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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

१३४ मुद्राराक्षस-

पुरुष ।—रामराम ! महाजन लोगों की यह चाल नही, विशेष कर के साधु जिष्णुदास की।

राक्षस। तौ कह मित्रहि को दुख वाहू के नास को हेतु तुम्हारे मान है।

५ पुरुष ।—हा, आर्य्य । राक्षस ।—(घबडा कर आप ही आप) अरे, इस के मित्र का प्रिय मित्र तो चन्दनदास ही है और यह कहता है कि सुहृद् विनाश ही उस के विनाश का हेतु है इस से मित्र के स्नेह से मेरा चित्त बहुत ही घबड़ाता है। (प्रकाश) भद्र ! तुम्हारे मित्र का चरित्र हम सविस्तर सुना चाहते हैं।

१० पुरुष ।—आर्य्य ! अब मै किसी प्रकार से मरने मे विलम्ब नही कर सकता। राक्षस ।—यह वृत्तान्त तो अवश्य सुनने के योग्य है इससे कह। पुरुष ।- क्या करैं ? आप ऐसा हठ करते हैं तो सुनिये।

१५ राक्षस ।—हा ! जी लगा कर सुनते हैं, कहो । पुरुष ।—आप ने सुना ही होगा कि इस नगर मे प्रसिद्ध जौहरी सेठ चन्दनदास है। राक्षस ।—[ दुख से आप ही आप ] दैव ने हमारे विनाश का द्वार अब खोल दिया। हृदय ! स्थिर हो अभी न जाने क्या क्या कष्ट तुम को सुनना होगा। (प्रकाश) भद्र ! हम ने भी सुना है कि वह साधु अत्यन्त मित्रवत्सल है ।

२० पुरुष ।—वह जिष्णुदास के अत्यन्त मित्र है। राक्षस ।—[ आप ही आप ] यह सब हृदय के हेतु शोक का वज्रपात है [ प्रकाश ] हा, आगे।

२५ पुरुष ।—सो जिष्णुदास ने मित्र की भांति चन्द्रगुप्त से बहुत बिनय किया। राक्षस ।—क्या क्या ?

छठा अङ्क । १३५

पुरुष ।—कि देव! हमारे घर मे जो कुछ कुटुम्बपालन का द्रव्य है आप सब ले लें, पर हमारे मित्र चन्दनदास को छोड़ दे। राक्षस ।—(आप ही आप) वाह जिष्णुदास ! तुम धन्य हो ! तुम ने मित्रस्नेह का निर्वाह किया। जा धन के हित नारि तजै पति पूत तजै पितु सीलहि खोई। ५ भाई सौं भाई लरै रिपुसे पुनि मित्रता मित्र तजै दुख जोई ॥ ता धनको बनिया ह्वै गिन्यौ न दियो दुख मीत सौं आरत होई। स्वारथ अर्थ तुम्हारोई है तुमरे सम और न या जग कोई ॥ (प्रकाश) इस बात पर मौर्य ने क्या कहा ? पुरुष ।—आर्य ! इस पर चन्द्रगुप्त ने उस से कहा कि जिष्णु- १० दास ! हम ने धन के हेतु चन्दनदास को नही दण्ड दिया है। इस ने अमात्य राक्षस का कुटुम्ब अपने घर मे छिपा- या, और बहुत मागने पर भी न दिया। अब भी जो यह दे दे तो छूट जाय, नही तो इस को प्राणदण्ड होगा। तभी हमारा क्रोध शान्त होगा और दूसरे लोगों को भी इस से १५ डर होगा—यह कह उस को वधस्थान मे भेज दिया। जिष्णु- दास ने कहा कि "हम कान से अपने मित्र का अमङ्गल सुनने के पहिले मर जाय तो अच्छी बात है' और अग्नि मे प्रवेश करने को बन मे चले गए। हम ने भी इसी हेतु कि उनका मरण न सुनें यह निश्चय किया कि फासी २० लगा कर मर जाय और इसी हेतु यहा आए है। राक्षस ।—(घबड़ा कर) अभी चन्दनदास को मारा तो नही ? पुरुष ।—आर्य्य ! अभी नहीं मारा है, बारम्बार अब भी उन से अमात्य राक्षस का कुटुम्ब मागते है और वह मित्र- वत्सलता से नही देते, इसी मे इतना विलम्ब हुआ। २५ राक्षस ।—(सहर्ष आप ही आप) वाह मित्र चन्दनदास ! वाह ! धन्य ! धन्य !

१३६ मुद्राराक्षस-

मित परोच्छहु मै कियो, सरनश्रत प्रतिपाल ।
निरमल जस सिबि*-सो लियो, तुम या काल कराल ॥

(प्रकाश) भद्र ! तुम शीघ्र जाकर जिष्णुदास को जलने से रोको, हम जाकर अभी चन्दनदास को छुड़ाते हैं।
५ पुरुष ।—आर्य्य ! आप किस उपाय से चन्दनदास को छुड़ाइएगा ?
राक्षस ।—(आतङ्क से खड्ग मियान से खींच कर) इन दुखों में एकान्त मित्र निष्कृप कृपाण से ।

समर साध तन पुलकित नित साधा मम कर को ।
१० रन मह बारहि बार परखियौ जिन बल-पर को ॥
विगत जलद नभ नील खड्ग यह रोस बढ़ावत ।
मीत कष्ट सो दुखिहु मोहि रनहित उमगावत ॥


* शिवि ने शरणागत कपोत के हेतु अपना शरीर दे दिया था ।
राजा शिवि जब ६२ यज्ञ कर चुके और आगे फिर प्रारम्भ किया तब इन्द्र को भय हुआ कि अब मेरा पद लेने में आठ यज्ञ बाकी हैं, उस ने अग्नि को कपोत बनाया और आप बाज बन उन के मारने को चला, तब वह भागा हुआ राजा की शरण में गया । राजा ने उस का वचन सुन बाज को देख यज्ञशाला में अपनी गोदी में छिपा लिया और बाज को निवारण किया । बाज बोला कि महाराज ! आप यहा यह क्या अनर्थ करते हैं कि मेरा आहार छीन लिया ? मै भूख से शरीर को छोड आप को पापभागी करूंगा । तब राजा ने कहा कि इसे तो नहो देगे, इस के पलटे में जो मागेगा सो देँग, पश्चात इस के प्रति उत्तर में यह बात ठहरी कि राजा कबूतर के तुल्य तौल के शरीर का मास दे, तब हम कबूतर को छोड देवें । इस बात पर राजा ने प्रसन्न हो तुला पर एक ओर कपोत को बैठाय, दूसरी ओर अपने शरीर का मास काट कर चढाने लगे परन्तु सब शरीर का मास काट काट के चढाय दिया तौ भी कबूतर के समान नही हुआ । तब राजा ने गले पर खड्ग चलाया त्योही विष्णु ने हाथ पकड अपने लोक को भेज दिया ।

छठा अङ्क । १३७

पुरुष । सेठ चन्दनदास के प्राण बचाने का उपाय मैं ने सुना किन्तु ऐसे टेढ़े समय मे इसका परिणाम क्या होगा, यह मैं नही कह सकता (राक्षस को देख कर पैर पर गिरता है) आर्य ! क्या सुगृहीत नामधेय अमात्य राक्षस आप ही है ? यह मेरा सन्देह आप दूर कीजिए । ५

राक्षस ।—भद्र ! भर्तृकुल विनाश से दुखी और मित्र के नाश का कारण यथार्थ नामा अनार्य राक्षस मैं ही हूं ।

पुरुष ।—( फिर पैर पर गिरता है) धन्य है ! बड़ा ही आनन्द हुआ । आप ने हम को आज कृतकृत्य किया ।

राक्षस ।—भद्र ! उठो । देर करने की काई आवश्यकता नही । १० जिष्णुदास से कहो कि राक्षस चन्दनदास को अभी छुड़ाता है ।

(खङ्ग खींचे हुए, 'समर साध' इत्यादि पढ़ता हुआ इधर उधर टहलता है)

पुरुष ।—(पैर पर गिर कर) अमात्यचरण ! प्रसन्न हों । मैं १५ यह बिनती करता हूँ कि चन्द्रगुप्त दुष्ट ने पहले शकटदास के वध की आज्ञा दी थी । फिर न जाने कौन शकटदास को छुड़ा कर उस को कही परदेस मे भगा ले गया ! आर्य शकटदास के वध मे धोखा खाने से चन्द्रगुप्त ने क्रोध कर के प्रमादी समझ कर उन वधिकों ही को मार डाला । २० तब से वधिक जो किसी को वध्यस्थान मे ले जाते हैं और मार्ग मे किसी को शस्त्र खींचे हुए देखते हैं तो छुड़ा ले जाने के भय से अपराधी को बीच ही में तुरत मार डालते हैं । इस से शस्त्र खींचे हुए आप के वहा जाने से चन्दनदास की मृत्यु में और भी शीघ्रता होगी (जाता है) । २५

१३८ मुद्राराक्षस-

राक्षस ।—( आप ही आप ) उस चाणक्य वटु का नीतिमार्ग कुछ समझ नही पडता क्योंकि— सकट बच्यौ जो ता कहे, तो क्यौ घातक घात । जाल भयो का खेल मै, कछु समझ्यौ नहि जात ॥ ५ ( सोचकर ) नहि शस्त्र को यह काल यासों मीत जीवन जाइ है । जौ नीति सोचै या समय तो व्यर्थ समय नसाइ है ॥ चुप रहनहू नहि जोग जब मम हित विपति फन्द पर्यौ । तासों बचावन प्रियहि अब हम देह निज विक्रय कर्यौ ॥

( तलवार फेंक कर जाता है )

१० छठा अंक समाप्त हुआ ।


सप्तम अंक

स्थान—सूली देने का मसान

(पहिला चाडाल आता है)

**चाडाल ।—**हटो लोगो हटो, दूर हो भाइया, दूर हो । जो अपना प्राण, धन और कुल बचाना हो तो दूर हो । राजा का विरोध यत्नपूर्वक छोड़ो ।

करि कै पथ्य विरोध इक, रोगी त्यागत प्रान ।
पै बिरोध नृप सों किए, नसत सकुल नर जान ॥

जो न मानो तो इस राजा के विरोधी को देखो जो स्त्री, पुत्र समेत यहां सूली देने को लाया जाता है। ऊपर देख कर ) क्या कहा ? कि इस चन्दनदास के छूटने का कुछ उपाय भी है ? भला इस बिचारे के छूटने का कौन उपाय है ? पर हां, जो यह मंत्री राक्षस का कुटुम्ब दे दे तो छूट जाय । (फिर ऊपर देख कर ) क्या कहा कि यह शरणागतवत्सल प्राण देगा पर यह बुरा कर्म्म न करैगा ? तो फिर इसकी बुरी गति होगी क्योंकि बचने का तो वही एक उपाय है।

( कंधे पर सूली रक्खे मृत्यु का कपड़ा पहिने चन्दनदास, उसकी स्त्री और पुत्र, और दूसरा चांडाल आते हैं )

**स्त्री ।—**हाय हाय ! जो हम लोग नित्य अपनी बात बिगड़ने के डर से फूंक फूंक कर पैर रखते थे उन्हीं हम लोगों की चोरों की भांति मृत्यु होती है। काल देवता को नमस्कार है• जिस को मित्र उदासीन सभी एक से हैं, क्योंकि—

१६० मुद्राराक्षस—

थोडि मास भख मरन भय, जियहि खाइ तृन घास ।
तिन गरीब मृगको करहि, निरदय ब्याधा नास ॥

(चारो ओर देख कर)

५ अरे भाई जिष्णुदास ! मेरी बात का उत्तर क्यो नही देते ? हाय ! ऐसे समय मे कौन ठहर सकता है।
च० दा०— [आसू भर कर] हाय ! यह मेरे सब मित्र बिचारे कुछ नही कर सकते, केवल रोते है और अपने को अकर्मण्य समझ शोक से सूखा सूखा मुह किये आसू भरी आखों से एक टक मेरी ही ओर देखते चले आते है।
१० दोनों चाडाल। अजी चन्दनदास ! अब तुम फासी के स्थान पर आ चुके इस से कुटुम्ब को बिदा करो।
च० दा० ।—(स्त्री से) अब तुम पुत्र को लेकर जाओ, क्योकि आगे तुम्हारे जाने की भूमि नही है।
स्त्री।—ऐसे समय में तो हम लोगों को बिदा करना उचित ही १५ है, क्योंकि आप परलोक जाते हैं, कुछ परदेश नहीं जाते (रोती है)।
च० दा० ।—सुनो मै कुछ अपने दोष से नही मारा जाता, एक मित्र के हेतु मेरे प्राण जाते हैं, तो इस हर्ष के स्थान पर क्यो रोती है ?
२० स्त्री।—नाथ ! जो यह बात है तो कुटुम्ब को क्यों बिदा करते हो ?
च० दा० ।—तो फिर तुम क्या कहती हो ?
स्त्री।—(आसू भर कर) नाथ ! कृपा कर के मुझे भी साथ ले चलो ।
२५ च०दा० ।—हा ! यह तुम कैसी बात कहती हो ? अरे ! तुम इस बालक का मुह देखो और इस की रक्षा करो, क्योंकि

सप्तम अङ्क । १४१

सप्तम अङ्क । १४१

यह बिचारा कुछ भी लोकव्यवहार नही जानता । यह किसका मुह देख के जीएगा ?

स्त्री ।—इस की रक्षा कुलदेवी करेंगी । बेटा ! अब पिता फिर न मिलेंगे इस से मिल कर प्रणाम कर ले ।

बालक ।—( पैरों पर गिर के ) पिता ! मैं आप के बिना क्या ५ करू गा ?

चं० दा० ।—बेटा ! जहा चाणक्य न हो वहा बसना ।

दोनों चाडाल ।—( सूली खड़ी कर के ) अजी चन्दनदास ! देखो, सूली खड़ी हुई, अब सावधान हो जाओ ।

स्त्री ।—( रोकर ) लोगो, बचाओ ! अरे ! कोई बचाओ । १०

च० दा० ।—भाइयो, तनिक ठहरो ( स्त्री से ) अरे ! अब तुम रोरो कर क्या नन्दों को स्वर्ग से बुला लोगी ? अब वे लोग यहा नही है जो स्त्रियों पर सर्व्वदा दया रखते थे ।

१ चाडाल ।—अरे वजुवेत्रक ! पकड़ इस चन्दनदास को, १५ घरवाले आप ही रो पीट कर चले जायगे ।

२ चाडाल ।—अच्छा वज्रलोमक, मै पकड़ता हूं ।

चं०दा० ।—भाइयो ! तनिक ठहरो, मै अपने लड़क से तो मिल लूं ( लड़के को गले लगा कर और माथा सूंघ कर) बेटा ! मरना तो था ही पर एक मित्र के हेतु मरते हैं इस से सोच मत कर । २०

पुत्र ।—पिता, क्या हमारे कुल के लोग ऐसा ही करते आए हैं ? ( पैर पर गिर पड़ता है ।)

२ चाडाल ।—पकड़ रे बज्रलोमक ! ( दोनों चंदनदास को पकड़ते हैं ) ।

स्त्री ।—लोगो ! बचाओ रे, बचाओ ! २५

१४२ मुद्राराक्षस—

(वेग से राक्षस आता है)

राक्षस ।—डरो मत, डरो मत । सुनो सुनो सेनापति ! चन्दनदास को मत मारना, क्योंकि— नसत स्वामिकुल जिन लख्यो, निज चख शलु समान । ५ मित्रदुख ह्र मै धरयौ, निलज होइ जिन प्रान ॥ तुम सों हारि बिगारि सब कढ़ी न जाकी साल । ता राक्षस के कठ मै, डारहु यह जमफास ॥

च० दा० ।—(देख कर और आखों मे आसू भर कर) अमात्य ! यह क्या करते हो ?

१० राक्षस । मित्र, तुम्हारे सच्चरित्र का एक छोटा सा अनुकरण ।

च० दा ।—अमात्य, मेरा किया तो सब निष्फल हो गया, पर आप ने ऐसे समय यह साहस अनुचित किया ।

राक्षस ।—मित्र चंदनदास ! उराहना मत दो, सभी स्वार्थी है ।

१५ (चाडाल से) अजी ! तुम उस दुष्ट चाणक्य से कहो ।

दोनों चाडाल ।—क्या कह ?

राक्षस ।— जिन कलि मै हू मित्र हित, तृन सम छोड़े प्रान । जाके जस-रवि सामुहे, शिवि जस दीप समान ॥ २० जाको अति निर्मल चरित, दया आदि नित जानि । बौद्धहु सब लज्जित भए, परम शुद्ध जेहि मानि ॥ ता पूजा के पात्र कों, मारत तू धरि पाप । जाके हितु सो शत्रु, तुव, आयो इत मै आप ॥

१ चाडाल । —अरे वेणुवेत्रक ! तू चन्दनदास को पकड़ कर २५ इस मसान के पेड़ की छाया मे बैठ, तब से मन्त्री चाणक्य को मै समाचार दू कि अमात्य राक्षस पकड़ा गया ।

सप्तम अङ्क । १४३

सप्तम अङ्क । १४३

२ चांडाल ।—अच्छा रे वज्रलोमक ! ( चन्दनदास, स्त्री, बालक और सूली को लेकर जाना है) ।

१ चांडाल ।—( राक्षस को लेकर घूम कर ) अरे ! यहा पर कौन है ? नन्दकुल सैनासच्चय के चूर्ण करनेवाले वज्र से, वैसे ही मौर्य्यकुल मे लक्ष्मी और धर्म्म स्थापना करने ५ वाले, आर्य्य चाणक्य से कहो ।

राक्षस ।—( आप ही आप ) हाय ! यह भी राक्षस को सुनना लिखा था !

१ चांडाल ।—कि आप की नीति ने जिस की बुद्धि को घेर लिया है, वह अमात्य राक्षस पकड़ा गया । १०

( परदे मे सब शरीर छिपाए केवल मुह खोले चाणक्य आता है )

चाणक्य ।—अरे कहो, कहो ।

किन निज बसन हि मैं धरी, कठिन अगिनि की ज्वाल ? रोकी किन गति वायु की, डोरिन ही के जाल ? १५ किन गजपति मर्द्दन प्रबल, सिंह पींजरा दीन ? किन केवल निज बाहु बल, पार समुद्रहि कीन ?

१ चांडाल —परमनीतिनिपुण आप ही ने तो।

चाणक्य ।—अजी ! ऐसा मत कहो, वरन “नन्दकुलद्वेषी दैव ने ” यह कहो । २०

राक्षस ।—( देख कर आप ही आप ) अरे ! क्या यही दुरात्मा वा महात्मा कौटिल्य है ?

सागर जिमि बहु रत्नमय, तिमि सब गुण की खानि । तोष होत नहि देखि गुण, बैरी रूप निज जानि ॥

चाणक्य ।—( देख कर ) अरे ! यही अमात्य राक्षस है ? २५ जिस महात्मा ने—

१४४मुद्राराक्षस

बहु दुख सों सोचत सदा, जागत रैन बिहाय।
मेरी मति अरु चन्द्र की, सैनहि दई थकाय ॥
(परदे से बाहर निकल कर) अजी अजी अमात्य राक्षस ! मै विष्णुगुप्त आप को दण्डवत् करता हूं। (पैर छूता है)
५ राक्षस।—(आप ही आप) अब मुझे अमात्य कहना तो केवल मुंह चिढ़ाना है (प्रगट) अजी विष्णुगुप्त ! मैं चाडालों से छू गया हू इस से मुझे मत छूओ।
चाणक्य।—अमात्य राक्षस ! वह श्वपाक नही है, वह आप का जाना सुना सिद्धार्थक नामा राजपुरुष है और दूसरा
१० भी समिद्धार्थक नामा राजपुरुष ही है, और इन्ही दोनों द्वारा विश्वास उत्पन्न कर के उस दिन शकटदास को धोखा दे कर मै ने वह पत्र लिखवाया था।
राक्षस।—(आप ही आप) अहा ! बहुत अच्छा हुआ कि मेरा शकटदास पर से संदेह दूर हो गया।
१५ चाणक्य।—बहुत कहा तक कह—
वे सब भद्रभटादि वह, सिद्धार्थक वह लेख।
वह भदन्त वह भूषणहु, वह नट-कपट भेख ॥
वह दुख चन्दनदास को, जो कछु दियो दिखाय।
सो सब मम (लज्जा से कुछ सकुच कर)
२० सो सब राजा चन्द्र को, तुम सो मिलन उपाय ॥
देखिए, यह राजा भी आप से मिलने आप ही आते हैं।
राक्षस।—(आप ही आप) अब क्या करें ? (प्रगट) हा ! मै देख रहा हू।
(सेवको के सग राजा आता है)
२५ राजा।—(आप ही आप) गुरु जी ने बिना युद्ध ही दुर्जय शत्रु का कुल जीत लिया इस में कोई संदेह नही, मैं तो बड़ा लज्जित हो रहा हूं, क्योंकि—

सप्तम अङ्क । १४

सप्तम अङ्क । १४

ह्वै बिनु काम लजाय करि, नीचो मुख भरि सोक ।
सोवत सदा निषङ्ग में, मम बानन के थोक ॥
सोवहि धनुष उतारि हम, जदपि सकहि जग जीति ।
जा गुरु के जागत सदा, नीति निपुण गत भीति ॥
( चाणक्य के पास जाकर ) आर्य्य ! चन्द्रगुप्त प्रणाम ५
करता है ।
चाणक्य ।—वृषल ! अब सब असीस सच्ची हुई, इस से
इन पूज्य अमात्य राक्षस को नमस्कार करो, यह
तुम्हारे पिता के सब मन्त्रियों में मुख्य है ।
राक्षस ।—( आप ही आप ) लगाया न इस ने सम्बन्ध १०
राजा ।— ( राक्षस के पास जा कर ) आर्य्य ! चन्द्रगुप्त
प्रणाम करता है ।
राक्षस ।—( देख कर आप ही आप) अहा ! यही चन्द्रगुप्त
है !
होनहार जाको उदय, बालपने ही जोइ । १५
राज लह्यो जिन बाल गज, जूथाधिप सम होइ ॥
( प्रगट ) महाराज ! जय हो ।
राजा ।—आर्य्य !
तुमरे आछत बहुरि गुरु, जागत नीति प्रबीन ।
कहहु कहा या जगत में, जाहि न जय हम कीन ॥ २०
राक्षस ।—( आप ही आप ) देखो, यह चाणक्य का सिखाया
पढ़ाया मुझ से कैसी सेवको की सी बात करता है !
नहीं २, यह आप ही विनीत है । अहा ! देखो, चन्द्रगुप्त
पर डाह के बदले उलटा अनुराग होता है । चाणक्य
सब स्थान पर यशस्वी है, क्योंकि— २५
पाइ स्वामि सतपात्र जौ, मन्त्री मूरख होइ ।
तौह पावै लाभ जस, इत तौ पण्डित दोइ ॥

१८६ मुद्राराक्षस-

मूरख स्वामी लहि गिरै, चतुर सचिव हू हारि ।
नदी तीर तरु जिमि नसै, तीरन ह्वै लहि बारि ॥

चाणक्य।—क्यों अमात्य राक्षस ! आप क्या चन्दनदास के प्राण बचाया चाहते हैं ?
५ राक्षस ।—इस मे क्या सन्देह है ?
चाणक्य ।—पर अमात्य ! आप शस्त्र ग्रहण नही करते, उस से सन्देह होता है कि आप ने अभी राजा पर अनुग्रह नही किया, इस से जो सच ही चन्दनदास के प्राण बचाया चाहते हों तो यह शस्त्र लीजिये ।
१० राक्षस ।—सुनो विष्णुगुप्त ! ऐसा कभी नही हो सकता, क्योंकि हम लोग उस योग्य नही, विशेष कर के जब तक तुम शस्त्र ग्रहण किए हो तब तक हमारे शस्त्र ग्रहण करने का क्या काम है ?
चाणक्य । - भला अमात्य ! आपने यह कहा से निकाला,
१५ कि हम योग्य हैं और आप अयोग्य हैं ? क्योंकि देखिये—
रहत लगामहि कसे अश्व की पीठ न छोडत ।
खान पान असनान भोग तजि सुख नहि मोडत ॥
छूटे सब सुख साज नीद नहि आवत नयनन ।
निसि दिन चौंकत रहन बीर सब भय धरि तिन मन ॥
२० वह हौदन सों सब छन कस्यौ नृप गजगन अवरोखिए ।
रिपुदर्प्प दूर कर अति प्रबल निज महात्मबल देखिए ॥

वा इन बातों से क्या ! आप के शस्त्र ग्रहण किये बिना तो चन्दनदास बचता भी नही ।
राक्षस । ( आप ही आप )
२५ नन्द नेह छूट्यौ नही, दास भए अरि साथ ।
ते तरु कैसे काटि ह, जे पाले निज हाथ ॥

सप्तम अंक । १४७

सप्तम अंक । १४७

कैसे करिहैं मित्र पै, हम निज कर सों घात ।
अहो भाग्य गति अति प्रबल, मोहि कछु जानि न जात ॥
( प्रकाश अच्छा विष्णुगुप्त ! मगाओ खड्ग “नमस्सर्व्वकार्य्यप्रतिपत्तिहेतवे सुहृत्स्नेहाय ” देखो, मै उपस्थित हूं ।
चाणक्य ।—( राक्षस को खड्ग दे कर हर्ष से ) राजन वृषल ! ५
बधाई है बधाई है । अब अमात्य राक्षस ने तुम पर अनुग्रह किया । अब तुम्हारी दिन दिन बढ़ती ही है ।
राजा ।—यह सब आप की कृपा का फल है ।
( पुरुष आता है । )
पुरुष ।—जय हो महाराज की, जय हो । महाराज ! भद्रभट १०
भागुरायणादिक मलयकेतु को हाथ पैर बाध कर लाए है और द्वार पर खड़े हैं, इस मे महाराज का क्या आज्ञा होती है ?
चाणक्य ।—हा, सुना । अजी ! अमात्य राक्षस से निवेदन करो, अब सब काम वही करेंगे । १५
राक्षस ।—(आप ही आप) कैसे अपने वश मे कर के मुझी से कहलाता है । क्या करै ? ( प्रकाश ) महाराज, चन्द्रगुप्त ! यह तो आप जानते ही हैं कि हम लोगों का मलयकेतु का कुछ दिन तक सम्बन्ध रहा है । इस से उस के प्राण तो बचाने ही चाहिए । २०
राजा ।—( चाणक्य का मुह देखता है )
चाणक्य ।--महाराज ! अमात्य राक्षस का पहिली बात तो सर्व्वथा माननी ही चाहिये ( पुरुष से ) अजी ! तुम भद्रभटादिको से कह दो कि “अमात्य राक्षस के कहने से महाराज चन्द्रगुप्त मलयकेतु को उस के पिता २५

१४८ मुद्राराक्षस -

का राज्य देते हैं” इस से तुम लोग खग जा कर उस को राज पर बिठा आश्रो।
पुरुष ।—जो आज्ञा।
चाणक्य ।—अजी अभी ठहरो, सुनो ! विजयपाल दुर्गपाल से यह कह दो कि अमात्य राक्षस के शस्त्र ग्रहण से प्रसन्न हो कर महाराज चन्द्रगुप्त यह आज्ञा करते हैं कि “चन्दनदास को सब नगरो का जगत्सेठ कर दो।”
पुरुष ।—जो आज्ञा (जाता है)।
चाणक्य ।—चन्द्रगुप्त ! अब और मै क्या तुम्हारा प्रिय करू ?
१० राजा ।—इस से बढ़ कर और क्या भला होगा ?

मैत्री राक्षस सों भई, मिल्यौ अकटक राज।
नन्द नसे सब अब कहा, यासो बढि सुखसाज ॥

चाणक्य ।—(प्रतिहारी से) विजये ! दुर्गपाल विजयपाल से कहो कि “अमात्य राक्षस क मेल से प्रसन्न हो कर महाराज चन्द्रगुप्त आज्ञा करते हैं कि हाथी, घोड़ो को छोड कर और सब बन्धुओ का बन्धन छोड़ दो” वा जब अमात्य राक्षस मन्त्री हुए तब अब हाथी घोड़ो का क्या सोच है ? इस से—

छोड़ौ सब गज तुरग अब, कछु मत राखौ बाधि।
२० केवल हम बाधत सिखा, निज प्रतिज्ञा साधि ॥
(शिखा बाघता है)

प्रतिहारी ।—जो आज्ञा (जाती है)।
चाणक्य ।—अमात्य राक्षस ! मै इस से बढ़ कर और कुछ भी आप का प्रिय कर सकताहूँ ?

सप्तम अङ्क । १४६

सप्तम अङ्क । १४६

राक्षस।—इस से बढ कर और हमारा क्या प्रिय होगा ? पर जो इतने पर भी सन्तोष न हो तो यह आशीर्वाद सत्य हो—

‘ वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरुपां
यस्य प्राग्दन्तकोटिम्प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री।
म्लेच्छैरुद्वेज्यमाना भुजयुगमधुना पीवर राजमूर्त्ते ः ५
स श्रीमद्बन्धुभृत्यश्चिरमवतु महीम्पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः ॥”

( सब जाते हैं )

सप्तम अंक समाप्त हुआ।

॥ इति ॥

APPENDIX A

उपसंहार (अक्षर) क ।

इस नाटक मे आदि अन्त तथा अङ्कों के विश्रामस्थल में रंगशाला मे ये गीत गाने चाहिए । यथा—

सब के पूर्व्व मङ्गलाचरण में ।
( ध्रुवपद चौताला )

५ जय जय जगदीस राम, श्याम धाम पूर्ण काम, आनन्द घन ब्रह्म विष्णु, सत् चित सुखकारी । कस रावनादि काल, सतत प्रनत भद्रपाल, सोभित गल मुकुमाल, दीनतापहारी ॥ प्रेम सरन पापहरन, असरन जन सरन चरन, सुखहि करन दुखहि दरन, वृन्दावनचारी । रमावास जगनिवास, राम रमन
१० समनत्रास, बिनवत हरिचन्द दास, जय जय गिरधारी ॥ १ ॥

( प्रस्तावना के अन्त मे प्रथम अङ्क के आरम्भ मे )
( चाल लखनऊ की ठुमरी “शाहजादे आलम तेरे लिये” इस चाल की )

जिनके हितकारक पण्डित हैं तिन कों कहा सत्रुन को डर है ।
१५ समुझैं जग में सब नीतिन्ह जो तिन्हें दुर्ग बिदेश मनो घर है ।
जिन मित्रता राखी है लायक सो तिनकों तिनकाहू महासर है ।
जिनकी परतिज्ञा टरै न कबौ तिनकी जय ही सब ही थर है॥२॥

( प्रथम अङ्क की समाप्ति और दूसरे अङ्क के प्रारम्भ मे )

उपसंहार ( अक्षर ) क । १५१

जग मै घर की फूट बुरी । घर के फूटहि सों बिनसाई सुबरन लंकपुरी ॥ फूटहि सों सब कौरव नासे भारत युद्ध भयो । जाको घाटो या भारत मै अब लौ नहि पुजयो ॥ फूट हि सों जयचन्द बुलायो जवनन भारत धाम । जाको फल अबलौ भोगत सब आरज होइ गुलाम ॥ फूटहि सों नवनन्द ५ बिनासे गया मगध को राज । चन्द्रगुप्त को नासन चाह्यो आपु नसे सहसाज ॥ जो जग मै धन मान और बल आपुनो राखन होय । तो अपने घर मै भूलेहू फूट करौ मति कोय ॥३॥ ( दूसरे अङ्क की समाप्ति और तीसरे अङ्क के आरम्भ में ) जग मै तेई चतुर कहावैं । जे सब विधि अपने कारज को १० नीको भांति बनावै ॥ पढ़्यौ लिख्यौ किन होइ जुपै नहि कारज साधन जानै । ताही कों मूरख या जग मै सब कोऊ अनुमानै ॥ छल मै पातक होत जदपि यह शास्त्रन मै बहु गायो । पे अरि सों छल किए दोष नहि मुनियन यहै बताया ॥४॥ ( तीसरे अङ्क की समाप्ति और चतुर्थ अङ्क के आरम्भ मे ) १५ ठुमरी—तिन को ना कछू कबहुं बिगरै, गुरु लोगन को कहनो जे करैं । जिन कों गुरु पन्थ दिखावत है ते कुपन्थ पै भूलि न पाव धरैं ॥ जिन कों गुरु अच्छत आप रहैं ते बिगारे न बैरिन के बिगरैं । गुरु को उपदेस सुनौ सब ही, जग कारज जासों सबै समरै ॥ ५ ॥ २० ( चतुर्थ अङ्क की समाप्ति और पंचम अङ्क के आरम्भ मे ) पूरबी—करि मूरख मित्र मिताई, फिर पछुतैहो रे भाई । अंत दगा खैहौ सिर धुनिहौ रहिहौ सबै गँवाई ॥ मूरख जो कछु हितहू करै तो तामै अन्त बुराई । उलटो उलटो काज करत सब दैहै अंत नसाई ॥ लाख करौ हित मूरख सों पै २५ नाहि न कछु समझाई । अन्त बुराई सिर पै ऐहै रहि जैहो मुह बाई ॥ फिर पछितैहो रे भाई ॥ ६ ॥

१५२ मुद्राराक्षस-

( पञ्चम अंक की समाप्ति और षष्ठ अंक के आरम्भ मे )
काफी ताल होली का।

छुलियन सों रहो सावधान नहि तो पछताओगे। इन की बातन मै फसि रहिहौ सबहि गवाओगे ॥ स्वारथ लोभी जन
५ सों आखिर दगा उठाओगे। तब सुख पैहो जब साचन सों नेह बढाओगे ॥ छुलियन सों० ॥ ७ ॥

( छठे अङ्क की समाप्ति और सातवे अङ्क के आरम्भ मे )
'जिन के मन मे सिय राम बसै' इस धुन की )

जग सूरज चंद टरै तो टरै पे न सज्जननेहु कबो बिचलै।
१० धन संपति सर्बस गेह नसौ नहि प्र म की मेड सों एड् टलै ॥
सतवा दिन कौ तिन का सम प्रान रहै तो रहै वा ढलै तो ढलै।
निज मीत का प्रीत प्रतीत रहौ इक और सब जग जाउ भलै ॥ ८ ॥

( अन्त मे गाने को ) ( बिहाग—श्लोक के अर्थ अनुसार )
१५ हरौ हरि रूप सबै जग बाधा। जा सरूप सों धरनि उधारी निज जन कारज साधा ॥ जिमि तब दाढ अग्र लै राखी महि हति असुर गिरायो। कनक दृष्टि म्लेच्छन हू। तमि किन अब लौं मारि नसायो ॥ आरज राज रूप तुम तासों मागत यह वरदाना। प्रजा कुमुदगन चन्द्र नृपति को करहु सकुल
२० कल्याना ॥ ६ ॥

( बिहाग ठुमरी )

पूरी अमी की कटोरिया सी चिरजीओ सदा विक्टोरिय रानी। सूरज चंद प्रकास करैं जब लौं रहै सात हू सिन्धु म पानी ॥ राज करौ सुख सांतवलो निज पुत्र औ पौत्र समेत
२५ सयानी। पालौ प्रजागन कों सुख सों जग कीरति गान कर गुन गानी ॥ १० ॥

उपसंहार ( उत्तर ) क । १५३

कलिगड़ा—लहौ सुख सब बिधि भारतवासी । विद्या कला जगत की सीखौ तजि आलस की फासी ॥ अपनो देस धरम कुल समुझहु छोड़ि वृत्ति निज दासी । उद्यम करिकै होहु एक मति निज बल बुद्धि प्रकासी ॥ पचपीर की अगति छाड़ि कै ह्वै हरिचरन उपासी । जग के और नरन सम येऊ ५ होउ सबै गुनरासी ।