प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
८६ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ६
| तिष्ठत इत्युक्तम्। सामर्थ्यात्प्रलयेऽपि तस्मिन्नेवाक्षरे सम्प्रतिष्ठते जगत्तत एवोत्पद्यत इति सिद्धं भवति। न ह्यकारणे कार्यस्य सम्प्रतिष्ठानमुपपद्यते। | हो जाता है। इसी नियमके अनुसार यह भी सिद्ध होता है कि प्रलयकालमें भी यह जगत् उस अक्षरमें ही स्थित होता है और फिर उसीसे उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि जो कारण नहीं है उसमें कार्यका लीन होना सम्भव नहीं है। |
| उक्तं च 'आत्मन एष प्राणो जायते' इति। जगतश्च यन्मूलं तत्परिज्ञानात्परं श्रेय इति सर्वोपनिषदां निश्चितोऽर्थः। अनन्तरं चोक्तं 'स सर्वज्ञः सर्वो भवति' इति। वक्तव्यं च क्व तर्हि तदक्षरं सत्यं पुरुषाख्यं विज्ञेयमिति। तदर्थोऽयं प्रश्न आरभ्यते। वृत्तान्ताख्यानं च विज्ञानस्य दुर्लभत्वख्यापनेन तल्लब्ध्यर्थं मुमुक्षूणां यत्नविशेषोपादानार्थम्। | इसके सिवा [ प्रश्न ३।३ में ] यह कहा भी है कि 'यह प्राण आत्मासे उत्पन्न होता है' तथा सम्पूर्ण उपनिषदोंका यह निश्चित अभिप्राय है कि 'जो जगत्का आदि कारण है उसके ज्ञानसे ही आत्यन्तिक कल्याण हो सकता है।' अभी [ प्रश्न ४।१० में ] यह कहा जा चुका है कि 'वह सर्वज्ञ और सर्वात्मक हो जाता है।' अतः अब यह बतलाना चाहिये कि 'उस पुरुषसंज्ञक सत्य और अक्षरको कहाँ जानना चाहिये?' इसीके लिये यह [ छठा ] प्रश्न आरम्भ किया जाता है। आख्यायिकाका उल्लेख इसलिये किया गया है कि जिससे विज्ञानकी दुर्लभता प्रदर्शित होनेसे मुमुक्षुलोग उसकी प्राप्तिके लिये विशेष प्रयत्न करें। |
प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| हे भगवन् हिरण्यनाभो नामतः कोसलायां भवः कौसल्यो राजपुत्रो जातितः क्षत्रियो माम् उपेत्योपगम्यैतद्वक्ष्यमाणं प्रश्नम् अपृच्छत । षोडशकलं षोडशसंख्याकाः कला अवयवा इव आत्मन्यविद्याध्यारोपितरूपा यस्मिन् पुरुषे सोऽयं षोडशकलस्तं षोडशकलं हे भारद्वाज पुरुषं वेत्थ विजानासि । तमहं राजपुत्रं कुमारं पृष्टवन्तमब्रवमुक्तवानस्मि नाहमिमं वेद यं त्वं पृच्छसीति ।<br><br>एवमुक्तवत्यपि मय्यज्ञानम् असंभावयन्तं तमज्ञाने कारणम् अवादिषम् । यदि कथञ्चिदहमिमं त्वया पृष्टं पुरुषमवेदिषं विदितवानस्मि कथमत्यन्तशिष्यगुणवतेऽर्थिने ते तुभ्यं नावक्ष्यं नोक्तवानस्मि न ब्रूयामित्यर्थः । भूयोऽप्यप्रत्ययमिवालक्ष्य प्रत्याययितुमब्रवम् । समूलः सह मूलेन वा . . एषोऽन्यथा | [ अत्र सुकेशाका प्रश्न आरम्भ होता है—] 'हे भगवन् ! कोसलपुरीमें उत्पन्न हुए हिरण्यनाभ नामक एक राजपुत्रने—जो जातिका क्षत्रिय था मेरे समीप आकर यह आगे कहा जानेवाला प्रश्न किया—'हे भारद्वाज ! क्या तू षोडशकल पुरुषको—जिस पुरुषमें, शरीरमें अवयवोंके समान, अविद्यावश सोलह कलाएँ आरोपित की गयी हों उसे षोडशकल पुरुष कहते हैं ऐसे उस सोलह कलाओंवाले पुरुषको क्या तू जानता है ?' इस प्रकार पूछते हुए उस राजकुमारसे मैंने कहा—'तुम जिसके विषयमें पूछते हो मैं उसे नहीं जानता ।'<br><br>ऐसा कहनेपर भी मुझमें अज्ञानकी सम्भावना न करनेवाले उस राजकुमारको मैंने अपने अज्ञानका कारण बतलाया—'यदि कहीं तेरे पूछे हुए इस पुरुषको मैं जानता तो तुझ अत्यन्त शिष्यगुणसम्पन्न प्रार्थीसे क्यों न कहता ? अर्थात् तुझे क्यों न बतलाता ?' फिर भी उसे अविश्वस्त-सा देख उसको विश्वास दिलानेके लिये मैंने कहा—'जो पुरुष अपने आत्माको अन्यथा करता हुआ अनृत—अयथार्थ |
| ६८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| सन्तमात्मानमन्यथा कुर्वन्ननृतम् अयथाभूतार्थमभिवदति यः स परिशुष्यति शोषमुपैतीहलोकपरलोकाभ्यां विच्छिद्यते विनश्यति । यत एवं जाने तस्मान्नार्हाम्यहम् अनृतं वक्तुं मूढवत् ।<br><br>स राजपुत्र एवं प्रत्यायितः तूष्णीं व्रीडितो रथमारुह्य प्रवव्राज प्रगतवान्यथागतमेव । अतो न्यायत उपसन्नाय योग्याय जानता विद्या वक्तव्यैवानृतं च न वक्तव्यं सर्वास्वप्यवस्थासु इत्येतत्सिद्धं भवति । तं पुरुषं त्वा त्वां पृच्छामि मम हृदि विज्ञेयत्वेन शल्यमिव मे हृदि स्थितं क्वासौ वर्तते विज्ञेयः पुरुष इति ॥ १ ॥ | भाषण करता है वह समूल अर्थात् मूलके सहित सूख जाता है अर्थात् इस लोक और परलोक दोनोंसे ही विलग होकर नष्ट हो जाता है । मैं इस बातको जानता हूँ, इसलिये अज्ञानी पुरुषके समान मिथ्या भाषण नहीं कर सकता ।<br><br>इस प्रकार विश्वास दिलाये जानेपर वह राजकुमार चुपचाप—संकुचित हो रथपर चढ़कर जहाँसे आया था वहीं चला गया । इससे यह सिद्ध होता है कि अपने समीप नियमपूर्वक आये हुए योग्य जिज्ञासुके प्रति विज्ञ पुरुषको विद्याका उपदेश करना ही चाहिये तथा सभी अवस्थाओंमें मिथ्या भाषण कभी न करना चाहिये । [सुकेशा कहता है—'हे भगवन् !] मेरे हृदयमें ज्ञातव्यरूपसे काँटेके समान खटकते हुए उस पुरुषके विषयमें मैं आपसे पूछता हूँ कि वह ज्ञातव्य पुरुष कहाँ रहता है ? ॥ १ ॥ |
पिप्पलादका उत्तर—वह पुरुष शरीरमें स्थित है ।
तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्तीति ॥ २ ॥
[प्रश्न ६] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
: उससे आचार्य पिप्पलादने कहा—'हे सोम्य ! जिसमें इन सोलह कलाओंका प्रादुर्भाव होता है वह पुरुष इस शरीरके भीतर ही वर्तमान है ॥ २ ॥
| तस्मै स होवाच । इहैवान्तः-शरीरे हृदयपुण्डरीकाकाशमध्ये हे सोम्य स पुरुषो न देशान्तरे विज्ञेयो यस्मिन्नेता उच्यमानाः षोडश कलाः प्राणाद्याः प्रभवन्ति उत्पद्यन्त इति षोडशकलाभिः उपाधिभूताभिः सकल इव निष्कलः पुरुषो लक्ष्यतेऽविद्ययेति तदुपाधिकलाध्यारोपापनयेन विद्यया स पुरुषः केवलो दर्शयितव्य इति कलानां तत्प्रभवत्वम् उच्यते। प्राणादीनामत्यन्तनिर्विशेषे ऽद्वये शुद्धे तत्त्वे न शक्योऽध्यारोपमन्तरेण प्रतिपाद्यप्रतिपादनादिव्यवहारः कर्तुमिति कलानां प्रभवस्थित्यप्यया आरोप्यन्ते अविद्याविषयाः । चैतन्या- | उससे उस (पिप्पलादाचार्य) ने कहा—हे सोम्य ! उस पुरुषको यहीं—इस शरीरके भीतर हृदयपुण्डरीकाकाशमें ही जानना चाहिये—किसी अन्य देश (स्थान) में नहीं, जिस (पुरुष) में कि इन आगे कही जानेवाली प्राण आदि सोलह कलाओंका प्रादुर्भाव होता है अर्थात् जिससे ये उत्पन्न होती हैं। इन उपाधिभूत सोलह-कलाओंके कारण वह पुरुष कलाहीन होकर भी अविद्यावश कलावान्-सा दिखलायी देता है। उन औपाधिक कलाओंके अध्यारोपकी विद्यासे निवृत्ति करके उस पुरुषको शुद्ध दिखलाना है इसलिये प्राणादि कलाओंको उसीसे उत्पन्न होनेवाली कहा है, क्योंकि अत्यन्त निर्विशेष, अद्वय और विशुद्ध तत्त्वमें अध्यारोपके बिना प्रतिपाद्य-प्रतिपादन आदि कोई व्यवहार नहीं किया जा सकता । इसलिये उसमें कलाओंके अविद्याविषयक उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका आरोप किया जाता है, क्योंकि ये कलाएँ चैतन्यसे |
| ९० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| व्यतिरेकेणैव हि कला जायमानाः तिष्ठन्त्यः प्रलीयमानाश्च सर्वदा लक्ष्यन्ते । | अभिन्न रहकर ही सर्वदा उत्पन्न स्थित तथा लीन होती देखी जाती हैं। |
|---|---|
| अत एव भ्रान्ताः केचिद् <br> <sub>आत्मचैतन्ये विकल्पाः</sub> अग्निसंयोगाद्धृतमिव घटाद्याकारेण चैतन्यम् एव प्रतिक्षणं जायते नश्यतीति तन्निरोधे शून्यमिव सर्वमित्यपरे । घटादिविषयं चैतन्यं चेतयितुर्नित्यस्यात्मनोऽनित्यं जायते विनश्यतीत्यपरे । चैतन्यं भूतधर्म इति लौकायतिकः । अनपायोपजनधर्मकचैतन्यमात्मा एव नाम रूपाद्युपाधिधर्मैः प्रत्यवभासते “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५।३) “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० ३।९।२८) “विज्ञानघन एव” (बृ० उ० २।४।१२) इत्यादि श्रुतिभ्यः । स्वरूपव्यभिचारिषु | इसीसे कुछ भ्रान्त पुरुषोंका मत है कि 'अग्निके संयोगसे घृतके समान चैतन्य ही प्रत्येक क्षणमें घट आदि आकारोंमें उत्पन्न और नष्ट हो रहा है।' इनसे भिन्न दूसरों (शून्यवादियों) का मत है कि 'इनका निरोध हो जानेपर सब कुछ शून्यमय हो जाता है।' तथा अन्य (नैयायिक) कहते हैं कि 'चेतयिता नित्य आत्माकी घटादिको विषय करनेवाली अनित्य चेतनता उत्पन्न और नष्ट होती रहती है' तथा लौकायतिकों (देहात्मवादियों) का कथन है कि 'चेतनता भूतोंका धर्म है'। परन्तु 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' 'प्रज्ञानं ब्रह्म' 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' 'विज्ञानघन एव' इत्यादि श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता है कि उत्पत्ति-नाशरूप धर्मसे रहित चेतन ही आत्मा है; वही नाम-रूप आदि औपाधिक धर्मोंसे युक्त भास रहा है। अपने स्वरूपसे व्यभिचारी (बदलनेवाले) |
प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
| [ज्ञेयवस्तुनि ज्ञानस्य अव्यभिचारो भवति] | |
|---|---|
| पदार्थेषु चैतन्यस्याव्यभिचाराद्यथा यथा यो यः पदार्थो विज्ञायते तथा तथा ज्ञायमानत्वादेव तस्य तस्य चैतनस्याव्यभिचारित्वम् ।<br><br>वस्तुतत्त्वं भवति किञ्चित्; न ज्ञायत इति चानुपपन्नम् । रूपं च दृश्यते न चास्ति चक्षुरिति यथा । व्यभिचरति तु ज्ञेयम्; न ज्ञानं व्यभिचरति कदाचिदपि ज्ञेयम् , ज्ञेयाभावेऽपि ज्ञेयान्तरे भावाज्ज्ञानस्य । न हि ज्ञानेऽसति ज्ञेयं नाम भवति कस्यचित् ; सुषुप्तेऽदर्शनात् ।<br><br>ज्ञानस्यापि सुषुप्तेऽभावाज्ज्ञेयवज्ज्ञानस्वरूपस्य व्यभिचार इति चेत् । | पदार्थोंमें चैतन्यका व्यभिचार (परिवर्तन) न होनेके कारण जो पदार्थ जिस-जिसप्रकार जाना जाता है उसके उस-उसप्रकार जाने जानेके कारण ही उस-उस पदार्थके चैतन्यका अन्यभिचार सिद्ध होता है।\ *<br><br>‘कोई वस्तुतत्त्व है तो सही किन्तु जाना नहीं जाता’ ऐसा कहना तो ‘रूप तो दिखलायी देता है परन्तु नेत्र नहीं है’ इस कथनके समान अयुक्त ही है। ज्ञेयका तो ज्ञानमें व्यभिचार होता है किन्तु ज्ञानका ज्ञेयमें कभी व्यभिचार नहीं होता, क्योंकि एक ज्ञेयका अभाव होनेपर भी ज्ञेयान्तरमें ज्ञानका सद्भाव रहता ही है; ज्ञानके अभावमें तो ज्ञेय किसीके लिये रहता ही नहीं, जैसा कि सुषुप्तिमें उनका अभाव देखा जाता है।<br><br>मध्यस्थ— सुषुप्तिमें तो ज्ञानका भी अभाव है; अतः उस समय ज्ञेयके समान ज्ञानके स्वरूपका भी व्यभिचार होता है? |
* जो पदार्थ जिस प्रकार जाना जाता है उसके ज्ञानके प्रकारभेदका कारण तो उपाधि है परन्तु उसमें ज्ञानत्व उस अव्यभिचारी चैतन्यका ही है जो सारी उपाधियोंकी ओटमें उनके अधिष्ठानरूपसे सर्वत्र अनुस्यूत है। इसीलिये यह कहा गया है कि जो पदार्थ जिस प्रकार भासता है उसके उसी प्रकार भासित होनेसे ही उस पदार्थके चैतन्यका अव्यभिचार सिद्ध होता है, क्योंकि यदि उसमें चैतन्यका व्यभिचार होता तो उसका ज्ञान ही नहीं हो सकता था।
| ९२ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| ज्ञेयावभासकस्य ज्ञानस्या-<br>(सुषुप्तौ ज्ञानसद्भाव-स्थापनम्) लोकवज्ज्ञेयाभिव्यञ्जक-त्वात्स्वव्यङ्ग्याभाव-आलोकाभावानुपपत्ति-वत्सुषुप्ते विज्ञानाभावानुपपत्तेः । न ह्यन्धकारे चक्षुषा रूपानुपलब्धौ चक्षुषोऽभावः शक्यः कल्पयितुं वैनाशिकेन । | **सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं ! ज्ञेयका अवभासक ज्ञान प्रकाशके समान ज्ञेयकी अभिव्यक्तिका कारण है; अतः प्रकाश्य वस्तुओंके अभावमें जिस प्रकार प्रकाशका अभाव नहीं माना जाता उसी प्रकार सुषुप्तिमें वस्तुओंकी प्रतीति न होनेसे विज्ञानका अभाव मानना ठीक नहीं । अन्धकारमें रूपकी उपलब्धि न होनेपर वैनाशिक (क्षणिक विज्ञानवादी) भी नेत्रके अभावकी कल्पना नहीं कर सकता । |
| वैनाशिको ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावं कल्पयत्येवेति चेत् । | **मध्यस्थ—**परन्तु वैनाशिक तो ज्ञेयके अभावमें ज्ञानके अभावकी कल्पना करता ही है । |
| (वैनाशिकमत-समीक्षा) येन तदभावं कल्पयेत्तस्याभावः केन कल्प्यत इति वक्तव्यं वैनाशिकेन, तदभावस्यापि ज्ञेयत्वाज्ज्ञानाभावे तदनुपपत्तेः । | **सिद्धान्ती—**उस वैनाशिकको यह बतलाना चाहिये कि जिस (ज्ञान) से ज्ञेयके अभावकी कल्पना की जाती है उसका अभाव किससे कल्पना किया जाता है ? क्योंकि उस (ज्ञान) का अभाव भी ज्ञेयरूप होनेके कारण बिना ज्ञानके सिद्ध नहीं हो सकता । |
| ज्ञानस्य ज्ञेयाव्यतिरिक्तत्वाज्ज्ञेयाभावे ज्ञानाभाव इति चेत् । | **मध्यस्थ—**ज्ञान ज्ञेयसे अभिन्न है, इसलिये ज्ञेयके अभावमें ज्ञानका भी अभाव हो जाता है—ऐसा मानें तो ? |
| न; अभावस्यापि ज्ञेयत्वाभ्युपगमादभावोऽपि ज्ञेयोऽभ्युप- | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अभाव भी ज्ञेयरूप माना |
| प्रश्न ६ ]' | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| गम्यते वैनाशिकैर्नित्यश्च तद्व्यतिरिक्तं चेज्ज्ञानं नित्यं कल्पितं स्यात्तदभावस्य च ज्ञानात्मकत्वादभावत्वं वाङ्मात्रमेव न परमार्थतोऽभावत्वमनित्यत्वं च ज्ञानस्य । न च नित्यस्य ज्ञानस्याभावनाममात्राध्यारोपे किञ्चिन्नश्छिद्रम् । | गया है । वैनाशिकोंने अभावको भी ज्ञेय और नित्य स्वीकार किया है। यदि ज्ञान उससे ( ज्ञेयसे ) अभिन्न है तो वह [ उनके मतमें भी ] नित्य मान लिया जाता है। तथा उसका अभाव भी ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसका अभावत्व नाममात्रको ही रहता है, वास्तवमें ज्ञानका अभावत्व एवं अनित्यत्व सिद्ध नहीं होता । नित्यज्ञानका केवल 'अभाव' नाम रख देनेसे ही हमारा कुछ बिगड़ नहीं जाता । |
| अथाभावो ज्ञेयोऽपि सन् ज्ञानव्यतिरिक्त इति चेत् । | **मध्यस्थ—**किन्तु यदि अभाव ज्ञेय होनेपर भी ज्ञानसे भिन्न माना जाय तो ? |
| न तर्हि ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावः । | **सिद्धान्ती—**तब तो ज्ञेयका अभाव होनेपर ज्ञानका अभाव हो ही नहीं सकता । |
| ज्ञेयं ज्ञानव्यतिरिक्तं न तु ज्ञानं ज्ञेयव्यतिरिक्तमिति चेत् । | **मध्यस्थ—**परन्तु ज्ञेय ही ज्ञानसे भिन्न माना जाय, ज्ञान ज्ञेयसे भिन्न न माना जाय तो ? |
| न; शब्दमात्रत्वाद्विशेषानुपपत्तेः । ज्ञेयज्ञानयोरेकत्वं चेदभ्युपगम्यते ज्ञेयं ज्ञानव्यतिरिक्तं ज्ञानं ज्ञेयव्यतिरिक्तं नेति तु शब्दमात्रमेतद्वह्निरग्निव्यतिरिक्तः | **सिद्धान्ती—**ऐसा मत कहो, क्योंकि यह कथन केवल शब्दमात्र होनेसे इसमें कोई विशेषता नहीं है । यदि तुम ज्ञान और ज्ञेयकी अभिन्नता मानते हो तो 'ज्ञेय ज्ञानसे भिन्न है किन्तु ज्ञान ज्ञेयसे भिन्न नहीं है' यह कथन इसी प्रकार केवल शब्दमात्र है जैसे यह मानना |
९४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ६
| अग्निर्न वह्निव्यतिरिक्त इति यद्वदभ्युपगम्यते । ज्ञेयव्यतिरेके तु ज्ञानस्य ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावा-नुपपत्तिः सिद्धा । | कि 'वह्नि अग्निसे भिन्न हैं, परन्तु अग्नि वह्निसे भिन्न नहीं है । अतः यह सिद्ध हुआ कि ज्ञान ज्ञेयसे व्यतिरिक्त होनेके कारण ज्ञेयका अभाव होनेपर ज्ञानका अभाव नहीं माना जा सकता । |
| ज्ञेयाभावेऽदर्शनादभावो ज्ञानस्येति चेत् ? | मध्यस्थ—परन्तु ज्ञेयका अभाव हो जानेपर तो प्रतीत न होनेके कारण ज्ञानका भी अभाव हो जाता है ? |
| न सुषुप्ते ज्ञप्त्यभ्युपगमात् । वैनाशिकैरभ्युपगम्यते हि सुषुप्ते-ऽपि ज्ञानास्तित्वम् । | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि सुषुप्तिमें ज्ञप्तिका अस्तित्व माना गया है—वैनाशिकोंने सुषुप्तिमें भी विज्ञानका अस्तित्व स्वीकार किया ही है । |
| तत्रापि ज्ञेयत्वमभ्युपगम्यते ज्ञानस्य स्वेनैवेति चेत् । | मध्यस्थ—परन्तु उस अवस्थामें भी ज्ञानका ज्ञेयत्व स्वयं अपनेसे (ज्ञानसे) ही माना जाता है ।* |
| न, भेदस्य सिद्धत्वात् । सिद्धं ह्यभावविज्ञेयविषयस्य ज्ञानस्य अभावज्ञेयव्यतिरेकाज्ज्ञेयज्ञानयोः अन्यत्वम् । न हि तत्सिद्धं मृत-मिवोज्जीवयितुं पुनरन्यथा कर्तुं शक्यते वैनाशिकशतैरपि । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उन (ज्ञान और ज्ञेय) का भेद सिद्ध हो ही चुका है । अभाव-रूप विज्ञेयविषयक ज्ञान अभावरूप ज्ञेयसे भिन्न होनेके कारण ज्ञेय और ज्ञानकी भिन्नता पहले सिद्ध हो चुकी है । उस सिद्ध हुई बातको, मृतकको पुनः जीवित करनेके समान, सैकड़ों वैनाशिक भी अन्यथा नहीं कर सकते । |
* अर्थात् ज्ञान ज्ञानका ही ज्ञेय माना गया है ।
| प्रश्न ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९५ |
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| ज्ञानस्य ज्ञेयत्वमेवेति तदप्यन्येन<br><br>तदप्यन्येनेति त्वत्पक्षेऽतिप्रसङ्ग<br><br>इति चेत् । | पूर्व०—ज्ञानको किसी अन्य ज्ञेयकी अपेक्षा है—यदि ऐसा मानें तो तेरे पक्षमें ‘वह ज्ञान किसी अन्यका ज्ञेय है और वह किसी अन्यका’ ऐसा माननेसे अनवस्था-दोष होगा । |
|---|---|
| न, तद्विभागोपपत्तेः सर्वस्य ।<br><br>यदा हि सर्वं ज्ञेयं कस्यचित्तदा<br><br>तद्व्यतिरिक्तं ज्ञानं ज्ञानमेवेति<br><br>द्वितीयो विभाग एवाभ्युपगम्यते<br><br>अवैनाशिकैर्न तृतीयस्तद्विषय<br><br>इत्यनवस्थानुपपत्तिः । | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि सम्पूर्ण वस्तुओंका [ ज्ञान और ज्ञेयरूपसे ] विभाग किया जा सकता है। जब कि सब वस्तुएँ किसी एकहीकी ज्ञेय हैं तो उनसे भिन्न [ उनका प्रकाशक ] ज्ञान तो ज्ञान ही रहता है। यह वैनाशिकोंसे इतर मतावलम्बियोंने दूसरा ही विभाग माना है। इस विषयमें कोई तीसरा विभाग नहीं माना गया । अतः उनके मतमें अनवस्था नहीं आ सकती । |
| ज्ञानस्य स्वेनैवाविज्ञेयत्वे सर्वज्ञत्वहानिरिति चेत् । | पूर्व०—यदि ज्ञानको अपनेसे ही ज्ञेय न माना जायगा तो उसके सर्वज्ञत्वकी हानि होगी । |
| सोऽपि दोषस्तस्यैवास्तु किं तन्निबर्हणेनास्माकम् । अनवस्थादोषश्च ज्ञानस्य ज्ञेयत्वाभ्युपगमात् । अवश्यं च वैनाशिकानां ज्ञानं ज्ञेयं स्वात्मना चाविज्ञेयत्वेनानवस्थानिवार्या । | सिद्धान्ती—यह दोष भी उस (वैनाशिक) का ही हो सकता है; हमें उसे रोकनेकी क्या आवश्यकता है ? अनवस्था-दोष भी ज्ञानका ज्ञेयत्व माननेसे ही है। वैनाशिकोंके मतमें ज्ञान ज्ञेय तो अवश्य ही है; अतः अपना ही ज्ञेय न हो सकनेके कारण उसकी अनवस्था भी अनिवार्य ही है । |
| ९६ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| (संस्कृत) | (हिन्दी अनुवाद) |
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| समान एवायं दोष इति चेत् । | पूर्व०—यह दोष* तो तुम्हारे पक्षमें भी ऐसा ही है।* |
| न ज्ञानस्यैकत्वोपपत्तेः ।<br><br>(ज्ञानावभासस्य औपाधिकम् अनेकत्वम्) सर्वदेशकालपुरुषाद्यवस्थमेकमेव ज्ञानं नामरूपाद्यनेकोपाधिभेदात् सवित्रादिजलादिप्रतिबिम्बवद् अनेकधावभासत इति । नासौ दोषः । तथा चेहेदमुच्यते । | सिद्धान्ती—नहीं, ज्ञानका एकत्व सिद्ध हो जानेके कारण [हमारे मतमें ऐसा कोई दोष नहीं आ सकता; हम तो मानते हैं कि] सम्पूर्ण देश, काल और पुरुष आदि अवस्थाओंमें, जलादिमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्य आदिके समान एक ही ज्ञान अनेक प्रकारसे भासित हो रहा है। अतः [हमारे मतमें] यह दोष नहीं है। इसीसे यहाँ यह [कलाओंके प्रादुर्भावकी] बात कही गयी है। |
| ननु श्रुतेरिहैवान्तःशरीरे परिच्छिन्नः कुण्डबदरवत्पुरुष इति । | पूर्व०—परन्तु इस श्रुतिके अनुसार तो पुरुष, कूँडेमें बेरके समान इस शरीरमें ही परिच्छिन्न है। |
| न, प्राणादिकलाकारणत्वात् । न हि शरीरमात्रपरिच्छिन्नस्य प्राणश्रद्धादीनां कलानां कारणत्वं प्रतिपत्तुं शक्नुयात् । कलाकार्यत्वाच्च शरीरस्य । न हि पुरुषकार्याणां कलानां कार्यं<br><br>(आत्मनः अपरिच्छिन्नत्व-निरूपणम्) | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि पुरुष प्राणादि कलाओंका कारण है; और जो शरीरमात्रसे परिच्छिन्न होगा उसे प्राण एवं श्रद्धादिकलाओंके कारण-रूपसे कोई नहीं जान सकता, क्योंकि शरीर तो उन कलाओंका ही कार्य है। पुरुषकी कार्यरूप कलाओंका कार्य होकर शरीर |
* क्योंकि ज्ञानको किसीका ज्ञेय न माननेसे उसका व्यवहार ही सिद्ध नहीं हो सकता।
प्रश्न ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
| सच्छरीरं कारणकारणं स्वस्य पुरुषं कुण्डवदरमिवाभ्यन्तरीकुर्यात् । | अपने कारणके कारण पुरुषको, कूँडेमें बेरके समान, अपने भीतर नहीं कर सकता । |
| बीजवृक्षादिवत्स्यादिति चेत्।<br>यथा बीजकार्यं वृक्षस्तत्कार्यं च फलं स्वकारणकारणं बीजम् अभ्यन्तरीकरोत्याम्रादि तद्वत् पुरुषमभ्यन्तरीकुर्याच्छरीरं स्वकारणकारणमपीति चेत् । | पूर्व ०—यदि बीज और वृक्षादिके समान ऐसा हो सकता हो तो ?<br>जिस प्रकार बीजका कार्य वृक्ष है और उसका कार्य आम्रादि फल अपने कारणके कारण बीजको अपने भीतर कर लेता है उसी प्रकार अपने कारणका कारण होनेपर भी शरीर पुरुषको अपने भीतर कर लेगा—ऐसा मानें तो ? |
| न; अन्यत्वात्सावयवत्वाच्च ।<br>दृष्टान्ते कारणबीजाद्वृक्षफलसंवृत्तान्यन्यान्येव बीजानि दार्ष्टान्तिके तु स्वकारणकारणभूतः स एव पुरुषः शरीरेऽभ्यन्तरीकृतः श्रूयते। बीजवृक्षादीनां सावयवत्वाच्च स्यादाधाराधेयत्वं निरवयवश्च पुरुषः सावयवाश्च कलाः शरीरं च । एतेनाकाशस्यापि शरीराधारत्वमनुपपन्नं | सिद्धान्ती—[ पूर्वबीजसे ] अन्य और सावयव होनेके कारण यह दृष्टान्त ठीक नही है । दृष्टान्तमें कारणरूप बीजसे वृक्षके फलसे ढँके हुए बीज भिन्न ही हैं, किन्तु दार्ष्टान्तमें तो अपने कारणका कारणरूप वही पुरुष शरीरके भीतर हुआ सुना जाता है। इसके सिवा सावयव होनेके कारण भी बीज और वृक्षादिमें परस्पर आधार-आधेयभाव हो सकता है । किन्तु इधर पुरुष तो निरवयव है तथा कलाएँ और शरीर सावयव हैं । इससे तो शरीर आकाशका भी आधार नहीं बन सकता, फिर |
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| ९८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| किमुताकाशकारणस्य पुरुषस्य तस्मादसमानो दृष्टान्तः। | आकाशके भी कारणस्वरूप पुरुषकी तो बात ही क्या है। इसलिये यह दृष्टान्त विषम है। |
| किं दृष्टान्तेन वचनात्स्यादिति चेत्। | **मध्यस्थ—**दृष्टान्तसे क्या है ? श्रुतिके वचनसे तो ऐसा ही होना चाहिये। |
| न; वचनस्याकारकत्वात्। न हि वचनं वस्तुनोऽन्यथाकरणे व्याप्रियते। किं तर्हि? यथाभूतार्थावद्योतने। तस्मादन्तःशरीर इत्येतद्वचनमण्डस्यान्तर्व्योमेतिवच्च द्रष्टव्यम्। | **सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वचन कुछ करनेवाला नहीं है। किसी वस्तुको कुछ-का-कुछ कर देनेके लिये वचन प्रवृत्त नहीं हुआ करता। तो फिर वह क्या करता है? वह तो ज्यों-की-त्यों वस्तु दिखलानेमें ही प्रवृत्त होता है। अतः 'अन्तःशरीरे' इस वचनको 'अण्डेके भीतर आकाश' इस कथनके समान ही समझना चाहिये। |
| उपलब्धिनिमित्तत्वाच्च, दर्शनश्रवणमननविज्ञानादिलिङ्गैः अन्तःशरीरे परिच्छिन्न इव ह्युपलभ्यते पुरुष उपलभ्यते चात उच्यतेऽन्तःशरीरे सोम्य स पुरुष इति। न पुनराकाशकारणः सन्कुण्डबदरवच्छरीरपरिच्छिन्न | इसके सिवा उपलब्धिका कारण होनेसे भी [ ऐसा कहा गया है ]। दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान (जानना) आदि लिङ्गोंसे पुरुष शरीरके भीतर परिच्छिन्न-सा दिखलायी देता है, तथा इस (शरीर) में ही उसकी उपलब्धि भी होती है। इसीलिये यह कहा गया है कि 'हे सोम्य! वह पुरुष इस शरीरके भीतर है।' नहीं तो, आकाशका भी कारण होकर वह कूँडेमें बेरके समान शरीरमें परिच्छिन्न है—ऐसी |
| प्रश्न ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९९ |
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| इति मनसापीच्छति वक्तुं मूढोऽपि किमुत प्रमाणभूता श्रुतिः ॥ २ ॥ | बात कहनेकी तो कोई मूढ पुरुष भी अपने मनसे भी इच्छा नहीं कर सकता, फिर प्रमाणभूता श्रुतिकी तो बात ही क्या है ? ॥ २ ॥ |
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| यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्तीत्युक्तं पुरुषविशेषणार्थं कलानां प्रभवः स चान्यार्थोऽपि श्रुतः केन क्रमेण स्यादित्यत इदमूच्यते—चेतनपूर्विका च सृष्टिरित्येवमर्थं च । | ऊपर 'जिसमें ये सोलह कलाएँ उत्पन्न होती हैं' यह बात पुरुषकी विशेषता बतलानेके लिये कही है। इस प्रकार अन्य अर्थ [ यानी पुरुषकी विशेषता बतलाने ] के लिये श्रवण किया हुआ वह कलाओंका प्रादुर्भाव किस क्रमसे हुआ होगा यह बतलानेके लिये तथा सृष्टि चेतनपूर्विका है—इस बातको भी प्रकट करनेके लिये अब इस प्रकार कहा जाता है— |
ईक्षणपूर्वक सृष्टि
स ईक्षांचक्रे । कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥
उसने विचार किया कि किसके उत्क्रमण करनेपर मैं भी उत्क्रमण कर जाऊँगा और किसके स्थित रहनेपर मैं स्थित रहूँगा ? ॥ ३ ॥
| स पुरुषः षोडशकलः पृष्टो यो भारद्वाजेन ईक्षांचक्रे ईक्षणं दर्शनं चक्रे कृतवानित्यर्थः सृष्टिफलक्रमादिविषयम् । कथम् ? | उस सोलह कलाओंवाले पुरुषने, जिसके विषयमें भारद्वाजने प्रश्न किया था, [ प्राणादिकी ] उत्पत्ति, [ उसके उत्क्रमण आदि ] फल और [ प्राणसे श्रद्धा आदि ] क्रमके विषयमें ईक्षण-दर्शन यानी विचार किया । किस प्रकार विचार |
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| १०० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| (संस्कृत-भाष्य) | (हिन्दी-अनुवाद) |
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| इत्युच्यते कस्मिन्कर्तृविशेषे देहादुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि अहमेवं कस्मिन्वा शरीरे प्रतिष्ठिते अहं प्रतिष्ठास्यामि प्रतिष्ठितः स्यामित्यर्थः ।<br><br>नन्वात्माकर्ता प्रधानं कर्तृ, <br>(सूत्रे सांख्यानां प्रधानकर्तृत्वम्) अतः पुरुषार्थप्रयोजनम् उररीकृत्य प्रधानं प्रवर्तते महदाद्याकारेण । तत्रेदम् अनुपपन्नं पुरुषस्य स्वातन्त्र्येण ईक्षापूर्वकं कर्तृत्ववचनम्; सत्त्वादिगुणसाम्ये प्रधाने प्रमाणोपपन्ने सृष्टिकर्तरि सतीश्वरेच्छानुवर्तिषु वा परमाणुषु सत्स्वात्मनोऽप्येकत्वेन कर्तृत्वे साधनाभावादात्मन आत्मन्यनर्थकर्तृत्वानुपपत्तेश्च । न हि चेतनावान्बुद्धिपूर्वककार्यात्मनोऽनर्थं कुर्यात् । तस्मात्पुरुषार्थेन प्रयोजनेन ईक्षापूर्वकमिव नियतक्रमेण प्रवर्त- | किया ? सो बतलाते हैं—‘किस विशेष कर्ताके शरीरसे उत्क्रमण करनेपर मैं भी उत्क्रमण कर जाऊँगा तथा इसी प्रकार शरीरमें किसके स्थित रहनेपर मैं भी स्थित रहूँगा’ [—यह निश्चय करनेके लिये उसने विचार किया] ।<br><br>पूर्व०—[ सांख्यमतानुसार ] आत्मा अकर्ता है और प्रधान सब कुछ करनेवाला है । अतः पुरुषके लिये उसके [भोग और अपवर्गरूप ] प्रयोजनको सामने रख प्रधान ही महदादिरूपसे प्रवृत्त होता है । इस प्रकार सत्त्वादि गुणोंके साम्यावस्थारूप एवं सृष्टिकर्ता प्रधानके प्रमाणतः सिद्ध होते हुए तथा [ नैयायिकके मतानुसार ] ईश्वरकी इच्छाका अनुवर्तन करनेवाले परमाणुओंके रहते हुए एकमात्र होनेके कारण आत्माके कर्तृत्वमें कोई साधन न होनेसे तथा उसका अपने ही लिये अनर्थकारित्व भी सिद्ध न हो सकनेके कारण पुरुषका जो स्वतन्त्रतासे ईक्षणपूर्वक कर्तृत्व बतलाया गया है वह अयुक्त है; क्योंकि बुद्धिपूर्वक कर्म करनेवाला कोई भी चेतनायुक्त व्यक्ति अपना अनर्थ नहीं करेगा । अतः पुरुषके प्रयोजनसे मानो ईक्षापूर्वक नियमित क्रमसे प्रवृत्त हुए |
| प्रश्न ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०१ |
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| मानेऽचेतने प्रधाने चेतनवदुपचारोऽयं 'स ईक्षांचक्रे' इत्यादिः। यथा राज्ञः सर्वार्थकारिणि भृत्ये राजेति तद्वत् । | अचेतन प्रधानमें चेतनकी भाँति 'उसने विचार किया' इत्यादि प्रयोग औपचारिक है; जैसे राजाका सारा कार्य करनेवाले सेवकको भी 'राजा' कहा जाता है, उसीके समान इसे समझना चाहिये । |
| न; आत्मनो भोक्तृत्ववत्कर्तृत्वोपपत्तेः। (सांख्यमत-निरसनम्) यथा सांख्यस्य चिन्मात्रस्यापरिणामिनोऽप्यात्मनो भोक्तृत्वं तद्वद्वेदवादिनामीक्षादिपूर्वकं जगत्कर्तृत्वमुपपन्नं श्रुतिप्रामाण्यात् । | **सिद्धान्ती—**ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि आत्माके भोक्तृत्वके समान उसका कर्तृत्व भी बन सकता है। जिस प्रकार सांख्यमतमें चिन्मात्र और अपरिणामी आत्माका भोक्तृत्व सम्भव है उसी प्रकार श्रुति-प्रमाणसे वेदवादियोंके मतमें उसका ईक्षणपूर्वक कर्तृत्व भी बन सकता है। |
| तत्त्वान्तरपरिणाम आत्मनोऽनित्यत्वाशुद्धत्वानेकत्वनिमित्तो न चिन्मात्रस्वरूपविक्रिया । अतः पुरुषस्य स्वात्मन्येव भोक्तृत्वे चिन्मात्रस्वरूपविक्रिया न दोषाय। भवतां पुनर्वेदवादिनां सृष्टिकर्तृत्वे तत्त्वान्तरपरिणाम एवेत्यात्मनोऽनित्यत्वादिसर्वदोषप्रसङ्ग इति चेत् । | **पूर्व०—**आत्माका तत्त्वान्तर परिणाम ही उसके अनित्यत्व, अशुद्धत्व और अनेकत्वका कारण है, चिन्मात्र-स्वरूपका विकार नहीं। अतः पुरुषका अपनेमें ही भोक्तृत्व रहनेके कारण उसका चिन्मात्रस्वरूप विकार किसी प्रकारके दोषका कारण नहीं है । किन्तु आप वेदवादियोंके मतानुसार सृष्टिका कर्तृत्व माननेमें तो उसका तत्त्वान्तरपरिणाम ही मानना होगा और इससे आत्माके अनित्यत्व आदि सब प्रकारके दोषोंका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । |
| १०२ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| [आत्मनः कर्तृत्वादि-व्यवहारस्य औपाधिकत्वम्] | |
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| न; एकस्याप्यात्मनोऽविद्यायां विषयनामरूपोपाध्यनुपाधिकृतविशेषाभ्युपगमादविद्याकृतनामरूपोपाधिकृतो हि विशेषोऽभ्युपगम्यत आत्मनो बन्धमोक्षादिशास्त्रकृतसंव्यवहाराय परमार्थतोऽनुपाधिकृतं च तत्त्वमेकमेवाद्वितीयमुपादेयं सर्वतार्किकबुद्ध्यनवग्राह्यमभयं शिवम् इष्यते न तत्र कर्तृत्वं भोक्तृत्वं वा क्रियाकारकफलं च स्याद् अद्वैतत्वात्सर्वभावानाम् । | **सिद्धान्ती—**यह बात नहीं है, क्योंकि हम अविद्याविषयक नाम-रूपमय उपाधि तथा उसके अभावके कारण ही एकमात्र (निरुपाधिक) आत्माकी [औपाधिक] विशेषता मानते हैं। बन्ध-मोक्षादि शास्त्रके व्यवहारके लिये ही आत्माका अविद्याकृत नाम-रूप-उपाधिमूलक विशेष माना गया है; परमार्थतः तो अनुपाधिकृत एक अद्वितीय तत्त्व ही मानना चाहिये, जो सम्पूर्ण तार्किकोंकी बुद्धिका अविषय, अभय और शिवस्वरूप है। उसमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व अथवा क्रिया-कारक या फल कुछ भी नहीं है, क्योंकि सभी भाव अद्वैतरूप हैं। |
| सांख्यास्त्वविद्याध्यारोपितम् एव पुरुषे कर्तृत्वं क्रियाकारकं फलं चेति कल्पयित्वागमवाह्यत्वात्पुनस्ततस्त्रस्यन्तः परमार्थत एव भोक्तृत्वं पुरुषस्येच्छन्ति तत्त्वान्तरं च प्रधानं पुरुषात्परमार्थवस्तुभूतमेव कल्पयन्तोऽन्यतार्किककृतबुद्धिविषयाः सन्तो विहन्यन्ते । | परन्तु सांख्यवादी तो पुरुषमें पहले अविद्यारोपित क्रिया, कारक, कर्तृत्व और फलकी कल्पना कर फिर वेदबाह्य होनेके कारण उससे घबड़ाकर पुरुषका वास्तविक भोक्तृत्व मान बैठे हैं। तथा प्रधानको पुरुषसे भिन्न तत्त्वान्तरभूत परमार्थवस्तु मान लेनेके कारण अन्य तार्किकोंकी बुद्धिके विषय होकर अपने सिद्धान्त-से गिरा दिये जाते हैं। |
| प्रश्न ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०३ |
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| तथेतरे तार्किकाः सांख्यैः । इत्येवं परस्परविरुद्धार्थकल्पनात् आमिषार्थिन इव प्राणिनोऽन्यो-न्यविरुद्धमानार्थदर्शित्वादूदूरम् एवापकृष्यन्ते। अतस्तन्मतमनादृत्य वेदान्तार्थतत्त्वमेकत्वदर्शनं प्रति आदरवन्तो मुमुक्षवः स्युरिति ता-ार्किकमतदोषप्रदर्शनं किञ्चिदुच्यते अस्माभिर्न तु तार्किकव चात्पर्य्येण। <br><br> तथैतदत्रोक्तम्— <br><br> “विवदत्स्वेव निक्षिप्य <br> विरोधोद्भवकारणम् । <br> तैः संरक्षितसद्बुद्धिः <br> सुखं निर्वाति वेदवित् ॥” <br> इति । <br><br> किं च भोक्तृत्वकर्त्तृत्वयो-र्विक्रिययोर्विशेषाानुपपत्तिः । का नामासौ कर्तृत्वाज्जात्यन्तरभूता भोक्तृत्वविशिष्टा विक्रिया यतो भोक्तैव पुरुषः कल्प्यते न कर्ता | इसी प्रकार दूसरे तार्किक सांख्य-वादियोंसे परास्त हो जाते हैं। इस प्रकार परस्पर विरुद्ध अर्थकी कल्पना कर मांसलोलुप प्राणियोंके समान एक-दूसरेके विरोधी अर्थको ही देखने-वाले होनेसे परमार्थतत्त्वसे दूर ही हटा दिये जाते हैं। अतः मुमुक्षुलोग उनके मतका अनादर कर वेदान्तके तात्पर्यार्थ एकत्वदर्शनके प्रति आदर-युक्त हों—इसलिये ही हम तार्किकों-के मतका किञ्चित् दोष प्रदर्शित करते हैं, तार्किकोंके समान कुछ तत्परतासे नहीं । <br><br> तथा इस विषयमें ऐसा कहा गया है— <br><br> “[ भेद सत्य है—इस ] विरोध-की उत्पत्तिके कारणको विवाद करनेवालोंके ऊपर ही छोड़कर जिसने अपनी सद्बुद्धिको उनसे सुरक्षित रक्खा है वह वेदवेत्ता सुख-पूर्वक शान्तिको प्राप्त हो जाता है।” <br><br> इसके सिवा, भोक्तृत्व और कर्तृत्व इन दोनों विकारोंमें कोई अन्तर मानना भी उचित नहीं है । कर्तृत्वसे विजातीय यह भोक्तृत्व-विशिष्ट विकार है क्या ? जिससे कि पुरुष भोक्ता ही माना जाता |
| १६४ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
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| प्रधानं तु कर्त्रेव न भोक्त्रीति । | है, कर्ता नहीं तथा प्रधान कर्ता ही है, भोक्ता नहीं ? |
|---|---|
| नन्ूक्तं पुरुषश्चिन्मात्र एव स च स्वात्मस्थो विक्रियते भुञ्जानो न तत्त्वान्तरपरिणामेन । प्रधानं तु तत्त्वान्तरपरिणामेन विक्रियतेऽतोऽनेकमशुद्धम् अचेतनं चेत्यादिधर्मवत्तद्विपरीतः पुरुषः । <br><br> (सांख्यानां कर्तृत्वभोक्तृत्वस्वरूपविवेचनम्) | पूर्व०— यह पहले ही कहा जा चुका है कि पुरुष चिन्मात्र ही है और वह भोग करते समय अपने स्वरूपमें स्थित हुआ ही विकारोंको प्राप्त होता है—उसका विकार तत्त्वान्तरपरिणामके द्वारा नहीं होता । किन्तु प्रधान तत्त्वान्तर-परिणामके द्वारा विकृत होता है; अतः वह [ महत्तत्त्वादि-भेदसे ] अनेक, अशुद्ध और अचेतन आदि धर्मोंसे युक्त है, तथा पुरुष उससे विपरीत स्वभाववाला है । |
| नासौ विशेषो वाङ्मात्रत्वात् । <br><br> (अस्य परिहारः) <br><br> प्राग्भोगोत्पत्तेः केवलचिन्मात्रस्य पुरुषस्य भोक्तृत्वं नाम विशेषो भोगोत्पत्तिक़ाले चेज्जायते निवृत्ते च भोगे पुनस्तद्विशेषादपेतश्चिन्मात्र एव भवतीति चेन्महदाद्याकारेण च परिणम्य प्रधानं ततोऽपेत्य पुनः प्रधानं स्वरूपेणावतिष्ठत इत्यस्यां कल्पनायां न कश्चिद्विशेष इति वाङ्मात्रेण प्रधान- | सिद्धान्ती— यह कोई विशेषता नहीं है, क्योंकि यह तो केवल शब्दमात्र है । यदि भोगोत्पत्तिके पूर्व केवल चिन्मात्ररूपसे स्थित पुरुषमें भोगकी उत्पत्तिके समय ही भोक्तृत्वरूप कोई विशेषता उत्पन्न होती है और भोगके निवृत्त होनेपर उस विशेषताके दूर हो जानेपर वह फिर चिन्मात्र ही रह जाता है तो प्रधान भी महत् आदिरूपसे परिणत होकर उनसे निवृत्त होनेपर फिर प्रधानरूपसे ही स्थित हो जाता है । अतः इस कल्पनामें कोई विशेषता नहीं है; इसलिये तुम्हारेद्वारा प्रधान और पुरुषके |
| प्रश्न ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०५ |
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| पुरुषयोर्विशिष्टविक्रिया कल्प्यते । | विशिष्ट विकारकी कल्पना केवल शब्दमात्रसे ही की गयी है । |
| अथ भोगकालेऽपि चिन्मात्र एव प्राग्वत्पुरुष इति चेत् । | पूर्व०—ठीक है, परन्तु पुरुष भोगकालमें भी पूर्ववत् चिन्मात्र ही है। |
| न तर्हि परमार्थतो भोगः पुरुषस्य । | सिद्धान्ती—तब तो परमार्थतः पुरुषका भोग ही सिद्ध नहीं होता। |
| भोगकाले चिन्मात्रस्य विक्रिया परमार्थैव तेन भोगः पुरुषस्येति चेत् । | पूर्व०—परन्तु भोगकालमें जो चिन्मात्र पुरुषका विकार होता है वह वास्तविक ही होता है; इससे पुरुषका भोग सिद्ध होता है। |
| न; प्रधानस्यापि भोगकाले विक्रियावत्त्वाद्भोक्तृत्वप्रसङ्गः । चिन्मात्रस्यैव विक्रिया भोक्तृत्वम् इति चेदौष्ण्याद्यसाधारणधर्म-वतामग्न्यादीनामभोक्तृत्वे हेत्व-नुपपत्तिः । | सिद्धान्ती—नहीं, भोगकालमें तो प्रधान भी विकारयुक्त होता है, इससे उसके भी भोक्तृत्वका प्रसंग आ जायगा। यदि कहो कि भोक्तृत्व चिन्मात्रके ही विकारका नाम है तो उष्णता आदि असाधारण धर्मवाले अग्नि आदिके अभोक्तृत्वमें भी कोई कारण नहीं दिखलायी देता [क्योंकि जिस प्रकार चेतनता पुरुषका असाधारण धर्म है उसी प्रकार उष्णता आदि उनके असाधारण धर्म हैं]। |
| प्रधानपुरुषयोर्द्वयोर्युगपद्भो-क्तृत्वमिति चेत् । | मध्यस्थ—यदि प्रधान और पुरुष दोनोंका साथ-साथ भोक्तृत्व माना जाय तो ? |