मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
संक्रान्तिप्रकरण ६३ सूर्यादि के बली रहते कार्य और संक्रान्ति करते हुए ग्रहों का बल नृपेक्षणं सर्वकृतिश्च संगरः शास्त्रं विवाहो गमदीक्षणे रवेः । वीर्येऽथ ताराबलतः शुभोविधुर्विधोर्बलेऽर्कोऽर्कंबले कुजादयः ॥ १९ ॥ अन्वयः—रवेः (सकाशात्) वीर्ये (क्रमेण) नृपेक्षणं, सर्वकृतिः, संगरः, शास्त्रं, विवाहः, गमदीक्षणे (शुभे भवतः), ताराबलतः (विधुः) (शुभः), विधोः बलात् रविः (शुभः), तद्बलतः कुजादयः शुभाः (भवन्ति) ॥ १९ ॥ सूर्य के बली रहते अथवा रविवार को राजा का दर्शन, चन्द्रमा के बली रहते अथवा सोमवार को सब कार्य, मङ्गल के बली रहते अथवा मङ्गल के दिन युद्ध, बुध के बली रहते अथवा बुधवार को शास्त्र पढ़ना, बृहस्पति के बली रहते अथवा बृहस्पति के दिन विवाह करना, शुक्र के बली रहते अथवा शुक्र के दिन यात्रा करना और शनैश्चर के बली रहते अथवा शनैश्चर के दिन यज्ञादि की दीक्षा लेना चाहिए । यदि चन्द्रमा की संक्रान्ति के काल में तारा बली हो तो अशुभ भी चन्द्रमा सवा दो दिन तक शुभदायक होता है । सूर्य की संक्रान्ति के समय यदि चन्द्रमा बली हो तो अशुभ भी सूर्य एक महीने तक शुभ होता है । मंगल की संक्रान्ति के काल में यदि सूर्य बली हो तो अशुभ भी मंगल डेढ़ महीने तक शुभ होता है । ऐसे ही बुधादि को भी जानना चाहिए ॥ १९ ॥ अधिकमास और क्षयमास का निर्णय स्पष्टार्कसंक्रान्तिविहीन उक्तो मासोऽधिमासः क्षयमासकस्तु । द्विसंक्रमस्तत्र विभागयोः स्तस्तिथेर्हि मासौ प्रथमान्त्यसंज्ञौ ॥ २० ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ संक्रान्तिप्रकरणं समाप्तम् ॥ ३ ॥ अन्वयः—स्पष्टार्कसंक्रान्तिविहीनः मासः अधिमासः उक्तः, तु (तथा) द्विसंक्रमः मासः क्षयमासकः (स्यात्) तत्र तिथेः विभागयोः प्रथमान्त्यसंज्ञौ मासौ स्तः ॥ २० ॥ शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर अमावास्या पर्यन्त चान्द्रमास होता है । जिस चान्द्रमास में स्पष्ट सूर्यसंक्रान्ति न हो वह मास अधिमास अर्थात् मलमास कहा जाता है और जिस मास में स्पष्ट सूर्य की दो संक्रान्तियाँ हों वह क्षयमास कहा जाता है । क्षयमास में तिथि के पूर्वार्द्ध उत्तरार्द्ध भागों के सम्बन्ध से पहिला और दूसरा मास जानना चाहिए अर्थात् उस एक ही
६४ मुहूर्तचिन्तामणि क्षयमास में दो मास माने जाते हैं। शुक्लपक्ष को पहिला और कृष्णपक्ष को दूसरा मास। यदि तिथि के पूर्वार्द्ध में किसी का जन्म अथवा मरण हुआ हो तो उसका जन्मदिन अथवा क्षयाह श्राद्ध पहिले मास में और यदि तिथि के उत्तरार्द्ध में किसी का जन्म अथवा मरण हुआ हो तो उसका जन्मदिन अथवा क्षयाह श्राद्ध दूसरे मास में होता है ॥ २० ॥ ————— गोचरप्रकरण —:०:— सूर्यो रसान्त्ये खयुगेऽग्निनन्दे शिवाक्षयोर्भौमशनी तमश्च । रसाङ्कयोर्लाभशरे गुणान्त्ये चन्द्रोऽम्बराब्धौ गुणनन्दयोश्च ॥ १ ॥ लाभाष्टमे चाद्यशरे रसान्त्ये नगद्वये ज्ञो द्विशरेऽब्धिरामे । रसाङ्कयोर्नागविधौ खनागे लाभव्यये देवगुरुः शराब्धौ ॥ २ ॥ द्वधन्त्ये नवांशे द्विगुणे शिवाग्नौ शुक्रः कुनागे द्विनगेऽग्निरूपे । वेदाऽम्बरे पञ्चनिधौ गजेषौ नन्देशयोर्भानुरसे शिवाग्नौ ॥ ३ ॥ क्रमाच्छुभो विद्ध इति ग्रहः स्यात्पितुः सुतस्यात्र न वेधमाहुः । अन्वयः—स्वजन्मराशेः सूर्यः रसान्त्ये, खयुगे, अग्निनन्दे, शिवाक्षयोः। च (तथा) भौमशनी (तथा) तमः रसाङ्कयोः, लाभशरे, गुणान्त्ये। च (तथा) चन्द्रः अम्बराब्धौ, गुणनन्दयोः, लाभाष्टमे, आद्यशरे, रसान्त्ये, नगद्वये, (तथा) ज्ञः द्विशरे, अब्धिरामे, रसाङ्कयोः, नागविधौ, खनागे, लाभव्यये। (तथा) देवगुरुः शराब्धौ, द्वद्यन्त्ये, नवांशे, द्विगुणे, शिवाग्नौ। (तथा) शुक्रः कुनागे, द्वनगे, अग्निरूपे, वेदाम्बरे, पञ्चनिधौ, गजेषौ, नन्देशयोः, भानुरसे, शिवाग्नौ, इति (एवं) क्रमात् ग्रहः शुभः स्यात् विद्धः स्यात्। अत्र पितुः सुतस्य वेधं न आहुः ॥ १-३ ॥ सूर्यादि ग्रह छठे बारहवें आदि स्थानों में क्रम से शुभ और विद्ध होते हैं अर्थात् जन्मराशि से छठी राशि में स्थित सूर्य शुभ और यदि जन्म राशि से बारहवें स्थान में शनैश्चर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो सूर्य विद्ध अर्थात् शुभ भी अशुभ हो जाता है। ऐसे ही दशवें स्थान में स्थित सूर्य शुभ और यदि चौथे स्थान में शनैश्चर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो सूर्य विद्ध अर्थात् शुभ भी अशुभ हो जाता है। ऐसे ही तीसरे स्थान में स्थित सूर्य शुभ और यदि नवें स्थान में शनैश्चर को छोड़
गोचरप्रकरण ६५ अन्य ग्रह स्थित हों तो सूर्य विद्ध हो जाता है। ऐसे ही गेरहवें स्थान में स्थित सूर्य शुभ और यदि पाँचवें स्थान में शनैश्चर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। मंगल, शनैश्चर, राहु, केतु ये ग्रह जन्मराशि से छठे स्थान में शुभ और यदि नवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाते हैं। गेरहवें स्थान में शुभ और यदि पाँचवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाते हैं। तीसरे स्थान में शुभ और यदि बारहवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाते हैं। परन्तु शनैश्चर भी सूर्य से विद्ध नहीं होता; क्योंकि आगे कहा है कि गोचर में पिता पुत्र का वेध नहीं होता। जन्मराशि से दशवें स्थान में स्थित चन्द्रमा शुभ और यदि चौथे स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही तीसरे स्थान में शुभ और यदि नवें स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है ॥ १ ॥ ऐसे ही गेरहवें स्थान में चन्द्रमा शुभ और यदि आठवें स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही पहले स्थान में चन्द्रमा शुभ और यदि पाँचवें स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही छठे स्थान में चन्द्रमा शुभ और यदि बारहवें स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही सातवें स्थान में स्थित चन्द्रमा शुभ और यदि दूसरे स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। जन्म- राशि से दूसरे स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि पाँचवें स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही चौथे स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि तीसरे स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही छठे स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि नवें स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही आठवें स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि पहले स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही दशवें स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि आठवें स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही गेरहवें स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि बारहवें स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। जन्म राशि से पाँचवें
६६ मुहूर्तचिन्तामणि स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि चौथे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है ॥ २ ॥ ऐसे ही दूसरे स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि बारहवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही नवें स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि दशवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही दूसरे स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि तीसरे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही गेरहवें स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि तीसरे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। जन्मराशि से पहिले स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि आठवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही दूसरे स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि सांतवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही तीसरे स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि पहिले स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही चौथे स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि दशवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही पाँचवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि नवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही आठवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि पाँचवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही नवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि गेरहवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही बारहवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि छठे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही गेरहवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि तीसरे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है ॥ ३ ॥ वामवेध और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा का बल दुष्टोऽपि खेटो विपरीतवेधाच्छुभो द्विकोणे शुभदः सितेऽब्जः ॥ ४ ॥ अन्वयः—(तथा) दुष्टः अपि खेटः विपरीतवेधात् शुभः (स्यात्) । तथासिते [शुक्लपक्षे ] अब्जः द्विकोणे शुभदः स्यात् ॥ ४ ॥ अशुभ भी ग्रह विपरीत वेध से शुभ हो जाता है, अर्थात् जन्मराशि से बारहवें, चौथे, नवें, पाँचवें स्थान में स्थित सूर्य अशुभ होता है परन्तु यदि छठे, दशवें, तीसरे, गेरहवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हो तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही नवें, पाँचवें, बारहवें स्थान में स्थित मङ्गल, शनैश्चर, राहु, केतु ये ग्रह अशुभ होते हैं, परन्तु छठे, गेरहवें, तीसरे स्थान में स्थित किसी
गोचरप्रकरण ६७ ग्रह से यदि विद्ध हों तो शुभ हो जाते हैं। ऐसे ही चौथे, नवें, आठवें, पांचवें, बारहवें और दूसरे स्थान में स्थित चंद्रमा अशुभ होता है परन्तु दशवें, तीसरे, गेरहवें, पहिले, छठे, सातवें स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध हो तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही पाँचवें, तीसरे, नवें, पहिले, आठवें, बारहवें स्थान में स्थित बुध अशुभ होता है, परन्तु दूसरे, चौथे, छठे, आठवें, दशवें, गेरहवें स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध हो तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही चौथे, बारहवें, दशवें, तीसरे स्थान में स्थित बृहस्पति अशुभ होता है परन्तु पाँचवें, दूसरे, नवें और गेरहवें स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध हो तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही आठवें, सातवें, पहिले, दशवें, नवें, पाँचवें, गेरहवें, छठे और तीसरे स्थान में स्थित शुक्र अशुभ होता है, परन्तु पहिले, दूसरे, चौथे, पाँचवें, आठवें, नवें, बारहवें, गेरहवें, स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध हो तो शुभ हो जाता है। शुक्लपक्ष में छठे, आठवें, चौथे स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध न हो तो दूसरे, नवें, पाँचवें स्थान में स्थित चन्द्रमा शुभ होता है। इस वामवेध में भी पिता-पुत्र का वेध नहीं होता ॥४॥ क्रमवेध और विपरीतवेध में मतभेद स्वजन्मराशेरिह वेधमाहुरन्ये ग्रहाधिष्ठितराशितः सः । हिमाद्रिविन्ध्यान्तर एव वेधो न सर्वदेशेष्विति काश्यपोक्तिः ॥५॥ अन्वयः—इह अन्ये (आचार्याः) स्वजन्मराशेः वेधं आहुः स वेधः ग्रहाधिष्ठित- राशित एव तथा हिमाद्रिविन्ध्यान्तरे [देशे] एव ज्ञेयः, सर्वदेशेषु न इति काश्य- पोक्तिः ॥५॥ नारदादि आचार्यों ने जन्मराशि से उक्त दोनों वेध कहे हैं और कश्यपादि आचार्यों ने जिस राशि में ग्रह स्थित हो उस राशि से उक्त दोनों वेध कहे हैं। यथा जन्मराशि से छठे स्थान में स्थित सूर्य शुभ होता है, परन्तु जिस राशि में वह स्थित हो उससे बारहवीं रार्श में शनि को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध अर्थात् शुभ भी अशुभ हो जाता है। ऐसे ही जन्मराशि से बारहवें स्थान में स्थित सूर्य अशुभ होता है, परन्तु वह जिस राशि में स्थित हो उससे छठी राशि में शनि को छोड़ अन्य ग्रह यदि स्थित हों तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही चन्द्रादि के भी दोनों प्रकार के वेधों को जानना चाहिए। इन वेधों का दोष हिमालय और विन्ध्याचल के मध्यवर्ती देशों में
६८ मुहूर्त्तचिन्तामणि ही होता है, अन्य देशों में नहीं, ऐसा कश्यपजी का वचन है। परन्तु बृहस्पतिजी ने क्रमवेध जन्मराशि से और विपरीतवेध ग्रह-स्थान से कहा है। हमारी समझ में भी यही माननीय है ॥ ५ ॥ ग्रहण-नक्षत्र का फल जन्मर्क्षे निधनं ग्रहे जनिभतो घातः क्षतिः श्रीर्व्यथा चिन्तासौख्यकलत्रदौस्थ्यमृत्यवः स्युर्माननाशः सुखम् । लाभोऽपाय इति क्रमात्तदशुभध्वस्त्यै जपः स्वर्णगो- दानं शान्तिरथो ग्रहं त्वशुभदं नो वीक्ष्यमाहुः परे ॥ ६ ॥ अन्वयः—जन्मर्क्षे ग्रहे निधनं, जनिभतः ग्रहणे घातः, क्षतिः, श्रीः, व्यथा, चिन्ता, सौख्य-कलत्रदौस्थ्यमृत्यवः, माननाशः, सुखं, लाभः, अपाय इति क्रमात् स्युः। तदशुभ- ध्वस्त्यै जपः, स्वर्णगोदानं, शान्तिः, अथो परे [आचार्याः] अशुभदं ग्रहं नो वीक्ष्यं आहुः ॥ ६ ॥ जिसके जन्मनक्षत्र में सूर्य या चन्द्रमा का ग्रहण हो उसका मरण होता है। जन्मराशि से लेकर बारह राशियों में ग्रहण हो तो इस क्रम से घातादि फल होता है, अर्थात् जन्मराशि में चन्द्रमा वा सूर्य का ग्रहण हो तो शरीर- पीड़ा, जन्मराशि से दूसरी राशि में हो तो हानि, तीसरी में लक्ष्मी, चौथी में व्यथा, पाँचवीं में पुत्रादि की चिंता, छठी में सौख्य, सातवीं में स्त्रीमरण, आठवीं राशि में अपना मरण, नवीं राशि में माननाश, दसवीं राशि में सुख, गेरहवीं राशि में लाभ और बारहवीं राशि में मरण होता है। चन्द्र-सूर्य-ग्रहण दोष के नाश के लिए त्र्यम्बकादि मन्त्रों का जप, सोने वा गौ का दान यही शान्ति है। अशुभ फल देनेवाले ग्रहण को नहीं देखना चाहिए, ऐसा कोई आचार्य कहते हैं ॥ ६ ॥ चन्द्रमा का विशेष शुभाशुभत्व पापान्तः पापयुग्द्यूने पापाच्चन्द्रः शुभोऽप्यसन् । शुभांशे चाधिमित्रांशे गुरुदृष्टोऽशुभोऽपि सत् ॥ ७ ॥ अन्वयः—चन्द्रः पापान्तः पापयुक्, पापात् द्यूने, शुभोऽपि असत् [अशुभः], वा शुभांशे, अधिमित्रांशे, वा गुरुदृष्टः, अशुभोऽपि सत् [शुभः] (स्यात्) ॥ ७ ॥ दो पापग्रहों के मध्य में स्थित, अथवा पापग्रहसंयुक्त, अथवा पापग्रह के स्थान से सातवें स्थान में स्थित शुभ भी चन्द्रमा अशुभ फल देता है।
गोचरप्रकरण ६९ और यदि शुभग्रहों के नवांश में अथवा अपने अधिमित्र के नवांश में स्थित हो और बृहस्पति देखता हो तो अशुभ भी चन्द्रमा शुभ फल देता है ॥ ७ ॥ प्रकारान्तर से चन्द्रमा का शुभाशुभफल सितासितादौ सद्दृष्टे चन्द्रे पक्षौ शुभावुभौ । व्यत्यासे चाशुभौ प्रोक्तौ संकटेऽब्जबलं त्विदम् ॥ ८ ॥ अन्वयः—सितासितादौ सद्दृष्टे चन्द्रे उभौ पक्षौ शुभौ प्रोक्तौ । व्यत्यासे च अशुभौ प्रोक्तौ, इदं अब्जबलं संकटे विचार्यम् ॥ ८ ॥ शुक्लपक्ष की परीवा में जिसका चन्द्रमा शुभ होता है उसका पक्षभर शुभ ही रहता है और कृष्णपक्ष की परीवा में जिसका चन्द्रमा अशुभ होता है उसका भी पक्षभर शुभ ही रहता है और इससे विपरीत अर्थात् शुक्लपक्ष की परीवा में जिसका चन्द्रमा अशुभ होता है उसका सम्पूर्ण पक्ष अशुभ रहता है और कृष्णपक्ष की परीवा में जिसका चन्द्रमा शुभ होता है उसका सम्पूर्ण पक्ष अशुभ रहता है । यह चन्द्रमा का बल किसी संकट के समय अर्थात् अत्यन्त आवश्यक विवाह वा यात्रादि करने में यदि तात्कालिक चन्द्रशुद्धि न हो तो विचारना चाहिए, अन्यथा नहीं ॥ ८ ॥ ग्रहों की शान्ति के लिए नवरत्न धारण वज्रं शुक्रेऽब्जे सुमुक्ता प्रवालं भौमेऽगौ गोमेदमाकौँ सुनीलम् । केतौ वैडूर्यं गुरौ पुष्पकं ज्ञे पाचिः प्राङ्माणिक्यमर्के तु मध्ये ॥ ९ ॥ अन्वयः—शुक्रे वज्रं, अब्जे सुमुक्ता, भौमे प्रवालं, अगौ गोमेदं, आकौँ सुनीलं, केतौ वैडूर्यं, गुरौ पुष्पकं, ज्ञे पाचिः (इति) प्राक् (क्रमेण रत्नानि धार्याणि) अर्के मध्ये माणिक्यं (धार्यम्) ॥ ६ ॥ नव कोष्ठोंवाला एक सोने का यन्त्र बनवाकर उसके पूर्व कोष्ठ में शुक्र की प्रसन्नता के लिए हीरा, आग्नेय कोष्ठ में चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए
७० मुहूर्तचिन्तामणि प्रत्येक ग्रह की प्रसन्नता के लिए माणिक्यादि का धारण माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमणि गारुत्मकं पुष्पकवज्रनीलम् । गोमेदवैदूर्यकमर्कतः स्यूरतनान्यथो ज्ञस्य मुदे सुवर्णम् ॥ १० ॥ धार्यं लाजावर्त्तकं राहुकेत्वो रौप्यं शुक्रेन्द्रोश्च मुक्ता गुरोस्तु । लोहं मन्दस्यारभान्वोः प्रवालं तारा जन्मर्क्षात्त्रिरावृत्तितःस्यात् ॥ ११ ॥ अन्वयः—माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमणि, गारुत्मकं, पुष्पकवज्रनीलं, गोमेदवैदूर्यकम् (क्रमण) अर्कतः सकाशात् रत्नानि (धार्याणि) अथो ज्ञस्य मुदे सुवर्णम् (धार्यम्) । राहुकेत्वोः (मुदे) लाजवर्तकं धार्यम्, शुक्रेन्द्रोः रौप्यं, गुरोश्च मुक्ता, तु (तथा) मन्दस्य लोह, आरभान्वोः प्रवालं (धार्यम्) तथा जन्मर्क्षात् त्रिरावृत्तितः तारा स्यात् ॥ १०-११ ॥ माणिक्य, मोती, मूँगा, मरकत, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद, वैडूर्य ये प्रत्येक रत्न, सूर्यादि प्रत्येक ग्रहों की प्रसन्नता के लिए धारण करना चाहिए । बहुमूल्य रत्न न मिलें तो अल्पमूल्य वस्तुएँ धारण करने को कहते हैं । बुध की प्रसन्नता के लिए सुवर्ण, राहु और केतु की प्रसन्नता के लिए लाजावर्त मणि, शुक्र और चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए चाँदी, बृहस्पति की प्रसन्नता के लिए मोती, शनैश्चर की प्रसन्नता के लिए लोहा, मंगल और सूर्य की प्रसन्नता के लिए मूँगा धारण करना चाहिए । अब तारा कहते हैं । जन्मनक्षत्र से दिननक्षत्र तक तीन आवृत्ति करने से तारा सिद्ध होती है, अर्थात् जिस दिन जिसकी तारा विचारना हो, उसके जन्मनक्षत्र से उस दिन के नक्षत्र तक गिने, जितनी संख्या हो उसमें नव का भाग देने पर जितने शेष रहें वही तारा होगी ॥ १०-११ ॥ ताराओं के नाम और फल जन्माख्यसंपद्विपदः क्षेमप्रत्यरिसाधकाः । वधमैत्रातिमैत्राः स्युस्तारानामसदृक्फलाः ॥ १२ ॥ अन्वयः—जन्माख्यसंपद्विपदः क्षेमप्रत्यरिसाधकाः वधमैत्रातिमैत्राः (एता) नाम- सदृक्फलाः तारा स्युः ॥ १२ ॥ एक शेष हो तो तारा का नाम जन्मर्क्ष, दो शेष हों तो संपत्, तीन शेष हों तो विपत्, चार शेष हों तो क्षेम, पाँच शेष हों तो प्रत्यरि, छः शेष हों तो साधक, सात शेष हों तो वध, आठ शेष हों तो मैत्र, नव शेष हों तो अति- मैत्र होता है । ये सब तारा नाम के समान फल देनेवाली होती हैं ॥ १२ ॥
गोचरप्रकरण ७१ दुष्ट तारा का परिहार मृत्यौ स्वर्णतिलान्विपद्यपि गुडं शाकं त्रिजन्मस्वथो दद्यात्प्रत्यरितारकासु लवणं सर्वं विपत्प्रत्यरिः । मृत्युश्चादिमपर्यये न शुभदोऽथैषां द्वितीयेऽंशका- नादिप्रान्त्यतृतीयका अथ शुभाः सर्वे तृतीये स्मृताः ॥ १३ ॥ अन्वयः—मृत्यौ (वधतारायां) स्वर्णतिलान् दद्यात्, विपदि (तारायां) गुडं, त्रिजन्मसु शाकं, प्रत्यरितारकासु लवणं दद्यात् । (अथ) आदिमपर्यये विपत्, प्रत्यरिः, मृत्युश्च, सर्वः न शुभदः । अथ एषां [विपत्प्रत्यरिमृत्यूनां] द्वितीये [द्वितीयावृत्तौ] आदिप्रान्त्यतृतीयकाः अंशकाः (क्रमेण) न (शुभदाः) अथ तृतीये [पर्यये] सर्वे शुभाः स्मृताः ॥ १३ ॥ मृत्युनामक सातवीं तारा हो तो सुवर्णयुक्त तिलों का, विपत्नामक तीसरी तारा हो तो गुड़ का, जन्मसंज्ञक तारा में शाक का और प्रत्यरिनामक पाँचवीं तारा हो तो नमक का दान करने से तारादोष शान्त होता है । अब तारादोष का दूसरा परिहार कहते हैं । जन्मनक्षत्र से सत्ताइसवें नक्षत्र तक तीन आवृत्ति होती हैं, अठारहवें तक दो आवृत्ति और नवें नक्षत्र तक एक आवृत्ति होती है । पहिली आवृत्ति में विपत्, प्रत्यरि, मृत्यु अर्थात् तीसरी, पाँचवीं, सातवीं तारा सम्पूर्ण अशुभ है । दूसरी आवृत्ति में इन्हीं तीनों ताराओं का पहिला, दूसरा, तीसरा अंश शुभ नहीं होता अर्थात्, तीसरी तारा के पहिले बीस अंश अशुभ और चालीस अंश शुभ होते हैं । पाँचवीं तारा में मध्य के बीस अंश अशुभ और आदि के बीस अंश तथा अंत के बीस अंश शुभ होते हैं । सातवीं तारा में अन्त के बीस अंश अशुभ और आदि के चालीस अंश शुभ होते हैं । तीसरी आवृत्ति में तीसरी, पाँचवीं, सातवीं तारा सम्पूर्ण शुभ होती हैं ॥ १३ ॥ चन्द्रमा की अवस्था षष्टि ६० घ्नं गतभं भुक्तघटीयुक्तं युगा ४ हतम् । शराब्धि ४५ हृल्लब्धतोऽर्कशेषेऽवस्थाः क्रमाद्विधोः ॥ १४ ॥ अन्वयः—गतभं षष्टिघ्नं भुक्तघटीयुक्तं युगाहतं, शराब्धिहृल्लब्धतः अर्कशेषे क्रमात् (मेषात् क्रमेण) विधोः अवस्थाः स्युः ॥ १४ ॥ अश्विन्यादि व्यतीत नक्षत्रों की संख्या को साठ से गुणा करके वर्त्तमान
७२ मुहूर्त्तचिन्तामणि नक्षत्र की भुक्त घटी जोड़े। फिर उसे चार से गुणा करे और पैंतालिस का भाग दे। जो लब्ध हों वे मेषादि राशियों में स्थित चन्द्रमा की भुक्त अवस्था होगी और शेष वर्त्तमान अवस्था होगी और यदि लब्ध बारह से अधिक हों तो उनमें बारह का भाग देकर जो शेष रहें वह भुक्त अवस्था होगी ॥ १४ ॥ अवस्थाओं के नाम और फल प्रवासनाशौ मरणं जयश्च हास्यारतिक्रीडितसुप्तभुक्ताः । ज्वराख्यकम्पस्थिरता अवस्था मेषात्क्रमात्नामसदृक्फलाःस्युः ॥ १५ ॥ अन्वयः—प्रवासनाशौ मरणं जयः हास्यारतिक्रीडितसुप्तभुक्ताः ज्वराख्यकम्प- स्थिरताः (एताः) मेषात् क्रमात् नामसदृक्फला अवस्थाः स्युः ॥ १५ ॥ प्रवास, नाश, मरण, जय, हास्या, रति, क्रीड़ा, सुप्त, भुक्त, ज्वर, कम्प स्थिरता ये उक्त अवस्थाओं के नाम हैं। ये मेषादि क्रम से अर्थात् चन्द्रमा मेष में हो तो प्रवासादि क्रम से, वृष में हो तो नाशादि क्रम से, मिथुन में हो तो मरणादि क्रम से, कर्क में हो तो जयादि क्रम से, सिंह में हो तो हास्यादि क्रम से, कन्या में हो तो रत्यादि क्रम से, तुला में हो तो क्रीड़ादि क्रम से, वृश्चिक में हो तो सुप्तादि क्रम से, धन में हो तो भुक्तादि क्रम से, मकर में हो तो ज्वरादि क्रम से, कुम्भ में हो तो कम्पादि क्रम से और मीन में हो तो स्थिरतादि क्रम से होती हैं। इनका फल इन्हीं नामों के समान होता है ॥ १५ ॥ ग्रह-दोष-शान्ति के लिए औषधयुक्त जल से स्नान लाजाकुष्ठबलाप्रियंगुघनसिद्धार्थैर्निशादारुभिः पुङ्खालोध्रयुतैर्जलैर्निगदितं स्नानं ग्रहोत्थघहृत् । धेनुःकम्ब्वरुणो वृषश्च कनकं पीताम्बरं घोटकः श्वेतो गौरसिता महासिरज इत्येता रवेर्दक्षिणाः ॥ १६ ॥ अन्वयः—लाजाकुष्ठबलाप्रियंगुघनसिद्धार्थैः निशादारुभिः पुङ्खालोध्रयुतैः जलैः ग्रहोत्थाघहृत् स्नानं निगदितम्, धेनुः, कम्बु, अरुणो वृषः च कनकं, पीताम्बरं, श्वेतः घोटकः, असिता गौः, महासिः, अजः इति एताः रवेः (क्रमेण) दक्षिणाः (ज्ञेयाः) ॥ १६ ॥ लज्जावती, कूट, बरियारा, काकुनि, मुस्ता, सरसो, हल्दी, देवदारु, शरपुंखा, लोध इन ओषधियों से युक्त जल से स्नान करना ग्रहों के दोष का हरण करनेवाला कहा गया है। अब सूर्यादि ग्रहों की दक्षिणा कहते हैं। सूर्य
गोचरप्रकरण ७३ की प्रसन्नता के लिए धेनु, चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए शंख, मंगल की प्रसन्नता के लिए लाल बैल, बुध की प्रसन्नता के लिए सुवर्ण, बृहस्पति की प्रसन्नता के लिए पीताम्बर, शुक्र की प्रसन्नता के लिए श्वेत घोड़ा, शनैश्चर की प्रसन्नता के लिए काली गौ, राहु की प्रसन्नता के लिए तलवार और केतु की प्रसन्नता के लिए बकरा ब्राह्मण को देना चाहिए ॥ १६ ॥ ग्रह गन्तव्य राशि का फल कितने दिन पहले देने लगते हैं सूर्यारसौम्यास्फुजितोक्षनागसप्ताद्रिघस्रान्विधुरग्निनाडी । तमोयमेज्यास्त्रिरसाश्विमासान् गन्तव्यराशेः फलदाः पुरस्तात् ॥ १७ ॥ अन्वयः—सूर्यारसौम्यास्फुजितः गन्तव्यराशेः पुरस्तात् (क्रमेण) अक्षनागसप्ताद्रि- घस्रान् फलदाः, विधुः अग्निनाडीः (फलदः) तमोयमेज्याः (क्रमेण) त्रिरसाश्विमासान् फलदाः ॥ १७ ॥ सूर्य अगली राशि में जाने से पाँच दिन पहले, मंगल आठ दिन, बुध सात दिन, शुक्र सात दिन, चन्द्रमा तीन दण्ड, राहु तीन मास, शनैश्चर छः मास और बृहस्पति दो मास पहले उस राशि का फल देने लगते हैं ॥ १७ ॥ दुष्ट योगादि की शान्ति के लिए दान दुष्टे योगे हेम चन्द्रे च शङ्खं धान्यं तिथ्यर्द्धे तिथौ तण्डुलांश्च । वारे रत्नं भे चगांहेम नाड्यां दद्यात्सिन्धूत्थंचतारासु राजा ॥ १८ ॥ अन्वयः—योगे दुष्टे हेम, चन्द्रे दुष्टे शङ्खं, तिथ्यर्धे धान्यं, तिथौ तण्डुलान्, वारे रत्नं, भे गां, नाड्यां हेम, तारासु [दुष्टासु] राजा सिन्धूत्थं दद्यात् ॥ १८ ॥ यदि किसी आवश्यक यात्रादि काल में दुष्ट योग हो तो सुवर्ण, चन्द्रमा अशुभ हो तो शंख, करण दुष्ट हो तो धान्य, तिथि दुष्ट हो तो चावल, वार दुष्ट हो तो रत्न, राशि दुष्ट हो तो गौ, नाड़ी अर्थात् मुहूर्त्त दुष्ट हो तो सुवर्ण और तारा दुष्ट हो तो सेंधानमक देकर राजा यात्रादि करे ॥ १८ ॥ राश्यन्तर में गए हुए ग्रहों के फल देने का काल राश्यादिगौ रविकुजौ फलदौ सितेज्यौ मध्ये सदा शशिसुतश्चरमेऽब्जमन्दौ । अध्वान्नवृद्धिभयसन्मतिवस्त्रसौख्य- दुःखानि मासि जनिभे रविवासरादौ ॥ १९ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ गोचरप्रकरणं समाप्तम् ॥ ४ ॥
७४ मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—रविकुजौ राश्यादिगौ फलदौ, सितेज्यौ मध्य फलदौ, शशिसुतः सदा फलदः, अब्जमन्दौ चरमे फलदौ, (तथा) रविवासरादौ जनिभे (सति) मासि [तस्मिन् मासे] (क्रमेण) अध्वाश्ववह्निभयसन्मतिवस्त्रसौख्यदुःखानि भवन्ति ॥ १६ ॥ सूर्य और मंगल राशि के पहले दशांश में फलदायक होते हैं। बृहस्पति और शुक्र राशि के मध्य दशांश में और बुध सदा अर्थात् जब तक राशि में रहे तब तक फलदायक होता है। चन्द्रमा और शनैश्चर राशि के अंतिम दशांश में फल देते हैं। अब चान्द्रमास में जिस वासर में जन्मनक्षत्र का प्रवेश हो उस वासर का फल कहते हैं। शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर अमावास्या तक जन्मनक्षत्र का प्रवेश यदि रविवार में हो तो रास्ता चलना पड़े, सोमवार में हो तो उत्तम अन्न मिले, मङ्गल में हो तो अग्निभय, बुधवार में हो तो उत्तम मति, बृहस्पति में हो तो वस्त्रप्राप्ति, शुक्रवार में हो तो सौख्य और शनैश्चर में हो तो दुःख मिले ॥ १९ ॥ ─── संस्कारप्रकरण ─:०:─ आद्यं रजः शुभं माघमार्गराधेेषफाल्गुने । ज्येष्ठ श्रावणयोः शुक्ले सद्बारे सत्त नौ दिवा ॥ १ ॥ अन्वयः—माघमार्गराधेेषफाल्गुने ज्येष्ठश्रावणयोः, शुक्ले, सद्बारे, सत्त नौ, दिवा (द्विसे) आद्यं रजः शुभम् ॥ १ ॥ माघ, अगहन, वैशाख, आश्विन, फाल्गुन, ज्येष्ठ, श्रावण इन महीनों में शुक्लपक्ष में, शुभग्रहों के वासर में, शुभग्रह से दृष्ट, युत वा शुभग्रह की लग्न में और दिन में पहिले पहिल रजोधर्शन हो तो शुभ होता है ॥ १ ॥ प्रथम रजोधर्शन में उत्तम, मध्यम, निकृष्ट नक्षत्र श्रुतित्रय मृदुक्षिप्रध्रुवस्वाती सिताम्बरे । मध्यं च मूलादितिभे पितृमिश्रे परेष्वसत् ॥ २ ॥ अन्वयः—श्रुतित्रयमृदुक्षिप्रध्रुवस्वाती सिताम्बरे (आद्यं रजः शुभं स्यात्) मूला- दितिभे पितृमिश्रे मध्यं (स्यात्) परेषु (नक्षत्रेषु) असत् (स्यात्) ॥ २ ॥
संस्कारप्रकरण ७५ श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, अश्विनी पुष्य, हस्त, रोहिणी, तीनों उत्तरा, स्वाती इन नक्षत्रों में प्रथम रजोदर्शन हो तो शुभ; मूल, पुनर्वसु, मघा, विशाखा, कृत्तिका इन नक्षत्रों में मध्यम और भरणी, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, इन नक्षत्रों में अशुभ होता है। श्वेत वस्त्र पहिने हुई स्त्री के प्रथम रजोदर्शन हो तो शुभदायक होता है ॥ २ ॥ निन्दित प्रथम रजोदर्शन भद्रानिद्रासंक्रमे दर्शरिक्तासंध्याषष्ठीद्वादशीवैधृतेषु । रोगेऽष्टम्यां चन्द्रसूर्योपरागे पाते चाद्यं नो रजोदर्शनं सत् ॥ ३ ॥ अन्वयः—भद्रानिद्रासंक्रमे दर्शरिक्तासन्ध्याषष्ठीद्वादशीवैधृतेषु, रोगे, अष्टम्यां, चन्द्रसूर्योपरागे, पाते च आद्यं रजोदर्शनं नो सत् ॥ ३ ॥ भद्रा में, सोते समय, संक्रान्तिकाल में, अमावास्या में, चौथि, नवमी,
७६ मुहूर्तचिन्तामणि गर्भाधानमुहूर्त्त गण्डान्तं त्रिविधं त्यजेन्निधनजन्मर्क्षं च मूलान्तकं दास्रं पौष्णमथोपरागदिवसं पातं तथा वैधृतिम् । पित्रोः श्राद्धदिनं दिवा च परिघाद्यार्द्धं स्वपत्नीगमे । भान्युत्पातहतानि मृत्युभवनं जन्मर्क्षतः पापभम् ॥ ५ ॥ भद्राषष्ठी पर्वरिक्ताश्च संध्या भौमार्किकीनाद्यरात्रीश्चतस्रः । गर्भाधानं त्र्युत्तरेन्द्रर्क्षमित्रब्राह्मस्वातीविष्णुवस्वम्बुपे सत् ॥ ६ ॥ अन्वयः—त्रिविधं गण्डान्तं, निधनजन्मर्क्षं च मूलान्तकं दास्रं पौष्णं अथ उपराग- दिवसान् पातं तथा वैधृति, पित्रोः श्राद्धदिनं दिवा च परिघाद्यर्धं उत्पातहतानि भानि जन्मर्क्षतः मृत्युभवनम् (तथा) पापभं (एतानि) स्वपत्नीगमे त्यजेत् । भद्राषष्ठीपर्व- रिक्ताः, च सन्ध्याभौमार्किकीन्, चतस्रः आद्यरात्रीः (स्वपत्नीगमे त्यजेत्), त्र्युत्तरेन्द्रर्क- मैत्रब्राह्मस्वातीविष्णुवस्वम्बुपे गर्भाधानं सत् ॥ ६ ॥ रजोदर्शन से चार दिन बाद अपनी स्त्री के गमन में नक्षत्र गण्डान्त, तिथि गण्डान्त, लग्न गण्डान्त, जन्मनक्षत्र से सातवाँ नक्षत्र, जन्मनक्षत्र, मूल, भरणी, अश्विनी, रेवती, ग्रहण का दिन, व्यतीपात और वैधृतियोग, माता- पिता का श्राद्धदिन, परिघयोग का पूर्वार्द्ध, उत्पात से दूषित नक्षत्र, जन्मराशि- जन्मलग्न से आठवीं लग्न, पापग्रहयुक्त नक्षत्र अथवा लग्न, इन सबका त्याग करे ॥ ५ ॥ भद्रा, छठि, पर्व अर्थात् कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, पूर्णिमा, सूर्यसंक्रान्ति और रिक्ता अर्थात् चौथ, नवमी, चतुर्दशी, संध्याकाल, मंगल, रविवार, शनैश्चर दिन इन सबको छोड़ शुभ तिथि, वासर, लग्न, योगादि में, रात्रि में, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष इन नक्षत्रों में गर्भाधान शुभ होता है ॥ ६ ॥ गर्भाधान में लग्नबल केन्द्रत्रिकोणेषु शुभैश्च पापैस्त्र्यायारिगैः पुंग्रहदृष्टलग्ने । ओजांशगेऽब्जेऽपि च युग्मरात्रौ चित्रादितीज्याशिवषु मध्यमं स्यात् ॥ ७ ॥ अन्वयः—शुभैः केन्द्रत्रिकोणेषु (स्थितैः) पापैः त्र्यायारिगैः पुङ् ग्रहदृष्टलग्ने अब्जे ओजांशगे च युग्मरात्रौ (गर्भाधानं शुभम्), च (पुनः) चित्रादितीज्याशिवेषु (नक्षत्रेषु) मध्यमं स्यात् ॥ ७ ॥
संस्कारप्रकरण ७७ पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, नवें और पाँचवें स्थान में शुभग्रह स्थित हों; तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह हों; सूर्य, मंगल वा बृहस्पति लग्न को देखते हों; विषम राशि वा विषम नवांश में चन्द्रमा स्थित हो, ऐसे लग्न में और रजोदर्शन के बाद चौथी, छठी, आठवीं, दशवीं, बारहवीं, चौदहवीं, सोलहवीं रात्रि में गर्भाधान शुभ होता है। चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य और अश्विनी नक्षत्र में गर्भाधान मध्यम फलदायक होता है ॥ ७॥ सीमन्तोन्नयनमुहूर्त्त जीवार्कारदिने मृगेज्यनिर्ऋतिश्रोत्रादितिब्रध्नभै रिक्तामर्करसाष्टवर्ज्यतिथिभिर्मासाधिपे पीवरे। सीमन्तोऽष्टमषष्ठमासि शुभदैः केन्द्रत्रिकोणे खलै- र्लभारित्रिषु वा ध्रुवान्त्यसदहे लग्ने च पुंभांशके ॥ ८ ॥ अन्वयः—जीवार्कारदिने मृगेज्यनिर्ऋतिश्रोत्रादितिब्रध्नभैः, रिक्तामर्करसाष्टवर्ज्य- तिथिभि मासाधिपे पीवरे, अष्टमषष्ठमासि, शुभदैः (शुभग्रहैः) केन्द्रत्रिकोणे, खलैः (पापग्रहैः) लाभारित्रिषु (स्थितैः) वा ध्रुवान्त्यसदहे, पुंभांशके लग्ने सीमन्तः शुभः ॥ ८ ॥ बृहस्पति, रविवार और मंगलवार में; मृगशिरा, पुष्य, मूल, श्रवण, पुनर्वसु और हस्त नक्षत्रों में; चौथि, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या, द्वादशी, छठि और अष्टमी को छोड़ अन्य तिथियों में; मासेश्वर¹ के बली रहते, गर्भाधान से आठवें या छठे मास में; केन्द्रत्रिकोण अर्थात् लग्न, चौथा, सातवाँ, दशवाँ, नवाँ, पाँचवाँ इन स्थानों में शुभग्रहों के रहते; गेरहवें, छठे, तीसरे स्थान में क्रूरग्रहों के रहते और पुरुषसंज्ञक ग्रहों के लग्न वा नवांश के सीमन्तोन्नयन कर्म श्रेष्ठ है। अथवा तीनों उत्तरा, रोहिणी और रेवती इन नक्षत्रों में और चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति, शुक्र, इन ग्रहों के वासर में और दोपहर से पूर्व शुक्लपक्ष में सीमन्तोन्नयन कर्म करना श्रेष्ठ है। छठे, आठवें मास होने के कारण इनमें गुरुशुक्रास्तादि का विचार कम किया जाता है ॥ ८ ॥ गर्भाधान से प्रसवपर्यंत महीनों के स्वामी मासेश्वराः सितकुजेज्यरवीन्दु- सौरिचन्द्रात्मजास्तनुपचन्द्रदिवाकराः स्युः। १—आगे कहेंगे।
७८ मुहूर्त्तचिन्तामणि स्त्रीणां विधोर्बलमुशन्ति विवाहगर्भसंस्कारयोरितरकर्मसु भर्तुरेव ॥ ९ ॥ अन्वयः—सितकुजेज्यरवीन्दुसौरिचन्द्रात्मजाः तनुपचन्द्रदिवाकराः (क्रमेण) मासेश्वराः स्युः । विवाहगर्भसंस्कारयोः स्त्रीणां विधोः बलं उशन्ति । इतरकर्मसु भर्तुः एव विधोः बलम् (ग्राह्यम्) ॥ ६ ॥ पहिले मास का शुक्र, दूसरे मास का मंगल, तीसरे मास का बृहस्पति, चौथे मास का सूर्य, पाँचवें मास का चन्द्रमा, छठे मास का शनैश्चर, सातवें मास का बुध, आठवें मास का गर्भाधानलग्नेश, नवें मास का चन्द्रमा और दशवें मास का सूर्य स्वामी होता है । प्रयोजन यह है कि यदि मासेश्वर अस्त, निर्बल वा किसी अन्य ग्रह से पीड़ित हो तो गर्भपात हो जाता है । इसलिए पहिले ही उसका उपाय करे । अब स्त्रियों का चन्द्रबल कहते हैं । विवाह और गर्भसम्बन्धी संस्कारों में स्त्री की जन्मराशि से अन्य यात्रादि कार्यों में स्वामी की जन्मराशि से और यदि पति मर गया हो तो यात्रादि कार्यों में भी स्त्री की ही जन्मराशि से चन्द्रबल विचारना चाहिए ॥ ९ ॥ पुंसवनमुहूर्त्त पूर्वोदितैः पुंसवनं विधेयं मासे तृतीये त्वथ विष्णुपूजा । मासेऽष्टमे विष्णुविधातृजीवैर्लग्ने शुभे मृत्युगृहे च शुद्धे ॥ १० ॥ अन्वयः—पूर्वोदितैः (सीमन्तोक्तैः तिथ्यादिभिः) तृतीये मासे पुंसवन विधेयम्, अथ अष्टमे मासे विष्णुविधातृजीवैः (नक्षत्रै) शुभे लग्ने मृत्युगृहे शुद्धे [सति] विष्णु- पूजा (कार्या) ॥ १० ॥ सीमन्तोन्नयन मुहूर्त्त में कहे हुए तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न में तथा गर्भाधान से तीसरे मास में पुंसवन कर्म करना चाहिए । अब गर्भ की रक्षा के लिए विष्णुपूजा का मुहूर्त्त कहते हैं । श्रवण, रोहिणी और पुष्य नक्षत्र में; शुभ ग्रहों के दिन में; गर्भाधान से आठवें मास में; शुभग्रह से दृष्ट, युत वा शुभग्रह-सम्बन्धी लग्न में और लग्न से आठवें स्थान में किसी ग्रह के न रहते, दोपहर के पूर्व विष्णु की पूजा करनी चाहिए ॥ १० ॥ जातकर्म और नामकर्म का मुहूर्त्त तज्जातकर्मादि शिशोर्विधेयं पर्वाह्वरिक्तोनतिथौ शुभेऽह्नि । एकादशे द्वादशकेऽपि घस्रे मृदुध्रुवक्षिप्रचरोडुषु स्यात् ॥ ११ ॥
संस्कारप्रकरण ७९ अन्वयः—पर्वाख्यरिक्तोनेतिथौ, शुभेह्नि, एकादशे अपि द्वादशके घस्रे, मृदुध्रुव- क्षिप्रचरेषु शिशोः तत् जातकर्मादि विधेयं स्यात् ॥ ११ ॥ पर्व अर्थात् कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पौर्णमासी, सूर्य- संक्रान्ति तथा चौथि, नवमी और चतुर्दशी को छोड़ अन्य तिथियों में, व्यतीपातादि दोषरहित शुभग्रहों के दिन में; जन्मकाल से गेरहवें वा बारहवें दिन में; मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिष नक्षत्र में जातकर्म करे यदि जन्मकाल में किसी कारणवश न किया गया हो । आदि पद से नामकर्म का भी ग्रहण है, अर्थात् इसी मुहूर्त्त में नामकर्म भी करना चाहिए ॥ ११ ॥ प्रसूता स्त्री के स्नान का मुहूर्त्त पौष्णध्रुवेन्दुकरवातहयेषु सूती- स्नानं समित्रभरवीज्यकुजेषु शस्तम् । नार्द्रात्रयश्रुतिमघान्तकमिश्रमूल- त्वाष्ट्रे ज्ञसौरिवसुषड्विरिक्ततिथ्याम् ॥ १२ ॥ अन्वयः—समित्रभरवीज्यकुजेषु, पौष्णध्रुवेन्दुकरवातहयेषु, सूतीस्नानं शस्तम्; आर्द्रात्रयश्रुतिमघान्तकमिश्रमूलत्वाष्ट्रे ज्ञसौरिवसुषड्विरिक्ततिथ्यां सूतीस्नान न शस्तम् ॥ १२ ॥ रेवती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाती, अश्विनी और अनुराधा नक्षत्र में, रविवार, मङ्गल वा बृहस्पतिवार में प्रसूता स्त्री का स्नान करना शुभ है। आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, श्रवण, मघा, भरणी, विशाखा, कृत्तिका, मूल और चित्रा नक्षत्र में; बुध और शनिवार में; अष्टमी, षष्ठि, द्वादशी, चौथि, नवमी और चतुर्दशी तिथि में प्रसूता स्त्री स्नान न करे, इनमें स्नान करने से फिर सन्तान नहीं होती ॥ १२ ॥ प्रथम आदि महीनों में बालक के दाँत निकलने का फल मासे चेत्प्रथमे भवेत्सदर्शनो बालो विनश्येत्स्वयं हन्यात्सङ्क्रमतोऽनुजातभगिनीं मात्रग्रजान् द्व्यादिके । षष्ठादौ लभते हि भोगमतुलं तातात्सुखं पुष्टतां लक्ष्मीं सौख्यमथो जनौ सदशनो वोर्ध्वं स्वपित्राविहा ॥ १३ ॥
८० मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—चेत् [यदि] प्रथमे मासे बालः सदशनः भवेत् (तदा सः स्वयं नश्येत् । द्वयादिके मासे (चेत् सदशनः) तदा क्रमशः अनुजातभगिनीमातृग्रजान् हन्यात् । षष्ठादौ (क्रमेण) अतुलं भोगं, तातात् सुखं, पुष्टतां, लक्ष्मीं, सौख्य लभते । अथो जनौ (जन्मसमये) सदशनः (बालः) स्वपित्रादिहा (भवति) वा ऊर्ध्वं (ऊर्ध्वपंक्तौ) सदशनः बालः स्वपित्रादिहा (भवति) ॥ १३ ॥ पहिले मास में यदि बालक के दाँत निकलें तो वह बालक मर जाता है। यदि दूसरे मास में निकलें तो छोटे भाई को, तीसरे मास में निकलें तो बहिन को, चौथे मास में जामें तो माता को और पाँचवें मास में जामें तो जेठे भाई को मारता है। यदि छठे मास में दाँत जामें तो वह बालक उत्तम भोग, सातवें मास में जामें तो पिता से सुख, आठवें मास में जामें तो देह की पुष्टता, नवें मास में जामें तो लक्ष्मी, दशवें मास में जामें तो सौख्य, गेरहवें मास में जामें तो अतिसौख्य और बारहवें मास में धन-सम्पत्ति को प्राप्त होता है। यदि गर्भ ही में जामे हुए दांतों के सहित उत्पन्न हो, अथवा ऊपर की पंक्ति में पहिले दाँत जामें तो वह बालक अपने माता-पिता, भाई इत्यादिकों का विनाश करता है ॥ १३ ॥ दोलारोहणमुहूर्त्त दोलारोहेऽर्कभात्पञ्चशरपञ्चेषुसप्तभैः । नैरूज्यं मरणं कार्श्य व्याधिः सौख्यं क्रमाच्छिशोः ॥ १४ ॥ अन्वयः—अर्कभात् पञ्चशरपञ्चेषुसप्तभैः [नक्षत्रैः] दोलारोहे [सति] क्रमात् शिशोः नैरूज्यं, मरणं, कार्श्य, व्याधिः, सौख्यं स्यात् ॥ १४ ॥ सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हों उस नक्षत्र से पाँच नक्षत्र पर्यन्त बालक को झुलुआ पर चढ़ाकर झुलावे तो वह नीरोग हो, फिर पाँच नक्षत्रों में उस बालक का मरण हो, फिर पाँच नक्षत्रों में वह बालक दुबला हो, फिर पाँच नक्षत्रों में उस बालक के व्याधि हो और फिर सात नक्षत्रों में उस बालक को सौख्य हो ॥ १४ ॥ दन्तार्कभूपधृतिदिङ्मतवासरे स्या- द्वारे शुभे मृदुलघुध्रुवभैः शिशूनाम् । दोलाधिरूढिरथनिष्क्रमणं चतुर्थ- मासे गमोक्तसमयेऽर्कमितेऽह्नि वा स्यात् ॥ १५ ॥
संस्कारप्रकरण ८१ अन्वयः-दन्तार्कभूपधृतिदिङ्मितवासरे, शुभे वारे, मृदुलघुध्रुवभैः (भैःनक्षत्रैः) शिशोः दोलाधिरूढिः स्यात् । अथ चतुर्थमासे वा अर्कमिते अह्नि गमोक्तसमये शिशोः निष्क्रमणं (शुभं) स्यात् ॥ १५ ॥ जन्मदिन से बत्तीसवें, बारहवें, सोलहवें, अठारहवें वा दशवें दिन; चन्द्र, बुध, बृहस्पति वा शुक्रवार और मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्, तीनों उत्तरा वा रोहिणी नक्षत्र में पहिले पहिल बालकों को झुलुआ पर चढ़ाना शुभ होता है । अब शिशुनिष्क्रमण- मुहूर्त्त कहते हैं । जन्म से चौथे मास में और यात्रा में कहे हुए तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न में पहिले पहिल बालक को घर से बाहर निकालना शुभ होता है, अथवा जन्मदिन से बारहवें दिन यात्रोक्त समय में शुभ होता है ॥ १५ ॥ जलपूजामुहूर्त्त कवीज्यास्तचैत्राधिमासे न पौषे जलं पूजयेत्सूतिका मासपूर्तौ । बुधन्द्रीज्यवारे विरिक्ते तिथौ हि श्रुतीज्यादितीन्द्रर्कनैर्ऋत्यमैत्रैः ॥ १६ ॥ अन्वयः—कवीज्यास्तचैत्राधिमासे, पौषे मासे, मासपूर्तौ (अपि) सूतिका जलं न पूजयेत् । बुधेन्द्रीज्यवारे विरिक्ते तिथौ श्रुतीज्यादितीन्द्रर्कनैर्ऋत्यमैत्रैः जलं पूजयेत् ॥ १६ ॥ बृहस्पति वा शुक्र के अस्त में तथा चैत्र, पौष, वा मलमास में सूतिका जल की पूजा न करे और बुधवार, सोमवार, बृहस्पतिवार में; चौथि, नवमी, चतुर्दशी तिथि को छोड़ अन्य तिथियों में; श्रवण, पुष्य, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, मूल, अनुराधा नक्षत्र में और पहिले महीने की समाप्ति में सूतिका जल की पूजा करे ॥ १६ ॥ अन्नप्राशन मुहूर्त्त रिक्तानन्दाष्टदर्शं हरिदिवसमथो सौरिभौमार्कवाराँ- ल्लग्नं जन्मर्क्षलग्नाष्टमगृहलवगं मीनमेषालिकं च । हित्वा षष्ठात्समे मास्यथ हि मृगदृशां पञ्चमादोजमासे नक्षत्रैः स्यात्स्थिराख्यैः समृदुलघुचरैर्बालकान्नाशनं सत् ॥ १७ ॥ अन्वयः—रिक्तानन्दाष्टदर्शं, हरिदिवसं, सौरिभौमार्कवारान्, जन्मर्क्षलग्नाष्टमगृह- लवगं लग्नं, मीनमेषालिकं लग्नं (एतत् सर्वं) हित्वा, षष्ठात् समे मासि अथ हि मृगदृशां
८२ मुहूर्त्तचिन्तामणि (कन्यानां) पञ्चमात् ओजमासे समृदुलघुचरैः स्थिराख्यैः नक्षत्रैः बालकान्नाशनं सत् ॥ १७॥ चौथि, नवमी, चतुर्दशी, परीवा, षठि, एकादशी, अष्टमी, अमावास्या और द्वादशी तिथि को छोड़ अन्य तिथियों में; शनैश्चर, मंगल, रविवार को छोड़ अन्य दिनों में; जन्मराशि वा जन्मलग्न से आठवीं राशि, आठवाँ नवांश; मीन, मेष और वृश्चिक को छोड़ अन्य लग्न में; तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभि- जित्, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिष नक्षत्र में; छठे मास से लेकर सम मासों में अर्थात् छठे, आठवें, दशवें इत्यादि मासों में बालकों का और पाँचवें मास से लेकर विषम मासों में अर्थात् पाँचवें, सातवें, नवें, इत्यादि मासों में कन्याओं का अन्नप्राशन शुभ होता है सो भी शुक्लपक्ष में और दोपहर से पूर्व होना चाहिए ॥ १७॥ अन्नप्राशन के लिये लग्नशुद्धि केन्द्रत्रिकोणसहजेषु शुभैः खशुद्धे लग्ने त्रिलाभरिपुगैश्च वदन्ति पापैः । लग्नाष्टषष्ठरहितं शशिनं प्रशस्तं मैत्राम्बुपानिलजनुर्भमसच्च केचित् ॥ १८ ॥ अन्वयः—शुभैः केन्द्रत्रिकोणसहजेषु (स्थितैः) खशुद्धे लग्ने त्रिलाभरिपुगैः पापैः, लग्नाष्टषष्ठरहितं शशिनं (अन्नाशने) प्रशस्तं वदन्ति। केचित् मैत्राम्बुपानिलजनुर्भं असत् वदन्ति ॥ १८ ॥ लग्न से पहिले, चौथे, सातवें और तीसरे स्थान में शुभ ग्रह हों; दशवें स्थान में कोई ग्रह न हो; तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह हों और लग्न, आठवें और छठे स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में चन्द्रमा स्थित हो, ऐसे लग्न में अन्नप्राशन शुभ होता है। कोई आचार्य अनुराधा, शतभिष और जन्मनक्षत्र को अन्नप्राशन में अशुभ कहते हैं ॥ १८॥ अन्नप्राशन मुहूर्त्त में ग्रहों का फल क्षीणेन्दुपूर्णचन्द्रेज्यज्ञभौमार्काकिभार्गवैः । त्रिकोणव्ययकेन्द्राष्टस्थितैरुक्तं फलं ग्रहैः ॥ १९ ॥ भिक्षाशी यज्ञकृद्दीर्घजीवी ज्ञानी च पित्तहक । कुष्ठी चान्नक्लेशवातव्याधिमान्भोगभागिति ॥ २० ॥