पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२३
महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२३
जाने पर भी जो पारमार्थिक तत्व शेष रह जाता है, जिसको
सच्चिदानन्दस्वरूप भी कहा जाता है, वही तो इस वाक्य के
'ब्रह्म' शब्द का अर्थ है । महावाक्य का संपिण्डित अर्थ तो यह
हुआ कि—ऐसा जो स्वयं प्रकाश तथा आत्मरूप ब्रह्म है वह
यही आत्मा है । इस आत्मा से भिन्न किसी को ब्रह्म समझना
भारी भूल है ।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं महावाक्यविवेकप्रकरणं समाम्
6. Chitradipa
ओम्
चित्रदीपप्रकरणम्
यथा चित्रपटे दृष्टमवस्थानां चतुष्टयम् ।
परमात्मनि विज्ञेयं तथावस्थाचतुष्टयम् ॥१॥
चित्रयुक्त पट में जैसे [आगे कही हुई] चार अवस्थायें
देखी जाती हैं, इसी प्रकार परमात्मा की भी [आगे कही] चार
अवस्थायें जाननी चाहियें ।
'अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपंचं प्रपञ्च्यते' क्योंकि आत्मतत्व
निष्प्रपंच है, इस कारण उसका सीधा निरूपण तो हो ही नहीं
सकता, परन्तु अध्यारोप तथा अपवाद नाम के दो ऐसे सहारे
अध्यात्मशास्त्र ने ढूँढ निकाले हैं कि उन से उसका वर्णन शक्य
हो गया है । इस न्याय के अनुसार जो जगत् परमात्मा में
आरोपित हो रहा है, उसकी स्थिति कैसी है, इस का स्पष्टी-
करण इस प्रकरण में किया गया है । इस निरूपण से यह
होगा कि इस आरोपित जगत् का निषेध करने में बड़ी सुकरता
हो जायगी ।
यथा धौतो घट्टितश्च लाञ्छितो रञ्जितः पटः ।
चिदन्तर्यामी सूत्रात्मा विराड् चात्मा तथेर्यते ॥२॥
चित्, दूसरी अन्तर्यामी, तीसरी सूत्रात्मा, चौथी विराट्, ये
(जैसे (१) धुला हुआ, (२) मांडी दिया हुआ, (३) चित्रों
की रेखा वाला, तथा (४) रंग भरा हुआ—ये चार अवस्थायें
छींट के कपड़े की होती हैं, इसी प्रकार परमात्मा में भी पहली
चित्, दूसरी अन्तर्यामी, तीसरी सूत्रात्मा, चौथी विराट्, ये
चार अवस्थायें होती हैं।)
स्वतः शुभ्रोऽत्र धौतः स्याद् घट्टितोऽन्नविलेपनात् ।
मष्याकारैर्लाञ्छितः स्याद् रञ्जितो वर्णपूरणात् ॥३॥
जो वस्त्र स्वतः [अर्थात् दूसरे द्रव्य से सम्बन्ध हुए बिना]
ही शुभ्र है उसको यहाँ ‘धौत’ कहा जाता है। अन्न [अर्थात्
मांडी] से पुतने पर उसको ‘घट्टित’ कहते हैं। स्याही से जिस
पर [खाली] आकार बना दिये गये हों वह ‘लाञ्छित’ कहाता
है। [यथायोग्य] रंग भर देने पर वही ‘रञ्जित’ कहाने लगता है।
स्वतश्चिदन्तर्यामी तु मायावी, सूक्ष्मसृष्टितः ।
सूत्रात्मा, स्थूलसृष्ट्यैव विराडित्युच्यते परः ॥४॥
वह परमात्मा जब स्वतः हो [जब उसमें माया और माया
के कार्यों का मिश्रण न हुआ हो] तब ‘चित्’ कहाता है।
माया का योग हो जाने पर वही परात्मा ‘अन्तर्यामी’ हो जाता
है। जब उसका सूक्ष्म सृष्टि से योग हो जाता है [किंवा जब उसे
अपंचीकृत भूतों से बना हुआ समष्टि सूक्ष्म शरीर मिल जाता
है] तब वही ‘सूत्रात्मा’ कहा जाता है। स्थूल सृष्टि [किंवा
पंचीकृत भूतों के बने हुए समष्टि स्थूल शरीर] के कारण वही
परमात्मा अन्त में ‘विराट्’ कहाने लगता है।
ब्रह्माद्याः स्तम्बपर्यन्ताः प्राणिनोऽत्र जडा अपि ।
उत्तमाधमभावेन वर्तन्ते पटचित्रवत् ॥५॥
१२६ पञ्चदशी
ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त चेतन प्राणी तथा गिरि, नदी.
आदि जड जगत्, जो कि इस परमात्मा में ऊँच नीच भाव से
रह रहा है, ठीक ऐसा ही है जैसे कि कपड़े के चित्र हों और
वे आपस में एक दूसरे से उत्तम वा अधम हों। [कपड़े के चित्रों
का उच्च नीच भाव जैसे परिणाम में निकम्मा है इसी प्रकार
प्राणियों का उच्च नीच भाव भी वेमतलव है। उच्च नीच कोई
नहीं है, ये सब जीव अनन्त को पाने में लगे हुए हैं, जिसने उसे
जितना पा लिया है वह उतना उच्च है। न पानेवाला नीच है ।
उच्च नीच उसको पाने या न पाने की ही अवस्थायें हैं। विद्या-
लय और महाविद्यालय में पढ़ने वाले छोटे बड़े छात्रों में जैसे
उच्च नीच भाव नहीं गिना जाता है । यही अवस्था इस संसार
रूपी महाविद्यालय के विद्यार्थी सब प्राणियों की है ।]
चित्रार्पितमनुष्याणां वस्त्राभासाः पृथक् पृथक् ।
चित्राधारेण वस्त्रेण सदृशा इव कल्पिताः ॥६॥
पृथक् पृथक् चिदाभासाश्चैतन्याध्यस्तदेहिनाम् ।
कल्प्यन्ते जीवनामानो बहुधा संसरन्त्यमी ॥७॥
[ यों तो चित्र में पर्वत, वृक्ष, मनुष्य आदि सभी होते हैं
परन्तु ] चित्र में जो मनुष्यशरीर होते हैं उस चित्र में केवल
उनके ही पृथक् पृथक् रंग विरंगे कपड़े, उस चित्र के आधार-
वस्त्र के समान दीखनेवाले बनाये जाते हैं [ उस चित्र में पर्व-
तादि के कपड़े नहीं बनाये जाते । चित्र के वे कपड़े भी कपड़े
नहीं होते । वे तो बनावटी कपड़े होते हैं। उन कपड़ों से किसी
के शीत आदि का निवारण नहीं होता ]। ठीक इसी प्रकार
चित्रदीपप्रकरणम् १२७
चित्रदीपप्रकरणम् १२७
. पर्वतादि का चिदाभास नहीं होता है किन्तु] जो देवादि देहधारी
चैतन्य में अध्यस्त हैं, उन्हीं के पृथक्-पृथक् जीवनामक चिदाभास
कल्पित कर लिये जाते हैं । [ उनके चिदाभास की कल्पना का
कारण तो यह है कि देव, तिर्यङ्, मनुष्यादि के शरीर को पाकर]
ये जीव ही तो अनेक प्रकार से संसार में चक्कर लगाया करते
हैं [ निर्विकार रहने के कारण वह परमात्मा संसार में नहीं
फंसता ] ।
वस्त्राभासस्थितान् वर्णान् यद्वदाधारवस्त्रगान् ।
वदन्त्यज्ञास्तथा जीवसंसारं चिद्गतं विदुः ॥८॥
उन बनावटी कपड़ों में जो रंग भरे हैं उनको भी जैसे
अज्ञ लोग आधार वस्त्र के ही रंग कहने लगते हैं, ठीक इसी
प्रकार सम्पूर्ण वादी लोग तथा सब लौकिक लोग मिलकर,
अपने अज्ञान से वृथा ही कहने लगे हैं कि चेतन आत्मा ही
संसार में फंस गया है [विचार कर देखने से तो यह संसार जीव
का ही है । आत्मा नाम का तत्व कभी संसार में नहीं फंसता ।]
चित्रस्थपर्वतादीनां वस्त्राभासो न लिख्यते ।
सृष्टिस्थमृत्तिकादीनां चिदाभासस्तथा न हि ॥९॥
चित्र में जो पर्वतादि होते हैं उनका जैसे चित्र में वस्त्रा-
भास नहीं खींचा जाता, इसी प्रकार सृष्टि में जो मिट्टी आदि हैं
उनमें भी चिदाभास नहीं होता ।
संसारः परमार्थोऽयं संलग्नः स्वात्मवस्तुनि ।
इति भ्रान्तिरविद्या स्याद् विद्ययैषा निवर्तते ॥१०॥
[देहादि को ही आत्मा मानने वाले कहते हैं कि] यह संसार
परमार्थ है । अपने आत्मा में [आत्माराधन में] ही यह संसार
१२८ पञ्चदशी
लगा हुआ है । बस उनकी यह भ्रान्ति ही [ इस संसार का
मूल कारण ] अविद्या कहाती है । [ इस भ्रान्ति ने ही इस
संसारं को चला रक्खा है ] विद्या से ही यह अविद्या निवृत्त
हुआ करती है ।
आत्माभासस्य जीवस्य संसारो नात्मवस्तुनः ।
इति बोधो भवेद् विद्या लभ्यतेऽसौ विचारणात् ॥११॥
'यह संसार तो आत्माभास [चिदाभास] जीव का ही है ।
आत्मवस्तु का संसार नहीं है' ऐसा ज्ञान ही 'विद्या' कहाती
है । अध्यात्म विचार करते रहने से [कालान्तर में] यह विद्या
हाथ आजाती है । [सूखे अध्ययन से इसकी प्राप्ति
नहीं होती ।]
सदा विचारयेत् तस्माज्जगज्जीवपरात्मनः ।
जीवभावजगद्भाववाधे स्वात्मैव शिष्यते ॥१२॥
क्योंकि विचार से विद्या मिलती है, इसलिये सदा ही
जगत्, जीव और परात्मा का विचार करता रहे [ कि इनका
कैसा कैसा स्वरूप है इत्यादि। यहाँ पर प्रश्न होता है कि मोक्षा-
वस्था मिल जाने पर फलरूप में हाथ आने वाले परात्मा का
विचार तो ठीक है, परन्तु जगत् और जीव का विचार करके हम
क्या करें ? उसका उत्तर यह है कि-] जीव भाव और जग-
द्भाव की जब बाधा होजाती है, किंवा जब जीवभाव और जग-
द्भाव का अपवाद कर दिया जाता है उस समय केवल
अपना आत्मा ही शेष रह जाता है [ इसी से कहते हैं कि पर-
मात्मा के विचार के साथ जीव और जगत् का विचार भी
करना ही चाहिये ] ।
चित्रदीपप्रकरणम् १२९
चित्रदीपप्रकरणम् १२९
नाप्रतीति स्तयोर्बाधः किन्तु मिथ्यात्वनिश्चयः ।
नो चेत् सुपुप्तिमूर्च्छादौ मुच्येतायततो जनः ॥१३॥
जीव और जगत् की प्रतीति के बन्द हो जाने को हम
उनका 'बाध' नहीं कहते हैं। किन्तु उन दोनों के मिथ्याभाव
का निश्चय कर लेना ही हमारे मत में 'बाध' कहाता है। यदि
तो प्रतीति न होने को ही बाध कहते हों तब तो सुपुप्ति या
मूर्च्छा आदि के समय [ जब कि स्वतः ही द्वैत की प्रतीति नहीं
होती ] तब बिना ही यत्न किये [ तत्त्वज्ञान का सम्पादन बिना
किये ही ] मनुष्य मुक्त हो जाया करें ।
परमात्मावशेषोऽपि तत्सत्यत्वविनिश्चयः ।
न जगद्विस्मृतिर्नो चेज्जीवन्मुक्तिर्न संभवेत् ॥१४॥
पिछले बारहवें श्लोक में जो कि 'स्वात्मैव शिष्यते' कहा गया
है उस स्वात्ममात्र शेष रहजाने का मतलब भी केवल उसी को
सत्य समझ लेने से ही है। 'परमात्मा से भिन्न सब जगत् को
भूल जाना उसका मतलब कदापि नहीं है। यदि स्वात्ममात्र
शेष रह जाने का अभिप्राय जगद्विस्मरण से हो तब तो जीवन्-
मुक्ति कोई चीज ही न रहे । [ जीवन्मुक्ति का मतलब यही
है कि—संसार की खटपट में भी बुद्धि स्थिर रह सके । गम्भीर
से गम्भीर और उत्तेजक से उत्तेजक अवस्था में भी परमात्म-
तत्व को याद रखते हुए उस पर मजबूत दृष्टि जमाये हुए
संसार की यात्रा की जाय ]
परोक्षा चापरोक्षेति विद्या द्वेधा विचारजा ।
तत्रापरोक्षविद्यासौ विचारोऽयं समाप्यते ॥१५॥
१३० पञ्चदशी
उसकी अवधि इस श्लोक में बतायी गयी है ]—विचार से
उत्पन्न होने वाली विद्या दो प्रकार की है—एक 'परोक्ष' दूसरी
'अपरोक्ष'। जब अपरोक्ष विद्या की प्राप्ति किसी को हो जाती
है, तभी विचार की यह खटपट बन्द हो जाती है।
अस्ति ब्रह्मेति चेद् वेद परोक्षज्ञानमेव तत् ।
अहं ब्रह्मेति चेद् वेद साक्षात्कारः स उच्यते ॥१६॥
यदि कोई [किसी के समझाने से] यह समझ जाय कि
'ब्रह्म तत्व है' बस इसी को 'परोक्ष ज्ञान' समझा जाता है।
जब तो किसी को यह दृढ विश्वास हो जाय कि 'मैं ही ब्रह्म हूँ'
इसी को 'साक्षात्कार' कहते हैं।
तत्साक्षात्कारसिद्धयर्थ मात्मतत्वं विविच्यते ।
येनायं सर्वसंसारात् सद्य एव विमुच्यते ॥१७॥
जिस साक्षात्कार के प्रभाव से यह मनुष्य सब संसार से
तुरन्त ही [साक्षात्कार होते ही] मुक्त हो जाता है,उसी साक्षा-
त्कार को सिद्ध करने के लिये अब हम आत्मतत्त्व का विवेचन
करते हैं।
कूटस्थो, ब्रह्म, जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।
घटाकाशमहाकाशौ जलाकाशाभ्रखे यथा ॥१८॥
जैसे एक ही आकाश घटाकाश, महाकाश, जलाकाश,
तथा मेघाकाश चार प्रकार का होता है, इसी प्रकार एक ही
चेतन कूटस्थ, ब्रह्म, जीव तथा ईश भेद से चार प्रकार का है।
घटावच्छिन्नखे नीरं यत्तत्र प्रतिबिम्बितः ।
साभ्रनक्षत्र आकाशो जलाकाश उदीर्यते ॥१९॥
चित्रदीपप्रकरणम् १३१
चित्रदीपप्रकरणम् १३१
निरूपण करना छोड़कर जलाकाश का निरूपण इस श्लोक में किया
जाता है ] घट के अन्दर के आकाश में जो जल भरा है, उस
जल में जो मेघ और नक्षत्र सहित आकाश प्रतिबिम्बित हो
रहा है, उसी को यहाँ 'जलाकाश' कहा जाता है ।
महाकाशस्य मध्ये यन्मेघमण्डलमीक्ष्यते ।
प्रतिबिम्बतया तत्र मेघाकाशो जले स्थितः ॥२०॥
इस महाकाश में जो मेघमण्डल दीखता है [ उस मेघ-
मण्डल में जो जल रहता है ] उस जल में प्रतिबिम्बित जो
आकाश है वही 'मेघाकाश' कहाता है ।
मेघांशरूपमुदकं तुषाराकारसंस्थितम् ।
तत्र खप्रतिबिम्बोऽयं नीरत्वादुन्मीयते ॥२१॥
मेघ का अंश रूपी जो जल होता है वह तुपार के [ बहुत
छोटे से ] आकार में रहता है । जल होने के कारण यह अनु-
मान कर लिया जाता है कि उसमें भी आकाश का प्रतिबिम्ब
होगा ही ।
अधिष्ठानतया देहद्वयावच्छिन्नचेतनः ।
कूटवन्निर्विकारेण स्थितः कूटस्थ उच्यते ॥२२॥
[ स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही प्रकार के देह अविद्याकल्पित
हैं, उन ] दोनों देहों का अधिष्ठान होने से जो चेतन दोनों देहों
से अवच्छिन्न (घिरा.हुआ) हो रहा है, उसी चेतन को 'कूटस्थ'
कहते हैं। क्योंकि वह लुहारे के कूट [ ऐरन= जिस लोहे पर
रखकर दूसरे लोहे ठोके पीटे जाते हैं, परन्तु जो स्वयं सदा
एक सा बना रहता है ] के समान निर्विकार रहता है इससे
उसे 'कूटस्थ' कहा जाता है ।
१३२ पञ्चदशी
कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्प्रतिबिम्बकः ।
प्राणानां धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते ॥२३॥
बुद्धि उस कूटस्थ में कल्पित है । उस बुद्धि में चेतन का
जो प्रतिबिम्ब है, वह जब प्राणों को धारण कर लेता है तब
उसको 'जीव' कहने लगते हैं । यह जीव ही संसार में फँसा
करता है । [ कूटस्थ आत्मा संसार से युक्त कभी नहीं होता ]
जलव्योम्ना घटाकाशो यथा सर्वस्तिरोहितः ।
तथा जीवेन कूटस्थः सोऽन्योऽन्याध्यास उच्यते ॥२४॥
जैसे जलाकाश सम्पूर्ण घटाकाश को ढक देता है [उसे
दीखने नहीं देता ] इसी प्रकार इस जीव ने कूटस्थ आत्मा को
तिरोहित कर डाला है [ उसे प्रकट नहीं रहने दिया है ] इसी
तिरोधान को [ भाष्यादि में ] 'अन्योन्याध्यास' कहा गया है ।
अयं जीवो न कूटस्थं विविनक्ति कदाचन ।
अनादिरविवेकोऽयं मूलाविद्येति गम्यताम् ॥२५॥
यह जीव कभी भी उस कूटस्थ तत्व को पृथक् नहीं पहचा-
नता है । अनादि काल से चली आने वाली उसकी यह जीव
और कूटस्थ की भेदा प्रतीति ही 'मूलाविद्या' कहाती है [इस
अविद्या से ही अन्योन्याध्यास की उत्पत्ति हुआ करती है ]
विक्षेपावृतिरूपाभ्यां द्विधाऽविद्या व्यवस्थिता ।
न भाति नास्ति कूटस्थ इत्यापादनमावृतिः ॥२६॥
'विक्षेप' और 'आवृति' इन दो भेदों से अविद्या दो प्रकार
की होती है । 'कूटस्थ नाम की चीज़ न तो प्रतीत ही होती
है और न वह है ही' ऐसा मिथ्या व्यवहार करानेवाला 'आव-
रण' कहाता है ।
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अज्ञानी विदुषा पृष्टः कूटस्थं न प्रबुध्यते ।
न भाति नास्ति कूटस्थ इति बुद्ध्वा वदत्यपि ॥२७॥
अज्ञानी से जब विद्वान् पूछता है तो वह कूटस्थ को नहीं
जानता [यही उसका अविद्या का अनुभव हुआ] मुझे कूटस्थ
न तो प्रतीत ही होता है और न वह है ही, यों आवरण को
अनुभव करके उसका वर्णन भी वह करता ही है।
अविद्या तथा उसके आवरण का प्रमाण जानना हो तो
लोकानुभव को ही प्रमाण मानना चाहिये यही बात इस श्लोक
में कही है—जब कोई विद्वान् किसी अज्ञानी से यह पूछता है
कि 'क्या तू कूटस्थ को जानता है?' वह अज्ञानी उस कूटस्थ
को नहीं जानता—अर्थात् उसे कूटस्थ का अज्ञान रहता है। इस
अज्ञान किंवा अविद्या को अनुभव करके ही वह चुप नहीं हो
जाता। वह यह भी कह देता है कि—तुम्हारा बूझा हुआ वह
कूटस्थ न तो मुझे प्रतीत ही होता है और न वह है ही। यों इस
रूप में उस आवरण का भी अनुभव होता है। यों अविद्या और
आवरण दोनों में अनुभव को ही प्रमाण मानना चाहिये।
स्वप्रकाशे कुतोऽविद्या तां विना कथमावृतिः ।
इत्यादितर्कजालानि स्वानुभूतिर्ग्रसत्यसौ ॥२८॥
स्वप्रकाश पदार्थ में अविद्या कहाँ से आयी ? तथा अविद्या
के बिना आवरण कैसे हुआ ? इत्यादि तर्कों को तो स्वानुभव
ही ग्रस लेता है।
आप आत्मा को स्वयंप्रकाश मानते हो। इसी से उसमें
अविद्या का होना ठीक नहीं है। प्रकाश और अन्धकार के
समान विरुद्ध स्वभाव वाले होने से इन दोनों का परस्पर
१३४ पञ्चदशी
सम्बन्ध ही नहीं बनता । उस आत्मा में जब अविद्या नहीं रह
सकती तब अविद्या का किया हुआ आवरण भी कैसा ? जब
आवरण ही नहीं रहा तो विक्षेप भी कहाँ ठहरेगा ? जब विक्षेप
न रहेगा तब ज्ञान से नष्ट करने योग्य अनर्थ भी नहीं रहेंगे ।
यों ज्ञान भी व्यर्थ हो जायगा तथा ज्ञान को बनानेवाले शास्त्र
भी प्रमाण नहीं रहेंगे । इन सब शंकाओं का एकमात्र समाधान
स्वानुभव ही है । जब यह सब अनुभव में आ ही रहा है तो
इसे अनुपपन्न कैसे कह बैठें । अनुभव से बड़ा तो कोई प्रमाण
है ही नहीं । अन्तिम निर्णय तो अनुभव ही करता है ।
स्वानुभूतावविश्वासे तर्कस्याप्यनवस्थितेः ।
कथं वा तार्किकंमन्य स्तत्वनिश्चयमाप्नुयात् ॥२९॥
यदि तो [ तर्क के मुक़ाबले में ] अपने अनुभव पर विश्वास
नहीं किया जायगा तो तर्क भी तो अनवस्थित है । फिर तार्किक-
म्मन्य को तत्व का निश्चय कैसे हुआ करेगा ?
जो जितना बड़ा तार्किक होता है उसका तर्क उतना ही
प्रबल होता जाता है । ऐसी अवस्था में केवल अपना अनुभव
ही एक ऐसी वस्तु है जिससे किसी बात का निर्णय किया जा
सकता है । जब उस अनुभव पर ही तार्किक विश्वास न करेगा
तो उसे तत्व का निश्चय कैसे होगा ?
बुद्ध्यारोहाय तर्कश्चेदपेक्षेत तथा सति ।
स्वानुभूत्यनुसारेण तर्क्यतां मा कुतर्क्यताम् ॥३०॥
बुद्धि में आने के लिये तर्क की अपेक्षा आवश्यक हो
तो अपने अनुभव के अनुसार ही तर्क करना चाहिये । कुतर्क
करना ठीक नहीं है ।
चित्रदीपप्रकरणम् १३५
चित्रदीपप्रकरणम् १३५
यद्यपि अनुभव से ही तत्व का निश्चय होता है । परन्तु
“अनुभव किया हुआ पदार्थ हो भी सकता है या नहीं” यह
संभावना जब करनी हो तब तो तर्क को मानना ही पड़ेगा ऐसा
यदि कहा जाय तो हम कहेंगे कि अनुभव के अनुसार ही तर्क
का वर्णन करना चाहिये । अनुभव के विरोधी तर्कों का करना
ठीक नहीं है ।
स्वानुभूति रविद्याया मावृतौ च प्रदर्शिता ।
अतः कूटस्थचैतन्य मविरोधीति तर्क्यताम् ॥३१॥
अविद्या तथा आवरण के विषय के अनुभव का प्रदर्शन
हमने इसी प्रकरण के 'अज्ञानी विदुषा पृष्टः' इस २७वें श्लोक में
किया है । इससे ऐसी तर्कणा करनी चाहिये कि वह कूटस्थ
चैतन्य आवृत्ति का तो विरोधी ही नहीं है । [जैसे सूरज अपना
आवरण करनेवाले मेघमण्डल का भी विरोधी नहीं है, इसी प्रकार
कूटस्थतत्व आवरण का भी विरोधी नहीं है किन्तु वह तो उस
आवरण को भी जतलाता रहता है ।]
तच्चेद्विरोधि, केनेयमावृतिर्ह्यनुभूयताम् ।
विवेकस्तु विरोध्यस्यास्तत्वज्ञानिनि दृश्यताम् ॥२॥
[वह तर्क ऐसा होना चाहिये ] यदि वह कूटस्थ चैतन्य इस
अविद्या नाम के आवरण का विरोधी है तो इस आवरण को कौन
अनुभव करता है उसे बताओ ? [कूटस्थ चैतन्य इसका विरोधी
नहीं है ] इस अविद्या का विरोधी तो विवेक ही है यह बात तत्व-
ज्ञानी पुरुष में स्पष्ट ही देख लो कि उसके विवेक ने अविद्या को
मार डाला है । [जो चैतन्य अविद्या के आवरण को सिद्ध किया
करता है, वही यदि उसका विरोधी भी हो, तब तो अविद्या की
प्रतीति ही नहीं होनी चाहिये । विवेक [अर्थात् उपनिषदों के
१३६ पञ्चदशी
प्रतीति ही नहीं होनी चाहिये । विवेक [अर्थात् उपनिषदों के
विचार से उत्पन्न हुआ ज्ञान] ही अविद्या का विरोधी होता है
यह बातें तत्वज्ञानी में देखी जा सकती हैं ।
अविद्यावृतकूटस्थे देहद्वययुता चितिः ।
शुक्तौ रूप्यवदध्यस्ता विक्षेपाध्यास एव हि ॥३३॥
[अब क्रमप्राप्त विक्षेपाध्यास को कहते हैं]—दोनों देहों से
युक्त जो चेतन है वह अविद्या से आवृत्त जो कूटस्थ है उसमें,
शुक्ति में रूप्य की तरह अध्यस्त हो जाता है, बस उसी को ‘विक्षे-
पाध्यास’ कहते हैं ।
इदमंशश्च सत्यत्वं शुक्तिगं रूप्य ईक्ष्यते ।
स्वयन्त्वं वस्तुता चैवं विक्षेपे वीक्ष्यतेऽन्यगम् ॥३४॥
जैसे सीप का इदं भाग तथा सत्यता [अबाधितता] दोनों ही
धर्म उस में आरोपित रजत में प्रतीत होने लगते हैं, इसी प्रकार
चिदाभास में भी दूसरे [कूटस्थ] की स्वयन्ता तथा वस्तुता दीख
पड़ रही हैं ।
शुक्ति की इदन्ता [अर्थात् पुरोदेशादि से सम्बन्धित्व]
तथा सत्यता [अर्थात् अबाधितत्व] जैसे आरोपित रजत में
भासा करता है इसी प्रकार कूटस्थ की स्वयन्ता तथा वस्तुता
भी आरोपित चिदाभास में भासने लगी हैं ।
नीलपृष्ठत्रिकोणत्वं यथाशुक्तौ तिरोहितम् ।
असङ्गानन्दताद्येवं कूटस्थेऽपि तिरोहितम् ॥३५॥
जैसे शुक्ति की नीली पीठ और त्रिकोणपना ढक गया है, इसी प्रकार
कूटस्थ की असङ्गता तथा आनन्दता आदि भी तिरोहित हो गयी
हैं। [यों दोनों ही अध्यासों में विक्षेपअंश की अप्रतीति हो रही है।]
चित्रदीपप्रकरणम् १३७
चित्रदीपप्रकरणम् १३७
आरोपितस्य दृष्टान्ते रूप्यं नाम यथा तथा।
कूटस्थाध्यस्तविक्षेपनामाहमिति निश्चयः ॥३६॥
शुक्तिरजत के दृष्टान्त में जैसे आरोपित पदार्थ का नाम
'रूप्य' होता है इसी प्रकार कूटस्थ में कल्पित जो विक्षेप
[चिदाभास] है उसका ही नाम 'अहम्' होता है।
इदमंशं स्वतः पश्यन् रूप्यमित्यभिमन्यते ।
तथा स्वं च स्वतः पश्यन्नहमित्यभिमन्यते ॥३७॥
'इदं' भाग को स्वतः [आंखों से] देखता हुआ भी जैसे
झूठ मूठ ही यह अभिमान कर लेता है कि यह तो 'रूप्य' है,
इसी प्रकार अपने आपको स्वतः देखकर भी वृथा ही 'मैं' ऐसा
अभिमान कर बैठता है। [जब हम अपने आप को देखते हों
तब हमको 'अहं' आदि कोई भी शब्द बोलने की आवश्यकता
नहीं होती है तो भी यह जीव 'मैं' कह ही बैठता है]
इदन्त्वरूप्यते भिन्ने स्वत्वाहन्ते तथेष्यताम् ।
सामान्यं च विशेषश्च ह्युभयत्रापि 'गम्यते ॥३८॥
इदन्ता तथा रूप्यता जैसे भिन्न भिन्न हैं, इसी प्रकार स्वत्व
और अहन्ता भी भिन्न भिन्न ही हैं। परन्तु इन दोनों [दृष्टान्त
तथा दार्ष्टान्तिक] में ही सामान्यविशेषभाव तो समानं ही है।
शंका यह है कि स्वयं और अहं शब्द एकार्थक हैं, फिर
दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में समता कैसे होगी ? इसका उत्तर यह
दिया गया कि—इदं और और रूप्य शब्दार्थों में तथा स्वयं
और अहं शब्दार्थों में सामान्य विशेष भाव तो समान ही है।
उसी समता को लेकर यह दृष्टान्त दिया गया है।
९
१३८ पञ्चदशी
देवदत्तः स्वयं गच्छेत् त्वं वीक्षस्व स्वयं तथा ।
अहं स्वयं न शक्नोमीत्येवं लोके प्रयुज्यते ॥३९॥
देवदत्त स्वयं जाता है तो जाय, तू स्वयं देखता है तो देख
पर मैं तो स्वयं ऐसा नहीं कर सकता हूँ, ऐसे प्रयोग लोक
होते हैं [इससे स्वयं शब्दार्थ सामान्यरूप होता है और अहं
[मैं] उसका विशेष है यह बात प्रकट होगयी] ।
इदं रूप्यमिदं वस्त्रमिति यद्वदिदं तथा ।
असौ त्वमहमित्येषु स्वयमित्यभिमन्यते ॥४०॥
'यह रूप्य है' 'यह वस्त्र है' इत्यादि उदाहरणों में जैसे इदं
शब्दार्थ सामान्य है, इसी प्रकार असौ [यह] त्वम् [तू]
अहम् [मैं] इन तीनों ही में [के साथ] स्वयं यह शब्द कहा
जाता है । [इससे स्वयं का अर्थ भी सामान्य ही समझना
चाहिये और अहं का अर्थ विशेष लेना चाहिये ] ।
अहन्त्वाद्भिद्यतां स्वत्वं कूटस्थे तेन किं तव ।
स्वयंशब्दार्थ एवैष कूटस्थ इति मे भवेत् ॥४१॥
प्रश्नकर्त्ता पूछता है कि—'स्वपन' 'अहं' से भिन्न है तो हुआ
करो, इससे कूटस्थ आत्मा के विषय में क्या सिद्ध करना
चाहते हो ? उत्तर यह है कि—'यह सामान्य रूप जो स्वयं
शब्दार्थ है वह ही तो कूटस्थ है' यह मेरी बात सिद्ध हो
जाती है ।
अन्यत्ववारकं स्वत्वमिति चेदन्यवारणम् ।
कूटस्थस्यात्मतां वक्तु रिष्टमेव हि तद्भवेत् ॥४२॥
स्वत्व तो अन्यत्व का वारण किया करता है, ऐसा यदि
चित्रदीपप्रकरणम् १३९
चित्रदीपप्रकरणम् १३९
कहा जाय तो कूटस्थ को आत्मा बतानेवाले मेरे मत में यह
अन्यत्व का वारण तो इष्ट ही होता है ।
शंका यह हैकि स्वत्वरूपी धर्म,अन्यता का वारण करता
है अर्थात् जो 'स्व' है वह अन्य नहीं हो सकता, परन्तु वह
कूटस्थता का बोध तो नहीं कराता । इसका समाधान यह है
कि स्वयं शब्द का अर्थ जो कूटस्थ तत्व है वही तो आत्मा है
इस कारण स्वत्व से यदि अन्य का वारण होता है तो यह इष्ट
ही है । [जो अनात्मा है उसका वारण कर देने से आत्मा तो
स्वयं ही शेष रह जाता है फिर उसके लिये कुछ भी करना नहीं
पड़ता । यों जब यह स्वयं शब्द अन्यों को हटा देता है तब
अर्थात् ही इससे कूटस्थ का बोध हो जाता है । ]
स्वयमात्मेति पर्यायौ, तेन लोके तयोः सह ।
प्रयोगो नास्त्यतः स्वत्वमात्मत्वं चान्यवारकम् ॥४३॥
स्वयम् और आत्मा इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही है ।
यही कारण है कि लोक में इन दोनों शब्दों का एक साथ
प्रयोग नहीं होता । निचोड़ तो यही है कि स्वत्व और आत्मत्व
दोनों ही अन्य के वारक हैं । यों स्वयं शब्द का अर्थ कूटस्थ
आत्मा ही है, क्योंकि ये दोनों पर्यायवाचक हैं ।
घटः स्वयं न जानातीत्येवं स्वत्वं घटादिषु ।
अचेतनेषु दृष्टं चेद् दृश्यतामात्मसत्त्वतः ॥४४॥
यदि कहो कि 'घट स्वयं नहीं जानता' इस वाक्य में
अचेतन घटादि पदार्थों में भी स्वत्व देखा जाता है फिर स्वत्व
और आत्मत्व भिन्न भिन्न क्यों नहीं है ? तो इसका समाधान
यह है कि—घटादि जड पदार्थों में भी स्फुरण रूप से आत्म
१५० पञ्चदशी
चैतन्य तो रहता ही है [ इस कारण उन जड पदार्थों को
भी स्वयं कह देने से कोई विरोध नहीं होता । यों भी स्वयन्ता
और आत्मता एक ही बात हो जाती है । ]
चेतनाचेतनभिदा कूटस्थात्मकृता न हि ।
किन्तु बुद्धिकृताभासकृतैवेत्यवगम्यताम् ॥४५॥
घट आदि जड पदार्थों में भी जब आत्मचैतन्य है तो
फिर चेतन और अचेतन का भेद क्यों है ? इसका उत्तर दिया
जाता है कि—चेतन और अचेतन का भेद बुद्धिकृत आभास
[चिदाभास] के कारण से ही है [ जहाँ चिदाभास होता है
उसे चेतन कहा जाता है । जहाँ चिदाभास नहीं होता उसे
अचेतन कहते हैं । यह चेतन और अचेतन का भेद तो चेतन
के आभास के पड़ने और न पड़ने से हो जाता है । यह भेद
कूटस्थ आत्मा का किया हुआ नहीं है ]
यथा चेतन आभासः कूटस्थे भ्रान्तिकल्पितः ।
अचेतनो घटादिश्च तथा तत्रैव कल्पितः ॥४६॥
जैसे चेतन आभास कूटस्थ में भ्रान्ति से कल्पित है,
ठीक इसी तरह अचेतन घटादि भी उसी कूटस्थ में भ्रान्ति
से कल्पित है ।
भाव यह है कि यह तो ठीक है कि चेतन और अचेतन के
विभाग का कारण कूटस्थ तत्व नहीं है, परन्तु अचेतन पदार्थों
की कल्पना का अधिष्ठान तो वह ठीक वैसे ही है जैसे कि यह
चिदाभास की कल्पना का अधिष्ठान है । इस कारण से अचे-
तनों में भी आत्मा की सत्ता को मानना पड़ता है ।
चित्रदीपप्रकरणम् १४१
चित्रदीपप्रकरणम् १४१
तत्तेदन्ते अपि स्वत्वमिव त्वमहमादिषु ।
सर्वत्रानुगते तेन तयोरप्यात्मतेति चेत् ॥४७॥
ते आत्मत्वेऽप्यनुगते तत्तदन्ते ततस्तयोः ।
आत्मत्वं नैव संभाव्यं सम्यक्त्वादेर्यथा तथा ॥४८॥
शंका होती है कि—यदि स्वपन और आत्मा एक ही पदार्थ
हैं तो यह बताओ कि—त्वम् [तू] अहम् [मैं] आदि में
सर्वत्र रहने वाले स्वपन को जैसे तुम आत्मा मानते हो इसी
प्रकार सर्वत्र अनुगत तत्ता और इदन्ता [वह और यहपने] को
भी तुम आत्मा क्यों नहीं मान लेते हो ?॥४७॥ इसका समा-
धान—वे तत्ता और इदन्ता तो आत्मत्व रूपी जाति में भी
रहते हैं। यों आत्मा में तथा आत्मा से अन्यत्र भी रहने के
कारण इन को ठीक इसी प्रकार आत्मरूप नहीं माना जा सकता
जैसे कि सम्यक्पन आदि को आत्मा नहीं मानते हैं। ['आत्मत्व
सम्यक् है' 'आत्मत्व असम्यक् है' इस व्यवहार के प्रताप से
आत्मत्व में भी अनुवृत्त हुए हुए सम्यक्त्व और असम्यक्त्व
को जैसे कोई आत्मा नहीं मानता, इसी प्रकार आत्मा में रहने
वाली इन तत्ता और इदन्ता को आत्मा नहीं मान सकते हैं]
तत्तेदन्ते स्वतान्यत्वे त्वन्ताहन्ते परस्परम् ।
प्रतिद्वन्द्वितया लोके प्रसिद्धे नास्ति संशयः ॥४९॥
तत्ता और इदन्ता [वह और यह] स्वत्व तथा अन्यत्व
[खुद और दूसरा] त्वन्ता और अहन्ता [तू और मैं] ये परस्पर
प्रतिद्वन्द्वी [विरोधी] रूप से प्रसिद्ध हैं। इन में तो कोई संशय
ही नहीं है।
१४२ पञ्चदशी
अन्यतायाः प्रतिद्वन्द्वी स्वयं कूटस्थ इष्यताम् ।
त्वन्तायाः प्रतियोग्येपोऽहमित्यात्मनि कल्पितः ॥५०॥
अन्यता [दूसरेपन] का प्रतिद्वन्द्वी [प्रतियोगी] जो स्वयं
[खुदपन] है उस को तो कूटस्थ मानना चाहिये । त्वन्ता का
प्रतियोगी जो कि अहम् है [जिस को चिदाभास कहा जाता है]
वह तो कूटस्थ आत्मा में कल्पित कर लिया हुआ है ।
अहन्तास्वत्वयोर्भेदे रूप्यतेदन्तयोरिव ।
स्पष्टेऽपि मोहमापन्ना एकत्वं प्रतिपेदिरे ॥५१॥
रूप्यता और इदन्ता में जिस तरह का भेद है, उसी तरह
का भेद अहन्ता और स्वत्व में भी स्पष्ट ही है, तो भी भ्रान्त
लोगों ने इन्हें एक ही मान लिया है। [तात्पर्य यह है कि जीव
और कूटस्थ का भेद होने पर भी, सब किसी को इस बात का
ज्ञान न होने का कारण तो यह है कि बुद्धि का साक्षी जो
कूटस्थ है उसका प्रत्यक्ष बुद्धि से नहीं हो सकता, इस कारण
'अहं' इस शब्द से जोकि जीव और कूटस्थ दोनों प्रतीत हो
रहे हैं उन दोनों को भ्रान्ति से एक मान लिया गया है।]
तादात्म्याध्यास एवात्र पूर्वोक्ताविद्यया कृतः ।
अविद्यायां निवृत्तायां तत्कार्यं विनिवर्तते ॥५२॥
[जीव और कूटस्थ की एकता का जो भ्रम हो गया है अब
उस का कारण बताया जाता है] 'अनादिरविवेकोऽयम्' इस २५ वें
श्लोक में जिस अविद्या का कथन किया है, उस अविद्या ने ही
तादात्म्याध्यास [एकत्व का भ्रम] कर रक्खा है। यह अविद्या
जब निवृत्त हो जाती है तब अविद्या का