भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

सप्तमोऽङ्कः ४०१

हिन्दी अनुवाद— [ तदनन्तर पर्दे से ढके हुए शरीर वाला और केवल मुख से देखे जाने योग्य प्रसन्न चाणक्य प्रवेश करता है। ]

चाणक्य— भद्र ! कहो, कहो—

ऊँची लपटों के समूह से ललाई लिये भूरे रंग की अग्नि को कपड़े की छोर मे किसने बाँधा ? वायु की गति का निरोध किसने तत्काल रस्सियों से कर डाला ? हाथियों के मद-जल से भीनी सटाओं वाले सिंह को किसने पिजड़े में डाल दिया ? (और) चंचल नाकों और मगरों वाले भयंकर समुद्र को किसने बाँहों से पार किया ? ॥ ६ ॥

टिप्पणी—जवनिका— पर्दा। जु√ (सौत्रो धातु) + ल्युट् करणे + कन् स्वार्थे स्त्रियाम् = जवनिका । 'प्रतिसीरा जवनिका स्यात्तिरस्करिणी च सा' इत्यमरः । सदागतेः— सदा सततं गतिः गमनं यस्य स सदागतिः = वायुः, तस्य। 'श्वसनः स्पर्शनो वायुर्मातरिश्वा सदागतिः' इत्यमरः । अगतिता— अविद्यमाना गतिर्यस्य सः अगतिः नञ्बहुव्रीहि स० । तस्य भावः अगतिता गतिनिरोध इत्यर्थः । अनेकप— न एकः अनेकः । अनेकञ्च अनेकञ्च अनेकौ । अनेकाभ्यां पिबति इति अनेक√पा + क कर्तरि = अनेकपः । इस श्लोक का निचोड़ यह है कि वस्त्र की छोर से अग्नि को बाँधने की तरह, रस्सी से वायु को बाँधने की तरह, पिंजड़े में सिंह को बन्द करने की तरह, और भुजाओं से महासागर को पार करने की तरह राक्षस को बाँधने का दुष्कर कार्य मैंने किया है। इस पद्य मे अप्रस्तुतप्रशंसा, अतिशयोक्ति और मालानिदर्शनालंकार में अंगांगिभाव से सांकर्य है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ ६ ॥

चण्डालः— णं णीदिणिउणबुद्धिणा अज्जेण ज्जेव। (ननु नीति-निपुणबुद्धिनार्येणैव ।)

चाणक्यः— भद्र ! मा मैवम्। नन्दकुलद्वेषिणा दैवेनेति ब्रूहि ।

राक्षसः— [ विलोक्य स्वगतम् ] अये ! अयं स दुरात्मा, अथवा अयं स महात्मा कौटिल्यः । यतः—

मु० रा०—२६

४०२ | मुद्राराक्षसम्

आकरः सर्वशास्त्राणां रत्नानामिव सागरः ।
गुणैर्न परितुष्यामो यस्य मत्सरिणो वयम् ॥ ७ ॥

अन्वय —रत्नानां सागर इव सर्वशास्त्राणाम् आकरः । यस्य गुणैः—मत्सरिणः वयम् न परितुष्यामः ॥ ७ ॥

व्याख्यारत्नानाम्—पद्मरागादीनां मणीनां, सागर इव—समुद्र इव, सर्वशास्त्राणाम्—समस्तशास्त्रज्ञानानामित्यर्थः, आकरः—खनिः (अस्ति), यस्य—चाणक्यस्य, गुणैः—चातुर्यादिभिः, मत्सरिणः—मत्सरवन्तः गुणेषु विद्वेषवन्त इत्यर्थः, वयम्, न परितुष्यामः—न परितोषमावहाम ॥ ७ ॥

हिन्दी अनुवादचाण्डाल—नीति मे निपुण बुद्धि वाले आर्य ने ही (यह दुष्कर कार्य किया)।

चाणक्य—भद्र ! न, ऐसा न कहो। नन्दवंश के शत्रु भाग्य ने (यह किया)—ऐसा कहो।

राक्षस—[देखकर मन में] अरे ! यह वह दुष्टात्मा, अथवा यह वह महात्मा चाणक्य है। क्योंकि—

यह रत्नों के समुद्र के समान सभी शास्त्रों की खान है। जिसके गुणों से डाह करने वाले हम सन्तुष्ट नहीं होते हैं ॥७॥

टिप्पणीनीतिनिपुणबुद्धिना—नीतौ राजनीतौ निपुणा कुशला। तादृशी बुद्धिर्यस्य स नीतिनिपुणबुद्धिः, तेन। नन्दकुलद्वेषिणा—नन्दानां कुलम्। तत् द्वेष्टि इति नन्दकुल√द्विष्+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये = नन्दकुलद्वेषी, तेन। आकर—खान, उत्पत्ति-स्थान। यहाँ राक्षस ने चाणक्य के गुणों की प्रशंसा की है, अतः चाणक्य के प्रति उसका द्वेषभाव समाप्त-सा समझना चाहिये। इस पद्य में उपमा और रूपक अलंकारों की संसृष्टि है। इसमें अनुष्टुप् छन्द है। अनुष्टुप् का लक्षण १, ३ में देखिए ॥७॥

चाणक्यः—[विलोक्य सहर्षम्] अये ! अयममात्यराक्षसः, येन महात्मना—

गुरुभिः कल्पनाक्लेशैर्दीर्घजागरहेतुभिः ।
चिरमायासिता सेना वृषलस्य मतिश्च मे ॥८॥

. सप्तमोऽङ्कः । ४०३

अन्वयः—(येन महात्मना) दीर्घजागरणहेतुभिः गुरुभिः कल्पनाक्लेशैः मे मतिः वृषलस्य सेना च चिरम् आयासिता ॥८॥

व्याख्या—(येन महात्मना) दीर्घजागरणहेतुभिः—दीर्घस्य सन्ततस्य जागरस्य अनिद्रायाः ये हेतवः निमित्तानि तथाभूतैः, गुरुभिः—महद्भिः, कल्पनाक्लेशैः—उपायोद्भावना कष्टैः पक्षान्तरे सज्जानियन्त्रणैः, मे—मम, मतिः—बुद्धिः, वृषलस्य—मौर्यस्य, सेना—वाहिनी च, चिरम्—दीर्घकालम्, आयासिता—आयासमनुभाविता ॥८॥

हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—[देखकर प्रसन्नतापूर्वक], अरे यह अमात्य राक्षस है, जिस महात्मा ने—

सतत जागरण के कारणभूत महान् कल्पना (बुद्धि के पक्ष मे राक्षस को पकड़ने के उपाय-चिन्तन और सेना-पक्ष में सदा तैयार रहने) के क्लेशों से मेरी बुद्धि को और मौर्य की सेना को चिरकाल तक कष्ट का अनुभव कराया ॥८॥

टिप्पणी—कल्पना—√ कृप् + णिच् + युच् कर्मणि। आयासिता— आयासेन कष्टेन योजिता वा आयासं गमिता इति आयास + णिच् (नाम-धातु) + क्त कर्मणि। इस श्लोक में तुल्ययोगिता अलंकार है और अनुष्टुप् छन्द है ॥८॥

[जवनिकामपनीयोपसृत्य च] भो भो अमात्यराक्षस ! विष्णुगुप्तोऽभिवादयते।

राक्षसः—[स्वगतम्] अमात्य इति लज्जाकरमिदानीं विशेषणपदम्। [प्रकाशम्] भो भो विष्णुगुप्त ! न मां श्वपाकस्पर्शदूषितं स्प्रष्टुमर्हसि।

**चाणक्यः—**अमात्य राक्षस ! नायं श्वपाकः। अयं खलु दृष्टपूर्वं एव भवता सिद्धार्थकनामा राजपुरुषः, योऽयमसो द्वितीयः, सोऽपि सुसिद्धार्थकनामा राजपुरुष एव। ताभ्यामेव सह सौहार्दमुत्पाद्य शकटदासोऽपि तपस्वी तं तादृशमजानन्नेव कपटलेखं मयैव लेखितः।

राक्षसः—[आत्मगतम्] दिष्ट्या शकटदासं प्रत्यपनीतो विकल्पः।

४७४ मुद्राराक्षसम्

चाणक्यः—किं बहुना, सङ्क्षेपतः कथयामि—

भृत्या भद्रभटादय म च तथा लेख स सिद्धार्थक तच्चालङ्करणत्रय स भवतो मित्र भदन्त किल । जीर्णोद्यानगतः स चातंपुरुष क्लेश स च श्रेष्ठिन सर्वं मे— [ इत्यर्धोक्ते सञ्ज्ञा नाटयति । ] वृषलस्य वीर ! भवता सयोगमिच्छोर्नय ॥६॥

अन्वयः—वीर ! भद्रभटादयः भृत्याः, स तथा लेखश्च, स सिद्धार्थक , तत् अलङ्करणत्रय च, भवतः किल मित्र स भदन्तः, जीर्णोद्यानगतः स आत-पुरुषश्च, स श्रेष्ठिनः क्लेशश्च—सर्वं वृषलस्य भवता सयोगमिच्छो मे नय ॥६॥

व्याख्या—वीर !—हे शूर !, भद्रभटादयः—भद्रभटप्रभृतयः, भृत्या —सेवका , मः, तथा—तयाविध तेन प्रकारेण छलेन रचित इत्यर्थः, लेखश्च—पत्रमपि, सः सिद्धार्थक —हन्यमानमपवाह्य शकटदास भवन्तमाश्रित इत्यर्थः, तत्—कपटवाणिग्भिविक्रीतं ते, अलङ्करणत्रय च—पर्वतेश्वरभूषणमपि, भवतः—तव, किल—मिथ्या, मित्र—सुहृत्, स —जीवसिद्धिरनामधेयः, भदन्तः—बौद्धसन्यासी, जीर्णोद्यानगतः—पुरातनोपवनप्राप्त , सः, आतं-पुरुषश्च—मिथ्या देहत्यागे व्यवसितो दुःखी जनश्च, सः, श्रेष्ठिन —चन्दन-दासस्य, क्लेशश्च—दुःख च, सर्वं—निखिल, वृषलस्य—मौर्यस्य, भवता—त्वया ( सह ), सयोग—सन्धिम्, इच्छो कामयमानस्य, मे—मम, नय —नीतिः ( अस्ति ) ॥६॥

हिन्दी अनुवाद—[ पर्दे को हटाकर समीप जाकर ] हे अमात्य राक्षस ! चाणक्य (,आपको ) प्रणाम करता है ।

राक्षस—[ मन में ] 'अमात्य' यह विशेषण शब्द इस समय लज्जा-जनक है । [ प्रकट ] हे चाणक्य ! चाण्डाल के स्पर्श से दूषित मुझे आप न छूएं ।

चाणक्य—अमात्य राक्षस ! यह चाण्डाल नही है । यह तो आपका पहले ही का देखा हुआ सिद्धार्थक नाम का राजपुरुष है। जो यह दूसरा है, वह भी सुसिद्धार्थक नाम का राजपुरुष ही है। इन्ही दोनो के साथ मित्रता उत्पन्न

सप्तमोऽङ्कः ४०५

कराकर मैंने बेचारे शकटदास से भी उस कूटपत्र को वैसा न जानते हुए ही लिखवाया था।

राक्षस [ मन में ] भाग्य से शकटदास के प्रति संदेह दूर हो गया।

चाणक्य—अधिक कहने से क्या ( लाभ ), संक्षेप में कह देता हूँ—

हे वीर ! भद्रभट आदि अनुचर, वह उस प्रकार का लेख, वह सिद्धार्थक, वे तीनों आभूषण, आपका मिथ्या मित्र वह बौद्धसंन्यासी, जीर्ण उपवन में मरा हुआ वह पीड़ित मनुष्य और वह सेठ ( चन्दनदास ) का क्लेश—यह सब [ ऐसा आधा कहने पर लज्जा का अभिनय करता है। ] चन्द्रगुप्त का आपके साथ सम्पर्क चाहने वाले मेरी चाल रही है ॥६॥

टिप्पणी—विष्णुगुप्तः अभिवादयते—नामोच्चारणपूर्वक अभिवादन करना शास्त्रसम्मत है। मनु ने कहा है—'अभिवादात्परो विप्रो ज्यायांसमभिवाद-यन् । असौ नामाहमस्मीति स्व नाम परिकीर्तयेद् ॥' कपटलेखम्—कपटः = छलम् अस्ति अस्मिन् इति कपटः = छलमयः कपट + अच् अर्शाआदित्वात् । कपटः लेखः कपटलेखः, तम्। शकटदासः कपटलेखं लिखितवान् = अहं शकटदासम् अजानन्तं कपटलेखं लेखितवान् = मया शकटदासः अजानन् कपटलेखं लेखितः । 'कपटलेखम्' इत्यत्र 'गत्यर्थ'—सूत्रेण कर्मसंज्ञा—द्वितीया । किल—यहाँ मिथ्यार्थक अव्यय है। सर्वम्—अत्र सामान्ये नपुंसकम् । आपको चन्द्रगुप्त के अमात्य-पद पर आरूढ करने के लिए ही मैंने यह सब कुछ किया है। यह निर्वहण नामक अंग है। इस श्लोक में वाक्यार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार है या अर्थान्तरन्यास अलंकार है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥६॥

तदेष वृषलस्त्वां द्रष्टुमागच्छति । पश्यैनम् ।

राक्षसः [ स्वगतम् ] का गतिः ? [ प्रकाशम् ] एष पश्यामि ।

[ ततः प्रविशति राजा विभवतश्च परिवारः । ]

राजा—[ स्वगतम् ] विनैव युद्धादार्येण पराजितं दुर्जयं रिपुकुलमिति लज्जित इवास्मि । मम हि—

४०६ मुद्राराक्षसम्

फलयोगमवाप्य सायकाना-
मनियोगेन विलक्षता गतानाम् ।
न शुचेव भवत्यधोमुखानां
निजतूणीशयनव्रतं प्रतुष्ट्यै ॥१०॥

**अन्वय—**फलयोगम् अवाप्य अनियोगेन विलक्षता गतानाम् शुचेव अधोमुखाना ( मम ) सायकाना निजतूणीशयनव्रत प्रतुष्ट्यै न भवति ॥ १० ॥

**व्याख्या—फलयोगम्—**फलेन शत्रुजयरूपेण योग समागतम् पक्षान्तरे फलेन लोहमयाग्रकीलेन योगम् सम्बन्धम्, **अवाप्य—**प्राप्य, **अनियोगेन—**नियोगायोग्यत्वेन पक्षा तरे अप्रेरणया, **विलक्षता—**लज्जावत्ता पक्षांतरे अशरव्यता, **गतानाम्—**प्राप्तानाम् । **शुचेव—**दु खेनेव, **अधोमुखाना—**नतास्यानाम् पक्षान्तरे आनताग्रभागाना, ( **मम—**अस्माकमित्यर्थ ), **सायकाना—**बाणानाम्, **निजतूणीशयनव्रतम्—**स्वगृहे निर्व्यापारतयाऽवस्थानम् पक्षान्तरे स्वेपुधिनिश्चलावस्थितिनियम , **प्रतुष्ट्यै—**प्रीत्यै, **न भवति—**न जायते ॥ १० ॥

**हिन्दी अनुवाद—**इसलिए यह चन्द्रगुप्त आपको देखने के लिए आ रहा है । देखिए इसे—

राक्षस—[ मन में ] क्या उपाय है ? [ प्रकट ] यह देखता हूँ ।

[ तदनन्तर राजा और ऐश्वर्य के अनुसार अनुचरगण प्रवेश करते हैं । ]

राजा—[ मन में ] बिना युद्ध के ही आर्य ( चाणक्य ) ने कठिनाई से जीतने योग्य शत्रु-कुल को परास्त कर डाला, इससे मैं लज्जित-सा हूँ । मेरे तो—

लोहे के अग्रवर्त्ती कील से सम्बन्ध प्राप्त करके ( भी ) बिना चालन के लक्ष्यहीनता को प्राप्त किये हुए और ( अतएव ) मानो शोक से झुके हुए अग्रभाग वाले बाणों का अपने तूणीर मे निश्चल होकर पड़ा रहना सन्तोष के लिए नही हो रहा है । पक्षान्तर मे—कार्य-सिद्धि को प्राप्त करके ( भी ) आज्ञा देने के योग्य न होने के कारण लज्जा को प्राप्त किये हुए और ( अतएव ) मानो शोक से नीचे मुख किये हुए हमारा निश्चेष्ट होकर अपने घर मे पड़ा रहना सन्तोष के लिए नही हो रहा है ॥ १० ॥

सप्तमोऽङ्कः ४०७

**टिप्पणी—विभवतः—**ऐश्वर्यानुसारेणेत्यर्थः । विभवेन इति विभवतः तृतीयान्तात्तसिप्रत्ययः । अथवा वि√भू+शतृ=विभवत्, तस्य । इस व्युत्पत्ति में यह शब्द लुप्त 'राज्ञः' का विशेषण माना जाएगा । **परिवारः—**अनुचरवर्गः । परिवार्यते अनेन इति परि√वृ+घञ् करणे । श्लोक १० में वाच्योत्प्रेक्षा अलंकार और श्लेषानुप्राणित गम्योपमा अलंकार में अंगांगिभाव से सांकर्य है । इसमें मालभारिणी छन्द है । इस छन्द का लक्षण यह है— “विषमे ससजा यदा गुरु चेत्, सभरा येन तु मालभारिणीयम्' । मालभारिणी को औपच्छन्दसिक भी कहते हैं ॥ १० ॥

अथवा—

विगुणीकृतकार्मुकोऽपि जेतुं
भुवि जेतव्यमसौ समर्थ एव ।
स्वपतोऽपि ममेव यस्य तन्त्रे
गुरवो जाग्रति कार्यजागरूकाः ॥ ११ ॥

**अन्वयः—**स्वपतोऽपि मम इव यस्य तन्त्रे कार्यजागरूकाः गुरवो जाग्रति असौ विगुणीकृतकार्मुकोऽपि भुवि जेतव्यं जेतुं समर्थ एव ॥ ११ ॥

**व्याख्या—स्वपतोऽपि—**शयानस्यापि, **मम इव—**चन्द्रगुप्तस्येव, **यस्य—**भूपस्य, **तन्त्रे—**राष्ट्रचिन्तने, **कार्यजागरूकाः—**कार्ये कर्तव्यकर्मणि जागरूकाः—सावधानाः, **गुरवः—**आचार्याः, **जाग्रति—**सततं शिवानुध्यानपरा आसते, **असौ—**एष भूपः, **विगुणीकृतकार्मुकोऽपि—**विगुणीकृतं मौर्वीहीनं कृतं कार्मुकं धनुः यस्य तथाविधोऽपि, **भुवि—**पृथिव्यां, **जेतव्यं—**जेतुं योग्यं शत्रुमित्यर्थः, **समर्थ एव—**शक्त एव ॥ ११ ॥

**हिन्दी अनुवाद—अथवा—**सोते हुए भी मेरे जैसे जिस (राजा) के राष्ट्र-चिन्तन में कर्तव्य के प्रति सतत सावधान गुरु जाग रहे हैं, वह प्रत्यंचा से रहित धनुष वाला होता हुआ भी पृथ्वी पर शत्रु को जीतने में समर्थ ही है ॥ ११ ॥

**टिप्पणी—विगुणीकृतकार्मुकः—**विगतः गुणः अस्य इति विगुणम् । अविगुणं विगुणं कृतम् इति विगुणीकृतम् विगुण+च्वि, ईत्व√कृ+क्त । तादृशं कार्मुकं यस्य सः । इस पद्य में वाक्यार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार,

४०८ मुद्राराक्षसम्

उपमा अलङ्कार और विभावना अलङ्कार मे अङ्गाङ्गिभाव से साङ्कर्य है । इसमें भी मालभारिणी छन्द है ॥ ११ ॥

[ चाणक्यमुपसृत्य ] आर्य ! चन्द्रगुप्त प्रणमति ।

चाणक्य —वृषल ! सम्पन्नास्ते सर्वाशिष । तदभिवादयस्व तत्रभवन्तममात्यराक्षसम्, पैतृकस्तवायममात्यमुख्य ।

राक्षस — [ स्वगतम् ] योजितोऽनेन सम्बन्ध ।

राजा—[ राक्षसमुपसृत्य ] आर्य ! चन्द्रगुप्तोऽहमभिवादये ।

राक्षस [ विलोक्य स्वगतम् ] अये ! अय चन्द्रगुप्त ।। य एष —

बाल एव हि लोकेऽस्मिन् सम्भावितमहोदयः । क्रमेणारुढवान् राज्य यूथैश्वर्यमिव द्विपः ॥ १२ ॥

अन्वय —अस्मिन् लोके सम्भावितमहोदय बाल एव द्विपः यूथैश्वर्यमिव क्रमेण राज्य हि आरूढवान् ॥ १२ ॥

व्याख्या—अस्मिन्—इह, लोके—संसारे, सम्भावितमहोदय —सम्भावितः अनुमित महोदय विशिष्टाभ्युदय यस्य तादृश,, बाल एव—शिशुरेव, द्विप —गज., यूथैश्वर्यमिव—यूथस्य समूहस्य ऐश्वर्यमिव नेतृत्वमिव, क्रमेण—शनै,, राज्य हि—राजपदमेव, आरूढवान्—प्राप्तवान् ॥ १२ ॥

हिन्दी अनुवाद— [ चाणक्य के पास जाकर ] आर्य ! चन्द्रगुप्त प्रणाम करता है ।

चाणक्य—वृषल ! ( मेरे दिये हुए ) तुम्हारे सभी आशीर्वाद पूरे हो गए । इसलिए माननीय अमात्य राक्षस का अभिवादन करो। ये तुम्हारे पितृपरम्परागत प्रधान अमात्य हैं ।

राक्षस—[ मन में ] इसने नाता जोड दिया ।

राजा—[ राक्षस के पास जाकर ] आर्य ! मैं चन्द्रगुप्त प्रणाम करता हूँ ।

राक्षस—[ देखकर मन मे ] अये ! यह चन्द्रगुप्त है ।। जो यह—

इस संसार मे सम्भावना की गई महान् उन्नति वाला बालक ही उसी तरह राज्य को क्रमशः पा गया जैसे हाथी ( का बच्चा हाथियों के ) झुंड के नेतृत्व

सप्तमोऽङ्कः ४०६

को (पा लेता है अर्थात् जैसे हाथी का बच्चा कालक्रम से गजसमूह के नेतृत्व को प्राप्त कर लेता है, उसी तरह इस चन्द्रगुप्त ने भी राज्य का सिंहासन पा लिया है) ॥ १२ ॥

टिप्पणीसम्पन्नास्ते सर्वाशिषः—ते तव सम्बन्धे या या आशिषः मया दत्ताः ताः सर्वाः पूर्णाः जाता इत्यर्थः । आशास्यन्ते इति आशिषः आ√शास्+क्विप् कर्मणि, उपधायाः इत्वम् । सम्भावितमहोदयः—जिसके महान् अभ्युदय की संभावना की गई थी । इस श्लोक में श्रौती पूर्णोपमा अलंकार है और अनुष्टुप् छन्द है । अनुष्टुप् का लक्षण १, ३ में देखिए ॥ १२ ॥

[ प्रकाशम् ] राजन् विजयस्व ।

राजा—आर्य !—

जगतः किं न विजितं मयेति प्रविचिन्त्यताम् ।
गुरौ षाड्गुण्यचिन्तायामार्ये चार्ये च जाग्रति ॥ १३ ॥

अन्वयः—गुरौ—आर्ये च आर्ये च षाड्गुण्यचिन्तायाम् जाग्रति जगतः किं मया न विजितम् इति प्रविचिन्त्यताम् ॥ १३ ॥

व्याख्या—गुरौ आचार्ये, आर्ये च—पूज्ये चाणक्ये च, आर्ये च—माननीये राक्षसे च, षाड्गुण्यचिन्तायाम्—षाड्गुण्यस्य सन्धिविग्रहादीनां षण्णां गुणानां चिन्तायाम् अनुध्याने, जाग्रति—उद्यते सति, जगतः—संसारस्य, किं—वस्तु, मया—चन्द्रगुप्तेन, न विजितम्—न लब्धमित्यर्थः, इति प्रविचिन्त्यताम्—एतद्विचार्यताम् ॥ १३ ॥

हिन्द्यनुवाद—[ प्रकट ] राजन् ! विजयी रहो ।

राजा—आर्य ! गुरु आर्य (चाणक्य) के और आप के (संधि, विग्रह आदि) छह गुणों के चिन्तन में जागरूक रहने पर मैंने संसार का क्या नहीं जीता (अर्थात् सब कुछ जीत लिया)—यह सोचिये ॥ १३ ॥

टिप्पणीविजयस्व—अत्र 'विपराभ्यां जेः' इत्यात्मनेपदम् । गुरौ—इसका सम्बन्ध 'आर्ये' और आर्ये' दोनों से अलग-अलग है, इसलिए यह एकवचन में प्रयुक्त हुआ है । षाड्गुण्यचिन्तायाम्—षडेव गुणाः इति

४१०मुद्राराक्षसम्

षड्गुण + ष्यञ् स्वार्थे चतुर्वर्णादित्वात् = षाड्गुण्यम् तद्धितार्थे समासः । अत्र 'क्वचित् स्वार्थिका प्रकृतिंतो लिङ्गवचनान्यतिवर्तन्ते' इति कारिकावचनात् नपुंसकत्वम् । छह गुण ये हैं—'संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव' । षाड्गुण्यस्य चिन्ता चिन्तनम् तस्याम् । जगत —अत्र शेषे षष्ठी । इसका सम्बन्ध 'किम्' से है । इस श्लोक मे तुल्ययोगितालंकार, समुच्चयालंकार, वाक्यार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार और अर्थापत्ति अलंकार की स्थिति परस्पर निरपेक्ष होने से संसृष्टि अलंकार है । इसमें भी अनुष्टुप् छन्द है ॥ १३ ॥

राक्षस —[ स्वगतम् ] स्पृशति मां भृत्यभावेन कौटिल्यशिष्यः । अथवा विनय एवैष चन्द्रगुप्तस्य । महत्परन्तु मे विस्मयो जनयति । सर्वथा स्थाने यशस्वी चाणक्यः । कुतः —

द्रव्यं जिगीषुमधिगम्य जडात्मनोऽपि नेतुर्यशस्विनि पदे नियता प्रतिष्ठा । अद्रव्यमेत्य भुवि शुद्धनयोऽपि मन्त्री शीर्णाश्रयः पतति कूलजवृक्षवृत्त्या ॥ १४ ॥

अन्वय — द्रव्यं जिगीषुम् अधिगम्य जडात्मनोऽपि नेतुः यशस्विनि पदे प्रतिष्ठा नियता ( भवति ) । अद्रव्यम् एत्य शुद्धनयः अपि मन्त्री शीर्णाश्रयः ( सन् ) कूलजवृक्षवृत्त्या भुवि पतति ॥ १४ ॥

व्याख्या — द्रव्यम् — पात्र योग्यमिति यावत् जिगीषूम् — जयोद्योगिनम् नृप-मिति शेषः, अधिगम्य — लब्ध्वा, जडात्मनोऽपि — मन्दबुद्धेरपि, नेतुः — नायकस्य मन्त्रिणः, यशस्विनि — कीर्तिविशिष्टे, पदे — स्थाने, प्रतिष्ठा — स्थितिः, नियता — निश्चिता, ( भवति ) । अद्रव्यम् — अपात्रम् अयोग्यमिति यावत्, एत्य — प्राप्य, शुद्धनयः अपि — विशुद्धनीतिशाल्यपि, मन्त्री — अमात्यः, शीर्णाश्रयः — उच्छिन्नावलम्बनः, ( सन् ) कूलजवृक्षवृत्त्या — कूलजस्य नदीतट-जातस्य वृक्षस्य पादपस्य वृत्त्या व्यवहारेण तीरजस्तरुरिवेदित्यर्थः भुवि — पृथिव्या, पतति — पतनं प्राप्नोति ॥ १४ ॥

हिन्दी अनुवाद — राक्षस —[ मन में ] चाणक्य का शिष्य मुझे सेवक भाव से छू रहा है (अर्थात् व्यवहार कर रहा है) अथवा यह चन्द्रगुप्त का

सप्तमोऽङ्कः ४११

विनय ही है। किन्तु डाह मुझे इसके उलटे दिखाती रही है। चाणक्य सब प्रकार से उचित (ही) यशस्वी है। क्योंकि—

योग्य विजयेच्छुक (राजा) को पाकर मंदबुद्धि मंत्री की भी स्थिति यशस्वी पद पर निश्चित रूप से होती है। किन्तु अयोग्य (राजा) को पाकर अनवद्यनीतिशाली मंत्री भी विनष्ट आश्रय वाला होता हुआ तटवर्ती वृक्ष के नियम से (अर्थात् किनारे के कटते किनारे खडे पेड की भाँति) धराशायी हो जाता है ॥ १४ ॥

टिप्पणी—स्पृशति माम्—राक्षस सोचता है कि अभी न तो मैंने इसका अमात्यपद स्वीकार किया है और न इसने मुझे इसके लिए आमन्त्रित ही किया है। तो भी यह मुझे अपना सेवक समझ रहा है। अथवा विनय एवैष चन्द्रगुप्तस्य—फिर राक्षस सोचता है कि नहीं, यह इसकी विनयशीलता ही है। मैं डाह के कारण इसको गलत समझ रहा था। स्थाने—युक्त, ठीक ही। द्रव्यम्—भव्य, योग्य। द्रवति ऊर्ध्वं गच्छति इति √द्रु (गतौ) + डु कर्तरि = द्रुः = वृक्षः। द्रुरिव इति द्रु + यत् इवार्थे = द्रव्यम्। यह 'जिगीषुम्' का विशेषण है, जिसका संकेत 'चन्द्रगुप्त' से है। अधिगम्य—यहाँ शंका हो सकती है कि 'अधिगम्य' और 'भवति' दोनों क्रियाओं के भिन्न-भिन्न कर्ता होने से क्त्वा प्रत्यय नहीं होना चाहिए, किन्तु 'जिगीषुमधिगम्य स्थितस्य नेतुः प्रतिष्ठा भवति' ऐसी विवक्षा करने से क्त्वा प्रत्यय हो सकता है। नेतुः प्रतिष्ठा नियता—इसका संकेत चाणक्य से है। अद्रव्यम्—इसका संकेत मलयकेतु से है। शुद्धनयः—शुद्धः अनवद्यः नयः नीतिप्रयोगः यस्य तादृशः। इसका संकेत स्वयं (राक्षस) से है। शीर्णाश्रयः—आश्रीयते इति आ√श्रि + अच् कर्मणि = आश्रयः = अवलम्बः। शीर्णः उत्खातः आश्रयः यस्य तादृशः। पतति—वृक्षपक्षे भुवि = पृथिव्यां पतति। मन्त्रिपक्षे भुवि = जगति लोकसमाजे पतति = न्यग्भवति। इस श्लोक में अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार, तन्मूलक अर्थान्तरन्यास अलंकार, अर्थापत्ति अलंकार और निदर्शनालंकार का सांकर्य है। इसमें वसन्ततिलका छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥ १४ ॥

चाणक्यः—अमात्य राक्षस ! अपीष्यते चन्दनदासस्य जीवितम् ?

राक्षसः—भो विष्णुगुप्त ! कुतः सन्देहः ?

४१२ मुद्राराक्षसम्

चाणक्य —अमात्य राक्षस ! अगृहीतशस्त्रेण भवताऽनुगृह्यत वृषल इत्यत सन्देह । तद्यदि सत्यमेव चन्दनदासस्य जीवितमिष्यते, ततो गृह्यतामिदं शस्त्रम् ।

राक्षस —भो विष्णुगुप्त ! मा मैवम् । अयोग्या वयमेतस्य ग्रहणे, विशेषतस्त्वया गृहीतस्य शस्त्रस्य ।

चाणक्य —अमात्यराक्षस ! योग्योऽहमयोग्यो भवान् इति कथमेतत् ? पश्य—

अश्वैः सार्द्धमजस्रदत्तकविकाक्षामैरशून्यासनैः स्नानाहारविहारपानशयनस्वेच्छासुखैर्वर्जितान् । माहात्म्यादतिपौरुषस्य भवतो दृप्तारिदर्पच्छिद पश्यैतान् परिकल्पनाव्यतिकरप्रोच्छूनवशान् गजान् ॥१५॥

अन्वय —दृप्तारिदर्पच्छिद अतिपौरुषस्य भवतः माहात्म्यात् अशून्यासनैः अजस्रदत्तकविकाक्षामैः अश्वैः सार्द्धम् स्नानाहारविहारपानशयनस्वेच्छासुखैः वर्जितान् परिकल्पनाव्यतिकरप्रोच्छूनवशान् एतान् गजान् पश्य ॥१५॥

व्याख्या—दृप्तारिदर्पच्छिद—दृप्तानाम् गर्वितानाम् अरीणाम् शत्रूणाम् दर्पच्छिद गर्वहारिण , अतिपौरुषस्य—अतिशयपराक्रमशालिनः, भवत —तव, माहात्म्यात्—प्रभावात्, अशून्यासने —अशून्यानि अनपनीतानि आसनानि पल्याणांनि येषां तादृशैः, अजस्रदत्तकविकाक्षामै —अजस्रम् अनवरतम् दत्ता मुखे अर्पिता कविका खलीन येषा ते तथाविधे अतएव क्षामैः कृशैः, अश्वैः—घोटकैः, सार्द्धम्—सह, स्नानाहारविहारपानशयनस्वेच्छासुखै —स्नानं च निमज्जनं च आहारश्च भोजनं च विहारश्च भ्रमणं च पानं च तृषावारणं च शयनं च स्वापश्च तानि स्वेच्छासुखानि यथेच्छाव्यापारास्तैः, वर्जितान्—रहितान, परिकल्पनाव्यतिकरप्रोच्छूनवशान्—परिकल्पनायाः पल्याणास्य व्यतिकरात् नित्यसम्पर्कात् प्रोच्छूनाः जातशोफाः वशाः पृष्ठास्थीनि येषां तादृशान्, एतान्—अमून, गजान्—हस्तिनः, पश्य—अवलोकय ॥१५॥

हिन्दी अनुवादचाणक्य—अमात्य राक्षस ! क्या ( आप ) चन्दनदास का जीवन चाहते हैं ?

सप्तमोऽङ्कः | ४१९

राक्षस—हे चाणक्य ! ( इसमें ) सन्देह क्यों ?

चाणक्य—अमात्य राक्षस ! बिना शस्त्र धारण किये आप चन्द्रगुप्त पर अनुग्रह कर रहे हैं, इसलिये सन्देह है। अतः यदि सचमुच ही चन्दनदास का जीवन चाहते हैं तो यह शस्त्र धारण कीजिए।

राक्षस—हे चाणक्य ! नही, ऐसा नही। इसके ग्रहण करने में हम अयोग्य हैं, विशेष करके आपके द्वारा ग्रहण किये हुए शस्त्र के (ग्रहण करने में)।

चाणक्य—अमात्य राक्षस ! मैं योग्य हूँ और आप अयोग्य हैं, यह कैसे ? देखिए—

मर्दीले शत्रु के गर्व को चूर करने वाले तथा अत्यन्त पराक्रमी आपके प्रभाव से पलान से रहित न होने वाले और निरन्तर लगाम के धारण करने से क्षीण घोड़ों के साथ नहाने, खाने, घूमने, पीने और सोने के यथेच्छ उपभोगों से वंचित तथा हौदे के सदा कसे रहने से सूजे हुए पृष्ठ भाग वाले इन हाथियों को देखिए ॥१५॥

टिप्पणीअपि—यहाँ प्रश्नवाचक अव्यय है। अगृहीतशस्त्रेण—अगदत्तायुधेन। यह शस्त्र अमात्य-पद का प्रतीक है। अजस्र—न जस्यति मुञ्चतीति अजस्रम् नञ् √ जस् + र कर्तरि। अजस्रं दत्ता इति अजस्रदत्ता सुप्सुपा स०। स्नानाहारविहारपानशयन—इसमें द्वन्द्व समास है। परिकल्पना—हौदा। व्यतिकर—नित्य सम्पर्क या संलग्नता। वि—अति √ कृ + घ करणे वा अप् भावे = व्यतिकरः। प्रोच्छून—सूजी हुई ( पीठ की हड्डी )। प्र—उद् √ श्वि + क्त कर्तरि। इस श्लोक में तुल्ययोगिता अलंकार है और शार्दूल-विक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥१५॥

अथवा किमनेन न खलु भवतः शस्त्रग्रहणमन्तरेण चन्दनदासस्य जीवितमस्ति।

राक्षसः—[ स्वगतम् ]

नन्दस्नेहकणाः स्पृशन्ति हृदयं भृत्योऽस्मि तद्विद्विषां ये सिक्ताः स्वयमेव पाणिपयसा च्छेद्यास्त एव द्रुमाः ? ।

४१८ मुद्राराक्षसम्

चाणक्य— हे राजन् चन्द्रगुप्त ! फिर तुम्हारा क्या प्रिय उपकार करूँ ?

राजा— इससे बढकर क्या प्रिय है ?

राक्षस के साथ मित्रता ( करवा दी ), हमे राज्य में प्रतिष्ठित कर दिया और सभी नन्दो का विनाश कर दिया । इससे अधिक क्या ( प्रिय ) करना है ? ॥१७॥

टिप्पणी—प्रतिमानयितव्य— सम्माननीय, स्वीकर्तव्य इत्यर्थः । प्रति√मन् + णिच् वा √मान् ( चुरादि ) + तव्य कर्मणि । प्रणय— प्रार्थना । प्रणीयते अनेन इति प्र√नी + अच् करणे । पित्र्यम्— पितुरागत इति पितृ + यत् = पित्र्यः, तम् । यह 'विषयम्' का विशेषण है । विषयम्— देश, राज्य को । भो राजन् चन्द्रगुप्त— यही चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को राजा कहकर सम्बोधित किया है, नही तो इसके पूर्व सभी जगह 'वृषल' ही कहा है । इसका कारण यह है कि राक्षस के अमात्य बन जाने से चन्द्रगुप्त का राज्य स्थिर हो गया है, इसलिए अब यह वस्तुत राजा है । इससे पूर्व तो इसका राजपद डावाडोल था । इसी कारण चाणक्य ने राजा नहीं कहा । श्लोक १७ में सम नामक अलकार है और अनुष्टुप् छन्द है । अनुष्टुप् का लक्षण १, ३ में देखिए ॥१७॥

चाणक्य— विजये ! उच्यता दुगं rush/दुर्गपालो विजयपालश्च, अमात्यराक्षसपरिग्रहेण प्रीतो देवश्चन्द्रगुप्त समाज्ञापयति—विना हस्त्यश्व क्रियता सर्वबन्धनमोक्ष इति । अथवा अमात्यराक्षसे नेतरि किं हस्त्यश्वेन प्रयोजनम् ? तदिदानीम्—

सह वाहनहस्तिभ्या मुच्यता सर्वबन्धनम् ।
मया पूर्णप्रतिज्ञेन केवल बध्यते शिखा ॥१८॥

[ इति शिखा बध्नाति ]

प्रतीहारी— ज अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )

[ इति निष्क्रान्ता । ]

अन्वय— वाहनहस्तिभ्यां सह सर्वबन्धनम् मुच्यताम् । पूर्णप्रतिज्ञेन मया केवलं शिखा बध्यते ॥१८॥

सप्तमोऽङ्कः ४१६

व्याख्यावाहनहस्तिभ्यां—अश्वगजाभ्यां, सह—साकं, सर्वबन्धनम्—सर्वेषां समेषां बन्धनं संयमनं, मुच्यताम्—अपनीयताम्। पूर्णप्रतिज्ञेन—पूर्णा सफला प्रतिज्ञा प्रतिश्रुतिः यस्य तथाविधेन, मया—चाणक्येन, केवलं—मात्रं, शिखा—चूडा, बध्यते—संयम्यते ॥१८॥

हिन्दी अनुवादचाणक्य—विजये ! दुर्गपाल और विजयपाल कहो कि अमात्य राक्षस के मिल जाने से प्रसन्न महाराज चन्द्रगुप्त आज्ञा देते हैं कि हाथियों और घोड़ो को छोड़कर सब के बन्धन खोल दिये जायं। अथवा अमात्य राक्षस के मंत्री होने पर हाथी-घोड़े का क्या काम ? इसलिए अब—

हाथियों और घोड़ों के साथ सब का बन्धन खोल दिया जाय। पूर्ण प्रतिज्ञा वाला मैं केवल शिखा बांधता हूँ ॥१८॥

[ शिखा बाँधता है। ]

प्रतिहारी—जो आर्य की आज्ञा।

[ बाहर चली जाती है। ]

टिप्पणीहस्त्यश्वम्—हस्तिनश्च अश्वाश्च इति हस्त्यश्वम् द्वन्द्वसमासे कृते 'द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्' इति सूत्रेण एकवद्भावः। प्रयोजनम्—प्रयोज्यते अनेन इति प्र√युज्+णिच्+ल्युट् करणे = प्रयोजनम्। वाहन—उह्यते अनेन इति √वह्+ल्युट् करणे, निपातनात् वृद्धिः = वाहनम् = अश्वः। पूर्णप्रतिज्ञेन—जिसकी प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी है। नन्दवंशोन्मूलन के बाद चाणक्य की प्रतिज्ञा थी कि राक्षस को चन्द्रगुप्त से मिलाकर मौर्य की लक्ष्मी को स्थिर करना। वह अब पूरी हो चुकी है। इसलिए वह अपने को पूर्णप्रतिज्ञ कहता है और शिखा भी बांध लेता है। इस श्लोक में एक ही शिखा में विरूप बन्धन और मोचन की संघटना होने से विषमालंकार है। इसमें भी अनुष्टुप् छन्द है ॥१८॥

चाणक्यः—अमात्यराक्षस ! तदुच्यतां, किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि ?

राक्षसः—किमतः परमपि प्रियमस्ति ? यदि न परितोषस्तदिदमस्तु—

[ भरत-वाक्यम् ]

वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरूपां
यस्य प्राग्दन्तकोटिं प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री।

४२० सप्तमोऽङ्कः

म्लेच्छैरुद्वेज्यमाना भुजयुगमधुना संश्रिता राजमूर्ते स श्रीमद्वन्धुभृत्यश्चिरमवतु मही पार्थिवश्चन्द्रगुप्त ॥ १९ ॥

[ इति निष्क्रान्ता सर्वे । ]
॥ इति मुद्राराक्षसे सप्तमोऽङ्कः ॥

अन्वयः—प्रलयपरिगता भूतधात्री प्राक् अतनुबलाम् अनुरुपा वाराहीं तनुम् आस्थितस्य यस्य आत्मयोनेः दन्तकोटिं शिश्रिये, अधुना म्लेच्छै उद्वेज्यमना (सती) राजमूर्ते (यस्य) भुजयुगम् संश्रिता स श्रीमद्वन्धुभृत्यः पार्थिवः चन्द्रगुप्तः महीं चिरम् अवतु ॥१९॥

व्याख्याप्रलयपरिगता—प्रलयेन कल्पक्षयेण परिगता अभिभूता, भूतधात्री—पृथिवी, प्राक्—पूर्वम् कल्पादौ इति यावत्, अतनुबलाम्—प्रचुरबलवतीम्, अनुरूपा—योग्या, वाराहीं—शौकरी, तनु—शरीरम्, आस्थितस्य—अधितिष्ठतः, यस्य, आत्मयोने—स्वयम्भुवः श्रीविष्णो, दन्तकोटिं—दशनाग्र, शिश्रिये—आश्रिता, अधुना—सम्प्रति, म्लेच्छै—यवने, उद्वेज्यमाना—पीड्यमाना, (सती) राजमूर्ते—पार्थिवदेहस्य (यस्य आत्मयोनेः), भुजयुगम्—बाहुयुगलम्, संश्रिता—समवलम्बिता, , श्रीमद्वन्धुभृत्य—श्रीमन्तः समृद्धा बान्धवाः स्वजना भृत्या सेवकाश्च यस्य तादृश, पार्थिव—राजा, चन्द्रगुप्त—मौर्य, महीं—पृथिवीम् चिरम्—दीर्घकाल यावत्, अवतु—रक्षतु ॥१९॥

हिन्दी अनुवादचाणक्य—अमात्य राक्षस ! तो कहिये, और क्या आपका प्रिय उपकार करूं ?

राक्षस—क्या इससे बढकर भी कोई प्रिय है ? यदि सन्तोष न होतो यह रहे—

[ भरत-वाक्य ]

प्रलय से व्याप्त (होती हुई) पृथिवी ने पहले (कल्प के आरम्भ में) प्रचुरबलशाली तथा (रक्षा करने में) समर्थ शूकर-शरीर को धारण किये हुए जिस स्वयम्भू विष्णु के दांतों के अग्रभाग का अवलम्ब किया था और इस समय म्लेच्छों से पीडित होती हुई (उसने जिस) राजमूर्ति (अर्थात् राजा का शरीर

सप्तमोऽङ्कः

४२१

धारण किये हुए विष्णु ) की दोनों भुजाओं का आश्रय लिया है, वह श्री-सम्पन्न बन्धुओं एवम् अनुचरों वाला राजा चन्द्रगुप्त चिरकाल तक पृथिवी की रक्षा करे ॥१६॥

[ सभी ( पात्र रंगमंच से ) चले जाते हैं । ]

॥ मुद्राराक्षस ( नामक नाटक ) में सातवाँ अंक समाप्त ॥

टिप्पणीभरतवाक्यम्—नाटक के अन्त में आशीर्वाद रूप में गाया जाने वाला पद्य । भूतधात्री—भूतानां प्राणिनां धात्री जननी = पृथिवी । वाराहीम्—वराहः शूकरः तस्य इयम् इति वराह + अण् + ङीप् = वाराही, ताम् । आत्मयोनेः—आत्मा स्वयमेव योनिः कारणमस्य इति आत्मयोनिः, तस्य । शिश्रिये—√श्रिधातुः उभयपदी । अत्र कर्त्रभिप्राये क्रियाफले आत्मनेपदम् । उद्वेज्यमाना—उद् √विज् + णिच् + शानच् कर्मणि । कई पुस्तकों में 'उद्विज्यमाना' पाठ है । वह अशुद्ध है; कारण विज् धातु अकर्मक है । उससे कर्म में शानच् कैसे हो सकता है ? अतएव णिजन्त से कर्म में शानच् करना चाहिए । राजमूर्तेः—पुरा वाराहीं तनुम् आस्थितस्य अधुना राजमूर्तेः । संश्रिता—सम् √श्रि + क्त कर्तरि वर्तमाने । 'ग्रन्थादौ ग्रन्थमध्ये ग्रन्थान्ते च मङ्गलमाचरेत्' इस शिष्टाचार के अनुसार इस ग्रन्थ के आदि में 'धन्या केयम्' श्लोक से, मध्य में 'आकाशं काशपुष्पम्' श्लोक से और अन्त में 'वाराहीम्' इस प्रकृत श्लोक से कवि ने मंगलाचरण किया है ॥१६॥

एषा मदीया सरला सुबोधा व्याख्या प्रिया मन्दधियामपि स्यात् ।
विभाव्य पूर्णेयमिति श्रमेण प्रीत्यै कृता प्रीतिमतोः स्वपित्रोः ॥ १ ॥

गृहीता पूर्वटीकाभ्यो बह्वीभ्यो हि सहायता ।
तासां कृतज्ञताञ्जलिं निर्मातॄणां करोम्यहम् ॥२॥

* श्रीसाम्बसदाशिवार्पणम् *