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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

६ से भी इस ओर कुछ प्रकाश पडता है। दूदा जी की पुत्री का राणा कुम्भ के साथ ब्याहा जाना समय के दृष्टिकोण से असगत भी नही ठहरता। यहाँ एक और पहलू भी विशेष विचारणीय है। राजस्थान और बगाल की जनश्रुतियाँ मीराँ को सधवा ही प्रमाणित करती है परन्तु ऐसो क्षेत्रो मे जहाँ मीराँ के साहित्य का प्रचार पिछले कुछ वर्षो मे हुआ है, जनश्रुति मीराँ को विधवा ही मानती है। मीराँ के जीवन का प्रमुख भाग राजस्थान मे व्यतीत हुआ अत वहाँ की जनश्रुति तुलनात्मक दृष्टिकोण से अधिक मान्य है। मीराँ की ख्याति राजस्थान के बाहर बगाल मे ही सर्व-प्रथम फैली, यहाँ तक कि बगाल मे 'भजन' शब्द ही मीराँ के पदो के लिये रूढिरूप हो गया। अत राजस्थान के बाद बगाल की जनश्रुति को ही विशेष महत्व दिया जा सकता है। इन दोनो ही जनश्रुतियो से मीराँ विधवा सिद्ध नही होती। विभिन्न स्थलो पर एक ही रूप मे चलने वाली जनश्रुति नितान्त निराधार हो, ऐसा सम्भव नही प्रतीत होता। भक्त-गाथाओ के आधार पर भी मीराँ का वैधव्य कही से भी लक्षित नही होता। अस्तु, अद्यावधि मान्य इतिहास की अपूर्णता को देखते प्राय सभी पदो से व्यक्त होती उपर्युक्त भावना को कोरी जनश्रुति कह कर कदापि टाला नही जा सकता। ऐसी कुछ पदाभिव्यक्तियो मे मीराँ के दृढ भक्ति-भाव की भूरि-भूरि प्रशसा भी मिलती है। स्पष्ट ही है कि ऐसी भक्तिमती नारी द्वारा स्वय अपनी प्रशसा असगत ही है। फिर ऐसे पदो की क्रिया तृतीय-पुरुष वाचक है। इस से भी यही लक्षित होता है कि ऐसे पद किसी अन्य की रचना है। मतभेद द्योतक अधिकाश पद राजस्थानी भाषा मे ही प्राप्त है। कुछ पद ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे और कुछ थोडे से शुद्ध ब्रजभाषा मे भी मिलते है। मतभेद द्योतक पदो मे अधिकाश का राजस्थानी मे पाया जाना सगत भी है। इन राजस्थानी मे प्राप्त पदो की अभिव्यक्ति पर सतमत का गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है जब कि ब्रजभाषा मे प्राप्त पदो पर वैष्णव-प्रभाव ही अधिक स्पष्ट है। ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त पदो पर दोनो ही मतो का प्रभाव है। भाषा के परिवर्तन के साथ ही साथ भावाभिव्यक्ति मे आया यह गहरा परिवर्तन विशेष विचारणीय है। प्राप्त पदाभिव्यक्तियो से ही यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि यह मतभेद शीघ्र ही कटु सघर्ष मे परिवर्तित हो गया। "ताला चौकी" बिठा कर मीराँ को महलो की सीमा मे बाँध रखने का निष्फल प्रयास बार बार

७ किया गया। "जहर पियाला", "साँप पिटारा", "सूल सेज" आदि के द्वारा मीराँ की हत्या का षडयन्त्र भी किया गया। उपर्युक्त प्रयासो में निष्फल क्रुद्ध राणा ने स्वय ही मीराँ को "खड्ग" के पार उतारने का प्रयास किया। इन अप्रिय घटनाओ के कारण असन्तुष्ट हो मीराँ स्वय ही एक दिन पति- गृह त्याग कर अपने पीहर चली जाने को उद्यत होती है। यहाँ पदाभि- व्यक्तियाँ विरोधात्मक है। कुछ पदाभिव्यक्तियो से मीराँ का अपने पीहर मेडते पहुँच कर तीर्थ-हेतु जाना सिद्ध होता है, तो अन्य पदाभिव्यक्तियो से बीच रास्ते से ही तीर्थ की ओर मुड जाना सिद्ध होता है। अधिकांश पदाभि- व्यक्तियाँ प्रथम मान्यता का ही समर्थन करती है। पति-गृह से असतुष्ट हो कर मीराँ का पितृ-गृह जाना और कालान्तर मे तीर्थ-हेतु प्रस्थान, मान्य इतिहास का एक सुनिश्चित पहलू है। इतना ही नही प्राप्त इतिहास का यही एक ऐसा पहलू है जिस पर सब विद्वान् एकमत है और इतिहास व पदाभिव्यक्तियो मे भी गहरा सामञ्जस्य है। इस गहरे साम्य के बावजूद भी इस तीर्थयात्रा के लक्ष्य को लेकर दोनो मे गहरा विरोध है। पदाभिव्यक्तियो के आधार पर जहाँ मीराँ का पितृ-गृह त्याग कर सीधे द्वारिका जाना सिद्ध होता है, वहाँ प्राप्त वृत्तान्त द्वारा मीराँ का वृन्दावन होते हुए द्वारिका जाना ही मान्य है। "डॉवो तो छोडयो मीराँ मेडतो, पेलॉ पोखर जाय" (पद स० १, पाठान्तर २) "डॉवो तो छोडयो मीराँ मेडतो, पुष्कर न्हावा जाय" (पद स० ७) "डॉवो तो छोडयो मीराँ मेडतो, पूठ दयी चितौड" जैसी अभिव्यक्तियो के आधार पर मीराँ द्वारा की गयी तीर्थ-यात्रा का मार्ग निर्धारित किया जा सकता है। ध्रुवदास रचित 'भक्त नामावली' मे ही मीराँ की वृन्दावन-यात्रा का सर्व-प्रथम उल्लेख है। मुशी देवीप्रसाद भी इस विषय मे अनिश्चित ही है। इतना ही नही, उनके मतानुसार मीराँ ने सम्भवत दो बार तीर्थ-यात्रा की थी। घटना और समय के क्रमानुसार विचार करने पर मीराँ द्वारा की गई वृन्दावन-यात्रा असम्भव ही सिद्ध होती है। "इन सरवरिया री पाल" जैसे पदो से उपर्युक्त घटना पर और भी प्रकाश पडता है। ऐसी पदाभिव्यक्तियो से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि सम्पूर्ण राजसी ठाट को छोड कर मीराँ अकेली ही "सरवर के पाल" खडी है। गृह-त्याग कर "पेलॉ पोखर" या "पुष्कर न्हाने" जाने जैसी उपर्युक्त पदाभिव्यक्तियो से लक्षित होनेवाले तीर्थ-यात्रा का मार्ग निर्देश और घटना-क्रम का सामञ्जस्य भी ठीक बैठ जाता है। गृह-त्याग

' ८ के बाद मीराँ की मानसिक स्थिति अत्यन्त करुण हो उठी है। "भर भर धोबा धोये नैन, साधॉ रो सग जोवति" मीराँ "आमण दूमणी" हो उठी हैं। अपने दृढ भक्ति-भाव और समर्पण के बाद भी सतत महल-निवासिनी मीराँ का अपने को नितान्त एकाकिनी पाकर क्षणिक आकुलता का अनुभव करना असंगत भी नहीं कहा जा सकता। सम्भव है कि प्राप्त वृत्तान्त और प्राप्त पदो मे सामञ्जस्य की एक कडी सिद्ध होने वाले इन पदो से व्यक्त होती अन्य भावनाओ और घटनाओ का पक्षपात विहीन विश्लेषण इतिहास की सुदृढ रूपरेखा बनाने मे सफल हो सके। विभिन्न अलौकिक गाथाओ का वर्णन भी इन सघर्ष द्योतक पदो का एक प्रधान अग है। राणा द्वारा मीराँ तक "जहर पियाला" भेजे जाने की कथा प्राय सर्वत्र ही मिलती है। पदाभिव्यक्तियो और प्राप्त सामग्री के आधार पर भी यह सुनिश्चित हो जाता है कि मीराँ के साधु-समागम के कारण फैलती बदनामी के कारण राणा ने मीराँ तक "जहर पियाला" भेजने मे ही अपना कल्याण समझा। अत कुछ लोगो के मतानुसार अपने एक मुँहलगे मुसाहिब के द्वारा और अन्य कुछ किम्बदन्तियो के अनुसार अपनी बहन ऊदाँ बाई के द्वारा यह "पियाला" मीराँ तक पहुँचा दिया जाता है। पदाभिव्यक्तियो से यह प्रकट होता है कि ननद ऊदाँ इस "पियाले" के रहस्य को जानती थी और कई बार मीराँ को इससे आगाह भी कर चुकी थी। नाभादास मे भी मीराँ को बन्धुजन द्वारा दिये गये विष की चर्चा मिलती है। इस विष- पान का प्रभाव मीराँ पर क्या पडा, यह सर्वथा अनिश्चित ही है। मुंशीजी भी दोनो ही मान्यताओ का उल्लेख करते है। एक मान्यता के अनुसार मीराँ की मृत्यु हो जाती है और मरते मरते वे विष लानेवाले राणा के मुँहलगे मुसाहिब को श्राप देती है, जिस के कारण आज तक भी उस मुसाहिब के वश मे धन और जन की वृद्धि एक साथ नही हो पाती। दूसरी मान्यता के अनुसार मीराँ किसी रहस्यमय तरीके से बच जाती है और जब उनके पितृव्य बीरमदेव को इस अप्रिय घटना का पता चलता है तो मीराँ को लिवा ले जाते है। परन्तु यहाँ भी साधु-समागम मे गहरी रोक-टोक है। अत एक दिन मीराँ दोनो ही कुलो और सम्पूर्ण राज वैभव को "तजि बटुक की नाई" चली जाती हैं अपने आराध्य के आश्रय मे। अस्तु, यही सम्भव प्रतीत होता है कि मीराँ ने अपने जीवन की किसी घटना का विष-पान के रूपक मे वर्णन किया हो और नाभादास ने भी

उसकी चर्चा ठीक उसी रूप मे कर दी हो और कालान्तर मे कवि-हृदय का यह सत्य ही जनश्रुतियो मे वस्तुत 'सत्य बन गया हो । जो भी हो, यह तो निश्चित है कि विष-पान की जनश्रुति अन्य जनश्रुंतियो से बहुत पुरानी है क्योकि नाभादास मे भी इस की चर्चा मिलती है। "सूल सेज" और "साँप पिटूरा" भेजे जाने की अथवा "खड्ग" से हत्या के प्रयास की जनश्रुतियो का वर्णन रघुराजसिंह कृत 'भक्तनामावली' मे भी प्राप्त नही होता। अत यह सिद्ध हो जाता है कि इन का प्रचलन बहुत बाद मे हुआ है। फिर, एक ही कथा के कई विभिन्न रूप भी पाये जाते है। अत उनकी प्रामाणिकता और भी संदिग्ध है। उदाहरणार्थ "साँप पिटारा" की कथा है। यह साँप कही "सालिगराम की बटिया" मे, कही "चन्दन हार" मे और कही "मोतीडारो हारो" मे भी परिणतित हो जाता है। इन उपर्युक्त कथाओ के द्योतक कुछ इने-गिने पद वर्णनात्मक शैली मे ही प्राप्त है। अस्तु, ऐसी कथाओ को मीराँ के प्रति भक्तो की अतिरजित श्रद्धांजलि मात्र ही कहा जा सकता है। अभिव्यक्ति के आधार पर अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होनेवाले ये सघर्ष द्योतक सभी पद राजस्थानी मे ही प्राप्त है। उपर्युक्त विभिन्न समूहो मे यही एक ऐसा समूह है जिसके पद केवल राजस्थानी मे ही प्राप्त है। इन प्राप्त पदो मे कुछ पद तो ठेठ पुरानी राजस्थानी मे प्राप्त है और शेष पदो की भाषा आधुनिक राजस्थानी है। मतभेद और सघर्ष द्योतक लगभग सभी पद वर्णनात्मक और कथो- पकथन की मिश्रित शैलियो मे प्राप्त है। शैली के आधार पर ये पद नौटकियो के पद्यबद्ध वार्तालाप कहे जा सकते हैं। पारस्परिक वार्तालाप के बीच- बीच मे कथा-वस्तु का वर्णन नौटकियो के लिये आवश्यक भी सिद्ध होता है। नौटकियो और रामलीला आदि करने वालो मे ऐसी परम्परा प्रचलित भी है। अपनी पुस्तक 'मीराँ बाई' मे पृष्ठ ११ पर डा० श्री कृष्णलाल लिखते है, "मध्य- कालीन भारत मे प्रमुख भक्तो और महापुरुषो की स्मृति अनेक गीतो, कथा-वार्ताओ और प्रसगो तथा रूपको द्वारा जीवित रखी जाती थी। कवि और गायक गीतो और पदो मे उन महात्माओ की कीर्त्ति गाते फिरते थे। वृद्धगण उनके सबन्ध मे अनेक कथा और प्रसग उत्सुक श्रोताओ को सुनाते रहते थे और संगीत अथवा छंदबद्ध वार्तालापो मे उनके जीवन के प्रमुख प्रसग रूपको के रूप मे प्रदर्शित किए जाते थे।" अस्तु, उपर्युक्त श्रेणी के पद

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अपने प्रचलित रूप मे तो प्रमाणिक कदापि नही माने जा सकते हैं। तब भी, सम्पूर्ण प्राप्त सामग्री मे सामञ्जस्य की एक कड़ी सिद्ध होनेवाले इन पदों की अभिव्यक्ति की सर्वथा अवहेलना भी नही की जा सकती । एक मध्य-मार्ग को अपना कर ही इस गम्भीर समस्या का हल निकाला जा सकता है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्राप्त पदाभिव्यक्तियो और प्राप्त सामग्री की मनोवैज्ञानिक आलोचना ही प्रस्तुत समस्या का एकमात्र हल हो सकती है।

  • यहाँ, प्रचलित जनश्रुतियो पर विचार कर लेना भी अप्रासंगिक न होगा। ऐतिहासिक जनश्रुतियो का नितान्त निराधार रूपेण चल पडना सम्भव नही प्रतीत होता। सूक्ष्मातिसूक्ष्म आधार को कल्पना और भावना के आधार पर अतिरजित और अलौकिक बनाया जा सकता है, परन्तु आधार के नितान्त अभाव में ऐसा सम्भव नही प्रतीत होता, विशेषत जब विभिन्न पदाभिव्यक्तियो मे कथा एक ही रूप मे मिलती हो। मीराँ की यात्राओ का मार्ग-निर्देश करने वाली विभिन्न पदाभिव्यक्तियो से एक ही तथ्य प्रकट होता है । इतना ही नही, प्राप्त भक्त-गाथाएँ, पदाभिव्यक्तियाँ और जनश्रुतियो का सम्मिश्रण ही हमारे मान्य इतिहास का एक महत्वपूर्ण आधार है। अस्तु, इतिहास की सुदृढ रूपरेखा तय्यार करने के लिये सम्पूर्ण प्राप्त सामग्री की समन्वयात्मक आलोचना अत्यावश्यक हो जाती है। प्राप्त पदो मे सर्वाधिक सख्या ऐसे पदो की है जिनकी अभिव्यक्ति वियोगात्मक है। ऐसे कुछ पदो मे सघर्ष की भी अभिव्यक्ति मिलती है परन्तु अधिकाश पदो से मात्र वियोग ही.लक्षित होता है। वियोग की यह अभिव्यक्ति अधिकांश सघर्ष-द्योतक पदो मे भी मिलती है। अत प्रस्तुत पुस्तक मे मतभेद द्योतक पदो के बाद ही वियोग द्योतक पद और तब संघर्ष द्योतक पद रखे गये हैं, परन्तु प्रस्तुत विवेचना मे इस क्रम को बदल कर सघर्ष द्योतक पदो की चर्चा पहले ही कर दी गई है क्योकि उपर्युक्त दोनो भावाभिव्यक्ति द्योतक पदो की विवेचना के कई पहलू सर्वथा एक है और शेष मे भी गहरा साम्य है। सघर्ष द्योतक पदो मे प्राप्त वियोगाभिव्यक्तियो मे वह भाव-गाम्भीर्य नही जो वियोग द्योतक पदाभिव्यक्तियो की विशेषता है। ऐसी पदा- भिव्यक्तियो से विरह-व्याकुला नारी की सुरुचिपूर्ण भोजन, भवन और शृङ्गारादि के प्रति गहरी उदासीनता ही लक्षित होती है। नौटकियो की शैली मे प्राप्त पदो मे भाव-गाम्भीर्य ही कृत्रिम सिद्ध होता ।

११ वियोग द्योतक पदो मे "दरद की मारी" नारी की करुण. आतुरता का अति गम्भीर व सुन्दर चित्र खीचा गया है। अन्य भक्त-कवियो मे भी विरहाभिव्यक्ति मिलती है। वैष्णव-साहित्य राधा-कृष्ण के 'प्रेम' और वियोग के गीतो से परिपूर्ण है तो सत-साहित्य भी इसं वियोगाभिव्यक्ति. से रिक्त नही। "राम की बहुरिया" बने हुए कबीर• की वियोगाभिव्यक्ति कही कही नारी हृदय की सहज वियोगाभिव्यक्ति के समकक्ष आ जाती है। इतने पर भी, "सूनी सेज न कोई" या "तेरा साँइयाँ तुझ मे" जैसी भावनाओ का एक अन्त श्रोत सतत् लक्षित होता रहता है। मीराँ की विरहाभिव्यक्ति इन दोनो से ही सर्वथा भिन्न पडती है। यहाँ न तो वैष्णव साहित्य की अतिशयोक्ति है न सत-साहित्य का तत्व-चिन्तन। यहाँ तो केवल एक ऐसा दर्द है जिसको कोई नही जानता और शायद जान भी नही सकता। मीराँ स्वय ही कहती है — "दरद की मारी मै बन बन डोलूँ, मेरो दरद न जाने कोय। घायल की गति घायलया जाने, की जिन लाई होय।" "को विरहणी को दुख जाणे .हो। जा घट विरहा सोई लखि है, कै कोई हरिजन मानै हो।" यह दर्द भी सम्पूर्ण मानव-भावनाओ से ओतप्रोत है ? इस मे खीज है, उपालम्भ है, मनावन है और है आत्म-समर्पण, जो सर्वोपरि है। मीराँ के आँसू गोकुल मे बाढ नही लाते अपितु वे भी "मोतियन की माल" बन जाते है, शायद आराध्य की पूजा हेतु ही। विरहाकुला गोपियाँ मधुबन को आराध्य के वियोग मे भी हरा भरा रहने के लिये धिक्कारती है परन्तु मीराँ स्वय अपने कठिन हृदय को ही धिक्कारती है जो आराध्य के वियोग मे अब तक भी फट नही गया — "पिड माँ सू प्राण पापी, निकस क्यूँ नही जात।" परन्तु यहाँ भी कितनी बडी विवशता है। आराध्य के दर्शनो के लोभ मे ही प्राण अब भी अटके हुए है -- "सावण आवण कहि गया रे, हरि आवण की आस। रैन अधेरी बीज चमकै, तारा गिणत निरास। लेई कटारी कठ सारूँ, मरूँगी जहर विष खाई। मीराँ दासी राम राती, लालच रही ललचाइ।" मीराँ द्वारा की गई इस गम्भीर विरहाभिव्यक्तियो मे किसी व्यक्तिगत

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दाम्पत्य, सम्बन्ध को व्यक्त करने वाला अन्त श्रोत पुन पुन लक्षित हो उठता है। अस्तु, श्री परशुराम 'जी चतुर्वेदी के शब्दो मे कहा जा सकता हे कि “मीराँबाई के इष्टदेव सगुण व साकार श्रीकृष्ण थे ।"१ वियोगाभिव्यक्ति द्योतक पद राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, ब्रज, गुजराती, पजाबी और खडी-बोली आदि विभिन्न बोलियो मे प्राप्त है। ॰राजस्थानी और ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त पदो की अभि- व्यक्ति लगभग एक ही सी पडती है। ये अभिव्यक्तियाँ हृदय-गत भावनाओ के छद-अलंकार-विहीन शुद्धतम चित्र है। इनकी अभिव्यक्ति मे एक तडप है, एक टीस है। अधिकांश पदो मे अपने इष्टदेव से शीघ्रातिशीघ्र दर्शन देने के लिये अति करुण प्रार्थना की गई है। ऐसे कुछ पदो पर नाथ- पथ का हल्का-सा प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त कुछ पदो पर सतमत का भी प्रभाव मिलता है। ऐसे कुछ पदो मे गुरु की चर्चा मिलती हे। एक पद मे मीराँ अपने गुरु का नाम रैदास बताती हे। ब्रजभाषा मे प्राप्त पद साहित्यिक सौन्दर्य का विशेष रूपेण सृजन करते है। यहाँ तक कि कुछ पद तो सूरदास के पदो से भी ॰ होड लेते से प्रतीत होते है। ऐसे अधिकांश पदो मे पौराणिक गाथाओ का ही वर्णन है। हिन्दी की अपूर्व गायिका मीराँ की महत्ता एक कवयित्री के रूप मे नही अपितु एक भक्तिमती नारी के रूप मे ही है। हृदय-गत भावनाओ की सहज सरल अभिव्यक्ति के कारण ही ये पद इतने अधिक जन-प्रिय हो सके है। मीराँ का वृन्दावन-गमन और निवास बहु-मान्य होते हुए भी असदिग्ध नही। प्राप्त सामग्री मे घटना और समय के क्रमो मे असम्बद्धता स्पष्ट ही है। शास्त्रीय शिक्षा का सुअवसर भी मीराँ को प्राप्त हुआ हो, ऐसा भी प्राप्त सामग्री से स्पष्ट नही होता। अस्तु, विशुद्ध ब्रजभाषा मे उच्चकोटि के ये कुछ पद प्रामाणिक रूपेण मीराँ की रचना हो या न हो, पर हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि निस्सदेह ही है। गुजराती मे प्राप्त अधिकांश पदो की अभिव्यक्तियो मे विरोधाभास और पूर्वापर सबध का अभाव है। इन मे वह भाव-गाम्भीर्य भी नही जो मीराँ के पदो की विशेषता है। पजाबी मे दो और खडी बोली में एक पद प्राप्त है। इनकी अभिव्यक्ति भी बहुत हल्की पडती है। १ 'मीराँ-स्मृति-ग्रंथ'-'सतमत और मीराँ' पृ० ४६३।

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मिलन जनित आनन्द को व्यक्त करने वाले कुछ पद उपर्युक्त सभी भाषाओ मे प्राप्त हैं। इनमे से अधिकांश ब्रजभाषा मे ही है। “बहोत दिनों की जोवती, बिरहिन पिव पाया जी” जैसी पदाभिव्यक्ति ही इन पदो की विशेषता है। ऐसे कुछ पदो से वैष्णव मत का प्रभाव सुस्पष्ट है शेष से सतमत का प्रभाव ही व्यक्त होता है तथापि उमडते हुए आनन्द की सहज अभिव्यक्ति ही इनकी विशेषता है। शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा मे प्राप्त सतमत से प्रभावित इन पदो की प्रमाणिकता विशेष-विचारणीय है। आराध्य के प्रति एक गहरा समर्पण ही मीराँ की विशेषता है। ऐसे अनुभूति-द्योतक कुछ थोडे से पद प्राप्त होते हैं। राजस्थानी मे ऐसे दो पद प्राप्त हैं जिनमे एक, “मीराँ रग लाग्यो हरि” की प्रामाणिकता विशेष विचारणीय है। ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त दोनो पदो की प्रामाणिकता भी असदिग्ध नही। ब्रजभाषा मे प्राप्त पदो की कुछ अपनी विशेषताएँ भी हैं। इनकी अभिव्यक्ति के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यद्यपि मीराँ को समाज और स्वजनों से गहरी लाछना ही मिली थी तथापि किसी एक वर्ग से गहरा समर्थन और सम्मान भी मिला था। “कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहै कुलनाँसी। कोई कहै मीराँ दीप आगरी, नाम पिया सूं रसी।” लोक-निन्दा और पारिवारिक कटुता की सर्वथा अवहेलना करते हुए अपने निर्धारित मार्ग पर दृढ रहने की अभिव्यक्ति ही इन पदो की दूसरी विशेषता है। अवधी और गुजराती मे भी समर्पण द्योतक कुछ पद प्राप्त होते हैं परन्तु भाव और भाषा के आधार पर इनकी प्रामाणिकता सर्वथा संदिग्ध ही प्रतीत होती है। इन विभिन्न भाषाओ मे प्राप्त समर्पण-द्योतक अधिकांश पदो पर सतमत का ही विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। ऐसे अधिकांश पदो मे “मीराँ के प्रभु गिरधर नागर” जैसी टेक-परम्परा “यूँ कहै मीराँ बाई”, “मीराँ के प्रभु गहिर गम्भीरा” आदि विभिन्न प्रयोगो मे परिवर्तित हो गई है। कुछ पदो मे यह परम्परा 'मीरा दासी', 'दासी मीरा', 'मीरा दास' और 'जन मीराँ' मे भी परिवर्तित हो गई है। ऐसे पद अन्य सभी प्राप्त पदो से सर्वथा भिन्न पडते हैं। इन पदाभिव्यक्तियो से मीराँ के जीवन पर बहुमुखी प्रकाश पडता है। ऐसी अभिव्यक्तियो से विभिन्न घटना-क्रम के

१८ साथ ही साथ विभिन्न धार्मिक मतो का प्रभाव भी स्पष्ट हो जाता है। ऐसे पदो मे सर्वाधिक सख्या उन पदो की है जिनकी अभिव्यक्ति वियोगात्मक है और जो नाथ-पथ से विशेष प्रभावित हैं। विशेषत इन्ही पदाभिव्यक्तियो के आधार पर मीराँ के इष्टदेव “सगुण व साकार” प्रतीत होते हैं। राजस्थानी मे प्राप्त ‘दासी’ ओर ‘जन्’ छाप युक्त अधिकांश पदो मे विरहाकुला नारी की आराध्य से शीघ्र दर्शन देने की आतुर प्रार्थना है। ऐसे अधिकांश पदो पर विभिन्न धार्मिक मतमतान्तरो का कोई विशेष प्रभाव नही दीखता तथापि एक पद (स २८३) से सतमत का और कुछ पदो से विभिन्न पौराणिक गाथाओ का प्रभाव स्पष्ट हो जाता है। पद स० २८४ ही एक ऐसा पद हैं जिसमे रणछोड जी का वर्णन हुआ है। • ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त पदाभिव्यक्ति भी वियोग-द्योतक ही है। इन पदो पर पौराणिक गाथा और नाथ-पथ का समान रूपेण प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। ब्रजभाषा मे प्राप्त ऐसे पदो पर सतमत का ही विशेष प्रभाव है। इन पदाभिव्यक्तियो से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ख्याति फैलने के बाद परिवारवालो से मीराँ को सम्मान मिला। “कुल कुटुम्बी आन बैठे, मनहुँ मधुमासी। दास मीरा लाल गिरधर, मिटी जग हाँसी।” यह एक विशेष विचारणीय पहलू है। अन्य कुछ पदो से आनन्द और दृढ भक्ति-भाव भी लक्षित होता है। कुछ पदो पर पौराणिक गाथाओ का भी प्रभाव मिलता है परन्तु ऐसे पदो मे भाव-गाम्भीर्य नही है। गुजराती मे प्राप्त पदो मे पौराणिक गाथाओ के साथ ही निर्वेद की भी अभिव्यक्ति मिलती हैं। पजाबी मे एक ही पद प्राप्त होता है जिसकी भी प्रामाणिकता संदिग्ध ही है। ‘दास’ और ‘जन’ प्रयोग की परम्परा अन्य भक्त-कवियो में भी प्राप्त होती है। एच० एच० विल्सन के मतानुसार दक्षिण भारत मे ‘मीराँ दासी’ सम्प्रदाय की स्थापना हुई थी। श्री नटवर नडियाल भी अपनी पुस्तक मे इस सम्प्रदाय की कुछ चर्चा करते हैं। अन्यत्र कही कोई ऐसा स्पष्ट उल्लेख नही मिलता जिसके आधार पर इस सम्प्रदाय का इतिहास जाना जा सके। • हिन्दी जगत् मे मीराँ सर्व-प्रथम एक भक्तिमती नारी के ही रूप मे आँती है। इनके नाम पर प्रचलित विभिन्न पदो से विभिन्न धार्मिक

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भावनाओ का प्रभाव सुस्पष्ट होता है। विक्रम की १५, १६ और. १७वी शताब्दियो का युग विभिन्न धार्मिक भावनाओ से आलोडित एक अपूर्व युग था। इस युग मे प्रस्फुटित होती प्रेरणा ब्राह्मणो द्वारा प्रसारित पौराणिक युग-धर्म व इनकी रूढियो को एक गहरी चुनौती थी। इस युग मे एकेश्वरवाद के शुष्क सिद्धान्तो और प्रचलित कर्मकाण्ड का सर्वथा खण्डन करने वाली एक अद्भुत व अभूतपूर्व धार्मिक प्रवृत्ति का उदय हुआ । यह प्रवृत्ति मानव-हृदय की रस-सिक्त सहज भावनाओ के अधिक निकट पडी । नवीन उदित होने वाली इस प्रवृत्ति मे तत्व-चिन्तन और आत्मज्ञान के शुष्क सिद्धान्तो के प्रति गहरी उदासीनता थी तो ब्राह्मणो द्वारा प्रसारित कर्म-काण्ड मे भी कोई आस्था नही थी। इतना ही नही, बौद्धो की सेवा, दया और जीव-मात्र के प्रति प्रेम के सिद्धान्तो से भी पूर्ण सतोष न था। व्यक्तिगत हृदय की प्रवृत्तियाँ ही इस नवीन धर्म की नीव थी। यह धर्म व्यक्ति का धर्म था। आराध्य के प्रति एकान्त समर्पण ही इसकी विशेषता थी। इसी धर्म को पडितो ने भक्ति-धर्म की सज्ञा प्रदान की। इस भक्ति- धर्म का उद्गम कब और कहाँ हुआ, यह निश्चित रूपेण नही कहा जा सकता यद्यपि श्रीमद्भागवत् मे ही इसका सर्व-प्रथम स्पष्ट उल्लेख मिलता है। गीता मे प्रतिपादित भक्ति-धर्म मे और जन-समुदाय में प्रसारित भक्ति धर्म के मूल सिद्धान्तो मे ही गहरा अन्तर है। गीतानुमोदित भक्ति-मार्ग मे ज्ञान और कर्म भी सर्वथा अपेक्षित है परन्तु जनता मे प्रचलित इस धर्म मे नारद के भक्ति-सूत्र तथा भागवत के अनुकूल विशुद्ध भावमय मार्ग ही अपेक्षित है। पूर्ण शान्ति और पूर्ण आनन्द की प्राप्ति ही इसका लक्ष्य था। जनता मे इस धर्म को प्रसारित करने का श्रेय दक्षिण भारत के वैष्णव गायक-कवि अलवारो को प्राप्त है। “जाँति पाँति पूछे नही कोई, हरि को भजै सो हरि का होई” जैसी भावना को जन्म इन्ही अलवार साधको से मिला। ये स्वय जाति-बहिष्कृत थे और शूद्रो व जाति-बहिष्कृतो को भी उपदेश देते थे। इन अलवार कवियो के सुमधुर गान से प्रस्फुटित होने वाली इस विशुद्ध भक्ति-भावना ने कालान्तर मे पडितो और विचारको को भी प्रभावित किया। फलत हृदयगत भावनाओ से उद्भासित इस धर्म का भी एक शास्त्र बन गया। विभिन्न यम-नियम और दार्शनिक सिद्धान्तो के आधार पर एक गहरा वितण्डावाद खडा हो गया जो भक्ति आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। रामानुज इस आन्दोलन के प्रमुख आचार्य थे।

१६ क्रमश - यह आन्दोलन दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर प्रसारित होने लगा। उत्तर भारत मे इसके अग्रगण्य नेता थे रामानन्द, जिन्होने काशी को अपना क्षेत्र बनाया। “भक्ति द्रविड़ उपजी, लाये रामानन्द। प्रकट करी कबीर ने, सप्त दीप नौ खंड।” उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होते हुए इस नवीन आन्दोलन के प्रभाव से स्वजस्थान भी अछूता न रह सका। राजस्थान मे प्रत्येक प्रचलित धर्म को राजाश्रय प्राप्त हुआ तथा विचार-स्वातन्त्र्य का पूर्ण अनुमोदन हुआ। फलत. एकलिंग और भवानी के उपासक गणा-परिवार मे भी महाराणा कुम्भ वैष्णव भक्ति के रग मे रग कर राधा-कृष्ण के प्रेम-गीत गा उठे तो दूसरी ओर “अकबर के गर्व दलनहार और चितोड के जोद्धार" वीर श्रेष्ठ जयमल भी परम वैष्णव सुविख्यात हुए। चितौड की महाराणी झाली ने भी रामानन्द के शिष्य कबीर के गुरुभाई चर्मकार रैदास को अपना गुरु स्वीकार करने मे गौरव का ही अनुभव किया। राजस्थान, इस युग मे प्रवाहित होनेवाली इन तीनो ही विभिन्न धाराओ का सगमराज बना हुआ था। अस्तु, मीराँ की रचना पर भी तीनो ही विभिन्न धाराओ का प्रभाव 'का पाया जाना स्वाभाविक ही सिद्ध होता है। अत्युक्ति न होगी यदि कहा जाय कि मीराँ अपने युग की प्रतिनिधि कवयित्री थी। प्राप्त पदो मे तीनो धाराएँ इतनी स्पष्ट हैं कि इनको बड़ी सरलता से छाँटा जा सकता है। कृष्ण-भक्ति के कारण ही मीराँ की सर्वाधिक ख्याति हुई। अत वैष्णव-परम्परा से प्रभावित पदो पर ही सर्व-प्रथम विचार कर लेना उचित होगा। वैष्णव-परम्परा से प्रभावित पदो को भी दो विभिन्न प्रभेदो मे विभक्त किया जा सकता है। प्रथम समूह उन पदो का है जिनसे निर्वेद की भावना झलकती है। इनमे ससार के सुख और सम्बन्धो को मोह जनित और नश्वर मान कर उनकी ओर से एक गहरी उदासीनता और परमात्मा के शरणा- गत होने पर ही पूर्ण शान्ति और आनन्द की प्राप्ति सम्भव होने की ही अभिव्यक्ति मिलती है। ये पदाभिव्यक्तियाँ अधिकांशतः उपदेशात्मक है। कुछ पदों पर विभिन्न पौराणिक गाथाओ का प्रभाव भी मिलता है। ऐसे पद राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, ब्रज, गुजराती और खडी बोली मे भी पाये जाते हैं। इन पदो मे से अधिकांश की प्रामाणिकता संदिग्ध ही है। खड़ीबोली मे प्राप्त पदो को भाषा के आधार पर निश्चित-

१७ रूपेण प्रक्षिप्त कहा जा सकता है। गुजराती मे प्राप्त अधिकांश पदं भी भाव और भाषा के आधार पर प्रामाणिक नही प्रतीत होते हैं। राजस्थानी और ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त अधिकांश पदो मे पूर्वापर सबंध का और अर्थ-सगति का सर्वथा अभाव है। अस्तु, ऐसे अधिकांश पदो को तो प्राप्त रूप मे प्रामाणिक मान लेना सगत नही सिद्ध होता। वैष्णव परम्परा से प्रभावित अन्य पदो पर पौराणिक गाथाओ का का विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। वियोगाभिव्यक्ति द्योतक पदो के बाद सर्वाधिक सख्या इन्ही पदो की हे। इनमे भी बहुसख्यक पद राधा- कृष्ण की प्रेम-लीला और बाँसुरी-वर्णन के ही हैं। इसी वर्ग के पद सर्वाधिक विभिन्न प्रान्तीय बोलियो मे भी प्राप्त है। राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, ब्रज, गुजराती, अवधी, भोजपुरी आदि बोलियाँ इन पदो की भाषा है। निर्वेदाभिव्यक्ति द्योतक पदो की तरह ही इन मे भी अधिकांश मे पूर्वापर सबंध और अर्थ-सगति का अभाव है। अत बहुत सम्भव है कि इनमे से अधिकांश पद प्रामाणिक न हो। 'मीर माधो', 'रैदास' आदि अन्य भक्त कवियो के पद भी मीराँ के नाम पर चल पडे है। सर्वाधिक सख्या मे 'चन्द्रसखी' के पद ही मीराँ के पदो से मिल कर मीराँ के ही नाम पर चल पडे हे। राजस्थान के इस जन-प्रिय कवि का साहित्य और वृतान्त दोनो ही गहरे अन्धकार मे है। मीराँ के पदो की तरह इनके सकलन का भी एकमात्र आधार लोक-गीत ही है। लोक-गीतो की यह परम्परा भी बडे वेग से लुप्त हो रही है। अत समय रहते ही सकलन हो जाने की अत्यधिक आवश्यकता है। प्रस्तुत सग्रह को तय्यार करने के प्रसग मे ही 'चन्द्रसखी' के कुछ पदो को सकलित करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। ये लगभग सौ पद हैं। इन प्राप्त पदो से 'चन्द्रसखी' के व्यक्तित्व या जीवन-वृतान्त पर कोई प्रकाश नही पडता। ऐसी भी एक मान्यता है कि सम्भवत मीराँ ने ही इस उपनाम से रचना की परन्तु ऐसी मान्यता का कोई आधार नही। 'चन्द्रसखी' नामक यह भक्त कौन थे और कब हुए थे यह जानने का कोई भी सूत्र अद्यावधि उपलब्ध नही। इनकी प्रामाणिक रचनाओ को भी छाँट लेने का भी कोई आधार नही। जो भी हो, प्राप्त पदो के आधार पर इतना तो निश्चित- रूपेण ही कहा जा सकता है कि 'चन्द्रसखी' और मीराँ के कुछ पदो मे भाव और भाषा का गहरा साम्य है। इतना ही नही, कुछ पद तो एक दूसरे

'१८ के गेय-रूपान्तर ही प्रतीत होते हैं, तो अन्य कुछ पदो मे शब्दावली भी हूबहू एक ही है। उपर्युक्त परिस्थिति मे यह कहना सम्भव नही कि कौन पद मौलिक रूपेण किसका है। इतने पर भी, 'चन्द्रसखी' के पदो मे प्राप्त "चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि" जैसी टेक के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 'चन्द्रसखी' की भक्ति वात्सल्य-भाव की ही थी। मीराँ अपनी माधुर्य-भाव की भक्ति के लिये ही प्रसिद्ध हुई। सम्भवत इस आधार पर कुछ पदो को छाँट लेने का प्रयास सफल हो सके। तथाकथित मीराँ के कुछ पदों से सतमत का प्रभाव विशेष रूपेण स्पष्ट हो जाता है। मतभेद, सघर्ष वियोग, आनन्द, समर्पण आदि सभी विभिन्न भावाभिव्यक्ति द्योतक पदो से भी सतमत का प्रभाव लक्षित होता है। 'दासी' और 'जन' प्रयोग युक्त पदो मे भी कुछ थोडे से पद सतमत से प्रभावित मिल जाते है। कुछ पदो मे मीराँ अपने गुरु का नाम रैदास बताती है। मुंशी देवीप्रसाद के आधार पर मीराँ को भोजराज की विधवा मान लेने पर मीराँ और रैदास दोनो के जीवन-काल मे लगभग सौ वर्ष का अन्तर पड जाता है। अत रैदास का मीराँ का गुरु होना सर्वथा ही असम्भव हो जाता है परन्तु मुशी देवीप्रसाद का कथन भी सर्वथा प्रामा- णिक नही सिद्ध होता। असम्भव नही कि मीराँ राव दूदा जी की पुत्री और राणा कुम्भ की ही राणी हो। जनश्रुतियाँ और पदाभिव्यक्तियाँ इसका समर्थन करती हैं तथा इतिहास सुनिश्चित न होते हुए भी विरोधा- त्मक नही। सर्व-मान्य है कि मीराँ का विरोध कृष्ण-पूजा के हेतु नही अपितु कुलमर्यादा के विरुद्ध पडने वाले साधु-समागम के कारण हुआ। अस्तु, अद्यावधि इन रचनाओ को निश्चित रूपेण प्रामाणिक या प्रक्षिप्त कहना युक्तियुक्त न होगा। फिर भी, प्रामाणिक पदो के छाँट लेने के लिये ही भाव-भाषा के आधार पर इनका विश्लेषण आवश्यक हो जाता है। राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, और ब्रज तीनो ही भाषाओ मे सतमत से प्रभावित पद प्राप्त होते हैं। संतमत मे प्रभावित शुद्ध ब्रजभाषा मे प्राप्त इन कुछ पदों की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध ही प्रतीत होती है। ऐसे अधिकांश पदो मे अर्थ-संगति और पूर्वापर सबध का अभाव है, फलत. उपर्युक्त सदेह को एक और समर्थन मिलता है। वैष्णव और सतमत से प्रभावित इस राणापरिवार मे एकलिंग और भवानी की पूजा का महत्व सदा ही अक्षुण्ण रहा। एकलिंग के पुजारी

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नाथ-पंथानुयायी जोगी ही हुआ करते थे। राज-परिवार पर नाथ-पथ के इस गहरे प्रभाव के रहते हुए भी जनता इससे विमुख हो चली थी। जनता मे नाथ-पथ और उसके योगियो के प्रति आदर-सम्मान नही रह गया था। बहुत सम्भव है कि राजपरिवार से सम्बन्धित होने के कारण मीराँ भी कुछ विशिष्ट योगियो के सम्पर्क मे आयी हो और इनसे प्रभावित भी हुई हो। अत नाथ-परम्परा से प्रभावित पदो की रचना अयुक्त नही कही जा सकती। ऐसे पदो मे सर्वाधिक पदो की अभिव्यक्ति वियोगात्मक है। इतना ही नही, इन्ही पदो मे प्राप्त अभिव्यक्तियो के आधार पर किसी व्यक्तिगत दाम्पत्य सम्बन्ध को व्यक्त करनेवाला अन्त श्रोत विशेष रूपेण प्रस्फुटित हो जाता है। किसी जाते हुए 'जोगी' को रोक रखने का निष्फल प्रयास, 'जोगी' के वियोग की वेदना और उसके विश्वासघात के प्रति गहरे उराल्म्भ के साथ ही साथ एक गहरे समर्पण की अभिव्यक्ति ही इन पदो की विशेषता है। इन पदाभिव्यक्तियो के आधार पर यह भी सुस्पष्ट हो जाता है कि मीराँ अपने नाथ परम्परानुसार सुसज्जित 'जोगी' आराध्य के अनुकूल स्वय भी “भगवाँ भेष” धारण कर “जोगण” बनने को “आकुल व्याकुल” हो उठी है। इनमे अधिकांश पद राजस्थानी मे ही प्राप्त है, जैसा कि स्थिति विशेष मे स्वाभाविक भी प्रतीत होता है। कुछ पद ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे और कुछ पद ब्रज व गुजराती भाषा मे भी प्राप्त है। नाथ-प्रभाव द्योतक ये थोडे से पद, विशेषत इनमे प्राप्त वियोगाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। विभिन्न भाव और भाषा मे प्राप्त लगभग सभी पदो की टेक है “मीराँ के प्रभु गिरधर नागर”। 'दासी' और 'जन' प्रयोग-युक्त पदो मे यह परम्परा खण्डित हो गई है परन्तु इनकी प्रामाणिकता ही सर्वथा संदिग्ध है। गुजराती भाषा मे प्राप्त अधिकांश पदो मे यह टेक “मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण” मे परिवर्तित हो गई है। इस परिवर्तन के लिये गेय-परम्परा ही उत्तरदायी प्रतीत होती है। कुछ पदो मे “मीराँ के प्रभु गहिर गम्भीरा”, “यू कहै मीराँ बाई”, “मीराँ व्याकुल विरहणी” आदि भी टेक रूप मे व्यवहृत हुए है। अन्य कुछ पदो मे मीराँ ने अपने आराध्य को “जोगी” “गुसाई” आदि सम्बोधनो से भी पुन-पुन सम्बोधित किया है। “जिन भेष्वां म्हाँरो सावि रीझै, सोई भेख धारणाँ।” के

२ २० अनुकूल मीराँ स्वय भी कभी "मोतियन मांग भराँ" के लिये अत्युत्सुक हो उठती० है तो कभी "कर जटाधारी वेश" "जोगण" बनने को "आकुल व्याकुल" हो जाती ह । इतने पर भी कभी-कभी इस योग-साधना पर झुझला जाती है "भाग लिखियो सो ही पायो।"" अपनी माधुर्य भाव की भक्ति के कारण ही मीरा ख्याति को प्राप्त हुई ।' नाभादास जी लिखते हैं, "सदरिस गोपिन प्रेम प्रगट कलिजुगंहि दिखायो।' पति-भाव से ही मीराँ ने अपने आराध्य की पूजा की। अत पदों मे प्राप्त वियोग और श्रृङ्गार, खीज और समर्पण की अभिव्यक्ति तो सहज ही प्रतीत होती है परन्तु कुछ पदो मे प्राप्त बाल-वर्णन उतना ही असगत भी प्रतीत होता है। सूर आदि अन्य ब्रजभाषा के कवियो मे भी सयोग और विप्रलम्भ शृङ्गार के अति उत्कट वर्णन के साथ ही साथ वात्सल्य और बाल-वर्णन की अभिव्यक्ति भी मिलती है। ब्रजभाषा के इन भक्त-कवियो ने आराध्य कृष्ण की विभिन्न लीलाओ का वर्णन किया; वे कवि थे परन्तु मीराँ तो स्वय ही गोपिका बनी हुई थी। एक कवि की तरह उन्होने अपने इष्टदेव की लीलाओं का वर्णन नही किया अपितु आराध्य मे तन्मय हो जाने अनजाने ही कुछ गा उठी, भावातिरेक मे बेसुध हृदय के छन्द- अलकार विहीन वे निश्छल चित्र ही हिन्दी-साहित्य की अपूर्व निधि बन गये। अस्तु, मीराँ के पदो में वात्सल्य-युक्त वर्णन कुछ अटपटा ही लगता है। मुग्धा नारी द्वारा अपने ही प्रियतम के बालरूप का वर्णन युक्तिसगत नही प्रतीत होता। कुछ पदो मे पूर्वापर सबध और अर्थ-सगति का सर्वथा अभाव है । अन्य कुछ पदो मे पुनरुक्ति और अस्पष्टता दोप भी हैं। गेय-परम्परा से प्राप्त पदो से ऐसा होना अस्वाभाविक या आश्चर्यजनक भी नही। ऐसे पदो को भी प्रचलित रूप मे तो प्रामाणिक नही ही माना जा सकता है। कुछ पद विशेष जन-प्रिय होकर विभिन्न क्षेत्रो मे गाये जाने लगे। अत' क्षेत्र विशेष की भाषा का प्रभाव उन पर पडा और फलत उनकी भाषा में भी परिवर्तन आ गया। बहुत सम्भव है कि इसी तरह मीराँ के कुछ पदो की भाषा मे क्रमश इतना अधिक परिवर्तन हो गया हो कि उसके मौलिक रूप का निर्णय कर लेना दुरूह ही नही वरन् असम्भव भी है। स्थिति विशेष मे भाषा के इस परिवर्तन के साथ ही साथ भाव परिवर्तन हो जाना भी सहज प्रतीत होता है। यह मान लेना कि पद विशेष की अभि-

२१ व्यक्ति मौलिक रूपेण मीराँ की ही है, मात्र भाषा ही गेय-परम्परा के कारण परिवर्तित हो गई है, प्रियकर हो सकता है और हमारी हृदयगत भावनाओ के निकटतर भी पड सकता है परन्तु खोज कार्य मे सहायक कदोपि नही हो सकता है। यह भी माना जा सकता है कि उनमे काव्य-सत्य है। - तथापि इस काव्य-सत्य के साथ ही साथ उनमे से वस्तुत सत्य को भी खोज निकालने का प्रयास आकाश-कुसुम को पाने का ही प्रयास मात्र होगा। प्राप्त रूप मे ऐसे पदो की प्रामाणिकता सदिग्ध ही सिद्ध होती है। - प्रस्तुत सग्रह मे भाव और भाषा के आधार पर ही पदो का वर्गी- करण किया गया है। मीराँ का जीवन कुछ विशिष्ट क्षेत्रो मे व्यतीत हुआ। अत उन विभिन्न क्षेत्रो की भाषा का प्रभाव उनकी रचना मे पाया जाना स्वाभाविक ही है। साधु-समागम के प्रभाव के कारण भी अन्य भाळाओ के कुछ शब्द-विशेष का प्रयोग भी सम्भव हो सकता है। परन्तु विभिन्न प्रान्तीय बोलियो मे इक्के-दुक्के पदो की रचना असम्भव ही प्रतीत होती है। अत ऐसे पदो को प्रक्षिप्त कहना ही युक्तियुक्त होगा। राजस्थान मे ही मीराँ ने जन्म लिया और राजस्थान मे ही उनका अधिकांश जीवन व्यतीत हुआ अत अधिकांश पदो का शुद्ध राजस्थानी - भाषा मे पाया जाना ही युक्ति-सगत है। फिर भी पुरानी राजस्थानी और आधुनिक राजस्थानी मे गहरा भेद है। अत राजस्थानी मे प्राप्त पदो की भाषा की शुद्धता पुरानी राजस्थानी के माप पर ही निर्धारित की जा सकती है। ऐसा एक प्रयास मैं कर भी रही हूँ और आशा रखती हूँ कि शीघ्र ही हिन्दी-साहित्य की यह छोटी सी सेवा भी कर सकूँगी। इसके बाद वे पद आते है जो मिश्रित भाषाओ के अन्तर्गत रखे गए है। इनमे से कुछ की भाषा प्रधानत राजस्थानी होते हुए भी ब्रजभाषा से प्रभावित है। तो अन्य कुछ की भाषा प्रधानत ब्रजभाषा होते हुए राजस्थानी से प्रभावित है। साधु-समागम के कारण भी भाषा का यह सम्मिश्रण सम्भव हो सकता है। अद्यावधि मीराँ का बृज-क्षेत्र मे गमन और निवास भी मान्य है। तथाकथित मीराँ के पदो की एक बडी सख्या ब्रजभाषा मे भी प्राप्त है। इनमे से कुछ की भाषा विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा है। ऐसे कुछ पद साहित्यिक सौन्दर्य का सृजन करने मे सूरदास के पदो से भी होड लेते है अद्यावधि प्राप्त सामग्री के आधार पर मीराँ की वृन्दावन-यात्रा और निवास बहुमान्य होते हुए भी सुनिश्चित इतिहास नही अपितु एक अत्यन्त विषाद-

२२ ग्रस्त विषय है। 'इन पदो की साहित्यिकता भी इनकी प्रामाणिकता के विरुद्ध ही गवाही देती है। मीराँ को शास्त्रीय अध्ययन का सुअवसर प्राप्त हुआ हाँ, ऐसा भी कोई निश्चित इंगित प्राप्त सामग्री मे नही मिलता। प्राप्त पद कवि की रचना न होकर एक स्वत सिद्ध भक्त के भावातिरेक के सत्यतम चित्र है। अतः शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा मे प्राप्त पदो की प्रामाणिकता विशेष सन्दिग्ध हो जाती है। • गुजराती मे भी मीराँ के नाम पर प्रचलित पद पर्याप्त सख्या मे प्राप्त होते नै। अपने जीवन के अन्तिम काल मे मीराँ का द्वारिका-गमन और निवास इतिहास सिद्ध है। अद्यावधि मान्य इतिहास, प्राप्त जनश्रुतियों और पदाभिव्यक्तियो से भी उपर्युक्त कथन का समर्थन होता है। • अत्युक्ति न होगी यदि कहा जाय कि प्राप्त सम्पूर्ण सामग्री मे यही एक ऐसा पहलू है जो सर्व-सम्मति से सुनिश्चित है। क्रमशः विकसित होते हुए जीवन के अन्तिम समय की भावाभिव्यक्ति मे इतने निम्न स्तर के घरेलू जीवन व अन्य बहुत ही हल्की भावनाओं का चित्रण बहुत सहज नही प्रतीत होता। चितौड़ के सम्पूर्ण राज-वैभव व तद्जनित सुख-सुविधा को "तजि बटुक की नाईं" अपने आराध्य के शरण मे द्वारिका आ जाने पर मीराँ जैसी भक्तिमती नारी की रचना मे विराग और नैराश्य की भावनाओ का मिलना ही अधिक सहज है। अस्तु, गुजराती में पद रचना असम्भव या असगत नही प्रतीत होती तथापि अभिव्यक्ति के आधार पर प्राप्त पदो की प्रामाणिकता मे संदेह ही उत्पन्न होता है। कुछ गुजराती मे प्राप्त पदो मे "मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर" "मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण" मै भी परिवर्तित हो गया है--बहुत सम्भव है कि गेय परम्परा ही इसका कारण हो, अस्तु, ऐसे पदो की प्रामाणिकता और भी सदिग्ध है। भोजपुरी, अवधी, बिहारी आदि विभिन्न बोलियो मे भी कुछ पद प्राप्त होते है। राजस्थान, ब्रज, और द्वारिका से बाहर भी कभी मीराँ ने प्रयाण किया हो ऐसा आभास कहीं कोई नही मिलता। साधु-समागम के कारण पडे प्रभाव के कारण भी ऐसे इक्के-दुक्के पदों की रचना सम्भव नही। अतः इन पूदो को निश्चित रूपेण प्रक्षिप्त कहा जा सकता है। खडी बोली मे प्राप्त कुछ पद भी भाषा की आधुनिकता के आधार पर निश्चित रूपेण प्रक्षिप्त ही कहे जा सकते हैं।

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प्रस्तुत सग्रह मे बहुत से पदो पर एक ऐसा † चिह्न लगा दिखा गया है। भाषा और भाव के आधार पर प्रक्षिप्त प्रतीत होनेवाले पदो पर ही यह चिह्न लगाया गया है। जैसा कि ऊपर कहा गया है बहुत सम्भव कि शेष पदों मे से भी अधिकांश प्रक्षिप्त ही हो परन्तु उनको प्रक्षिप्त या प्रामाणिक कहने का कोई सुनिश्चित सूत्र अद्यावधि उपलब्ध नही। बहुत सम्भव है कि प्राप्त सामग्री के गहरे अध्ययन के बाद शेष पदो पर भी निश्चय पूर्वक विचार किया जा सके। किसी ऐसे ही प्रामाणिक सग्रह के आधार पर ही मीराँ की जीवन-वृत्त को सुनिश्चित इतिहास का रूप दिया जा सकता है। इस सग्रह मे लिखित व मौखिक परम्परा से प्राप्त मीराँ के नाम पर प्रचलित सभी पदो को एकत्रित करने का प्रयास किया गया है, फिर भी बहुत सम्भव है कि और भी कुछ ऐसे पद प्राप्त हो सके जो इस सग्रह मे नही आ सके हैं। विभिन्न प्राप्त सग्रह; जिनकी सूची 'मीराँ, एक अध्ययन' मे दे दी गयी है, इन पदो के सग्रह का मूल आधार रही है। अत उन सभी विद्वानो की कृतज्ञ हूँ। श्री सूर्यनारायण जी चतुर्वेदी (जयपुर) द्वारा २०० पद ऐसे प्राप्त हुए जिनके बिना यह सग्रह निश्चित ही अधूरा रह जाता, अत मै उनकी विशेष कृतज्ञ हूँ। इन पदो मे अधिकांश राजस्थानी भाषा मे हैं। इनमे अधिकांश की अभिव्यक्ति मतभेद, सघर्ष और वियोग- द्योतक है। इन पदाभिव्यक्तियो से विभिन्न धार्मिक मतो का विशेषत सतमत का ही प्रभाव स्पष्ट हो जाता है। कुछ पदो के विषय मे अपने विचार (जो पद विशेष के नीचे दिये गये हैं) देकर इन्होने मेरे कार्य मे अधिक सुगमता ला दी। उनके इस कष्ट के लिये मै विशेष आभारी हूँ। भाई श्री नर्मदेश्वर जी चतुर्वेदी और उनके अग्रज हिन्दी के सुविख्यात विद्वान् श्री परशुराम जी चतुर्वेदी द्वारा सामग्री एकत्रित करने मे पर्याप्त सहायता मिली। अपनी राजस्थान की यात्रा-काल मे किसी दादू पन्थी सत के हस्त- लिखित सग्रह से प्राप्त ६२ पद आपने मुझ को दिये जिनमे लगभग ५० मेरे सग्रह मे थे और शेष पद नवीन थे। इनमे से अधिकांश नाथ- परम्परा प्रभाव द्योतक है। 'दासी' और 'जन' प्रयोग युक्त पद भी इस सग्रह का एक बडा भाग है। शेष पदो पर सतमत का ही विशेष प्रभाव है। इनमे अधिकांश की अभिव्यक्ति वियोगात्मक और भाषा राज- स्थानी व ब्रज मिश्रित राजस्थानी है।

२४ उपर्युक्त पदो के सिवाय कुछ पद लोक-गीत परम्परा से भी प्राप्त हुए। विशेष प्रयास के करने बाद कुल १४ पदो को एकत्रित करने मे सफल हो सकीँ। ये पद भी 'मीराँ', एक अध्ययन' मे परिशिष्ट मे दे दिये गये है। लोक-गीत परम्परा से प्राप्त प्राय पद सग्रह मे वर्तमान किसी-न-किसी पद का गेय रूपान्तर मात्र ही सिद्ध हुए। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष हिन्दी के सुविख्यात विद्वान् श्री हजारीप्रसाद जी द्विवेदी ने पदो के वर्गीकरण के बारे मे जो महत्वपूर्ण सुझाव किये उनके बिना इस सग्रह को इस रूप में प्रस्तुत करना सम्भव न होता। "मीरा बाई" के विद्वान् लेखक डा० श्रीकृष्ण लाल ने अपनी कार्य-व्यस्त दिनचर्या के बाद भी सग्रह मे महत्वपूर्ण सुझाव देने और भूमिका लिखने का कष्ट स्वीकार किया। गुरुजनों के प्रति कृत- ज्ञता प्रकाश करना भी धृष्टता ही होगी, अत मै इनको नमस्कार ही करती हूँ। अनुज तुल्य श्री अवधेश तिवारी के सहयोग और कार्य-निष्ठा के बिना प्रस्तुत सग्रह असम्भव ही था। इन पदो की पुन पुन प्रतिलिपि करना सुगम या रुचिकर कार्य नही। उनकी अटूट लगन और कठिन परिश्रम के बिना यह सग्रह कदाचित तय्यार नही हो सकता था। अपने छोटे देवर श्री जानकी प्रसाद झुनझुनवाला, श्री गोपालचन्द सराफ और पुत्र तुल्य श्री बाल- कृष्ण मालवीय के विशेष सहयोग की महत्ता भी सदा अक्षुण्ण रहेगी। भाई श्री नरेन्द्र श्रीवास्तव और भाई श्री सुधाकर पाण्डेय ने प्रूफ देखने का भार उठा कर मेरे कार्य को विशेष सुगम बना दिया। मानव-जीवन मे स्निग्ध भावनाओ का एक अपना विशिष्ठ स्थान है। अतः उपर्युक्त सभी स्वजनो के स्नेहमय सहयोग के लिये कृतज्ञता प्रकाशन या धन्यवाद दोनो ही असम्भव है। प्रस्तुत सग्रह मे जो अपूर्णता और गलतियाँ रह गई हो, उन पर प्रकाश डाल कर गुरुजन मेरा प्रोत्साहन और पथ-प्रदर्शन करेंगे, ऐसी ही आशा करती हूँ। विशेष प्रयास के बावजूद भी प्रूफ आदि की जो गलतियाँ छूट गयी हो, उनके लिये मै क्षमाप्रार्थिनी हूँ। पद्मावती

विषय-सूची विषय पृ० स० जीवन खण्ड मतभेद राजस्थानी मे प्राप्त पद १ मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद २४ ब्रजभाषा मे प्राप्त पद २७ वियोगाभिव्यक्ति राजस्थानी मे प्राप्त पद ३१ मिश्रित भाषाओमे प्राप्त पद ५८ ब्रजभाषा मे प्राप्त पद ७४ गुजराती मे प्राप्त पद ८६ विभिन्न बोलियो मे प्राप्त पद ६० संघर्षाभिव्यक्ति राजस्थानी मे प्राप्त पद ६२ मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद १२३ ब्रजभाषा मे प्राप्त पद १३० खडी बोली मे प्राप्त पद १३१ गुजराती मे प्राप्त पद १३१ मिलन और बधाई राजस्थानी मे प्राप्त पद . १३५ मिश्रित भाषाओ में प्राप्त पद १३६ ब्रजभाषा मे प्राप्त पद .. १४१ गुजराती मे प्राप्त पद .. १४८ समर्पण द्योतक पद राजस्थानी मे प्राप्त पद . १५१ मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद .. ... १५४