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प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

द्विधाभक्ति जानन्तु तत्र बीजं हरिभक्त्या ज्ञानिनो ये स्युः। मूर्त्तं चैवामूर्त्तं द्वे एव ब्रह्मणो रूपे ॥१६९॥ इत्युपनिषत्तयोर्वा द्वौ भक्तौ भगवदुपदिष्टौ । क्लेशादक्लेशाद्वा मुक्तिः स्यादेतयोर्मध्ये ॥१७०॥ जो लोग हरि-भक्तिसे ज्ञानी हुए हैं, वे अपने ज्ञानका बीज (कारण) समझ लें। 'मूर्त्त (साकार) और अमूर्त्त (निराकार) दोनों ही ब्रह्मके रूप हैं'—ऐसा उपनिषद् कहते हैं; और भगवान्ने भी उन दोनों रूपोंके [ व्यक्तोपासक तथा अव्यक्तोपासक-भेदसे ] दो प्रकारके भक्त बताये हैं। इनमेंसे एक (अव्यक्तोपासक) को क्लेशसे और दूसरे (व्यक्तोपासक) को सुगमतासे मुक्ति मिलती है। स्थूला सूक्ष्मा चेति द्वेधा हरिभक्तिरुद्दिष्टा । प्रारम्भे स्थूला स्यात्सूक्ष्मा तस्याः सकाशाच्च॥१७१॥ भगवान्की भक्ति स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकारकी कही गयी है; उनमें पहले स्थूल-भक्ति होती है और फिर उसीमेंसे सूक्ष्म- भक्तिका उदय होता है। स्वाश्रमधर्माचरणं कृष्णप्रतिमार्चनोत्सवो नित्यम् । विविधोपचारकरणैर्हरिदासैः सङ्गमः शश्वत् ॥१७२॥ कृष्णकथासंश्रवणे महोत्सवः सत्यवादश्च । परयुवतौ द्रविणे वा परापवादे पराङ्मुखता ॥१७३॥ ४९

प्रबोधसुधाकर ग्राम्यकथासूद्वेगः सुतीर्थगमनेषु तात्पर्यम् । यदुपतिकथावियोगे व्यर्थं गतमायुरिति चिन्ता॥१७४॥ अपने वर्णाश्रम-धर्मोंका आचरण करना, नित्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रतिमाका उत्साहपूर्वक विविध सामग्रियोंसे पूजनो- त्सव करना, निरन्तर हरि-भक्तोंका संग करना, भगवत्कथाओंके सुननेमें अत्यन्त उत्साह रखना, सत्य भाषण करना तथा परस्त्री, परधन और परनिन्दासे दूर रहना, अश्लील बातोंसे घृणा करना, पुण्य-तीर्थ-स्थानोंमें जानेके लिये तत्पर रहना तथा 'भगवत्कथा- श्रवणादिके बिना यह आयु व्यर्थ ही बीत गयी'—ऐसी चिन्ता करना—ये सब स्थूल-भक्तिके लक्षण हैं । एवं कुर्वति भक्तिं कृष्णकथानुग्रहोत्पन्ना । समुदेति सूक्ष्मभक्तिर्यस्या हरिरन्तराविशति ॥१७५॥ इस प्रकार स्थूल-भक्तिका अभ्यास करते-करते भगवत्कथाके अनुग्रहसे सूक्ष्म-भक्तिका उदय होता है, जिसके भीतर भगवान्‌की उपलब्धि होती है । स्मृतिसत्पुराणवाक्यैर्यथाश्रुतायां हरेर्मूर्तौ । मानसपूजाभ्यासो विजननिवासेऽपि तात्पर्यम् ॥१७६॥ सत्यं समस्तजन्तुषु कृष्णस्यावस्थितेर्ज्ञानम् । अद्रोहो भूतगणे ततस्तु भूतानुकम्पा स्यात् ॥१७७॥ ५०

द्विधाभक्ति प्रमितयदृच्छालाभे सन्तुष्टिर्दारपुत्रादौ । ममताशून्यत्वमतो निरहङ्कारत्वमक्रोधः ॥१७८॥ मृदुभाषिता प्रसादो निजनिन्दायां स्तुतौ समता । सुखदुःखशीतलोष्णद्वन्द्वसहिष्णुत्वमापदो न भयम् ॥ निद्राहारविहारेष्वनादरः सङ्गराहित्यम् । वचने चानवकाशः कृष्णस्मरणेन शाश्वती शान्तिः ॥ केनापि गीयमाने हरिगीते वेणुनादे वा । आनन्दाविर्भावो युगपत्स्यादृष्टसात्त्विकोद्रेकः॥ [ उस सूक्ष्म-भक्तिके लक्षण ये हैं— ] स्मृति और पुराणोंके सद्वाक्योंसे सुनी हुई भगवान्‌की मूर्तिके मानस-पूजनका अभ्यास, एकान्त-सेवनमें तत्पर रहना, सत्य, समस्त प्राणियोंमें श्रीकृष्णचन्द्र- को वर्तमान जानना और सम्पूर्ण प्राणियोंसे अद्रोह । इन साधनोंसे समस्त प्राणियोंपर दया उत्पन्न हो जाती है । इनके सिवा प्रारब्धा- नुकूल स्वल्प लाभमें सन्तोष रखना, स्त्री और पुत्र आदिमें ममता- शून्य होना, अहङ्कार और क्रोधसे रहित होना, मृदु भाषण करना, प्रसन्न-चित्त रहना, अपनी निन्दा और स्तुतिमें समान रहना, सुख- दुःख और शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करना, आपत्तिसे भय न करना, निद्रा, आहार और विहारादिमें अनादर, अनासक्त रहना, व्यर्थ वार्तालापके लिये अवकाश न देना, श्रीकृष्ण-स्मरणसे ५१

प्रबोधसुधाकर निरन्तर शान्त-चित्त रहना तथा कोई भगवत्सम्बन्धी गीतका गान करे अथवा बाँसुरी बजावे तो एक ही समय आनन्दका आविर्भाव और सात्त्विक भावोंका प्रौढ़ उद्रेक हो जाना । तस्मिन्ननुभवति मनः प्रगृह्यमाणं परात्मसुखम्। स्थिरतां याते तस्मिन्याति मदोन्मत्तदन्तिदशाम्॥१८२॥ उस सत्त्वोद्रेकमें रोककर रक्खा हुआ मन परमात्मसुखका अनुभव करता है । फिर उस ( परमात्मसुख ) के स्थिर हो जानेपर चित्तकी अवस्था मतवाले हाथीके समान हो जाती है । जन्तुषु भगवद्भावं भगवति भूतानि पश्यति क्रमशः । एतादृशी दशा चेत्तदैव हरिदासवर्यः स्यात् ॥१८३॥ और वह क्रमशः समस्त प्राणियोंमें भगवान्‌को और भगवान्‌में समस्त प्राणियोंको देखने लगता है, यदि ऐसी अवस्था हो जाय तो वह तत्काल भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ हो जाता है । ध्यानविधि यमुनाटटनिकटस्थितवृन्दावनकानने महारम्ये । कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरि स्थाप्य ॥१८४॥ तिष्ठन्तं घननीलं स्वतेजसा भासयन्तमिह विश्वम् । पीताम्बरपरिधानं चन्दनकर्पूरलिप्तसर्वाङ्गम् ॥१८५॥ ५२

श्रीशंकराचे दोन बाल-कृष्ण

चित्र पूर्णतः रिक्त (सफेद) है, इसमें कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है।

ध्यानविधि आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमण्डितश्रवणम् । मन्दस्मितमुखकमलं सुकौस्तुभोदारमणिहारम्॥१८६॥ वलयाङ्गुलीयकाद्यानुज्ज्वलयन्तं स्वलङ्कारान् । गलविलुलितवनमालं स्वतेजसापास्तकलिकालम् १८७ गुञ्जारवालिकलितं गुञ्जापुञ्जान्विते शिरसि । भुञ्जानं सह गोपैः कुञ्जान्तरवर्तिनं हरिं स्मरत॥१८८॥ श्रीयमुनाजीके तटपर स्थित वृन्दावनके किसी महामनोहर उद्यानमें जो कल्पवृक्षके नीचे पृथिवीपर पाँवपर पाँव रखे बैठे हैं, जो मेघके समान श्यामवर्ण हैं, अपने तेजसे इस निखिल ब्रह्माण्ड- को प्रकाशित कर रहे हैं, सुन्दर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, समस्त शरीरमें कर्पूरमिश्रित चन्दनका लेप लगाये हुए हैं, जिनके कर्णपर्यन्त विशाल नेत्र हैं, कान कुण्डलके जोड़ेसे सुशोभित हैं, मुख-कमल मन्द-मन्द मुसका रहा है, तथा वक्षःस्थलमें कौस्तुभ- मणियुक्त सुन्दर हार है और जो [ अपनी कान्तिसे ] कङ्कण और अंगूठी आदि सुन्दर आभूषणोंकी भी शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनके गलेमें वनमाला लटक रही है और अपने तेजसे जिन्होंने कलिकालको परास्त कर दिया है तथा जिनका गुञ्जावलिविभूषित मस्तक गूँजते हुए भ्रमर-समूहसे सुशोभित है, किसी कुञ्जके भीतर बैठकर ग्वालबालोंके साथ भोजन करते हुए उन श्रीहरिका स्मरण करो । ५३

प्रबोधसुधाकर मन्दारपुष्पवासितमन्दानिलसेवितं परानन्दम् । मन्दाकिनीयुतपदं नमत महानन्ददं महापुरुषम् ॥ १८९ ॥ जो कल्पवृक्षके पुष्पोंकी गन्धसे युक्त मन्द-मन्द वायुसे सेवित हैं, परमानन्दस्वरूप हैं तथा जिनके चरण-कमलोंमें श्रीगंगाजी विराजमान हैं उन महानन्ददायक महापुरुषको नमस्कार करो । सुरभीकृतदिग्वलयं सुरभिशतैरावृतं सदा परितः । सुरभीतिक्षपणमहासुरभीमं यादवं नमत ॥ १९० ॥ जिन्होंने समस्त दिशाओंको सुगन्धित कर रक्खा है, जो चारों ओरसे सैकड़ों कामधेनु गौओंसे घिरे हुए हैं तथा देवताओंके भयको दूर करनेवाले और बड़े-बड़े राक्षसोंके लिये भयङ्कर हैं उन यदुनन्दनको नमस्कार करो । कन्दर्पकोटिसुभगं वाञ्छितफलदं दयार्णवं कृष्णम् । त्यक्त्वा कमन्यविषयं नेत्रयुगं द्रष्टुमुत्सहते ॥ १९१ ॥ जो करोड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर है, वाञ्छित फलके देने- वाले हैं, दयाके समुद्र हैं, उन श्रीकृष्णचन्द्रको छोड़कर ये नेत्र- युगल और किस विषयको देखनेके लिये उत्सुक होते हैं। पुण्यतमामतिसुरसां मनोऽभिरामां हरेः कथां त्यक्त्वा । श्रोतुं श्रवणद्वन्द्वं ग्राम्यकथामादरं वहति ॥ १९२॥ ५४

सगुण-निर्गुणकी एकता [ अहो ! खेदकी बात है कि ] अत्यन्त पवित्र, अति सुन्दर रसमयी और मनोहारिणी हरिकथाको छोड़कर ये कर्णयुगल अन्य ग्राम्य-वार्ताओंके सुननेमें श्रद्धा प्रकट करते हैं । दौर्भाग्यमिन्द्रियाणां कृष्णे विषये हि शाश्वतिके । क्षणिकेषु पापकरणेष्वपि सज्जन्ते यदन्यविषयेषु ॥ इन्द्रियोंका यह परम दुर्भाग्य ही है कि नित्य विद्यमान श्रीकृष्ण- रूप विषयके रहते हुए भी वे अन्य क्षणिक और पापमय विषयोंमें आसक्त हो जाती हैं । सगुण-निर्गुणकी एकता श्रुतिभिर्महापुराणैः सगुणगुणातीतयोरैक्यम् । यत्प्रोक्तं गूढतया तदहं वक्ष्येऽतिविशदार्थम् ॥१६४॥ श्रुतियों और महापुराणोंने जो सगुण और निर्गुणकी एकता गूढ़भावसे कही है, उसीको मैं स्पष्ट करके बतलाता हूँ । भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमयः सच्चिदानन्दः । प्रकृतेः परः परात्मा यदुकुलतिलकः स एवायम्॥१६५॥ जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृतिसे परे परमात्मा सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं यह यदुकुल-भूषण श्रीकृष्ण वही तो है । ५५

विषय हैं ।

प्रबोधसुधाकर ननु सगुणो दृश्यतनुस्तथैकदेशाधिवासश्च । स कथं भवेत्परात्मा प्राकृतवद्रागरोषयुतः ॥१६६॥ [ यदि कहो कि ] यह श्रीकृष्ण तो सगुण है, दृश्य शरीरधारी है, एकदेशी है तथा साधारण पुरुषोंके समान रागद्वेषयुक्त है; यह परमात्मा कैसे हो सकता है ? इतरे दृश्यपदार्था लक्ष्यन्तेऽनेन चक्षुषा सर्वे । भगवाननया दृष्ट्या न लक्ष्यते ज्ञानदृग्गम्यः ॥१६७॥ [ तो इस विषयमें यह विचारना चाहिये कि ] इन चर्म- चक्षुओंसे तो अन्य सब दृश्य-पदार्थ ही जाने जा सकते हैं, इनसे भगवान् दिखायी नहीं दे सकते; वे तो ज्ञान-दृष्टिके ही विषय हैं । यद्विश्वरूपदर्शनसमये पार्थाय दत्तवान्भगवान् । दिव्यं चक्षुस्तस्माददृश्यता युज्यते नृहरौ ॥१६८॥ भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखलाते समय अर्जुनको दिव्य- दृष्टि दी थी, इससे उन नररूप हरिकी अदृश्यता सिद्ध ही है; [ क्योंकि चर्म-चक्षुओंसे न देख सकनेके कारण ही तो उन्होंने अर्जुनको दिव्य-दृष्टि दी थी ] । साक्षाद्यथैकदेशे वर्तुलमुपलभ्यते रवेर्बिम्बम् । विश्वं प्रकाशयति तत्सर्वैः सर्वत्र दृश्यते युगपत् ॥ ५६

सगुण-निर्गुणकी एकता जिस प्रकार गोलाकार सूर्य-मण्डल साक्षात् एक देशमें ही दिखायी देता है, किन्तु वह सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करता है और सबको एक साथ ही सब जगह दीखता भी है । यद्यपि साकारोऽयं तथैकदेशी विभाति यदुनाथः । सर्वगतः सर्वात्मा तथाप्ययं सच्चिदानन्दः ॥२००॥ उसी प्रकार यदुनाथ श्रीकृष्णचन्द्र यद्यपि साकार हैं और एकदेशी-से दिखायो देते हैं तथापि वे सर्वव्यापी, सर्वात्मा और सच्चिदानन्दस्वरूप ही हैं । एको भगवानरेमे युगपद्गोपीष्वनेकासु । अथवा विदेहजनकश्रुतदेवभूदेवयोर्हरिर्युगपत्॥२०१॥ देखो, एक ही भगवान्‌ने एक साथ अनेक गोपियोंके साथ रमण किया तथा विदेह जनक और श्रुतदेव ब्राह्मण दोनोंके घरोंमें एक ही साथ आतिथ्य ग्रहण किया । अथवा कृष्णाकारां स्वचमूं दुर्योधनोऽपश्यत् । तस्माद्व्यापक आत्मा भगवान्हरिरीश्वरः कृष्णः॥२०२॥ इनके अतिरिक्त दुर्योधनने भी अपनी समस्त सेनाको श्रीकृष्णरूप ही देखा था । इससे विदित होता है कि श्रीकृष्णचन्द्र व्यापक आत्मा ईश्वर हरि ही हैं । ७७

प्रबोधसुधाकर वक्षसि यदा जघान श्रीवत्सः श्रीपतेः स किं द्वेष्यः । भक्तानामसुराणामन्येषां वा फलं सदृशम् ॥२०३॥ जब भृगुजीने भगवान्‌के वक्षःस्थलमें पाद-प्रहार किया था तो क्या वे उन श्रीपतिके द्वेष्य हो गये थे ? [ नहीं, उन्हें तो सभी समान हैं ] भक्त, असुर और अन्य पुरुषोंको भी वे एक-सा ही फल देते हैं । तस्मान्न कोऽपि शत्रुनों मित्रं नाप्युदासीनः । नृहरिः सन्मार्गस्थः सफलः शाखीव यदुनाथः॥२०४॥ इसलिये भगवान्‌का न कोई मित्र है, न शत्रु है और न उदासीन है । श्रीनृहरि तो सुन्दर मार्गपर लगे हुए एक फलयुक्त वृक्षके समान हैं । लोहशलाकानिवहैः स्पर्शाश्मनि भिद्यमानेऽपि । स्वर्णत्वमेति लौहं द्वेषादपि विद्विषां तथा प्राप्तिः॥२०५॥ पारसको यदि लोहेकी शलाकाओंसे भेदा भी जाय तो भी उनका लोहा सुवर्ण हो जाता है, इसी प्रकार शत्रुओंको द्वेषसे भी भगवान्‌की प्राप्ति हो जाती है । नन्वात्मनः सकाशादुत्पन्ना जीवसन्ततिश्रेयम् । जगतः प्रियतर आत्मा तत्प्रकृते नैव सम्भवति॥२०६॥ ५८

सगुण-निर्गुणकी एकता शंका—आत्मासे तो इन समस्त जीवोंकी उत्पत्ति हुई है और संसारमें सबसे अधिक प्रिय भी आत्मा ही है, किन्तु श्री- कृष्णचन्द्रमें यह बात नहीं मिल सकती । वत्साहरणावसरे पृथग्वयोरूपवासनाभूषान् । हरिरजमोहं कर्तुं स वत्सगोपान्विनिर्ममे स्वस्मात्॥२०७॥ समाधान—बछड़ोंको चुरा लेनेके समय ब्रह्माको मोहित करनेके लिये भगवान्‌ने पृथक्-पृथक् अवस्था, रूप, वासनाओं और भूषणोंसे युक्त गोप और बछड़ोंको अपने आपसे ही बना लिया था । अग्नेर्यथा स्फुलिङ्गाः क्षुद्रास्तु व्युच्चरन्तीति । श्रुत्यर्थं दर्शयितुं स्वतनोरतनोत्स जीवसन्दोहम्॥२०८॥ 'जिस प्रकार अग्निसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं उसी प्रकार आत्मासे विविध प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है'—इस श्रुतिके अर्थको सिद्ध करनेके लिये ही भगवान्‌ने अपने शरीरसे उस जीव-समूहको रचा था । यमुनातीरनिकुञ्जे कदाचिदपि वत्सकांश्च चारयति । कृष्णे तथार्यगोपेषु च वरगोष्ठेषु चारयत्स्वारात् ॥२०९॥ वत्सं निरीक्ष्य दूराद्गावः स्नेहेन सम्भ्रान्ताः । तदभिमुखं धावन्त्यः प्रययुर्गोपैश्च दुर्वाराः ॥२१०॥ ५९

प्रबोधसुधाकर एक दिन जब श्रीकृष्णचन्द्र यमुनाके तटपर एक कुञ्जमें बछड़ोंको चरा रहे थे और पास ही दूसरे गोष्ठमें वृद्ध गोपगण गौओंको चरा रहे थे तो गौएँ दूरसे ही अपने बछड़ोंको देखकर स्नेहसे व्याकुल हो उनकी ओर दौड़कर चलीं तथा गोपोंके बहुत कुछ रोकनेपर भी न रुक सकीं । प्रस्रवभरेण भूयः स्रुतस्तनाः प्राप्य पूर्ववद्वत्सान् । पृथुरसनया लिहन्त्यस्तर्णकवत्योऽप्यपाययन्प्रमुदा ॥ दूधके उमड़नेसे उनके स्तन पुनः-पुनः बहने लगे और जिनके नये बछड़ोंने जन्म ले लिया था उन्होंने भी उमङ्गमें भर- कर अपने बछड़ोंको पूर्ववत् लंबी-लंबी जीभोंसे चाटते हुए खूब दूध पिलाया । गोपा अपि निजबालाञ्जगृहुर्मूर्धानमाघ्राय । इत्थमलौकिकलाभस्तेषां तत्र क्षणं ववृधे ॥२१२॥ गोपोंने भी अपने-अपने बालकोंका सिर सूँघते हुए उन्हें उठा लिया । इस प्रकार उस समय एक क्षणके लिये वहाँ अलौकिक उत्साहकी वृद्धि हुई । गोपा वत्साश्चान्ये पूर्वं कृष्णात्मका ह्यभवन् । तेनात्मनः प्रियत्वं दर्शितमेतेषु कृष्णेन ॥२१३॥ ६०

सगुण-निर्गुणकी एकता ये सब ग्वालबाल और बछड़े पहले श्रीकृष्णरूप ही तो थे; इसलिये ऐसा करके श्रीकृष्णचन्द्रने इनमें अपनी प्रियतमताको दिखा दिया। प्रेयः पुत्राद्वित्तात्प्रेयोऽन्यस्माच्च सर्वस्मात् । अन्तरतरं यदात्मेत्युपनिषदः सत्यतामभिहिता॥२१४॥ उपनिषदोंने जो कहा है कि आत्मा पुत्रसे, वित्तसे तथा अन्य समस्त वस्तुओंसे भी प्रियतर और आन्तरिक है, उसको भगवान्‌ने सत्य करके दिखा दिया। नन्वूच्चावचभूतेष्वात्मा सम एव वर्ततेऽथ हरिः। दुर्योधनेऽर्जुने वा तरतमभावं कथं नु गतवान्सः।२१५। शंका—आत्मा तो ऊँच-नीच सभी प्राणियोंमें समान है, फिर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुन और दुर्योधन आदिमें विषमभाव क्यों किया ? बधिरान्धपङ्‌गुमूका दीर्घाः खर्वाः सरूपाश्च । सर्वे विधिना दृष्टाः सवत्सगोपाश्चतुर्भुजास्तेन ॥२१६॥ समाधान—ब्रह्माने वहरे, अन्धे, पङ्गु, मूक, छोटे, बड़े सभी वछड़ोंको और ग्वालोंको चतुर्भुजरूप ही देखा था। भूतसमत्वं नृहरेः समो हि मशकेन नागेन । लोकैः समस्त्रिभिर्वेत्युपनिषदा भाषितः साक्षात्।२१७। ६१

प्रबोधसुधाकर उपनिषदोंने भी मच्छरसे लेकर हाथीपर्यन्त त्रिलोकीके समस्त जीवोंमें भगवान्‌की समता साक्षात् बतायी है । आत्मा तावदभोक्ता तथैव ननु वासुदेवश्चेत् । नानाकैतव्यनैः पररमणीभिः कथं रमते ॥२१८॥ शंका—आत्मा तो अभोक्ता है; यदि वासुदेव भी साक्षात् आत्मा ही हैं तो उन्होंने नाना प्रकारके छल-छन्दोंसे पर-स्त्रियोंके साथ रमण क्यों किया ? सुन्दरमभिनवरूपं कृष्णं दृष्ट्वा विमोहिता गोप्यः । तमभिलषन्त्यो मनसा कामाद्विरहव्यथां प्रापुः ॥२१९॥ समाधान—उन अति मनोहर, अभिनवरूप श्रीकृष्णचन्द्र- को देखकर मोहित हुई गोपियाँ ही उनकी मन-ही-मन इच्छा करती थीं और [ उनके न मिलनेपर ] कामातुरा होकर अत्यन्त विरहाकुला हो जाती थीं । गच्छन्त्यस्तिष्ठन्त्यो गृहकृत्यपराश्च भुञ्जानाः । कृष्णं विनान्यविषयं समक्षमपि जातु नाविन्दन्।२२०। चलते-फिरते, उठते-बैठते, घरके कामोंको करते तथा भोजनादि करते हुए हर समय श्रीकृष्णचन्द्रके अतिरिक्त उन्हें सामने पड़ी हुई भी कोई वस्तु दिखायी नहीं देती थी । [ उन्हें सभी पदार्थ श्रीकृष्णमय प्रतोत होते थे । ] ६२

सगुण-निर्गुणकी एकता दुःसहविरहभ्रान्त्या स्वपतीन्ददृशुस्तरून्नरांश्च पशून् । हरिरयमिति सुप्रीताः सरभसमालिङ्गयाञ्चक्रुः॥२२१॥ दुःसह विरह-व्यथाके कारण उत्पन्न हुए भ्रमसे अपने पति, वृक्ष, मनुष्य और पशु आदिको भी 'ये हरि ही हैं' ऐसा जानकर वे प्रेमविभोर होकर अति वेगसे आलिङ्गन कर लेती थीं । कापि च कृष्णायन्ती कस्याश्चित्पूतनायन्त्याः । अपिबत्स्तनमिति साक्षाद्व्यासो नारायणः प्राह॥२२२॥ साक्षात् नारायण भगवान् व्यासने भी कहा है कि कोई गोपी कृष्ण बनकर पूतना बनी हुई दूसरी गोपीका स्तन-पान करती थी । तस्मान्निजनिजदयितान्कृष्णाकारान्व्रजस्त्रियो वीक्ष्य । स्वपरनृपतिपत्नीनामन्तर्यामी हरिः साक्षात् ॥२२३॥ अतः यह सिद्ध होता है कि व्रजबालाएँ अपने-अपने पतियोंको कृष्णरूप देखकर उन्हींको आलिङ्गन करती थीं और यह समझती थीं कि यह श्रीकृष्ण ही अपने-पराये समस्त मानव पति-पत्नियोंके साक्षात् अन्तर्यामी हैं । परमार्थतो विचारे गुडतन्मधुरत्वदृष्टान्तात् । नश्वरमपि नरदेहं परमात्माकारतां याति ॥२२४॥ ६३

प्रबोधसुधाकर वास्तवमें विचार किया जाय तो गुड़ और उसकी मधुरताके अभेदके समान यह नाशवान् मनुष्य-शरीर भी परमात्मारूप ही प्रतीत होगा। किं पुनरनन्तशक्तेर्लीलावपुरीश्वरस्येह । कर्माण्यलौकिकानि स्वमायया विदधतो नृहरेः॥२२५॥ फिर अपनी मायासे अलौकिक कर्म करनेवाले अनन्तशक्ति ईश्वर नृहरिके लीलामय शरीरकी तो बात ही क्या है ? मृद्भक्षणेन कुपितां विकसितवदनां स्वमातरं वक्त्रे । विश्वमदर्शयदखिलं किं पुनरथ विश्वरूपोऽसौ ॥२२६॥ मिट्टी खानेपर कुपित होकर माता यशोदाने जब मुँह खोला तो जिन्होंने उस (मुख) में ही सारा ब्रह्माण्ड दिखा दिया, वे ही यदि स्वयं विश्वरूप हो गये तो क्या आश्चर्य है ? अनुग्रह विषविषमस्तनयुगलं पाययितुं पूतना गृहं प्राप्ता । तस्याः पृथुभाग्याया आसीत्कृष्णार्पणो देहः ॥२२७॥ देखो, पूतना स्तनोंमें विषम विष लगाकर उन्हें पिलानेके लिये घरमें आयी थी, किन्तु उस बड़भागिनीका शरीर श्रीकृष्णके अर्पण हो गया ! ६४

अनुग्रह अनयत्पृथुतरशकटं निजनिकटं वा कृतापराधमपि। कण्ठाश्लेषविशेषादवधीद्बाल्येऽसुरं कृष्णः ॥२२८॥ शकटासुर बड़ा अपराधी था तथापि भगवान् कृष्णने उसे अपने निकट बुला लिया [अर्थात् उसे मारकर अपना धाम दिया], और बाल्यावस्थामें ही उन्होंने [तृणावर्त] असुरको गला घोंटकर मार डाला। यमलार्जुनौ तरू उन्मूल्योलूखलगतश्चिरं खिन्नौ। रिङ्गन्नङ्गणभूमौ स्वमालयं प्रापयन्नृहरिः ॥२२९॥ चिरकालसे दुःखी यमलार्जुन-वृक्षोंको ऊखलमें बँधे-बँधे ही अपने घरके आँगनमें रेंगते हुए श्रीकृष्णने उखाड़कर अपने लोक- को भेज दिया। नित्यं त्रिदशद्वेषी येन च मृत्योर्वशीकृतः केशी। काकः कोऽपि वराको बकोऽप्यशोकं गतो लोकम् ॥ उन श्रीकृष्णचन्द्रने ही देवताओंसे नित्य द्वेष करनेवाले केशीका वध किया और [उन्हींकी कृपासे] बेचारे तुच्छ काकासुर और बकासुर भी शोकरहित लोकोंको गये। गोगोपीगोपानां निकरमहिं पीडयन्तमतिवेगात्। अनघमघासुरमकरोत्पृथुतरमुरगेश्वरं भगवान्॥२३१॥ ६५

प्रबोधसुधाकर बड़े भारी अजगर-रूप अघासुरको, जो गौवों, गोपों और गोपियोंको अपने पेटमें डालकर अति पीड़ा पहुँचा रहा था, मारकर भगवान्ने अनघ (निष्पाप) कर दिया । पीत्वारण्यहुताशनमसह्यतत्तेजसो हेतोः । दग्धान्मुग्धानखिलाञ्जुगोप गोपान्कृपासिन्धुः ॥२३२॥ जो अपने तेजके कारण अति असह्य था, वनमें लगे हुए उस दावानलको पीकर उसके कारण दग्ध और मुग्ध हुए समस्त गोपोंकी कृपासागर भगवान्ने रक्षा की । पातुं गोकुलमाकुलमशनितडिद्वर्षणैः कृष्णः । असहाय एकहस्ते गोवर्धनमुद्धधारोच्चैः ॥२३३॥ वज्र, बिजली और वर्षासे व्याकुल गोकुलकी रक्षा करनेके लिये कृष्णचन्द्रने बिना किसीकी सहायताके ही एक हाथपर गोवर्धन-पर्वतको उठा लिया । वासोलोभाकलितं धावद्रजकं शिलातलैर्हत्वा । विस्मृत्य तदपराधं वैकुण्ठवासोऽर्पितस्तस्मै ॥२३४॥ वस्त्रोंके लोभसे भागते हुए धोबीको पत्थरोंसे मारकर भगवान्ने उसके अपराधको भूलकर उसे वैकुण्ठ-वास दिया । त्रेधा वक्रशरीरामतिलम्बोष्ठीं स्खलद्द्रुपूर्वचनाम् । स्रक्चन्दनपरितोषात्कुब्जामृज्वाननामकरोत् ॥२३५॥ ६६