मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* अध्याय १६७ *
६९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अटंस्तीर्थप्रसङ्गेन पृथिवीं तीर्थगोचराम्।<br>आश्रमाणि च पुण्यानि देवतायतनानि च॥ १५<br><br>देशान् राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च।<br>जपहोमपरः शान्तस्तपो घोरं समास्थितः॥ १६<br><br>मार्कण्डेयस्ततस्तस्य शनैर्वक्त्राद् विनिःसृतः।<br>स निष्क्रामन् न चात्मानं जानीते देवमायया ॥ १७<br><br>निष्क्रम्याप्यस्य वदनादेकार्णवमथो जगत्।<br>सर्वतस्तमसाच्छन्नं मार्कण्डेयोऽन्ववैक्षत ॥ १८<br><br>तस्योत्पन्नं भयं तीव्रं संशयश्चात्मजीविते।<br>देवदर्शनसंहृष्टो विस्मयं परमं गतः॥ १९ | रहे। वे तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे तीर्थोंको प्रकट करनेवाली पृथिवी, पुण्यमय आश्रमों, देव-मन्दिरों, देशों, राष्ट्रों और अनेकों रमणीय नगरोंको देखते हुए जप और होममें तत्पर रहकर शान्तभावसे घोर तपस्यामें लगे हुए थे। तत्पश्चात् मार्कण्डेय मुनि धीरे-धीरे भ्रमण करते हुए भगवान्के मुखसे बाहर निकल आये, किंतु देवमायाके वशीभूत होनेके कारण वे अपनेको मुखसे निकला हुआ न जान सके। भगवान्के मुखसे बाहर निकलनेपर मार्कण्डेयजीने देखा कि सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न है और सब ओर अन्धकार छाया हुआ है। यह देखकर उनके मनमें महान् भय उत्पन्न हो गया और उन्हें अपने जीवनमें भी संशय दिखायी पड़ने लगा। इसी समय हृदयमें भगवान्का दर्शन होनेसे प्रसन्नता तो हुई, साथ ही महान् आश्चर्य भी हुआ॥११—१९॥ |
| चिन्तयन् जलमध्यस्थो मार्कण्डेयो विशङ्कितः।<br>किं नु स्यान्मम चिन्तेयं मोहः स्वप्नोऽनुभूयते ॥ २० | इस प्रकार जलके मध्यमें स्थित मार्कण्डेय मुनि शंकित चित्तसे विचार करने लगे कि यह मेरी आकस्मिक चिन्ता है या मेरी बुद्धिपर मोह छा गया है अथवा मैं स्वप्नका अनुभव कर रहा हूँ? |
| व्यक्तमन्यतमो भावस्तेषां सम्भावितो मम।<br>न हीदृशं जगत्क्लेशमयुक्तं सत्यमर्हति ॥ २१ | परंतु यह तो स्पष्ट है कि मैं इनमेंसे किसी एक भावका अनुभव तो अवश्य कर रहा हूँ; क्योंकि इस प्रकार क्लेशसे रहित जगत् सत्य नहीं हो सकता। |
| नष्टचन्द्रार्कपवने नष्टपर्वतभूतले।<br>कतमः स्यादयं लोक इति चिन्तामवस्थितः ॥ २२ | जब चन्द्रमा, सूर्य और वायु नष्ट हो गये तथा पर्वत और पृथ्वीका विनाश हो गया, तब यह कौन-सा लोक हो सकता है? वे इस प्रकारकी चिन्तासे ग्रस्त हो गये। |
| ददर्श चापि पुरुषं स्वपन्तं पर्वतोपमम्।<br>सलिलेऽर्धमथो मग्नं जीमूतमिव सागरे ॥ २३ | इतनेमें ही उन्हें वहाँ एक पर्वत-सरीखा विशालकाय पुरुष शयन करता हुआ दीख पड़ा, जिसके शरीरका आधा भाग सागरमें बादलकी तरह जलमें डूबा हुआ था। |
| ज्वलन्तमिव तेजोभिर्भायुक्तमिव भास्करम्।<br>शर्वर्यां जाग्रतमिव भासन्तं स्वेन तेजसा ॥ २४ | वह अपने तेजसे किरणयुक्त सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। अपने तेजसे उद्भासित होता हुआ वह रात्रिके अन्धकारमें जाग्रत्-सा दीख रहा था। |
| देवं द्रष्टुमिहायातः को भवानिति विस्मयात्।<br>तथैव स मुनिः कुक्षिं पुनरेव प्रवेशितः॥ २५ | तब मार्कण्डेय मुनि आश्चर्ययुक्त हो उस देवको देखनेके लिये ज्यों ही उसके निकट जाकर बोले—'आप कौन हैं?' त्यों ही उसने पुनः उन्हें अपनी कुक्षिमें समेट लिया। |
| सम्प्रविष्टः पुनः कुक्षिं मार्कण्डेयोऽतिविस्मयः।<br>तथैव च पुनर्भूयो विजानन् स्वप्नदर्शनम् ॥ २६ | पुनः कुक्षिमें प्रविष्ट हुए मार्कण्डेयको परम विस्मय हुआ। वे बाह्य जगत्को पूर्ववत् स्वप्नदर्शन ही मान रहे थे। |
| स तथैव यथापूर्वं यो धरामटते पुरा।<br>पुण्यतीर्थजलोपेतां विविधान्याश्रमाणि च॥ २७ | वे उस कुक्षिके अन्तर्गत जैसे पहले पृथ्वीपर विचरण कर रहे थे, उसी प्रकार पुनः भ्रमण करने लगे। उन्होंने पुण्यमय तीर्थजलसे भरी हुई नदियों, अनेकों |
१७१- ब्रह्माके मानस पुत्रोंकी उत्पत्ति, दक्षकी बारह कन्याओंका वृत्तान्त, ब्रह्माद्वारा सृष्टिका विकास तथा विविध देवयोनियोंकी उत्पत्ति
| ६९४ | * मत्स्यपुराण * |
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| ऋतुभिर्यजमानांश्च समाप्तवरदक्षिणान्।<br>अपश्यद्देवकुक्षिस्थान्याजकाञ्छतशो द्विजान्॥ २८<br><br>सद्वृत्तमास्थिताः सर्वे वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः।<br>चत्वारश्चाश्रमाः सम्यग्यथोद्दिष्टा मया तव॥ २९ | आश्रमों तथा कुक्षिके भीतर स्थित सैकड़ों याजक ब्राह्मणोंको देखा, जो कहीं यज्ञोंद्वारा यजन कर रहे थे और कहीं यज्ञ समाप्त होनेके पश्चात् उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त थे। जैसा मैंने तुम्हें पहले बतलाया है, उसके अनुसार ब्राह्मण आदि सभी वर्णों तथा चारों आश्रमोंके लोग सम्यक् प्रकारसे सदाचारका पालन करते थे॥ २८—२९॥ | | एवं वर्षशतं साग्रं मार्कण्डेयस्य धीमतः।<br>चरतः पृथिवीं सर्वां न कुक्ष्यन्तः समीक्षितः॥ ३०<br><br>ततः कदाचिदथ वै पुनर्वक्त्राद्विनिःसृतः।<br>गुप्तं न्यग्रोधशाखायां बालमेकं निरैक्षत॥ ३१<br><br>तथैवार्णवजले नीहारेणावृताम्बरे।<br>अव्यग्रः क्रीडते लोके सर्वभूतविवर्जिते॥ ३२<br><br>स मुनिर्विस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वितः।<br>बालमादित्यसंकाशं नाशक्नोदभिवीक्षितुम्॥ ३३<br><br>स चिन्तयंस्तथैकान्ते स्थित्वा सलिलसन्निधौ।<br>पूर्वदृष्टमिदं मन्ये शङ्कितो देवमायया॥ ३४<br><br>अगाधसलिले तस्मिन् मार्कण्डेयः सुविस्मयः।<br>प्लवंस्तथार्तिमगमद् भयात् संत्रस्तलोचनः॥ ३५<br><br>स तस्मै भगवानाह स्वागतं बालयोगवान्।<br>बभाषे मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः॥ ३६<br><br>मा भैर्वत्स न भेतव्यमिहैवायाहि मेऽन्तिकम्।<br>मार्कण्डेयो मुनिस्त्वाह बालं तं श्रमपीडितः॥ ३७ | इस प्रकार बुद्धिमान् मार्कण्डेयके सौ वर्षोंसे भी अधिक कालतक समूची पृथ्वीपर भ्रमण करते रहनेपर भी उन्हें उस कुक्षिका अन्त न दीख पड़ा। तत्पश्चात् किसी समय वे पुनः उस पुरुषके मुखसे बाहर निकल आये। उस समय उन्होंने बरगदकी शाखामें छिपे हुए एक बालकको देखा, जो उसी प्रकारके एकार्णवके जलमें, यद्यपि आकाश नीहारसे आच्छादित था तथा जगत् समस्त प्राणियोंसे शून्य हो गया था, तथापि निश्चिन्तभावसे खेल रहा था। यह देखकर मार्कण्डेय मुनि आश्चर्यचकित हो गये। उनके मनमें उसे जाननेके लिये कुतूहल उत्पन्न हो गया, किंतु वे सूर्यके समान तेजस्वी उस बालककी ओर देखनेमें असमर्थ हो गये। तब जलके निकट एकान्त स्थानमें स्थित होकर विचार करते हुए मार्कण्डेयजी देवमायाके प्रभावसे सशङ्कित हो उसे पहले देखा हुआ मानने लगे। परम विस्मित हुए मार्कण्डेय उस अथाह जलमें तैरते हुए कष्टका अनुभव करने लगे तथा भयके कारण उनके नेत्र कातर हो गये। तब बालयोगी भगवान् पुरुषोत्तम मेघ-सदृश गम्भीर स्वरसे मार्कण्डेयसे स्वागतपूर्वक बोले—'वत्स! डरो मत, तुम्हें डरना नहीं चाहिये। यहाँ मेरे निकट आओ।' तदुपरान्त थके-माँदे मार्कण्डेय मुनि उस बालकसे बोले॥ ३०—३७॥ | | मार्कण्डेय उवाच<br><br>को मां नाम्ना कीर्तयति तपः परिभवन्मम।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्राख्यं धर्षयन्निव मे वयः॥ ३८<br><br>न ह्येष वः समाचारो देवेष्वपि ममोचितः।<br>मां ब्रह्मापि हि देवेशो दीर्घायुरिति भाषते॥ ३९<br><br>कस्तमो घोरमासाद्य मामद्य त्यक्तजीवितः।<br>मार्कण्डेयेति मामुक्त्वा मृत्युमीक्षितुमर्हति॥ ४० | मार्कण्डेयजीने कहा— यह कौन है, जो मेरी तपस्याका तिरस्कार करता हुआ मेरा नाम लेकर पुकार रहा है? यह एक हजार दिव्य वर्षोंवाली मेरी आयुका भी अपमान-सा कर रहा है। देवताओंमें भी किसीको मेरे प्रति ऐसा व्यवहार करना उचित नहीं है; क्योंकि देवेश्वर ब्रह्मा भी मुझे 'दीर्घायु' कहकर ही पुकारते हैं। जीवनसे हाथ धोनेवाला ऐसा कौन है, जो घोर अज्ञानान्धकारका आश्रय लेकर आज मुझे 'मार्कण्डेय' ऐसा कहकर मृत्युका मुख देखना चाहता है?॥ ३८—४०॥ | | सूत उवाच<br><br>एवमाभाष्य तं क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः।<br>तथैव भगवान् भूयो बभाषे मधुसूदनः॥ ४१ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! महामुनि मार्कण्डेय क्रोधवश उस बालकसे ऐसा कहकर चुप हो गये। तब भगवान् मधुसूदन पुनः उसी प्रकार बोले॥ ४१॥ |
| * अध्याय १६७ * | ६९५ |
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| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान्ने कहा—'वत्स! मैं पुराणप्रसिद्ध हृषीकेश | | अहं ते जनको वत्स हृषीकेशः पिता गुरुः।<br>आयुष्प्रदाता पौराणः किं मां त्वं नोपसर्पसि॥ ४२ | ही तुम्हें जन्म देनेवाला तुम्हारा पिता और गुरु हूँ। मैंने ही तुम्हें दीर्घायु प्रदान किया है, तुम मेरे निकट क्यों नहीं | | मां पुत्रकामः प्रथमं पिता तेऽङ्गिरसो मुनिः।<br>पूर्वमाराधयामास तपस्तीव्रं समाश्रितः॥ ४३ | आ रहे हो? तुम्हारे पिता अङ्गिरा मुनिने पहले पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे कठोर तपका आश्रय ले मेरी आराधना | | ततस्त्वां घोरतपसा प्रावृणोदमितौजसम्।<br>उक्तवानहमात्मस्थं महर्षिममितौजसम्॥ ४४ | की थी और उस घोर तपस्याके परिणामस्वरूप तुम्हारे-जैसे अमित ओजस्वी पुत्रका वरदान माँगा था, तब मैंने उन आत्मज्ञानमें लीन एवं अमित पराक्रमी महर्षिको वरदान दिया था। अन्यथा तुम्हारे अतिरिक्त पञ्चभूतात्मक | | कः समुत्सहते चान्यो यो न भूतात्मकात्मजः।<br>द्रष्टुमेकार्णवगतं क्रीडन्तं योगवर्त्मना॥ ४५ | शरीरधारीका पुत्र दूसरा कौन है, जो एकार्णवके जलमें योगमार्गका आश्रय लेकर क्रीडा करते हुए मुझे देखनेका | | ततः प्रहृष्टवदनो विस्मयोत्फुल्ललोचनः।<br>मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिपुटो मार्कण्डेयो महातपाः॥ ४६ | साहस कर सकता है? यह सुनकर महातपस्वी मार्कण्डेयका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उनके नेत्र विस्मयसे उत्फुल्ल हो गये। तब वे लोकपूजित दीर्घायु मुनि मस्तकपर | | नामगोत्रे ततः प्रोच्य दीर्घायुर्लोकपूजितः।<br>तस्मै भगवते भक्त्या नमस्कारमथाकरोत्॥ ४७ | हाथ जोड़कर नाम और गोत्रका उच्चारण करके भक्तिपूर्वक उन भगवान्को नमस्कार करते हुए बोले॥ ४२-४७॥ | | मार्कण्डेय उवाच | **मार्कण्डेयजीने कहा—**अनघ! मैं आपकी इस | | इच्छेयं तत्त्वतो मायामिमां ज्ञातुं तवानघ।<br>यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान्॥ ४८ | मायाको तत्त्वपूर्वक जानना चाहता हूँ, जो आप बालकका रूप धारण करके इस एकार्णवके जलके मध्यमें स्थित होकर शयन करते हैं। ऐश्वर्यशाली प्रभो! आप लोकमें | | किं संज्ञश्चैव भगवाँल्लोके विज्ञायसे प्रभो।<br>तर्कये त्वां महात्मानं को ह्यन्यः स्थातुमर्हति॥ ४९ | किस नामसे विख्यात होते हैं? मैं आपको एक महान् आत्मबल-सम्पन्न पुरुष मानता हूँ, अन्यथा दूसरा कौन इस प्रकार स्थित रह सकता है॥ ४८-४९॥ | | श्रीभगवानुवाच | **श्रीभगवान् बोले—**ब्रह्मन्! मैं सभी प्राणियोंको | | अहं नारायणो ब्रह्मन् सर्वभूः सर्वनाशनः।<br>अहं सहस्त्रशीर्षाख्यैः पदैरभिसंज्ञितः॥ ५० | उत्पन्न करनेवाला तथा सबका विनाशक नारायण हूँ। जो सहस्रशीर्ष आदि नामोंसे अभिहित होता है, वह मैं ही | | आदित्यवर्णः पुरुषो मखे ब्रह्ममयो मखः।<br>अहमग्निर्हव्यवाहो यादसां पतिरव्ययः॥ ५१ | हूँ। मैं ही आदित्यवर्ण पुरुष और यज्ञमें ब्रह्ममय यज्ञ हूँ। मैं ही हव्यको वहन करनेवाला अग्नि और जल-जन्तुओंका अविनाशी स्वामी हूँ। इन्द्रपदपर स्थित रहनेवाला | | अहमिन्द्रपदे शक्रो वर्षाणां परिवत्सरः।<br>अहं योगी युगाख्यश्च युगान्तावर्त एव च॥ ५२ | इन्द्र तथा वर्षोंमें परिवत्सर मैं हूँ। मैं ही योगी, युग नामसे प्रसिद्ध और युगोंका अन्त करनेवाला हूँ। समस्त | | अहं सर्वाणि सत्त्वानि दैवतान्यखिलानि तु।<br>भुजङ्गानामहं शेषस्तार्क्ष्यो वै सर्वपक्षिणाम्॥ ५३ | प्राणी और सम्पूर्ण देवता मेरे ही स्वरूप हैं। मैं सर्पोंमें शेषनाग और सम्पूर्ण पक्षियोंमें गरुड हूँ। मैं सभी प्राणियोंका | | कृतान्तः सर्वभूतानां विश्वेषां कालसंज्ञितः।<br>अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम्॥ ५४ | अन्त करनेवाला तथा लोकोंका काल हूँ। चारों आश्रमोंमें निवास करनेवाले मनुष्योंका धर्म और तप मैं ही हूँ। मैं | | अहं चैव सरिद्दिव्या क्षीरोदश्च महार्णवः।<br>यत्तत्सत्यं च परममहमेकः प्रजापतिः॥ ५५ | दिव्य नदी गङ्गा और दुग्धरूपी जलसे भरा हुआ महासागर हूँ। जो परम सत्य है, वह मैं हूँ। मैं ही एकमात्र प्रजापति हूँ। |
६९६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अहं सांख्यमहं योगोऽप्यहं तत्परमं पदम्।<br>अहमिज्याक्रिया चाहमहं विद्याधिपः स्मृतः॥ ५६<br>अहं ज्योतिरहं वायुरहं भूमिरहं नभः।<br>अहमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशो दश॥ ५७<br>अहं वर्षमहं सोमः पर्जन्योऽहमहं रविः।<br>क्षीरोदसागरे चाहं समुद्रे वडवामुखः॥ ५८ | मैं ही सांख्य, मैं ही योग और मैं ही वह परमपद हूँ। मैं ही यज्ञकी क्रिया और मैं ही विद्याका अधिपति कहलाता हूँ। मैं ही अग्नि, मैं ही वायु, मैं ही पृथ्वी, मैं ही आकाश, मैं ही जल, समुद्र, नक्षत्र और दसों दिशाएँ हूँ। मैं ही वर्ष, मैं ही चन्द्रमा, मैं ही बादल तथा मैं ही रवि हूँ। क्षीरसागरमें शयन करनेवाला मैं ही हूँ। मैं ही समुद्रमें बडवाग्नि हूँ॥ ५०—५८॥ |
| वह्निः संवर्तको भूत्वा पिबंस्तोयमयं हविः।<br>अहं पुराणः परमं तथैवाहं परायणम्॥ ५९<br>अहं भूतस्य भव्यस्य वर्तमानस्य सम्भवः।<br>यत्किञ्चित् पश्यसे विप्र यच्छृणोषि च किञ्चन॥ ६०<br>यल्लोके चानुभवसि तत्सर्वं मामनुस्मर।<br>विश्वं सृष्टं मया पूर्वं सृज्यं चाद्यापि पश्य माम्॥ ६१<br>युगे युगे च स्रक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत्।<br>तदेतदखिलं सर्वं मार्कण्डेयावधारय॥ ६२<br>शुश्रूषर्मम धर्मांश्च कुक्षौ चर सुखं मम।<br>मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवैश्च ऋषिभिः सह॥ ६३<br>व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छासुरद्विषम्।<br>अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्र्यक्षरश्चैव तारकः॥ ६४<br>परस्त्रिवर्गादोंकारस्त्रिवर्गार्थनिदर्शनः ।<br>एवमादिपुराणेशो वदन्नेव महामतिः॥ ६५<br>वक्त्रमाहूतवानाशु मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः।<br>स तस्मिन् सुखमेकान्ते शुश्रूषुर्हसमव्ययम्॥ ६६<br>योऽहमेव विविधतनुं परिश्रितो<br>महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे।<br>शनैश्चरन् प्रभुरपि हंससंज्ञितो-<br>ऽसृजज्जगद्विरहितकालपर्यये॥ ६७ | मैं ही संवर्तक अग्नि बनकर जलरूप हविका पान करता हूँ। जैसे मैं पुराण-पुरुष हूँ, उसी प्रकार मैं सबके लिये आश्रयदाता भी हूँ। भूत, भविष्य और वर्तमानका उत्पत्तिस्थान मैं हूँ। विप्रवर! तुम जो कुछ देख रहे हो, जो कुछ सुन रहे हो और लोकमें जिसका अनुभव कर रहे हो, उस सबमें मेरा ही स्मरण करो। मार्कण्डेय! पूर्वकालमें मैंने ही विश्वकी सृष्टि की थी और इस समय भी सृष्टिकर्ता मुझे ही समझो। मार्कण्डेय! प्रत्येक युगमें मैं ही सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करता हूँ, अतः तुम इन सबका रहस्य इस प्रकार जानो। यदि तुम मेरे धर्मोंको सुनना चाहते हो तो मेरी कुक्षिमें प्रवेश करके सुखपूर्वक विचरण करो। देवताओं और ऋषियोंके साथ ब्रह्मा मेरे शरीरमें ही विद्यमान हैं। मुझे ही व्यक्त (प्रकट) और अव्यक्त (अप्रकट) योगवाला तथा असुरोंका शत्रु समझो। मैं ही एक अक्षर तथा तीन अक्षरोंवाला तारक मन्त्र हूँ। त्रिवर्गसे परे तथा त्रिवर्गके अभिप्रायको निर्दिष्ट करनेवाला ओंकार मैं ही हूँ। आदि पुराणेश महाबुद्धिमान् भगवान् इस प्रकार कह ही रहे थे कि उन्होंने शीघ्र ही महामुनि मार्कण्डेयको अपने मुखमें समेट लिया। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय भगवान्की कुक्षिमें प्रविष्ट हो गये और उस एकान्त स्थानमें अविनाशी हंसधर्मको सुननेकी इच्छासे सुखपूर्वक विचरण करने लगे। (इतनेमें ही ऐसी ध्वनि सुनायी पड़ी—) मैं ही वह हूँ, जो चन्द्रमा और सूर्यसे रहित महार्णवके जलमें विविध शरीर धारण कर समर्थ होते हुए भी शनैः-शनैः विचरण करता हूँ और हंस नामसे पुकारा जाता हूँ तथा काल-परिवर्तनके समाप्त होनेपर पुनः जगत्की सृष्टि करता हूँ॥ ५९—६७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे सप्तषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६७॥
* अध्याय १६८ * ६९७
एक सौ अड़सठवाँ अध्याय
पञ्चमहाभूतोंका प्राकट्य तथा नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
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| आपवः स विभुर्भूत्वा चारयामास वै तपः।<br>छादयित्वाऽऽत्मनो देहं यादसां कुलसम्भवम्॥ १ | राजन्! तदनन्तर वे सर्वव्यापी नारायण जल-जन्तुओंके कुलमें उत्पन्न अपने शरीरको छिपाकर जलमें निवास करते हुए तपस्यामें संलग्न हो गये। कुछ समयके पश्चात् उन महाबली |
| ततो महात्मातिबलो मतिं लोकस्य सर्जने।<br>महतां पञ्चभूतानां विश्वो विश्वमचिन्तयत्॥ २ | महात्माने जगत्की सृष्टि करनेका विचार किया। तब उन विश्वात्माने पञ्चमहाभूतोंकी समष्टिरूप विश्वका चिन्तन किया। उनके चिन्तन करते समय महासागर वायुरहित |
| तस्य चिन्तयमानस्य निर्वाते संस्थितेऽर्णवे।<br>निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति गह्वरे॥ ३ | होनेके कारण शान्त था। आकाशका विनाश हो गया था, सर्वत्र जल-ही-जल व्याप्त था, उसके गह्वरमें सूक्ष्म जगत् विद्यमान था, उस समय जलके मध्यमें स्थित |
| ईषत् संक्षोभयामास सोऽर्णवं सलिलाश्रयः।<br>अनन्तरोर्मिभिः सूक्ष्ममथ छिद्रमभूत् पुरा॥ ४ | नारायणने उस एकार्णवको थोड़ा संक्षुब्ध कर दिया। तदनन्तर उससे उठी हुई लहरोंसे सर्वप्रथम सूक्ष्म छिद्र प्रकट हुआ। छिद्रसे शब्द-गुणवाला आकाश उत्पन्न हुआ। |
| शब्दं प्रति तदोद्भूतो मारुतश्छिद्रसम्भवः।<br>स लब्ध्वान्तरमक्षोभ्यो व्यवर्धत समीरणः॥ ५ | उस छिद्राकाशसे वायुकी उत्पत्ति हुई। वह दुर्धर्ष पवन अवसर पाकर वृद्धिको प्राप्त हुआ। तब वेगपूर्वक बढ़ते हुए उस बलवान् पवनने महासागरको विक्षुब्ध कर दिया। |
| विवर्धता बलवता वेगाद् विक्षोभितोऽर्णवः।<br>तस्यार्णवस्य क्षुब्धस्य तस्मिन्नम्भसि मन्थिते।<br>कृष्णवर्त्मा समभवत् प्रभुर्वैश्वानरो महान्॥ ६ | उस क्षुब्ध हुए महासागरके जलके मथित होनेपर महान् प्रभावशाली कृष्णवर्त्मा वैश्वानर (अग्नि) प्रकट हुए। तब उस अग्निने अधिकांश जलको सोख लिया। समुद्र- |
| ततः स शोषयामास पावकः सलिलं बहु।<br>क्षयाज्जलनिधेश्चिद्रमभवद्विस्तृतं नभः॥ ७ | जलके संकुचित हो जानेसे वह छिद्र विस्तृत आकाशके रूपमें परिणत हो गया। इस प्रकार अपने तेजसे उत्पन्न |
| आत्मतेजोद्भवाः पुण्या आपोऽमृतरसोपमाः।<br>आकाशं छिद्रसम्भूतं वायुराकाशसम्भवः॥ ८ | हुए एवं अमृत-रसके समान स्वादिष्ट पुण्यमय जल, छिद्रसे उत्पन्न हुए आकाश, आकाशसे प्रकट हुए पवन |
| आभ्यां सङ्घर्षणोद्भूतं पावकं वायुसम्भवम्।<br>दृष्ट्वा प्रीतो महादेवो महाभूतविभावनः॥ ९ | तथा आकाश और पवनके संघर्षसे उद्भूत हुए वायुजनित अग्निको देखकर महाभूतोंको उत्पन्न करनेवाले वे महान् देव प्रसन्न हो गये। तब विविध रूप धारण करनेवाले |
| दृष्ट्वा भूतानि भगवाँल्लोकसृष्ट्यर्थमुत्तमम्।<br>ब्रह्मणो जन्मसहितं बहुरूपो व्यचिन्तयत्॥ १० | भगवान् उन महाभूतोंको उपस्थित देखकर लोककी सृष्टिके लिये ब्रह्माके जन्मसहित अन्यान्य उत्तम साधनोंके विषयमें विशेषरूपसे विचार करने लगे॥ १—१०॥ |
| चतुर्युगाभिसंख्याते सहस्रयुगपर्यये।<br>बहुजन्मविशुद्धात्मा ब्रह्मणोह निरुच्यते॥ ११ | इस प्रकार चारों युगोंकी संख्यासे युक्त एक हजार युग बीत जानेपर बारम्बार जन्म लेनेपर भी जिसका आत्मा विशुद्ध होता है, उसे ब्रह्मा कहा जाता है। |
| यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम्।<br>ज्ञानं दृष्टं तु विश्वार्थे योगिनां याति मुख्यताम्॥ १२ | योगवेत्ता भगवान् भूतलपर जिसे तपस्यासे पवित्र आत्मावाले महर्षियोंके ज्ञान और योगियोंकी मुख्यतासे युक्त देखते |
६९८ * मत्स्यपुराण *
| तं योगवन्तं विज्ञाय सम्पूर्णैश्वर्यमुत्तमम्।<br>पदे ब्रह्माणि विश्वेशं न्ययोजयत योगवित्॥ १३<br><br>ततस्तस्मिन् महातोये महीशो हरिरच्युतः।<br>स्वयं क्रीडंश्च विधिवन्मोदते सर्वलोककृत्॥ १४<br><br>पद्मं नाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवांस्तदा।<br>सहस्रपर्णं विरजं भास्कराभं हिरण्मयम्॥ १५<br><br>हुताशनज्वलितशिखोज्ज्वलप्रभ-<br>मुपस्थितं शरदमलार्कतेजसम्।<br>विराजते कमलमुदारवर्चसं<br>ममात्मनस्तनुरुहचारुदर्शनम् ॥ १६ ॥ | हैं, उसे योगसम्पन्न सम्पूर्ण उत्तम ऐश्वर्योंसे युक्त और विश्वके शासनकी क्षमतासे पूर्ण जानकर ब्रह्माके पदपर नियुक्त कर देते हैं। तत्पश्चात् जो सम्पूर्ण लोकोंके रचयिता, पृथ्वीके स्वामी और अपनी महिमासे कभी भी च्युत होनेवाले नहीं हैं, वे श्रीहरि उस महार्णवके जलमें स्वयं विधिपूर्वक क्रीडा करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं। उस समय वे अपनी नाभिसे एक कमल उत्पन्न करते हैं। उस स्वर्णमय कमलमें एक हजार पत्ते होते हैं। वह परागरहित और सूर्यके समान कान्तिमान् होता है। उस समय अग्निकी जलती हुई शिखाओंकी उज्ज्वल कान्तिके समान देदीप्यमान, शरत्कालीन निर्मल सूर्यके सदृश तेजस्वी, भगवान्की रोमावलि-सरीखे परम दर्शनीय तथा उत्तम कान्तिमान् उस प्रकट हुए कमलकी विशेष शोभा होती है॥११—१६॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे पद्मोद्भवो नामाष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥१६८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसंगमें पद्मोद्भव नामक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१६८॥
एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय
नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव तथा उस कमलका साङ्गोपाङ्ग वर्णन
| मत्स्य उवाच<br>अथ योगवतां श्रेष्ठमसृजद् भूरितेजसम्।<br>स्रष्टारं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम्॥ १<br>यस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहुयोजनविस्तृते।<br>सर्वतेजोगुणमयं पार्थिवैर्लक्षणैर्वृतम्॥ २<br>तच्च पद्मं पुराणज्ञाः पृथिवीरूपमुत्तमम्।<br>नारायणसमुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥ ३<br>या पद्मा सा रसा देवी पृथिवी परिचक्ष्यते।<br>ये पद्मसारगुरवस्तान् दिव्यान् पर्वतान् विदुः॥ ४<br>हिमवन्तं च मेरुं च नीलं निषधमेव च।<br>कैलासं मुञ्जवन्तं च तथान्यं गन्धमादनम्॥ ५<br>पुण्यं त्रिशिखरं चैव कान्तं मन्दरमेव च।<br>उदयं पिञ्जरं चैव विन्ध्यवन्तं च पर्वतम्॥ ६<br>एते देवगणानां च सिद्धानां च महात्मनाम्।<br>आश्रयाः पुण्यशीलानां सर्वकामफलप्रदाः॥ ७ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजर्षे ! तदनन्तर नारायणने अनेकों योजन विस्तारवाले उस स्वर्णमय कमलमें सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करनेवाले ब्रह्माको उत्पन्न किया। वे योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परम तेजस्वी, सब ओर मुखवाले, सभी तेजोमय गुणोंसे युक्त और राजलक्षणोंसे सुशोभित थे। पुराणोंके ज्ञाता महर्षिगण उस कमलको नारायणसे उत्पन्न हुआ उत्तम पृथ्वीरूप बतलाते हैं। जो पद्मा है, वही रसा नामसे विख्यात पृथ्वीदेवी कही जाती है और जो कमलके सार-तत्त्वसे युक्त होनेके कारण भारी अंश हैं, उन्हें दिव्य पर्वत कहा जाता है। इस प्रकार जो हिमवान्, मेरु, नील, निषध, कैलास, मुञ्जवान् तथा दूसरा गन्धमादन, पुण्यमय त्रिशिखर, रमणीय मन्दर, उदयाचल, पिञ्जर तथा विन्ध्यवान् पर्वत हैं—ये सभी देवगणों, सिद्धों और पुण्यशील महात्माओंके निवासस्थान तथा समस्त कामनाओंका फल प्रदान करनेवाले हैं। |
१७२- तारकामय-संग्रामकी भूमिका एवं भगवान् विष्णुका महासमुद्रके रूपमें वर्णन, तारकादि असुरोंके अत्याचारसे दुःखी होकर देवताओंकी भगवान् विष्णुसे प्रार्थना और भगवान्का उन्हें आश्वासन
| * अध्याय १६९ * | ६९९ |
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| एतेषामन्तरे देशो जम्बूद्वीप इति स्मृतः।<br>जम्बूद्वीपस्य संस्थानं यज्ञिया यत्र वै क्रियाः॥ ८<br><br>एभ्यो यत् स्रवते तोयं दिव्यामृतरसोपमम्।<br>दिव्यास्तीर्थशताधाराः सुरम्याः सरितः स्मृताः॥ ९<br><br>स्मृतानि यानि पद्मस्य केसराणि समंततः।<br>असंख्येयाः पृथिव्यास्ते विश्वे वै धातुपर्वताः॥ १०<br><br>यानि पद्मस्य पर्णानि भूरीणि तु नराधिप।<br>ते दुर्गमाः शैलचिता म्लेच्छदेशा विकल्पिताः॥ ११<br><br>यान्यधोभागपर्णानि ते निवासास्तु भागशः।<br>दैत्यानामुरगाणां च पतङ्गानां च पार्थिव॥ १२<br><br>तेषां महार्णवो यत्र तद्रसेत्यभिसंज्ञितम्।<br>महापातककर्माणो मज्जन्ते यत्र मानवाः॥ १३<br><br>पद्मस्यान्तरतो यत्तदेकार्णवगता मही।<br>प्रोक्ताथ दिक्षु सर्वासु चत्वारः सलिलाकराः॥ १४<br><br>एवं नारायणस्यार्थे मही पुष्करसम्भवा।<br>प्रादुर्भावोऽप्ययं तस्मान्नाम्ना पुष्करसंज्ञितः॥ १५<br><br>एतस्मात् कारणात्तज्ज्ञैः पुराणैः परमर्षिभिः।<br>याज्ञिकैर्वेददृष्टान्तैर्यज्ञे पद्मविधिः स्मृतः॥ १६<br><br>एवं भगवता तेन विश्वेषां धारणाविधिः।<br>पर्वतानां नदीनां च ह्रदानां चैव निर्मितः॥ १७<br><br>विभुस्तथैवाप्रतिमप्रभावः<br>प्रभाकराभो वरुणासितद्युतिः।<br>शनैः स्वयम्भूः शयनं सृजत्तदा<br>जगन्मयं पद्मविधिं महार्णवे॥ १८ | इन सभी पर्वतोंके मध्यवर्ती देशको जम्बूद्वीप कहा जाता है। जम्बूद्वीपकी पहचान यह है कि वहाँ सभी यज्ञसम्बन्धिनी क्रियाएँ होती हैं। इन पर्वतोंसे जो दिव्य अमृत-रसके समान सुस्वादु जल प्रवाहित होता है, वह सैकड़ों धाराओंमें विभक्त होकर दिव्य तीर्थ बन जाता है और वे धाराएँ सुरम्य नदियाँ कहलाती हैं॥ १—९॥<br><br>राजन्! उस कमलके चारों ओर जो केसर कहे जाते हैं, वे विश्वमें पृथ्वीके असंख्य धातुपर्वत हैं। उस कमलमें जो बहुसंख्यक पत्ते हैं, वे म्लेच्छोंके देश कहे जाते हैं, जो पर्वतोंसे व्याप्त होनेके कारण दुर्गम हैं। भूपाल! उस कमलमें जो निचले भागमें पत्ते हैं, वे विभागपूर्वक दैत्यों, नागों और कीट-पतङ्गोंके निवासस्थान हैं। इन सबका जहाँ महासागर है, उसे 'रसा' नामसे पुकारा जाता है। वहीं महान् पाप करनेवाले मानव डूबते-उतराते रहते हैं। उस कमलके अन्तर्गत जो ठोस भाग दीखता है, वही एकार्णवमें डूबी हुई पृथ्वी कही गयी है। उसकी सभी दिशाओंमें जलसे भरे हुए चार महासागर हैं। इस प्रकार नारायणकी कार्य-सिद्धिके लिये पृथ्वी कमलसे उद्भूत हुई है। इसी कारण यह प्रादुर्भाव भी पुष्कर नामसे कहा जाता है। इसी कारण उस वृत्तान्तको जाननेवाले प्राचीन याज्ञिक महर्षियोंने वेदके दृष्टान्तोंद्वारा यज्ञमें कमलकी रचनाका विधान बतलाया है। इस प्रकार उन भगवान्ने सम्पूर्ण पर्वतों, नदियों और जलाशयोंकी धारणाकी विधिका निर्माण किया है। तदुपरान्त जो अनुपम प्रभावशाली, सूर्य-सरीखे द्युतिमान् और वरुणकी-सी कृष्ण कान्तिवाले हैं, वे सर्वव्यापी स्वयम्भू भगवान् उस महार्णवमें जगन्मय कमलका विधान करके पुनः पूर्ववत् शयन करने लगे॥ १०—१८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६९॥
७०० * मत्स्यपुराण *
एक सौ सत्तरवाँ अध्याय
मधु-कैटभकी उत्पत्ति, उनका ब्रह्माके साथ वार्तालाप और भगवान्द्वारा वध
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! भगवान्के योगनिद्राके वशीभूत हो शयन करते समय मधु नामका महान् असुर उत्पन्न हुआ, जो ब्रह्माजीकी तपस्यामें विघ्नस्वरूप था। तत्पश्चात् उसीके साथ रजोगुणसे युक्त कैटभ भी उत्पन्न हुआ। रजोगुण और तमोगुणसे युक्त एवं विघ्नस्वरूप उत्पन्न हुए वे दोनों महाबली तामसी असुर एकार्णवके जलमें सम्पूर्ण जगत्को क्षुब्ध कर रहे थे। वे लाल रंगका दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे, उनकी श्वेत वर्णकी दाढ़ोंके अग्रभाग चमक रहे थे, वे उद्दीप्त किरीट और कुण्डल तथा उज्ज्वल केयूर और कंकणसे विभूषित थे, उनके लाल रंगके विशाल नेत्र खुले हुए थे, उनकी छाती मोटी और भुजाएँ लम्बी थीं, उनका शरीर विशाल पर्वतके समान था, वे चलते हुए पर्वत-जैसा जान पड़ते थे, उनकी शरीर-कान्ति नूतन मेघ-जैसी थी, उनका मुख सूर्यके समान प्रकाशमान था, वे बिजलीकी तरह चमक रहे थे और हाथमें गदा धारण करनेके कारण अत्यन्त भयानक दीख रहे थे, चलते समय वे पैरोंको इस प्रकार रख रहे थे मानो समुद्रको उछाल रहे हों और शयन करते हुए भगवान् मधुसूदनको कम्पित-सा कर रहे थे। इस प्रकार वहाँ विचरण करते हुए उन दोनोंने कमलपर उद्भासित होते हुए चारों ओर मुखवाले योगियोंमें श्रेष्ठ ब्रह्माके निकट पहुँचकर उन्हें नारायणकी आज्ञासे मानसिक संकल्पद्वारा समस्त प्रजाओं, सम्पूर्ण देवताओं, असुरों और ऋषियोंकी सृष्टि करते हुए देखा। वे दोनों असुरश्रेष्ठ अपनी कान्तिसे उद्दीप्त, क्रोधसे परिपूर्ण और आसन्नमृत्यु थे, उनके नेत्र क्रोधसे व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने ब्रह्मासे पूछा—'श्वेत रंगकी पगड़ी बाँधे, चार भुजाधारी एवं कमलके मध्यमें स्थित तुम कौन हो? तुम मोहवश नियम धारणकर यहाँ शान्तचित्त होकर क्यों बैठे हो? कमलजन्मा! तुम यहाँ आओ और हम दोनोंके साथ युद्ध करो। हम दोनों सामर्थ्यशालियोंके अतिरिक्त तुम इस महासागरमें स्थित नहीं रह सकते। तुम्हें उत्पन्न करनेवाला कौन है? तुम किसके द्वारा इस काममें नियुक्त किये गये हो? तुम्हारी सृष्टि करनेवाला कौन है? तुम्हारा रक्षक कौन है? तुम किस नामसे पुकारे जाते हो?'॥ १—१२॥ |
|---|---|
| विघ्नस्तपसि सम्भूतो मधुर्नाम महासुरः।<br>तेनैव च सहोद्भूतो रजसा कैटभस्ततः॥ १॥<br><br>तौ रजस्तमसौ विघ्नसंभूतौ तामसौ गणौ।<br>एकार्णवे जगत् सर्वं क्षोभयन्तौ महाबलौ॥ २॥<br><br>दिव्यरक्ताम्बरधरौ श्वेतदीप्ताग्रदंष्ट्रिणौ।<br>किरीटकुण्डलोदग्रौ केयूरवलयोज्ज्वलौ॥ ३॥<br><br>महाविवृतताम्राक्षौ पीनोरस्कौ महाभुजौ।<br>महागिरेः संहननौ जङ्गमाविव पर्वतौ॥ ४॥<br><br>नवमेघप्रतीकाशावादित्यसदृशाननौ ।<br>विद्युदाभौ गदाग्राभ्यां कराभ्यामतिभीषणौ॥ ५॥<br><br>तौ पादयोस्तु विन्यासादुत्क्षिपन्ताविषार्णवम्।<br>कम्पयन्ताविव हरिं शयानं मधुसूदनम्॥ ६॥<br><br>तौ तत्र विचरन्तौ स्म पुष्करे विश्वतोमुखम्।<br>योगिनां श्रेष्ठमासाद्य दीप्तं ददृशतुस्तदा॥ ७॥<br><br>नारायणसमाज्ञातं सृजन्तमखिलाः प्रजाः।<br>दैवतानि च विश्वानि मानसान्सुरानृषीन्॥ ८॥<br><br>ततस्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणमसुरोत्तमौ।<br>दीप्तौ मुमूर्षू संक्रुद्धौ रोषव्याकुलितेक्षणौ॥ ९॥<br><br>कस्त्वं पुष्करमध्यस्थः सितोष्णीषश्चतुर्भुजः।<br>आधाय नियमं मोहादास्से त्वं विगतज्वरः॥ १०॥<br><br>एह्यागच्छावयोर्युद्धं देहि त्वं कमलोद्भव।<br>आवाभ्यां परमीशाभ्यामशक्तस्त्वमिहार्णवे॥ ११॥<br><br>तत्र कश्चौद्भवस्तुभ्यं केन वासि नियोजितः।<br>कः स्रष्टा कश्च ते गोप्ता केन नाम्ना विधीयसे॥ १२॥ |
| * अध्याय १७० * | ७०१ |
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| ब्रह्मोवाच<br>एक इत्युच्यते लोकैरविचिन्त्यः सहस्रदृक् ।<br>तत्संयोगेन भवतोः कर्म नामावगच्छताम् ॥ १३ | ब्रह्माने कहा— जो ध्यानसे परे एवं हजारों नेत्रोंवाला है, उस परम पुरुषको तो लोग अद्वितीय बतलाते हैं, (परंतु तुम दोनों कौन हो?) अतः मैं तुम दोनोंके नाम और कर्मको जानना चाहता हूँ॥ १३॥ | | मधुकैटभावूचतुः<br>नावयोः परमं लोके किञ्चिदस्ति महामते ।<br>आवाभ्यां छाद्यते विश्वं तमसा रजसाथ वै ॥ १४<br>रजस्तमोमयावावामृषीणामवलङ्घितौ ।<br>छाद्यमानौ धर्मशीलौ दुस्तरौ सर्वदेहिनाम् ॥ १५<br>आवाभ्यामुह्यते लोको दुष्कराभ्यां युगे युगे ।<br>आवामर्थश्च कामश्च यज्ञः स्वर्गपरिग्रहः ॥ १६<br>सुखं यत्र मुदा युक्तं यत्र श्रीः कीर्तिरेव च ।<br>येषां यत्काङ्क्षितं चैव तत्तदावां विचिन्तय ॥ १७ | मधु-कैटभ बोले— महामते! जगत्में हम दोनोंसे उत्कृष्ट कुछ भी नहीं है। हमीं दोनोंने तमोगुण और रजोगुणद्वारा विश्वको आच्छादित कर रखा है। रजोगुण और तमोगुणसे व्याप्त होनेके कारण हम दोनों ऋषियोंके लिये अलङ्घनीय हैं। धर्म और शील-स्वभावका आच्छादन करनेवाले हम दोनों समस्त देहधारियोंके लिये अजेय हैं। प्रत्येक युगमें दुष्कर कर्म करनेवाले हमीं दोनों लोकका वहन करते हैं। अर्थ, काम, यज्ञ, स्वर्गसंकलन—यह सब हम दोनोंके लिये ही हैं। जहाँ जो कुछ प्रसन्नतायुक्त सुख, लक्ष्मी और कीर्ति है तथा प्राणियोंके जो मनोरथ हैं, उनके रूपमें हमीं दोनोंको जानना चाहिये॥ १४—१७॥ | | ब्रह्मोवाच<br>यत्नाद्योगवतो दृष्ट्या योगः पूर्वं मयार्जितः ।<br>तं समाधाय गुणवत्सत्त्वं चास्मि समाश्रितः ॥ १८<br>यः परो योगमतिमान् योगाख्यः सत्त्वमेव च ।<br>रजसस्तमसश्चैव यः स्रष्टा विश्वसम्भवः ॥ १९<br>ततो भूतानि जायन्ते सात्त्विकानीतराणि च ।<br>स एव हि युवां नाशे वशी देवो हनिष्यति ॥ २० | ब्रह्माने कहा— पूर्वकालमें मैंने यत्नपूर्वक योगदृष्टिद्वारा योगका उपार्जन किया था, उसी गुणशाली योगको धारण करके मैं सत्त्वगुणसे युक्त हो सका हूँ। जो परात्पर, योगकी बुद्धिसे युक्त, ‘योग’ नामवाले, सत्त्वगुणस्वरूप, रजोगुण और तमोगुणके रचयिता तथा विश्वको उत्पन्न करनेवाले हैं, जिनसे सात्त्विक, राजसिक और तामसिक प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है, वे ही देव तुम दोनोंका विनाश करनेमें समर्थ हैं, अतः वे ही तुम दोनोंका वध करेंगे॥ १८—२०॥ | | स्वपन्नेव ततः श्रीमान् बहुयोजनविस्तृतम् ।<br>बाहुं नारायणो ब्रह्मन् कृतवानात्ममायया ॥ २१<br>कृष्यमाणौ ततस्तस्य बाहुना बाहुशालिनः ।<br>चेरतुस्तौ विगलितौ शकुनाविव पीवरौ ॥ २२<br>ततस्तावाहुतुर्गत्वा तदा देवं सनातनम् ।<br>पद्मनाभं हृषीकेशं प्रणिपत्य स्थितावुभौ ॥ २३<br>जानीवस्त्वां विश्वयोनिं त्वामेकं पुरुषोत्तमम् ।<br>त्वमावां पाहि हेत्वर्थमिदं नौ बुद्धिकारणम् ॥ २४<br>अमोघदर्शनः स त्वं यतस्त्वां विद्मःशाश्वतम् ।<br>ततस्त्वामागतावावामभितः प्रसमीक्षितुम् ॥ २५ | ठीक उसी अवसरपर परब्रह्म श्रीमान् नारायणने शयन करते हुए ही अपनी मायासे अपने बाहुको अनेकों योजनके विस्तारवाला बना लिया। तब दीर्घ बाहुवाले भगवान्की उस भुजासे खींचे जाते हुए वे दोनों दैत्य स्थानसे भ्रष्ट होकर दो मोटे पक्षियोंकी भाँति घूमने लगे। इस प्रकार खिंचते हुए वे दोनों असुर अविनाशी पद्मनाभ हृषीकेशके निकट जा पहुँचे और उन्हें नमस्कार कर सामने खड़े हो गये और इस प्रकार बोले—‘देव! हम दोनों आपको विश्वका उत्पादक, अद्वितीय और पुरुषोत्तम जानते हैं। आप हम दोनोंकी रक्षा करें। हमलोगोंकी ऐसी बुद्धिका कारण किसी प्रयोजनकी सिद्धिके लिये है। आपका दर्शन अमोघ होता है। इसीलिये हम दोनों आपको अविनाशी मानते हैं। देव! इसी कारण हम दोनों |
| ७०२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तदिच्छावो वरं देव त्वत्तोऽद्भुतमरिन्दम।<br>अमोघदर्शनोऽसि त्वं नमस्ते समितिञ्जय॥ २६<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>किमर्थं हि द्रुतं ब्रूतं वरं ह्यसुरसत्तमौ।<br>दत्तायुष्कौ पुनर्भूयो रहो जीवितुमिच्छथः॥ २७<br><br>मधुकैटभावूचतुः<br>यस्मिन्न कश्चिन्मृत्यवान् देव तस्मिन् प्रभो वधम्।<br>तमिच्छावो वधश्चैव त्वत्तो नोऽस्तु महाव्रत॥ २८<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>बाढं युवां तु प्रवरौ भविष्यत्कालसम्भवे।<br>भविष्यतो न संदेहः सत्यमेतद् ब्रवीमि वाम्॥ २९<br>वरं प्रदायाथ महासुराभ्यां<br>सनातनो विश्ववरः सुरोत्तमः।<br>रजस्तमोवर्गभवायनौ यमौ<br>ममन्थ तावूरुतलेन वै प्रभुः॥ ३० | आपका दर्शन करनेके लिये यहाँ आये हैं। शत्रुसूदन! हम दोनों आपसे अद्भुत वर प्राप्त करना चाहते हैं। युद्धविजयी देव! आप अमोघदर्शन हैं, अर्थात् आपका दर्शन निष्फल नहीं होता। आपको नमस्कार है'॥ २१-२६॥<br><br>श्रीभगवान्ने कहा—श्रेष्ठ असुरो! तुमलोगोंकी क्या अभिलाषा है? शीघ्र वर माँगो। तुमलोगोंने अपनी आयु तो दे दी है, अब तुमलोग पुनः एकान्तमें कैसे जीवित रहना चाहते हो?॥ २७॥<br><br>मधु-कैटभ बोले—सामर्थ्यशाली देव! जिस स्थानपर कोई भी न मरा हो, वहाँ हम अपनी मृत्यु चाहते हैं। साथ ही महाव्रत! हमारी वह मृत्यु आपके हाथों होनी चाहिये॥ २८॥<br><br>श्रीभगवान्ने कहा—ठीक है, भविष्यकालमें तुम दोनों असुरोंमें श्रेष्ठ होकर उत्पन्न होओगे, इसमें संदेह नहीं है। यह मैं तुम दोनोंसे सत्य कह रहा हूँ। इस प्रकार विश्वमें श्रेष्ठ सनातन सुरवर भगवान्ने उन दोनों महान् असुरोंको वर प्रदान करनेके पश्चात् रजोगुण और तमोगुणके उत्पत्तिस्थानस्वरूप उन दोनों असुरोंको अपनी जाँघपर सुलाकर उनका कचूमर निकाल लिया॥ २९-३०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ सत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७०॥
एक सौ एकहत्तरवाँ अध्याय
ब्रह्माके मानस पुत्रोंकी उत्पत्ति, दक्षकी बारह कन्याओंका वृत्तान्त, ब्रह्माद्वारा सृष्टिका विकास तथा विविध देवयोनियोंकी उत्पत्ति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br>स्थित्वा च तस्मिन् कमले ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।<br>ऊर्ध्वबाहुर्महातेजास्तपो घोरं समाश्रितः॥ १<br><br>प्रज्वलन्निव तेजोभिर्भाभिः स्वाभिस्तमोनुदः।<br>बभासे सर्वधर्मस्थः सहस्त्रांशुरिवांशुभिः॥ २<br><br>अथान्यद् रूपमास्थाय शम्भुर्नारायणोऽव्ययः।<br>आजगाम महातेजा योगाचार्यो महायशाः॥ ३<br><br>सांख्याचार्यो हि मतिमान् कपिलो ब्राह्मणो वरः।<br>उभावपि महात्मानौ स्तुवन्तौ क्षेत्रतत्परौ॥ ४ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महान् तेजस्वी ब्रह्मा उस कमलपर स्थित होकर हाथोंको ऊपर उठाये हुए घोर तपस्यामें संलग्न हो गये। उस समय सम्पूर्ण धर्मोंके निवासस्थान ब्रह्मा अपने तेज और अपनी कान्तिसे प्रज्वलित होते हुए-से अन्धकारका विनाश कर रहे थे और अपनी किरणोंसे प्रकाशित सूर्यकी तरह उद्भासित हो रहे थे। तदनन्तर जो जगत्का कल्याण करनेवाले अविनाशी महान् यशस्वी एवं योगके आचार्य हैं, वे महान् तेजस्वी नारायण दूसरा रूप धारण कर वहाँ आये। साथ ही ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ सांख्याचार्य बुद्धिमान् |
१७३- दैत्यों और दानवोंकी युद्धार्थ तैयारी
| * अध्याय १७१ * | ७०३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तौ प्राप्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणममितौजसम्।<br>परावरविशेषज्ञौ पूजितौ च महर्षिभिः॥ ५<br><br>ब्रह्मात्मदृढबन्धश्च विशालो जगदास्थितः।<br>ग्रामणीः सर्वभूतानां ब्रह्मा त्रैलोक्यपूजितः॥ ६<br><br>तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्माभ्याहतयोगवित्।<br>त्रीनिमान् कृतवाँल्लोकान् यथेयं ब्रह्मणः श्रुतिः॥ ७<br><br>पुत्रं च शम्भवे चैकं समुत्पादितवान् ऋषिः।<br>तस्याग्रे वाग्यतस्तस्थौ ब्रह्माणमजमव्ययम्॥ ८<br><br>सोत्पन्नमात्रो ब्रह्माणमुक्तवान् मानसः सुतः।<br>किं कुर्मस्तव साहाय्यं ब्रवीतु भगवान् ऋषिः॥ ९ | कपिलजी भी उपस्थित हुए। वे दोनों महात्मा परावरके विशेषज्ञ, महर्षियोंद्वारा पूजित और अपने-अपने मार्गमें तत्पर रहनेवाले थे। वे वहाँ पहुँचकर अमित तेजस्वी ब्रह्माकी प्रशंसा करते हुए बोले—'सर्वश्रेष्ठ', जगत्के रचयिता, त्रिलोकीद्वारा पूजित, सभी प्राणियोंके नायक ब्रह्मा अपने सुदृढ़ आसनपर विराजमान हैं।' उन दोनोंकी वह बात सुनकर पूर्वकथित योगके ज्ञाता ब्रह्माने इन तीन लोकोंकी रचना की, ब्रह्माके विषयमें यह श्रुति प्रसिद्ध है। उस समय ऋषिश्रेष्ठ ब्रह्माने जगत्के कल्याणके लिये एक पुत्र उत्पन्न किया। ब्रह्माका वह मानस पुत्र उत्पन्न होते ही उनके समक्ष चुपचाप खड़ा हो गया और फिर उन अजन्मा अविनाशी ब्रह्मासे इस प्रकार बोला—'आप ऐश्वर्यशाली ऋषि बतलावें कि मैं आपकी कौन-सी सहायता करूँ?'॥ १—९॥ |
| ब्रह्मोवाच<br><br>य एष कपिलो ब्रह्म नारायणमयस्तथा।<br>वदते भवतस्तत्त्वं तत्कुरुष्व महामते॥ १०<br><br>ब्रह्मणस्तु तदर्थं तु तदा भूयः समुत्थितः।<br>शुश्रूषुरस्मि युवयोः किं करोमि कृताञ्जलिः॥ ११ | ब्रह्माने कहा—महामते! ये जो महर्षि कपिल और नारायणस्वरूप ब्रह्म सामने उपस्थित हैं, ये दोनों तुमसे जिस तत्त्वका वर्णन करें, तुम वैसा ही करो। ब्रह्माके उस अभिप्रायको जानकर वह पुनः उठ खड़ा हुआ और उनके समक्ष जाकर हाथ जोड़कर बोला—'मैं आपलोगोंका आदेश सुनना चाहता हूँ, कहिये क्या करूँ?'॥ १०-११॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br><br>यत्सत्यमक्षरं ब्रह्म ह्यष्टादशविधं तु तत्।<br>यत्सत्यं यदृतं तत्तु परं पदमनुस्मर॥ १२<br><br>एतद्वचो निशम्यैव ययौ स दिशमुत्तराम्।<br>गत्वा च तत्र ब्रह्मत्वमगमज्ज्ञानतेजसा॥ १३<br><br>ततो ब्रह्मा भुवं नाम द्वितीयमसृजत् प्रभुः।<br>संकल्पयित्वा मनसा तमेव च महामनाः॥ १४<br><br>ततः सोऽथाब्रवीद् वाक्यं किं करोमि पितामह।<br>पितामहसमाज्ञातो ब्रह्माणं समुपस्थितः॥ १५<br><br>ब्रह्माभ्यासं तु कृतवान् भुवश्च पृथिवीं गतः।<br>प्राप्तं च परमं स्थानं स तयोः पार्श्वमागतः॥ १६<br><br>तस्मिन्नपि गते पुत्रे तृतीयमसृजत् प्रभुः।<br>सांख्यप्रवृत्तिकुशलं भूर्भुवं नामतो विभुम्॥ १७<br><br>गोपतित्वं समासाद्य तयोरेवागमद् गतिम्।<br>एवं पुत्रास्त्रयोऽप्येत उक्ताः शम्भोर्महात्मनः॥ १८ | श्रीभगवान् बोले—ब्रह्मन्! जो सत्य और अविनाशी ब्रह्म है, वह अठारह प्रकारका है। जो सत्य है, जो ऋत है, वही परम पद है। तुम उसका अनुस्मरण करो। ऐसी बात सुनते ही वह उत्तर दिशाकी ओर चला गया और वहाँ जाकर उसने अपने ज्ञानके तेजसे ब्रह्मत्वको प्राप्त कर लिया। तत्पश्चात् महामना एवं सामर्थ्यशाली ब्रह्माने मानसिक संकल्पद्वारा 'भुव' नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि की। तब उसने भी ब्रह्माके समक्ष खड़ा होकर इस प्रकार कहा—'पितामह! मैं कौन-सा कार्य करूँ?' फिर ब्रह्माकी आज्ञासे वह ब्रह्मके निकट गया। तदुपरान्त 'भुव' ने भूतलपर आकर ब्रह्मका अभ्यास किया और ब्रह्म एवं महर्षि कपिलके पास आकर परम पदको प्राप्त कर लिया। उस पुत्रके भी चले जानेपर भगवान् ब्रह्माने 'भूर्भुव' नामक तीसरे पुत्रको प्रकट किया, जो सर्वव्यापी और सांख्यशास्त्रमें परम प्रवीण था। यह भी इन्द्रियजयी होकर उन दोनों भाइयोंकी गतिको प्राप्त हो गया। इस प्रकार कल्याणकारी महात्मा ब्रह्माके ये तीनों पुत्र कहे गये हैं। |
७०४ * मत्स्यपुराण *
| तान् गृहीत्वा सुतांस्तस्य प्रयातः स्वार्जितां गतिम्।<br>नारायणश्च भगवान् कपिलश्च यतीश्वरः॥ १९ | तदनन्तर भगवान् नारायण और यतीश्वर कपिल ब्रह्माके उन तीनों पुत्रोंको साथ लेकर अपने तपद्वारा उपार्जित गतिको प्राप्त हो गये॥ १२-१९॥ |
| यं कालं तौ गतौ मुक्तौ ब्रह्मा तं कालमेव हि।<br>ततो घोरतमं भूयः संश्रितः परमं व्रतम्॥ २०<br>न रेमेऽथ ततो ब्रह्मा प्रभुरेकस्तपश्चरन्।<br>शरीरात्तां ततो भार्यां समुत्पादितवाञ्छुभाम्॥ २१<br>तपसा तेजसा चैव वर्चसा नियमेन च।<br>सदृशीमात्मनो देवीं समर्थां लोकसर्जने॥ २२<br>तया समाहितस्तत्र रेमे ब्रह्मा तपश्चरन्।<br>ततो जगाद त्रिपदां गायत्रीं वेदपूजिताम्॥ २३<br>सृजन् प्रजानां पतयः सागरांश्चासृजद् विभुः।<br>अपरांश्चैव चतुरो वेदान् गायत्रिसम्भवान्॥ २४<br>आत्मनः सदृशान् पुत्रानसृजद् वै पितामहः।<br>विश्वे प्रजानां पतयो येभ्यो लोका विनिःसृताः॥ २५<br>विश्वेशं प्रथमं तावन्महातापसमात्मजम्।<br>सर्वमन्त्रहितं पुण्यं नाम्ना धर्मं स सृष्टवान्॥ २६<br>दक्षं मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमङ्गिरसं मनुम्॥ २७<br>अथैवाद्भुतमित्येते ज्ञेयाः पैतामहर्षयः।<br>त्रयोदशगुणं धर्ममालभन्त महर्षयः॥ २८ | इधर जिस समय वे दोनों मुक्त पुरुष चले गये, उसी समयसे ब्रह्मा पुनः अत्यन्त कठोर परम व्रतके पालनमें संलग्न हो गये। जब सामर्थ्यशाली ब्रह्माको अकेले तपस्या करते हुए आनन्दका अनुभव नहीं हुआ, तब उन्होंने अपने शरीरसे एक ऐसी सुन्दरी भार्याको उत्पन्न किया, जो तपस्या, तेज, ओजस्विता और नियमपालनमें उन्हींके समान थी। वह देवी लोककी सृष्टि करनेमें भी समर्थ थी। उससे युक्त होकर वहाँ तपस्या करते हुए ब्रह्माको संतोषका अनुभव हुआ, तब उन्होंने वेदपूजित त्रिपदा गायत्रीका उच्चारण किया। तत्पश्चात् सर्वव्यापी ब्रह्माने प्रजापतियोंकी सृष्टि करते हुए सागरोंकी तथा गायत्रीसे उत्पन्न होनेवाले अन्य चारों वेदोंकी रचना की। फिर ब्रह्माने अपने ही सदृश पुत्रोंको उत्पन्न किया, जो विश्वमें प्रजापतिके नामसे विख्यात हुए और जिनसे सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुईं। सर्वप्रथम उन्होंने अपने धर्म नामक पुत्रको प्रकट किया, जो विश्वके ईश्वर, महान् तपस्वी, सम्पूर्ण मन्त्रोंद्वारा अभिरक्षित और परम पावन थे। तदुपरान्त उन्होंने दक्ष, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, गौतम, भृगु, अङ्गिरा और मनुको उत्पन्न किया।* ब्रह्माके पुत्रभूत इन महर्षियोंको अत्यन्त अद्भुत जानना चाहिये। इन्हीं महर्षियोंने तेरह प्रकारके गुणोंसे युक्त धर्मका प्रतिपादन एवं अनुसरण किया॥ २०-२८॥ |
| अदितिर्दितिर्दनुः काला अनायुः सिंहिका मुनिः।<br>ताम्रा क्रोधाथ सुरसा विनता कद्रूरेव च॥ २९<br>दक्षस्यापत्यमेता वै कन्या द्वादश पार्थिव।<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तपसा निर्मितः किल॥ ३०<br>तस्मै कन्या द्वादशान्या दक्षस्ताः प्रददौ तदा।<br>नक्षत्राणि च सोमाय तदा वै दत्तवान् ऋषिः॥ ३१<br>रोहिण्यादीनि सर्वाणि पुण्यानि रविनन्दन।<br>लक्ष्मीर्मरुत्वती साध्या विश्वेशा च मता शुभा॥ ३२<br>देवी सरस्वती चैव ब्रह्मणा निर्मिताः पुरा।<br>एताः पञ्च वरिष्ठा वै सुरश्रेष्ठाय पार्थिव॥ ३३ | राजन्! अदिति, दिति, दनु, काला, अनायु, सिंहिका, मुनि, ताम्रा, क्रोधा, सुरसा, विनता और कद्रू—ये बारह कन्याएँ दक्ष प्रजापतिकी संतान हैं। कश्यप महर्षि मरीचिके पुत्र थे, जो पिताकी तपस्याके प्रभावसे उत्पन्न हुए थे। उस समय दक्षने कश्यपको अपनी उन बारह कन्याओंको पत्नीरूपमें प्रदान किया था। रविनन्दन! उसी समय ऋषिवर ब्रह्माने नक्षत्रसंज्ञक रोहिणी आदि सभी पुण्यमयी कन्याओंको चन्द्रमाके हाथोंमें सौंप दिया। लक्ष्मी, मरुत्वती, साध्या, शुभा, विश्वेशा और सरस्वती देवी—ये पूर्वकालमें ब्रह्माद्वारा निर्मित हुई थीं। राजन्! कर्मपर दृष्टि रखनेवाले ब्रह्माने इन पाँचों सर्वश्रेष्ठ कन्याओंको मङ्गलकारक सुरश्रेष्ठ धर्मको समर्पित कर दिया। |
* यह विषय प्रजापतिसर्गनिरूपण नामक पहलेके अध्यायोंमें भी वर्णित हुआ है।
१७४- देवताओंका युद्धार्थ अभियान
| * अध्याय १७१ * | ७०५ |
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| दत्ता भद्राय धर्माय ब्रह्मणा दृष्टकर्मणा।<br>या तु रूपवती पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी॥ ३४<br>सुरभिः सा हिता भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता।<br>ततस्तामगमद् ब्रह्मा मैथुनं लोकपूजितः॥ ३५<br>लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय सत्तमः।<br>जज्ञिरे च सुतास्तस्यां विपुला धूमसन्निभाः॥ ३६<br>नक्तंसन्ध्याभ्रसङ्काशा प्रादहंस्तिग्मतेजसः।<br>ते रुदन्तो द्रवन्तश्च गर्हयन्तः पितामहम्॥ ३७<br>रोदनाद् द्रवणाच्चैव रुद्रा इति ततः स्मृताः।<br>निर्ऋतिश्चैव शम्भुवैं तृतीयश्चापराजितः॥ ३८<br>मृगव्याधः कपर्दी च दहनोऽथेश्वरश्च वै।<br>अहिर्बुध्न्यश्च भगवान् कपाली चापि पिङ्गलः॥ ३९<br>सेनानीश्च महातेजा रुद्रास्त्वेकादश स्मृताः।<br>तस्यामेव सुरभ्यां च गावो यज्ञेश्वराश्च वै॥ ४०<br>प्रकृष्टाश्च तथा मायाः सुरभ्याः पशवोऽक्षराः।<br>अजाश्चैव तु हंसाश्च तथैवामृतमुत्तमम्॥ ४१<br>ओषध्यः प्रवरायाश्च सुरभ्यास्ताः समुत्थिताः।<br>धर्माल्लक्ष्मीस्तथा कामं साध्या साध्यान् व्यजायत॥ ४२<br>भवं च प्रभवं चैव हीशं चासुरहं तथा।<br>अरुणं चारुणिं चैव विश्वावसुबलध्रुवान्॥ ४३<br>हविष्यं च वितानं च विधानशमितावपि।<br>वत्सरं चैव भूतिं च सर्वासुरनिषूदनम्॥ ४४<br>सुपर्वाणं बृहत्कान्तिः साध्या लोकनमस्कृता।<br>तमेवानुगता देवी जनयामास वै सुरान्॥ ४५<br>वरं वै प्रथमं दैवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम्।<br>विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थं सोममीश्वरम्॥ ४६<br>ततोऽनुरूपमायं च यमस्तस्मादनन्तरम्।<br>सप्तमं च तथा वायुमष्टमं निर्ऋतं वसुम्॥ ४७<br>धर्मस्यापत्यमेतद् वै सुदेव्यां समजायत।<br>विश्वे देवाश्च विश्वायां धर्माज्जाता इति श्रुतिः॥ ४८<br>दक्षश्चैव महाबाहुः पुष्करस्वन एव च।<br>चाक्षुषस्तु मनुश्चैव तथा मधुमहोरगौ॥ ४९<br>विश्रान्तकवपुर्बालो विष्कम्भश्च महायशाः।<br>गरुडश्चातिसत्त्वौजा भास्करप्रतिमद्युतिः॥ ५०<br>विश्वान् देवान् देवमाता विश्वेशाजनयत् सुतान्। | इसी बीच ब्रह्माकी स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एवं हितकारिणी सुन्दरी पत्नी सुरभिका रूप धारण कर ब्रह्माके निकट उपस्थित हुई। तब लोक-सृष्टिके कारणोंके ज्ञाता लोकपूजित देवश्रेष्ठ ब्रह्माने गौओंकी उत्पत्तिके निमित्त उसके साथ मानसिक समागम किया। उससे धूमकी-सी कान्तिवाले विशालकाय पुत्र उत्पन्न हुए। उनका वर्ण रात्रि और संध्याके संयोगकालमें छाये हुए बादलोंके समान था। वे अपने प्रचण्ड तेजसे सबको जला रहे थे और ब्रह्माकी निन्दा करते हुए रोते-से वे इधर-उधर दौड़ रहे थे। इस प्रकार रोने और दौड़नेके कारण वे 'रुद्र' कहे जाते हैं। निर्ऋति, शम्भु, तीसरे अपराजित, मृगव्याध, कपर्दी, दहन, ईश्वर, अहिर्बुध्न्य, भगवान् कपाली, पिंगल और महातेजस्वी सेनानी—ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं॥ २९-३९ १/२॥<br><br>तदनन्तर उसी श्रेष्ठ सुरभिसे यज्ञकी साधनभूता गौएँ, प्रकृष्ट माया, अविनाशी पशुगण, बकरियाँ, हंस, उत्तम अमृत और ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। धर्मके संयोगसे लक्ष्मीने कामको और साध्याने साध्यगणोंको जन्म दिया। भव, प्रभव, ईश, असुरहन्ता, अरुण, आरुणि, विश्वावसु, बल, ध्रुव, हविष्य, वितान, विधान, शमित, वत्सर, सम्पूर्ण असुरोंके विनाशक भूति और सुपर्वा—इन देवताओंको लोकनमस्कृता परम सुन्दरी साध्यादेवीने धर्मके संयोगसे जन्म दिया। इसी प्रकार प्रथम वर, दूसरे अविनाशी ध्रुव, तीसरे विश्वावसु, चौथे ऐश्वर्यशाली सोम, पाँचवें अनुरूपमाय, तदनन्तर छठे यम, सातवें वायु और आठवें वसु निर्ऋति—ये सभी धर्मके पुत्र सुदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। धर्मके संयोगसे विश्वाके गर्भसे विश्वेदेवोंकी उत्पत्ति हुई है—ऐसा सुना जाता है। महाबाहु दक्ष, पुष्करस्वन, चाक्षुष मनु, मधु, महोरग, विश्रान्तकवपु, बाल, महायशस्वी विष्कम्भ और सूर्यकी-सी कान्तिवाले अत्यन्त पराक्रमी एवं तेजस्वी गरुड—इन विश्वेदेवोंको देवमाता विश्वेशाने पुत्ररूपमें जन्म दिया॥ ४०—५० १/२॥ |
७०६ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| मरुत्वती मरुत्वतो देवानजनयत् सुतान्॥ ५१<br>अग्निं चक्षुं रविर्ज्योतिः सावित्रं मित्रमेव च।<br>अमरं शरवृष्टिं च सुकर्षं च महाभुजम्॥ ५२<br>विराजं चैव वाचं च विश्वावसुमतिं तथा।<br>अश्वमित्रं चित्ररश्मिं तथा निषधनं नृप॥ ५३<br>ह्वन्तं वाडवं चैव चारित्रं मन्दपन्नगम्।<br>बृहन्तं वै बृहद्रूपं तथा वै पूतनानुगम्॥ ५४<br>मरुत्वती पुरा जज्ञे एतान् वै मरुतां गणान्।<br>अदितिः कश्यपाज्जज्ञ आदित्यान् द्वादशैव हि॥ ५५<br>इन्द्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणो हार्यमा रविः।<br>पूषा मित्रश्च धनदो धाता पर्जन्य एव च॥ ५६<br>इत्येते द्वादशादित्या वरिष्ठास्त्रिदिवौकसः।<br>आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञाते द्वौ सुतौ वरौ॥ ५७<br>तपःश्रेष्ठौ गुणिश्रेष्ठौ त्रिदिवस्यापि सम्मतौ।<br>दनुस्तु दानवाञ्जज्ञे दितिर्दैत्यान् व्यजायत॥ ५८<br>काला तु वै कालकेयानसुरान् राक्षसांस्तु वै।<br>अनायुषायास्तनया व्याधयः सुमहाबलाः॥ ५९<br>सिंहिका ग्रहमाता वै गन्धर्वजननी मुनिः।<br>ताम्रा त्वप्सरसां माता पुण्यानां भारर्तोद्भव॥ ६०<br>क्रोधायाः सर्वभूतानि पिशाचांश्चैव पार्थिव।<br>जज्ञे यक्षगणांश्चैव राक्षसांश्च विशाम्पते॥ ६१ | इसी प्रकार मरुत्वतीने मरुत् देवताओंको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया। अग्नि, चक्षु, रवि, ज्योति, सावित्र, मित्र, अमर, शरवृष्टि, महाभुज सुकर्ष, विराज, वाच, विश्वावसु, मति, अश्वमित्र, चित्ररश्मि, निषधन, ह्वन्त, वाडव, चारित्र, मन्दपन्नग, बृहन्त, बृहद्रूप तथा पूतनानुग—इन मरुद्गणोंको पूर्वकालमें मरुत्वतीने जन्म दिया था। अदितिने कश्यपके संयोगसे बारह आदित्योंको उत्पन्न किया। उनके नाम हैं—इन्द्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अर्यमा, रवि, पूषा, मित्र, धनद, धाता और पर्जन्य। ये बारह आदित्य देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। आदित्यके सरस्वतीके गर्भसे दो श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए, जो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ, गुणवानोंमें प्रधान और देवताओंके लिये भी पूजनीय कहे जाते हैं। दनुने दानवोंको और दितिने दैत्योंको उत्पन्न किया। कालाने कालकेय नामक असुरों और राक्षसोंको जन्म दिया। अत्यन्त बलवती व्याधियाँ अनायुषाकी संतान हैं। सिंहिका राहुग्रहकी माता है और मुनि गन्धर्वोंकी जननी कही जाती है। भरतकुलोत्पन्न राजन्! ताम्रा पवित्रात्मा अप्सराओंकी माता है। क्रोधासे सभी भूत और पिशाच पैदा हुए। विशाम्पते! क्रोधाने यक्षगणों और राक्षसोंको भी जन्म दिया था॥ ५१—६१॥ |
| चतुष्पदानि सत्त्वानि तथा गावस्तु सौरभाः।<br>सुपर्णान् पक्षिणश्चैव विनता चाप्यजायत॥ ६२<br>महीधरान् सर्वनागान् देवी कद्रूर्व्यजायत।<br>एवं वृद्धिं समगमन् विश्वे लोकाः परंतप॥ ६३<br>तदा वै पौष्करो राजन् प्रादुर्भावो महात्मनः।<br>प्रादुर्भावो पौष्करस्ते मया द्वैपायनेरितः॥ ६४<br>पुराणः पुरुषश्चैव मया विष्णुर्हरिः प्रभुः।<br>कथितस्तेऽनुपूर्व्येण संस्तुतः परमर्षिभिः॥ ६५<br>यश्चेदमग्र्यं शृणुयात् पुराणं<br>सदा नरः पर्वसु गौरवेण।<br>अवाप्य लोकान् स हि वीतरागः<br>परत्र च स्वर्गफलानि भुङ्क्ते॥ ६६<br>चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्।<br>प्रसादयति यः कृष्णं तं कृष्णोऽनुप्रसीदति॥ ६७ | राजन्! सभी चौपाये जीव तथा गौएँ सुरभीकी संतान हैं। विनताने सुन्दर पंखधारी पक्षियोंको पैदा किया। कद्रूदेवीने पृथ्वीको धारण करनेवाले सभी प्रकारके नागोंको उत्पन्न किया। परंतप! इसी प्रकार विश्वमें लोकसृष्टि वृद्धिको प्राप्त हुई है। राजन्! यही महात्मा विष्णुका पुष्करसम्बन्धी प्रादुर्भाव है। व्यासद्वारा कहे गये इस पौष्कर प्रादुर्भावका तथा जो पुराणपुरुष, सर्वव्यापी और महर्षियोंद्वारा संस्तुत हैं, उन भगवान् श्रीहरिका वर्णन मैंने तुम्हें आनुपूर्वी सुना दिया। जो मनुष्य सदा पर्वोंके समय गौरवपूर्वक इस श्रेष्ठ पुराणको श्रवण करता है, वह वीतराग होकर लौकिक सुखोंका उपभोग करके परलोकमें स्वर्गफलोंका भोग करता है। जो मनुष्य श्रीकृष्णको नेत्र, मन, वचन और कर्म—इन चारों प्रकारोंसे प्रसन्न करता है तो श्रीकृष्ण भी उसे उसी प्रकार आनन्दित करते हैं। |
| * अध्याय १७२ * | ७०७ |
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| राजा च लभते राज्यमधनश्चोत्तमं धनम्।<br>क्षीणायुर्लभते चायुः पुत्रकामः सुतं तथा॥ ६८<br>यज्ञा वेदास्तथा कामास्तपांसि विविधानि च।<br>प्राप्नोति विविधं पुण्यं विष्णुभक्तो धनानि च॥ ६९<br>यद्यत्कामयते किञ्चित् तत्तल्लोकेश्वराद् भवेत्।<br>सर्वं विहाय य इमं पठेत् पौष्करकं हरेः॥ ७०<br>प्रादुर्भावं नृपश्रेष्ठ न तस्य ह्यशुभं भवेत्।<br>एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः।<br>कीर्तितस्ते महाभाग व्यासश्रुतिनिदर्शनात्॥ ७१ | राजाको राज्यकी, निर्धनको उत्तम धनकी, क्षीणायुको दीर्घायुकी तथा पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है। विष्णुभक्त मनुष्य यज्ञ, वेद, कामनापूर्ति, अनेकविध तप, विविध पुण्य और धनको प्राप्त करता है। नृपश्रेष्ठ! जो मनुष्य सबका परित्याग करके श्रीहरिके इस पौष्कर-प्रादुर्भावका पाठ करता है, वह जो-जो कामनाएँ करता है, वह सब कुछ उस लोकेश्वरभगवान्से प्राप्त हो जाता है और उसका कभी अमङ्गल नहीं होता। महाभाग! इस प्रकार मैंने तुमसे महात्मा विष्णुके पुष्कर या कमलके प्रादुर्भावका वर्णन कर चुका। यह व्यासके वचनों तथा श्रुतियोंका निदर्शन है॥ ६२—७१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावो नामैकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ एकहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७१॥
एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय
तारकामय-संग्रामकी भूमिका एवं भगवान् विष्णुका महासमुद्रके रूपमें वर्णन, तारकादि असुरोंके अत्याचारसे दुःखी होकर देवताओंकी भगवान् विष्णुसे प्रार्थना और भगवान्का उन्हें आश्वासन
| मत्स्य उवाच<br>विष्णुत्वं शृणु विष्णोश्च हरित्वं च कृते युगे।<br>वैकुण्ठत्वं च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषु च॥ १<br>ईश्वरस्य हि तस्यैषा कर्मणां गहना गतिः।<br>सम्प्रात्यतीतान् भव्यांश्च शृणु राजन् यथातथम्॥ २<br>अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एष भगवान् प्रभुः।<br>नारायणो ह्यनन्तात्मा प्रभवोऽव्यय एव च॥ ३<br>एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत् सनातनः।<br>ब्रह्मा वायुश्च सोमश्च धर्मः शक्रो बृहस्पतिः॥ ४<br>अदितेरपि पुत्रत्वं समेत्य रविनन्दन।<br>एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजो विभुः॥ ५<br>प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्याः पुत्रकारणम्।<br>वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम्॥ ६<br>प्रधानात्मा पुरा ह्येष ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः।<br>सोऽसृजत् पूर्वपुरुषः पुराकल्पे प्रजापतीन्॥ ७ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! अब मैं कृतयुगमें घटित हुए भगवान् विष्णुके विष्णुत्व एवं हरित्व, देवताओंमें वैकुण्ठत्व और मनुष्योंमें कृष्णत्वका वर्णन कर रहा हूँ, सुनो। उस ईश्वरके कर्मोंकी यह गति बड़ी गहन है। इस समय तुम विष्णुके भूत एवं भावी अवतारोंके विषयमें यथार्थरूपसे श्रवण करो। जो ये ऐश्वर्यशाली अव्यक्तस्वरूप भगवान् हैं, वे ही व्यक्तरूपमें भी प्रकट होते हैं। वे ही नारायण अनन्तात्मा, सबके उत्पत्तिस्थान और अविनाशी भी कहे जाते हैं। ये सनातन नारायण श्रीहरि ब्रह्मा, वायु, सोम, धर्म, इन्द्र और वृहस्पति के रूपमें भी प्रकट होते हैं। रविनन्दन! ये सर्वव्यापी विष्णु अदितिके पुत्ररूपमें उत्पन्न होकर इन्द्रके अनुज 'उपेन्द्र' के नामसे विख्यात होते हैं। इन सर्वव्यापीका अदितिके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेके दो कारण हैं—एक तो अदितिपर कृपा करना और दूसरा देवशत्रु दैत्यों, दानवों और राक्षसोंका वध करना। इन प्रधानात्मा प्रभुने सर्वप्रथम ब्रह्माको उत्पन्न किया। उन पूर्वपुरुषने पूर्व कल्पमें प्रजापतियोंकी सृष्टि की। |
| ७०८ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| असृजन्मानवांस्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान्।<br>तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम्॥ ८<br><br>एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोः कर्मानुकीर्तनम्।<br>कीर्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे॥ ९ | तत्पश्चात् ब्रह्माके वंशमें उत्पन्न होनेवाले सर्वश्रेष्ठ मानवोंको उत्पन्न किया। उन महात्माओंके सम्पर्कसे एक ही शाश्वत ब्रह्म अनेक रूपोंमें विभक्त हो गया। लोकोंमें वर्णन करनेयोग्य भगवान् विष्णुके कर्मोंका यह अनुकीर्तन परम आश्चर्यजनक है। मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ, सुनो॥ १—९॥ |
| वृत्ते वृत्रवधे तत्र वर्तमाने कृते युगे।<br>आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः॥ १०<br><br>यत्र ते दानवा घोराः सर्वे संग्रामदुर्ज्जयाः।<br>घ्नन्ति देवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान्॥ ११<br><br>ते वध्यमाना विमुखाः क्षीणप्रहरणा रणे।<br>त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं प्रभुम्॥ १२<br><br>एतस्मिन्नन्तरे मेघा निर्वाणाङ्गारवर्चसः।<br>सार्कचन्द्रग्रहगणं छादयन्तो नभस्तलम्॥ १३<br><br>चण्डविद्युद्गणोपेता घोरनिर्ह्रादकारिणः।<br>अन्योन्यवेगाभिहताः प्रववुः सप्त मारुताः॥ १४<br><br>दीप्ततोयाशनिघनैर्वज्रवेगानलानिलैः।<br>रवैः सुघोरैरुत्पातैर्दह्यमानमिवाम्बरम्॥ १५<br><br>तत उल्कासहस्राणि निपेतुः खगतान्यपि।<br>दिव्यानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च॥ १६<br><br>चतुर्युगान्ते पर्याये लोकानां यद्भयं भवेत्।<br>अरूपवन्ति रूपाणि तस्मिन्नुत्पातलक्षणे॥ १७<br><br>जातं च निष्प्रभं सर्वं न प्राज्ञायत किञ्चन।<br>तिमिरौघपरिक्षिप्ता न रेजुश्च दिशो दश॥ १८<br><br>विवेश रूपिणी काली कालमेघावगुण्ठिता।<br>द्यौर्नभात्यभिभूतार्का घोरेण तमसावृता॥ १९ | राजन्! कृतयुगकी स्थितिके समय वृत्रासुरका वध हो जानेके पश्चात् त्रिलोकीमें विख्यात तारकामय संग्राम हुआ था। जिसमें संग्राममें कठिनतासे जीते जानेवाले सभी भयंकर दानव यक्ष, नाग और राक्षसोंसहित सभी देवगणोंका संहार कर रहे थे। इस प्रकार मारे जाते हुए वे देवगण शस्त्ररहित हो युद्धसे विमुख हो गये और मनसे अपने रक्षक सामर्थ्यशाली भगवान् नारायणकी शरणमें गये। इसी बीच बुझते हुए अंगारकी-सी कान्तिवाले मेघोंने सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहगणोंसमेत आकाशमण्डलको आच्छादित कर लिया। वे प्रचण्ड बिजलियोंसे युक्त थे तथा भयंकर गर्जना कर रहे थे। पुनः एक-दूसरेके वेगसे आहत हो सातों प्रकारकी वायु बहने लगी। उस समय कौंधती हुई बिजली और जलसे युक्त बादलों, वज्रके समान वेगशाली अग्नि और वायुके झकोरोंने तथा अत्यन्त भयंकर शब्दोंसे युक्त उत्पातोंद्वारा आकाश जलता हुआ-सा दीख रहा था। आकाशमें उड़ती हुई हजारों उल्काएँ भूतलपर गिरने लगीं। दिव्य विमान लड़खड़ाते हुए गिरने लगे। चारों युगोंकी समाप्तिके समय लोकोंके लिये जैसा भयकारी विनाश उपस्थित होता है, वैसा ही उत्पात उस समय भी घटित हुआ। सभी रूपवती वस्तुएँ विकृत हो गयीं। सारा जगत् प्रकाशहीन हो गया, जिससे कुछ भी जाना नहीं जा सकता था। घने अन्धकारसे ढकी हुई दसों दिशाएँ शोभाहीन हो गयीं। उस समय काले मेघोंके अवगुण्ठनसे युक्त काला रूप धारण करनेवाली देवी आकाशमें प्रविष्ट हुई। घोर अन्धकारसे आवृत होनेके कारण सूर्यके छिप जानेसे आकाशमण्डलकी शोभा जाती रही॥ १०—१९॥ |
| तान् घनौघान् सतिमिरान् दोर्भ्यामाक्षिप्य स प्रभुः।<br>वपुः सन्दर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः॥ २०<br><br>बलाहकाञ्जननिभं बलाहकतनूरुहम्।<br>तेजसा वपुषा चैव कृष्णां कृष्णमिवाचलम्॥ २१<br><br>दीप्तपीताम्बरधरं तप्तकाञ्चनभूषणम्।<br>धूमान्धकारवपुषं युगान्ताग्निमिवोत्थितम्॥ २२ | उसी समय सामर्थ्यशाली भगवान्ने अपने दोनों हाथोंसे अन्धकारसहित घन-समूहोंको दूर हटाकर कृष्णवर्णका दिव्य शरीर प्रकट किया। उसकी कान्ति काले मेघ और कज्जलके समान थी, उसके रोएँ भी काले मेघ-जैसे थे, वह तेज और शरीर-दोनोंसे कज्जलगिरिकी भाँति कृष्ण था, उसपर उद्दीप्त पीताम्बर शोभा पा रहा था, वह तपाये हुए स्वर्णमय आभूषणोंसे विभूषित, धुएँके अन्धकारकी-सी कान्तिसे युक्त तथा |
१७५- देवताओं और दानवोंका घमासान युद्ध, मयकी तामसी माया, और्वाग्निकी उत्पत्ति और महर्षि ऊर्वद्वारा हिरण्यकशिपुको उसकी प्राप्ति
* अध्याय १७२ * | ७०९
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चतुर्द्विगुणपीनांसं किरीटच्छन्नमूर्धजम्।<br>बभौ चामीकरप्रख्यैरायुधैरुपशोभितम्॥ २३<br><br>चन्द्रार्ककिरणोद्द्योतं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम्।<br>नन्दकानन्दितकरं शराशीविषधारिणम्॥ २४<br><br>शक्तिचित्रफलोदग्रशङ्खचक्रगदाधरम् ।<br>विष्णुशैलं क्षमामूलं श्रीवृक्षं शार्ङ्गधन्विनम्॥ २५<br><br>त्रिदशोदारफलदं स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवम्।<br>सर्वलोकमनःकान्तं सर्वसत्त्वमनोहरम्॥ २६<br><br>नानाविमानविटपं तोयदाम्बुमधुस्रवम्।<br>विद्याहंकारसाराढ्यं महाभूतप्ररोहणम्॥ २७<br><br>विशेषपत्रैर्निचितं ग्रहनक्षत्रपुष्पितम्।<br>दैत्यलोकमहास्कन्धं मर्त्यलोके प्रकाशितम्॥ २८ | प्रलयकालमें प्रकट हुई अग्निके समान उद्भासित हो रहा था, उसके कंधे दुगुने एवं चौगुने मोटे थे, उसके बाल किरीटसे ढके होनेके कारण शोभा पा रहे थे, वह स्वर्ण-सदृश चमकीले आयुधोंसे सुशोभित था, उससे चन्द्रमा और सूर्यकी किरणों-जैसी प्रभा निकल रही थी, वह पर्वत-शिखरकी तरह ऊँचा था, उसके हाथ नन्दक नामक खड्ग और विषैले सर्पों-जैसे बाणोंसे युक्त थे, वह चित्तल मछलीके समान विशाल शक्ति, शङ्ख, चक्र और गदा धारण किये हुए था, क्षमा जिसका मूल था, जो श्रीवृक्षसे सम्पन्न, शार्ङ्गधनुषसे युक्त, देवताओंको उत्तम फल देनेवाला, देवाङ्गणारूपी रुचिर पल्लवोंसे सुशोभित, सभी लोगोंके मनको प्रिय लगनेवाला, सम्पूर्ण जीवोंसे युक्त होनेके कारण मनोहर, नाना प्रकारके विमानरूपी वृक्षोंसे युक्त और बादलोंके मीठे जलको टपकानेवाला, विद्या और अहंकारके सारसे सम्पन्न तथा महाभूतरूपी वृक्षोंको उगानेवाला था, वह घने पत्तोंसे आच्छादित था, उसपर ग्रह-नक्षत्ररूप पुष्प खिले हुए थे, दैत्योंके लोक उसकी विशाल शाखाके रूपमें थे, ऐसा वह विष्णुशैल मृत्युलोकमें प्रकाशित हो रहा था॥ २०—२८॥ |
| सागराकारनिर्ह्रादं रसातलमहाश्रयम्।<br>मृगेन्द्रपाशैर्विततं पक्षजन्तुनिषेवितम्॥ २९<br><br>शीलार्थचारुगन्धाढ्यं सर्वलोकमहाद्रुमम्।<br>अव्यक्तानन्तसलिलं व्यक्ताहङ्कारफेनिलम्॥ ३०<br><br>महाभूततरङ्गौघं ग्रहनक्षत्रबुद्बुदम्।<br>विमानगरुतव्यासं तोयदाडम्बराकुलम्॥ ३१<br><br>जन्तुमत्स्यगणाकीर्णं शैलशङ्खकुलैर्युतम्।<br>त्रैगुण्यविषयावर्तं सर्वलोकतिमिङ्गिलम्॥ ३२<br><br>वीरवृक्षलतागुल्मं भुजगोत्कृष्टशैवलम्।<br>द्वादशार्कमहाद्वीपं रुद्रैकादशपत्तनम्॥ ३३<br><br>वस्वष्टपर्वतोपेतं त्रैलोक्याम्भोमहोदधिम्।<br>संध्यासंख्योर्मिसलिलं सुपर्णानिलसेवितम्॥ ३४<br><br>दैत्यरक्षोगणग्राहं यक्षोरगझषाकुलम्।<br>पितामहमहावीर्यं सर्वस्त्रीरत्नशोभितम्॥ ३५ | रसातलतक व्याप्त रहनेवाला वह नारायणरूप महासागर सागरकी भाँति शब्द कर रहा था, वह मृगेन्द्ररूपी पाशोंसे व्याप्त, पंखधारी जन्तुओंसे सेवित, शील और अर्थकी सुन्दर गन्धसे युक्त तथा सम्पूर्ण लोकरूपी महान् वृक्षसे सम्पन्न था, नारायणका अव्यक्त स्वरूप उसका अगाध जल था, वह व्यक्त अहंकाररूप फेनसे युक्त था, उसमें महाभूतगण लहरोंके समूह थे, ग्रह और नक्षत्र बुद्बुदकी तरह शोभा पा रहे थे, वह विमानोंके चलनेसे होनेवाले शब्दोंसे व्याप्त था, वह बादलोंके आडम्बरसे सम्पन्न, जलजन्तुओं और मत्स्यसमूहोंसे परिपूर्ण और समुद्रस्थ पर्वतों एवं शङ्खसमूहसे युक्त था। उसमें त्रिगुणयुक्त विषयोंकी भँवरें उठ रही थीं और सारा लोक तिमिंगिल (बहुत बड़ी मछली)-के समान था, वीरगण वृक्षों और लताओंके झुरमुट थे, बड़े-बड़े नाग सेवारके समान थे, बारहों आदित्य महाद्वीप और ग्यारहों रुद्र नगर थे, वह महासागर आठों वसुओंरूप पर्वतसे युक्त और त्रिलोकीरूप जलसे भरा हुआ था, उसके जलमें असंख्य संध्यरूप लहरें उठ रही थीं, वह सुपर्णरूप वायुसे सेवित, दैत्य और राक्षसगणरूप ग्राह तथा यक्ष एवं नागरूप मीनसे व्याप्त था, पितामह ब्रह्मा ही उसमें महान् पराक्रमी व्यक्ति थे, |
७१० मत्स्यपुराण
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रीकीर्तिकान्तिलक्ष्मीभिर्नदीभिरुपशोभितम् ।<br>कालयोगिमहापर्वप्रलयोत्पत्तिवेगिनम् ॥ ३६ | वह सभी स्त्री-रत्नों तथा श्री, कीर्ति, कान्ति और लक्ष्मीरूपी नदियोंसे सुशोभित था, उसमें समयानुसार महान् पर्व और प्रलयकी उत्पत्ति होती रहती थी, ऐसा वह योगरूप महान् तटवाला नारायण-महासागर था ॥ २९—३६ १/२ ॥ |
| तं तु योगमहापारं नारायणमहार्णवम् ।<br>दैवाधिदेवं वरदं भक्तानां भक्तवत्सलम् ॥ ३७<br><br>अनुग्रहकरं देवं प्रशान्तिकरणं शुभम् ।<br>हर्यश्वरथसंयुक्ते सुपर्णध्वजसेविते ॥ ३८<br><br>ग्रहचन्द्रार्करचिते मन्दराक्षवरावृते ।<br>अनन्तरश्मिभियुक्ते विस्तीर्णे मेरुगह्वरे ॥ ३९<br><br>तारकाचित्रकुसुमे ग्रहनक्षत्रबन्धुरे ।<br>भयेष्वभयदं व्योम्नि देवा दैत्यपराजिताः ॥ ४०<br><br>ददृशुस्ते स्थितं देवं दिव्ये लोकमये रथे ।<br>ते कृताञ्जलयः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ ४१ | उस समय दैत्योंसे पराजित हुए देवताओंने आकाशमें उन देवाधिदेव भगवान्को, जो भक्तोंके वरदायक, भक्तवत्सल, अनुग्रह करनेवाले, प्रशान्तिकारक, शुभमय और भयके अवसरोंपर अभय प्रदान करनेवाले हैं, देखा। वे ऐसे लोकमय दिव्य रथपर विराजमान थे, जो इन्द्रके रथके समान था, जिसपर गरुडध्वज फहरा रहा था, जिसमें सभी ग्रह, चन्द्र और सूर्य उपस्थित थे, जो मन्दराचलकी श्रेष्ठ धुरीपर आधारित था, वह असंख्य किरणोंसे युक्त मेरुकी विस्तृत गुफा-जैसा लग रहा था, उसमें तारकाएँ विचित्र पुष्पोंके सदृश तथा ग्रह और नक्षत्र हंसके समान शोभा पा रहे थे। तब इन्द्र आदि वे सभी देवता हाथ जोड़कर जय-जयकार करते हुए उन शरणागतवत्सलकी शरणमें गये ॥ ३७—४१ १/२ ॥ |
| जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणं गताः ।<br>स तेषां तां गिरं श्रुत्वा विष्णुर्दैवतदैवतम् ॥ ४२<br><br>मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां महामृधे ।<br>आकाशे तु स्थितो विष्णुरुत्तमं वपुरास्थितः ॥ ४३<br><br>उवाच देवताः सर्वाः सप्रतिज्ञमिदं वचः ।<br>शान्तिं व्रजत भद्रं वो मा भैष्ट मरुतां गणाः ॥ ४४<br><br>जिता मे दानवाः सर्वे त्रैलोक्यं परिगृह्यताम् ।<br>ते तस्य सत्यसंधस्य विष्णोर्वाक्येन तोषिताः ॥ ४५<br><br>देवाः प्रीतिं समाजग्मुः प्राश्यामृतमिवोत्तमम् ।<br>ततस्तमः संहृतं तद्दिनेशश्च बलाहकाः ॥ ४६<br><br>प्रववुश्च शिवा वाता प्रशान्ताश्च दिशो दश ।<br>शुद्धप्रभाणि ज्योतींषि सोमश्चक्रुः प्रदक्षिणाम् ॥ ४७<br><br>न विग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रशान्ताश्चापि सिन्धवः ।<br>विरजस्काभवन् मार्गा नाकवर्गादयस्त्रयः ॥ ४८<br><br>यथार्थमूहूः सरितो नापि चुक्षुभिरेऽर्णवाः ।<br>आसञ्छुभानीन्द्रियाणि नराणामन्तरात्मसु ॥ ४९ | इस प्रकार देवताओंकी वह आर्त-वाणी सुनकर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने महासमरमें दानवोंका विनाश करनेको सोचा। तब उत्तम शरीर धारण करके आकाशमें स्थित हुए भगवान् विष्णु सभी देवताओंसे प्रतिज्ञापूर्वक ऐसी वाणी बोले—'देवगण! तुम्हारा कल्याण हो। तुमलोग शान्त हो जाओ, भय मत करो, ऐसा समझो कि मैंने सभी दानवोंको जीत लिया है। अब तुमलोग पुनः त्रिलोकीका राज्य ग्रहण करो।' इस प्रकार उन सत्यसंध भगवान् विष्णुके वचनसे वे देवगण परम संतुष्ट हुए और उन्हें ऐसी प्रसन्नता प्राप्त हुई, मानो उत्तम अमृत ही पान करनेको मिल गया हो। तदनन्तर वह निविड़ अन्धकार नष्ट हो गया। बादल विनष्ट हो गये। सुखदायिनी वायु चलने लगी और दसों दिशाएँ शान्त हो गयीं। ज्योतिर्गणोंकी प्रभा निर्मल हो गयी। तब चन्द्रमा और वे सभी ज्योतिर्गण प्रदक्षिणा करने लगे। ग्रहोंमें परस्पर विग्रहका भाव नष्ट हो गया। सागर प्रशान्त हो गये। मार्ग धूलरहित हो गये। स्वर्गादि तीनों लोकोंमें शान्ति स्थापित हो गयी। नदियाँ यथार्थरूपसे प्रवाहित होने लगीं। समुद्रोंका ज्वार-भाटा शान्त हो गया। मनुष्योंकी अन्तरात्माएँ तथा इन्द्रियाँ |
| * अध्याय १७३ * | ७११ |
|---|
| महर्षयो वीतशोका वेदानुच्चैरधीयत।<br>यज्ञेषु च हविः पाकं शिवमप च पावकः॥ ५०<br><br>प्रवृत्तधर्माः संवृत्ता लोका मुदितमानसाः।<br>विष्णोर्दत्तप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधने गिरम्॥ ५१ | शुभकारिणी हो गयीं। महर्षियोंका शोक नष्ट हो गया, वे उच्च स्वरसे वेदोंका अध्ययन करने लगे। यज्ञोंमें अग्निको पके हुए मङ्गलकारक हविकी प्राप्ति होने लगी। इस प्रकार शत्रुके विनाश करनेके विषयमें दत्तप्रतिज्ञ भगवान् विष्णुकी वाणी सुनकर सभी लोगोंका मन हर्षित हो गया, तब वे अपने-अपने धर्मोंमें संलग्न हो गये। |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७२ ॥
एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय
दैत्यों और दानवोंकी युद्धार्थ तैयारी
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्बोले— |
|---|---|
| ततोऽभयं विष्णुवचः श्रुत्वा दैत्याश्च दानवाः।<br>उद्योगं विपुलं चक्रुर्यूद्धाय विजयाय च॥ १<br><br>मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वायतमक्षयम्।<br>चतुश्चक्रं सुविपुलं सुकम्पितमहायुगम्॥ २<br><br>किङ्किणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम्।<br>रुचिरं रत्नजालैश्च हेमजालैश्च शोभितम्॥ ३<br><br>ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिपङ्क्तिविराजितम्।<br>दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरनिनादितम्॥ ४<br><br>स्वक्षं रथवरोदारं सूपस्थं गगनोपमम्।<br>गदापरिघसम्पूर्णं मूर्तिमन्तमिवार्णवम्॥ ५<br><br>हैमकेयूरवलयं स्वर्णमण्डलकूबरम्।<br>सपताकध्वजोपेतं सादित्यमिव मन्दरम्॥ ६<br><br>गजेन्द्राभोगवपुषं क्वचित् केसरिवर्चसम्।<br>युक्तमृक्षसहस्रेण समृद्धाम्बुदनादितम्॥ ७<br><br>दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम्।<br>अध्यतिष्ठद्रणाकाङ्क्षी मेरुं दीप्त इवांशुमान्॥ ८ | रविनन्दन ! तदनन्तर देवताओंके लिये उपयुक्त भगवान् विष्णुके उस अभयदायक वचनको सुनकर दैत्य और दानव युद्ध एवं उसमें विजयप्राप्तिके लिये महान् उद्योग करने लगे। उस समय युद्धाकाङ्क्षी मय एक ऐसे दिव्य रथपर सवार हुआ, जो सोनेका बना हुआ था। वह अविनाशी रथ तीन नल्व* विस्तारवाला अत्यन्त विशाल तथा चार पहियों और परम सुन्दर महान् जुएसे युक्त था। उसमें क्षुद्र घंटिकाओंके रुनझुन शब्द हो रहे थे। वह गैंडेके चमड़ेसे आच्छादित, रत्नों और सुवर्णकी सुन्दर जालियोंसे सुशोभित, भेड़ियों और पङ्क्तिबद्ध पक्षियोंकी पच्चीकारीसे समलंकृत तथा दिव्यास्त्र और तरकससे परिपूर्ण था। उससे मेघकी गड़गड़ाहटके समान शब्द निकल रहा था। वह श्रेष्ठ रथ सुन्दर धुरी और सुदृढ़ मध्यभागसे युक्त, आकाशमण्डल-जैसा विस्तृत तथा गदा और परिघसे परिपूर्ण होनेके कारण मूर्तिमान् सागर-सा लग रहा था। उसके केयूर, वलय और कूबर (युगंधर) सोनेके बने हुए थे तथा उसपर पताकाएँ और ध्वज फहरा रहे थे, जिससे वह सूर्ययुक्त मन्दराचलकी भाँति शोभित हो रहा था। उसका ऊपरी भाग कहीं गजेन्द्र-चर्म तो कहीं सिंह-चर्म-जैसा चमक रहा था। उसमें एक हजार रीछ जुते हुए थे, वह घने बादलकी तरह शब्द कर रहा था, शत्रुओंके रथको रौंदनेवाला वह दीप्तिशाली रथ आकाशगामी था, उसपर बैठा हुआ मय ऐसा लग रहा था मानो दीप्तिमान् सूर्य सुमेरु पर्वतपर विराजमान हों॥ १—८॥ |
* एक फलाँगका एक प्राचीन माप।
७१२ * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shloka | Hindi Meaning |
|---|---|
| तारमुक्तक्रोशविस्तारं सर्वं हेममयं रथम्।<br>शैलाकारमसम्बाधं नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ९<br>कार्ष्णायसमयं दिव्यं लोहेषाबद्धकूबरम्।<br>तिमिरोद्गारिकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम्॥ १०<br>लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम्।<br>आयसैः परिघैः पूर्णं क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः॥ ११<br>प्रासैः पाशैश्च विततैस्संयुक्तश्च कण्टकैः।<br>शोभितं त्रासयानैश्च तोमरैश्च परश्वधैः॥ १२<br>उद्यन्तं द्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मन्दरम्।<br>युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम्॥ १३<br>विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः।<br>प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः॥ १४<br>युक्तं रथसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः।<br>स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः॥ १५<br>व्यायतं किष्कुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन् महत्।<br>वाराहः प्रमुखे तस्थौ सप्ररोह इवाचलः॥ १६<br>खरस्तु विक्षरन् दर्पान्नेत्राभ्यां रोषजं जलम्।<br>स्फुरद्दन्तोष्ठनयनं संग्रामं सोऽभ्यकाङ्क्षत॥ १७ | इसी प्रकार जो अत्यन्त ऊँचा और दूरतक शब्द करनेवाला था, जिसके सभी अङ्ग स्वर्णमय थे, जो आकारमें पर्वतके समान और नीलाञ्जनकी राशि-सा दीख रहा था, काले लोहेका बना हुआ था, जिसके लोहेके हरसेमें कूबर बँधा हुआ था, जिसमें कहीं-कहीं अंधकारको फाड़कर किरणें चमक रही थीं, जो बादलकी तरह गर्जना कर रहा था, लोहेकी विशाल जाली और झरोखोंसे सुशोभित था, लोहनिर्मित परिघ, क्षेपणीय (ढेलवाँस) और मुद्गरोंसे परिपूर्ण था, भाला, पाश, बड़े-बड़े शङ्कु, कण्टक, भयदायक तोमर और कुठारोंसे सुशोभित था, शत्रुओंसे युद्ध करनेके लिये उद्यत दूसरे मन्दराचलकी भाँति दीख रहा था तथा जिसमें एक हजार गधे जुते हुए थे, ऐसे उत्तम दिव्य रथपर तारकासुर सवार हुआ। क्रोधसे भरा हुआ विरोचन हाथमें गदा लिये हुए उस सेनाके मुहानेपर खड़ा हुआ। वह देदीप्यमान शिखरवाले पर्वतके समान लग रहा था। शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले दानवश्रेष्ठ हयग्रीवने एक हजार रथके साथ अपने रथको आगे बढ़ाया। वाराह नामक दानव अपने एक हजार किष्कु* लम्बे विशाल धनुषका टंकार करते हुए सेनाके अग्रभागमें स्थित हुआ, जो वृक्षोंसहित पर्वत-सा दीख रहा था। खर नामक दैत्य अभिमानवश नेत्रोंसे रोषजनित जल गिराता हुआ संग्रामके लिये उद्यत हुआ, उस समय उसके दाँत, होंठ और नेत्र फड़क रहे थे॥ ९-१७॥ |
| त्वष्टा त्वष्टगजं घोरं यानमास्थाय दानवः।<br>व्यूहितुं दानवव्यूहं परिचक्राम वीर्यवान्॥ १८<br>विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः।<br>श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखे स्थितः॥ १९<br>अरिष्टो बलिपुत्रश्च वरिष्ठोऽद्रिशिलायुधः।<br>युद्धायाभिमुखस्तस्थौ धराधरविकम्पनः॥ २०<br>किशोरस्त्वभिसंहर्षात्किशोर इति चोदितः।<br>सबला दानवाश्चैव सन्नह्यन्ते यथाक्रमम्॥ २१<br>अभवद् दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः।<br>लम्बस्तु नवमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः॥ २२<br>दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान्।<br>स्वर्भानुरास्ययोधी तु दशनोष्ठेक्षणायुधः॥ २३ | इसी प्रकार पराक्रमी दानवराज त्वष्टा, जिसमें आठ हाथी जुते हुए थे, ऐसे भयंकर रथपर बैठकर दानवसेनाको व्यूहबद्ध करनेका प्रयत्न करने लगा। विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत, जो श्वेत पर्वतके समान विशालकाय और श्वेत कुण्डलोंसे विभूषित था, युद्धके लिये सेनाके अग्रभागमें स्थित हुआ। बलिक पुत्र अरिष्ट, जो महान् बलसम्पन्न और पर्वतको कँपा देनेवाला था तथा पर्वत-शिलाएँ जिसकी आयुधभूता थीं, युद्धकी कामनासे सेनाके सम्मुख खड़ा हुआ। किशोर नामक दैत्य प्रेरित किये गये सिंह-किशोरकी तरह अत्यन्त हर्षके साथ दैत्य-सेनाके मध्यभागमें उपस्थित हुआ, जो उदयकालीन सूर्य-सा प्रतीत हो रहा था। नवीन मेघकी-सी कान्तिवाला लम्ब नामक दानव, जो लम्बे वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित था, दैत्यसेनामें पहुँचकर कुहासेसे घिरे हुए सूर्यकी तरह शोभा पा रहा था। महान् ग्रह राहु, जो मुख, दाँत, होंठ और नेत्रोंसे युद्ध करनेवाला |
* बीस अंगुल या मतान्तरसे एक हाथका प्राचीन माप।