदिरा और रक्त बहाने लगते हैं अथवा उनका जल विक्षुब्ध हो उठता है, तब छः महीनेके भीतर उस देशपर शत्रुपक्षकी सेनासे भय प्राप्त होनेकी सम्भावना होती है। जब किसी प्रकारसे जलाशय शब्द करने लगते हैं या जलने लगते हैं तथा लपटें, धुआँ एवं धूलि फेंकने लगते हैं, बिना खोदे ही जल निकलने लगता है, जलाशय बड़े-बड़े जन्तुओंसे भर जाते हैं और उनमेंसे संगीतकी ध्वनियाँ सुनायी पड़ने लगती हैं, तब प्रजावर्गके मरणका भय उपस्थित होता है। ऐसे अवसरपर घी, मधु और तैलसे जलाशयोंका अभिषेक कर वरुणके मन्त्रोंका जप करना चाहिये और उन्हीं मन्त्रोंका उच्चारण कर जलमें हवन करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजनार्थ मधु तथा घृत मिलाकर श्रेष्ठ अन्न देना चाहिये और जलके महापापकी शान्तिके लिये श्वेत वस्त्रोंसे युक्त गौएँ और जल रखनेके घड़े दान करने चाहिये॥ १-७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ सलिलाशयवैकृत्यं नाम चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुतशान्ति-प्रकरणमें जलाशय-विकार-शान्ति नामक दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३४॥
दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय
प्रसवजनित विकारका वर्णन और उसकी शान्ति
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| गर्ग उवाच<br><br>अकालप्रसवा नार्यः कालातीतप्रजास्तथा।<br>विकृतप्रसवाश्चैव युग्मसम्प्रसवास्तथा॥ १<br><br>अमानुषा ह्यतुण्डाश्च संजातव्यसनास्तथा।<br>हीनाङ्गा अधिकाङ्गाश्च जायन्ते यदि वा स्त्रियः॥ २ | **गर्गजीने कहा—**ब्रह्मन्! जब स्त्रियाँ बिना समय पूरा हुए अथवा पूरे समयके बहुत बाद प्रसव करती हैं, विकृत एवं जुड़वीं संतान पैदा करती हैं तथा मानवसे भिन्न, मुखहीन, जन्मते ही मर जानेवाले, अङ्गहीन और अधिक अङ्गवाले बच्चोंको जन्म देती हैं, |
२४१- अङ्गस्फुरणके शुभाशुभ फल
९१६ * मत्स्यपुराण *
| पशवः पक्षिणश्चैव तथैव च सरीसृपाः।<br>विनाशं तस्य देशस्य कुलस्य च विनिर्दिशेत्॥ ३<br>विवासयेत् तान् नृपतिः स्वराष्ट्रात्<br>स्त्रियश्च पूज्याश्च ततो द्विजेन्द्राः।<br>किमिच्छकैर्ब्राह्मणतर्पणैश्च<br>लोके ततः शान्तिमुपैति पापम्॥ ४ | उसी प्रकार वहाँके पशु, पक्षी और रेंगनेवाले जन्तु भी बच्चे देने लगते हैं, तब उस देश और कुलका विनाश कहना चाहिये। ऐसे उपद्रवोंके घटित होनेपर राजा अपने राष्ट्रसे उन पैदा होनेवाली संतानों और स्त्रियोंको निर्वासित कर दे। तदनन्तर ब्राह्मणोंकी विधिवत् पूजा करे। इस प्रकार इच्छानुसार ब्राह्मणोंको संतुष्ट करनेसे लोकमें पाप शान्तिको प्राप्त होता है॥१—४॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ प्रसववैकृत्यं नाम पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्तिप्रसङ्गमें प्रसववैकृत्य नामक दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३५॥
दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय
उपस्कर-विकृतिके लक्षण और उनकी शान्ति
| गर्ग उवाच<br>यान्ति यानान्ययुक्तानि युक्तान्यपि न यान्ति च।<br>चोद्यमानानि तत्र स्यान्महद्भयमुपस्थितम्॥ १<br>वाद्यमाना न वाद्यन्ते वाद्यन्ते चाप्यनाहताः।<br>अचलाश्च चलन्त्येव न चलन्ति चलानि च॥ २<br>आकाशे तूर्यनादाश्च गीतगन्धर्वनिःस्वनाः।<br>काष्ठदर्वीकुठारादि विकारं कुरुते यदि॥ ३<br>गावो लाङ्गूलसङ्घैश्च स्त्रियः स्त्री च विघातयेत्।<br>उपस्कारादिविकृतौ घोरं शस्त्रभयं भवेत्॥ ४<br>वायोस्तु पूजां द्विज सक्तुभिश्च<br>कृत्वा नियुक्तांश्च जपेच्च मन्त्रान्।<br>दद्यात् प्रभूतं परमान्नमत्र<br>सदक्षिणं तेन शमोऽस्य भूयात्॥ ५ | **गर्गजीने कहा—**ब्रह्मन्! जिस देशमें रथादि घोड़ोंके बिना जोते ही चलने लगते हैं और घोड़ोंके जोतनेपर एवं उन्हें हाँकनेपर भी नहीं चलते, वहाँ महान् भय उपस्थित होनेवाला है। बिना बजाये ही बाजे बजने लगते हैं और बजानेपर नहीं बजते, अचल वस्तुएँ चलने लगती हैं और चल अचल हो जाती हैं, आकाशमें तुरुहीकी ध्वनि और गन्धर्वोंकी गीतोंका शब्द सुनायी पड़ने लगता है, काष्ठ, करछुल एवं फावड़े आदिमें विकार उत्पन्न हो जाते हैं, गौएँ पूँछसे एक-दूसरेको मारने लगती हैं, स्त्रियाँ एक-दूसरेकी हत्या करने लगती हैं और घरेलू वस्तुओंमें भी विकार उत्पन्न हो जाते हैं, उस देशमें शस्त्रास्त्रोंसे घोर भय उत्पन्न होता है। ऐसे उत्पातोंके घटित होनेपर सत्तूसे वायुदेवकी पूजा करके उनके मन्त्रोंका जप करना चाहिये और प्रचुरपरिमाणमें दक्षिणासहित परमोत्तम अन्नका दान देना चाहिये। इसीसे उस उत्पातका शमन होता है॥१—५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावुपस्करवैकृत्यं नाम षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रकरणमें उपस्करशान्ति नामक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३६॥
| * अध्याय २३७ * | १९७ |
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दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय
पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पात और उनकी शान्ति
| गर्ग उवाच | |
|---|---|
| प्रविशन्ति यदा ग्राममारण्या मृगपक्षिणः।<br>अरण्यं यान्ति वा ग्राम्याः स्थलं यान्ति जलोद्भवाः॥ १<br>स्थलजाश्च जलं यान्ति घोरं वाशन्ति निर्भयाः।<br>राजद्वारे पुरद्वारे शिवाश्चाप्यशिवप्रदाः॥ २<br>दिवा रात्रिंचरा वापि रात्रावपि दिवाचराः।<br>ग्राम्यास्त्यजन्ति ग्रामं च शून्यतां तस्य निर्दिशेत्॥ ३<br>दीप्ता वाशन्ति संध्यासु मण्डलानि च कुर्वते।<br>वाशन्ति विस्वरं यत्र तदाप्येतत्फलं लभेत्॥ ४<br>प्रदोषे कुक्कुटो वाशेद्धेमन्ते वापि कोकिलः।<br>अर्कोदयेऽर्काभिमुखी शिवा रौति भयं वदेत्॥ ५<br>गृहं कपोतः प्रविशेत् क्रव्यादो मूर्ध्नि लीयते।<br>मधु वा मक्षिकाः कुर्युर्मृत्युर्गृहपतेर्भवेत्॥ ६<br>प्राकारद्वारगेहेषु तोरणापणवीथिषु।<br>केतुच्छत्रायुधाद्येषु क्रव्यादं प्रपतेद् यदि॥ ७<br>जायन्ते वाथ वल्मीका मधु वा स्यन्दते यदि।<br>स देशो नाशमायाति राजा वा म्रियते तथा॥ ८ | गर्गजीने कहा— ब्रह्मन्! जब जंगली पशु-पक्षी ग्रामोंमें प्रवेश करने लगें या ग्रामीण पशु-पक्षी जंगलोंमें चले जायँ, जलमें रहनेवाले जीव-जन्तु भूमिपर रेंगने लगें या भूमिके जीव जलमें चले जायँ, अमङ्गलदायक शृगाल राजद्वार या नगरद्वारपर निर्भय होकर बोलना आरम्भ कर दें, दिनमें घूमनेवाले रात्रिमें और रात्रिमें घूमनेवाले दिनमें घूमने लगें तथा ग्राममें रहनेवाले जीव ग्रामको छोड़ दें, तब उस ग्रामकी शून्यताका निर्देश करना चाहिये। जब ग्रामोंमें पशु आदि जीवगण क्रोधोन्मत्त हो मण्डल बनाकर क्रूर स्वरमें चिल्लाने लगें, तब भी यही फल प्राप्त होता है। सायंकालमें मुर्गा बाँग देने लगे, हेमन्त-ऋतुमें कोकिल बोले और सूर्योदयके समय सूर्याभिमुखी हो शृगाली चिल्लाये तो भयका आगमन कहना चाहिये। घरमें कबूतर घुस आये, मस्तकपर मांसभक्षी पक्षी बैठ जाय और घरके भीतर मधुमक्खियाँ छत्ते लगायें तो उस घरके स्वामीकी मृत्यु होती है। यदि दुर्गादिके परकोटे, प्रवेशद्वार, राजभवन, तोरण (सिंहद्वार), बाजार, गली, पताका, ध्वज और अस्त्र-शस्त्रादिपर मांसभक्षी पक्षी बैठ जाय अथवा घरमें बिमवट हो जाय या छत्तेसे मधु चूने लगे तो उस देशका विनाश हो जाता है तथा राजाकी मृत्यु हो जाती है॥ १—८॥ |
| मूषकाञ्शलभान् दृष्ट्वा प्रभूतं क्षुद्रयं भवेत्।<br>काष्ठोल्मुकास्थिशृङ्गाढ्याः श्वानो मर्कटवेदनाः॥ ९<br>दुर्भिक्षं वेदना ज्ञेया काका धान्यमुखा यदि।<br>जनानभिभवन्तीह निर्भया रणवेदिनः॥ १०<br>काको मैथुनसक्तश्च श्वेतस्तु यदि दृश्यते।<br>राजा वा म्रियते तत्र स च देशो विनश्यति॥ ११<br>उलूको वाशते यत्र नृपद्वारे तथा गृहे।<br>ज्ञेयो गृहपतेर्मृत्युर्धननाशस्तथैव च॥ १२ | चूहे और शलभ अधिक परिमाणमें दिखायी पड़ें तो दुर्भिक्ष पड़ता है। लकड़ीके लुआठे, हड्डियाँ, सींगवाले जानवर, कुत्ते और बन्दरोंकी अधिकता होनेपर देशमें व्याधियाँ फैलनेका भय रहता है। यदि कौए चोंचमें अन्न लेकर निर्भयतापूर्वक लोगोंपर टूट पड़ते हों तो दुर्भिक्ष और रण छिड़नेकी सम्भावना समझनी चाहिये। यदि श्वेत कौआ मैथुन करते हुए दिखलायी पड़ जाय तो उस देशका राजा मर जाता है अथवा वह देश विनष्ट हो जाता है। जहाँ राजाके द्वार तथा घरपर उल्लू बोलता हो, वहाँ उस घरके स्वामीकी मृत्यु तथा सम्पत्तिका विनाश जानना चाहिये। |
२४२- शुभाशुभ स्वप्नोंके लक्षण
| ९१८ | * मत्स्यपुराण * |
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| मृगपक्षिविकारेषु कुर्याद्धोमं सदक्षिणम्।<br>देवाः कपोता इति वा जप्तव्याः पञ्चभिर्द्विजैः ॥ १३<br>गावश्च देया विधिवद् द्विजानां<br>सकाञ्चना वस्त्रयुगोत्तरीयाः ।<br>एवं कृते शान्तिमुपैति पापं<br>मृगैर्द्विजैर्वा विनिवेदितं यत् ॥ १४ | इस प्रकार पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पातोंके होनेपर दक्षिणासहित हवन करना चाहिये या पाँच ब्राह्मणोंको ‘देवाः कपोता’—इस मन्त्रका जप करना चाहिये। ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक सुवर्ण तथा दुपट्टेसहित दो वस्त्रोंसे युक्त गौओंका दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे पशुओं एवं पक्षियोंद्वारा सूचित किया गया पाप शान्त हो जाता है॥ ९—१४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ मृगपक्षिवैकृत्यं नाम सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रसंगमें पशु-पक्षी-विकार-शान्ति नामक दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३७॥
दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय
राजाकी मृत्यु तथा देशके विनाशसूचक लक्षण और उनकी शान्ति
| गर्ग उवाच | गर्गजीने कहा— |
|---|---|
| प्रासादतोरणाट्टालद्वारप्राकारवेश्मनाम् ।<br>निर्निमित्तं तु पतनं दृढानां राजमृत्युवे ॥ १ | ब्रह्मन्! सुदृढ़ राजभवन, तोरण, अट्टालिका, प्रवेशद्वार, परकोटा और घरका अकारण गिरना राजाकी मृत्युका कारण होता है। |
| रजसा वाथ धूमेन दिशो यत्र समाकुलाः ।<br>आदित्यचन्द्रताराश्च विवर्णा भयवृद्धये ॥ २ | जहाँ दिशाएँ धूलि अथवा धूएँसे व्याप्त दिखायी पड़ती हैं तथा सूर्य, चन्द्रमा और ताराओंका रंग बदल जाता है तो यह भी भय-वृद्धिका सूचक है। |
| राक्षसा यत्र दृश्यन्ते ब्राह्मणाश्च विधर्मिणः ।<br>ऋतवश्च विपर्यस्ता अपूज्यः पूज्यते जनैः ॥ ३ | जहाँ राक्षस दिखायी पड़ते हों, ब्राह्मण विधर्मी हों, ऋतुओंका विपर्यय हो, लोग अपूज्यकी पूजा करते हों |
| नक्षत्राणि वियोगीनि तन्महद्भयलक्षणम् ।<br>केतूदयोपरागो च छिद्रं वा शशिसूर्ययोः ॥ ४ | और नक्षत्रगण आकाशसे नीचे गिरने लगें तो यह महान् भयका लक्षण है। जहाँ केतुका उदय, ग्रहण, चन्द्र-सूर्यके बिम्बमें छिद्र |
| ग्रहर्क्षविकृतिर्यत्र तत्रापि भयमादिशेत् ।<br>स्त्रियश्च कलहायन्ते बाला निघ्नन्ति बालकान् ॥ ५ | तथा ग्रह और नक्षत्रोंमें विकार दिखायी दे, वहाँ भी भयकी सम्भावना कहनी चाहिये। जहाँ स्त्रियाँ आपसमें झगड़ने लगें, बालक बच्चोंको मारने लगें, |
| क्रियाणामुचितानां च विच्छित्तिर्यत्र जायते ।<br>हूयमानस्तु यत्राग्निर्नोद्दीप्यते न च शान्तिषु ॥ ६ | उचित कार्योंका विनाश होने लगे, शान्तिकर्मोंमें आहुति देनेपर भी अग्नि उद्दीप्त न हो, |
| पिपीलिकाश्च क्रव्यादा यान्ति चोत्तरतस्तथा ।<br>पूर्णकुम्भाः स्रवन्ते च हविर्वा विप्रलुप्यते ॥ ७ | पिपीलिका और मांसभक्षी पक्षी उत्तर दिशा होकर जायें, भरे हुए घटोंमें रखी हुई वस्तुओंका चूना, हविका नष्ट हो जाना, |
| मङ्गल्याश्च गिरो यत्र न श्रूयन्ते समंततः ।<br>क्षवथुर्बाधते वाथ प्रहसन्ति नदन्ति च ॥ ८ | चारों ओरसे माङ्गलिक वाणियोंका न सुना जाना, लोगोंमें कास-रोगकी पीड़ा, जनतामें अकारण हँसी और गानेकी अभिरुचि, |
| न च देवेषु वर्तन्ते यथावद् ब्राह्मणेषु च ।<br>मन्दघोषाणि वाद्यानि वाद्यन्ते विस्वराणि च ॥ ९ | देवता और ब्राह्मणोंके प्रति उचित बर्तावका अभाव, बाजोंका मन्द एवं विकृत स्वरमें बजना, |
| गुरुमित्रद्विषो यत्र शत्रुपूजारता नराः ।<br>ब्राह्मणान् सुहृदो मान्यान् जनो यत्रावमन्यते ॥ १० | लोगोंमें गुरु एवं मित्रोंसे द्वेष तथा शत्रु की पूजामें अभिरुचि, ब्राह्मण, मित्र और माननीय लोगोंका अपमान तथा |
* अध्याय २३९ * ९९९
| शान्तिमङ्गलहोमेषु नास्तिक्यं यत्र जायते।<br>राजा वा म्रियते तत्र स देशो वा विनश्यति॥ ११<br>राज्ञो विनाशे सम्प्राप्ते निमित्तानि निबोध मे।<br>ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणैश्च विरुध्यते॥ १२<br>ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्च जिघांसति।<br>न च स्मरति कृत्येषु याचितश्च प्रकुप्यति॥ १३<br>रमते निन्दया तेषां प्रशंसां नाभिनन्दति।<br>अपूर्वं तु करं लोभात् तथा पातयते जने॥ १४<br>एतेष्वभ्यर्चयेच्छक्रं सपत्नीकं द्विजोत्तम।<br>भोज्यानि चैव कार्याणि सुराणां बलयस्तथा।<br>सन्तो विप्राश्च पूज्याः स्युस्तेभ्यो दानं च दीयताम्॥ १५<br>गावश्च देया द्विजपुङ्गवेभ्यो<br>भुवस्तथा काञ्चनमम्बराणि।<br>होमश्च कार्योऽमरपूजनं च<br>एवं कृते पापमुपैति शान्तिम्॥ १६ | शान्तिपाठ, माङ्गलिक कार्य और हवनादिमें नास्तिकताका प्रभाव दिखायी पड़े, वहाँका राजा मर जाता है अथवा वह देश विनष्ट हो जाता है॥ ९—११॥<br>द्विजोत्तम! अब मैं राजाका विनाश उपस्थित होनेपर उत्पन्न होनेवाले निमित्तोंको बतला रहा हूँ, सुनिये। वह राजा सर्वप्रथम ब्राह्मणोंसे द्वेष करने लगता है, ब्राह्मणोंसे विरोध करता है, ब्राह्मणोंकी सम्पत्तिको हड़प लेता है, ब्राह्मणोंके मारनेका उपक्रम करता है, उसे सत्कार्योंके सम्पादनका स्मरण नहीं होता, वह माँगनेपर क्रुद्ध होता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें विशेष रुचि रखता है और प्रशंसाका अभिनन्दन नहीं करता, लोभवश लोगोंपर नया-नया कर लगाता है—ऐसे अवसरपर शचीसहित इन्द्रकी पूजा करनी चाहिये तथा ब्राह्मणोंको भोजन और अन्य देवताओंके उद्देश्यसे बलि प्रदान करना चाहिये। सत्पुरुषों एवं ब्राह्मणोंकी पूजा कर उन्हें दान देना चाहिये। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको गौएँ, पृथ्वी, सुवर्ण और वस्त्रादिका दान, देवताओंकी पूजा तथा हवन करना चाहिये। ऐसा करनेसे पाप शान्त हो जाता है॥ १२—१६॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावुत्पातप्रशमनं नामाष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रसङ्गमें उत्पात-प्रशमन नामक दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३८॥
दो सौ उन्तालीसवाँ अध्याय
ग्रहयागका विधान
| मनुरुवाच | मनुजीने पूछा— |
|---|---|
| ग्रहयज्ञः कथं कार्यो लक्षहोमः कथं नृपैः।<br>कोटिहोमोऽपि वा देव सर्वपापप्रणाशनः॥ १<br>क्रियते विधिना येन यद् दृष्टं शान्तिचिन्तकैः।<br>तत् सर्वं विस्तराद् देव कथयस्व जनार्दन॥ २ | देव! राजाओंको ग्रहयज्ञ किस प्रकार करना चाहिये? सभी पापोंको नष्ट करनेवाले लक्षहोम तथा कोटिहोम करनेकी क्या विधि है? जनार्दन! यह जिस विधिसे किया जाता है तथा शान्तिका चिन्तन करनेवाले जिस विधिसे सम्पन्न किये हों, वह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये॥ १-२॥ |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
| इदानीं कथयिष्यामि प्रसङ्गादेव ते नृप।<br>राज्ञा धर्मप्रसक्तेन प्रजानां च हितेप्सुना॥ ३<br>ग्रहयज्ञः सदा कार्यो लक्षहोमसमन्वितः।<br>नदीनां संगमे चैव सुराणामग्रतस्तथा॥ ४ | राजन्! इस समय प्रसंगवश मैं तुम्हें उसे बतला रहा हूँ। धर्मपरायण एवं प्रजाओंके हितेच्छु राजाको लक्षहोमसहित ग्रहयज्ञ सदा करना चाहिये। इस ग्रहयज्ञको नदियोंके संगम तथा देवताओंके समक्ष |
२४३- शुभाशुभ शकुनोंका निरूपण
९२० * मत्स्यपुराण *
| सुसमे भूमिभागे च दैवज्ञाधिष्ठितो नृपः।<br>गुरुणा चैव ऋत्विग्भिः सार्धं भूमिं परीक्षयेत्॥ ५<br>खनेत् कुण्डं च तत्रैव सुसमं हस्तमात्रकम्।<br>द्विगुणं लक्षहोमे तु कोटिहोमे चतुर्गुणम्॥ ६<br>युग्मास्तु ऋत्विजः प्रोक्ता अष्टौ वै वेदपारगाः।<br>कन्दमूलफलाहारा दधिक्षीराशिनोऽपि वा॥ ७<br>वेद्यां निधापयेच्चैव रत्नानि विविधानि च।<br>सिकतापरिवेषान्च ततोऽग्निं च समिन्धयेत्॥ ८<br>गायत्र्या दशसाहस्रं मानस्तोकेन षड्गुणः।<br>त्रिंशद् ग्रहाणां मन्त्रैश्च चत्वारो विष्णुदैवतैः॥ ९<br>कूष्माण्डैर्जुहुयात् पञ्च कुसुमाद्यैस्तु षोडश।<br>होतव्या दशसाहस्रं बादरैर्जातवेदसि॥ १०<br>श्रियो मन्त्रेण होतव्याः सहस्राणि चतुर्दश।<br>शेषाः पञ्चसहस्त्रास्तु होतव्यास्त्विन्द्रदैवतैः॥ ११<br>हुत्वा शतसहस्रं तु पुण्यस्नानं समाचरेत्।<br>कुम्भैः षोडशसंख्यैश्च सहिरण्यैः सुमङ्गलैः॥ १२<br>स्नापयेद् यजमानं तु ततः शान्तिर्भविष्यति।<br>एवं कृते तु यत्किंचिद् ग्रहपीडासमुद्भवम्॥ १३<br>तत् सर्वं नाशमायाति दत्त्वा वै दक्षिणां नृप।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रधाना दक्षिणा स्मृता॥ १४<br>हस्त्यश्वरथयानानि भूमिवस्त्रयुगानि च।<br>अनुडुद्गोशतं दद्याद् ऋत्विग्जां चैव दक्षिणाम्॥ १५<br>यथाविभवसारं तु वित्तशाठ्यं न कारयेत्।<br>मासे पूर्णे समाप्तस्तु लक्षहोमो नराधिप॥ १६<br>लक्षहोमस्य राजेन्द्र विधानं परिकीर्तितम्।<br>इदानीं कोटिहोमस्य शृणु त्वं कथयाम्यहम्॥ १७<br>गङ्गातटेऽथ यमुनासरस्वत्योर्न्ररेश्वर।<br>नर्मदादेविकायास्तु तटे होमो विधीयते॥ १८<br>तत्रापि ऋत्विजः कार्या रविनन्दन षोडश।<br>सर्वहोमे तु राजर्षे दद्याद् विप्रेऽथवा धनम्॥ १९<br>ऋत्विगाचार्यसहितो दीक्षां सांवत्सरीं स्थितः।<br>चैत्रे मासे तु सम्प्राप्ते कार्त्तिके वा विशेषतः॥ २०<br>प्रारम्भः करणीयो वा वत्सरं वत्सरं नृप। | समतल भूभागपर करना चाहिये। सर्वप्रथम राजा ज्योतिषीसे परामर्श कर गुरु और ऋत्विजोंके साथ भूमिकी परीक्षा करे। वहाँ एक हाथ गहरा चौकोर कुण्ड बनाये। लक्षहोममें यह कुण्ड दुगुना और कोटिहोममें चौगुना बड़ा बनाना चाहिये। इसके लिये सोलह ऋत्विज् बतलाये गये हैं, जो वेदोंके पारगामी विद्वान् कंद-मूल-फलका आहार करनेवाले अथवा दही-दूधका भोजन करनेवाले हों। यजमान राजा यज्ञवेदीपर विविध प्रकारके रत्न स्थापित करे। बालूद्वारा वेदीके चारों ओर मण्डल बनाकर अग्नि प्रज्वलित कराये। फिर गायत्रीमन्त्रद्वारा दस हजार, 'मानस्तोके०' (ऋ० ३।१३।६, वाजसनेयि १६।१६) आदि मन्त्रद्वारा छः हजार, ग्रहोंके मन्त्रोंसे तीस हजार, विष्णुसूक्तसे चार हजार, कोंहड़ेसे पाँच हजार, पुष्प-समूहसे सोलह हजार तथा बेरके फलोंसे दस हजार आहुतियाँ अग्निमें देनी चाहिये॥ ३-१०॥<br><br>इसी प्रकार श्रीसूक्तसे चौदह हजार आहुतियाँ देनी चाहिये और शेष पाँच हजार आहुतियाँ इन्द्र देवताके मन्त्रोंसे देनी चाहिये। फिर एक लाख आहुतियोंसे हवन कर पुण्यस्नान* सम्पन्न करे। तत्पश्चात् सुवर्णयुक्त सोलह मङ्गल-कलशोंसे यजमानको स्नान कराये, तब शान्तिकी प्राप्ति होती है। नृप! ऐसा करके दक्षिणा देनेपर ग्रहपीडासे उत्पन्न जो कुछ कष्ट होता है, वह सब नष्ट हो जाता है। इसीलिये सभी प्रकारसे दक्षिणाको ही प्रधान माना गया है। उस समय राजा अपनी सम्पत्तिके अनुकूल ऋत्विजोंको हाथी, घोड़े, रथ, वाहन, भूमि, जोड़े वस्त्र, बैल तथा सौ गौएँ दक्षिणारूपमें दे, कृपणता न करे। नराधिप! लक्षहोम एक मासमें समाप्त होता है। राजेन्द्र! इस प्रकार मैंने लक्षहोमका विधान आपको बतला दिया। अब मैं कोटिहोमका विधान बतला रहा हूँ, आप सुनिये। नरेश्वर! गङ्गा, यमुना और सरस्वतीके अथवा नर्मदा और देविका (सरयू)-के तटपर इस हवनके करनेका विधान है। रविनन्दन! इस कोटिहोममें भी सोलह ऋत्विजोंका वरण करना चाहिये। राजर्षे! सभी हवन-कार्योंमें ब्राह्मणोंको धन देना चाहिये। यजमान ऋत्विज् और आचार्यके साथ वर्षभरकी दीक्षा ग्रहण करे। राजन्! चैत्र अथवा विशेषतया कार्तिकका महीना आनेपर इस यज्ञको प्रारम्भ करना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिवर्ष करनेका विधान है॥ ११-२०$\frac{१}{२}$॥ |
* पुण्यस्नानकी विस्तृत विधि बृहत्संहितामें दी गयी है।