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पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

( २६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

णोंका यद्यपि हमसे कुछ प्रयोजन नहीं है परन्तु आपसे समयपर वचन कहना उचितही है, कारण कि, उत्तम, मध्यम, अधम सभीसे राजाओंका प्रयोजन होता है ।

उक्तञ्च-
कहाभी है-

दन्तस्य निष्कोषणकेन नित्यं कर्णस्य कण्डूयनकेन वापि ।
तृणेन कार्य्यं भवतीश्वराणां किमंत्र वाग्घस्तवता नरेण ७७

दांतोंके कुरेदनेसे वा नित्य कर्णोंके खजानेसे तृणसे भी राजोंका कार्य होताहै हे अङ्ग ! वाणी और हाथवाले मनुष्यसे कार्य होता है सदा तो कहनाही क्या है ॥ ७७ ॥

तथा वयं देवपादानामान्वयागता भृत्या आपत्स्वपि पृष्ठ-गामिनो यद्यपि स्वमधिकारं न लभामहे तथापि देवपादानामेतत् युक्तं न भवति ।

इसी प्रकारसे हम स्वामीके चरणोंके कुलक्रमसे प्राप्त हुये भृत्य आपदांमेंभी पीछे चलनेवाले हैं यद्यपि अपने अधिकारको प्राप्त नहीं हैं तोभी श्रीमान्‌के चरणोंको यह योग्य नहीं है ।

उक्तञ्च-
कहाभी है-

स्थानेष्वेव नियोक्तव्या भृत्याश्चाभरणानि च ।
न हि चूडामणिः पादे प्रभवामीति बध्यते ॥ ७८ ॥

भृत्य और गहने स्थानमें नियुक्त करने चाहिये । मैं प्रभुहूं ऐसा मानकर चूडामणि (शिरका भूषण) चरणपर कोई धारण नहीं करता है ॥ ७८ ॥

यतः-
कारण-

अनभिज्ञो गुणानां यो न भृत्यैरनुगम्यते ।
धनाढ्योऽपि कुलीनोऽपि क्रमायातोऽपि भूपतिः ॥ ७९ ॥

जो गुणोंसे अनभिज्ञ है; भृत्य उसको साथ नहीं देते, चाहें वह धनाढ्य कुलीन और क्रमायात राजा हो ॥ ७९ ॥

भाषाटीकासमेतम्। (२७)

उक्तञ्च-
कहा है कि-

असमैः समीयमानः समैश्च परिहीयमाणसत्कारः ।
धुरि यो न युज्यमानस्त्रिभिरेर्थपतिं त्यजति भृत्यः ॥८०॥

जो भृत्य असमान भृत्योंसे समानताको प्राप्त किया जाय तुल्य भृत्योंसे दूर सत्कारवाला किया जाय तथा कार्यभारमें नियुक्त न किया जाय इन तीन कारणोंसे भृत्य राजाको त्याग न करदेता है ॥ ८० ॥

यच्च अविवेकतया राजा भृत्यानुत्तमपदयोग्यान् हीनाधमस्थाने नियोजयति न ते तत्रैव तिष्ठन्ति न भूपतेर्दोषो न तेषाम् । उक्तञ्च-

और जो अज्ञानतासे उत्तम पदके योग्य भृत्योंको हीन अधम स्थानमें नियुक्त करता है, न वे वहा रहते है न राजाका दोष है न उनका । कहाभी है-

कनकभूषणसंग्रहणोचितो यदि मणिस्त्रपुणि प्रतिबध्यते ।
न स विरौति न चापि स शोभते भवति योजयितुर्वचनीयता ॥ ८१ ॥

सुवर्णके गहनेमे लगाने योग्य मणि यदि निकृष्ट धातुमे लगाई जाय, वह मणि न रोती है, न शोभित होती है किन्तु वैसे नियुक्त करनेवालेकी निन्दा होती है कि, लगानेवालेको योग्यायोग्यका ज्ञान नहीं है ॥ ८१ ॥

यच्च स्वामी एवं वदति "चिराद्दृश्यते" तदपि श्रूयताम् ।

सव्यदक्षिणयोर्यत्र विशेषो नास्ति हस्तयोः ।
कस्तत्र क्षणमप्यार्यो विद्यमानगतिर्वसेत् ॥ ८२ ॥

और जो स्वामी यह कहते हैं कि, "बहुत कालमें देखा" सोभी सुनो जिस स्थानमे दहिने बाये हाथका विशेष नहीं है, वहा सब स्थानमे जानेवाला कौन बुद्धिमान् क्षणमात्रभी स्थिति करेगा ॥ ८२ ॥

काचे मणिर्मणौ काचो येषां बुद्धिविकल्प्यते ।
न तेषां सन्निधौ भृत्यो नाममात्रोऽपि तिष्ठति ॥ ८३ ॥

जिनकी बुद्धि काचमे मणि मणिमें काचका विकल्प करती है उनके निकट भृत्यजन नाममात्रकोभी स्थित नहीं होते ॥ ८३ ॥

( २८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

परीक्षका यत्र न सन्ति देशे नार्घन्ति रत्नानि समुद्रजानि । आभीरदेशे किल चन्द्रकान्तं त्रिभिर्वराटैर्विपणन्ति गोपाः ८४

जिस देशमें परीक्षा करनेवाले नहीं हैं वहां समुद्रसे उत्पन्न हुए रत्नोंका मूल्य नहीं होता ह आभीर देशमें चन्द्रकान्तमणिको गोप तीन कौडींसे खरीदते हैं ८४

लोहिताख्यस्य च मणेः पद्मरागस्य चान्तरम् । यत्र नास्ति कथं तत्र क्रियते रत्नविक्रयः ॥ ८५ ॥

लोहित मणि और पद्मरागमणिको अन्तर जहां नहीं है, वहां किस प्रकार रत्नोंका विक्रय होसक्ता है ॥ ८५ ॥

निर्विशेषं यदा स्वामी समं भृत्येषु वर्त्तते । तत्रोद्यमसमर्थानामुत्साहः परिहीयते ॥ ८६ ॥

जब स्वामी सबभृत्योंमें एकसा विशेषतः रहित वर्तता है वहां उद्यममें समर्थोंका उत्साह हीन हो जाताहै ॥ ८६ ॥

न विना पार्थिवो भृत्यैर्न भृत्याः पार्थिवं विना । तेषां च व्यवहारोऽयं परस्परनिबन्धनः ॥ ८७ ॥

भृत्योंके विना राजा नहीं और न राजाके बिना भृत्य हैं, उनका यह व्यवहार पस्पर निबन्धवाला है ॥ ८७ ॥

भृत्यैर्विना स्वयं राजा लोकानुग्रहकारिभिः । मयूखैरिव दीप्तांशुस्तेजस्यपि न शोभते ॥ ८८ ॥

भृत्योंके विना राजा ऐसे शोभित नहीं होता जिस प्रकार लोककी अनुग्रह-करनेवाली किरणोंके बिना तेजस्वी सूर्य नहीं शोभित होता है ॥ ८८ ॥

अरैः सन्धाय्यन्ते नाभिर्नाभौ चाराः प्रतिष्ठिताः । स्वामिसेवकयोरेवं वृत्तिचक्रं प्रवर्त्तते ॥ ८९ ॥

अरोंमें नाभि और नाभि ( पुट्ठे ) में अरे स्थित रहते हैं, इस प्रकारसे यह स्वामी सेवकका आजीविका चक्र चलता है ॥ ८९ ॥

शिरसा विधृता नित्यं स्नेहेन परिपालिताः । केशा अपि विरज्यन्ते निःस्नेहाः किं न सेवकाः ॥ ९० ॥

नित्य शिरसे धारण किये स्नेहसे परिपालित तेलके बिना केशभी रूखे हो जाते हैं, क्या सेवक न होंगे ॥ ९० ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२९)

राजा तुष्टो हि भृत्यानामर्थमात्रं प्रयच्छति ।
ते तु सम्मानमात्रेण प्राणैरप्युपकुर्वते ॥ ९१ ॥

राजा प्रसन्न होकर भृत्योको अर्थमात्र प्रदान करता है, और वे सन्मानमात्रसे उसके निमित्त अपने प्राण लगादेते हैं ॥ ९१ ॥

एवं ज्ञात्वा नरेन्द्रेण भृत्याः कार्या विचक्षणाः ।
कुलीनाः शौर्यसंयुक्ताः शक्ता भक्ताः क्रमागताः ॥ ९२ ॥

यह विचारकर राजाओंको चतुर भृत्य करने चाहिये, जो कुलीन शूरतासे सयुक्त समर्थ भक्त और कुलपरपरासे आये हों ॥ ९२ ॥

यः कृत्वा सुकृतं राज्ञो दुष्करं हितमुत्तमम् ।
लज्जया वक्ति नो किञ्चित्तेन राजा सहायवान् ॥ ९३ ॥

जो राजाका दुःसाध्य उत्तम हित करके लज्जासे कुछ नहीं कहता है, उससे ही राजा सहायवान् होता है ॥ ९३ ॥

यस्मिन् कृत्यं समावेश्य निर्विशङ्केन चेतसा ।
आस्यते सेवकः स स्यात्कलत्रमिव चापरम् ॥ ९४ ॥

जिसमें कार्यको निर्भय चित्तसे समर्पण करके राजा स्थित होताहै वह सेवक राजाको अन्य कलत्रकी समान पोषणीय है ॥ ९४ ॥

योऽनाहूतः समभ्येति द्वारि तिष्ठति सर्वदा ।
पृष्टः सत्यं मितं ब्रूते स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९५ ॥

जो बिनाबुलाये समीपमें स्थित रहता है सदा द्वारेही स्थित रहता है और पूछनेसे सत्य बोलता है वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९५ ॥

अनादिष्टोऽपि भूपस्य दृष्ट्वा हानिकरञ्च यः ॥
यतते तस्य नाशाय स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९६ ॥

और जो राजाकी आज्ञाके बिनाभी हानिकारक वार्ताको देख उसके नाश करनेका यत्न करता है, वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९६ ॥

तांडितोऽपि दुरुक्तोऽपि दण्डितोऽपि महीभुजा ।
यो न चिन्तयते पापं स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९७ ॥

जो राजासे ताडित होकर कठोर कहा जाकर दण्ड दिया जाकर भी राजाका अनिष्ट चिन्तन नहीं करताहै वह राजाका भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९७ ॥

( ३० ) पञ्चतन्त्रम् ।

न गर्वं कुरुते माने नापमाने च तप्यते ।
स्वाकारं रक्षयेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९८ ॥

जो सन्मानमें गर्व नहीं करता, अपमानमें तापित नहीं होता है और जो अपने मानापमानके भावको रक्षित करता है वह राजाका भृत्य होनेके योग्यहै ९८

न क्षुधा पीड्यते यस्तु निद्रया न कदाचन ।
न च शीतातपाद्यैश्च स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९९ ॥

कभीभी जो निद्रा और क्षुधा शीत आदिसे पीडित नहीं होताहै वह राजाओंके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९९ ॥

श्रुत्वा साङ्ग्रामिकीं वार्त्तां भविष्यां स्वामिनं प्रति ।
प्रसन्नास्यो भवेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०० ॥

जो आगे होनेवाली स्वामीकी संग्राम वार्ताको सुनकर प्रसन्नमुख होता है वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०० ॥

सीमावृद्धिं समायाति शुक्लपक्ष इवोडुराट् ।
नियोगसंस्थिते यस्मिन् स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०१ ॥

जिस भृत्यके नियुक्त होनेमें शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी समान राजाकी सीमा वृद्धिको प्राप्त होती है वही राजाओंका भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०१ ॥

सीमा सङ्कोचमायाति वह्नौ चर्म इवाहितम् ।
स्थिते यस्मिन्स तु त्याज्यो भृत्यो राज्यं समीहता ॥ १०२ ॥

और जिसकी स्थितिमें अग्निमें चर्मकी समान सीमा संकोच भावको प्राप्त होतीहै राज्यकी इच्छा करनेवाले राजा उस भृत्यको त्यागने करे ॥ १०२ ॥

तथा शृगालोऽयमिति मन्यमानेन ममोपरि स्वामिना यदि अवज्ञा क्रियते तदपि अयुक्तम् । उक्तं च यतः-

और यह शृगाल है यदि ऐसा मानकर स्वामी मेरी अवज्ञा करें तो यहभी अनुचित है । कारण कहा भी है-

कौशेयं कृमिजं सुवर्णमुपलाहूवाप गोरोमतः
पङ्कात्तामरसं शशाङ्क उदधेरिन्दीवरं गोमयात् ।
काष्ठादग्निरहेः फणादपि मणिर्गोपित्ततो रोचना
प्राकाश्यं स्वगुणोदयेन गुणिनो गच्छन्ति किं जन्मना १०३

भाषाटीकासमेतम् । (३१)

रेशम कीडोंसे, सुवर्ण पाषाणसे, दूर्वा गौके रोमसे, कमल कीचडसे, चन्द्रमा सागरसे, इन्दीवर (कमल) गोबरसे, अग्नि काष्ठसे, मणि सर्पके फणसे, रोचन गोपित्तसे उत्पन्न होता है, गुणी अपने गुणोंके उदयसे प्रकाशित होते हैं न कि जन्मसे ॥ १०३ ॥

मूषिका गृहजातापि हन्तव्या स्वापकारिणी ।
भक्ष्यप्रदानैर्मार्जारो हितकृत्प्रार्थ्यते जनैः ॥ १०४ ॥

घरमें उत्पन्न हुई अपना अपकार करनेवाली मूषिकाभी मारने योग्य है, हितकारी बिलावको भक्ष्य दान देकरभी लानेकी मनुष्य प्रार्थना करते हैं ॥ १०४ ॥

एरण्डभिण्डार्कनलैः प्रभूतैरपि सञ्चितैः ।
दारुकृत्यं यथा नास्ति तथैवाज्ञैः प्रयोजनम् ॥ १०५ ॥

जिस प्रकार बहुतसे एरण्ड भिण्ड आक नलसे कुछ काठका प्रयोजन नहीं निकलता इसी प्रकार अज्ञोंसे प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है ॥ १०५ ॥

किं भक्तेनासमर्थेन किं शक्तेनापकारिणा ।
भक्तं शक्तं च मां राजन् नावज्ञातुं त्वमर्हसि ॥ १०६ ॥"

असमर्थ भक्त और अपकारी सामर्थ्यवान् पुरुषसे क्या है, हे राजन् ! मुझ भक्त और समर्थकी अवज्ञा करनेको आप योग्य नहीं हैं ॥ १०६ ॥"

पिंगलक आह—"भवतु एवं तावत् । असमर्थः समर्थो वा चिरन्तनः त्वमस्माकं मन्त्रिपुत्रः तद्विश्रब्धं ब्रूहि यत् किंचिद्वक्तुकामः" । दमनक आह—"देव ! विज्ञाप्यं किंचिदस्ति" । पिंगलक आह—"तन्निवेद्य अभिप्रेतम्" । सोऽब्रवीत्—

पिंगलक बोला—"हो यह समर्थ वा असमर्थ, परन्तु तुम हमारे पुराने मंत्रिपुत्र हो सो जो तेरे कहनेकी इच्छा है. निर्भय कहो" दमनक बोला—"देव ! कुछ कहना तो है." पिंगलक बोला—"अपना अभीष्टकहो" वह बोला—

"अपि स्वल्पतरं कार्य्यं यद्भवेत्पृथिवीपतेः ।
तन्न वाच्यं सभामध्ये प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥ १०७ ॥

"राजाका जो अत्यन्त छोटासाभी कार्य हो वह सभामे नहीं कहना चाहिये ऐसा वृहस्पतिने कहा है ॥ १०७ ॥

( ३२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

तत् एकान्तिके मद्विज्ञाप्यमाकर्णयन्तु देवपादाः । यतः– सो एकान्तमें स्वामीके चरण मेरी विज्ञप्तिको श्रवण करें कारण कि–

षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रश्चतुष्कर्णः स्थिरो भवेत् ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन षट्कर्णं वर्जयेत्सुधीः ॥ १०८ ॥”

छः कानमें मंत्र भेदको प्राप्त होता है, चारकर्णमें स्थिर होता है इस कारण बुद्धिमान् सब प्रकार षट्कर्णको वर्जित करें ॥ १०८ ॥ ”

अथ पिंगलकाभिप्रायज्ञा व्याघ्रद्वीपिबृकपुरःसराः सर्वेऽपि तद्वचः समाकर्ण्य संसदि तत्क्षणादेव दूरीभूताः । ततश्च दमनक आह–"उदकग्रहणार्थं प्रवृत्तस्य स्वामिनः किमिह निवृत्त्यावस्थानम्" । पिंगलक आह–(सविलक्षस्मितम् ) “न किञ्चिदपि” । सोऽब्रवीत्–“ देव ! यदि अनाख्येयं तत्तिष्ठतु । उक्तञ्च–

तब पिंगलकके अभिप्राय जाननेवाले व्याघ्र गैंडे वृक आदि सब कोई उसके वचनको श्रवण कर सभामेसे उसी समय दूर होगये । दमनक बोला–“जल ग्रहणके लिये गये हुए स्वामी क्यों लौटकर यहां स्थित हुए”। पिङ्गलकने लज्जासे कुछ हास्यके सहित कहा–“कुछ नहीं” उसने कहा–“देव ! यदि कहनेके योग्य नहीं है तो जाने दीजिये । कारण कहा है–

दारेषु किञ्चित्स्वजनेषु किञ्चिद्गोप्यं वयस्येषु सुतेषु किञ्चित् ।
युक्तं न वा युक्तमिदं विचिन्त्य वदेद्विपश्चिन्महतोऽनुरोधात्॥”

कुछ स्त्रियोंमें, कुछ स्वजनोंमें, कुछ बन्धुओंमें, कुछ पुत्रोंमें गुप्त रक्खे; परन्तु विद्वान् यह युक्त है वा नहीं ऐसा विचार कर महाकार्यके वशसे गुप्तभी कहे ॥ १०९ ॥ ”

तच्छ्रुत्वा पिंगलर्कश्चिन्तयामास । “योग्योऽयं दृश्यते । तत् कथयामि एतस्य अग्रे आत्मनोऽभिप्रायम् । उक्तञ्च–

यह सुनकर पिंगलक विचार करने लगे “यह तो योग्य ही है सो इसके आगे अपना अभिप्राय कथन करूं, क्योंकि–

सुहृदि निरन्तरचित्ते गुणवति भृत्येऽनुवर्त्तिनि कलत्रे ।
स्वामिनि सौहृदयुक्ते निवेद्य दुःखं सुखी भवति ॥ ११० ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( ३३

निरन्तर चित्तवाले सुहृद्मे, गुणवान् भृत्यमे, अनुगामिनी स्त्रीमे, सौहार्दयुक्त स्वामीमें दुःख निवेदन कर सुखी होता है ॥ ११० ॥

भो दमनक ! शृणोषि शब्दं दूरात् महान्तम् ?''। सोऽब्रवीत—"स्वामिन् ! शृणोमि ततः किम्" ? पिंगलक आह—"भद्र ! अहमस्मात् वनात् गन्तुमिच्छामि"। दमनक आह—"कस्मात्" ? । पिंगलक आह—"यतोऽद्य अस्मद्वने किमपि अपूर्व्वं सत्त्वं प्रविष्टं यस्य अयं महाशब्दः श्रूयते । तस्य च शब्दानुरूपेण पराक्रमेण भव्यमिति"। दमनक आह—"यत् शब्दमात्रादपि भयमुपगतः स्वामी तदपि अयुक्तम् । उक्तञ्च—

भो दमनक ! क्या तू दूरसे महान् शब्द श्रवण करता है"? । वह बोला—"स्वामिन् ! सुनता हूं सो क्या"? । पिंगलक बोला—"भद्र ! मैं इस वनसे जानेकी इच्छा करता हूं"। दमनक बोला—"क्यों ?" । पिंगलक बोला—"जो कि, इस वनमे कोई अपूर्व जीव आया; जिसका यह महाशब्द सुनाई देता है । शब्दके अनुरूप इसका पराक्रम भी होगा"। दमनक बोला—"यदि स्वामीको शब्दमात्रसेभी भय प्राप्त हुवा है, सोभी युक्त नहीं है । कहा है—

अम्भसा भिद्यते सेतुस्तथा मन्त्रोऽप्यरक्षितः । पैशुन्याद्भिद्यते स्नेहो भिद्यते वाग्भिरातुरः ॥ १११ ॥

जैसे जलसे सेतु भेदको प्राप्त होता है इसी प्रकार अरक्षित मन्त्र भेदको प्राप्त होता है (दुर्जनतासे) चुगलीसे स्नेह और पंडित जन शुष्क कथासे भेदको प्राप्त होता है ॥ १११ ॥

तन्न युक्तं स्वामिनः पूर्व्वोपार्जितं वनं त्यक्तुम् । यतो भेरीवेणुबीणामृदंगतालपटहशंखकाहलादिभेदेन शब्दा अनेकविधा भवन्ति । तत् न केवलात् शब्दमात्रादपि भेतव्यम् । उक्तञ्च—

सो स्वामीको कुलक्रमागत वन त्यागना उचित नहीं है, जो कि भेरी, वेणु वीणा, मृदंग, ताल, पटह, काहलादिके भेदसे शब्द अनेक प्रकारके होते हैं, सो केवल शब्दमात्रसेही न डरना चाहिये । कहाहै—

( ३४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

अत्युत्कटे च रौद्रे च शत्रौ प्राप्ते न हीयते ।
धैर्यं यस्य महीनाथो न स याति पराभवम् ॥ ११२ ॥

जिस राजाका धैर्य अति उत्कट (दारुण) भयानक शत्रुके प्राप्त होनेसेभी नष्ट नहीं होताहै, उसका कभी पराभव नहीं होता ॥ ११२ ॥

दर्शितभयेऽपि धातरि धैर्यध्वंसो भवेन्न धीराणाम् ।
शोषितसरसि निदाघे नितरामेवोद्धतः सिन्धुः ॥ ११३ ॥

विधाताकेभी भय दिखानेसे धीरोका धैर्यध्वंस नहीं होताहै, गरमीमें सरोवर सूखते हैं, परन्तु सिन्धु अत्यन्त बढताही है ॥ ११३ ॥

तथाच–
और देखो–

यस्य न विपदि विषादः सम्पदि हर्षो रणे न भीरुत्वम् ।
तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् ॥ ११४ ॥

जिसको विपत्तिमें विषाद, सम्पत्तिमें हर्ष और रणमें भय नहीं होताहै, उस त्रिभुवनके तिलक किसी विरलेही पुत्रको माता उत्पन्न करती है ॥ ११४ ॥

तथाच–
औरभी–

शक्तिवैकल्यनम्रस्य निःसारत्वाल्लघीयसः ।
जन्मिनो मानहीनस्य तृणस्य च समा गतिः ॥ ११५ ॥

शक्तिकी विकलतासे नम्र हुए, निस्सार होनेसे अत्यन्त लघु, मानहीन जन्म धारीकी और तृणकी समान गति है ॥ ११५ ॥

अपिच–
और भी

अन्यप्रतापमासाद्य यो दृढत्वं न गच्छति ।
जतुजाभरणस्येव रूपेणापि हि तस्य किम् ॥ ११६ ॥

दूसरेके प्रतापको प्राप्त होकर जो दृढताको नहीं प्राप्त होताहै लाखके आभरणकी समान उसके रूपसे भी क्या है ॥ ११६ ॥

तदेवं ज्ञात्वा स्वामिना धैर्यावष्टम्भः कार्यः । न शब्दमात्रात् भेतव्यम् । उक्तञ्च–

भाषाटीकासमेतम् । ( ३६ )

यह जानकर स्वामीको धैर्यकी स्थिति करनी योग्य है, शब्दमात्रसे डरना न चाहिये कहाभी है-

पूर्वमेव मया ज्ञातं पूर्णमेतद्धि मेदसा । अनुप्रविश्य विज्ञातं यावच्चर्म च दारु च ॥ ११७ ॥”

मैंने पहले मज्जासे पूर्ण जान लिया था परन्तु पीछे प्रवेश कर देखा तो इसमें चर्म और दारुही निकला ॥ ११७ ॥”

पिङ्गलक आह-“कथमेतत्”? सोऽब्रवीत्- पिंगलक बोला-“यह कैसी कथा है”? । वह बोला-

कथा २ .

कश्चित् गोमायुर्नाम शृगालः क्षुत्क्षामकंठः इतस्ततः परि- भ्रमन् वने सैन्यद्वयसंग्रामभूमिमपश्यत् ।तस्याश्च दुन्दुभेः पति- तस्य वायुवशात् वल्लीशाखाग्रैः हन्यमानस्य शब्दमशृणोत् । अथ क्षुभितहृदयश्चिन्तयामास ।“अहो ! विनष्टोऽस्मि । तद्या- वत् न अस्य प्रोच्चारितशब्दस्य दृष्टिगोचरे गच्छामि तावद् अन्यतो व्रजामि। अथवा नैतत् युज्यते सहसैव पितृपैतामहं वनं त्यक्तुम् । उक्तञ्च-

कोई गोमायु नामवाला शृगाल भूखसे दुर्बल कंठवाला इधर उधर घूमता हुआ वनमे दोनो सेनाकी संग्रामभूमि देखता भया । वहां गिरे हुए नगाडेका पवनके वशसे वल्ली शाखाओके अग्रभागके ताडनसे उठा शब्द सुनता भया । तब क्षुभितहृदय हो विचारने लगा “अहो मैं मरा, सो जबतक इस उच्चारण किये शब्दके सम्मुख नहूं, तबतक यहांसे अन्य स्थानमें जाऊं। अथवा एकसाथै पितामह जनोका यह वन त्यागन करनेके योग्य नहीं है । कहाभी है-

भये वा यदि वा हर्षे संप्राप्ते यो विमर्शयेत् । कृत्यं न कुरुते वेगान्न स सन्तापमाप्नुयात् ॥ ११८ ॥

भय वा हर्षके प्राप्त होनेपर जो विचार करता है और कार्यको शीघ्रतासे नहीं करता है, वह सन्तापको प्राप्त नहीं होता है ॥ ११८ ॥

तत् तावत् जानामि कस्य अयं शब्दः”। धैर्यमाळम्ब्य विमर्शयन् यावत् मन्दं मन्दं गच्छति तावत् दुन्दुभिम् अप-

( ३६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

श्यत् । स च तं परिज्ञाय समीपं गत्वा स्वयमेव कौतुकात् अताडयत् । भूयश्च हर्षात् अचिन्तयत् । “अहो ! चिरादेतत् अस्माकं महत् भोजनमापतितम्,तत् नूनं प्रभूतमांसमेदोऽसृग्भिः परिपूरितं भविष्यति”। ततः परुषचर्मावगुंठितं तत्कथमपि विदार्य्य एकदेशे छिद्रं कृत्वा संहृष्टमना मध्ये प्रविष्टः परं चर्मविदारणतोदंष्ट्राभङ्गः समजनि । अथ निराशीभूतः तत् दारुशेषमवलोक्य श्लोकमेनंमपठत्।“पूर्वमेव मया ज्ञातम्”, इति। ततो न शब्दमात्रात् भेतव्यम्” । पिङ्गलक आह- “भोः ! पश्य अयं मम सर्वोऽपि परिग्रहो भयव्याकुलितमनाः पलायितुमिच्छति । तत् कथमहं धैर्यावष्टम्भं करोमि”। सोऽब्रवी- “स्वामिन् ! नैषामेष दोषो यतः स्वामिसदृशा एव भवन्ति भृत्याः । उक्तञ्च-

सो पहले मैं यह जानूं, कि, यह किसका शब्द है”। धैर्य्यको अवलम्बन कर जबतक शनैः २ गया तबतक नगाडेको देखता भया । वह इसको जान धोरे जाकर स्वयंही कौतुकसे ताडन करता हुआ, फिरभी प्रसन्नतासे विचारता भया । “अहो ! बहुत कालमें यह भोजन हमको प्राप्त हुआहै । सो निश्चयही बहुतसे मांस मेंद रुधिरसे परिपूर्ण होगा” सो कठिन चर्मसे मढे हुए इस (ढोल) को किसी प्रकारसे विदीर्ण करके एक देशमें छिद्र करके प्रसन्नमनसे भीतर प्रविष्ट हुआ । और चर्मके विदारण करनेसे दाढें टूटगईं । तब निराश होकर केवल काष्ठमात्र देखकर इसश्लोकको पढताहुआ कि, “मैने पहिले जाना था” । इससे शब्दमात्रसे न डरना चाहिये” पिंगलक बोला “भो ! देखोयह मेरा सम्पूर्ण कुटुम्ब भयव्याकुल मन होकर भागनेकी इच्छा करता है, सो मैं किस प्रकार धैर्य धारण करूं” । वह बोला- “स्वामिन् ! इनका दोष नहीं जिस कारण कि, भृत्य स्वामीकी समान होते हैं । कहाभी है-

अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च । पुरुषविशेषं प्राप्ता भवन्त्ययोग्याश्च योग्याश्च ॥ ११९ ॥

घोडा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, नर और नारी यह पुरुषविशेषको प्राप्त होकर योग्य अयोग्य होजाते हैं ॥ ११९ ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( ३७ )

तत् पौरुषावष्टम्भं कृत्वा त्वं तावत् अत्र एव प्रतिपालय-यावदहमेतत् शब्दस्वरूपं ज्ञात्वा आगच्छामि । ततः पश्चात् यथोचितं कार्य्यम्” इति । पिङ्गलक आह-“किं तत्र भवान् गन्तुमुत्सहते ?”। स आह-“किं स्वाम्यादेशात्सद्भृत्यस्य कृत्याकृत्यमस्ति उक्तञ्च-

सो पुरुषार्थका अवलम्बन कर तुम तबतक यहां रहो जबतक मैं इस शब्दस्वरूपको जानकर आऊ, तब पीछे जैसा उचित हो सो करना”। पिंगलक बोला-“क्या आप वहां जानेकी इच्छा करते हो ?”। वह बोला-“स्वामीकी आज्ञासे भृत्यको कृत्यका और अकृत्यका विचार क्या है ? । कहाहै कि-

स्वाम्यादेशात्सुभृत्यस्य न भीः सञ्जायते क्वचित् । प्रविशेन्मुखमाहेयं दुस्तरं वा महार्णवम् ॥ १२० ॥

स्वामीकी आज्ञासे सुभृत्यको कहींभी कुछ भय नहीं होताहै, सर्पके मुखमें प्रवेश करजाय वा दुस्तर महासागर तर जाय ॥ १२० ॥

तथाच- तैसाही-

स्वाम्यादिष्टस्तु यो भृत्यः समं विषममेव च । मन्यते न स सन्धाय्यों भूभुजा भूतिमिच्छता ॥१२१॥”

जो भृत्य स्वामीकी आज्ञाको समवा विषम नहीं मानता है ऐश्वर्यकी इच्छाकरनेवाले राजाओंको सदा उसको अपने समीपमें रखना उचित है ॥ १२१ ॥”

पिङ्गलक आह-“भद्र ! यदि एवं तत् गच्छ शिवास्ते पन्थानः सन्तु” इति । दमनकोऽपि तं प्रणम्य सञ्जीवकशब्दानुसारी प्रतस्थे । अथ दमनके गते भयव्याकुलमनाः पिङ्गलकः चिन्तयामास । “अहो ! न शोभनं कृतं मया, यत् तस्य विश्वासं गत्वा आत्माभिप्रायो निवेदितः । कदाचित दमनकोऽयमुभयवेतनॊ भूत्वा ममोपरि दुष्टबुद्धिः स्यात् भ्रष्टाधिकारत्वात् । उक्तञ्च-

पिंगलक बोला, “भद्र ! जो ऐसा है तो तेरे मार्ग मगलकारी हो” दमनक भी उसको प्रणाम करके सञ्जीवकके शब्दका अनुसरण कर चला । तब दमनकके

( ३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

जानेमें भयसे व्याकुलमन होकर पिंगलक विचार करने लगा कि, "देखो मैने अच्छा नहीं किया जो इसके विश्वासको प्राप्त होकर मैने अपना भेद कह दिया। जो कदाचित् यह दमनक दोनों तरफका बनकर मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि होजायं कारण कि, यह अधिकारसे भ्रष्ट है। कहाहै कि-

ये भवन्ति महीपस्य सम्मानितविमानिताः । यतन्ते तस्य नाशाय कुलीना अपि सर्वदा ॥ १२२ ॥

-जो राजाके पहले सम्मानपात्र होकर पीछे तिरस्कृत होते हैं, चाहे वे कुलीन भी हों तोभी उसके नाशके निमित्त यत्न करते हैं ॥ १२२ ॥

तत् तावदस्य चिकीर्षितं वेत्तुमन्यत् स्थानान्तरं गत्वा प्रतिपालयामि । कदाचित् दमनकः तमादाय मां व्यापादयितुमिच्छति । उक्तञ्च-

सो तबतक इसकी इच्छा देखनेको दूसरे स्थानमें जाकर स्थित रहूं, कदाचित् दमनक उसको साथ लाकर मुझे मरवा डालनेकी इच्छा करताहै क्या कहाहै कि-

न बध्यन्ते ह्यविश्वस्ता बलिभिर्दुर्बला अपि । विश्वस्तास्त्वेव बध्यन्ते बलवन्तोपि दुर्बलैः ॥ १२३ ॥

किसीका विश्वास न करनेवाले दुर्बलभी बलवानोंसे नहीं बंधते हैं और विश्वास करनेसे बलवान्‌ही दुर्बलोंसे बंधजातेहैं ॥ १२३ ॥

बृहस्पतेरपि प्राज्ञो न विश्वासे व्रजेन्नरः । य इच्छेदात्मनो वृद्धिमायुष्यञ्च सुखानि च ॥ १२४ ॥

बुद्धिमान् तो बृहस्पतिके विश्वासमेंभी न जाय जो अपनी आयुवृद्धि और सुखकी इच्छा करता हो ॥ १२४ ॥

शपथैः सन्धितस्यापि न विश्वासे व्रजेद्रिपोः । राज्यलाभोद्यतो वृत्रः शक्रेण शपथैर्हतः ॥ १२५ ॥

शपथसे सन्धान किये शत्रुके विश्वासमें न जाय, देखो विश्वाससेही राज्यलोभसे उद्यत हुए वृत्रको इन्द्रने मार डाला ॥ १२५ ॥

न विश्वासं विना शत्रुद्देवानांमपि सिद्ध्यति । विश्वासात्त्रिदशेन्द्रेण दितेर्गर्भो विदारितः ॥ १२६ ॥”

भाषाटीकासमेतम् । ( ३९ )

विश्वासके विना तो देवताभी शत्रुको सिद्ध नहीं कर सकते, विश्वाससेही इन्द्रने दितिका गर्भनाश¹ कर दिया ॥ १२६ ॥”

एवं सम्प्रधार्य स्थानान्तरं गत्वा दमनकमार्गमवलोकयन् एकाकी तस्थौ । दमनकोऽपि सञ्जीवकसकाशं गत्वा वृषभोऽयमिति परिज्ञाय हृष्टमना व्यचिन्तयत् । “अहो ! शोभनमापतितम् अनेन एतस्य सन्धिविग्रहद्वारेण मम पिंगलको वश्यो भविष्यति इति । उक्तञ्च–

ऐसा विचारकर अन्यस्थानमें जाय दमनककी बाट देखता हुआ इकल्ला स्थित रहा । दमनक भी सजीवकके निकट जाकर यह बैल है ऐसा जानकर प्रसन्न हो विचारने लगा “आहा ! यह तो अच्छी बात हुई । इसके साथ उसकी संधि विग्रह होनेसे पिंगलक मेरे वशीभूत हो जायगा । कहा भी है–

न कौलीन्यान्न सौहार्द्दान्नृपो वाक्ये प्रवर्त्तते ।
मन्त्रिणां यावदभ्येति व्यसनं शोकमेव च ॥ १२७ ॥

कुलीनता और सुहृदतासे राजा मन्त्रियोंके वाक्यमें प्रवृत्त नहीं होता है जबतक कि, उसको व्यसन और शोककी प्राप्ति नहीं होती ॥ १२७ ॥

सदैवापद्गतो राजा भोग्यो भवति मन्त्रिणाम् ।
अत एव हि वाञ्छन्ति मन्त्रिणः सापदं नृपम् ॥ १२८ ॥

आपत्तिमें प्राप्त हुआ राजा मन्त्रियोंको सदा भोग्य होता है, इसकारण मन्त्री राजाको आपत्तियुक्त रहनेकी ही इच्छा करते हैं ॥ १२८ ॥

यथा नेच्छति नीरोगः कदाचित्सुचिकित्सकम् ।
तथापद्रहितो राजा सचिवं नाभिवाञ्छति ॥ १२९ ॥”

जैसे निरोगी कभी वैद्यकी इच्छा नहीं करता, इसी प्रकार आपत्तीरहित राजा कभी मन्त्रीकी इच्छा नहीं करता ॥ १२९ ॥”

एवं विचिन्तयन् पिंगलकाभिमुखः प्रतस्थे । पिंगलकोऽपि तमायान्तं प्रेक्ष्य स्वाकारं रक्षन् यथापूर्वमवस्थितः । दमनकोऽपि पिंगलकसकाशं गत्वा प्रणम्य उपविष्टः । पिंगलक आह–“किं दृष्टं भवता तत् सत्त्वम्”? । दमनक आह–“दृष्टं


१ देखो भागवतपर हमारी टीका ।

(४०) पञ्चतन्त्रम् ।

स्वामिप्रसादात्'' । पिंगलक आह-''अपि सत्यम्'' ? । दमनक आह-''किं स्वामिपादानामग्रेऽसत्यं विज्ञाप्यते? । उक्तञ्च-

ऐसा विचारकर पिंगलकके समीप चला, पिंगलकभी उसको आता देख अपना आकार रक्षित किये हुए पहलेकी समान स्थित भया । दमनकभी पिंगलकके धोरे जाकर प्रणामकर स्थित हुआ । पिंगलक बोला-“क्या आपने उस जीवको देखा?” दमनक बोला-“स्वामीकी कृपासे देखा” । पिंगलक बोला-“क्या सत्य है?” । दमनक बोला-“क्या स्वामीके चरणोंके सन्मुख असत्य कहाजाता है ? । कहा भी है कि-

अपि स्वल्पमसत्यं यः पुरो वदति भूभुजाम् ।
देवानाञ्च विनश्येत स द्रुतं सुमहानपि ॥ १३० ॥

जो देवता और राजाके आगे थोडाभी असत्य कहताहै वह महान् भी शीघ्रनष्ट होजाताहै ॥ १३० ॥

तथाच-
और देखो-

सर्वदेवमयो राजा मनुना सम्प्रकीर्त्तितः ।
तस्मात्तं देववत्पश्येन्न व्यलीकेन कर्हिचित् ॥ १३१ ॥

मनुजीने कहा है कि, राजामे सब देवता निवास करतेहैं । इसकारण उसको सदा देवताओंके समान देखना कभी और प्रकारसे नही॥१३१॥

सर्वदेवमयस्यापि विशेषो नृपतेरयम् ।
शुभाशुभफलं सद्यो नृपाद्देवाद्भवन्तरे ॥ १३२ ॥''

सर्वदेवमय होनेवाले राजामें यह विशेष है कि, राजासे शुभाशुभ फल शीघ्र मिलताहै और देवताओंसे जन्मान्तरमें फल मिलताहै ॥ १३२ ॥''

पिङ्गलक आह-“सत्यं दृष्टं भविष्यति भवता । न दीनोपरि महान्तः कुप्यन्ति इति न त्वं तेन निपातितः । यतः-

पिंगलक बोला-“आपने सत्यही देखा होगा, परन्तु दीनोंके ऊपर महान् क्रोध नहीं करते इस कारण उसने तुझको नहीं मारा । क्योंकि,-

तृणानि नोन्मूलयति प्रभञ्जनो
मृदूनि नीचैः प्रणतानि सर्वतः ।

भाषाटीकासमेतम् । ( ४१ )

स्वभाव एवोन्नतचेतसामयं महान्महत्स्वेव करोति विक्रमम् ॥ १३३ ॥

पवन मृदु नीचे सब प्रकार प्रणत हुए तृणोंको उन्मूलन नहीं करताहै श्रेष्ठ चित्तवालोंका यह स्वभावही है बडे पुरुष बडोंमेंही विक्रम करतेहैं ॥ १३३ ॥

अपिच-
औरभी-

गण्डस्थलेषु मदवारिषु बद्धराग-
मत्तभ्रमद्भ्रमरपादतलाहतोऽपि ।
कोपं न गच्छति नितान्तबलोऽपि नाग-
स्तुल्ये बले तु बलवान्परिकोपमेति ॥ १३४ ॥ ”

मदके जलवाले गण्डस्थलोंमे प्रीति करनेवाले मतवाले भ्रमण करते हुए भोरोंके चरणतलसे ताडित होकर भी महाबली हाथी उनपर क्रोध नहीं करता कारण कि, बलवान् तुल्यबलमे क्रोध करताहै ॥ १३४ ॥”

दमनक आह-“अस्तु एवंस महात्मा वयं कृपणाः तथापि स्वामी यदि कथयति ततो भृत्यत्वे नियोजयामि ।” पिङ्गलक आह-“( सोच्छ्वासम् ) किं भवान् शक्नोत्येवं कर्तुम्?”। दमनक आह-“किमसाध्यं बुद्धेरस्ति । उक्तञ्च-

दमनक बोला-“यही हो क्योंकि, वह महात्मा और हम दीन हैं तोभी यदि आप कहें तो आपके भृत्यपनमें उसको नियुक्त करूं” । पिंगलक ( विश्वास लैकर ) बोला-“क्या तुम यह कर सकते हो”? । दमनक बोला-“बुद्धिके सामने क्या असाध्य है, कहा है-

न तच्छस्त्रैर्न नागेन्द्रैर्न हयैर्न पदातिभिः ।
कार्य्यं संसिद्धिमभ्येति यथा बुद्ध्या प्रसाधितम् ॥ १३५॥ ”

कार्य जैसा बुद्धिसे सिद्ध होताहै ऐसा शस्त्र, हाथी, घोडे, पैदलोंसे सिद्ध नहीं होता, ॥ १३५ ॥”

पिङ्गलक आह-“यदि एवं, तर्हि अमात्यपदे अध्यारोपितस्त्वम् । अद्यप्रभृति प्रसादनिग्रहादिकं त्वयैव कार्य्यमिति निश्चयः।” । अथ दमनकः सत्वरं गत्वा साक्षेपं तमिदमाह-

( ४२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

“एह्येहि दुष्टवृषभ ! स्वामी पिङ्गलकः त्वाम् आकारयति किं निःशङ्को भूत्वा मुहुर्मुहुर्नर्दसि वृथेति” । तच्छ्रु सञ्जीवकोग्ब्रवीत्-“भद्र ! कोऽयं पिङ्गलकः ?” । दमनकः आह-“किं स्वामिनं पिङ्गलकमपि न जानासि ? तत्क्षणं प्रतिपालय फलेनैव ज्ञास्यसि । ननु अयं सर्वमृगपरिवृतो वटतले स्वामी पिङ्गलकनामा सिंहस्तिष्ठति” । तच्छ्रुत्वा गतायुषमिवात्मानं मन्यमानः सञ्जीवकः परं विषादमर्गमत् । आह च-“भद्र ! भवान् साधुसमाचारो वचनपटुश्च दृश्यते । तत् यदि मामवश्यं तत्र नयसि तदभयप्रदानेन स्वामिनः सकाशात् प्रसादः कारयितव्यः” । दमनक आह-“भोः सत्यमभिहितं भवता । नीतिरेषा । यतः-

पिंगलक बोला-“जो ऐसा है तो तुझको अमात्यपदमें स्थापित किया । आजसे लेकर (प्रजा अनुजीवियोंपर) प्रसाद निग्रह (दंड) तुम्हारेही आधीन है यह निश्चय है” तब दमनक शीघ्रतासे जाकर तिरस्कारपूर्वक यह बोला-“ आओ आओ ! दुष्ट वृषभ ! स्वामी पिंगलक तुझको पुकारताहै । क्यों निश्शंक होकर बारंबार वृथा नाद करताहै” । यह सुनकर संजीवक बोला-“भद्र ! पिंगलक कौन है ?” दमनक बोला-“क्या तू स्वामी पिंगलकको नहीं जानताहै ? । सो क्षणमात्रको ठहर फलसेही जानलेगा, निश्चयही यह सब मृगोंसे युक्त वटतले हमारा स्वामी पिंगलक सिंह स्थित है” । यह सुन आयुरहित अपनेको मानताहुआ संजीवक महादुःखको प्राप्त हुआ और बोला-“ भद्र ! आप साधुसमाचार और वचन बोलनेमें चतुर दीखते हो । यदि मुझको अवश्य ही वह लिये जाते हो, तो अभयप्रदानसे स्वामीके निकट प्रसाद कराओ” । दमनक बोला-“भो ! तुमने सत्य कहा नीति ऐसी ही है । क्योंकि-

पर्यन्तो लभ्यते भूमेः समुद्रस्य गिरेरपि ।
न कथञ्चिन्महीपस्य चित्तान्तः केनचित् क्वचित् ॥ १३६ ॥

मनुष्य पृथ्वी, समुद्र और पर्वतका भी अन्त पासकतेहैं, परन्तु राजाके चित्तका अन्त कभी किसीने नहीं पाया ॥ १३६ ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( ४३ )

तत् त्वमत्रैव तिष्ठ यावदहं तं समयं दृष्ट्वा ततः पश्चात् त्वां नयामि इति” । तथा अनुष्ठिते दमनकः पिंगलकसकाशं गत्वा इदमाह- “स्वामिन् ! न तत् प्राकृतं सत्त्वं, स हि भगवतो महेश्वरस्य वाहनभूतो वृषभ इति मया पृष्ट इदमूचे- “महेश्वरेण परितुष्टेन कालिन्दीपरिसरे शष्पाग्राणि भक्षयितुं समादिष्टः किं बहुना ममप्रदत्तं भगवता क्रीडार्थं वनमिदम्” पिंगलक आह-(सभयम्) “सत्यं ज्ञातं मयाऽधुना । न देवताप्रसादं विना शष्पभोजिनो व्यालाकीर्णे एवंविधे वने निःशंका नदन्तो भ्रमन्ति । ततस्त्वया किमभिहितम्?”। दमनक आह- “स्वामिन् ! एतदभिहितं मया 'यदेतद्वनं चण्डिकावाहनभूतस्य मत्स्वामिनः पिंगलकनाम्नः सिंहस्य विषयीभूतं तद्भवानभ्यागतः प्रियोऽतिथिः । तत् तस्य सकाशं गत्वा भ्रातृस्नेहेन एकत्र भक्षणपानविहरणक्रियाभिः एकस्थानाश्रयेण कालो नेय इति”। ततः तेनापि सर्वमेतत् प्रतिपन्नमुक्तञ्च सहर्षम् । स्वामिनः सकाशात् अभयदक्षिणा दापयितव्या । इति । तदत्र स्वामी प्रमाणम्” । तच्छ्रुत्वा पिंगलक आह- “साधु सुमते ! साधु । मन्त्रिश्रोत्रिय ! साधु । मम हृदयेन सह सम्मन्त्र्य भवता इदमभिहितम् । तद्दत्ता मया तस्य अभयदक्षिणा । परं सोऽपि मदर्थे अभयदक्षिणां याचयित्वा द्रुततरमानीयतामिति । अथ साधु चेदमुच्यते-

सो तूं यहीं स्थित हो जबतक मैं समयको देखकर पीछे तुझको वहा ले जाऊं” ऐसा करनेपर दमनक पिंगलके समीप जाकर यह बोला- “स्वामिन् ! वह प्राकृत जीव नहीं है, वह शिवजीका वाहनभूत वृषभ है । मेरे पूछनेसे उसने मुझसे कहा है कि, “शिवजीने प्रसन्न होकर यमुना तीरके देशमे नवीन तृण खानेकी आज्ञा दी है, बहुत कहनेसे क्या हे भगवान् शिवने मुझे यह वन क्रीडाके निमित्त प्रदान किया है”। पिंगलक ( भयपूर्वक ) बोला- “अब मैंने सत्य २ जाना देवताकी प्रसन्नताके विना घास खानेवाले सर्पादिकसे युक्त इस प्रकारके वनमे निश्शंक नाद करते हुये घूमते कैसे रहें सो तैने क्या कहा” ? । दमन

( ४४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

बोला—स्वामिन् ! मैंने यह कहा कि "यह वन चण्डिकाके वाहनभूत हमारा स्वामी पिंगलक नाम सिंहका अधिकृतहै, सो आप अभ्यागत प्रिय अतिथि प्राप्त हो सो उस (स्वामी) के पास चलकर भ्रातृस्नेहसे एक स्थानमेंही भक्षण पान विहार क्रियासे एक स्थानमें रहकर समय व्यतीत करो, तब उसने यह सब स्वीकार करके प्रसन्न हो कहा—'स्वामीके निकटसे अभयदक्षिणा दिवाओ, सो इसमें स्वामीही प्रमाण है" यह सुनकर पिंगलक बोला—"धन्य बुद्धिमान् धन्य । मानो यह मेरे हृदयसेही सम्मति करके तैने कहा। मैंने उसको अभय दक्षिणा दी, परन्तु उससेभी मेरे निमित्त अभय दक्षिणा दिवाकर शीघ्र लाओ। ठीकही कहा है—

अन्तःसारैरकुटिलैरच्छिद्रैः परीक्षितैः। मन्त्रिभिर्धार्य्यते राज्यं सुस्तम्भैरिव मन्दिरम् ॥ १३७॥

सारवान् कुटिलतासे रहित निर्दोष अच्छी प्रकार परीक्षा किये हुए मंत्रियोंसे राज्य धारण कियाजाताहै जैसे अच्छे स्तम्भोंसे मन्दिर ॥ १३७ ॥

तथाच— और भी—

मन्त्रिणां भिन्नसन्धाने भिषजां सान्निपातिके । कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा स्वस्थे को वा न पण्डितः ॥१३८॥"

अयुक्तके युक्त करनेमें मन्त्रियोंकी सन्निपातके कर्म ( व्यापार ) में वैद्योंकी बुद्धि देखी जातीहै स्वस्थतामें कौन पंडित नहीं होताहै ॥ १३८ ॥

दमनकोऽपि तं प्रणम्य सञ्जीवकसकाशं प्रस्थितः सहर्षमचिन्तयत् ।"अहो ! प्रसादसन्मुखो नः स्वामी वचनवशगश्च संवृत्तस्तन्नास्ति धन्यतरो मम । उक्तञ्च—

दमनकभी उसको प्रणाम कर संजीवकके समीप गया, और प्रसन्नतासे विचारने लगा "अहो इस समय स्वामी हमपर प्रसन्न है वचनके वशीभूत है सो इस समय मुझसे अधिक धन्य और कौनहै। कहाभी है—

अमृतं शिशिरे वह्निरमृतं प्रियदर्शनम् । अमृतं राजसम्मानममृतं क्षीरभोजनम् ॥ १३९ ॥

जाडेमें अग्नि अमृत है, प्रियदर्शन अमृत है, राजसन्मान अमृत है, तथा क्षीर भोजन अमृत है ॥ १३९ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (४५)

अथ सञ्जीवकसकाशमासाद्य सप्रश्रयमुवाच-“भो मित्र ! प्रार्थितोऽसौ मया भवदर्थे स्वाम्यभयप्रदानम् । तद्विश्रब्ध मागम्यतामिति । परं त्वया राजप्रसादमासाद्य मया सह समयधर्मेण वर्त्तितव्यम् । न गर्वमासाद्य स्वप्रभूतया विचरणीयम् । अहमपि तव संकेतेन सर्व्वां राज्यधुरममात्यपदवीमाश्रित्य उद्धरिष्यामि। एवं कृते द्वयोरपि आवयोः राज्यलक्ष्मीर्भोग्या भविष्यति । यतः-

सञ्जीवकके निकट जाकर नम्रतापूर्वक यह वचन बोला-“हे मित्र ! आपके निमित्त मैंने स्वामीसे अभयदानके लिये प्रार्थना की । सो नि शक होकर चलो परन्तु तुमको राजाका प्रसाद प्राप्त कर, मेरे साथ नियमक्रमसे बर्तना चाहिये, गर्वको प्राप्त होकर अपनी प्रभुतासे न विचरना और मैंभी तुम्हारे संकेतसे सम्पूर्ण राज्यभार अमात्यपदवीको प्राप्त कर धारण करूंगा ऐसा करनेसेही हम दोनोंको राज्यलक्ष्मी भोग्य होगी । कारण-

आखेटकस्य धर्मेण विभवाः स्युर्वशे नृणाम् ।
नृप्रजाः प्रेरयत्येको हन्त्यन्योऽत्र मृगानिव ॥ १४० ॥

आखटके धर्मसे ऐश्वर्य मनुष्योंके वशीभूत होजाते हैं, एक मनुष्यरूपी प्रजाओंको प्रेषण करता हैऔर दूसरा इस संसारमें मृगोंकी समान कार्यसिद्धि करता है ॥ १४० ॥

तथाच-
और देखो-

यो न पूजयते गर्वादुत्तमाधममध्यमान् ।
भूपसम्मानमान्योऽपि भ्रश्यते दन्तिलो यथा ॥ १४१ ॥”

जो गर्वसे उत्तम, अधम, मध्यमका सन्मान नहीं करता है, वह राजासे सन्मान मान्यताको प्राप्त होकरभी दन्तिलके समान भ्रष्ट होता है ॥ १४१ ॥”

सञ्जीवक आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत-
सञ्जीवक बोला-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला-