प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
( ५७ ) लक्ष्मणः—कथं कथं किमिद नाम ? क्रमप्राप्ते हृते राज्ये भुवि शोच्यासने नृपे । इदानीमपि सन्देहः किं क्षमा निर्मनस्विता ॥ ( १६ ) रामः—सुमित्रामातः । अस्मद्राज्यभ्रंशो भवत उद्योगं जनयति । आ., अपण्डितः खलु भवान् । भरतो वा भवेद् राजा वयं वा ननु तत् समम् । यदि तेऽस्ति धनु.श्लाघा स राजा परिपाल्यताम् ॥ ( २० ) लक्ष्मणः—न शक्नोमि रोषं धारयितुम् । भवतु भवतु । गच्छाम- स्तावत् । (प्रस्थित.) रामः—त्रैलोक्यं दग्धुकामेव ललाटपुटसंस्थिता । भ्रुकुटिर्लक्ष्मणस्यैषा नियतीव व्यवस्थिता ॥ ( २१ ) सुमित्रामातः ! इतस्तावत् । शब्दार्थ—सहसे = सहन करते हो । अक्षोभ्यः = शान्त । क्षोभितः = चंचल बना दिया गया । रुष्टेन = कुपित बने हुए । शताकीर्णाम् = सैकड़ों लोगो से घने बने हुए । स्वजननिभृतः = आत्मीयों पर क्षमाशील । मृदुः = शान्त । परिभूयते = अपमानित होता है । यतः = जिस कारण से । अपूर्वः = अनोखा । आयासः = खेद । सुमित्रामातः = सुमित्रा माता य य स = सुमित्रा जिसकी जननी है, वह अर्थात् सुमित्रा का पुत्र = लक्ष्मण । शोच्यासने = दुःख- पूर्णा आसन या स्थिति वाले । निर्मनस्विता = आत्माभिमान शून्यता अस्मद्राज्यभ्रंशः = हमारा राज्य से च्युत् होना । भवतः = आपके । उद्योगं = परिश्रम को । जनयति = प्रेरित करती है । अपण्डितः = विवेकहीन । धनुः- श्लाघा = धनुर्विद्या में प्रवीणता । रोषं = क्रोध को । दग्धुकामा = जलाने की इच्छा वाले । ललाटपुटसंस्थिता = भालपर विधमान । भ्रुकुटिः = भौंह । नियती = भाग्य की इच्छा । व्यवस्थिता=स्थिर निश्चय वाली । अन्वय- अक्षोभ्यः धैर्यसागरः लक्ष्मणः केन क्षोभितः ? रुष्टेन येन अग्रतः शताकीर्णाम् इव पश्यामि । (१७) अन्वय—यदि राज्ञः मोहं न सहसे, धनुः स्पृश, दया मा । स्वजननिभृतः मृदुः सर्वः एवं परिभूयते । अथ न रुचित, त्वं मां मुञ्च । अहं
( 60 ) रामः—वने खलु वस्तव्यम् ! सीता—तत् खलु मे प्रासादः । रामः—श्वश्रूश्वशुरशुश्रूषापि च ते निर्वर्तितव्या । सीता—एनामुद्दिश्य देवतानां प्रणामः क्रियते । रामः—लक्ष्मण ! वार्यतामियम् । लक्ष्मणः—आर्य ! नोत्सहे श्लाघनीये काले वारयितुमत्रभवतीम् । कुतः— (अनुचरति शशाङ्कं राहुदोषेऽपि तारा) पतति च वनवृक्षे याति भूमिं लता च । त्यजति न च करेणुः पङ्कलग्नं गजेन्द्रं व्रजतु चरतु धर्मं भर्तृनाथा हि नार्यः ॥ (२५) (प्रविश्य) चेटी—जयतु भट्टिनी । नेपथ्यपालिन्यार्यरैवा प्रणम्य विज्ञापयति- अवदातिकाया संगीतशालाया आच्छिद्य वल्कला आनीताः । इमेऽपरा अननुभूता वल्कलाः । निर्वर्त्यतां तावत् किल प्रयोजनमिति । रामः—भद्रे, आनय, सन्तुष्टैषा । वयमर्थिन । चेटी—गृह्णातु भर्ता । (तथा कृत्वा निष्क्रान्ता) (रामो गृहीत्वा परिधत्ते ) शब्दार्थ—स्थैर्यम् = धैर्य को । उत्पादथता = उत्पन्न करने वाले । नमयि = उठाया जाये । अवेक्षमाणो = प्रतीक्षा या पालन करने वाले । मुञ्चानि = छोड़ा जाए । मातरि = माता कैकेयी पर । हरन्त्याम् = लेने वाली । दोषेषु बाह्यम् = दोष या अपराध में लिप्त न होने वाले । हनानी = मारा जाए । रुचिरं = अच्छा लगने वाला । पातकेषु = महा पापों में । अविज्ञाय = नहीं जान कर । उपालभसे = डांट रहे है । निवेदितम् प्रकट की है । अप्रभुत्वम् = अधीशता को । मङ्गलार्थे = अच्छा कार्य करने के लिए । अनया = इस अवदातिका के द्वारा । नैवाप्तम् = नहीं प्राप्त किया है । नोपपादितम् = नहीं [कि]या है । व्यवसितम् = सोचा है । श्वश्रू = सास । शुश्रूषा = सेवा । निर्वति- [तव्या] = की जानी चाहिए । वार्यताम् = मना करो । उत्सहे = समर्थ हूँ ।
( 61 )
श्लाघनीये = प्रशंसनीय । राहुदोषे = राहु से ग्रस लेने पर । तारा = चन्द्रमा की पत्नी रोहिणी । याति = चली जाती है । करेणु = हथिनो । पङ्कलग्नम् = कीचड़ मे फँसे हुए । व्रजतु = जाए । चरतु = आचरण करे । 'भर्तृनाथा = स्वामी के अधीन । आच्छिद्य = छीन कर । अननुभूताः = काम में नहीं लिए गए । निर्वर्त्यताम् = पूरा कीजिए । अन्वय-सत्यम् अवेक्षमाणे ताते धनु नमयि । स्वधनं हरन्त्यां मातरि शर मुञ्चानि, दोषेषु बाह्यम् अनुज भरत हनानि, त्रिषु पातकेषु रोषणाय किं रुचिरम् । (२२) अन्वय-यत्कृते महति क्लेशे राज्ये मे मनोरथ. न । चतुर्दश वर्षाणी त्वया वने वस्तव्यम् किल । (२३) अन्वय-अनया दत्तान् वल्कलान् तावत् मङ्गलार्थे आनय । अन्यः नृपै नैवाप्त नोपपादितं धर्म करोमि । (२४) अन्वय- राहुदोषे ऽपि तारा शशाकम् अनुचरति । च वनवृक्षे पतर्ति लता भूमि याति । करेणुः पंकलग्नं गजेन्द्र न त्यजति । व्रजतु धर्मम् चरतु । हि नार्यः भर्तृनाथा । (२५) हिन्दी अर्थ लक्ष्मण-आर्य यह आया । राम-तुमको शान्त करने के लिए ही मैने ऐसा कहा है । अब तुम ही बताओ । अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने वाले पिताजी पर धनुष उठाया जाये । पूर्व प्रतिज्ञात अपने विवाह शुल्क को माँगने वाली, माता पर वाण छोड़ूँ । अथवा निर्दोष बने हुए छोटे भाई भरत को मारूँ । इन तीनो भयंकर पापो मे से तुम्हारे क्रोध को कौन-सा अच्छा लगता है ? (२२) लक्ष्मण-(आँसू भर कर) हाय धिक्कार है । हमे विना जाने ही आप उलाहना दे रहे है । जिसके कारण महान् दुःख हो रहा है, उस राज्य के प्रति मेरी अभिलाषा नही है । मुझे पीडा यह है कि १४ वर्ष तक आपको वन में रहना पड़ेगा । (२३) राम-क्या इस पर महाराज बेंहोश हो गए । हाय, उन्होने तो अपनी अधीरता दिखा दी । हे सीते,
( 62 ) इस सेविका के द्वारा दिये गए ये वल्कल वस्त्र मुझे शुभ कार्य करने के लिए दो । मैं दूसरे राजाओं द्वारा नही प्राप्त किए गए और न किए गए आचरण को करूँगा । (२४) सीता--आर्यपुत्र लीजिए । राम- हे सीते ! तुमने क्या निश्चय किया है ? सीता-मैं तो आपकी सहधर्मचारिणी हूँ । राम-मुझे तो अकेले को ही जाना है । सीता-इसीलिए तो आपके साथ चल रही हूँ । राम-वहाँ तो जगल में रहना पड़ेगा । सीता-वह मेरे लिए राजमहल होगा । राम-तुमको सास-ससुर की सेवा भी तो करनी चाहिए । सीता-इसके लिए मैं देवताओ को प्रणाम करती हूँ । राम- हे लक्ष्मण, इसे रोको । लक्ष्मण-आर्य, ऐसे सम्माननीय अवसर पर इन देवी को नही रोक सकता हूँ क्योकि— राहु के द्वारा चन्द्रमा के ग्रहण कर लेने पर भी रोहिणी चन्द्रमा के साथ रहती है । वन मे वृक्ष के गिर जाने पर उसके साथ लिपटी हुई लता भी पृथ्वी पर आ जाती है । हथिनी कीचड़ मे सने हाथी को नही छोड़ती है । अत. यह सीता भा वन जाए और अपने धर्म (कर्त्तव्य) का आचरण करे क्योकि स्त्रियो के लिए तो पति ही सर्वस्व होते है । (२५) (प्रवेश करके) चेटी—महारानी की जय हो ! सज्जागृह की रक्षिका आर्या रेवा प्रणाम करके सूचित करती है कि अवमातिका मगीतशाला से कुछ वल्कल वस्त्र स्वय ही ले आई है । हो सकता है कि वे अच्छे नही हो । ये दूसरे नये वल्कल है । इनसे आप अपना प्रयोजन पूरा कर लीजिए । राम-भद्रे, इधर लाओ । यह तो सतुष्ट है । मुझे आवश्यकता है । चेटी-स्वामी ग्रहण करें । (उन्हे देकर निकल जाती है ।) (राम लेकर पहनते है ।) (१०) मूल लक्ष्मणः—प्रसीदत्वार्यः ।
( 65 ) अन्वय-वधूसहायं सौभ्रातृव्यवसितलक्ष्मणानुयात्रम् ते वनगमनं उत्थाय जीर्णः क्षितितलरेगुरूषिताङ्गः कान्तारद्विरदः इव उप- (३०) अन्वय—चीरमात्रोत्तरीयाणा वनवासिना किं दृश्यम् । राजा अस्मासु नः शिरःस्थानानि पश्यतु ॥ (३१) अर्थ ण—आप प्रसन्न होइए । आज तक आप सभी प्रकार के वस्त्र, आभूषण, माला आदि सभी पदार्थों मे से आधा देतेआए है । फिर अकेले ही इस वल्कल को क्यो बांध लिया है । क्या इस वल्कल में आप लोभी बन गए है । (२६) —हे सीते, इसे रोको । ता—लक्ष्मण, तुम रुक जाओ । मण—आर्य, तुम अकेली ही मेरे पूज्य राम के चरणों की सेवा करना चाहती हो । दाहिना पांव तुम्हारा है । मेरा बाया होगा । (२७) ता—आप पतिदेव दया करे । लक्ष्मण दुःखी हो रहा है । म—हे लक्ष्मण, सुनो । यह वल्कल—तपस्या रूपी युद्ध में कवच के समान, संयम रूपी हाथी को वश करने में अंकुश, इन्द्रिय रूपी घोडो के लिए लगाम तथा धर्म रूपी रथ का सारथी है, अतः तुम इनको ग्रहण करो । (२८) क्ष्मण—कृतकृत्य । (ले —इस समाचार मार्ग पर एकत्रित हो — है । इन्हे
( 64 ) चीरमात्रोत्तरीयाणां किं दृश्यं वनवासिनाम् । रामः— गतेष्वस्मासु राजा नः शिरःस्थानानि पश्यतु ॥ (३१) (इति निष्क्रान्ताः सर्वे) प्रथमोऽङ्कः। शब्दार्थ—निर्योगात् = वस्त्र, कञ्चुक आदि पहनने के उपयोगी वस्त्र से । सर्वेभ्यः = सभी भोग्य वस्तुओं से । चीरं = वल्कल । मत्सरी = लोभ की प्रवृत्ति । गुरोः = बड़े भाई राम की । दक्षिणः = दाहिना । सव्यः = बायां । दयतां = दया कीजिए । संतप्यते = व्यथित हो रहा है । सौमित्रिः = लक्ष्मण । नियमद्विरदांकुशः = वृत रूपी हाथी के वशीकरण का साधन । खलीनम् = लगाम (रवे अश्वमुखच्छिद्रे लीनम् इति) । धर्मसारथिः = धर्म रूपी रथ का चालक । परिवत्ते = पहनता है । सन्निरुद्धः = परिपूर्ण । राजमार्गः = सड़क । उत्सार्यताम् = हटाया जाए । यास्यामि = चलूंगा । अपनीयताम् = हटा दो । अवगुण्ठनम् = घूंघट । स्वैरं = यथेच्छ रूप में । कलत्रम् = स्त्री को अर्थात् सीता को । बाष्पाकुलाक्षैः = अश्रू भरे नेत्रों वाले । वदनैः = मुख से । भवन्तः = आप लोग । निर्दोषदृश्याः = दोषरहित दर्शनीय । व्यसने = आपत्ति- काल में । वधूसहायं = सीता के साथ । सौभ्रात्रव्यवसित = भाई के स्नेह से निश्चित मन वाले । लक्ष्मणानुयात्रम् = लक्ष्मण के अनुगमन को । रेणुरुषिता- ङ्गः = धूल से सने शरीर वाले । कान्तारद्विरद = जंगली हाथी । उपयाति आ रहे हैं । जीर्णः = वृद्ध । चीरमात्रोत्तरीयाणां = वल्कल रूपी रेशमी वस्त्र ले । किं दृश्यम् = क्या देखना । शिरःस्थानानि = प्रधान निवास स्थानों को । अन्वय—निर्योगात् भूषणात् माल्यात् सर्वेभ्यः मे अर्धम् प्रदाय एका- चीरम् बद्धम् । खलु चीरे मत्सरी असि । (२६) अन्वय—त्वम् एका गुरोः पादशुश्रूषां कर्तुम् इच्छसि । दक्षिणः तव एव । मम सव्यः भविष्यति । (२७) अन्वय—तपःसंग्रामकवचम् नियमद्विरदाङ्कुशः इन्द्रियाश्वानाम् खली- धर्मसारथिः गृह्यताम् । (२८) अन्वय—बाष्पाकुलाक्षैः वदनैः भवन्तः एतत् कलत्रम् स्वैरम् हि पश्यन्तु । नार्यः यज्ञे विवाहे व्यसने वने च निर्दोषदृश्याः हि भवन्ति । (२६)
२. तृतीय-चतुर्थ अङ्क: देवकुल में प्रतिमा-दर्शन, भरत का विलाप एवं पादुका-ग्रहण
( 65 ) अन्वय—वधूसहायं सौभ्रातृव्यवसितलक्ष्मणानुयात्रम् ते वनगमनं वा उत्थाय जीर्णः क्षितितलरेगुरुषिताङ्गः कान्तारद्विरदः इव उप- ते। (३०) अन्वय—चीरमात्रोत्तरीयाणां वनवासिनां किं दृश्यम् । राजा अस्मासु षु नः शिरःस्थानानि पश्यतु ॥ (३१) न्दी अर्थ क्ष्मण—आप प्रसन्न होइए । आज तक आप सभी प्रकार के वस्त्र, आभूषण, माला आदि सभी पदार्थों मे से आधा देतेआए है । फिर अकेले ही इस वल्कल को क्यो बाध लिया है । क्या इस वल्कल में आप लोभी बन गए है । (२६) ाम—हे सीते, इसे रोको । सीता—लक्ष्मण, तुम रुक जाओ । लक्ष्मण—आर्य, तुम अकेली ही मेरे पूज्य राम के चरणों की सेवा करना चाहती हो । दाहिना पांव तुम्हारा है । मेरा बायां होगा । (२७) सीता—आप पतिदेव दया करें । लक्ष्मण दुःखी हो रहा है । राम—हे लक्ष्मण, सुनो । यह वल्कल—तपस्या रूपी युद्ध में कवच के समान, संयम रूपी हाथी को वश करने में अंकुश, इन्द्रिय रूपी घोड़ो के लिए लगाम तथा धर्म रूपी रथ का सारथी है, अतः तुम इनको ग्रहण करो । (२८) लक्ष्मण—कृतकृत्य हो गया हूं । (लेकर पहनता है ) राम--इस समाचार को सुन कर पुरवासी लोग राजमार्ग पर एकत्रित हो गए है । इन्हे समझाकर हटा दीजिए । लक्ष्मण—आर्य, मैं आगे चलता हूँ । हट जाइए, हट जाइए । राम—सीते, अपना घू घट हटा दो । सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा । (घूंघट हटाती है) राम--हे हे पुरवासियो, आप लोग सुनिए, सुनिए । आप लोग निःशंक होकर अश्रुपूर्ण नेत्रो से सीता को देख ले । यज्ञ, विवाह, सकट और वन गमन के अवसर पर स्त्रियो को देखना निर्दोष है । (२६) (प्रवेश करके)
( 66 ) काञ्चुकीय—हे कुमार, मत जाइए । ये महाराज दशरथ-सीता के सँ आपका वनगमन तथा भ्रातृस्नेह के वशीभूत लक्ष्मण का अनुगमन न कर, वृद्ध महाराज उठ कर पृथ्वी की धूलि से धूसरित शरीर वा वन्य गजराज की भाँति काँपती चाल से आप लोगो को देखने के लि इधर ही आ रहे हैं । (३०) लक्ष्मण—आर्य, वस्त्र के रूप में केवल वल्कल मात्र को पहने हुए हम वन- वासियो को देखकर क्या करेंगे ? राम—हमारे चले जाने पर महाराज हमारे प्रधान निवास स्थानो को देखा करेंगे । (इस प्रकार सब निकल जाते हैं ) प्रथम अंक समाप्त ।
द्वितीय अंक (१) मूल (ततः प्रविशति काञ्चुकीयः) काञ्चुकीयः—भो भोः प्रतिहारव्यापृताः ! स्वेषु स्वेषु स्थानेष्वप्रमत्ता भवन्तु भवन्तः । (प्रविश्य) प्रतीहारी—आर्य ! किमेतत् ? काञ्चुकीयः—एष हि महाराजः सत्यवचनरक्षणपरो राममरण्यं गच्छन्तमुपावर्तयितुमशक्तः पुत्रविरहशोकाग्निना दग्धहृदय उन्मत्त इव बहु प्रलपन् समुद्रगृहके शयानः— मेरुश्चलन्निव युगक्षयसन्निकर्षे शोषं व्रजन्निव महोदधिरप्रमेयः । सूर्यः पतन्निव च मण्डलमात्रलक्ष्यः शोकाद् भृशं शिथिलदेहमतिर्नरेन्द्रः ॥ (१) प्रतीहारी—हा हा एवंगतो महाराजः । काञ्चुकीयः—भवति ! गच्छ । प्रतीहारी—आर्य ! तथा । (निष्क्रान्ता) काञ्चुकीयः—(सर्वतो विलोक्य) अहो नु खलु रामनिर्गमन दिना- दारभ्य शून्यैवेयमयोध्या सलक्ष्यते । कुतः— नागेन्द्रा यवसाभिलाषविमुखाः सास्रेक्षणा वाजिनो हेषाशून्यमुखः सवृद्धवनिताबालाश्च पौरा जनाः । त्यक्ताहारकथाः—सुदीनवदनाः क्रन्दन्त उच्चैर्दिशा रामो याति यया सदारसहजस्तामेव पश्यन्त्यमी ॥ (२) यावदहमपि महाराजस्य समीपवर्ती भविष्यामि । (परिक्रम्या- वलोक्य) अये ! अयं महाराजो महादेव्या सुमित्रया च सुदृ सहमपि पुत्रविरहसमुद्भव शोकं निगृह्यात्मानमेव संस्थापयन्ती-
( 68 ) भ्यामन्वास्यमानस्तिष्ठति । कष्टा खल्ववस्था वर्तते । एष एष महाराजः— पतत्युत्थाय चोत्थाय हा हेत्युच्चैर्लपन्मुहुः । दिशं पश्यति तामेव यया यातो रघूद्वहः ॥ (३) (निष्क्रान्तः) मिश्रविष्कम्भकः । शब्दार्थ—प्रतिहारव्यापृताः = द्वार पर नियुक्त पुरुष । अप्रमत्तः = सावधान । सत्यवचनरक्षणपरः = सत्य वाणी के पालन में तत्पर । उपावर्त- यितुम् = वापस लौटाने के लिए । अशक्तः - असमर्थ । प्रलपन् = निरर्थक बोलते हुए । समुद्रगृहके = समुद्रगृह नामक भवन में । मेरुः = सुमेरु पर्वत । चलन् = कम्पायमान् । युगक्षय-सन्निकर्षे = युगान्त के समीप आने पर । शोषं व्रजन् = सूखते हुए । महोदधिः = समुद्र । अप्रमेयः = जिसका निर्धारण नहीं किया जा सके । पतन् = गिरता हुआ । मण्डलमात्रलक्ष्यः = बिम्ब मात्र के समान दिखने वाला । भृश = बहुत अधिक । शिथिलदेहमतिः = सुन्न शरीर और बुद्धि वाले । यवस = कोमल घास । सास्रेक्षणा = अश्रु पूर्ण नेत्रों वाले । वाजिनः = घोड़े । हेषाशून्यमुखाः=शब्द रहित मुख वाले । त्यक्ताहारकथा = भोजन और बोलना छोड़ने वाले । सुदीनवदनाः = अत्यन्त मलिन मुख वाले । क्रन्दन्तः = रोते हुए । उच्चैः = जोर से । याति = गये है । सदारसहजः = स्त्री और भाई के साथ । अमी = ये । महादेव्या = कौसल्या के द्वारा । निगृह्य= रोक कर । संस्थापयन्तीभ्याम् = धैर्य बँधाती हुई । अन्वास्यमानः = सेवा किए जाते हुए । कष्टा=दुःखपूर्णा । उत्थाय=उठ कर । लपन् बोलते हुए । मुहुः = बार-बार । यया = जिस दिशा से । यातः = गए हैं । रघूद्वहः = रघुवंश में श्रेष्ठ अर्थात् राम । मिश्रविष्कम्भकः = नाटक में प्राप्त होने वाला एक विशेष पारिभाषिक शब्द, जिसमें बीती हुई और आगे होने वाली घटनाओं की सूचना रहती है । अन्वय-युगक्षयसन्निकर्षे चलन् मेरुः इव, शोषं व्रजन् अप्रमेयः महोदधिः इव, पतन् मण्डलमात्रलक्ष्यः सूर्यः इव, नरेन्द्रः शोकात् भृशं शिथिलदेहमतिः ।(१) अन्वय—अमी यवसाभिलाषविमुखाः नागेन्द्राः, सास्रेक्षणाः हेषाशून्य- मुखाः वाजिनः, त्यक्ताहारकथाः सुदीनवदनाः उच्चैः क्रन्दन्तःसवृद्धवनितावालाः पौराः जनः च यया दिशा सदारसहजः रामः याति, ताम् इव पश्यन्ति । (२)
( 69 ) अन्वय—उत्थाय च उत्थाय हा हा इति मुहुः उच्चैः लपन् पतति । या रघूद्वहः यात. ताम् एव दिशं पश्यति । (३) हिन्दी अर्थ (इसके वाद काञ्चुकीय श्राता है ) काञ्चुकीय—हे द्वारपालो, श्राप अपने स्थानों पर सावधान रहें । (प्रवेश करके) प्रतीहारी—श्रार्ये, यह क्या है ? काञ्चुकीय—ये प्रतिज्ञापालक महाराज दशरथ राम को वन जाने से लौटा न सके और अब पुत्रवियोग के दुःख की ज्वाला से सन्तप्त हृदय होकर पागलो के समान प्रलाप करते हुए समुद्रगृह मडल मे लेटे है, जो— प्रलय के समीप श्राने पर डगमगाते हुए सुमेरु के समान, सूखते हुए सागर के समान, गिरते हुए व मण्डल मात्र दीखने वाले सूर्य के समान श्रपार शोक सागर मे निमग्न दुर्बलकाय व हीन चेतना वाले होते जा रहे है । (१) प्रतीहारी—हाय, क्या महाराज ऐसे हो गए हैं । काञ्चुकीय—देवी, जाश्रो । प्रतीहारी—श्रार्य, ठीक हैं । (निकल जाती है ) काञ्चुकीय- (चारो श्रोर देख कर) अहो, जिस दिन से राम वन में गए है, यह अयोध्या सूनी सी दीख रही है । क्योकि— गजराजो ने चारा खाना छोड़ दिया है । श्रांसुश्रों से भरी आँखों वाले घोडो ने हिनहिनाना वन्द कर दिया है । वृद्ध, स्त्रियाँ, बालक और युवक सभी नगरवासियो ने भोजन की बात भुला दी है तथा जोर- जोर से रोने के कारण उनके चेहरे उतर गए है । ये सब उसी दिशा की ओर देखते रहते है, जिधर राम, लक्ष्मण और सीता गये हैं । (२) जितने मैं भी महाराज के पास चलूँ । (घूम कर श्रोर देख कर) श्ररे, ये महाराज बैठे है । कौसल्या तथा सुमित्रा श्रत्यन्त श्रसहनीय पुत्र वियोग को भी किसी भांति सह कर महाराज को आश्वासन देती हुई उनकी सेवा में लगी हैं - सचमुच मे बड़ी दु.खपूर्ण स्थिति है । श्रोर ये महाराज-
( ७० ) वार-वार उठ कर गिरते हैं, हाय हाय की रट लगाए जोर से विल करते हैं, फिर लड़खड़ाते है तथा उसी ओर एकटक निहार रहे जिधर से कि रघुश्रेष्ठ राम वन को गए हैं । (३) (निकल जाता है ) मिश्रविष्कम्भक (२) मूल (ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टो राजा देव्यौ च) राजा—हा वत्स ! राम ! जगता नयनाभिराम ! हा वत्स ! लक्ष्मण ! सलक्षणसर्वगात्र ! । हा साध्वि ! मैथिलि ! पतिस्थितचित्तवृत्ते ! हा हा गताः किल वनं वत मे तनूजा : ॥ (४) चित्रमिदं भोः, यद् भ्रातृस्नेहात् पितरि विमुक्तस्नेहमपि तावल्लक्ष्मणं द्रष्टुमिच्छामि । वधु ! वैदेहि ! रामेणापि परित्यक्तो लक्ष्मणेन च गर्हित. । अयशोभाजन लोके परित्यक्तस्त्वयाप्यहम् ॥ (५) पुत्र राम ! वत्स लक्ष्मण ! वधु वैदेहि ! प्रयच्छत मे प्रतिवच- नम् : न । पुत्रकाः ! शून्यमिद भोः ! न मे कश्चित् प्रतिवचनं प्रयच्छति । कौसल्यामातः ! क्वासि ? सत्यसन्ध ! जितक्रोध ! विमत्सर ! जगत्प्रिय ! । गुरुशुश्रू परो युक्त ! प्रतिवाक्यं प्रयच्छ मे ॥ (६) हा क्वासौ सर्वजनहृदयनयनाभिरामो राम. ? क्वासौ मयि गुर्वनुवृत्तिः ? क्वासौ शोकार्तेष्वनुकम्पा ? क्वासौ तृणवदग- णितराज्यैश्वर्यः ? पुत्र ! राम ! वृद्धं पितर मा परित्यज्य किमसम्बद्धेन धर्मेण ते कृत्यम् ? हा धिक् । कष्ट भोः ! सूर्य इव गतो रामः सूर्यम् दिवस इव लक्षमणोऽनुगतः । सूर्यदिवसावसाने छायेव न दृश्यते सीता ॥ (७) (ऊर्ध्वमवलोक्य) भोः कृतान्तहतक ! अनपत्या वयं रामः पुत्रोऽन्यस्य महीपतेः । वने व्या घ्रीच कैकेयी त्वया किं न कृत त्रयम् ॥ (८)
( 71 )
सल्या – (सरुदितम्) अलमिदानीं महाराजोऽतिमात्रं सन्तप्य परवशमात्मानं कर्तुम् । ननु सा तौ च कुमारौ महाराजस्य समयावसाने प्रेक्षितव्या भविष्यन्ति । राजा – कौ त्व भोः ! कौसल्या – अस्रिग्धपुत्रप्रसविनी खल्वहम् । राजा – कि कि सर्वजनहृदयनयनाभिरामस्य रामस्य जननी त्वमसि कौसल्या ? कौसल्या – महाराज सैव मन्दभागिनी खल्वहम् । राजा – कौसल्ये ! सारवती खल्वसि । त्वया हि खलु रामो गर्भे धृतः ! अहं हि दुःखमत्यन्तमसह्यं ज्वलनोपमम् । नैव सोढुं न संहर्तुम् शक्नोमि मुषितेन्द्रियः ॥ (६) राजा – (सुमित्रां विलोक्य) इयमपरा का ? कौसल्या -- महाराज ! वत्सलक्ष्मण- (इत्यर्धोक्ते) राजा – (सहसोत्थाय) क्वासौ क्वासौ लक्ष्मणः ? न दृश्यते । भोः कष्टम् । (देव्यौ ससम्भ्रमुत्थाय राजानमवलम्बेते) कौसल्या – महाराज ! वत्सलक्ष्मणस्य जननी सुमित्रेति वक्तुं मयोपक्रान्तम् । राजा – अयि सुमित्रे ! तवैव पुत्रः सत्पुत्रो येन नक्तन्दिवं वने । रामो रघुकुलश्रेष्ठश्छायेवेवानुगम्यते ॥ (१०) शब्दार्थ- यथानिर्दिष्ट = जैसा कहा गया है । नयनाभिराम = नेत्रों को सुन्दर लगने वाले । सलक्षणसर्वगात्र = अच्छे लक्षणो से युक्त पूरे शरीर वाले । साध्वि = हे पतिव्रते । पतिस्थितचित्तवृत्ते = पति मे विद्यमान मन की भावना वाली । बत = हाय । तनूजाः = सन्तान । चित्रम् = आश्चर्यजनक । विमुक्तस्नेहम् = प्रेम को छोड़ने वाले । गर्हितः = निन्दित । अयशोभाजनं = बुराई का पात्र । प्रयच्छत = दो । मे = मुझे । प्रतिवचनम् = उत्तर । कौसल्या- मातः = राम । सत्यसन्ध = अवितथ प्रतिज्ञा वाला । जितक्रोध = कोपावेग को
( 72 ) नियन्त्रण में रखने वाला। विमत्सर = शत्रुता से रहित। गुर्वनुवृत्तिः = मह अनुगति अर्थात् आज्ञापालन का भाव। शोकार्तेषु = पीडितों पर। अनुकम्पा = दया। तृणावद्गणितरा-ज्यैश्वर्यः = राज्यवैभव को तिनके के समान समझने वाले। असम्बद्धेन = सम्बन्धरहित। कृत्यम् = आचरण। कृतान्तहतक = दुष्ट यमराज। अनपत्या = सन्तानहीन। परवशं = पराधीन। प्रेक्षितव्या = देखने योग्य। अस्निग्ध-पुत्रप्रसविनी = प्रेमहीन पुत्र को पैदा करने वाली। मन्दभागिनी = अधन्य बनी। सारवती = प्रशस्त वस्तु वाली। ज्वलनोपमम् = अग्नि के समान। सोढुम् = सहन करने के लिए। संहर्तुम् = विनाश करने के लिए। मुषितेन्द्रियः = ठगी हुई इन्द्रियों वाला। ससम्भ्रमं = सहसा ही। उपक्रान्तम् = प्रारम्भ किया था। नक्तन्दिवं = रात और दिन। अन्वय—हा वत्स जगतां नयनाभिराम राम, हा वत्स सलक्षण- सर्वगात्र लक्ष्मण, हा साध्वि पतिस्थित-चित्तवृत्ते मैथिलि, वत मे तनुजाः हा हा किल वनं गताः। (४) अन्वय—रामेण अपि परित्यक्तः लक्ष्मणेन च गर्हितः, त्वया अपि परित्यक्तः अह लोके अयशोभाजनम्। (५) अन्वय—सत्यसन्ध, जितक्रोध, विमत्सर, जगत्प्रिय, गुरुशुश्रूषणे युक्त, मे प्रतिवाक्यं प्रयच्छ। (६) अन्वय—सूर्यः इव रामः गतः, दिवसः इव लक्ष्मणः सूर्यम् अनुगतः। सूर्यदिवसावसाने छाया इव सीता न दृश्यते। (७) अन्वय—वयम् अनपत्याः, रामः अन्यस्य महीपतेः पुत्रः, कैकेयी वने व्याघ्री च त्वया अद्य किं न कृतम्। (८) अन्वय—हि अहं मुषितेन्द्रियः अत्यन्तम् असह्यम् ज्वलनोपमं दुःखं नैव सोढुं नैव संहर्तुम् शक्नोमि। (९) अन्वय—तव पुत्रः एव सत्पुत्रः, येन वने रघुकुल-श्रेष्ठः रामः नक्तन्दिवं छायया इव अनुगम्यते। (१०) हिन्दी अर्थ (ऊपर कहे गए अनुसार राजा और देवियों का प्रवेश) राजा—हा वत्स संसार के नेत्रों को अच्छे लगने वाले राम, हा, सुलक्षण देह वाले वत्स लक्ष्मण, पतिपरायणा तथा विमल चरित्र वाली सीते, हाय, मेरे प्रिय बच्चे सचमुच वन मे चले गए। (४)
( 73 ) ओह, कैसा आश्चर्य है कि लक्ष्मण ने भाई के स्नेह के आगे पिता के स्नेह को तिलांजलि दे दी, फिर भी उसे देखने को मेरा हृदय लालायित हो रहा है। हे बहू सीते, राम ने मुझे छोड़ दिया, लक्ष्मण ने भी तिरस्कार कर दिया और तुम्हारे द्वारा परित्याग किया गया मैं संसार में अपयश का पात्र बना। (५) हे पुत्र राम, वत्स लक्ष्मण, बहू सीते, मुझे प्रत्युत्तर दो है। पुत्रों यह तो सब कुछ सूना है। अरे, कोई भी मुझे उत्तर नही दे रहा है। हे राम, तुम कहां हो ? हे सत्यप्रतिज्ञ, जितक्रोध, मात्सर्यशून्य, गुरु की सेवा में निरत, मुझे प्रत्युत्तर तो दो। (६). हा, वह सभी के हृदय और नेत्रों को सुन्दर लगने वाला राम कहां है। उसकी मुझ में गुरुभक्ति कहां है। दुःखी व्यक्तियों पर दया दिखाने वाला कहां है। राज्य भोग को तिनके के समान समझने वाला कहा है। हे पुत्र राम, मुझ वृद्ध पिता को छोड़ कर इस असम्बद्ध धर्म से तुझे क्या लेना-देना। हाय, धिक्कार है । कैसा भयंकर दुःख है। सूर्य के समान राम चला गया। सूर्य के पीछे दिन की भांति लक्ष्मण भी गया। सूर्य और दिन के चले जाने पर छाया की तरह सीता भी नही दिख रही है। (७) (ऊपर की ओर देख कर) अरे दुर्देव, मुझे निस्सन्तान, राम को किसी दूसरे राजा का पुत्र और कैकेयी को वन में सिंहनी बनाना चाहिए था। फिर तुमने ये तीनो कार्य क्यों नही किए। (८) कौसल्या—(रोती हुई), महाराज, अब आप अधिक दुःख न करें तथा विलाप करके अपना धैर्य न खोयें। चौदह वर्ष के व्यतीत होने पर आप सीता और उन दोनों राजकुमारों को अवश्य देखेंगे। राजा—अरे, तुम कौन हो ? कौसल्या—मैं उस अप्रिय पुत्र की जननी हूं । राजा—क्या तुम उस राम की मां कौसल्या हो, जो सभी के हृदय और नेत्रों के लिए सुन्दर है ?
( 74 ) कौसल्या—महाराज, मैं वही अभागिनी हूं। राजा—अरी कौसल्या, तुम तो धन्य हो। तुमने ही तो राम को गर्भ में धारण किया है। मैं तो नष्ट इन्द्रियों वाला, अत्यन्त असह्य और अग्नि तुल्य इस दुःख को न तो सह सकता हूं तथा न ही दूर करने में समर्थ हूं। (६) (सुमित्रा को देख कर) यह दूसरी कौन है ? कौसल्या—महाराज, पुत्र लक्ष्मण— (यों आधा कहने पर) राजा—(अचानक उठ कर) वह लक्ष्मण कहां है, कहां है ? नहीं दीख रहा है। हाय, बड़ा दुःख है। (दोनों रानियां घबराहट में उठ कर राजा को सहारा देती हैं) कौसल्या—महाराज, मैं तो यह कह रही थी कि यह पुत्र लक्ष्मण की जननी सुमित्रा है। राजा—अरी सुमित्रा, तेरा ही पुत्र सत्पुत्र है, जो रात दिन छाया की तरह वन में रघुकुल श्रेष्ठ राम के पीछे-पीछे चलता है। (१०) (३) मूल (प्रविश्य) काञ्चुकीयः जयतु महाराजः। एष खलु तत्रभवान् सुमन्त्रः प्राप्तः। राजा--(सहसोत्थाय सहर्षम्) अपि रामेण ? काञ्चुकीयः--न खलु, रथेन। राजा—कथं कथं रथेन केवलेन। (इति मूर्च्छितः पतति) देव्यौ—महाराज ! समाश्वसिहि समाश्वसिहि। (गात्राणि परा- मृशतः) काञ्चुकीयः—भोः ! कष्टम्। ईदृग्विधाः पुरुषविशेषा ईदृशीमापदं प्राप्नुवन्तीति (विधिरनतिक्रमणीयः) महाराज ! समाश्वसिहि समाश्वसिहि। राजा--(किञ्चित् समाश्वस्य) वालाके ! सुमन्त्र एक एव ननु प्राप्तः ? काञ्चुकीयः- महाराज ! अथ किम् ।
( 75 ) राजा—कष्टं भोः ! शून्य. प्राप्तो यदि रथो भग्नं मम मनोरथः । नूनं दशरथं नेतुं कालेन प्रेषितो रथः ॥ (११) तेन हि शीघ्रं प्रवेश्यताम् । काञ्चुकीयः—यदाज्ञापयति महाराजः । (निष्क्रान्तः) राजा—धन्या.खलु वने वातास्तटाकंपपरिवर्तिनः । विचरन्तं वने रामं ये स्पृशन्ति यथासुखम् ॥ (१२) (ततः प्रविशति सुमन्त्रः) सुमन्त्रः—(सर्वतो विलोक्य सशोकम्) एते भृत्याः स्वानि कर्माणि हित्वा स्नेहाद् रामे जातबाष्पाकुलाक्षाः । चिन्तादीनाः शोकसन्तप्तदेहा विक्रोशन्तं पार्थिवं गर्हयन्ति ॥ (१३) (उपेत्य) जयतु महाराजः । राजा—भ्रातः सुमन्त्र ! क्व मे ज्येष्ठो रामः— न हि न हि युक्तमभिहितं मया । क्व ते ज्येष्ठो रामः प्रियसुत ! सुतः सा क्व दुहिता विदेहानां भर्तु'निरतिशयभक्तिर्गुरुजने । क्व वा सौमित्रिर्म.म् हतपितृकमासन्नमरणं किमप्याहुः किं ते सकलजनशोकार्णवकरम् ॥ (१४) सुमन्त्रः—महाराज ! मा मैवममङ्गलवचनानि भाषिष्ठाः । अचिरा- देव तान् द्रक्ष्यसि । राजा—सत्यमयुक्तमभिहितं मया । नायं तपस्विनामुचितः प्रश्नः । तत् कथ्यताम् । अपि तपस्विनां तपो वर्धते ? अप्यरण्यानि स्वाधीनानि विचरन्ती वैदेही न परिखिद्यते ? सुमित्रा—सुमन्त्र ! बहुवल्कलालङ्कृतशरीरा बालाप्यबालचरित्रा भर्तुः सहधर्मचारिणी अस्मान् महाराज च किञ्चिन्नालपति ।
( 76 )
शब्दार्थ—तत्रभवान् = श्रीमान् । समाश्वसिहि = धीरज रखिए । परामृशतः = सहलाती है । ईदृग्विधाः = इस प्रकार के । पुरुष विशेषाः = लोकोत्तर पुरुष । ईदृशीमापद = ऐसे दुःख को । विधिः = भवितव्यता । अनतिक्रमणीय = अनुलंघनीय । बालाके = हे बालाकि (यह कञ्चुकी का नाम है) । शून्यं = सूना । भग्नः = टूट जाना । नेतुं = ले जाने के लिए । कालेन = यमराज के द्वारा । प्रेषितः = भेजा गया । वाताः = हवाएँ । तटाकपरिवर्तिन. = तालाबों पर चलने वाली । हित्वा = छोड़ कर । जात- बाष्पाकुलाक्षाः = आंसुओं से व्याकुल नेत्रों वाले । चिन्तादीनाः = चिन्ता से आर्त बने हुए । शोक सन्तप्तदेहा. = दुःख से पीड़ित शरीर वाले । विक्रोशन्तम् = विलाप करते हुए । गर्हयन्ति = निन्दा कर रहे है । दुहिता = पुत्री । हतपितृकम् अभागे पिता को । आसन्नमरण = जिसकी मृत्यु पास मे है । सकलजनशोकार्णवकरम् = पूरे लोक के लिए दुःख रूपी सागर के उत्पादक । भाषिष्ठाः = कहे । द्रक्ष्यसि = देखोगे । अयुक्त = अनुचित । अपि = क्या । परिखिद्यते = दुःखी होती है । अवालचरित्रा = प्रौढ आचरण वाली । सहधर्म- चारिणी = पत्नी । आलपति = कहती है । अन्वय—यदि रथः शून्य प्राप्तः, मम मनोरथः भग्नः । नूनं दशरथं नेतुं कालेन रथ प्रेषित. । (११) अन्वय—वने तटाकपरिवर्तिनः वाताः धन्याः खलु ये वनं विचरन्तं राम यथामुख स्पृशन्ति । (१२) अन्वय—एते भृत्याः रामे स्नेहात् जातवाष्पाकुलाक्षाः चिन्तादीनाः शोकसन्तप्तदेहा. स्वानि कर्माणि हित्वा विक्रोशन्तं पार्थिव गर्हयन्ति । (१३) अन्वय—प्रियसुत ! ते ज्येष्ठ सुतः राम. क्व ? सा गुरुजने निरतिश- यक्तिः विदेहानां भर्तुः दुहिता क्व ? सौमित्रि. वा क्व ? किं ते सकलजन- शोकार्णवकरम् आसन्नमरण हतपितृकं मा किमपि आहुः । (१४) हिन्दी अर्थ (प्रवेश करके) काञ्चुकीय महाराज की जय हो । ये श्रीमान् सुमन्त्र आए हैं । राजा— (अचानक उठ कर, प्रसन्नतापूर्वक) क्या राम के साथ ? काञ्चुकीय—नहीं, रथ के साथ ।
( 77 ) राजा—क्या ? केवल मात्र रथ के साथ । (बेहोश होकर गिर जाते हैं) देवियाँ—महाराज, धैर्य धारण कीजिए, धैर्य धारण कीजिए । (अंगों का स्पर्श करती है) काञ्चुकीय—अरे, बड़ा दुःख है । इस प्रकार के महापुरुष भी जब ऐसी आपत्ति को प्राप्त करते हैं, तो यह सच है कि होनी किसी से नहीं टाली जा सकती । महाराज, धीरज रखिए, धीरज रखिए । राजा—(कुछ संभल कर) हे वाताकि, सुमन्त्र क्या अकेले ही आए हैं ? काञ्चुकीय—महाराज, और क्या । राजा—अरे, बड़ा दुःख है । यदि रथ सूना ही आया है, तो मेरे हृदय की इच्छा तो टूट गई । ऐसा लगता है कि सचमुच मे दशरथ को ले जाने के लिए ही यम ने रथ भेजा है । (११) तो उसे जल्दी से बुलाओ । काञ्चुकीय - जैसी महाराज की आज्ञा । (निकल जाता है) राजा—सरोवरों में चलने वाली वे वन की हवाएं सौभाग्यशालिनी हैं, जो वन में विचरण करने वाले राम को आनन्दपूर्वक छू लेती हैं । (इसके बाद सुमन्त्र का प्रवेश) सुमन्त्र—(चारो ओर देख कर, दुःखपूर्वक) ये सेवक राम में अनुराग होने के कारण अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले, वेदना से दुःखी बने, कष्ट से तपे अंगों वाले होकर अपने कार्यों का परित्याग कर, रोते हुए राजा को कोस रहे हैं । (१३) (पास जाकर) महाराज की जय हो । राजा—हे भाई सुमन्त्र, मेरा बड़ा पुत्र राम कहां है— नही, नही, मैंने ठीक नहीं कहा । हे प्रियसुत सुमन्त्र, तुम्हारा बड़ा लड़का राम कहां है ? गुरुजनों पर अत्यधिक श्रद्धा रखने वाली, विदेहराज जनक की पुत्री, वह सीता कहां है ? अथवा सुमित्रा का पुत्र लक्ष्मण कहां है ? क्या उन्होंने सबके लिए शोकसामर को उपस्थित करने वाले, अब शीघ्र मरने वाले, मुझ अभागे पिता को भी कुछ कहा है । (१४)
( 78 ) सुमन्त्र—महाराज, इस प्रकार के अशुभ वाक्य मत कहिए। आप शीघ्र ही उन्हें देखेंगे ! राजा—सचमुच में मैंने अनुचित कहा है। यह तपस्वियों के योग्य प्रश्न नहीं है। अतः अब बताओ। क्या तपस्वियों का तप तो बढ़ रहा है। क्या वन में स्वेच्छा से घूमती हुई सीता दुःखी तो नहीं है। सुमित्रा—हे सुमन्त्र, बहुत से वल्कलों से आभूषित शरीर वाली, बाला होकर भी आदर्श आचरण वाली, पति के साथ धार्मिक कृत्य करने वाली सीता ने हमें और महाराज को क्या कुछ नहीं कहा है। (४) मूल सुमन्त्रः—सर्व एव महाराजम्— राजा—न न। श्रोत्ररसायनैर्मम हृदयातुरीषधैस्तेषां नामधेयैरेव श्रावय। सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति महाराजः। आयुष्मान् रामः। राजा—राम इति। अयं रामः। तन्नामश्रवणात् स्पृष्ट इव मे प्रति- भाति। ततस्ततः। सुमन्त्रः—आयुष्मान् लक्ष्मणः। राजा—अयं लक्ष्मणः। ततस्ततः। सुमन्त्रः—आयुष्मती सीता जनकराजपुत्री। राजा—इयं वैदेही। रामो लक्ष्मणो वैदेहीत्ययमक्रमः। सुमन्त्रः—अथ × कः क्रमः ? राजा—रामो वैदेही लक्ष्मण इत्यभिधीयताम्। रामलक्ष्मणयोर्मध्ये तिष्ठत्वत्रापि मैथिली। बहुदोषान्यरण्यानि, सनाथैषा भविष्यति ॥ (१५) सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति महाराजः। आयुष्माम् रामः। राजा—अयं रामः। सुमन्त्रः—आयुष्मती जनकराजपुत्री। राजा—इयं वैदेही। सुमन्त्रः—आयुष्मान् लक्ष्मणः। राजा—अयं लक्ष्मणः। राम ! वैदेहि ! लक्ष्मण ! परिष्वजध्वं मां पुत्रकाः !