नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
वृत्ति की दृष्टि से भिन्नता लिये हुए होते हैं, तथापि ये चारों एक दृष्टि से समान हैं। वह समानता है—इन चारों का स्वामी के अधीन होना। शिष्य और अन्तेवासी जाति से द्विज होते हैं। भृतक तथा अधिकर्मकृत शूद्र भी हो सकते हैं। इन चारों की सामाजिक स्थिति की भिन्नता स्पष्ट है। शिष्य और अन्तेवासी गुरु की सेवा करते हुए भी दास नहीं कहलाते, जबकि भृतक और अधिकर्मकृत दास कहला भी सकते हैं और नहीं भी। शिष्य और अन्तेवासी वेतनभोगी नहीं होते, जबकि भृतक पारिश्रमिक पाता है और अधिकर्मकृत वेतन अथवा भत्ता अथवा कमीशन पाता है। शिष्य और अन्तेवासी गुरु की गुरुता के कारण उसके अधीन हैं और उसके प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं, परन्तु भृतक और अधिकर्मकृत को स्वामी के गुण, पद तथा सामाजिक स्तर आदि से कुछ लेना-देना नहीं। उसे तो केवल उससे प्राप्त होने वाले धन और उसके उदार व्यवहार से प्रयोजन है। शिष्य और अन्तेवासी को सामान्यतया शिक्षा- समाप्तिकाल तक गुरु के पास रहना ही है। भृतक और अधिकर्मकृत का कार्यकाल और स्थितिकाल तो अनिश्चित ही रहता है, वे जीवनपर्यन्त भी स्वामी के साथ जुड़े रह सकते हैं तथा इसके विपरीत दूसरे दिन भी उसे छोड़कर जा सकते हैं। इस प्रकार इन चारों में जाति सम्बन्धी, स्थिति सम्बन्धी, कर्म सम्बन्धी और वृत्ति सम्बन्धी भिन्नता होते हुए भी एक अभिन्नता है—गुरु अथवा स्वामी की वशवर्तिता—उसकी आज्ञापालन तत्परता। इस प्रकार उसकी अधीनता, दूसरे शब्दों में अस्वतन्त्रता। कर्मापि द्विविधं ज्ञेयमशुभं शुभमेव च। अशुभं दासकर्मोक्तं शुभं कर्मकृता स्मृतम्॥ ५॥ सेवाकर्म दो प्रकार का कहा गया है—शुभ तथा अशुभ। दासकार्य—झाडू- पोचा, बर्तन साफ़ करना, वस्त्र-प्रक्षालन, जूता-पॉलिश, तेल-मालिश तथा लकड़ी चीरना-फाड़ना आदि छोटे कार्य—अशुभ कर्म हैं तथा शेष सभी कर्मचारियों का सेवाकार्य शुभ कर्म है। गृहद्वाराशुचिस्थानरथ्यावस्करशोधनम् । गुह्याङ्गा स्पर्शनोच्छिष्टविण्मूत्रग्रहणोज्झनम्॥ ६॥ इष्टतः स्वामिनश्चाङ्गोपस्थानमथोऽन्ततः। अशुभं कर्म विज्ञेयं शुभमन्यदतः परम्॥ ७॥ अशुभ कर्मों का विवरण इस प्रकार है—1. गृहद्वार, अपवित्र स्थान, अपवित्र मार्ग तथा अशुद्ध वस्तु का शोधन, 2. गृहस्वामी के गुप्त अंगों का स्पर्श, 3. उच्छिष्ट (जूठन) और मल-मूत्र को उठाकर घर से बाहर फेंकना तथा 4. स्वामी की इच्छानुसार उसे इन्द्रिय सुख देना आदि इस प्रकार के सभी कर्म अशुभ हैं और इनसे भिन्न अन्य कर्म शुभ हैं। नारदस्मृति / 161
**टिप्पणी—**इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि प्राचीनकाल में स्वामी अपने दास-दासी का यौन-शोषण भी करते थे। दासों को स्वामी की इच्छा का विरोध करने का अधिकार नहीं था। स्वामी उनकी चमड़ी उधेड़ सकता था। यहां तक कि उनके अधमरा हो जाने पर उसका उपचार कराने-न कराने के लिए स्वामी स्वतन्त्र था। दास की मृत्यु के लिए स्वामी उत्तरदायी नहीं था। क्या मानवता थी ? आविद्याग्रहणाच्छिष्यः शुश्रूषेत प्रयतो गुरुम्। तद्वृत्तिर्गुरुदारेषु गुरुपुत्रे तथैव च॥ 8॥ शिष्य को विद्या-ग्रहणपर्यन्त पूरे समय पूर्ण मनोयोग से गुरु की सेवा में अपने को समर्पित करना चाहिए। यही सेवा का भाव गुरुपत्नी और गुरुपुत्र के प्रति भी रखना चाहिए। ब्रह्मचारी चरेद्भैक्षमधः शाय्यनलङ्कृतः। जघन्यशायी सर्वेषां पूर्वोत्थायी गुरोर्गृहे॥ 9॥ गुरुकुल में रहने वाले शिष्य (अन्तेवासी) को अपने निवासकाल में निम्नोक्त नियमों का दृढ़ता से पालन करना चाहिए—1. ब्रह्मचर्य का पालन, अर्थात् स्त्री संग की इच्छा भी न करना और न ही इस विषय में सोचना, 2. भिक्षा से उदर- भरण करना, अर्थात् रुचिकर, स्वादिष्ट तथा मनचाहे भोजन के स्थान पर यथाप्राप्त से सन्तोष करना तथा याचक के रूप में विनम्रता तथा साधुवृत्ति—जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला—को अपनाना और दूसरों से मांगे अन्न पर जीते हुए समाज को लौटाने की भावना का पाठ पढ़ना, 3. भूतलशैया—रीढ़ की हड्डी को सुदृढ़ बनाना, 4. अलंकरण की इच्छा का त्याग तथा 5. गुरु-परिवार के सोने के उपरान्त सोना और जागने से पूर्व जागना। नासन्दिष्टः प्रतिष्ठेत तिष्ठेद्वा गुरुणा क्वचित्। सन्दिष्टः प्रतिकुर्वीत शक्तश्चेदविचारयन्॥ 10॥ गुरु का आदेश न मिलने तक शिष्य को उनके सामने उपस्थित रहना चाहिए। उनकी अनुमति प्राप्त किये बिना वहां से खिसक जाना कदापि उचित नहीं। गुरु के आदेश के औचित्य पर विचार किये बिना ही उसका पालन करना शिष्य का धर्म एवं कर्तव्य है। यथाकालमधीयीत यावन्न विमना गुरुः। आसीनोऽधो गुरोः पार्श्वे फलके वा समाहितः॥ 11॥ शिष्य को नियम एवं निश्चित समय पर अपना अध्ययन प्रारम्भ करना चाहिए और जब तक गुरु पठन पाठन को बन्द करने का आदेश नहीं देते, तब तक अध्ययन जारी रखना चाहिए। शिष्य को पाठ पढ़ते समय गुरु के सामने धरती पर आसन बिछाकर और संयत होकर बैठना चाहिए। 162 / नारदस्मृति
स्रोतोवहेव सर्वत्र विद्या निम्नानुसारिणी। निम्नवर्ती श्रवेत्तस्मात्तदर्थी सर्वदा गुरोः ॥ 12 ॥ जिस प्रकार नदी का जल सदैव नीचे की ओर प्रवाहित होता है, उसी प्रकार विद्या भी सदैव विनम्र व्यक्ति को प्राप्त होती है। अतः विद्यार्थी को उद्देश्य-सिद्धि के लिए सदैव ही गुरु के प्रति विनम्र एवं विनत बने रहना चाहिए। तब ही वह विद्या में प्रवीणता प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बना सकता है। अनुशास्यश्च गुरुणा न चेदनुविधीयते। अविधिनाथवा बद्ध्वा रज्ज्वा वेणुदलेन वा ॥ 13 ॥ शिष्य के धृष्ट, अविनीत तथा अनुशासनहीन होने पर उसे अनुशासित करना, सही मार्ग पर लाना, दिशा निर्देश देना गुरु का कर्तव्य-कर्म है। इसके लिए भले ही गुरु को शिष्य की डण्डे से पिटाई करनी पड़े अथवा रस्सी से बांधकर रखना पड़े, यह सब करने में संकोच नहीं करना चाहिए। वस्तुतः अपने शिष्य को सुसंस्कृत करने के लिए गुरु द्वारा कठोर पग उठाना शिष्य के हित-साधन के निमित्त ही होता है। इस सम्बन्ध में मनु का कथन दर्शनीय है- सामृतैः पाणिभिर्ध्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः। अर्थात् गुरु विष-भरे हाथों से नहीं, अपितु अमृतमय हाथों से पिटाई करते हैं। उनके द्वारा पिटाई करने का उद्देश्य शिष्य को सन्मार्ग पर लाना होता है। भृशं न ताडयेदेनं नोत्तमाङ्गे न वक्षसि। अनुशास्याय विश्वास्यः शास्यो राज्ञान्यथा गुरुः ॥ 14 ॥ गुरु को अपने शिष्य को अनुशासित करने के लिए उसकी पिटाई करते समय उसके उत्तम अंगों-वक्ष के ऊपर के अंगों-ग्रीवा, मस्तक, सिर, कान, नाक, गला आदि-पर कभी प्रहार नहीं करना चाहिए। ताड़ना का विधान केवल अनुशासनहीन छात्र के लिए है और उसका उद्देश्य छात्र को सही मार्ग पर लाना है। अनावश्यक एवं अनुचित रूप से छात्रों को दण्ड देने वाले अध्यापक को क्रूर मानकर प्रशासन द्वारा दण्डित करना चाहिए। समावृत्तश्च गुरवे प्रदाय गुरुदक्षिणाम्। प्रनीयात् स्वगृहानेषा शिष्यवृत्तिरुदाहृता ॥ 15 ॥ शिष्य का यह कर्तव्य कर्म है कि उसे अपनी शिक्षा-समाप्ति पर अपने गुरु को दक्षिणा से सन्तुष्ट करने के उपरान्त ही अपने घर को लौटना चाहिए। स्वशिल्पमिच्छन्नाहर्तुं बान्धवानामनुज्ञया। आचार्यस्य वसेदन्ते कालं कृत्वा सुनिश्चितम् ॥ 16 ॥ छात्र को अपने अभिभावकों, शुभचिन्तकों तथा बन्धु-बान्धवों से परामर्श करके ही शिक्षा की शाखा विशेष-वैद्यक, विज्ञान, कला, वाणिज्य, अनुसन्धान, नारदस्मृति / 163
शिल्प तथा यान्त्रिकी आदि—का चुनाव करना चाहिए। अभिमत शाखा की पाठ्यावधि के समाप्तिकाल तक उसे गुरुकुल में रहना चाहिए। आचार्यः शिक्षयेदेनं स्वगृहे दत्तभोजनम्। न चान्यत् कारयेत् कर्म पुत्रवच्चैनमाचरेत्॥ 17 ॥ आचार्य पिता बनकर अपने शिष्य का पुत्र के समान पालन-पोषण करता है। वह अपने शिष्य से कोई अन्य निजी कार्य न लेकर केवल विद्या-प्राप्ति के लिए अनुकूल सुविधाएं और परिवेश जुटाकर उसे उद्देश्य के प्रति समर्पित बनाता है। शिक्षयन्तमदुष्टं य आचार्यः सम्परित्यजेत्। बलाद्वासयितव्यः स्याद्बधबन्धौ च सोऽर्हति॥ 18 ॥ ईमानदारी से अपने शिष्यों को शिक्षित करने वाले तथा कठोरता से अनुशासन को लागू करने वाले गुरु का परित्याग करने वाले छात्र को बांधकर पीटना ही नहीं चाहिए, अपितु उसे बलपूर्वक गुरु के समीप लाकर शिक्षा-प्राप्ति के लिए बाध्य भी करना चाहिए। शिक्षितोऽपि कृतं कालमन्तेवासी समाप्नुयात्। तत्र कर्म च यत् कुर्यादाचार्यस्यैव तत् फलम्॥ 19 ॥ शिक्षा-प्राप्तिकाल में शिष्य के द्वारा किये गये कर्म—आविष्कार, मूर्ति, चित्र- निर्माण, वस्त्रों की सिलाई, खिलौने बनाना, फ़र्नीचर बनाना, लेख, पुस्तक लिखना, प्रतियोगिता में पुरस्कार पाना आदि के फल एवं लाभ पर गुरु का अधिकार होता है। शिष्य को शिक्षाकाल में अपने शारीरिक अथवा बौद्धिक श्रम से प्राप्त आय अपने गुरु को ही समर्पित कर देनी चाहिए। शिक्षा-समाप्ति के उपरान्त शिष्य के द्वारा गुरुकुल को छोड़कर अपने घर चले जाने पर, यदि उसके श्रम का कोई फल मिलता है या किसी सामान की बिक्री का धन आता है, किसी पुस्तक पर पुरस्कार मिलता है अथवा अन्य किसी प्रकार का सम्मान मिलता है, तो उस पर भी गुरु का ही अधिकार होता है। गृहीतशिल्पः समये कृत्वाचार्यप्रदक्षिणम्। शक्तिश्चानुमान्यैनमन्तेवासी निवर्तते॥ 20 ॥ शिष्य अपने निर्वाचित शिल्प, कला आदि विषय के निर्धारित पाठ्यक्रम को निश्चित अवधि में सम्पन्न करने के उपरान्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुरु को यथोचित दक्षिणा समर्पित करता है और फिर गुरु की अनुमति प्राप्त होने पर ही अपने घर को लौटता है। वेतनं वा यदि कृतं ज्ञात्वा शिष्यस्य कौशलम्। अन्तेवासी समादद्यान्न चान्यस्य गृहे वसेत्॥ 21 ॥ यदि शिक्षा-समाप्ति के उपरान्त गुरु शिष्य को रोक लेता है और उसका वेतन 164 / नारदस्मृति
निर्धारित करके उसे कोई काम सौंपता है, तो शिष्य को अनुकूल प्रतीत होने पर अपनी स्वीकृति देनी चाहिए और वेतन लेने में भी आनाकानी नहीं करनी चाहिए। हां, उस अवधि में उसे किसी के घर में न रहकर अपने आवास की व्यवस्था स्वयं करनी चाहिए। अभिप्राय यह है कि जब शिष्य वेतनभोगी है, तो उसे गुरुकुल में मुफ़्त आवास और भोजन पाने का कोई अधिकार नहीं रह जाता। यदि वह सुविधाओं का उपभोग करता है, तो फिर वेतन पाने के उसके अधिकार के आगे प्रश्नचिह्न लग जाता है। भृतकस्त्रिविधो ज्ञेय उत्तमो मध्यमोऽधमः । शक्तिभक्त्यनुरूपा स्यादेषां कर्माश्रया भृतिः ॥ २२ ॥ भृतक—वेतनभोगी—के तीन स्तर अथवा भेद हैं—उत्तम, मध्यम और अधम। आज की भाषा में प्रथम श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी, द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी तथा तृतीय श्रेणी के अराजपत्रित कर्मचारी। इनके वेतन निर्धारण के तीन आधार अथवा मापदण्ड हैं—1. शक्ति, अर्थात् कार्य करने की क्षमता, 2. भक्ति, अर्थात् कार्य के प्रति निष्ठा एवं समर्पण का भाव तथा 3. कर्म, अर्थात् कार्य का स्वरूप एवं महत्त्व। उत्तमस्त्वायुधीयोऽत्र मध्यमस्तु कृषीवलः। अधमो भारवाहः स्यादित्येष त्रिविधो स्मृतः ॥ २३ ॥ आयुधधारी, अर्थात् देश की रक्षा, शान्ति और व्यवस्था को बनाये रखने आदि कठोर दायित्व के निर्वहण के प्रति समर्पित तथा प्राणों का संकट झेलने को सदैव उत्तम श्रेणी का कर्म समझना चाहिए। कृषि, वाणिज्य और पशुपालन से देश की समृद्धि में योगदान, देशवासियों के भरण-पोषण का दायित्व निभाना मध्यम कर्म है। भार ढोना, लकड़ियां काटना, पानी भरना, धान्य साफ़ करना तथा वस्त्र- प्रक्षालन आदि सेवाकार्य अधम कर्म हैं। अर्थेष्वधिकृतो यः स्यात् कुटुम्बस्य तथोपरि। सोऽपि कर्मकरो ज्ञेयः स च कौटुम्बिकः स्मृतः ॥ २४ ॥ कुटुम्ब के सभी सदस्यों के भरण-पोषण का दायित्व निभाने वाला, कुटुम्ब की चल-अचल सम्पत्ति की देखभाल करने वाला तथा परिवार के लिए आय की व्यवस्था करने के लिए अधिकृत व्यक्ति भी कर्मकर माना जाता है। शुभकर्मकरास्त्वेते चत्वारः समुदाहृताः। जघन्यकर्मभाजस्तु शेषा दासास्त्रिपञ्चकाः ॥ २५ ॥ शुभ कर्मकरों के चार रूप-भेद हैं, शेष सारे भेद अशुभ कर्मकरों के हैं। दासों के पन्द्रह प्रकार-भेद हैं। नारदस्मृति / 165
गृहे जातस्तथा क्रीतो लब्धो दायादुपागतः । अनाकालभृतो लोके आहितः स्वामिना च यः ॥ २६ ॥ मोक्षितो महतश्चर्णात् प्राप्तो युद्धात् पणे जितः । तवाहमित्युपगतः प्रव्रज्यावसितः कृतः ॥ २७ ॥ भक्तादासश्च विज्ञेयस्तथैव वडवाहृतः । विक्रेता चात्मनः शास्त्रे दासाः पञ्चदश स्मृताः ॥ २८ ॥ शास्त्रों में दासों के निम्नोक्त पन्द्रह प्रकार बताये गये हैं- 1. घर के दास-दासी से उत्पन्न, 2. क्रीत, अर्थात् ख़रीदा गया, 3. लाभ के रूप में प्राप्त, अर्थात् व्यापार आदि में नक़दी के बदले मिला, 4. दाय के रूप में पितृ-परम्परा से प्राप्त, 5. दुर्भिक्ष आदि में पाला गया, सहारा दिया गया, 6. किसी के द्वारा बन्धक रखा गया, 7. भारी ऋण से मुक्त कराया गया, अर्थात् प्रत्युपकार के रूप में आया हुआ, 8. युद्ध में पराजित राजा से छीना गया अथवा बन्दी बनाया गया, 9. अपनी आवश्यकतावश शरण में आया हुआ, 10. संन्यास आश्रम से भ्रष्ट, 11. निश्चित समय के लिए अनुबन्धित, 12. पूरा जीवन अपने भरण-पोषण के बदले घर में सेवा करने वाला, 13. दासी द्वारा अपने साथ लाया गया, 14. शर्त में जीता गया तथा 15. अपने को बेचने वाला। तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो दासत्वान्न विमुच्यते । प्रसादाद्धनिनोऽन्यत्र दास्यमेषां क्रमागतम् ॥ २९ ॥ उपर्युक्त पन्द्रह प्रकार के दासों में प्रथम चार- 1. घर में उत्पन्न, 2. क्रीत, 3. लाभ के रूप में प्राप्त तथा 4. दाय के रूप में प्राप्त वंशानुगत होने से स्वामी से प्रसन्न हो जाने पर भी, अर्थात् उसके चाहने पर भी दासत्व से मुक्त नहीं हो सकते। यश्चैषां स्वामिनं कश्चिन्मोक्षयेत् प्राणसंशयात् । दासत्वात् स विमुच्येत पुत्रभागे लभेत च ॥ ३० ॥ अपने प्राणों को संकट में डालकर, स्वामी के प्राणों की रक्षा करने वाला दास न केवल दासत्व से मुक्त हो जाता है, अपितु स्वामी का पुत्रतुल्य होकर उसकी सम्पत्ति के भाग को पाने का अधिकारी भी बन जाता है। अनाकालभृतो दास्यान्मुच्यते गोयुगं ददत् । संरक्षितं यद्दुर्भिक्षं न तच्छुष्येत कर्मणा ॥ ३१ ॥ अकाल में पाला-पोसा जाने से दास बना व्यक्ति दीर्घकाल तक स्वामी की सेवा करने पर भी दासत्व से मुक्त नहीं हो सकता है। हां, सामर्थ्य जुटाने पर गाय बैल आदि देकर मुक्ति-लाभ कर सकता है। आहितोऽपिधनं दत्वा स्वामी यद्येनमुद्धरेत् । अथोपगमयेदेनं स विक्रीतादनन्तरः ॥ ३२ ॥ 166 / नारदस्मृति
बन्धक में आया दास, उसके मूलस्वामी द्वारा धन चुकाने पर मुक्त हो जाता है। हां, उसके मूलस्वामी द्वारा निश्चित अवधि में ऋण न चुका सकने पर वह 'क्रीतदास' बन जाता है। ऋणं तु सोदयं दत्वा ऋणी दास्यात् प्रमुच्यते। कृतकालव्यपगमात् कृतकोऽपि विमुच्यते ॥ 33 ॥ भारी ऋण से मुक्त किया गया और प्रत्युपकार के रूप में दास बना व्यक्ति, ब्याज समेत ऋण राशि को चुका देने पर दासत्व से मुक्त हो सकता है। इसी प्रकार निश्चित अवधि के लिए दासत्व के रूप में अनुबन्धित व्यक्ति अवधि बीतने पर अपने आप मुक्त समझा जाता है। तवाह्मित्युपगतो ध्वजप्राप्तः रणार्जितः। प्रतिशीर्षप्रदानेन मुच्यते तुल्यकर्मणा ॥ 34 ॥ स्वयं अपने को दासत्व के लिए सौंपने वाले तथा युद्ध में बन्दी बनाकर लाये गये दास, स्थिति बदलने पर, अर्थात् अपना पेट भरने को समर्थ होने पर तथा राजाओं में सन्धि समझौता हो जाने पर दासत्व से मुक्त हो जाते हैं। राज्ञामेव तु दासः स्यात् प्रव्रज्यावसितो नरः। न तस्य विप्रमोक्षोऽस्ति न विशुद्धिः कथञ्चन ॥ 35 ॥ भ्रष्ट संन्यासी—संन्यास आश्रम में रहते हुए अपने ऊपर संयम न रख पाने वाला—राजा का दास होता है। ऐसे नीच पुरुष के लिए न कोई प्रायश्चित्त है और न ही कोई मुक्ति है। भक्तस्योपेक्षणात् सद्यो भक्तदासः प्रमुच्यते। निग्रहाद्वडवानां तु मुच्यते वडवाहृतः ॥ 36 ॥ जीवन-भर भरण-पोषण की आशा से दास बना व्यक्ति उपयुक्त भरण-पोषण न मिलने पर दासकर्म को छोड़ सकता है। इसी प्रकार दासी द्वारा अपने साथ लाया होने से दास बना उसका बेटा भी मां की मुक्ति के साथ अपने आप मुक्त हो जाता है। विक्रीणीते य आत्मानं स्वतन्त्रः सन्नराधमः। स जघन्यतरस्तेषां नैव दास्यात् प्रमुच्यते ॥ 37 ॥ अपनी स्वतन्त्रता को स्वयं परतन्त्रता में बदलने वाला, अर्थात् अपने को बेचने वाला अधम एवं जघन्य पुरुष कभी दासत्व से मुक्त नहीं हो पाता। चौरापहृतविक्रीता ये च दासीकृता बलात्। राज्ञा मोक्षयितव्यास्ते दासत्वं तेषु नेष्यते ॥ 38 ॥ चोरों के द्वारा अपहरण करके दास के रूप में बेचे जाने वाले अथवा बलपूर्वक दास बनाये जाने वाले, राजा द्वारा मुक्त करा दिये जाते हैं, उन्हें अधिक समय तक नारदस्मृति / 167
दास बनाकर नहीं रखा जा सकता। वर्णानां प्रातिलोम्येन दासत्वं न विधीयते। स्वधर्म त्यागिनोऽन्यत्र दारवद्दासता मता ॥ ३९॥ जिस प्रकार निम्न वर्ण वाले पुरुष को उत्तम वर्ण की स्त्री से विवाह सम्बन्ध का अधिकार नहीं है (उत्तम वर्ण की ब्राह्मण स्त्री निम्न वर्ण के शूद्र पुरुष से सम्बन्ध जोड़ती है, तो उसे अपनी जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है) उसी प्रकार उच्च वर्ण के व्यक्ति को निम्न वर्ण के व्यक्ति द्वारा दास नहीं बनाया जा सकता। शूद्र तथा वैश्य द्वारा ब्राह्मण व क्षत्रिय से दास के रूप में काम लेना वर्जित है। तवाहमिति चात्मानं योऽस्वतन्त्रः प्रयच्छति। न स तं प्राप्नुयात् नाम पूर्वस्वामी लभेत तम्॥ ४० ॥ पहले से ही किसी के अधीन व्यक्ति (दूसरे के दास) द्वारा किसी अन्य व्यक्ति का दासत्व स्वीकार करने को मान्य नहीं किया जा सकता, अर्थात् दास को अपने पूर्व स्वामी को छोड़ने का और नया स्वामी चुनने का कोई अधिकार नहीं है। पुराना स्वामी अपने दास के नये स्वामी के पास होने का पता चलने पर, उसे बलपूर्वक वहां से अपने पास वापस ले जा सकता है। अधनास्त्रय एवोक्ताः भार्या दासस्तथा सुतः। यत्तु समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ॥ ४१॥ तीनों—स्त्री, पुत्र और दास—को निजी धन रखने का कोई अधिकार नहीं, अतः इनके द्वारा किया गया व्यापार-धन्धा तथा उससे अर्जित लाभ उसी का होता है, जिसके ये होते हैं, अर्थात् स्त्री, पुत्र और दास की सम्पत्ति पर क्रमशः पति, पिता और स्वामी का अधिकार होता है। स्वदासमिच्छेद् यः कर्तुमदासं प्रीतमानसः। स्कन्धादादाय तस्यासौ भिद्यात् कुम्भ सहाम्भसा ॥ ४२ ॥ साक्षताभिः सपुष्पाभिर्मूर्ध्न्यद्भिरवाकिरेत्। अदास इति चोक्त्वा त्रिः प्राङ्मुखं तमथोत्सृजेत् ॥ ४३ ॥ अपनी प्रसन्नता एवं उदारता से दास को दासत्व से मुक्त करने के इच्छुक स्वामी को जल से पूर्ण कलश दास के कन्धे से गिरा फोड़कर ऐसी घोषणा करनी चाहिए। इसके साथ अक्षत और पुष्प युक्त जल को दास के मस्तक से छुआकर गिराते हुए तीन बार बोलना चाहिए—अब तुम दास नहीं हो। इसके उपरान्त दासता से मुक्त हुए पुरुष को तत्काल पूर्व दिशा की ओर चल देना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का पञ्चम प्रकरण समाप्त ॥ 168 / नारदस्मृति
- परिभाषित-अपरिभाषित वेतन विधि भृत्यानां वेतनस्योक्तो दानादानविधिक्रमः । वेतनस्यानपाकर्म तद्विवादपदं स्मृतम् ॥ 1 ॥ आजीविका के लिए सेवाकार्य करने वाले कर्मचारियों-अधिकारियों के वेतन के भुगतान का नाम भी विधि है और इस भुगतान को रोकना, नकारना तथा टालना आदि विवाद का विषय है। भृत्याय वेतनं दद्यात् कर्मस्वामी यथाक्रमम् । आदौ मध्येऽवसाने वा कर्मणो यद्विनिश्चितम् ॥ 2 ॥ सेवाकार्य के भुगतान के अनेक रूप हैं- 1. पूरी निर्धारित राशि प्रारम्भ में ही दे देना, 2. निर्धारित पारिश्रमिक का कुछ अंश प्रारम्भ में, कुछ मध्य में और कुछ कार्य-समाप्ति पर देना, 3. सारा भुगतान कार्य-समाप्ति पर करना तथा 4. कुछ पारिश्रमिक आधा कार्य हो जाने पर और कुछ पूरा कार्य निपट जाने पर देना। ये सभी रूप प्रचलित हैं। जिसे जो अनुकूल लगता हो, उसे वही अपनाना चाहिए। भृत्यावनिश्चितायां तु दशभागं समाप्नुयुः । लाभगोबीजशस्यानां वणिग्गोपकृषीवलाः ॥ 3 ॥ वेतन अथवा पारिश्रमिक निर्धारित किये बिना ही कार्य पर लगाये गये भृत्य को व्यापारी द्वारा अपने लाभ का, गोपाल द्वारा अपने दुग्ध, दधि तथा नवनीत आदि गव्य द्रव्यों का तथा कृषक द्वारा अपनी उपज - फल, सब्जी तथा धान्य आदि - का दशम भाग देय होता है। क्रियोपकरणं चैषां क्रियां मत्प्रत्युदाहृतम् । तत्स्वभावेन कुर्वीत न जिह्येन समाचरेत् ॥ 4 ॥ तकनीकी कर्मचारियों को काम में आने वाले उपकरणों (ट्रेक्टर आदि मशीनें) का ईमानदारी और सही ढंग से प्रयोग करना चाहिए। इसमें कुटिलता बरतनी धूर्तता ही नहीं, पाप भी है। किसी यन्त्र को जान-बूझकर ख़राब कर देना, बिगड़े और ठीक हो सकने वाले यन्त्र को ठीक न करना तथा ठीक करने में अनुचित ख़र्च कराना, अपने व्यवसाय के साथ विश्वासघात करना है। कर्मचारी को अपनी सत्यनिष्ठा से अपने स्वामी का विश्वास जीतना चाहिए। नारदस्मृति / 169
कर्माकुर्वन् प्रतिश्रुत्य कार्यो दत्वा भृतिं बलात्। भृतिं गृहीत्वाऽकुर्वाणो द्विगुणं भृतिमावहेत् ॥ ५॥ काम करने के लिए पारिश्रमिक निश्चित करके तथा पेशगी लेकर अथवा न लेकर काम न करने वाले को निश्चित राशि देकर उससे बलपूर्वक काम कराना चाहिए और उसे काम करना चाहिए। काम करने से आनाकानी करने वाले से निर्धारित पारिश्रमिक से दुगुनी राशि दण्ड के रूप में वसूल करनी चाहिए। भृतिषड्भागमादद्यात् पण्यं युग्यकृतं त्यजन्। अददत् कारयित्वा तु सोदयां भृतिमावहेत् ॥ ६ ॥ व्यापारिक सामान के परिवहन—गाड़ी, छकड़ा, नौका, रथ, गज तथा अश्व— का, अर्थात् एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने का अनुबन्ध करके सामान न पहुंचाने वाले अथवा मार्ग में ही कहीं छोड़ देने वाले से निश्चित किराये का छठा भाग दण्ड के रूप में वसूल करना चाहिए। इसी प्रकार, यदि सामान का स्वामी निश्चित भाड़ा समय पर नहीं देता है, तो उसे ब्याज समेत भुगतान करना चाहिए। अनयन् भाटयित्वा तु भाण्डवान् यानवाहने। दाप्यो भृतिचतुर्भागं सममर्धपथे त्यजन्॥ 7 ॥ यान (ट्रक-टैम्पू आदि अथवा वाहन-बैल-गाड़ी, भैंसा-गाड़ी आदि) अथवा वाहन को किराये पर लेने की बात पक्की करके, न लेने वाले को निश्चित किये गये किराये का चौथा भाग क्षतिपूर्ति के रूप में वाहन के स्वामी को देना चाहिए। भाड़े पर लिये वाहन को बीच रास्ते में छोड़ देने पर सवार को पूरे भाड़े का भुगतान करना चाहिए। अनयन्वाहकोऽप्येवं भृतिहानिमवाप्नुयात्। द्विगुणां तु भृतिं दाप्यः प्रस्थाने विघ्नमाचरन्॥ 8 ॥ वाहन लेने के लिए वचनबद्ध होकर, वाहन न लेने वाले द्वारा वाहन के स्वामी को दूसरे व्यक्ति को न बिठाने से हुई क्षति की पूर्ति करनी चाहिए। इसी प्रकार वाहन देने को वचनबद्ध होकर मुकरने अथवा प्रस्थान में विघ्न डालने वाले वाहनचालक को निश्चित किये गये भाड़े से दुगुनी रकम दण्ड के रूप में देनी चाहिए। भाण्डं व्यसनमागच्छेद्यदि वाहकदोषतः। स दाप्यो यत्प्रणष्टं स्याद्दैवराजकृतादृते॥ 9 ॥ दैवी आपत्ति—भूकम्प, दुर्घटना तथा तस्करों का उत्पात आदि तथा राजकीय संकट—वाहन द्वारा मार्ग-शुल्क (रोड-टैक्स) आदि चुकता न होने से वाहन को जाने की अनुमति न देना आदि—को छोड़कर चालक के दोष से सवार को होने वाली हानि—सामान चुराया जाना, चालक की दुरभिसन्धि से उसके द्वारा सिखाये 170 / नारदस्मृति
धूर्तों द्वारा लूट-पाट करना आदि-की पूर्ति का दायित्व चालक का ही होता है। चालक को सवार के नष्ट द्रव्य का भुगतान करना ही होता है। गवां शताद्वत्सतरी धेनुः स्याद्द्विशताद् भृतिः। प्रति संवत्सरं गोपे सन्दोहश्चाष्टमेऽहनि ॥ 10 ॥ एक सौ गायों को एक वर्ष तक चराने-दिन-भर वन में घुमाने के पारिश्रमिक- के रूप में ग्वाले को दूध देने वाली एक युवा गाय देनी चाहिए। दो सौ गायों को पूरा वर्ष चराने का शुल्क बछड़े समेत एक स्वस्थ-पुष्ट गाय है। इस प्रकार आठ दिनों तक गाय को दोहने का शुल्क आठवें दिन का दुग्ध है। उपानयेद् गां गोपाय प्रत्यहं रजनीक्षये। चीर्णाः पीताश्च ता गोपः सायाह्ने प्रत्युपानयेत् ॥ 11 ॥ गोपाल को प्रतिदिन गायों के स्वामी से गायों को लेकर उन्हें वन में घुमाना चाहिए। दोपहर में गायों को भोजन और पानी आदि पिलाना और सायंकाल वापस पहुंचाना चाहिए। सा चेद् गौर्व्यसनं गच्छेद्व्यायच्छेत्तत्र शक्तितः। अशक्तस्तूर्णमागत्य स्वामिने तन्निवेदयेत् ॥ 12 ॥ गोचारण के समय किसी गाय के विपत्तिग्रस्त-घायल होना, गड्ढे में गिरना, हिंसक सिंह-व्याघ्र आदि का शिकार बनना अथवा किसी विषैले जन्तु द्वारा काटा जाना आदि-होने पर अपनी शक्ति के अनुसार उसकी रक्षा, उपचार आदि करना गोपाल का धर्म एवं दायित्व है। स्थिति गम्भीर होने पर गोपाल द्वारा गाय के स्वामी को यथाशीघ्र सूचित करना चाहिए और अस्वस्थ गाय उसके स्वामी को लौटा देनी चाहिए। अव्यायच्छन्नविक्रोशन् स्वामिने चानिवेदयन्। वोढुमर्हति गोपस्तां विनयं चापि राजनि ॥ 13 ॥ विपत्तिग्रस्त गाय की सेवा-शुश्रूषा न करने वाले तथा गाय के स्वामी को सूचित न करने वाले, अर्थात् पूर्णतः उदासीन गोपालक से गाय के मूल्य की राशि (एक सौ रुपया, आजकल तीन-चार हजार रुपया) क्षति-पूर्ति के रूप में वसूल करनी चाहिए तथा प्रशासन द्वारा उसे दण्ड-जेल, कोड़े लगाना अथवा कठोर श्रम कराना आदि-भी देना चाहिए। नष्टंविनष्टं कृमिभिः श्वहतं विषमे मृतम्। हीनं पुरुषकारेण पालएव निपातयेत् ॥ 14 ॥ गाय के खो जाने पर, सर्पादि द्वारा काटने अथवा कुत्तों द्वारा घायल किये जाने पर तथा उसका यथोचित एवं यथाशीघ्र उपचार न किये जाने से मर जाने पर गोपालक को उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। नारदस्मृति / 171
अजाविके तथारुद्धे वृकैः पाले त्वनायति। यां प्रसह्म वृको हन्यात् पाले तत् किल्विषं भवेत् ॥ 15 ॥ व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओं द्वारा घेरकर मारी गयी तथा किसी व्याध आदि द्वारा बाँधी गयी भेड़-बकरी के मर जाने पर पशुपालक को ही उत्तरदायी ठहराया जाता है; क्योंकि उसकी उपेक्षा से ही भेड़ बकरी झुण्ड से अलग हो गयी और शिकारी का शिकार बन गयी। इसके लिए उसे मृत पशु का न केवल मूल्य चुकाना होता है, अपितु कोताही के लिए दण्ड भी भुगतना होता है। विधुस्यापहृतं चौरैर्न पालो दातुमर्हति। यदि देशे च काले च स्वामिनश्चापि शंसति ॥ 16 ॥ चोरों द्वारा बलपूर्वक पशुओं का अपहरण किये जाने की सम्बद्ध स्वामियों और अधिकारियों को यथाशीघ्र सूचना देने वाला गोपालक पशुओं की हानि के लिए उत्तरदायी नहीं होता। अनेन सर्वपालानां विवादः समुदाहृतः। मृतेषु च विशुद्धिः स्याद्बालशृङ्गादिदर्शनात् ॥ 17 ॥ इसी प्रकार किसी पशु की अपनी ही चञ्चलता से मृत्यु हो जाने पर मृत पशु के बाल, सींग आदि लाकर दिखाने वाले गोपालक से क्षतिपूर्ति की मांग नहीं की जा सकती। पशुपालों के सम्भावित विवादों का विवरण इतना ही है। शुल्कं गृहीत्वा पण्यस्त्री नेच्छन्ती द्विस्तदाप्नुयात्। अप्रयच्छंस्तदा शुल्कमनुभूय पुमान् स्त्रियम् ॥ 18 ॥ किसी पुरुष से सम्भोग शुल्क लेकर उसे अंग-सुख देने से इनकार करने वाली वेश्या को वसूल किये गये शुल्क का दुगुना लौटाना होता है। इसी प्रकार वेश्या को सम्भोग के उपरान्त शुल्क देने का वचन आश्वासन देकर, फुसलाकर सम्भोग करने और फिर शुल्क न चुकाने वाले पुरुष से भी दुगुना शुल्क वसूल करना चाहिए। अयोनौ वा समाक्रामेद्बहुभिर्वापि वासयेत्। शुल्कं सोऽष्टगुणं दाप्यो विनयं तावदेव तु ॥ 19 ॥ किसी वेश्या को भोग के लिए अनुबन्धित करके उसकी योनि के अतिरिक्त अन्यान्य अंगों-मुख, गुदा आदि-में लिंग प्रवेश करने वाले तथा अपने लिए अनुबन्धित वेश्या को अपने माथियों से भी भोग कराने को विवश करने वाले से निश्चित शुल्क का आठ गुना वसूल करना चाहिए। पराजिरे गृहं कृत्वा स्तोमं दत्त्वा वसेत्तु यः। स तद्गृहीत्वा निर्गच्छेत्तृणकाष्ठेष्टकादिकम् ॥ 20 ॥ 172 / नारदस्मृति
किराये के मकान में मकान-मालिक की अनुमति से अपने ख़र्च पर अस्थायी निर्माण करने वाले व्यक्ति को मकान छोड़ते समय निर्माण से सम्बन्धित सामान- लकड़ी, ईंटें, दरवाज़ा आदि-ले जाने का पूरा अधिकार है। स्तोमं विना वसित्वा तु परभूमावनिच्छतः। निर्गच्छंस्तृणकाष्ठानि न गृह्णीयात् कदाचन ॥ २१ ॥ मकान-मालिक की अनुमति तथा जानकारी के बिना किराये के मकान में किसी प्रकार का निर्माण करने वाले व्यक्ति को मकान छोड़ने पर कोई भी सामान ले जाने का अधिकार नहीं होता। अस्थायी निर्माण मकान-मालिक की सम्पत्ति माना जाता है। स्तोमवाहीनि भाण्डानि पूर्णकालान्युपानयेत्। गृहीतुराभवेद्भग्नं नष्टं चान्यत्र सम्प्लवात् ॥ २२ ॥ सामान पहुंचाने का किराया लेकर निश्चित समय में सामान न पहुंचाने वाले को, किसी वस्तु के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने की भरपाई करनी होती है। उदाहरणार्थ, फल-सब्जी का सड़-गल जाना, दूध-दही का फट जाना, खट्टा हो जाना, फ्रिज में ख़राबी आ जाना आदि। हां, दैवी आपत्ति-बिजली चले जाना, टायर फट जाना अथवा दुर्घटना हो जाना अथवा घोड़े या बैल आदि का गिर पड़ना आदि तथा राजकीय संकट-पुलिस द्वारा रोकना, रास्ता बन्द होना, चक्कर काटकर जाने को विवश होना आदि-में सञ्चालक का दोष न होने के कारण उसे हानि के लिए उत्तरदायी नहीं माना जा सकता। ॥ चतुर्थ अध्याय का षष्ठ प्रकरण समाप्त ॥
नारदस्मृति / 173
- अस्वामिविक्रय निक्षिप्तं वा परद्रव्यं नष्टं लब्ध्वापहृत्य वा। विक्रीयेऽसमक्षं यद्विनेयोऽस्वामिविक्रयः॥ 1 ॥ दूसरे व्यक्ति द्वारा विश्वास करके धरोहर के रूप में रखे सामान को, किसी के बन्धक में पड़े सामान को, किसी के खोये हुए सामान को प्राप्त करके या किसी के सामान को चुराकर या बलपूर्वक छीनकर अथवा छल करके किसी को बेच देना, अर्थात् अपना स्वामित्व न रखने पर भी स्वामी-जैसा व्यवहार करना 'अस्वामिविक्रय' कहलाता है। द्रव्यमस्वामिविक्रीतं प्राप्य स्वामी समाप्नुयात्। प्रकाशविक्रये शुद्धिः क्रेतुः स्तेयं रहः क्रयात्॥ 2 ॥ अस्वामिविक्रीत सामान की खोज-ख़बर लगने पर वास्तविक स्वामी अपने सामान को क्रेता से वापस ले सकता है। सार्वजनिक रूप से क्रेता को चोरी का माल ख़रीदने का दोष नहीं दिया जा सकता। हां, लुक-छिपकर बेचे गये सामान को ख़रीदने वाला अवश्य दोषी माना जाता है। अस्वाम्यनुमताद्दासादसतश्च जनाद्रहः। हीनमूल्यमवेलायां क्रीणंस्तद्दोषभाग् भवेत्॥ 3 ॥ निम्नोक्त क्रेताओं को दोषी मानना चाहिए-1. स्वामी की अनुमति के बिना सामान बेचने वाले दास से ख़रीदने वाला, 2. सामान बेच रहे बच्चों से ख़रीदने वाला, 3. लुक-छिपकर एकान्त में दूसरों की दृष्टि को बचाकर बेचने वाले से ख़रीदने वाला, 4. असमय, रात के अंधेरे में, निर्जन स्थान में बेचे जा रहे सामान को ख़रीदने वाला। मूल स्वामी को ऐसे क्रेताओं से न केवल सामान वापस लेने का पूरा अधिकार होता है, अपितु ऐसे क्रेता दण्ड के भागी भी होते हैं। न गृहीतागमं क्रेता शुद्धिस्तस्य तदागमात्। विपर्यये तुल्यदोषः स्तेयदण्डं च सोऽर्हति॥ 4 ॥ बेचने वाले के सामान के वास्तविक स्वामी होने की पुष्टि के लिए क्रय- विक्रय को सार्वजनिक करने वाला किसी प्रकार दोषी नहीं माना जा सकता। अभिप्राय यह है कि यदि क्रेता किसी प्रामाणिक व्यक्ति अथवा संस्था-पञ्च, 174 / नारदस्मृति
सरकारी अधिकारी, पुलिस आदि को सूचित करके अथवा साक्षी बनाकर सामान ख़रीदता है और सामान के स्वामी होने का दम भरने वाला कपटी सबके सामने सामान बेचने का साहस जुटाता है, तो वास्तविकता का पता चलने पर क्रेता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हां, ऐसा न करने वाले, अर्थात् सामान को चोरी- छिपे सस्ता बिकता देखकर या लोभ में आकर, चोरी-छिपे ख़रीदने वाला अवश्य दोषी होने से चोर के समान दण्ड पाने के योग्य है। विक्रेता स्वामिनेऽर्थं स्वं क्रेत्रे मूल्यं च तत्समम्। दद्याद्दण्डं तथा राज्ञे विधिरस्वामिविक्रये ॥ ५ ॥ स्वामी न होने पर भी स्वामी बनकर दूसरों के द्रव्य को बेचने वाले को पकड़े जाने पर, उसे मूलस्वामी को उसका न केवल द्रव्य लौटाना चाहिए, क्रेता से वसूल किया धन भी उसे वापस करना चाहिए, अपितु सामान के मूल्य के बराबर अर्थदण्ड (जुर्माना) भी राजकोष में जमा कराना चाहिए, अन्यथा ऐसा न करने वाले को बन्दी बनाकर कारावास में डाल देना चाहिए। परेण निहितं लब्ध्वा राजन्युपहरेन्निधिम्। राजगामी निधिः सर्वः सर्वेषां ब्राह्मणादृते ॥ ६ ॥ किसी अन्य की गिरी-पड़ी सम्पत्ति को पाने वाले को वह सम्पत्ति सरकार को सौंप देनी चाहिए। राजा ब्राह्मण द्वारा प्राप्त सम्पत्ति को छोड़कर अन्य सभी वर्गों द्वारा प्राप्त सम्पत्ति को अपने अधिकार में लेने में पूर्ण समर्थ है। वस्तुतः प्रजाजनों की निजी सम्पत्ति की रक्षा करने का दायित्व निभाने वाला राजा भी तो एक प्रकार से स्वामी ही होता है। फिर स्वामी-विहीन सम्पत्ति का तो वह स्वभावतः एकमात्र स्वामी है। ब्राह्मणोऽपि निधिं लब्ध्वा क्षिप्रं राज्ञे निवेदयेत्। तेन दत्तं च भुञ्जीत स्तेनः स्यादनिवेदयन् ॥ ७ ॥ ब्राह्मण को भी किसी अन्य की गिरी-पड़ी सम्पत्ति मिलने पर उसे राजा को सौंप देना चाहिए। यदि राजा वह सम्पत्ति ब्राह्मण को भोगने के लिए दे देता है, तो ब्राह्मण उसके भोग को स्वतन्त्र है, परन्तु बिना राजा को सूचित-निवेदित किये पराई वस्तु पर अपना अधिकार मान लेने वाला ब्राह्मण भी चोर कहलाता है। स्वमप्यर्थं तथा नष्टं लब्ध्वा राज्ञे निवेदयेत्। गृह्णीयात्तत्र तं शुद्धमशुद्धं स्यात्ततोऽन्यथा ॥ ८ ॥ यदि अपना खोया हुआ धन व सामान भी मिल जाता है, तो भी राजा को सूचित निवेदित करना चाहिए। राजा द्वारा अनुग्रहपूर्वक दे देने पर उसका भोग न्यायसंगत है, अन्यथा वह भी एक प्रकार की चोरी है और दण्डनीय अपराध है। नारदस्मृति / 175
॥ चतुर्थ अध्याय का सप्तम प्रकरण समाप्त ॥
टिप्पणी — यदि खोये हुए सामान की सूचना— एफ. आई. आर. (प्रथम सूचना प्रतिवेदन) सरकार के पास दर्ज करायी जाती है, तो फिर सामान मिल जाने की सूचना भी सरकार को देना नागरिक का कर्तव्य बनता है, अन्यथा पुलिस खोये हुए माल की खोज में लगी रहेगी और मालिक सामान मिल जाने से निश्चिन्त हो जायेगा। इसे धोखाधड़ी मानकर ही यह उचित निर्देश दिया गया है। ॥ चतुर्थ अध्याय का सप्तम प्रकरण समाप्त ॥ 176 / नारदस्मृति
- विक्रीय-असम्प्रदान विक्रीय पण्यं मूल्येन क्रेत्रे यन्न प्रदीयते। विक्रीयासम्प्रदानं तद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥ सामान बेचकर और उसका दाम वसूल करने के उपरान्त बेचा हुआ सामान क्रेता को न सौंपना 'विक्रीय-असम्प्रदान' झगड़े का मामला कहलाता है। लोकेऽस्मिन् द्विविधं द्रव्यं जङ्गमं स्थावरं तथा। क्रयविक्रयधर्मेषु सर्वं तत् पण्यमुच्यते ॥ 2 ॥ लोक में क्रय-विक्रय किये जाने वाले पदार्थों के दो रूप हैं—1. चल सम्पत्ति-गज, रथ, अश्व, नक़दी, स्वर्ण-रजत तथा दास आदि।
- अचल सम्पत्ति- धरती, मकान, दुकान, खेत तथा गोदाम आदि। इन दोनों सम्पत्तियों के क्रय-विक्रय योग्य होने से इन्हें 'पण्य' नाम दिया जाता है। षड्विधस्तस्य तु बुधैर्दानादानविधिः स्मृतः। गणितं तुलिमं मेयं क्रियया रूपतः श्रिया ॥ 3 ॥ विद्वानों ने पण्य के क्रय-विक्रय (लेन-देन) के छह आधार निर्धारित किये हैं- गणितं- गिनकर देना, दर्जन के भाव, कोड़ी के भाव। तुलिम-तौलकर बेचना, किलोग्राम, टन, क्विण्टल के भाव। मेय-मापकर बेचना, गज़, फुट, मीटर के भाव। क्रिया-कार्यक्षमता के आधार पर मूल्य निर्धारित कर बेचना, तीव्रगति और मन्दगति के अश्व का ऊंचा-नीचा दाम लगाना। रूप-वस्तु के सौन्दर्य के आधार पर दाम वसूल करना। कन्या के अथवा दासी के रूप-सौन्दर्य और आकर्षण के आधार पर उसका न्यूनाधिक मूल्य निर्धारित करना। श्री, अर्थात् दीप्ति-चमक-रत्नों, हीरे-मोतियों तथा मणियों की आभा के आधार पर एवं उनकी उत्कृष्टता-निकृष्टता के अनुरूप मूल्य निर्धारित करना। टिप्पणी-जड़ पदार्थों की श्री को ही चेतन प्राणियों का रूप-सौन्दर्य समझना चाहिए। दोनों में समान रूप से आकर्षण होता है। विक्रीय पण्यं मूल्येन क्रेत्रे यो न प्रयच्छति। स्थावरस्योदयं दाप्यो जङ्गमस्य क्रियाफलम् ॥ 4 ॥ नारदस्मृति / 177
सामान बेचकर, अर्थात् सौदा पक्का करके क्रेता को तत्काल सामान न सौंपने वाले विक्रेता से, क्रेता द्वारा चुकाये गये मूल्य के साथ उस अवधि में चल वस्तु— वस्त्र, आभूषण-आदि की स्थिति-रूप, रंग, चमक-दमक आदि में आये परिवर्तन तथा बाज़ार में उसके मूल्य में आयी कमी आदि-के अनुरूप अर्थदण्ड वसूल करना चाहिए तथा अचल सम्पत्ति के उपभोग से विक्रेता द्वारा प्राप्त सुविधा का मूल्य क्रेता को दिलाना चाहिए। अर्थश्चेदपचीयेत सोदयं पण्यमावहेत्। स्थायिनामेष नियमो दिग्लाभो दिग्विचारिणाम् ॥ 5 ॥ सामान बेचने का सौदा पक्का करके विक्रेता पूरा सामान तत्काल न देकर कालान्तर में (सारा अथवा कुछ) देने को कहता है और इस अवधि-सामान का मूल्य निश्चित करने और सामान देने के मध्य के समय-में, यदि सामान का भाव गिर जाता है और क्रेता की लाभ की सम्भावना धूमिल हो जाती है, तो उसकी क्षतिपूर्ति का दायित्व विक्रेता पर है, यदि विक्रेता ने तत्काल सामान की आपूर्ति कर दी होती, तो क्रेता उस समय के बाज़ार-भाव पर सामान बेचकर लाभ कमा सकता था। विक्रेता द्वारा माल न देने से, अब क्रेता को हानि उठानी पड़ेगी। अतः क्रेता की हानि का उत्तरदायी विक्रेता ही है। उपर्युक्त व्यवस्था स्थायी क्रेता के लिए है। देश-देशान्तर में घूमने-फिरने वाले और विभिन्न स्थानों से अपनी सुविधा से क्रय-विक्रय करने वाले अस्थायी ग्राहकों पर विभिन्न देशों में प्रचलित नियम लागू होता है अथवा आपस में निश्चित व्यवस्था ही लागू होती है, अर्थात् क्रेता-विक्रेता में जो शर्तें निश्चित हो जाती हैं, उन्हीं का पालन किया जाता है। उपहन्येत वा द्रव्यं दह्येतापह्रियेत् वा। विक्रेतुरेव सोऽनर्थो विक्रीयासम्प्रयच्छतः॥ 6 ॥ सामान को बेचने का सौदा पक्का करके क्रेता को सामान न देने वाले विक्रेता के सामान के चोरी हो जाने पर, गल जाने पर, सड़ जाने पर, नष्ट हो जाने पर, आग लग जाने पर तथा राजा द्वारा अधिग्रहण कर लिये जाने पर सब प्रकार की हानि विक्रेता की होती है, क्रेता को उस हानि से कुछ लेना-देना नहीं होता; क्योंकि समय पर क्रेता को सामान न देने का दोषी विक्रेता ही है। निर्दोषं दर्शयित्वा तु सदोषं यः प्रयच्छति। मूल्यं तु द्विगुणं दाप्यो विनयं तावदेव च ॥ 7 ॥ उत्तम स्तर का सामान दिखाकर निकृष्ट स्तर का माल बेचने वाले व्यापारी से न केवल चुकाये गये दाम का दुगुना वसूल करना चाहिए, अपितु उसे राजदण्ड द्वारा अनुशासित भी करना चाहिए। 178 / नारदस्मृति
तथान्यस्मै तु विक्रीतं योऽन्यस्मै सम्प्रयच्छति। सोऽपि तद्द्विगुणं दाप्यो विनयं चैव राजनि॥ 8 ॥ इसी प्रकार एक क्रेता से पण्य का सौदा पक्का कर दूसरे क्रेता को सामान बेचने वाले व्यापारी से भी न केवल सामान के मूल्य का दुगुना वसूल करना चाहिए, अपितु राजा को उसे दण्डित भी करना चाहिए। दीयमानं न गृह्णाति क्रीतं पण्यं च यः क्रयी। विक्रीणानस्तदन्यत्र विक्रेता नापराध्नुयात् ॥ 9 ॥ हां, यदि क्रेता ख़रीदे पण्य को नहीं उठाता है, तो विक्रेता को अपना सामान किसी अन्य व्यापारी को बेचने पर कोई दोष नहीं लगता; क्योंकि आख़िर व्यापारी को अपना सामान बेचना ही तो है, घर में तो नहीं रखना है। दत्तमूल्यस्य पण्यस्य विधिरेवं प्रकीर्तितः। अदत्तेऽन्यत्र समयान्न विक्रेतुरतिक्रमः ॥ 10 ॥ उपर्युक्त सभी तथ्य-सामान को समय पर न देने का दण्ड, सामान के नष्ट होने का दायित्व तथा सौदे से मुकरने का दोष आदि-उस स्थिति में लागू होते हैं, जब क्रेता ने सामान का मूल्य चुकता कर दिया हो। यदि क्रेता ने मूल्य का भुगतान ही नहीं किया, तो विक्रेता को उस सौदे से बांधा नहीं जा सकता। वह किसी भी दूसरे को अपना सामान बेचने को स्वतन्त्र है; क्योंकि भुगतान न करने पर क्रेता पर निर्भर कैसे किया जा सकता है ? हां, अपवाद-रूप में विक्रेता का क्रेता पर विश्वास अडिग है, तो स्थिति भिन्न हो जाती है। लाभार्थं वणिजां सर्वं पण्येषु क्रयविक्रयः। स च लाभोऽर्थमासाद्य महान् भवति वा न वा ॥ 11 ॥ व्यापारी लोग लाभ कमाने के लिए ही पण्य का क्रय-विक्रय करते हैं और यह लाभ पण्य-पदार्थों के मूल्य के घटने-बढ़ने के अनुरूप न्यूनाधिक होता रहता है। तस्माद्देशे च काले च वणिगर्थं समाश्रयेत्। न जिह्मं च प्रवर्त्तेत श्रेयानेवं वणिक्पथः ॥ 12 ॥ अतः व्यापारी देश और काल के आधार पर ही पण्य-पदार्थों का मूल्य निर्धारित करते हैं। उदाहरणार्थ, ठण्डे इलाकों में विशेषतः शीत ऋतु में उष्ण पदार्थों तथा लकड़ी-कोयला आदि की मांग बढ़ जाने से उनका मूल्य चढ़ जाता है। इसके विपरीत मैदानी इलाक़ों में इनकी मांग और खपत कम होने से इनका मूल्य कम रखा जाता है। व्यापार का श्रेष्ठ आचरण यह है कि मूल्यनिर्धारण में छल-कपट न करके व्यावहारिकता को अपनाया जाये। ईमानदारी व सरलता को अपनाने वाला व्यापारी ही धन तथा यश कमाता है। ॥ चतुर्थ अध्याय का अष्टम प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 179
- क्रीतानुशय क्रीत्वा मूल्येन यः पण्यं क्रेता न बहु मन्यते। क्रीतानुशय इत्येतद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥ जहां क्रेता सामान ख़रीदकर और दाम चुकाकर अपने को ठगा गया, अर्थात् सौदे में गड़बड़ी अनुभव करता है, वहां क्रेता-विक्रेता में उत्पन्न विवाद 'क्रीतानुशय विवाद' कहलाता है। क्रीत्वा मूल्येन यः पण्यं दुष्क्रीतं मन्यते क्रयी। विक्रेतुः प्रतिदेयं तत्तस्मिन्नेवाह्न्यविक्षतम् ॥ 2 ॥ मूल्य देकर ख़रीदे गये सामान में धोखा पाने पर क्रेता को उसी दिन, सारा सामान उसी स्थिति में विक्रेता को लौटा देना चाहिए। क्रेता को सामान को खोलना, उलटना-पुलटना, सील तोड़ना, पैकिंग को बिगाड़ना तथा अन्य कोई चिह्न बनाना आदि कोई कार्य कदापि नहीं करना चाहिए। द्वितीयेऽह्नि ददत् क्रेता मूल्यात्त्रिंशांशमाहरेत्। द्विगुणं तु तृतीयेऽह्नि परतः क्रेतुरेव तत्॥ 3 ॥ यदि ख़रीदे गये माल को पसन्द न करने वाला क्रेता उसी दिन सही हालत में सामान न लौटा कर दूसरे दिन लौटाता है, तो विक्रेता को मूल्य के रूप में प्राप्त धन से तीस प्रतिशत की कटौती करके शेष धन लौटा देना चाहिए। तीसरे दिन पण्य लौटाने वाला क्रेता चुकाये गये मूल्य का आधा लेने का अधिकारी होता है। तीन दिनों के पश्चात् ख़रीदे गये सामान को लौटाने वाले क्रेता के अनुरोध को मानने अथवा न मानने को विक्रेता स्वतन्त्र है। विक्रेता अपनी शर्तों पर सामान वापस भी ले सकता है और वापस लेने से इनकार भी कर सकता है। क्रेता पण्यं परीक्षेत प्राक् स्वयं गुणदोषतः। परीक्ष्याभिमतं क्रीतं विक्रेतुर्न भवेत् पुनः॥ 4 ॥ क्रेता को सामान ख़रीदने से पहले सामान की स्थिति, उसके गुण-दोष और उसकी उपयोगिता आदि की भली प्रकार से जांच परख कर लेनी चाहिए। इस जांच-परख और निजी पसन्द के पश्चात् खरीदा गया सामान विक्रेता को लौटाया नहीं जा सकता। 180 / नारदस्मृति