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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

मुद्राराक्षस—

।—जो आज्ञा (जाता है)।
क पर्दा हटता है और राक्षस आसन पर बैठा हुआ
ा की मुद्रा मे एक पुरुष के साथ दिखलाई पड़ता
)
—(आप ही आप) चन्द्रगुप्त की ओर के बहुत लोग
री सेना मे भरती हो रहे हैं इस से हमारा मन शुद्ध
है। क्योंकि—

साध्य ते अन्वित अरु बिलसत निज पच्छहि।
साधन साधक जो नहि छुअत बिपच्छहि॥
पुनि आपु असिद्ध सपच्छ बिपच्छहु मे सम।
कछु नहि निज पच्छ माहि जाको है सगम॥
ति ऐसे साधनन कों अनुचित अंगीकार करि।
भांति पराजित होत है बादी लो बहुबिधि बिगरि+॥


पाँचवें अंक में चार बेर दृश्य बदलना है। पहिले प्रवेशक, फिर भागुरायण
र तीसरा यह राक्षस का प्रवेश, चौथा राक्षस का फिर मलयकेतु के पास
नाटको के अनुसार चार दृश्या वा गर्भांको में इस को बाट सकते हैं यथा
राजमार्ग, दूसरा युद्ध के डेरा के बीच में मार्ग, और तीसरा राक्षस का
मलयकेतु का डेरा।

यशास्त्र में अनुमान के प्रकरण में किसी पदार्थ को दूसरे पदार्थ के साथ
देख कर व्याप्तिज्ञान होता है कि जहां पहला पदार्थ रहता है वहां दूसरा
। होगा। जैसे रसोई के घर में अग्नि के साथ धूए को बराबर देख कर
होता है कि जहां धुँआ होगा वहां अग्नि भी अवश्य होगी। इसी भांति और
२ दूसरे पदार्थ को देखते। पहले पदार्थ का ज्ञान होता है कि वहां भी अग्नि
। इसी को अनुमिति कहते हैं। जिस की बाद में सिद्धि करनी हो उस
हते हैं, जैसे अग्नि। जिस के द्वारा सिद्ध हो उसे हेतु और साधन कहते हैं
जहां साध्य का रहना निश्चित हो वह सपक्ष कहलाता है, जैसे पाकशाला।
मिति से साध्य की सिद्धि करनी हो वह पक्ष कहलाता है जैसे पर्वत।
का निश्चय अभाव हो वह विपक्ष कहलाता है, जैसे जलाशय। यहां पर
नी न्यायशास्त्र की जानकारी का परिचय देने को यह छंद बनाया है।

पंचम अङ्क । ११५

वा जो लोग चन्द्रगुप्त से उदास हो गए हैं वही लोग इधर मिले हैं, मैं व्यर्थ सोच करता हूं । (प्रगट) प्रियम्वदक ! कुमार के अनुयायी राजा लोगों से हमारी ओर से कह दो कि अब कुसुमपुर दिन दिन पास आता जाता है, इस से सब लोग अपना सेना अलग अलग कर के जो जहां नियुक्त हों ५
वहां सावधानी से रहें ।

आगे खस अरु मगध चलैं जय ध्वजहि उड़ाए ।
यवन और गंधार रहैं मधि सैन जमाए ॥
चेदि हून सक राज लोग पीछे सो धावहि ।
कौलूतादिक नृपति कुमारहि घेरे आवहि * ॥ १०


जैसे न्यायशास्त्र में वाद करनेवाला पूर्वोक्त साधनादिको को न जान कर स्वपक्ष स्थापन में असमर्थ हो कर हार जाता है, वैसे ही जो राजा ( भावक ) सैना आदि साधन से अन्वित है और अपने पक्ष को जानता है, विपक्ष से बचता है वह जय पाता है । जो आप साध्यो ( सेना नीति आदिको ) से हीन ( असिद्ध ) है और जिसको शत्रु मित्र का ज्ञान नहीं है और जो अपने पक्ष को नहीं समझता और अनुचित साधनों का [ अर्थात् शत्रु से मिले हुए लोगों का ] अंगीकार करता है, वह हारता है । यह राक्षस ने इसी विचार पर कहा कि चन्द्रगुप्त के लोग इधर बहुत मिले हैं इस से हारने का सन्देह है [ दर्शनों का थोड़ा सा बखान पाठकगण को जानकारी के हेतु पीछे किया जायगा ] ।


* खस हिमालय के उत्तर की एक जाति । कोई विद्वान तिब्बत, कोई लद्दाख़ को खस देश मानते हैं । यवन शब्द से मुख्य तात्पर्य्य यूनानप्रान्त के देशों से है (Bactria, Ionia, Greek) परन्तु पश्चिम की विदेशी और अन्यधर्मी जाति मात्र को मुहाविरे में यवन कहते हैं । गांधार जिस का अपभ्रंश कन्दहार है । चेदि देश बुन्देलखराड, कोई कोई चन्देरी के छोटे शहर को चेदि देश की राजधानी कहते हैं । हून देश योरोप के तत्काल के किसी असभ्य देश का नाम ( Huns Hungary ) कोई विद्वान् मध्यएशिया में हून देश मानते हैं । शक को कोई विद्वान् तातार देश कहते हैं और कोई ( Scythians ) को शक कहते हैं । कोई बलूचिस्तान के पास के देशों को शक देश मानते हैं । कौलूत देश के राजा चित्रवर्मादिक राक्षस के बड़े विश्वस्त थे इसी से कुमार की सुरक्षा इनको दी थी । इन को राजाओं के

११६ मुद्राराक्षस—

प्रियम्बदक ।—अमात्य की जो आज्ञा (जाता है) । (प्रतिहारी आता है)

प्रतिहारी ।—अमात्य की जय हो। कुमार अमात्य को देखना चाहते हैं।

५ राक्षस ।—भद्र ! क्षण भर ठहरो। बाहर कौन है ? (एक मनुष्य आता है)।

मनुष्य ।—अमात्य ! क्या आज्ञा है ?

राक्षस ।—भद्र ! शकटदास से कहो कि जब से कुमार ने हम को आभरण पहराया है तब से उन के सामने नगे अंग १० जाना हम को उचित नही है। इस से जो तीन आभरण मोल लिये हैं उन में से एक भेज दें।


नाम और देश का कुछ और पता मिलने को हम सिकंदर क विजय की बडी बडी पुस्तको को देखें। क्योकि बहुत सी बाते जिन का पता इस देश की पुस्तको से नहीं लगता विदेशी पुस्तकें उन को सहज में बतला देती हैं। इस हेतु यहा तीन अगरेजी पुस्तको से हम थोडा सा अनुवाद करते हैं—( 1 ) Alexander the Great and his successors, ( 2 ) History of Greece ( 3 ) Plutarch s lives of illustrious men V II “सिकंदर के सिपाही लोग केवल ऋतु और थकावट ही से नहीं डरे कि तु उन्हो ने यह भी सुना कि गगा छ सौ फुट गहरी और चार मील चौटी है। Ganderites और Praisians के राजगण अस्सी हजार सवार, दो लाख सिपाही छ हजार हाथी और आठ हजार रथ सजे हुए सिकंदर से लडने को तैयार हैं। इतनी सैना मगध देश में एकत्र होना कुछ आश्चर्य की बात नहीं क्योकि ऐन्डाकुत्तस (चद्रगुप्त) ने सिल्यूकस को एक ही बेर पाच सौ हाथी दिए थे और एक बेर छ लाख सैना लेकर मारा हिंदुस्तान जीता था। यह गान्दरिटस गान्धार और प्रेसियन फारस प्रात के किसी देश का नाम होगा। हम को इन पाच राजाओ में कुलूत और मलय इन दो देशो की विशेष चिंता है इस हेतु इन देशो का विशेष अन्वेषण कर के आग लिखते हैं ‘ एक बेर सिकंदर [Malli] माल्लि वा मल्लि नामक भारत के विख्यात लटनवाली जाति से जब वह उन को जीतने को गया था मरते मरते बचा। जब सिकन्दर ने उन लोगो का दुर्ग घेर लिया और दीवार पर के लोगों को अपने शस्त्र से मार डाला तो साहस कर क अकेला दीवार पर चढ कर भीतर कूद पडा और वहा

पञ्चम अङ्क । ११७

पञ्चम अङ्क । ११७

मनुष्य ।—जो अमात्य की आज्ञा । ( बाहर जाता है आभरण लेकर आता है । ) अमात्य ! अलङ्कार लीजिए । राक्षस ।— ( अलङ्कार धारण कर के ) भद्र ! राजकुल में जाने का मार्ग बतलाओ । प्रतिहारी ।—इधर से आइए । ५ राक्षस ।—अधिकार ऐसी बुरी वस्तु है कि निर्दोष मनुष्य का भी जी डरा करता है । सेवक प्रभु सों डरत सदाही । पराधीन सपने सुख नाही ॥ जे ऊंचे पद के अधिकारी । तिन को मनही मन भय भारी ॥ सबही द्वेष बड़न सो करहीं । अनुचित कान स्वामि को भरहीं ॥ १० जिमि जे जनमे ते मरैं मिले अवसि बिलगाहि । तिमि जे अति ऊंचे चढ़, गिरि हैं संसय नाहि ॥


शत्रुओं से ऐसा घिर गया कि यदि उस के सिपाही साथ ही न पहुंचते तो वह टुकड़े २ हो जाता । ” यह मली देश ही मुद्राराक्षस का मलय देश है यह संभव होता है । यद्यपि अंग्रेजी वाले यह देश कहां था इस का कुछ वर्णन नहीं करते किन्तु हिन्दुस्तान से लौटते समय यह देश उस को मिला था, इस से अनुमान होता है कि कहीं बलूचिस्तान के पास होगा । आगे चल कर फिर लिखते हैं “नदियों के मुहाने पर पहुंचने के पीछे उस को एक टापू मिला, जिस को उसने शिकोस्तितिस Scillcustis लिखा है पर आरियन [आर्य] लोग उस टापू को किलूता Cillutta कहते हैं ।” क्या आश्चर्य है कि यहां कुलूत हो । वह लोग यह भी लिखते हैं कि चन्द्रगुप्त ने छोटेपन में सिकन्दर को देखा था और उस के विषय में उस ने यह अनुमति दी थी कि सिकन्दर यदि स्वभाव अपने वश में रखता तो सारी पृथ्वी जीतता । अब इन पुस्तकों से राजाओं के नाम भी कुछ मिलाइए । पर्व्वतेश्वर और बर्बर यह दोनों शब्द Barbarian बर्बरियन के कैसे पास हैं । काश्मीरादि देश का राजा जिस के पंजाब अति निकट है, पुष्कराक्ष ग्रीक लोगो के पोरस शब्द के पास है । पुष्कराज वा पुसकस और उस से पोरस हुआ हो तो क्या आश्चर्य है । प्युकैस्तम वा पुसैतस ( जो सिकन्दर के पीछे पारस का गवर्नर हुआ था ) भी पुष्कराक्ष के पास है किंतु यहां पारस का राजा मेघाक्ष लिखा है । इन राजाओं का ठीक, ठीक ग्रीक नाम या जो देश उन का विशाखदत्त ने लिखा उस को यूनानवाले

११८ मुद्रा राक्षस—

प्रतिहारी।— (आगे बढ़ कर) अमात्य ! कुमार यह बिराजते हैं, आप जाइये।

राक्षस।—अरे, कुमार यह बैठे हैं।

लखत चरन की ओर हू, तऊ न देखत ताहि।
अचल दृष्टि इक ओर ही, रही बुद्धि अवगाहि॥
कर पै धारि कपोल निज, लसत झुकौ अवनीस।
दुसह काज के भार सो, मनहु नमित भो सीस॥

(* आगे बढ़ कर) कुमार की जय हो !

मलयकेतु।—आर्य ! प्रणाम करताहू। आसन पर बिराजिए।

१० राक्षस।—(बैठता है।)

मलयकेतु। आर्य ! बहुत दिनों से हम लोगों ने आप को नही देखा।

राक्षस।—कुमार ! सेना को आगे बढ़ाने के प्रबन्ध में फसने के कारण हम को यह उपालम्भ सुनना पड़ा।

१५ मलयकेतु।—अमात्य ! सेना के प्रयाण का आप ने क्या प्रबन्ध किया है? मैं भी सुनना चाहता हूं।

राक्षस। कुमार! आपके अनुयायी, राजा लोगों को यह आज्ञा दी है (आगे खस अरु मगध इत्यादि छन्द पढ़ता है)।


उस समय क्या कहत थे यह निर्णय करना बहुत कठिन है। संस्कृत के शब्द भी यूनानी में इतने बदल जाते हैं जिस का कुछ हिसाब नहीं। च द्रगुप्त का ऐ द्राका त्तस वा सैं डाकोटस, पाटलिपुत्र का पालीबोत्रा वा पालीभोत्तरा। तक्षक का टैक्साइल्स। यही बात यदि हम यूनानी शब्दों का संस्कृत के सादृश्यानुसार अनुवाद करें तो उपस्थित होंगी। अलेक्जैन्डर एलेकजे दर इत्यादि का फारसी सिकन्दर हुआ। हम यदि इन शब्दो को संस्कृत Sanskritised करें तो अलक्षेन्द्र वा लक्षेन्द्र वा श्रीकेन्द्र वा ओक दर वा शिखेन्द्र इत्यादि शब्द होगे। अब कहिए, कहा के शब्द कह जा पडे इसी से ठीक ठीक नामग्राम का निर्णय होना बहुत कठिन है। केवल शब्द विद्या के पण्डितो के कुतूहल के हेतु इतना भी लिखा गया।

* यहीं पर चौथा दृश्य आरम्भ होता है।

पंचम अङ्क । ११६

मलयकेतु ।—( आप ही आप ) हां, जाना, जो हमारे नाश करने के हेतु चन्द्रगुप्त से मिले हैं वही हमको घेरे रहेंगे (प्रकाश) आर्य्य, अब कुसुमपुर से कोई आता है या वहां जाता है कि नहीं ? राक्षस ।—अब यहां किसी के आने जाने से क्या प्रयोजन । ५ पांच छः दिन मे हम लोग ही वहां पहुंचेगे । मलयकेतु ।—[ आप ही आप ] अभी सब खुल जाता है [ प्रगट ] जो यही बात है तो इस मनुष्य को चिट्ठी ले कर आप ने कुसुमपुर क्यों भेजा था ? राक्षस ।—[ देख कर ] अरे ! सिद्धार्थक है ? भद्र ! यह १० क्या ? सिद्धार्थक ।—[ भय और लज्जा नाट्य कर के ] अमात्य ! हम को क्षमा कीजिये । अमात्य ! हमारा कुछ भी दोष नहीं है मार खाते खाते हम आप का रहस्य छिपा न सके । राक्षस ।—भद्र ! वह कौन सा रहस्य है यह हम को नहीं १५ समझ पड़ता । सिद्धार्थक ।—निवेदन करते हैं, मार खाने से, [ इतना ही कह लज्जा से नीचा मुंह कर लेता है ] । मलयकेतु ।—भागुरायण ! स्वामी के सामने लज्जा और भय से यह कुछ न कह सकेगा, इस से तुम सब बात आर्य्य २० से कहो । भागुरायण ।—कुमार की जो आज्ञा । अमात्य ! यह कहता है कि अमात्य राक्षस ने हम को चिट्ठी दे कर और संदेश कह कर चन्द्रगुप्त के पास भेजा है । राक्षस ।—भद्र सिद्धार्थक ! क्या यह सत्य है ? सिद्धार्थक ।—[ लज्जा नाट्य कर के ] मार खाने के डर से २५ मैंने कह दिया ।

१२० मुद्राराक्षस—

राक्षस। — कुमार ! मार की डर से लोग क्या नहीं कह देते ? मलयकेतु। — भागुरायण ! चिट्ठी दिखला दो और संदेशा वह अपने मुह से कहैगा । भागुरायण। — (चिट्ठी खोल कर 'स्वस्ति कही से कोई ५ किसी को' इत्यादि पढता है ।) राक्षस। — कुमार ! कुमार ! यह सब शत्रु का प्रयोग है । मलयकेतु। — लेख अशून्य करने को आर्य ने जो आभरण भेजे हैं वह शत्रु कैसे भेजेगा ? (आभरण दिखलाता है) राक्षस। — कुमार ! यह मैं ने किसी को नहीं भेजा । कुमार ने १० यह मुझ को दिया, और मै ने प्रसन्न होकर सिद्धार्थक को दिया । भागुरायण। — अमात्य ! ऐसे उत्तम आभरणों का विशेष कर अपने अङ्ग से उतार कर कुमार की दी हुई वस्तु का—यह पात्र है ? १५ मलयकेतु। — और संदेश भी बड़े प्रामाणिक सिद्धार्थक से सुनना—यह आर्य ने लिखा है । राक्षस। — कैसा संदेश और कैसी चिट्ठी ? यह हमारा कुछ नहीं है ! मलयकेतु। — तो मुहर किस की है ? २० राक्षस। — धूर्त्त लोग कपटमुद्रा भी बना लेते हैं । भागुरायण। — कुमार ! अमात्य सच कहते हैं । सिद्धार्थक, यह चिट्ठी किस की लिखी है ? सिद्धार्थक। — (राक्षस का मुंह देख कर चुप रह जाता है ।) भागुरायण। — चुप मत रहो । जी कड़ा कर के कहो । २५ सिद्धार्थक। — आर्य ! शकटदास ने । राक्षस—शकटदास ने लिखा तो मानो मैने ही लिखा । मलयकेतु। — विजये ! शकटदास को हम देखा चाहते हैं ।

पञ्चम अङ्क । १२१

पञ्चम अङ्क । १२१

भागुरायण । - ( आप ही आप ) आर्य चाणक्य के लोग बिना निश्चय समझे हुए कोई बात नही करते । जो शकटदास आकर यह चिट्ठी किस प्रकार लिखी गई है यह सब वृत्तान्त कह देगा तो मलयकेतु फिर बहक जायगा ।

प्रकाश ) कुमार ! शकटदास, अमात्य राक्षस के सामने लिखा होगा तो भी न स्वीकार करेंगे, इस से उन का कोई और लेख मगाकर अक्षर मिला लिये जाय ।

मलयकेतु ।—विजये ! ऐसा ही करो ।

भागुरायण ।—और मुहर भी आवै ।

मलयकेतु । - हा, यह भी । १०

कञ्चुकी । - जो आज्ञा ( बाहर जाता है और पत्र और मुहर लेकर आता है ।) कुमार ! यह शकटदास का लेख और मुहर है ।

मलयकेतु - ( देख कर और अक्षर और मुहर को मिलान कर के ) आर्य ! अक्षर तो मिलते है । १५

राक्षस ।--( आप ही आप ) अक्षर नि सन्देह मिलते हैं, किन्तु शकटदास हमारा मित्र है, इस हिसाब से नही मिलते, तो क्या शकटदास ही ने लिखा अथवा

पुत्र दार की याद करि, स्वामि भक्ति तजि देत ।
छोड़ि अचल जस कों करत, चल धन सों जन हेत ॥ २०

या इसमे सन्देह ही क्या है ?

मुद्रा ताके हाथ की, सिद्धार्थक हू मित्र ।
ताही के कर को लिख्यौ, पत्रहु साधन चित्र ॥
मिलि कै शत्रुन सों करन, भेद भूलि निज धर्म ।
स्वामि विमुख शकटहि कियो, निश्चय यह खल कर्म ॥ २५

मलयकेतु ।—आर्य ! श्रीमान ने तीन आभरण भेजे, सो मिले, यह जो आप ने लिखा है सो उसी में का एक आभरण

१२२ मुद्राराक्षस-

यह भी है ? (राक्षस के पहने हुए आभरण को देख कर आप ही आप) क्या यह पिता के पहने हुए आभरण है ? (प्रकाश) आर्य, यह आभरण आपने कहा से पाया ? राक्षस। — जौहरी से मोल लिया था । ५ मलयकेतु। — विजये ! तुम इन आभरणों को पहचानती हौ ? प्रतिहारी। — देख कर आसू भर के) कुमार ! हम सुगृहीत नामधेय महाराज पर्व्वतेश्वर के पहिरने के आभरणों को न पहिचानैगे ? मलयकेतु। — (आखों मे आसू भर के) १० भूषण प्रिय ! भूषण सबै, कुल भूषण ! तुव अङ्ग । तुव मुख ढिग इमि सोहतो, जिमि ससि तारन सङ्ग ॥ राक्षस। (आपही आप) य पर्व्वतेश्वर के पहिने हुए आभरण हैं ? (प्रकाश) जाना, यह भी निश्चय चाणक्य के भेजे हुए जौहरियों ने ही बेचा हे । १५ मलयकेतु। — आर्य ! पिता के पहने हुए आभरण और फिर चन्द्रगुप्त के हाथ पडे हुए जौहरी बेचै, यह कभी हो नही सकता । अथवा हो सकता है । अधिक लाभ के लोभ सों, क्रूर ! त्यागि सब नेह । बदले इन आभरन के तुम बेच्यौ मम देह ॥ २० राक्षस। — (आपही आप) अरे ! यह दाव तो पूरा बैठ गया । मम लेख नहि यह किमि कहैं मुद्रा छुपी जब हाथ की । विश्वास होत न शकट तजि हे प्रीति कबहु साथ की ॥ पुनि बेचि हैं नृप चन्द्र भूषण कौन यह पतियाइहैं । तासों भलो अब मौन रहनो कथन तैं पति जाइ है ॥ २५ मलयकेतु। — आर्य ! हम यह पूछते हैं । - राक्षस। — जो आर्य हो उस से पूछो, हम अब पापकारी अनार्य हो गये है ।

पंचम अङ्क । १२३

मलयकेतु ।—स्वामि पुत्र तुव मौर्य्य हम, मित्र पुत्र सह हेत । पैहो उत वाको दियो इत तुम हम कोँ देत ॥ सचिवहु भे उत दास ही, इत तुम स्वामी आप । कौन अधिक फिर लोभ जो, तुम कीन्हो यह पाप ॥ राक्षस ।—( आखों मे आसू भरके ) कुमार ! इस का निर्णय ५ तो आप ही ने कर दिया— स्वामि पुत्र मम मौर्य्य तुम, मित्र पुत्र सह हेत । पैहैं उत वाको दियो, इत हम तुम को देत ॥ सचिवहु भे उत दास ही, इत हम स्वामी आप । कौन अधिक फिर लोभ जो, हम कीन्हो यह पाप ॥ १० मलयकेतु ।—( चिट्ठी, पेटी इत्यादि दिखला कर ) यह सब क्या है ? राक्षस ।—( आखों मे आसू भर के ) यह सब चाणक्य ने नही किया, दैव ने किया । निज प्रभु सोँ करि नेह जे भृत्य समर्पत देह । १५ तिन सौं अपने सुत सरिस सदा निबाहत नेह ॥ ते गुण गाहक नृप सबे जिन मारे नुन माहि । ताही विधि को दोस यह औरन को कछु नाहि ॥ मलयकेतु ।—(क्रोधपूर्वक) अनार्य्य ! अब तक छल किए जाते हौ कि यह सब दैव ने किया । २० विष कन्या दै पितु हत्यौ, प्रथम प्रीति उपजाय । अब रिपु सोँ मिलि हम सबन, बधन चहत ललचाय ॥ राक्षस ।—( दुःख से आप ही आप ) हां ! यह और जले पर नमक है । (प्रगट कानों पर हाथ रख कर ) नारायण ! देव पर्व्वतेश्वर का कोई अपराध हम ने नही किया । २५ मलयकेतु ।—फिर पिता को किसने मारा ? राक्षस ।—यह दैव से पूछो ।

१२४ मुद्रााराक्षस -

मलयकेतु ।— दैव से पूछूँ, जीवसिद्धि क्षपणक से न पूछूँ ? राक्षस । ( आप ही आप ) क्या जीवसिद्धि भी चाणक्य का गुप्तचर है ! हाय ! शत्रु ने हमारे हृदय पर भी अधिकार कर लिया ?

५ मलयकेतु ।—( क्रोध से ) शिखरसेन सेनापति से कहो कि राक्षस से मिल कर चन्द्रगुप्त को प्रसन्न करने को पाच राजे जो हमारा बुरा चाहते हैं उन मे कौलूत चित्रवर्मा, मलयाधिपति सिंहनाद और काश्मीराधीश पुष्कराक्ष ये तीन हमारी भूमि की कामना रखते हैं, सो इन को भूमि ही में १० गाड दे, और सिन्धुराज सुषेण और पारसीकपति मेघनाद हमारी हाथी की सेना चाहते हैं सो इन को हाथी ही के पैर के नीचे पिसवा दो । * पुरुष ।—जो कुमार की आज्ञा । ( जाता है ) मलयकेतु ।—राक्षस ! हम मलयकेतु हैं, कुछ तुम से विश्वा १५ सघाती राक्षस नहीं हैं + इस से तुम जाकर अच्छी तरह चन्द्रगुप्त का आश्रय करो । चन्द्रगुप्त चाणक्य सों, मिलिए सुख सों आप । हम तीनहु को नासि हैं, जिमि त्रिवर्ग कह पाप x ॥ भागुरायण ।—कुमार ! व्यर्थ अब कालक्षेप मत कीजिए । २० कुसुमपुर घेरने को हमारी सेना चढ़ चुकी है । उड़िक तियगन गडजुगल कह मलिन बनावति । अलिकुल से कल अलकन निज कत ववल छुवावति ॥


* यही ब त ऐथानियन ले गो न तारा से कही थी । Wilson कहत ह कि चाणक्य की आज्ञा से ये राजे सब कैद कर लिय गए ने मारे नही गए थे ।
+ अर्थात् हम तुम्हारा प्राण नहीं मारत ।
x जैसे धर्म, अर्थ काम का पाप नाश कर दा ->

पंचम अङ्क । १२५

चपल तुरगखुर घात उठी घन घुमड़ि नवीनी ।
सबु सीस पैं धूरि परै गजमद सौं भीनी ॥
अपने भृत्यों के साथ मलयकेतु जाता है ।

राक्षस ।— ( घबड़ा कर ) हाय ! हाय ! चित्रवर्मादिक साधु सब व्यर्थ मारे गए । हाय ! राक्षस की सब चेष्टा शत्रु को ५
नही, मित्रों ही के नाश करने को होती है । अब हम मन्द-भाग्य क्या करें ?
जाहि तपोबन, पै न मन, शांत होत सह क्रोध ।
प्रान देहि ? रिपु कें जियत, यह नारिन को बोध ॥
खींचि खड्ग कर पतग सम, जाहि अनल अरि पास । १०
है या साहस होइ है, चन्दनदास बिनास ॥

( सोचता हुआ जाता है । )

पटाक्षेप । इति पंचम अङ्क ।

छठा अंक

स्थान—नगर के बाहर सडक ।

( कपडा, गहिना पहिने हुए सिद्धार्थक आता है । )

सिद्धार्थक ।—

जलद नील तन जयति जय, केशव केशी काल ।
जयति सुजन जन दृष्टि ससि, चन्द्रगुप्त नरपाल ॥
जयति आर्य्य चाणक्य की, नीति सहज बल भौन ।
बिनही साजे सैन नित, जीतत अरि कुल जौन ॥

चलो आज पुराने मित्र समिद्धार्थक से भेट करें (घूमकर) अरे ! मित्र समिद्धार्थक आपही इधर आता है ।

( समिद्धार्थक आता है )

समिद्धार्थक ।—

मिटत ताप नहि पान सों, होत उडाह बिनास ।
बिना मोत के सुख सबै, औरहु करत उदास ॥

सुना है कि मलयकेतु के कटक से मित्र सिद्धार्थक आ गया है । उसी को खोजने को हम भी निकले है कि मिलै तो बड़ा आनन्द हो । ( आगे बढ़ कर ) अहा ! सिद्धार्थक तो यही है । कहो मित्र ! अच्छे तो हो ?

**सिद्धार्थक ।—**अहा ! मित्र समिद्धार्थक आप ही आगए । ( बढ़ कर )—कहो मित्र ! क्षेम कुशल तो है ?

( दोनों गले से मिलते हैं )

**समिद्धार्थक ।—**भला ! यहा कुशल कहा कि तुम्हारे ऐसा मित्र बहुत दिन पीछे घर भी आया तो बिना मिले फिर चला गया ।

छठा अङ्क। १२७

सिद्धार्थक ।—मित्र ! क्षमा करो। मुझ को देखते ही आर्य्य चाणक्य ने आज्ञा दी कि इस प्रिय वृत्तान्त को अभी चन्द्रमा सदृश प्रकाशित शोभावाले परम प्रिय महाराज प्रियदर्शन से जा कर कहो। मै उसी समय महाराज के पास चला गया और उन से निवेदन कर के यह सब पुरस्कार ५ पाकर तुम से मिलने को तुम्हारे घर अभी जाता ही था। समिद्धार्थक ।—मित्र ! जो सुनने के योग्य हो तो महाराज प्रियदर्शन से जो प्रियवृत्तान्त कहा है वह हम भी सुनें। सिद्धार्थक ।—मित्र ! तुम से भी कोई बात छिपी है ! सुनो ! आर्य्य चाणक्य की नीति से मोहित मति हो कर उस १० नष्ट मलयकेतु ने राक्षस को दूर कर दिया और चित्र- वर्म्मादिक पांचो प्रबल राजो को मरवा डाला। यह देखते ही और सब राजे अपने प्राण और राज्य का संशय समझ कर उस को छोड़ कर सैना सहित अपने अपने देश चले गए। जब शत्रु ऐसी निर्बल अवस्था मे हुआ, १५ तो भद्रभट, पुरुषदत्त, हिगुरात, बलगुप्त, राजसेन, भागु- रायण, रोहिताक्ष, विजयवर्मा इत्यादि लोगों ने मलयकेतु को कैद कर लिया। समिद्धार्थक ।—मित्र ! लोग तो यह जानते हैं कि भद्रभट इत्यादि लोग महाराज चन्द्रश्री को छोड़ कर मलयकेतु २० से मिल गए, तो क्या कुकवियों के नाटक की भांति इस के मुख में और तथा निर्वहण मे और बात है * ? सिद्धार्थक ।—वयस्य ! सुनो, जैसे दैव की गति नहीं जानी जाती वैसे ही आर्य्य चाणक्य की जिस नीति की भी गति नहीं जानी जाती उस को नमस्कार है। २५ समिद्धार्थक ।—हा ! कहो, तब क्या हुआ ?


* अर्थात् नाटक की उत्तमता यही है कि जिस वर्णन, रीति और रस से आरम्भ हो वैसे ही समाप्त हो यह नहीं कि पहिले कछ, पीछे कुछ ।

१२८ मुद्राराक्षस—

सिद्धार्थक ।—तब इधर से सब सामग्री ले कर आर्य चाणक्य बाहर निकले और विपक्ष के शेष राजाओं को नि शेष कर के बहर लोगों की सब सामग्री लूट ली। समिद्धार्थक । तो वह सब अब कहा हैं ? ५ सिद्धार्थक ।—वह देखो स्रवत गडमद गरब गज, नदत मेघ अनुहार। चाबुक भय चिनवत चपल, खडे अस्व बहु द्वार ॥ समिद्धार्थक ।—अच्छा, यह सब जाने दो यह कहो कि सब लोगों के सामने इतना अनादर पाकर फिर भी आर्य्य १० चाणक्य उसी मन्त्री के काम का क्यों करते है ? सिद्धार्थक ।—मित्र ! तुम अब तक निरे सीधेसाधे बने हौ। अरे, अमात्य राक्षस भी आर्य चाणक्य की जिन चालों को नही समझ सकते उन को हम तुम क्या समझैगे ! समिद्धार्थक ।—वयस्य ! अमात्य राक्षस अब कहा है ? १५ सिद्धार्थक ।—उस प्रलय कोलाहल के बढ़ने के समय मलय- केतु की सेना से निकल कर उन्दुर नामक चर के साथ कुसुमपुर ही की ओर वह आते है, यह आर्य चाणक्य को समाचार मिला है । समिद्धार्थक ।—मित्र ! नन्दराज्य के फिर स्थापन की प्रतिज्ञा २० कर के स्वनाम तुल्य पराक्रम अमात्य राक्षस, उस काम को पूरा किए बिना फिर कैसे कुसुमपुर आते है ? सिद्धार्थक ।—हम सोचते है कि चन्दनदास के स्नेह से । समिद्धार्थक ।—ठीक है, चन्दनदास के स्नेह ही से । किन्तु तुम सोचते हो कि चन्दनदास के प्राण बचैगे ? २५ सिद्धार्थक ।—कहा उस दीन के प्राण बचैगे ? हमी दोनों को वधस्थान मै ले जाकर उस को मारना पडेगा ।

छठा अङ्क । १२६

समिद्धार्थक ।—( क्रोध से ) क्या आर्य चाणक्य के पास कोई घातक नहीं है कि ऐसा नीच काम हम लोग करैं ? सिद्धार्थक ।—मित्र ! ऐसा कौन है जिस को इस जीवलोक म रहना हो और वह आर्य चाणक्य की आज्ञा न मानै ? चलो, हमलोग चांडाल का वेष बना कर चन्दनदास को ५ वधस्थान मे लेचलैं ।

( दोनों जाते है )

इति प्रवेशक ।


६ अंक ।

दृश्य । बाहरी प्रान्त में प्राचीन बारी । १० ( फांसी हाथ मे लिए हुए एक पुरुष आता है ) पुरुष—षट गुन सुदृढ़ गुथी मुख फासी । २ जय उपाय परिपाटी गासा ॥ रिपु बन्धन मै पटु प्रति पोरी । जय चानक्य नीति की डोरी ॥ १५ आर्य चाणक्य के चर उन्दुर ने इसी स्थान में मुझ को अमात्य राक्षस से मिलने कहा है । ( देख कर ) यह अमात्य राक्षस सब अङ्ग छिपाए हुए आते हैं । तब तक इस पुरानी बारी मे छिप कर हम देखे, यह कहाँ ठहरते हैं । ( छिप कर बैठता है ) २०

(सब अंग छिपाए हुए राक्षस आता है)

राक्षस—[ आखों में आंसू भर के हाय ! बड़े कष्ट की बात है आश्रय बिनसे और पै, जिमि कुलटा तिय जाय । • तजि तिमि नन्डहि चंचला, चन्द्रहि लपटी धाय ॥

१३० मुद्राराक्षस—

देखादेखी प्रजहु सब, कीनो ता अनुगौन ।
तजि कै निज नृप नेह सब, कियो कुसुमपुर भौन ॥
होइ बिफल उद्योग मैं, तजि कै कारजभार ।
आप्त मित्र हू थकि रहे, सिर बिनु जिमि अहि छार ॥
५ तजि कै निज पति भुवनपति, सुकुल जात नृप नन्द ।
श्री वृषली गइ वृषल ढिग, सील त्यागि करि छन्द ॥
जाइ तहा थिर ह्वै रही, निज गुन सहज बिसारि ।
बस न चलत जब बाम बिधि, सब कछु देत बिगारि ॥
नन्द मरे सैलेश्वरहि, देन चह्यौ हम राज ।
सोऊ बिनसे तब कियो, तासुत हित सो साज ॥
बिगर्‌यौ तौन प्रबन्ध हू, मिठ्यौ मनोरथ मूल ।
दोस कहा चानक्य को, दैवहि भो प्रतिकूल ॥

वाहरे म्लेच्छ मलयकेतु की मूर्खता ! जिस ने इतना नही समझा कि—

१५
मरे स्वामिहू नहि तज्यौ, जिन निज नृप अनुराग ।
लोभ छाड़ि दै प्रान जिन, करी सत्रु सों लाग ॥
सोई राक्षस सत्रु सों, मिलि है यह अन्धेर ।
इतनो सूझ्यौ वाहि नहि, दई दैव मति फेर ॥

सो अब भी शत्रु के हाथ में पड़ के राक्षस बन मे चला जायगा, पर चन्द्रगुप्त से संधि न करैगा । लोग झूठा कहै, यह अपयश हो, पर शत्रु की बात कौन सहैगा ? (चारो ओर देख कर) हा ! इसी प्रान्त में देव नन्द रथ पर चढ़ कर फिरने आते थे ।

इतहि देव अभ्यास हित, सर सजि धनु सन्धानि ।
२५ रचत रहे भुव चित्र सम, रथ सुचक्र परिखानि ॥
जहँ नृपगन संकित रहे, इत उत थमे लखात ।
सोई भुव ऊजर भई, दृगन लखी नहि जात ॥

छठा अङ्क । १२१

हाय ! यह मन्द भाग्य अब कहा जाय ? ( चारो ओर देख कर ) चलो, इस पुरानी बारी मे कुछ देर ठहर कर मित्र चन्दनदास का कुछ समाचार ले । ( घूम कर आप ही आप ) अहा ! पुरुषों की भाग्य से उन्नति अवनति की भी क्या क्या गति होती है कोई नही जानता । ५

जिमि नव ससि कहँ सब लखत, निज निज करहि उठाय ।
तिमि नृप सब हम को रहे, लखत अनन्द बढ़ाय ॥
चाहत हे नृपगन सबै, जासु कृपा दृग कोर ।
सो हम इत संकित चलत, मानहुँ कोऊ चोर ॥

वा जिस के प्रसाद से यह सब था, जब वही नहीं है तो यह १० होईगा । (देख कर) यह पुराना उद्यान कैसा भयानक हो रहा है ।

नसे विपुल नृप कुल सरिस, बड़े बड़े गृह जाल ।
मित्र नास सों साधुजन, हिय सम सूखे ताल ॥
तरुवर भे फलहीन जिमि, बिधि बिगरे सब रीति ।
तृन सों लोपी भूमि जिमि, मति लहि मूढ़ कुनीति ॥ १५
तीछुन परसु प्रहार सों, कटे तरोवर गात ।
रोअत मिलि पिड्डुक खग, ताके घाव लखात * ॥
दुखी जानि निज मित्र कहँ, अहि मन लेत उसास ।
निज केंचुल मिस धरत है, फाहा तरु-ब्रन पास ॥
तरुगन को सूख्यो हियो, छिदै कीट सों गात । २०
दुखी पत्र फल छाह बिनु, मनु मसान सब जात ॥

तो तब तक हम इस सिला पर, जो भाग्यहीनों को सुलभ है, लेटैं । ( बैठ कर और कान देकर सुन कर ) अरे ! यह शंख डंके से मिला हुआ नान्दी शब्द कहा हो रहा है ?


* वृक्ष के खोढरे में से जो शब्द निकलता है वही मानो वृक्ष रोते हैं और उन वृक्षों पर पेंडुकी बोलती हैं वह मानो रोन में वृक्षो का साथ देती हैं ।

१३२ मुद्राराक्षस—

अति ही तीखन होन सों, फोरत स्रोता कान ।
जब न समायो घरन मैं, तब इत कियो पयान ॥
सख पटह धुनि सों मिल्यौ, भारी मङ्गल नाद ।
निकस्यौ मनहु दिगन्त को, दूरी देखन स्वाद ॥
५ [कुछ सोचकर] हा, जाना। यह मलयकेतु के पकड़े जाने पर राजकुल * (रुक कर) मौर्यकुल का आनन्द देने को हो रहा है।
(आंखों में आसू भर कर) हाय ! बड़े दुख की बात है।
मेरे बिनु अब जीति दल, शत्रु पाइ बल घोर ।
१० मोहि सुनावन हेत ही, कीन्हौँ शब्द कठोर ॥
पुरुष।—अब तो यह बैठे है तो अब आर्य चाणक्य की आज्ञा पूरी करैं। (राक्षस की ओर न देख कर अपने गले मे फासी लगाना चाहता है।)
राक्षस (देख कर आप ही आप) अरे यह फासी क्यों लगाता है? निश्चय कोई हमारा सा दुखिया है। जो हो,
१५ पूँछैं तो सही (प्रकाश) भद्र, यह क्या करते हौ?
पुरुष।—(रोकर) मित्रों के दुख से दुखो होकर हमारे ऐसे मन्दभाग्यों को जो कर्त्तव्य है।
राक्षस।—(आप ही आप) पहले ही कहा था, कोई हमारा
२० सा दुखिया है। (प्रकाश) भद्र+जो अतिगुप्त वा किसी विशेष कार्य का बात न हो तो हम से कहो कि तुम क्यों प्राण त्याग करने हो?
पुरुष।—आर्य ! न तो गुप्त ही हे न कोई बड़े काम की बात है, परन्तु मित्र के दुख से मै अब क्षण भर भी ठहर
२५ नही सकता।


* जहा ऐसी उक्ति हे,ता है वहा यह ध्वनि है कि मना " ६व रु जो कहा था वह ठीक है रुक कर आग्र से कुछ और कह दिया ।
+ यहा संस्कृत में व्यसनि ब्रह्मचारिन सम्बोधन है।

छठा अङ्क। १३३

राक्षस।—(आप ही आप दुःख से) मित्र की विपत्ति मे हम पराए लोगों की भांति उदासीन हो कर जो देर करते हैं मानो उस मे शीघ्रता करने की यह अपना दुःख करने के बहाने शिक्षा देता है। (प्रकाश) भद्र! जो रहस्य नही है तो हम सुना चाहते है कि तुम्हारे दुख का क्या ५ कारण है? पुरुष।—आप का इस मे बड़ा ही हठ है तो कहना पड़ा। इस नगर मे जिष्णुदास नामक एक महाजन है। राक्षस।—(आप ही आप) वह तो चन्दनदास का बड़ा मित्र है। १० पुरुष।—वह हमारा प्यारा मित्र है। राक्षस।—(आप ही आप) कहता है कि वह हमारा प्यारा मित्र है। इस अति निकट सम्बन्ध से इस को चन्दनदास का वृत्तान्त ज्ञात होगा। पुरुष।—(रोकर) "सो दीन जनों को सब धन देकर वह १५ अब अग्निप्रवेश करने जाता है" यह सुन कर हम यहा आये है कि "इस दुख वार्ता सुनने के पूर्व ही अपना प्राण दे दें।" राक्षस।—भद्र! तुम्हारे मित्र के अग्निप्रवेश का कारण क्या है? कै तेहि रोग असाध्य भयो कोऊ जाको न औषध २० नाहि निदान है। पुरुष।—नही आर्य्य। राक्षस।—कै विष अग्निहुसो बढ़ि कै नृपकोप महा फसि त्यागत प्रान है। पुरुष।—रामराम! चन्द्रगुप्त के राज्य मे लोगों को प्राणहिंसा २५ का भय कहा? राक्षस।—कै कोउ सुन्दरी पै जिय देत लग्यो हिय माहि विशेषा को बान है।