मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
१४ मुहूर्तचिन्तामणि सर्वार्थसिद्धियोगचक्र
| रवि | सोम | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनैश्चर |
|---|---|---|---|---|---|---|
| हस्त | श्रवण | अश्विनी | रोहिणी | रेवती | रेवती | श्रवण |
| मूल | रोहिणी | उ०भाद्रपद | अनुराधा | अनुराधा | अनुराधा | रोहिणी |
| उ० ३ | मृगशिरा | कृत्तिका | हस्त | अश्विनी | अश्विनी | स्वाती |
| पुष्य | पुष्य | आश्लेषा | कृत्तिका | पुनर्वसु | पुनर्वसु | |
| अश्विनी | अनुराधा | मृगशिरा | पुष्य | श्रवण | ||
| उत्पातादि योगचतुष्टय | ||||||
| द्वीशात्तोयाद्द्वासवात्पौष्णभाच्च ब्राह्मात्पुष्यादर्यमर्क्षाच्चतुर्भिः । | ||||||
| स्यादुत्पातो मृत्युकाणौ च सिद्धिर्वारैरेऽर्काद्यैतत्फलं नामतुल्यम् ॥ ३० ॥ | ||||||
| अन्वयः—अर्काद्ये वारे द्वीशात्, तोयात्, वासवात्, पौष्णभात्, ब्राह्मात्, पुष्यात्, | ||||||
| अर्यमर्क्षात्, चतुर्भिः उत्पातः स्यात् मृत्युकाणौ (भवेताम्) सिद्धिः स्यात्, तत्फलं | ||||||
| नामतुल्यं (ज्ञेयम्) ॥ ३० ॥ | ||||||
| रविवारादि सात दिनों में क्रम से विशाखा, पूर्वाषाढ़, धनिष्ठा, रेवती, | ||||||
| रोहिणी, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी इन नक्षत्रों से चार-चार नक्षत्र उत्पात, | ||||||
| मृत्यु, काण, सिद्धि ये चार योग होते हैं अर्थात् रविवार को विशाखा | ||||||
| उत्पात, अनुराधा मृत्यु, ज्येष्ठा काण, मूल सिद्धियोग; सोमवार को पूर्वा- | ||||||
| षाढ़ उत्पात, उत्तराषाढ़ मृत्यु, अभिजित् काण, श्रवण सिद्धियोग; मंगल | ||||||
| को धनिष्ठा उत्पात, शतभिष मृत्यु, पूर्वाभाद्रपद काण, उत्तराभाद्रपद सिद्धि- | ||||||
| योग; बुधवार को रेवती उत्पात, अश्विनी मृत्यु, भरणी काण, कृत्तिका | ||||||
| सिद्धियोग; बृहस्पति को रोहिणी उत्पात, मृगशिरा मृत्यु, आर्द्रा काण, | ||||||
| पुनर्वसु सिद्धियोग; शुक्रवार को पुष्य उत्पात, आश्लेषा मृत्यु, मघा काण, | ||||||
| पूर्वाफाल्गुनी सिद्धियोग; शनैश्चर को उत्तराफाल्गुनी उत्पात, हस्त मृत्यु, | ||||||
| चित्रा काण, स्वाती सिद्धियोग होता है । इन चारों योगों का फल भी इनके | ||||||
| नाम के सदृश ही होता है ॥ ३० ॥ | ||||||
| उत्पातादियोगचतुष्टयचक्र | ||||||
| योग | रवि | सोम | मंगल | बुधवार | बृहस्पति | शुक्र |
| :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
| उत्पात | विशाखा | पूर्वाषाढ़ | धनिष्ठा | रेवती | रोहिणी | पुष्य |
| मृत्यु | अनुराधा | उत्तराषाढ़ | शतभिष | अश्विनी | मृगशिरा | आश्लेषा |
| काण | ज्येष्ठा | अभिजित् | पूर्वाभा० | भरणी | आर्द्रा | मघा |
| सिद्धि | मूल | श्रवण | उ०भा० | कृत्तिका | पुनर्वसु | पूर्वाफा० |
शुभाशुभप्रकरण १५ निन्दित योगों का परिहार कुयोगास्तिथिवारोत्थास्तिथिभोत्था भवारजाः । हूणवङ्गखशेष्वेव वर्ज्यास्त्रितयजास्तथा ॥ ३१ ॥ अन्वयः—तिथिवारोत्थाः, तिथिभोत्थाः, भवारजाः, तथा त्रितयजाः, कुयोगाः हूणवंगखशेषु (देशेषु) एव वर्ज्याः ॥ ३१ ॥ तिथि-वार के योग से, तिथि-नक्षत्र के योग से, नक्षत्र-वार के योग से और तिथि-वार-नक्षत्र इन तीनों के योग से जितने कुयोग कहे हैं वे सब हूण देश, वंग देश और खश देश में ही वर्जनीय हैं, अन्य देशों में नहीं ॥ ३१ ॥ सम्पूर्ण कृत्यों में वर्जनीय वस्तुएँ सर्वस्मिन्विधुपापयुक्तनुलवावद्धं निशाह्नोर्घटी- त्र्यंशं वै कुनवांशकं ग्रहणतः पूर्वं दिनानां त्रयम् । उत्पातग्रहतोऽद्रचहांश्च शुभदोत्पातैश्च दुष्टं दिनं षण्मासं ग्रहभिन्नभं त्यज शुभे यौद्धं तथोत्पातभम् ॥ ३२ ॥ अन्वयः—विधुपापयुक्तनुलवौ, निशाह्नोः अर्धे [मध्ये] घटीत्र्यंशं, वै (निश्चयेन) कुनवांशकं, ग्रहणतः पूर्वं दिनानां त्रयं, उत्पातग्रहतः अद्रचहान्, शुभदोत्पातैः दुष्टं दिनं, सर्वस्मिन् शुभे त्यज । ग्रहभिन्नभं यौद्ध (भं), तथा उत्पातभं षण्मासं (यावत्) सर्वस्मिन् शुभे त्यज ॥ ३२ ॥ चन्द्रमा, सूर्य, मंगल, शनैश्चर, राहु और केतु से युक्त लग्न, और नवांश; आधी रात और मध्याह्न में बीस-बीस पल (दस पहिले और दस पीछे); पापग्रह का नवांश; सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण से पूर्व तीन दिन, भूकम्प आदि उत्पात और चन्द्र-सूर्य-ग्रहण के पश्चात् सात दिन तथा शुभद उत्पात का दिन, इन सब को शुभ कार्यों में त्याग दे । मंगलादि पाँच ग्रहों से भेद को प्राप्त हुआ नक्षत्र, जिस नक्षत्र में मंगलादि पापग्रहों का युद्ध हुआ हो वह नक्षत्र, जिस नक्षत्र में कोई उत्पात हुआ हो वह नक्षत्र, इन सबको सम्पूर्ण शुभ कार्यों में छः महीने तक त्याग करे। उत्पात और शुभदोत्पात—इन दोनों में यह भेद है कि जो वसन्तादि ऋतुओं में बिजली गिरना आदि वराहमिहिर ने कहा है वे तो शुभदोत्पात हैं और वही उक्त ऋतुओं को छोड़ अन्य ऋतुओं में होने से उत्पात कहे जाते हैं। ग्रह-युद्ध चार प्रकार का है—उल्लेख १ भेद २ अंशुविमर्द ३ अपसव्य ४ । मंगलादि ग्रहों का परस्पर स्पर्श उल्लेख कहा जाता है । जब एक ग्रह दूसरे ग्रह को ढक ले तब
१६ मुहूर्त्तचिन्तामणि भेद कहा जाता है। दो ग्रहों की किरणों का परस्पर मिलकर एक हो जाना अंशुविमर्द कहा जाता है और अंशुविमर्द नामक युद्ध में एक ग्रह के हीन होने पर अपसव्य कहा जाता है। ऐसा वराहमिहिराचार्य ने कहा है ॥ ३२ ॥ सूर्य और चन्द्रग्रहण के त्याज्य नक्षत्र और दिन नेष्टं ग्रहक्षं सकलार्द्धपादग्रासे क्रमात्तर्कगुणेन्दुमासान् । पूर्वं परस्तादुभयोस्त्रिघस्रा ग्रस्तेऽस्तगे वाप्युदितेऽर्द्धखण्डे ॥ ३३ ॥ अन्वयः—सकलार्धपादग्रासे क्रमात् तर्कगुणेन्दुमासान् ग्रहक्षं नेष्टम्। ग्रस्तेऽस्तगे पूर्वं त्रिघस्रा नेष्टाः। ग्रस्तेऽभ्युदिते परस्तात् (त्रिघस्रा नेष्टाः)। अर्धखण्डे (ग्रासे) उभयोः (पूर्वापरयोः) त्रिघस्राः (तित्रिघस्राः) नेष्टाः ॥ ३३ ॥ चन्द्रमा वा सूर्य के बिम्ब का सर्वग्रास हो तो छः महीने तक, अर्द्धग्रास हो तो तीन महीने तक, चतुर्थांश का ग्रास हो तो एक ही महीने वह नक्षत्र त्याज्य होता है जिस नक्षत्र में ग्रहण हुआ हो। अर्थात् उक्त दिनों तक उस नक्षत्र में कोई शुभ कार्य न करे। यदि ग्रहण लगते ही सूर्य या चन्द्र अस्त हो जाय तो पहले तीन दिन में और यदि ग्रसित सूर्य या चन्द्रमा उदय हो तो ग्रहण होने के अनन्तर तीन दिन में कोई शुभ कार्य न करना चाहिए। यदि अर्द्धग्रास हो तो तीन दिन पहले और तीन दिन पश्चात् और ग्रहण का दिन भी शुभ कर्मों में त्यागना चाहिए ॥ ३३ ॥ त्याज्य नक्षत्र और योग आदि जन्मर्क्षमासतिथयो व्यतिपातभद्रा- वैधृत्यमापितृदिनानि तिथिक्षयर्द्धी । न्यूनाधिमासकुलिकप्रहरार्धपाता विष्कम्भवज्रघटिकात्रयमेव वर्ज्यम् ॥ ३४ ॥ परिघार्धं पञ्च शूले षट् च गण्डातिगण्डयोः । व्याघाते नवनाड्यश्च वर्ज्याः सर्वेषु कर्मसु ॥ ३५ ॥ अन्वयः—जन्मर्क्षमासतिथयः (वर्ज्याः), व्यतिपातभद्रावैधृत्यमापितृदिनानि (वर्ज्यानि), तिथिक्षयर्द्धी (वर्ज्ये), न्यूनाधिमासकुलिकप्रहरार्धपाताः (वर्ज्याः), विष्कम्भवज्रघटिकात्रयं एव वर्ज्यम्। सर्वेषु कर्मसु परिघार्धं (वर्ज्यम्), शूले पञ्च, गण्डातिगण्डयोः षट्, व्याघाते नव नाड्यः वर्ज्याः ॥ ३४-३५ ॥
शुभाशुभप्रकरण १७ जन्मनक्षत्र, जन्ममास, जन्मतिथि, व्यतीपातयोग, भद्रा, वैधृतियोग, अमावास्या, माता-पिता के मरने की तिथि, क्षयतिथि, वृद्धितिथि, क्षयमास, अधिमास, कुलिक, अर्द्धयाम और महापात योग सम्पूर्ण शुभ कार्यों में त्याज्य हैं । विष्कुम्भ और वज्र के तीन तीन दण्ड परिघयोग का पूर्वार्द्ध, शूलयोग के प्रथम पाँच दण्ड, गण्ड और अतिगण्ड के छः छः दण्ड और व्याघात योग के नवदण्ड सम्पूर्ण शुभ कार्यों में वर्जनीय हैं ॥ ३४-३५ ॥ पक्षरन्ध्रतिथि और उनका परिहार वेदाङ्गाष्टनवार्केन्द्रपक्षरन्ध्रतिथौ त्यजेत् । वस्वङ्कमनुतत्त्वाशा शरा नाडोः पराः शुभाः ॥ ३६ ॥ अन्वयः—वेदाङ्गाष्टनवार्केन्द्रपक्षरन्ध्रतिथौ (क्रमेण) वस्वङ्कमनुतत्त्वाशाः शराः नाड़ीः त्यजेत्, पराः शुभाः (भवन्ति) ॥ ३६ ॥ चौथि, छठि, अष्टमी, नवमी, द्वादशी और चतुर्दशी इन तिथियों की पक्षरन्ध्र संज्ञा है। इनमें कोई शुभ कार्य न करे। किन्तु यदि कोई आवश्यक कार्य हो तो चौथि के आठ दण्ड, छठि के नव, अष्टमी के चौदह, नवमी के चौबिस, द्वादशी के दश और चतुर्दशी के पाँच दण्ड त्याग दे, शेष सब शुभ हैं ॥ ३६ ॥ कुलिक आदि दुष्ट मुहूर्त्त कुलिकः कालवेला च यमघण्टश्च कण्टकः । वाराद्द्विघ्ने क्रमान्मन्दे बुधे जीवे कुजे क्षणः ॥ ३७ ॥ अन्वयः—वारात् मन्दे बुधे, जीवे, द्विघ्ने (सति) क्रमात् कुलिकः, कालवेला यमघण्टः, कण्टकः, क्षणः, (मुहूर्तः स्यात्) ॥ ३७ ॥ जिस दिन कुलिकादि दोषों का विचार करना हो उस दिन से शनैश्चर, बुध, बृहस्पति और मंगल तक गिनने से जितनी संख्या हों उनको दो से गुणा करे। उसी संख्यावाला मुहूर्त्त क्रम से कुलिक, कालवेला, यमघण्ट और कण्टक दोष होता है। यथा रविवार को ये दोष विचारना है तो रविवार से शनैश्चर तक सात संख्या हुई। इसको दो से गुण दिया, चौदह हुए, यही चौदहवाँ मुहूर्त्त कुलिक दोष हुआ। रविवार से बुधवार तक गिना तो चार हुए, इसको दो से गुणा तो आठ हुए, यही आठवाँ मुहूर्त्त कालवेला हुआ। ऐसे ही बृहस्पति तक गिना तो पाँच हुए, इनको दो से गुणा तो दश हुए, यही दशवाँ मुहूर्त्त यमघण्ट हुआ। ऐसे ही मंगल तक
१८ मुहूर्त्तचिन्तामणि
गिनने से तीन संख्या हुई । इसको दो से गुणा तो छः हुए, यही छठा मुहूर्त्त कंटक दोष हुआ । ऐसे ही अन्य दिनों से उक्त दिनों तक गणना करने से कुलिकादि स्पष्ट होंगे । दिन के सोलहवें अंश को मुहूर्त्त कहते हैं । कुलिक मुहूर्त्त में शुभ कर्म करने से सर्वथा नाश, यमघण्ट में दरिद्रता, कालवेला में मृत्यु और कंटक में विघ्न होता है । परन्तु ये रात्रि में दूषित नहीं हैं । यदि अति आवश्यक कार्य हो तो इन दोषों का उत्तरार्द्ध त्यागना चाहिए ॥ ३७ ॥
कुलिक आदि दुष्टमुहूर्त्तचक्र
| रविवार | सोमवार | मंगल | बुधवार | बृहस्पति | शुक्रवार | शनैश्चर | वार | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मुहूर्त्त | १४ | १२ | १० | ८ | ६ | ४ | २ | कुलिक |
| मुहूर्त्त | ८ | ६ | ४ | २ | १४ | १२ | १० | कालवेला |
| मुहूर्त्त | १० | ८ | ६ | ४ | २ | १४ | १२ | यमघण्ट |
| मुहूर्त्त | ६ | ४ | २ | १४ | १२ | १० | ८ | कण्टक |
प्रकारान्तर से वर्जित मुहूर्त्त सूर्ये षट्स्वरनागदिङ्मनुमिताश्चन्द्रेऽब्धिषट्कुञ्जरां- कार्का विश्वपुरन्दराः क्षितिसुते द्व्यग्न्यब्धितर्का दिशः । सौम्ये द्व्यब्धिगजाङ्कदिङ्मनुमिता जीवे द्विषड्भास्कराः शक्राख्यास्तिथयः कलाश्च भृगुजे वेदेषु तर्कग्रहाः ॥ ३८ ॥ दिग्भास्करा मनुमिताश्च शनौ शशिद्वि- नागा दिशो भवदिवाकरसंमिताश्च । दुष्टः क्षणः कुलिककण्टककालवेला- स्युश्चार्धयामयमघण्टगताः कलांशाः ॥ ३९ ॥
**अन्वयः—**सूर्ये षट् स्वरनागदिङ्मनुमिताः, चन्द्रेऽब्धिषट्कुञ्जराङ्कार्का विश्व- पुरन्दराः, क्षितिसुते द्व्यग्न्यब्धितर्काः दिशः, सौम्ये द्व्यब्धिगजाङ्कदिङ्मनुमिताः, जीवे द्विषड्भास्कराः, शक्राख्याः, तिथयः कलाः च भृगुजे वेदेषुतर्कग्रहाः दिग्भास्कराः मनुमिताः च शनौ शशिद्विनागा दिशा भवदिवाकरसंमिता च कलांशाः (मुहूर्ताः) दुष्टः क्षणः स्यात् कुलिककण्टककालवेलाः स्युः । अर्धयामयमघण्टगताः स्युः ॥ ३८-३९ ॥
रविवार को छठा, सातवाँ, आठवाँ, दशवाँ, चौदहवाँ मुहूर्त्त; सोमवार को चौथा, छठा, आठवाँ, नवाँ, बारहवाँ, तेरहवाँ, चौदहवाँ मुहूर्त्त; मंगल को दूसरा, तीसरा, चौथा, छठा, दशवाँ मुहूर्त्त; बुधवार को दूसरा, चौथा,
शुभाशुभप्रकरण १९ आठवाँ, नवाँ, दशवाँ, चौदहवाँ मुहूर्त्त; बृहस्पति को दूसरा, छठा, बारहवाँ, चौदहवाँ, पन्द्रहवाँ, सोलहवाँ मुहूर्त्त; शुक्रवार को चौथा, पाँचवाँ, छठा, नवाँ, दशवाँ, बारहवाँ, चौदहवाँ मुहूर्त्त और शनैश्चर को पहिला, दूसरा, आठवाँ, दशवाँ, गेरहवाँ, बारहवाँ मुहूर्त्त निन्दित होता है । इन्हीं मुहूर्त्तों में कोई दुष्टक्षण, कोई कुलिक, कंटक, कालवेला, अर्द्धयाम और यमघण्ट होते हैं । दिनमान का सोलहवाँ भाग एक मुहूर्त्त है ॥ ३८-३९ ॥ वर्जित मुहूर्त्तों का चक्र | रविवार | ६ | ७ | ८ | १० | १४ | | | | सोमवार | ४ | ६ | ८ | ९ | १२ | १३ | १४ | | मंगल | २ | ३ | ४ | ६ | १० | | | | बुधवार | २ | ४ | ८ | ९ | १० | १४ | | | बृहस्पति | २ | ६ | १२ | १४ | १५ | १६ | | | शुक्रवार | ४ | ५ | ६ | ९ | १० | १२ | १४ | | शनैश्चर | १ | २ | ८ | १० | ११ | १२ | | देशभेद से होलाष्टक का निषेध विपाशैरावतीतीरे शतद्रूवाश्च त्रिपुष्करे । विवाहादिशुभे नेष्टं होलिकाप्राग्दिनाष्टकम् ॥ ४० ॥ अन्वयः—विपाशैरावतीतीरे, शतद्रूवाः (तीरे) त्रिपुष्करे (देशे) विवाहादिशुभे होलिकाप्राग्दिनाष्टकं नेष्टम् ॥ ४० ॥ विपाशा, इरावती और शतद्रु नदी के तट पर बसे हुए देशों में और त्रिपुष्कर देश में विवाह आदि शुभ कार्यों में होलिकादहन से पूर्व आठ दिन निषिद्ध हैं, अन्य देशों में नहीं ॥ ४० ॥ चन्द्रमा अनुकूल होने से दुष्ट योग भी शुभ होते हैं मृत्युक्रकचदग्धादीनिन्दौ शस्ते शुभाञ्जगुः । केचिद्यामोत्तरं चान्ये यात्रायामेव निन्दितान् ॥ ४१ ॥ अन्वयः—इन्दौ शस्ते मृत्युक्रकचदग्धादीन् (योगान्) शुभान् जगुः । केचित् यामोत्तरं (शुभान् जगुः) । अन्ये यात्रायामेव निन्दितान् जगुः ॥ ४१ ॥ कोई आचार्य चन्द्रमा के शुभ रहते मृत्यु योग, क्रकचयोग, दग्धयोग, विषाख्य और हुताशनाख्य योग को शुभ कहते हैं, और कोई कहते हैं कि एक पहर के बाद ये सब योग शुभ होते हैं । कोई तो कहते हैं कि ये यात्रा में ही निन्दित हैं ॥ ४१ ॥
२० मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्य परिहार अयोगे सुयोगोपि चेत्स्यात्तदानीमयोगं निहत्यैष सिद्धिं तनोति । परे लग्नशुद्धा कुयोगादिनाशं दिनार्द्धोत्तरं विष्टिपूवं च शस्तम् ॥ ४२ ॥ अन्वयः—चेत् अयोगे सुयोगोऽपि स्यात् तदानीं एष (सुयोगः) अयोगं निहत्य सिद्धिं तनोति, परे (आचाय ) लग्नशुद्धया कुयोगादिनाशं (वदन्ति), विष्टिपूवं दिनार्धोत्तरं शस्तं (कथयन्ति) ॥ ४२ ॥ यदि क्रकचादि कोई दुष्टयोग हो और उसी काल में कोई सिद्धादि शुभ योग भी हो तो वह शुभ योग उस क्रकचादि के फल को नष्ट करके कार्य की सिद्धि करता है। कोई आचार्य कहते हैं कि लग्न शुद्ध हो तो उसी से संपूर्ण कुयोगों का नाश होता है। भद्रा आदि मध्याह्न के अनन्तर शुभ होते हैं। भद्रा आदि का परिहार “विष्टिरंगारकश्चैवव्यतीपातश्चवैधृतिः । प्रत्यरं जन्मनक्षत्रं मध्याह्नात्परतः शुभम् ॥” भद्रा, मंगल दिन, व्यतीपात, वैधृति, प्रत्यरितारा, जन्मनक्षत्र ये सब मध्याह्न के अनन्तर शुभ होते हैं ॥ ४२ ॥ भद्राकाल शुक्ले पूर्वार्द्धेऽष्टमीपञ्चदश्योर्भद्रैकादश्यां चतुर्थ्यां परार्द्धे । कृष्णेऽन्त्यार्द्धं स्यात्ततीयादशम्योः पूर्वे भागे सप्तमीशम्भुतिथ्योः ॥ ४३ ॥ अन्वयः—शुक्ले अष्टमी पञ्चदश्योः पूर्वार्धे, (तथा) एकादश्यां चतुर्थ्यां परार्धे भद्रा (भवति) । कृष्णे तृतीयादशम्योः अन्त्यार्धे, सप्तमीशम्भुतिथ्योः पूर्वे भागे भद्रा (भवति) ॥ ४३ ॥ शुक्लपक्ष की अष्टमी और पूर्णमासी के पूर्वार्द्ध में तथा एकादशी और चौथि के उत्तरार्द्ध में भद्रा होती है। कृष्णपक्ष की तीज और दशमी के उत्तरार्द्ध में तथा सप्तमी और चतुर्दशी के पूर्वार्द्ध में भद्रा होती है ॥ ४३ ॥ भद्रा के मुख और पुच्छ का विचार पञ्चद्यद्रिकृताष्टरामरसभूयामादिघटचः शरा विष्टेरास्यमसद्गजेन्दुरसरामाद्रद्यशिवबाणाब्धिषु । यामेष्वन्त्यघटीत्रयं शुभकरं पुच्छं तथा वासरे विष्टिस्तिथ्यपरार्धजा शुभकरी रात्रौ च पूर्वार्धजा ॥ ४४ ॥
शुभाशुभप्रकरण २१ अन्वयः—पञ्चद्वद्यद्रिकृताष्टरामरसभूयामादिघट्यः शराः विष्टेः आस्यं (प्रोक्तं तत्) असत् । गजेन्दुरसरामाद्र्यश्विबाणाब्धिषु यामेषु अन्त्यघटीत्रयं विष्टेः पुच्छं (प्रोक्तं तत्) शुभकरं । तिथ्यपरार्धजा विष्टिः वासरे तथा पूर्वार्धजा विष्टिः रात्रौ शुभकरी (भवति) ॥ ४४ ॥ चौथि, अष्टमी, एकादशी, पूर्णमासी, तीज, सप्तमी, दशमी और चतुर्दशी, इन तिथियों में क्रम से पाँचवें, दूसरे, सातवें, चौथे, आठवें, तीसरे, छठे और पहिले, इन पहरों की पूर्व की पाँच घड़ी भद्रा का मुख है वह अशुभ होता है। और इन्हीं उक्त तिथियों में क्रम से आठवें, पहिले, छठे, तीसरे, सातवें, दूसरे, पाँचवें और चौथे, इन पहरों के अन्त की तीन घड़ी भद्रा की पुच्छ हैं वह शुभ फलदायक होती हैं। तिथि के उत्तरार्द्ध में होनेवाली भद्रा यदि दिन में हो और तिथि के पूर्वार्द्ध में होनेवाली भद्रा यदि रात्रि में हो तो शुभ होती है ॥ ४४ ॥ भद्रा का निवास और फल कुम्भकर्कद्वये मर्त्ये स्वर्गेऽब्जेऽजातत्रयेऽलिगे । स्त्रीधनूर्जूकनक्रेऽधो भद्रा तत्रैव तत्फलम् ॥ ४५ ॥ अन्वयः—कुम्भकर्कद्वये अब्जे [चन्द्रे] मर्त्ये [मृत्युलोके], [तथा] अजात् [मेषात्] त्रये अलिगे [अब्जे] स्वर्गे, (तथा) स्त्रीधनूर्जूकनक्रे [अब्जे] अधः [पाताले] भद्रा तिष्ठति । (यत्र तिष्ठति) तत्रैव तत्फलं (भवति) ॥ ४५ ॥ यदि चन्द्रमा कुम्भ, मीन, कर्क वा सिंह में हो तो भद्रा मृत्युलोक में, मेष, वृष, मिथुन वा वृश्चिक में हो तो स्वर्गलोक में और कन्या, तुला, धनु वा मकर में हो तो पाताललोक में भद्रा का निवास जानना। जिस लोक में भद्रा का निवास होता है उसी लोक में उसका शुभाशुभ फल भी होता है ॥ ४५ ॥ शुक्रास्त आदि में वर्जनीय क्रिया वाप्यारामतडागकूपभवनारम्भप्रतिष्ठे व्रता- रम्भोत्सर्गवधूप्रवेशनमहादानानि सोमाष्टके । गोदानाग्रयणप्रपाप्रथमकोपाकर्मवेदव्रतं नीलोद्वाहमथातिपन्नशिशुसंस्कारान्सुरस्थापनम् ॥ ४६ ॥ दीक्षामौञ्जिविवाहमुण्डनमपूर्वं देवतीर्थेक्षणं संन्यासाग्निपरिग्रहौ नृपतिसंदर्शाभिषेकौ गमम् । चातुर्मास्यसमावृती श्रवणयोर्वेधं परीक्षां त्यजेद् वृद्धत्वास्तशिशुत्वइज्यसितयोर्न्यूनाधिमासे तथा ॥ ४७ ॥
२२ मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—इज्यसितयोः वृद्धत्वास्तशिशुत्वे (तथा) न्यूनाधिमासे वाप्यारामतडाग- कूपभवनारम्भप्रतिष्ठे, व्रतारम्भोत्सर्गवधूप्रवेशनमहादानानि, सोमाष्टके गोदानाग्रयण- प्रपाप्रथमकोपाकर्म, वेदव्रतम्, नीलोद्वाहं, अथ अतिपन्नशिशुसंस्कारान्, सुरस्थापनम्, दीक्षामौञ्जिविवाहमुण्डनम्, अपूर्वं देवतीर्थेक्षणम्, संन्यासाग्निपरिग्रहौ नृपतिसंदर्शा- भिषेकौ, गमम्, चातुर्मास्यसमावृत्ती, श्रवणयोर्वेधं, परीक्षां त्यजेत् ॥ ४६-४७ ॥ बावली, बगीचा, तड़ाग, कूप और गृह के बनाने का प्रारम्भ और स्थापना (गृहप्रवेश) ; किसी व्रत का आरम्भ वा उद्यापन, वधूप्रवेश, तुलादान आदि महादान, सोमयज्ञ, अष्टकाश्राद्ध, केशान्तकर्म, नवान्न, पौशाला, प्रथम श्रावणीकर्म, वेदारम्भ, काम्य वृषोत्सर्ग पिछड़े हुए जातकर्म नामकर्म आदि संस्कार, देवताओं का स्थापन, मन्त्रग्रहण, यज्ञोपवीत, विवाह, मुण्डन, किसी देवता का प्रथम दर्शन, तीर्थयात्रा, संन्यास, अग्निहोत्रादि के लिए अग्नि का ग्रहण करना, राजा का प्रथम दर्शन, राजा का अभिषेक, यात्रा, चातुर्मास्य नामक योग समावर्तन कर्म, कर्णछेदन, इन सब कर्मों को बृहस्पति और शुक्र के वृद्ध, बाल वा अस्त रहते, मलमास और क्षयमास में न करना चाहिए ॥ ४६-४७ ॥ सिंह और मकर राशि में स्थित बृहस्पति का दोष अस्ते वर्ज्यं सिंहनक्रस्थजीवे वर्ज्यं केचिद्वक्रगे चातिचारे । गुर्वादित्ये विश्वघस्रेऽपि पक्षे प्रोचुस्तद्वद्दन्तरत्नादिभूषाम् ॥ ४८ ॥ अन्वयः—अस्ते वर्ज्यं (कर्म) सिंहनक्रस्थजीवेऽपि वर्ज्यम् । केचित् [आचार्याः] वक्रगे च (तथा) अतिचारे [जीवे] गुर्वादित्ये, विश्वघस्रे पक्षेऽपि (वर्ज्यं) तद्वत् दन्त- रत्नादिभूषां (च) (वर्ज्यं) प्रोचुः ॥ ४८ ॥ बृहस्पति वा शुक्र के अस्त में जिन शुभ कर्मों का निषेध किया है वे सब कर्म सिंह वा मकर राशियों में बृहस्पति के रहते भी वर्ज्य हैं । कोई आचार्य कहते हैं कि बृहस्पति के वक्री रहते वा अतिचार करते और गुर्वा- दित्य अर्थात् सूर्य और बृहस्पति के एकत्र रहते पूर्वोक्त (वाप्यारामेत्यादि) शुभ कर्म न करे । उसी तरह दाँत और रत्न से बने हुए आभूषणों को भी बृहस्पति वा शुक्र के अस्तादि काल में न धारण करे ॥ ४८ ॥ सिंहस्थ बृहस्पतिदोष का परिहार सिंहे गुरौ सिंहलवे विवाहो नेष्टोऽथ गोदोत्तरतश्च यावत् । भागीरथी याम्यतट च दोषो नान्यत्र देशे तपनेऽपि मेषे ॥ ४९ ॥
शुभाशुभप्रकरण २३
अन्वयः—सिंहे सिंहलवे गुरौ (सति) विवाहः नेष्टः, अथ गोदोत्तरतः भागीरथी याम्यतटं (यावत्) दोषः । अन्यत्र देशे न (दोषः) । मेषे तपने [सूर्ये] अपि (दोषः न) ॥ ४६ ॥ सिंहराशि में सिंह ही के नवांश में बृहस्पति स्थित हो तो विवाह इष्ट नहीं है, अर्थात् सिंह के नवांश को छोड़कर सिंह राशि के शेष अंशों में बृहस्पति के रहते विवाह करने का निषेध नहीं है । अथवा सिंह राशि में बृहस्पति के रहते गोदावरी नदी के उत्तर किनारे से लेकर गङ्गा के दक्षिण किनारे तक के देशों में विवाहादि शुभ कार्य करने में दोष है, अन्य देशों में नहीं । अथवा सिंह राशि में बृहस्पति के रहते भी मेष में सूर्य स्थित हो तो विवाहादि शुभकर्म करने में दोष नहीं है ॥ ४९ ॥ सिंहस्थ गुरुदोष और उसका परिहार मघादिपञ्चपादेषु गुरुः सर्वत्र निन्दितः । गङ्गागोदान्तरं हित्वा शेषाङ्घ्रिषु न दोषकृत् ॥ ५० ॥ मेषेऽर्के सन् व्रतोद्वाहौ गङ्गागोदान्तरेऽपि च । सर्वः सिंहगुरुर्वर्ज्यः कलिङ्गे गौडगुर्जरे ॥ ५१ ॥ अन्वयः—मघादिपञ्चपादेषु गुरुः सर्वत्र निन्दितः । शेषाङ्घ्रिषु गङ्गागोदान्तरं हित्वा दोषकृत् न (भवति) । मेषेऽर्के गंगागोदान्तरेऽपि सद्र्वतोद्वाहौ (भवेताम्) । कलिङ्गे गौडगुर्जरे (देशे) सर्वः सिंहगुरुः वर्ज्यः ॥ ५०-५१ ॥ मघा नक्षत्र के प्रथम चरण से लेकर पूर्वाफाल्गुनी के प्रथमचरणपर्यन्त पाँच चरणों में बृहस्पति सब देशों में निन्दित है । शेष चरणों में अर्थात् पूर्वाफाल्गुनी के दूसरे चरण से लेकर उत्तराफाल्गुनी के प्रथमचरणपर्यन्त चार चरणों में गङ्गा और गोदावरी के मध्य में बसे हुए देशों को छोड़कर अन्य देशों में दोषकारक नहीं है । यदि सूर्य मेष में हो और बृहस्पति सिंह राशि में हो तो गङ्गा और गोदावरी के मध्यवर्ती देशों में भी यज्ञोपवीत और विवाह शुभ हैं । परन्तु कलिङ्ग, गौड़, गुर्जर इन देशों में सम्पूर्ण सिंहस्थ बृहस्पति वर्जनीय है ॥ ५०-५१ ॥ मकर में स्थित बृहस्पति के परिहार रेवापूर्वे गण्डकीपश्चिमे च शोणस्योदग्दक्षिणे नीच इज्यः । वर्ज्यो नायं कौङ्कणे मागधे च गौडे सिन्धौ वर्जनीयः शुभेषु ॥ ५२ ॥
२४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—रेवापूर्वे, गण्डकीपश्चिमे, शोणस्य उदकदक्षिणे [तीरे] नीचः इज्यः न वर्ज्यः। कौंकणे, मागधे, गौडे च (तथा) सिन्धौ (देशे) अयं शुभेषु वर्जनीयः (स्यात्) ॥ ५२ ॥ नर्मदा नदी के पूर्व, गण्डकी नदी के पश्चिम और शोणनद के उत्तर तथा दक्षिण देशों में मकरराशिस्थित बृहस्पति विवाहादि शुभ कार्यों में वर्जनीय नहीं है, किन्तु कोङ्कण, मागध, गौड और सिन्धु देश में शुभ कार्यों में वर्जित है ॥ ५२ ॥ लुप्तसंवत्सर दोष और उसका परिहार गोजान्त्यकुम्भेतरभेऽतिचारगो नो पूर्वराशिं गुरुरेति वक्रितः । तदा विलुप्ताब्दइहातिनिन्दितः शुभेषु रेवासुरनिम्नगान्तरे ॥ ५३ ॥ अन्वयः—गोजान्त्यकुम्भेतरभे अतिचारगः गुरुः वक्रितः (पुनः) पूर्वराशिं नो एति तदा लुप्ताब्दः । (स) इह रेवासुरनिम्नगान्तरे शुभेषु अतिनिन्दितः (स्यात्) ॥ ५३ ॥ वृष, मेष, मीन और कुम्भ के अतिरिक्त अन्य किसी राशि में स्थित बृहस्पति उस राशि से अगली राशि में अतिचार करके गया हो और फिर वक्री होकर पूर्वराशि में जिस वर्ष में न आया हो वह लुप्तसंवत्सर कहा जाता है। वह विवाहादि शुभकार्य में अतिशय निन्दित है, परन्तु नर्मदा और गंगा के मध्य ही में निन्दित है ॥ ५३ ॥ होरासिद्धि के लिये वारप्रवृत्ति पादोनरेखापरपूर्वयोजनैः पलैर्युतोनास्तिथयो दिनार्धतः । ऊनाधिकास्तद्विवरोद्भवैः पलैरूर्ध्वं तथाऽधो दिनपप्रवेशनम् ॥ ५४ ॥ अन्वयः—पादोनरेखापरपूर्वयोजनैः पलैः युतोनाः तिथयः (पञ्चदश) यदि दिनार्धतः ऊनाधिका (तदा) तद्विवरोद्भवैः पलैः ऊर्ध्वं तथा अधः दिनपप्रवेशनम् (स्यात्) ॥ ५४ ॥ लङ्का से लेकर उज्जयिनी और कुरुक्षेत्रादि देश तथा सुमेरुपर्वतपर्यन्त भूमध्यरेखा कही जाती है । जिस देश में वारप्रवृत्ति जानना हो वह देश उक्त रेखा से पूर्व या पश्चिम जितने योजन पर हो, उन योजनों में उन्हीं का चतुर्थांश घटाकर जितने शेष रहें उन्हें पल मानकर, इष्ट देश यदि रेखा से पश्चिम हो तो पन्द्रह में जोड़े और पूर्व हो तो घटावे । यदि वे जुड़े या घटे हुए पन्द्रह इष्ट दिनमानार्ध के बराबर हों तो सूर्योदय काल ही में और यदि न्यून या अधिक हों तो दोनों का अन्तर करे । उस अन्तर के जितने पल हों, यदि न्यून हों तो उतने ही पल सूर्योदय से पर और अधिक हों तो
शुभाशुभप्रकरण २५ उतने ही पल सूर्योदय से पूर्व, वारप्रवृत्ति होती है। उदाहरण—कुरुक्षेत्र से लखनऊ ४८ योजन पूर्व है। इन योजनों का चतुर्थांश १२ इन्हीं ४८ में घटाया तो शेष ३६ पल हुए। उक्त योजन मध्यरेखा से पूर्व होने के कारण इन ३६ पलों को १५ दण्ड में घटाया तो १४ दण्ड २४ पल शेष रहे। ये दंड-पल इष्ट दिनमानार्द्ध १७।२ दण्डादि से न्यून होने के कारण, इन दोनों में जो अन्तर है अर्थात् २ दण्ड ३८ पल, सूर्योदय होने के पश्चात् लखनऊ में वारप्रवृत्ति जाननी चाहिए ॥ ५४ ॥ कालहोरा वारादेर्घटिका द्विघ्नाः स्वाक्षहृच्छेषवर्जिताः । सैकास्तष्टा नगैः कालहोरेशा दिनपात् क्रमात् ॥ ५५ ॥ अन्वयः—वारादेः घटिकाः द्विघ्नाः, स्वाक्षहृच्छेषवर्जिताः, सैकाः, नगै तष्टाः, दिन- पात् कमात् कालहोरेशाः (भवन्ति) ॥ ५५ ॥ वारप्रवृत्तिकाल से लेकर इष्टकालपर्यन्त जितने दण्डादि हों उनको दो से गुणा करके दो जगह रखे। एक स्थान में पाँच का भाग देकर जो शेष रहे उसे दूसरे स्थान में घटावे। जो शेष रहे उसमें एक और जोड़ दे तब सात का भाग देने से जो शेष रहे वह दिवस के स्वामी के क्रम से कालहोरेश होगा। उदाहरण—यदि रविवार को वारप्रवृत्ति से लेकर इष्टकाल पर्यन्त ६ दण्ड हों, २ से गुणा तो १२ हुए। इनको दो स्थानों में रखकर एक स्थान में ५ का भाग दिया, २ शेष रहे, उन्हें दूसरे स्थान में घटाया तो १० शेष रहे। एक जोड़ा तो ११ हुए। उनमें ७ का भाग दिया तो ४ शेष रहे। रविवार से गिना तो चौथा बुध हुआ यही उस काल में कालहोरेश हुआ ॥ ५५ ॥ कालहोरा का प्रयोजन वारे प्रोक्तं कालहोरासु तस्य धिष्ण्ये प्रोक्तं स्वामितिथ्यंशकेऽस्य । कुर्याद्दिक्शूलादि चिन्त्यं क्षणेषु नैवोल्लङ्घ्यः पारिघश्चापिदण्डः ॥ ५६ ॥ अन्वयः—वारे प्रोक्तं (कर्म) तस्य (वारस्य) कालहोरासु कुर्यात् । (तथा) धिष्ण्ये प्रोक्तं अस्य स्वामितिथ्यंशके (मुहूर्ते) कुर्यात् । क्षणेषु (मुहूर्तेषु) दिक्शूलादि (अवश्यं) चिन्त्यम् । पारिघः दण्डः अपि नैव उल्लंघ्यः ॥ ५६ ॥ जो कार्य जिस वार में विहित है वह आवश्यक हो तो उसके कालहोरा में करने को महर्षियों ने कहा है, और जो कार्य जिस नक्षत्र में विहित है वह
(Water) 21. Uttarashadha: विश्वे (Vishvedevah) 22. Abhijit: विधि (Vidhi/Brahma)
Now let's look at the words in L26: Word 1: शक्राग्नी (shakraagnii) Word 2: खलु (khalu) Word 3: मित्र (mitra) Word 4: शक्र (shakra) Word 5: निऋतिः or निरृतिः or निर्ऋतिः? In the print: न (na) with choti-i = नि, then ऋ with reph? or र्ऋ? Look at it: न िर ् ऋ त ी ः -> निर्ऋतीः or निरृतीः? Wait, it has न, with ि, then ऋ with reph above it: र्ऋ! So निर्ऋतीः. Wait, what about the next word? Is it "तोयानि"? Look at the characters: त् + ो = तो! य + ा = या! न + ि = नि! "तोयानि"! Wait, why did I think "क्षीराणि"? Ah, because the scan at first glance looked like that, but looking closely: त् with ो = तो य with ा = या न with ि = नि It is definitely "तोयानि"! Let's look at the meter: शक्राग्नी (---) खलुमि (vv
नक्षत्रप्रकरण २७ अन्वयः—नासत्यान्तकवह्निधातृशशभृद्रुद्रादितिज्योरगाः, पितरः, भगः, अर्यमरवी, त्वष्टा, समीरः, शक्राग्नी, मित्रः, शक्रः निर्ऋतिः, तोयानि, विश्वे, विधिः, गोविन्दः, वसुतोयपाजचरणाहिर्बुध्न्यपूषाभिधाः (एते) क्रमात् ऋक्षेशाः (ज्ञेयाः) ॥ १ ॥ अश्विनी नक्षत्र के स्वामी अश्विनीकुमार, भरणी के यमराज, कृत्तिका के अग्नि, रोहिणी के ब्रह्मा, मृगशिरा के चन्द्रमा, आर्द्रा के रुद्र, पुनर्वसु के अदिति, पुष्य के बृहस्पति, आश्लेषा के सर्प, मघा के पितर, पूर्वाफाल्गुनी के भग देवता अर्थात् सूर्यविशेष, उत्तराफाल्गुनी के अर्यमा अर्थात् सूर्य- विशेष, हस्त के सूर्य, चित्रा के विश्वकर्मा, स्वाती के वायु, विशाखा के इन्द्र और अग्नि, अनुराधा के मित्र अर्थात् सूर्यविशेष, ज्येष्ठा के इन्द्र, मूल के के राक्षस, पूर्वाषाढ़ के जल, उत्तराषाढ़ के विश्वेदेव, अभिजित् के ब्रह्मा, श्रवण के विष्णु, धनिष्ठा के वसु, शतभिष के वरुण, पूर्वाभाद्रपद के अजचरण अर्थात् रुद्रविशेष, उत्तराभाद्रपद के अहिर्बुध्न्य अर्थात् रुद्रविशेष, रेवती के पूषा अर्थात् सूर्यविशेष स्वामी हैं ॥ १ ॥ नक्षत्र-स्वामियों का चक्र
| अ० | अ०कु० | पुन० | अदिति | हस्त | सूर्य | मूल | राक्षस | श० | वरुण |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ० | यम | पुष्य | बृहस्प० | चित्रा | त्वष्टा | पू० | जल | पू० | अजच० |
| कृ० | अग्नि | अश्ले० | सर्प | स्वा० | वायु | उ० | विश्वे० | उ० | अ० बु० |
| रो० | ब्रह्मा | मघा | पितर. | वि० | इन्द्र अ० | अ० | विधि | रे० | पूषा |
| मृ० | चन्द्रमा | पू० | भग | अनु० | मित्र | श्र० | विष्णु | × | × |
| आ० | रुद्र | उ० | अर्यमा | ज्ये० | इन्द्र | ध० | वसु | × | × |
नक्षत्रों की संज्ञा उत्तरात्रयरोहिण्यो भास्करश्च ध्रु
२८ मुहूर्त्तचिन्तामणि स्वात्यादित्ये श्रुतेस्त्रीणि चन्द्रश्चापि चरं चलम् । तस्मिन् गजादिकारोहो वाटिकागमनादिकम् ॥ ३ ॥ अन्वयः—स्वात्यादित्ये श्रुतेः त्रीणि (तथा) चन्द्रः चरं, चलं च (संज्ञं ज्ञेयम्) तस्मिन् गजादिकारोहो वाटिका-गमनादिकम् (शुभं भवति) ॥ ३ ॥ स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष ये पाँच नक्षत्र और सोमवार इनकी चर और चल संज्ञा है। इनमें हाथी, घोड़े आदि पर चढ़ना, बगीचा लगाना, यात्रा करना, और आदि शब्द से लघुसंज्ञक नक्षत्रों का भी कार्य करना शुभ है ॥ ३ ॥ पूर्वात्रयं याम्यमघे उग्रं क्रूरं कुजस्तथा। तस्मिन् घाताग्निशाठ्यानि विषशस्त्रादि सिद्ध्यति ॥ ४ ॥ अन्वयः—पूर्वात्रयं याम्यमघे तथा कुजः, उग्रं क्रूरं (च ज्ञेयम्) तस्मिन् घाताग्निशाठ यानि, विषशस्त्रादि सिद्ध्यति ॥ ४ ॥ पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, भरणी, मघा, ये पाँच नक्षत्र और मंगल दिन, इनकी क्रूर और उग्र संज्ञा है । इनमें मारण, अग्नि का कार्य, शठता का कार्य, विष का कार्य, हथियार का कार्य और आदि शब्द से दारुणसंज्ञक नक्षत्रों का कार्य, ये सब सिद्ध होते हैं ॥ ४ ॥ विशाखाग्नेयभे सौम्यो मिश्रं साधारणं स्मृतम् । तत्राग्निकार्यं मिश्रं च वृषोत्सर्गादि सिद्ध्यति ॥ ५ ॥ अन्वयः—विशाखाग्नेयभे, (तथा) सौम्यः [बुधः], मिश्रं (तथा) साधारणं स्मृतम्। तत्र अग्निकार्यं, मिश्रं च वृषोत्सर्गादि सिद्ध्यति ॥ ५ ॥ विशाखा, कृत्तिका, ये दो नक्षत्र और बुध दिन, इनकी मिश्र और साधारण संज्ञा है । इनमें अग्निहोत्र, साधारण कार्य, वृषोत्सर्ग और आदि शब्द से उग्र भी कार्य, ये सब सिद्ध होते हैं ॥ ५ ॥ हस्ताश्विपुष्याभिजितः क्षिप्रं लघुगुरुस्तथा । तस्मिन्पण्यरतिज्ञानभूषाशिल्पकलादिकम् ॥ ६ ॥ अन्वयः—हस्ताश्विपुष्याभिजितः तथा गुरुः, क्षिप्रं लघु (च संज्ञं ज्ञेयम्) तस्मिन् पण्यरतिज्ञानभूषाशिल्पकलादिक (शुभं भवति) ॥ ६ ॥ हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्, ये चार नक्षत्र और बृहस्पति दिन, इनकी क्षिप्र और लघु संज्ञा है। इनमें बाजार का कार्य, स्त्री-सम्भोग, शास्त्रादि का ज्ञान, आभूषणों का बनवाना और पहिनना, चित्रकारी, गाना-
नक्षत्रप्रकरण २९ बजाना इत्यादि कला और आदि पद से चरसंज्ञक नक्षत्रों का भी कार्य, वे सब सिद्ध होते हैं ॥ ६ ॥ मृगान्त्यचित्रामित्रर्क्षं मृदु मैत्रं भृगुस्तथा । तत्र गीताम्बरक्रीडामित्रकार्यं विभूषणम् ॥ ७ ॥ अन्वयः—मृगान्त्यचित्रामित्रक्षं तथा भृगुः, मृदु मैत्रं (च संज्ञं ज्ञेयम्) तत्र गीताम्बर- क्रीडामित्रकार्यं विभूषणं (सिद्धयति) ॥ ७ ॥ मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, ये चार नक्षत्र और शुक्रवार इनकी मृदु और मैत्र संज्ञा है । इनमें गाना, वस्त्र पहिनना स्त्री के साथ क्रीड़ा, मित्र का कार्य, आभूषण पहिनना इत्यादि कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ७ ॥ मूलेन्द्रार्द्राहिभं सौरिस्तीक्ष्णं दारुणसंज्ञकम् । तत्राभिचारघातोग्रभेदाः पशुदमादिकम् ॥ ८ ॥ अन्वयः—मूलेन्द्रार्द्राहिभं तथा सौरिः, तीक्ष्णं, दारुणसंज्ञकं (च ज्ञेयम्) । तत्र अभिचारघातोग्रभेदाः पशुदमादिकं (सिद्धयति) ॥ ८ ॥ मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, ये चार नक्षत्र और शनैश्चर दिन, इनकी तीक्ष्ण और दारुण संज्ञा है । इनमें अभिचार, मारण आदि भयानक कर्म, भेद और हाथी-घोड़े आदि का सिखाना, ये कार्य-सिद्ध होते हैं ॥ ८ ॥ नक्षत्रों की अधोमुखादि संज्ञा मूलाहिमिश्रोग्रमधोमुखं भवेद्धूर्ध्वास्यमार्द्वेज्यहरित्रयं ध्रुवम् । तिर्यङ्मुखं मैत्रकरानिलादितिज्येष्ठाशिवभानीदृशकृत्यमेषु सत् ॥ ९ ॥ अन्वयः—मूलाहिमिश्रोग्रं अधोमुखं, आर्द्वेज्यहरित्रयं ध्रुवं ऊर्ध्वास्यं, मैत्रकरानि- लादितिज्येष्ठाशिवभानि तिर्यङ्मुखं भवेत्, एषु ईदृशकृत्यं सत् ॥ ६ ॥ मूल, आश्लेषा, मिश्रसंज्ञक और उग्रसंज्ञक की अधोमुख संज्ञा है । आर्द्रा, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, और ध्रुवसंज्ञक नक्षत्रों की ऊर्ध्वमुख संज्ञा है । मृदुसंज्ञक नक्षत्र, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, ज्येष्ठा और अश्विनी की तिर्यङ् - मुख संज्ञा है । इन्हीं संज्ञाओं के सदृश कार्य इनमें शुभ होते हैं, अर्थात् अधोमुख संज्ञक नक्षत्रों में कुँआ, बावली तालाब खुदवाना इत्यादि, ऊर्ध्व- मुख नक्षत्रों में राज्याभिषेक, पट्टबन्ध, दुमहला, तिमहला आदि मकान बनवाना और तिर्यङ्मुख नक्षत्रों में हाथी, घोड़े, बैल आदि के कृत्य और यात्रा इत्यादि शुभ हैं ॥ ९ ॥
३० मुहूर्त्तचिन्तामणि नवीन वस्त्र-आभूषण और चूड़ी आदि धारण करने का मुहूर्त पौष्णध्रुवाश्विकरपञ्चकवासवेज्यादित्ये प्रवालरदशंखसुवर्णवस्त्रम्। धार्यं विरिक्तशनिचन्द्रकुजेऽह्निरक्तं भौमे ध्रुवादितियुगे सुभगा न दध्यात् ॥१०॥ अन्वयः—पौष्णध्रुवाश्विकरपञ्चकवासवेज्यादित्ये, विरिक्तशनिचन्द्रकुजेऽह्नि, प्रवाल- रदशंखसुवर्णवस्त्रं धार्यम्। भौमे रक्तं (वस्त्रं धार्यम्) ध्रुवादितियुगे सुभगा न दध्यात् ॥१०॥ रेवती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, धनिष्ठा, पुष्य, पुनर्वसु इन नक्षत्रों में और रिक्ता को छोड़ अन्य तिथियों में सोमवार, मंगल, शनैश्चर को छोड़ अन्य दिनों में मूँगा, दाँत, शंख और सुवर्ण के आभूषण तथा वस्त्र धारण करना चाहिए। मंगल के दिन लालवस्त्र धारण करना चाहिए। तीनों उत्तरा, रोहिणी, पुनर्वसु और पुष्य में सधवा स्त्री नवीन वस्त्र इत्यादि न धारण करे। (कोई आचार्य कहते हैं कि शतभिषा नक्षत्र में भी सधवा स्त्री नवीन वस्त्र-आभूषण इत्यादि का धारण और स्नान न करे। यदि ऐसा कार्य भूल से हो तो अपने पति की पूजा करे तो दोष शान्त होता है) ॥१०॥ नवीन वस्त्र के जलने आदि का शुभाशुभ फल वस्त्राणां नवभागकेषु च चतुष्कोणेऽमरा राक्षसा मध्यत्र्यंशगता नरास्तु सदशे पाशे च मध्यांशयोः। दग्धे वा स्फुटितेऽम्बरे नवतरे पङ्कादिलिप्ते न स- द्रक्षोंशे नृसुरांशयोः शुभमसत्सर्वांशके प्रान्ततः ॥११॥ अन्वयः—वस्त्राणां नवभागकेषु चतुष्कोणे अमरा, मध्यत्र्यंशगताः राक्षसाः तु [पुनः] मध्यांशयोः.. सदशे पाशे नराः (तत्र) रक्षोंऽशे नवतरे अम्बरे दग्धे स्फुटिते पङ्कादिलिप्ते वा न सत्, नृसुरांशयोः शुभं, प्रान्ततः सर्वांशके असत् ॥११॥ यदि कदाचित् पहिनने के दिन नवीन वस्त्र कहीं जल जाय, अथवा फट जाय, अथवा गोबर या कीचड़ लग जाय तो उस वस्त्र में नव भागों की कल्पना करके चारों कोणों के भागों में देवताओं की, मध्य के तीन भागों में राक्षसों की और दोनों छोरों के दोनों मध्य भागों में नरों की कल्पना करे। यदि राक्षसभागों में दाहादि हो तो वस्त्र शुभ नहीं होता अर्थात् मरणकारक होता है, और यदि देव-मनुष्यभागों में दाहादि हो तो शुभ होता है, भोग और
नक्षत्रप्रकरण ३१ पुत्र प्राप्तिकारक होता है । यदि राक्षस, देवता, मनुष्य, इन तीनों के भागों में दाहादि हो तो वह वस्त्र शुभकारक नहीं होता । ऐसा ही विचार, शय्या, आसन, खड़ाऊँ इत्यादि में भी करना चाहिए ॥ ११ ॥ वस्त्रनवधाचक्र | देवता शुभ | राक्षस अशुभ | देवता शुभ | | मनुष्य शुभ | राक्षस अशुभ | मनुष्य शुभ | | देवता शुभ | राक्षस अशुभ | देवता शुभ | निन्द्यकाल में भी वस्त्रधारण विप्राज्ञया तथोद्वाहे राज्ञा प्रीत्यार्पितं च यत् । निन्द्येऽपि धिष्ण्ये वारादौ धार्यं वस्त्रं जगुर्बुधाः ॥ १२ ॥ अन्वयः—विप्राज्ञया, तथा उद्वाहे, राज्ञा प्रीत्यार्पित च यत् वस्त्र (तत्) धिष्ण्ये वारादौ निन्द्येऽपि धार्यं (इति) बुधाः जगुः ॥ १२ ॥ ब्राह्मण की आज्ञा से, विवाह में और प्रीतिपूर्वक राजा के दिये हुए वस्त्र को निंद्य भी नक्षत्र और वारादि में धारण करना चाहिए, यह पण्डित लोग कहते हैं ॥ १२ ॥ राजदर्शन, मद्यारम्भ और गो-क्रय-विक्रय का मुहूर्त्त राधामूलमृदुध्रुवर्क्षवरुणक्षिप्रैर्लतापादपा- रोपोऽथो नृपदर्शनं ध्रुवमृदुक्षिप्रश्रवोवासवैः । तीक्ष्णोग्राम्बुपभेषु मद्यमुदितं क्षिप्रान्त्यवह्नीन्द्रभा- दित्येन्द्राम्बुपवासवेषु हि गवां शस्तः क्रयो विक्रयः ॥ १३ ॥ अन्वयः—राधामूलमृदुध्रुवर्क्षवरुणक्षिप्रैः लतापादपारोपः, अथ ध्रुवमृदुक्षिप्रश्रवो- वासवैः नृपदर्शनं, तीक्ष्णोग्राम्बुपभेषु मद्यं उदितम्, क्षिप्रान्त्यवह्नीन्दुभादित्येन्द्राम्बुपवासवेषु गवां क्रयो विक्रयः शस्तो हि ॥ १३ ॥ विशाखा, मूल, मृदुसंज्ञक अर्थात् चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, ध्रुवसंज्ञक अर्थात् तीनों उत्तरा, रोहिणी, शतभिषा और क्षिप्रसंज्ञक अर्थात् अश्विनी, पुष्य, हस्त इन चौदह नक्षत्रों में लता और वृक्ष लगाना चाहिए । ध्रुवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक, श्रवण, धनिष्ठा इन तेरह नक्षत्रों में राजा का
३२ मुहूर्त्तचिन्तामणि दर्शन करना चाहिए। मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, मघा, भरणी, शतभिषा, इन नक्षत्रों में मद्यारम्भ शुभ कहा गया है। अश्विनी, पुष्य, हस्त, रेवती, विशाखा, पुनर्वसु, ज्येष्ठा, शतभिषा, धनिष्ठा इन नक्षत्रों में गो-बैल आदि का मोल लेना और बेचना शुभ है ॥ १३ ॥ पशुओं के पालने का मुहूर्त्त लग्ने शुभे चाष्टमशुद्धिसंयुते रक्षा पशूनां निजयोनिभे चरे । रिक्ताष्टमीदर्शकुजश्ववोध्रुवत्वाष्ट्रेषु यानं स्थितिवेशनं न सत् ॥ १४ ॥ अन्वयः—अष्टमशुद्धिसंयुते शुभे लग्ने, च (तथा) निजयोनिभे, चरे, पशूनां रक्षा सत्। रिक्ताष्टमीदर्शकुजश्ववोध्रुवत्वाष्ट्रेषु पशूनां यानं, स्थितिवेशनं न सत् ॥ १४ ॥ शुभ लग्न हो, लग्न से आठवें स्थान में कोई ग्रह न हो और अपनी योनि का नक्षत्र हो (योनि नक्षत्र विवाह प्रकरण श्लो० २५ में कहे गये हैं) तब पशुओं को पालना चाहिए अथवा चर अर्थात् स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, इन नक्षत्रों में पशुओं को पालना चाहिए। चौथि, नवमी, चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस, मंगल दिन, श्रवण, तीनों उत्तरा, रोहिणी और चित्रा नक्षत्र में पशुओं को घर से बाहर ले जाना, गोष्ठ में बाँधना और बाहर से घर में लाना शुभ नहीं है ॥ १४ ॥ औषध और सूचीकर्म का मुहूर्त्त भैषज्यं सल्लघुमृदुचरे मूलभे द्व्यङ्ग्लग्ने शुक्रेन्दिज्ये विदि च दिवसे चापि तेषां रवेश्च । शुद्धे रिष्फद्युनमृतिगृहे सत्तिथौ नो जने र्भेसूचीकर्माप्यदितिवसुभत्वाष्ट्रमित्राश्विधिष्ण्ये ॥ १५ ॥ अन्वयः—लघुमृदुचरे मूलभे शुक्रेन्दिज्ये विदि च द्व्यङ्गलग्ने, तेषां रवेश्चापि दिवसे, रिष्फद्युनमृतिगृहे शुद्धे, सत्तिथौ, भैषज्यं सत्, जनेर्भे नो । अदितिवसुभत्वाष्ट्रमित्राश्वि- धिष्ण्ये सूचीकर्मापि सत् ॥ १५ ॥ अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, मृगशिरा, अनुराधा, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, स्वाती, पुनर्वसु, मूल इन नक्षत्रों में; द्विस्वभाव लग्न में; शुक्र, चन्द्रमा, बृहस्पति और बुध लग्न में हों; शुक्र, चन्द्रमा, बृहस्पति, बुध, वा रविवार हो, लग्न से बारहवें, सातवें, आठवें स्थान में कोई ग्रह न हो; रिक्ता और अमावस को छोड़ अन्य शुभ तिथियाँ हों तो औषध का सेवन करना शुभ
नक्षत्रप्रकरण ३३ है । परन्तु जन्मनक्षत्र न हो । पुनर्वसु, धनिष्ठा, चित्रा, अनुराधा, अश्विनी इन नक्षत्रों में सिलाई के काम शुभ हैं ॥ १५ ॥ क्रय-विक्रय मुहूर्तों का परस्पर निषेध और क्रयमुहूर्त्त क्रयर्क्षे विक्रयो नेष्टो विक्रयर्क्षे क्रयोऽपि न । पौष्णाम्बुपाश्विनीवातश्रवश्चित्राः क्रये शुभाः ॥ १६ ॥ अन्वयः—क्रयर्क्षे विक्रयो नेष्टः, विक्रयर्क्षे क्रयः अपि न, पौष्णाम्बुपाश्विनीजात- श्रवश्चित्राः क्रये शुभाः ॥ १६ ॥ मोल लेने के मुहूर्त्त में बेचना शुभ नहीं है और बेचने के मुहूर्त्त में मोल लेना शुभ नहीं है । यद्यपि मोल लेनेवाला बेचनेवाले के मुहूर्त्त में मोल नहीं लेगा तो बेचनेवाला किस के हाथ बेचेगा, और बेचनेवाला मोल लेनेवाले के मुहूर्त्त में बेचेगा नहीं तो मोल लेनेवाला क्या मोल लेगा । इस रीति से दोनों कार्य नहीं हो सकते तथापि आवश्यकता के कारण किसी एक के मुहूर्त्त का विचार न करने से दूसरे का कार्य हो सकता है, यही इसका तात्पर्य है । रेवती, शतभिष, अश्विनी, स्वाती, श्रवण, चित्रा ये नक्षत्र मोल लेने में शुभ होते हैं ॥ १६ ॥ विक्रय और विपणि का मुहूर्त्त पूर्वाद्वीशकृशानुसार्पयमभे केन्द्रद्विकोणे शुभैः षट्त्र्यायेष्वशुभैर्विना घटतनुं सन्विक्रयः सत्तिथौ । रिक्ताभौमघटान्विना च विपणिर्मित्रध्रुवक्षिप्रभै- र्लग्ने चन्द्रसिते व्ययाष्टरहितैः पापैः शुभैर्द्वचायखे ॥ १७ ॥ अन्वयः—पूर्वाद्वीशकृशानुसार्पयमभे शुभैः केन्द्रत्रिकोणे, अशुभैः षट्त्र्यायेषु (स्थितैः) घटतनुं विना, सत्त्थिौ विक्रयः सत्, रिक्ताभौमघटान् विना, च मित्रध्रुव- क्षिप्रभैः चन्द्रसिते लग्ने, पापैः व्ययाष्टरहितैः, शुभैः द्वचायखे, विपणिः सत् ॥ १७ ॥ तीनों पूर्वा, विशाखा, कृत्तिका, आश्लेषा और भरणी नक्षत्र में लग्न से पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, दूसरे, पाँचवें और नवें स्थान में शुभग्रह हों, छठें, तीसरे, गेरहवें स्थान में अशुभ ग्रह हों ऐसे लग्न में, कुंभ को छोड़ अन्य लग्नों में और शुभ तिथियों में किसी वस्तु का बेचना शुभ होता है । चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, इन नक्षत्रों में, चौथि, नवमी, चतुर्दशी, मङ्गल दिन, कुम्भ लग्न को छोड़ अन्य