प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
लताश्रृंगवाला विमान नागर जाति का प्रासाद (पीठ मडोवर और शिखर का सर्वाङ्गपूर्ण दृश्य) - उदयपुर-मेवाड़
प्राग्ग्रीव मंडप वाला नागर जाति का निरधार प्रासाद खजुराहो (मध्यप्रदेश)
ॐ णमो जिणाणं मण्डनसूत्रधारविरचितम् प्रासादमण्डनम् टीकाकारका मंगलाचरण— "परं परमेष्ठिनं जिनं नत्वा करोम्यहम् । प्रासादमण्डनप्रबो-धाय भाषां सुबोधिनीम् ॥" श्रेष्ठ जो पञ्च परमेष्ठी जिनदेव है, उनको नमस्कार करके प्रासाद मंडन नाम के शिल्प- शास्त्र को अच्छी तरह समझने के लिये सुबोधिनी नामकी टीका करता हूं । ग्रन्थकार का मंगलाचरण— गणेशाय नमस्तस्मै निर्विघ्नसिद्धिहेतवे । आदिगौरीसमुद्भूत-तेजसा सम्भूताय¹ वै ॥१॥ निर्विघ्न रूप से अपने कार्य की सिद्धि के लिए महामाया पार्वतीदेवी के अद्भुत तेज से उत्पन्न हुए श्री गणेश देव को नमस्कार है ॥१॥ महामायेति या गीता चिन्मयी मुनिसत्तमैः । तनोतु² वाग्विलासं मे जिह्वायां सा सरस्वती ॥२॥ महान् ऋषियों ने जिनकी स्तुति की है, ऐसी ज्ञानमयी महामाया सरस्वती देवी मेरी जिह्वा मे निवास करके वाणी का विस्तार करें ॥२॥ सृष्ट्याद्यसूत्रधारस्य प्रसादाद् विश्वकर्मणः । प्रासादमण्डनं ब्रूते सूत्रधारेषु मण्डनः ॥३॥ सृष्टि के आद्य सूत्रधार श्री विश्वकर्मा की कृपा से सूत्रधारो मे श्रेष्ठ भूषण रूप 'मण्डन' नाम का सूत्रधार प्रासादमण्डन नामका यह ग्रन्थ कहता है ॥२॥ गृहेषु यो विधिः प्रोक्तो त्रिनिवेशप्रवेशने । स एव विधिना³ कार्यो देवतायतनेष्वपि ॥४॥ (१) सम्भवाय (२) करोतु (३) विदुषा
२ प्रासादमण्डने घर बनाने की तथा उसमे प्रवेश करने की जो विधि वास्तुशास्त्र में विद्वानों ने बतलायी है, उस विधि के अनुसार देवालय मे भी कार्य करे ॥४॥ देवपूजित शिवस्थान— हिमाद्रेरुत्तरे पार्श्वे चारुदारुवनं परम् । पावनं शङ्करस्थानं तत्र सर्वैः शिवोऽर्चितः ॥५॥ हिमालय पर्वत के उत्तर दिशा में एक बडा मनोहर देवदारु वृक्षों का सुन्दर वन है, यह महादेवजी का पवित्र तीर्थस्थान है। वहां सब देव और दैत्य आदि ने मिलकर महादेव की पूजा की ॥५॥ प्रासादों की जाति— प्रासादाकारपूजाभिर्देवदैत्यादिभिः क्रमात् । चतुर्दश समुत्पन्नाः प्रासादानां सुजातयः² ॥६॥ देव और दैत्य आदि सब देवो ने अनुक्रम से प्रासाद के आकार वाली शंकर की अनेक प्रकार से पूजा की, जिसके चौदह लोक के देवों द्वारा भिन्न भिन्न रूप से पूजित होने से चौदह प्रकार की प्रासाद की जाति उत्पन्न हुई ॥६॥ प्रासादोत्पत्ति की चौदह जाति— “यत्र येषां कृता पूजा तत्र तन्नामकास्तु ते । प्रासादानां समस्तानां कथयिष्याम्यनुक्रमम् ॥ सुरैस्तु नागराः ख्याता द्राविडा दानवेन्द्रकैः । लतिनाश्चैव गन्धर्वै-र्यक्षैश्चापि विमानजाः ॥ विद्याधरैर्मिश्रकाश्च वसुभिश्च वराटकाः । सान्धाराश्चोरगैः ख्याताः नरेन्द्रै¹र्भूमिजास्तथा ॥ विमाननागरच्छन्दाः सूर्यलोकसमुद्भवाः । नक्षत्राधिपलोकोक्ताश्छन्दा विमानपुष्पकाः ॥ पार्वतीसम्भवाः सेना वलभ्याकारसंस्थिताः । हरसिद्ध्यादिदेवीभिः कार्याः सिंहावलोकनाः ॥ व्यन्तरस्थितदेवैस्तु फासनाकारिणो मताः । इन्द्रलोकसमुद्भूता रथाश्च विविधा मताः ॥” अपराजितपृच्छा सू० १०६ (१) देवगुरु (२) 'च'
प्रथमोऽध्यायः ३
'जिन जिन देवो ने प्रासाद के आकार वाली पूजा की, उनके नाम वाले, जो जो प्रासाद उत्पन्न हुए, उनको अनुक्रम से कहूँगा (१) देवो के पूजन से नागर जाति, (२) दानवो के पूजन से द्राविडजाति, (३) गन्धर्वो के पूजन से लतिनजाति, (४) यक्षों के पूजन से विमानजाति, (५) विद्याधरों के पूजन से मिश्रजाति, (६) वसु देवो के पूजन से वराटकजाति, (७) नागदेवो के पूजन से सान्धार जाति, (८,) नरेन्द्रो के पूजन से भूमिजजाति, (६) सूर्यदेवो के पूजन से विमान- नागर जाति, (१०) चन्द्रमा के पूजन से विमानपुष्पक जाति, (११) पार्वती के पूजन से वलभी जाति, (१२) हरसिद्धि आदि देवियों के पूजन से सिंहावलोकन जाति, (१३) व्यन्तर स्थित देवों के पूजन से फांसी के आकार वाली जाति, १४-और इन्द्रलोक के देवो के पूजन से रथारूढ़ (दारुजादि) जाति, ये चौदह जाति के प्रासाद उत्पन्न हुए। आठ जाति के उत्तम प्रासाद— नागरा द्राविडाश्चैव भूमिजा लतिनास्तथा । सावन्धारा विमानादि-नागराः पुष्पकाङ्किताः' ॥७॥ मिश्रकास्तिलकैः २ शृङ्गैरुत्तै जातिषु चोत्तमाः । सर्वदेवेषु कर्त्तव्याः शिवस्यापि विशेषतः ॥८॥ चौदह जाति के प्रासादों मे (१) नागर, (२) द्राविड, (३) भूमिज, (४) लतिन, (५) सावं- धार (सांधार केसरी आदि), (६) विमान नागर, (७) विमान पुष्पक, और (८) शृङ्ग और तिलक वाला मिश्र, ये आठ जाति के प्रासाद उत्तम हैं। इसलिये सब देवो के लिये यही बनाने चाहिये, उनमे भी विशेषकर महादेवजी के लिये बनाना श्रेयस्कर है ॥७-८॥ प्रासादानां च सर्वेषां जातयो देशभेदतः । चतुर्दश प्रवर्त्तन्ते ज्ञेया लोकानुसारतः ॥६॥ सब प्रासादो के भेद देशो के भेद के अनुसार होते है। इनके मुख्य चौदह भेद है, वे अन्य अपराजित पृच्छा सूत्र ११२ आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ॥६॥ लक्ष्यलक्षणतोऽभ्यासाद् गुरुमार्गानुसारतः । प्रासादभवनादीनां सर्वज्ञानमवाप्यते ॥१०॥ प्रासाद और गृह आदि बनाने के लिये सब प्रकार का शिल्पज्ञान, उसके लक्ष्य और लक्षण के अभ्यास से एवं गुरुशिक्षा के अनुसार प्राप्त करना चाहिये ॥१०॥
(१) पुष्पकान्विता (२) प्रासादमिश्रकारश्चैव
४ प्रासादमण्डने प्रासाद का निर्माण समय— शुभलग्ने सुनक्षत्रे¹ पञ्चग्रहबलान्विते । माससंक्रान्तिवत्सादि-निषिधकालवर्जिते ॥११॥ शुभ लग्न और शुभ नक्षत्र मे, पांच ग्रह ( सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र ) के बलवान् होने पर, तथा मास, संक्रान्ति और दत्त आदि के निषेध समय को छोड़ कर प्रासाद बनाना आरंभ करे ॥११॥ भूमि परीक्षा— सर्वदिक्षु प्रवाहो वा प्रागुदक्शङ्करप्लवम् । भूमि परीक्ष्य संसिञ्चेत् पञ्चगव्येन कोविदः ॥१२॥ मणिसुवर्णरूप्येण विद्रुमेण फलेन वा । प्रथम प्रासाद, बनाने की भूमि की परीक्षा करनी चाहिये । जिस भूमि पर चारों दिशाओं मे पानी का प्रवाह चलता हो अर्थात वह चारों दिशाओं मे नीची हो और बीच मे ऊंची हो, अथवा पूर्व, उत्तर और ईशान कोनों मे नीची हो, अर्थात् इन तीन दिशाओं मे पानी का प्रवाह जाता हो तो ऐसी भूमि शुभदायक है । विशेष जानने के लिये देखें अपराजित पृच्छा सूत्र० ५१. इस प्रकार भूमिकी परीक्षा करके विद्वान् जन पञ्च गव्य ( गाय का दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर ) से उस भूमि पर छिड़काव करें तथा मणि, सोना, रूपा, मूंगा और फलो से भूमि को पवित्र करे ॥१२॥ वास्तुमंडल लिखने का पदार्थ— चतुःषष्टिपदैर्वास्तुं लिखेद्वापि शतांशकैः ॥१३॥ पिष्टेन वाक्षतैः शुद्धैस्ततो² वास्तुं समर्च्चयेत् । पूर्वोक्तेन विधानेन बलिपुष्पैश्च³ पूजयेत् ॥१४॥ प्रासाद के आरभ होने से समाप्त होने तक उतने समय मे सात अथवा चौदह बार चौसठ पद का अथवा एकसौ पद का वास्तुमण्डल* पूजा जाता है । यह शुद्ध आटा अथवा शुद्ध चावलो मे बनाना चाहिये । पश्चात् उसे पूर्वाचार्यो द्वारा बतलाई गई विधि के अनुसार बलि और पुष्प आदि से पूजना चाहिये ॥१३॥१४॥ (१) शुभर्चे च (२) ऊर्ध्वं (३) बलिपुष्पादिपूजनैः
- विशेष जानने के लिये देखें स्वयंद्वारा अनुदित राजवल्लभमंडन में दूसरा अध्याय ।
प्रथमोऽध्यायः ५ आठ दिक्पाल— इन्द्रो वह्निः पितृपतिर्नैर्ऋतो वरुणो मरुत् । कुवेर ईशः पतयः पूर्वांदीनां दिशां क्रमात् ॥१५॥ इन्द्र, अग्नि, यम, नैर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईश, ये आठ देव अनुक्रम से पूर्वादि दिशाओ के अधिपति है ॥१५॥ कार्यारम्भ के समय पूजनीय देव— दिक्पालाः क्षेत्रपालाश्च गणेशश्चण्डिका तथा । एतेषां विधिवत् पूजां कृत्वा कर्म समारभेत्¹ ॥१६॥ दिक्पाल, क्षेत्रपाल, गणेश और चण्डिका देवी आदि देव देवियो की विधि पूर्वक पूजा करके कार्य आरंभ करे ॥१६॥ निषेध समय— धनुर्मीनस्थिते सूर्ये गुरौ शुक्रेऽस्तगे विधौ । वैधृतौ व्यतिपाते च दग्धायां न कदाचन ॥१७॥ धन और मीन संक्रांति का सूर्य हो, गुरु शुक्र और चन्द्रमा ये अस्त हो, वैधृति और व्यतिपात के योग हो, तथा दग्धा तिथि हो, तब कभी भी नवीन कार्य का आरंभ नही करना चाहिये ॥१७॥ वत्समुख— कन्यादित्रित्रिभे² सूर्ये द्वारं पूर्वादिषु त्यजेत् । सृष्ट्या वत्समुखं तत्र स्वामिनो हानिकृद्यतः ॥१८॥ कन्या आदि तीन तीन राशि पर सूर्य हो, तब अनुक्रम से पूर्व आदि दिशाओ में द्वार आदि का कार्य नही करना चाहिये । क्योकि उन दिशाओ में सृष्टिक्रम से अर्थात् पूर्व, दक्षिण पश्चिम और उत्तर दिशा मे वत्सका मुख रहता है। यह कार्य कराने वाले स्वामी को हानिकारक है । जैसे-कन्या, तुला और वृश्चिक राशि पर सूर्य हो तब वत्स का मुख पूर्व दिशा मे, धन, मकर और कुंभ राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख दक्षिण दिशा में, मीन मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख पश्चिम दिशा मे; मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख उत्तर दिशा मे रहता है । ॥१८॥ (१) समाचरेत् (२) त्रित्रिगे
६ प्रासादमण्डने जिस दिशा में वत्स का मुख हो, उस दिशा में तथा मुख के सामने वाली दिशा में खात, देव प्रतिष्ठा, द्वार प्रतिष्ठा आदि कार्य करना शास्त्र मे वर्जित है, परन्तु वत्समुख एक दिशा में तीन तीन मास तक रहता है। इसलिये तीन मास तक उक्त कार्य को नही रोकने के लिये ठक्कुर फेरु कृत 'वत्थुसार पयरण' प्र० १ गाथा २० में विशेष रूप से बतलाया है कि— “गिहभूमि सत्तभाए पण दह तिहि तीस तिहि दहक्क कमा इम्र दिणसंखा चउदिसि सिरपुच्छसमकि वच्छठिई ॥” घर या प्रासाद की भूमि का प्रत्येक दिशा में सात सात भाग करना, उनमे अनुक्रम से प्रथम भाग में पांच दिन, दूसरे में दस दिन, तीसरे में पंद्रह दिन, चौथे में तीस दिन, पांचवें मे पंद्रह दिन, छठे में दस दिन और सातवे भाग में पांच दिन वत्स का मुख रहता है। इस प्रकार भूमि की चारो दिशाओं मे दिन संख्या समझना चाहिये। जिस अंक पर वत्स का मुख हो, उसी अंक के सामने वाले बराबर के अंक पर वत्स की पूंछ रहती है। इस प्रकार की वत्स की स्थिति है। [चक्र: उत्तर— वायव्य
प्रथमोऽध्यायः ७ वत्सके सिर के भाग में और उनके सामने के भाग मे देव मंदिर अथवा मनुष्य के घर नही बनावे, यदि बनावेगे तो मृत्यु, रोग और भय हमेशा बना रहेगा। इसलिये वत्स की कुक्षि में कार्य करना अच्छा है। विशेष उक्त ग्रंथ मे देखें । आयादिका विचार— आयो व्ययर्द्ध्मंशस्य भित्तिवाह्ये सुरालये । ध्वजायो देवनक्षत्रं व्ययांशौ प्रथमौ शुभौ ॥१६॥ आय, व्यय, नक्षत्र और अंश आदि की गणना देवालय मे दीवार के बाहर के भाग से होती है। देवालय मे ध्वज आय, देव नक्षत्र, प्रथम व्यय और प्रथम अंश ये शुभ है ॥१६॥ केषाञ्चिन्मरुतां¹ गेहे वृषसिंहगजाः शुभाः । आयादूने² व्ययः श्रेष्ठः पिशाचस्तु समोऽधिकः ॥२०॥ देवालयों मे वृष, सिंह और गज आय भी श्रेष्ठ है। अपराजित पृच्छा सूत्र ६४ में भी कहा है कि—'ध्वजः सिंहो वृषगजो शस्यन्ते सुरवेश्मनि ।' आय से व्यय कम हो तो श्रेष्ठ है। सम व्यय हो तो पिशाच और अधिक व्यय हो तो राक्षस नाम का व्यय माना जाता है ॥२०॥ देवालय में विचारणीय— देवतानां गृहे चिन्त्य-मायाद्यङ्गचतुष्टयम् । नवाङ्गं नादीवेधादि-स्थापकामरयोर्मिथः ॥२१॥ देवालय मे आय, व्यय, अंश और नक्षत्र इन चार अंगों का, तथा स्थापक (देव स्थापन करने वाले ) और देव इन दोनो के परस्पर नाडीवैध, योनि, गण, राशि, वर्ण, वश्य, तारा, वर्ग और राशिपति, इन नव अङ्गों का विचार करना चाहिये ॥२१॥ आयादिचिन्तनं भूमि-लक्षणं वास्तुमण्डलम् । मासनक्षत्रलग्नादि-चिन्तनं पूर्वशास्त्रतः ॥२२॥ आय आदिका विचार, भूमिका लक्षण, वास्तु मण्डल, मास, नक्षत्र और लग्न आदिका विचार, ये सब राजवल्लभ मंडन और अपराजित पृच्छा आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ॥२२॥ आय व्यय और नक्षत्र लाने का प्रकार— “व्यासे दैर्घ्यगुणेऽष्टभिर्विभजिते शेषो ध्वजाद्यायको, ऽष्टघ्ने तद्गुणिते च धिष्ण्यभजिते साहक्षमश्वादिकम् । (१) केपा च (२) हीन आय.द
८ प्रासादमण्डने नक्षत्रे वसुभिर्व्ययोऽपि भजिते हीनस्तु लक्ष्मीप्रदः, तुल्यायश्च पिशाचको ध्वजमृते संवर्द्धितो राक्षसः ॥” राज व० अ० ३ प्रासाद अथवा गृह बनाने की भूमि की लंबाई और चौड़ाई के नाप का गुणाकार करने से जो गुणनफल हो, वह क्षेत्रफल कहा जाता है । इसको आठ से भाग देने से जो शेष बचे, वह ध्वज आदि आय कहलाती है । क्षेत्रफल को आठ से गुणा करके, गुणनफल को सत्ताईस से भाग दे जो शेष बचे वह अश्विनी आदि नक्षत्र होता है । नक्षत्र की जो संख्या आवे, उसमे आठ का भाग देने से जो शेष बचे वह व्यय कहलाता है । आय से व्यय कम हो तो लक्ष्मी को प्राप्त करने वाला है । आय और व्यय दोनों बराबर हो तो पिशाच नाम का व्यय और ध्वज आय को छोड़कर दूसरी आयों से व्यय अधिक हो तो वह राक्षस नाम का व्यय कहलाता है । आयों की संज्ञा और दिशा— “ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरो गजः । ध्वांक्षश्चेति समुद्दिष्टाः प्राचादिषु प्रदक्षिणाः ॥” अप० सू० ६४ ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, खर, गज और ध्वांक्ष, ये आठ आयों के नाम है। वे अनुक्रम से पूर्व आदि दिशाओं के स्वामी हैं । प्रासाद के प्रशस्त आय— ध्वजः सिंहो वृषगजौ शस्यते सुरवेश्मनि । अधमानां खरध्वांक्ष-धूम्रश्वानाः सुखावहाः ॥” अप० सू० ६४ ध्वज, सिंह, वृष और गज ये चार आय देवालय में शुभ हैं । तथा खर, ध्वांक्ष, धूम और श्वान ये चार आय अधम जातिवालों के घरों मे सुखकारक है¹ । व्यय संज्ञा— “शान्तः पौरः प्रद्योतश्च श्रियानन्दो मनोहरः । श्रीवत्सो विभवश्चैव चिन्तात्मा च व्ययाः स्मृताः ॥ · समो व्ययः पिशाचश्च राक्षसास्तु व्ययोऽधिकः । व्ययो यूनो यक्षश्चैव धनधान्यकरः स्मृतः ॥” अप० सू० ६६ शान्त, पौर, प्रद्योत, श्रियानन्द, मनोहर, श्रीवत्स, विभव और चिन्तात्मा, ये व्ययों के आठ नाम हैं । आय और व्यय समान हो तो पिशाच नाम का व्यय, आय से व्यय अधिक हो तो राक्षस नाम का व्यय और आय से व्यय कम हो तो यक्ष नाम का व्यय होता है । यह, धन धान्य की वृद्धि करने वाला है । (१) विशेष जानने के लिये देखो मेरा अनुवादित राजवल्लभ मंडन ग्रंथ
प्रथमोऽध्यायः ६ राशि, योनि, नाड़ी, गण आदि जानने का शतपद्चक्र—
| संख्या | नक्षत्र | अक्षर | राशि | वर्ण | वश्य | योनि | राशीश | गण | नाडी | चन्द्र | व्यय |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनि | चू. चे.<br>चो. ला. | मेष | क्षत्रिय | चतुष्पद | अश्व | मंगल | देव | आद्य | उत्तर | शान्त |
| २ | भरणी | ली. लू.<br>ले. लो. | मेष | क्षत्रिय | चतुष्पद | गज | मंगल | मनुष्य | मध्य | उत्तर | पीर |
| ३ | कृत्तिका | अ. इ.<br>उ. ए. | १ मेष<br>२ वृष | १ क्षत्रिय<br>३ वैश्य | चतुष्पद | बकरा | १ मंगल<br>३ शुक्र | राक्षस | अन्त्य | पूर्व | प्रद्योत |
| ४ | रोहिणी | ओ. वा.<br>वी. वु. | वृष | वैश्य | चतुष्पद | सर्प | शुक्र | मनुष्य | अन्त्य | पूर्व | श्रियानंद |
| ५ | मृगशिर | वे. वो.<br>का. की. | २ वृष<br>२ मिथुन | २ वैश्य<br>२ शूद्र | २ चतुष्पद<br>२ मनुष्य | सर्प | २ शुक्र<br>२ बुध | देव | मध्य | पूर्व | मनोहर |
| ६ | आर्द्रा | कु. घ.<br>ङ. छ. | मिथुन | शूद्र | मनुष्य | श्वान | बुध | मनुष्य | आद्य | पूर्व | श्रीवत्स |
| ७ | पुनर्वसु | के. को.<br>हा. ही. | ३ मिथुन<br>१ कर्क | ३ शूद्र<br>१ ब्राह्मण | ३ मनुष्य<br>१ जलचर | मार्जार | ३ बुध<br>१ चन्द्र | देव | आद्य | पूर्व | विभव |
| ८ | पुष्य | हू. हे.<br>हो. डा. | कर्क | ब्राह्मण | जलचर | बकरा | चन्द्रमा | देव | मध्य | पूर्व | चिन्तात्म |
| ९ | आश्लेषा | डी. डू.<br>डे. डो. | कर्क | ब्राह्मण | जलचर | मार्जार | चन्द्रमा | राक्षस | अन्त्य | पूर्व | शान्त |
| १० | मघा | मा. मी.<br>मु. मे. | सिंह | क्षत्रिय | वनचर | चूहा | सूर्य | राक्षस | अन्त्य | दक्षिण | पीर |
| ११ | पूर्वा फा० | मो. टा<br>टी. टू. | सिंह | क्षत्रिय | वनचर | चूहा | सूर्य | मनुष्य | मध्य | दक्षिण | प्रद्योत |
| १२ | उत्तरा फा. | टे. टो.<br>पा. पी. | १ सिंह<br>३ कन्या | १ क्षत्रिय<br>३ वैश्य | १ वनचर<br>३ मनुष्य | गो | १ सूर्य<br>३ बुध | मनुष्य | आद्य | दक्षिण | श्रियानन्द |
| १३ | हस्त | पु. षा.<br>ण. ठ. | कन्या | वैश्य | मनुष्य | भैंस | बुध | देव | आद्य | दक्षिण | मनोहर |
१० प्रासादमण्डने
| संख्या | नक्षत्र | अक्षर | राशि | वर्ण | वश्य | योनि | राशीश | गण | नाडी | चन्द्र | व्यय |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १४ | चित्रा | पे. पो<br>रा. री. | २ कन्या<br>२ तुला | २ वैश्य<br>२ शूद्र | मनुष्य | वाघ | २ बुध<br>२ शुक्र | राक्षस | मध्य | दक्षिण | श्रीवत्स |
| १५ | स्वाति | रु. रे.<br>रो. ता. | तुला | शूद्र | मनुष्य | भैंस | शुक्र | देव | अंत्य | दक्षिण | विभव |
| १६ | विशाखा | ती. तु.<br>ते. तो. | ३ तुला<br>१ वृश्चिक | ३ शूद्र<br>१ ब्राह्मण | ३ मनुष्य<br>१ कीडा | व्याघ्र | ३ शुक्र<br>१ मंगल | राक्षस | अंत्य | दक्षिण | चिन्तात्मा |
| १७ | अनुराधा | ना. नी.<br>नु. ने. | वृश्चिक | ब्राह्मण | कीडा | हीरण | मंगल | देव | मध्य | पश्चिम | शान्त |
| १८ | ज्येष्ठा | नो या.<br>यी. यु. | वृश्चिक | ब्राह्मण | कीडा | हीरण | मंगल | राक्षस | आद्य | पश्चिम | पौर |
| १९ | मूल | ये. यो.<br>भा. भी. | धन | क्षत्रिय | मनुष्य | कुक्कुर | गुरु | राक्षस | आद्य | पश्चिम | प्रद्योत |
| २० | पूर्वाषाढा | भु. धा.<br>फ. ढा. | धन | क्षत्रिय | मनुष्य<br>चतुष्पद | वानर | गुरु | मनुष्य | मध्य | पश्चिम | श्रियानन्द |
| २१ | उत्तराषाढा | भे. भो.<br>जा. जी. | १ धन<br>३ मकर | १ क्षत्रिय<br>३ वैश्य | चतुष्पद | न्योला | १ गुरु<br>३ शनि | मनुष्य | अंत्य | पश्चिम | मनोहर |
| २२ | श्रवण | खी. खू.<br>खे खो. | मकर | वैश्य | चतुष्पद<br>जलचर | वानर | शनि | देव | अंत्य | पश्चिम | श्रीवत्स |
| २३ | धनिष्ठा | गा. गी.<br>गु गे. | २ मकर<br>२ कुम्भ | २ वैश्य<br>२ शूद्र | २ जलचर<br>२ मनुष्य | सिंह | शनि | राक्षस | मध्य | उत्तर | विभव |
| २४ | शतभिषा | गो. सा.<br>सी. सु | कुम्भ | शूद्र | मनुष्य | घोडा | शनि | राक्षस | आद्य | उत्तर | चिन्तात्मा |
| २५ | पूर्वा भाद्र | से. सो.<br>दा. दी | ३ कुम्भ<br>१ मीने | ३ शूद्र<br>१ ब्राह्मण | ३ मनुष्य<br>१ जलचर | सिंह | ३ शनि<br>१ गुरु | मनुष्य | आद्य | उत्तर | शान्त |
| २६ | उत्तराभाद्र | दु. थ.<br>झ. ञ. | मीन | ब्राह्मण | जलचर | गौ | गुरु | मनुष्य | मध्य | उत्तर | पौर |
| २७ | रेवती | दे. दो.<br>चा ची. | मीन | ब्राह्मण | जलचर | हाथी | गुरु | देव | अंत्य | उत्तर | प्रद्योत |
प्रथमोऽध्यायः ११ ध्वजाय और देवगणनक्षत्रवाले समचोरस क्षेत्र का माप— गज - इच नक्षत्र गज - इच नक्षत्र गज - इच नक्षत्र १-१ मृगशीर ७-२१ रेवती १५-१ अनुराधा १-३ रेवती ७-२३ मृगशीर १५-६ रेवती १-५ मृगशीर ८-७ अनुराधा १५-१६ पुष्य १-१३ अनुराधा ८-१५ रेवती १६-३ रेवती १-२१ रेवती ८-२३ पुष्य १६-११ अनुराधा २-५ पुष्य ९-१ पुष्य १६-१६ मृगशीर २-७ पुष्य ९-६ रंवती १६-२१ रेवती २-१५ रेवती ९-१७ अनुराधा १७-१३ रेवती २-२३ अनुराधा १०-१ मृगशीर १७-१५ रेवती ३-७ मृगशीर १०-३ रेवती १७-२३ पुष्य ३-६ रेवती १०-५ मृगशीर १८-१ पुष्य ३-११ मृगशीर १०-१३ अनुराधा १८-६ रेवती ३-१६ अनुराधा ११-५ पुष्य १८-१७ रेवती ४-३ रेवती ११-७ पुष्य १९-१ मृगशीर ४-११ पुष्य ११-१५ रेवती १९-३ रेवती ४-१३ पुष्य ११-२३ अनुराधा १९-५ मृगशीर ४-२१ रेवती १२-७ मृगशीर १९-२१ रेवती ५-५ अनुराधा १२-६ रेवती १९-२३ पुनर्वसु ५-१३ मृगशीर १२-११ मृगशीर २०-५ पुष्य ५-१५ रेवती १२-१६ अनुराधा २०-७ पुष्य ५-१७ मृगशीर १३-३ रेवती २०-१५ रेवती ६-१ अनुराधा १३-११ पुष्य २०-१६ हस्त ६-६ रेवती १३-१३ पुष्य २०-२३ अनुराधा ६-१७ पुष्य १३-२१ रेवती २१-७ मृगशीर ६-१६ पुष्य १४-५ अनुराधा २१-६ रेवती ७-३ रेवती १४-१३ मृगशीर २१-११ मृगशीर ७-११ अनुराधा १४-१५ रेवती २१-१६ अनुराधा ७-१६ मृगशीर १४-१७ मृगशीर २१-२३ मृगशीर
१२ प्रासादमण्डने अंश लाने का प्रकार— "तन्मूले व्ययहर्म्यनामसहिते भक्ते त्रिभिस्त्वंशकः, स्यादिन्द्रो यमभूपती क्रमवशाद् देवे सुरेन्द्रो हितः । वेश्यामेष यमस्तु पण्यभवने नागे तथा भैरवे, राजांशो गजवाजियाननगरे राज्ञां गृहे मन्दिरे ॥" राज० अ० ३ मूलराशि (क्षेत्रफल) मे व्यय की संख्या और घरके नामाक्षर की संख्या जोड़ करके उसमें तीन से भाग दें । जो एक शेष बचे तो इन्द्रांश, दो शेष बचे तो यमांश और तीन (शून्य) शेष बचे तो राजांश जाने । इन्द्र का अंश-देवालय और वेदी में शुभ है । यमका अंश-दुकान, नागदेव और भैरव के प्रासाद में शुभ है । राजा का अंश-गजशाला, अश्वशाला, वाहन, नगर, राजमहल और साधारण घर मे शुभ है । दिक् साधन— रात्रौ दिक्साधनं कुर्याद् दीपसूत्रध्रुवैक्यतः । समे भूमिप्रदेशे तु शङ्कुना दिवसेऽथवा ॥२३॥ घर और देवालय आदि बराबर वास्तविक दिशा में न होने से दिङ् मूढदोष माना जाता है । इसलिये गृह आदि बराबर ठीक दिशा मे रखने के लिये दिक् साधन करना जरूरी है । रात्रि मे दिशा का साधन दीपक, सूत और ध्रुव से किया जाता है और दिन मे दिशा का साधन समतल भूमि के ऊपर शंकु रखकर किया जाता है ॥२३॥ "प्राची मेषतुलारवेरुदयतः स्याद् वैष्णवे वह्निभे, चित्रास्वातिभमध्यगा निगदिता प्राची बुधैः पञ्चधा । प्रासादं भवनं करोति नगर दिङ्मूढमर्थक्षयं, हर्म्ये देवगृहे पुरे च नितरामायुर्धनं दिङ्मुखे ॥" राज० अ० १ मेष और तुला संक्रान्ति को सूर्य का उदय पूर्व दिशा मे होता है । श्रवण और कृत्तिका नक्षत्र का उदय पूर्व दिशा मे होता है । चित्रा और स्वाति नक्षत्र के मध्य में पूर्व दिशा मानी जाती है । विद्वानो ने कहा है कि इन पांच प्रकार से पूर्व दिशा को जानें । प्रासाद गृह और नगर को दिङ् मूढ करने से धन का नाश होता है । यदि ये वास्तविक दिशा मे हो तो हमेशा आयु और धन की वृद्धि होती है । रात्री में और दिन में दिक्साधन— "तारे मार्कटिके ध्रुवस्य समतां नीतेऽवलम्बे नते, दीपाग्रेण तदैक्यतश्च कथिता सूत्रेण सा सौम्या दिशा ।
प्रथमोऽध्यायः १३ शङ्कोर्नेत्रगुणे तु मण्डलवरे छायाद्वयान्मत्स्ययो- र्जाता यत्र युतिस्तु शङ्कु तलतो याम्योत्तरे स्त* स्फुटे ॥'* राज० अ० १ श्लो० ११ रात्रि में दिक् साधन— सप्तर्षि और ध्रुव के बीच मे एक गज के अन्तर वाले दो तारा है जो ध्रुव के चारो तरफ घूमते है उनको मर्कटिका कहते है। यह मर्कटिका और ध्रुव जब बराबर समसूत्र मे आवे, तब एक अवलम्ब लटकावे और उसके सामने दक्षिण की तरफ एक दीपक रखें । यदि दीपक का अग्र भाग, अवलंब और ध्रुव ये तीनो बराबर समसूत्र में दिखाई पड़े तो उसे उत्तर दिशा आने । अवलंब और दीपक के समसूत्र एक रेखा खींची जाय तो वह उत्तर दक्षिण रेखा होगी * । दिन मे दिक्साधन करना हो तो समतल भूमि के ऊपर बत्तीस अंगुल का एक गोल चक्र बनावें, उसके मध्य बिन्दु पर एक बारह अंगुल के नाप का शंकु रखें । पश्चात् दिन के पूर्वार्ध मे देखे कि शंकुकी छाया गोल मे जिस जगह प्रवेश करे, वहां एक चिह्न करे वह पश्चिम दिशा होगी और दिन के उत्तरार्ध में जहां बाहर निकले वहा एक बिन्दु करे यह पूर्व दिशा होगी । पीछे पूर्व और पश्चिम की इन दोनो बिन्दुओ तक एक सरल रेखा खीची जाय तो यह पूर्व पश्चिम रेखा होगी, इसको व्यासार्ध मान करके दो गोल बनावें, जिसे एक मत्स्य के जैसी आकृति होगी, उसके ऊपर और नीचे के योग बिन्दु से एक सरल रेखा खीची जाय तो यह उत्तर दक्षिण रेखा होगी । देखो नीचे का दिक्साधन चक्र— चक्र परिचय— बत्तीस अंगुल का 'इ उ ए' एक गोल है, उसका मध्य बिन्दु 'अ' है । उसके ऊपर बारह अंगुल का एक शंकु रखकर दिन के पूर्वार्द्ध में देखा गया तो शंकुकी छाया गोल के 'क' बिन्दु के पास प्रवेश करती है, यह पश्चिम दिशा जाने और दिनार्द्ध के बाद 'च' बिन्दु के पास बाहर निकलती है, यह पूर्व दिशा जाने । इन 'क' और 'च' दोनों बिन्दु तक एक सरल रेखा खीची जाय तो यह पूर्व पश्चिम रेखा होती है । इसको व्यासार्द्ध मान कर 'क' बिन्दु से 'च छ ज' और दूसरा 'च' बिन्दु से 'क ख ग' ऐसे दो गोल बनावे तो पूर्व पश्चिम रेखा के ऊपर एक मछली के जैसी आकृति हो जाती है। उसके मध्य बिन्दु 'अ' से एक सरल रेखा खीची जाय जो गोलके दोनो स्पर्श बिन्दु से बाहर निकल जाय, यह उत्तर दक्षिण रेखा होती है ।
- उपरोक्त प्रकार से भी वास्तविक दिशा का ज्ञान नहीं होता, क्योकि अयनाश के कारण ध्रुव का तारा एव कृत्तिकादि नक्षत्र ठीक दिशा मे उदय नहीं होता । जिसे आजकल नवीन आविष्कार दिक् साधन यन्त्र (कुतुबनुमा) से करना चाहिये ।
१४ प्रासादमण्डने खात विधि— नागवास्तुं समालोक्य कुर्यात् खातविधिं¹ सुधीः । पाषाणान्तं जलान्तं वा ततः कूर्मं निवेशयेत् ॥२४॥ प्रथम शेषनाग चक्र का विचार करके विद्वान् शिल्पी खात विधि करें। नींव को खोदने से भूमि में पाषाण अथवा पानी निकल जाय, उसके ऊपर कूर्म (कच्छुआ) की स्थापना करें ॥२४॥ नागवास्तु— “कन्यादौ रवितस्त्रये फणीमुखं पूर्वादि सृष्टिकमात्” ऐसा राजवल्लभ मण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २२ मे कहा है कि— कन्या, तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब शेषनाग का मुख पूर्व दिशा मे; धन, मकर कुम्भ राशि का सूर्य हो तब दक्षिण दिशा मे; मीन, मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब पश्चिम दिशा मे, मिथुन कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब उत्तर मे शेषनाग का मुख रहता है। “पूर्वास्येऽनिलखातनं यममुखे खातं शिवे कारये- च्छीर्षे पश्चिमगे च वह्नि खननं सौम्ये खनेन्नैर्ऋते।।” ऐसा राजवल्लभ मण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २४ में कहा है कि-शेषनाग का मुख पूर्व दिशा मे हो तो वायुकोण में, दक्षिण दिशा मे हो तो ईशानकोण मे, पश्चिम दिशा मे हो तो अग्निकोण में और उत्तर दिशा मे हो तो नैर्ऋत्य कोण मे खात करना चाहिये। (१) वास्तुविधि
प्रथमोऽध्याय १५ ज्योतिष शास्त्र के मुहूर्त्त ग्रन्थों मे अन्य प्रकार से कहा है। मुहूर्त्त चिन्तामणि के वास्तु प्रकरण श्लोक १६ की टीका मे विश्वकर्मा का प्रमाण देकर लिखा है कि— "ईशानतः सर्पति कालसर्पो, विहाय सृष्टिं गणयेद् विदिक्षु । शेषस्य वास्तोर्मुखमध्यपुच्छं, त्रयं परित्यज्य खनेच्च तुर्यम् ॥" शेषनाग प्रथम ईशानकोण से चलता है, उसका मुख, नाभि और पूंछ सृष्टिमार्ग को छोड़कर विपरीत विदिशा में रहता है । अर्थात् ईशान मे मुख, वायुकोण में नाभि और नैर्ऋत्य कोण मे पूंछ रहता है। इसलिये इन तीनों विदिशाओ को छोड़कर चौथा अग्निकोण खाली रहता है, उसमें प्रथम खात करना चाहिये । राहु (नाग) मुख— 'देवालये गेहविधौ जलाश्रये, राहोर्मुखं शम्भुदिशो विलोमतः । मीनार्क सिंहार्कमृगार्कतस्त्रिभे, खाते मुखात् पृष्ठविदिकूशुभाभवेत् ॥' देवालय का खात मुहूर्त्त करते समय राहु का मुख यदि मीन, मेष और वृषभ राशि का सूर्य हो तब ईशान कोण में, मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वायुकोण मे, कन्या तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब नैर्ऋत्यकोण मे, धन, मकर और कुम्भ राशि का सूर्य हो तब अग्निकोण मे, राहु का मुख रहता है। घरके खात मुहूर्त्त के समय नाग का मुख सिंह कन्या और तुला राशि के सूर्य में ईशान कोण मे, वृश्चिक धन और मकर राशि के सूर्य मे वायुकोण मे, कुम्भ मीन और मेषराशि के सूर्य मे नैर्ऋत्यकोण मे, वृष मिथुन और कर्क राशि के सूर्य मे अग्निकोण मे राहु का मुख रहता है। कुंआ, बावडी, तालाब आदि जलाशयको आरंभ करते समय राहु का मुख मकर कुम्भ और मीन राशि के सूर्य मे ईशान कोण मे, मेष वृष और मिथुन राशि के सूर्य मे वायुकोण मे, कर्क सिंह और कन्या राशि के सूर्य मे नैर्ऋत्यकोण मे, तुला वृश्चिक और धन राशी के सूर्य मे अग्निकोण में राहु का मुख रहता है। जिस विदिशा में राहु का मुख हो, उसके पीछे की विदिशा मे खात करना शुभ है। जैसे-ईशान कोण मे मुख है, तो अग्निकोण मे, वायुकोण में मुख हो तो ईशानकोण में, नैर्ऋत्य कोण में मुख हो तो वायुकोण मे और अग्निकोण मे मुख हो तो नैर्ऋत्य कोण मे खात करना शुभ है।*
- राहु मुख याने नागमुख या वास्तुमुख इसमे बहुत मतान्तर है। कोई सृष्टि क्रम से और कोई विलोम क्रम से मानते है। विशेष जानने के लिये देखे स्वयं द्वारा अनुवादित 'राजवल्लभ मंडन ग्रंथ'।
१६ प्रासादमण्डने
कूर्ममान— अर्धाङ्गुलो भवेत् कूर्म एकहस्ते सुरालये । अर्धाङ्गुला ततो वृद्धिः कार्या तिथिकरावधि ॥२५॥ एकत्रिंशत्करान्तं च तदर्धा वृद्धिरिष्यते । ततोऽर्धापि शतार्धान्तं कूर्मो मन्वङ्गुलोत्तमः ॥२६॥ एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में आधे अंगुल के नाप का कूर्म ( कच्छूआ ) नींव में स्थापित करे। दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके, (दो हाथ के प्रासाद में एक अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में डेढ़ अंगुल, चार हाथ के प्रासाद मे दो अंगुल, इस प्रकार आधा २ अंगुल बढ़ाने से पंद्रह हाथ के प्रासाद में साढ़े सात अंगुल के मान का कूर्म होता है)। सोलह से इकतीस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद मे प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके और बत्तीस से पचास हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ सूत बढ़ा करके नींव में स्थापित करें। इस प्रकार पचास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है ॥२५-२६॥ अपराजितपृच्छा के मत से कूर्ममान— "एकहस्ते सुरागारे कूर्मः स्याच्चतुरङ्गुलः । अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रतिहस्तं दशावधिः ॥ पादवृद्धिः पुनः कार्याद् विंशतिहस्ततः करे । ऊर्ध्वं वै त्रिशद्धस्तान्तं वसुहस्तैकमङ्गुलम् ॥ ततः परं शतार्धान्तं सूर्यहस्तैकमङ्गुलम् । अनेन क्रमयोगेन मन्वङ्गुलः शतार्धके ॥” सूत्र ५२ एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में कूर्म चार अंगुल के मान का, दोसे दस हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा कर के, ग्यारह से बीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके, इक्कीस से तीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ सूत बढा कर के और इकतीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ १/१२ अंगुल बढ़ा कर के बनावे। इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में लगभग चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है। अपराजितपृच्छाके मत से दूसरा कूर्ममान— “एकहस्ते तु प्रासादे कूर्मश्चार्धाङ्गुलः स्मृतः । अर्द्धवृद्धिः प्रकर्त्तव्या पञ्चदशहस्तावधिः ॥ एकत्रिंशच्च हस्तान्तं पादवृद्धिः प्रकीर्त्तिता । तदर्धेन 'पुनर्वृद्धि-र्मन्वङ्गुलः शतार्धके ॥” सूत्र १५३
प्रथमोऽध्यायः १७ एक हाथ के प्रासाद मे कूर्म आधा अंगुल का, दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अगुल बढा करके, सोलह से एकतीस हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके, और बत्तीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक २ सूत बढा करके बनावे। इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद मे एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है। क्षीरार्णव के मत से कूर्ममान-- “शिलायाः पञ्चमांशेन कर्तव्यं कूर्ममुत्तमम् । सर्वालङ्कारसंयुक्तं दिव्यपुष्पैश्च पूजितम् ॥” अध्याय १०१ धारणी शिला के पाचवे भाग का कूर्म बनावे, यह उत्तम मान है। उसको सब प्रकार के अलंकारों से युक्त करे और सुगंधित पुष्पो से पूजित करे । कूर्म का ज्येष्ठ और कनिष्ठ मान— चतुर्थांशाधिको ज्येष्ठः कनिष्ठो हीनयोगतः । सौवर्णो रूप्यजो वापि स्नाप्यः पञ्चामृतेन स ॥२७॥ तिलैर्यवैस्तथा होम-पूर्णां चैव प्रदापयेत् । कूर्मका जो मान आया हो, वह मध्यम मान है, उसमे इस मान का चौथा भाग बढ़ावे तो ज्येष्ठ मानका और चौथा भाग कम करे तो कनिष्ठ मानका कूर्म होता है। यह कूर्म सुवर्ण अथवा चांदी का बनाना चाहिये । उसको पञ्चामृत से स्नान कराके, तथा तिल और जवो का पूर्णा आहुति पूर्वक होम करके स्थापित करे ॥२७॥ शिला और कूर्म का स्थापन क्रम— ईशानादग्निकोणाद्वा शिलाः स्थाप्याः प्रदक्षिणाः ॥२८॥ मध्ये कूर्मशीला पश्चाद् गीतवादित्रमङ्गलैः । बलिदानं च नैवेद्यं विविधाम्नं घृतप्लुतम् ॥ देवताभ्यः सुधीर्दद्यात् कूर्मन्यासे शिलासु च ॥२६॥ इति कूर्म स्थापनम् । प्रथम ईशान अथवा अग्नि कोने मे नंदा शिला की स्थापना करके पीछे प्रदक्षिण क्रम से अन्य शिलाओ को स्थापित करे। पीछे मध्य मे कूर्म शिला (धारणी शिला) को स्थापित करे । शिला स्थापन करते समय मांगलिक गीत और वाजींत्रों का नाद करावे। वास्तु के देवों को बलि बाकुले, नैवेद्य और अनेक प्रकार के धान्य के घृत से पूर्ण मालपूवे आदि चढावें ॥२८-२९॥ प्रा० ३
१८ प्रासादमण्डने पुनः शिला स्थापन क्रम— “नन्दां पुरः प्रदातव्यां शिलाः शेषाः प्रदक्षिणो । मध्ये च धरणी स्थाप्या यथाक्रमं प्रयत्नतः ॥” क्षीरार्णवे अध्य० १०१ प्रथम नन्दा नाम की शिला को स्थापित करे, पीछे अनुक्रम से भद्रा आदि शिलाओं को प्रदक्षिण क्रम से स्थापित करे और मध्य मे धरणी शिला को स्थापन करे। ऐसा क्षीरार्णव ग्रंथ मे कहा है। शिला के नाम— ‘'नन्दा भद्रा जया रिक्ता अजिता चापराजिता । शुक्ला सौभाग्यिनी चैव धरणी नवमी शिला ॥” क्षीरार्णवे अ० १०१ नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता, अजिता, अपराजिता, शुक्ला और सौभाग्यिनी ये अनुक्रम से दिशाओं की आठ शिलाओ के नाम है। नवमी धरणी नाम की शिला मध्य भाग की है। अपराजित मत से शिला के नाम— “नन्दा भद्रा जया पूर्णा विजया पञ्चमी शिला मङ्गला ह्यजितापरा-जिता च धरणीभवाः ॥” नन्दा, भद्रा, जया, पूर्णा, विजया, मंगला, अजिता, अपराजिता, ये अनुक्रम से दिशाओं को शिला के नाम है और मध्य भाग की नववी धरणी नाम की शिला है। धरणी शिला का मान— “एक हस्ते तु प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् । द्वयङ्गुला च भवेद् वृद्धिर्य्यावच्च दशहस्तकम् ॥ दशोर्ध्वं विंशपर्यन्तं हस्ते हस्ते चैकाङ्गुला । अर्द्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिर्य्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥ तृतीयांशे कृते पिण्डे तदर्धं रूपपातकम् । पुष्पाणि च यथाकारं शिलामध्ये ह्यलंकृतम् ॥” क्षीरार्णवे अ० १०१ एक हाथ के प्रासाद मे चार अंगुल की शिला, दोसे दस हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ दो २ अगुल वढा करके, ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद में एक एक अंगुल बढ़ा करके, और इक्कीस से पचास हाथ तक के प्रासाद मे आधा २ अंगुल बढा करके स्थापित करे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद मे ४७ अंगुल के मान की समचोरस धरणी शिला होती है।