मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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मयमतम्
समर्पण प्रिय जीवन-सहचर डॉ. राधेकृष्ण पाण्डेय जी को सादर समर्पित — शैलजा
प्राक्कथन भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्।। अथर्ववेद से उद्भूत स्थापत्य विद्या संस्कृत वाङ्मय में अनेक स्थलों पर प्राप्त होती है। कुछ महापुराणों एवं उपपुराणों में; यथा—मत्स्य, अग्नि, गरुड तथा विष्णु- धर्मोत्तर आदि में; गृह्यसूत्र, आगमग्रन्थों, तन्त्रसमुच्चय आदि तान्त्रिकग्रन्थों, बृहत्संहिता आदि ज्योतिषग्रन्थों में स्थापत्य विद्या से सम्बद्ध पर्याप्त विवेचन प्राप्त होते हैं। आगे चल कर यह विद्या स्वतन्त्र शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित होती है। मत्स्यपुराण (२५२. २-४) में भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित्, विशालाक्ष, पुरन्दर, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति शिल्पशास्त्र के उपदेष्टा कहे गये हैं। उनमें विश्वकर्मा औदीच्य अथवा नागर वास्तु-परम्परा के तथा मय द्राविड-परम्परा के दीपस्तम्भ आचार्य हैं। मय की प्रमुख रचना ‘मयमत’ है। इसका काल चोल राजाओं का काल माना गया है।१ दक्षिण भारतीय वास्तु-परम्परा अथवा द्राविड रीति का यह मानक ग्रन्थ है। द्राविड परम्परा के प्रायः सभी ग्रन्थों का उपजीव्य यह ग्रन्थ अपने भीतर समग्र वास्तु- शास्त्र एवं शिल्पशास्त्र को समेटे है। द्राविड वास्तु में उपपीठ, अधिष्ठान आदि भवन के मूलभाग एवं शिखरभाग विशिष्ट स्थान रखते हैं। पूरे भवन को वेश्मपुरुष माना जाता है। उपपीठ, अधिष्ठान आदि वेश्मपुरुष के पदभाग अथवा पैर हैं। मध्यभाग वेश्मपुरुष का शरीर तथा शिखर वेश्मपुरुष का शिर होता है, जिस पर वेश्मपुरुष के शिर का अलंकरण होता है। इस प्रकार वास्तुमण्डल में जिस वास्तुपुरुष को स्थापित किया जाता है, वह मानों भवन के रूप में उठ खड़ा होता है। भवन वास्तुपुरुष का विग्रह होता है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर के किसी भाग में विकार आ जाय तो वह कष्टकर होता है, उसी प्रकार भवन अथवा वेश्मपुरुष की रचना करते समय यदि किसी भाग में दोष होता है तो वह गृह अपने भीतर निवास करने वालों के लिये कष्टकारी होता है। अतः वास्तुविद् मुनियों ने इस पर अत्यधिक ध्यान दिया है। १. ब्रूनो डेगेन्स द्वारा सम्पादित ‘मयमतम्’ की भूमिका
( ६ ) 'मयमत' ग्रन्थ में वास्तु के स्थान पर 'वस्तु' पद का प्रयोग किया है। मय के अनुसार वस्तु ही मूल है। इनके अनुसार वस्तु से उत्पन्न पदार्थ 'वास्तु' है। इन्होंने पृथिवी को प्रथम वस्तु माना है। इसके अतिरिक्त प्रासाद, यान एवं शयन भी वास्तु की श्रेणी में परिगणित हैं। अमर्त्याश्चैव मर्त्याश्च यत्र यत्र वसन्ति हि। तद्वस्त्विति मतं तज्ज्ञैस्तद्भेदांश्च वदाम्यहम्।। भूप्रासाद्यानानि शयनं च चतुर्विधम्। भूरेव मुख्यवस्तु स्यात्तत्र जातानि यानि हि।। ( मयमत-२.१-२ ) अतः उन्होंने वास्तुशास्त्र के स्थान पर सभी जगह 'वस्तुशास्त्र' का प्रयोग किया है; जबकि अन्य ग्रन्थकार 'वास्तुशास्त्र' पद का प्रयोग करते हैं। इस ग्रन्थ का अन्य वैशिष्ट्य नींव में गर्भविन्यास है। प्रत्येक स्थान के लिये भवन के गर्भ में रखे जाने वाले पदार्थों एवं सम्पूर्ण भवन के गर्भ में रखे जाने वाले पदार्थों ( गर्भविन्यास ) का स्वतन्त्र रूप से एवं प्रकरण के अनुसार विवेचन किया गया है। असुरराज मय शैव मत में अपनी पूर्ण आस्था रखते हैं। प्रतिमा-लक्षण संज्ञक अध्याय में यद्यपि सभी देवी-देवताओं की प्रतिमायें लक्षणसहित वर्णित हैं तथापि शिव की प्रतिमाओं एवं शिवलिङ्गों के लक्षण एवं निर्माण आदि पर विशेष प्रकाश डाला गया है। विषय-वस्तु अनेक वैशिष्ट्यों से युक्त इस ग्रन्थ का विषयवस्तु इस प्रकार है— यह ग्रन्थ ३६ अध्यायों में विभक्त है। इसका प्रथम अध्याय संग्रहाध्याय, दूसरा वस्तुप्रकार, तीसरा भूपरीक्षा, चौथा भूपरिग्रह, पाँचवाँ मानोपकरण, छठा दिक्परिच्छेद, सातवाँ पदविन्यास, आठवाँ बलिकर्म, नवाँ ग्रामविन्यास, दसवाँ नगरविधान, ग्यारहवाँ भूलम्बविधान, बारहवाँ गर्भविन्यास, तेरहवाँ उपपीठविधान, चौदहवाँ अधिष्ठानविधान, पन्द्रहवाँ पादप्रमाण-द्रव्यपरिग्रहविधान, अट्ठारहवाँ प्रासादोर्ध्ववर्ग, उन्तीसवाँ एकभूमिविधान तथा बीसवाँ द्विभूमिविधान है। इसके पश्चात् क्रमशः त्रिभूमिविधान, चतुर्भूम्यादि बहु- भूमिविधान, प्राकारपरिवारविधान, गोपुरविधान, मण्डप-सभाविधान, शालाविधान, चतुर्गृह- विधान, गृहप्रवेश, राजवेश्मविधान, द्वारविधान, यानाधिकार, शयनासनाधिकार, लिङ्गलक्षण, पीठलक्षण, अनुकर्मविधान तथा प्रतिमालक्षण संज्ञक अध्याय हैं। ग्रन्थ के अन्त में कूपारम्भ संज्ञक परिशिष्ट प्राप्त होता है।
( ७ ) १. संग्रहाध्याय—इस अध्याय का प्रारम्भ मङ्गलाचरण से होता है। इसमें सम्पूर्ण ग्रन्थ के वर्ण्य विषय का उल्लेख प्राप्त होता है। २. वस्तुप्रकार—इस अध्याय में प्रथमतः वस्तु एवं वास्तु की परिभाषा दी गई है। मय के अनुसार वह सभी स्थान, जहाँ देवता तथा मनुष्य निवास करते हैं, वस्तु है तथा वस्तु पर जिनका निर्माण होता है, वह वास्तु है। भूमि, प्रासाद, यान एवं शयन वस्तु है। इनमें भी सर्वप्रधान भूमि है। अतः वर्ण, गन्ध तथा रसादि से भली प्रकार भूमि की परीक्षा करनी चाहिये। इसमें अनेक प्रकार की भूमियों के लक्षण एवं वर्णानुसार अनुरूपता का वर्णन किया गया है। ३. भूपरीक्षा—इस अध्याय में भूमि के प्रशस्त एवं अप्रशस्त लक्षणों का वर्णन किया गया है। इसमें आकृति, गन्ध, वृक्षादि, रंग, रस, जलप्रवाह, मिट्टी के प्रकार, भूमि से प्राप्त होने वाली वस्तुयें, भूमि के समीप-स्थित देवालय आदि, परिवेश आदि पर सूक्ष्म विवेचन प्राप्त होता है। ४. भूपरिग्रह—भूमि पर निर्माण से पूर्व उसका संस्कार आवश्यक है। चयनित स्थान को भूतादि बाधा से मुक्त करना, हल चलाना, बीजवपन, बलिकर्म तथा भूमि- परीक्षण आदि का वर्णन इस अध्याय में किया गया है। ५. मानोपकरण—इस अध्याय में विभिन्न प्रकार के माप—परमाणु, रथरेणु, बालाग्र, लीक्षा, यूका, यव, अङ्गुल, वितस्ति, हस्त अथवा किष्कु तथा प्राजापत्य, धनुर्मुष्टि एवं धनुर्ग्रह आदि एवं उनके भेद वर्णित हैं। इसके साथ ही उनके प्रयोग के स्थलों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनन्तर स्थपति, सूत्रग्राही, तक्षक एवं वर्धकि-संज्ञक शिल्पियों का लक्षणसहित वर्णन प्राप्त होता है। ६. दिक्परिच्छेद—सही दिशा के ज्ञान के बिना समीचीन निर्माण सम्भव नहीं होता; अतः भूमि की दिशा के ज्ञानहेतु शङ्कु का प्रयोग वर्णित है। इसके लिये उचित समय, भूमि को तैयार करना, शङ्कु-निर्माण, शङ्कु से पड़ने वाली छाया से पूर्व आदि दिशाओं का निर्धारण एवं अपच्छाया का ज्ञान आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त इस अध्याय में रज्जु-लक्षण, खातशङ्कु-लक्षण, सूत्रविन्यास तथा अपच्छाया का वर्णन किया गया है। ७. पदविन्यास—इस अध्याय में वास्तु-पद-विन्यास का विशद् वर्णन प्राप्त होता है। इसमें बत्तीस पदविन्यासों की सूची; सकल, पेचक, पीठ, महापीठ, उपपीठ आदि कतिपय पदविन्यासों का वर्णन; वास्तुदेवों का वर्णन तथा उनके स्थानों का विवेचन किया गया है। पदविन्यासों में मण्डूकपद वास्तु (चौंसठ पद वास्तु) एवं परमशायिन (इक्यासी पद वास्तु) प्रधान हैं; अतः उनका विस्तार से वर्णन किया गया
( ८ ) है। इसके अतिरिक्त वास्तुपुरुष का भी वर्णन किया गया है। ८. बलिकर्म—इस अध्याय में वास्तुमण्डल के पदों में अधिष्ठित देवों की आहत्य बलि ( व्यक्तिगत पूजा एवं हवनादि ) तथा साधारण बलि ( सभी देवों की सामूहिक पूजा एवं पूजा के सामान्य नियम ) वर्णित है। ९. ग्राम-विन्यास—इस अध्याय में ग्रामों के प्रमाण, विविध मापों पर एक दृष्टि, ग्रामादि के प्रमाण, आयादि-विचार, ग्रामादि में ब्राह्मणों की संख्या, ग्रामों के नाम, मार्ग-व्यवस्था, ग्रामों के मङ्गल एवं पुर आदि भेद, द्वार-व्यवस्था, ग्रामों में देवालय, ग्राम के प्रवेशद्वारों पर स्थापित देवता, ग्रामवास्तु के वर्ज्य स्थान, उपवन आदि के लिये श्रेणिस्थान, गृहों के लक्षण, गृहादि के विन्यास में सम्भावित दोष तथा ग्राम का शिलान्यास आदि वर्णित है। १०. नगर-विधान—इस अध्याय में नगर के प्रमाण एवं उसके विन्यास की चर्चा की गई है। इसमें माप के अनुसार नगरों के विभिन्न भेद, नगरों के चारो ओर उनके आकार के अनुसार वप्र ( चारदिवारी ) का निर्माण, वर्ज्य स्थान, मार्गविन्यास आदि का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त राजधानी का विशद् विवेचन, खेट आदि नगरों का विन्यास, दुर्गों के सात भेद एवं उनके विन्यास, नगरयोजना तथा बाजार आदि के विन्यास का वर्णन प्राप्त होता है। ११. भूलम्ब-विधान—इस अध्याय में भवन की आकृति के अनुसार भूलम्ब ( तल ) का वर्णन किया गया है। इसमें तलों के अनुसार भवन के माप एवं भवन का सर्वाधिक माप वर्णित है। १२. गर्भन्यास—इस अध्याय में देवों, ब्राह्मणों तथा अन्य जातियों के भवनों में शिलान्यास तथा नींव में रखी जाने वाली वस्तुओं का विशद् वर्णन प्राप्त होता है। इसके अन्तर्गत फेला ( पिटारी ), गर्भस्थापन ( नींव के गर्त में शिलान्यास-सामग्री रखना ), शिवालय का गर्भस्थापन, विष्णु, ब्रह्मा, षण्मुख आदि देवों के मन्दिरों में गर्भस्थापन, मनुष्यों के आवास का गर्भस्थापन, गर्भस्थापन का मन्त्र, वापी आदि का शिलान्यास तथा इष्टकाविन्यास वर्णित है। १३. उपपीठ-विधान—भवन के निर्माण में उपपीठ ( कुर्सी ) का निर्माण उसकी ऊँचाई, शोभा एवं रक्षा-हेतु होता है। इसके ऊपर अधिष्ठान आदि स्थापित होते हैं। इनके वेदिभद्र, प्रतिभद्र तथा सुभद्रभेद लक्षणसहित विस्तार से वर्णित है। १४. अधिष्ठान-विधान—इस अध्याय में अधिष्ठान के लिये भूमि तैयार करना, उसका माप, ऊँचाई में अधिष्ठान के विविध अंगों की योजना के अनुसार पादबन्ध, उरगबन्ध, प्रतिक्रम, पद्मकेसर, पुष्पपुष्कल, श्रीबन्ध, मञ्चबन्ध, प्रतिबन्ध तथा कलशाधिष्ठान-
( ९ ) योजना का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अधिष्ठान के सामान्य लक्षण, उसके पर्याय, निर्गम-मान तथा प्रतिच्छेदविधि का भी वर्णन किया गया है। १५. पादप्रमाण-द्रव्यपरिग्रह-विधान—इस अध्याय में स्तम्भ के लक्षण, पर्याय, उसके प्रमाण, स्तम्भों के भेद, स्तम्भदण्ड का लक्षण, कलश का लक्षण, पोतिका का माप एवं उसके अंग, स्तम्भ के विशेष लक्षण, स्तम्भ के निर्माणहेतु काष्ठ, प्रस्तर एवं इष्टका का संग्रह, इस हेतु चुनने योग्य वृक्ष, शिला एवं इष्टका के लक्षण, त्याज्य वृक्ष, वृक्ष-ग्रहण करने से पूर्व किया जाने वाला पूजन-कार्य तथा काष्ठा- नयन, मुहूर्त्तस्तम्भ एवं इष्टका-निर्माण वर्णित है। १६. प्रस्तरकरण—इस अध्याय में उत्तर से प्रारम्भ होकर वृतिपर्यन्त प्रस्तर के अंगों का वर्णन किया गया है। इसमें उत्तर वाजन, प्रमालिका, दण्डिका, वलय, गोपान, कायपाद, वाजन, कपोत तथा प्रस्तर के ऊर्ध्वभाग का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त तुलाबन्ध, प्रस्तर का प्रमाण, लेप, विषम एवं सम मान, द्वार, वेदि, जालक तथा भित्ति का विवेचन किया गया है। १७. सन्धिकर्म-विधान—इस अध्याय में सन्धि की परिभाषा एवं सन्धि की विधि समझाते हुये सन्धि के भेद, सन्धि के नियम, मल्ललीला, सर्वतोभद्र, नन्द्यावर्त, स्वस्तिबन्ध, वर्धमान तथा सन्धि के अन्य भेदों का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त स्तम्भ की सन्धियाँ, शयित सन्धियाँ, विद्ध तथा कील वर्णित हैं। अध्याय के अन्त में सन्धि के दोषों का निरूपण किया गया है। १८. प्रासादोर्ध्ववर्गाः—इसके अन्तर्गत भवन के शीर्षभाग, उसके अंगों तथा अलंकरणों का वर्णन किया गया है। इसके अन्तर्गत गल्लक्षण, शिखरों के भेद, शिखरों की आकृति, स्तूपिका की ऊँचाई, लुपाओं की संख्या, पुष्कर, लुपा-प्रमाण, लुपाओं के पाँच भेद, शिखर के अंगों के प्रमाण, आच्छादन, वलयसन्धि, घटिका, लुपा के ऊपर आच्छादन, स्तूपिका की कील, ललाटभूषण, स्तूपिका, लेप एवं सुधा- कर्म, चित्रकर्म, मूर्ध्नेष्टिका, स्तूपिकाकील, मूर्ध्नेष्टकास्थापन आदि वर्णित हैं। तदनन्तर आचार्य को दान एवं दक्षिणा देना, प्रासाद में रत्न स्थापित करना, कर्मसमाप्ति, स्तूपिका- कील के वृक्षों का विवेचन, सम्प्रोक्षण कर्म, अधिवास मण्डप, कुम्भस्थापन, वास्तुदेवता बलि, चक्षुमोक्षण, सम्प्रोक्षण, स्तूपिकाकुम्भ, दक्षिणादान, सम्प्रोक्षण की आवश्यकता, सम्प्रोक्षणकाल तथा कलशस्थापन वर्णित हैं। १९. एकभूमिविधान—इस अध्याय में एक तल के प्रासादों के चार प्रकार के प्रमाण वर्णित हैं। इसमें मुखमण्डप, भवनों के पर्याय, गर्भगृह का प्रमाण, स्तूपिका- प्रमाण, द्वार, नाल-प्रमाण, अलंकरण, मन्दिरों के भेद एवं विमानतल के देवता वर्णित हैं।
( १० ) २०. द्विभूमिविधान—इस अध्याय में द्वितल प्रासाद के पाँच प्रमाण वर्णित हैं। इसके अन्तर्गत स्वस्तिक, विपुलसुन्दर, कूट, कैलासादि भेद, भवनों के भेद, खण्ड ‘भवन तथा तोरण वर्णित हैं। २१. त्रिभूमिविधान—इसके अन्तर्गत त्रितल भवन के पाँच भेद, स्वस्तिक, विमलाकृति, हस्तिपृष्ठ, मुखमण्डप, पुनः हस्तिपृष्ठ, स्तम्भतोरण, पुनः हस्तिपृष्ठ, भद्रकोष्ठ, वृत्तकूट, सुमङ्गल, गान्धार, श्रीभोग, कूटकोष्ठादि, धामभेद, नालीगृह ( गर्भगृह ), वेदिका, तोरणादि-विधान एवं सोपान वर्णित हैं। २२. चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधान—इस अध्याय में चतुर्भौम देवालय के पाँच भेद—सुभद्रक, श्रीविशाल, भद्रकोष्ठ, जयावह तथा भद्रकूट वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त कपोतपञ्जर, पुनः भद्रकूट, मनोहर, आवन्तिक एवं सुखावह का वर्णन है। चार तल के अतिरिक्त पाँच तल, छः से ग्यारह तल, बारह तल, खण्डहर्म्य तथा कूटकोष्ठादि का वर्णन प्राप्त होता है। २३. प्राकार-परिवार-विधान—इसमें प्राकार या चारदिवारी की आवश्यकता, प्राकार का प्रमाण, प्राकार की भित्ति, आवृतमण्डप, भित्ति के शीर्षालंकार, अधिष्ठान की ऊँचाई, परिवारालय-विधान, अष्ट परिवार, द्वादश परिवार, षोडश परिवार, बत्तीस परिवार, मालिकापंक्ति, पीठलक्षण, ध्वजस्थान, प्राकाराश्रित स्थान, शक्तिस्तम्भ, अन्य स्थान, विष्णु परिवार तथा वृषलक्षण वर्णित हैं। २४. गोपुर-विधान—इस अध्याय में अत्यन्त छोटे-छोटे, मध्यम तथा उत्तम प्रकार के भवनों या देवालयों को दृष्टि में रखकर गोपुर-निर्माण पर प्रकाश डाला गया है। प्रधान रूप से गोपुर के पाँच भेद प्राप्त होते हैं, जो द्वारशोभा, द्वारशाला, द्वारप्रासाद, द्वारहर्म्य एवं गोपुर संज्ञक कहे गये हैं। इनका प्रमाणसहित वर्णन प्राप्त होता है। इस प्रसंग में द्वारमान, अधिष्ठान आदि का प्रमाण, गोपुर के श्रीकर आदि पन्द्रह भेद, एकतल गोपुर, द्वितल, त्रितल, चतुस्तल, पञ्चतल, षट्तल तथा सप्ततल गोपुरों का वर्णन किया गया है। तदनन्तर गोपुर का विस्तारमान एवं उनके कूट-कोष्ठादि अंगों का विवेचन, द्वार-विस्तारमान, गोपुर के अलंकरण प्राप्त होते हैं। तत्पश्चात् द्वारशोभा, गोपुर के श्रीकर, रतिकान्त, कान्तविजय भेद; द्वारशाला के विजयविशाल, विशालालय, विप्रतिकान्त भेद; द्वारप्रासाद गोपुर के श्रीकान्त, श्रीकेश तथा केशविशाल भेद; द्वारहर्म्य गोपुर के स्वस्तिक, दिशास्वस्तिक तथा मर्दल संज्ञक भेद; द्वारगोपुर संज्ञक गोपुर के मात्राकाण्ड संज्ञक भेद निरूपित हैं। २५. मण्डप-सभा-विधान—इस अध्याय में मण्डप तथा सभा का लक्षण एवं भेद निरूपित है। सर्वप्रथम देवों, ब्राह्मणों एवं अन्य वर्ण के अनुकूल मण्डप की
( ११ ) चर्चा की गई है। इसके पश्चात् मनुष्य के अनुकूल स्थान, मण्डप का प्रयोजन, मण्डप के नाम, उसके प्रमाण, स्तम्भमान, अधिष्ठान की ऊँचाई, उपपीठ की ऊँचाई, मण्डप के लक्षण, मण्डप का अर्थ, प्रपालक्षण तथा रङ्गलक्षण वर्णित है। मण्डप के प्रकारों में मालिका, मेरुक, विजय, सिद्ध एवं यागमण्डप वर्णित हैं। यागमण्डप के सन्दर्भ में कुण्ड के लक्षण तथा उसके भेदों—योनिकुण्ड, अर्धचन्द्र, द्व्यस्र, वृत्त, षट्कोण, पद्म, अष्टास्र, सप्तास्र तथा पञ्चास्र का निरूपण किया गया है। इसके अनन्तर सिद्ध, पद्मक, भद्रक, शिव, वेद, अलंकृत, दर्भ, कौशिक, कुलधारण, सुखाङ्ग, सौम्य, गर्भ, माल्य, माल्याद्भुत, धन, सुभूषण, आहल्य, सुगाख्य, कोण, खर्वट, श्रीरूप, मङ्गल, मार्ग, सौभद्र, सुन्दर, साधारण, सौख्य, ईश्वरकान्त, श्रीभद्र तथा सर्वतोभद्र आदि मण्डपों का लक्षणसहित प्रमाणवर्णन किया गया है। मण्डप के मुखभाग की लम्बाई के पश्चात् पुनः मण्डपों के भेद, जलक्रीड़ा-मण्डप, मण्डप के अनुकूल वृक्ष, मुखमण्डप, मण्डप का गर्भस्थान, अलिन्द्र, मालिका आदि निरूपित हैं। सभा-विधान के प्रसंग में सभाओं के भेद एवं कूटलक्षण वर्णित हैं। सभाभेदों में मल्लवसन्त, पञ्चवसन्तक, एकवसन्तक, सर्वतोभद्र, पार्वतकूर्म, माहेन्द्र, सोमवृत्त, शुक- विमान तथा श्रीप्रतिष्ठित वर्णित हैं। २६. शाला-विधान—इसके अन्तर्गत शाला का विस्तार, उसकी लम्बाई, ऊँचाई, एकशाल गृह के सामान्य लक्षण का वर्णन प्राप्त होता है। तदनन्तर शाला के भेदों में प्रथम दण्डक, द्वितीय दण्डक, तृतीय दण्डक, चतुर्थ दण्डक, पञ्चम दण्डक, मौलिक, स्वस्तिक तथा चतुर्मुख आदि वर्णित हैं। पुनः दण्डक आदि के सामान्य लक्षण वर्णित हैं। द्विशाल भवनों के चतुर्मुख, स्वस्तिक, दण्डवक्त्र भेद; त्रिशाल भवनों के मेरुकान्त, मौलिभद्र भेद तथा त्रिशाल भवन का प्रमाण प्राप्त होता है। चतुश्शाल भवनों के प्रमाण एवं भेद तथा उसके दैर्घ्य का प्रमाण वर्णित है। इनके भेदों में प्रथम सर्वतोभद्र, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ तथा पञ्चम सर्वतोभद्र वर्णित हैं। इसके पश्चात् विमान आदि के लक्षण तथा वर्धमान के सात भेद वर्णित हैं। नन्द्यावर्त संज्ञक चतुश्शाल गृह के पाँच भेद, स्वस्तिक भवन, रुचक भवन, चतुश्शाल भवन की सामान्य विधि, सप्तशालादि, गर्भस्थान, वंशद्वार, विहारशाल, शालापाद-प्रमाण, आयादि लक्षण तथा खलूरी का निरूपण किया गया है। २७. चतुर्गृह-विधान—इस अध्याय में चतुश्शाल भवनों का विस्तार से निरूपण प्राप्त होता है। इसमें प्रथमतः वाटभित्ति ( चारदिवारी ), खलूरिका, भिन्नाभिन्न गृह, गृहविन्यास, मध्यमण्डल का प्रमाण, मध्यवेदिका, मध्यमण्डप का लक्षण, अन्नागार आदि स्थान, सुखालय, चतुश्शाल का सामान्य प्रमाण, अन्नालय, धान्यालय, धनालय, गृह के ऊर्ध्व भाग का वर्णन, वास्तुमण्डप-प्रमाण, गर्भस्थान तथा मुहूर्त-स्तम्भ निरूपित
( १२ ) हैं। इसके पश्चात् भवन के सामान्य नियम, अलिन्द्र, गृहस्वामी का स्थान, भोगविन्यास, चुल्ली( चूल्हा )-लक्षण, चूली की संख्या तथा पुनः भोगविन्यास वर्णित है। तदनन्तर वस्तुभेदों में दिशिभद्रक, गरुड़पक्ष, कायभार, तुलानीय; द्वारों का प्रमाण, गृहनिर्माणकर्म का काल, द्वारस्थान, वासविन्यास एवं गृहारम्भ-काल निरूपित है। २८. गृहप्रवेश—यह अध्याय गृहनिर्माण के पश्चात् गृहप्रवेश से सम्बद्ध धार्मिक कृत्यों का निरूपण करता है। इसमें अधिवास, कलशस्थापन, बलिविधान, स्थपति- निर्गमन, गृहपति एवं गृहिणी का प्रवेश आदि कर्म वर्णित हैं। २९. राजवेश्म-विधान—इस अध्याय में राजवेश्म के प्रमाण, अधमवेश्म ( छोटे राजभवन ) का विन्यास, गोपुर, गृहविन्यास, परिखा, पुनः गृहविन्यास, प्रथम आवरण ( प्राकार ), द्वितीय आवरण, तृतीय आवरण, नगर, नगरभित्ति, राजवेश्म के गोपुर, वेश्मतल लम्बविधान, नरेन्द्रवेश्म, प्राकार, वेश्मविन्यास आदि वर्णित हैं। सौबल संज्ञक वेश्म का प्रथम आवरण, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ तथा पञ्चम आवरण वर्णित हैं। तदनन्तर अधिराज मन्दिर, नगर के भेद, हस्तिशाला, अश्वशाला, विभिन्न प्रकार के भवन, मन्त्रशाला, प्रसाधन कक्ष, अभिषेकशाला, तुलाभारस्थान तथा हिरण्यगर्भस्थान का विवेचन किया गया है। ३०. द्वार-विधान—इस अध्याय में द्वार के माप, योग ( चौखट ) का प्रमाण, कवाट, शुभ एवं अशुभ द्वार, द्वार के स्थान, गोपुर-प्रमाण तथा गोपुर के प्रकारों में एकतल गोपुर, द्वितल गोपुर एवं उनके रतिकान्त, कान्तविजय तथा सुमङ्गल भेद, त्रितल गोपुर तथा उनके मर्दल, मात्रखण्ड, श्रीनिकेतन संज्ञक भेद, सप्ततल गोपुर के भद्रकल्याण, सुभद्र तथा भद्रसुन्दर संज्ञक भेद, षट्टल गोपुर, पञ्चतल गोपुर, चतुस्तल गोपुर एवं उनके सामान्य नियम वर्णित हैं। ३१. यानाधिकार—इस अध्याय में यान एवं शयन के भेद, शिबिकाभेद, पीठा, अन्य शिबिकायें तथा रथ का वर्णन लक्षण एवं प्रमाणसहित प्राप्त होता है। ३२. शयनासनाधिकार—इसमें लक्षण एवं प्रमाणसहित शयन, पर्यङ्क, आसन, सिंहासन, पूजा-पाठ एवं आयादि का वर्णन किया गया है। ३३. लिङ्गलक्षण—इस अध्याय में सकल ( अभिव्यक्त अंग ), निष्कल ( बिना अंग आदि के ) तथा मिश्र लिङ्ग का वर्णन प्राप्त होता है। सकल बेर ( प्रतिमा ), निष्कल ( लिङ्ग, पिण्डी ) तथा मिश्रमुख लिङ्ग होता है। इस प्रसंग में शिलालक्षण, उचित काल एवं विधि से शिलासंग्रह; इसका मन्त्र, लिङ्ग का प्रमाण, लिङ्ग का स्थान, नागर, द्राविड़ तथा वेसर लिङ्ग, हस्तमाप से लिङ्गप्रमाण, द्वारादि के अनुसार लिङ्गमान, आयादि, लिङ्गलक्षण, सर्वतोभद्र आदि लिङ्गप्रमाण, सुरार्चित आदि लिङ्गों के भेद,
( १३ )
आर्ष लिङ्ग, स्वयम्भू लिङ्ग, शिरोवर्तन, लक्षणोद्धरण, नागरलिङ्ग—द्राविड़ तथा वेसर लिङ्ग के लक्षणोद्धरण, सूत्र का व्यास एवं गहराई, सामान्य विधि, सूत्राग्रलक्षण, स्फाटिक लिङ्ग, मृण्मय लिङ्ग, लिङ्ग-स्थापन तथा लिङ्ग-स्थापन का फल निरूपित है। ३४. पीठलक्षण—इस अध्याय में पीठलक्षण के प्रसंग में पीठद्रव्य, पीठप्रमाण, पीठ का आकार, पीठों के नाम, भद्रपीठ, पद्मपीठ, वज्रपद्मपीठ, महाब्जपीठ, श्रीकरपीठ, पीठपद्मपीठ, महावज्र तथा सौम्यपीठ तथा श्रीकाम्यपीठ वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त पीठों के सामान्य लक्षण, ब्रह्मशिला, नन्द्यावर्त शिला, प्रतिमाओं के पीठ, पीठों के मान से प्रासाद का प्रमाण, बेर ( प्रतिमा ) के प्रमाण से प्रासाद का प्रमाण, अष्टबन्ध ( गारा ) का संग्रहण तथा गर्भगृह में बेर के स्थान निरूपित हैं। ३५. अनुकर्म-विधान—इस अध्याय में अनुकर्म-विधान के अन्तर्गत भवन का जीर्णोद्धार, लिङ्गजीर्णोद्धार, पीठजीर्णोद्धार, बेरजीर्णोद्धार, सामान्य विधि, ग्रामादिकों का जीर्णोद्धार, बाल ( अस्थायी लिङ्ग ) का स्थापन आदि वर्णित हैं। ३६. प्रतिमा-लक्षण—इस अध्याय में ब्रह्मा, विष्णु, वराह, त्रिविक्रम, नारसिंह, अनन्तशायी, महेश्वर, षोड़श मूर्तियाँ, सुखासनमूर्ति, वैवाहमूर्ति, सोमास्कन्दमूर्ति, वृषारूढ़मूर्ति, त्रिपुरान्तकमूर्ति, नृत्तमूर्तियाँ, चन्द्रशेखरमूर्ति, अर्धनारीश्वरमूर्ति, हरिहरमूर्ति, चन्द्रेशानुग्रहमूर्ति, कामारिमूर्ति, कालनाशमूर्ति, दक्षिणामूर्ति, भिक्षाटनमूर्ति, कङ्गालमूर्ति, मुखलिङ्ग, षण्मुख, गणाधिप, सूर्य, दिक्पाल—इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, चन्द्र, ईशान, काम, अश्विनद्वय, वसुगण, मरुद्गण, रुद्र, विघ्नेश्वर, क्षेत्रपाल, चण्डेश्वर, आदित्य, सप्तर्षि, सप्तरोहिणी, गरुड, शास्ता, मातृकायें, वीरभद्र, ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, विनायक, मातृकाओं की स्थापना, चामुण्डी, परिवार, लक्ष्मी, यक्षिणी, कात्यायनी, दुर्गा, सरस्वती, ज्येष्ठा, भूमि, पार्वती, सप्तमाता, बुद्ध, जिन, सामान्य विधि, बेर के प्रमाण, जङ्गम बेर के प्रमाण तथा द्वारपाल की मूर्तियों के लक्षण प्रमाणसहित वर्णित हैं। परिशिष्ट—इसमें कूप के निर्माण के विषय में विविध विद्वानों के मत उद्धृत हैं। इस प्रकार विषयवस्तु की दृष्टि से मयमत ग्रन्थ में प्रथम 'वस्तु' ( अथवा वास्तु ) भूमि है। तदनन्तर ग्राम-नगरादि का स्थान आता है। इसके पश्चात् देवों एवं चारो वर्णों के लिये भूमि, भवन, यान तथा शयनासन का स्थान आता है। तीसरे एवं चौथे अध्याय में भूमि के परीक्षण का वर्णन प्राप्त होता है। तदनन्तर माप के विभिन्न प्रकारों एवं ईकाइयों का निरूपण किया गया है। चार प्रकार के शिल्पी—स्थपति, सूत्रग्राही, तक्षक तथा वर्धकि निर्माणकार्य के अभिन्न अंग हैं; अतः इनका ग्रन्थ में विस्तार से वर्णन किया गया है। निर्माणहेतु दिशा का सटीक ज्ञान एवं कार्य के अनुसार वास्तुपद-
( १४ ) विन्यास आवश्यक होता है। अतः ग्रन्थ में इनका विवेचन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त ग्राम, नगर, भवन, नींव में गर्भविन्यास, उपपीठ, अधिष्ठान, स्तम्भ, द्रव्य- संग्रह, प्रस्तरकरण, सन्धिकर्म, कलश, छत एवं शिखर आदि का निरूपण किया गया है। देवालय, राजभवन-मर्यादा, गोपुर, मण्डप, सभागृह, शालगृह, अलिन्द्र, आंगन आदि वास्तु के अंग हैं। इनका भी विवेचन ग्रन्थ में प्राप्त होता है। भवन की सम्पूर्णता यान-शयनादि उपस्करों के विना पूर्ण नहीं होती; अतः ग्रन्थकार ने इन्हें भी वास्तु का वर्ण्य विषय बनाया है। इसी प्रकार प्रासाद की परिकल्पना देवविग्रह से रहित अकल्पनीय होती है। अतः ग्रन्थकार ने सकल ( प्रतिमा ), निष्कल ( लिङ्ग ) एवं मिश्र ( मुखलिङ्ग ) का लक्षणसहित प्रतिपादन किया है। महादेव शिव के प्रति अनन्य भक्ति होने के कारण ग्रन्थकार ने पौरुष लिङ्ग, स्वयम्भू लिङ्ग, धारालिङ्ग, स्फाटिक लिङ्ग आदि का अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया है। अन्य देवी-देवताओं का भी विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। इस प्रकार मय ने वास्तुशास्त्र के सभी पक्षों पर प्रकाश डाला है। ग्रन्थ पर शैव मत का प्रभाव मयमत ग्रन्थ पर शैव मत का अत्यधिक प्रभाव परिलक्षित होता है। प्रो० कपिला वात्स्यायन ( मयमतम् ग्रन्थ की भूमिका, ब्रूनो डेगेन्स द्वारा सम्पादित ) ने इस पर कामिकागम, मुख्यतः पूर्व कामिकागम का प्रभाव माना है। शैव सिद्धान्त पर आधारित इस ग्रन्थ में शैवागमों का प्रभाव परिलक्षित होता है; तथापि बुद्ध एवं जिन तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा का लक्षण एवं वर्णन ग्रन्थकार के अन्य दार्शनिक धाराओं के प्रति दृष्टिकोण का परिचायक है। ग्रन्थ के प्रकाशन इस ग्रन्थ का सम्भवतः प्रथम प्रकाशन गणपति शास्त्री द्वारा १९११ में अनन्तशयन संस्कृत ग्रन्थावलि के ग्रन्थांक ६५ में हुआ था। वर्तमान समय में यह ग्रन्थ अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण स्थिति में प्राप्त होता है। इसके पश्चात् १९७०-७६ में फ्रेञ्च इन्स्टिट्यूट आफ इन्डोलॉजी ( वर्तमान समय में फ्रेञ्च इन्स्टिट्यूट ) पाण्डिचेरी से प्रकाशित हुआ। १९८५ में सीताराम भारतीय इन्स्टिट्यूट आफ साइन्टिफिक रिसर्च, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात् इन्दिरा गाँधी नेशनल सेण्टर फार द आर्ट्स, नई दिल्ली से कलामूलशास्त्र ग्रन्थमाला-१४ में इस ग्रन्थ का प्रकाशन ब्रूनो डेगेन्स के अंग्रेजी अनुवाद के साथ हुआ। इतने प्रकाशनों के पश्चात् भी हिन्दीभाषी पाठकों के लिये इस ग्रन्थ का अध्ययन दुष्कर ही बना रहा। अतः इस ग्रन्थ को हिन्दी भाषा में भावानुवाद, विशिष्ट व्याख्यात्मक
( १५ ) टिप्पणी, पारिभाषिक शब्दावली एवं विषय को समझने में सहायक चित्रावली के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है। कृतवेदिता पुष्पाञ्जलि मेरी प्रथम पुष्पाञ्जलि पराम्बा-सहित भगवान् शिव के चरणों में समर्पित है, जिनकी कृपा के बिना यह कार्य सम्भव नहीं था। मयमत ग्रन्थ के कर्ता दैत्यराज मय तथा सभी पूर्व सूरियों को मैं नमन करती हूँ, जिनके आशीर्वाद से एवं ग्रन्थों के अव- लोकन से मैं इस ग्रन्थ की ग्रन्थियों को सुलझा सकी। इस कार्य की योजना उपस्थित करने वाले तथा भरपूर सामग्री सुलभ कराने वाले चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन परिवार के श्री नवनीतदास जी गुप्त जी मेरी कृतज्ञता के अत्यधिक पात्र हैं। विषय-विशेषज्ञ न होते हुये भी मेरे शैक्षणिक कार्य में अत्यधिक रुचि रखते हुये हर कदम पर उत्साहित करने वाले अपने पति डॉ. राधेकृष्ण पाण्डेय की मैं अत्यधिक आभारी हूँ, जिनके द्वारा प्रदत्त पूर्ण सहयोग एवं मनोबल के कारण मैं इस कार्य को हर बाधा पार करते हुये पूर्ण कर सकी। गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ ( अधुना गंगानाथ झा परिसर ), इलाहाबाद के ग्रन्थालय का मैंने इस कार्य में भरपूर प्रयोग किया है; अतः मैं सम्पूर्ण लाइब्रेरी- परिवार को धन्यवाद देती हूँ। अन्ततः चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी की मैं कृतज्ञ हूँ, जिन्होंने अत्यल्प समय में इस ग्रन्थ को सुन्दर कलेवर में प्रकाशित करने का भार उठाया। मानवीय दुर्बलताओं के कारण इस ग्रन्थ में हुई त्रुटियों के लिये सभी सुधिजनों से क्षमा-प्रार्थना करती हुई— विदुषां वशंवदा शैलजा पाण्डेय
विषयानुक्रमणी विषयाः पृष्ठाङ्काः प्रथमोऽध्यायः (संग्रहाध्यायः ) ◆ मङ्गलाचरणम् १ ◆ ग्रन्थविषयसूचना १ ◆ ग्रन्थप्रामाण्यकथनम् ३ द्वितीयोऽध्यायः (वस्तुप्रकारः ) ◆ वस्तुभेदाः ४ ◆ भूमिभेदाः ४ ◆ भूप्राधान्ये हेतुः ५ ◆ वर्णानुरूपा भूमिः ५ तृतीयोऽध्यायः (भूपरीक्षा ) ◆ अनिन्द्या भूः ८ ◆ निन्द्या भूः ९ ◆ सर्वोत्कृष्टा भूः ११ चतुर्थोऽध्यायः (भूपरिग्रहः ) ◆ भूग्रहणे कर्तव्यानि १५ ◆ उत्तमादिभूलक्षणम् १७ पञ्चमोऽध्यायः (मानोपकरणम् ) ◆ शिल्पिलक्षणम् २१ विषयाः पृष्ठाङ्काः ◆ स्थपतिः २१ ◆ सूत्रग्राही २२ ◆ तक्षकः २२ ◆ वर्धकिः २२ षष्ठोऽध्यायः (दिक्परिच्छेदः ) ◆ शङ्कुलक्षणम् २९ ◆ अपच्छाया ३१ ◆ रज्जुलक्षणम् ३१ ◆ खातशङ्कुलक्षणम् ३२ ◆ सूत्रविन्यासम् ३२ ◆ पुनरपच्छाया ३४ सप्तमोऽध्यायः (पदविन्यासः ) ◆ द्वात्रिंशत् पदानि ३६ ◆ सकलम् ३८ ◆ पेचकम् ३९ ◆ पीठम् ३९ ◆ महापीठम् ३९ ◆ उपपीठादि ४० ◆ दैवतस्थानानि ४१ ◆ मण्डूकपदम् ४२ ◆ वास्तुपुरुषविधानम् ४३ ◆ पुनर्मण्डूकपदम् ४४ ◆ परमशायिपदम् ४५
( १७ ) विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः अष्टमोऽध्यायः | द्वादशोऽध्यायः ( बलिकर्म ) | ( गर्भविन्यासः ) ✦ आहत्यबलिः ४८ | ✦ फेला १०२ ✦ साधारणबलिः ५० | ✦ गर्भस्थापनम् १०३ ✦ पुनर्मानोपकरणम् ५२ | ✦ शिवगर्भम् १०६ ✦ ग्रामादिमानम् ५२ | ✦ विष्णुगर्भम् १०८ ✦ आयादि ५४ | ✦ ब्रह्मगर्भम् १०८ ✦ विप्रसंख्या ५६ | ✦ षण्मुखगर्भम् १०८ ✦ ग्रामनामानि ५७ | ✦ मानुषहर्म्यगर्भकम् १११ ✦ वीथिविधानम् ५७ | ✦ गर्भमन्त्रः ११६ ✦ ग्रामभेदाः ५८ | ✦ वाप्यादिगर्भः ११६ ✦ द्वाराणि ६१ | ✦ प्रथमेष्टका ११६ ✦ प्रासादस्थानम् ६२ | त्रयोदशोऽध्यायः ✦ दौवारिकाः ६५ | ( उपपीठविधानम् ) ✦ वर्ज्यस्थानानि ६५ | ✦ वेदिभद्रम् १२१ ✦ श्रेणिस्थानम् ६५ | ✦ प्रतिभद्रम् १२१ ✦ गृहलक्षणम् ६६ | ✦ सुभद्रम् १२२ ✦ विन्यासदोषाः ६७ | चतुर्दशोऽध्यायः ✦ गर्भविन्यासः ६८ | ( अधिष्ठानविधानम् ) दशमोऽध्यायः | ✦ अधिष्ठानवस्तुनिर्माणम् १२५ ( नगरविधानम् ) | ✦ अधिष्ठानोन्मानम् १२६ ✦ नगरमानम् ७४ | ✦ पादबन्धम् १२८ ✦ वप्रविधानम् ७६ | ✦ उरगबन्धम् १२८ ✦ वर्ज्यस्थानानि ७६ | ✦ प्रतिक्रमम् १२८ ✦ मार्गाः ७६ | ✦ पद्मकेसरम् १२९ ✦ राजधानी ७७ | ✦ पुष्पपुष्कलम् १२९ ✦ खेटादिभेदाः ७८ | ✦ श्रीबन्धम् १३० ✦ दुर्गाणि ८० | ✦ मञ्चबन्धम् १३० ✦ नगरविन्यासः ८२ | ✦ श्रीकान्तम् १३१ ✦ अन्तरापणम् ८६ | ✦ श्रेणीबन्धम् १३१
( १८ ) विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ पद्मबन्धम् १३१ ✦ वप्रबन्धम् १३१ ✦ कपोतबन्धम् १३२ ✦ प्रतिबन्धम् १३२ ✦ कलशाधिष्ठानम् १३२ ✦ अधिष्ठानसामान्यलक्षणम् १३२ ✦ अधिष्ठानपर्यायनामानि १३३ ✦ निर्गममानम् १३३ ✦ अधिष्ठानप्रतिच्छेदविधिः १३४ पञ्चदशोऽध्यायः ( पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् ) ✦ स्तम्भलक्षणम् १३८ ✦ स्तम्भमानम् १३८ ✦ स्तम्भभेदाः १३९ ✦ दण्डलक्षणम् १४२ ✦ कलशलक्षणम् १४२ ✦ पोतिका १४४ ✦ स्तम्भविषये विशेषः १४५ ✦ द्रव्यपरिग्रहः १४७ ✦ वृक्षलक्षणम् १४७ ✦ शिलालक्षणम् १४८ ✦ इष्टकालक्षणम् १४८ ✦ वर्ज्याः वृक्षाः १४९ ✦ वृक्षसंग्रहणम् १५१ ✦ मुहूर्तस्तम्भः १५४ ✦ इष्टकासंग्रहणम् १५६ षोडशोऽध्यायः ( प्रस्तरकरणम् ) ✦ उत्तरवाजनौ १६५ ✦ प्रमालिका १६६ विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ दण्डिका १६६ ✦ वलयं गोपानञ्च १६६ ✦ कायपादम् १६७ ✦ वाजनम् १६८ ✦ कपोतम् १६८ ✦ प्रस्तरोर्ध्वभागम् १६९ ✦ तुलादिबन्धम् १७० ✦ प्रस्तरमानम् १७२ ✦ लेपः १७३ ✦ युग्मायुग्ममानम् १७३ ✦ द्वारम् १७३ ✦ वेदिः १७३ ✦ जालकानि १७४ ✦ भित्तिः १७५ सप्तदशोऽध्यायः ( सन्धिकर्मविधानम् ) ✦ सन्धिभेदाः १८१ ✦ संन्धिविधिः १८१ ✦ मल्ललीलादिसन्धयः १८२ ✦ सर्वतोभद्रसन्धिः १८३ ✦ नन्द्यावर्तसन्धिः १८४ ✦ स्वस्तिबन्धसन्धिः १८४ ✦ वर्धमानसन्धिः १८४ ✦ सन्धिभेदाः १८५ ✦ स्तम्भसन्धयः १८६ ✦ शयितसन्धयः १८७ ✦ विद्धं कीलं च १८८ ✦ सन्धिदोषाः १८८ अष्टादशोऽध्यायः ( प्रासादोर्ध्ववर्गाः ) ✦ गललक्षणम् १९३
१. अध्याय १-७: वास्तु-परिभाषा, भूमि-लक्षण, शङ्कु-स्थापन एवं ग्राम-नगर विन्यास
( १९ ) विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ शिखरभेदाः १९४ | ✦ दक्षिणादानम् २२४ ✦ शिखराकृतिः १९५ | ✦ सम्प्रोक्षणावश्यकता २२४ ✦ स्तूपिकोत्सेधः १९५ | ✦ सम्प्रोक्षणकालः २२५ ✦ लुपासंख्या १९६ | ✦ कलशस्थापनम् २२६ ✦ पुष्करम् १९६ | एकोनविंशोऽध्यायः ✦ लुपामानम् १९६ | ( एकभूमिविधानम् ) ✦ पञ्जरलुपाभेदाः १९८ | ✦ मुखमण्डपम् २३१ ✦ शिखरावयवमानानि १९९ | ✦ धामपर्यायनामानि २३२ ✦ छादनम् २०० | ✦ गर्भगृहमानम् २३३ ✦ वलयसन्धिः २०० | ✦ स्तूपिकामानम् २३३ ✦ घटिका २०१ | ✦ द्वारम् २३४ ✦ पुनश्छादनम् २०३ | ✦ नालमानम् २३५ ✦ स्तूपिकाकीलम् २०३ | ✦ अलङ्करणम् २३६ ✦ ललाटभूषणम् २०५ | ✦ धामभेदाः २३६ ✦ स्तूपिका २०५ | ✦ विमानतलदेवता २३७ ✦ लेपः सुधाकर्म च २०७ | विंशोऽध्यायः ✦ चित्रकर्म २०९ | ( द्विभूमिविधानम् ) ✦ मूर्ध्नष्टका २१० | ✦ स्वस्तिकम् २४० ✦ स्तूपिकाकीलम् २११ | ✦ विपुलसुन्दरम् २४१ ✦ मूर्ध्नष्टकादिस्थापनम् २१२ | ✦ कूटलक्षणम् २४१ ✦ दक्षिणादानम् २१६ | ✦ कैलासादि २४२ ✦ रत्नादिस्थानम् २१६ | ✦ पुनः धामभेदाः २४४ ✦ कर्मसमाप्तिः २१७ | ✦ खण्डभवनम् २४५ ✦ स्तूपिकीलवृक्षाः २१८ | ✦ तोरणम् २४५ ✦ सम्प्रोक्षणकर्म २१८ | एकविंशोऽध्यायः ✦ अधिवासमण्डपः २१८ | ( त्रिभूमिविधानम् ) ✦ कुम्भस्थापनम् २२० | ✦ स्वस्तिकम् २४८ ✦ वास्तुदेवताबलिः २२१ | ✦ विमलाकृतिकम् २४९ ✦ चक्षुर्मोक्षणम् २२१ | ✦ हस्तिपृष्ठम् २५० ✦ सम्प्रोक्षणम् २२२ | ✦ स्तूपिकुम्भः २२२ |
( २० ) विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ मुखमण्डपम् २५१ ✦ पुनः हस्तिपृष्ठम् २५२ ✦ स्तम्भतोरणम् २५२ ✦ पुनः हस्तिपृष्ठम् २५३ ✦ भद्रकोष्ठम् २५४ ✦ वृत्तकूटम् २५६ ✦ सुमङ्गलम् २५६ ✦ गान्धारम् २५६ ✦ श्रीभोगम् २५७ ✦ कूटकोष्ठादि २५८ ✦ पुनः धामभेदाः २५८ ✦ नालीगृहम् २५८ ✦ वेदिका २५९ ✦ तोरणादिविधानम् २५९ ✦ सोपानम् २६२ द्वाविंशोऽध्यायः ( चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् ) ✦ सुभद्रकम् २६७ ✦ श्रीविशालम् २६९ ✦ भद्रकोष्ठम् २६९ ✦ जयावहम् २७० ✦ भद्रकूटम् २७२ ✦ कपोतपञ्जरम् २७२ ✦ पुनः भद्रकूटम् २७३ ✦ मनोहरम् २७३ ✦ आवन्तिकम् २७४ ✦ सुखावहम् २७४ ✦ पञ्चभूमिविधानम् २७५ ✦ षडाद्येकादशभूम्यन्तविधानम् २७६ ✦ द्वादशतलविधानम् २७७ विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ खण्डहर्म्यम् २७८ ✦ कूटकोष्ठादि २७९ त्रयोविंशोऽध्यायः ( प्राकारपरिवारविधानम् ) ✦ तत्र प्राकारविधानम् २८३ ✦ प्राकारमानम् २८३ ✦ प्राकारभित्तिः २८५ ✦ आवृतमण्डपम् २८६ ✦ सालशीर्षालङ्कारः २८७ ✦ अधिष्ठानोत्सेधः २८८ ✦ परिवारालयविधानम् २८८ ✦ अष्टौ परिवाराः २८९ ✦ द्वादश परिवाराः २८९ ✦ षोडश परिवाराः २८९ ✦ द्वात्रिंशत् परिवाराः २९० ✦ मालिकापङ्क्तिः २९१ ✦ पीठलक्षणम् २९३ ✦ ध्वजस्थानम् २९५ ✦ प्राकाराश्रितस्थानानि २९५ ✦ शक्तिस्तम्भः २९६ ✦ इतरस्थानानि २९६ ✦ विष्णुपरिवारकम् २९७ ✦ वृषलक्षणम् २९८ चतुर्विंशोऽध्यायः ( गोपुरविधानम् ) ✦ पञ्चविधगोपुरमानम् ३०५ ✦ पञ्चविधगोपुरम् ३०६ ✦ द्वारमानम् ३०८ ✦ गोपुरभेदाः ३०९ ✦ एकतलगोपुरम् ३१०
( २१ ) विषया: पृष्ठाङ्का: | विषया: पृष्ठाङ्का: ✦ द्वितलगोपुरम् ३१० | ✦ भक्तिमानम् ३३० ✦ त्रितलगोपुरम् ३११ | ✦ स्तम्भमानम् ३३० ✦ चतुस्तलगोपुरम् ३११ | ✦ अधिष्ठानोत्सेध: ३३१ ✦ पञ्चतलगोपुरम् ३१२ | ✦ उपपीठोत्सेध: ३३१ ✦ षट्तलगोपुरम् ३१२ | ✦ मण्डपलक्षणम् ३३१ ✦ सप्ततलगोपुरम् ३१३ | ✦ मण्डपशब्दार्थ: ३३२ ✦ गोपुरविस्तारमानम् ३१३ | ✦ प्रपालक्षणम् ३३२ ✦ द्वारविस्तारमानम् ३१६ | ✦ रङ्गलक्षणम् ३३२ ✦ गोपुरालङ्कार: ३१७ | ✦ मालिकामण्डपम् ३३३ ✦ श्रीकर-द्वारशोभा ३१७ | ✦ मेरुकम् ३३३ ✦ रतिकान्त-द्वारशोभा ३१८ | ✦ विजयम् ३३४ ✦ कान्तविजय-द्वारशोभा ३१८ | ✦ सिद्धम् ३३४ ✦ विजयविशाल-द्वारशाला ३१९ | ✦ यागमण्डपम् ३३४ ✦ विशालालय-द्वारशाला ३१९ | ✦ कुण्डलक्षणम् ३३५ ✦ विप्रतीकान्त-द्वारशाला ३२० | ✦ योनिकुण्डम् ३३५ ✦ श्रीकान्त-द्वारप्रासाद: ३२० | ✦ अर्धचन्द्रकुण्डम् ३३६ ✦ श्रीकेश-द्वारप्रासाद: ३२१ | ✦ त्र्यस्रकुण्डम् ३३६ ✦ केशविशाल-द्वारप्रासाद: ३२१ | ✦ वृत्तकुण्डम् ३३६ ✦ स्वस्तिक-द्वारहर्म्यम् ३२२ | ✦ षट्कोणकुण्डम् ३३६ ✦ दिशास्वस्तिक-द्वारहर्म्यम् ३२२ | ✦ पद्मकुण्डम् ३३७ ✦ मर्दल-द्वारहर्म्यम् ३२३ | ✦ अष्टास्रकुण्डम् ३३७ ✦ मात्राकाण्ड-द्वारगोपुरम् ३२३ | ✦ सप्तास्रकुण्डम् ३३७ ✦ श्रीविशाल-द्वारगोपुरम् ३२४ | ✦ पञ्चास्रकुण्डम् ३३८ ✦ चतुर्मुख-द्वारगोपुरम् ३२४ | ✦ सिद्धम् ३३८ पञ्चविंशोऽध्याय: | ✦ पद्मकम् ३३९ ( मण्डपसभाविधानम् ) | ✦ भद्रकम् ३४० | ✦ शिवम् ३४० ✦ मण्डपविधानम् ३२८ | ✦ वेदम् ३४१ ✦ मण्डपयोग्यादेशा: ३२८ | ✦ अलङ्कृतम् ३४१ ✦ मण्डपप्रयोजनम् ३२८ | ✦ दर्भम् ३४२ ✦ मण्डपनामानि ३२९ | ✦ कौशिकम् ३४२