भारतकोश
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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

गावस्तु गोभिन्ना देया धान्यं तत् कर्षिकस्य तु। एवं हि विनयः प्रोक्तो गोपैः सस्यावपातनात् ॥ ३९ ॥ वस्तुतः पशुओं के स्वामियों को उनके पशु लौटाना और दूसरों के खेतों में घुसने वाले पशुओं द्वारा उत्पात मचाने की क्षतिपूर्ति करना गोपालक का ही कर्तव्य और दण्ड है। ग्रामोपान्ते च यत् क्षेत्रं विवीतान्ते महापथे। अनावृते चेत्तन्नाशे न पालस्य व्यतिक्रमः ॥ ४० ॥ गांव के आस-पास अथवा समीप के खेतों, बगीचों से सटे खेतों व राजमार्ग के दोनों ओर के खेतों तथा पशुओं के चरने-घूमने के लिए निर्धारित खेतों में पशुओं के घुस जाने तथा उपज को खाने-रौंदने के लिए गोपालक को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। पथि क्षेत्रे वृत्तिः कार्या यामुष्ट्रो नावलोकयेत् । न लंघयेत् पशुर्वाश्वो न भिन्द्याद्यं च सूकरः ॥ ४१ ॥ राजमार्ग के दोनों ओर पड़ने वाले क्षेत्रों के स्वामियों को अपने खेत के चारों ओर ऊंची दीवार खड़ी करनी चाहिए, ताकि ऊंट, गाय, बैल और अश्व आदि पशु उधर की उपज को देख ही न सकें। इसके अतिरिक्त उसे अपने खेत के चारों ओर मुदृढ़, बाड़-कांटेदार तार आदि लगानी चाहिए, ताकि पशु खेत में घुस ही न सकें। गृहक्षेत्रं च दृष्टे द्वे वासहेतू कुटुम्बिनाम् । तस्मात्तं नोत्क्षिपेद्राजा तद्विमूलं कुटुम्बिनाम् ॥ ४२ ॥ परिवार वाले गृहस्थों के लिए गृह और क्षेत्र दो ऐसे आवश्यक संसाधन हैं जिनके बिना जीवन चल ही नहीं सकता। निवास के लिए सुविधाजनक स्थान गृह है और आजीविका को चलाने का साधन क्षेत्र है। एक विश्राम का आधार है, तो दूसरा श्रम का। अतः राजा को इन दोनों को कभी नहीं छीनना चाहिए। इन दोनों में से किसी एक का भी छीना जाना असन्तोषजन्य विद्रोह का कारण बन सकता है। वृद्धे जनपदे राज्ञो धर्मः कोशश्च वर्धते। हीयते हीयमाने च वृद्धिहेतुमतः श्रयेत् ॥ ४३ ॥ वस्तुतः जनपद और जनता की सम्पन्नता-विपन्नता में ही राजा की सम्पन्नता- विपन्नता निहित है। अभाव-पीड़ित जनता पर शासन करने वाला राजा कभी सुख और शान्ति का जीवन व्यतीत नहीं कर सकता। अतः राजा को सदा प्रजा की उन्नति और समृद्धि की कामना व चिन्ता करनी चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का एकादश प्रकरण समाप्त ॥

  1. स्त्री-पुरुष-योग विवाहादिविधः स्त्रीणां यत्र पुंसां च कीर्त्यते। स्त्रीपुंसयोगनामैतद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥ दो भिन्न परिवार के स्त्री और पुरुष के विवाह-विधि से एक हो जाने का नाम 'स्त्री-पुरुष-योग' है। यहां भी आपसी मनमुटाव और कलह के कारण विवाद उत्पन्न हो जाते हैं, जिसे सुलझाने के लिए व्यवहार का आश्रय लिया जाता है। इसी का नाम 'स्त्री-पुरुष-योग' है। स्त्रीपुंसयोस्तुसम्बन्धे वरणं प्राग् विधीयते। वरणाद् ग्रहणं पाणेः संस्कारोऽथ द्विलक्षणः ॥ 2 ॥ स्त्री और पुरुष अथवा कन्या और बालक अथवा वधू और वर के परस्पर योग से पूर्व वरण-लड़की के लिए लड़के का और लड़के के लिए लड़की का चुनाव-होता है। इन चुनाव पर मोहर लगाने की क्रिया का नाम सगाई अथवा वाग्दान है, अर्थात् लड़की और लड़के के माता-पिता द्वारा अपने बच्चों के लिए उपयुक्त जीवनसाथी चुन लेने को सार्वजनिक करना है। यह इस दिशा का प्रथम चरण है। इसके उपरान्त द्वितीय चरण है-अग्नि के समक्ष दोनों-लड़की और लड़के-द्वारा जीवनपर्यन्त एक-दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा करना। इसी का नाम पाणिग्रहण-लड़के द्वारा लड़की का हाथ पकड़ना, उसके भरण-पोषण का दायित्व लेना, उसे अपने व्यक्तित्व का भागी बनाना-है। यही विवाह एवं सप्तपदी कहलाता है। इस प्रकार स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध के जुड़ने के दो चरण हैं- चुनाव और प्रतिज्ञा अथवा वरण और धारण। तयोरनियतं प्रोक्तं वरणं दोषदर्शनात्। पाणिग्रहणमन्त्रश्च नियतं दारलक्षणम् ॥ 3 ॥ वरण अथवा वाग्दान (सगाई) किये जाने पर लड़की लड़के का योग नहीं हो जाता है। योग तो विवाह में मन्त्रोच्चारण के उपरान्त ही होता है। अतः यदि सगाई के उपरान्त लड़की-लड़के में किसी दोष का पता चल जाता है, तो सम्बन्ध तोड़ा जा सकता है, परन्तु विवाह हो जाने (सम्भोग-क्रिया हो जाने) के उपरान्त दोनों में किसी दोष के दीखने पर सम्बन्ध विच्छेद नहीं किया जा सकता। विवाह नारदस्मृति / 195

के उपरान्त लड़का-लड़की पति पत्नी बन चुके होते हैं। ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परिग्रहे। सजातिः श्रेयसी भार्या सजातिश्च पतिः स्त्रियाः ॥ 4 ॥ चारों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—वर्णों के लड़कों के लिए सवर्ण लड़की से पाणिग्रहण ही वाञ्छनीय एवं शुभ होता है, अर्थात् ब्राह्मण लड़के का ब्राह्मण लड़की से, क्षत्रिय लड़के का क्षत्रिय लड़की से पाणिग्रहण ही उत्तम रहता है। भिन्न वर्ण और जाति के लड़के द्वारा भिन्न जाति और वर्ण की लड़की का पाणिग्रहण उपयुक्त नहीं माना जाता। ब्राह्मणस्यानुलोम्येन स्त्रियोऽन्यास्तिस्र एव तु। शूद्रायाः प्रातिलोम्येन तथान्ये पतयस्त्रयः ॥ 5 ॥ अनुलोम क्रम से ब्राह्मण लड़के को ब्राह्मण लड़की के अतिरिक्त अन्य तीन—क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—लड़कियों से भी विवाह करने का अधिकार है। इसी प्रकार शूद्र लड़की को शूद्र लड़के के अतिरिक्त अन्य तीन वर्णों के लड़के को भी पति बनाने का अधिकार है। द्वे भार्ये क्षत्रियस्यान्थे वैश्यस्यैका प्रकीर्तिता। वैश्याया द्वौ पती ज्ञेयाविकोऽन्यः क्षत्रियापतिः ॥ 6 ॥ इसी प्रकार क्षत्रिय बालक, क्षत्रिया बालिका के अतिरिक्त दो अन्य वर्णों— वैश्य और शूद्र—की बालिकाओं से—विवाह कर सकता है। वैश्य अपने वर्ण की वैश्य बालिका के अतिरिक्त शूद्रा से भी विवाह कर सकता है। इस प्रकार वैश्या स्त्री के दो अन्य पति—क्षत्रिय और ब्राह्मण—तथा क्षत्रिया का एक अन्य पति—ब्राह्मण— हो सकता है। आ सप्तमात् पञ्चमाद्वा बन्धुभ्यः पितृमातृत्तः। अविवाह्याः सगोत्राः स्युः समानप्रवरास्तथा ॥ 7 ॥ पितृपक्ष की सात पीढ़ियों और मातृपक्ष की पांच पीढ़ियों को छोड़कर ही लड़का लड़की का विवाह सम्बन्ध स्थिर करना चाहिए। सपिण्डों और सगोत्रियों में रक्त-सम्बन्ध होने के कारण विवाह सम्बन्ध उचित नहीं; क्योंकि इससे स्वस्थ एवं बल बुद्धि सम्पन्न सन्तान के उत्पन्न होने की सम्भावना के आगे प्रश्नचिह्न लग जाता है। परीक्ष्य पुरुषः पुंसत्वे निजैरेवाङ्गलक्षणैः। पुमांश्चेदविकल्पेन स कन्यां लब्धुमर्हति ॥ 8 ॥ अपने शरीर के लक्षणों से कन्या के लिए चुने जा रहे लड़के के शरीर की तुलना और जांच परख करने पर व उसके पुरुषत्व का निश्चय हो जाने के उपरान्त ही उसे कन्या देने का विचार बनाना चाहिए, अर्थात् सच्चे अर्थों में पुरुष—कन्या 196 / नारदस्मृति

को सन्तुष्ट कर पाने वाला—सिद्ध एवं निश्चित होने वाले बालक को ही कन्या को ग्रहण करने का अधिकारी समझना चाहिए। सुबद्धजत्रुजान्वस्थिः सुबद्धांसशिरोरुहः । स्थूलघाटास्तनूक्त्वग्विलग्नगतिस्वरः ॥ ९॥ रेतोऽस्योत्प्लवते नाप्सु ह्लादि मूत्रं च फेनिलम् । पुमान् स्याल्लक्षणैरेतैर्विपरीतैस्तु षण्ढकः ॥ १० ॥ निम्नोक्त लक्षणों वाले बालक को पुरुष और इन लक्षणों से रहित को नपुंसक समझना चाहिए—

  1. जंघाओं और घुटनों की हड्डी का सुदृढ़ और सुसम्बद्ध होना।
  2. कन्धों की भीतरी अस्थियों का बलशाली होना।
  3. मस्तक के ऊपर घने, काले और लम्बे केशों का होना।
  4. ग्रीवा के पिछले भाग का स्थूल होना।
  5. शरीर की त्वचा पर घने बालों का उगना।
  6. व्यक्ति की चाल में स्फूर्ति और तीव्रता का होना।
  7. स्वर का गम्भीर और मधुर होना।
  8. वीर्य का पानी के ऊपर स्थिर रहना, डूब बह न जाना तथा
  9. मूत्र का स्वाभाविक रूप से निकलना तथा उसका झाग लिये रहना। चतुर्दशविधः शास्त्रे षण्ढो दृष्टो मनीषिभिः । चिकित्स्यश्चाचिकित्स्यश्च तेषामुक्त्तो विधिः क्रमात् ॥ ११॥ शरीर-वैज्ञानिकों ने चौदह प्रकार के नपुंसक माने हैं। उनमें कुछ चिकित्सा द्वारा आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं, अर्थात् नपुसंकत्व को पुंसत्व में बदला जा सकता है, परन्तु कुछ भेद ऐसे हैं, जिनमें चिकित्सा द्वारा भी कोई परिवर्तन नहीं आ पाता। कितना और कैसा भी उपचार क्यों न कर लिया जाये, नपुंसकता दूर नहीं हो पाती। नपुंसकता के निम्नोक्त चौदह भेद हैं। निसर्गषण्ढो वध्रश्च पक्षषण्ढस्तथैव च । अभिशापाद् गुरो रोगाद्देवक्रोधात्तथैव च ॥ १२ ॥ ईर्ष्याषण्ढश्च सेव्यश्च वातरेता मुखेभगः । आक्षिप्तो मोघबीजश्च शालीनोऽन्यापतिस्तथा ॥ १३ ॥
  10. जन्मजात—लिंग और अण्डकोश रहित।
  11. वध्र—दाढ़ी-मूंछ-रहित।
  12. पक्षषण्ढ—एक पक्ष---शुक्ल अथवा कृष्ण—में रति भोग करने में समर्थ और दूसरे पक्ष में सर्वथा अशक्त ।
  13. अभिशप्त—गुरु अथवा महात्मा आदि के शाप से नष्ट पुंसत्व। नारदस्मृति / 197
  1. रोग विकार—किसी रोग के कारण पुंसत्व का नष्ट हो जाना।
  2. दैवी प्रकोप—किसी देवता के प्रकोप से पुंसत्व गंवा बैठना।
  3. ईर्ष्याषण्ढ—स्त्रियों के प्रति विद्वेष, हीनभावना अथवा घृणा आदि के कारण उत्तेजना खो देना।
  4. हीनता-ग्रस्त—स्त्रियों की सेवा करने से उन्हें भोगने में अरुचि, असामर्थ्य, भय, लज्जा एवं बेचैनी अनुभव करना।
  5. वातरेता—सम्भोग में प्रवृत्त होते ही वीर्य का स्खलित हो जाना।
  6. मुखेभग—भग में लिंग प्रवेश से भयभीत और मुख-मैथुन अथवा गुदा-मैथुन में रुचि रखना—एक प्रकार के अन्धविश्वास (वहम) का शिकार।
  7. आक्षिज—सम्भोग करने पर भी वीर्यपात न कर पाना। वीर्य का न निकलना।
  8. मोघबीज—वीर्य में सन्तानोत्पादक शुक्राणुओं का अभाव।
  9. शालीन—स्त्री संसर्ग के समय लिंग का उत्थित-उत्तेजित ही न होना।
  10. अन्यापति—अपनी पत्नी से भोग करने में असमर्थ, उसके सामने उत्तेजित न होने वाला, परन्तु दूसरी स्त्रियों से भोग करने में सफल। तत्राद्यावप्रतीकारौ पक्षाख्यो मासमाचरेत्। अनुक्रमात्तु यस्यान्य कालः सम्वत्सरः स्मृतः ॥ 14 ॥ उपर्युक्त चौदह प्रकार के नपुंसकों में से प्रथम दो—लिंगविहीन तथा श्मश्रु- विहीन—को तो सर्वथा असाध्य ही समझना चाहिए। इनकी तो कोई चिकित्सा ही नहीं है। पक्षषण्ढ की एक मास तक और दूसरे षण्ढों की एक साल तक चिकित्सा करके परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिए। ईर्ष्याषण्ढादयोयेऽन्ये चत्वारः समुदाहृताः । त्यक्तव्यास्ते पतितवत् क्षतयोन्या अपि स्त्रिया ॥ 15 ॥ यद्यपि नारी विद्वेष, नारी सेवा, वातरेता तथा मुत्स्वेभग आदि नपुंसकों की स्थिति में अनुकूल परिवेश, उपयुक्त चिकित्सा, सहानुभूति तथा मनोवैज्ञानिक उपचार आदि अपनाकर सुधार लाया जा सकता है, तथापि इन्हें पतितों के समान समझकर त्याग देना चाहिए; क्योंकि इनकी मानसिकता को स्थायी रूप में बदलना कदापि सम्भव नहीं। कुण्ठाग्रस्त व्यक्ति कभी सफल सम्भोग नहीं कर पाता। अक्षिममोघबीजाभ्यां कृतेऽपि प्रतिकर्मणि। पतिरन्यः स्मृतो नार्या वत्सरार्धं प्रतीक्ष्य तु ॥ 16 ॥ विवाह करने पर पत्नी के साथ सम्भोग-क्रिया में लिंग उत्थित न कर पाने वाले (उत्तेजनाविहीन) तथा शीघ्रपात के रोगी और सन्तानोत्पत्ति के लिए अपेक्षित शुक्राणुओं से हीन वीर्य वाले पति को उपचार, चिकित्सा आदि के लिए छह महीने 198 / नारदस्मृति

की अवधि देनी चाहिए। इसके पश्चात् भी अनुकूल परिणाम न निकलने पर स्त्री को उसका परित्याग करके, दूसरे समर्थ पुरुष से विवाह कर लेना चाहिए। शालीनस्यापि धृष्टस्त्रीसंयोगाद् भृश्यते ध्वजः। तं हीनवेषमन्तस्त्रीबालान्धाभिरुपाचरेत् ॥ 17 ॥ स्त्री सम्पर्क के समय उत्थित लिंग को वीर्यपात हुए बिना स्थिर न रख पाने वाले पुरुष को, उसकी स्त्री के द्वारा सुन्दर, परन्तु भद्दी वेशभूषा वाली स्त्री अथवा भोली-भाली आकर्षक लड़की आदि को दिखाकर उसकी वासना को उद्दीप्त करने और उत्तेजना को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। वस्तुतः कभी-कभी शालीन पुरुष (अत्यधिक शालीनता के कारण नपुंसक बना) थोड़ी स्वतन्त्रता तथा अपनी पत्नी का सहयोग-प्रोत्साहन पाकर सहज एवं सामान्य स्थिति में आ जाता है। अन्यस्या यो मनुष्यः स्यादमनुष्यः स्वयोजिति। लभेत सान्यं भर्तारमेतत् कार्यं प्रजापतेः ॥ 18 ॥ प्रजापति ने अन्य स्त्रियों के साथ सम्भोग में समर्थ, परन्तु अपनी पत्नी के सौन्दर्य, उद्धत स्वभाव, उच्च शिक्षा, सम्पन्न मायका तथा सामाजिक प्रतिष्ठा अथवा अन्यान्य किन्हीं कारणों से उससे सम्भोग करने में व उसे तृप्त-सन्तुष्ट करने में सर्वथा असमर्थ पुरुष को छोड़कर दूसरे समर्थ पुरुष से विवाह करने का स्त्री को अधिकार प्रदान किया है। अपत्यार्थं स्त्रियः सृष्टाः स्त्रीक्षेत्रं बीजिनो नराः। क्षेत्रं बीजवते देयं नाबीजी क्षेत्रमर्हति ॥ 19 ॥ सन्तान की उत्पत्ति के लिए स्त्रियों की सृष्टि हुई है। इस प्रकार स्त्री क्षेत्र है और पुरुष बीज धारण करने वाला है। वीर्यहीन पुरुष का क्षेत्र (स्त्री) को ग्रहण करने (विवाह करने) का कोई अधिकार नहीं है। पिता दद्यात् स्वयं कन्यां भ्राता वाऽनुमते पितुः। पितामहो मातुलश्च सकुल्या बान्धवास्तथा ॥ 20 ॥ कन्या का दान पहले तो स्वयं उसके पिता को या फिर कन्या के भ्राता को या फिर कन्या के पिता की अनुमति से कन्या के पितामह, मातुल, साकुल्य - चाचा अथवा चाचा के लड़के-आदि निकट सम्बन्धी अथवा अन्यान्य जाति बन्धु को करना चाहिए। इस सम्बन्ध में विष्णु ने अपनी स्मृति में माता को कन्यादान के अधिकारियों में एक तो सबसे पीछे फेंक दिया है और फिर उसके साथ शर्तें भी जोड़ दी हैं। उदाहरणार्थ, माता के स्वस्थ होने, परिवार से सौमनस्य रखने तथा पति की सेवा में रत (सम्भोग से तृप्त करने) रहने वाली होने पर ही उसे कन्यादान का अधिकार है। इन योग्यताओं से रहित होने पर अपनी कन्या के दान का अधिकार उसे नहीं, नारदस्मृति / 199

अपितु उसके जाति-बन्धुओं को होता है- यथोक्तसर्वाभावे माता दद्यात् यदि प्रकृतिस्था वृत्तस्था पतितल्पमुपास्ते चेत्। तस्यां चासत्यामवृत्तस्थायां च समान जातीयाः। माता त्वभाव सर्वेषां प्रकृतौ यदि वर्तते। तस्यामप्रकृतिस्थायां दद्युः कन्यां सनाभयः ॥ 21 ॥ उपर्युक्त सभी-भ्राता, पितामह तथा मातुल आदि-के अभाव में मानसिक रूप से स्वस्थ होने पर माता कन्यादान कर सकती है, परन्तु माता के मानसिक रूप से विकारग्रस्त होने पर यह दायित्व कुटुम्बी अथवा सपिण्डीजनों को ही निभाना चाहिए। टिप्पणी-उपर्युक्त कन्या के दाताओं के अधिकारी सम्बन्धियों में पिता के उपरान्त-जीवित न होने पर अथवा असमर्थ अथवा अनिच्छुक होने पर-दूसरा स्थान भ्राता को और तृतीय स्थान माता को दिया गया है-पिता दद्यात् कन्यां स्वयम्। स्वयं ग्रहणमन्यनिरपेक्षप्रामाण्यार्थम्। पित्रा अनुज्ञातो भ्राता वा, पितुरभावे माता वा। तदभावे पितामहः। इस कथन से स्पष्ट है कि पिता के जीवित होते उसकी आज्ञा से कन्या का भाई अथवा माता-पिता कन्यादान कर सकते हैं, परन्तु पिता के न रहने पर या दिवंगत होने अथवा प्रवासित होने पर पहला अधिकार केवल माता का है। माता के भी जीवित न होने पर यह अधिकार दादा, नाना आदि को मिलता है। एक अन्य विचारणीय तथ्य यह है कि माता की पात्रता के सम्बन्ध में लगायी गयी शर्त-मानसिक रूप से स्वस्थ होनी चाहिए-अन्य सम्बन्धियों पर नहीं लगायी गयी। वस्तुतः यह मातृत्व का घोर अपमान है। पिता के उपरान्त दूसरा स्थान तो माता को ही मिलना चाहिए, परन्तु पुरुषप्रधान समाज यह सब कैसे सहन कर सकता है ? ऐसी उदारता कैसे दिखा सकता है ? यदा तु नैव कश्चित् स्यात् कन्या राजानमाश्रयेत्। अनुज्ञया तस्य वरं प्रतीत्य वरयेत् स्वयम्॥ 22 ॥ किसी भी अभिभावक-पिता, भ्राता, माता, पितामह तथा मातुल-के अतिरिक्त बन्धु बान्धव और सपिण्डी आदि के न होने पर कन्या द्वारा राजा को अपना संरक्षक एवं अभिभावक मानकर उसके प्रशासन द्वारा अभिभावकविहीन कन्याओं के संरक्षण के लिए मनोनीत अधिकारी की अनुमति एवं सहमति प्राप्त कर स्वयं ही अपने लिए अपनी इच्छानुसार वर की खोज करनी चाहिए। सवर्णमनुरूपं च कुलशीलवयः श्रुतैः। सह धर्मं चरेत्तेन प्रजाश्चोत्पादयेत्ततः ॥ 23 ॥ अभिभावकविहीन कन्या को अपनी ही जाति के कुलीन, चरित्रवान्, सुन्दर 200 / नारदस्मृति

आयु, विद्या और गुणों की दृष्टि से सही लगने वाले युवक को ढूंढकर उससे विवाह कर लेना चाहिए। इस प्रकार ऐसी कन्या को अपने उद्यम से ही सन्तान उत्पन्न कर अपना घर बसाना चाहिए। प्रतिगृह्य च यः कन्यां वरो देशान्तरं व्रजेत्। त्रीनृतून् समतिक्रम्य कन्यान्वं वरयेद्वरम्॥ 24 ॥ यदि अभिभावकविहीन कन्या चुने हुए वर के द्वारा धोखे का शिकार हो जाती है, अर्थात् उसका पति उसे लौटने का आश्वासन देकर विदेश चला जाता है अथवा अपने ही देश में बिना कुछ बताये कहीं अन्यत्र चला जाता है, तो ऐसी स्त्री को तीन ऋतुओं तक, अर्थात् छः मास तक अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस अवधि में उसके न लौटने और न ही कोई सूचना देने पर स्त्री किसी दूसरे युवक के वरण करने को स्वतन्त्र होती है। इसमें किसी प्रकार का कोई अनौचित्य नहीं है। कन्या नर्तुमुपेक्षेत बान्धवेभ्यो निवेदयेत्। ते चेन्न दद्युस्तां भर्त्रे ते स्युर्भ्रूणहभिः समाः॥ 25 ॥ अभिभावकविहीन कन्या के ऋतुमती हो जाने पर उसे इस तथ्य को गुप्त न रखकर अपने समीप-दूर के सभी सम्बन्धियों को बताना चाहिए और उनसे अपने लिए उपयुक्त वर की खोज का निवेदन करना चाहिए। इस तथ्य को जानने के उपरान्त भी निश्चेष्ट रहने वाले, अर्थात् कन्या के लिए उपयुक्त वर की खोज न करने वाले बन्धु-बान्धव भ्रूणहत्या के दोषी होते हैं। यावन्तश्चर्तवस्तस्याः समतीयुः पतिं विना। तावत्यो भ्रूणहत्याः स्युस्तस्य यो न ददाति ताम्॥ 26 ॥ मातृपितृविहीन कन्या के अभिभावकों को यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि कन्या के युवती हो जाने की जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त भी कन्या के लिए यथाशीघ्र उपयुक्त वर की व्यवस्था न करने वाले दूर-समीप के बन्धु-बान्धव कन्या की व्यर्थ जाने वाली ऋतुओं की संख्या के अनुरूप भ्रूणहत्या के दोषी बनते हैं, अर्थात् कन्या जितनी बार ऋतुमती होती है और अपने दुर्भाग्य पर रोती है तथा सोचती है कि वह विवाहिता होती, तो पति के संग से फलवती हो सकती थी, अब उसका ऋतुमती होना व्यर्थ जा रहा है, उतनी बार की भ्रूणहत्या का पाप बन्धु- बान्धवों को लगता है। अतोऽप्रवृत्ते रजसि कन्यां दद्यात् पिता सकृत्। महदेनः स्पृशेदेनमन्यथैवं विधिः सताम्॥ 27 ॥ कन्या की ऋतुओं को सार्थक बनाने के उद्देश्य से कन्या के ऋतुमती होने से पूर्व ही उसके पिता भ्राता आदि को उसका विवाह कर देना चाहिए, अन्यथा पिता नारदस्मृति / 201

आदि अभिभावक पाप के भागी होते हैं। सकृदंशो निपतति सकृत् कन्या प्रदीयते। सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत्॥ २८॥ सज्जनों को यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि निम्नोक्त तीन कार्य एक ही बार किये जाते हैं, बदले पलटे नहीं जाते। जो एक बार कह दिया, वह अटल और स्थिर होता है। अतः मुंह खोलने से पूर्व भली प्रकार सोच-विचार कर लेना चाहिए। ये तीन हैं—

  1. पैतृक सम्पत्ति का विभाजन, 2. कन्यादान तथा 3. धन सम्पत्ति के दान का संकल्प। ब्राह्मादिषु विवाहेषु पञ्चस्वेष विधिः स्मृतः। गुणापेक्षं भवेद्दानमासुरादिषु च त्रिषु॥ २९॥ पांच – ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष, दैव और गान्धर्व—प्रकार के विवाहों में कन्या का दान एक बार किया जाता है, अर्थात् एक बार जिसे दे दिया, दे दिया। प्रथम दान को ही अन्तिम माना जाता है, परन्तु इसके विपरीत तीन - आसुर, राक्षस और पैशाच-प्रकार के विवाहों में वर की योग्यता एवं गुणवत्ता के आधार पर देने के संकल्प को बदला जा सकता है, अर्थात् यदि एक व्यक्ति को कन्या देने का वचन दे दिया और उसके उपरान्त पहले वाले से अधिक दूसरा योग्य वर मिल गया, तो अभिभावक अपने वचन को बदल सकता है। कन्यायां दत्तशुल्कायां ज्यायांश्चेद्वर आव्रजेत्। धर्मार्थकामसंयुक्तं वाच्यं तत्रानृतं भवेत् ॥ ३०॥ कन्या का शुल्क ग्रहण करने के पश्चात्, अर्थात् धन लेकर कन्या देने का समझौता करने के उपरान्त भी, यदि पहले से अधिक योग्य वर मिल जाता है, तो पहले वालों को पैसा लौटाकर सम्बन्ध विच्छेद किया जा सकता है। इसमें किसी प्रकार का कोई दोष नहीं। टिप्पणी- याज्ञवल्क्य व मनु आदि स्मृतिकारों ने तो कन्या के शुल्क को ग्रहण करते समय अथवा ग्रहण करने के पश्चात् पहले से अधिक प्रशस्त वर के मिलने पर सम्बन्ध विच्छेद करने के लिए अभिभावकों द्वारा मिथ्याभाषण को— कन्या को ही यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं, अब उसे विवश तो नहीं किया जा सकता आदि-अनुचित अथवा दोषपूर्ण नहीं माना। कन्यायां प्राप्तशुल्कायां शुल्कग्रहण काले प्रशस्यतरः प्रार्थनीयो यद्या- गच्छेत्, तत्र धर्मादियुक्तं शीलवती, कुलरूपवती चेत्याद्यनृतमपि प्रयोजनार्थं वक्तव्यम्। नात्रानृत वचने दोषः। अन्य आह—गृहीतशुल्कायां प्रशस्यतरो यद्यान्य आगच्छेत् तत्र धर्मादि- 202 / नारदस्मृति

युक्तमविधेया अविनेया अतिविरूपा च तस्मात् तव न ददामीति शुल्कप्रदाने नास्त्यनृतदोषः। स्पष्ट है कि कन्या को अधिक उपयुक्त वर देने की दृष्टि से पहले प्रस्ताव को भंग करने के लिए झूठे बहाने बनाने में भी दोष नहीं माना गया। हमारे विचार में कालान्तर में कुछ दुष्ट अभिभावकों द्वारा अपने लोभ की पूर्ति के लिए इस झूठ का जमकर दुरुपयोग किया जाने लगा। नादुष्टां दूषयेत् कन्यां नादुष्टं दूषयेद्वरम्। दोषं तु सति नागः स्यादन्योन्यं त्यजतास्तयोः॥ ३१॥ दोष-रहित कन्या अथवा वर में सम्बन्ध स्थिर हो जाने के उपरान्त छिद्रान्वेषण अथवा दोष-दर्शन जहां सर्वथा अनुचित है, वहां स्पष्ट दोष दिखाई देने पर कन्या अथवा वर के त्यागने अथवा सम्बन्ध-विच्छेद करने में कोई दोष अथवा अनौचित्य नहीं है। दत्वा न्यायेन यः कन्यां वराय न ददाति ताम्। अदुष्टश्चेद्दरो राज्ञा स दण्ड्यस्तत्र चौरवत्॥ ३२॥ भली प्रकार सोच विचार करके विधिपूर्वक कन्या का वाग्दान करने के उपरान्त वर में किसी दोष के न होने पर तथा वर पक्षवालों के किसी अपराध के न करने पर भी अपने वचन से मुकरने वाले, अर्थात् वाग्दत्ता कन्या का विवाह न करने वाले कन्या के अभिभावक को प्रशासन द्वारा चोर के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए। यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति। तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं पूर्वसाहसचोदितम्॥ ३३॥ किसी दोष- असाध्य रोग से पीड़ित, बोलने में हकलाना तथा चलने में लड़खड़ाना आदि-से ग्रस्त कन्या के दोष को छिपाकर धोखे से उसे किसी के मत्थे मढ़ने वाले, अर्थात् वर पक्षवालों को अंधेरे में रखने वाले कन्या के अभिभावक (पिता आदि) को पूर्वसाहस का दण्ड देना चाहिए। अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद् द्वेषेण मानवः। स शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन्॥ ३४॥ किसी अक्षतयोनि कन्या को भुक्त (पुरुष विशेष से सम्बन्ध रखने वाली) कहकर कलंकित करने वाले, परन्तु अपने आरोप को सिद्ध करने के लिए प्रमाण न जुटा सकने वाले व्यक्ति से सौ पण दण्ड के रूप में वसूल करने चाहिए। प्रतिगृह्य तु यः कन्यामदुष्टामृत्सृजेन्नरः। स विनेयस्त्वकामोऽपि कन्यां तामेव चोद्वहेत्॥ ३५॥ दोषरहित कन्या के ग्रहण की सहमति देकर, अकारण उसका परित्याग करने नारदस्मृति / 203

वाले पुरुष को इच्छा न होने पर भी उससे विवाह करना पड़ता है। दीर्घकुत्सितरोगार्ता व्यङ्गा संसृष्टमैथुना। धृष्टान्यगतभावा च कन्यादोषाः प्रकीर्तिताः ॥ 36 ॥ कन्या को अग्राह्य बनाने वाले दोष निम्नलिखित हैं—

  1. दीर्घकाल से चले आ रहे असाध्य रोग से ग्रस्त—दमा, राजयक्ष्मा, कैंसर आदि से पीड़ित।
  2. कुत्सित रोग से ग्रस्त—कोढ़, सफ़ेद दाग, दाद खुजली आदि चर्म रोगों की शिकार।
  3. आर्त्ता—मासिक धर्म आने पर असह्य पीड़ा से कराहने वाली, क्षुधा- पीड़ित तथा दारिद्र्य की प्रतिमूर्ति।
  4. व्यंगा—विकलांग—अन्धी, काणी, भैंगी, लंगड़ी, कुबड़ी, टेढ़े-मेढ़े हाथ- पांव वाली।
  5. संसृष्ट मैथुना—विवाह से पूर्व ही पुरुष से सम्बन्ध रखने वाली, व्यभिचारिणी।
  6. धृष्टा—ढीठ, निर्लज्ज, अनुचित एवं अश्लील विषयों में रुचि लेने वाली, मर्यादा की रक्षा न करने वाली तथा दुस्साहस करने वाली।
  7. अन्यगतभावा—पुरुषों से प्रीति एवं मित्रता करने वाली, आज की भाषा में ब्वायफ्रेण्ड बनाने वाली ! उन्मत्तः पतितः क्लीबो दुर्भगस्त्यक्तबान्धवः। कन्यादोषौ च यौ पूर्वावेषं दोषगणो वरे ॥ 37 ॥ इसी प्रकार वर को अवरणीय बनाने वाले दोष निम्नलिखित हैं—
  8. उन्मत्त—मस्तिष्क का सन्तुलित न होकर विकारग्रस्त होना। शरीर में वात, पित्त तथा कफ के विकार से, धन के विनाश से तथा सन्निपात ज्वर से प्रायः मन अस्थिर और मस्तिष्क विकृत हो जाता है।
  9. पतित—निकृष्ट कर्मों के कारण जाति से बहिष्कृत तथा धर्मानुष्ठान आदि के अयोग्य घोषित।
  10. क्लीव—नपुंसक, रति भोग में असमर्थ।
  11. दुर्भग—स्त्रियों के बदले समलिंगियों अथवा पशुओं से अथवा स्त्रियों के भग के स्थान पर उनकी गुदा या मुख में मैथुन करने वाला।
  12. त्यक्त बान्धव—जिसके अवगुणों (दोषों) के कारण बन्धु बान्धवों ने उससे नाता ही तोड़ लिया है।
  13. रोगग्रस्त—पुराने असाध्य रोग से पीड़ित तथा
  14. विकलांग—शरीर के किसी अंग से असामान्य। 204 / नारदस्मृति

अष्टौ विवाहा वर्णानां संस्कारार्थं प्रकीर्तिताः । ब्राह्मस्तु प्रथमस्तेषां प्राजापत्यस्तथापरः ॥ ३८ ॥ आर्षश्चैव हि दैवश्च गान्धर्वश्चासुरस्तथा। राक्षसोऽनन्तरस्तस्मात् पैशाचस्त्वष्टमः स्मृतः ॥ ३९ ॥ चारों वर्णों के लोगों के विवाह के निम्नोक्त आठ भेद हैं—ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष, दैव, गान्धर्व, आसुर, राक्षस तथा पैशाच। सत्कृत्याहूय कन्यां तु दद्यात्ब्राह्मोत्वलंकृताम्। सह धर्मं चरेत्युक्त्वा प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥ ४० ॥ ब्राह्म विवाह में कन्या का पिता वर को निमन्त्रित करके उसे अपनी सुभूषित और अलंकृता कन्या सादर समर्पित करता है। प्राजापत्य विवाह में कन्या का पिता वर को कन्या समर्पित करते हुए उन दोनों को मिलकर धर्मानुचरण करने का निर्देश देता है। वस्त्रगोमिथुनाभ्यां तु विवाहस्त्वार्ष उच्यते। अन्तर्वेद्यां तु दैवः स्याहृत्विजे कर्म कुर्वते ॥ ४१ ॥ वरपक्ष से वस्त्र, गाय और वृषभ आदि लेकर कन्या का विवाह करना आर्ष विवाह कहलाता है तथा ऋत्विक् कर्म करने वाले को दक्षिणा के रूप में कन्यादान करना दैव विवाह कहलाता है। इच्छन्तीमिच्छतः प्राहुर्गान्धर्वं नाम पञ्चमम्। विवाहस्त्वासुरो ज्ञेयः शुल्कसंव्यवहारतः ॥ ४२ ॥ एक-दूसरे पर अनुरक्त लड़के-लड़की को दोनों के माता-पिता द्वारा विवाह बन्धन में बांध देना गान्धर्व विवाह कहलाता है तथा शुल्क लेकर कन्या का दान, अर्थात् कन्या को बेचना—उपयुक्त पात्रता की अपेक्षा शुल्क की राशि को महत्त्व देना—आसुर विवाह कहलाता है। प्रसह्यहरणादुक्तो विवाहो राक्षसस्तथा। सुप्तप्रमत्तोपगमात् पैशाचस्त्वष्टमोऽधमः ॥ ४३ ॥ कन्या तथा उसके माता-पिता की इच्छा-अनिच्छा, सहमति-विमति आदि की अपेक्षा किये बिना बलपूर्वक कन्या का हरण करके, उससे विवाह कर लेना राक्षस विवाह कहलाता है तथा सोयी हुई, मूर्च्छित अथवा प्रमत्त स्त्री से सम्भोग करके उसे विवाह के लिए विवश-सहमत करना पैशाच विवाह कहलाता है, जो क्रम की दृष्टि से आठवें स्थान पर है। एषां तु धर्म्याश्चत्वारो ब्राह्माद्याः समुदाहृताः । साधारणः स्याद् गन्धर्वस्त्रयोऽधर्म्यास्ततः परे ॥ ४४ ॥ उपर्युक्त आठ प्रकार के विवाहों में प्रथम चार—ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष तथा नारदस्मृति / 205

दैव—धर्मसम्मत हैं। पांचवां गान्धर्व विवाह साधारण है, अर्थात् उसे न धर्मसम्मत कहा जा सकता है और न ही धर्म विरुद्ध। अन्य तीन--आसुर, राक्षस तथा पैशाच—अधर्म और पाप-रूप होने से निन्दनीय एवं त्याज्य हैं। परपूर्वाः स्त्रियस्त्वन्याः सप्त प्रोक्ता यथाक्रमम्। पुनर्भूर्स्त्रिविधा तासां स्वैरिणी तु चतुर्विधा ॥ 45 ॥ एक से अधिक पुरुषों से सम्बन्ध रखने वाली स्त्रियों के सात प्रकार भेद हैं—इनमें तीन प्रकार की स्त्रियों को 'पुनर्भू' और चार प्रकार की स्त्रियों को 'स्वैरिणी' माना जाता है। कन्यैवाक्षतयोनिर्या पाणिग्रहणदूषिता । पुनर्भूः प्रथमा प्रोक्ता पुनः संस्कारमर्हति ॥ 46 ॥ विवाह से पूर्व अक्षतयोनि और केवल विवाहित पति से दूषित होने वाली और उसे छोड़कर फिर से दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली प्रथम 'पुनर्भू' कहलाती है। अभिप्राय यह है कि विवाह के उपरान्त पति के किसी दोष, असाध्य रुग्णता, मस्तिष्क-विकृति तथा नपुंसकता आदि के प्रकट हो जाने पर उससे सम्बन्ध- विच्छेद करके दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली स्त्री पूर्वपति की भुक्ता होने के कारण पुनर्भू मानी जाती है। कौमारं पतिमुत्सृज्य या त्वन्यं पुरुषं श्रिता। पुनः पत्युर्गृहंमियात् सा द्वितीया प्रकीर्तिता ॥ 47 ॥ अपने कुमार (छोटी आयु) पति की विवाहिता युवती अन्य पुरुष से सम्बन्ध रखती हुई पति के युवा होने पर उसके पास लौट आने वाली स्त्री दूसरे प्रकार की 'पुनर्भू' कहलाती है। कुछ प्रदेशों में छोटी आयु के लड़कों की बड़ी आयु की लड़कियों से विवाह करने और लड़कों के युवा होने तक लड़कियों के ज्येष्ठ आदि की भुक्ता बने रहने की प्रथा है। उसी के सन्दर्भ में उक्त कथन है। असत्सुः देवरेषु स्त्री बान्धवैर्या प्रदीयते । सवर्णाय सपिण्डाय सा तृतीया प्रकीर्तिता ॥ 48 ॥ पति की अकालमृत्यु हो जाने पर और देवर आदि के न होने पर अथवा उसके द्वारा ग्रहण को उद्यत न होने पर किसी सगोत्री अथवा सपिण्डी से विवाहित होने वाली स्त्री तीसरे प्रकार की 'पुनर्भू' कहलाती है। स्त्री प्रसूताप्रसूता वा पत्यावेव तु जीवति। कामाद्या संश्रयेदन्यं प्रथमा स्वैरिणी तु सा ॥ 49 ॥ पति के जीवित होते हुए सन्तानवती अथवा निस्सन्तान स्त्री अपने असमर्थ पति से असन्तुष्ट होने के कारण उसका परित्याग कर, अपनी कामवासना की तृप्ति 206 / नारदस्मृति

के लिए पर-पुरुष से सम्बन्ध स्थापित करने वाली प्रथम प्रकार की 'स्वैरिणी' कहलाती है। मृते भर्त्तरि सम्प्राप्तान्देवरान्दीनपास्य या। उपगच्छेत् परं कामात् सा द्वितीया प्रकीर्तिता ॥ 50 ॥ पति की मृत्यु के उपरान्त योग्य देवरों द्वारा उसके वरण को सहमत, उनकी उपेक्षा करके अपनी रुचि के पुरुष का आश्रय ग्रहण करने वाली द्वितीय प्रकार की 'स्वैरिणी' होती है। प्राप्ता देशाद्धनक्रीता क्षुत्पिपासातुरा च या। तवाह्मित्युपगता सा तृतीया प्रकीर्तिता ॥ 51 ॥ धन से ख़रीदी गयी, दूसरे देश से आयी हुई, अर्थात् आश्रयविहीन तथा भूख-प्यास से आकुल-व्याकुल स्त्री अपने को शरण देने वाले पुरुष के प्रति कृतज्ञ भाव से समर्पित होने वाली-'आपने मुझे सहारा दिया है, अब मैं आपकी दासी हूं, आपके यथेष्ट भोग के लिए उपस्थित हूं,' इस प्रकार के भावों को प्रकट करने वाली-स्त्री तृतीय प्रकार की 'स्वैरिणी' कहलाती है। देशधर्मौ निरपेक्ष्य स्त्री गुरुभिर्या प्रदीयते। उत्प्रभसाहसान्यस्मै अन्त्या सा स्वैरिणी स्मृता ॥ 52 ॥ माता-पिता आदि पूज्य अभिभावकों द्वारा देश-धर्मानुसार उपयुक्त मानकर चुने गये वर की उपेक्षा करके अपने मनोऽकूल जीवनसाथी का आश्रय लेने का दुस्साहस करने वाली स्त्री चतुर्थ प्रकार की 'स्वैरिणी' कहलाती है। टिप्पणी—माता-पिता के मान-सम्मान तथा लड़के की जाति, धर्म, आयु शिक्षा-दीक्षा, कुल-परिवार तथा सामाजिक स्थिति आदि किसी बात की चिन्ता किये बिना, मन के मीत से प्रेमविवाह करने वाली आजकल की लड़कियों को चतुर्थ प्रकार की 'स्वैरिणी' मानना चाहिए। पुनर्भूर्वा विधिस्त्वेष स्वैरिणीनां प्रकीर्तितः। पूर्वा पूर्वा जघन्यासां श्रेयसी तूत्तरोत्तरा ॥ 53 ॥ पुनर्भू और स्वैरिणी स्त्रियों के स्वरूप और भेदों आदि के वर्णन को यहीं विराम दिया जाता है। यहां इतना और समझ लेना चाहिए कि पुनर्भू से पूर्व-पूर्व निन्दनीय है, अर्थात् तृतीया—विवाह के उपरान्त पति की अकालमृत्यु हो जाने पर और देवरों के न होने पर पर-पुरुष से विवाह करने वाली की अपेक्षा युवा पति की ओर न लौटने वाली द्वितीया और उसकी अपेक्षा प्रथमा—जीवित पति का परित्याग करने वाली अधिक निन्दनीय है। तृतीया का तो मात्र इतना ही दोष है कि उसने आत्मसंयम को अव्यावहारिक मानकर पुनर्विवाह को ही व्यावहारिक समझा। द्वितीया पुनर्भू यदि अपने को भोगने वाले के प्रति समर्पित हो जाती है, तो उसका नारदस्मृति / 207

भी दोष इतना ही माना जायेगा कि उसका विवाहित तो कोई और है, उसके प्रति भी उसका कुछ कर्तव्य बनता है, परन्तु इसके लिए अकेली स्त्री को दोषी न मानकर प्रचलित प्रथा की भी निन्दा करनी होगी। इस प्रकार इस द्वितीया की अपेक्षा जीवित पति से समझौता न कर पाने वाली स्त्री को सर्वथा निकृष्ट मानना होगा। विवाह के उपरान्त पुरुष में आये दोष को तो दैवी विधान समझना चाहिए और विवाह पूर्व के किसी दोष की भली प्रकार जांच परख न करने के लिए स्वयं अपने परिवार वालों को और अन्ततः भाग्य को दोषी मानना चाहिए। हां, छल कपट अथवा धोखा-धड़ी की बात अलग है। इसी प्रकार चार प्रकार की स्वैरिणी स्त्रियों में उत्तरोत्तर को निकृष्ट माना गया है। पुरुष की नपुंसकता अथवा असमर्थता को जीवन-भर के लिए सहन न कर पाने और पर-पुरुष का आश्रय लेने को स्त्री की विवशता मानना चाहिए और इसके लिए विवाह करने वाले पुरुष को दोषी ठहराना चाहिए। देह की क्षुधा की तृप्ति की इच्छा भी तो जीवन धर्म है। संयम-नियम का उपदेश देना सरल है, निभाना टेढ़ी खीर है। गुप्त रूप से पर पुरुष से सम्बन्ध रखने की अपेक्षा, तो दूसरा विवाह कहीं अधिक उचित पग है। हां, इससे पूर्वपति की नाक अवश्य कटती है, उसका पुंसत्व कलंकित होता है, जो होना ही चाहिए। इस प्रथम स्वैरिणी की अपेक्षा द्वितीय स्वैरिणी-देवरों को धता बताकर मनोऽनुकूल पुरुष का वरण करने वाली-उसकी अपेक्षा तृतीया-आश्रयदाता का वरण करने वाली और उसकी भी अपेक्षा चतुर्थी स्वैरिणी-माता पिता, देश काल प्रथा, मर्यादा आदि का अतिक्रमण कर प्रेमविवाह करने वाली अधिक निकृष्ट है। टिप्पणी—हमारे विचार में तो केवल चतुर्थ प्रकार की स्वैरिणी को ही स्वैरिणी कहना उचित है। नपुंसक पति के परित्याग को तो स्वेच्छाचरण नहीं माना जा सकता। द्वितीय स्वैरिणी की भी परिवारजनों के व्यवहार से असन्तुष्ट होकर बाहर जाने की विवशता को समझने पर स्थिति भिन्न हो सकती है। तृतीय स्वैरिणी को तो स्वैरिणी कहना ही सर्वथा अनुचित है। इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण मिलते हैं-जहां नदी, कूप आदि से निकालने वाले चोर डाकुओं, आततायियों तथा दुराचारियों से सम्मान, प्राण आदि की रक्षा करने वाले, भय, आतंक से मुक्त करने वाले वीर एवं उदार पुरुषों के प्रति कृतज्ञतावश अथवा उनके गुणों पर मुग्ध होकर स्त्रियों ने उनसे विवाह कर लिया। ऐसी स्त्रियों को 'स्वैरिणी' कहना तो मानवता का अपमान ही करना होगा। अपत्यमुत्पादयितुस्तासां या शुल्कतो हृता। अशुल्कोपहतायां तु क्षेत्रिकस्यैव तत्फलम्॥ 54 ॥ उपर्युक्त सात प्रकार की स्त्रियां -तीन प्रकार की पुनर्भू और चार प्रकार की 208 / नारदस्मृति

स्वैरिणी, यदि धन देकर ली-दी जाती हैं, तो ऐसी गर्भवती स्त्रियों से उत्पन्न होने वाली सन्तान उत्पादक की होती है। इसके विपरीत बिना शुल्क लिये-दिये विवाह करने वाली स्त्रियों की सन्तान पर वीर्य का आधान करने वाले के स्थान पर क्षेत्र के स्वामी बने पुरुष का ही अधिकार होता है। क्षेत्रिकस्य यदज्ञातं क्षेत्रे बीजं प्रदीयते। न तत्र बीजिनां भागः क्षेत्रिकस्यैव तत्फलम्॥ 55 ॥ वीर्याधान करने वाले किसी भी पुरुष को स्त्री द्वारा गर्भधारण करने की जानकारी होने अथवा न होने पर उत्पन्न सन्तान पर एकमात्र पति का अधिकार होता है, दूसरे पुरुष-यार या द्वितीय पति आदि का नहीं। अभिप्राय यह है कि महत्त्व वीर्य का नहीं, क्षेत्र (स्त्री, भग) के स्वामित्व का है। बीज किसका है—यह विवादास्पद हो सकता है, परन्तु खेत पर स्वामित्व किसका है—यह तो निश्चित तथ्य होता है। ओघवाताहृतं बीजं क्षेत्रे यस्य प्ररोहति। फलभुक्तस्य तत् क्षेत्रं न बीजी फलभाग्भवेत्॥ 56 ॥ जिस प्रकार ऊपर से अपने खेत में फेंका गया बीज उड़कर दूसरे के खेत में जा पड़ता है, तो उस बीज से उत्पन्न उपज पर खेत के स्वामी का अधिकार होता है, बीज के स्वामी का नहीं, उसी प्रकार वीर्य का आधान करने वाले पुरुष का नहीं, अपितु गर्भ धारण करने वाली स्त्री के स्वामी का ही उत्पन्न सन्तान पर अधिकार होता है। महोक्षो जनयेद्वत्सान्यस्य गोषु व्रजे चरन्। तस्य ते यस्य ता गावो मोघं स्पन्दितमार्षभम्॥ 57 ॥ एक अन्य उदाहरण द्वारा इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए स्मृतिकार का कथन है कि जिस प्रकार किसी का वृषभ किसी दूसरे के घर, गोष्ठ अथवा क्षेत्र में खड़ी- विचरण करती गाय से मैथुन कर उसे गर्भवती बनाता है और उस गाय से उत्पन्न होने वाली सन्तान पर गाय के स्वामी ही अधिकार होता है, वृषभ के स्वामी का नहीं—वृषभ का प्रयास केवल यौनतृप्ति माना जाता है—उसी प्रकार पर स्त्री से भोग करने वाला केवल यौन-सुख का आनन्द लेता है, सन्तान का स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकता। क्षेत्रिकानुमते बीजं यस्य क्षेत्रे समर्प्यते। तदपत्यं द्वयोरेव बीजिक्षेत्रिकयोर्मतम्॥ 58 ॥ क्षेत्र के स्वामी की अनुमति से उसके क्षेत्र में बीज वपन करने पर दोनों—क्षेत्र के स्वामी और वपनकर्ता—का क्षेत्र में उत्पन्न उपज (सन्तान) पर समान अधिकार होता है। नारदस्मृति / 209

न स्यात् क्षेत्रं विना सस्यं न वा बीजं विनास्ति तत्। अतोऽपत्यं द्वयोरिष्टं पितुर्मातुश्च धर्मतः ॥ ५९ ॥ वस्तुतः क्षेत्र के बिना वीर्याधान नहीं किया जा सकता और वीर्याधान के बिना खेत खाली पड़ा रहता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि कृषि उपज पाने के लिए दोनों— खेत और बीज—के समान महत्त्व के अनुरूप ही स्त्री (खेत) और पुरुष (वीर्य) का अथवा शालीन भाषा में माता-पिता का एक-समान महत्त्व है। नान्यपत्यं परगृहे संयुक्तस्य स्त्रिया सह। दृष्टं संग्रहणं तज्ज्ञैर्नागतायाः स्वयं गृहे ॥ ६० ॥ दूसरे के घर में जाकर पराई स्त्री से सम्भोग करते हुए पकड़ा जाने वाला पुरुष अवश्य दण्डनीय है, परन्तु अपने घर स्वयं आयी, पराई स्त्री से सम्भोग करते हुए पकड़े गये पुरुष को दण्डित नहीं करना चाहिए। अदुष्टत्यक्तदारस्य क्लीबस्य क्षयिकस्य च। सेच्छानुपैयुषो दारामदोषः साहसे भवेत् ॥ ६१ ॥ स्त्री के किसी दोष अथवा अपराध के बिना उसका त्याग करने वाले—स्त्री के असुन्दर, अनाकर्षक अथवा मलिन होने के कारण अथवा पुरुष की किसी अन्य स्त्री में अनुरक्ति-आसक्ति के कारण उससे विरक्त—क्लीब तथा असाध्य रोगग्रस्त, अर्थात् उसकी इच्छा से मैथुन करने वाले—पुरुष को दोषी नहीं मानना चाहिए। वस्तुतः ऐसी स्त्री को तृप्त-सन्तुष्ट करना, तो भूखे को भोजन खिलाने और प्यासे को जल पिलाने के समान एक प्रकार का पुण्यकर्म है। यह तो पुरुष का दयाभाव भी हो सकता है। परस्त्रियां सहाकालेऽदेशे वा भवतोमिथः। स्थानसम्भाषणा मोदास्त्रयः संग्रहणक्रमाः ॥ ६२ ॥ असमय—रात के अंधेरे में, अस्थान—निर्जन वन में, घर के एकान्त में अथवा किसी गुप्त स्थान (झाड़ियों के पीछे, सूने पड़े दुर्ग आदि) में, 1. पराई स्त्री के साथ घूमना, फिरना, उठना-बैठना, 2. बातचीत करना तथा 3. हास्य विनोद करना अपराध है। इन तीनों क्रियाओं को ही पकड़ा जाना कहा जाता है। ऐसा करते हुए युवक युवती देखने वालों की दृष्टि में आने से बचने की चेष्टा करते हैं। नदीनां संगमे तीर्थेष्वारामेषु वनेषु च। स्त्रीपुंसौ यत्समैयातां तच्च संग्रहणं स्मृतम् ॥ ६३ ॥ दूसरों की दृष्टि से बचने के लिए स्त्रियों और पुरुषों का गुपचुप एक-दूसरे से निम्नोक्त स्थानों पर मिलना भी संग्रहण—पकड़े जाने से बचने का प्रयास— कहलाता है।

  1. नदियों का संगम स्थल प्रयाग आदि, 2. तीर्थ स्थल (हरद्वार आदि), 3 210 / नारदस्मृति

उद्यान तथा निर्जन वन। इन स्थानों में परिचितों के मिलने की कम सम्भावना रहती है। स्मृतिकारों के अनुसार प्रेमी युगल (युवक-युवती) इन स्थानों को अपनी प्रणयलीला के लिए सुरक्षित पाते हैं। इन स्थानों पर सशंक रूप से घूमते हुए युगलों को घर से भागे तथा अनुचित चेष्टारत मानकर पकड़ लेना चाहिए। दूतीप्रस्थापनैर्वापि लेखसम्प्रेषणैरपि। अन्यैश्च विविधैर्दोषैर्ग्राह्यं संग्रहणं बुधैः ॥ 64 ॥ बुद्धिमानों को किसी युवक-युवती को एक-दूसरे के पास सन्देशवाहक को भेजते अथवा उसके स्वागत पत्रों का आदान-प्रदान करते तथा इस प्रकार के अन्यान्य गुप्त एवं दूषित चेष्टाएं देखकर दोनों की एक-दूसरे में अनुरक्ति-आसक्ति समझकर उन्हें पकड़ लेना चाहिए। स्त्रियं स्पृशेददेशे यः स्पृष्टो वा मर्षयेत्तथा। परस्परस्यानुमतं सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 65 ॥ पुरुष और स्त्री को एक-दूसरे के गुप्त अंगों को स्पर्श करते हुए अथवा एक- दूसरे के द्वारा किये जा रहे स्पर्श का निवारण न करते हुए, अपितु उलटे प्रोत्साहन (आंखें मटकाना, हंसना, मुख से सीटी बजाना, उछलना, गुदगुदाना, गीत गाना, रोमाञ्चित होना तथा सीत्कारना आदि) देते हुए देखकर उन्हें परस्पर अनुरक्त मानते हुए पकड़ा जा सकता है। उपकारक्रिया केलिः स्पर्शो भूषणवाससाम्। सहखट्वासनं चैव सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 66 ॥ प्रसन्न भाव से एक-दूसरे को अंगवस्त्रों का आदान-प्रदान, एक-दूसरे से हास-परिहास तथा उनकी प्रशंसा के बहाने एक-दूसरे के अंगों को छूना तथा दोनों का एक ही आसन पर एक-दूसरे के साथ सटकर बैठना आदि एक-दूसरे के प्रति आकर्षण एवं अनुराग वृद्धि के लक्षण हैं। पाणौ यश्च निगृह्णीयाद्वेण्यां वस्त्राञ्चलेऽपि वा। तिष्ठ तिष्ठेति वा ब्रूयात् सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 67 ॥ युवक द्वारा युवती के वस्त्रों व उसकी वेणी आदि को अपने हाथों में हलके से खींचना-झटकना और युवती द्वारा कृत्रिम क्रोध से मुसकराते हुए—ठहर, अभी तुझे मज़ा चखाती हूं—कहना और उसके पीछे भागना आदि चेष्टाएं दोनों की पारस्परिक अनुरक्ति के लक्षण हैं। वस्त्रैराभरणैर्माल्यैः पानैर्भक्ष्यस्तथैव च। सम्प्रेष्यमाणैर्गन्धैश्च वेद्यं संग्रहणं बुधैः ॥ 68 ॥ प्रेमी-प्रेमिका को एक-दूसरे के पास वस्त्रों, आभूषणों, पुष्पमालाओं, पेयपदार्थों, नारदस्मृति / 211

दर्पाद्वा यदि वा मोहाच्छ्लाघया वा स्वयं वदेत्।

उत्तम भक्ष्य पदार्थों तथा अन्यान्य उपहारों का आदान प्रदान करता देखकर, उन दोनों की परस्पर अनुरक्ति का अनुमान लगाना चाहिए। दर्पाद्वा यदि वा मोहाच्छ्लाघया वा स्वयं वदेत्। ममेयं भुक्तपूर्वेति तच्च संग्रहणं स्मृतम्॥ ६९॥ किसी युवक प्रेमी द्वारा दर्प तथा मोहवश अथवा मिथ्या आत्म-विज्ञान की इच्छा से प्रेरित होकर किसी युवती को अपनी 'भुक्ता' कहने का अर्थ, उसकी उसे पाने की उत्कट अभिलाषा ही समझना चाहिए। युवती को अन्य उपायों से पाने में असफल युवक कभी कभी उसे अपमानित-कलंकित करने से ही पाना सम्भव मानकर ऐसी ओछी हरकतें करते हैं। वस्तुतः इसे युवक प्रेमी की कुण्ठा और निराशा की परिणति ही समझना चाहिए; क्योंकि वह समझता है कि वश में नहीं आती, तो मिथ्या आरोप लगाने में क्या बुराई है। वैसे, इस प्रकार के हताश प्रेमी को ओछा व्यक्ति ही समझना चाहिए। सजात्यतिशये पुंसां दण्ड उत्तमसाहसः। मध्यमस्त्वानुलोम्येन प्रातिलोम्ये प्रमापणम्॥ ७०॥ समान वर्ण, जाति और स्थिति के व्यक्तियों द्वारा स्त्रियों पर मिथ्या आरोप लगाकर, उन्हें वश में करने की चेष्टा करने पर युवक को उत्तम साहस का दण्ड और उच्च वर्ण, जाति एवं स्थिति के पुरुष द्वारा अपने से निम्न जाति, वर्ण एवं स्थिति की स्त्री को मिथ्या कलंकित करने पर मध्यम साहस का दण्ड देना चाहिए। निम्न वर्ण जाति वाले युवक प्रेमी द्वारा अपने से उच्च वर्ण-जाति की युवती को अनुचित रूप से अपमानित करने पर पुरुष को मृत्यु-दण्ड दिया जाना चाहिए। कन्यायामस्कामायां द्वयाङ्गुलस्यावकर्तनम्। उत्तमार्या वधस्त्वेव सर्वं संग्रहणं तथा॥ ७१॥ हीन अथवा समान वर्ण, जाति तथा स्थिति की कन्या की इच्छा के विरुद्ध उसकी योनि को अंगुलि से अथवा लिंग से आहत करने वाले पुरुष के हाथ की दो अंगुलियां काट डालनी चाहिए। अपने से उन्नत वर्ण-जाति की स्त्री से बलात्कार करने वाले से न केवल उसकी सारी सम्पत्ति छीन लेनी चाहिए, अपितु उसे मृत्यु दण्ड भी देना चाहिए। सकामायां तु कन्यायां सङ्गमे नास्त्यतिक्रमः। किन्त्वलंकृत्य सत्कृत्य स एवैनां समुद्वहेत्॥ ७२॥ कन्या की इच्छा एवं सहमति से उससे मैथुन करने वाला पुरुष दोषी नहीं माना जाता। हां, पुरुष को अपने द्वारा भोगी गयी कन्या को समुचित आदर देते हुए, उसे सजा-धजा कर उससे विवाह कर लेना चाहिए। टिप्पणी—विवाह पूर्व प्रेमी से यौन सम्बन्ध रखने वाली कन्या को तो 212 / नारदस्मृति

असंयत एवं उच्छृंखल ही कहा जायेगा। प्रेमान्ध व्यक्तियों की बात छोड़ दें, तो ऐसी स्त्रियों को युवक प्रायः अपने विलास की सामग्री समझते हैं, उन्हें अपनी अर्धांगिनी कदापि नहीं बनाते। माता मातृष्वसा श्वश्रूर्मातुलानी पितृष्वसा। पितृव्यसखिशिष्यस्त्री भगिनी तत्सखी स्नुषा ॥ 73 ॥ दुहिताऽऽचार्यभार्या च सगोत्रा शरणागता। राज्ञी प्रव्रजिता धात्री साध्वी वर्णोत्तमा च या ॥ 74 ॥ असा मान्यतमां गत्वा गुरुतल्पग उच्यते। शिश्नस्योत्कर्तनं तस्य नान्यो दण्डो विधीयते ॥ 75 ॥ निम्नोक्त बीस सम्बन्धियों से सम्भोग करने वाले युवक के लिंग को काट देना ही इस पाप का एकमात्र दण्ड है, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई दण्ड नहीं है— सम्बन्धी स्त्रियां हैं—

  1. अपने पिता की पत्नी (माता तथा माता से भिन्न अन्य स्त्री, विमाता आदि), 2. माता की भगिनी (मौसी), 3. सासू मां, 4. मामी, 5. पिता की बहिन, बुआ, 6. चाचा की पत्नी या रखैल, 7. शिष्य की स्त्री, 8. बहिन, चाचा, मामा आदि की लड़की, 10. पुत्रवधू, 11. अपनी पुत्री, 12. आचार्य की पत्नी, 13 अपने गोत्र—दूर के चाचा, भाई आदि की बहिन, पुत्री, बहू आदि, 14. शरण में आयी हुई असहाय स्त्री, 15. रानी, 16. संन्यासिनी, 17. दायी—पालन करने वाली अथवा स्तनपान कराने वाली स्त्री, 18. उत्तमर्ण की पतिव्रता स्त्री, 19. अपने वर्ण से भिन्न वर्ण जाति की स्त्री तथा 20. भाई की पत्नी। पशुयोनावतिक्रामन् विनेयः स दमं शतम्। मध्यमं साहसं गोषु तदेवान्त्यावसायिषु ॥ 76 ॥ स्त्री पशुओं की योनि में लिंग-प्रवेश का दण्ड एक सौ पण है। गाय तथा चाण्डाल स्त्री से सम्भोग का मध्यम साहस दण्ड है। अगम्यागामिनश्चाति दण्डो राज्ञा प्रचोदितः। प्रायश्चित्तविधानं तु पापानां स्याद् विशोधनम् ॥ 77 ॥ अगम्या—सम्भोग के लिए वर्जित—विमाता, गुरुपत्नी तथा शिष्या आदि— से मैथुन करने वाला, जहां राजा द्वारा दण्डित होता है, वहां उसे अपनी शुद्धि के लिए शास्त्रों में निर्दिष्ट प्रायश्चित्त भी करना होता है। इसके बिना वह जाति से बहिष्कृत माना जाता है। स्वैरिण्यब्राह्मणी वेश्या दासी निष्कासिनी च या। गम्याः स्युरानुलोम्येन स्त्रियो न प्रतिलोमतः ॥ 78 ॥ अपने से निम्न अथवा अपने समान वर्ण की निम्नोक्त स्त्रियों से मैथुन करने नारदस्मृति / 213