पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
भाषाटीकासमेतम् । ( ६३ )
तं शौचमानो मात्रामुद्दिश्य शनैः शनैः प्रस्थितो यावदाषा-ढभूतिं न पश्यति ततश्च औत्सुक्येन शौचं विधाय यावत् कन्थामालोकयति तावत् मात्रां न पश्यति। ततश्च “हा ! हा ! मुषितोऽस्मीति” जल्पन् पृथिवीतले मूर्च्छया निपपात । ततः क्षणात् चेतनां लब्ध्वा भूयोऽपि समुत्थाय फूत्कर्त्तुमारब्धः।"भो आषाढभूते! क्व मां वञ्चयित्वा गतोऽसि। तद्देहि मे प्रतिवचनम्”। एवं बहु विलप्य तस्य पदपद्धतिमन्वेषयञ्छनैः शनैः प्रस्थितः। अथ एवं गच्छन् सायन्तनसमये कञ्चिद्ग्राममाससाद । अथ तस्माद्ग्रामात्कश्चित्कौलिकः सभार्य्यो मद्यपानकृते समीपवर्त्तिनि नगरे प्रस्थितः । देवशर्मापि तमालोक्य प्रोवाच--“भो भद्र ! वयं सूर्योढा अतिथयस्तत्त्वान्तिकं प्राप्ता न कमपि अत्र ग्रामे जानीमः। तद्गृह्यतामतिथिधर्मः । उक्तञ्च--
सो तुझ व्रतग्रहणके उपरान्त मठके द्वारे तृणके कुटीमे प्रवेश करना चाहिये”। वह बोला-“भगवन् ! आपकी आज्ञा प्रमाण है दूसरे लोकमे मग ल्हो यही मेरा प्रयोजन है” सो शयनकी प्रतिज्ञा कर देवशर्मा अनुग्रहकर शास्त्रोक्त विधिसे उसको शिष्य करता भया । वहभी हाथ पैर आदि दावनेकी परिचर्य्यासे उसको संतुष्ट करता हुआ, इसपरभी वह मुनि बगलसे मात्राको न त्यागता । तब कुछ समय बीतनेपर आषाढ भूति विचार करनेलगा, “अहो किसीप्रकारसेभी यह मेरे विश्वासको प्राप्त नहीं होताहै। सो क्या दिनमें शस्त्रसे मारू या इसको विषदू या पशुकी समान मारडालू”। यह उसके विचारकरनेपर देवशर्माके शिष्यका पुत्र कोई ग्रामसे निमंत्रण करनेको आया और बोला--“भगवन् ! यज्ञोपवीत देनेके निमित्त मेरे घर आइये”। यह सुन देवशर्मा आषाढभूतिके साथ प्रसन्न मन हो चला । तब उनके जातेमें कोई नदी आगे आई । उसको देखकर मात्राको वगलमेंसे निकाल गुदडीमें छिपाय रख स्नान-कर देवार्चनविधिकर आषाढभूतिसे यह बोला-“हे आषाढभूति ! जबतक मैं पुरीष त्यागन करआऊ तबतक यह मुझ योगेश्वरकी गुदडी सावधानतासे रक्षा करना” यह कह गया । आषाढभूतिभी उसके अदर्शन होनेमें उस मात्राको
( ६४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
लेकर पलायन करगया । देवशर्माभी शिष्यके गुणोंसे अनुरंजितमन होकर विश्वासकर जबतक स्थितरहा तबतक सुवर्णरोम ( जन्तु ) के यूथमें हूडनामक जीवका युद्ध देखने लगा। तब रोषके कारण दोनो हूड पीछे हटकर फिरभी बडे वेगसे आकर मस्तकमें प्रहार करते जिससे बडा रुधिर निकलता था। वहां एक गीदड जिह्वाके लौल्यसे रंगभूमिमें प्रवेशकर रुधिर खाता था। देवशर्माभी इसको देखकर विचार करने लगा।"अहो यह गीदड मन्दमति है,यदि किसी प्रकारसे इन दोनोंके संघट्टमें प्राप्त होगा तो अवश्य मृत्युको प्राप्त होगा ऐसी मैं तर्कना करताहूं"। उसीक्षणमें रुधिर आस्वादानकी चंचलतासे बीचमें प्रवेश करताहुआ उनके शिरके झटकेसे शृगाल मृतक भया, देवशर्माभी उसको शोचकरता हुआ धनका स्मरण कर शनैः २ चलकर जबतक आषाढभूतिको नहीं देखताहै तंबतक उत्कंठासे शौच करके ज्योंही गुदडीको देखा कि, उसमें मात्राको न पाया तब "हाय ! हाय ! मै ठगा गया" यह कहकर पृथ्वीमे मूर्छित हो गिरा । फिर चेतनताको प्राप्त होकर उठ श्वास लेने लगा "भो आषाढभूति ! मुझे ठगकर कहां गया ? मुझे उत्तर तो दे"इसप्रकार बहुत विलाप कर उसके पैरोंके चिन्हके अनुसरण क्रमसे खोजता हुआ शनैः २ चला । यौं जाताहुआ संध्यासमय किसी गांवमें प्राप्त हुआ, उस गांवसे कोई कौलिक स्त्रीके सहित मद्यपान किये नगरके समीप चलाथा। देवशर्माभी उसको देखकर बोला-"भो भद्र! हम सूर्योढ ( सन्ध्या समय गृहस्थियोंके घरजानेवाले ) अतिथि तुम्हारे निकट प्राप्त हुए हैं किसीको इस गांवमें नहीं जानते सो अतिथिधर्म स्वीकार कीजिये । कहाहै-
संप्राप्तो योऽतिथिः सायं सूर्योढो गृहमेधिनाम् ।
पूजया तस्य देवत्वं प्रयान्ति गृहमेधिनः ॥ १८१ ॥
जो अतिथि गृहस्थियोंके यहां संध्यासमय ( सूर्यछिपनेके समय ) प्राप्तहो गृहस्थी उसकी पूजाकरे तो देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥ १८१ ॥
तथाच-
तैसेही-
तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ।
सतामेतानि हर्म्येषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १८२ ॥
तृण, भूमि, जल और चौथी सत्य मधुर वाणी यह सत्पुरुषोंके घरसे कदाचित् भी नष्ट नहीं होतीहैं ॥ १८२ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ६६ )
स्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतुः । पादशौचेन पितर अर्घाच्छम्भुस्तथातिथिः ॥ १८३ ॥
आइये ऐसा कहनेसे अग्नि, आसनसे इन्द्र, चरणधोनेसे पितर और अतिथिके अर्घ देनेसे शिवजी प्रसन्न होजातेहैं ॥ १८३ ॥
कौलिकोऽपि तच्छ्रुत्वा भार्यामाह—"प्रिये ! गच्छ त्वमतिथिमादाय गृहं प्रति । पादशौचभोजनशयनादिभिः सत्कृत्य त्वं तत्रैव तिष्ठ । अहं तव कृते प्रभूतं मद्यमानेष्यामि" । एवमुक्त्वा प्रस्थितः। सापि भार्या पुंश्चली तमादाय प्रहसितवदना देवदत्तं मनसि ध्यायन्ती गृहं प्रति प्रतस्थे । अथवा साधु चेदमुच्यते—
कौलिकभी यह वचन सुन अपनी स्त्रीसे बोला—"हे प्रिये ! तू इस अतिथिको लेकर घर जा चरणधोना भोजन शयनादिसे सत्कार करके घरही रह, और मैं तेरे निमित्त बहुतसी मद्य लाताहूं" । यह कह चला । यह उसकी भार्या व्यभिचारिणी उसको ले हँसतीहुई देवदत्तका मनमे ध्यान करतीहुई घरको चली । अथवा सत्य कहाहै—
दुर्दिवसे घनतिमिरे दुःसञ्चरासु वनवीथिषु । पत्युर्विदेशगमने परमसुखं जघनचपलायाः ॥ १८४ ॥
मेघसे आच्छादित दिनमें, घन अन्धकारमे, जहा किसीका प्रवेश न हो ऐसी गलियोमे, पतिके विदेश जानेमें, चपलजंघा (रतिप्रिया) स्त्रियोंको परम सुख होताहै ॥ १८४ ॥
तथाच—
तैसेही—
पर्यङ्केष्वास्तरणं पतिमनुकूलं मनोहरं शयनम् । तृणमिव लघु मन्यन्ते कामिन्यश्चौर्यरतलुब्धाः ॥ १८५॥
पलंगपर सोना, पतिकी अनुकूलता, तथा मनोहर शयनको भी चौररातकी लालची स्त्रियें तृणकी समान लघु मानतीहैं ॥ १८५ ॥
५
( ६६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तथाच– आरभी–
केलिं प्रदहति लज्जा शृङ्गारोऽस्थीनि चाटवः कटवः। बन्धक्याः परितोषो न किञ्चिदिष्टं भवेत्पत्यौ ॥ १८६ ॥
कुल्टाओंको लज्जा पतिमें क्रीडा जलाती है, श्रृंगार अस्थी, मनोहर वचन कटु लगतेहैं, बहुत क्या कोईभी पतिमें इष्ट और परितोषता नहीं होती ॥१८६॥
कुलपतनं जनगर्हा बन्धनमपि जीवितव्यसन्देहम् । अङ्गीकरोति कुलटा सततं परपुरुषसंसक्ता ॥ १८७ ॥
कुलकी हीनता, मनुष्योंमें निन्दा, बन्धन, जीवनमें सन्देह यह सब परपुरुषमें मन लगानेवाली कुलटा स्वीकार करलेतीहैं ॥ १८७ ॥
अथ कौलिकभार्य्या गृहं गत्वा देवशर्मणे गतास्तकरणां भग्नाञ्च खट्वाँ समर्प्य इदमाह–"भो भगवन् ! यावदहं स्वसखीं ग्रामादभ्यागतां सम्भाव्य द्रुतमागच्छामि तावत्त्वया मद्गृहेऽप्रमत्तेन भाव्यम्" एवमभिधाय शृंगारविधिं विधाय यावद्देवदत्तमुद्दिश्य व्रजति तावत् तद्भर्त्ता सन्मुखो मदविह्वलांगो मुक्तकेशः पदे पदे प्रस्खलन् गृहीतमद्यभाण्डः समभ्येति । तञ्च दृष्ट्वा सा द्रुततरं व्याघुट्य स्वगृहं प्रविश्य मुक्तशृंगारवेशा यथापूर्वमभवत् । कौलिकोऽपि तां पलायमानां कृताद्भुतशृंगारां विलोक्य प्रागेव कर्णपरम्परया तस्याः श्रुतापवादक्षुभितहृदयः स्वाकारं निगूहमानः सदैवास्ते । ततश्च तथाविधं चेष्टितमवलोक्य दृष्टप्रत्ययः क्रोधवशगो गृहं प्रविश्य तामुवाच–"आः पापे ! पुंश्चलि ! क्व प्रस्थिताऽसि?"। सा प्रोवाच–"अहं त्वत्सकाशादागता न कुत्रचिदपि निर्गता । तत् कथं मद्यपानवशात् अप्रस्तुतं वदसि" अथवा साधु चेदमुच्यते–
तब कौलिककी स्त्री घर जाय देवशर्मा यतिको बिछौने रहित भग्न ( टूटी ) खाटको समर्पण कर बोली–"भगवन् ! जबतक ग्रामसे आई हुई अपनी सखीसे कुशल कहकर शीघ्र आऊं तबतक तुम हमारे घरमें सावधानतासे रहना" । यह
भाषाटीकासमेतम् । ( ६७ )
कह शृंगारकर जबतक देवदत्तके निकट चली कि, तबतक उसका भर्ता सामनेसे मदसे विह्वल शरीर बाल खोले पग पगपर गिरता हुआसा मद्यका बर्तन ग्रहणकरे हुए आया । उसको देख वह बहुत शीघ्र लौटकर तत्काल शृंगार उतार पूर्ववत् स्थित हुई । कौलिकभी उसे भागती हुई अद्भुत शृंगार किये देखकर प्रथम ही कर्णपरम्परासे उसकी निन्दासे क्षुभित हृदय हुआ अपने आकारको छिपाये हुए सदा स्थित रहताथा । उसकी इस प्रकारकी चेष्टाको देख उसवातका विश्वासकर क्रोधसे घरमे प्रवेश कर उससे बोला-"आः पापे व्यभिचारिणी ! कहा जाती है ?" वह बोली-"मैं तुम्हारे पाससे आकर कहींभी नहीं निकली, सो किसप्रकार मद्यपान करके अप्रस्तुत वचन बोलते हो" । अथवा सत्य कहा है-
वैकल्यं धरणीपातमयथोचितजल्पनम् ।
सन्निपातस्य चिह्नानि मद्यं सर्वाणि दर्शयेत् ॥ १८८ ॥
विक्वलता, धरणीपर गिरना, जो मनमे आये सो वकना, यह सन्निपातके चिन्ह मद्यंम सब स्थित रहते हैं ॥ १८८ ॥
करस्पन्दोऽम्बरत्यागस्तेजोहानिः सरागता ।
वारुणीसंगजावस्था भानुनाप्यनुभूयते ॥ १८९ ॥
हाथमें कंपकपी, वस्त्रत्याग, तेजहानि, रागता, यह वारुणीपानकी अवस्था सूर्यसे भी अनुभव कीजाती है, अन्यकी कौन कहे पश्चिम दिशामें अस्त होते समय सूर्यकी यही दशा होतो है ॥ १८९ ॥
सोऽपि तच्छ्रुत्वा प्रतिकूलवचनं वेशविपर्य्ययं च अवलोक्य तामाह—“पुंश्चलि ! चिरकालं श्रुतो मया तव अपवादः। तदद्य स्वयं सञ्जातप्रत्ययः तव यथोचितं निग्रहं करोमि” इति अभिधाय लगुडप्रहारैः तां जर्जरितदेहां विधाय स्थूणया सह दृढबन्धनन बद्धा सोऽपि मदविह्वलो निद्रावशमगमत्। अत्रान्तरे तस्याः सखी नापिती कौलिकं निद्रावशगतं विज्ञाय तां गत्वा इदमाह—“सखि ! स देवदत्तः तस्मिन् स्थाने त्वां प्रतीक्षते तच्छीघ्रमागम्यताम्॥” इति। सा च आह-‘पश्य मम अवस्थाम्। तत्कथं गच्छामि ? तद्गत्वा
( ६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
ब्रूहि तं कामिनं यदस्यां रात्रौ न त्वया सह समागमः” । नापिती प्राह-“सखि । मामैवं वद । न अयं कुलटाधर्मः । उक्तञ्च-
वहभी यह वचन सुन प्रतिकूल वचन और बालोंका बिखरना देख उससे बोला-“पुंश्चलि ! बहुत दिनोंमें मैंने तेरा अपवाद सुनरखा है, सो आजदिन स्वयं देखकर विश्वास आगया है अब तेरा यथोचित दण्ड करता हूं,” वह कह लकडीके प्रहारसे उसकी जर्जरित देह ( चूर्ण ) करके स्तम्भमें दृढ बांधकर मदविह्वल हो निद्राके वशीभूत हुआ, इसी समय उसकी सखी नायन कौलिकको निद्राके वशीभूत हुआ जानकर जाकर उससे यों बोली--“सखी देवदत्त उस स्थानमे तेरी बाट देख रहा है सो शीघ्र जाओ” वह बोली-, “मेरी अवस्था तो देख भला मै कैसे जासक्ती हूं ? सो तूही जाकर उस कामीसे कह आजकीरात तुम्हारे सग समागम न होगा” नायन बोली--“सखी ऐसा मत कह, यह कुलटाओंका धर्म नहीं है । कहा है-
विषमस्थस्वादुफलग्रहणव्यवसायनिश्चयो येषाम् । उष्ट्राणामिव तेषां मन्येऽहं शंसितं जन्म ॥ १९० ॥
कठिन स्थानमें स्थित स्वादु फलके ग्रहण करनेका जिनका निश्चय है उन्हीका जन्म मैं ऊंटोंकी समान प्रशंसित मानती हूं ॥ १९० ॥
तथाच-
तैसेही-
सन्दिग्धे परलोके जनापवादे च जगति बहुचित्रे । स्वाधीने पररमणे धन्यास्तारुण्यफलभाजः ॥ १९१ ॥
परलोकमें सन्देह है, जनापवाद चित्र विचित्र होता है, दूसरेसे रमण करना स्वाधीन है युवावस्थाके फल भोगनेवाली स्त्री धन्य हैं ॥ १९१ ॥
यदि भवति दैवयोगात्पुमान् विरूपोऽपि बन्धकीरहसि । न तु कृच्छ्रादपि भद्रं निजकान्तं सा भजत्येव ॥ १९२ ॥
औरभी यदि दैवयोगसे पुरुष कुरूपभी एकान्तमे प्राप्तहो तथापि वह कष्टको प्राप्त हुई सुन्दरभी अपने पतिका भजन नहीं करती है ॥ १९२ ॥
भाषाटीकासमेतम् ! ( ६९ )
सा अब्रवीत्—"यदि एवं तर्हि कथय कथं दृढबन्धनबद्धा सती तत्र गच्छामि ? सन्निहितश्चायं पापात्मा मत्पतिः"। नापिती आह—"सखि ! मदविह्वलोऽयं सूर्य्यकरस्पृष्टः प्रबोधं यास्यति । तदहं त्वामुन्मोचयामि । मामात्मस्थाने बद्धा द्रुततरं देवदत्तं सम्भाव्य आगच्छ" । सा अब्रवीत्—"एवमस्तु" इति । तदनु सा नापिती तां स्वसखीं बन्धनाद्विमोच्य तस्याः स्थाने यथापूर्वमात्मानं बद्ध्वा तां देवदत्तसकाशे सङ्केतस्थानं प्रेषितवती । तथानुष्ठिते कौलिकः कस्मिंश्चित्क्षणे समुत्थाय किञ्चिद्गतकोपो विमदस्तामाह,—"हे परुषवादिनि ! यदि अद्यप्रभृति गृहान्निष्क्रमणं न करोषि न च परुषं वदसि ततः त्वामुन्मोचयामि" । नापिती अपि स्वरभेदभयात् यावन्न किञ्चित् ऊचे तावत् सोऽपि भूयोभूयस्तां तदेव आह । अथ सा यावत् प्रत्युत्तरं किमपि न ददौ तावत् स प्रकुपितस्तीक्ष्णशस्त्रमादाय नासिकामच्छिनत् आह च—"रे पुंश्चलि ! तिष्ठ इदानीं न त्वां भूयस्तोषयिष्यामि" इति जल्पन् पुनरपि निद्रावशमगमत् । देवशर्मा अपि वित्तनाशात् क्षुत्क्षामकण्ठो नष्टनिद्रस्तत्सर्वं स्त्रीचरित्रमपश्यत् । सापि कौलिकभार्य्या यथेच्छया देवदत्तेन सह सुरतसुखमनुभूय कस्मिंश्चित् क्षणे स्वगृहमागत्य तां नापितीमिदमाह—"अयि ! शिवं भवत्याः । नायं पापात्मा मम गताया उत्थितः?" । नापिती आह—"शिवं नासिकया विना शेषस्य शरीरस्य । तद् द्रुतं मां मोचय बन्धनात्, यावन्नायं मां पश्यति येन स्वगृहं गच्छामि" । तथा अनुष्ठिते भूयोऽपि कौलिक उत्थाय तामाह—"पुंश्चलि ! किमद्यापि न वदसि । किं भूयोऽप्यतो दुष्टतरं निग्रहं कर्णच्छेदेन करोमि" । अथ सा सकोपं साक्षेपमिदमाह—"धिक् धिक् महामूढ ! को मां महासतीं धर्षयितुं व्यंगयितुं वा समर्थः । तत् शृण्वन्तु सर्वेऽपि लोकपालाः ।
( ७० ) पञ्चतन्त्रम् ।
वह बोली-“यदि ऐसा है बता किसप्रकारसे मैं दृढ बंधनमें बँधी हुई वहां जाऊं? और यह पापात्मा मेरा पति समीपमें है”। नायन बोली-“सखी ! मदसे विह्वल हुआ यह सूर्य निकलनेपर जागेगा । सो मैं तुझे खोले देतीहूं, मुझे अपने स्थानमें बाँधकर बहुत शीघ्र देवदत्तका मन मनाकर आ” वह बोली-“ऐसाही हो” तब यह नायन उस अपनी सखीको बन्धनसे खोल उसके स्थानमें यथापूर्व अपनी आत्माको बांधकर उसको देवदत्तके निकट संकेत स्थानमें भेजती हुई। ऐसा होनेपर कौलिक कुछ काल उपरान्त उठकर कुछगतकोप और मद उतरनेसे बोला-“हे कठोरवादिनि ! यदि आजसे लेकर तू घरसे न निकले तो तुझे खोलदूं” नायनभी स्वरभेदके भयसे जबतक कुछ नहीं बोलती तबतक वहभी वारंवार उससे यही कहने लगा और जब उसने कुछभी उत्तर नदिया तब वह क्रोधकर तीक्ष्ण छुरी लेकर उसकी नाक काटता हुआ और बोला-“कुलटा ! ठहर फिर नतुझको संतुष्ट करूंगा” यह कहकर सोगया। देवशर्माभी धनके नाशसे क्षुधासे शुष्ककंठ हुआ निद्रा रहित होकर यह सब स्त्रीचरित्र देखता रहा था, और वह कौलिकभार्या यथेच्छ देवदत्तके संग सुरतका सुख अनुभव कर कुछ काल उपरान्त घर आकर उस नायनसे बोली-“कहो तुम्हारे कुशल है ? अयि ! तुम्हारी कुशल है ? मेरे जानेपर यह पापात्मा उठा तो नहीं” नायन बोली-“नासिकाके बिना और सब शरीरमें कुशल है, सो शीघ्र मुझे बन्धनसे खोल जबतक यह मुझे न देखे जिससे मैं अपने घर चली जाऊं” ऐसा करनेपर फिरभी कौलिक उठकर बोला-“पुंश्चलि ! क्या अबभी नहीं, बोलती क्या अब फिर कठिन दण्ड कर्णछेदनका तुझको करूं”। तब वह क्रोध और आक्षेपके सहित यह बोली,-“धिक् धिक् महामूढ ! कौन मुझ महासतीको धर्षण करनेका अथवा व्यंग ( शरीरछेदन ) करनेको समर्थ है। सो सब लोकपाल सुनें-
आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च
द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च ।
अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये
धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ १९३ ॥
सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिनरात, दोनों संध्या और धर्म मनुष्यका वृत्त जानते हैं ॥ १९३ ॥
भाषाटीकासमेतम्। ( ७१ )
तद्यदि मम सतीत्वमस्ति मनसापि परपुरुषो नाभिलषितः ततो देवा भूयोऽपि मे नासिकां तादृग्रूपामक्षतां कुर्वन्तु । अथवा यदि मम चित्ते परपुरुषस्य भ्रान्तिरपि भवति मां भस्मसान्नयन्तु” । एवमुक्त्वा भूयोऽपि तमाह–“भो दुरात्मन् ! पश्य मे सतीत्वप्रभावेण तादृशी एव नासिका संवृत्ता” । अथ असा उल्मुकमादाय यावत्पश्यति तावत् तद्रूपां नासिकाञ्च भूतले रक्तप्रवाहञ्च महान्तमपश्यत् । अथ स विस्मितमनास्तां बन्धनाद्विमुच्य शय्यायामारोप्य च चाटुशतैः पर्य्यतोषयत् । देवशर्मा अपि तं सर्ववृत्तान्तमालोक्य विस्मितमना इदमाह–
सो यदि मेरा सतीत्व है और मनसेभी परपुरुषका अभिलाष नहीं कियाहै तो देवता फिरभी मेरी नासिकाको उसी प्रकारकी अक्षत करदें । अथवा यदि मेरे चित्तमें परपुरुषकी भ्रान्तिभी हो तो मुझको भस्म करदें”। यह कह फिर उससे बोली,–“भो दुरात्मन् ! देख मेरे सतीत्वके प्रभावसे फिर वैसीही नासिका होगई” तब यह दीपक लेकर देखनेलगा तो उसी प्रकारकी उसकी नासिका और पृथ्वीमें रक्तप्रवाह बहुत देखता भया। तब यह विस्मितमन होकर उस बन्धनसे खोल शय्यामें आरोपणकर सैकडों मनोहर वचनोंसे उसको सन्तुष्ट करताहुआ । देवशर्माभी इस सब वृत्तान्तको देखकर विस्मयको प्राप्त होकर यह बोला–
“शम्बरस्य च या माया या माघा नमुचेरपि । बलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ॥ १९४ ॥
“जो शम्बरकी मायाहै, जो नमुचिकी मायाहै, बलि और कुम्भीनसकी जो मायाहै वे सब माया स्त्रियें जानतीहैं ॥ १९४ ॥
हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्त्यपि । अप्रियं प्रियवाक्यैश्च गृह्णन्ति कालयोगतः ॥ १९५ ॥
यह हँसते हुएके साथ हँसती, रोते हुएके साथ रोतीं, समय योगसे अनुरक्त जनको प्रियवचनोंसे ग्रहण करती हैं ॥ १९५ ॥
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः । स्त्रीबुद्ध्या न विशिष्येत तस्माद्रक्ष्याः कथं हि ताः ॥१९६॥
( ७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जो शास्त्र शुक्र जानताहै और जो शास्त्र बृहस्पति जानता है वह स्त्रीकी बुद्धिमें कुछ विशेष नहीं है इस कारण उन स्त्रियोंकी कैसे रक्षा हो ॥ १९६ ॥
अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम् । इति यास्ताः कथं धीरैः संरक्ष्याः पुरुषैरिह ॥ १९७ ॥
जो असत्यको सत्य और सत्यको असत्य कहती हैं धीर पुरुष इस संसारमें उनकी किस प्रकार रक्षा कर सकतेहैं ॥ १९७ ॥
अन्यत्रापि उक्तम्- और स्थानमे भी कहाहै-
नातिप्रसंगः प्रमदासु कार्यो नेच्छेद्बलं स्त्रीषु विवर्द्धमानम् । अतिप्रसक्तैः पुरुषैर्युतास्ताः क्रीडन्ति काकैरिव लूनपक्षैः १९८
स्त्रियोंमे अतिप्रसगन करे और उनका बल बढने नदे कारण अति आसक्त हुए पुरुषोंसे वह पंखनुचे कौओंकी समान क्रीडा करती हैं ॥ १९८ ॥
सुमुखेन वदन्ति वल्गुना प्रहरन्त्येव शितेन चेतसा । मधु तिष्ठति वाचि योषितां हृदये हालहलं महद्विषम् १९९
सुन्दर मुखसे मनोहर बोलतीहैं, तीक्ष्ण चित्तसे प्रहार करती हैं स्त्रियोंके वचनमें मधु और हृदयमें हलाहल विष रहताहै ॥ १९९ ॥
अतएव निपीयतेऽधरो हृदयं मुष्टिभिरेव ताड्यते । पुरुषैः सुखलेशवञ्चितैर्मधुलुब्धैः कमलं यथालिभिः २००॥
इसी कारण उनके अधर पिये जातेहैं और हृदय मुष्टियोंसे ताडन किया जाता है, सुखलेशसे वञ्चित हुए पुरुषोंसे, मधुसे लुब्ध हुए भौरों द्वारा कमलकी समान ( भोग किया जाता है ) ॥ २०० ॥
अपिच- और भी कहतेहै-
आवर्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साहसानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतगृहं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् । दुर्ग्राह्यं यन्महद्भिर्नरवरवृषभैः सर्वमायाकरण्डं स्त्रीयन्त्रं केन लोके विषममृतयुतं धर्मनाशाय सृष्टम् २०१॥
भाषाटीकासमेतम् । (७३)
संदेहोका आवर्त (भौर), अविनयका घर, साहसका पत्तन (नगर), दोषोंका स्थान, कपटका शतगृह, अविश्वासका क्षेत्र, बडे नरपुरुषोंसे ग्रहण करनेको असमर्थ, सब मायाकी पोटली स्त्रीरूपी यंत्र जो विष और अमृतसे युक्त है सो धर्म नाशके लिये किसने निर्माण की है ? ॥ २०१ ॥
कार्कश्यं स्तनयोर्दृशोस्तरलतालीकं मुखे दृश्यते कौटिल्यं कचसञ्चये प्रवचने मान्द्यान्नितम्बे स्थूलता । भीरुत्वं हृदये सदैव कथितं मायाप्रयोगः प्रिये यासां दोषगणो गुणो मृगदृशां ताः किं नराणां प्रियाः ॥ २०२ ॥
स्तनोंमें कठिनता, नेत्रोंमें चंचलता, मुखमें असत्य, बालसमूहमें कुटिलता, वचनमें मधुरता, नितम्बोंमे स्थूलता, हृदयमें भय, स्वामीमें मायापूर्वक वचनोंका कहना, इस प्रकारके जिनके दोष गुणनामसे ग्रहण किये जाते हैं, क्या वह मनुष्योंकी प्रिया हैं ? अर्थात् नहीं हैं ॥ २०२ ॥
एता हसन्ति च रुदन्ति च कार्यहेतो- र्विश्वासयन्ति च परं न च विश्वसन्ति । तस्मान्नरेण कुलशीलवता सदैव नार्य्यः श्मशानवटिका इव वर्जनीयाः ॥ २०३ ॥
यह कार्यके निमित्त हँसती और रोती हैं, विश्वास करकेभी यह विश्वासको प्राप्त नहीं होती हैं इसकारण कुलशीलवाले मनुष्यको श्मशानके वटवृक्षकी समान सदा स्त्रियें वर्जनीय हैं ॥ २०३ ॥
व्याकीर्णकेशरकरालमुखा मृगेन्द्रा नागाश्च भूरिमदराजिविराजमानाः । मेधाविनश्च पुरुषाः समरेषु शूराः स्त्रीसन्निधौ परमकापुरुषा भवन्ति ॥ २०४ ॥
बिखरे हुए गरदनके बालोंसे करालमुखसिंह, अत्यन्त मदसमूहसे विराज-मानहाथी तथा बुद्धिमान् समरशूर, पुरुष भी स्त्रीके निकट परम कायर होजाते हैं ॥ २०४ ॥
कुर्वन्ति तावत्प्रथमं प्रियाणि यावन्न जानन्ति नरं प्रसक्तम् ।
( ७ ) पञ्चतन्त्रम् ।
ज्ञात्वा च तं मन्मथपाशबद्धं
ग्रस्तामिषं मीनमिवोद्धरन्ति ॥ २०५ ॥
जबतक यह मनुष्यको प्रसक्त नहीं जानती तबतक प्रिय करतीहैं और पीछे उसे कामके वशीभूत जानकर मांस ग्रहण करनेवाली मछलीकी समान उठा-लेती हैं ॥ २०५ ॥
समुद्रवीचीव चलस्वभावाः
सन्ध्याभ्ररेखेव मुहूर्त्तंरागाः ।
स्त्रियः कृतार्थाः पुरुषं निरर्थं
निष्पीडितालक्तकवत्त्यजन्ति ॥ २०६ ॥
समुद्रकी तरंगोंकी समान चंचल स्वभाव संध्याकालके मेघरेखाकी समान मुहूर्त्तमात्रको रागवाली स्त्रिये सिद्धकाम होकर निर्धन पुरुषको निचोडे महावरकी समान त्याग देती हैं ॥ २०६ ॥
अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता ।
अशौचं निर्दयत्वञ्च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥ २०७ ॥
झूंठ, साहस, माया, मूर्खत्व, अतिलोभ, अपवित्रता, निर्दयता यह स्त्रियोंके स्वाभाविक दोषहैं ॥ २०७ ॥
सम्मोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति
निर्भर्त्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति ।
एताः प्रविश्य सरलं हृदयं नराणां
किं वा न वामनयना न समाचरन्ति ॥ २०८ ॥
मोहित करती, मदकरती, प्रसन्न करती, वंचित करती, घुडकती, रमती और विषादित करती हैं, बहुत क्या यह कुटिल नेत्रवाली पुरुषोंके सरल हृदयोंमें प्रवेश करके क्या क्या नहीं करती हैं ॥ २०८ ॥
अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः ।
गुञ्जाफलसमाकारा योषितः केन निर्मिताः ॥ २०९ ॥”
यह भीतरसे विषममय और बाहरसे मनोरम, चोंटलीके फलकी समान स्त्रियें किसने निर्मित की हैं ? ॥ २०९ ॥”
एवं चिन्तयतस्तस्य परिव्राजकस्य सा निशा महता कृच्छ्रेण अतिचक्राम। सा च दूतिका छिन्ननासिका स्वगृहं गत्वा
भाषाटीकासमेतम् । ( ७५ )
चिन्तयामास । “किमिदानीं कर्तव्यम् । कथमेतत् महच्छिद्रं स्थगयितव्यम्” । अथ तस्या एवं विचिन्तयन्त्या भर्त्ता कार्य्यवशाद्राजकुले पर्युषितः प्रत्यूषे च स्वगृहमभ्युपेत्य द्वारदेशस्थः विविधपौरकृत्योत्सुकतया तामाह-“भद्रे ! शीघ्रformानीयतां क्षुरभाण्डं येन क्षौरकर्मकरणाय गच्छामि”। सापि छिन्ननासिका गृहमध्यस्थितैव कार्य्यकरणापेक्षया क्षुरभाण्डात्क्षुरमेकं समाकृष्य तस्य अभिमुखं प्रेषयामास । नापितोऽपि उत्सुकतया तमेकं क्षुरमवलोक्य कोपाविष्टः सन् तदभिमुखमेव तं क्षुरं प्राहिणोत् । एतस्मिन्नन्तरे सा दुष्टा उर्द्ध्वबाहू विधाय फूत्कर्त्तुमना गृहात् निष्चक्राम । “अहो ! पापेन अनेन मम सदाचारवर्त्तिन्याः पश्यत नासिकाच्छेदो विहितः। तत्परित्रायतां परित्रायताम्” । अत्र अन्तरे राजपुरुषाः समभ्येत्य तं नापितं लगुडप्रहारैर्जर्जरीकृत्य दृढबन्धनैर्बद्धा तया छिन्ननासिकया सह धर्माधिकरणस्थानं नीत्वा सभ्यान् ऊचुः-“शृण्वन्तु भवन्तः सभासदः । अनेन नापितेन अपराधं विना स्त्रीरत्नमेतद्व्यङ्गितं तदस्य यत् युज्यते तत् क्रियताम्” । इति अभिहिते सभ्या ऊचुः-“रे नापित ! किमर्थं त्वया भार्य्या व्यङ्गिता । किमनया परपुरुषोऽभिलषितः, उत स्वित् प्राणद्रोहः कृतः, किंवा चौर्य्यकर्म आचरितम् । तत् कथ्यतामस्या अपराधः?” । नापितोऽपि प्रहारपीडिततनुर्वक्तुं न शशाक । अथ तं तूष्णींभूतं दृष्ट्वा पुनः सभ्या ऊचुः-“अहो ! सत्यमेतत् राजपुरुषाणां वचः पापात्मा अयम् । अनेन इयं निर्दोषा वराकी दूषिता । उक्तञ्च-
यह विचार करते उस सन्यासीको वह रात बडे कष्टसे बीती और वह नाककटी दूती अपने घर जाकर विचार करने लगी कि, “अब मैं क्या करूं । किस प्रकार यह महाछिद्र छिपाना चाहिये” । उसके यह विचार करतेही उसका स्वामी किसी कार्यके वशसे राजकुलमें रहाहुआ प्रातःकाल निज घरमें आकर द्वारपर स्थित हुआही बहुतसे नगरवासियोंके कार्यकी उत्कठासे उससे बोला-
( ७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
"भद्रे ! शीघ्र क्षुरभाण्ड (किस्वत) ला जिससे कि, क्षौरकर्म (हजामत) बनानेको जाऊं" । वहभी नाककटी अपने घरमेंसेही बहुत कार्य करनेकी व्याजतासे किसबतमेंसे एक उसतरा निकाल उसके निकट भेजती भई, इधर नापितनेभी उत्कंठासे एक क्षुरको देख क्रोधकर उसके सम्मुख उस क्षुरको फेंकदिया । इसी अवसरमें वह दुष्टा ऊपरको भुजा उठाकर स्वास लेती (हाय हाय) करती घरसे निकली, "अहो ! इस नाईने मुझ सदाचारमें रहनेवालीकी नाक काटदी, सो रक्षा करो रक्षा करो" । उसी अवसरमें राजपुरुष आकर उस नाईको डंडोंसे ताड़ितकर दृढ बंधनसे बांध उस छिन्ननासिकाके सहित धर्माधिकारीके स्थान (कचहरी) में लेजाकर वहांके सभ्योंसे बोले-"हे सभासदों ! सुनो । इस नाईने अपराधके विनाही इस स्त्रीरत्नका अंगभंग किया, सो जो कुछ इसका करना हो करो" । यह कहनेपर सभ्य बोले-"हे नाई ! क्यों तैने इस स्त्रीको व्यंगित किया ? क्या इसने परपुरुषकी अभिलाषा की । या प्राणद्रोह किया । या चोरी की । सो इसका अपराध कहो ?" । नाईभी प्रहारसे पीड़ित शरीर होनेके कारण कुछ न कहसका । उसको चुप देखकर सभ्य बोले-"अहो यह राजपुरुषोंका वचन सत्यहै । यह पापात्मा है इसने इस विचारी निर्दोषीको दूषित कियाहै । कहाहै-
भिन्नस्वरमुखवर्णः शङ्कितदृष्टिः समुत्पतिततेजाः । भवति हि पापं कृत्वा स्वकर्मसन्त्रासितः पुरुषः ॥ २१० ॥
और प्रकारका स्वर, मुखका अन्य वर्ण, संदिग्ध दृष्टि, उत्तपतित तेज (नष्टश्री) यह वस्तु पापकरके अपने कर्मसे सन्तापित पुरुषोंको होतीहैं ॥ २१० ॥
तथाच- और देखो-
आयाति स्खलितैः पादैर्मुखवैवर्ण्यसंयुतः । ललाटस्वेदभाक् भूरि गद्गदं भाषते वचः ॥ २११ ॥
स्खलित चरणोसे आताहै, मुखमें विवर्ण होताहै, माथेपर पसीना, और बोलनेमें गडबड़ ॥ २११ ॥
अधोदृष्टिर्भवेत्कृत्वा पापं प्राप्तः सभां नरः । तस्माद्यत्नात्परिज्ञेयश्चिह्नैरैतैर्विचक्षणैः ॥ २१२ ॥
पाप करके यदि मनुष्य सभामें आवे ता उसकी अधोदृष्टि होती है इसकारण इन चिन्होंसे मनुष्य यत्नसे इनको पहचाने ॥ २१२ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ७७ )
अन्यच्च-
और भी-
प्रसन्नवदनो दृष्टः स्पष्टवाक्यः सरोषदृक् ।
सभायां वक्ति सामर्षं सावष्टम्भो नरः शुचिः ॥ २१३ ॥
प्रसन्नवदन, दृष्टता, स्पष्टवचन बोलनेवाला, क्रोधदृष्टि, धैर्यतासे सभाके बीचमे पवित्र मनुष्य क्रोधसे बोलताहै ॥ २१३ ॥
तदेष दुष्टचरित्रलक्षणो दृश्यते । स्त्रीधर्षणात् वध्य इति । तच्छूलमारोप्यताम्” इति । अथ वध्यस्थाने नीयमानं तमवलोक्य देवशर्मा तान् धर्माधिकृतान् गत्वा प्रोवाच-“भोः ! भोः ! अन्यायेन एष वराको वध्यते । नापितः साधुसमाचार एषः। तत् श्रूयतां मे वाक्यम् । “जम्बूको हुड्डयुद्धेन” इति। अथ ते सभ्या ऊचुः-“भो भगवन् ! कथमेतत् ?” । ततो देवशर्मा तेषां त्रयाणामपि वृत्तान्तं विस्तरेण अकथयत । तदाकर्ण्य सुविस्मितमनसस्ते नापितं विमोच्य मिथः प्रोचुः-“अहो !
सो यह दुष्टचरित्रलक्षणवाला दीखताहै, स्त्रीके धर्षणसे वध्यहै सो इसको शूलपर अरोपण करो”। तब वध्यस्थानमें लेजाते हुए इसको देख देवशर्मा उन अधिकारियोंके पास जाकर बोला-“भो ! भो ! अन्यायसे यह बिचारा मारा जाताहै, यह नाई तो श्रेष्ठ आचारवालाहै, सो मेरा वाक्य श्रवण करो-“जम्बुक हुड्डयुद्धसे” इत्यादि। तब वे सभ्य बोले- “भगवन् ! यह क्या बातहै ?” । तब देवशर्मा उन तीनोंके वृत्तान्तको विस्तारसे कहता भया । यह वचन सुन वे सब विस्मयको प्राप्तहो नाईको छोडकर परस्पर कहने लगे “अहो !
अवध्यो ब्राह्मणो बालः स्त्री तपस्वी च रोगभाक् ।
विहिता व्यंगिता तेषामपराधे महत्यपि ॥ २१४ ॥
ब्राह्मण, बालक, स्त्री, तपस्वी, रोगी यह अवध्यहैं, यदि इनका कोई वडा अपराध हो तोभी कोई अङ्ग विकल करदेना उचितहै ॥ २१४ ॥
तदस्या नासिकाच्छेदः स्वकर्मणा हि संवृत्तः । ततो राजनिग्रहस्तु कर्णच्छेदः कार्यः”। तथानुष्ठिते देवशर्मापि वित्त-
( ७८ ) पंचतन्त्रम् ।
नाशसमुद्भूतशोकरहितः पुनरपि स्वकीयं मठायतनं जगाम । अतोऽहं ब्रवीमि- "जम्बूको हुडुयुद्धेन" इति ।
सो इसका नासिकाच्छेद तो इसके कर्मसेही होगयाहै। अब राजनिग्रह कर्णच्छेद करना”। ऐसा होनेपर देवशर्माभी अपने धननाशके शोकसे रहित हो अपने मठमें आया, इससे मैं कहताहूं- "जम्बुक हुडुयुद्धसे" इत्यादि ।
करटक आह- "एवंविधे व्यतिकरे किं कर्त्तव्यमावयोः" । दमनकोऽब्रवीत्- "एवंविधेऽपि समये मम बुद्धिस्फुरणं भविष्यति, येन सञ्जीवकं प्रभोर्विश्लेषयिष्यामि । उक्तञ्च-
करटक बोला- "इस प्रकारकी अवस्थामें हम दोनोंको क्या करना चाहिय" । दमनक बोला- "इस प्रकारके समयमेंभी मेरी बुद्धि स्फुरित होगी, जिससे संजीवकको प्रभुसे पृथक् करसकूंगा । कहाहै-
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुरुक्तो धनुष्मता । बुद्धिर्बुद्धिमतः सृष्टा हन्ति राष्ट्रं सनायकम् ॥ २१५ ॥
धनुर्धारीके धनुषसे निकला हुआ बाण किसी एकको मारे या न मारे लेकिन बुद्धिमानकी बुद्धिसे किया कृत्य राजा सहित राज्यको नष्ट करताहै ॥ २१५ ॥
तदहं मायाप्रपञ्चेन गुप्तमाश्रित्य तं स्फोटयिष्यामि" । करटक आह- "भद्र ! यदि कथमपि तव मायाप्रवेशं पिङ्गलकः ज्ञास्यति सञ्जीवको वा तदा नूनं विघात एव" । सोऽब्रवीत्- "तात ! नैवं वद गूढबुद्धिभिरापत्काले विधुरेऽपि दैवे बुद्धिः प्रयोक्तव्या नोद्यमस्त्याज्यः कदाचित् घुणाक्षरन्यायेन बुद्धेः साम्राज्यं भवति । उक्तञ्च-
सो मैं मायाप्रपंचसे गुप्त आश्रय कर इनमें फूट करूं” करटक बोला- “भद्र ! यदि किसीप्रकार यह पिंगलक संजीवक तुम्हारी मायाका प्रवेश जान जायँ तो अवश्य नष्ट होना होगा ” वह बोला- "तात ! ऐसा मतकहो, महाबुद्धिमानोंको आपत्कालमें प्रारब्धके नष्ट होनेमेंभी बुद्धिका प्रयोग करना उचितहै, उद्यमका त्याग करना अच्छा नहीं है, कदाचित् घुणाक्षरन्यायसे बुद्धिद्वारा सुखसाम्राज्य प्राप्त होजाय । कहा भी है--
१ घुनके कुरेदनेसे जो अक्षर बनजाय ।
भाषाटीकासमेतम्। (७९)
त्याज्यं न धैर्य्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः । याते समुद्रेऽपि हि पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म्म एव ॥ २१६ ॥
दैवके बिगडनेमेभी धीरता त्यागन करनी नहीं चाहिये कारण कि, धैर्यसे कदाचित् स्थितिकी प्राप्ति होजाय समुद्रमे जहाज डूबनेपरभी पोत वणिक् उद्यम करनेकीही इच्छा करता है। (अर्थान्तरन्यासः) ॥ २१६ ॥
तथाच—
और देखो—
उद्योगिनं सततमत्र समेति लक्ष्मी- दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः ॥ २१७ ॥
उद्योगी पुरुषको निरन्तर लक्ष्मी मिलती है, प्रारब्ध देता है यह कायर कहते हैं, दैवको त्यागकर आत्मशक्तिसे पुरुषार्थ कर यत्न करनेपरभी यदि सिद्ध न हो तो किसका दोष है ॥ २१७ ॥
तदेवं ज्ञात्वा सुगूढबुद्धिप्रभावेण यथा तौ द्वौ अपि न ज्ञास्यतः तथा मिथो वियोजयिष्यामि । उक्तञ्च—
सो ऐसा जानकर अपनी बुद्धिके प्रभाव करके जैसे वह दोनों न जाने इस प्रकार उनको वियुक्त कर दूंगा । कहाभी है—
सुगुप्तस्यापि दम्भस्य ब्रह्माप्यन्तं न गच्छति ।
कौलिको विष्णुरूपेण राजकन्यां निषेवते ॥ २१८ ॥”
सम्यक् प्रकारसे छिपाये दम्भके अन्तको तो ब्रह्माभी नहीं जानसकता, इसी लिये एक कौलिक विष्णुके रूपसे राजकन्यासे रमताथा ॥ २१८ ॥”
करटक आह—“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्—
करटक बोला,—“यह कैसी कथा है ?” वह बोला—
( ८० ) पञ्चतन्त्रम् ।
कथा ५.
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने कौलिकरथकारौ मित्रे प्रतिवसतः स्म। तत्र च तौ बाल्यात् प्रभृति सहचारिणौ, परस्परमतीव स्नेहपरौ सदा एकस्थानविहारिणौ कालं नयतः। अथ कदाचित् तत्राधिष्ठाने कस्मिंश्चिद्देवायतने यात्रामहोत्सवः संवृत्तः। तत्र च नटनर्त्तकचारणसंकुले नानादेशागतजनावृते तौ सहचरौ भ्रमन्तौ, काञ्चिद्राजकन्यां करेणुकारूढां सर्वलक्षणसनाथां कञ्चुकिवर्षवरपरिवारितां देवतादर्शनार्थं समायातां दृष्टवन्तौ। अथासौ कौलिकस्तां दृष्ट्वा विषार्दित इव दुष्टग्रहगृहीत इव कामशरैः हन्यमानः सहसा भूतले निपपात । अथ तं तदवस्थमवलोक्य रथकारः तद्दुःखदुःखित आत्मपुरुषैस्तं समुत्क्षिप्य स्वगृहमानाययत् । तत्र च विविधैः शीतोपचारैः चिकित्सकोपादिष्टैः मन्त्रवादिभिरुपचर्यमाणश्चिरात्कथञ्चित्सचेतनो बभूव । ततो रथकारेण पृष्टः । “भो मित्र ! किमेवं त्वमकस्मात् विचेतनः सञ्जातः । तत्कथ्यतामात्मस्वरूपम् ?” । स आह,— “वयस्य ! यदि एवं तच्छृणु मे रहस्यं येन सर्वामात्मवेदनां ते वदामि यदि त्वं मां सुहृदं मन्यसे ततः काष्ठप्रदानेन प्रसादः क्रियतां, क्षम्यतां यद्वा किञ्चित्प्रणयातिरेकाद्युक्तं तव मयानुष्ठितम्” । सोऽपि तदाकर्ण्य बाष्पपिहितनयनः सगद्गदमुवाच— “वयस्य ! यत्किञ्चिद्दुःखकारणं तद्वद येन प्रतीकारः क्रियते यदि शक्यते कर्तुम् । उक्तञ्च—
किसी स्थानमें एक कौलिक और बढ़ई दो मित्र रहतेथे, वह बालकपनसे सहचारी थे; परस्पर अत्यन्त स्नेहवाले सदा एक स्थानमें रहते समय विचरतेथे, तब कभी उस स्थानमें किसी देवताके स्थानमें यात्राका महोत्सव हुआ । वहां नट नर्तक चारणसे युक्त अनेक अनेक देशोंसे आये मनुष्योंसे आवृत्त वह दोनों सहचर घूमते हुए किसी राजकन्याको हथिनीपर चढी सम्पूर्ण गहने पहरे अन्तःपुरके वृद्ध ब्राह्मण और नपुंसकोंसे युक्त देवताके दर्शन करनेके निमित्त आई
भाषाटीकासमेतम् । (८१)
हुईको देखते भये, तब यह कौलिक उसको देखकर विषसे अर्दित हुएकी समान दुष्टग्रहसे गृहीत हुआसा कामबाणसे ताड़ितकी समान सहसा पृथ्वीमे गिरा । उसकी यह दशा देखकर रथकार उसके दुःखसे दुःखी हुआ, अपने मनुष्योंसे उसको उठवाय अपने घरमें लाया । वहा अनेक प्रकारके शीतल उपचार वैद्योंके किये हुए तथा मंत्रादिसे उपचारको प्राप्त हुआ बहुतकालमे कुछ सचेत भया । तब रथकारने पूंछा-"मित्र ! यह क्या हे जो तुम अकस्मात् अचेतन होगये अपनी बात तो कहो ?" । वह बोला,-"मित्र ! जो ऐसा हे तो मेरी गुप्तवार्ता सुनो, जिस कारण मै सब अपना दुःख तुझसे कहताहू । जो तू मुझे अपना सुहृदय मानता है तो चिता रचकर मेरे ऊपर कृपा करो । और क्षमा करना जो कुछ प्रणयके कारण तुमसे अयुक्त कहा होवे" । वहभी यह वचन सुन आखोंमे आंसू भर गद्गद-कण्ठसे बोला-"मित्र ! जो कुछ दु खका कारण हे, सो कहो जिससे यदि होसके-गा तो उसका प्रतिकार किया जायगा । कहा है-
औषधार्थसुमन्त्राणां बुद्धेश्चैव महात्मनाम् ।
असाध्यं नास्ति लोकेऽत्र यद्ब्रह्माण्डस्य मध्यगम् ॥२१९॥
इस संसार और ब्रह्माण्डके मध्यमें जो कुछभी है वह औषधी, अर्थ और सुमन्त्र तथा महात्माओंकी बुद्धिके सामने कुछ असाध्य नहीं है ॥२१९॥
तदेषां चतुर्णां यदि साध्यं भविष्यति तदा अहं साधयिष्यामि" । कौलिक आह- "वयस्य ! एतेषामन्येषामपि सहस्राणामुपायानामसाध्यं तत् मे दुःखम् । तस्मान्मम मरणे मा कालक्षेपं कुरु" । रथकार आह-"भो मित्र ! यद्यपि असाध्यं तथापि निवेदय येनाहमपि तदसाध्यं मत्वा त्वया सह वह्नौ प्रविशामि । न क्षणमपि त्वद्वियोगं सहिष्ये । एष मे निश्चयः" । कौलिक आह-"वयस्य ! याऽसौ राजकन्या करेणुकारूढा तत्र उत्सवे दृष्टा तस्या दर्शनानन्तरं मकरध्वजेन ममेयमवस्था विहिता । तन्न शक्नोमि तद्वेदनां सोढुम् । तथाचोक्तम् -
सो इन चारोमे यदि साध्य होगा तो मै साधन करूंगा" । कौलिक बोला,-
६
( ८२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
“मित्र ! इन चारोंमें अथवा अन्य सहस्रों उपायोंसेभी मेरा दुःख असाध्य है इस कारण मेरे मरणमें वृथा समयका बिताना मतकरो” । रथकार बोला- “मित्र ! यद्यपि असाध्य है, तथापि निवेदन तो कर जिससे मैंभी उसे असाध्य मानकर तेरे संग अग्निमें प्रवेश करूं क्षणमात्रको भी तुम्हारा वियोग न सहूंगा यह मेरा निश्चय है” । कौलिक बोला- “मित्र ! जो यह कन्या हथिनीपर चढी उस उत्सवमें देखीथी उसके दर्शन करतेही कामके कारण मेरी यह दशा हुई सो उसकी वेदना अब नहीं सही जाती । जैसा कहा भी है-
मत्तेभकुम्भपरिणाहिनि कुंकुमार्द्रे तस्याः पयोधरयुगे रतखेदखिन्नः । वक्षो निधाय भुजपञ्जरमध्यवर्ती स्वप्स्ये कदा क्षणमवाप्य तदीयसंगम् ॥ २२० ॥
मत्त हाथियोंके कुम्भकी समान परिणाहवाले केशरसे गीले उसके युगल स्तनोंको रतिके खेदसे खिन्न हुआ मैं भुजाओंके मध्यमें कर हृदयमें रख क्षण मात्रको उसके अंगसंगको प्राप्त होकर कब सोऊंगा ॥ २२० ॥
तथाच- तैसेही-
रागी बिम्बाधरोऽसौ स्तनकलशयुगं यौवनारूढगर्वं चीना नाभिः प्रकृत्या कुटिलकमलकं स्वल्पकञ्चापि मध्यम् । कुर्वन्त्येतानि नाम प्रसभमिह मनश्चिन्तितान्याशु खेदं यन्मां तस्याः कपोलौ दहत इति मुहुः स्वच्छकौ तन्न युक्तम् ”
लालवर्ण उसका कंदूरीकी समान अधर, कलशकी समान स्तन, गर्वको प्राप्त यौवन, गम्भीर नाभि, स्वभावसेही कुटिल बाल, पतली कमर इतनी वस्तु विचारतेही हठसे मनमें खेद उत्पन्न करतीही हैं और जो उसके स्वच्छ विमल कपोलको मैं वारंवार चिन्तन करताहूं वह जो मुझे जलाते हैं यह युक्त नहीं है ॥ २२१ ॥”
रथकारोऽपि एवं सकामं तद्वचनमाकर्ण्यः सस्मितमिदमाह- “वयस्य ! यदि एवं तर्हि दिष्ट्या सिद्धं नः प्रयोज-