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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

१४२ नीतिवाक्यामृतम् जिसने स्वयम् उद्योग करके किसी प्रकार की प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त की वह यदि अपने उच्च वंश में जन्म लेने के अहंकार का प्रदर्शन करता है तो सबकी अप्रतिष्ठा का पात्र होता है। आर्तः सर्वोऽपि भवति धर्मबुद्धिः ॥ ५ ॥ दुखी होने पर सभी व्यक्ति धार्मिकविचार वाले बन जाते हैं। स नीरोगो यः स्वयं धर्माय समीहते ॥ ६ ॥ नीरोग वह व्यक्ति है जो बिना किसी कारण के ही धर्म-बुद्धि वाला हो। व्याधिग्रस्तस्य ऋते धैर्यान्न परमौषधमस्ति ॥ ७ ॥ व्याधि से पीड़ित व्यक्ति के लिये धैर्य के अतिरिक्त दूसरी कोई श्रेष्ठ औषध नहीं है। स महाभागो यस्य न दुरपवादोपहतं जन्म ॥ ८ ॥ भाग्यशाली वह है जिसका जीवन किसी अपयश से कलंकित न हो। पराधीनेष्वर्थेषु स्वोत्कर्षसंभावनं मन्दमतीनाम् ॥ ९ ॥ पराधीन वस्तुओं से अपने उत्कर्ष की आशा करना मूर्खता है। न भयेषु विषादः प्रतीकारः किन्तु धैर्यावलम्बनम् ॥ १० ॥ किसी प्रकार के सङ्कट से भय उत्पन्न होने पर दुखी होकर बैठना उस भय को दूर करने का उपाय नहीं है, किन्तु धैर्यधारण करना ही उसका श्रेष्ठ प्रतीकार है। स किं धन्वी तपस्वी वा यो रणे मरणे शरसन्धाने मनःसमाधाने च मुह्यति ॥ ११ ॥ वह कैसा धनुर्धारी अथवा तपस्वी है जो रण में, मरण में, बाण-चढ़ाने में और मन को समझाने में मोह में—अज्ञान में—पड़ जाता है ? कृते प्रतिकृतमकुर्वतो नैहिकफलमस्ति नामुत्रिकञ्च ॥ १२ ॥ उपकारी के प्रति प्रत्युपकार न करनेवाले को इस लोक और परलोक में भी कोई फल प्राप्त नहीं होता। शत्रुणाऽपि सूक्तमुक्तं न दूषयितव्यम् ॥ १३ ॥ शत्रु के द्वारा भी कही गई उत्तम उक्ति में दोष न लगाना चाहिए। कलहजननम् अप्रीत्युत्पादनं च दुर्जनानां धर्मो न सज्जनानाम् ॥१४॥ लड़ाई लगाना, वैर कराना दुर्जनों का कार्य है सज्जनों का नहीं। श्रीर्न तस्याभिमुखी यो लब्धार्थमात्रेण सन्तुष्टः ॥ १५ ॥ भाग्यवश जो मिल गया उसीसे सन्तुष्ट हो जानेवाले व्यक्ति के पास लक्ष्मी नहीं आती। तस्य कुतो वंशवृद्धियों न प्रशमयति वैरानुबन्धनम् ॥ १६ ॥

सदाचारसमुद्देशः १४३ जो परम्परा से प्राप्त बैरभाव को शान्त नहीं कर सकता उसके वंश का विस्तार कैसे हो सकता है ? अर्थात् किसी से पुराना बैर ठना रहने पर अवश्य ही कभी न कभी मारपीट में कुछ आदमी मरेंगे और इस प्रकार वंश की वृद्धि में बाधा होगी अतः वैर मिटा दे । भीतेष्वभयदानात् परं न दानमस्ति ॥ १७ ॥ डरे हुये को अभयदान देने से बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ दान नहीं है । स्वस्यासम्पत्तौ न चिन्ता किञ्चित् काङ्क्षितमर्थं ( प्रसूते ) दुग्धे किन्तूत्साहः ॥ १८ ॥ अपनी दरिद्रता के विषय में चिन्ता में पड़े रहने से कोई लाभ नहीं होता किन्तु उत्साह रखने से अच्छा फल मिलता है। अर्थात् उत्साहपूर्वक उद्योग करने से लक्ष्मी अवश्य प्राप्त होती हैं। स खलु स्वस्यैवापुण्योदयोऽपराधो वा (यः) सर्वेषु कल्पफलप्रदोऽपि स्वामी भवत्यात्मनि वन्ध्यः ॥ १६ ॥ यदि कोई स्वामी सर्वसाधारण के लिये कल्पवृक्ष के तुल्य फलदायक हो किन्तु मात्र अपने को उससे कोई फल न मिल सके तो उसे अपने ही पापों का उदय अथवा अपना ही कोई अपराध समझना चाहिए। स सदैव दुःखितो यो मूलधनमसंवर्धयन्ननुभवति ॥ २० ॥ वह व्यक्ति सदा ही दुखी बना रहता है जो मूल धन का उपयोग करता है। मूर्खदुर्जनचण्डालपतितैः सह संगतिं न कुर्यात् ॥ २१ ॥ मूर्ख, दुर्जन, चण्डाल और पतित पुरुषों की संगति न करे। किं तेन तुष्टेन यस्य हरिद्राराग इव चित्तानुरागः ॥ २२ ॥ जिसका प्रेम हलदी के रंग के समान धो देने से छूट जानेवाला हो अर्थात् थोड़े में ही बदल जानेवाला हो उस मनुष्य के सन्तुष्ट हो जाने से भी क्या लाभ होगा ? वह क्षणभर में फिर बदलकर अहित भी कर सकता है। स्वात्मानमविज्ञाय पराक्रमः कस्य न परिभवं करोति ॥ २३ ॥ अपनी शक्ति और सामर्थ्य का अनुमान किये बिना दूसरे पर आक्रमण करने से किसकी पराजय नहीं होगी ? नाक्रान्तिः पराभियोगस्योत्तरं किन्तु युक्तेरुपन्यासः ॥ २४ ॥ शत्रु के आक्रमण का वास्तविक उत्तर स्वयं भी आक्रमण कर देना नहीं होता, किन्तु युक्ति से कोई बात करना ही उसका वास्तविक उत्तर होता है। राज्ञोऽस्थाने कुपितस्य कुतः परिजनः ॥ २५ ॥

१४४ नीतिवाक्यामृतम् बिना बात की बात बिगड़ बैठने वाले राजा के पास सेवकों का अभाव रहता है। न मृतेषु रोदितव्यमश्रुपातसमा हि किल पतन्ति तेषां हृदयेष्व- ङ्गाराः ॥ २६ ॥ किसी व्यक्ति के मृत हो जाने पर रुदन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे उस मृत व्यक्ति को अश्रुपात के तुल्य अङ्गारपतन की हार्दिक पीड़ा होती है। अतीते च वस्तुनि शोकः श्रेयानेव यदास्ति तत्समागमः ॥ २७ ॥ नष्ट हुए पदार्थ के लिये शोक करना तभी कल्याणकारक समझा जायगा जब कि वह पुनः मिल जाय किन्तु ऐसा कभी होता नहीं। अतः मृत व्यक्ति अथवा नष्ट पदार्थ के लिये शोक करना सर्वथा व्यर्थ है। शोकमात्मनि चिरमनुवासयँस्त्रिवर्गमनुशोषयति ॥ २८ ॥ किसी वस्तु के लिये चिरकाल तक शोक करते रहने से धर्म, अर्थ और काम तीनों का नाश होता है। स किंपुरुषो योऽकिञ्चनः सन् करोति विषयाभिलाषम् ॥ २६ ॥ जो व्यक्ति दरिद्र होकर भी अगम्य विषयों की अभिलाषा करता है वह निन्दनीय है। अपूर्वेषु प्रियपूर्वं सम्भाषणं स्वर्गच्युतानां लिङ्गम् ॥ ३० ॥ जो व्यक्ति अपरिचितों से मिलकर मधुर भाषणपूर्वक बातचीत करे उसे समझना चाहिये कि वह किसी कारणवश स्वर्ग से भ्रष्ट होकर इस मृत्युलोक में आ गया है। न ते मृता येषामिहास्ति शाश्वती कीर्त्तिः ॥ ३१ ॥ जिसकी कीर्ति इस लोक में निरन्तर वर्त्तमान है वह मृत होकर भी जीवित है। स केवलं भूभाराय जातो येन न यशोभिर्धवलितानि भुवनानि ॥ ३२॥ जिसने अपनी कीर्त्ति-चन्द्रिका से भुवनों को उज्ज्वल नहीं किया उसका जन्म पृथ्वी के लिये व्यर्थ भार है। परोपकारो योगिनां महान् भवति श्रेयोबन्ध इति ॥ ३३ ॥ योगियों-महापुरुषों द्वारा किये गये जनकल्याण के कार्य लोगों के लिये महती कल्याण परम्परा है। का नाम शरणागतानां परीक्षा ॥ ३४ ॥ जो व्यक्ति अपनी शरण में आ जाय उसकी परीक्षा नहीं करनी चाहिए।

सदाचारसमुद्देशः १४५ अभिभवनमन्त्रेण परोपकारो महापातकिनां न महासत्त्वानाम् ॥३५॥ किसी अभिलाषा से परोपकार करना महापातकियों का कार्य है, महा- पुरुषों का नहीं। तस्य भूपतेः कुतोऽभ्युदयो जयो वा यस्य द्विषत्सभासु नास्ति गुण- ग्रहणप्रागल्भ्यम् ॥ ३६ ॥ शत्रुओं की भी सभा में जिस राजा की कीर्त्ति का गान नहीं किया जाता उसका जय और अभ्युदय कैसा ! अर्थात् राजा को इतना प्रभावशाली होना चाहिए कि शत्रु भी उसके गुणों और प्रभाव का लोहा मानें। तस्य गृहे कुटुम्बं धरणीयं यत्र न भवति परेषामाभिषम् ॥ ३७ ॥ आपत्ति के समय पलायन करते समय अपने कुटुम्ब को ऐसे व्यक्ति के यहां छोड़ जाना चाहिए जहाँ कुटुम्ब को दूसरे के द्वारा कोई हानि न हो। परस्त्रीद्रव्यरक्षणेन नात्मनः किमपि फलं विप्लवेन महाननर्थ- सम्बन्धः ॥ ३८ ॥ दूसरे की स्त्री और द्रव्य रखने से अपना कोई लाभ नहीं होता किन्तु यदि किसी प्रकार का उपद्रव हुआ तो उससे महान् अनर्थ होता है। आत्मानुरक्तं कथमपि न त्यजेत् यथास्ति तदन्ते तस्य सन्तोषः ॥ ३९ ॥ अपने यहां रहने में जिसे परम सन्तोष हो और जो अपने ऊपर अनुरागी हो ऐसे व्यक्ति का परित्याग कभी भी नहीं करना चाहिए। आत्मसंभावितः परेषां भृत्यानामसहमानश्च भृत्यो हि बहुपरिजन- मपि करोत्येकाकिनं स्वामिनम् ॥ ४० ॥ जो नौकरों की बढ़ती न देख सके और अपने को बहुत बड़ा माने ऐसे भृत्य के होने से राजा के बहुत से भी सेवक धीरे-धीरे करके चले जाते हैं और राजा अकेला रह जाता है। अतः राजा को चाहिए कि वह सेवकों में प्रमुख ऐसे व्यक्ति को बनावे जो अपने साथी सेवकों की तरक्की से प्रसन्न हो और स्वयं विनम्र स्वभाव का हो। अपराधानुरूपो दण्डः पुत्रेऽपि प्रणेतव्यः ॥ ४१ ॥ अपराध के अनुसार पुत्र को भी दण्ड देना चाहिए। देशानुरूपः करो ग्राह्यः ॥ ४२ ॥ देश की स्थिति के अनुसार ही कर ग्रहण करना चाहिए। प्रतिपाद्यानुरूपं वचनम् उदाहर्त्तव्यम् ॥ ४३ ॥ प्रतिपादन किये जाने वाले विषय के अनुकूल ही वाणी का प्रयोग करे। अर्थात् लोगों को जैसा विषय समझाना हो वैसी ही भाषा का व्यवहार करे। १० नी०

१४६ नीतिवाक्यामृतम् आयानुरूपो व्ययः कार्यः ॥ ४४ ॥ आय के अनुसार ही व्यय करना चाहिये । ऐश्वर्यानुरूपः प्रसादो विधेयः ॥ ४५ ॥ अपनी सम्पत्ति के अनुरूप ही दूसरों को भेंट और पुरस्कार आदि देना चाहिए । स पुमान् सुखी यस्यास्ति सन्तोषः ॥ ४६ ॥ वही पुरुष वास्तविक सुखी है जिसको सन्तोष है । रजस्वलाभिगामी चाण्डालादप्यधमः ॥ ४७ ॥ रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग करनेवाला व्यक्ति चांडाल से भी अधिक नीच है । सलज्जं निर्लज्जं न कुर्यात् ॥ ४८ ॥ सलज्ज व्यक्ति को निर्लज्ज न बना दें अर्थात् विनम्र भाव से रहने वाले व्यक्ति को मुंहलगा बना कर ढीठ कर देना उचित नहीं होता । स पुमान् सवस्त्रोऽपि नग्न एव यस्य नास्ति सच्चरित्रम् आवर- णम् ॥ ४६ ॥ जिस पुरुष के पास सच्चरित्र रूपी आवरण नहीं है वह वस्त्र पहने हुए भी नंगा ही है । स नग्नोऽप्यनग्न एव यो भूषितः सच्चरित्रेण ॥ ५० ॥ जो सच्चरित्र से विभूषित है वह नंगा होने पर भी वस्त्रयुक्त है । सर्वत्र संशायानेषु नास्ति कार्यसिद्धिः ॥ ५१ ॥ सर्वत्र संशयभरी दृष्टि रखने वाले को कार्यों में सिद्धि नहीं प्राप्त होती । न क्षीरघृताभ्यां परं भोजनमस्ति ॥ ५२ ॥ दूध और घी से बढ़कर दूसरा भोजन नहीं है । परोपघातेन वृत्तिरभव्यानाम् ॥ ५३ ॥ दूसरों को पीड़ित कर अपना जीवन निर्वाह करना दुष्टों का काम है । वरमुपवासो न पराधीनं भोजनम् ॥ ५४ ॥ उपवास कर लेना अच्छा है किन्तु दूसरों के अधीन रहकर भोजन करना श्रेष्ठ नहीं है । स देशोऽनुसर्त्तव्यो यत्र नास्ति वर्णसङ्करः ॥ ५५ ॥ उस देश में निवास करना चाहिए जहां वर्णसंकर अर्थात् क्षुद्र प्रकृति के मनुष्य न हों । स जात्यन्धो यः परलोकं न पश्यति ॥ ५६ ॥ जो अपना परलोक का हित न देखे वह स्वभावतः अन्धा है ।

सदाचारसमुद्देशः १४७ व्रतं, विद्या, सत्यमानृशंस्यमलौल्यता च ब्राह्मण्यं न पुनर्जाति- मात्रम् ॥ ५७ ॥ शुभ संकल्प, सद्विद्या का अभ्यास, सत्यपालन, अक्रूरता और गाम्भीर्य गुणों से मनुष्य ब्राह्मण होता है केवल ब्राह्मण जाति में जन्म लेने से नहीं । निःस्पृहाणां का नाम परापेक्षा ॥ ५८ ॥ जो व्यक्ति निःस्पृह हैं—जिनको किसी बात का अभिलाष नहीं हैं उनको दूसरे व्यक्ति की सहायता आदि की क्या आवश्यकता है । कं पुरुषमाशा न क्लेशयति ॥ ५९ ॥ आशा किसे नहीं दुख देती । स संयमी गृहाश्रमी वा यस्याविद्यातृष्णाभ्यामनुपहतं चेतः ॥ ६० ॥ जिसके हृदय में अज्ञान और तृष्णा नहीं है वही व्यक्ति वस्तुतः संयमी और गृहस्थ है। शीलमलंकारः पुरुषाणां न देहखेदावहो बहिः ॥ ६१ ॥ पुरुषों के लिये 'शील' ऐसा आभूषण है जो बाहर से देह को किसी प्रकार का कष्ट नहीं देता अथवा भार नहीं लगता । अप्रियकर्त्तुर्न प्रियकरणात् परम् आचरणम् ॥ ६३ ॥ अप्रिय आचरण करने वाले व्यक्ति के प्रति प्रिय व्यवहार करना सर्वश्रेष्ठ आचरण है । अप्रयच्छन्नर्थिने न परुषं ब्रूयात् ॥ ६४ ॥ जिसे कुछ देना न चाहे ऐसे याचक के प्रति कम से कम कठोर वचन तो न बोले । स स्वामी मरुभूमियेत्रार्थिनो न भवन्तीष्टकामाश्च ॥ ६५ ॥ वह स्वामी मरुभूमि के समान है जिससे याचकों की अभीष्ट याञ्चा न पूर्ण हो । प्रजापालनं हि राज्ञो यज्ञो न पुनर्भूतानामालम्भः ॥ ६६ ॥ राजा का यज्ञ प्रजापालन है न कि जीवों की बलि देना । प्रभूतमपि नानपराधसत्त्वव्यावृत्तये नृपाणां बलं धनुर्वा किन्तु शरणागतरक्षणाय ॥ ६७ ॥ राजा की प्रचुरशक्ति सैन्य बल आदि अथवा दृढ़ धनुष निरपराध व्यक्तियों को नष्ट करने के लिये नहीं किन्तु शरणागतों की रक्षा के लिये होता है । [ इति सदाचारसमुद्देशः ]

१४८ नीतिवाक्यामृतम् २७. व्यवहारसमुद्देशः कलत्रं नाम नराणामनिगडमपि बन्धनं दृढमाहुः ॥ १ ॥ मनुष्यों के लिये भार्या बन्धन की लोह-शृङ्खला न होने पर भी दृढ़ बन्धन है । त्रीण्यवश्यं भर्त्तव्यानि माता, कलत्रम् , अप्राप्तव्यवहाराणि चाप- त्यानि ॥ २ ॥ माता, स्त्री, और व्यवहार में अबोध सन्तति इन तीनों का भरण-पोषण अवश्य करना चाहिए । दानं तपः प्रायोपवेशनं तीर्थोपासनफलम् ॥ ३ ॥ दान, तप और उपवास ये तीर्थ सेवा के फल हैं । तीर्थोपवासिषु देवस्वापरिहरणं क्रव्यादेषु कारुण्यमिव, स्वाचारच्युतेषु पापभीरुत्वमिव प्राहुः ॥ ४ ॥ तीर्थ स्नान में वास करनेवाले देवता का द्रव्य नहीं ग्रहण करते यह कहना वैसा ही है जैसे मांस भक्षक में करुणा का होना और अपने आचार-विचार से भ्रष्ट पुरुष में पाप भीरुता का होना । ऐसा लोग कहते हैं । अधार्मिकत्वम् अतिनिष्ठुरत्वं वञ्चकत्वं प्रायेण तीर्थवासिनां प्रकृतिः ॥ ५ ॥ अधार्मिक होना, अतिक्रूर होना, वञ्चना करना यह प्रायः तीर्थ-वासियों का स्वभाव होता है । स किं प्रभुर्यः कार्यकाल एव न संभावयति भृत्यान् ॥ ६ ॥ वह स्वामी निन्दनीय है जो कार्य के अवसर पर ही सेवकों का पुरस्कार आदि से सम्मान नहीं करता । स किं भृत्यः सखा वा यः कार्यमुद्दिश्यार्थं याचते ॥ ७ ॥ वह सेवक और सखा भी निन्दनीय है जो कार्य के समय अर्थ की याचना करता है । याऽर्थेन प्रणयिनी करोति चाङ्गाकृष्टि सा किंभार्या ॥ ८ ॥ जो द्रव्य के कारण अनुराग और आलिङ्गन करती है वह भार्या निन्द- नीय है । स किं देशो यत्र नास्त्यात्मनो वृत्तिः ॥ ६ ॥ वह देश कुत्सित है जहां अपना जीवन-निर्वाह नहीं ।

व्यवहारसमुद्देशः १४६ स किं बन्धुर्यो व्यसनेषु नोपतिष्ठते ॥ १० ॥ दुःख के अवसर पर काम न आने वाला क्या बन्धु है ? अर्थात् वह कुत्सित बन्धु है । तत्किं मित्रं यत्र नास्ति विश्वासः ॥ ११ ॥ जिस पर विश्वास न किया जा सके वह कुत्सित मित्र है । स किं गृहस्थो यस्य नास्ति सत्कलत्रसम्पत्तिः ॥ १२ ॥ जिसके पास सती भार्या रूप सम्पत्ति नहीं है वह गृहस्थ निन्दनीय है । तत्किं दानं यत्र नास्ति सत्कारः ॥ १३ ॥ विना सम्मान का दान निन्दनीय है । तत्किं भुक्तं यत्र नास्त्यतिथिसंविभागः ॥ १४ ॥ जिस भोजन में अतिथि का भाग न हो वह निन्दनीय भोजन है । तत्किं प्रेम यत्र कार्यवशात् प्रवृत्तिः ॥ १५ ॥ जहाँ प्रयोजन-वश प्रवृत्ति हो वह प्रेम निन्दनीय है । तत् किमाचरणं यत्र वाच्यता मायाव्यवहारो वा ॥ १६ ॥ वह आचार निन्दनीय है जिसमें अपयश और छल-कपट पूर्ण व्यव- हार हो । तत् किमपत्यं यत्र नाध्ययनं विनयो वा ॥ १७ ॥ वह कुत्सित पुत्र है जिसमें न अध्ययन हो न विनय हो । तत्किं ज्ञानं यत्र मदेनान्धता चित्तस्य ॥ १८ ॥ मदान्ध चित्त वाले का ज्ञान निन्दनीय है । तत्किं सौजन्यं यत्र परोक्षे पिशुनभावः ॥ १९ ॥ जहां पीठ पीछे निन्दा की जाती हो वह सज्जनता कैसी ? सा किं श्रीर्यया न सन्तोषः सत्पुरुषाणाम् ॥ २० ॥ उस लक्ष्मी से भी क्या जिससे सत्पुरुषों का सन्तोष न हो । तत्किं कृत्यं यत्रोक्तिरुपकृतस्य ॥ २१ ॥ किये हुए उपकार को जहां कह-कहकर प्रकट किया जाय वह उपकार प्रशंसनीय नहीं है । तयोः को नाम निर्वाहो यौ द्वावपि प्रभूतमानिनौ पण्डितौ लुब्धौ साहङ्कारौ ॥ २२ ॥ ऐसे उन दो आदमियों का परस्पर निर्वाह कैसे हो सकता है जो दोनों ही बड़े अभिमानी, पण्डित, लोभी और अहङ्कारी हों । स्ववान्त इव स्व-दत्ते नाभिलाषं कुर्यात् ॥ २३ ॥

१५० नीतिवाक्यामृतम् अपने द्वारा किये गये वमन के समान अपने द्वारा दी गई वस्तु का पुनः अभिलाष नहीं करना चाहिए । उपकृत्य मूकभावोऽभिजातानाम् ॥ २४ ॥ कुलीन व्यक्ति उपकार करने के अनन्तर मौन रहते हैं । परदोषश्रवणे बधिरभावः सत्पुरुषाणाम् ॥ २५ ॥ सज्जन पुरुष दूसरे का दोष सुनने के समय बहरे बन जाते हैं । परकलत्रदर्शनेऽन्धभावो महाभाग्यानाम् ॥ २६ ॥ अतीव पुण्यशाली व्यक्ति दूसरे की स्त्री को देखने के अवसर पर अन्धे बन जाते हैं । शत्रावपि गृहायाते संभ्रमः कर्त्तव्यः किं पुनर्न महति ॥ २७ ॥ जबकि अपने घर में शत्रु के भी आने पर उसका समादर करना उचित है तो महान् व्यक्ति के आगमन पर उसका समादर क्यों न किया जायगा । अन्तः सारधनमिव स्वधर्मो न प्रकाशनीयः ॥ २८ ॥ गुप्त धन को जिस प्रकार दूसरे को नहीं बताया जाता उसी प्रकार अपना धर्माचरण भी किसी के समक्ष नहीं व्यक्त करना चाहिए । मदप्रमादजे दोषे गुरुषु निवेदनम् अनु प्रायश्चित्तं च प्रतीकारः ॥ २६ ॥ काम क्रोध आदि के मद-वश अथवा असावधानी से किये गये दुष्कृत्य को गुरुजनों से निवेदन करने के अनन्तर उसका प्रायश्चित्त कर लेना ही उसका प्रतीकार है । श्रीमतोऽर्थार्जने कायक्लेशो धन्यो, यो देव-द्विजान् प्रीणाति ॥३०॥ जिस धन से देवता और ब्राह्मणों को प्रसन्न किया जाता हो उस धन के अर्जन में श्रीमानों का कष्ट धन्यवाद के योग्य है । चणका इव नीचा उदरस्थापिता अपि नाविवुर्वाणास्तिष्ठन्ति ॥३१॥ नीचों के साथ कितना भी आत्मीय भाव क्यों न कर लिया जाय वे पेट में डाले गये अर्थात् खाये हुये चनों की भांति कुछ न कुछ विकार करते ही हैं । स पुमान् वन्द्यचरितो यः प्रत्युपकारमनवेक्ष्य परोपकारं करोति ॥ ३२ ॥ उस पुरुष का आचरण वन्दनीय है जो प्रत्युपकार की आशा न रखकर दूसरे का उपकार करता है । अज्ञानस्य वैराग्यं, भिक्षोर्विटत्वम्, अधनस्य विलासो, वेश्यारतस्य शौचम्, अविदितवेदितव्यस्य तत्त्वग्रह इति पञ्च न कस्य मस्तक- शूलानि ॥ ३३ ॥ अज्ञानी का वैराग्य ग्रहण करना, भिक्षु का कामुक होना, निर्धन का

व्यवहारसमुद्देशः १५१ विलास भोग में रत होना वेश्यागामी की पवित्रता तथा तत्त्वज्ञान अर्थात् ब्रह्मज्ञान से पूर्व जानने योग्य बातों को जाने बिना तत्त्वज्ञान के लिये आग्रह करना ये पांच किसके लिये 'शिरदर्द' नहीं होते अर्थात् इन बातों से सबको कष्ट होता है । स हि पञ्च-महापातकी योऽशस्त्रमशास्त्रं वा पुरुषमभियुञ्जीत ॥३४॥ जो व्यक्ति शस्त्र रहित अथवा शास्त्र ज्ञान से शून्य पुरुष से युद्ध अथवा शास्त्रार्थ के लिये प्रवृत्त होता है उसे पांच महापापों के करने का पाप होता है । स्त्री, बालक, गो, ब्राह्मण और अपना स्वामी इनका वध पंच महा- पातक है । उपश्रुति श्रोतुमिव कार्यवशान्नीचमपि स्वयमुपसर्पेत् ॥ ३५ ॥ उपश्रुति सुनने के समान ही कार्य-वश नीच के घर भी स्वयं जाना चाहिए । नक्तं निर्गत्य यत्किञ्चिच्छुभाशुभकरं वचः । श्रूयते तद्विदुर्वीरा दैवप्रश्नमुपश्रुतिम् ॥ ( हारावली ) भविष्य का शुभ अशुभ बताने के लिये देवगण रात्रि में कुछ शब्द करते हैं इस विश्वास से रात्रि के समय घर से निकल कर उस शब्द को सुनने के लिये जो गम्य अगम्य स्थान पर जाकर उस शकुन को सुनते हैं उस दैव प्रश्न को विद्वान् उपश्रुति कहते हैं । वेश्यागमो गृहिणीं गृहपति वा प्रत्यवसादयति ॥ ३६ ॥ वेश्या के समागम से गृहिणी अथवा गृहपति का विनाश हो जाता है । वेश्यासंग्रहो देवद्विजगृहिणीबन्धूनामुच्चाटनमन्त्रः ॥ ३७ ॥ वेश्या से व्यवहार रखना देवता, ब्राह्मण अपनी स्त्री और बन्धुओं के लिये उच्चाटन मन्त्र के प्रयोग के समान है । अहो लोकस्य पापं यन्निजस्त्री रतिरपि भवति निम्बसमा, परगृहीता शुन्यपि भवति रम्भासमा ॥ ३८ ॥ पाप के विषय में लोगों की यह कैसी विडम्बना है कि कामदेव की स्त्री रति के समान भी अपनी स्त्री नीम के समान कड़वी अथवा अप्रिय लगती है और परपुरुष की स्त्री कुतिया के समान क्षुद्र होने पर भी रम्भा देवलोक की अप्सरा के समान प्रिय लगती है । स सुखी यस्य एकदैव दारपरिग्रहः ॥ ३६ ॥ सुखी वही है जिसकी एक ही स्त्री होती हैं ।

१५२ नीतिवाक्यामृतम् व्यसनिनो यथा अभिसारिकासु सुखं न तथा अर्थवतीषु ॥ ४० ॥ लम्पट पुरुष को व्यभिचारिणी अभिसारिका से जैसा सुख मिलता है वैसा वेश्या से नहीं । महान् धन-व्ययस्तदिच्छानुवर्त्तनं दैन्यं चार्थवतीषु ॥ ४१ ॥ वेश्या के यहां जाने में बहुत धन का व्यय करना पड़ता है, उसकी इच्छा का अनुसरण करना होता है और विनम्र याचक बनना होता है । आस्तरणं, कम्बलो, जीवधनं, गर्दभः, परिग्रहो, वोढा, सर्वकर्माणश्च भृत्या इति कस्य नाम न सुखावहानि ॥ ४२ ॥ बिस्तर, कम्बल, पशुधन-गायबैल आदि, गदहा, स्त्री, बोझ ढोने वाला और सब प्रकार का काम करनेवाला सेवक ये किसके लिये सुखदायक नहीं होते ! अर्थात् इनसे सबको सुख मिलता है । न दारिद्र्यात् परं पुरुषस्य लाञ्छनमस्ति यत्संगेन सर्वे गुणा निष्फलतां यान्ति ॥ ४३ ॥ पुरुष के लिये दरिद्रता से बढ़कर दूसरा कोई कलंक नहीं है, जिसके संयोग से उसके सब गुण निष्फल हो जाते हैं । अलब्धार्थोऽपि लोको धनिनो भाण्डो भवति ॥ ४४ ॥ धन न मिलने पर भी लोग धनी पुरुष के सहायक हो जाते हैं । धनिनो यतयोऽपि चाटुकाराः ॥ ४५ ॥ सन्यासी भी धनी की चाटुकारिता-खुशामद करते हैं । न रत्नहिरण्यपूताज्जलात् परं पावनमस्ति ॥ ४६ ॥ रत्न और सुवर्ण से पवित्र किये गये जल से बढ़कर दूसरा कोई पवित्र करनेवाला पदार्थ नहीं है । स्वयं मेध्या आपो वह्नितप्ता विशेषतः ॥ ४७ ॥ जल स्वयं पवित्र है किन्तु अग्नि पर गरम किया गया जल विशेषरूप से पवित्र हैं । स एवोत्सवो यत्र बन्दिमोक्षो दीनोद्धरणं च ॥ ४८ ॥ उत्सव वही है जिसमें बन्दी छोड़े जायें और दीनों का उद्धार किया जाय । तानि पर्वाणि येष्वतिथिपरिजनयोः प्रकामं सन्तर्पणम् ॥ ४६ ॥ पर्व, त्योहार के वही दिन हैं जिनमें अतिथि और सेवकगण खिलापिला- कर पूर्ण रूप से सन्तुष्ट किये जायं । तास्तिथयो यासु नाधर्माचरणम् ॥ ५० ॥ प्रतिपद आदि तिथियों में मनुष्य के लिये वही तिथि तिथि है जिसमें वह किसी प्रकार का अधर्म का कार्य न करे ।

व्यवहारसमुद्देशः १५३ सा तीर्थयात्रा यस्यामकृत्यनिवृत्तिः ॥ ५१ ॥ तीर्थ यात्रा वही सफल है जिसमें मनुष्य दुष्कृत्य का परित्याग कर दे । तत् पाण्डित्यं यत्र वयोविद्योचितमनुष्ठानम् ॥ ५२ ॥ पाण्डित्य वही सफल है जिसमें अवस्था और विद्या के अनुरूप आचरण किया जाय । तच्चातुर्यं यत् परप्रीत्या कार्यसाधनम् ॥ ५३ ॥ चतुराई वही है जिसमें दूसरे को प्रसन्न रख कर अपना कार्य सिद्ध किया जाय । तल्लोकोचितत्वं यत् सर्वजनादेयत्वम् ॥ ५४ ॥ लोकोचित वही कर्म है जिससे मनुष्य सबका प्रिय पात्र बन जाय । तत् सौजन्यं यत्र नास्ति परोद्वेगः ॥ ५५ ॥ सज्जनता वही है जिसमें दूसरे को किसी प्रकार का उद्वेग ( भय और त्रास ) न प्रतीत हो । तद्धीरत्वं यत्र यौवने नापवादः ॥ ५६ ॥ धीरता वही है जिसमें युवावस्था में कोई अपयश न हो । तत्सौभाग्यं यत्रादानेन वशीकरणम् ॥ ५७ ॥ मनुष्य का सौभाग्य वही है कि वह किसी को कुछ दे भी नहीं और लोग उसके वश में रहें । सा सभारण्यानी यस्यां न सन्ति विद्वांसः ॥ ५८ ॥ वह सभा अरण्यस्थली है जिसमें विद्वान् न हों । किं तेनात्मनः प्रियेण यस्य न भवति स्वयं प्रियः ॥ ५६ ॥ कोई व्यक्ति अपना प्रिय तो हो, किन्तु उसके लिये आप प्रिय न हों तो उस प्रियता से क्या लाभ ? अर्थात् प्रीति दोनों ओर से समान होनी चाहिए । स किं प्रभुर्यो न सहते ॰परिजनसम्बाधम् ॥ ६० ॥ वह स्वामी श्लाघनीय नहीं है जो सेवकों की बाधाओं और आवश्यकताओं को नहीं सहन कर सकता, अर्थात् सेवकों की आवश्यकता के अनुकूल यदि व्यय न कर सके तो वह स्वामी ठीक नहीं है । न लेखाद्वचनं प्रमाणम् ॥ ६१ ॥ लेख से बढ़कर वचन को प्रमाण नहीं माना जाता । अनभिज्ञाते लेखेऽपि नास्ति सम्प्रत्ययः ॥ ६२ ॥ बिना हस्ताक्षर आदि का अपरिचित लेख भी विश्वसनीय नहीं होता । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

१५४ नीतिवाक्यामृतम् त्रीणि पातकानि सद्यः फलन्ति, स्वामिद्रोहः, स्त्रीवधो बालवध- श्चेति ॥ ६३ ॥ अपने स्वामी से द्रोह, स्त्री और बालक का वध ये तीन पाप तत्काल अनिष्ट फलदायक होते हैं । अप्लवस्य समुद्रावगाहनमिवाबलस्य बलवता सह विग्रहाय टिरिटि- ल्लितम् ॥ ६४ ॥ बिना नाव के समुद्र में प्रवेश के समान निर्बल का बलवान् के साथ वैर विनाशकारी होता है । बलवन्तमाश्रित्य विकृति-भजनं सद्यो मरणकारणम् ॥ ६५ ॥ बलवान् के आश्रय में रहकर उससे बिगाड़ करना तत्काल मरण का कारण होता है । प्रवासः चक्रवर्त्तिनमपि सन्तापयति किं पुनरन्यम् ॥ ६६ ॥ प्रवास चक्रवर्तियों को भी दुःख देता है तो स्वल्प साधन सम्पन्न दूसरों को क्यों न दुःखकर होगा । अर्थात् परदेश में सबको क्लेश होता है । बहुपाथेयं, मनोऽनुकूलः परिजनः, सुविहितश्चोपस्करः प्रवासे दुःखो- त्तरणतरण्डको वर्गः ॥ ६७ ॥ पाथेय ( रास्ते का कलेवा ) प्रचुर मात्रा में हो मन के अनुकूल सेवक हों, प्रवास की सब सामग्री सुव्यवस्थित रूप से हो इतनी वस्तुएँ प्रवास रूप समुद्र में दुःखों से उद्धार पाने के लिए जहाज के समान हैं । [ इति व्यवहार-समुद्देशः ] २८. विवाद-समुद्देशः गुणदोषयोस्तुलादण्डसमो राजा, स्वगुणदोषाभ्यां जन्तुषु गौरव- लाघवे ॥ १ ॥ विवाद में गुण और दोषों का निर्णय करने के लिये राजा तराजू की डांडी के समान निर्णायक है और प्रजा की गुरुता और लघुता—निर्दोष अथवा सदोष सिद्ध होना उसके अपने गुण दोषों पर निर्भर करता है । राजा त्वपराद्धालिङ्गितानां समवर्त्ती तत्फलमनुभावयति ॥ २ ॥ राजा पुत्र और सामान्य प्रजा में समदृष्टि होकर अपराधियों को उनके अपराधों के अनुकूल फल-दण्ड-का भोग कराता है—विधान बनाता है। आदित्यवद्यथावस्थितार्थप्रकाशनप्रतिभाः सभ्याः ॥ ३ ॥

विवादसमुद्देशः १५५ राजा की सभा के सभासद सूर्य के समान यथार्थ तत्त्व को प्रकाशित करने की प्रतिभा से सम्पन्न होते हैं । अदृष्टश्रुतव्यवहाराः परिपन्थिनः सामिषाः न सभ्याः ॥ ४ ॥ लोक व्यवहार (कानून) के अनुभव और अध्ययन से शून्य वादी प्रति- वादी अथवा राजा के शत्रु एवं सहज ईर्ष्या द्वेषयुक्त व्यक्ति राजा के न्यायालय के सदस्य होने योग्य नहीं होते । लोभपक्षपाताभ्यामयथार्थवादिनः सभ्याः सभापतिश्च सद्यो मानार्थ- हानिं लभेरन् ॥ ५ ॥ लोभ अथवा पक्षपातपूर्ण दृष्टि के कारण अयथार्थवादी—ठीक निर्णय न देनेवाले सभासदों और सभापति-न्यायाधीश अथवा राजा की तत्काल मान- हानि और अर्थहानि होती है । तत्रालं विवादेन यत्र स्वयमेव सभापतिः प्रत्यर्थी ॥ ६ ॥ जिस विवाद में स्वयं सभापति=न्यायाधीश ही विरोधी अथवा पक्षपात- पूर्ण हो जाय वह विवाद अथवा मुकदमा व्यर्थ है । क्योंकि न्यायाधीश के अनु- कूल सब सभासद बोलेंगे । सभ्यसभापत्योरसामञ्जस्येन कुतो जयः, किं बहुभिश्च्छगलः श्वा न क्रियते ॥ ७ ॥ सभासदों और सभापति में जब ऐकमत्य न होगा तब विजय की आशा करना व्यर्थ है । क्या बहुत से आदमी कह कर बकरे को कुत्ता नहीं बना देते । यहां हितोपदेश की उस कथा का सन्दर्भ है जिसमें एक ब्राह्मण जब बकरे को लादे हुए जा रहा था तब धूर्तों ने सलाह करके उस बकरे को अपने खाने के लिये छीनना चाहा । वे एक एक करके थोड़ी-थोड़ी दूरी पर खड़े हो गये और अपने पास आते ही उस ब्राह्मण से कहते हैं कि क्या ब्राह्मण होकर कुत्ते को ढोते फिरते हो ? इस प्रकार लगातार कई आदमियों के कहने पर ब्राह्मण को संशय हो गया और उसने बकरे को मार्ग में ही छोड़ दिया जिसे धूर्त लोग ले गये । मुकदमें में भी जब बहुसंख्यक सभासद किसी असत् पक्ष को भी सत् सिद्ध करने लगेंगे तो उन्हीं की जीत होगी । पराजित व्यक्ति के चिह्न— विवादमास्थाय यः सभायां नोपतिष्ठेत, समाहूतोऽपसरति, पूर्वोक्त- मुत्तरोक्तेन बाधते, निरुत्तरः पूर्वोक्तेषु युक्तेषु, युक्तमुक्तं न प्रतिपद्यते, स्वदोषमनुवृत्य परदोषमुपालभते, यथार्थवादेऽपि द्वेष्टि सभामिति परा- जितलिङ्गानि ॥ ७ ॥

१५६ नीतिवाक्यामृतम् विवाद-मुकदमा प्रारम्भ करके जो न्यायालय में उपस्थित न हों, पुकार होने पर चला जाय, उसका प्रथम वक्तव्य आगे के वक्तव्य से विरुद्ध पड़ता हो, पूर्वकथित युक्तियुक्त बात का उत्तर देने में असमर्थ हो और युक्तियुक्त को न माने, अपना दोष न मान कर दूसरे का दोष निकाले यथार्थ न्याय होने पर भी न्यायालय का अनौचित्य बतलावे यह सब पराजित के लक्षण हैं। छलेनाप्रतिभासेन ✻ वचनाकौशलेन चार्थहानिः ॥ ८ ॥ विवाद में यदि सभासद छलकपट करें, अथवा अभियोग के विषय में ठीक परामर्श और अनुसन्धान न करें बोलने में निपुण न हों तो वादी प्रति- वादी की व्यर्थ हानि होती है । भुक्तिः, साक्षी, शासनं प्रमाणम् ॥ ६ ॥ विवाद में तीन चीज प्रमाण मानी जाती है भुक्ति अर्थात् जमीन जायदाद पर बारह वर्ष तक का कब्जा, गवाह, और न्यायालयीय लेख दस्ता- वेज आदि । भुक्तिः सापवादा, साक्रोशाः साक्षिणः शासनं च कूटलिखितमिति न विवादं समापयन्ति ॥ १० ॥ अधिकार अथवा कब्जा बलात् किया गया हो, गवाह सदोष हों, और (दस्तावेज) अधिकार पत्र साफ लिखा पढ़ा न हो तो विवाद का मुकदमे का अन्त नहीं हो पाता । बलात्कृतमन्यायकृतं राजोपधिकृतं च न प्रमाणम् ॥ ११ ॥ जो बात बलात् कराई गई हो, अन्याय से हुई हो अथवा राज-बल से हुई हो वह प्रमाणभूत नहीं होती । वेश्याकितवयोरुक्तं ग्रहणानुसारितया प्रमाणयितव्यम् ॥ १२ ॥ वेश्या और जुआड़ी का वचन जितना ग्राह्य हो उतना प्रमाणित मानना चाहिये । असत्यंकारे व्यवहारे नास्ति विवादः ॥ १४ ॥ सर्वथा झूठे व्यवहार में विवाद नहीं होता । अर्थात् जब वादीप्रतिवादी दोनों ही झूठे होंगे तो अभियोग क्या चलेगा ? । नीवीविनाशेषु विवादः पुरुषप्रामाण्यात् सत्यापयितव्यो दिव्य- क्रिया वा ॥ १४ ॥ धरोहर के रूप में रखे गये मूलद्रव्य (पूंजी) के विवाद में जिसके यहां वह वस्तु रखी गई अथवा जिसने रखी उस पुरुष की विख्यात प्रामा- ✻ प्रतिभास के अनुसन्धान और परामर्श अर्थ के लिये देखिए काव्य प्रकाश दशम उल्लास प्रारम्भ—वाच्यवैचित्र्यप्रतिभासादेव पर वामन टीका ॥

विवादसमुद्देशः १५७ णिकता अप्रामाणिकता के आधार पर सत्य का निर्णय करना चाहिए अथवा शपथ ग्रहण अथवा दण्ड के द्वारा सत्य का निर्णय करना चाहिए। यादृशे तादृशे वा साक्षिणि नास्ति दैवी क्रिया किं पुनरुभयसम्मते मनुष्ये नीचेऽपि ॥ १५ ॥ जब कि जैसे-तैसे अर्थात् साधारण अथवा निकृष्ट चरित्र के गवाह से शपथ नहीं कराई जाती तब वादी और प्रतिवादी दोनों से सम्मत नीच गवाह से शपथ कैसे कराई जायगी। यः परद्रव्यमभियुञ्जीताभिलुम्पते वा तस्य शपथः क्रोशो दिव्यं वा ॥ १६ ॥ जो कोई दूसरे का द्रव्य अपहरण कर ले अथवा नष्ट करदे तो उस विवाद में शपथ, कुड़की अथवा दण्ड का भय दिखाकर निर्णय करना चाहिए। अभिचारयोगैर्विशुद्धस्याभियुक्तार्थसंभावनायां प्राणावशेषोऽर्थाप- हारः ॥ १७ ॥ शपथ आदि प्रयोगों के द्वारा अपने को निर्दोष सिद्ध करनेवाले व्यक्ति का अपराध यदि पुनः सिद्ध हो तो उसके प्राणों को छोड़कर उसका शेष समस्त धन राजा को ग्रहण कर लेना चाहिए। लिङ्गिनास्तिकस्वाचाराच्च्युतपतितानां दैवी क्रिया नास्ति ॥ १८ ॥ संन्यासी, वैरागी आदि चिह्नधारी, नास्तिक और अपने आचार से भ्रष्ट तथा पतित पुरुषों के वाद-विवाद के निर्णय में शपथ क्रिया का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि ये झूठी शपथ भी ले लेते हैं। तेषां युक्तितोऽर्थसिद्धिरसिद्धिर्वा ॥ १९ ॥ उनके विवाद का निर्णय युक्तियों द्वारा करके उनको दोषी अथवा निर्दोष ठहरावे। सन्दिग्धे पत्रे साक्ष्ये वा विचार्य परिच्छिन्द्यात् ॥ २० ॥ दस्तावेज आदि शासकीय अभिलेख अथवा गवाह जब सन्दिग्ध हों तब बहुत विचारपूर्वक निर्णय करना चाहिए। परस्परविवादे न युगैरपि विवादसमाप्तिरानन्त्याद् विपरीतप्रत्युक्ती- नाम् ॥ २१ ॥ वादी प्रतिवादी यदि स्वयं ही तर्क-वितर्क (बहस) करने लगे तो प्रश्नों और उत्तरों तथा युक्तियों की अनन्तता के कारण युगों तक अभियोग का निर्णय नहीं हो सकता अतः धर्माधिकारी अथवा वकीलों के माध्यम से विवाद का निर्णय करना चाहिए।

१५८ नीतिवाक्यामृतम् ग्रामे पुरे वा वृत्तो व्यवहारस्तस्य विवादे तथा राजानमुपेयात् ॥२२॥ ग्राम अथवा तहसील में झगड़ा निपट जाने पर भी यदि पुनः विवाद उपस्थित हो जाय तो ऐसे विवाद में राजा के पास आना चाहिए। राज्ञा दृष्टे व्यवहारे नास्त्यनुबन्धः ॥ २३ ॥ राजा के द्वारा अभियोग का निर्णय हो जाने पर अपील नहीं होती। अनुबन्ध का अर्थ दोष किया गया है जिसके अनुसार अर्थ होगा राजाके निर्णय में दोष नहीं होता। राजाज्ञां मर्यादाम् वाऽतिक्रामन् सद्यः फलेन दण्डेनोपहन्तव्यः ॥२४॥ राजा की आज्ञा अथवा न्याय की मर्यादा का उल्लङ्घन करने वालेको तात्कालिक दण्ड से दण्डित करना चाहिए। न हि दण्डादन्योऽस्ति विनयोपायोऽग्निसंयोग एव वक्रं काष्ठं सर- लयति ॥ २५ ॥ प्रजा को अनुशासन में लाने के लिये दण्ड के अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है। टेढ़ा काष्ठ अग्नि के संयोग से ही सीधा होता है। ऋजुं सर्वेऽपि परिभवन्ति नहि तथा वक्रः संछिद्यते यथा सरलः ॥ २६ ॥ सीधे को सब दबा लेते हैं। वन में खड़ा टेढ़ा पेड़ वैसा नहीं काटा जाता जैसा कि सीधा। स्वोपालम्भपरिहारेण परमुपालभेत स्वामिनमुत्कर्षयन् गोष्ठीमव- तारयेत् ॥ २७ ॥ राजा की ओर से नियुक्त धर्माधिकारी सरकारी वकील को राजकीय पक्ष को प्रबल सिद्ध करते हुए राज्य के ऊपर लगाया गया आरोप दूर कर दूसरे को दोषी ठहराते हुए समझौता करा देना चाहिए। न हि भर्तुरभियोगात् परं सत्यमसत्यं वा वदन्तम् अवगृह्णीयात् ॥ २८ ॥ स्वामी का पक्षपात करके सत्य अथवा असत्य कहनेवाले के अनुसार किसी को दोषी नहीं सिद्ध करना चाहिए। अर्थात् राजनियुक्त पुरुष को विवाद में पक्षपात नहीं करना चाहिए। अर्थसम्बन्धः सहवासश्च नाकलहः संभवति ॥ २८ ॥ एक ही साथ रहकर पैसे का लेन देन बिना झगड़ा के नहीं चल सकता। अर्थात् ऐसी स्थिति में कलह, अवश्य होगा। अतः दो पृथक् व्यक्ति यदि एक साथ शान्ति से रहना चाहें तो आपस में पैसे का लेन-देन नहीं करना चाहिए।

विवादसमुद्देशः १५६ निधिराकस्मिको वाऽर्थलाभः प्राणैः सह सञ्चितमप्यर्थमपहार- यति ॥ २९ ॥ पूर्वजों से संचित अथवा प्राप्त निधि अथवा अकस्मात् मिला हुआ धन प्राणों के साथ सञ्चित अर्थ को भी नष्ट कर देता है। ब्राह्मणानां हिरण्ययज्ञोपवीतस्पर्शनं च शपथः ॥ ३० ॥ ब्राह्मण की शपथ सुवर्ण अथवा यज्ञोपवीत के स्पर्श से होती है। शस्त्ररत्नभूमिवाहनपल्याणानां तु क्षत्रियाणाम् ॥ ३१ ॥ शस्त्र, रत्न मोती, हीरा आदि, पृथ्वी, सवारी घोड़ा, हाथी आदि और सवारी की जीन का स्पर्श कराकर क्षत्रियों से शपथ कराई जाती है। श्रवणपोतस्पर्शनात् काकिणीहिरण्ययोर्वा वैश्यानाम् ॥ ३२ ॥ कान, छोटा बच्चा, तीस कौड़ियां अथवा सुवर्ण के स्पर्श से वैश्यों की शपथ होती है। शूद्राणां क्षीरबीजयोर्वल्मीकस्य वा ॥ ३३ ॥ शूद्रों की शपथ, क्रिया, दूध, अन्न और वांबी के स्पर्श से होती है। कारूणां यो येन कर्मणा जीवति तस्य तत्कर्मोपकरणानाम् ॥३४॥ जो जिस शिल्प से जीवन निर्वाह करता हो उसके साधनभूत औजारों को स्पर्श करके शिल्पी की शपथक्रिया होती है। व्रतिनामन्येषां चेष्टदेवतापादस्पर्शनात् प्रदक्षिणा, दिव्यकोशात्तन्दुल- तुलारोहणैर्विशुद्धिः ॥ ३५ ॥ व्रती, तपस्वी तथा अन्य पुरुषों की शपथक्रिया उनके इष्ट देवता के पाद- स्पर्श से, उनकी प्रदक्षिणा से, देव-निधि के स्पर्श से चावलों के स्पर्श से और तुला पर आरोहण-पैर रखने से होती है। व्याधानां तु धनुर्लङ्घनम् ॥ ३६ ॥ बहेलियों की शपथ धनुष के लांघने से होती है। अन्त्यवर्णावसायिनामार्द्रचर्मारोहणम् ॥ ३७ ॥ शूद्र, चाण्डाल आदि की शपथक्रिया गीले चमड़े पर पैर रखकर खड़े होने से होती है। वेश्या महिला, भृत्यो भण्डः, क्रीणिनियोगो, नियोगिमित्रं चत्वार्य- शाश्वतानि ॥ ३८ ॥ वेश्या का किसी की पत्नी बनना, धूर्त सेवक का होना, चुङ्गी, टैक्स आदि की आय और अधिकारी की मैत्री ये चार अस्थिर वस्तुएं हैं।

१६० नीतिवाक्यामृतम् क्रीतेष्वाहारेष्विव परस्त्रीषु क आस्वादः ॥ ३९ ॥ खरीदे हुए भोजन के समान बाजारू स्त्री अर्थात् वेश्या में क्या स्वाद मिल सकता है ? यस्य यावानेव परिग्रहस्तस्य तावानेव सन्तापः ॥ ४० ॥ जिसका जितना बड़ा परिवार है उसको उतना ही दुःख है । गजे गर्दभे च राजरजकयोः सम एव चिन्ताभारः ॥ ४१ ॥ राजा और धोबी को हाथी और गदहे की चिन्ता समान रूप से होती है । मूर्खस्याग्रहो नापायमनवाप्य निवर्त्तते ॥ ४२ ॥ मूर्ख पुरुष का आग्रह ( मिथ्या हठ ) बिना उसके नाश के नहीं दूर होता । कार्पासाग्नेरिव मूर्खस्य शान्तावुपेक्षणमौषधम् ॥ ४३ ॥ कपास में लगी आग जिस प्रकार शान्त नहीं की जा सकती उसी प्रकार मूर्ख का दुराग्रह नहीं दूर किया जा सकता । अतः उसकी उपेक्षा करना ही उसकी ओषध है । मूर्खस्याभ्युपपत्तिकरणमुद्दीपनपिण्डः ॥ ४४ ॥ मूर्ख को समझाना उसे और उकसाना है । कोपाग्निप्रज्वलितेषु मूर्खेषु तत्क्षणप्रशमनं घृताहुतिनिक्षेप इव ॥ ४५ ॥ क्रोध की आग में जलते हुए मूर्ख को तत्काल शान्त करने की चेष्टा आग में घी की आहुति देने के समान है । अनस्तिकोऽनड्वानिव ध्रियमाणो मूर्खः परमाकर्षति ॥ ४६ ॥ जिस तरह बिना नकेल के बैल को पकड़ने में वह पकड़ने वाले को ही घसीट ले जाता है उसी प्रकार कुपित मूर्ख को समझाना भी आपत्ति में पड़ना है । स्वयमगुणं वस्तु न खलु पक्षपाताद् गुणवद्भवति न गोपालस्नेहा- दुक्षा क्षरति क्षीरम् ॥ ४७ ॥ निर्गुण वस्तु किसी के पक्षपात से गुणवान् नहीं बन जाती । ग्वाले के स्नेह से बैल नहीं दूध देने लगता । [ इति विवादसमुद्देशः ]

षाड्गुण्यसमुद्देशः १६१ २९. षाड्गुण्यसमुद्देशः शमव्यायामौ योगक्षेमयोर्योनिः ॥ १ ॥ शम और व्यायाम योग क्षेम के कारण हैं। कर्मफलोपभोगानां क्षेमसाधनः शमः, कर्मणां योगाराधनो व्यायामः ॥ २ ॥ अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त फल को भोगने में सहायक कल्याणकारी साधनों का नाम शम है, और नवीन कर्म करने के उद्योग का नाम व्यायाम है। दैवं धर्माधर्मौ ॥ ३ ॥ अपना ही पूर्व जन्म का किया हुआ धर्म अथवा अधर्म, सुकृत अथवा दुष्कृत 'दैव' है। मानुषं नयानयौ ॥ ४ ॥ अपना ही नीतिपूर्ण अथवा अनीतिपूर्ण व्यवहार मानुष कर्म है। दैवं मानुषं च कर्म लोकं यापयति ॥ ५ ॥ दैव और मानुष दोनों कर्मों के योग से मनुष्य का दैनिक जीवन निर्वाह होता है। तच्चिन्त्यमचिन्त्यं वा दैवम् ॥ ६ ॥ मनुष्य चाहे तो दैव कर्म की चिन्ता करे चाहे न करे क्योंकि वह तो होकर ही रहेगा। अतः उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। अचिन्तितोपस्थितोऽर्थसम्बन्धो दैवायत्तः ॥ ७ ॥ बिना सोच विचार के प्राप्त विषयों से सम्बन्ध होना दैवाधीन है। बुद्धिपूर्वं हिताहितप्राप्तिपरिहारसम्बन्धो मानुषायतः ॥ ८ ॥ ज्ञानपूर्वक हितकर कार्य करना और अहितकर से बचना मनुष्य के अधीन है। सत्यपि दैवेऽनुकूले न निष्कर्मणो भद्रमस्ति ॥ ९ ॥ दैव के अनुकूल होने पर भी बिना कर्म किये मनुष्य का कल्याण नहीं हो सकता। न खलु दैवमीहमानस्य कृतमप्यन्नं मुखे स्वयं प्रविशति ॥ १० ॥ दैव वादी के समक्ष उपस्थित भोजन स्वयं ही उसके मुखमें नहीं प्रविष्ट हो जाता। न हि दैवमवलम्बमानस्य धनुः स्वयमेव शरान् सन्धत्ते ॥ ११ ॥ दैववादी का धनुष अपने आप बाणों को नहीं चढ़ा लेता। ११ नी०