संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ४० ] नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान-प्राप्ति १३९ दितेः पुत्रो महानासीद्धिरण्यकशिपुः पुरा। | पूर्वकालमें दितिका पुत्र हिरण्यकशिपु महान् प्रतापी तपस्तेपे निराहारो बहुवर्षसहस्रकम्॥ २ | हुआ। उसने अनेक सहस्र वर्षोंतक निराहार रहते हुए तपतस्तस्य संतुष्टो ब्रह्मा तं प्राह दानवम्। | तपस्या की। उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो ब्रह्माजीने उस वरं वरय दैत्येन्द्र यस्ते मनसि वर्तते॥ ३ | दानवसे कहा—'दैत्येन्द्र! तुम्हारे मनको जो प्रिय लगे, इत्युक्तो ब्रह्मणा दैत्यो हिरण्यकशिपुः पुरा। | वही वर माँग लो।' दैत्य हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीके इस उवाच नत्वा देवेशं ब्रह्माणं विनयान्वितः॥ ४ | प्रकार कहनेपर उन देवेश्वरसे विनयपूर्वक प्रणाम करके | कहा॥ २-४॥ हिरण्यकशिपुरुवाच | यदि त्वं वरदानाय प्रवृत्तो भगवन्मम। | हिरण्यकशिपु बोला—ब्रह्मन्! भगवन्! यदि आप यद्यद्वृणोम्यहं ब्रह्मांस्तत्तन्मे दातुमर्हसि॥ ५ | मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं जो-जो माँगता हूँ, न शुष्केण न चार्द्रेण न जलेन न वह्निना। | वह सब देनेकी कृपा करें। मैं न सूखी वस्तुसे मरूँ न न काष्ठेन न कीटेन पाषाणेन न वायुना॥ ६ | गीलीसे; न जलसे न आगसे; न काठसे न कीड़ेसे और नायुधेन न शूलेन न शैलेन न मानुषैः। | न पत्थर या हवासे ही मेरी मृत्यु हो। न शूल अथवा न सुरैरसुरैर्वापि न गन्धर्वैर्न राक्षसैः॥ ७ | किसी और शस्त्रसे न पर्वतसे; न मनुष्योंसे न देवता, न किन्नरैर्न यक्षैस्तु विद्याधरभुजंगमैः। | असुर, गन्धर्व अथवा राक्षसोंसे ही मरूँ। न किंनरोंसे न न वानरैर्मृगैर्वापि नैव मातृगणैरपि॥ ८ | यक्ष, विद्याधर अथवा भुजंगोंसे; न वानर तथा अन्य नाभ्यन्तरे न बाह्ये तु नान्यैर्मरणहेतुभिः। | पशुओंसे और न दुर्गा आदि मातृगणोंसे ही मेरी मृत्यु न दिने न च नक्तं मे त्वत्प्रसादाद् भवेन्मृतिः॥ ९ | हो। मैं न घरके भीतर मरूँ न बाहर; न दिनमें मरूँ न इति वै देवदेवेशं वरं त्वत्तो वृणोम्यहम्। | रातमें तथा आपकी कृपासे मृत्युके हेतुभूत अन्य कारणोंसे | भी मेरी मृत्यु न हो। देवदेवेश्वर! मैं आपसे यही वर मार्कण्डेय उवाच | माँगता हूँ॥ ५-९ १/२॥ इत्युक्तो दैत्यराजेन ब्रह्मा तं प्राह पार्थिव॥ १० | मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! दैत्यराज तपसा तव तुष्टोऽहं महता तु वरानिमान्। | हिरण्यकशिपुके यों कहनेपर ब्रह्माजीने उससे कहा— दुर्लभानपि दैत्येन्द्र ददामि परमाद्भुतान्॥ ११ | 'दैत्येन्द्र! तुम्हारे महान् तपसे संतुष्ट होकर मैं इन परम अन्येषां नेदृशं दत्तं न तैरित्थं तपः कृतम्। | अद्भुत वरोंको दुर्लभ होनेपर भी तुम्हें दे रहा हूँ। दूसरे त्वत्प्रार्थितं मया दत्तं सर्वं ते चास्तु दैत्यप॥ १२ | किसीको मैंने ऐसा वर नहीं दिया है और न दूसरोंने गच्छ भुङ्क्ष्व महाबाहो तपसामूर्जितं फलम्। | ऐसी तपस्या ही की है। दैत्यपते! तुम्हारे माँगे हुए सभी इत्येवं दैत्यराजस्य हिरण्यकशिपोः पुरा॥ १३ | वर मैंने तुम्हें दे दिये; वे सब तुम्हें प्राप्त हों। महाबाहो! दत्त्वा वरान् ययौ ब्रह्मा ब्रह्मलोकमनुत्तमम्। | अब जाओ और अपने तपके बढ़े हुए उत्कृष्ट फलको सोऽपि लब्धवरो दैत्यो बलवान् बलदर्पितः॥ १४ | भोगो।' इस प्रकार पूर्वकालमें दैत्यराज हिरण्यकशिपुको देवान् सिंहान् रणे जित्वा दिवः प्राच्यावयद् भुवि। | अभीष्ट वर देकर ब्रह्माजी अपने परम उत्तम लोकको दिवि राज्यं स्वयं चक्रे सर्वशक्तिसमन्वितम्॥ १५ | चले गये। उस बलवान् दैत्यने भी वर पाकर बलसे | उन्मत्त हो श्रेष्ठ देवताओंको युद्धमें जीतकर उन्हें स्वर्गसे | पृथ्वीपर गिरा दिया तथा वह स्वयं स्वर्गलोकमें रहकर | वहाँका सर्वशक्तिसम्पन्न राज्य भोगने लगा॥ १०-१५॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४०
१४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४०
देवा अपि भयात्तस्य रुद्राश्चैवर्षयो नृप। विचेरुरवनौ सर्वे बिभ्राणा मानुषीं तनुम्॥ १६ प्राप्तत्रैलोक्यराज्योऽसौ हिरण्यकशिपुः प्रजाः। आहूय सर्वा राजेन्द्र वाक्यं चेदमभाषत॥ १७ न यष्टव्यं न होतव्यं न दातव्यं सुरान् प्रति। युष्माभिरहमेवाद्य त्रैलोक्याधिपतिः प्रजाः॥ १८ ममैव पूजां कुरुत यज्ञदानादिकर्मणा। ताश्च सर्वास्तथा चक्रुर्दैत्येन्द्रस्य भयान्नृप॥ १९ यत्रैवं क्रियमाणेषु त्रैलोक्यं सचराचरम्। अधर्मयुक्तं सकलं बभूव नृपसत्तम॥ २० स्वधर्मलोपात् सर्वेषां पापे मतिरजायत। गते काले तु महति देवाः सेन्द्रा बृहस्पतिम्॥ २१ नीतिज्ञं सर्वशास्त्रज्ञं पप्रच्छुर्वि नयान्विताः। हिरण्यकशिपोरेस्य विनाशं मुनिसत्तम॥ २२ त्रैलोक्यहारिणः शीघ्रं वधोपायं वदस्व नः।
बृहस्पतिरुवाच शृणुध्वं मम वाक्यानि स्वपदप्राप्तये सुराः॥ २३ प्रायो हिरण्यकशिपुः क्षीणभागो महासुरः। शोको नाशयति प्रज्ञां शोको नाशयति श्रुतम्॥ २४ शोको मतिं नाशयति नास्ति शोकसमो रिपुः। सोढुं शक्योऽग्निसम्बन्धः शस्त्रस्पर्शश्च दारुणः॥ २५ न तु शोकभवं दुःखं संसोढुं नृप शक्यते। कालानिमित्ताच्च वयं लक्ष्यामस्तत्क्षयं सुराः॥ २६ बुधाश्च सर्वे सर्वत्र स्थिता वक्ष्यन्ति नित्यशः। अचिरादेव दुष्टोऽसौ नश्यत्येव परस्परम्॥ २७ देवानां तु परामृद्धिं स्वपदप्राप्तिलक्षणाम्। हिरण्यकशिपोर्नाशं शकुनानि वदन्ति मे॥ २८ यत एवमतो देवाः सर्वे गच्छत माचिरम्। क्षीरोदस्योत्तरं तीरं प्रसुप्तो यत्र केशवः॥ २९ युष्माभिः संस्तुतो देवः प्रसन्नो भवति क्षणात्। स हि प्रसन्नो दैत्यस्य वधोपायं वदिष्यति॥ ३०
नरेश्वर! इन्द्रादि देवता, रुद्र तथा ऋपिगण भी उसके भयसे मनुष्यरूप धारणकर पृथ्वीपर विचरते थे। राजेन्द्र! त्रिभुवनका राज्य प्राप्त कर लेनेपर हिरण्यकशिपुने समस्त प्रजाओंको बुलाकर उनसे यह वाक्य कहा—'प्रजागण! तुम लोग देवताओंके लिये यज्ञ, होम और दान न करो। अब मैं ही त्रिभुवनका अधीश्वर हूँ; अतः यज्ञ और दानादि कर्मोंद्वारा मेरी ही पूजा करो।' राजन्! यह सुनकर वे सभी प्रजाएँ उसके भयसे वैसा ही करने लगीं। नृपश्रेष्ठ! वहाँ ऐसा व्यवहार चालू होनेपर चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिभुवन अधर्मपरायण हो गया। स्वधर्मका लोप हो जानेसे सबकी बुद्धि पापमें प्रवृत्त हो गयी। इस तरह बहुत समय बीतनेपर इन्द्रसहित सब देवताओंने मिलकर समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता तथा नीतिवेत्ता बृहस्पतिजीसे विनयपूर्वक पूछा—'मुनिश्रेष्ठ! त्रिलोकीका राज्य छीननेवाले इस हिरण्यकशिपुके विनाशका समय और उसका उपाय हमें शीघ्र बताइये'॥ १६–२२ १/२॥
बृहस्पतिजी बोले—देवताओ! तुम लोग अपने स्थानकी प्राप्तिके लिये मेरे ये वाक्य सुनो—'इस महान् असुर हिरण्यकशिपुके पुण्यका अंश प्रायः क्षीण हो चुका है। [इसे अपने भाई हिरण्याक्षकी मृत्युसे बहुत शोक हुआ है।] यह शोक बुद्धिको नष्ट और शास्त्रज्ञानको चौपट कर देता है, विचारशक्तिको भी क्षीण कर डालता है; अतः शोकके समान कोई शत्रु नहीं है। नरेश्वर! अपने शरीरपर अग्निका स्पर्श और दारुण शस्त्र-प्रहार भी सहा जा सकता है, परंतु शोकजन्य दुःखका सहन नहीं किया जा सकता। देवताओ! इस शोकसे और कालरूप निमित्तसे हम हिरण्यकशिपुका नाश निकट देख रहे हैं। इसके अतिरिक्त सभी विद्वान् सर्वत्र परस्पर यही कहा करते हैं कि दुष्ट हिरण्यकशिपु अब शीघ्र ही नष्ट होनेवाला है। मेरे शकुन भी यही बताते हैं कि देवताओंको अपने पद— स्वर्ग-साम्राज्यकी प्राप्तिरूप महती समृद्धि मिलनेवाली है और हिरण्यकशिपुका नाश होना चाहता है। चूँकि ऐसा ही होनेवाला है, इसलिये तुम सभी देवता क्षीरसागरके उत्तरतटपर, जहाँ भगवान् विष्णु शयन करते हैं, शीघ्र ही जाओ। तुम लोगोंके भलीभाँति स्तवन करनेपर वे भगवान् क्षणभरमें ही प्रसन्न हो जायँगे और प्रसन्न होनेपर वे ही उस दैत्यके वधका उपाय बतायेंगे॥ २३–३०॥
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अध्याय ४०] नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान-प्राप्ति १४१
अध्याय ४०] नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान-प्राप्ति १४१ इत्युक्तास्तेन देवास्ते साधु साध्वित्यथाब्रुवन् । श्रीबृहस्पतिजीके इस प्रकार कहनेपर सभी देवता प्रीत्या च परया युक्ता गन्तुं चक्रुरथोधमम् ॥ ३१ कहने लगे- 'भगवान् ! आपने बहुत अच्छा कहा, बहुत पुण्ये तिथौ शुभे लग्ने पुण्यं स्वस्ति च मङ्गलम्। अच्छा कहा।' और वे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वहाँ कारयित्वा मुनिवरैः प्रस्थितास्ते दिवौकसः ॥ ३२ जानेका उद्योग करने लगे। नृपवर ! वे देवगण किसी नाशाय दुष्टदैत्यस्य स्वभूत्यै च नृपोत्तम । पुण्यतिथिको शुभ लग्नमें मुनिवरोंद्वारा पुण्याहवाचन, ते शर्वमग्रतः कृत्वा क्षीराब्धेरुत्तरं तटम् ॥ ३३ स्वस्तिवाचन और मङ्गलपाठ कराकर दुष्ट दैत्य तत्र गत्वा सुराः सर्वे विष्णुं जिष्णुं जनार्दनम्। (हिरण्यकशिपु)-के विनाश और अपनी ऐश्वर्य-वृद्धिके अस्तुवन् विविधैः स्तोत्रैः पूजयन्तः प्रतस्थिरे ॥ ३४ लिये महादेवजीको आगे करके क्षीरसागरके उत्तर तटकी भवोऽपि भगवान् भक्त्या भगवन्तं जनार्दनम्। ओर प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर सभी देवता विजयशील अस्तुवन्नामभिः पुण्यैरेकाग्रमनसा हरिम् ॥ ३५ जनार्दन भगवान् विष्णुका नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा श्रीमहादेव उवाच स्तवन-पूजन करते हुए वहाँ खड़े रहे। भगवान् शङ्कर विष्णुर्जिष्णुर्विभुर्देवो यज्ञेशो यज्ञपालकः । भी भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्तसे भगवान् जनार्दनके पवित्र प्रभविष्णुर्ग्रसिष्णुश्च लोकात्मा लोकपालकः ॥ ३६ नामोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३१-३५॥ केशवः केशिका कल्पः सर्वकारणकारणम् । कर्मकृद् वामनाधीशो वासुदेवः पुरुष्टुतः ॥ ३७ श्रीमहादेवजी बोले - विष्णु, जिष्णु, विभु, देव, आदिकर्ता वराहश्च माधवो मधुसूदनः । यज्ञेश, यज्ञपालक, प्रभविष्णु, ग्रसिष्णु, लोकात्मा, नारायणो नरो हंसो विष्णुसेनो हुताशनः ॥ ३८ लोकपालक, केशव, केशिका, कल्प, सर्वकारणकारण, ज्योतिष्मान् द्युतिमान् श्रीमानायुष्मान् पुरुषोत्तमः । कर्मकृत्, वामनाधीश, वासुदेव, पुरुष्टुत, आदिकर्ता, वराह, वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुरार्चितः ॥ ३९ माधव, मधुसूदन, नारायण, नर, हंस, विष्णुसेन, हुताशन, नरसिंहो महाभीमो वज्रदंष्ट्रो नखायुधः । ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, श्रीमान्, आयुष्मान्, पुरुषोत्तम, आदिदेवो जगत्कर्ता योगेशो गरुडध्वजः ॥ ४० वैकुण्ठ, पुण्डरीकाक्ष, कृष्ण, सूर्य, सुरार्चित, नरसिंह, गोविन्दो गोपतिर्गोप्ता भूपतिर्भुवनेश्वरः । महाभीम, वज्रदंष्ट्र, नखायुध, आदिदेव, जगत्कर्ता, योगेश, पद्मनाभो हृषीकेशो विभुर्दामोदरो हरिः ॥ ४१ गरुडध्वज, गोविन्द, गोपति, गोप्ता, भूपति, भुवनेश्वर, त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो ब्रह्नेशः प्रीतिवर्धनः । पद्मनाभ, हृषीकेश, विभु, दामोदर, हरि, त्रिविक्रम, त्रिलोकेश, वामनो दुष्टदमनो गोविन्दो गोपवल्लभः ॥ ४२ ब्रह्नेश, प्रीतिवर्धन, वामन, दुष्टदमन, गोविन्द, गोपवल्लभ, भक्तिप्रियोऽच्युतः सत्यः सत्यकीर्तिध्रुवः शुचिः । भक्तिप्रिय, अच्युत, सत्य, सत्यकीर्ति, ध्रुव, शुचि, कारुण्य, कारुण्यः वरुणो व्यासः पापहा शान्तिवर्धनः ॥ ४३ करुण, व्यास, पापहा, शान्तिवर्धन, संन्यासी, शास्त्रतत्त्वज्ञ, संन्यासी शास्त्रतत्त्वज्ञो मन्दारगिरिकेतनः । मन्दारगिरिकेतन, बदरीनिलय, शान्त, तपस्वी, वैद्युतप्रभ, बदरीनिलयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतप्रभः ॥ ४४ भूतावास, गुहावास, श्रीनिवास, श्रियः पति, तपोवास, दम, भूतावासो गुहावासः श्रीनिवासः श्रियः पतिः । वास, सत्यवास, सनातन पुरुष, पुष्कल, पुण्य, पुष्कराक्ष, तपोवासो दमो वासः सत्यवासः सनातनः ॥ ४५ महेश्वर, पूर्ण, पूर्ति, पुराणज्ञ, पुण्यज्ञ, पुण्यवर्द्धन, शङ्खी, पुरुषः पुष्कलः पुण्यः पुष्कराक्षो महेश्वरः । चक्री, गदी, शार्ङ्गी, लाङ्गली, मुशली, हली, किरीटी, पूर्णः पूर्तिः पुराणज्ञः पुण्यज्ञः पुण्यवर्द्धनः ॥ ४६ कुण्डली, हारी, मेखली, कवची, ध्वजी, जिष्णु, जेता, शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी लाङ्गली मुशली हली । महावीर, शत्रुघ्न, शत्रुतापन, शान्त, शान्तिकर, शास्ता, किरीटी कुण्डली हारी मेखली कवची ध्वजी ॥ ४७ जिष्णुर्जेता महावीरः शत्रुघ्नः शत्रुतापनः । शान्तः शान्तिकरः शास्ता शङ्करः शांतनुस्तुतः ॥ ४८ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४०
१४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४० सारथिः सात्त्विकः स्वामी सामवेदप्रियः समः। शंकर, शांतनुस्तुत, सारथि, सात्त्विक, स्वामी, सामवेदप्रिय, सावनः साहसी सत्त्वः सम्पूर्णांशः समृद्धिमान्॥४९ सम, सावन, साहसी, सत्त्व, सम्पूर्णांश, समृद्धिमन्, स्वर्गद, स्वर्गदः कामदः श्रीदः कीर्तिदः कीर्तिनाशनः। कामद, श्रीद, कीर्तिद, कीर्तिनाशन, मोक्षद, पुण्डरीकाक्ष, मोक्षदः पुण्डरीकाक्षः क्षीराब्धिकृतकेतनः॥५० क्षीराब्धिकृतकेतन, सुरासुरैःस्तुत, प्रेरक और पापनाशन आदि स्तुतः सुरासुरैरीश प्रेरकः पापनाशनः। नामोंसे कहे जानेवाले परमेश्वर! आप ही यज्ञ, वषट्कार, ॐकार तथा आहवनीयादि अग्निरूप हैं। पुरुषोत्तम! देव! त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोंकारस्त्वमग्रयः॥५१ आप ही स्वाहा, स्वधा और सुधा हैं, आप सनातन देवदेव त्वं स्वाहा त्वं स्वधा देव त्वं सुधा पुरुषोत्तम। भगवान् विष्णुको नमस्कार है। गरुडध्वज! आप प्रमाणोंके नमो देवादिदेवाय विष्णवे शाश्वताय च॥५२ अविषय तथा अनन्त हैं॥३६-५२१/२॥ अनन्तायाप्रमेयाय नमस्ते गरुडध्वज। मार्कण्डेयजी बोले-इन दिव्य नामोंद्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् मधुसूदनने प्रत्यक्ष प्रकट होकर मार्कण्डेय उवाच सम्पूर्ण देवताओंसे यह वचन कहा॥५३१/२॥ इत्येतैर्नामभिर्दिव्यैः संस्तुतो मधुसूदनः॥५३ श्रीभगवान् बोले-देवगण! तुम लोगोंने केवल उवाच प्रकटीभूत्वा देवान् सर्वानिदं वचः। कल्याणकारी नामोंद्वारा मेरा स्तवन किया है, अतः मैं तुमपर प्रसन्न हूँ; कहो, तुम्हारा क्या कार्य सिद्ध श्रीभगवानुवाच करूँ?॥५४१/२॥ युष्माभिः संस्तुतो देवा नामभिः केवलैः शुभैः॥५४ देवता बोले-हे देवदेव! हे हृषीकेश! हे अत एव प्रसन्नोऽस्मि किमर्थं करवाणि वः। कमलनयन! हे लक्ष्मीपते! हे हरे! आप तो सब कुछ जानते हैं; फिर हमसे क्यों पूछ रहे हैं?॥५५१/२॥ देवा ऊचुः श्रीभगवान् बोले-असुरनाशक देवताओ! तुम देवदेव हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव॥५५ लोगोंके आनेका सारा कारण मुझे ज्ञात है। जगत्का त्वमेव जानासि हरे किं तस्मात् परिपृच्छसि। कल्याण करनेवाले महादेवजीने तथा तुमने हिरण्यकशिपु दैत्यका नाश करानेके लिये मेरे एक सौ पुण्यनामोंद्वारा श्रीभगवानुवाच मेरा स्तवन किया है। महामते शिव! तुम्हारे कहे हुए युष्मदागमनं सर्वं जानाम्यसुरसूदनाः॥५६ इन सौ नामोंसे जो मेरा नित्य स्तवन करेगा, उस हिरण्यकविनाशार्थं स्तुतोऽहं शङ्करेण तु। पुरुषद्वारा मैं उसी प्रकार प्रतिदिन पूजित होऊँगा, जैसे पुण्यनामशतेनैव संस्तुतोऽहं भवेन च॥५७ इस समय तुम्हारे द्वारा हुआ हूँ। देव शम्भो! मैं तुमपर एतेन यस्तु मां नित्यं त्वयोक्तेन महामते। प्रसन्न हूँ, अब तुम अपने शुभ कैलासशिखरको जाओ। तेनाहं पूजितो नित्यं भवामीह त्वया यथा॥५८ तुमने मेरी स्तुति की है, अतः तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मैं हिरण्यकशिपुका वध करूँगा। देवताओ! अब तुम भी प्रीतोऽहं गच्छ देव त्वं कैलासशिखरं शुभम्। जाओ और कुछ कालतक प्रतीक्षा करो। जब इस त्वया स्तुतो हनिष्यामि हिरण्यकशिपुं भव॥५९ हिरण्यकशिपुके प्रह्लाद नामक बुद्धिमान् विष्णुभक्त पुत्र गच्छध्वमधुना देवाः कालं कंचित् प्रतीक्षताम्। होगा और जिस समय यह दैत्य प्रह्लादसे द्रोह करेगा, उस यदास्य तनयो धीमान् प्रह्लादो नाम वैष्णवः॥६० समय वरोंसे रक्षित होकर देवताओं और दानवोंसे भी तस्य द्रोहं यदा दैत्यः करिष्यति सुरांस्तदा। नहीं जीते जा सकनेवाले इस असुरका मैं अवश्य वध हनिष्यामि वरैर्गुप्तमजेयं देवदानवैः। कर डालूँगा। राजन्! भगवान् विष्णुके इस प्रकार कहनेपर इत्युक्त्वा विष्णुना देवा नत्वा विष्णुं ययुर्नृप॥६१ देवगण उन्हें प्रणाम करके चले गये॥५६-६१॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे विष्णोर्नामस्तोत्रं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः॥४०॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'विष्णुका नाममय स्तोत्र' नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥४०॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
इकतालीसवाँ अध्याय
अध्याय ४१ ] प्रह्लादकी उत्पत्ति और उनकी हरि-भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता १४३ इकतालीसवाँ अध्याय प्रह्लादकी उत्पत्ति और उनकी हरि-भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता सहस्रानीक उवाच मार्कण्डेय महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । प्रादुर्भावं नृसिंहस्य यथावद्वक्तुमर्हसि ॥ १ वद प्रह्लादचरितं विस्तरेण ममानघ । धन्या वयं महायोगिंस्त्वत्प्रसादान्महामुने ॥ २ सुधां पिबामो दुर्लभां धन्याः श्रीशकथाभिधाम् । श्रीमार्कण्डेय उवाच पुरा हिरण्यकशिपोस्र्तपोऽर्थं गच्छतो वनम् ॥ ३ दिग्दाहो भूमिकम्पश्च जातस्तस्य महात्मनः । वारितो बन्धुभिर्भृत्यैर्मित्रैश्च हितकारिभिः ॥ ४ शकुना विगुणा राजञ्जातास्तच्च न शोभनम् । त्रैलोक्याधिपतिस्त्वं हि सर्वे देवाः पराजिताः ॥ ५ तवास्ति न भयं सौम्य किमर्थं तप्यते तपः । प्रयोजनं न पश्यामो वयं बुद्ध्या समन्विताः ॥ ६ यो भवेन्न्यूनकामो हि तपश्चर्यां करोति सः । एवं तैर्वार्यमाणोऽपि दुर्मदो मदमोहितः ॥ ७ यातः कैलासशिखरं द्वित्रैर्मित्रैः परिवृतः । तस्य संतप्यमानस्य तपः परमदुष्करम् ॥ ८ चिन्ता जाता महीपाल विरिञ्चेः पद्मजन्मनः । किं करोमि कथं दैत्यस्तपसो विनिवर्तते ॥ ९ इति चिन्ताकुलस्यैव ब्रह्मणोऽङ्गसमुद्भवः । प्रणम्य प्राह भूपाल नारदो मुनिसत्तमः ॥ १० नारद उवाच किमर्थं खिद्यते तात नारायणपरायण । येषां मनसि गोविन्दस्ते वै नार्हन्ति शोचितुम् ॥ ११ अहं तं वारयिष्यामि तप्यन्तं दितिनन्दनम् । नारायणो जगत्स्वामी मतिं मे सम्प्रदास्यति ॥ १२ सहस्रानीकने कहा—सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता महाप्राज्ञ मार्कण्डेयजी ! आप भगवान् नृसिंहके प्रादुर्भावकी कथा यथोचितरूपसे कहें। अनघ ! भक्तवर प्रह्लादजीका चरित्र मुझे विस्तारपूर्वक सुनायें। महायोगिन् ! महामुने ! हम लोग धन्य हैं; क्योंकि आपकी कृपासे हमें भगवान् विष्णुकी कथारूप दुर्लभ सुधाका पान करनेका अवसर मिला है ॥ १-२१/२॥ श्रीमार्कण्डेयजी बोले—पूर्वकालमें एक समय वह महाकाय हिरण्यकशिपु जब तपस्या करनेके लिये वनमें जानेको उद्यत हुआ, उस समय समस्त दिशाओंमें दाह और भूकम्प होने लगा। यह देखकर उसके हितकारी बन्धुओं, मित्रों और भृत्योंने उसे मना किया—'राजन् ! इस समय बुरे शकुन हो रहे हैं। इनका फल अच्छा नहीं है। सौम्य ! आप त्रिभुवनके एकच्छत्र स्वामी हैं, समस्त देवताओंपर आपने विजय प्राप्त की है, आपको किसीसे भय भी नहीं है; फिर किसलिये तप करना चाहते हैं? हम सभी लोग जब अपनी बुद्धिसे विचारते हैं, तब कोई भी प्रयोजन नहीं दिखायी देता [जिसके लिये आपको तप करनेकी आवश्यकता हो]; क्योंकि जिसकी कामना अपूर्ण होती है, वही तपस्या करता है' ॥ ३-६१/२॥ अपने बन्धुजनोंके इस प्रकार मना करनेपर भी वह दुर्मद एवं मदमत्त दैत्य अपने दो-तीन मित्रोंको साथ लेकर (तपके लिये) कैलास-शिखरको चला ही गया। महीपाल ! वहाँ जाकर जब वह परम दुष्कर तपस्या करने लगा, तब पद्मयोनि ब्रह्माजीको उसके कारण बड़ी चिन्ता हो गयी। वे सोचने लगे—'अहो ! अब क्या करूँ? वह दैत्य कैसे तपसे निवृत्त हो ?' भूपाल ! इस चिन्तासे ब्रह्माजी जब व्याकुल हो रहे थे, उसी समय उनके अङ्गसे उत्पन्न मुनिवर नारदजीने उन्हें प्रणाम करके कहा— ॥ ७-१० ॥ नारदजी बोले—पिताजी ! आप तो भगवान् नारायणके आश्रित हैं, फिर आप क्यों खेद कर रहे हैं? जिनके हृदयमें भगवान् गोविन्द विराजमान हैं, उन्हें इस प्रकार सोच नहीं करना चाहिये। तपस्यामें प्रवृत्त हुए उस दैत्य हिरण्यकशिपुको मैं उससे निवृत्त करूँगा। जगदीश्वर भगवान् नारायण मुझे इसके लिये सुबुद्धि देंगे ॥ ११-१२ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
१४४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ४१
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१४४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ४१
[संस्कृत श्लोक]
मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त्वाऽऽनम्य पितरं वासुदेवं हृदि स्मरन्। प्रयातः पर्वतेनैव सार्धं स मुनिपुङ्गवः॥ १३ कलविङ्कौ तु तौ भूत्वा कैलासं पर्वतोत्तमम्। यत्रास्ते दितिजश्रेष्ठो द्वित्रैर्मित्रैः परीवृतः॥ १४ कृतस्नानो मुनिस्तत्र वृक्षशाखासमाश्रितः। शृण्वतस्तस्य दैत्यस्य प्राह गम्भीरया गिरा॥ १५ नमो नारायणायेति पुनः पुनरुदारधीः। त्रिवारं प्रजपित्वा वै नारदो मौनमाश्रितः॥ १६ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कलविङ्कस्य सादरम्। हिरण्यकशिपुर्दैत्यः क्रुद्धश्चापं समाददे॥ १७ बाणं धनुषि संधाय यावन्मुञ्चति तौ प्रति। तावदुड्डीय तौ भूप गतौ नारदपर्वतौ॥ १८ सोऽपि क्रोधपरीताङ्गो हिरण्यकशिपुस्तदा। त्यक्त्वा तमाश्रमं भूयो नगरं स्वं महीपते॥ १९ तस्यापि भार्या सुश्रोणी कयाधूर्नाम नामतः। तदा रजस्वला भूत्वा स्नाताभूद्दैवयोगतः॥ २० रात्रावेकान्तसमये तया पृष्टः स दैत्यराट्। स्वामिन् यदा तपश्चर्यां कर्तुं गेहाद्वनं गतः॥ २१ तदा त्वयोक्तं वर्षाणामयुतं मे तपस्त्विदम्। तत्किमर्थं महाराज साम्प्रतं त्यक्तवान् व्रतम्॥ २२ तथ्यं कथय मे नाथ स्नेहात्पृच्छामि दैत्यप।
हिरण्यकशिपरुवाच शृणु चार्वङ्गि मे तथ्यां वाचं व्रतविनाशिनीम्॥ २३ क्रोधस्यातीव जननीं देवानां मुदवर्द्धनीम्। कैलासशिखरे देवि महदानन्दकानने॥ २४ व्याहरन्तौ शुभां वाणीं नमो नारायणेति च। वारद्वयं त्रयं चेति व्याहृतं वचनं शुभे॥ २५
[हिन्दी अनुवाद]
**मार्कण्डेयजी बोले—**अपने पितासे इस प्रकार कहकर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने उन्हें प्रणाम किया और मन-ही-मन भगवान् वासुदेवका स्मरण करते हुए वे पर्वतमुनिके साथ वहाँसे चल दिये। वे दोनों मुनि कलविङ्क पक्षीका रूप धारणकर उस उत्तम कैलास पर्वतपर आये, जहाँ दैत्यश्रेष्ठ हिरण्यकशिपु अपने दो-तीन मित्रोंके साथ रहता था। वहाँ स्नान करके नारदमुनि वृक्षकी शाखापर बैठ गये और उस दैत्यके सुनते-सुनते गम्भीर वाणीमें भगवन्नामका उच्चारण करने लगे। उदारबुद्धि नारद लगातार तीन बार 'ॐ नमो नारायणाय'—इस मन्त्रका उच्च स्वरसे उच्चारण कर मौन हो गये। भूपाल! कलविङ्कके द्वारा किये गये उस आदरयुक्त नामकीर्तनको सुनकर हिरण्यकशिपुने कुपित हो धनुष उठाया और उसपर बाणका संधान करके ज्यों ही उन दोनों पक्षियोंके प्रति छोड़ने लगा, त्यों ही नारद और पर्वतमुनि उड़कर अन्यत्र चले गये। महीपते! तब हिरण्यकशिपु भी क्रोधसे भर गया और उसी समय वह उस आश्रमको त्यागकर अपने नगरको चला आया॥ १३-१९॥
वहाँ उसी समय उसकी कयाधू नामकी सुन्दरी पत्नी दैवयोगसे रजस्वला होकर ऋतु-स्नाता हुई थी। रात्रिमें एकान्तवासके समय कयाधूने दैत्यराजसे पूछा— 'स्वामिन्! आप जिस समय तप करनेके लिये घरसे वनको गये थे, उस समय तो आपने यह कहा था कि 'मेरी यह तपस्या दस हजार वर्षोंतक चलेगी।' फिर महाराज! आपने अभी क्यों उस व्रतको त्याग दिया? स्वामिन्! दैत्यराज! मैं प्रेमपूर्वक आपसे यह प्रश्न करती हूँ, कृपया मुझे सच-सच बताइये'॥ २०-२२½॥
**हिरण्यकशिपु बोला—**सुन्दरि! सुनो, मैं वह बात तुम्हें सच-सच सुनाता हूँ, जिसके कारण मेरे व्रतका भङ्ग हुआ है। वह बात मेरे क्रोधको अत्यन्त बढ़ानेवाली और देवताओंको आनन्द देनेवाली थी। देवि! कैलासशिखरपर जो महान् आनन्द-कानन है, उसमें दो पक्षी 'ॐ नमो नारायणाय'—इस शुभवाणीका उच्चारण करते हुए आ गये। शुभे! उन्होंने [मुझे सुना-सुनाकर] दो बार, तीन बार उक्त वचनको दुहराया।
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अध्याय ४१ ] प्रह्लादकी उत्पत्ति और उनकी हरि-भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता १४५ तेन मे मनसि क्रोधो जातोऽतीव वरानने। वरानने! पक्षियोंके उस शब्दको सुनकर मेरे मनमें बड़ा कोदण्डे शरमाधाय यावन्मुञ्चामि भामिनि॥ २६ क्रोध हुआ और भामिनि! उन्हें मारनेके लिये धनुषपर बाण चढ़ाकर ज्यों ही मैंने छोड़ना चाहा, त्यों ही वे दोनों तावत्तौ पक्षिणौ भीतौ गतौ देशान्तरं त्वहम्। पक्षी भयभीत हो उड़कर अन्यत्र चले गये। तब मैं भी त्यक्त्वा व्रतं समायातो भाविकार्यबलेन वै॥ २७ भावीकी प्रबलतासे अपना व्रत त्यागकर यहाँ चला आया ॥ २३—२७ ॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी कहते हैं—[हिरण्यकशिपु अपनी इत्युच्यमाने वचने वीर्यद्रावोऽभवत्तदा। पत्नीके साथ] जब इस प्रकार बातें कर रहा था, उसी ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते जातो गर्भस्तदैव हि॥ २८ समय उसका वीर्य स्खलित हुआ; पत्नीका ऋतुकाल तो प्राप्त था ही, तत्काल गर्भ स्थापित हो गया। माताके पुनः प्रवर्धमानस्य गर्भे गर्भस्य धीमतः। उदरमें बढ़ते हुए उस गर्भसे बुद्धिमान् नारदजीके उपदेशके नारदस्योपदेशेन वैष्णवः समजायत॥ २९ कारण विष्णुभक्त पुत्र उत्पन्न हुआ। भूप! इस प्रसङ्गको आगे कहूँगा; इस समय जो प्रसङ्ग चल रहा है, उसे तदग्रे कथयिष्यामि भूप श्रद्धापरो भव। श्रद्धापूर्वक सुनो। हिरण्यकशिपुका वह भक्त पुत्र प्रह्लाद तस्य सूनुरभूद्भक्तः प्रह्लादो जन्मवैष्णवः॥ ३० जन्मसे ही वैष्णव हुआ। जैसे पापपूर्ण कलियुगमें संसार- बन्धनसे मुक्त करनेवाली भगवान् श्रीहरिकी भक्ति बढ़ती सोऽवर्धतासुरकुले निर्मलो मलिनाश्रये। रहती है, उसी प्रकार उस मलिन कर्म करनेवाले यथा कलौ हरेर्भक्तिः पाशसंसारमोचनी॥ ३१ असुर-वंशमें भी प्रह्लाद निर्मल भावसे रहकर दिनोंदिन बढ़ने लगा। वह बालक त्रिलोकीनाथ भगवान् विष्णुके स वर्द्धमानो विरराज बालैः चरणोंमें बढ़ती हुई भक्तिके साथ ही स्वयं भी बढ़ता सह त्रयीनाथपदेषु भक्त्या। हुआ शोभा पा रहा था। शरीर छोटा होनेपर भी उस बालोऽल्पदेहो महतीं महात्मा बालकका हृदय महान् था; वह विष्णुभक्तिका प्रसार विस्तारयन् भाति स विष्णु भक्तिम्॥ ३२ करता हुआ उसी तरह शोभा पाता था, जैसे चौथा युग (कलियुग) [महत्त्वमें सब युगोंसे छोटा होकर भी] यथा चतुर्थं युगमासधर्म- भगवद्भजनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाला कामार्थमोक्षं किल कीर्तिदं हि। तथा यशका विस्तार करनेवाला होता है। प्रह्लाद अन्य स बाललीलासु सहान्यडिम्भैः बालकोंके साथ खेलते, पहेली बुझाते और खिलौने प्रहेलिकाक्रीडनकेषु नित्यम्॥ ३३ आदिसे मनोरञ्जन करते समय तथा बातचीतके प्रसङ्गमें भी सदा भगवान् विष्णुकी ही चर्चा करता था; क्योंकि कथाप्रसङ्गेषु च कृष्णमेव उसका स्वभाव भगवन्मय हो गया था। इस प्रकार प्रोवाच यस्मात् स हि तत्स्वभावः। शैशव-कालमें भी विचित्र कार्य करनेवाला वह प्रह्लाद इत्थं शिशुत्वेऽपि विचित्रकारी भगवत्स्मरणरूपी अमृतका पान करता हुआ दिन-दिन व्यवर्द्धतेऽशस्मरणामृताशः ॥ ३४ बढ़ने लगा॥ २८-३४॥ एक दिन बहुत-सी स्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए दुष्ट तं पद्मवक्त्रं दैत्येन्द्रः कदाचित्स्त्रीवृतः खलः। दैत्यराज हिरण्यकशिपुने गुरुजीके घरसे आये हुए कमल- बालं गुरुगृहायातं ददर्श स्वायतेक्षणम्॥ ३५ से मुखवाले अपने बालक पुत्र प्रह्लादको देखा; उसकी In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१
१४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१
गृहीत्वा तु करे पुत्रं पट्टिका या सुशोभना। आँखें बड़ी-बड़ी और सुन्दर थीं तथा वह हाथमें पट्टी मूर्ध्नि चक्राङ्किता पट्टी कृष्णनामाङ्किताऽऽदरात्॥ ३६ लिये हुए था। उसकी पट्टी बड़ी सुन्दर थी, उसके सिरेपर चक्रका चिह्न बना हुआ था और पट्टीपर आदरपूर्वक तमाहूय मुदाविष्टो लालयन् प्राह पुत्रकम्। श्रीकृष्णका नाम लिखा गया था। उसे देख हिरण्यकशिपुको पुत्र ते जननी नित्यं सुधीर्मे त्वा प्रशंसति॥ ३७ बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने पुत्रको पास बुलाकर उसे प्यार करते हुए कहा—'बेटा! तुम्हारी बुद्धिमती माता अथ तद्वद यत्किंचिद् गुरुवेश्मनि शिक्षितम्। मुझसे तुम्हारी बड़ी प्रशंसा किया करती है। अतः तुमने विचार्यानन्दजननं सम्यगायाति तद्वद॥ ३८ गुरुजीके घर जो कुछ सीखा है, वह मुझसे कहो। पहले सोच लो, जो तुम्हें बहुत आनन्ददायी प्रतीत होता हो और भलीभाँति याद हो, वही पाठ सुनाओ'॥ ३५—३८॥ अथाह पितरं हर्षात् प्रह्लादो जन्मवैष्णवः। यह सुनकर जन्मसे ही विष्णुकी भक्ति करनेवाले गोविन्दं त्रिजगद्वन्द्यं प्रभुं नत्वा ब्रवीमि ते॥ ३९ प्रह्लादने प्रसन्नतापूर्वक पितासे कहा—'त्रिभुवनके वन्दनीय भगवान् गोविन्दको प्रणाम करके मैं अपना पढ़ा हुआ पाठ आपको सुनाता हूँ।' अपने पुत्रके मुखसे इस प्रकार इति शत्रोः स्तवं श्रुत्वा पुत्रोक्तं स्त्रीवृतः खलः। शत्रु की स्तुति सुनकर स्त्रियोंसे घिरा हुआ वह दुष्ट दैत्य क्रुद्धोऽपि तं वञ्चयितुं जहासाच्चैः प्रहृष्टवत्॥ ४० यद्यपि बहुत क्रुद्ध हुआ, तथापि प्रह्लादसे उस क्रोधको छिपानेके लिये वह प्रसन्न पुरुषकी भाँति जोर-जोरसे आलिङ्ग्य तनयं प्राह शृणु बाल हितं वचः। हँसने लगा। फिर पुत्रको गलेसे लगाकर बोला—'बच्चा! राम गोविन्द कृष्णेति विष्णो माधव श्रीपते॥ ४१ मेरा हितकर वचन सुनो—बेटा! जो लोग 'राम, कृष्ण, गोविन्द, विष्णो, माधव, श्रीपते!' इस प्रकार कहा करते एवं वदन्ति ये सर्वे ते पुत्र मम वैरिणः। हैं, वे सभी मेरे शत्रु हैं; ऐसे लोग मेरे द्वारा शासित— शासितास्तु मयेदानीं त्वयेदं क्व श्रुतं वचः॥ ४२ दण्डित हुए हैं। तुमने यह हरिनामकीर्तन इस अवस्थामें कहाँ सुन लिया?'॥ ३९—४२॥ पितुर्वचनमाकर्ण्य धीमान्भयसंयुतः। पिताकी बात सुनकर बुद्धिमान् प्रह्लाद निर्भय होकर प्रह्लादः प्राह हे आर्य मैवं ब्रूयाः कदाचन॥ ४३ बोला—आर्य! आपको कभी ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। जो मनुष्य सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको देनेवाले तथा धर्म सर्वैश्वर्यप्रदं मन्त्रं धर्मादिपरिवर्धनम्। आदिकी वृद्धि करनेवाले 'कृष्ण' इस मन्त्रका उच्चारण कृष्णोति यो नरो ब्रूयात् सोऽभयं विन्दते पदम्॥ ४४ करता है, वह अभय पदको प्राप्त कर लेता है। भगवान् कृष्णकी निन्दासे होनेवाले पापका कहीं अन्त नहीं कृष्णनिन्दासमुत्थस्य पातकस्यान्तो न विद्यते। है; अतः अब आप अपनी शुद्धिके लिये भक्तिपूर्वक राम माधव कृष्णेति स्मरन्मर्त्योऽमृतायते॥ ४५ 'राम, माधव और कृष्ण' इत्यादि नाम लेते हुए 'भगवान्का स्मरण करें। जो बात मैं आपसे कह रहा हूँ, गुरोरपि ब्रुवाणस्य हितकरं वचः। वह सबसे बढ़कर हितसाधक है, इसीलिये मेरे गुरुजन शरणं व्रज सर्वेशं सर्वपापक्षयंकरम्॥ ४६ होनेपर भी आपसे मैं निवेदन करता हूँ कि आप समस्त पापोंका क्षय करनेवाले सर्वेश्वर भगवान् विष्णुकी शरणमें जायें॥ ४३—४६॥
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अध्याय ४१ ] प्रह्लादकी उत्पत्ति और उनकी हरि-भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता १४७ अथाह प्रकटक्रोधः सुरारिर्भर्त्सयन् सुतम्। प्रह्लादके यों कहनेपर देवशत्रु हिरण्यकशिपु अपने केनायं बालको नीतो दशामेतां सुमध्यमाम्॥ ४७ क्रोधको रोक न सका, उसने रोषको प्रकट करके पुत्रको धिग् धिग्घाहेति दुष्पुत्र किं मे कृतमघं महत्। फटकारते हुए कहा—'हाय! हाय! किसने इस बालकको याहि याहि दुराचार पापिष्ठ पुरुषाधम। अत्यन्त मध्यम कोटिकी अवस्थाको पहुँचा दिया ? रे दुष्ट उक्तेति परितो वीक्ष्य पुनराह शिशोर्गुरुम् ॥ ४८ पुत्र! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है! तूने क्यों मेरा महान् बद्ध्वा चानीयतां दैत्यैः क्रूरैः क्रूरपराक्रमैः। अपराध किया ? ओ दुराचारी नीच पुरुष! अरे पापिष्ठ! तू इति श्रुत्वा ततो दैत्यास्तमानीय न्यवेदयन्। यहाँसे चला जा, चला जा।' यों कहकर उसने अपने चारों धीमानूचे खलं भूपं देवान्तक परीक्षताम् ॥ ४९ ओर निहारकर फिर कहा—'नृशंस पराक्रमी क्रूर दैत्य जायें लीलयैव जितं देव त्रैलोक्यं निखिलं त्वया। और इसके गुरुको बाँधकर यहाँ ले आयें' ॥ ४७-४८१/२ ॥ असकृन्न हि रोषेण किं क्रुद्धस्याल्पके मयि ॥ ५० यह सुन दैत्यों ने प्रह्लादके गुरुको वहाँ लाकर उपस्थित इति सामवचः श्रुत्वा द्विजोक्तं प्राह दैत्यराट्। कर दिया। बुद्धिमान् गुरुने उस दुष्ट दैत्यराजसे विनयपूर्वक विष्णुस्तवं मम सुतं पाप बालमपीपठः ॥ ५१ कहा—देवान्तक! थोड़ा विचार तो कीजिये। आपने उक्तेति तनयं प्राह राजा साम्नामलं सुतम्। समस्त त्रिभुवनको अनायास ही अनेकों बार पराजित ममात्मजस्य किं जाड्यं तव चैतद्द्विजैः कृतम् ॥ ५२ किया है, खेल-खेलमें ही सबको जीता है, रोषसे कभी विष्णुपक्षैर्ध्रुवं धूर्तैर्मूढ नित्यं परित्यज। काम नहीं लिया। फिर मुझ-जैसे तुच्छ प्राणीपर क्रोध त्यज द्विजप्रसङ्गं हि द्विजसङ्गो ह्यशोभनः ॥ ५३ करनेसे क्या लाभ होगा ? ॥ ४९-५०॥ अस्मत्कुलोचितं तेजो यैर्द्विजैस्तु तिरोहितम्। ब्राह्मणके इस शान्त वचनको सुनकर दैत्यराज बोला— यस्य यत्सङ्गतिः पुंसो मणिवत्स्यात्स तद्गुणः ॥ ५४ 'अरे पापी! तूने मेरे बालक पुत्रको विष्णुका स्तोत्र पढ़ा स्वकुलवृद्धयै ततो धीमान् स्वयूथ्यानेव संश्रयेत्। दिया है।' गुरुसे यों कहकर राजा हिरण्यकशिपुने अपने मत्सुतस्योचितं त्यक्त्वा विष्णुपक्षीयनाशनम् ॥ ५५ निर्दोष पुत्रके प्रति सान्त्वनापूर्वक कहा—'बेटा! तू मेरा स्वयमेव भजन् विष्णुं मन्द किं त्वं न लज्जसे। आत्मज है, तुझमें यह जड-बुद्धि कैसे आ सकती है ? विश्वनाथस्य मे सूनुर्भूत्वान्यं नाथमिच्छसि ॥ ५६ यह तो इन ब्राह्मणोंकी ही करतूत है। मूर्ख बालक! शृणु वत्स जगत्तत्त्वं कश्चिन्नास्ति निजः प्रभुः। आजसे तू सदा विष्णुके पक्षमें रहनेवाले धूर्त ब्राह्मणोंका यः शूरः स श्रियं भुङ्क्ते स प्रभुः स महेश्वरः ॥ ५७ साथ छोड़ दे, ब्राह्मणमात्रका सङ्ग त्याग दे; ब्राह्मणोंकी संगति अच्छी नहीं होती; क्योंकि इन ब्राह्मणोंने ही तेरे उस तेजको छिपा दिया, जो हमारे कुलके लिये सर्वथा उचित था। जिस पुरुषको जिसकी संगति मिल जाती है, उसमें उसीके गुण आने लगते हैं—ठीक उसी तरह, जैसे मणि कीचड़में पड़ी हो तो उसमें उसके दुर्गन्ध आदि दोष आ जाते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह अपने कुलकी समृद्धिके लिये आत्मीय जनोंका ही आश्रय ले। बुद्धिहीन बालक! मेरे पुत्रके लिये तो उचित कर्तव्य यह है कि वह विष्णुके पक्षमें रहनेवाले लोगोंका नाश करे; परंतु तू इस उचित कार्यको त्यागकर इसके विपरीत स्वयं ही विष्णुका भजन कर रहा है! बता तो सही, क्या यों करते हुए तुझे लज्जा नहीं आती ? अरे! मुझ सम्पूर्ण जगत्के सम्राट्का पुत्र होकर तू दूसरेको अपना स्वामी बनाना चाहता है ? बेटा! मैं तुझे संसारका तत्त्व बताता हूँ, सुन; यहाँ कोई भी अपना स्वामी नहीं है। जो शूरवीर है, वही लक्ष्मीका उपभोग करता है तथा वही प्रभु है, वही महेश्वर है ॥ ५१-५७॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२
१४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२ स देवः सकलाध्यक्षो यथाहं त्रिजगज्जयी। | ''वही सबका अध्यक्ष देवता है, जैसा कि तीनों त्यज जाड्यमतः शौर्यं भजस्व स्वकुलोचितम्॥ ५८ | लोकोंपर विजय पानेवाला मैं हूँ। इसलिये तू अपनी यह | जडता त्याग दे और अपने कुलके लिये उचित वीरताका अन्येऽपि त्वां हनिष्यन्ति वदिष्यन्ति जनास्त्विदम्। | आश्रय ले। तेरी यह कायरता देखकर दूसरे लोग भी तुझे असुरोऽयं सुरान् स्तौति मार्जार इव मूषकन्॥ ५९ | मारेंगे और कहेंगे कि 'अरे! यह असुर होकर भी | देवताओंकी उसी प्रकार स्तुति करता है, जैसे बिल्ली द्वेष्यान् शिखीव फणिनो दुर्निमित्तमिदं ध्रुवम्। | चूहेकी स्तुति करे और मोर अपने द्वेषपात्र सर्पोंकी प्रार्थना लब्ध्वापि महदैश्वर्यं लाघवं यान्त्यबुद्धयः॥ ६० | करे। ऐसा करना अवश्य ही अनिष्टका सूचक है। मूर्ख | प्राणी महान् ऐश्वर्य पाकर भी [अपने खोटे कर्मोंके द्वारा] यथायं मत्सुतः स्तुत्यः स्तावकान् स्तौति नीचवत्। | नीचे गिर जाते हैं, जैसे मेरा पुत्र प्रह्लाद, जो स्वयं स्तुतिके रे मूढ दृष्ट्वाप्यैश्वर्यं मम ब्रूषे पुरो हरिम्॥ ६१ | योग्य था, आज नीच जनोंकी भाँति उन लोगोंकी स्तुति | कर रहा है, जो स्वयं हमारी स्तुति करनेवाले हैं। रे मूर्ख! असदृशस्य तु हरेः स्तुतिरेषा विडम्बना। | तू मेरा ऐश्वर्य देखकर भी मेरे सामने ही हरिका नाम ले इत्युक्त्वा तनयं भूप जातक्रोधो भयानकः॥ ६२ | रहा है? वह हरि इस सम्मानके योग्य नहीं है, उसकी | स्तुति विडम्बनामात्र है''॥ ५८—६११/२॥ जिह्मं निरीक्ष्य च प्राह तद्गुरुं कम्पयन् रुषा। | भूप! अपने पुत्रसे इस प्रकार कहकर वह इतना याहि याहि द्विजपशो साधु शाधि सुतं मम॥ ६३ | कुपित हुआ कि उसका स्वरूप भयानक हो गया; फिर | प्रह्लादके गुरुको टेढ़ी नजरसे देखकर उन्हें अपने रोषसे प्रसाद इत्येष वदन् स विप्रो | कँपाता हुआ बोला—'मूर्ख ब्राह्मण! यहाँसे चला जा, जगाम गेहं खलराजसेवी। | चला जा। अबकी बार मेरे पुत्रको अच्छी शिक्षा देना।' विष्णुं विसृज्यान्वसरच्च दैत्यं | दुष्ट राजाकी सेवा करनेवाला वह ब्राह्मण 'बड़ी कृपा किं वा न कुर्युर्भरणीय लुब्धाः॥ ६४॥ | हुई' यों कहता हुआ घर चला गया और विष्णुका भजन | त्यागकर दैत्यराज (हिरण्यकशिपु)-का अनुसरण करने | लगा। सच है, लोभी मनुष्य अपना पेट पालनेके लिये | क्या नहीं कर सकते?॥ ६२—६४॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे नृसिंहप्रादुर्भावे एकचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४१॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतार' नामक इकतालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४१॥
बयालीसवाँ अध्याय प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये उसके द्वारा किये गये अनेक प्रयत्न मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी कहते हैं—भगवान् विष्णुकी भक्ति ही सोऽप्याशु नीतो गुरुवेश्म दैत्यै- | जिनका भूषण है, वे दैत्यराजकुमार योगी प्रह्लादजी शीघ्र दैत्येन्द्रसूनुर्हरिभक्तिभूषणः । | ही सारथिके साथ गुरुके घर भेजे गये। वहाँ वे कालक्रमसे अशेषविद्यानिवहेन साकं | कालेन कौमारमवाप योगी॥ १ | सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञानके साथ कुमारावस्थाको प्राप्त In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४२ ] प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये प्रयत्न १४९ प्रायेण कौमारमवाप्य लोकः | हुए। संसारके अन्य लोग कौमार अवस्थाको पाकर पुष्णाति नास्तिक्यमसद्रतिं च। | प्रायः नास्तिक विचार और बुरे आचार-व्यवहारके पोषक तस्मिन् वयःस्थस्य बहिर्विरक्ति- | बन जाते हैं, परंतु उसी उम्रमें प्रह्लादको बाह्य विषयोंसे र्भवत्यभूच्चित्रमजे च भक्तिः॥ २ | वैराग्य हुआ और भगवान्में उनकी भक्ति हो गयी—यह | अद्भुत बात है। तदनन्तर जब प्रह्लादने गुरुके यहाँ अपनी अथ सम्पूर्णविद्यं तं कदाचिद्दितिजेश्वरः। | पढ़ाई समाप्त कर ली, तब एक दिन दैत्यराजने उन्हें अपने आनाय्य प्रणतं प्राह प्रह्लादं विदितेश्वरम्॥ ३ | पास बुलवाया और ईश्वर-तत्त्वके ज्ञाता प्रह्लादको अपने | सामने प्रणाम करके खड़े देख उनसे कहा— ॥ १-३॥ साध्वज्ञाननिधेर्बाल्यान्मुक्तोऽसि सुरसूदन। | सुरसूदन ! तुम अज्ञानकी निधिरूपा बाल्यावस्थासे मुक्त इदानीं भ्राजसे भास्वान् नीहारादिव निर्गतः ॥ ४ | हो गये—यह बहुत अच्छा हुआ। इस समय तुम कुहिरेसे | निकले हुए सूर्यकी भाँति अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हो। बाल्ये वयं च त्वमिव द्विजैर्जाड्याय मोहिताः । | पुत्र ! बचपनमें तुम्हारी ही तरह हमें भी जडबुद्धि सिखानेके वयसा वर्धमानेन पुत्रकैवं सुशिक्षिताः ॥ ५ | लिये ब्राह्मणोंने मोहित कर रखा था; किंतु अवस्था बढ़नेपर | जब हम समझदार हुए, तब इस प्रकार अपने कुलके अनुरूप तदद्य त्वयि धुर्येऽहं संसकण्टकताधुरम्। | सुन्दर शिक्षा ग्रहण कर सके थे। अतः शत्रुरूपी काँटोंसे युक्त विन्यस्य स्वां चिरधृतां सुखी पश्यन् श्रियं तव ॥ ६ | इस राज्य-शासनके भारको, जिसे मैंने बहुत दिनोंसे धारण कर | रखा है, अब तुझ सामर्थ्यवान् पुत्रपर रखकर मैं तुम्हारी राज्य- यदा यदा हि नैपुण्यं पिता पुत्रस्य पश्यति । | लक्ष्मीको देखते हुए सुखी होना चाहता हूँ। पिता जब-जब तदा तदाऽऽधिं त्यक्त्वा नु महत्सौख्यमवाप्नुयात् ॥ ७ | अपने पुत्रकी निपुणता देखता है, तब-तब अपनी मानसिक | चिन्ता त्यागकर महान् सुखका अनुभव करता है। तुम्हारे गुरुने गुरुश्चातीव नैपुण्यं ममाग्रेऽवर्णयत्तव । | भी मेरे समक्ष तुम्हारी योग्यताका बड़ा बखान किया है। यह न चित्रं पुत्र तच्छ्रोतुं किं नु मे वाञ्छतः श्रुती ॥ ८ | तुम्हारे लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। आज मेरे कान तुम्हारी | कुछ बातें सुनना चाहते हैं। नेत्रोंके सामने शत्रु की दरिद्रता नेत्रयोः शत्रुदारिद्र्यं श्रोत्रयोः सुतसूक्तयः । | देखना, कानोंमें पुत्रकी सुन्दर वाणीका पड़ना और अङ्गोंमें युद्धव्रणं च गात्रेषु मायिनां च महोत्सवः॥ ९ | युद्धके आघातसे घाव होना—यह सब ऐश्वर्यवान् वीरों अथवा | मायावी दैत्योंके लिये महान् उत्सवके समान है ॥ ४-९॥ श्रुत्वेति निकृतिप्रज्ञं दैत्याधिपवचस्ततः। | उस समय दैत्यराजके ये शठतापूर्ण वचन सुनकर जगाद योगी निश्शङ्कं प्रह्लादः प्रणतो गुरुम् ॥ १० | योगी प्रह्लादने पिताको प्रणाम करके निर्भीकतापूर्वक | कहा— ॥ १०॥ सूक्तयः श्रोत्रयोः सत्यं महाराज महोत्सवः। | 'महाराज! आपका यह कथन सत्य है कि अच्छी किंतु ता वैष्णवीर्वाचो मुक्त्वा नान्या विचारयेत् ॥ ११ | बातें सुनना कानोंके लिये महान् उत्सवके समान है; किंतु | वे बातें भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाली हों, तभी ऐसा नीतिःसूक्तिःकथाःश्राव्याःश्राव्यं काव्यं च तद्वचः। | होता है। उनको छोड़कर दूसरी बातें सुननेका विचार भी यत्र संसृतिदुःखौघकक्षाग्निर्गोयिते हरिः॥ १२ | नहीं करना चाहिये। जो संसारके दुःखसमुदायरूपी तृणोंको | भस्म करनेके लिये अग्निके समान हैं, उन भगवान् विष्णुका | जिसमें गुणगान किया जाता हो, वही वचन नीतियुक्त है, | वही सूक्ति (सुन्दर वाक्य) है, वही सुनने योग्य कथा
१५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२
१५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२ [संस्कृत श्लोक] अचिन्त्यः स्तूयते यत्र भक्त्या भक्तेप्सितप्रदः। अर्थशास्त्रेण किं तात यत्र संसृतिसंततिः ॥ १३ शास्त्रश्रमेण किं तात येनात्मैव विहंस्यते। वैष्णवं वाङ्मयं तस्माच्छाव्यं सेव्यं च सर्वदा ॥ १४ मुमुक्षुभिर्भवक्लेशान्नो चेन्नैव सुखी भवेत्। इति तस्य वचः शृण्वन् हिरण्यकशिपुस्तदा ॥ १५ जज्वाल दैत्यराट् तप्तसर्पिर्ह्रद्विरिवाधिकम्। प्रह्लादस्य गिरं पुण्यां जनसंसृतिनाशिनीम् ॥ १६ नामृष्यतासुरः क्षुद्रो घूको भानुप्रभामिव। परितो वीक्ष्य सम्प्राह क्रुद्धो दैत्यभटानिदम् ॥ १७ हन्यतामेष कुटिलः शस्त्रपातैः सुभीषणैः। उत्कृत्योत्कृत्य मर्माणि रक्षितास्तु हरिः स्वयम् ॥ १८ पश्यत्विदानीमेवैष हरिसंस्तवजं फलम्। काकोलकाङ्गगृध्रेभ्यो ह्यस्याङ्गं संविभज्यताम् ॥ १९ अथोद्धतास्त्रा दैतेयास्तर्जयन्तः प्रगर्जितैः। अच्युतस्य प्रियं भक्तं तं जघ्नुः पतिनोदिताः ॥ २० प्रह्लादोऽपि प्रभुं नत्वा ध्यानवज्रं समाददे। अकृत्रिमरसं भक्तं तमित्थं ध्याननिश्चलम् ॥ २१ ररक्ष भगवान् विष्णुः प्रह्लादं भक्तदुःखहृत्। अथालब्धपदान्यस्य गात्रे शस्त्राणि रक्षसाम् ॥ २२ नीलाब्जशकलानीव पेतुश्छिन्नान्यनेकधा। किं प्राकृतानि शस्त्राणि करिष्यन्ति हरिप्रिये ॥ २३ तापत्रयमहास्त्रौघः सर्वोऽप्यस्माद् बिभेति वै। पीडयन्ति जनांस्तावद् व्याधयो राक्षसा ग्रहाः ॥ २४ यावद् गुहाशयं विष्णुं सूक्ष्मं चेतो न विन्दति। ते तु भग्नास्त्रशकलैः प्रतीपोत्थैरितस्ततः ॥ २५ हन्यमाना न्यवर्तन्त सद्यः फलददैरिव। न चित्रं विबुधानां तदज्ञानां विस्मयावहम् ॥ २६ [हिन्दी अनुवाद] और श्रवण करने योग्य काव्य है। जिसमें भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाले अचिन्त्य परमेश्वरका भक्तिपूर्वक स्तवन किया जाता हो, वही शास्त्र है। तात ! उस अर्थशास्त्रसे क्या लाभ, जिसमें संसार-चक्रमें डालनेवाली ही बातें कही गयी हैं। पिताजी ! उस शास्त्रमें परिश्रम करनेसे क्या सिद्ध होगा, जिससे आत्माका ही हनन होता है; इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको सदा वैष्णव शास्त्रोंका ही श्रवण और सेवन करना चाहिये। अन्यथा सांसारिक कष्टसे छुटकारा नहीं मिलता और न मनुष्य सुखी ही हो पाता है ॥ ११–१४१/२ ॥ जिस प्रकार तपाया हुआ घी जलके छींटे पड़नेसे और अधिक प्रज्वलित हो उठता है, वैसे ही दैत्यराज हिरण्यकशिपु प्रह्लादकी उपर्युक्त बातें सुनकर क्रोधसे जल उठा। जैसे उल्लू सूर्यकी प्रभा नहीं देख सकता, उसी प्रकार वह क्षुद्र असुर जीवके संसार-बन्धनको नष्ट करनेवाली प्रह्लादकी पवित्र वाणी न सह सका। उस क्रोधीने चारों ओर देखकर दैत्य वीरोंसे कहा- ॥ १५-१७ ॥ 'अरे! इस कुटिलको शस्त्रोंके भयंकर आघातसे मार डालो, इसके मर्मस्थानोंके टुकड़े-टुकड़े कर दो; आज इसका भगवान् स्वयं आकर इसकी रक्षा करे। विष्णुकी स्तुति करनेका फल यह आज इसी समय अपनी आँखोंसे देखे। इसका अङ्ग-अङ्ग काटकर कौओं, काँकों और गिद्धोंको बाँट दो' ॥ १८-१९ ॥ तब अपने स्वामी हिरण्यकशिपुद्वारा प्रेरित दैत्यगण अपनी विकट गर्जनासे डराते हुए, हाथमें शस्त्र लेकर भगवान्के प्रिय भक्त उन प्रह्लादजीको मारने लगे। प्रह्लादने भी भगवान्को नमस्कार करके ध्यानरूपी वज्र ग्रहण किया। तब भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले भगवान् विष्णु स्वभावतः प्रेम करनेवाले भक्त प्रह्लादको इस प्रकार ध्यानमें स्थिर देख उसकी रक्षा करने लगे। फिर तो राक्षसोंके चलाये हुए अस्त्र-शस्त्र प्रह्लादके शरीरमें स्पर्श किये बिना ही नील-कमलके टुकड़ोंकी भाँति खण्ड- खण्ड होकर गिर जाने लगे। भला, ये प्राकृत शस्त्र भगवान्के प्रिय भक्तका क्या कर सकते हैं। उससे तो सम्पूर्ण त्रितापरूपी महान् अस्त्रसमूह भी भय मानता है। व्याधि, राक्षस और ग्रह-ये तभीतक मनुष्योंको पीड़ा पहुँचाते हैं, जबतक उनका चित्त हृदय-गुहामें सूक्ष्मरूपसे स्थित भगवान् विष्णुको नहीं प्राप्त कर लेता। भक्तके अपमानका मानो तत्काल फल देनेवाले वे भग्न अस्त्रखण्ड उलटे चलकर दैत्योंका संहार करने लगे। इनसे पीड़ित होनेके कारण वे दैत्य इधर-उधर भाग गये। विद्वानोंकी दृष्टिमें ऐसा होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, अज्ञानीजनोंको ही इस घटनासे विस्मय हो सकता है ॥ २०-२६ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४२ ] प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये प्रयत्न १५१ वैष्णवं बलमालोक्य राजा नूनं भयं दधौ। वैष्णवोंका बल देखकर राजा हिरण्यकशिपुको अवश्य पुनस्तस्य वधोपायं चिन्तयन् स सुदुर्मतिः॥ २७ ही महान् भय हुआ; किंतु उस दुर्बुद्धिने पुनः प्रह्लादके समादिशत् समाहूय दंदशूकान् सुदुर्विषान्। वधका उपाय सोचते हुए, अत्यन्त भयंकर विषवाले अशस्त्रवधयोग्योऽयमस्मयो हरितोषकृत्॥ २८ सर्पोंको बुलाकर उन्हें आदेश दिया—'गरलायुधो*! तर द् भवद्भिरचिराद् हन्यतां गरलायुधाः। विष्णुको संतुष्ट करनेवाला यह निश्शङ्क बालक किसी हि. ण्यकशिपोः श्रुत्वा वचनं ते भुजंगमाः। शस्त्रसे नहीं मारा जा सकता; अतः तुम सभी मिलकर तस्याज्ञां जगृहुर्मूर्ध्ना प्रहर्षार्दिशवर्तिनः॥ २९ इसे अति शीघ्र मार डालो।' हिरण्यकशिपुकी यह बात अथ ज्वलद्दशनकरालदंष्ट्रिण सुनकर उसकी आज्ञा माननेवाले सभी सर्पोंने उसके स्फुटस्फुरद्दशनसहस्रभीषणाः । आदेशको हर्षपूर्वक शिरोधार्य किया॥ २७-२९॥ अकर्णका हरिमहिस्वकर्णका तदनन्तर जिनके दाँत विषसे जल रहे हैं तथा जिनकी हरिप्रियं द्रुततरमापतन्नुषा॥ ३० दाढ़ें विकराल हैं, जो स्फुट दिखायी देनेवाले हजारों गरायुधास्त्वचमपि भेत्तुमल्पिकां चमकीले दाँतोंके कारण भयानक जान पड़ते हैं, ऐसे वपुष्यजस्मृतिबलदुर्भिदाकृतेः । सर्पगण क्रोधसे फुफकारते हुए बड़े वेगसे उस हरिभक्तके अलं न ते हरिवपुषं तु केवलं ऊपर टूट पड़े। भगवान्के स्मरणके बलसे जिनका आकार विदश्य तं निजदशनैर्विना कृताः॥ ३१ दुर्भेद्य हो गया था, उन प्रह्लादजीके शरीरका थोड़ा-सा ततः स्रवत्क्षतजविषण्णमूर्तयो चमड़ा भी काटनेमें वे विषधर सर्प समर्थ न हो सके। द्विधाकृताद्भुतदशनां भुजंगमाः। इतना ही नहीं, जिनका शरीर भगवन्मय हो गया था, उन समेत्य ते दितिजपतिं व्यजिज्ञपन् प्रह्लादजीको केवल डँसनेमात्रसे वे सर्प अपने सारे दाँत विनिःश्वसत्प्रचलफणा भुजंगमाः॥ ३२ खो बैठे। तदनन्तर रक्तकी धारा बहनेसे जिनका आकार प्रभो महीध्रानपि भस्मशेषां- विषादग्रस्त हो रहा है, जिनके अद्भुत दाँतोंके दो-दो टुकड़े स्तस्मिन्नशक्तास्तु तदैव वध्याः। हो गये हैं तथा बार-बार उच्छ्वास लेनेके कारण जिनके महानुभावस्य तवात्मजस्य फन चञ्चल हो रहे हैं, उन भुजंगमोंने परस्पर मिलकर वधे नियुक्त्वा दशनैर्विना कृताः॥ ३३ दैत्यराज हिरण्यकशिपुको सूचित किया—॥ ३०-३२॥ इत्थं द्विजिह्वाः कठिनं निवेद्य 'प्रभो! हम पर्वतोंको भी भस्म करनेमें समर्थ हैं, यदि ययुर्विसृष्टाः प्रभुणाकृतार्थाः। उनमें हमारी शक्ति न चले तो आप तत्काल हमारा वध विचिन्तयन्तः पृथुविस्मयेन कर सकते हैं। परंतु आपके महानुभाव पुत्रका वध करनेमें प्रह्लादसामर्थ्यनिदानमेव ॥ ३४ लगाये जाकर तो हम अपने दाँतोंसे भी हाथ धो बैठे!' इस मार्कण्डेय उवाच प्रकार बड़ी कठिनाईसे निवेदन करके स्वामी हिरण्यकशिपुके अथासुरेशः सचिवैर्विचार्य आदेश देनेपर भी अपने कार्यमें असफल हुए वे सर्प निश्चित्य सूनुं तमदण्डसाध्यम्। अत्यन्त आश्चर्यके साथ प्रह्लादके अद्भुत सामर्थ्यका क्या आहूय साम्ना प्रणतं जगाद कारण है, इसका विचार करते हुए चले गये॥ ३३-३४॥ वाक्यं सदा निर्मलपुण्यचित्तम्। मार्कण्डेयजी कहते हैं—इसके बाद असुरराज प्रह्लाद दुष्टोऽपि निजाङ्गजातो हिरण्यकशिपुने मन्त्रियोंके साथ विचारकर अपने पुत्रको न वध्य इत्यद्य कृपा ममाभूत्॥ ३५ दण्डसे अजेय मानकर उसे शान्तिपूर्वक अपने पास बुलाया और जब वह आकर प्रणाम करके खड़ा हो गया, तब उस निर्मल एवं पवित्र हृदयवाले अपने पुत्रसे कहा—'प्रह्लाद! अपने शरीरसे यदि दुष्ट पुत्र भी उत्पन्न हो जाय तो वह वधके योग्य नहीं है, यह सोचकर अब तुझपर मुझे दया आ गयी है'॥ ३५॥
- विष ही जिनका शस्त्र है, उन्हें 'गरलायुध' (सर्प) कहा है। In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
१५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
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१५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ ततस्तूर्णं समागत्य दैत्यराजपुरोहिताः । तत्पश्चात् तुरंत ही वहाँ दैत्यराजके पुरोहित आये। मूढाः प्राञ्जलयः प्राहुर्द्विजाः शास्त्रविशारदाः ॥ ३६ शास्त्रविशारद होनेपर भी वे मूढ ही रह गये थे। उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर कहा— 'देव ! तुम्हारी युद्धविषयक त्रैलोक्यं कम्पते देव भृशं त्वय्यभिकाङ्क्षिणि । इच्छा होते ही सारा त्रिभुवन थरथर काँपने लगता है। प्रह्लादस्त्वां न जानाति क्रुद्धं स्वल्पो महाबलम् ॥ ३७ यह अल्प बलवाला प्रह्लाद कुपित हुए आप महान् बलशालीको नहीं जानता। अतः देव ! आपको क्रोधका परित्याग करके इसपर दया करनी चाहिये; क्योंकि पुत्र तदलं देव रोषेण दयां कर्तुं त्वमर्हसि । भले ही कुपुत्र हो जाय, परंतु माता-पिता कभी कुमाता पुत्रः कुपुत्रतामेति न मातापितरौ कदा ॥ ३८ अथवा कुपिता नहीं होते' ॥ ३६-३८ ॥ दैत्यराजके पुरोहितोंने उस दुर्बुद्धि दैत्य हिरण्यकशिपुसे उक्त्वेति कुटिलप्रज्ञं दैत्यं दैत्यपुरोहिताः । यों कहकर उसकी आज्ञासे प्रह्लादको साथ लेकर अपने आदाय तदनुज्ञातं प्रह्लादं धीधनं ययुः ॥ ३९ भवनको चले गये ॥ ३९ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे नरसिंहप्रादुर्भावे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतारविषयक' बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना; हिरण्यकशिपुकी आज्ञासे प्रह्लादका समुद्रमें डाला जाना तथा वहीं उन्हें भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन होना मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले— तदनन्तर सकल शास्त्रोंके अथ स गुरुगृहेऽपि वर्तमानः ज्ञाता प्रह्लादजी गुरुके घरमें रहकर भी अपने पवित्र सकलविदच्युतसक्तपुण्यचेताः । मनको भगवान् विष्णुमें लगाये रहनेके कारण सम्पूर्ण जड इव विचचार बाह्यकृत्ये जगत्को नारायणका स्वरूप समझकर बाह्य-लौकिक सततमनान्तमयं जगत्प्रपश्यन् ॥ १ कर्मोंमें जडकी भाँति व्यवहार करते हुए विचरते थे। सहगुरुकुलवासिनः कदाचि- एक दिन, उनके साथ ही गुरुकुलमें निवास करनेवाले च्छुतिविरता ह्यवदन् समेत्य बालाः । छात्र-बालक पाठ-श्रवण बंद करके, एकत्र हो, प्रह्लादसे तव चरितमहो विचित्रमेतत् कहने लगे— 'राजकुमार ! अहो ! आपका चरित्र बड़ा ही क्षितिपत्तिपुत्र यतोऽस्य भोगलुब्धः । विचित्र है; क्योंकि आपने विषय-भोगोंका लोभ त्याग हृदि किमपि विचिन्त्य हृष्टरोमा दिया है। प्रिय ! आप अपने हृदयमें किसी अनिर्वचनीय भवसि सदा च वदाङ्ग यद्यगुह्यम् ॥ २ वस्तुका चिन्तन करके सदा पुलकित रहते हैं। यदि वह वस्तु छिपानेयोग्य न हो तो हमें भी बताइये' ॥ १-२॥ इति गदितवतः स मन्त्रिपुत्रा- नृप ! प्रह्लादजी सबपर स्नेह करनेवाले थे, अतः इस नवददिदं नृप सर्ववत्सलत्वात् । प्रकार पूछते हुए मन्त्रिकुमारोंसे वे यों बोले— “हे दैत्यपुत्रो! शृणुत सुमनसः सुरारिपुत्रा एकमात्र भगवान्में अनुराग रखनेवाला मैं तुम्हारे पूछनेपर यदहमनन्यरतिर्वदामि पृष्टः ॥ ३ जो कुछ भी बता रहा हूँ, उसे तुमलोग प्रसन्नचित्त होकर In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५३
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५३ धनजनतरुणीविलासरम्यो | सुनो। यह जो धन, जन और स्त्री-विलास आदिसे भवविभवः किल भाति यस्तमेनम्। | अत्यन्त रमणीय प्रतीत होनेवाला सांसारिक वैभव दृष्टिगोचर विमृशत सुबुधैरुतैष सेव्यो | हो रहा है, इसपर विचार करो। क्या यह लोक-वैभव द्रुतमथ वा परिवर्ज्य एव दूरात् ॥ ४ | विद्वानोंके सेवन करने योग्य है या जल्दी-जल्दी दूरसे ही | त्याग देनेयोग्य? अहो! जिनके अङ्ग गर्भाशयमें टेढ़े-मेढ़े प्रथममिह विचार्यतां यदम्बा- | पड़े हैं, जो जठरानलकी ज्वालासे संतप्त हो रहे हैं तथा जठरगतैरनुभूयते सुदुःखम्। | जिन्हें अपने अनेक पूर्वजन्मोंका स्मरण हो रहा है, वे सुकुटिलतनुभिस्तदग्नितप्तै- | माताके गर्भमें पड़े हुए जीव जिस महान् कष्टका अनुभव र्विविधपुराजन्मनानि संस्मरद्भिः॥ ५ | करते हैं, पहले उसपर तो विचार करो ॥ ३-५॥ कारागृहे दस्युरिवास्मि बद्धो | 'गर्भमें पड़ा हुआ दुःखी जीव कहता है— 'हाय! जरायुणा विट्कृमिमूत्रगेहे। | कारागारमें बँधे हुए चोरकी भाँति मैं विष्ठा, कृमियों और पश्यामि गर्भेऽपि सकृन्मुकुन्द- | मूत्रसे भरे हुए इस [देहरूपी] घरमें जरायु (झिल्ली)- पादाब्जयोरस्मरणेन कष्टम्॥ ६ | से बँधा पड़ा हूँ। मैंने जो एक बार भी भगवान् मुकुन्दके | चरणारविन्दोंका स्मरण नहीं किया, उसीके कारण तस्मात्सुखं गर्भशयस्य नास्ति | होनेवाले कष्टको आज मैं इस गर्भमें भोग रहा हूँ।' अतः बाल्ये तथा यौवनवार्द्धके वा। | गर्भमें सोनेवाले जीवको बचपन, जवानी और बुढ़ापेमें भी एवं भवो दुःखमयः सदैव | सुख नहीं है। दैत्यकुमारो! जब इस प्रकार यह संसार सेव्यः कथं दैत्यसुताः प्रबुद्धैः। | सदा दुःखमय है, तब विज्ञ पुरुष इसका सेवन कैसे कर एवं भवेऽस्मिन् परिमृग्यमाणा | सकते हैं ? इस तरह इस संसारमें ढूँढ़नेपर हमें सुखका वीक्षामहे नैव सुखांशलेशम्॥ ७ | लेशमात्र भी दिखायी नहीं देता। हम जैसे-जैसे इसपर | ठीक विचार करते हैं, वैसे-ही-वैसे इस जगत्को यथा यथा साधु विचारयाम- | अत्यन्त दुःखमय समझते हैं। इसलिये ऊपरसे सुन्दर स्तथा तथा दुःखतरं च विद्मः। | दिखायी देनेवाले इस दुःखपूर्ण संसारमें साधु पुरुष तस्माद्बवेऽस्मिन् किल चारुरूपे | आसक्त नहीं होते। जो तत्त्वज्ञानसे रहित अत्यन्त मूढ़ दुःखाकरे नैव पतन्ति सन्तः॥ ८ | लोग हैं, वे ही देखनेमें सुन्दर दीपकपर गिरकर नष्ट | होनेवाले पतंगोंकी भाँति सांसारिक भोगोंमें आसक्त होते पतन्त्यथोऽतत्त्वविदः सुमूढा | हैं। यदि सुखके लिये कोई दूसरा सहारा न होता, तब वह्नौ पतंगा इव दर्शनीये। | तो सुखमय-से प्रतीत होनेवाले इस जगत्में आसक्त यद्यस्ति नान्यच्छरणं सुखाय | होना उचित था—जैसे अन्न न पानेके कारण जो अत्यन्त युक्तं तदैतत्पतनं सुखाभे॥ ९ | दुबले हो रहे हैं, उनके लिये खली-भूसी आदि खा | लेना ठीक हो सकता है; परंतु भगवान् लक्ष्मीपतिके अविन्दतामन्नमहो कृशानां | युगल चरणारविन्दोंकी सेवासे प्राप्त होनेवाला आदि, युक्तं हि पिण्याकतुषादिभक्षणम्। | अविनाशी, अजन्मा एवं नित्य सुख (परमात्मा) तो अस्ति त्वजं श्रीपतिपादपद्म- | है ही, फिर इस क्षणिक संसारका आश्रय क्यों लिया द्वन्द्वार्चनप्राप्यमनन्तमाद्यम् ॥१० | जाय ? ॥ ६-१०॥
१५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ अक्लेशतः प्राप्यमिदं विसृज्य | ''जो बिना कष्टके ही प्राप्त होनेयोग्य इस महान् सुख महासुखं योऽन्यसुखानि वाञ्छेत्। | (परमेश्वर)-को त्यागकर अन्य तुच्छ सुखोंकी इच्छा राज्यं करस्थं स्वमसौ विसृज्य | करता है, वह दीनहृदय मूर्ख पुरुष मानो हाथमें आये हुए भिक्षामटेद्दीनमनाः सुमूढः॥ ११ | अपने राज्यको त्यागकर भीख माँगता है। भगवान् लक्ष्मीपतिके तच्चार्च्यते श्रीपतिपादपद्म- | युगल-चरणारविन्दोंका यथार्थ पूजन वस्त्र, धन और परिश्रमसे द्वन्द्वं न वस्त्रैर्न धनैः श्रमैर्न। | नहीं होता; किंतु मनुष्य यदि अनन्यचित्त होकर 'केशव', अनन्यचित्तेन नरेण किंतु | 'माधव' आदि भगवन्नामोंका उच्चारण करे तो वही उनकी उच्चार्यते केशव माधवेति॥ १२ | वास्तविक पूजा है। दैत्यकुमारो! इस प्रकार संसारको एवं भवं दुःखमयं विदित्वा | दुःखमय जानकर भगवान्का ही भलीभाँति भजन करो। दैत्यात्मजाः साधु हरिं भजध्वम्। | इस प्रकार करनेसे ही मनुष्यका जन्म सफल हो सकता एवं जनो जन्मफलं लभेत | है; नहीं तो (भगवद्भजन न करनेके कारण) अज्ञानी पुरुष नो चेद्भवब्धौ प्रपतेदधोऽधः॥ १३ | भवसागरमें ही नीचेसे और नीचे स्तरमें ही गिरता रहता तस्माद्भवेऽस्मिन् हृदि शङ्खचक्र- | है। इसलिये इस संसारमें समस्त कामनाओंसे रहित हो गदाधरं देवमनन्तमीड्यम्। | तुम सभी लोग अपने हृदयके भीतर विराजमान शङ्ख- स्मरन्तु नित्यं वरदं मुकुन्दं | चक्र-गदाधारी, वरदाता, अविनाशी स्तवनीय भगवान् सद्भक्तियोगेन निवृत्तकामाः॥ १४ | मुकुन्दका सच्चे भक्तिभावसे सदा चिन्तन करो। भवसागरमें अनास्तिकत्वात् कृपया भवद्द्व्यो | पड़े हुए दैत्यपुत्रो! तुम लोग नास्तिक नहीं हो, इसलिये वदामि गुह्यं भवसिन्धुसंस्थाः। | दयावश मैं तुमसे यह गोपनीय बात बतलाता हूँ-समस्त सर्वेषु भूतेषु च मित्रभावं | प्राणियोंके प्रति मित्रभाव रखो; क्योंकि सबके भीतर भजन्वयं सर्वगतो हि विष्णुः॥ १५ | भगवान् विष्णु ही विराजमान हैं''॥ ११-१५॥ दैत्यपुत्रा ऊचुः | दैत्यपुत्र बोले-महाबुद्धिमान् प्रह्लादजी! बचपनसे प्रह्लाद त्वं वयं चापि बालभावान्महामते। | लेकर आजतक आप और हम भी षण्डामर्कके सिवा षण्डामर्कात्परं मित्रं गुरुं चान्यं न विद्महे॥ १६ | दूसरे किसी गुरु तथा मित्रको नहीं जान सके। फिर त्वयैतच्छिक्षितं कुत्र तथ्यं नो वद निस्तुषम्। | आपने यह ज्ञान कहाँ सीखा? हमसे पर्दा न रखकर | सच्ची बात बताइये॥ १६ १/२॥ प्रह्लाद उवाच | प्रह्लादजी बोले-कहते हैं, जिस समय मेरे पिताजी यदा तातः प्रयातो मे तपोऽर्थं काननं महत्॥ १७ | तपस्या करनेके लिये महान् वनमें चले गये, उसी समय तदा चेन्द्रः समागत्य पुरं तस्य रुरोध ह। | इन्द्रने यहाँ आकर पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मरा मृतं विज्ञाय दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं तदा॥ १८ | हुआ समझकर उनके इस नगरको घेर लिया। इन्द्र इन्द्रो मे जननीं गृह्य प्रयातो मन्मथाग्निना। | कामाग्निसे पीड़ित हो मेरी महाभागा माताजीको पकड़कर दह्यमानो महाभागां मार्गे गच्छति सत्वरम्॥ १९ | यहाँसे चल दिये। वे मार्गमें बड़ी तेजीसे पैर बढ़ाते तदा मां गर्भंगं ज्ञात्वा नारदो देवदर्शनः। | हुए चले जा रहे थे। इसी समय देवदर्शन नारदजी मुझे आगत्येन्द्रं जगादोच्चैर्मूढ मुञ्च पतिव्रताम्॥ २० | माताके गर्भमें स्थित जान सहसा वहाँ पहुँचे और | चिल्लाकर इन्द्रसे बोले-'मूर्ख! इस पतिव्रताको छोड़ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५५
अस्या गर्भे स्थितो योऽसौ स वै भागवतोत्तमः । तच्छ्रुत्वा नारदवचो मातरं प्रणिपत्य मे ॥ २१ विष्णुभक्त्या प्रमुच्याथ गतः स्वं भुवनं हरिः । नारदस्तां समानीय आश्रमं स्वं शुभव्रतः ॥ २२ मामुद्दिश्य महाभागामेतद्वै कथितं तदा । तथा मे विस्मृतं नैव बालाभ्यासाद्हनोः सुताः ॥ २३ विष्णोश्चानुग्रहेणैव नारदस्योपदेशतः । मार्कण्डेय उवाच एकदा गुप्तचर्यायां गतोऽसौ राक्षसाधिपः ॥ २४ शृणोति रात्रौ नगरे जय रामेति कीर्तनम् । अवैत्पुत्रकृतं सर्वं बलवान् दानवेश्वरः ॥ २५ अथाहूयाह दैत्येन्द्रः क्रोधान्धः स पुरोहितान् । रे रे क्षुद्रद्विजा यूयमतिमुमूर्षतां गताः ॥ २६ प्रह्लादोऽयं मृषालापान् वक्तव्यान्यान् पाठयत्यपि । इति निर्भर्त्स्य तान् विप्रान् श्वसन राजाविशद् गृहम् ॥ २७ न च पुत्रवधे चिन्तां जहौ स्ववधकारिणीम् । आसन्नमरणोऽमर्षात्कृत्यमेकं विमृश्य सः ॥ २८ अकृत्यमेव दैत्यादीनाहूयोपादिशद्रहः । अद्य क्षपायां प्रह्लादं प्रसुप्तं दुष्टमुल्बणैः ॥ २९ नागपाशैर्दृढं बद्ध्वा मध्ये निक्षिपताम्बुधेः । तदाज्ञां शिरसाऽऽदाय ददृशुस्तमुपेत्य ते ॥ ३० रात्रिप्रियं समाधिस्थं प्रबुद्धं सुप्तवत् स्थितम् । संछिन्नरागलोभादिमहाबन्धं क्षपाचराः ॥ ३१ बबन्धुस्तं महात्मानं फल्गुभिः सर्परज्जुभिः । गरुडध्वजभक्तं तं बद्ध्वाहिभिरबुद्धयः ॥ ३२ जलशायिप्रियं नीत्वा जलराशौ निचिक्षिपुः । बलिनस्तेऽचलान् दैत्या तस्योपरि निधाय च ॥ ३३ शशंसुस्तं प्रियं राज्ञे द्रुतं तान् सोऽप्यमानयत् ।
दो। इसके गर्भमें जो बालक है, वह भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ है।' नारदजीका कथन सुनकर इन्द्रने विष्णुभक्तिके कारण मेरी माताको प्रणाम करके छोड़ दिया और वे अपने लोकको चले गये। फिर शुभ सङ्कल्पवाले नारदजी मेरी माताको अपने आश्रममें ले आये और मेरे उद्देश्यसे मेरी महाभागा माताके प्रति इस पूर्वोक्त ज्ञानका वर्णन किया। दानवो! बाल्यकालके अभ्यास, भगवान्की कृपा तथा नारदजीका उपदेश होनेसे वह ज्ञान मुझे भूला नहीं है॥ १७-२३१/२ ॥ मार्कण्डेयजी बोले-एक दिन राक्षसराज हिरण्य- कशिपु रात्रिके समय गुप्तरूपसे नगरमें घूम रहा था। उस समय उसे 'जय राम' का कीर्तन सुनायी देने लगा। तब बलवान् दानवराजने यह सब अपने पुत्रकी ही करतूत समझी। तब उस दैत्यराजने क्रोधान्ध होकर पुरोहितोंको बुलाया और कहा-'नीच ब्राह्मणो! जान पड़ता है, तुमलोग मरनेके लिये अत्यधिक उत्सुक हो गये हो। तुम्हारे देखते-देखते यह प्रह्लाद स्वयं तो व्यर्थकी बातें बकता ही है, दूसरोंको भी यही सिखाता है।' इस प्रकार उन ब्राह्मणोंको फटकारकर राजा हिरण्यकशिपु लम्बी साँसें खींचता हुआ घरमें आया। उस समय भी वह पुत्रवधके विषयमें होनेवाली चिन्ताको, जो उसका ही नाश करनेवाली थी, नहीं छोड़ सका। उसकी मृत्यु निकट थी; अतः उसने अमर्षवश एक ऐसा काम सोचा, जो वास्तवमें न करने योग्य ही था। हिरण्यकशिपुने दैत्यादिकोंको बुलाया और उनसे एकान्तमें कहा-'देखो, आज रातमें प्रह्लाद जब गाढी नींदमें सो जाय, उस समय उस दुष्टको भयंकर नागपाशोंद्वारा खूब कसकर बाँध दो और बीच समुद्रमें फेंक आओ'॥ २४-२९१/२ ॥ उसकी आज्ञा शिरोधार्य करके उन दैत्योंने प्रह्लादजीके पास जाकर उन्हें देखा। वे रात्रिके ही प्रेमी थे (क्योंकि रातमें ही उन्हें ध्यान लगानेकी सुविधा रहती थी)। प्रह्लादजी समाधिमें स्थित होकर जाग रहे थे, फिर भी खूब सोये हुएके समान स्थित थे। उन्होंने राग और लोभ आदिके महान् बन्धनोंको काट डाला था, तो भी उन महात्मा प्रह्लादको निशाचरोंने तुच्छ नागपाशोंसे बाँध दिया। जिनकी ध्वजामें साक्षात् गरुडजी विराजमान हैं, उन भगवान्के भक्त प्रह्लादको उन मूर्खोंने सर्पोंद्वारा बाँधा और जलशायीके प्रियजनको ले जाकर जलराशि समुद्रमें डाला। तदनन्तर उन बली दैत्योंने प्रह्लादके ऊपर पर्वतकी चट्टानें रख दीं और तुरंत ही जाकर राजा हिरण्यकशिपुको यह प्रिय संवाद कह सुनाया। उसे सुनकर उस दैत्यराजने भी उन सबका सम्मान किया॥ ३०-३३१/२ ॥
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१५६ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५६ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ४३ प्रह्लादं चाब्धिमध्यस्थं तमौर्वाग्निमिवापरम् ॥ ३४ बीच समुद्रमें पड़े हुए प्रह्लादको भगवान्के तेजसे दूसरे वडवानलकी भाँति प्रज्वलित देख अत्यन्त भयके ज्वलन्तं तेजसा विष्णोर्ग्राह्या भूरिभियात्यजन्। कारण ग्राहोंने उन्हें दूरसे ही त्याग दिया। प्रह्लाद भी स चाभिन्नचिदानन्दसिन्धुमध्ये समाहितः ॥ ३५ अपनेसे अभिन्न चिदानन्दमय समुद्र (परमेश्वर)-में समाहित होनेके कारण यह न जान सके कि 'मैं बाँधकर खारे न वेद बद्धमात्मानं लवणाम्बुधिमध्यगम्। पानीके सागरमें डाल दिया गया हूँ।' मुनि (प्रह्लाद) जब अथ ब्रह्मामृताम्भोधिमये स्वस्मिन् स्थिते मुनौ ॥ ३६ ब्रह्मानन्दामृतके समुद्ररूप अपने आत्मामें स्थित हो गये, ययौ क्षोभं द्वितीयाब्धिप्रवेशादिव सागरः । उस समय समुद्र इस प्रकार क्षुब्ध हो उठा, मानो उसमें क्लेशात् क्लेशानि वोद्धूय प्रह्लादमथ वीचयः ॥ ३७ दूसरे महासागरका प्रवेश हो गया हो। फिर समुद्रकी लहरें प्रह्लादको धीरे-धीरे कठिनाईसे ठेलकर उस नौकारहित निन्युस्तीरेऽप्लवाम्भोधेः गुरूक्तय इवाम्बुधेः । सागरके तटकी ओर ले गयीं—ठीक उसी प्रकार, जैसे ध्यानेन विष्णुभूतं तं भगवान् वरुणालयः ॥ ३८ ज्ञानी गुरुके वचन क्लेशोंका उन्मूलन करके शिष्यको भवसागरसे पार पहुँचा देते हैं। ध्यानके द्वारा विष्णुरूप विन्यस्य तीरे रत्नानि गृहीत्वा द्रष्टुमाययौ । हुए उन प्रह्लादजीको तीरपर पहुँचाकर भगवान् वरुणालय तावद् भगवताऽऽदिष्टः प्रहृष्टः पन्नगाशनः ॥ ३९ (समुद्र) बहुत-से रत्न ले उनका दर्शन करनेके लिये आये। इतनेमें ही भगवान्की आज्ञा पाकर सर्पभक्षी बन्धनाहीन् समभ्येत्य भक्षयित्वा पुनर्ययौ । गरुडजी वहाँ आ पहुँचे और बन्धनभूत सर्पोंको अत्यन्त अथाबभाषे प्रह्लादं गम्भीरध्वनिरर्णवः ॥ ४० हर्षपूर्वक खाकर चले गये ॥ ३४—३९१/२ ॥ प्रणम्य दिव्यरूपः सन् समाधिस्थं हरेः प्रियम् । तत्पश्चात् गम्भीर घोषवाला दिव्यरूपधारी समुद्र प्रह्लाद भगवद्भक्त पुण्यात्मन्नर्णवोऽस्म्यहम् ॥ ४१ समाधिनिष्ठ भगवद्भक्त प्रह्लादको प्रणाम करके यों बोला— 'भगवद्भक्त प्रह्लाद! पुण्यात्मन् ! मैं समुद्र हूँ। अपने पास चक्षुर्भ्यामथ मां दृष्ट्वा पावयार्थिनमागतम् । आये हुए मुझ प्रार्थीको अपने नेत्रोंद्वारा देखकर पवित्र इत्यम्बुधिगिरः श्रुत्वा स महात्मा हरेः प्रियः ॥ ४२ कीजिये।' समुद्रके ये वचन सुनकर भगवान्के प्रिय भक्त महात्मा असुर-नन्दन प्रह्लादने सहसा उनकी ओर उद्वीक्ष्य सहसा देवं तं नत्वाऽऽहासुरात्मजः । देखकर प्रणाम किया और कहा—'श्रीमन् कब पधारे?' कदाऽऽगतं भगवता तमथाम्बुधिरब्रवीत् ॥ ४३ तब उनसे समुद्रने कहा— ॥ ४०—४३ ॥ योगिन्नज्ञातवृत्तस्त्वमपराध्दं तवासुरैः । 'योगिन्! आपको यह बात ज्ञात नहीं है, असुरोंने बद्धस्त्वमहिभिर्दैत्यैर्मयि क्षिप्तोऽद्य वैष्णव ॥ ४४ आपका बड़ा अपराध किया है। वैष्णव! आपको साँपोंसे बाँधकर दैत्योंने आज मेरे भीतर फेंक दिया; तब मैंने ततस्तूर्णं मया तीरे न्यस्तस्त्वं फणिनश्च तान् । तुरंत ही आपको किनारे लगाया और उन साँपोंको इदानीमेव गरुडो भक्षयित्वा गतो महान् ॥ ४५ अभी-अभी महात्मा गरुडजी भक्षण करके गये हैं। महात्मन् ! मैं सत्सङ्गका अभिलाषी हूँ, आप मुझपर महात्मन्ननुगृहीष्व त्वं मां सत्संगमार्थिनम् । अनुग्रह करें और इन रत्नोंको भेंटरूपमें स्वीकार गृहाणेमानि रत्नानि पूज्यस्त्वं मे हरैर्यथा ॥ ४६ करें। मेरे लिये आप भगवान् विष्णुके समान ही पूज्य हैं। यद्यपि आपको इन रत्नोंकी कोई आवश्यकता यद्यप्येतैर्न ते कृत्यं रत्नैर्दास्याम्यथाप्यहम् । नहीं है, तथापि मैं तो इन्हें आपको दूँगा ही; क्योंकि दीपान्निवेदयत्येव भास्करस्यापि भक्तिमान् ॥ ४७ भगवान् सूर्यका भक्त उन्हें दीप निवेदन करता ही है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५७ त्वमापत्स्वपि घोरासु विष्णुनेव हि रक्षितः। घोर आपत्तियोंमें भी भगवान् विष्णुने ही आपकी रक्षा त्वादृशा निर्मलात्मानो न सन्ति बहवोऽर्कवत्॥ ४८ की है। सूर्यकी भाँति आप-जैसे शुद्धचित्त महात्मा बहुना किं कृतार्थोऽस्मि यत्तिष्ठामि त्वया सह। संसारमें अधिक नहीं हैं। बहुत क्या कहूँ? आज मैं आलपामि क्षणमपि नेक्षे ह्येतत्फलोपमाम्॥ ४९ कृतार्थ हो गया; क्योंकि आज मुझे आपके साथ स्थित इत्यब्धिना स्तुतः श्रीशमाहात्म्यवचनैः स्वयम्। होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस समय क्षणभर भी जो ययौ लज्जां प्रहर्षं च प्रह्लादो भगवत्प्रियः॥ ५० आपके साथ बातचीत कर रहा हूँ, इससे प्राप्त होनेवाले प्रतिगृह्य स रत्नानि वत्सलः प्राह वारिधिम्। फलकी उपमा मैं कहीं नहीं देखता'॥४४–४९॥ महात्मन् सुतरां धन्यः शेते त्वयि हि स प्रभुः॥५१ इस प्रकार समुद्रने साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपतिके कल्पान्तेऽपि जगत्कृत्स्नं ग्रसित्वा स जगन्मयः। माहात्म्यसूचक वचनोंद्वारा जब उनकी स्तुति की, तब त्वय्येवैकार्णवीभूते शेते किल महात्मनि॥५२ भगवान्के प्रिय भक्त प्रह्लादजीको बड़ी लज्जा हुई और हर्ष लोचनाभ्यां जगन्नाथं द्रष्टुमिच्छामि वारिधे। भी। स्नेही प्रह्लादने समुद्रके दिये हुए रत्न ग्रहणकर उनसे त्वं पश्यसि सदा धन्यस्तत्रोपायं प्रयच्छ मे॥५३ कहा—'महात्मन्! आप विशेष धन्यवादके पात्र हैं; क्योंकि उक्तेति पादावनतं तूर्णमुत्थाप्य सागरः। भगवान् आपके ही भीतर शयन करते हैं। यह प्रसिद्ध है प्रह्लादं प्राह योगीन्द्र त्वं पश्यसि सदा हृदि॥५४ कि जगन्मय प्रभु प्रलयकालमें भी सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें द्रष्टुमिच्छस्यथाक्षिभ्यां स्तुहि तं भक्तवत्सलम्। लीन करके एकार्णवरूपमें स्थित आप महात्मा महासागरमें उक्तेति सिन्धुः प्रह्लादमात्मनः स जलेऽविशत्॥५५ ही शयन करते हैं। समुद्र! मैं इन स्थूल नेत्रोंसे भगवान् गते नदीन्द्रे स्थित्वैको हरिं रात्रौ स दैत्यजः। जगन्नाथका दर्शन करना चाहता हूँ। आप धन्य हैं; क्योंकि भक्त्यास्तौदिति मन्वानस्तद्दर्शनमसम्भवम्॥ ५६ सदा भगवान्का दर्शन करते रहते हैं। कृपया मुझे भी प्रह्लाद उवाच उनके दर्शनका उपाय बताइये'॥ ५०-५३॥ वेदान्तवाक्यशतमारुतसम्पवृद्ध- यों कहकर प्रह्लादजी समुद्रके चरणोंपर गिर पड़े। वैराग्यवह्निशिखया परिताप्य चित्तम्। तब समुद्रने उनको शीघ्र ही उठाकर कहा—'योगीन्द्र! संशोधयन्ति यदवेक्षणयोग्यतायै आप तो सदा ही अपने हृदयमें भगवान्का दर्शन करते धीराः सदैव स कथं मम गोचरः स्यात्॥ ५७ हैं; तथापि यदि इन नेत्रोंसे भी देखना चाहते हैं तो उन मात्सर्यरोषस्मरलोभमोह- भक्तवत्सल भगवान्का स्तवन कीजिये।' यों कहकर मदादिभिर्वा सुदृढैः सुषड्भिः। समुद्रदेव अपने जलमें प्रविष्ट हो गये॥५४-५५॥ उपर्युपर्यावरणैः सुबद्ध- समुद्रके चले जानेपर दैत्यनन्दन प्रह्लादजी रात्रिमें वहाँ मन्धं मनो मे क्व हरिः क्व वाहम्॥ ५८ अकेले ही रहकर भगवान्के दर्शनको एक असम्भव यं धातृमुख्या विबुधा भयेषु कार्य मानते हुए भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी स्तुति करने लगे ॥ ५६ ॥ शान्त्यर्थिनः क्षीरनिधेरुपान्तम्। प्रह्लादजी बोले—धीर पुरुष जिनके दर्शनकी योग्यता गत्वोत्तमस्तोत्रकृतः कथंचित् प्राप्त करनेके लिये सदा ही सैकड़ों वेदान्त-वाक्यरूप पश्यन्ति तं द्रष्टुमहो ममाशा॥ ५९ वायुद्वारा अत्यन्त बढ़ी हुई वैराग्यरूप अग्निकी ज्वालासे अपने चित्तको तपाकर भलीभाँति शुद्ध किया करते हैं, वे भगवान् विष्णु, भला, मेरे दृष्टिपथमें कैसे आ सकते हैं। एकके ऊपर एकके क्रमसे ऊपर-ऊपर जिनका आवरण पड़ा हुआ है—ऐसे मात्सर्य, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद आदि छः सुदृढ़ बन्धनोंसे भलीभाँति बँधा हुआ मेरा मन अंधा (विवेकशून्य) हो रहा है। कहाँ भगवान् श्रीहरि और कहाँ मैं! भय उपस्थित होनेपर उसकी शान्तिके लिये क्षीरसागरके तटपर जाकर ब्रह्मादि देवता उत्तम रीतिसे स्तवन करते हुए किसी प्रकार जिनका दर्शन कर पाते हैं, उन्हीं भगवान्के दर्शनकी मुझ-जैसा दैत्य आशा करे— यह कैसा आश्चर्य है!॥ ५७-५९॥
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१५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ अयोग्यमात्मानमितीशदर्शने राजन्! इस प्रकार अपनेको भगवान्का दर्शन पानेके स मन्यमानस्तदनासिकातरः । योग्य न मानते हुए प्रह्लादजी उनकी अप्राप्तिके दुःखसे उद्वेगदुःखार्णवमग्नमानसः कातर हो उठे। उनका चित्त उद्वेग और अनुतापके समुद्रमें स्रुताश्रुधारो नृप मूर्च्छितोऽपतत् ॥ ६० डूब गया। वे नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़े। भूप! फिर तो क्षणभरमें ही भक्तजनोंके अथ क्षणात्सर्वगतश्चतुर्भुजः एकमात्र प्रियतम सर्वव्यापी कृपानिधान भगवान् विष्णु शुभाकृतिर्भक्तजनैकवल्लभः । सुन्दर चतुर्भुज रूप धारणकर दुःखी प्रह्लादको अमृतके दुःस्थं तमाश्लिष्य सुधामयैर्भुजै- समान सुखद स्पर्शवाली अपनी भुजाओंसे उठाकर गोदमें स्तत्रैव भूपाविरभूद्दयानिधिः ॥ ६१ लगाते हुए वहाँ प्रकट हो गये ॥ ६०-६१ ॥ स लब्धसंज्ञोऽथ तदङ्गसङ्गा- उनके अङ्गस्पर्शसे होशमें आनेपर प्रह्लादने सहसा नेत्र दुन्मीलिताक्षः सहसा ददर्श । खोलकर भगवान्को देखा। उनका मुख प्रसन्न था। नेत्र प्रसन्नवक्त्रं कमलायताक्षं कमलके समान सुन्दर और विशाल थे। भुजाएँ बड़ी- सुदीर्घबाहुं यमुनासवर्णम् ॥ ६२ बड़ी थीं और शरीर यमुनाजलके समान श्याम था। वे उदारतेजोमयमप्रमेयं परम तेजस्वी और अपरिमित ऐश्वर्यशाली थे। गदा, शङ्ख, गदारिशङ्खाम्बुजचारुचिह्नितम् । चक्र और पद्म आदि सुन्दर चिह्नोंसे पहचाने जा रहे थे। स्थितं समालिङ्ग्य विभुं स दृष्ट्वा इस प्रकार अपनेको अङ्कमें लगाये हुए भगवान्को खड़ा प्रकम्पितो विस्मयभीतिहर्षैः ॥ ६३ देख प्रह्लाद भय, विस्मय और हर्षसे काँप उठे, वे इस तत् स्वप्नमेवाथ स मन्यमानः घटनाको स्वप्न ही समझते हुए सोचने लगे—'अहा! स्वप्नेऽपि पश्यामि हरिं कृतार्थम् । स्वप्नमें भी मुझे पूर्णकाम भगवान्का दर्शन तो मिल गया!' इति प्रहर्षार्णवमग्नचेताः यह सोचकर उनका चित्त हर्षके महासागरमें गोता लगाने स्वानन्दमूर्च्छां स पुनश्च भेजे ॥ ६४ लगा और वे पुनः स्वरूपानन्दमयी मूर्च्छाको प्राप्त हो गये। ततः क्षितावेव निविश्य नाथः तब अपने भक्तोंके एकमात्र बन्धु भगवान् पृथ्वीपर ही कृत्वा तमङ्के स्वजनैकबन्धुः । बैठ गये और पाणिपल्लवसे धीरे-धीरे उन्हें हिलाने लगे। शनैर्विधुन्वन् करपल्लवेन स्नेहमयी माताकी भाँति प्रह्लादके गात्रका स्पर्श करते हुए स्पृशन् मुहुर्मातृवदालिलिङ्ग ॥ ६५ उन्हें बार-बार छातीसे लगाने लगे ॥ ६२-६५ ॥ ततश्चिरेण प्रह्लादः सम्मुखोन्मीलितेक्षणः । कुछ देरके बाद प्रह्लादने भगवान्के सामने आँखें खोलकर आलुलोके जगन्नाथं विस्मयाविष्टचेतसा ॥ ६६ विस्मितचित्तसे उन जगदीश्वरको देखा। फिर बहुत देरके ततश्चिरात्तं सम्भाव्य धीरः श्रीशाङ्कशायिनम् । बाद अपनेको भगवान् लक्ष्मीपतिकी गोदमें सोया हुआ आत्मानं सहसोत्तस्थौ सद्यः सभयसम्भ्रमः ॥ ६७ अनुभवकर वे भय और आवेगसे युक्त हो सहसा उठ गये प्रणामायापतद्भूम्यां प्रसीदेति वदन्मुहुः । तथा 'भगवन्! प्रसन्न होइये' यों बार-बार कहते हुए उन्हें सम्भ्रमात् स बहुज्ञोऽपि नान्यां पूजोक्तिमस्मरत् ॥ ६८ साष्टाङ्ग प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर गिर पड़े। बहुज्ञ तमथाभयहस्तेन गदाशङ्खारिधृक् प्रभुः । होनेपर भी उन्हें उस समय घबराहटके कारण अन्य गृहीत्वा स्थापयामास प्रह्लादं स दयानिधिः ॥ ६९ स्तुतिवाक्योंका स्मरण न हुआ। तब गदा, शङ्ख और चक्र कराब्जस्पर्शनाह्लादगलदश्रुं सवेपथुम् । धारण करनेवाले दयानिधि भगवान्ने प्रह्लादको अपने भूयोऽथाह्लादयन् स्वामी तं जगादेति सान्त्वयन् ॥ ७० भक्तभयहारी हाथसे पकड़कर खड़ा किया। भगवान्के कर- कमलोंका स्पर्श होनेसे अत्यन्त आनन्दके आँसू बहाते और काँपते हुए प्रह्लादको और अधिक आनन्द देनेके लिये प्रभुने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा ॥ ६६-७० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth