भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

७६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह एक टगटगी पिया पथ निहारूँ, भई छै मासी रैन। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, दुख मेलण सुख देश ॥१२१॥ अन्तिम पंक्ति मे 'मेलण' शब्द के स्थान पर 'मेटण' शब्द की अर्थ संगति ठीक बैठती है। ७ मै जाण्यो नही प्रभु को मिलन कैसे होय री। आए मोरे सजना, फिरि गए अंगना, मै अभागण रही सोय री। फारूँगी चीर करूँ गलकथा, रहूँगी वैरागण होय री । चुडिया फोरूँ माग बिखेरू, कजरा मै डारूँ धोय री । निसि बासर मोहि बिरह सतावै, कल न परत पल मोय री। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, मिलि बिछुडी मत कोई री। ॥१२२॥ इस पद मे ब्रजभाषा और खडी बोली का अजीब सम्मिश्रण हुआ है। पद की तीसरी और चौथी पक्तियो पर खडी बोली का प्रभाव विशेष स्पष्ट है। यह भी एक विचारणीय पहलू है कि इन दोनो ही पक्तियो की अभिव्यक्ति नाथ परम्परा के प्रभाव की द्योतक है। अन्तिम पक्ति से व्यक्त होती भावना 'मिलि बिछुड़न मत कीज्यो' प्राय इन्ही शब्दो मे अन्य पदो मे भी मिल जाती है। 'बृहद्राग रत्नाकर' में 'लच्छीराम' नामक किसी सत का निम्नांकित एक पद मिलता है। इन दोनो पदो में भाव और भाषा का गहरा साम्य है। बहुत सम्भव है कि निम्नाकित पद ही कुछ घट बढ और हेर फेर के साथ मीराँ के नाम पर चल पड़ा हो। नीद तोहि बेचूँगी आली, जो कोई गाहक होय। आए मोहन फिरि गए अंगना, मै बैरन रही सोय। कहा करुँ कछु वश न मेरो, आयो धन दियो खोय। लछीराम प्रभु अबके मिले तो, राखूँगी नैन समोय। —पृष्ठ ७९, पद २९२।

प्रयोगाभिव्यक्ति ५७ ८ रानी हो। हारते, सब रैण बिहानी हो। ـــــ ख तई, मन एक न मानी हो। बिन देखे कल ना परे, जिय ऐसी ठानी हो। अंग छीन व्याकुल भई, मुख पिय पिय बानी हो। अन्तर वेदन विरह की, वह पीर न जानी हो। ज्यो चातक घन को रटै, मछरी जिमि पानी हो। मीराँ व्याकुल बिरहणी, सुध बुध बिसरानी हो ॥१२३॥ पदाभिव्यक्ति से पश्चाताप की भावना ही प्रकट होती है। ऐसी अभिव्यक्ति राजस्थानी के कुछ पदो में भी पायी जाती है। ९ पलक न लागै मेरी स्याम बिन। हरि बिन मथुरा ऐसी लागे, शशि बिन रैन अधेरी। पात पात वृन्दाबन ढूँढ्यो, कुज कुज ब्रज केरी। ऊँचे खडे मथुरा नगरी, तले बहै जमुना गहरी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणन की चेरी ॥१२४॥ पद की तीसरी पक्ति का शेष पद से पूर्वापर सबन्ध नही बैठता । १० नीद नही आवे जी सारी रात। करवट लेकर सेज टटोलूँ, पिया नही मेरे साथ। सगरी रैन मोहे तरफत बीती, सोच सोच जिया जात। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आज भयो परभात ॥१२५॥

७८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह

११

मे विरहणी बैठी जागूँ, जगत सब सोवै री आली । विरहणी बैठी रग महल मे, मोतियन की लड पोवै । इक विरहणी हम ऐसी देखी, अँसुवन की माला पोवै । तारा गिन गिन रैण बिहानी, सुख की घडी कब आवै । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल के बिछुड न जावै । ॥१२६॥

१२

दरस बिन दूखण लागै नैण । अब के तुम बिछुरे प्रभुजी, कबहूँ न पायो चैन । सबद सुणत मेरी छतियाँ काँपै, मीठे मीठे बंन । बिरह बिथा कासूँ कहूँ सजनी, बह गई करवत ऐन । कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण । मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैण । ॥१२७॥

पद की तीसरी और पाचवी पक्तियों का निम्नाकित पाठान्तर पाया जाता है। तीसरी पक्ति- "सबद सुणत मेरी छतिया कम्पे, मीठे लागै तुम बेन" या "सबद सुणत मेरी छतिया कम्पे, मीठे लागै बैन"। और पाँचवी पक्ति- "एकटकी पथ निहारूँ, भई छमासी रैन।"

१३

जोहने गोपाल फिरूँ, ऐसी आवत मन मे अवलोकत बारिज बदन, बिबस भई तन मं । मुरली कर लकुट लेऊँ, पीत बसन धारूँ । पछी गोप भेष मुकुट, गो झन सग चारूँ ।

वियोगाभिव्यक्ति ˙ ७९ हम भईं गुल काम लता, वृन्दाबन रैना। पसु पछी मरकर मुनी, श्रवण सुनत बैना। गुरुजन कठिन कानि, कासो री कहिये। मीराँ प्रभु गिरिधर मिलि, ऐसे ही रहिये। ॥१२८॥† पद की छठी और अन्तिम पक्तियो का अर्थ स्पष्ट नहीं होता। अन्तिम पंक्ति की अभिव्यक्ति से मिलन की ही भावना लक्षित होती हैं जबकि शेष पद से वियोग भावना ही स्पष्ट हो उठती है। आराध्य के अनुकूल वैष्णव परम्परा प्रभावित वेश भूषा को स्वीकार कर लेने की अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता है। १४ हो गए श्याम दूइज के चन्दा। मधुबन जाईं भये मधुबनिया, हम पर डारो प्रेम का फंदा। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, अब तो नेह परो मदा। ॥१२९॥ इस पद से व्यक्त होती भावना 'अब तो नेह परो मदा' अन्य वियोग द्योतक और नाथ परम्परा प्रभावित पदो मे भी मिलती हैं। नाथ परम्परा प्रभावित पदो मे यह भावना बहुत ही स्पष्ट है। १५ कान्हा तेरी रे जोवत रह गई बाट। जोवत जोवत इक पग ठारी, कालिन्दी के घाट। कपटी प्रीत करी मनमोहन, या कपटी की बात। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, दे गयो ब्रज चाट। ॥१३०॥ १६ अखिया कृष्ण मिलन की प्यासी। आप तो जाय द्वारिका छाये, लोक करत मेरी हाँसी।

८० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह आम की डार कोयलिया बोलै, बोलत सब्द उदासी । मेरे तो मन ऐसी आवे, करवत लेहो कासी । मीराँ के प्रभु गिरिधर लाल, चरण कँवल की उदासी ॥१३१॥† पद की प्रथम पंक्ति सूरदास के पद से हू बहू मिलती है। अन्तिम पंक्ति मे प्रयुक्त 'उदासी' प्रयोग विचारणीय है। १७ मन हमारा बाध्यो भाई, कँवल नैन अपने गुन । तीषण तीर बेध शरीर, दूरि गयो भाई, लाग्यो तब । जाण्यो नाही, अब न सह्यो जाई री भाई । तत मत औषध कर तक परि न जाई, है कोऊ । उपकार करै, कठिन दर्द री भाई । निकटि हो तुम दूरि नाहि, बेगि मिलो आई, मीराँ । गिरधर स्वामी दयाल, तनकी तपति बुझाई रे भाई । कमल नैन अपने गुन बाध्यो भाई ॥१३२॥† श्री सूर्यनारायण जी चतुर्वेदी से मिला यह पद "ग्रंथ साहिब, भाई बन्दे की बीड़" से उद्धृत है। पद की दूसरी, चौथी और छठी पंक्तियो का अन्तिम हिस्सा क्रमश. तीसरी पाँचवी और सातवीं के प्रारम्भ मे लगा कर पढ़ने से अर्थ संगति ठीक से बैठ जाती है, अन्यथा नही । १८ बिरहनी बावरी सी भई । ऊँची चढ चढ अपने भवन मे टेरत हाय दई । ले अँचरा मुख अँसुवन पोछत उघरे गात सही । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बिछुरत कछु ना कही ॥१३३॥ 'बिछुरत कछु ना कही' जैसी अभिव्यक्ति इस पद की विशषता है ।

वियोगाभिव्यक्ति ८१ १९ हरि तुम काय कूँ प्रीति लगाई। प्रीति लगाई परम दुख दीयो, कैसी लाज न आई। गोकुल छोड़ि मथुरा के जयुँवा मे कोण बडाई। मीराँ के प्रभु गिरिधर नांगर, तुम कूँ नन्द दुहाई ॥१३४॥ २० पिया इतनी बिनती सुनो मोरी, कोई कहियो रे जाय। और न सूं रस बतियाँ करत हो, हम से रहै चित चोरी। तुम बिन मेरे और न कोई, मै सरनागत तोरी। आवन कह गए अजहूँ न आये,दिवस रहै अब थोरी। मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, अरज करूँ करजोरी ॥१३५॥ 'दिवस रहै अब थोरी' जैसी अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता है। "आवन कह गए अजहूँ न आए" पदाभिव्यक्ति कई अन्य पदो मे भी मिलती है। ऐसे कुछ पदो मे अवधि सूचक 'पेउर पलटिया काला केस" जैसी अभिव्यक्ति भी मिलती है, परन्तु उपर्युक्त भावना किसी भी अन्य पद मे प्राप्त नही। २१ देखो सांईया, हरि मन काठ कियो। आवन कहि गयो, अजहू न आयो, करि करि बचन गयो। खान पान सुध बुध सब बिसरी, कैसि करि मै जियों। बचन तुम्हारे तुम्ही बिसरे, मन मेरो हर लियो। मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, तुम बिन फाटत हियो ॥१३६॥ २२ पिया कूँ बता दे मेरे, तेरा गुण मानूँगी। खान पान मोहि फीको सो लागै, नैन रहे दोय छाय। ६

८२ -मीराँ-बृहद्-पद-संग्रहँ बार बार मैं अरज करत हूँ, रैण दिन जाय। मीराँ के प्रभु वेग मिलोगे, तरस तरस जिय जाय ।।१३७।।† २३ पिया जी थे तो कटारी मारी। जिन को पिव परदेस बसत हैं, सो क्यूँ सोवे न्यासी। . . . .... नहीं भावत, आकूँ सदा देहारी। जैसे भवगत जत कौंचरी, सो गत भई है हमारी। बिन दरसण कल न परत है, तुम हम दिये बिसारी। मीराँ के प्रभु तुम्हरे मिलन कूँ, चरण कमल पर वारी ।।१३८।।† पदाभिव्यक्ति में संगति का अभाव है। २४ सोवत ही पलको मे मै तो, पलक लागी पल में पिऊ आये । मै जु उठी प्रभु आदर देण कूँ, जाग परी पिव ढूँढ न पाये । और सखी पिव सूत गमाये, मै जु सखी पिव जागी गमाये । आज की बात कहा कहूँ सजनी, सुपना मे हरि लेत बुलाये । वस्तु एक जब प्रेम की पकरी, अजि भये सखि मन से भाये । वो म्हारों सुने अरु गुनि है, बाजे अधिक बजाये । मीराँ कहै सत्त कर मानो, भक्ति मुक्ति फल पाये ।।१३९।।† स्वप्नानुभूति का ऐसा वर्णन इस पद की विशेषता है। पद की छठी पंक्ति का अर्थ अस्पष्ट है। २५ स्याम को सदेशो आयो, पतियाँ लिखाय माय। पतियाँ अनूप आईं, छतियाँ लगाय लीनी । अचल की दे दे ओट, ̢ऊधो पै बंधाई है।

वियोगाभिव्यक्ति ८३ बाल की जटा बनाऊँ, अग तो भभूत लाऊँ। फाडूॅ चीर करुँ गलकंथा, जोगिन बन जावूंगी। इन्द्र के नगारे बाजै, बदल की फौज आई। तोपखाना पैसखाना उतरा आया बाग मे। मथुरा उजार कीन्ही गोकुल बसाय लीन्ही। कुब्जा सो बाध्यो हेत, मीराँ गाय सुनाई है॥१४०॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबध का सर्वथा अभाव है तथा प्राय क्रिया पद सभी आधुनिक हिन्दी मे है।• २६ मेरे प्रीतम रामकूँ लिख भेजूँ री पाती। स्याम सदेशो कबहुँ न दीन्हो, जानिं बूझि गुझबाती। डगर बुहारुँ पथ निहारुँ, रोय रोय अखियाँ राती। तुम देख्यां बिन कल न परत है, हियो फाटत मेरी छाती। मीराँ के प्रभु कबर मिलोगे, पूरब जनम का साथी॥१४१॥ २७ मतवारो बादर आए रे, हरि को सदेशो कछु नही लाए रे। दादुर मोर पपइया बोले, कोयल सबद सुनाए रे। कारी अधियारी बिजरी चमकै, बिरहिन् अति डरपाये रे। गाजै बाजै पवन मधुरिया, मेहा अति झड लाए रे । कारी नाग बिरह अति जारे, मीराँ मन हरि भाए रे ॥१४२॥ २८ बादल देखि झरी हो श्याम, बादल देखि झरी। काली पीली घटा उमगी, बरस्यो एक घरी। जित जाऊँ तित पाणी ही पाणी, हुई सब मोम हरी। जाकाँ पिया परदेस बसत है, मीजूं बाहर खरी। मीराँ के प्रभु गिरिधर• नागर, कीज्यो प्रीत खरी॥१४३॥

८४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह प्रथम पंक्ति मे "झरी" प्रयोग के बदले "डरी' प्रयोग भी मिलता है। २९ सावण दे रह्यो जोरा रे, घर आओ जो स्याम मोरा रे। उमड घुमड चहु दिसि से आया, गरजत है घनघोरा रे। दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल कर रही सोरा रे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, ज्यो वारु सो हो थोरा रे ॥१४४॥ ३० बरसे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की। सावन मे उमड्यो मेरो मनवां, भनक सुनी हरि आवन की। उमड घुमड चहु दिसि ते आयो, दामिनी दमक झर लावन की। नन्हीं नन्ही बूँदन मेहा बरसे, सीतल पवन सोहावन की। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आनन्द मगल गावन की ॥१४५॥ पदाभिव्यक्ति मे विरोधाभास है। पहले की पक्तयों से विरोध और अन्तिम पक्तियो से आनन्द ही लक्षित होता है। ३१ सुनी हो मै हरि आवन की आवाज। म्हैल चढि चढ़ि जोऊं सजनी, कब आवै महाराज। दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल मधुरै साज। उमग्यो इन्द्र चहु दिसि बरसे, दामिणी छोड़ी लाज। धरती रुप नवा नवा धरिया, इन्द्र मिलण के काज। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बेग मिलो महाराज ॥१४६॥

वियोगाभिव्यक्ति ८५ ३२ कोई कहियो रे प्रभु आवन की। आवन की मन भावन की, कोई। आप नही आवै, लिख नहीं भेजै बाण पड़ी ललचावन की। एक दोइ नैना कह्यो नही मानै, नदिया बहै जस सावन की। कहा करूं कछु बस नही मेरो, पांख नही उड जावन की। मीराँ कहै प्रभु कबर मिलोगे, चेरी भई हू तेरे दावन की।।१४७।।† उपर्युक्त तीनों पदों मे कुछ ऐसा भाव साम्य है कि तीनों ही पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर प्रतीत होते है। "भनक सुनी हरि आवन की" भावना की ही पुनरुक्ति हुई है। "सुनिहौ मै हरि आवन की आवाज" (पद स० ३१) और "कोई कहियो प्रभु आवन की" (पद स० ३२) मे प्रथम दो पदो मे वर्षा और श्रावण का वर्णन है। तीसरे पद की अभिव्यक्ति के अनुसार मीराँ की आँखो पर ही श्रावण छाया हुआ है। अन्तिम पद (स० ३२) चन्द्र सखी के निम्नांकित पद के कुछ विशेष निकट पडता है। 'चन्द्रसखी' के नाम पर भी एक ऐसा ही निम्नांकित पद पाया जाता है। निश्चित रूपेण यह कहना कि पद मौलिक रूपेण किसका है, अति दुरूह है। फिर भी, मीराँ के पदो के साथ हुए भाव और भाषा के अन्तर पर विचार करते हुए यह अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि पद मौलिक रूपेण 'चन्द्रसखी' का ही हो। कोई कहियो रे मोहन आवन की। आप तो जाय द्वारिका छाये, हम को जोग पठावन की। आप न आवै, पतियाँ न भेजै, बात करै ललचावन की। ए दोऊ नैण कहियो न मानै, घटा उमड़ रही सावन की। दिल चाहत उड जाय मिलूँ, पर पाख नही उड़ जावन की। चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, पर कमल लपटावेन की। पद स० ३२ से इस पद का बहुत अधिक साम्य है।

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण और यथावत पाठ प्रस्तुत है:

८६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह गुजराती में प्राप्त पद १ क्यारेँ¹ आवसे घेर कान रे, जोसिडा जोस² जुवो³ ने , दहीयो हमारी वाला दुर्बल थई केरे, थई गई थाकेली⁴ पान रे . वृन्दा ते वनमां वाले रास रच्यो छे, सहस्त्र गोपी मा एक कानरे । बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भावे भरिया भगवान र । ॥१४८॥† पदाभिव्यक्ति में पूर्वापर संबध का निर्वाह नही हुआ है । २ कागद कोण लई जाय रे, मथुरामां लखीए, प्रीत थोडी थोडी थाय⁵ रे । प्रीत तमीने मलवा ने तलखे, ने जोशोमति अन्न न खाय रे । वृन्दाबन की कुज गलियन मे, रोता रजनी जाय रे । मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल चित चोर रे ॥१४९॥† अन्तिम पंक्ति का शेष पद से समन्वय नही होता । ३ कही जइ⁶ करूं रे पोकार, कारी मुनी धावे लागे थे, मे कही जई करूं पोकार रे । पिऊ जी हमारो पारधि भयो थे, मै तो भइ हरिणी शिकार रे । दूर से थी आइ गोली लग गई,शीरू थे,नीकर गयी पारम पार रे । प्रेम नी कटारी पुने⁷ खेच कर मारी था, थई गई हाल बेहाल रे । मीराँ के प्रभु गिरिधरना गुण, हो गई पारम पार रे ॥१५०॥† १ कब, २ पंचाग, ३ देखी, ४ सूखा हुआ, ५ होती है, ६ जाकर, ७ मुझको ।

वियोगाभिव्यक्ति ८७ ४ शामले मल्या त बिसारी, ओधव ने वाले शामले मेल्या ते बिसारी । प्रीत करी ने पालव१ पकडो वाला, प्रेम नी कटारी मुने मारी । गोकुल थी मथुरा मै गयो छो वा'ला, कुब्जा सोलागी छै तस्ली२ । मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल बलिहारी ।।१५१।।† ५ ब्रजमा कयम रेवाशे३ ओधव ना वा'ला, ब्रज मा कयम रेवाशे । आठ दाहडानी४ अवध करी ने गया छो, वा'ला खटमास थय छेहरिने । वृन्दाबन की कुजगलिगाँ वाला, बैठा छे मुख मोरली धरी ने । मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, वा'ला अमोरह्या छे आसडा भरी ने । ।।१५२।।† पदाभिव्यक्ति मे विरोधाभास स्पष्ट है । ६ आव जो म्हॉरे नेडे५, ओधव न वा'ला, आव जो म्हारे नैडे । म्हॉरे आगणिये आबो मेर्यो, वा'ला कानुडो आवीने सायॉ बैडे । अमो जल जमुना भरवा गया ता, वाला कानुडो पड्यो छे म्हारी कैड़े । मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, वा'ला हरि मलवा मन हेरे ।।१५३।।† पद की तीसरी पंक्ति शेष पद से सर्वथा भिन्न पडती है । पद मे पूर्वापर सम्बन्धका भी सर्वथा अभाव है । ७ कांनी भावे देखन जाऊं, श्यामलो वेरागी भयो रे । कोरी मटकी मां नही जमाऊं, गुबालेन हो कर जावूँरे । १ आँचल, २ नेह, ३ रहा जायगा, ४ दिनकी, ५ नजदीक, पास।

८८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह गोरे गोरे अंग पर भभूत लगावूूँ, जोगण होकर जाऊ रे। मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर नागर, श्याम सुदर पार पावूँ रे ।। १५४।।† इस तरह की अभिव्यक्ति का यह एक ही पद प्राप्त है । ८ गोविन्दा ने देश ओघ मुने लेई, जारे गोविन्दा ने देश । मने रे मोहन जी ए मेली, १ रे बिसारी, करडूूँ मोरी करम की रेख । हार तजुगी, शणगार तजुगी, तजुगी काजल की रेख । चीर ने फाडी वा'ला कफनी पेरुगी, लेऊगी जोगन का वेश । गोकुल तजुगी मे मथुरा तजुगी, तजुगी मे ब्रज केरी देश । मीराँबाई के प्रभु गिरधरना गुण, चरण कमल चित्त सग रहेश । ।।१५५।।† पदाभिव्यक्ति पर नाथ पथ का और भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट हैं। ९ आवो ने सलुणा म्हारा मीठडा मोहन, आँख लडी माँ तमने राखूं रे । हरि जेरे जोइये ते तमने आणी,आणी आपुँ २ मीठाई मेवा तमने खावा रे । ऊची ऊंची मेडी स़ाहेबा अजब झरुखा, झरुखे चढ़ी चढी फारबे रे । चुन चुन कलिया वा'ली सेज बिछावुँ,भमर पलग पर सुख नाखुँ वारी रे। मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, तारा चरण कमल मां चित राखूं रे। ।।१५६।।† १० मारा प्राण पातलिया वाहेला आवो रे, तमरे विनाहूँ तो जनम जोगण छूूँ। नाभी कमल की सुरता रे चाली, जई ने तखत पर रास रसीला रे। १ रखी, २ दूँ।

९० मीराँ बृहद्-पद संग्रह १३ ब्रजमा केम रेवाशे, ओधवना वा'ला, ब्रज मा केम रेवाशे । जेरे डाडा जीवन गया छो वा'ला, दु खडा काने कहेवागे । बलवात थई ने वादी शूँ मूको, वा'ला, वरद तमारू जाशे । मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, वा'ला, गोपिका अरज काशे । ।।१६०।।† पद स० ५ तथा उपर्युक्त पद की पचम पक्तियो में साम्य हे, परन्तु शेष पद सर्वथा भिन्न पडता हे । विभिन्न बोलियों में प्राप्त पद पंजाबी १ सावरे दी भालन भाये, सानू प्रेम दी कटारिया । सखी पूछे दोऊ चारे, व्याकुल क्यों मैया नारे । रग के रगीले मोंसे दृग भर मारिया । व्याकुल बेहाल भैयो, सुध बुध भूल गैया । अजहूँ न आये श्याम, कुंज बिहारिया । यमुना की घाटी बाटी, असो तेरी चाल पछाती । बसियां बजावी कान्हा, मैया मत वारिया । मीराँ बाई प्रेम पाया, गिरधर लाल ध्याया । तू तो मेरो प्रभु जी प्यारा, दासी हो तिहारियां ।।१६१।।† पद की आठवी पंक्ति से अन्योक्ति ही स्पष्ट होती है। भाषा क आधार पर भी पद की प्रामाणिकता संदिग्ध ही है ।

वियोगाभिव्यक्ति ९१ खड़ी बोली १ आली सावरे की दृष्टि मानो प्रेम कटारी है। लागत बेहाल भई, तनं की सुधि बुधि गई। तन मन व्यापो प्रेम, मानो मतवारी है। सखियाँ मिलि दुइ चारी, बावरी सो भई न्यारी। हो तो वाको नीके जानो, कुज की बिहारी है। चन्द्र को चकोर चाहे, दीपक पतग दाहै। जल बिन मीन जैसे, तैसे प्रीत प्यारी है। बिनती करो है श्याम, लागो मै तुम्हारे पाम। मीराँ प्रभु ऐसे जानो दासी तुम्हारी है ॥१६२॥† भाव और भाषा दोनो के ही आधार पर पद की प्रामाणिकता संदिग्ध है। २ जल्दी खबर लेना मेहरम मेरी। जल बिना मीन मरे एक छन मे, एनै अमृत पाऊ तो झेरी झेरी। बहुत दिनो का बिछोह घड़ा है, अब तो राखो नेडी नेडी। चकोर को ध्यान लगो चन्दवा सो, नटवा को ध्यान लगी डोरी डोरी। सन्त को ध्यान लगे राम प्यारे, भूख को ध्यान मेरी मेरी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, तुम पर सूरत मेरी ठहरी ठहरी ॥१६३॥†

संघर्षाभिव्यक्ति राजस्थानी में प्राप्त पद १ अब नहि बिसरुँ म्हारे हिरदै लिख्यो हरिनाम् । म्हारे सतगुरु दियो बताय अब नहि बिसरू रे । मीराँ बैठी महल मे, उठत बैठत राम । सेवा करस्यां साध की म्हारे और न दूजो काम । राणा जी बतलाया¹ कहू देणो जवाब । पण लागो हरिनाम् सूं म्हांरे दिन दिन दूनो लाभ । सीप भर्यो पाणी पिवे रे, टाक² भर्यो अन्न खाय । बतलाया बोली नही रे राणो जी गया रिसाय³ । विखरा प्याला राणा जी भेज्या, दीजो मीराँ हाथ । कर चरणामृत पी गई म्हारा सबल धणी⁴ के साथ । विष का प्याला पी गई भजन करे उस ठौर । थारी मारी ना मरूं म्हांरा राखनहार और । राणाजी मोपर कोप्यो रे, मारूं एकज⁵ सेल ।⁶ मार्या पिराछित लागसी दीजो म्हाने पीहर भेल । राणा मोपर कोप्यो रे रती न राख्यो भोद । ले जाती बैकुण्ठ मे, यो तो समझ्यो नही सिसोद । छापा तिलक बनाइया तजिया सब सिगार । म्न्हें तो सरणे राम के भल निन्दो संसार । १ बात करने का प्रयास किया. २ छटाँक भर, बहुत थोडा, ३ क्रुद्ध, ४ स्वामी, पति अर्थ में रूढ़िवाचक हो गयाँ हैं, ५ एक ही, ६ कटारी ।

संघर्षाभिव्यक्ति ९३ माला म्हारे दोवडी¹, सील बरत सिगार। अब के किरपा कीजियो, हूं तो फिर बाँधू तलवार ।।१६४।। कही कही इस पद के आगे निम्नाकित कुछ पक्तिया और भी मिलती हैं — रथा बैल जुताय के ऊटा कसिया भार। कैसे तोडूँ राम सूं, म्हारो भो भो² रो भरतार। राणो साड्यो मोकल्यो जाउँयो एके दौड। कुल की तारण अस्तरी, या तो मुरड चली राठौर। साड़िया पाछो फेरिया रे परत³ न देस्या पॉव। कर सूरापण नीसरी म्हांरे कुछ राणे कुण राव। ससारी निन्दा करै दुखियो सब ससार। कुल सारो ही लाजसी मीराँ जो भया ख्वार। राती माती प्रेम की विष भगत को मोड। राम अमल माती रहै धन मीरा राठौड। २ म्हारे हिरदे लिख्यो जी हरिनाम, अब नहि बिसरू। मै तो हिरदे लिखियो जी गोपाल, अब र्नहि बिसरू। हाथी घोडा बहो घणा माया केर न पार। राज तजूं चितौड को गामडी है असी हजार। साध हमारी आतमा मे साधन की देह। रोम रोम मे राम रह्या ज्यो बादर मे मेह। राती माती हरिनाम की बाँध भक्त को मोर। राम अमल साखी फिरै धन मीरा-राठोर। एक आडी गुरु गोविन्द खडा, एक आडी सब ससार। १ दुलडी, २ जन्मजन्मान्तर, ³ लौटकर।

९४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह कैसे तोडूँ राम सों म्हारो भो भो रो भरतार । संसारी निन्दा करे, रूठो सब परवार१। कुल सारोड लजाइयौ, मीरा बाई बहै अकरार२। भक्त हीन पापी घणा राणा के दरबार । ⁻ के तो विवग प्याला प्याय द्यो, के डाली कठहार । राणो जी विषण प्याला मोकल्यां३, दीज्यो मीरा रे हाथ । मे तो चरणामृत कर पी गइ अब थे जाणो म्हारा नाथ । मीरा विष का प्याला पी गई सोती खूँटी तान४। म्हारो दरद दिवाणो सावरो, म्हाने दौडि जगावेलो आन ॥ ॥१६५॥ इस पद के साथ निम्नांकित पंक्तिया और भी पाई जाती है। राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊ ए माय । म मद भागिन करम अभागिन कीरत कैसे गाऊ ए माय । बिरह पिजड की बाड सखी री, उठकर जी हुलसाऊ ए माय । उपर्युक्त तीन पंक्तिया सत मत से प्रभावित एक अन्य पद का प्रथमांश है। अत इनको तो इस पद से निश्चित रूपेण हटाया जा सकता है। ३ म्हारे हिरदे लिखयो हरिनांव, अब मेना बिसरूं। मीराँ गढ सूं उतरी जी छापा तिलक बणाय । पगा बजावता घूँघरूं जो हाथ बजावतां ताल। माला कंठी दो लडो सील बरत सिणगार । जो कोई हिरदै बस जी, जो कोइ आवणहार । १ परिवार, २ बेकरार, सम्पूर्ण सीमाओ को तोडकर, ३ भेजा, ४ खूंटी तानकर सोना, सर्वथा निश्चिन्त होकर सोना।

संघर्षाभिव्यक्ति ९५ राणो मन मे कोपियो जी मारो याके सेल१। म्हारो तो पिराछित लागै जी, पीहर दो याको मेल । रथडा बैल जुपाइया२ जी, ऊटा कसियो भार । डावो३ छोडो मेडतो जी पेला४ पोषर५ जाय । राणा साडया मोकल्या जी, पाछा ल्यावो मोड । कुल की माडण६ हस्तरी७ जी, मुरड चली८ राठौड । मीराँ वचन उचेरिया९ जी गिरधर म्हारो मोड१० । थे पाछा जावो साडिया जी काने११ मोड़ो जोड१२ ।।१६६।। † इस पद की अन्तिम कुछ पक्तियाँ विशेष विचारणीय है । उपर्युक्त तीनो ही पदो मे स्वानुभूति और अन्योक्ति का विचित्र सम्मिश्रण हुआ है। बहुधा पुनरुक्ति भी हुई है। एक पद से व्यक्त होती किसी घटना का दूसरे पद मे कोई स्पष्ट उल्लेख नही तथापि ऐसी कुछ पक्तिया सभी पदो मे मिल जाती है, जिनसे कि उस घटना विशेष का आभास मिल जाता है । भाव और भाषा के साम्य के आधार पर तीनो ही पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर प्रतीत होते है । ४ मै तो सुमऱ्या छै मदन गोपाल, राणा जी म्हारो काई करसी । मीराँ बैठ्या महल मे जी, छापा तिलक लगाय । आया राणा जी महल मे जी, कोप कऱ्यो छै मन भाय१३ । मीराँ महला से उतऱ्या जी, ऊटा भार कसाय । १ कटार, २ जुतवाये, ३ बाँए, ४ सर्व प्रथम, ५ तालाब, ६ बनाने- वाली, ७ स्त्री, ८ नाराज होकर चली, ९ उच्चारण किया, १० मोड शब्द के तीन अर्थ होते हैं – लौटाना, सन्यासी का अवहेलनात्मक पर्यायवाची, तोडना, ११ किसलिए, १२ जोडी या साथ, विशेषत दम्पति के अर्थ मे ही 'जोडी' शब्द व्यवहृत होता है। १३ मुन मे ।

६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह डावो' छोड़यो मेड़तो कोई सूधा' द्वारका जाय। राणा जी सांड्_यो भेजिया जी, पाछा लावो घेर। घर की नार इस्तरी चाली, चाली छे मुड राठोर। लाजै पीहर सासरो जी, लाजै भाय र बाप। लजे दूदा जी रो मेड़तो जी, कोई चोथी गढ चितौड़। राणा जी विष का प्याला भेजिया जी द्यो मीराँ के हाथ। कर चरणामृत पी गयाँ जी, आप जानो दीनानाथ। पेया२ नाग छोड़िया- जी, छाडो मीरा के महल। हिवड़े३ हार हिडोलिया,४ कोइ तुम जाणो रघुनाथ ॥१६७॥ “दूदा जी रो मेडतो” अभिव्यक्ति विशेष महत्वपूर्ण है। राणा द्वारा साप भेजे जाने का कथानक यहाँ दूसरे ही रूप मे दिया गया है। आराध्य के प्रति “मदन गोपाल” सम्बोधन भी इस पद की विशेषता है। इस पद का भी पहले तीनों पदो से गहरा साम्य है। पाठान्तर १ में तो सुमर्या छै मदन गोपाल, राणो जी म्हांरो काई करसी। मीराँ बैठी महल मे जी छाप। तिलक लगाय। आया राणा जी महल म जी,कोप करियो छै मन माय। मीराँ महैलाँ से उतऱ्या जी ऊटा कसिया भार। डावो छोड्यो मेड़तो कोई सूधा द्वारका जाय। राणा जी साड्_यो भेजियो जी पाछा ल्यावो दौड़। घर की नार इस्तरी चाली, चाली मुड राठौड। लाजै पीहर सासरो जी, लाजै माय र बाप। लाजै दूदा जी रो मेडतो जी लाजै गढ चितोड। विष का प्याला भेजिया जी, द्यो मीराँ के हाथ। कर चरणामृत पी गयां जी, आप जाणो दीनानाथ। १ सीधे, २ पिटारी, ३ हृदय पर, ४ झूला लिया।